गुरुवार, 3 अगस्त 2017

एक ओंकार सतनाम - प्रवचन-1

आदि सचु जुगादि सचु—(प्रवचन—पहला)
मंत्र:
इक ओंकार सतिनाम
करता पुरखु निरभउ निरवैर
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि।।

जपु:
आदि सचु जुगादि सचु।
है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

पोड़ी: 1
सोचे सोचि न होवई जे सोची लख बार।
चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिवतार
भुखिया भुख न उतरी जे बंना पुरीआं भार।
सहस सियाणपा लख होहित इक न चले नालि
किव सचियारा होइएकिव कूड़ै तुटै पालि।
हुकमि रजाई चलणा 'नानकलिखिआ नालि


क अंधेरी रात। भादों की अमावस। बादलों की गड़गड़ाहट। बीच-बीच में बिजली का चमकना। वर्षा के झोंके। गांव पूरा सोया हुआ। बसनानक के गीत की गूंज।
रात देर तक वे गाते रहे। नानक की मां डरी। आधी रात से ज्यादा बीत गई। कोई तीन बजने को हुए। नानक के कमरे का दीया जलता है। बीच-बीच में गीत की आवाज आती है। नानक के द्वार पर नानक की मां ने दस्तक दी और कहाबेटे! अब सो भी जाओ। रात करीब-करीब जाने को हो गई।
नानक चुप हुए। और तभी रात के अंधेरे में एक पपीहे ने जोर से कहापियू-पियू
नानक ने कहासुनो मां! अभी पपीहा भी चुप नहीं हुआ। अपने प्यारे की पुकार कर रहा हैतो मैं कैसे चुप हो जाऊं?इस पपीहे से मेरी होड़ लगी है। जब तक यह गाता रहेगापुकारता रहेगामैं भी पुकारता रहूंगा। और इसका प्यारा तो बहुत पास हैमेरा प्यारा बहुत दूर है। जन्मों-जन्मों गाता रहूं तो ही उस तक पहुंच सकूंगा। रात और दिन का हिसाब नहीं रखा जा सकता है। नानक ने फिर गाना शुरू कर दिया।

नानक ने परमात्मा को गा-गा कर पाया। गीतों से पटा है मार्ग नानक का। इसलिए नानक की खोज बड़ी भिन्न है। पहली बात समझ लेनी जरूरी है कि नानक ने योग नहीं कियातप नहीं कियाध्यान नहीं किया। नानक ने सिर्फ गाया। और गा कर ही पा लिया। लेकिन गाया उन्होंने इतने पूरे प्राण से कि गीत ही ध्यान हो गयागीत ही योग बन गयागीत ही तप हो गया।
जब भी कोई समग्र प्राण से किसी भी कृत्य को करता हैवही कृत्य मार्ग बन जाता है। तुम ध्यान भी करो अधूरा-अधूरा,तो भी न पहुंच पाओगे। तुम पूरा-पूरापूरे हृदय सेतुम्हारी सारी समग्रता सेएक गीत भी गा दोएक नृत्य भी कर लोतो भी तुम पहुंच जाओगे। क्या तुम करते होयह सवाल नहीं। पूरी समग्रता से करते हो या अधूरे-अधूरेयही सवाल है।
परमात्मा के रास्ते पर नानक के लिए गीत और फूल ही बिछे हैं। इसलिए उन्होंने जो भी कहा हैगा कर कहा है। बहुत मधुर है उनका मार्गरससिक्त! कल हम कबीर की बात कर रहे थे:
सुरत कलारी भई मतवारीमधवा पी गई बिन तौले
नानक वही हैंजो मधवा को बिना तौले पी गए हैं। फिर जीवन भर गाते रहे। ये गीत साधारण गायक के नहीं हैं। ये गीत उसके हैं जिसने जाना है। इन गीतों में सत्य की भनकइन गीतों में परमात्मा का प्रतिबिंब है।
दूसरी बातजपुजी के जन्म के संबंध में। जिस भादों की रात की मैंने बात कही--तब नानक की उम्र रही होगी कोई सोलह-सत्रह। जपुजी का जन्म हुआ तब उनकी उम्र थीछत्तीस वर्षछह माहपंद्रह दिन। जिस घटना का मैंने उल्लेख किया,उस भादों की रात वे साधक थे और तलाश में थे। प्यारे की पुकार चल रही थीपियू-पियू। अभी पपीहा रट लगा रहा था। अभी मिलन न हुआ था।
जपुजी का जब जन्म हुआ--यह मिलन के बाद उनका पहला उदघोष है। पपीहा ने पा लिया अपने प्यारे को। पियू-पियू की रटन पूरी हुई। मिलन हो गया। उस मिलन से जो पहला उदघोष हुआ हैवह जपुजी है। इसलिए नानक की वाणी में जो मूल्य जपुजी का है वह किसी और बात का नहीं। जपुजी ताजी से ताजी खबर है उस लोक की। वहां से लौट कर उन्होंने जो पहली बात कहीवह यही है। उस जगत से इस जगत में आ करजो पहले शब्द निर्मित हुए वही जपुजी है।
उस घटना को भी समझ लेना है।
नदी के किनारे रात के अंधेरे मेंअपने साथी और सेवक मरदाना के साथ वे नदी तट पर बैठे थे। अचानक उन्होंने वस्त्र उतार दिए। बिना कुछ कहे वे नदी में उतर गए। मरदाना पूछता भी रहाक्या करते हैंरात ठंडी हैअंधेरी है! दूर नदी में वे चले गए। मरदाना पीछे-पीछे गया। नानक ने डुबकी लगाई। मरदाना सोचता था कि क्षण-दो क्षण में बाहर आ जाएंगे। फिर वे बाहर नहीं आए।
दस-पांच मिनट तो मरदाना ने राह देखीफिर वह खोजने लग गया कि वे कहां खो गए। फिर वह चिल्लाने लगा। फिर वह किनारे-किनारे दौड़ने लगा कि कहां होबोलोआवाज दो! ऐसा उसे लगा कि नदी की लहर-लहर से एक आवाज आने लगी,धीरज रखोधीरज रखो। पर नानक की कोई खबर नहीं। वह भागा गांव गयाआधी रात लोगों को जगा दिया। भीड़ इकट्ठी हो गई।
नानक को सभी लोग प्यार करते थे। सभी को नानक में दिखाई पड़ती थी कुछ होने की संभावना। नानक की मौजूदगी में सभी को सुगंध प्रतीत होती थी। फूल अभी खिला नहीं थापर कली भी तो गंध देती है! सारा गांव रोने लगाभीड़ इकट्ठी हो गई। सारी नदी तलाश डाली। इस कोने से उस कोने लोग भागने-दौड़ने लगे। लेकिन कोई पता न चला। तीन दिन बीत गए। लोगों ने मान ही लिया कि नानक को कोई जानवर खा गया। डूब गएबह गएकिसी खाई-खड्ड में उलझ गए। मान ही लिया कि मर गए। रोना-पीटना हो गया। घर के लोगों ने भी समझ लिया कि अब लौटने का कोई उपाय न रहा।
और तीसरे दिन रात अचानक नानक नदी से प्रकट हो गए। जब वे नदी से प्रकट हुए तो जपुजी उनका पहला वचन है। यह घोषणा उन्होंने की।
कहानी ऐसी है--कहता हूंकहानी। कहानी का मतलब होता हैजो सच भी हैऔर सच नहीं भी। सच इसलिए है कि वह खबर देती है सचाई कीऔर सच इसलिए नहीं है कि वह कहानी है और प्रतीकों में खबर देती है। और जितनी गहरी बात कहनी होउतनी ही प्रतीकों की खोज करनी पड़ती है।
नानक जब तीन दिन के लिए खो गए नदी में तो कहानी है कि वे प्रकट हुए परमात्मा के द्वार में। ईश्वर का उन्हें अनुभव हुआ। जाना आंखों के सामने प्यारे कोजिसके लिए पुकारते थे। जिसके लिए गीत गाते थेजो उनके हृदय की धड़कन-धड़कन में प्यास बना था। उसे सामने पाया। तृप्त हुए। और परमात्मा ने उन्हें कहाअब तू जा। और जो मैंने तुझे दिया हैवह लोगों को बांट। जपुजी उनकी पहली भेंट है--परमात्मा से लौट कर।
यह कहानी है। इसके प्रतीकों को समझ लें। एककि जब तक तुम न खो जाओजब तक तुम न मर जाओ तब तक परमात्मा से कोई साक्षात्कार न होगा। नदी में खोओ कि पहाड़ मेंइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन तुम नहीं बचने चाहिए। तुम्हारा खो जाना ही उसका होना है। तुम जब तक हो तभी तक वह न हो पाएगा। तुम ही अड़चन हो। तुम ही दीवाल हो। तो यह जो नदी में खो जाने की कहानी है--तुम्हें भी खो जाना पड़ेगातुम्हें भी डूब जाना पड़ेगा। तीन दिन लगते हैं। इसलिए तो हमजब आदमी मर जाता हैतो तीसरा मनाते हैं। तीसरा हम इसलिए मनाते हैं कि मरने की घटना पूरी होने में तीन दिन लग जाते हैं। उतना समय जरूरी है। अहंकार मरता हैएकदम से नहीं। कम से कम समय तीन दिन लेता है। इसलिए कहानी में तीन दिन हैंकि नानक तीन दिन नदी में खोए रहे। अहंकार पूरा गल गयामर गया। और पास-पड़ोसमित्रोंप्रियजनोंपरिवार के लोगों को तो अहंकार ही दिखाई पड़ता हैतुम्हारी आत्मा तो दिखाई पड़ती नहींइसलिए उन्होंने तो समझा कि नानक मर गए।
जब भी कोई संन्यासी होता हैघर के लोग समझ लेते हैंमर गया। जब भी कोई उसकी खोज में जाता हैघर के लोग मान लेते हैंखत्म हुआ। क्योंकि अब यह वही तो न रहा। टूट गई पुरानी शृंखला। अतीत मिटाअब नया हुआ। बीच में तीन दिन की खाई है। इसलिए तीन दिन का प्रतीक है। तीन दिन बाद नानक लौट आए। जो भी खोता है वह लौट आता हैलेकिन नया हो कर लौटता है। जो भी जाता है उस मार्ग परवापस आता है। लेकिन जा रहा था तब प्यासा थाआता है तब दानी हो कर आता है। जाता था तब भिखारी थाआता है तब सम्राट हो कर आता है। जो भी परमात्मा में लीन होता हैजाते समयभिक्षापात्र होता हैलौटते समय अपरंपार संपदा होती है बांटने को। जपुजी पहली भेंट है।
परमात्मा के सामने प्रकट होनाप्यारे को पा लेनाइन्हें तुम बिलकुल प्रतीक कोभाषागत रूप से सच मत समझ लेना। क्योंकि कहीं कोई परमात्मा बैठा हुआ नहीं हैजिसके सामने तुम प्रकट हो जाओगे। लेकिन कहना हो बाततो और कुछ कहने का उपाय भी नहीं है। जब तुम मिटते हो तो जो भी आंख के सामने होता है वही परमात्मा है। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है;परमात्मा निराकार शक्ति है।
तुम उसके सामने कैसे हो सकोगेजहां तुम देखोगेवहीं वह है। जो तुम देखोगेवही वह है। जिस दिन आंख खुलेगी,सभी वह है। बस तुम मिट जाओआंख खुल जाए।
अहंकार तुम्हारी आंख में पड़ी हुई कंकड़ी है। उसके हटते ही परमात्मा प्रकट हो जाता है। परमात्मा प्रकट ही थातुम मौजूद न थे। नानक मिटेपरमात्मा प्रकट हो गया। जैसे ही परमात्मा प्रकट हो जाता हैतुम भी परमात्मा हो गए। क्योंकि उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
नानक लौटेपरमात्मा हो कर लौटे। फिर उन्होंने जो भी कहा हैएक-एक शब्द बहुमूल्य है। फिर उस एक-एक शब्द को हम कोई भी कीमत दें तो भी कीमत छोटी पड़ेगी। फिर एक-एक शब्द वेद-वचन हैं।
अब हम जपुजी को समझने की कोशिश करें।
इक ओंकार सतिनाम
करता पुरखु निरभउ निरवैर
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि।।
'वह एक हैओंकार स्वरूप हैसत नाम हैकर्ता पुरुष हैभय से रहित हैवैर से रहित हैकालातीत-मूर्ति हैअयोनि है,स्वयंभू हैगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।'
एक है--इक ओंकार सतिनाम
जो भी हमें दिखाई पड़ता है वह अनेक है। जहां भी तुम देखते होभेद दिखाई पड़ता है। जहां तुम्हारी आंख पड़ती है,अनेक दिखाई पड़ता है। सागर के किनारे जाते होलहरें दिखाई पड़ती हैं। सागर दिखाई नहीं पड़ता। हालांकि सागर ही है। लहरें तो ऊपर-ऊपर हैं।
पर जो ऊपर-ऊपर है वही दिखाई पड़ता हैक्योंकि ऊपर की ही आंख हमारे पास है। भीतर को देखने के लिए तो भीतर की आंख चाहिए। जैसी होगी आंखवैसा ही होगा दर्शन। आंख से गहरा तो दर्शन नहीं हो सकता। तुम्हारे पास आंख ही ऊपर की है। तो लहरों को देख कर लौट आओगे। और लोगों से कहोगे कि सागर हो आया। सागर में जाने का यह ढंग नहीं है। किनारे से तो दिखाई पड़ेंगी लहरें। सागर में हो तो डूबना ही पड़े। इसलिए तो कहानी है कि नानक नदी में डूब गए। लहरों में नहीं है वह,नदी में है। लहरों में नहीं हैसागर में है। ऊपर-ऊपर तो लहरें होंगी। तट से तुम देख कर लौट आओगेतो तुम जो खबर दोगे वह गलत होगी। तुम कहोगे कि सागर हो आया। सागर तक तुम गए नहीं। तट पर तो सागर नहीं हैवहां से तो लहरें दिखाई पड़ सकती हैं। लहरों का जोड़ भी सागर नहीं है। जोड़ से भी ज्यादा है सागर। और जो मौलिक भेद है वह यह है कि लहर अभी हैक्षण भर बाद नहीं होगीक्षण भर पहले नहीं थी।
एक सूफी फकीर हुआ जुन्नैद। बहुत प्रेम करता था अपने बेटे को। फिर बेटा अचानक मर गया किसी दुर्घटना मेंतो दफना आया। पत्नी थोड़ी हैरान हुई। पत्नी सोचती थी कि बेटा मरेगा तो जुन्नैद पागल हो जाएगाइतना प्रेम करता था बेटे को। लेकिन जैसे जुन्नैद को कुछ हुआ ही नहीं। जैसे बेटा मरा ही नहीं। जैसे कोई बात ही नहीं हुईजुन्नैद वैसा ही रहा। आखिर सांझ होते-होते जब लोग विदा हो गए सहानुभूति प्रगट करकेतो पत्नी ने पूछा कि कुछ दुख नहीं हुआ तुम्हेंमैं तो सोचती थी तुम टूट जाओगे। इस बेटे से तुम्हें इतना प्रेम था। जुन्नैद ने कहा कि एक क्षण को धक्का लगा थाफिर मुझे याद आयाजब यह बेटा नहीं था तब भी मैं था और खुश था। जब यह बेटा नहीं था तब भी मैं था और खुश थाअब यह बेटा नहीं है तो दुख होने का क्या कारण हैफिर वैसे ही हो गयाजैसे पहले था। बेटा बीच में आया और गया। न पहले दुखी था तो अब दुखी होने का क्या कारणबिना बेटे के मजे में था। अब फिर बिना बेटे के हूं। फर्क क्या हैबीच का एक सपना टूट गया।
जो बनता है और मिट जाता हैवह सपना है। जो आता है और चला जाता हैवह सपना है । लहरें सपना हैंसागर सच है। अनेक लहरें हैंएक सागर है। हमें अनेक दिखाई पड़ता है। और जब तक एक न दिखाई पड़ जाएतब तक हम भटकते रहेंगे। क्योंकि एक ही सच है।
इक ओंकार सतिनाम
और नानक कहते हैं कि उस एक का जो नाम हैवही ओंकार है। और सब नाम तो आदमी के दिए हैं। राम कहोकृष्ण कहोअल्लाह कहोये नाम आदमी के दिए हैं। ये हमने बनाए हैं। सांकेतिक हैं। लेकिन एक उसका नाम है जो हमने नहीं दिया;वह ओंकार हैवह ॐ है।
क्यों ओंकार उसका नाम हैक्योंकि जब सब शब्द खो जाते हैं और चित्त शून्य हो जाता है और जब लहरें पीछे छूट जाती हैं और सागर में आदमी लीन हो जाता है तब भी ओंकार की धुन सुनाई पड़ती रहती है। वह हमारी की हुई धुन नहीं है। वह अस्तित्व की धुन है। वह अस्तित्व की ही लय है। अस्तित्व के होने का ढंग ओंकार है। वह किसी आदमी का दिया हुआ नाम नहीं है। इसलिए ॐ का कोई भी अर्थ नहीं होता। ॐ कोई शब्द नहीं है। ॐ ध्वनि है और ध्वनि भी अनूठी है। कोई उसका स्रोत नहीं है। कोई उसे पैदा नहीं करता। अस्तित्व के होने में ही छिपी है। अस्तित्व के होने की ध्वनि है।
जैसे कि जलप्रपात हैतुम उसके पास बैठो तो प्रपात की एक ध्वनि है। लेकिन वह ध्वनि पानी और चट्टान की टक्कर से पैदा होती है। नदी के पास बैठोकल-कल का नाद होता है। लेकिन वह कल-कल का नाद नदी और तट की टक्कर से होता है। हवा का झोंका निकलता हैवृक्ष से सरसराहट होती है। लेकिन वह सरसराहट हवा और वृक्ष की टक्कर से होती है। हम बोलते हैंसंगीतज्ञ गीत गाता हैवीणा का कोई तार छेड़ता हैलेकिन सभी चीज संघर्ष से पैदा होती है। संघर्ष के लिए दो जरूरी हैं। तार चाहिए वीणा काहाथ चाहिए छेड़नेवाला। जितनी ध्वनियां द्वैत से पैदा होती हैंवे उसके नाम नहीं हैं। उसका नाम तो वही हैजब सब द्वैत खो जाता हैफिर भी एक ध्वनि गूंजती रहती है।
इस संबंध में कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं। विज्ञान कहता है कि सारे अस्तित्व को अगर हम तोड़ते चले जाएंऔर गहराई में विश्लेषण करेंतो अंत में हमें विद्युत-ऊर्जाइलेक्ट्रीसिटी मिलती है। इसलिए जो आखिरी खोज है विज्ञान कीवहइलेक्ट्रान हैविद्युतकण। सारा अस्तित्व विद्युत से बना है। अगर हम विज्ञान से पूछें कि ध्वनि किससे बनी हैतो विज्ञान कहता हैवह भी विद्युत से बनी है। ध्वनि भी विद्युत का एक आकार हैएक रूप है। लेकिन मूल विद्युत है।
इस संबंध में समस्त ज्ञानियों की विज्ञान से सहमति हैथोड़े से भेद के साथ। वह भेद बड़ा नहींवह भेद भाषा का है। समस्त ज्ञानियों ने पाया कि अस्तित्व बना है ध्वनि से और ध्वनि का ही एक रूप विद्युत है। विज्ञान कहता हैविद्युत का एक रूप ध्वनि हैऔर धर्म कहता है कि विद्युत ध्वनि का एक रूप है। इतना ही फासला है।
मगर यह फासला ऐसा ही दिखाई पड़ता है जैसे ग्लास आधा भरा होकोई कहे आधा भरा हैकोई कहे आधा खाली है। विज्ञान की पहुंच का द्वार अलग है। विज्ञान ने पदार्थ को तोड़त्तोड़ कर विद्युत को खोजा है। ज्ञानियों की पहुंच का मार्ग अलग है। उन्होंने अपने को जोड़-जोड़ कर--तोड़ कर नहींअपने को जोड़-जोड़ कर अखंड को पाया है। और उस अखंड में एक ध्वनि पाई है। जब कोई व्यक्ति समाधिस्थ हो जाता है तो ओंकार की ध्वनि गूंजती है। वह अपने भीतर उसे गूंजते पाता हैअपने बाहर गूंजते पाता है। सबसारे लोक उससे व्याप्त मालूम होते हैं।
चकित हो जाता है पहली बारजब घटता है। क्योंकि वह देखता है कि मैं तो बोल नहीं रहामैं तो कुछ कर नहीं रहा,यह ध्वनि कहां से आ रही हैतब वह अनुभव करता है कि यह होने की ध्वनि हैयह किसी टक्कर से पैदा नहीं हो रही है। यह आहत ध्वनि नहीं हैयह अनाहत नाद है।
नानक कहते हैंवही एक उसका नाम है--ओंकार। नानक बहुत बार नाम शब्द का प्रयोग करेंगे। इसे स्मरण रखना कि जब भी वे कहते हैंउसका नामऔर उसका नाम ही मार्ग हैऔर उसके नाम की रटन में जो डूब जाएगाउसके नाम में जो डूब जाएगा वह उसे पा लेगातो ध्यान रखनानाम जब भी नानक कहते हैंतब उनका इशारा ओंकार की तरफ है। क्योंकि वही एक उसका नाम है जो हमने नहीं दियाजो उसका ही है। हमारे दिए हुए नाम बहुत दूर न जा सकेंगे। और अगर थोड़े-बहुत जाते भी हैंतो इसलिए जाते हैं कि हमारे नामों में भी उसके नाम की थोड़ी-सी झलक होती है।
जैसे समझो कि राम। अगर कोई रामरामरामकी रटन लगा दे भीतरतो उसमें ओंकार की थोड़ी-सी झलक है। वह जो म है वह ॐ का है। इसलिए राम शब्द से भी थोड़ी दूर तक जा सकेंगे हम। लेकिन अगर तुम धुन को करते ही गएतो तुम एक दिन अचानक पाओगे कि राम की ध्वनि ओंकार में बदल गई। अगर तुम करते ही जाओगे तो जैसे ही मन शांत होगावैसे ही ॐ तुम्हारे राम में प्रविष्ट हो जाएगा। और तुम धीरे-धीरे पाओगे कि राम तो खो गयाॐ आ गया। समस्त ज्ञानियों का यह अनुभव है कि उन्होंने किसी भी नाम से शुरू किया होलेकिन आखिरी में ॐ आ जाता है। जैसे ही तुम शांत होने लगते हो,वैसे ही ॐ आने लगता है। ॐ सदा मौजूद हैबसतुम्हारे शांत होने की जरूरत है।
नानक कहते हैंइक ओंकार सतिनाम
यह सत शब्द भी समझ लेने जैसा है। संस्कृत में दो शब्द हैं। एक सत और एक सत्य। सत का अर्थ होता है एक्झिस्टेंसअस्तित्व। और सत्य का अर्थ होता है ट्रुथ। दोनों में बड़ा फर्क है। दोनों की मूल धातु तो एक है। सचसत्यसत,सब की मूल धातु एक है। लेकिन थोड़े से फर्क हैंवे समझ लेने जरूरी हैं। सत्य तो दार्शनिक की खोज है। वह खोजता है कि सत्य क्या हैव्हाट इज ट्रुथजैसेदो और दो मिल कर चार होते हैंयह सत्य है। कि दो और दो मिल कर पांच नहीं होतेदो और दो मिल कर तीन नहीं होतेदो और दो मिल कर चार होते हैं। यह गणित का सूत्र सत्य हैलेकिन सत नहीं है। क्योंकि यह मनुष्य का ही हिसाब है। दिस इज ट्रूबट नाट एक्झिस्टेंशियल। दो और दो मिल कर चार होते हैंयह मनुष्य की ही ईजाद है। यह सत्य तो हैसच नहीं है। सत नहीं है।
तुम सपना देखते हो रात। सपना सत तो हैसत्य नहीं है। सपना है तो! नहीं तो देखोगे कैसेहोना तो हैलेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि सत्य है। क्योंकि सुबह तुम पाते हो कि न होने के बराबर है। लेकिन हुआ जरूर! सपना घटा।
तो दुनिया में ऐसी घटनाएं हैंजो सत्य हैं और सत नहीं। और ऐसी भी घटनाएं हैंजो सत हैं लेकिन सत्य नहीं। गणित सत्य हैसत नहीं। गणित का एक निष्कर्ष सत्य हो सकता हैसत नहीं। सपना हैसपना सत हैसत्य नहीं।
परमात्मा दोनों है--सत भीसत्य भी। और इसलिए न तो उसे गणित से पाया जा सकता-- विज्ञान से उसे नहीं पाया जा सकताक्योंकि विज्ञान खोजता है सत्य कोऔर न उसे काव्यकलाआर्ट्स से पाया जा सकता हैक्योंकि कला खोजती है सत को। परमात्मा दोनों हैसत+सत्य। इसलिए न तो कला उसे पूरा खोज सकती है और न विज्ञान। दोनों अधूरे हैं।
और इसीलिए धर्म की खोज दोनों से पृथक है। धर्म उसकी तलाश हैजो दोनों हैएक साथ है। जो इतना सत्य है जितना कि गणित का कोई भी फार्मूला और जो इतना सत है जितनी काव्य की कोई भी धारणा। वह दोनों हैऔर दोनों नहीं है। अगर तुम आधे से देखोगे तो चूक जाओगे। अगर तुम दोनों को मिला कर देखोगे तो ही उसे पा सकोगे।
तो जब नानक कहते हैंएक ओंकार सतिनामतो इस सत में दोनों हैं--सत्य और सत। उस परम अस्तित्व का नाम--जो गणित की तरह सच हैऔर जो काव्य की तरह भी सत हैजो स्वप्न की तरह मधुरऔर गणित की तरह ठीक-ठीक सही है;जो हृदय की भावना की तरह भी हैऔर मस्तिष्क की प्रतीति की भांति भी है।
जहां मस्तिष्क और हृदय मिलते हैंवहीं धर्म शुरू होता है। अगर मस्तिष्क अकेला रहेहृदय को दबा देतो विज्ञान पैदा होता है। अगर हृदय अकेला रहेमस्तिष्क को हटा देतो कल्पना का जगतकाव्यसंगीतचित्रकला पैदा होती है। और अगर मस्तिष्क और हृदय दोनों मिल जाएंदोनों का संयोग हो जाएतो हम ओंकार में प्रवेश करते हैं।
धार्मिक व्यक्ति वैज्ञानिक से बड़ा वैज्ञानिककलाकार से बड़ा कलाकार हैक्योंकि उसकी खोज संयुक्त है। विज्ञान और कला द्वंद्व है। धर्म समन्वय हैसिन्थेसिस है।
नानक कहते हैंइक ओंकार सतिनाम
'वह एक ओंकार स्वरूपवह सत नामकर्ता पुरुष...।'
ये जो शब्द हैंइन्हें ऊपर से समझोगे तो भ्रांतियां होंगी।
ज्ञानियों की एक अड़चन है कि शब्द तो उन्हें तुम्हारे ही उपयोग करने पड़ते हैं। तुमसे बात करनी हैतुम्हारी ही भाषाबोलनी पड़ेगी। और जो वे कहना चाहते हैंवह भाषा के पार है। जो वे कहना चाहते हैंवह तुम्हारी भाषा में आ नहीं सकता। तुम्हारी भाषा बहुत संकीर्णवह बहुत विराट। जैसे कोई अपने घर में पूरे आकाश को समा लेना चाहे। जैसे कोई अपनी मुट्ठी में सारे प्रकाश को बांध लेना चाहेऐसी असमर्थता है। तो तुम्हारे ही शब्द उपयोग करने पड़ते हैं।
और तुम्हारे शब्दों के कारण ही इतने संप्रदाय पैदा हो जाते हैं। क्योंकि बुद्ध नानक से दो हजार साल पहले हुए। तो बुद्ध दूसरी भाषा का उपयोग करते हैंजो प्रचलित थीजो लोग समझते थे। कृष्ण और दो हजार साल पहले बुद्ध से हुए। वे और दूसरी भाषा का उपयोग करते हैंजो लोग समझते थे। मुहम्मद और दूसरी भाषा का उपयोग करते हैंक्योंकि दूसरी हवा,दूसरा मुल्कदूसरे ढंग के लोग। महावीर अलगजीसस अलग।
भाषाओं के भेद हैं। भाषा तुम्हारी वजह से अलग हैअन्यथा ज्ञानियों में कोई भी भेद नहीं। नानक जो भाषा का उपयोग कर रहे हैंवह नानक के समय समझी जा सकती थी।
तो नानक कहते हैंकर्ता पुरुष। वही बनाने वाला। लेकिन तत्क्षण हमें खयाल आता है कि अगर वही बनाने वाला हैऔर हम बनाए गए हैंतो द्वैत हो गया। और नानक तो शुरू में ही इनकार कर दिए हैं कि वह एक है। अगर वह बनाने वाला और स्रष्टा हैऔर सृष्टि अलग है जिसको उसने बनायातो द्वैत शुरू हो गया।
हमारी भाषा से अड़चन शुरू होती है। जैसे-जैसे नानक आगे बढ़ेंगे वैसे-वैसे अड़चन शुरू होगी। जो उन्होंने पहला शब्द बोला है समाधि के बादवह है--इक ओंकार सतिनाम
सच तो यह है कि पूरा सिक्ख धर्म इन तीन शब्दों में समाप्त हो जाता है। इसके आगे तो तुम्हें समझाने की कोशिश है,अन्यथा बात पूरी हो गयी। तुम नहीं समझोगे इससेइससे आगे फिर विस्तार करना पड़ता है। विस्तार तुम्हारे कारण है,अन्यथा मंत्र तो पूरा हो गया। बात तो पूरी हो गई। इक ओंकार सतिनाम--सब कह दिया। लेकिन तुम्हारे लिए तो अभी कुछ भी नहीं कहा गया। इन तीन शब्दों से क्या हल होगाकुछ हल नहीं होता। तब तुम्हारी भाषा की शुरुआत होती है।
'कर्ता पुरुष--वह बनाने वाला है।'
लेकिन ध्यान रखनाजो उसने बनाया है वह उससे अलग नहीं है। बनाने वालाबनायी हुई सृष्टि में छिपा है। कर्ता कृत्य में छिपा है। स्रष्टा सृष्टि में लीन है।
इसलिए नानक ने गृहस्थ को और संन्यासी को अलग नहीं किया। क्योंकि अगर कर्ता परमेश्वर अलग है सृष्टि सेतो फिर तुम्हें सृष्टि के काम-धंधे से अलग हो जाना चाहिए। जब तुम्हें कर्ता पुरुष को खोजना है तो कृत्य से दूर हो जाना चाहिए,कर्म से दूर हो जाना चाहिए। फिर बाजार हैदूकान हैकाम-धंधा हैउससे अलग हो जाना चाहिए।
नानक आखिर तक अलग नहीं हुए। यात्राओं पर जाते थेऔर जब भी वापस लौटते तो फिर अपनी खेती-बाड़ी में लग जाते। फिर उठा लेते हल-बक्खर। पूरे जीवनजब भी वापस लौटते घरतब अपना कामधाम शुरू कर देते। जिस गांव में वे आखिर में बस गए थेउस गांव का नाम उन्होंने करतारपुर रख लिया था--कर्ता का गांव।
अगर परमात्मा कर्ता हैतो तुम यह मत समझना कि वह दूर हो गया है कृत्य से। एक आदमी मूर्ति बनाता है। जब मूर्ति बन जाती है तो मूर्तिकार अलग हो जाता हैमूर्ति अलग हो जाती है। दो हो गए। मूर्तिकार के मरने से मूर्ति नहीं मरेगी। मूर्तिकार मर जाएमूर्ति रहेगी। मूर्ति के टूटने से मूर्तिकार नहीं मरेगा। मूर्ति टूट जाएमूर्तिकार बचेगा। दोनों अलग हो गए। परमात्मा और उसकी सृष्टि में ऐसा फासला नहीं है।
फिर परमात्मा और उसकी सृष्टि में कैसा संबंध हैवह ऐसा है जैसे नर्तक का। एक आदमी नाच रहा हैतो नृत्य है,लेकिन क्या तुम नृत्य को और नृत्यकार को अलग कर सकोगेनृत्यकार घर चला जाएनृत्य तुम्हारे पास छोड़ जा सकेगा?नृत्यकार मरेगानृत्य मर जाएगा। नृत्य रुकेगाफिर वह आदमी नर्तक न रहा। दोनों संयुक्त हैं। इसलिए हिंदुओं ने बड़े प्राचीन समय सेपरमात्मा को नर्तक की दृष्टि से देखा--नटराज! क्योंकि नटराज के प्रतीक में नर्तक और नृत्य अलग नहीं होते।
कवि भी कविता बनाए तो कविता से अलग हो जाता है। मूर्तिकार मूर्ति बनाएमूर्ति से अलग हो जाता है। मां बेटे को जन्म देजन्म देते ही अलग हो जाती है। पिता बेटे से अलग है। लेकिन परमात्मा सृष्टि से अलग नहीं है। सृष्टि में समाया हुआ है। अगर ठीक-ठीकतुम्हारी भाषा का उपयोग न किया जाएतो कहना होगा--द क्रियेटर इज द क्रियेशनवह जो स्रष्टा है,सृष्टि है। और भी अगर ठीक कहना हो तोद क्रियेटर इज नथिंग बट द क्रियेटीविटीस्रष्टा सृजन की प्रक्रिया है। वह स्वयं सृजन है।
इसलिए नानक कहते हैंकुछ छोड़ कर कहीं भागना नहीं है। जहां तुम होवहीं वह छिपा है। इसलिए नानक ने एक अनूठे धर्म को जन्म दिया हैजिसमें गृहस्थ और संन्यासी एक है। और वही आदमी अपने को सिक्ख कहने का हकदार हैजो गृहस्थ होते हुए संन्यासी होसंन्यासी होते हुए गृहस्थ हो। सिर के बाल बढ़ा लेने सेपगड़ी बांध लेने से कोई सिक्ख नहीं होता। सिक्ख होना बड़ा कठिन है। गृहस्थ होना आसान है। संन्यासी होना आसान हैछोड़ दोभाग जाओ जंगल। सिक्ख होना कठिन है। क्योंकि सिक्ख का अर्थ है--संन्यासीगृहस्थ एक साथ। रहना घर में और ऐसे रहना जैसे नहीं हो। रहना घर में और ऐसे रहना जैसे हिमालय पर हो। करना दूकानलेकिन याद परमात्मा की रखना। गिनना रुपएनाम उसका लेना।
नानक को जो पहली झलक मिली परमात्मा कीजिसको सतोरी कहें...इस नदी में तीन दिन डूब कर तो जो घटना घटी,वह समाधि की हैउसके बाद तो वे परम पुरुष हो गए। पर उसके पहले अनेक छोटी-छोटी झलकें मिलीं।
जो पहली झलक नानक को मिलीवह मिली एक दूकान परजहां वे तराजू से गेहूं और अनाज तौल रहे थे। अनाज तौल कर किसी को दे रहे थे। तराजू में भरते और डालते। कहते--एकदोतीन... दसग्यारहबारह...फिर पहुंचे वेतेरा। पंजाबी में तेरह का जो रूप हैवह तेरा। उन्हें याद आ गई परमात्मा की। तेरादाईनदाऊ--धुन बन गई। फिर वे तौलते गए लेकिन संख्या तेरा से आगे न बढ़ी। भरते तराजू मेंडालते और कहतेतेरा। भरते तराजू में और डालतेऔर कहतेतेरा। क्योंकि आखिरीपड़ाव आ गया। तेरा के आगे कोई संख्या हैमंजिल आ गई। तेरा पर सब समाप्त हो गया। लोग समझे कि पागल हो गए। लोगों ने रोकना भी चाहालेकिन वे तो किसी और लोक में हैं। वे तो कहे जाते हैंतेरा। डाले जाते हैं तराजू सेतौले जाते हैं और तेरा से आगे नहीं बढ़ते। तेरा से आगे बढ़ने को जगह भी कहां है?
दो ही तो पड़ाव हैंया तो मैं या तू। मैं से शुरुआत हैतू पर समाप्ति है।
नानक संसार के विरोध में नहीं हैं। नानक संसार के प्रेम में हैं। क्योंकि वे कहते हैं कि संसार और उसका बनाने वाला दो नहीं। तुम इसे भी प्रेम करोतुम इसी में से उसको प्रेम करो। तुम इसी में से उसको खोजो।
तो नानक जब युवा हुए और घर के लोगों ने कहा शादी कर लोतो उन्होंने नहीं न कहा। सोचते तो रहे होंगे घर के लोग कि यह नहीं कहेगाक्योंकि बचपन से ही इसके ढंगढंग के नहीं थे। नानक के बाप तो परेशान ही रहे। उनको कभी समझ में न आया कि क्या मामला है। भजन मेंकीर्तन मेंसाधु-संगत में...।
भेजा बेटे को सामान खरीदने दूसरे गांव। बीस रुपए दिए थे। सामान तो खरीदालेकिन रास्ते में साधु मिल गएवे भूखे थे। बाप ने चलते वक्त कहा थासस्ती चीज खरीद लाना और इस गांव में आ कर महंगे बेच देना। यही धंधे का गुर है। दूसरे गांव से सस्ते में खरीदनायहां आ कर महंगे में बेच देना। यहां जो चीज सस्ती हो खरीदनादूसरे गांव में महंगे में बेच देना। यही लाभ का रास्ता है। तो कोई ऐसी चीज खरीद कर लाना जिसमें लाभ हो। नानक लौटते थे खरीद करमिल गई साधुओं की एक जमातवे पांच दिन से भूखे थे। नानक ने पूछा कि भूखे बैठे हो! उठोकुछ करो। जाते क्यों नहीं गांव मेंउन्होंने कहा,यही हमारा व्रत है। कि जब उसकी मर्जी होगीवह देगा। तो हम आनंदित हैं। भूख से कोई अंतर नहीं पड़ता।
तो नानक ने सोचा कि इससे ज्यादा लाभ की बात क्या होगी कि इन परम साधुओं को यह भोजन बांट दिया जाए जो मैं खरीद लाया हूं! बाप ने यही तो कहा था कि कुछ काम लाभ का करो।
बांट दिया। साथी था साथ मेंमित्र था साथ मेंउसका नाम बाला था। उसने कहाक्या करते होदिमाग खराब हुआ है?नानक ने कहायही तो कहा था पिता ने कि कुछ लाभ का काम करना। इससे ज्यादा लाभ क्या होगाबांट कर बड़े प्रसन्न घर लौट आए।
इसलिए कहता हूंढंग के न थे। बाप ने कहा कि मूरख! ऐसे कहीं धंधा हुआ हैतू बरबाद कर देगा। और नानक ने कहा कि आप नहीं सोचते कि इससे ज्यादा लाभ की और क्या बात होगीलाभ कमा कर लौटा हूं।
लेकिन यह लाभ किसी को दिखाई नहीं पड़ता था। नानक के पिता कालू मेहता को तो बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता था। उनको तो लगता थालड़का बिगड़ गया। साधु-संगत में बिगड़ा। होश में नहीं है। सोचा कि शायद स्त्री से बांधने से कुछ राहत मिल जाएगी।
अक्सर ऐसा लोग सोचते हैं। सोचने का कारण है। क्योंकि संन्यासी स्त्री को छोड़ कर भागते हैं। तो अगर किसी को गृहस्थ बनाना होतो स्त्री से बांध दो। पर नानक पर यह तरकीब काम न आयी। क्योंकि यह आदमी किसी चीज के विरोध में न था।
बाप ने कहाशादी कर लो। नानक ने कहाअच्छा। शादी हो गई। लेकिन इसके ढंग में कोई फर्क न पड़ा। बच्चे हो गए,लेकिन इसके ढंग में कोई फर्क न पड़ा।
इस आदमी को बिगाड़ने का उपाय ही न थाक्योंकि संसार और परमात्मा में इसे कोई भेद न था। तुम बिगाड़ोगे कैसे?जो आदमी धन छोड़ कर संन्यासी हो गयाबिगाड़ सकते होधन दे दो। जो आदमी स्त्री छोड़ कर संन्यासी हो गयाएक सुंदर स्त्री को उसके पास पहुंचा दोबिगाड़ सकते हो। लेकिन जो कुछ छोड़ कर ही नहीं गयाउसको तुम कैसे बिगाड़ोगेउसके पतन का कोई रास्ता नहीं है। नानक को भ्रष्ट नहीं किया जा सकता।
इसलिए मैं भी पक्ष में हूं कि संन्यासी तो नानक के ही होने चाहिए। क्योंकि संन्यासी वही परम हैजिसको भ्रष्ट न किया जा सके। भ्रष्ट तुम उसी को न कर सकोगे जो ठीक तुम्हारे संसार में बैठा हैऔर फिर भी वहां नहीं है। तुम उसे कैसे भ्रष्ट करोगेउसने सब उपाय तोड़ दिए।
वह परमात्माजिसे नानक कहते हैंकर्ता पुरुषभय से रहित है।
क्योंकि भय तो वहीं होता है जहां दूसरा हो।
पश्चिम में ज्यां पाल सार्त्र का एक वचन बहुत प्रसिद्ध हो गया। वह वचन है: द अदर इज हेलदूसरा नरक है। तुम्हारा भी अनुभव यही है। कितनी बार तुम नहीं चाहते हो कि अकेला छूट जाऊं! दूसरा उपद्रव है। मित्र हो तो थोड़ा कम उपद्रव हैशत्रु हो तो थोड़ा ज्यादा उपद्रव है। अपना हो तो थोड़ा कम उपद्रव हैपराया हो तो थोड़ा ज्यादा उपद्रव है। लेकिन दूसरा उपद्रव है।
भय क्या हैदूसरे का भय है। कोई छीन न ले। कोई सुरक्षा न तोड़ दे। फिर मौत आ रही हैवह भी दूसरी है। बीमारी आ रही हैवह भी दूसरी है। भय क्या हैतुम दूसरे से घिरे होयही तुम्हारा नर्क है। द अदर इज हेलदूसरा नर्क है।
लेकिन तुम दूसरे से बचोगे कैसेहिमालय पर भी जा कर बैठ जाओ तो भी तुम अकेले न हो पाओगे। बैठोगे वृक्ष के नीचेकौवा बीट कर देगा। गुस्सा कौवे पर आ जाएगा। बैठोगेवर्षा आ जाएगीधूप आ जाएगी। दूसरे से तुम भागोगे कहांतुम जहां भी जाओगेतुम दूसरे को पाओगे। क्योंकि दूसरे से बचने का तो एक ही उपाय है कि तुम उस एक को खोज लो जहां कोई दूसरा नहीं रह जाता। फिर सब भय गिर जाता है। फिर मौत है ही नहीं। फिर बीमारी है ही नहीं। फिर असुविधा है ही नहीं। क्योंकि दूसरा ही न रहातुम ही हो। कोई अंतर नहीं है। भय तब तक रहेगा जब तक तुम्हें दूसरे दूसरे दिखाई पड़ते हैं।
इक ओंकार सतिनाम
जिसके मन में यह छा गयाउसे कैसा भयपरमात्मा को भय नहीं हो सकता। किसका भय होगावही है अकेला। उससे अन्यथा कोई भी नहीं है।
'अकाल भय से रहितवैर से रहितकालातीतअकाल मूरति।'
कालातीत मूर्ति है। समय के पार है--बियांड टाइम।
इसे थोड़ा समझ लो। समय का अर्थ ही होता है परिवर्तन। अगर कोई चीज परिवर्तित न हो तो तुम्हें समय का पता ही न चलेगा। घड़ी में भी समय का पता चलता है क्योंकि कांटा घूमता है। अगर कांटा न घूमे तो समय का पता न चलेगा। चीजें बदल रही हैं। सूरज उगादोपहर हो गईसांझ हो गई। बच्चा था जवान हो गयाजवान था बूढ़ा हो गयास्वस्थ बीमार हो गयाबीमार स्वस्थ हो गया। गरीब अमीर हो गयाअमीर का दिवाला निकल गयापरिवर्तन है। सब चीजें बदल रही हैं। नदी बही जाती है। इस परिवर्तन में ही समय है। समय का अर्थ ही होता हैदो परिवर्तन के बीच का फासला।
थोड़ा सोचोअगर आज सुबह तुम उठो और सांझ तक कुछ भी घटना न घटेकोई परिवर्तन न हो। सूरज खड़ा रहेजहां था। तुम्हारी उम्र उतनी ही बनी रहे जितनी थी। घड़ी का कांटा न हिलेवृक्ष बूढ़े न होंपत्ते कुम्हलाएं न। सब ठहर जाए। तो तुम्हें समय का कैसे पता चलेगासमय होगा ही नहीं।
तुम्हारे लिए समय का पता चलता हैक्योंकि तुम परिवर्तन से घिरे हो। परमात्मा के लिए कोई समय नहींक्योंकि वह सनातन हैशाश्वत हैसदा है। उसके लिए कुछ भी परिवर्तित नहीं हो रहा है। उसके लिए सब ठहरा हुआ है। परिवर्तन अंधी आंख का अनुभव है। परिवर्तन ऐसे है क्योंकि हमें पूरा नहीं दिखाई पड़ रहा है। अगर हमें पूरा दिखाई पड़ जाए तो हमें परिवर्तन समाप्त हो जाएगा। परिवर्तन के समाप्त होते ही समय खो जाता है। समय परिवर्तन को नापने का माध्यम है। परमात्मा के लिए सब वैसा का वैसा है। कुछ बदलता नहीं। सब ठहरा हुआ है।
'कालातीतअकाल मूरतिअयोनिस्वयंभू।'
वह किसी योनि से पैदा नहीं होता। परमात्मा का न कोई पिता है न कोई मां। और जो भी योनि से पैदा होता हैवह परिवर्तन की दुनिया में प्रवेश कर जाता है। तुम्हें भी अपने भीतर उसी को खोजना हैजो अयोनिज है। यह शरीर तो पैदा हुआ हैमरेगा। यह शरीर तो दो शरीरों के जोड़ से बना हैबिखरेगा। जब वे दो शरीर ही बिखर गए तो यह शरीर कैसे बचेगा जो उनसे मिल कर बना हैलेकिन इसके भीतर अयोनिज भी हैजो गर्भ में आयाजो गर्भ के पहले थाऔर जो अभी छोड़ दे तो शरीर मुरदे की भांति पड़ा रह जाएगा। इस शरीर के भीतर कालातीत प्रवेश किया है। अकाल पुरुष इस शरीर के भीतर भी मौजूद है। यह शरीर जैसे उसका सिर्फ वस्त्र मात्र है। एक घर हैजिसमें ठहर गया है।
लेकिन तुम जब इसे अपने भीतर पाओगे तभी तुम नानक की वाणी समझ पाओगे। तुम्हें अपने भीतर उसको खोजना है,जो न तो परिवर्तित होता हैन बदलता है।
अगर तुमने कभी थोड़ा भी आंख बंद कर के बैठने का अभ्यास किया हैतो तुम्हें एक बात खयाल में आयी होगी कि भीतर कोई उम्र नहीं है। तुम चालीस साल के हो कि पचास साल केभीतर कुछ पता नहीं चलेगा। तुम जब पांच साल के थे तब भी आंख बंद करते तो भीतर तुम अपने को वैसा ही पातेजैसा तुम पचास साल के हो कर पाओगे। जैसे भीतर के लिए समय बीता ही नहीं। आंख बंद कर के भीतर देखोतुम पाओगे वहां कुछ बदलता ही नहीं।
और यह जो भीतर अनबदला हैयह किसी योनि से पैदा नहीं हुआ है। तुम मां-बाप से आए होउनसे पैदा नहीं हुए हो। वे तुम्हारे आने के मार्ग हैंलेकिन वे तुम्हारे जन्मदाता नहीं हैं। तुम उनसे गुजरे होक्योंकि तुम्हारे शरीर को बनाने की व्यवस्था उनके भीतर थी। लेकिन जो उस शरीर के भीतर प्रविष्ट किया हैवह पार से आया है। अपने भीतर जिस दिन तुम अयोनिज को पाओगेउसी दिन तुम समझोगे कि परमात्मा की कोई योनि नहीं है। हो भी नहीं सकती। क्योंकि परमात्मा का अर्थ हैसमष्टि। परमात्मा का अर्थ हैद टोटेलिटी। यह पूरा का पूरा किससे पैदा होगापूरे के पार कुछ बचता ही नहींजो इसकी मां और पिता बन सके।
इसलिए अयोनि हैस्वयंभू हैअपने आप है। स्वयंभू का अर्थ हैअपने आप है। कोई सहारा नहीं है। किसी कारण से नहीं है। कोई आधार नहीं है। अपना ही आधार है। तुम भी जिस दिन अपने भीतर इस बात की थोड़ी सी झलक पाओगे उसी दिन मुक्त होओगे चिंता से।
तुम्हारी चिंता क्या हैचिंता यही है कि हर चीज का आधार है। और हर चीज का आधार छीना जा सकता है। छीनने से चिंता है। छीनने के खयाल से चिंता है। आज धन हैकल न होगा। फिर तुम क्या करोगेधन के कारण अमीर होअपने कारण अमीर नहीं हो।
संन्यासी अपने कारण अमीर है। उससे तुम छीन नहीं सकते। बुद्ध से तुम क्या छीनोगेनानक से तुम क्या छीनोगे?कुछ भी छीन कर तुम नानक को कम न कर पाओगे। कुछ दे कर ज्यादा न कर पाओगे। कुछ जोड़ नहीं सकते। कुछ घटा नहीं सकते। नानक जो भी हैंउस परम सहारे के साथ हैं। तुम्हारा कोई सहारा नहीं।
और वह परम सहारा अलग नहीं है। परमात्मा निराधार है। तुम भी निराधार हो। और जिस दिन तुम निराधार होने को राजी हो जाओगेउसी दिन परमात्मा और तुम्हारा मिलन हो जाएगा।
यह जो परमात्मा की व्याख्या हैयह व्याख्या दार्शनिक की व्याख्या नहीं है। यह व्याख्या साधक के लिए हैताकि तुम समझ जाओ कि परमात्मा के ये-ये लक्षण हैं। अगर तुम्हें परमात्मा को पाना हैतो इन्हीं-इन्हीं लक्षणों को तुम्हें अपनी साधना बना लेना है। छोटे रूप में तुम्हें परमात्मा होने की कोशिश में लग जाना है। जैसे-जैसे तुम उसके समान होने लगोगेवैसे-वैसे तालमेल बैठने लगेगा। दोनों के बीच धुन बजने लगेगी।
'अयोनिस्वयंभू हैवह गुरु कृपा से प्राप्त होता है।'
क्यों कहते हैं गुरु कृपा सेक्या मनुष्य का अपना श्रम काफी नहीं हैइस संबंध में एक सूक्ष्म बात समझ लेनी जरूरी है। क्योंकि नानक गुरु पर बहुत जोर देंगे। गुरु के बिना तो मिल ही नहीं सकता परमात्मावे कहेंगे। क्या कारण हैअगर परमात्मा मौजूद हैतो सीधा-सीधा मैं उससे मिल क्यों नहीं सकतागुरु को बीच में लेने की जरूरत क्या है?
कृष्णमूर्ति कहते हैंगुरु की कोई जरूरत नहीं। बुद्धि कोतर्क को ठीक भी मालूम पड़ता है। क्या जरूरतजब परमात्मा मौजूद हैमैं भी परमात्मा से पैदा हुआ हूंगुरु भी परमात्मा से पैदा हुआ हैतो गुरु को बीच में क्यों खड़ा करनाक्या आवश्यकता हैमन तो यह चाहता भी है कि गुरु बीच में खड़ा न किया जाए। इसलिए कृष्णमूर्ति के आसपास अहंकारी लोगों की जमात इकट्ठी हो गई है। कृष्णमूर्ति बिलकुल ठीक कहते हैंगुरु की जरूरत नहीं हैअगर तुम अपने अहंकार को खुद ही गिराने में समर्थ हो जाओ।
लेकिन अपने अहंकार को गिराना वैसा ही कठिन हैजैसे अपने ही जूते के बंध को पकड़ कर खुद को उठाना। अपने अहंकार को गिराना वैसे ही मुश्किल हैजैसे कुत्ता अपनी ही पूंछ को पकड़ने की कोशिश करे। जितने जोर से छलांग लगाता है उतनी जोर से पूंछ भी छलांग लगाती है। अपने अहंकार को तुम गिराओगे कैसेअगर गिरा सकते हो तो कृष्णमूर्ति ठीक कहते हैं। बिलकुल ठीक कहते हैं। कोई भी जरूरत नहीं है किसी गुरु की।
लेकिन वहीं सारी उलझन है। अगर तुम अपने अहंकार को गिराने में समर्थ भी हो जाओ और यह कहो कि मैंने अपना अहंकार गिरा दियातो यह नया अहंकार पैदा हो गया। यह पुराने से ज्यादा खतरनाक है। गुरु की इसीलिए जरूरत है कि यह दूसरा अहंकार पैदा न हो सके। तुम कहोगेगुरु प्रसाद से। नहीं तो तुम यह अहंकार बना लोगे कि मैं कितना विनम्र! मुझ जैसा कोई भी विनम्र नहीं है। अब यह मैं ने नए रास्ते पकड़े। यह अहंकार ने नयी तरकीबें खोजीं। कल कहता था मुझ से धनी कोई भी नहींअकड़! आज कहता है मुझ से विनम्र कोई भी नहींअकड़ वही है। रस्सी जल गईअकड़ रह गई। अकड़ को कौनमिटाएगाइसलिए नानक का जोर है।
परमात्मा को पाने में तो कोई अड़चन नहींसीधे ही पाया जा सकता है। क्योंकि वह सामने ही मौजूद है। तुम्हारी नाक के बिलकुल सीध में। जहां तुम जाते होसब तरफ वह मौजूद है। लेकिन एक अड़चन है। और वह अड़चन यह है कि तुम भीतर खड़े हो। इसे तुम कैसे गिराओगे?
इसलिए गुरु प्रसाद से। साधक श्रम करेगालेकिन धारणा यही रखेगा: होगा गुरु की कृपा से। यह जो गुरुकृपा की धारणा हैयह तुम्हारे अहंकार को बनने न देगी। पुराने को गिरा देगीनए को बनने न देगी। अन्यथा एक बीमारी जाती हैदूसरी उसकी जगह खड़ी हो जाती है।
और इसलिए एक बड़े मजे की घटना घटी है। कृष्णमूर्ति के पास अहंकारियों की जमात इकट्ठी हो गयी है। वह जमात उन लोगों की है जो किसी के सामने झुकना नहीं चाहते। उनको बिलकुल राहत मिल गई। किसी के चरण नहीं छूना चाहते। उनको बड़ा सहारा मिल गया। उन्होंने कहागुरु की कोई जरूरत ही नहींहम खुद ही पा लेंगे। और यही अड़चन है।
अगर नानक जैसा व्यक्ति कृष्णमूर्ति के पास होरामकृष्ण जैसा व्यक्ति कृष्णमूर्ति के पास होतो कोई अड़चन नहीं है। लेकिन जो लोग इकट्ठे होते हैं वे वे ही लोग हैं जो अहंकार गिराने में असमर्थ हैं। इनको गुरु की जरूरत है।
यह बड़े मजे की घटना है। कृष्णमूर्ति के पास जितने लोग हैं उनको गुरु की जरूरत है। नानक के पास जितने लोग थे,बिना गुरु के भी पा सकते थे। तुम कहोगे कि मैं पहेली खड़ी कर रहा हूं। नानक के पास जो लोग थेबिना गुरु के पा सकते थे,क्योंकि वे तैयार थे गुरुप्रसाद को स्वीकार करने को। वे तैयार थे अपने को छोड़ने को। पाया तो बिना गुरु के ही जाता हैलेकिन गुरु की धारणा तुम्हारे अहंकार को गिराने में सहयोगी हो जाती है। तुम अकड़ से नहीं भरते। नहीं तो तुम कहोगेशीर्षासन करता हूं तीन घंटे। सुबह ध्यान करता हूं।
एक पत्नी मेरे पास आयी और उसने कहा कि मेरे पति आपके पास आते हैंउन्हें कुछ समझाइए। अब हद हो गई। सिक्ख हैं पति।
क्या हुआ?
उसने कहावे रात दो बजे से उठ आते हैं और जपुजी का पाठ शुरू कर देते हैं। तो घर में सोना मुश्किल हो गया है। न बच्चे सो सकते हैंन मैं सो सकती हूं। और उनसे कुछ कहो तो वे कहते हैं कि तुम सब उठ कर पाठ करो। तो क्या करना?
मैंने पति को बुलायावे मेरे पास आते थे। मैंने उनसे पूछा कि कब उठ कर पाठ करते होउन्होंने कहा कि बस सुबहप्रभातकाल में। बसदो बजे सुबह उठ आता हूं।
उनके लिए दो बजे सुबह है! तो मैंने कहा कि तुम्हारी जो सुबह हैदूसरों के लिए बहुत खतरनाक हो गई।
वे बोलेवह उनकी गलती है। उनको सबको उठना चाहिए। आलसी हैंकाहिल हैंसुस्त हैं। और मैं तो सबकी सेवा ही कर रहा हूं। जोर से जपुजी का पाठ करता हूं। मुहल्ले-पड़ोस के लोगों के कान में भी पड़ जाती है आवाज।
मैंने उनसे कहा कि तुम ऐसा करोथोड़ी कम सेवा करो मुहल्ले-पड़ोस की। तुम चार बजे...।
धीरे-धीरे लाना उचित है। अन्यथा जो चढ़े हुए लोग हैं उनको उतारना बड़ा कठिन हो जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसा कभी नहीं हो सकता। आप क्या मुझसे मेरा धर्म छीनना चाहते हैं?
अब यही उनकी अकड़ है कि उन जैसा पाठ करने वाला कोई नहीं। और वही अकड़ बाधा है। जीवन भर दोहराते रहो जपुजी को। असली सवाल तो अकड़ का मिटना है।
इसलिए नानक बार-बार कहेंगे कि क्या तुम करते हो उससे कुछ भी न होगाजब तक कि तुम न मिट जाओ। यह गुरु की धारणा स्वयं को मिटाने की बड़ी कीमिया है। क्योंकि करो तुम कुछकहते तुम होगुरु प्रसाद से। उसकी कृपा से हो रहा है।
मैं कर रहा हूं--बस! अड़चन खड़ी हो जाएगी। अगर तुम अपने मैं को बिना किसी के सहारे के गिरा दोतो गुरु की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन करोड़ में कभी कोई एक व्यक्ति बिना गुरु के गिरा पाता है। इसलिए वह अपवाद है। उसको हमें गिनती में लेना नहीं चाहिए। उससे कारण नियम नहीं बनाना चाहिए।
कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि कोई व्यक्ति बिना गुरु के गिरा देता है। पर उसके लिए बड़ी गहरी समझ चाहिएजो तुम्हारे पास नहीं है। उसके लिए इतनी गहरी समझ चाहिए कि वह अहंकार को आंख के सामने खड़ा करके देख ले। और सिर्फ देखने से अहंकार गिर जाए। उसके लिए वैसी आंख चाहिए जैसी शिव के पास हैकि कामदेव को देख लिया और कामदेव भस्म हो गए। इतनी अवेयरनेसइतना होश चाहिए। कोई बुद्धकोई कृष्णमूर्ति कभी इतनी त्वरा से देख लेता है कि उसके देखने की उस तीव्रता में ही सब गिर जाता है। फिर दूसरा भाव पैदा नहीं होता। क्योंकि सब राख ही गिर गई। उसे खयाल ही नहीं होता कि मैंने कुछ किया है...हुआ!
लेकिन तुम तो कुछ भी करोगेतो भीतर एक धुन बजती रहती हैमैंने किया है। भजन करो तो मैंने किया हैध्यान करो तो मैंने किया हैपूजा करो तो मैंने की हैतुम्हारा मैं तो हर तरफ से बनता है।
उस एक को हम छोड़ दें। क्योंकि उस एक को बीच में लाने की कोई जरूरत भी नहीं है। वह पा लेगा। लेकिन वे जो करोड़ों लोग हैंउन करोड़ों लोगों के लिए पाने का एक ही उपाय है कि वे जो भी करें साधनाभाव यही रखें कि गुरु की कृपा से हो रहा है।
भारत में बड़ी पुरानी लोकोक्ति है कि जब सतयुग था तब गुरु की इतनी जरूरत न थीलेकिन कलियुग में गुरु की बड़ी जरूरत होगी। क्या कारण है! हिंदू किस हिसाब से बांटते हैं संसार कोसतयुग वे कहते हैं उस समय को जब लोग बड़े सचेत थेबड़े सावधान थे। और कलियुग कहते हैं उस युग कोजब लोग बड़े सोए हुए हैंमूर्च्छित हैं।
इसलिए बुद्ध का या महावीर का धर्म उतने काम का नहीं है आजजितना नानक का धर्म। नानक का धर्म नवीनतम धर्म है। हालांकि उसको भी पांच सौ साल हो गए। वह भी काफी पुराना हो गया है। और नया चाहिए। क्योंकि बुद्ध और महावीर जिनसे बात कर रहे थे वे हमसे ज्यादा सचेत लोग थे। वे हमसे ज्यादा प्रबुद्ध लोग थे। वे हमसे ज्यादा सरल लोग थे। फिर कृष्ण जिनसे बात कर रहे थे वे और भी सरल लोग थे। जैसे हम पीछे जाते हैंवैसे सरलता है। जैसे एक आदमी अपने पीछे जाए तो बचपन में सरल होता हैजवानी में थोड़ा कठिन हो जाता हैबुढ़ापे में तो बिलकुल जटिल हो जाता है। बूढ़े आदमी से तो पार पाना ही मुश्किल है। उसे कुछ भी पता नहींलेकिन वह समझता है सब मुझे पता है। जिंदगी की टक्करें खायी हैंइधर-उधर गिरा हैकहता है अनुभव बहुत है। ठीकरे इकट्ठे किए हैंलेकिन वह सोचता है बड़े अनुभव से ज्ञान इकट्ठा कर लिया है।
बच्चा सरलवह सतयुग है। बूढ़ा बहुत जटिलवह कलियुग है। और बूढ़े की मूर्च्छा बढ़ती ही जाती है। बढ़नी ही चाहिए क्योंकि मौत करीब आ रही है। बच्चे का होश ताजा होता है क्योंकि अभी जीवन का स्रोत बहुत करीब है। बच्चा अभी परमात्मा से निकली लहर की भांति है। बूढ़ा धूल से भर गयापरमात्मा में गिरने के करीब है। बच्चा ताजा फूल हैबूढ़ा मुरझा गयाजाने के करीब हैजीवन ऊर्जा क्षीण हो रही है।
कलियुग का अर्थ है ऐसा समयजब अंत करीब आ रहा है। जिंदगी बूढ़ी हो गयी। उस कलियुग में तो गुरु के बिना बिलकुल न हो सकेगाक्योंकि तुम हर हालत में अपने अहंकार से भर जाओगे।
जब तुम छोटे-छोटे काम करके अहंकार से भर जाते होतो तुम साधना करके कैसे न भरोगे। तुमने एक छोटा सा मकान बना लिया हैतुम अकड़े फिरते होकि तुमने एक तिजोड़ी भर लीतुम अकड़े फिरते हो। जब तुम परम धन की खोज में जाओगे तो तुम्हारी अकड़ तो बहुत हो जाएगी।
तो जो आदमी मंदिर जाता हैमस्जिद जाता हैउसकी अकड़ देखो। वह सबकी तरफ देखता है कि तुम सब नरक मेंपड़ोगेसड़ोगे। मैं मंदिर जाता हूं रोज। तुम सब भ्रष्टपापी। जो आदमी राम नाम ले लेता हैवह समझता है कि बस! स्वर्ग का द्वार उसके लिए निश्चित हो गया। और शेष सब नरक में पड़ने वाले हैं।
मूर्च्छा जितनी होगीउतनी गुरु की जरूरत है। इसको तुम ऐसा समझ लो जितनी तुम्हारे जीवन में निद्रा होउतना गुरु जरूरी। जितनी तुम्हारे जीवन में जागृति होउतना गुरु कम जरूरी। अगर तुम परिपूर्ण जागरूक होगुरु की बिलकुल जरूरत नहीं। अगर तुम बिलकुल सोए हो तो तुम अपने आप जागोगे कैसेकोई तुम्हें हिलाएगातो ही तुम जग सकते हो। तब भी डर है कि तुम करवट ले कर सो जाओगे।
'वह गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।'
आदि सचु जुगादि सचु।
है भी सचु नानक होसी भी सचु।।
'वह आदि में सत्य हैयुगों के आरंभ में सत्य हैअभी सत्य है। नानक कहते हैंवह सदा सत्य है। भविष्य में भी सत्य है।'
सत्य और असत्य की यही परिभाषा है। असत्य वह जो कभी नहीं थाअब हैऔर कभी फिर नहीं हो जाएगा। असत्य का अर्थ है दो छोरों पर जो नहींऔर बीच में है! सपना...सुबह तुम उठे तब खो गयारात तुम जब सोए तब नहीं था। इसलिए तो सुबह तुम कहते हो सपना झूठा थासच नहींक्योंकि सांझ नहीं थासुबह फिर नहीं है। तुम्हारा यह शरीर एक दिन नहीं था। एक दिन फिर नहीं हो जाएगा। यह शरीर झूठा है। क्रोध आयाएक क्षण पहले नहीं थाऔर घड़ी भर बाद फिर चला जाएगा। यह क्रोध सपना हैयह सच नहीं है। जो सदा हैवही सत्य है। और अगर तुम इस धारणा को गहरे ले जाओ तो तुम्हारे जीवन में रूपांतरण हो जाएगा। उससे बहुत ज्यादा ग्रसित मत होना जो बदलता है। तुम उसी की तलाश करना जोअबदला हैसदा स्थायी और थिर है।
कौन है तुम्हारे भीतर जो कभी नहीं बदलताउसको ही खोजो। जरूर वह तुम्हारे भीतर है। क्योंकि सब बदलाहट उसी पर होती है। जैसे गाड़ी का चाक चलता है। तो एक कील पर चलता हैजो ठहरी रहती है। चाक चलता रहता हैकील ठहरी रहती है। तुम कील को अलग कर लोचाक फौरन गिर जाएगा। जो परिवर्तन हो रहा है वह भी शाश्वत के ऊपर हो रहा है। कील आत्मा की ठहरी हुई हैशरीर का चक्र घूम रहा है। जैसे ही कील अलग हुईचाक गिर जाता है।
नानक कहते हैं--
आदि सचु जुगादि सचु।
है भी सचु नानक होसी भी सचु।।
वही सत्य है। वही एकक्योंकि वह पहले भी थाअभी भी हैकल भी होगासदा रहेगा। और शेष सब सपना है। यह एक वचन अगर तुम्हारे मन में गहरा बैठ जाए...जब क्रोध आएतब दोहराना अपने मन में--
आदि सचु जुगादि सचु।
है भी सचु नानक होसी भी सचु।।
घृणा आएलोभ आएदोहराना। और ध्यान रखना कि जो अभी नहीं थाअभी हुआसपना है। खो जाएगा। इसमें ज्यादा ग्रसित होने की जरूरत नहीं है। साक्षीभाव रखना। धीरे-धीरे तुम पाओगे कि व्यर्र्थ अपने आप गिरने लगाक्योंकि तुम्हारे उससे संबंध टूट गए और सार्र्र्थक का जन्म होने लगा। शाश्वत उठने लगासंसार खोने लगा।
सोचे सोचि न होवई जे सोची लख बार।
चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिवतार
भुखिया भुख न उतरी जे बंना पुरीआं भार।
सहस सियाणपा लख होहित इक न चले नालि
किव सचियारा होइएकिव कूड़ै तुटै पालि।
हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि
यह बड़ा कीमतीबहुमूल्य सूत्र है। नानक का सब सार।
'सोच-सोच कर भी हम उसे सोच नहीं सकते। यद्यपि हम लाखों बार सोच सकते हैं।'
सोच-सोच कर उसे कभी किसी ने पाया नहीं। सोच-सोच कर ही तो हमने उसे गंवाया है। जितना हम सोचते हैं उतने ही तो विचारों में हम खो जाते हैं। परमात्मा कोई विचार नहीं है। वह कोई तर्क की निष्पत्ति नहीं है। वह कोई मस्तिष्क का निष्कर्ष नहीं है। परमात्मा तो सत्य है। तुम्हें सोचने का सवाल नहींदेखना है। सोचने से क्या होगासोचने में तो और भटक जाओगे। आंख खोलनी है।
और अगर आंखें विचारों से भरी हैंतो तुम्हारी आंखें अंधी रहेंगी। आंख निर्विचार चाहिएतभी दर्शन उपलब्ध होता है। जिसको झेन फकीर कहते हैंनो माइंड। जिसको कबीर कहते हैंउन्मनी दशा। जिसको बुद्ध कहते हैंचित्त का खो जाना। जिसको पतंजलि ने कहा हैनिर्विकल्प समाधि। सब विकल्प और विचार जहां खो गएवही नानक कह रहे हैं।
'सोच-सोच कर भी हम उसे सोच नहीं सकतेयद्यपि हम लाखों बार सोचते रहें। चुप होने से भी उस मौन को उपलब्ध नहीं हुआ जा सकतायद्यपि हम लगातार ध्यान में रह सकते हैं।'
क्योंसोच-सोच कर उसे पाया नहीं जा सकताचेष्टा कर-कर के मौन साधा नहीं जा सकता। क्योंक्योंकि जितनी तुम चेष्टा करोगेउतना ही तुम पाओगेमौन असंभव हो जाता है। कुछ चीजें हैंजो चेष्टा से नहीं घटतीं। जैसे नींद नहीं आती किसी कोतो कितनी ही चेष्टा करे नींद नहीं आएगी। सच तो यह है जितनी चेष्टा करेगा उतनी नींद मुश्किल हो जाएगी,क्योंकि नींद का अर्थ ही यह है कि तुम सब चेष्टा छोड़ दोतभी आएगी। तुम कोशिश जारी रखोगेकोशिश तुम्हें जगाए रखेगी। जागने से कहीं नींद आयी हैकोई उपाय नींद लाने का नहीं। क्योंकि नींद आती तब हैजब तुम निरुपाय हो जाते हो। जब तुम कोई उपाय नहीं करते हो। पड़े हो बिस्तर पर निरुपायतभी नींद आ जाती है।
तुम अपने को जबर्दस्ती कैसे मौन करोगेतुम बैठ सकते हो। शरीर को साध सकते हो पत्थर की मूर्ति की तरहभीतर मन उबलता रहेगा।
नानक एक मुसलमान नवाब के घर मेहमान थे। नानक को क्या हिंदू क्या मुसलमान! जो ज्ञानी हैउसके लिए कोई संप्रदाय की सीमा नहीं। उस नवाब ने नानक को कहा कि अगर तुम सच ही कहते हो कि न कोई हिंदू न कोई मुसलमानतो आज शुक्रवार का दिन हैहमारे साथ नमाज पढ़ने चलो। नानक राजी हो गए। पर उन्होंने कहा कि अगर तुम नमाज पढ़ोगे तो हम भी पढ़ेंगे। नवाब ने कहायह भी कोई शर्त की बात हुईहम पढ़ने जा ही रहे हैं।
पूरा गांव इकट्ठा हो गया। मुसलमान-हिंदू सब इकट्ठे हो गए। हिंदुओं में तहलका मच गया। नानक के घर के लोग भी पहुंच गए कि यह क्या कर रहे होलोगों को लगा कि नानक मुसलमान होने जा रहे हैं। लोग अपने भय से ही दूसरों को भी तौलते हैं।
नानक मस्जिद गए। नमाज पढ़ी गई। नवाब बहुत नाराज हुआ। बीच-बीच में लौट-लौट कर देखता था कि नानक न तो झुकेन नमाज पढ़ी। बस खड़े हैं। जल्दी-जल्दी नमाज पूरी कीक्योंकि क्रोध में कहीं नमाज हो सकती है! करके किसी तरह पूरीनानक पर लोग टूट पड़े। और उन्होंने कहातुम धोखेबाज हो। कैसे साधुकैसे संत! तुमने वचन दिया नमाज पढ़ने का और तुमने की नहीं।
नानक ने कहावचन दिया थाशर्त आप भूल गए। कहा था कि अगर आप नमाज पढ़ोगे तो मैं पढूंगा। आपने नहीं पढ़ी तो मैं कैसे पढ़ता?
नवाब ने कहाक्या कह रहे होहोश में होइतने लोग गवाह हैं कि हम नमाज पढ़ रहे थे।
नानक ने कहाइनकी गवाही मैं नहीं मानताक्योंकि मैं आपको देख रहा था भीतर क्या चल रहा है। आप काबुल में घोड़े खरीद रहे थे।
नवाब थोड़ा हैरान हुआक्योंकि खरीद वह घोड़े ही रहा था। उसका अच्छे से अच्छा घोड़ा मर गया था उसी दिन सुबह। वह उसी की पीड़ा से भरा था। नमाज क्या खाक! वह यही सोच रहा था कि कैसे काबुल जाऊंकैसे बढ़िया घोड़ा खरीदूंक्योंकि वह घोड़ा बड़ी शान थीइज्जत थी।
और नानक ने कहायह जो मौलवी है तुम्हाराजो पढ़वा रहा था नमाजयह खेत में अपनी फसल काट रहा था।
और यह बात सच थी। मौलवी ने भी कहा कि बात तो यह सच है। फसल पक गयी है और काटने का दिन आ गया है,गांव में मजदूर नहीं मिल रहे हैं और चिंता मन पर सवार है।
तो नानक ने कहाअब तुम बोलोतुमने नमाज पढ़ी जो मैं साथ दूं?
तुम जबर्दस्ती नमाज पढ़ लोतुम जबर्दस्ती ध्यान कर लोतुम जबर्दस्ती पूजा-प्रार्थना कर लोक्या तुम कर रहे हो इसका कोई मूल्य नहीं है। क्या तुम्हारे भीतर चल रहा हैतुम पत्थर की मूर्ति की तरह बैठ जाओइससे क्या होगाशरीर को साध लोगेइससे क्या मन सधेगामन में तो वही चलता रहेगा जो चल रहा था। और भी जोर से चलेगा। क्योंकि जब शरीर काम में लगा था तो शक्ति बंटी थी। अब शरीर बिलकुल निष्क्रिय हैसारी शक्ति मन को मिल गई। अब मन में और जोर से विचार उठेंगे।
इसलिए लोग जब भी ध्यान करने बैठते हैं तब ज्यादा विचार उठते हैं। पूजा करने बैठते हैं तब बाजार का बहुत खयाल आता है। जब भी बैठते हैंघंटी वगैरह बजाते हैं मंदिर में जा करतभी पाते हैं कि भीतर न मालूम क्या खराबी है! ऐसे सब ठीक चलता है। सिनेमा में बैठ जाएंमौन आ जाता है। थोड़ी शांति हो जाती है। लेकिन मंदिर-मस्जिद मेंगुरुद्वारे में बिलकुल शांति नहीं। बात क्या है?
सिनेमा तुम्हारी वासनाओं से संगत हैवहां वही जगाया जा रहा हैजो तुम हो। वहां वही उभारा जा रहा हैजो तुम्हारे भीतर भरा है। वही कूड़ा-करकटवही कचरा! तुमसे तालमेल बैठ जाता है। मंदिर में कुछ ऐसी पुकार की जा रही हैजिससे तुम्हारा कोई तालमेल नहीं है। वहां सब गड़बड़ हो जाती है।
नानक कहते हैंचुप होने से भी कुछ न होगा। उस मौन को नहीं पाया जा सकता। यद्यपि हम लगातार ध्यान में रह सकते हैं। बैठे रहो दिनरात! कुछ भी न होगा।
'भूखों की भूख नहीं जाएगीयद्यपि हम पूड़ियों के पहाड़ ही क्यों न जमा कर लें।'
क्योंकि यह भूख पूड़ियों से भरने वाली नहीं है। यह जो ध्यान की भूख हैयह जो परमात्मा की भूख हैयह कोई साधारण भूख नहीं है। इस संसार की कोई भी चीज इसे बुझा न सकेगी। यह तृषा अनूठी है। और परमात्मा ही उतरे धार बन कर तो ही बुझ सकती है।
'किस भांति हम सच्चे बनें? किस भांति झूठ के परदे का नाश हो?'
नानक कहते हैं कि उसके हुक्मऔर उसकी मर्जी के अनुसार। जैसा उसने नियत कर रखा हैलिख रखा हैउसके अनुसार चलने से ही यह हो सकता है।
यह वचन अति-ध्यानपूर्वक समझने का है।
हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिया नालि
नहींतुम्हारे करने से कुछ भी न होगा। तुम जो भी करोगेतुम ही करोगे। तुम सच भी बोलोगे तो तुम्हारे झूठे व्यक्तित्व से ही सच निकलेगा। वह सच भी झूठा हो जाएगा। तुम सच लाओगे कहां सेतुम बिलकुल झूठे हो। इससे कोई फर्क न पड़ेगा।
नानक एक गांव में ठहरे थे। गांव में जो प्रधान था गांव काउसने निमंत्रण दिया था सारे गांव को भोज का। कोई यज्ञ चल रहा था। नानक को भी बुलाया था। नानक गए नहीं। और एक गरीब आदमी के घर में ठहरे थे। उसका नाम था लालू। गरीब बढ़ई था। उसकी कोई हैसियत न थी। रूखी-सूखी रोटियां थीं। और गांव के अमीर ने निमंत्रण दिया था। अनेक बार आदमी आए बुलाने। नहीं जब मानाअमीर खुद आया। नानक को ले कर गया। नानक ने कहातुम चाहते हो तो चलूंगा।
उसने पूछा महल में ले जा कर कि मेरे शुद्धतम भोजन को इंकार करते होऔर उस गरीब का अशुद्ध भोजन--वह ब्राह्मण भी नहीं है! यह शुद्ध ब्राह्मणों ने स्नान करके गंगा जल से इस सबको तैयार किया है। पवित्रतम! और तुम इसे इंकार करते हो?
नानक ने कहा कि तुम अब जिद ही करते हो तो कहूं। थोड़ा भोजन तुम्हारा ले आओ। लालू भी पीछे-पीछे चला आया था। उससे कहातू भी अपनी रूखी रोटी ले आ।
कहते हैं--प्रतीक कहानी है--कि नानक ने एक हाथ में लालू की रोटी और एक हाथ में हलवा-पूड़ी उस धनपति की ले करनिचोड़ी। तो लालू की सूखी रोटी से तो दूध की धार बही और दूसरे हाथ से लहू की बूंदें टपकीं। नानक ने कहातुम अशुद्ध हो तो तुम ब्राह्मणों से भोजन बनवाओकि गंगा के पानी को बुलवाओकि एक-एक गेहूं को धो कर साफ कर के बनवाओइससे कोई फर्क न पड़ेगा। तुम्हारा सारा जीवन शोषणबेईमानीचोरीझूठ का है। तुम्हारी हर रोटी में खून छिपा है।
खून निकला या नहींयह सवाल महत्वपूर्ण नहीं हैलेकिन बात तो सच है। तुम कैसे सच्चे होओगेतुम ही तो सच्चे होओगे न! कौन उपाय करेगा?
तो नानक कहते हैंतुम्हारे किए कुछ भी न होगा। तुम बेईमान होतो तुम्हारी सचाई में भी बेईमानी घुस जाएगी। तुम सच भी ऐसा बोलोगे कि जब तुम्हारी बेईमानी को उससे फायदा होता हो। तुम सच भी इस ढंग से बोलोगे कि दूसरे को दुख पहुंचे। तुम ऐसे सच की तलाश करोगे जिससे दूसरे के हृदय में छुरा लग जाए। तुम झूठ से लोगों को नुकसान पहुंचाते थेतुम सच से भी नुकसान पहुंचाओगे। तुम जो भी करोगे वह गलत होगाक्योंकि तुम गलत हो।
उपाय क्या हैतो नानक कहते हैंउपाय एक ही है कि उसके हुक्म और उसकी मर्जी के अनुसार सब उस पर छोड़ दो। जैसा वह जिलाएजीयो। जैसा वह कराएकरो। जहां वह ले जाएजाओ। उसका हुक्म तुम्हारी एक मात्र साधना हो जाए। तुम अपनी मर्जी हटाओ। उसकी मर्जी को आने दो। तुम स्वीकार कर लो जीवन जैसा हो। परमात्मा ने दिया हैवही जाने। तुम इंकार मत करो। दुख आए तो दुख को भी स्वीकार कर लो कि उसकी मर्जी। और अहोभाव रखोधन्यभाव रखो कि अगर उसने दुख दिया है तो जरूर कोई राज होगाकोई अर्थ होगाकोई रहस्य होगा। तुम शिकायत मत करो। तुम धन्यवाद से ही भरे रहो। वह तुम्हें जैसा रखे। गरीबतो गरीब। अमीरतो अमीर। सुख मेंतो सुख में। दुख मेंतो दुख में। एक बात तुम्हारे भीतर सतत बनी रहे कि मैं राजी हूं। तेरा हुक्म मेरा जीवन है।
और तब तुम अचानक पाओगे कि तुम शांत होने लगे। जो लाख ध्यान में बैठ कर नहीं होता था वह उसकी मर्जी पर सब छोड़ देने से होने लगा। हो ही जाएगा। क्योंकि चिंता का कोई कारण न रहा। चिंता क्या हैचिंता यह है कि जैसा हो रहा है उससे अन्यथा होना चाहिए। बेटा मर गयानहीं मरना थायह चिंता है। दिवाला निकल गयानहीं निकलना थायह चिंता है। जैसा हुआवैसा नहीं होना थाऔर जैसा हो रहा हैवैसा नहीं होना चाहिए। तुम अपनी मर्जी को थोपने की कोशिश कर रहे हो जीवन पर। यही तुम्हारी चिंता है। फिर इससे तुम परेशान हो। फिर इस परेशानी को भीतर ढोते हुए तुम ध्यान करने बैठते हो। तब तुम खेत में फसल काटोगेकाबुल में घोड़ा खरीदोगे। वह चिंता तुम्हारी जो थीपीछे रहेगी। वह तुम्हारे ध्यान को भी विकृत कर देगी। तब तुम कैसे शांत हो सकोगे?
शांति का एक ही गुर है। और अगर यह सूत्र तुम्हें ठीक से समझ में आ जाएतो पूरब की सारी खोज समझ में आ सकती है। पूरब की सारी खोज यह हैलाओत्से से ले कर नानक तककि जो हो रहा है उसे स्वीकार कर लो। टोटलएक्सेप्टीबिलिटी
इसका पुराना नाम भाग्य है। वह शब्द बिगड़ गया। सब शब्द बहुत दिन उपयोग करने से बिगड़ जाते हैं। क्योंकि गलत लोग उपयोग करते हैंगलत अर्थ जुड़ जाते हैं। अब तो किसी की निंदा करनी हो तो कह दो कि भाग्यवादी है। लेकिन भाग्य...यही तो अर्थ है भाग्य का।
नानक कहते हैंहुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि
जो लिखा है वह होगा। जो उसने लिख रखा है वही होगा। अपनी तरफ से कुछ भी करने का उपाय नहीं है। कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। फिर चिंता किसकोफिर बोझ किसकोजब तुम बदलना ही नहीं चाहते कुछजब तुम उससे राजी होउसकी मर्जी में राजी होजब तुम्हारी अपनी कोई मर्जी नहींतब कैसी बेचैनी! तब कैसा विचार! तब सब हलका हो जाता है। पंख लग जाते हैं। तुम उड़ सकते हो उस आकाश मेंजिस आकाश का नाम है--इक ओंकार सतनाम। नानक की एक ही विधि है। और वह विधि हैपरमात्मा की मर्जी। वह जैसा करवाए। वह जैसा रखे।
ऐसा हुआ कि बल्ख का एक नवाब थाइब्राहीम। उसने बाजार में एक गुलाम खरीदा। गुलाम बड़ा स्वस्थतेजस्वी था। इब्राहीम उसे घर लाया। इब्राहीम उसके प्रेम में ही पड़ गया। आदमी बड़ा प्रभावशाली था। इब्राहीम ने पूछा कि तू कैसे रहना पसंद करेगातो उस गुलाम ने मुस्कुरा कर कहामालिक की जो मर्जी। मेरा कैसामेरे होने का क्या अर्थआप जैसा रखेंगे वैसा रहूंगा। इब्राहीम ने पूछातू क्या पहननाक्या खाना पसंद करता हैउसने कहामेरी क्या पसंदमालिक जैसा पहनाए,पहनूंगा। मालिक जो खिलाएखाऊंगा। इब्राहीम ने पूछा कि तेरा नाम क्या हैहम क्या नाम ले कर तुझे पुकारेंउसने कहा,मालिक की जो मर्जी। मेरा क्या नामदास का कोई नाम होता हैजो नाम आप दे दें।
कहते हैंइब्राहीम के जीवन में क्रांति घट गई। उठ कर उसने पैर छुए इस गुलाम के और कहा कि तूने मुझे राज बता दिया जिसकी मैं तलाश में था। अब यही मेरा और मेरे मालिक का नाता। तू मेरा गुरु है। तब से इब्राहीम शांत हो गया। जो बहुत दिनों के ध्यान से न हुआ थाजो बहुत दिन नमाज पढ़ने से न हुआ थावह इस गुलाम के सूत्र से मिल गया।
हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि
सोचोथोड़ा प्रयोग करो। जैसा रखेरहो। अपनी तरफ से तुमने बहुत कोशिश करके भी देख लीक्या हुआतुम वैसे के वैसे हो। जैसा उसने भेजा था उससे विकृत भला हो गए होउससे सुकृत नहीं हुए हो। जैसे आए थे बचपन में भोले-भालेउतना भी नहीं बचा हाथ में। स्लेट गंदी हो गई हैतुमने सब लिख डाला। पाया क्या हैसिवाय दुखतनावसंताप के क्या तुम्हारे हाथ लगा हैथोड़े दिन नानक की सुन कर देखो। छोड़ दो उस पर।
इसलिए नानक कहते हैंन जपन तपन ध्यानन धारणा। एक ही साधना है--उसकी मर्जी। जैसे ही तुम्हें खयाल आएगा उसकी मर्जी कातुम पाओगे भीतर सब हलका हो जाता है। एक गहन शांतिएक वर्षा होने लगती है भीतरजहां कोई तनाव नहींकोई चिंता नहीं।
पश्चिम में इतना तनाव और चिंता है। पूरब से बहुत ज्यादा। हालांकि पूरब बहुत गरीब हैदुखी हैबीमार हैरुग्ण है;भोजन नहींकपड़े नहींछप्पर नहीं। पश्चिम में सब हैफिर भी चिंतातनाव! इतना तनाव है कि करीब-करीब चार आदमी में तीन आदमी विक्षिप्त हालत में हो गए हैं।
क्या कारण हैक्योंकि पश्चिम ने अपनी मर्जी चलाने की कोशिश की है। आदमी को पश्चिम में भरोसा हैहम सब कर लेंगे। भगवान के कोई सहारे की जरूरत नहीं। भगवान है ही नहीं। आदमी सब कर लेगा। तो उसने बहुत कुछ कर भी लिया है। लेकिन आदमी बिलकुल खो गया हैपागल हुआ जा रहा है। बाहर बहुत कुछ कर लियाभीतर सब रुग्ण हो गया। अगर तुम्हारे जीवन में यह सूत्र उतर जाए तो कुछ करने को नहीं बचता। जैसा हो रहा है होने दो।
तुम तैरो मतबहो। नदी से लड़ो मत। नदी दुश्मन नहीं हैमित्र है। तुम बहो। लड़ने से दुश्मनी पैदा होती है। और जब तुम उलटी धार तैरने लगते हो तो नदी तुमसे संघर्ष करने लगती है। तुम सोचते हो नदी मुझ से दुश्मनी ले रही है। नदी को क्या दुश्मनीनदी को तुम्हारा पता भी नहीं है। तुम अपने ही हाथ उलटी धारा बह रहे हो। तुम्हारी मर्जीयानी उलटी धारा। अहंकारयानी उलटी धारा।
उसकी मर्जी--तुम धारा के साथ एक हो गए। अब नदी जहां ले जाए वही मंजिल है। जहां लगा दे वही किनारा है। डुबा दे,तो वह भी मंजिल है। फिर कैसी चिंता! फिर कैसा दुख! तुमने दुख की जड़ काट दी।
बड़ा कीमती यह सूत्र है! नानक कहते हैंउसके हुक्म और उसकी मर्जी के अनुसार। जैसा उसने नियत कर रखा हैलिख रखा हैउसके अनुसार चलने से ही यह हो सकता है।
तो नानक ने अहंकार के सब द्वार बंद कर दिए। पहले तोगुरुप्रसाद। कि तुम जो भी करोजो भी उपलब्धि होवह गुरु की कृपा। और फिर जो भी होजीवन की धारा वह जहां ले जाएउसका हुक्म। फिर कुछ और करने को बचता नहीं।
और तब ज्यादा देर न लगेगी कि तुम्हें भी पता चल जाए--

इक ओंकार सतिनाम
करता पुरखु निरभउ निरवैर
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि।।

आदि सचु जुगादि सचु।
है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

सोचे सोचि न होवई जे सोची लख बार।
चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिवतार
भुखिया भुख न उतरी जे बंना पुरीआं भार।
सहस सियाणपा लख होहित इक न चले नालि
किव सचियारा होइएकिव कूड़ै तुटै पालि।
हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि

आज इतना ही।

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