गुरुवार, 3 अगस्त 2017

एक ओंकार सतनाम - प्रवचन-17

करमी करमी होइ वीचारु—(प्रवचन—सतरहवां)
पउड़ी: 34

राती रुति थिति वार। पवन पानी अगनी पाताल।।
तिसु विचि धरती थापि रखी धरमसाल।
तिसु विचि जीअ जुगुति के रंग। तिनके नाम अनेक अनंत।।
करमी करमी होइ वीचारु। साचा आप साचा दरबारु।।
तिथै सोहनि पंच परवाणु। नदरी करमी पवै नीसाणु।।
कच पकाई ओथै पाइ। 'नानकगाइआ जापै जाइ।।


नानक के सूत्र के पहले कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
पहली बातकि जीवन को जो लक्ष्य मान लेता हैवह भटक जाता है। जीवन केवल एक अवसर हैलक्ष्य नहीं। मार्ग है,गंतव्य नहीं। उससे कहीं पहुंचना है। जीवित होने से ही मत समझ लेना कि पहुंच गए। जीवन कोई सिद्धि नहीं हैकेवल एक प्रक्रिया है। उससे ठीक से गुजरेतो पहुंच जाओगे। ठीक से न गुजरेतो भटक जाओगे।

जीवन को ही जो सब कुछ मान लेता हैवही नास्तिक है। और जीवन के पार जिसके लिए पहुंचने को कोई मंजिल है,वही आस्तिक है। आस्तिक के लिए जीवन एक पड़ाव है। नानक कहते हैंधर्मशाला। वहां रुकना है थोड़ी देरलेकिन सदा के लिए उसे घर नहीं बना लेना। जिसने उसे ही घर बना लियावह असली घर से वंचित रह जाएगा। चले थे कुछ पानेमार्ग में ही घर समझ लियातो फिर मंजिल तक कैसे पहुंचेंगेकौन चलेगा?
संसार घर नहीं है। और जिन्होंने संसार को घर बना लिया हैउन्हीं को हम गृहस्थ कहते हैं। गृहस्थ का अर्थ यह नहीं है कि आप घर में रहते हैं। गृहस्थ का अर्थ है कि संसार को घर बना लिया है।
संन्यासी का अर्थ है कि संसार धर्मशाला हैघर नहीं। रहता तो वह भी वहीं हैजाएगा कहांरहना तो घर में ही पड़ेगा,लेकिन घर को देखने का ढंग बदल जाता है। तुम घर को समझते हो यही मंजिल हैपहुंच गए। और संन्यासी समझता है धर्मशाला हैसराय हैकहीं और जाना है। और भूलता नहीं मंजिल को। रुके कहींहजारों धर्मशालाओं में रुकना पड़ेतो भी मंजिल की याद रखता है।
वही सुरति है। उस याद को जिसने रखाजिसने उस याद के धागे को न खोयावह सभी धर्मशालाओं में रुकेगा और पार होता जाएगा। कोई धर्मशाला उसे पकड़ न पाएगी। रहेगा संसार मेंलेकिन संसार के बाहर रहेगा। तुम्हारी मंजिल जहां हैवहीं तुम हो। जहां तुम जा रहे होवहीं तुम हो। वहां तुम नहीं होतेजहां तुम हो। जहां तुम पहुंचना चाहते होजहां तुम्हारा ध्यान होता हैवहीं तुम हो। यह पहली बात समझ लेनी जरूरी है।
अधिक लोगकरीब-करीब सभीकरोड़ों में एकाध को छोड़ करजो मिला हैसमझते हैं यही अंत है। जो मिला हैयह तो प्रारंभ भी नहीं है। यह तो भवन का द्वार भी नहीं है। ये तो भवन की सीढ़ियां भी नहीं हैं। तुम तो मार्ग पर होअभी सीढ़ियां आएंगी। जिसके जीवन में सीढ़ियां आ गयींधर्म आ गया। जो मार्ग पर हैवह संसारी है। जिसके जीवन में सीढ़ियां आ गयींवह साधक। और जो भवन में प्रतिष्ठित हो गयावह सिद्ध। तुम्हारे जीवन में अभी सीढ़ियां भी नहीं आयी हैं। अभी तुमने साधना भी शुरू नहीं की है।
और इस भ्रांति का गहरे से गहरा कारण यही है कि तुम्हें जो मिल गया हैतुम उससे संतुष्ट हो गए हो। ध्यान रखना,धार्मिक आदमी एक अर्थ में तो बिलकुल संतुष्ट होता हैऔर एक दूसरे अर्थ में उससे ज्यादा असंतुष्ट आदमी खोजना कठिन है। संतुष्ट होता है इस अर्थ में कि परमात्मा से उसकी कोई शिकायत नहीं। और असंतुष्ट होता है इस अर्थ में कि अपने से उसकी बड़ी शिकायत है।
अधार्मिक आदमी की परमात्मा से तो शिकायत होती है--तूने यह नहीं दियातूने यह नहीं दियाअपने से कोई शिकायत नहीं होती। अपने से अधार्मिक आदमी संतुष्ट होता है। वही संतोष कब्र बन जाती है। क्योंकि अगर तुम अपने से संतुष्ट होतो विकसित कैसे होओगेबढ़ोगे कैसेआकाश को छूने के लिए पंख कैसे खोलोगेतुम अपने घोंसले में ही कैद हो जाओगे। तुम अपने पिंजड़े में ही मर जाओगे।
परमात्मा से तो संतोष चाहिएअपने से असंतोष। हालत उलटी है। अपने से तो हम संतुष्ट हैंपरमात्मा से असंतोष है। सारे जगत के प्रति हमारा असंतोष है। कुछ भी ठीक नहीं मालूम होतासिर्फ हम ठीक मालूम होते हैं। और वही ठीक नहीं है,शेष सब ठीक है। तुम्हारे अतिरिक्त कहीं कोई भूल-चूक नहीं है। सारा जगत बड़ी शांति और आनंदमग्नता से प्रवाहित है। कहीं कोई बाधा नहीं है। सिर्फ तुम्हारे भीतर कहीं अवरोध है।
तो धार्मिक आदमी एक गहरा असंतोष है अपने प्रति कि मैं जैसा हूंपरमात्मा के योग्य नहीं हूं। मैं जैसा हूंअभी अर्चना न कर सकूंगाअभी पूजा न कर सकूंगा। अभी मैं जैसा हूंकैसे स्वीकार हो सकूंगाअभी मैं जैसा हूंवह उसके योग्य नहीं हूं। उसके योग्य बनना है। उसके स्वीकार के योग्य पात्र बनना है। अपने को इस योग्य बनाना है कि वह मेहमान बनने को राजी हो जाए। मेरे हृदय में उसके लायक सिंहासन बनाना है।
तो धार्मिक व्यक्ति अपने से तो असंतुष्ट होता है। इसलिए एक दिन ऐसी घड़ी आती है कि वह अपने को बढ़ाते-बढ़ाते,निखारते-निखारतेस्वर्ण-सिंहासन बन जाता है। वह परमात्मा के विराजने योग्य हो जाता है। उसके द्वार पर परमात्मा आज नहीं कल दस्तक देता है। एक क्षण की देरी भी न होगी। जिस क्षण तुम तैयार होउसी क्षण तुम्हारे द्वार पर दस्तक पड़ जाएगी। देर तभी तक हैजब तक तुम तैयार नहीं हो। रोने से कुछ न होगा। चीखने-पुकारने से कुछ न होगा। तैयारी चाहिए।
और तैयारी का अर्थ हैरूपांतरणट्रांसफार्मेशन। तुम्हें अपने को बदलना होगाबहुत-बहुत रूपों में। अगर तुम गौर से अपने को देखोगेतो तुम खुद ही पाओगे कि परमात्मा तो दूरअगर तुमको भी इस घर में रहने के लिए पूछा गया होताजो तुम होतो शायद तुम भी राजी न होते। तुम जैसे होअगर ऐसे ही व्यक्ति से तुम्हें प्रेम करना पड़ेतो तुम इनकार कर दोगे।
इसलिए तो कोई अपने को प्रेम नहीं करता। तुम अपने प्रेम के पात्र होने के योग्य भी नहीं हो। इसलिए तो लोग अकेले में परेशान होते हैं। अपने साथ रहने को कोई राजी नहीं है। अगर तुम्हें घड़ी दो घड़ी अकेले बैठना पड़ेतो तुम बेचैन होते हो। कहते हो मित्र चाहिएक्लबसिनेमाबाजाररेडियोटेलीविजनअखबारकुछ चाहिए। ऐसा अपने साथ कैसे बैठे रहेंबड़ी ऊब पैदा होती है। तुम अपने से ऊबे हुए हो। तुम अपने सत्संग में जरा भी नहीं रह सकते और तुम परमात्मा की आकांक्षा करते हो! जब तुम खुद ही अपने साथ रहने को राजी नहींतो इतना तो पक्का समझना कि तुम्हारे साथ कौन रहने को राजी होगा?
और परमात्मा तो फिर बहुत दूर है। परमात्मा का अर्थ हैअस्तित्व का गहनतम शिखर तुम्हारे हृदय में उतरे। लेकिन फिर उसके लिए गहराई बनाओ। वहां उतनी गहराई तो चाहिए। तुम इतने छिछले हो कि जरा सी बात तुम्हारे भीतर तूफान ले आती है। जरा से कंपन से तुम कंप जाते हो। जरा सा अपमानऔर तुम आग हो जाते हो। जरा सा दुखऔर तुम समझते हो नर्क टूट पड़ा। तुम छोटे-छोटे से इतने व्याकुल हो जाते हो कि तुम्हारी कोई गहराई तो नहीं है। कोई एक छोटा सा पत्थर फेंक दे तो तुम्हारे भीतर तूफान आ जाएतो जाहिर है कि तुम कोई गहरे सागर नहीं हो।
सागर में तो हिमालय भी डूब जाए तो भी लहरों को कोई खबर न आएगीकोई फर्क न पड़ेगा। इतनी नदियां गिरती हैं सागर मेंइंच भर सागर ऊंचा नहीं उठता। जैसा है वैसा ही बना रहता है।
तुम परमात्मा की आकांक्षा कर रहे हो। कभी तुमने सोचा कि अगर परमात्मा आ जाएतो तुम्हारी क्या गति होगीतुम तो बड़ी मुश्किल में पड़ जाओगे। तुम कहां बिठाओगे उसेतुम कैसे उसका स्वागत करोगेतुम तो भाग खड़े होओगे अपने घर से।
तुम्हारे पास न सिंहासन हैक्योंकि सिंहासन कोई सोने का बनाना होता तो तुम बना भी लेते। सिंहासन हृदय का बनाना है। सिंहासन प्रेम का बनाना है। सोना तो बाजार में मिल जाएगाप्रेम कहां पाओगेमहल बनाना होतातो बहुत महल हैंबन जातेमिल जाते। फिर तो सम्राटों के घर परमात्मा उतर आता। लेकिन भीतर महल को बनाना है। शून्य का महल बनाना है,ध्यान का महल बनाना है। बड़ा कठिन है। लंबी यात्रा है।
तुम जहां होअगर तुमने समझ लिया कि यही घर हैतो तुम गृहस्थ। और अगर तुमने समझा कि धर्मशाला हैथोड़ी देर टिके हैंविश्राम करते ही आगे जाना है...।
एक बहुत पुरानी सूफी कहानी है। एक सूफी फकीर से किसी ने पूछा कि परमात्मा को पाने का राज क्या हैतो उसने कहा कि मैं तुझसे एक कहानी कहता हूं। और उसने कहा कि एक लकड़हारा था और वह लकड़ियां काटता रोजजंगल से शहर लाता। वह रोज यही करता रहा पूरे जीवन। इतना भी न कमा पाता कि दो जून रोटी मिल जाए। एक बार कभी रोटी मिल जाती,तो रात कभी भूखा सोता।
एक फकीर जंगल में रहता था। वह इसे रोज देखता था। उसे दया आ गयी। उसने कहा कि तू बहुत नासमझ है। जरा जंगल में और आगे क्यों नहीं जाताउस लकड़हारे ने कहाआगे जाने से क्या होगाफकीर ने कहातू जरा आगे जा। तू यहीं से लकड़ियां काट कर लौट जाता है। नाहक दरिद्र है। जो जरा और आगे गयासमृद्ध हो गया! क्योंकि और आगे तांबे की खदान है।
वह आदमी थोड़ा और आगे गया। तांबे की खदान मिल गयी। वह तांबा बेचने लगा ला कर। फिर कुछ दिन बाद वह फकीर मिला। और उसने कहा कि नासमझअब भी तुझे खयाल नहीं आयाअब लकड़ियों से तुझे तांबा मिल गया। तो थोड़ा और आगे क्यों नहीं जाताचांदी की खदान है।
जरा और आगे गयाचांदी की खदान मिल गयी। वह संपन्न होने लगा।
वह फकीर फिर एक दिन गुजरता था। और उसने कहा कि तुझे अक्ल है या नहींतू मंत्र को समझ ही नहीं रहा। और आगे जा! सोने की खदान है।
वह आदमी और आगे गयालेकिन सोने में उलझ गया। हमारे जैसा ही लकड़हारा होगा! जहां पहुंच जाते हैंवहीं उलझ जाते हैं। जहां बैठ गएवहां से उठने का नाम ही नहीं लेते। उस फकीर ने कहा कि नासमझतुझे कितनी बार मैंने कहा कि और आगे! आगे सोने की खदान है। वह और आगे गया और सोने की खदान में उलझ गयाजहां कि बहुत लोग उलझ गए हैं।
फकीर ने एक दिन उसके पास से गुजरते हुए कहातुझे कभी भी अक्ल न आएगी। तू जड़-बुद्धि का जड़-बुद्धि रहा। तू बाहर से अब संपन्न हो गयालेकिन भीतर अब भी दरिद्र है। मुझे तुझ पर दया आती है। तुझसे कितनी बार कहा हैऔर आगे। आगे हीरों की खदान है। वह और आगे गया।
फिर कई वर्षों के बाद फकीर वहां से गुजर रहा था। तब वह हीरों में उलझा था। उसने बड़े महल खड़े कर लिए थे। उसके पास बड़ा धन थाअंबार थे। फकीर ने कहातू एक दया का पात्रदया का पात्र ही बना हुआ है। तू भीतर गरीब का गरीब है। जैसा तू लकड़हारा थावैसा ही अब है। क्योंकि सोनासंपत्तिहीरेजवाहरात सब बाहर हैं। तू और आगे क्यों नहीं जाता?
उस आदमी ने कहाक्यों मेरे पीछे पड़े हुए होतुम मुझे चैन से क्यों नहीं रहने देतेतुम क्यों और आगेऔर आगे,लगाए हुए होअब क्या और आगे मिल सकता हैअब हीरे मिल गए!
उस फकीर ने कहाऔर आगे मेरा आश्रम है। और असली हीरे तुझे मैं दे सकता हूं। वे ध्यान के हीरे हैं। अभी तक तू बाहर की खदानें ही खोजता रहा। और आगे भीतर की खदान शुरू होती है।
उसने तब तक तो सुना थालेकिन अब उसने कहा कि यह जरा ज्यादा...। मेरी समझ के बाहर है। मुझे तो यहीं रुक जाने दें।
फकीर ने कहातेरी मर्जी। लेकिन यह खदान जो और आगे हैसदा नहीं रहेगी। क्योंकि मैं आज हूंकल नहीं हो जाऊंगा। जो खदानें तूने अब तक पायी हैंवे सदा रहेंगी। हम रहें या न रहें। हमसे पहले थींहमसे बाद भी रहेंगी।
ध्यान की खदान कभी-कभी प्रकट होती है। हजारों वर्षों में कभी-कभी प्रकट होती है। कभी कोई आदमी उस खदान को खोज लेता है और द्वार बन जाता है। उसी को नानक गुरु कहते हैं। और उसी के द्वार को नानक गुरुद्वारा कहते हैं। जिस आदमी के जीवन में ध्यान की खदान आ जाती हैवह द्वार बन जाता है। लेकिन वह सदा नहीं रहता। और तुम ऐसे अंधे हो कि तुम उस द्वार के पास से भी निकल जाओगेवह तुम्हें दिखायी न पड़ेगा। क्योंकि तुम्हारी नजर तो दृश्य धन पर लगी है,अदृश्य धन की तो तुम्हें कोई खबर नहीं है।
यह और आगे का सूत्र जिस आदमी को खयाल में बना रहता है...तब तक तुम इस मंत्र को मत भूलना जब तक परमात्मा ही न मिल जाए। उसके पहले जो राजी हो गयावह भटक गयावह गृहस्थ हो गया। इसलिए संन्यासी की अतृप्ति का कोई अंत नहीं है। परमात्मा को ही पी लेगा तभी प्यास को बुझाएगा। उससे छोटे पानी उसके काम के नहीं हैं।
नानक इसलिए इस संसार को धर्मशाला कहते हैं। उनका सूत्र समझें।
राती रुति थिति वार। पवन पानी अगनी पाताल।।
तिसु विचि धरती थापि रखी धरमसाल।
परमात्मा ने रातऋतुतिथिवारहवापानीआग और पाताल रच करउस सब के बीच धरती को धर्मशाला के रूप में स्थापित किया। उसके बीच उसने रंग-रंग के जीवों का विधान कियाजिनके नाम अनेक और अनंत हैं। वहां अपने-अपने कर्म के अनुसार उनका विचार होता है।
तो पहली तो बातयह संसार धर्मशाला हैसराय है। इसे तुम जितने गहरे अपने भीतर ले जा सकोउतना ही उपयोगी है। क्योंकि जितनी यह बात तुम्हारे भीतर उतर जाए कि तुम जहां हो वहीं रुके रहना मौत है--और आगेऔर आगेऔर आगे--जब तक कि परमात्मा का ही द्वार न आ जाएतब तक यात्रा जारी रखना। तब तक यात्रा बंद मत करना। तब तक थको तो विश्राम कर लेनालेकिन विश्रामगृह को घर मत बनाना।
थकान होगीक्योंकि यात्रा बड़ी हैमंजिल दूर है। हजारों बार तुम भटकोगे। क्योंकि कोई बंधा-बंधाया रास्ता नहीं है। कोई राजपथ नहीं है। कोई हाई-वे नहीं है कि तुम चले जाओ। आदमी चल कर ही अपना रास्ता बनाता है। परमात्मा का मार्ग इसलिए दूर है। जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं और उनके पैरों के कोई चिह्न नहीं छूटतेऐसे ही परमात्मा के आकाश में सिद्ध-पुरुष चलते हैंपहुंच जाते हैंपर उनके पैरों के कोई चिह्न नहीं छूटते। आकाश फिर खाली का खाली होता है।
तुम जब चलोगेतब तुम किसी के चरण-चिह्नों पर नहीं चल सकते। उधारी सत्य के जगत में संभव नहीं है। सत्य कोई दूसरा तुम्हें दे नहीं सकता। इशारे मिल सकते हैं। प्रेम मिल सकता है। गुरु की कृपा मिल सकती है। लेकिन सत्य तुम्हें ही खोजना पड़ेगा। उसकी कृपा तुम्हारे पैरों को मजबूती दे सकती हैमार्ग नहीं दे सकती है। उसकी कृपा तुम्हें आश्वासन दे सकती हैरास्ता नहीं दे सकती। उसकी कृपा तुम्हेंडगमगाओ नडरो मतइसके लिए हिम्मत दे सकती हैलेकिन मार्ग पर तुम्हीं को चलना पड़े। और मार्ग कुछ ऐसा है कि तुम चलो तो बनता हैचलने से ही बनता है। बंधा-बंधायातैयार मार्ग नहीं है। रेडी मेड,परमात्मा की तरफ जाने का कोई उपाय नहीं है। हर मनुष्य को अपना मार्ग खोजना पड़ता है। यही कठिनाई हैलेकिन यही गरिमा भी है। क्योंकि अगर बंधा-बंधाया मार्ग होताबासा मार्ग होताजिस पर लाखों लोग चल चुके होतेऔर तुम भी चलते,तो परमात्मा को पाने का कुछ मजा न रह जाता।
परमात्मा जब भी मिलता है किसी व्यक्ति कोतो ताजा और नयामौलिक। जैसे तुम्हें ही पहली बार मिल रहा है। इसके पहले यह मिलन की घटना कभी घटी ही नहीं। बासा नहींकि दूसरे भी उससे मिल गए हैं तुमसे पहलेकि दूसरे भी उसके द्वार पर अपने चरण-चिह्न छोड़ गए हैंकि दूसरों ने भी उसके दरवाजे पर अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं।
नहींतुम जैसे बिलकुल नए आए होपहली दफा आए हो। जैसे वह कुंवारा तुम्हारे लिए प्रतीक्षा कर रहा हो। परमात्मा सदा कुंवारा है। अगर बहुत लोगों से उसका विवाह पहले रच गया होतातो जानने योग्य भी न रह जाता। उसका कुंवारापन शाश्वत है। जो भी पहुंचेगाउसे कुंवारा पाएगाताजा और नया पाएगा। ऐसे जैसे सुबह की ओस ताजी होती हैजैसे सुबह की पहली किरण ताजी होती हैठीक ऐसा ही ताजा तुम पाओगे। बंधे-बंधाए रास्ते नहीं हैं।
और न कोई नक्शा हैजो तुम्हें दे दिया जाएकि इस नक्शे के अनुसार चलना। क्योंकि जीवन सतत परिवर्तन है। वहां सब प्रतिपल बदल रहा है। जिस ढंग से मैं पहुंचावह ढंग तुम्हारे काम न आएगा। वह ढंग मेरे काम आया। वह ढंग तुम्हारे काम न आएगा।
क्योंकि नानक कहते हैंपरमात्मा ने अनेक-अनेक जीवअनेक-अनेक आत्माएं भिन्न-भिन्न रंगों और रूपों में बनायी हैं।
एक-एक व्यक्ति अनूठा है। अगर एक-एक व्यक्ति अनूठा हैतो जो मेरे काम पड़ावह तुम्हारे काम न पड़ेगा। मेरी समझ तुम्हारे काम पड़ सकती हैमेरा मार्ग नहीं। मेरी समझ तुम्हें मार्ग खोजने में सहयोगी हो सकती हैलेकिन तुम जो मार्ग खोजोगे वह बिलकुल तुम्हारा होगा। वह तुम्हारा निजी होगा। उस पर तुम्हारी छाप होगी। जैसे तुम्हारे अंगूठे का निशान बस तुम्हारा है। अरबों-खरबों लोग हुए हैं पृथ्वी परऔर अरबों-खरबों लोग आज हैंऔर अरबों-खरबों लोग आगे होंगेलेकिन तुम्हारे अंगूठे का निशान कभी फिर नहीं दोहरेगा। जब तुम्हारे अंगूठे का निशान तक अस्तित्व इतना मौलिक बनाता हैतो तुम्हारी आत्मा को कितनी मौलिक बनाता होगातुम सोच सकते हो!
नयी चिकित्सा-शास्त्र की खोजें बड़ी गहरी बातों में उलझ गयी हैं। उनमें एक गहरी बात यह है कि तुम अगर चिकित्सा-शास्त्र की किताबें पढ़ोतो तुम हृदय का चित्र बना हुआ पाओगे। किडनी काफुप्फस काफेफड़ों का चित्र तुम बना पाओगे। वे चित्र केवल औसत हैं। हर आदमी का फेफड़ा अलग रंगआकार का है। किसी दूसरे आदमी का फेफड़ा वैसा नहीं है। नवीनतम खोजें कहती हैं कि शरीर का हर अंगहर आदमी का अनूठा है। दो आदमियों के हृदय एक जैसे नहीं हैं। अंगूठे की छाप ही नहीं,शरीर का कण-कण तुम्हाराबस तुम्हारे जैसा है। और परमात्मा तुम्हें दुबारा पैदा नहीं करता। तुम जैसा फिर वह किसी को नहीं बनाएगा। तुम अनूठे हो। तुम्हारे पहुंचने का मार्ग भी अनूठा होगा। तुम अद्वितीय हो। तुम्हारे पहुंचने का मार्ग भी अद्वितीय होगा। मजबूरी और कठिनाई भी हैगरिमा भी यही हैगौरव भी यही है कि तुम नवीनतमएकदम नूतन मार्ग से उस तक पहुंचोगे। वह तुम्हारे लिए बासा नहीं होगा।
यह जो बात हैअगर ठीक से समझ में आ जाएतो इसी का अर्थ आत्मा है। मशीनें हम एक जैसी हजारों बना सकते हैं। फोर्ड की एक कार जैसी लाख कारें हो सकती हैंदस लाख कारें हो सकती हैं। एक का कल-पुर्जा दूसरे में फिट हो जाएगा। एक कार और दूसरी कार में फर्क करना मुश्किल होगा कि क्या फर्क हैलेकिन दो आत्माएं एक जैसी नहीं होतीं। प्रत्येक आत्मा अद्वितीय होती है।
इसका अर्थ यह है--अगर इसे हम कवि और संत या भक्तों की भाषा में कहें--तो इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मा किन्हीं यंत्रों में ढाल कर नहीं बनायी जा सकती। परमात्मा जैसे एक-एक आत्मा को अपने हाथ से रचता है। यही उसके स्रष्टा होने का अर्थ है। जैसे चित्रकार एक चित्र बनाता है। तुम उससे कहो कि दुबारा इसी को बनाओतो वह ठीक वैसा चित्र दुबारा न बना सकेगा। खुद वही चित्रकार भी न बना सकेगा। भेद हो जाएंगे। क्योंकि समय बीत गया। चित्रकार भी भिन्न हो गया। उसकी भावदशाएं भिन्न हो गयीं। जिस भावदशा में पहला चित्र बनाया थाअब वह भावदशा न रही।
पिकासो एक बार चित्र बना रहा था। और एक मित्र उसके पास आया। उसने देखा उसको चित्र बनातेलेकिन वह इतना तल्लीन था। कि वापस लौट गया। फिर वह चित्र बाजार में बिका तो उस आदमी ने खरीद लिया। क्योंकि पिकासो के झूठे चित्र बाजार में बिक रहे हैं। लेकिन यह चित्र तो वह अपनी आंख से पिकासो को बनाते देख कर आया था। तो उसने खरीद लिया। लाखों रुपए उसमें लगे। चित्रकार से मिलने आया था--पिकासो से--वह मित्र। तो उसने एक बार पूछा--वह चित्र साथ ले आया--और उसने कहा कि यह चित्र प्रामाणिक तो है नक्योंकि मैंने तुम्हें बनाते देखा था। पिकासो ने कहा कि बनाया तो मैंने ही है,लेकिन प्रामाणिक नहीं है। वह मित्र तो हैरान हुआ! क्योंकि प्रामाणिक का तो एक ही अर्थ होता है कि चित्रकार ने स्वयं बनाया है। किसी ने नकल और कापी नहीं की। आथेंटिक हैपिकासो ने कहाइस अर्थ में कि मैंने बनाया है। और आथेंटिक नहीं है,क्योंकि मैंने केवल अपने पहले बनाए हुए चित्रों की प्रतिकृति की है। बनाते वक्त मैं रचनाकार नहीं था। बनाते वक्त मैं सिर्फ कापी कर रहा था--अपने ही चित्रों की--लेकिन बनाते वक्त मेरा स्रष्टा मौजूद नहीं था। उस मित्र ने पूछास्रष्टा का तुम्हारा क्या अर्थ हैतो पिकासो ने कहास्रष्टा मैं तभी होता हूं जब मैं अद्वितीय बनाता हूंयूनीकबेजोड़! और जब मैं नकल करता हूं तब कैसा स्रष्टा!
इसलिए कविचित्रकारमूर्तिकारजब वस्तुतः कोई मौलिक चीज बनाते हैंतब परमात्मा के निकटतम होते हैं। उतने ही निकट जितने भक्तजितने संत। जितना ध्यान में बुद्ध निकट होते हैं परमात्मा केउतना ही अजंता की मूर्तियों कोएलोरा के चित्रों को खोदता हुआ चित्रकार भी होता है। ये दूसरे मार्ग से।
जब भी तुम किसी चीज का सृजन करते होऔर अगर सृजन मौलिक हैतुम नकल नहीं कर रहे होइमिटेशन नहीं है,तो इससे बड़ी कोई प्रार्थना नहीं सकती। क्योंकि परमात्मा के तुम निकटतम हो। तुम उसके ही जैसे हो उस क्षण में। तुम भी स्रष्टा हो। इसलिए सृजन का इतना आनंद है। तुम छोटी सी भी चीज बना लेते हो तो कितने प्रसन्न होते हो।
एक छोटा सा बच्चा ताश का घर बना लेता हैतो खबर करता है आस-पड़ोस में कि मैंने एक घर बना लिया। एक रेत में घर बना लेता हैजो अभी गिर जाएगा क्षण भर बाद। लेकिन बच्चे की खुशी देखो! वह नाच रहा है।
जीवन में आनंद के क्षण सृजन के क्षण हैं। जब तुम बनाते होतब तुम आनंदित होते हो। और जिनके जीवन बिना सृजन के बीत जाते हैंउनके जीवन में सिवाय दुख के और कुछ भी नहीं होता।
क्यों ऐसा हैजब तुम कुछ बनाते हो तो क्यों आनंदित होते होक्योंकि बनाने के क्षण में एक झलक स्रष्टा की मिलती है। वह स्रष्टा हैतुम भी उस क्षण में छोटे-मोटे स्रष्टा हो जाते हो। तुम एक बगीचे में पौधा लगाओऔर जब पौधे में फूल आए तब तुम्हें एक आनंद होगा। वह आनंद वही है। बड़ी छोटी मात्रा मेंनिश्चित ही बूंद की तरह हैलेकिन आनंद वही है जो परमात्मा को सारे जगत को खिलता हुआ देख कर होता है। मात्रा का भेद होगुण का भेद नहीं है।
नानक कहते हैंउसने रंग-रंग के जीवों का विधान कियाजिनके नाम अनेक हैं और अनंत हैं।
यह जो परमात्मा का फैलाव हैजो सृजन हैक्रिएटिविटी हैअगर तुम इसे पहचान लो-- परमात्मा को पहचानना तो मुश्किल हैक्योंकि वह तो छिपा हुआ है--लेकिन अगर तुम उसकी दृश्य-कृति को पहचान लोतो पहली पहचान हो गयी। एक कदम उठ गया। देखो जगत को! एक गहन व्यवस्था से आपूरित है। चांद उगता हैसूरज उगता हैतारे घूमते हैं। ऋतु आती है,फूल खिल जाते हैं। सुबह होती हैपक्षी चहचहाते हैं। झरने बह-बह कर सागर पहुंचते रहते हैं। सागर बादलों में उमड़-घुमड़ कर वापस झरनों में बरसता रहता है। एक व्यवस्था है। जगत एक कासमास हैकेयास नहीं। एक अराजकता नहीं है। एक सुसंबद्ध व्यवस्था है। इस महत व्यवस्था को अगर तुम पहचानने लगो...।
जितना तुम इस व्यवस्था को पहचानोगे और जितना तुम्हें जगत में चलते हुए नियम की धारा दिखायी पड़ेगीउतना ही तुम्हें परमात्मा का हाथ स्मरण आने लगेगा। क्योंकि व्यवस्था बिना हाथों के नहीं हो सकती। और जहां इतनी विराट व्यवस्था है वहां इतने ही विराट हाथ होंगे। इसलिए तो हिंदू कहते हैं कि उसके हजार हाथ हैं। हजार का मतलब अनंत हाथ हैं। क्योंकि दो हाथों से यह कृत्य नहीं हो सकता। यह जो अनंत अस्तित्व हैयह अनंत हाथों से ही संभाला जा सकता है।
नानक कहते हैंउसी ने बनायी रातउसी ने बनायी ऋतुउसी ने बनायी तिथिउसी ने बनायी हवापानीआग,पातालपृथ्वी। सब उसने बनाया है। और इन सब के बीच में उसने बनायी पृथ्वीकि तुम इस अनंत की यात्रा में विश्राम कर सको।
लेकिन वह धर्मशाला है। वहां तुम घर बना कर मत बैठ जाना। लोग अनेक-अनेक तरह के घर बना-बना कर बैठ गए हैं। भूल ही गए हैं। जैसे कोई आदमी रात धर्मशाला में ठहरे और सुबह भूल ही जाए कि धर्मशाला है। और फिर वहीं रहने लगे। और धर्मशाला की ही उलझन को अपनी उलझन बना ले। धर्मशाला की चिंता को अपनी चिंता समझ ले। फिर परेशान होपीड़ित हो,दुखी हो और पूछता फिरे शांति का मार्ग। और जब भी कोई उससे कहे कि धर्मशाला को तुम घर क्यों बनाए हुए होतभी वह कहे कि अभी छोड़ना बहुत मुश्किल है। अभी जरा कठिनाई है। समझ में तो मुझे भी आता है। लेकिन जरा वक्त की जरूरत है। धीरे-धीरे छोडूंगा।
सवाल धीरे-धीरे छोड़ने का नहीं है। सवाल छोड़ने का है ही नहीं। सवाल देखने का है। देखने के लिए क्या समय लगाने की जरूरत पड़ती है! एक क्षण में दिखायी पड़ जाता है। देखने के लिए समय बिलकुल ही गैर जरूरी है। अगर तुम देखने को राजी होतो तुम्हें बिलकुल साफ दिखायी पड़ सकता है कि जहां तुम हो वह धर्मशाला है। क्योंकि तुम सदा तो वहां न थे।
जन्म के पहले तुम कहां थेमरने के बाद तुम कहां होओगेथोड़े से दिन का मेला है। और इन थोड़े से दिन में तुम इतने जड़ हो कर चिपक गए हो! जो हैउसको भी पकड़ लिया है। जो नहीं हैउस तक को तुम पकड़े हुए हो। आदमी के पास जो संपत्ति हैउसको तो वह पकड़ता ही हैभविष्य की जो वासनाएं हैं और सपने हैंउनको भी पकड़े हुए है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक घर बनाया। वह मुझे दिखाने ले गया। उसने बड़ा बगीचा लगाया था। उसमें स्नान के लिए तालाब बनाए। उसने कहा कि यह गर्म पानी का तालाब है। यह सर्दियों में स्नान के लिए बनाया है। फिर उसने कहा कि यह ठंडे पानी का तालाब है। यह दूसरा तालाब है। यह हमने गर्मियों में स्नान के लिए बनाया है। फिर उसने तीसरा तालाब बताया कि यह बिना पानी का तालाब है। मैंने उससे पूछा कि यह किसलिए बनाया हैउसने कहा कि यह उन समयों के लिए जब न नहाना होउस मौके के लिए।
आदमी नहाने का भी इंतजाम करता है और न नहाने का भी इंतजाम करता है। जो तुम्हारे पास है उसका भी तुम इंतजाम करते होजो तुम्हारे पास नहीं है उसका भी तुम इंतजाम करते हो। तुम जो है उसकी तो पीड़ा से भरे ही होजो कभी होगा वह चिंता भी तुम्हें घेरती है। तुम कभी अपने मन को गौर से देखोतो तुम पाओगे कि वह अतीत की चिंताओं से भरा है,जो अब हैं ही नहीं। कोई घटना जो बीस साल पहले घटी थीवह तुम्हारे मन में चलती है। वह बची ही नहीं है। अब कुछ भी नहीं बचा है। और कोई बात जो बीस साल बाद होगीउसका तुम विचार कर रहे हो। तुम अपनी चिंताओं को हजार गुना कर लेते हो।
और किसके लिए तुम चिंतित हो रहे होरास्ते पर बने हुए एक सराय के लिए। और इस सराय में जिनसे तुम्हारा मिलना हो गया हैतुम उनके लिए बड़े परेशान हो रहे हो। पति हैपत्नी हैबेटा हैमां हैपिता हैऔर सब की मुलाकात सराय में हुई है। रास्ते के किनारे मिलना हो गया है। और तुम भारी परेशान हो। तुम्हें एक भर चिंता नहीं है कि तुम घर को खोजो। और सब चिंताएं तुम्हारे पास हैं।
नानक कहते हैंइस पृथ्वी को उसने धर्मशाला की तरह बनाया।
इस प्रतीक को ठीक से समझ लेना।
और वहां अपने-अपने कर्म के अनुसार उनका विचार होता है।
और इस जगत में तुम जो भी कर रहे होवह बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि अंततः तुम्हारे जीवन की नियति उसी से निर्धारित होगी। जगत है धर्मशालाजहां रुक कर आगे बढ़ जाने की जरूरत है। लेकिन तुम वहां बहुत से कामों में लगे हो। धर्मशाला तो छीन ली जाएगीकाम का जाल तुम्हारे पास रह जाएगा। मरोगे तुमधर्मशाला तो छूट जाएगी पीछेलेकिन तुम ने धर्मशाला में जो कियावह तुम्हारा अनुगमन करेगा। वह तुम्हारी छाया हो जाएगी। वह तुम्हारा जन्मों-जन्मों तक पीछा करेगा। और अंतिम निर्णयतुमने क्या कियाक्या तुम्हारे कर्म थेउन पर निर्धारित होगा।
अब यह थोड़ा सोच लेने जैसा है। अगर तुम्हें याद आ जाए कि तुम धर्मशाला में हो और यह याद बनी रहेतो बहुत से कर्म तो तत्क्षण विलीन हो जाएंगे। तुम क्या पत्नी पर क्रोध करोगेक्रोध का प्रयोजन क्या हैदो क्षण का मिलना हैफिर छूट जाना है। इस दो क्षण में तुम पत्नी को अपना मान लेते होइसीलिए क्रोध भी करते हो। अपना मान लेते होइसलिए झगड़ते भी हो। पत्नी तो छूट जाएगी। क्योंकि मौत के समय तुम पत्नी को अपने साथ न ले जा सकोगे। लेकिन तुमने जो क्रोध किया,तुमने जो नाराजगी कीतुमने जो दुख पहुंचायावह सब कृत्य तुम्हारे साथ चले जाएंगे। सपने तो टूट जाएंगेलेकिन सपनों में तुमने जो कियावह तुम्हारा पीछा करेगा। यह सौदा महंगा है। यह सौदा बिलकुल ही महंगा है। इससे मिलता तो कुछ नहीं सिवाय खोने के। संसार में आदमी पाता कुछ नहींसिर्फ खोता है।
नानक कहते हैंइस धर्मशाला में अगर तुम स्मरण रख सको कि यह धर्मशाला हैतो तुम्हारे निन्यानबे प्रतिशत कृत्य तो बंद हो जाएंगे। तुम रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर बैठे हुए होया विश्रामगृह में बैठे हुए होवेटिंग रूम मेंवहां तुम कैसा व्यवहार करते होवहां किसी आदमी का चलते वक्त अगर तुम्हारे पैर पर जूता भी पड़ जाता हैतो भी तुम कहते हो स्टेशन हैभीड़-भड़क्का है। तुम नाराज नहीं होते।
मुल्ला नसरुद्दीन ने बहुत जीवन के देरी तक शादी नहीं की। जब वह पचास साल का हो गया तो मित्रों ने उससे पूछा कि तुम रुके क्यों होशादी क्यों नहीं कर लेतेउसने कहा कि ऐसा हुआ कि मैं एक सिनेमागृह के बाहर निकल रहा था। और एक स्त्री के पैर पर मेरा पैर पड़ गया। वह झपट कर लौटी! और जैसे रण-चंडिका होकाली का अवतार हो। और उसकी आंखों से आग! और ऐसा लगा कि वह या तो मुझे मारेगीया मेरी गर्दन दबा देगीया झपट पड़ेगी। लेकिन तभी वह एकदम शांत हो गयी मुझे देख कर। और उसने कहाकोई बात नहीं। मैं समझी कि मेरा पति है। तभी मैंने तय कर लिया कि शादी की झंझट में नहीं पड़ना है।
पराया आदमी हैक्या झंझट लेनी है! हो गयी भूल उससेपैर पर पैर पड़ गया। हम परायों को माफ कर देते हैंलेकिन अपनों को माफ नहीं कर पाते। बड़ी हैरानी हैअजनबी को हम क्षमा कर देते हैं। निकट जो हैउसे क्षमा नहीं कर पाते। क्यों?क्या कारण हैअजनबी और निकट में फर्क क्या हैअजनबी अजनबी हैउससे संबंध धर्मशाला का है। निकट जो हैवह अजनबी नहीं रहा हैऐसी हमारी भ्रांति है। उससे संबंध घर का है।
जो आदमी इस पूरे संसार को धर्मशाला समझ लेगाउसके लिए सभी अजनबी हैंस्टें्रजर्स हैं--हैं भी! पत्नी चाहे तीस साल तुम्हारे पास रहेक्या तुम सोचते होअजनबी नहीं रहीक्या तुम सोचते होतीस साल साथ रहने से जो पराया है वह अपना हो जाता हैभ्रांति होती है। अपना तो हो ही नहीं सकता कोई इस जगत में। अपना होने का यहां उपाय नहीं है। अपना तो सिर्फ परमात्मा हो सकता है। लेकिन उसकी तुम्हें कोई खोज नहीं है। तुम अजनबियों को अपना मान कर बैठे हो।
एक बेटा तुम्हारे घर पैदा हुआ। तो तुम सोचते हो कि तुमसे पैदा हुआइसलिए अजनबी नहीं है। तो जिंदगी तुम्हें गलत सिद्ध करेगी। बाप भी तो बेटे के जीवन के संबंध में कुछ तय नहीं कर पाता। बाप कुछ बनाना चाहता हैबेटा कुछ बनता है। बाप कुछ और चाहता थाबेटा कुछ और होता है। बाप की आकांक्षा कुछ और थीबेटे की अभीप्सा कुछ और है। कौन बाप अपने बेटे से तृप्त होता हैतुमने कोई बाप देखा जो बेटे से तृप्त होतुमसे पैदा हुआलेकिन अजनबी है। बाप भी तो प्रेडिक्ट नहीं कर सकता बेटे को कि क्या इसका भविष्य होगा। बाप भी तो तय नहीं कर सकता कि बेटे को वही बना ले जो बनाना चाहता है। बड़े से बड़े बाप हार जाते हैं। कोई उपाय नहीं है। पति लाख चेष्टा करता है पत्नी को सुधारने की। पत्नी कितनी चेष्टाएं करती है पति को सुधारने की। कौन किसको सुधार पाता हैसुधारने में बिगाड़ हो जाता है भलासुधार तो नहीं हो पाता।
क्योंकि हम सब अजनबी हैं। हम सब अपने-अपने कर्मों से जी रहे हैं। हमें कोई दूसरा न सुधार सकता हैन बदल सकता है। हमारी अपनी-अपनी अलग-अलग यात्रा है। थोड़ी देर को चौराहे पर मिल गए हैं। और इस मिलने को हमने इतना ज्यादा मान लिया है।
इससे क्या फर्क पड़ता है कि तुम एक स्त्री के साथ सात चक्कर लगा लिए अग्नि केसात चक्कर लगाने से कोई स्त्री तुम्हारी हो जाएगीसात क्यातुम सात हजार चक्कर लगाओ। सात तो शुरुआत हैजिंदगी में कितने लाख चक्कर लगाने पड़ते हैं! कुछ हल नहीं होता। तुम जहां थे वहीं हो।
यहां इस संसार में परायापन मिट ही नहीं सकता। यहां तुम कितने ही निकट आ जाओ तो भी दूरी रहेगी। यही तो पीड़ा है सभी प्रेमियों की। प्रेमी चाहता है कि इतने निकट आ जाए कि दूरी न रहे। लेकिन जितने ही तुम निकट आते होउतने ही तुम पाते होदूरी है। दूर थेतो यह भी खयाल था कि शायद पास आएंगे तो दूरी मिट जाएगी। पास आ-आ कर पता चलता है कि दूरी के मिटने का उपाय ही नहीं है। दूरी का मिटना असंभव है। तुम बिलकुल पास-पास बैठ सकते हो। शरीर ही पास-पास होंगेतुम्हारी भीतरी दूरी तो बनी ही रहेगी। तुम अपने खयाल मेंतुम्हारी प्रेयसी अपने खयाल में। तुम्हारे पास तुम्हारा मन है,तुम्हारी प्रेयसी के पास उसका मन है। इन दोनों का कैसे मिलना होगा! इस जगत में मिलन झूठा है। बिछोह सच है। मिलन सपना है। मिलन तो सिर्फ परमात्मा से हो सकता है। एक ही मिलन है।
इसलिए तो कबीरनानक और दादू गाए चले जाते हैं कि हम राम की दुलहनियां हैं। कबीर कहते हैं कि बसहम समझ गए कि दुल्हन तो सिर्फ राम की ही हुआ जा सकता है। वहीं मिलना पूरा होगा। जहां सब बाहर-भीतर की दूरी गिर जाएगी। वहीं प्यास तृप्त होगी। वहीं हम उससे मिलेंगे जो हमारा है। वहीं हम बिछोह को समाप्त कर पाएंगे।
उसके पहले तो व्याकुलता रहेगी। कितने ही कुओं से पानी पीयोप्यास न बुझेगी। कितने ही घाटों पर भटकोभटकाव ही रहेगा। सिर्फ उस एक के घाट पर भटकाव मिटता है। और उसकी हमें चिंता नहीं है। और तुम जो कर रहे हो इस भटकाव की अवस्था मेंवे सब कर्म तुम्हारे साथ इकट्ठे हो रहे हैं। वे सब संगृहीत हो रहे हैं। और उन सब संगृहीत कर्मों से तुम्हारा आगे का जीवन तय होगा।
इसे थोड़ा समझो। तुम जो भी करते होउससे तुम्हारा भविष्य रोज तय होता है। अगर तुमने आज सुबह उठ कर क्रोध कियातो तुम एक संस्कार पैदा कर रहे हो। अगर तुमने कल सुबह भी उठ कर क्रोध किया थातो संस्कार और भी गहरा है। अगर परसों सुबह उठ कर भी तुमने क्रोध किया थातो संस्कार की मजबूत लकीर बन गयी। अब कल सुबह जब तुम उठोगेतो बहुत संभावना है कि तुम फिर क्रोध करो। क्योंकि आदमी संस्कार से जीता हैजब तक कि आदमी प्रबुद्धत्व को उपलब्ध न हो जाए। सिर्फ बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति संस्कार से नहीं जीता। वह आदत से नहीं जीता। वह होश से जीता है। तुम तो आदत से जीते हो। जो कल हुआ थावही आज हो रहा है। जो आज होता हैवही कल होगा। तो
तुम जो भी कर रहे हो उससे तुम आदतें निर्मित करते हो। कर्म का सिद्धांत बहुत वैज्ञानिक है। उसका फलसफा से कुछ लेना-देना नहीं है। बस सीधी-साधी बात है। वह मनोविज्ञान का सीधा सा तथ्य है कि तुम जो करते हो उसको करने की वृत्ति बढ़ती जाती है। तो जो तुम नहीं करते होउसको न करने की वृत्ति बढ़ती चली जाती है। करना एक आदत हो जाती है। तुम यंत्रवत उसे करते रहते हो। लौट कर अपने जीवन को विचार करोतो तुम पाओगे कि तुम एक पुनरुक्ति होरिपिटीशन। तुम वही-वही रोज करते हो।
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं कि हम क्रोध नहीं करना चाहतेलेकिन हो जाता है। फिर मैं उनसे पूछता हूं कि जब हो जाता हैतब तुम क्या करते होतो वे कहते हैं कि जब हो जाता हैतब फिर हम पछताते हैं। फिर हम दुखी होते हैं। तो मैं उनसे कहता हूं कि तुम एक काम करो। क्रोध की तो फिक्र छोड़ोतुम पछताना छोड़ दो कम से कम। वह तो कर सकते हो! वे कहते हैंआप कैसी उलटी शिक्षा दे रहे हैं! पछता-पछता कर हम क्रोध छोड़ नहीं पाए! और अगर पछताना छोड़ देंगेफिर क्रोध कैसे छूटेगामैंने कहा कि तुम अपनी ही जिंदगी को देखो। पछता-पछता कर तुम छोड़ नहीं पाएअब मैं तुमसे कहता हूं कि तुम बिना पछता कर प्रयोग करके देख लो। कम से कम आदत का आधा हिस्सा तो तोड़ो। क्रोध करते हो फिर पछताते होयह पूरी आदत है तुम्हारी। क्रोध छोड़-छोड़ कर तुम कोशिश कर लिएवह नहीं छूटा। दूसरे हिस्से से कोशिश करो। कम से कम पछताना तो छोड़ दोउसमें तो कुछ महंगा नहीं है। क्रोध में तो समझो कि महंगा है। लगता है कई दफा करना जरूरी है। लेकिन पछताना तो तुम्हारा व्यक्तिगत है। इसमें तो किसी का कोई लेना-देना नहीं है।
क्रोध में तो दूसरा आदमी भी सम्मिलित है। किसी ने गाली दीअब कैसे क्रोध न करें! और न करें तो लोग क्या कहेंगे?और इस तरह अगर जाने दिया एक आदमी को गाली देतेऔर गांव में खबर लग गयी तो हर कोई गाली देगा। तो क्रोध तो सामूहिक हैपछतावा तो अकेला है। उसमें तो किसी का कुछ लेना-देना नहीं है। उसमें तो दूसरे का कोई भी संबंध नहीं है। अकेले में बैठ कर पछताते हो। कृपा कर के उसको छोड़ो। वह आदमी कुछ दिन बाद आता है और कहता है कि जितनी मुसीबत क्रोध छोड़ने में हैउतनी ही मुसीबत पछतावा छोड़ने में है।
एक महिला मेरे पास आती है। उनके पति शराबी हैं। आज बीस साल से वह उनके पीछे पड़ी है। जब से वह ब्याही है तब से वह यही काम कर रही है कि शराब न पीयो। वे शराब पीए जाते हैंवह पीछे पड़ी है। उसने मुझ से कहा कि इनकी आदत नहीं छूटतीहद हो गयी। इनको किसी तरह समझाएं। मैंने कहा कि तू एक काम कर। तीन महीने तू इनके पीछे मत पड़। इनको तो शराब की आदत है। शराब तो जरा केमिकल मामला है। क्योंकि बीस साल से जो आदमी शराब पी रहा हैउसके शरीर के रोएं-रोएं में शराब चली गयी है। उसके खून में शराब है। और अभी यह उसके एकदम बस की बात नहीं है कि एकदम से शराब छोड़ देना। खैरइनकी मैं पीछे फिक्र कर लूंगा। पहले तू सबूत दे एक बात का कि तू तीन महीने इनके पीछे न रहेगी।
तीसरे दिन आ कर उसने कहा कि यह मुझ से नहीं हो सकता। मेरी भी आदत पड़ गयी है। तो मैंने उसको कहा कि अब तू समझ कि इस तेरे पति की कितनी मुसीबत है। तू कहना तक नहीं छोड़ सकती। कहने का कौन सा नशा हैकहने का कोई केमिकल! कोई भी तो नहीं है। कहना ही छोड़ देना है। पीने दे। बीस साल कह कर भी शराब बंद नहीं हुई हैसिर्फ तीन महीने की बात है। तू तीन महीने इनसे मत कह। तो तू एक सबूत देगी कि तू आदत छोड़ सकती है। तो फिर मैं इनके भी पीछे पडूं,कि जब तेरी पत्नी आदत छोड़ सकती है...। मगर वह तीन महीने पूरे नहीं कर पाती। मैंने कहाजब तक तू तीन महीने पूरे न करेतब तक तेरे पति से मैं कुछ कहने वाला नहीं।
अब तो वह समझ गयी कि मुश्किल है। क्योंकि वह कहती हैदिन भर भी बीतना मुश्किल हो जाता है। दिन में कम से कम आठ-दस दफा की आदत है टोकने की। पति दिन में दो दफे शराब पीते हैं। वह दस दफे टोकती हैवह भी शराब है। सब आदतें शराब हैं। और जब तुम पुनरुक्ति करते होतुम उनको मजबूत करते हो।
कर्म का सिद्धांत सिर्फ इतना ही कहता है कि जो तुम करते होउसको करने की संभावना बढ़ जाती है। जो तुम नहीं करतेउसको न करने की संभावना बढ़ जाती है। ठहरे हो धर्मशाला में और व्यवहार ऐसा कर रहे हो जैसे घर में हो। यह गलत आदत बना रहे हो। धर्मशाला तो छूटेगीवह तुम्हारी है ही नहीं। लेकिन जो तुमने धर्मशाला में कियावह साथ चला जाएगावह तुम्हारा है। कर्म के अतिरिक्त तुम्हारे साथ कुछ भी नहीं जा रहा है। इसलिए सोच-समझ कर करना।
हीरा तुमने उठा लिया किसी का। वह हीरा तो पड़ा रह जाएगा जब तुम मरोगे। लेकिन तुमने उठाया थायह कृत्य तुम्हारे साथ चला जाएगा। तुम जो कर रहे होवही तुम्हारी संपदा बन जाएगी।
अगर तुम गलत कर रहे होतो तुम अपने भविष्य को गलत दिशा में मोड़ने के उपाय कर रहे हो। अगर तुम ठीक कर रहे होतो ठीक दिशा में मोड़ने के उपाय कर रहे हो। और अगर तुम सजग हो कर जी रहे होतो तुम मुक्त होने का उपाय कर रहे हो। क्योंकि जितना आदमी सजग होता हैउतनी आदत टूटती है। तब वह आदत से नहीं जीता। तब वह होश से जीता है। तब वह प्रत्येक परिस्थिति में होश से निर्णय लेता हैअतीत की आदत से नहीं। किसी ने गाली दीतुम्हारी पुरानी आदत है कि जब भी कोई गाली देबस खड़े हो जाओ झगड़ने को।
एक हवाई जहाज में पाइलट और एक यात्री का झगड़ा हो गया। गाली-गलौज की स्थिति आ गयी। पाइलट बड़े बेहूदे शब्द बोलने लगा। वह यात्री भी बोलने लगा। एक दूसरे यात्री ने कहा कि भाइयोयह भी तो खयाल रखो कि सभ्य महिलाएं बैठी हैं। उस यात्री ने कहा कि सभ्य महिलाएं भला नीचे उतर जाएंमगर यह लड़ाई हो कर रहेगी।
उड़ते हवाई जहाज मेंआकाश मेंवह आदमी कह रहा है कि सभ्य महिलाएं भला ही नीचे उतर जाएं...। वह अपने होश में नहीं है। वह क्या कह रहा हैउसे कुछ पता नहीं है। लेकिन लड़ाई हो कर रहेगी। वह अपने बस में नहीं है। कोई भी अपने बस में नहीं है। जो बेहोश हैवह अपने बस में नहीं है। तुम जो भी कर रहे होबेबस कर रहे होकिए जा रहे हो। तुम्हें साफ नहीं हैतुम क्या कर रहे हो! क्यों कर रहे हो!
थोड़ा जगो। पहला जागरण इस बात का कि यह संसार इतना मूल्यवान ही नहीं है कि इसमें तुम इतने परेशान हो। कोई आदमी तुम्हें गाली देता हैन तो वह आदमी इतना मूल्यवान हैन उसकी गाली इतनी मूल्यवान है कि तुम परेशान होओ। न तुम्हारा अहंकार इतना मूल्यवान है कि उसके लिए तुम उपद्रव खड़ा करो। यह धर्मशाला है। किसी का पैर तुम्हारे पैर पर पड़ गयापरेशान मत हो।
मुल्ला नसरुद्दीन एक सिनेमा से बाहर आ रहा था इंटरवल में। एक आदमी के पैर पर उसका पैर पड़ा। वह आदमी तिलमिला गया। लेकिन उसने सोचा कि अंधेरा हैअभी-अभी प्रकाश हुआ हैएकदम से लोगों को दिखायी भी नहीं पड़ता अंधेरे में रहने के बादहो गयी होगी भूल। फिर लौट कर नसरुद्दीन आया। उस आदमी के पास आ कर पूछा कि क्या भाई साहब,आपके पैर पर मेरा पैर पड़ गया थाउस आदमी ने सोचा कि यह क्षमा मांगने आया है। उसने कहा कि हां। मुल्ला ने पीछे लौट कर अपनी पत्नी से कहाआ जाओयही अपनी लाइन है। वे लाइन बनाने के लिए पैर पर पैर रख गए थे!
तो जो आदमी तुम्हें गाली दे रहा हैउसके अपने प्रयोजन होंगे। तुम्हें उसमें परेशान हो जाने की कोई जरूरत नहीं है। भीड़-भड़क्का है यहां। काफी लोग हैं। सब अपना-अपना खोज रहे हैं। किसी से तुम्हें न प्रयोजन हैन तुम्हें किसी से प्रयोजन है। किसी का किसी से कुछ लेना-देना नहीं है। यहां हर आदमी अपना खेल खेल रहा है। और थोड़े धक्के-मुक्के होंगे ही। क्योंकि इतनी भीड़ हैरास्ता हैइतना ट्रैफिक है।
अगर तुम थोड़ा सा इसे देख पाओ और तुम इस बोध को रख सकोक्रोध गिरेगाघृणा गिरेगी,र् ईष्या गिरेगी,जलन...और उनसे पैदा होने वाले कृत्य विदा हो जाएंगे। जिस दिन तुम्हारे घृणा से संबंधित कृत्य गिर जाएंगेउसी दिन तुम्हें लोगों पर दया आने लगेगी। क्योंकि हर आदमी मूर्च्छित है। कल क्रोध आता थाअब दया आएगी। और तुम्हें लगेगा हर आदमी भटका हुआ है। लोग अंधेरे में जी रहे हैं। किसी का कोई कसूर नहीं है। लोग सोए हुए हैं। सोया हुआ आदमी बड़बड़ा रहा हो,गाली बक रहा होतो भी तुम कुछ न कहोगे। नींद में हैतुम कहोगे। लेकिन यही हालत सब की है।
एक शराबी गाली दे रहा होतो तुम कहते हो शराबी हैपी गया है। लेकिन यही हालत सब की है। जन्मों-जन्मों के कर्मों की शराब है। गहरी नींद है। तुम्हें दया आएगी। अगर तुम थोड़े भी जगोगेतो तुम्हें दया आएगी कि चारों तरफ इतने लोग कितनी परेशानी उठा रहे हैं। धर्मशाला को घर समझे हुए हैं। अदालतों में मुकदमे लड़ रहे हैं कि धर्मशाला किसकी है।
तुम्हें दया आनी शुरू होगी। और तुम्हारी दया के साथ हीतुम्हारे कृत्यों का रूप बदलेगा। जहां कृत्य पाप थेवहां पुण्य होने लगेंगे। जहां तुम दूसरे को नुकसान पहुंचाने को तत्पर हो जाते थेवहां दूसरे को सहारा देने को तत्पर हो जाओगे। जो तुम्हें गाली देगाउसको भी सहारा देने की दया तुम्हारे भीतर होगी।
इसलिए तो नानक कहते हैंज्ञान और दया। ज्ञान यानी जागरणऔर दया यानी तुम्हारे कृत्यों में जागरण के कारण हुआ परिवर्तन। अज्ञान भीतरहिंसा बाहर। उन दोनों का संग है। ज्ञान भीतरकरुणा बाहर। उन दोनों का संग है।
कर्म के अनुसार विचार होगा।
अब यह बहुत मजे की बात है कि तुम अच्छी-अच्छी बातें सोचते हो और बुरी-बुरी बातें करते हो। करते तुम बुरा हो,सोचते बड़ा अच्छा हो। लेकिन तुम्हारे सोचने का कोई विचार होने वाला नहीं है। तुमने क्या सोचाइससे कुछ हिसाब नहीं है। तुमने क्या कियावही तुम्हारा प्रमाण है। कृत्य तुम्हारा प्रमाण हैतुम्हारा विचार नहीं। विचार तो पापी भी बड़े अच्छे-अच्छे करते हैं। कारागृहों में जा कर अपराधियों को देखोवे भी बड़े ऊंचे विचार करते हैं। ऊंचा विचार करना तो एक तरकीब है। बुरा काम करने की तरकीब हैऊंचा विचार करना।
इसे थोड़ा समझना। यह थोड़ा बारीक है। जब आदमी बुरा काम करता है तो उसके भीतर पछतावा होता है। जब आदमी किसी पर कठोर हो जाता हैक्रोध करता हैअपमान कर देता हैतो भीतर पछतावा होता है। भीतर लगता हैयह उचित नहीं हुआ। तो भीतर अच्छे-अच्छे विचार करता हैकरुणा केदया केकि दुबारा मौका आने पर दया करूंगा। पछताता है कि जो कियावह बुरा किया। इस भांति जो बैलेंस खो गया है भीतरजो संतुलन खो गया है बुरा कर केउस पलड़े को वह भारी कर देता है विचार केशुभ धारणाओं के कारण। तुम अच्छा-अच्छा सोचते होताकि तुम्हारी नजर में जो तुमने बुरा किया हैवह ढंक जाए। बुरे आदमी हमेशा अच्छे विचार करते हैं।
और इससे उलटा भी सही है। अच्छे कृत्य करने वाले लोग अक्सर बुरा विचार करते हैं। और अगर तुम जाग जाओगे तो तुम पाओगे कि ये दोनों स्थितियां ही भ्रांत हैं। चोर अक्सर सोचता है कि दान करूं। इसलिए तुम चोरों को दान करते पाओगे भी। चोर अक्सर सोचता है कि मंदिर बना दूंकि गरीबों को भोजन करवा दूंकि सर्दी आ गयी कंबल बंटवा दूं। और तुम चोरों को कंबल बंटवाते पाओगे भी। क्योंकि चोरी का दंश ऊपर होता है। लाख रुपए की चोरी की तो हजार रुपए का दान तो करने का मन होता ही है। उससे आदमी सोचता है कि संतुलन हो जाएगा। पापी गंगा स्नान करने जाता है। वहां थोड़ी दान-दक्षिणा करता हैसोचता हैसब निपट गया। घर हलका हो कर लौटता है। हलके हो कर लेकिन तुम करोगे क्याकरोगे तुम वहीजो तुमने कल किया था। अब तुम हलके मन से करोगे। यह और खतरा है। अब तुम निश्चिंत भाव से करोगे।
एक महिला एक डाक्टर के पास जा रही थी। एक मनस्विद के पास। उसके हाथ से बर्तन छूट जाने की उसे बीमारी थी। बर्तन टूट जातेगिर जाते। और उससे वह बहुत ज्यादा नर्वसऔर बहुत बेचैनव्याकुलकंप जाती थी। बड़ी दुखी होती थी। छः महीने की मनसचिकित्सा के बाद उसके मनोवैज्ञानिक ने पूछा कि अब तो सब ठीक हैअब घबड़ाहट तो नहीं होतीबर्तन तो नहीं गिरतेउस स्त्री ने कहा कि बर्तन तो अभी भी गिरते हैंलेकिन बाकी सब ठीक है। चिकित्सक ने कहा कि फिर बाकी सब ठीक का क्या अर्थ हैउसने कहा कि अब आपके समझाने से घबड़ाहट बिलकुल नहीं होती।
जो आदमी थोड़ा पुण्य कर लेता हैपुण्य के कारण अब घबड़ाहट बिलकुल नहीं होती। और सोचता है कि पुण्य कर के निपट गए। पाप तो खतम हो गयाअब फिर किया जा सकता है। और एक तरकीब भी हाथ में लग गयीजब भी पाप करो,पुण्य कर लेना।
इसलिए तो यह मुल्क इतना पापी हुआ है। क्योंकि इस मुल्क को पुण्य की तरकीब हाथ में लग गयी। आज भारत जैसा पापी मुल्क खोजना कठिन है। और उसका कारण यह है कि गंगा यहां बहती है। गएस्नान कर के आ गए। पाप कियामंदिर में जा कर प्रसाद चढ़ा आए। पाप कियाहनुमान जी को एक नारियल फोड़ दिया।
हनुमान जी का कोई संबंध भी नहीं हैकोई उनका कसूर भी नहीं है। तुम्हारे पाप में कुछ लेना-देना नहीं है। और तुम उनको भी भागीदार बना रहे हो। इधर भूल कीउधर जा कर सुधार आए। फिर भूल करने को तैयार हो कर वापस आ गए। जब भी तुम बुरा करते होतब तुम भले विचार करते हो। ताकि भूल का जो तुम्हारे भीतर दंशकांटा लग गयावह निकल जाए। और तुम्हारी जो प्रतिमा भीतर अच्छे आदमी की खंडित हो गयीवह फिर अखंड हो जाए।
लेकिन तुम्हारे विचारों का कोई हिसाब होने वाला नहीं है। तुम क्या करते होवही तुम बनते हो। तुम क्या सोचते हो,इससे कोई संबंध नहीं है। और बड़े आश्चर्य की बात है कि जब भी कोई शुभ कृत्य करना हो तब तुम टालते होपोस्टपोन करते हो। तुम कहते होकल करेंगेजल्दी क्या हैऔर जब भी कोई बुरा कृत्य करना होता हैतो तुम कभी नहीं कहते कि कल करेंगे। तुम कहते होअभी हो जाएइसी वक्त। जब तुम्हें किसी की हत्या करनी हैतब तुम उसी वक्त करते हो। क्यों?क्योंकि तुम भी भलीभांति जानते होजो टालावह सदा के लिए टल जाएगावह कभी नहीं होगा। क्रोध करना हो तो उसी वक्त करते हो। तुमने कोई आदमी देखा जो कहे कि अच्छा भाईअभी हम जरा काम में हैंकल आ कर क्रोध करेंगे। तुमने गाली दी,वह हजार काम छोड़ देता है। पत्नी मर रही होवह दवा लेने जा रहा था। वह कहता हैमर जाए कल की मरने वाली आज,लेकिन पहले यह निपटारा करना है। क्योंकि तुम भी भलीभांति जानते हो कि तुमने टाला कि सदा के लिए टल जाएगा। फिर कभी न कर पाओगे।
गुरजिएफ का पिता मरा। और उसने उससे कहा कि सिर्फ एक बात तू खयाल रखना कि जब भी क्रोध करना हो चौबीस घंटे रुक कर करना। कोई गाली देउससे कह आना कि भई चौबीस घंटे बाद आ कर कहूंगा उत्तर। क्योंकि क्या करूंबाप मरते वक्त यह वचन ले गया है। नौ साल का था गुरजिएफ। कुछ समझता भी न था। वचन दे दिया।
गुरजिएफ ने लिखा है बाद में कि मेरी पूरी जिंदगी उस वचन के कारण बदल गयी। क्योंकि चौबीस घंटे में कहीं किसी ने क्रोध किया है लौट करचौबीस घंटे में तो मूर्खता समझ में आ जाती है कि यह बात ही फिजूल है। चौबीस घंटे में निन्यानबे मौकों पर तो यह भी समझ में आता है कि उस आदमी ने जो कहा थावह ठीक ही कहा है। वह गाली नहीं हैठीक मेरा वर्णन है। अगर उसने कहाचोर! तो चौबीस घंटे में खुद ही समझ में आ जाता है कि बात तो ठीक ही कह रहा है कि मैं चोर हूं। उसने कहाबेईमान! चौबीस घंटे में खुद ही समझ में आ जाता है कि बात तो ठीक ही हैहूं तो बेईमान। यह तो वर्णन हुआ,गाली कहां हुई!
तो गुरजिएफ बहुत दफा जा कर तो धन्यवाद दे आया कि तुमने जो कहा था बिलकुल ठीक कहा था। क्रोध का तो कोई सवाल ही नहीं है। तुम्हारी बड़ी कृपा कि तुमने बताया। जो मुझे नहीं दिखता थातुमने समझाया। बीमारी जो बता दे वह चिकित्सक हैदुश्मन थोड़े ही है। निदान कर दिया तुमने। डायग्नोसिस हो गयी।
या चौबीस घंटे बाद वह जा कर कह आता कि भाईमैंने बहुत सोचालेकिन तुम्हारी बात बिलकुल ही गलत मालूम पड़ती है। मुझ पर लागू नहीं होती। और जब लागू ही नहीं होती तो हम किसलिए क्रोध करेंहम से उसका कुछ लेना-देना नहीं,तुम किसी और के संबंध में कह रहे होओगे। इसकी कोई संगति ही नहीं है। या तो संगति पायीतब धन्यवाद दे आता। या जब असंगति पायी तो झूठ के लिए कोई क्रोधित होता है?
तुमने कभी खयाल कियातुम जब भी क्रोधित होते होतो कोई सच बात कह रहा होता हैतभी क्रोधित होते हो। तुम चोर होऔर कोई कह देता है चोर। तुम अगर चोर नहीं होतो कोई कितना ही चोर कहेक्रोध पैदा नहीं होता। क्योंकि क्या क्रोध करना! वह आदमी बात ही झूठ कह रहा है। वह किसी और के संबंध में कह रहा होगा। उससे मेरा कोई लेना-देना नहीं। उसकी चोट ही नहीं पड़ती।
लेकिन तुम छिपाए थे कि तुम चोर हो। तुम सब तरफ साधु का वेश बनाए थेमंदिर जाते थेमाला जपते थे। तुम्हारा वेश धोखे का था। और इस आदमी ने असली बात पकड़ लीइसने कह दिया चोरचोट लगती है। ध्यान रखनासत्य से चोट लगती हैझूठ से कैसे चोट लगेगीझूठ की कोई ताकत हैझूठ में कोई बल हैलेकिन हम बुराई को उसी वक्त करते हैं। और भलाई को हम कहते हैंकल आना।
एक मारवाड़ी गर्मी के दिनों में अपनी खस की टट्टी के पीछे बैठा हुआ हिसाब-किताब कर रहा है। एक भिखारी मांगने आया। वह कहता हैमिल जाएं चार पैसे। उस मारवाड़ी ने कहा कि जाओपैसे-वैसे यहां नहीं हैं। उसने कहातो दो रोटी मिल जाएं। उस मारवाड़ी ने कहाभागो यहां सेयहां कोई रोटी-वोटी नहीं है। उसने कहाकुछ कपड़ा-लत्ताजैसे कि भिखारी अड़ियल होते हैं। लेकिन मारवाड़ियों से कोई जीता हैऔर उस मारवाड़ी ने कहा कि यहां कुछ नहीं हैआगे बढ़ो। उस भिखारी ने कहा,फिर भीतर बैठे क्या कर रहे होचलो हमारे साथ ही हो जाओ। जो भी मिलेगा आधा-आधा कर लेंगे।
कोई दो पैसे भी मांगे तो तुम टालते हो। कोई दो रोटी भी मांगने आ जाए तो तुम पूरे प्राणपण से लग जाते हो कि कैसे हटे। अच्छा करने की हिम्मत ही नहीं होती। और बुरा करने को तुम बिलकुल ही कमर बांध कर तैयार खड़े हो। जैसे कि प्रतीक्षा ही कर रहे थे कि आओ।
बुरे को स्थगित करना और भले को स्थगित मत करनातुम्हारा जीवन बदल जाएगा। बुरे को कहनाकल करेंगे। भले को अभी कर लेना। क्योंकि कल का क्या भरोसा हैअगर तुम्हारे जीवन का यह सूत्र हो जाए कि बुरे को स्थगित करनाबुरा होगा ही नहीं। भले को तत्क्षण करनाबहुत भला होगा। अभी भी तुम वही कर रहे होउलटे ढंग से। अभी तुम बुरा करते हो,भले को टालते हो। भला फिर कभी नहीं होताबुरा रोज होता है। तुम्हारे सारे कृत्यों की शृंखला कांटों की हो जाती है। उसमें फूल फिर आते नहीं।
नानक कहते हैंलेकिन विचार होगा कर्म का। वह परमात्मा सच्चा है और उसका दरबार भी सच्चा है।
और ध्यान रखना कि तुम सच्चे हुए तो ही उसके दरबार में प्रवेश पा सकोगे। तुम किसे धोखा दे रहे होतुम सारे संसार को धोखा दे सकते होलेकिन क्या तुम स्वयं को धोखा दे सकते होतुम तो जानते ही हो कि तुम क्या हो! सारी दुनिया तुम्हें पूजेकहे कि तुम साधु होलेकिन तुम तो भीतर जानते ही हो कि तुम कौन होउस भीतर छिपे को कैसे धोखा दोगेवह जो तुम्हारा भीतर छिपा हुआ अस्तित्व हैवही तो परमात्मा है। परमात्मा के सामने तुम कैसे वंचना करोगेवहां तो तुम नग्न हो। वहां तो सब खुला है। वहां तो कुछ ढंका नहीं हो सकता। उस दरबार में तो सच्चे ही तुम हो सकोगे तो ही प्रवेश पा सकोगे।
लोग पूछते हैंपरमात्मा कैसे पाएंलोगों को पूछना चाहिएसच्चे कैसे होंपरमात्मा को पाने की बात ही छोड़ देनी चाहिए। जैसे लोग पूछते हैंपरमात्मा दिखायी नहीं पड़ता। उन्हें पूछना चाहिएमुझे परमात्मा क्यों दिखायी नहीं पड़ता?
झूठी आंखें उसे नहीं देख सकतीं। सत्य को देखना हो तो सच्ची आंखें चाहिए। सत्य को अनुभव करना हो तो सच्चा हृदय चाहिए। सत्य को पहचानना हो तो तुम्हें भी सच्चा होना पड़े। क्योंकि समान ही समान को पहचान सकता है। तुम अभी जहां खड़े होजैसे खड़े होबिलकुल झूठ हो।
झूठ का मतलब इतना नहीं है कि तुम जो बोलते हो वह झूठ है। तुम्हारा होना ही झूठ है। तुम्हारे चेहरे झूठ हैं। तुम्हारा व्यवहार झूठ है। तुम कहते कुछ होतुम सोचते कुछ होतुम करते कुछ हो। तुम्हारी बात कातुम्हारे होने का कोई भी भरोसा नहीं है। तुम्हें खुद ही भरोसा नहीं है कि तुम क्या कर रहे हो। क्या तुम यही करना चाहते होतुम क्या कह रहे होक्या तुम यही सोचते हो जो तुम कह रहे हो?
लेकिन तुम डरोगे बहुत। क्योंकि अगर तुम सच्चे होने लगे तो तुमने धर्मशाला में जो घर बनाया हैवह गिरने लगेगा। क्योंकि इस धर्मशाला में--धर्मशाला का अर्थ हैवह पड़ाव हैघर नहीं है--बड़े से बड़ा झूठ तो तुमने यह खड़ा किया है कि तुमने घर बना लिया है। अब तुम कागज की नाव में बैठे हो और यात्रा कर रहे हो। तुम यात्रा करोगे कैसेकिनारे पर ही बैठे रहोगे। नाव को पानी में भी उतारना खतरनाक है। क्योंकि कागज की नाव हैउतरी कि डूबी। उतरी कि गली।
लोग मेरे पास आते हैं। और वे कहते हैं कि अगर हम सच्चे हो जाएं तो जीवन बहुत मुश्किल हो जाएगा। हो ही जाएगा। क्योंकि झूठ से तुमने जीवन को बनाया हैइसलिए। शुरू में तो बहुत मुश्किल होगा। न बदलो तो भी मुश्किल है। कौन सा सुख तुमने जाना हैकौन से आनंद का फूल तुम्हारे जीवन में खिला हैकौन सी सुगंध आयी हैक्या है कि जिसके कारण तुम कह सको कि जीना सार्थक हुआकुछ भी तो दिखायी नहीं पड़ता।
कठिन तो अभी भी है। लेकिन इस कठिनाई के तुम आदी हो गए हो। जब तुम सच में बदलने की कोशिश करोगे तो आदतें टूटेंगी। जिस आदमी से तुम्हें कुछ प्रेम नहीं हैउससे तुम कहते होआप आएबड़ा सौभाग्य है। और भीतर सोचते हो कि इस दुष्ट का चेहरा कैसे दिखायी पड़ गया सुबह-सुबह! आज का दिन खराब हो गया।
अगर वह आदमी भी थोड़ा समझदार होथोड़ा सजग होतो वह तुम्हारे झूठ को देख लेगा। क्योंकि तुम कहो कुछ भी,तुम्हारी आंखें खबर देंगी। तुम्हारा चेहरातुम्हारा हाव-भाव प्रसन्नता प्रकट नहीं करेगा। तुम्हारे शब्द और होंगेतुम्हारे ओंठ और होंगे। उन दोनों में कोई संगति न होगी।
क्योंकि जब कोई आदमी सच ही प्रसन्न होता हैतो प्रसन्नता की बात कहता थोड़े ही है! उसका रोआं-रोआं गदगद हो उठता है। जब कोई आदमी सच ही प्रसन्न होता हैतो उसको तुम पहचान सकते हो। लेकिन दूसरा भी सोया हुआ है। वह भी सोचता है कि तुम ठीक कह रहे हो। इसलिए तो खुशामद दुनिया में सफल होती है। सब झूठी है। और सुनने वाला भी अगर गौर से सुने तो समझेगा कि तुम बिलकुल गलत बात कह रहे हो। यह है ही नहीं।
इंग्लैंड में कवि हुआ ईट्स। उसे नोबल प्राइज मिली। उसका स्वागत किया गया। वह बहुत सच्चा आदमी था। बहुत सरल आदमी था। उसके काव्य में भी वैसी सच्चाई है। जब उसका स्वागत किया गया तो स्वागत में तो जैसा होता हैलोग स्तुति करते हैं। जो सदा गाली देते थेवे भी वहां खड़े हो कर स्तुति करते हैं। वह बड़ा हैरान हुआ। और उसे बड़ा संकोच होने लगा कि ये सब झूठी बातें मेरे संबंध में कही जा रही हैं। वह अपनी कुर्सी में सिकुड़ता गया--दो घंटे!
जब स्तुति खतम हुई तो लोगों ने देखा कि वह कुर्सी में बिलकुल ऐसा दबा बैठा है कि जैसे अब उसके बर्दाश्त के बाहर है। उसे हिलाया सभापति ने और उससे कहाआप सो तो नहीं गए हैंउसने कहा कि मैं सो नहीं गया हूंलेकिन अगर मुझे यह पता होता तो मैं न आता। कुछ समझा नहीं सभापति। उसने खड़े हो कर घोषणा की कि पच्चीस हजार पौंड हमने पूरे मित्रों ने इकट्ठे किए हैं तुम्हारी भेंट के लिए। सोचा सभी ने कि वह बड़ा प्रसन्न होगा। उसने खड़े हो कर कहा कि अगर मुझे पता होता कि सिर्फ पच्चीस हजार पौंड के लिए इतना झूठ मुझे सुनना पड़ता तो मैं आता ही नहीं। सिर्फ पच्चीस हजार पौंड के लिए इतना झूठ! महंगा सौदा रहा। दो घंटे!
अगर तुम थोड़े सजग हो तो तुम्हारी कोई खुशामद न कर सकेगा। क्योंकि तुम पाओगे कि यह आदमी झूठ बोल रहा है। लेकिन तुम सजग नहीं होलोग झूठ बोल रहे हैं चारों तरफतुम्हारे खयाल में नहीं आता। तुम खुद झूठ बोल रहे होवह तक तुम्हारे खयाल में नहीं आता कि तुम क्या कह रहे होऔर तब तुम फंसते हो बड़ी झंझटों में। किसी स्त्री से कह बैठते हो कि तू बड़ी सुंदर है। तुझसे मुझे बड़ा प्रेम है। फिर तुम उलझन में पड़े। तुम शायद झूठ ही कह रहे थे। अब यह सिलसिला शुरू हुआ। कल तुम पछताओगे।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी ने कहा उससे एक दिन सुबह चाय पीते वक्त कि तुम ही मेरे पीछे पड़े थे। मैं तुम्हारे पीछे कभी नहीं पड़ी थी। और अब तुम्हारे ये ढंग! अगर यही व्यवहार करना था तो मेरे पीछे क्यों पड़े थेमुल्ला नसरुद्दीन ने कहा,तू बिलकुल ठीक कह रही है। कभी किसी चूहादानी को चूहे को पकड़ने के लिए दौड़ते देखा हैचूहा खुद ही फंसता है। यह बात सच है तेरा कहना कि हम खुद ही तेरे पीछे पड़े थे।
स्त्रियां होशियार हैं इस मामले में। इसलिए कोई पति कभी उनको यह नहीं कह सकता कि तू मेरे पीछे पड़ी थी। कोई स्त्री ऐसी भूल नहीं करती। क्योंकि यह झंझट आज नहीं कल तो आने ही वाली है। हमेशा पुरुष ही फंसता है। क्योंकि स्त्री चुपचाप देखती है। वह सुनती हैवह राजी होती हैसिर हिलाती है। बाकी कभी इनिशिएटिव नहीं लेती। पहल नहीं करती। वह नसरुद्दीन ठीक कहता है कि कोई पिंजड़ा चूहे के पीछे नहीं भागता। स्त्रियां ज्यादा होशियार हैं। वे अपने आप ही...।
जब नसरुद्दीन मरने लगा तो उसके बेटे ने पूछा कि कोई सूत्र जीवन के अनुभव केतो उसने कहातीन बातें सीखी हैं पूरे जीवन में। एक यह कि अगर लोग थोड़ा धैर्य रखें तो फल अपने आप ही पक जाते हैं और गिरते हैं। उनको तोड़ने के लिए झाड़ पर चढ़ने की कोई जरूरत नहीं। और दूसरी बात कि लोग अगर धैर्य रखें तो लोग अपने आप ही मर जाते हैं। उनको मारने के लिए युद्ध वगैरह करने की कोई जरूरत नहीं। और तीसरी बातअगर लोग सच में धैर्य रखें तो स्त्रियां खुद पुरुषों के पीछे भागेंगी। उनके पीछे भागने की कोई जरूरत नहीं है। उसने कहाये तीन चीजें मैंने जीवन का सार अनुभव की हैं। लेकिन कोई सार से तो चलता नहीं। न कोई अनुभव से चलता है।
क्या तुम बोलते होक्या तुम करते होहोशपूर्वक करोगे तो तुम पाओगे निन्यानबे तो गिर गया। निन्यानबे प्रतिशत तो गिर गया। एक प्रतिशत बचेगा। वह एक प्रतिशत धर्मशाला के लिए काफी है। वह निन्यानबे प्रतिशत से घर बना रहे थे तुम। वह जो एक प्रतिशत बचेगावही संन्यासी का जीवन है। जो अनिवार्य है वही बचेगा। जो अपरिहार्य है वही तुम करोगे। जो अनावश्यक है वह कट जाएगा। अनावश्यक ही तो गृहस्थ का उपद्रव है। कितनी अनावश्यक चीजें तुम घर में खरीद कर ले आए हो।
एक घर में मैं मेहमान हुआ। तो वहां इतनी चीजें थीं कि उस घर में चलना-फिरना तक मुश्किल था। वे अमीर हैंलेकिन वे इस भांति रह रहे हैं कि गरीब के झोपड़ों में भी ज्यादा जगह होती है। जो मिलता है बाजार से वह खरीद कर चला आता है। जो भी चीज अखबार में एडवरटाइज होती हैवह उनके घर होनी ही चाहिए। घर भर गया है चीजों से। वहां रहना ही मुश्किल है। वहां चलना मुश्किल है। मैंने उनसे कहा कि यह अजायबघर है कि घरयहां तुम रहते हो कि यह कोई प्रदर्शनी हैइनमें से सभी चीजें करीब-करीब बेकार हैं। इनसे तुम छुटकारा पाओ। घर में थोड़ी जगह होनी चाहिएजगह का नाम घर है। यहां तो रहना ही मुश्किल है। थोड़े दिन में तुम को बाहर रहना पड़ेगाअगर यही सिलसिला रहा।
तुम घर में भी कबाड़ इकट्ठा करते हो। चीजें व्यर्थ हो जाती हैं तो भी रखे रहते हैं लोग कि शायद कभी काम पड़ें। खराब हो गयी चीजों को भी रखे रहते हैं कि शायद कभी काम पड़ें।
एस्कीमोज एक नियम मानते हैं। और उनका नियम अगर सारी दुनिया माने तो दुनिया में बड़ी शांति और बड़ा आनंद हो जाए। हर वर्षवर्ष के प्रथम दिन वे अपने घर की सब चीजें बांट देते हैं। फिर से असे शुरू करते हैं। तो एस्कीमो का छोटा सा घर जितना साफ-सुथरा होता हैदुनिया में किसी का नहीं होता। ऐसे भी उसके पास ज्यादा नहीं होतालेकिन पहली तारीख को हर वर्ष की सब बांट देना है। फिर सब चीजें शुरू करनी हैं। एक ताजगी! और व्यर्थ इकट्ठी ही नहीं करता वह,क्योंकि पता है कि एक तारीख को सब बांट देना है। तुम्हीं सोचो! अगर हर साल की एक तारीख को बांट देना होतो कितनी चीजें तुम ले आए हो जो कभी न लाए होते।
तुम व्यर्थ की चीजें ही घर में इकट्ठी नहीं करतेउसी तरह तुम व्यर्थ के विचार भी इकट्ठे करते हो। कोई आदमी तुम्हें सुना रहा है कुछ भीतुम सुनते जाते हो। अखबार में तुम कुछ भी पढ़ते जाते हो। तुम यह भी नहीं पूछते कि ये विचार इकट्ठे करने हैंतुमने कभी किसी आदमी से कहा कि भाई इन बातों की मुझे कोई भी जरूरत नहींकोई आदमी किसी की निंदा कर रहा हैकोई अफवाह सुना रहा हैतुमने कभी बीच में टोका कि इसकी मुझे कोई भी जरूरत नहींक्यों कचरा मेरी खोपड़ी में डाल रहे होडाल देना आसान हैनिकालना मुश्किल है। ध्यान करने वालों से पूछो! जब वे निकालने बैठते हैं तब वह निकलता नहीं। वह जड़ें जमा ली हैं उसने। और इकट्ठा करते वक्त होश नहीं रखा।
कृत्य भी तुम गलत करते होव्यर्थ का सामान इकट्ठा करते होव्यर्थ के विचार इकट्ठे कर लेते हो। तुम धीरे-धीरे एक कबाड़खाना हो जाते हो। कबाड़ी की दुकान में और तुम्हारे जीवन में कोई अंतर नहीं है। थोड़ा सजग होओ।
नानक कहते हैं कि तुम्हारे एक-एक कृत्य से तुम्हारा जीवन निर्मित हो रहा है। तो एक-एक कृत्य को बहुत विचार कर करो।
उसके दरबार में सच्चा ही पहुंच पाएगा। उसमें प्रामाणिक पंच शोभा पाते हैं। जो श्रेष्ठ हैंजो प्रामाणिक हैंकेवल वे ही वहां पहुंच पाते हैं। उसकी कृपा-दृष्टि से उन्हें प्रतीक की प्राप्ति होती है।
और जैसे-जैसे तुम्हारे जीवन में सच्चाई आएगीतुम्हें उसकी कृपा-दृष्टि के प्रतीक मिलने शुरू हो जाएंगे। तुम जगह-जगह पाओगे उसका इशारा। अभी तुम्हें उसका कोई इशारा दिखायी नहीं पड़ता। अभी तुम्हें उसकी कोई पहचान ही नहीं है। लेकिन तुम इधर सच्चे होने शुरू हुए और तुम पाओगे भीतर तुम्हारे अंतःकरण में उसके आदेश आने शुरू हो गए। इधर तुम सच्चे हुएतुम पाओगे रत्ती-रत्तीपत्ती-पत्ती पर तुम्हें उसकी पहचान आने लगी।
वह तुम्हें चलाना चाहता है। वह तुम्हें खबर देना चाहता है कि क्या करोक्या न करो। लेकिन उस खबर को सुनने योग्य तुम्हारे भीतर खालीपन नहीं है। तुम्हारा अपना शोरगुल इतना ज्यादा है कि उसकी आवाज सुनायी नहीं पड़ती। रोज तुम्हें प्रतीक मिलने लगेंगे उसकी कृपा-दृष्टि के।
अभी तुम्हें कोई प्रतीक नहीं मिलता। अभी तुम अपने ही सहारे जी रहे हो। और अपना सहारा भी कोई सहारा हैजैसे ही तुम सच्चे होने शुरू होओगेउसके सहारे जीना शुरू हो जाएगा। तब जीवन की एक नयी गतिऔर एक नया आयाम उपलब्ध होता है।
वहां ही कच्चे और पक्के का निर्णय होता है।
नानक कहते हैंवहां पहुंचने पर ही लोगों की परख होती है।
राती रुति थिति वार। पवन पानी अगनी पाताल।।
तिसु विचि धरती थापि रखी धरमसाल।
तिसु विचि जीअ जुगुति के रंग। तिनके नाम अनेक अनंत।।
करमी करमी होइ वीचारु। साचा आप साचा दरबारु।।
तिथै सोहनि पंच परवाणु। नदरी करमी पवै नीसाणु।।
कच पकाई ओथै पाइ। नानक गाइआ जापै जाइ।।
सिर्फ परमात्मा के सामने ही परख होती हैकौन कच्चा हैकौन पक्का है। क्या अर्थ है कच्चे और पक्के कापरमात्मा के सामने जो गल जाए वह कच्चा। उसके सामने जो बच जाए वह पक्का। तुम इसे कसौटी बना लो कि तुम जो भी करो यह सोच कर करना कि क्या इस कृत्य को मैं परमात्मा के सामने प्रकट कर सकूंगाया कि डरूंगाया कि छिपाना चाहूंगाया कि चाहूंगा कि परमात्मा इसे न देख ले?
अगर तुम डरोछिपाना चाहोमत करना। क्योंकि उसके सामने कुछ भी छिपाया न जा सकेगा। वह तुम्हें आर-पार देख लेगा। उस दर्पण से कुछ भी छिप नहीं सकता।
अगर तुम इसे संभाल लो अपने मन में कि जो भी करोजो भी सोचोजो भी बोलोएक कसौटी पर पहले कस लो। जैसे स्वर्णकारसुनार खरीदता है सोनातो पत्थर पास रखे रहता है। पहले कसता है। जब पत्थर कह देता हैठीक! तभी आगे बढ़ता है। तुम इसको पत्थर बना लो कसने का कि क्या इसे मैं परमात्मा के सामने प्रकट कर सकूंगा जो भी मैं कर रहा हूं?फिर निश्चिंत भाव से करो। अगर भीतर मन डरेकंपेऔर कहे कि यह तो कैसे जाहिर कर सकोगेतो मत करना।
तुम पक्के होने लगोगे। कुम्हार घड़े पकाता है। कच्चे वर्षा में गल जाएंगे। पक्के जल को भर लेंगे। तुम बाजार जाते हो,दो पैसे का घड़ा खरीदते हो तो ठोंक कर देखते हो कि कच्चा है या पक्का। क्योंकि पक्के की ध्वनि और है।
जैसे-जैसे तुम पकने लगोगेतुम्हारे जीवन की ध्वनि बदलने लगेगी। तुम पाओगे अंतर-नाद अपने भीतर। और उसके इशारे और उसके प्रतीक तुम्हें मिलने लगेंगे। उसके इशारे हैं--तुम ज्यादा शांत होने लगोगेतुम ज्यादा सुखी होने लगोगेतुम ज्यादा आनंदित अपने को पाओगे। एक गहन संतोष की छाया तुम्हें सब तरफ से घेरे रहेगी। और तुम पाओगे एक अनुग्रह का भावएक अहोभाव--अकारण! कुछ भी कारण न होगा और तुम पाओगे कि भीतर एक आनंद थिरक रहा है।
सहजोबाई ने कहा हैबिन घन परत फुहार! कोई बादल दिखायी नहीं पड़ता और वर्षा हो रही है। कोई कारण दिखायी नहीं पड़ताअकारण तुम प्रफुल्लित हो। अकारण तुम्हारा रोआं-रोआं मुस्कुरा रहा हैआनंदित हो रहा है। कुछ मिल नहीं गया खजाना,लेकिन फिर भी हृदय धन्यवाद दे रहा है। ये प्रतीक हैं।
जैसे-जैसे तुम पक्के होने लगोगेवैसे-वैसे तुममें वर्षा का जल भरने लगेगा। उसका आनंद तो बरस रहा है। वह फुहार तो हर वक्त पड़ रही है। लेकिन तुम कच्चे हो। उसी में तो गल जाते हो। तृप्ति तो हो नहीं पातीउलटे गल जाते होउलटे मिट जाते हो। परमात्मा का आशीर्वाद तुम्हारे कच्चे होने के कारण अभिशाप हो जाता है। तुम पक्के हो जाओगे तो जिन्हें तुमने कल तक अभिशाप जाना थातुम अचानक पाओगेवे सभी आशीर्वाद हैं।
वहां पहुंचने पर ही लोगों की परख है।
लेकिन उस समय तक प्रतीक्षा मत करो। क्योंकि तुम प्रतिक्षण बन रहे होनिर्मित हो रहे हो। आज शुरू करो तो ही तुम उसके सामने प्रकट हो सकोगे। आज से तैयारी करो। ऐसे भी बहुत समय गंवाया है। ऐसे भी बहुत देर हो चुकी है। एक क्षण भी मत गंवाओ अब। परमात्मा को ध्यान में रख कर जीयो। क्योंकि वह घर है। और संसार धर्मशाला है।

आज इतना ही।

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