शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

अनहद में बिसराम - प्रवचन-02

दिनांक 12नवम्बरसन् 1980


पहला प्रश्न: भगवानजीवन के चालीस वर्ष नास्तिक समाजवादी विचारधारा में गंवाने के बाद पिछले पंद्रह वर्षों से आपका संपर्क पाया। और जीवन में जो आनंद और उत्सव का अनुभव किया,उसका कैसे वर्णन करूंऔर कैसे अपनी कृतज्ञता प्रकट करूंशब्द बिलकुल ओछे पड़ गए हैं। आप क्या मिलेबस सब कुछ मिल गया! प्रभुमेरे प्रणाम स्वीकार करें।

 अमृत बोधिसत्व!
आस्तिक होने के लिए नास्तिक होना अत्यंत अनिवार्य है। अभागे हैं वे जिन्होंने कभी नास्तिकता नहीं चखीक्योंकि वे आस्तिकता का स्वाद न समझ पाएंगे। आस्तिकता उभर कर प्रकट होती हैनास्तिकता की पृष्ठभूमि चाहिए। जैसे ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं सफेद खड़िया सेअक्षर-अक्षर साफ दिखाई पड़ता है। यूं तो सफेद दीवाल पर भी लिख सकते हैंमगर तब अक्षर दिखाई न पड़ेंगे।
इस जगत के बड़े से बड़े दुर्भाग्यों में से एक है कि हम प्रत्येक बच्चे को नास्तिक बनने के पहले आस्तिक बना देते हैं।

वह आस्तिकता झूठी होती हैउसमें कुछ प्राण नहीं होते। उस आस्तिकता में पंख नहीं होते। वह निर्वीर्य होती हैनिर्जीव होती है। खिलौनों की तरह कृष्ण को पकड़ा देते हैंराम को पकड़ा देते हैंबुद्ध कोमहावीर को पकड़ा देते हैं। अभी बच्चे में जिज्ञासा भी नहीं जगीअभी प्रश्न भी नहीं उठाऔर हमने उत्तर दे दिए! जहां प्रश्न ही नहीं हैवहां उत्तर मिथ्या होगावहां उत्तर की कोई गुंजाइश ही नहीं है। बीमारी ही नहीं हैऔर तुमने इलाज शुरू कर दिया! तुम दवा पिलाने लगे! तुम्हारी दवा जहर बन जाएगी।

और आस्तिकता जहर बन गई है। सारी पृथ्वी आस्तिकता से पीड़ित हैनास्तिकता से नहीं। और आदमी कुछ ऐसा मूढ़ है कि एक अति से दूसरी अति पर जाने में उसे देर नहीं लगती। रूसचीन और दूसरे कम्युनिस्ट देश दूसरी अति पर चले गए। बच्चा पैदा हुआऔर वे उसे नास्तिकता सिखाने लगते हैं।
सिखाई नास्तिकता उतनी ही थोथी होगीजितनी सिखाई आस्तिकता। किसी बच्चे को भूख तो नहीं सिखानी होतीप्यास तो नहीं सिखानी होतीनींद तो नहीं सिखानी होती।
नास्तिकता वैसी ही स्वभावतः पैदा होती है। नास्तिकता का ठीक अर्थ है: जिज्ञासाआकांक्षा जानने कीअन्वेषणखोज। वह यात्रा है। प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ लेकर आया है उसके बीज। किसी को नास्तिक बनाने की जरूरत नहीं है और न किसी को आस्तिक बनाने की जरूरत है। बनाया कि चूक हुई। बनाया कि ढोंग हुआ। बनाया कि मुखौटे उढ़ा दिए। फिर मुखौटे हिंदू के हों,कि मुसलमान केकि ईसाई केकि नास्तिक केकम्युनिस्ट केइससे भेद नहीं पड़ता। दूसरों के द्वारा उढ़ाए गए मुखौटे तुम्हारा चेहरा नहीं हैं। और तुम्हारा चेहरा ही काम आएगा।
जीवन उधार नहीं जीया जा सकता। जीवन प्रामाणिक होना चाहिए। हमें इतना धैर्य रखना चाहिए कि बच्चे पर जब जिज्ञासा अपने आप अवतरित होगीजब वह पूछेगातो हम साथ देंगे। और साथ भी बहुत सोच कर देना।
साथ देने का अर्थ नहीं है कि वह पूछे और तुम उत्तर देना। प्रश्न उसकाउत्तर तुम्हारामेल कैसे होगाप्रश्न उसका तो उत्तर भी उसका ही होना चाहिएतभी तृप्ति होगीतभी संतोष होगातभी बोध होगाबुद्धत्व होगा।
तो जब बच्चे को जिज्ञासा जगेप्रश्न उठेंसंदेह के झंझावात आएंतब माता कोपिता कोपरिवार कोप्रियजनों कोशिक्षकों को सहयोग देना चाहिए--प्रश्नों के निखारने कानिखारने मेंप्रश्नों पर धार रखने में। प्रश्नों पर उत्तर नहीं थोपने हैंप्रश्नों को त्वरा देनी हैतीव्रता देनी है। प्रश्नों को ऐसी प्रगाढ़ता देनी है कि जब तक व्यक्ति उनके उत्तर स्वयं न खोज लेचैन न पाए,विश्राम न पाए। उसके प्रश्नों को मूल्य दो।
मगर किसको पड़ी है! हमें जल्दी है हमारे उत्तर थोप देने की। हमारा न्यस्त स्वार्थ यही है कि हम जल्दी से अपने उत्तर थोप दें। बेटा पैदा हुआकि चलो उसका यज्ञोपवीत संस्कार करोकि चलो उसका खतना करवाओकि चलो उसको मुसलमान बनाओ,हिंदू बनाओईसाई बनाओबपतिस्मा करवाओ। जैसे उसका तो इसमें कुछ भाग ही नहीं है। यह सब दूसरों का गोरखधंधा है,जिसमें उसको फंसना है। ये जो उसे फंसा रहे हैंये भी फंसाए गए थे। इनके बाप-दादे भी फंसाए गए थेऔर उनके बाप-दादे भी। और ये पीढ़ियों दर पीढ़ियों बीमारियां सरकती चली जाती हैंऔर भी जघन्य होती जाती हैं। ये रोग इतने घने हो जाते हैं कि इनका इलाज करना मुश्किल हो जाता है।
अमृत बोधिसत्वतुम धन्यभागी हो कि तुम जब मुझे मिलेनास्तिक थे। मुझसे मिलने के लिए नास्तिक होना ठीक-ठीक क्षण हैजैसे वसंत। और वह नास्तिकता तुम्हारी ओढ़ी हुई नहीं थीक्योंकि भारत में कौन नास्तिकता उढ़ाएगा तुम्हें! वह सहज थी,तुम्हारी थीअपनी थीनिजता थी उसमेंव्यक्तित्व था उसका। तुम्हें ही मुझसे प्रेम हो गयाऐसा नहींमुझे भी तुमसे प्रेम हो गया। जहां भी प्रामाणिकता है वहां मैं ऐसे बरस पड़ता हूं जैसे जल से भरा हुआ कोई बादल बरसे।
अमृत बोधिसत्व समाजवादी थेऔर महत्वपूर्ण समाजवादी थे। कहानी तो यह है कि स्वयं माओत्से तुंग ने अमृत बोधिसत्व के चित्र को पेकिंग में रख कर सलामी दी थीक्योंकि अमृत बोधिसत्व ने गुजरात के एक कारखाने पर कब्जा कर लिया था और उस कारखाने की मालकियत मजदूरों में बांट दी थी। वह पहला समाजवादी प्रयोग था। भारत में बहुत उसकी चर्चा नहीं हुई। लेकिन चीन और रूस तक उसकी चर्चा हुई।
मुझे जब अमृत बोधिसत्व मिले थेतो शायद उन्होंने कभी सोचा भी न होगा कि यह जीवन में एक नया मोड़ आयाऐसा जिसकी कल्पना भी न थीस्वप्न भी न देखा होगा। उनके संगी-साथियों ने भी न सोचा होगा कि अमृत बोधिसत्व कभी संन्यासी हो जाएंगे।
मगर मेरी अपनी सूझ यही है कि जो नास्तिक होने की हिम्मत रखता हैवही कभी संन्यासी भी हो सकता है। संन्यास नास्तिक होने से भी बड़ी हिम्मत है। जो नास्तिक होने की हिम्मत नहीं रखता इसलिए आस्तिक हैउसकी आस्तिकता दो कौड़ी की है,उसका कोई भी मूल्य नहीं है। कचरा है। जितने जल्दी उससे छुटकारा हो जाएउतना अच्छा है। जो नास्तिक होने तक की हिम्मत नहीं रखतावह क्या खाक आस्तिक होगा! आस्तिकता बड़ी बात है। नास्तिकता तो छोटी बात है। नहीं तो हमेशा छोटा होता है।
तुमने खयाल कियाजब तुम नहीं कहते होतो सिकुड़ जाते होऔर जब तुम हां कहते होतो फैल जाते हो! और आस्तिकता का अर्थ हैसमग्ररूपेण अस्तित्व को हां कहना। सारी नहीं गिर जाएसारा नकार गिर जाए। नहीं कहने में तो कोई अड़चन नहीं है बड़ीक्योंकि नहीं अहंकार को भरती है। हम नहीं इसीलिए तो कहते हैं। नहीं भोजन है अहंकार का। जितना नहीं कहोउतना अहंकार को मजा आता है। इसलिए जहां नहीं कहने की कोई जरूरत भी नहींवहां भी हम मौका नहीं चूकतेवहां भी हम नहीं कहेंगे।
अगर तुम रेलवे स्टेशन पर टिकट की खिड़की पर टिकट खरीदने खड़े होतो तुमने देखा होगा कि क्लर्क को कुछ काम भी नहीं है तो भी वह फाइलें उलटाने लगता हैतुम्हारी तरफ देखता ही नहीं। वह यह कह रहा हैतुम हो ही क्या! वह एक ढंग से नहीं कह रहा है। अगर तुम बीच में दखलंदाजी करो कि भईमुझे टिकट चाहिए। वह कहेगाचुप रहो! काम में बाधा न डालो। पंद्रह मिनट बाद आना।
छोटा सा बच्चा अपनी मां से पूछता हैबाहर खेल आऊं?
नहीं! जैसे कि कोई गुनाह की बात पूछ रहा हैकोई अपराध करने जा रहा है। सिर्फ बाहर धूप हैपक्षी हैंवृक्षों पर फूल खिले हैंबच्चे को बहुत से निमंत्रण बाहर से आ रहे हैं। पड़ोसियों के बच्चे खेल रहे हैंखिलखिला रहे हैं। वह मां से पूछता हैबाहर खेल आऊंनहीं! जैसे नहीं तो जबान पर रखा है।
नहीं कहने में मजा हैक्योंकि बल पता चलता है। हां कहने में बल पता नहीं चलता। जिसको थोड़ी सी भी सत्ता हैवह भी नहीं कहेगा। चपरासी भी नहीं कहेगा। है चपरासीबैठा है स्टूल परलेकिन तुम पहुंचोगे तो यूं व्यवहार करेगा जैसे राष्ट्रपति हो--ठहरो अभी! रुको अभी! अभी मालिक काम में उलझे हैं।
नहीं कहने में एक मजा है। मजा यह है कि देखो मेरी ताकतरोक दे सकता हूं। बड़ों-बड़ों को रोक देता हूं। तुम किस खेत की मूली हो!
तो नहीं कहना तो बहुत छोटी बात है। अगर उस छोटी सी बात को भी कहने की हिम्मत नहीं हैतो फिर हां जैसी विराट अनुभूति को कैसे स्वीकार करोगे?
नास्तिक होना नहीं कहना है। हर बच्चे को नास्तिकता से गुजरना ही चाहिए। वह अनिवार्य प्रक्रिया है। उसे नहीं कहना ही चाहिए। उसे नहीं सीखना ही चाहिए। क्योंकि नहीं कह कर ही तोये नहीं के कांटों के बीच में ही तो कभी हां का गुलाब खिलेगा।
हांजिसने नहीं कही है और नहीं कहने के लिए कष्ट भोगा हैवह ज्यादा दिन तक नहीं नहीं कहता रहेगा। उसे समझ में आनी बात शुरू हो जाएगीक्योंकि नहीं से कोई तृप्ति नहीं मिलतीसंतोष नहीं मिलताआनंद नहीं मिलता। दूसरे को दुख भला दे दो;मगर दूसरे को दुख देने में तुम्हें थोड़े ही सुख मिलता है! दूसरे को मिटा देने में तुम थोड़े ही बन जाते हो!
इंग्लैंड का एक सम्राट अपने राजदूत को फ्रांस भेज रहा था। और फ्रांस में जो उस समय सम्राट थाएकदम झक्की था। इतना झक्की कि कोई फ्रांस राजदूत होकर नहीं जाना चाहता थाक्योंकि वह जरा सी बात में बिगड़ जाएतो गर्दन कटवा ले। वहीं! देर-अबेर भी न करेवहीं राज-दरबार में गर्दन कटवा ले। पहले गर्दन कटवाएफिर दूसरा काम करे।
तो मूर नाम का जो व्यक्ति भेजा जा रहा थाउसने अंग्रेज सम्राट को कहा कि देखेंमेरे बाल-बच्चे हैंपत्नी हैबूढ़े मां-बाप हैं,किसी और को भेज दें! वह आदमी पागल है। और आप मुझे भी जानते हैं कि मैं भी गर्म-मिजाज हूं। और उसके साथ बात बिगड़ जाएगीज्यादा देर चल नहीं सकती मेरी बात। अगर उसने एक शब्द भी ऐसा कुछ कहा जो मुझे नहीं जमातो फिर गर्दन रहे कि जाए। वह मेरी गर्दन कटवा लेगा।
अंग्रेज सम्राट ने कहामूरतू फिक्र न कर। अगर उसने तेरी गर्दन कटवाईतो कम से कम एक हजार फ्रांसीसियों की गर्दन इंग्लैंड में कटवा लूंगा उसी वक्त। तू बेफिक्र रह!
मूर ने कहाआप कहते हैं तो जरूर करेंगे। मगर सवाल यह है कि उन एक हजार गर्दनों में से कोई भी गर्दन मेरी गर्दन पर जमेगी क्यामैं तो गयाअब तुम हजार कटवाओ कि लाख कटवाओकटवाओ कि न कटवाओक्या फर्क पड़ता है!
मूर ने ठीक बात कही। दूसरे को मिटाने से तुम तो नहीं बनते हो। दूसरे की मौत तुम्हारा जीवन तो नहीं हो सकती है। दूसरे का दुख तुम्हारा सुख तो नहीं। दूसरे के जीवन के फूलों को तुम नष्ट कर दोइससे कुछ तुम्हारे जीवन की बगिया में चंपा और चमेली और जुही तो न खिल जाएंगे। पड़ोसी के घर में आग लगा दोइससे कुछ तुम्हारा झोपड़ा महल तो न हो जाएगा।
नहीं दूसरे को तो दुख दे सकती हैइसलिए थोड़े अहंकार को मजा आ सकता है कि देखोचखा दिया मजा! दिखा दिया कि मैं कौन हूं! आज अहसास करवा दिया कि मैं भी कुछ हूं! लेकिन यह अहसास दूसरे को करवा देकर तुमने घाव भला पहुंचा दिया हो,लेकिन उसका घाव तुम्हारे भीतर कोई कमल का खिलना तो नहीं हो जाएगा।
तो जिसने नहीं कहा हैप्रामाणिक रूप से नहीं कहा हैजो नास्तिक है...। नास्तिक की मेरी परिभाषा यही है कि जो नहीं कहने में तल्लीन हो गया है। जिसने इतना नहीं कहा है कि वह परमात्मा को भी नहीं कह रहा हैआत्मा को भी नहीं कह रहा है,जीवन के सर्वोच्च मूल्यों को नहीं कह रहा है। जो कह रहा हैजीवन सिर्फ पदार्थ है और कुछ भी नहींमिट्टी है और कुछ भी नहीं। यहां कुछ सार नहीं हैकुछ शाश्वत नहीं है।
नहीं कहने में थोड़ी-बहुत देर मजा आ जाएलेकिन कब तकजल्दी ही एक बात खयाल में आएगी: अगर कुछ भी नहीं है--न परमात्मा हैन सत्य हैन सौंदर्य हैन शिवत्व हैन शाश्वतता हैन अमृतत्व हैन बुद्धत्व है--तो फिर जीवन एकदम व्यर्थ है। एक मूढ़ के द्वारा कही हुई कथा--शोरगुल बहुतअर्थ कुछ भी नहीं। व्यर्थ की बकवास है।
नास्तिक अगर प्रामाणिक हो--रूसी नहींचीनी नहींक्योंकि रूस और चीन में नास्तिक वैसा ही झूठा हैजैसे भारत के आस्तिक झूठे हैं। भारत में आस्तिकता थोपी जाती हैचीन और रूस में नास्तिकता थोपी जाती है। हर थोपी चीज झूठी हो जाती है। जिसके भीतर से नास्तिकता जगी है! और हर बच्चे के भीतर जगती हैजगनी ही चाहिए। मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। मनोवैज्ञानिक अनिवार्यता है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हर बच्चे के जीवन में वह घड़ी आती है जब उसे नहीं कहना ही चाहिए। क्योंकि नहीं कहेगातो ही धीरे-धीरे मां-बाप से मुक्त होगा। नहीं कहेगातो ही मां की साड़ी को छोड़ेगानहीं तो साड़ी को पकड़े ही फिरता रहेगा। नहीं कहेगातो ही अपना व्यक्तित्व निखरेगानहीं तो मां-बाप की ही दुनिया का एक हिस्सा रहेगाकभी भी अपनी क्षमता को अलग न कर पाएगाअपनी प्रतिभा को निखार न पाएगा। इसलिए बच्चे को अनिवार्य रूप से नहीं कहना पड़ेगा।
वह जो बाइबिल की कथा है कि ईश्वर ने कहा अदम को और हव्वा को कि तुम इस वृक्ष के फल न खानायह वृक्ष ज्ञान का वृक्ष है। ध्यान रहेचेताता हूं तुम्हेंबार-बार चेताता हूंइस ज्ञान के वृक्ष के फल मत खाना! उन्होंने खाए ज्ञान के वृक्ष के फल। और उसी की सजा मिली उन्हें कि वे बहिश्त से निकाल कर बाहर कर दिए गए। लेकिन मैं मानता हूं कि यह कथा बड़ी मनोवैज्ञानिक है। यह हर बच्चे के जीवन में घटती है। यह सिर्फ कथा नहीं है। यह कभी इतिहास में घटीऐसा नहीं है। यह हर बच्चे के जीवन में घटती हैअपरिहार्यरूपेण घटती है।
मां-बाप कहेंगेसिगरेट न पीनाऔर बच्चा पीएगा। मां-बाप कहेंगेऐसा न करनाऔर बच्चा वैसा ही करेगा। असल में तुम्हें जो न करवाना होउसकी बात ही न छेड़ना। तुम्हें जो करवाना होउसी के लिए इनकार करना। क्योंकि तुम जिसको इनकार करोगे,बच्चा उसे तोड़ेगातोड़ेगा तो ही तुमसे मुक्त हो सकता है।
जैसे एक दिन मां के गर्भ से बच्चे को बाहर आना होता हैवैसे ही एक दिन बच्चे को मां-बाप के मनोवैज्ञानिक गर्भ से भी बाहर आना होता है। और उससे बाहर आने की एक ही प्रक्रिया है कि वह कहे नहीं। मां-बाप के धर्म को नहीं कहे। मां-बाप के सिद्धांतों को नहीं कहे। मां-बाप के आचरण-संहिता को नहीं कहे। मां-बाप जो भी मानते होंउस सबको नहीं कहेतो ही वह उस मनोवैज्ञानिक गर्भ के बाहर आएगा और अपने व्यक्तित्व को उपलब्ध होगा। वही उसका असली जन्म है। नहीं तो वह गोबर-गणेश रह जाएगा।
अधिक बच्चे गोबर-गणेश रह जाते हैं। मां-बाप गोबर-गणेशों से बहुत प्रसन्न होते हैं। गोबर-गणेशों की खूब प्रशंसा करते हैं कि बेटा हो तो ऐसा हो! कैसा आज्ञाकारी! इधर बैठो! तो इधर बैठता है। उधर बैठो! तो उधर बैठता है। गोबर-गणेश ही हैंबैठ गए सो बैठ गए! उठाओ तो उठेंबैठाओ तो बैठें। लेकिन इन गोबर-गणेशों से दुनिया में कोई भी सौंदर्य बढ़ा नहीं। इन गोबर-गणेशों ने दुनिया को दिया क्या?
इस दुनिया को अगर किन्हीं ने भी कुछ दिया हैतो वे वे बच्चे हैं जिन्होंने आज्ञाएं तोड़ी हैंजो मां-बाप की आज्ञाओं के विपरीत गए हैंजिन्होंने हिम्मत की है और साहस किया है। हिम्मत बड़ी हैक्योंकि छोटा बच्चा मां-बाप पर निर्भर होता हैसब तरह से निर्भर होता है। भोजन के लिएवस्त्र के लिएशिक्षा के लिएउसका सारा जीवन ही मां-बाप पर निर्भर है। उतनी निर्भरता को भी दांव पर लगा देता हैऔर जो उसे करना है करता हैकरके दिखाता है।
एक छोटे बच्चे ने--मुल्ला नसरुद्दीन का बेटाफजलू--उसने सेब का वृक्ष काट डाला। नसरुद्दीन ने उसकी खूब पिटाई की। पिटाई करने के पहले पूछा कि तूने सेब का वृक्ष काटातूने ही काटाउसने कहाहांमैंने ही काटा।
उसके बाप नेनसरुद्दीन ने कहामैंने तुझसे कितनी बार नहीं कहा था कि इस वृक्ष को काटना मत। तू यह कुल्हाड़ी लिए बगीचे में क्यों घूमता हैये बगीचे को बर्बाद करना हैयह वृक्ष मैंने मुश्किल से लगाया थाबामुश्किल बड़ा हुआ था। इस भूमि मेंइस तापमान मेंइस आबोहवा में सेब लगते नहींइसमें सेब लगने शुरू हो गए थे। मना कियाफिर भी तूने काटा! और ऊपर से तू यह भी जुर्रत कर रहा है कि इनकार भी नहीं करताकहता है कि हां काटा।
तो बेटे ने कहाआपने ही मुझे कहानी सुनाई थी कि अमरीका के प्रथम राष्ट्रपति वाशिंगटन ने सेब का वृक्ष काट दिया था। और जब उसके बाप ने पूछा तो वाशिंगटन ने कहाहांवृक्ष मैंने ही काटा है। बाप ने मारा तो नहींवरन पुरस्कार दियाक्योंकि बेटा सत्य बोला। मैं तो उसी आधार पर चल रहा हूं। उलटे मुझे पिटाई पड़ रही है!
बाप ने कहावह कहानी मुझे मालूम हैमैंने ही तुझे सुनाई। मगर तू यह भी खयाल रख कि जब वाशिंगटन ने सेब का वृक्ष काटा थातो उसका बाप वृक्ष पर नहीं बैठा था। हरामजादेमैं वृक्ष के ऊपर बैठा हुआ था। यह भी कोई वक्त था काटने का!
लेकिन बच्चों को कितना ही तुम सताओजिनमें थोड़ी भी प्रतिभा हैजिनमें थोड?ी भी तेजस्विता हैवे इनकार करेंगे। उन्हें इनकार करना ही हैकरना ही पड़ेगा। यह मनोवैज्ञानिक अनिवार्यता हैअपरिहार्यता है।
नास्तिकता इस सारे इनकार का इकट्ठा नाम है। सारी धारणाएंसिद्धांतशास्त्रपरंपराव्यवस्थास्थापित स्वार्थस्थापित मूल्यइन सबको इनकार करने का नाम नास्तिकता है।
मेरे देखेअमृत बोधिसत्वजो इतना इनकार करता हैउसे एक दिन वह घड़ी जरूर आ जाती है जब यह प्रश्न उठता है: इस इनकार से मैंने पाया क्या?
हांमां-बाप से छूटामुक्त हुआअपने पैर पर खड़ा हुआअब क्याअब आगे की यात्रा कैसे होऔर तभी पहली दफा जीवन में आस्तिकता की किरण फूट सकती हैअगर संयोग मिल जाए किसी आस्तिक से मिलने का।
तुम धन्यभागी थे कि मुझे मिल गए। मैंने तुम्हें नाम दियाअमृत बोधिसत्व। वे दो शब्द मैंने तुम्हारे लिए उपयोग किएउन्हीं दो को तुम इनकार करते रहे थे। अमृत यानी परमात्माशाश्वतजो सदा है। और बोधिसत्व अर्थात उसे जान लेनापहचान लेनाअनुभव कर लेनाबुद्धत्व को पा लेना। मैंने तुम्हें जो दो शब्द दिएवे तुम्हारी पूरी चालीस साल की नास्तिकता की पृष्ठभूमि में ही दिए। उसी पृष्ठभूमि में वे उभर कर प्रकट हुए।
तुम कहते हो, "मैं चालीस साल तक नास्तिक था। समाजवादी विचारधारा में जीवन गंवाने के बाद पिछले पंद्रह वर्षों से आपका संपर्क पाया। और जीवन में जो आनंद और उत्सव का अनुभव कियाउसका कैसे वर्णन करूं!'
इन पंद्रह वर्षों में और भी लाखों लोग मेरे संपर्क में आएलेकिन उन सभी को वह आनंद और उत्सव अनुभव नहीं हुआजो तुम्हें अनुभव हुआ है। और उसका कारण तुम्हारी नास्तिकता थी। तुम तैयार थेतुम्हारी पृष्ठभूमि तैयार थी। आस्तिक भी मेरे संपर्क में आए हैं। मगर चूंकि उनकी आस्तिकता झूठी थीउनका मेरे संपर्क में आना भी झूठा हुआ। मेरे और उनके बीच एक दीवाल बनी रही। तुम उघाड़े थे। तुम्हारे और मेरे बीच कोई दीवाल न थी। तुमने सारे वस्त्र पहले ही फेंक दिए थे। तुम नग्न खड़े थे सूरज में। तुमसे मेरा संपर्क सीधा हो सका।
आस्तिक यहां आ जाता हैतो उसे बड़ी मुश्किल होती हैक्योंकि उसकी धारणाएं बीच में खड़ी रहती हैं। उसकी आकांक्षा होती है कि मैं उसकी धारणाओं का समर्थन करूं! और मैं उसका दुश्मन नहीं हूंतो कैसे उसकी धारणाओं का समर्थन करूं! उसकी धारणाओं का समर्थन करूं तो उसके जीवन में कभी क्रांति नहीं होगी। मुझे तो उसकी धारणाएं तोड़नी ही पड़ेंगी। तुम्हारी कोई धारणा न थीइसलिए काम आधा तो तुम कर ही चुके थे। पुराने को तो तुम मिटा चुके थेनए को बनाने की बात थी। वह बहुत आसान है। असली सवाल तो पुराने को मिटाना हैक्योंकि पुराने से हमारा मोह होता है। नए को बनाने के लिए तो हरेक उत्सुक हो जाता है। लेकिन जिनका पुराने से मोह हैउनके मोह बड़े भयंकर होते हैं।
मैंने सुनाएक पुराना चर्च था। वह गिरने के करीब था। इतना जीर्ण-जर्जर कि उसके भीतर जाकर कोई प्रार्थना करने में भी डरता थाकि जरा हवा जोर से चलती थीतो चर्च कंपता थाचरमराता था। अब गिरातब गिरा! औरों की तो बात छोड़ दो,पादरी भी भीतर नहीं जाता था। वह भी चर्च के बाहर से ही प्रार्थना करके लौट जाता था।
आखिर चर्च के जो प्रमुख थेउनकी बैठक हुई। और उन्होंने कहाअब कुछ करना होगा। अब चर्च में लोगों ने जाना ही बंद कर दियाइतना ही नहींचर्च के पास से भी निकलना बंद कर दियाक्योंकि पता नहीं कब गिर जाए। और चर्च पुराना है।
और जितना पुराना हो उतना ही बहुमूल्य होता है। यह कुछ अजीब धारणा है लोगों कीकि पुराना जितना हो उतना ही मूल्यवान होता है। बिलकुल मरा-मराया होसड़ा-सड़ाया होउतना ज्यादा मूल्यवान। लाश ही बची होअस्थिपंजर ही रह गए हों,तो और भी मूल्यवान। लोग अपने-अपने धर्म को पुराना सिद्ध करने में ऐसी दीवानगी करते हैंसच और झूठ की फिक्र ही नहीं करते। गुड़ भी हो तो गोबर कर देते हैं। सिद्ध करने की चेष्टा कि पुरानापुराना होना चाहिए।
सारे वैज्ञानिक आधारों से तय होता है कि वेद पांच हजार साल से ज्यादा पुराने नहीं हैंलेकिन लोकमान्य तिलक की चेष्टा जीवन भर यह रही कि नब्बे हजार साल पुराने हैं। क्योंऐसा क्या दीवानापन हैपुराना हैतो मूल्यवान होना चाहिए! जितना पुराना हो! जैसे कि धर्म न हुआशराब हुईजितनी पुरानी होउतनी ही कीमती। सभी धर्म इस चेष्टा में लगे रहते हैंएक-दूसरे को हराने की चेष्टा में लगे रहते हैं।
ईसाई तो मानते हैं कि पृथ्वी का जन्म ही जीसस से चार हजार चार वर्ष पहले हुआ। इसलिए नब्बे हजार साल पहले वेद रचे गएयह बात तो व्यर्थ ही हो गई। समय ही कहां थाकुल चार हजार चार वर्ष ईसा से पूर्वइतना ही तो कुल समय था। मगर इसके तो प्रमाण हैं कि समय इससे बहुत पुराना थास्पष्ट प्रमाण हैं।
लेकिन प्रमाणों को कोई सुनता है! अंधे कहीं प्रमाणों को सुनते हैं! ईसाई पादरियों ने यह तर्क खोज निकाला है कि वे प्रमाण ठीक हैंवे प्रमाण ईश्वर ने आस्तिकता की परीक्षा के लिए रख दिए हैं। अरेईश्वर क्या नहीं कर सकता! जो दुनिया बना सकता है,वह क्या नहीं कर सकता! उसने जमीन के भीतर ऐसी हड्डियां रख दींजो मालूम पड़ती हैं कि नब्बे हजार साल पुरानी हैं। मगर हैं नहीं। उसके लिए क्या कठिन है! यह तो परीक्षा के लिए बनाई हैं उसने कि देखेंकौन असली श्रद्धावान है और कौन नकली! इससे तय हो जाएगा।
लोकमान्य तिलक कहते हैं कि नब्बे हजार साल पुराना है वेद। जैन बड़े प्रसन्न होते हैं। वे कहते हैंबिलकुल ठीक। ठीक कहते हैं आप। नब्बे हजार साल पुराना होना ही चाहिएक्योंकि ऋग्वेद में हमारे प्रथम तीर्थंकर का उल्लेख है। सो निश्चितहमारे प्रथम तीर्थंकर तुम्हारे ऋग्वेद से भी पुराने हैं। और सम्मानपूर्वक उल्लेख है!
और यह तो आदमी की आदत है कि जिंदा संत को कोई सम्मान देता हैअपमान देते हैं। यह तो सीधा गणित है। जिंदा संत को अपमानमुर्दा संत को सम्मान।
तो इतने सम्मान से उल्लेख है ऋग्वेद में जैनों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ काइससे सिद्ध होता है कि कम से कम तीन सौ से लेकर पांच सौ वर्ष तो गुजर ही चुके होंगे। नहीं तो इतना सम्मान नहीं हो सकता। जीवित अगर होते वहतब तो अपमान होता,गालियां पड़तीं।
आदमी का कुछ गणित है। जिंदा तीर्थंकर होगाली दोक्योंकि जिंदा तीर्थंकर तुम्हारी धारणाओं के विपरीत होगा। और जब मर जाएतो सम्मान करोक्योंकि मर जाएतो फिर पश्चात्ताप पकड़ता है कि अरेहमने गालियां दींअपमान कियापाप किया,अब कहीं फल न भोगना पड़े! तो जिंदा हो तो पत्थर मारोमर जाए तो फूल चढ़ाओ। वे फूल भी तुम्हारे पत्थरों का पश्चात्ताप हैं,और कुछ भी नहीं। जीसस को सूली दोऔर फिर मर जाने के बाद दो हजार साल तक हजारों-हजारों चर्चों में पूजा करो। सुकरात को जहर पिलाओऔर फिर ढाई हजार सालों तक दर्शन-शास्त्रों की हर किताब में सुकरात को घोषित करो कि इससे महान कोई दार्शनिक नहीं हुआ। यह पश्चात्ताप हैऔर कुछ भी नहीं।
जो व्यक्ति धारणाओं से भरा आता हैउसके साथ मुझे मुश्किल खड़ी हो जाती है। उसकी धारणाओं के अनुकूल मुझे होना चाहिएतो वह मेरे साथ राजी होता है। और मैं उसकी धारणाओं के अनुकूल कैसे हो सकता हूं?
अजयकृष्ण यहां हैं। उनको कम्मू बाबा परेशान किए हुए हैं। कम्मू बाबा मेरे और उनके बीच खड़े हैं। कम्मू बाबा नहीं खड़े हैं,अजयकृष्ण उनको खड़ा किए हुए हैं! वे तो जा भी चुके! मगर कम्मू बाबा की आड़ अजयकृष्ण को बचा रही है। हर चीज को वे कम्मू बाबा को बीच में लाकर देखते हैं। क्योंकि कम्मू बाबा ने कहा कि हमेशा अपने माता-पिता का सम्मान करनाउनकी इच्छा के विपरीत न जाना। अजयकृष्ण को संन्यास लेना हैलेकिन मां कहती हैइससे मुझे दुख होगा। कैसे संन्यास लेंकम्मू बाबा कहते थे कि कभी अपने मां-बाप को दुख न देना!
और जरा यह तो पूछो कि कम्मू बाबा ने अपने मां-बाप को कितना दुख दिया होगा! नहीं तो कम्मू बाबा हो पातेये अजयकृष्ण कम्मू बाबा हो पाएंगे कभीसोचो! कम्मू बाबा के तो मां-बाप का भी पता चलाना मुश्किल होगा। ऐसे भागे होंगे दुख देकर कि फिर पीछे लौट कर न देखा होगा। कम्मू बाबा से...।
लेकिन नहींहमारी धारणा। हमारी धारणा की परिपूर्ति होनी चाहिए।
गुरजिएफ से किसी ने पूछा कि सारे धर्मशास्त्र कहते हैं कि अपने मां-बाप को आदर दोसम्मान दो। क्योंतो गुरजिएफ ने कहाइसका कारण है। इसमें ईश्वर की चालबाजी है।
सुन कर वह आदमी बहुत हैरान हुआ। गुरजिएफ तो अपने किस्म का अनूठा आदमी था। और इस तरह के अनूठे आदमी अनूठी बात ही कहते हैं। उसने कहाक्या कहते हैं आप! इसमें ईश्वर की चालबाजी है?
गुरजिएफ ने कहानिश्चित ईश्वर की चालबाजी हैक्योंकि ईश्वर को भलीभांति पता हैजो व्यक्ति अपने मां-बाप को आदर देता हैवह ईश्वर को भी आदर देगा। अरेजो मां-बाप तक की फिक्र नहीं करतावह क्या खाक फिक्र ईश्वर-वीश्वर की करेगा! ईश्वर यानी महापिता। जब छोटे ही पिता को धक्का दे दियातो आकाश में बैठे पिता की कौन फिक्र करता हैदेखा जाएगाजब मिलेंगे! और अभ्यास तो यहीं हो रहा है। अगर यहीं छोटे-छोटे मां-बाप से डरे रहेतो बड़े पिता के सामने तो एकदम कंपोगे,एकदम घुटनों पर गिर पड़ोगे। कहोगे कि हे परम प्रभुदया करोबचाओरक्षा करो! मैं तो पतित हूंतुम पतितपावन हो!
गुरजिएफ ने बात ठीक कही कि सारे धर्मशास्त्र इसलिए कहते हैंइसमें परमात्मा की चालबाजी है। परमात्मा की हो या न हो,लेकिन पुरोहितों की चालबाजी जरूर। क्योंकि मां-बाप को आदर दोतो पुरोहित को भी तुम आदर दोगेक्योंकि मां-बाप और पुरोहित एक ही षडयंत्र के हिस्से हैं। मां-बाप कहते हैंपुरोहित को आदर दोपुरोहित कहता हैमां-बाप को आदर दो। पुरोहित समर्थन करता है मां-बाप कामां-बाप समर्थन करते हैं पुरोहित का।
लेकिन जब भी तुम बुद्ध या महावीर या जीसस जैसे व्यक्ति के पास जाओगेतो तुम्हारी इन धारणाओं का कोई समर्थन नहीं हो सकता।
अब तो अजयकृष्ण कुछ ऐसे घबड़ा गए हैं कि कल उन्होंने झूठे नाम से प्रश्न पूछा। कल जो नवलकिशोर डी.डी.के नाम से जो प्रश्न थावह अजयकृष्ण का था। नवलकिशोर को मैं जानता हूंवर्षों से जानता हूं। उन्होंने कभी प्रश्न पूछा ही नहीं। अचानक वे प्रश्न पूछेंगेइसकी संभावना नहीं। और पूछ भी नहीं सकतेवे अपने बाप से डरे हुए हैं। उनके पिता जो हैं डी. डी.वे उनके हाथ-पैर तोड़ देंगे अगर उनको पता चल गया कि इधर आकर उन्होंने प्रश्न पूछा है। वह प्रश्न पूछा है अजयकृष्ण नेनाम लिख दिया--उनके मित्र हैं--नवलकिशोर। पूछ कर लिख दिया होगा नाम कि भैयातुम्हारा नाम लिख रहा हूंया बाद में बता दिया होगाया न भी बताया हो। क्योंकि कम्मू बाबा ने यह तो कहा नहीं कि अपने मित्र के नाम से कभी प्रश्न न पूछना!
अजयकृष्ण सुनते भी हैं व्याख्यानतो यहां बुद्ध-भवन में बैठ कर नहीं सुनते! बाहरबगीचे में बैठ कर। इतने पास बैठ कर सुनना खतरनाक है। अरेसम्मोहित हो जाएंकुछ से कुछ हो जाए! थोड़ी देर को भूल-भाल जाएं कम्मू बाबा कोकोई बात गले उतर जाए! तो उधर दूर बैठे रहते हैं दरवाजे के पास कि अगर एकदम कोई बात पकड़ ही लेतो कम से कम भागने की सुविधा तो हैदरवाजे से निकल भागें! शरीर भी थोड़ा वजनी हैदरवाजे के पास ही रहना ठीक है। एकदम भागें इधर से और कोई गार्ड वगैरह पकड़ ही ले! और उतनी देर में तो बात ही हो जाए। अरेबात होने में कोई देर लगती है! कभी-कभी तो एक शब्द काम कर जाता है। तो अपनी सुरक्षा से चलना चाहिए।
अमृत बोधिसत्व जब मेरे पास आए थेतो नास्तिक थेसमाजवादी थेदोनों बातों ने सहयोग दिया। उससे हानि नहीं हुई। नास्तिक थेतो मुझे कुछ मिटाने को न था। वे खुद ही पुराने चर्च को गिरा चुके थे। जमीन साफ थी।
यह मैंने पुराने चर्च की तुमसे कहानी कही। लोग डरने लगेतो इकट्ठे हुए ट्रस्टी। और उन्होंने कहाअब क्या करेंचर्च तो पुराना हैगिराना उचित भी नहींपुरानी चीज! और बचाया भी नहीं जा सकता। तो कुछ बीच का रास्ता। तो उन्होंने बीच का रास्ता निकाला। उन्होंने चार प्रस्ताव स्वीकार किए--सर्वसम्मति से। पहला प्रस्ताव कि हमें बहुत दुख हैलेकिन मजबूरी हैप्रभु क्षमा करनाकि तेरे पुराने चर्च को हमें गिराना पड़ेगा। दूसरा प्रस्ताव सर्वसम्मति से कि यद्यपि हम पुराना चर्च गिरा रहे हैं,लेकिन हम कसम खाते हैं कि नए चर्च में कोई भी नई चीज नहीं लगाएंगे। पुराने चर्च के ही दरवाजेपुराने ही चर्च की खिड़कियां और कांचपुराने चर्च की ही मूर्ति और पत्थरपुराने चर्च की ही ईंटेंहर चीज पुराने चर्च की ही लगाएंगे! और तीसरा प्रस्ताव स्वीकृत किया सर्वसम्मति से कि जब तक नया चर्च बन न जाएतब तक हम पुराने को गिराएंगे भी नहीं। जब नया बन कर खड़ा हो जाएगातो हम पुराने को गिराएंगे। और चौथा--और वह भी सर्वसम्मति से--कि नए चर्च को हम ठीक वहीं बनाएंगे जहां पुराना चर्च है! वही बुनियादवही भूमिवही स्थापत्यवही ढंग।
और इन मूढ़ों को यह भी खयाल न आयाये क्या प्रस्ताव स्वीकार कर रहे हैं! मगर यह हर आदमी की मूढ़ता है। अतीत को हम पकड़ते हैंजोर से पकड़ते हैं। उसमें बड़ी सांत्वना मिलती है।
अमृत बोधिसत्व जब मेरे पास आएउनके पास कोई अतीत न थामैं प्रसन्न हुआ था। नास्तिक को देख कर मैं सदा प्रसन्न होता हूं। ये जो लोग आ जाते हैं--कोई कम्मू बाबा को लेकर आ गयाकोई मुईनुद्दीन बाबा को लेकर आ गयाकोई निजामुद्दीन बाबा को लेकर आ गया--इनके बाबा देख कर ही मैं सोचता हूं कि पहले इन बाबा से सिर फोड़ो! किसी तरह बाबा में से बोगदा बनाओतब कहीं ये दिखाई पड़ें तो पड़ें। ये छिपे हैं बहुत पीछे। और अक्सर तो यह होता है कि एक बाबा नहीं होताबाबा अकेले नहीं पाए जाते। एक बाबातो उसके पीछे और-और बाबा होते हैं। बाबाओं की कतार लगी होती हैक्यू लगे होते हैं। बाबाओं की परंपरा होती हैसिलसिले होते हैं।
जब भी मैं किसी नास्तिक व्यक्ति को देखता हूंतो आह्लादित होता हूं। हांनास्तिकता उसकी निज होनी चाहिए। उसकी स्लेट कोरी है। उसकी स्लेट पर काम किया जा सकता है। उसका कैनवस कोरा है। उस पर चित्र उभारा जा सकता है। उसका दर्पण निर्मल हैउसमें परमात्मा की छवि बन सकती है।
और तुम समाजवादी थेअमृत बोधिसत्वइससे भी लाभ हुआ। क्योंकि समाजवादी ही केवल समझ सकता है व्यक्तिवाद का मूल्य। जीवन बड़ा अनूठा गणित है! जिन लोगों के जीवन में समाजवाद की कोई स्पष्ट रूप-रेखा नहीं हैउनके सामने व्यक्ति की भी कोई रूप-रेखा नहीं होती। रहते हैं भीड़ मेंभीड़ के हिस्से होते हैंमगर चूंकि समाजवाद की कोई स्पष्ट रूप-रेखा नहीं होतीइसलिए व्यक्ति को भी अलग करके देखने की क्षमता नहीं होती।
समाजवादी का अर्थ क्या होता हैसमाजवादी का अर्थ होता है: व्यक्ति का कोई मूल्य नहींव्यक्ति केवल समाज के लिए एक उपकरण मात्र हैसाधन मात्र है। समाज साध्य हैव्यक्ति साधन है। व्यक्ति की कुर्बानी दी जा सकती है समाज के लिए।
लेकिन असलियत यह है कि समाज केवल एक शब्द है। समाज कहीं मिला तुम्हेंजरा ढूंढने निकलोतुम्हें कहीं कोई समाज मिलेगाजब मिलेगाकोई व्यक्ति मिलेगा। व्यक्ति का यथार्थ है। समाज तो केवल संज्ञा मात्र है। अच्छे-अच्छे प्यारे-प्यारे शब्द बहुत भटकाने और भरमाने वाले हो जाते हैं--समाजमनुष्यता! मनुष्यता को कहां खोजोगे?
मेरे पास लोग आते हैंवे कहते हैंहम मनुष्यता को प्रेम करते हैं।
मैं उनसे कहता हूंमनुष्य को प्रेम करो। मनुष्यता को क्या खाक प्रेम करोगे! कैसे करोगेगले लगाओगे मनुष्यता कोयह तो तरकीब है बचने की। मनुष्य को तो तुम छोड़ना चाहते होमनुष्य से तो बचना चाहते होक्योंकि मनुष्य तो यथार्थ है। मनुष्यता का अच्छा शब्द खोज लिया तुमनेएक हवाई शब्दजिसमें कुछ भी नहीं है। खाली शब्द।
लेकिन उस खाली शब्द को सिर पर उठाए लिए फिरोगेझंडा ऊंचा रहे हमारा! और झंडे में है क्याएक कपड़े का टुकड़ा बांध रखा हैरंगीन कर लिया होगा।
और झंडा है क्यासिर्फ डंडे को छिपाने का उपाय हैऔर कुछ भी नहीं। जब तुम कहते होझंडा ऊंचा रहे हमारा! तब ठीक से समझ लेनातुम यह कह रहे होडंडा ऊंचा रहे हमारा! लेकिन डंडा ऊंचा रहे हमारायह अगर कहोतो और डंडे उठ जाएंगे कि कौन है तू डंडा ऊंचा करने वालाझंडा ऊंचा रहे हमाराठीक है भईमजे से करोझंडे में क्या हर्जा हैमगर झंडे के भीतर होता डंडा ही ऊंचा है।
मनुष्यता को प्रेम करते हैं! दिव्यता को प्रेम करते हैं! सत्य को प्रेम करते हैं! सौंदर्य को प्रेम करते हैं! मगर यथार्थयथार्थ कुछ और है। खोजने जाओगेमनुष्यता नहीं मिलेगीमनुष्य मिलेगा। सौंदर्य नहीं मिलेगासुंदर फूल मिलेंगेसुंदर सूरज मिलेगा,सुंदर चांदत्तारे मिलेंगे। कोई सुंदर तत्व मिलेगासौंदर्य नहीं। ये तो कोरे शब्द हैंथोथे शब्द हैं। मगर थोथे शब्द बड़े महत्वपूर्ण बन जाते हैंइतने महत्वपूर्ण बन जाते हैं कि हम यथार्थ की कुर्बानी चढ़ा सकते हैं।
समाजवादियों ने व्यक्ति की कुर्बानी चढ़ा दी। रूस में स्टैलिन ने अंदाजन एक करोड़ व्यक्ति मारेऔर बेझिझक मारे। और मार सका बिना किसी संकोच केबिना किसी अपराध भाव के। कारणएक ऊंचा शब्द! यह व्यक्ति कोई अपने लिए तो मार नहीं रहा हैकोई हिंसा तो कर नहीं रहा है। यह तो समाजवाद की वेदी पर आहुति चढ़ाई जा रही है। यह तो जो लोग समाजवाद के आने में बाधा डाल रहे हैंउनकी कुर्बानी चढ़ाई जा रही है।
व्यक्ति मारे समाजवाद के लिए। और समाजवाद किसके लिए हैव्यक्तियों के लिए। कैसा चक्कर है! कैसा दुष्टचक्र है! समाजवाद है व्यक्तियों के लिए और व्यक्ति काटे जा रहे हैं समाजवाद के लिए! स्टैलिन का तर्क पुराना तर्क हैकोई नया नहीं। हमेशा ऊंची चीज के लिए नीचे को कुर्बान किया जा सकता है।
लेकिन खयाल रखना कि ऊंची चीज है भी या नहींया केवल एक कोरा शब्द है?
शांति के लिए लोग युद्ध करते हैं। क्या मजा है! कहते हैं शांतिऔर करते हैं युद्ध! और कहते हैंशांति की रक्षा के लिए कर रहे हैं!
मोहम्मद की तलवार पर यह वचन खुदा हुआ था: शांति ही मेरा धर्म है।
तलवार पर यह वचन खुदा हुआ था! और मोहम्मद ने अपने धर्म को भी नाम दियाइसलाम। इसलाम का अर्थ होता हैशांति का धर्म। और इसलाम ने जितनी अशांति फैलाई हैशायद किसी ने भी नहीं फैलाई है। तलवार के बलबूते पर जबरदस्ती इसलाम करोड़ों लोगों पर थोपा गया है। और यह शांति का धर्म है!
हिंदू सहिष्णुता की बात करते हैं। और हजारों साल से जितना हिंदुओं ने शूद्रों को सताया हैदुनिया में किसी ने किसी को नहीं सताया। और सहिष्णु! और इनको सब जगह कण-कण में परमात्मा के दर्शन होते हैं। मगर शूद्र में नहीं होते! स्त्री में नहीं होते! स्त्री नर्क का द्वार है! यह बड़ा मजा है! कण-कण में राम बसा है! सियाराम मय सब जग जानी। मगर सिया का अलग से पूछो मामलातो नर्क का द्वार! सीता मैया नर्क का द्वाररामचंद्र जी से जोड़ दोतो बस सोने में सुगंध आ गईनर्क का द्वार एकदम स्वर्ग का द्वार हो गया! कण-कण में इनको परमात्मा दिखाई पड़ता हैलेकिन शूद्रों में नहीं।
हिंदुओं ने जितना अनाचार किया स्त्रियों के साथशूद्रों के साथउतना दुनिया में किसी ने भी नहीं किया। और यह धर्म सहिष्णुता का धर्म हैप्रेम का धर्म हैविश्व-बंधुत्व का धर्म है! दावा है हमारा कि सारा विश्व हमारा कुटुंब है। और शूद्र को भी हम अपने परिवार का हिस्सा न बना सके! शूद्र को तो छोड़ दोस्त्री को भी हम अपना अंग न बना सके!
जैन मानते हैंस्त्री-पर्याय से किसी का मोक्ष नहीं। क्या मजा है! और यही जैन कहते हैं कि तुम शरीर नहीं होआत्मा हो। जरा देखते हो असंगतियांमूढ़तापूर्ण बातें! तुम शरीर नहीं होआत्मा हो। तो क्या आत्मा भी स्त्री और पुरुष होती हैआत्मा तो बस आत्मा ही है। उसमें कैसे स्त्री-पुरुष होगा कोईशरीर ही स्त्री-पुरुष होता है। और अगर व्यक्ति शरीर है ही नहींतो ध्यान को उपलब्ध व्यक्तिसमाधि को उपलब्ध व्यक्ति स्त्री होगा या पुरुषलेकिन जैन कहते हैं कि स्त्री-पर्याय से मोक्ष नहीं।
एक जैन स्त्री--पता नहीं किस भूल-चूक सेबड़ी हिम्मतवर स्त्री रही होगी--तीर्थंकर हो गई। जरूर अदभुत हिम्मत की रही होगी। मल्लीबाई उसका नाम था। जैनियों को बड़ा कष्ट हुआ होगा। रही होगी बलशाली महिला कि जैनियों को भी पानी पिला दिया! और लगता हैबिना छाने पिला दिया। क्योंकि स्त्री का तो पर्यायउस पर्याय से मोक्ष ही नहींमोक्ष की बात ही छोड़ो--मल्लीबाई भी अदभुत हिम्मत की औरत रही होगी--उसने तो घोषणा ही कर दी कि वह तीर्थंकर है। अरेमोक्ष तो उसे मिल ही गयादूसरों को भी मिलाने की हकदार है। बड़ी हिम्मतवर स्त्री रही होगी।
मगर जैनियों ने क्या चालबाजी कीउसका नाम ही बदल दिया। मल्लीबाई नहींमल्लीनाथ कर दिया। इसलिए जब तुम जैनियों के तीर्थंकरों की फेहरिस्त पढ़ोगेतो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा इसमें एक स्त्री भी है। नेमीनाथपार्श्वनाथउसी में मल्लीनाथ। क्या चालबाजियां हैं! थी बेचारी स्त्रीबाई को नाथ कर दिया। अब बाई को बाई कैसे कहें! अगर बाई कहेंतो सारा शास्त्र गड़बड़ होता है। अगर स्त्री तीर्थंकर हो गईतो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। फिर स्त्री को नर्क का द्वार कैसे कहोगे?
जैन बातें तो करते हैं आत्मा कीमगर अटके हैं शरीर से ही। अभी स्त्री-पुरुष की ही बात चल रही है। ऊंचे शब्द!
कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तू फिक्र मत कर मारने मेंक्योंकि आत्मा मरती ही नहीं। क्या अदभुत सिद्धांत! जब आत्मा मरती ही नहीं तो तू बेफिक्री से मार। पागल हो गया है कि छोड़ कर भागता है युद्धक्षेत्र कोधर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे! यह तो धर्म का युद्ध हो रहा है। कहां भाग रहा हैजूझ! और परमात्मा ने जिनको मारना हैउनको वह मार ही चुका हैतू तो निमित्त मात्र है।
अगर यह बात सच हैतो फिर हिटलर का क्या कसूर हैतो फिर स्टैलिन का क्या कसूर हैतो फिर माओत्से तुंग का क्या कसूर हैफिर ये छोटे-मोटे हत्यारेयह नाथूराम गोडसेइसका क्या कसूर हैअरे जब परमात्मा ने मार ही डालातो यह तो बेचारा निमित्त मात्र है। और इसने कोई ज्यादा कसूर नहीं कियाएक महात्मा गांधी को मारावे भी काफी बूढ़े हो चुके थे और मरना चाहते थे।
मरने के दो ही दिन पहले उन्होंने कहा था कि अब मैं जीना नहीं चाहता। परमात्मा ने सुन ली होगी। कभी-कभी सुन लेता है! और तभी तो उसने भेज दिया नाथूराम! नाथूराम मतलब कलियुगी राम। हैं तो राम हीनाथू ही हुए तो क्या! और पुण्य-नगरी पूना के निवासी! क्या जगह चुनी उन्होंने भी! पुण्य-नगरी पूना से भेज दिया नाथूराम कोकि अब राम तुम्हीं जाओमेरा भक्त मुश्किल में पड़ा है। मेरा भक्त कह रहा हैअब मुझे जीना नहीं।
महात्मा गांधी कहते थेमैं एक सौ पच्चीस वर्ष जीऊंगा। मगर जब से सत्ता कांग्रेसियों के हाथ में आई तब से उनको पता चला,अब जीना बेकार है। क्योंकि जैसे ही उनके शिष्य सत्ता में गएउन्होंने उनकी फिक्र ही छोड़ दी। अरेकौन फिक्र करता है तुम्हारी! कीमत तुम्हारी तभी तक थीजब तक सत्ता हाथ में न आई थी। अब सत्ता उनके हाथ में थीतुम हो क्यारहो तो ठीकन रहो तो ठीक। असल में न ही रहो तो ज्यादा ठीकक्योंकि रहोगे तो कुछ न कुछ गड़बड़ करोगेकुछ दखलंदाजी करोगे,कुछ दांव-पेंच बताओगेकुछ इधर-उधर की बातें लाओगेउनकी राजनीति को ठीक से न चलने दोगे। वे भी चाहते थे कि छुटकारा हो। भीतरी! ऊपर चाहे न भी कहते हों। क्योंकि सात दिन पहले ही सरदार वल्लभभाई पटेल ने लखनऊ की एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रैली में यह घोषणा की थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ज्यादा सुंदरसुव्यवस्थितसुसांस्कृतिक और धार्मिक कोई संगठन भारत में नहीं है। और उसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य ने महात्मा गांधी को गोली मारी।
मगर कसूर क्याएक ही आदमी को मारा।
अगर हम शास्त्रों को मान कर चलेंतो वह जो कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआधर्मक्षेत्र जो था--खूब हुआ धर्मक्षेत्र में भी काम--एक अरब से लेकर सवा अरब आदमी के बीच लोग मरे। एक अरब व्यक्ति! अभी भी भारत में नहीं हैं। अभी दुनिया की कुल आबादी चार अरब अब हो पाई--सारी दुनिया की! अभी भारत की आबादी तो केवल सत्तर करोड़ है। अभी भी भारत में एक अरब लोग नहीं हैं। उस समय कुरुक्षेत्र के छोटे से मैदान में गजब कर दिया!
मगर चमत्कार ही करना हो परमात्मा को तो क्या नहीं कर सकता! अरेउसके हाथ में सब कुछ है। एक अरब आदमी कैसे बिठा दिए! यूं समझो कि रहा होगा कोई...जैसे रेलगाड़ी का कंडक्टर थर्ड क्लास के डब्बे में आदमी भरता ही चला जाता हैभरता ही चला जाता है। इसीलिए तो उसको डब्बा कहते हैं! डब्बा जैसा सुंदर शब्द दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। दुनिया की किसी भाषा में रेल के डब्बे को डब्बा नहीं कहतेयहीं कहते हैंक्योंकि यहां उसका व्यवहार डब्बे की तरह होता है। भरते जाओ! न संख्या का कोई सवाल है। भरने वाले चाहिए। या रहा होगा कोई दिल्ली का टैक्सी चलाने वाला।
एक टैक्सी में अठारह आदमी पकड़े गए! टैक्सी को पकड़ कर थाने ले जाया गया। सरदार जीजो टैक्सी चला रहे थेउनको बहुत डांटा-डपटा थानेदार ने और कहा कि तुमने हद्द कर दीअठारह आदमी! सरदार ने कहा कि आप भरोसा करते होतो अठारह आदमी बिठा कर बता दो! हालांकि अठारह आदमी उनके ही सामने उतारे गए थेमगर थानेदार और सारे पुलिस वाले कोशिश करके अठारह आदमी न बिठा सके गाड़ी में।
तो उस टैक्सी वाले ने कहाअब बोलो! अरेजब बैठ ही नहीं सकते अठारहतो सरासर झूठ बात है। थानेदार ने कहातूने भी गजब कर दिया! अपनी आंखों से हमने उतरते देखेमगर चढ़ा नहीं पा रहेयह हम भी मानते हैं!
तो भगवान भी कोई टैक्सी वाला रहा या क्या! कुरुक्षेत्र का छोटा सा मैदान! हांहाकी-क्रिकेट का मैच करना हो तो ठीक। ओलंपिक भी करना हो तो मुश्किल पड़ जाएतो छोटा पड़ जाए। वहां सवा अरब आदमी मरवा डाले! और जरा सोचो तो कि सवा अरब आदमी जहां लड़े होंवहां थोड़ी-बहुत जगह भी तो चाहिए। अगर घमासान एक-दूसरे के साथ खड़े होंतो घूंसा तक चलाना मुश्किल! तलवारें वगैरह निकालेंगे कहांऔर हाथी-घोड़ों का क्या होगाऔर रथ वगैरह कैसे चलेंगेये तो वैसे ही मर जाएंगे,बिना मारे मर जाएंगे।
मगर कृष्ण ने कहा कि बेफिक्री से मारक्योंकि आत्मा तो मरती ही नहीं। जब आत्मा मरती ही नहींतो दुनिया में फिर हत्या का कोई अपराध ही नहीं।
अच्छे-अच्छे शब्दों की आड़ में भी हम क्या-क्या छिपा लेते हैं! आत्मा नहीं मरतीइसलिए मारो बेफिक्री से! और परमात्मा के बिना इशारे के तो पत्ता नहीं हिलता। तो तुम मारोगे कैसेउसने मार ही दिया होगा पहले। तुम न मारोगेकोई और मारेगा।
अच्छे शब्दों ने मनुष्य की छाती पर पहाड़ रख दिए हैं। समाजवाद अच्छा शब्द हैप्यारा शब्द हैमगर झूठानिहायत झूठा! दुनिया में व्यक्ति हैंसमाज कहीं भी नहींमनुष्य हैंमनुष्यता कहीं भी नहीं। मगर यह समाजवादी को ही समझ में आ सकता है।
तुम जब मेरे पास आए थेसमाजवादी विचारधारा और नास्तिकता में डूबे हुएतो मैंने देखा था कि संभावना है। अब तुम ऊब गए थे। देख चुके थे तुम समाजवाद को भीउसकी व्यर्थता को भी। नास्तिकता को तुमने जी लिया था और देख चुके थे उसकी निरर्थकता को। वहीं से संन्यास का फूल खिल सकता था। इसलिए तुम्हें मैंने नाम दिया: अमृत बोधिसत्व। और आज वह घड़ी आ गई कि तुम कह सकते हो कि अब जीवन में आनंद हैउत्सव हैउसका कैसे वर्णन करूं! उसका वर्णन तो नहीं किया जा सकता।
तुम कहते हो, "आप क्या मिलेसब कुछ मिल गया!'
कहना तो कठिन हो जाता है। जो भी महत्वपूर्ण हैअनकहा रह जाता है।

किसको आती है मसीहाईकिसे आवाज दूं?
बोल ऐ खूंखार तनहाईकिसे आवाज दूं?

पढ़ते-पढ़तेपढ़ते-पढ़ते दुख गई हैं पुतलियां,
बुझ रही है शम्मए-बीनाईकिसे आवाज दूं?

चुप रहूं तो हर नफस डसता है नागिन की तरह,
आह भरने में है रुसवाईकिसे आवाज दूं?
हाय! इस गुरबत के जंगल में पुकारूं तो किसे,
किससे है मेरी शनासाईकिसे आवाज दूं?

ये जम्हाई-पे-जम्हाई अलहफीजो-अलअमां,
उफ ये अंगड़ाई-पे-अंगड़ाईकिसे आवाज दूं?

उफ खामोशी की ये बांहें दिल को भरमाती हुई,
उफ ये सन्नाटे की शहनाईकिसे आवाज दूं?

चल रहे हैं जिंदगी पर चांदनी के नेशतर,
चुभ रही है दिल में पुरवाईकिसे आवाज दूं?

मुश्किल तो होगा अब कहना। अब आवाज देना मुश्किल होगा।
उफ खामोशी की ये बाहें दिल को भरमाती हुई,
उफ  ये  सन्नाटे  की  शहनाई  किसे  आवाज  दूं?
लेकिन तुम्हारे भीतर जो शहनाई बज रही हैवह मुझे सुनाई पड़ रही हैकहो न कहो। कहना भी चाहो तो न कह सकोगे।
कल अमृत बोधिसत्व दर्शन में उपस्थित थे। मैं भी चौंका क्षण भर को। इतना रूपांतरण हुआ है! इतनी क्रांति हुई है! नए हो गए हैं! एक नए बच्चे की तरह हो गए हैं। कहो या न कहोमुझे तुम्हारे भीतर की शहनाई सुनाई पड़ रही है।


 दूसरा प्रश्न: भगवानइस वर्ष से जनगणना की जा रही हैजिसमें अनिवार्य रूप से जाति-धर्म की जानकारी देकर घोषणा करनी पड़ती है। चूंकि आपके संन्यासी तथाकथित किसी प्रचलित जाति-धर्म को मान्यता नहीं देतेवे जनगणना अधिकारी को क्या जानकारी दें?

 अरूपानंद!
इतने जल्दी भूल गएकल ही तो मैंने कहा--
जात हमारी ब्रह्म हैमाता-पिता हैं राम।
गिरह हमारा सुन्न मेंअनहद में बिसराम।।
अब और क्या चाहिएमाता-पिता की जगह लिख देना रामजाति की जगह ब्रह्मधर्म की जगह शून्यऔर भाषा की जगह अनहद।
जात हमारी ब्रह्म हैमाता-पिता हैं राम।
गिरह हमारा सुन्न मेंअनहद में बिसराम।।
 तीसरा प्रश्न: भगवानभारतवर्ष में आपके बाद जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध धर्मगुरु हैंतो वे हैं आचार्य तुलसी। अभी-अभी उन्होंने कुछ नए आयाम शुरू किए हैंवे इस प्रकार हैं--
(१) तुलसी फाउंडेशन की स्थापना।
(२) गृहस्थों को नव-संन्यास दिया जा रहा हैजिसके अधीन वे गृहत्याग नहीं करते हैंब्रह्मचर्य पालन करते हैं एवं संन्यासी की तरह जीते हैं।
(३) जब तुलसी सभागृह में पधारते हैंतो श्रावक उदघोष करते हैं: जय भगवान!
(४) जो पुस्तकें प्रकाशित होती हैंउन पर दोनों तरफ आचार्य तुलसी के चित्र होते हैं।
भगवानआपकी इस तरह खुलेआम नकल करते जाते हैं एवं आपका विरोध करते जाते हैंहम कब तक देखते रहेंबताने की कृपा करें।
अभी-अभी उन्होंने हर महीने दस दिवसीय शिविर-ध्यान लेने शुरू किए हैं।

भगवानक्या ये नकल करने वाले थोड़े भी शघमदा नहीं होतेबताने की कृपा करें।

 पहली तो बातकृष्ण सत्यार्थीमैं कोई प्रसिद्ध व्यक्ति हूंबदनाम कहोचलेगा! बदनामी में मुझे रस भी हैप्रसिद्धि में मुझे कोई रस नहीं।
और तुम मुझे धर्मगुरु कहते हो! तो अधर्मगुरु कौन होगाये अच्छी-अच्छी बातें आचार्य तुलसीविनोबा भावेपुरी के शंकराचार्य,इन सबके लिए छोड़ दो। मेरा काम तो बदनामी से चल जाएगाअधर्मगुरु होने से भी चल जाएगा।
रही नकल की बाततो दया करो उन पर। क्या करेंमजबूरी है! खुद का कोई बोध नहींखुद का कोई अनुभव नहीं। नकल भी करते हैंनकल करना भी नहीं आताऔर तो बात और!


ऐसा ही प्रश्न चैतन्य कीर्ति ने पूछा है। पूछा है:
 भगवानआचार्य तुलसी के शिष्यों ने प्रेक्षा-ध्यान साधना शिविर स्मारिका भेजी हैजिसमें रामसमंद के श्री भिक्षु बोधिस्थल शिविर में हुए प्रेक्षा-ध्यान तथा प्रवचनों का विवरण प्रकाशित हुआ है। आपके पुराने समय के साहित्य में जो निष्क्रिय ध्यान है--शरीर शिथिल हो रहा हैश्वास शांत हो रही हैविचार शांत हो रहे हैं--वही ज्यों का त्यों इनका प्रेक्षा-ध्यान है। सक्रिय ध्यान में थोड़ा हेर-फेर करके इनके साधक कुंडलिनी-जागरण भी करते हैं।
आचार्य श्री तुलसी तथा युवाचार्य महाप्राज्ञ से प्रेरित होकर जिन साधुओंसाध्वियों तथा साधकों ने जो प्रवचन वहां दिएवे प्रवचन तथा बोध-कथाएं शब्दशः आपके प्रवचनों से ली गई हैं। हांकहीं-कहीं अपनी बातें जोड़ कर छीछा-लेदर भी की है।
नकल यहां तक की है कि शिविर-स्थल के प्रवेश-द्वार पर एक साइन बोर्ड लगाया है: कृपया अपने मन और जूते यहीं उतार दें।
स्मारिका का अंतिम उदगार है: युगों युगों तक अमर रहेगा तुलसी नाम तुम्हारा।
भगवानऐसे लोगों की ध्यान में क्या गति होती है?
 ध्यान का अर्थ हैअपने भीतर मौलिक स्वरूप की खोज। ध्यान उधार नहीं होताबासा नहीं होतानकल तो हो ही नहीं सकता है। इन बेचारों को ध्यान से क्या लेना-देना है!
इनको तो सिर्फ एक बात अखर रही है कि मेरी बात दुनिया के कोने-कोने तक पहुंच रही हैलाखों लोग आंदोलित हो रहे हैं। इनको यही अड़चन लग रही है कि जरूर मेरी बात में कुछ होगा जिसके कारण इतने लोग प्रभावित हो रहे हैं। और उस प्रभाव से कहीं हम वंचित न रह जाएंकहीं ऐसा न हो कि हम पिछड़ जाएंकहीं इस दौड़ में पीछे न रह जाएंइसलिए नकल करो। इस बात की ही नकल करो। इस बात में ही कुछ होगा।
इन सबको बता दो: इस बात में कुछ भी नहीं होताव्यक्ति में होता है कुछ। बातों की नकल तुम कितनी ही करोकुछ परिणाम नहीं होगा। इससे तुम तो ध्यान को उपलब्ध होओगे ही नहींजिनको तुम ध्यान करवा रहे होउनको भी भटका रहे हो,भरमा रहे हो। इसका भी तुम पाप कर रहे हो।
इन पर दया करोनाराज न होना। और इनकी कोई चिंता लेने की जरूरत नहीं है।

आज इतना ही।

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