गुरुवार, 3 अगस्त 2017

एक ओंकार सतनाम - प्रवचन-11

ऊचे उपरि ऊचा नाउ—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)
पउड़ी: 24

अंतु न सिफती कहणि न अंतु। अंतु न करणै देणि न अंतु।।
अंतु न वेखणि सुणणि न अंतु। अंतु न जापै किआ मनि मंतु।।
अंतु न जापै कीता आकारु। अंत न जापै पारावारु।।
अंत कारणि केते बिललाहि। ताके अंत न पाए जाहि।।
एहु अंत न जाणै कोइ। बहुता कहिऐ बहुता होइ।।
वडा साहिबु ऊचा थाउ। ऊचे उपरि ऊचा नाउ।।
एवडु ऊचा होवे कोइ। तिसु ऊचे कउ जाणै सोइ।।
जेवड आपि जाणै आपि आप। 'नानकनदरी करमी दाति।।


पउड़ी: 25

बहुता करम लिखिआ न जाइ। बडा दाता तिलु न तमाइ।।
केते मंगहि जोध अपार। केतिआ गणत नही वीचारु।।
केते खपि तुटहि वेकार
केते लै लै मुकरु पाहि। केते मूरख खाही खाहि।।
केतिआ दूख भूख सद मार। एहि भी दाति तेरी दातारि।।
बंदि खलासी भाणै होइ। होरु आखि न सकै कोइ।।
जे को खाइकु आखणि पाइ। ओहु जाणै जेतिआ मुहि खाइ।।
आपे जाणै आपे देइ। आखहि सि भि केई केइ।।
जिसनो बखसे सिफति सालाह। 'नानकपातिसाही पातिसाहु।।

सकी महिमा का कोई अंत नहीं है। जो भी हम कहें वह थोड़ा है। और जो भी हम कहें उससे हमारी असमर्थता पता चलती है।
रवींद्रनाथ मरणशय्या पर थे। एक पुराने मित्र ने उनसे कहा कि आप तो प्रसन्न भाव से विदा हो सकते हैं। क्योंकि जो करना था आपने कर लिया। खूब सम्मान पायागीत लिखेसारे जगत में ख्याति पायीमहाकवि की तरह लाखों लोगों ने भक्ति दीआप तो निश्चिंत मन से जा सकते हैं। कुछ अधूरा नहीं छोड़ा।

रवींद्रनाथ ने आंख खोली और उन्होंने कहा कि मत कहो ऐसी बात। क्योंकि मैं तो परमात्मा से यही प्रार्थना कर रहा था कि जो मैं गाना चाहता थावह तो अभी तक गा नहीं पाया। जो कहना चाहता थावह तो अभी तक कहा नहीं। और अभी तक तो केवल साज बिठाने में ही समय बीत गया। अभी तेरी महिमा का गान शुरू कहां हुआ था! और यह तो विदा का क्षण आ गया।
रवींद्रनाथ ने छः हजार गीत लिखे हैं। और रवींद्रनाथ के सारे गीत ही परमात्मा की महिमा के गीत हैं। फिर भी रवींद्रनाथ कहते हैं कि अभी साज ही बिठा पाया था। अभी संगीत शुरू कहां हुआ थाऔर यह जाने का वक्त आ गया।
यही नानक कहते हैं। यही सभी ऋषियों का अनुभव है कि जो भी हम कहेंवह साज का बिठाना ही सिद्ध होता है। उसका गीत गाया ही नहीं जा सकता।
कौन गाएगा उसका गीतहम इस छोटे से व्यक्तित्व में कैसे उस विराट को समाएंगेमुट्ठी में आकाश को बांधने की कोशिश कैसे पूरी होगीहमारे सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। और सब कर के ही हमें सिर्फ अपनी असमर्थता का पता चलता है।
पर वही पता चल जाए तो समझ का जन्म हुआ। यह खयाल में आ जाए कि मैं बहुत छोटा हूंतो ही उसके बड़े होने का खयाल पैदा होगा। नासमझों को लगता है कि हम काफी बड़े हैं। समझदारों को लगता है कि हम बहुत छोटे हैं। जैसे-जैसे समझ बढ़ती है वैसे-वैसे हम छोटे होते जाते हैंजैसे-जैसे हम छोटे होते हैंउसका विराट प्रकट होता है। एक ऐसी घड़ी भी आती है इस खोज मेंजब कि तुम बिलकुल ही खो जाते हो और वही शेष रह जाता है।
कहने वाला खो जाता हैकहेगा क्यासिर्फ वही रह जाता है। उसकी महिमाउसका अहर्निश नाद। देखने वाला खो जाता हैदृश्य ही रह जाता है। तुम तो मिट ही जाते होकौन उसकी खबर देगाकौन उसके संबंध में कुछ कहेगा?
इसलिए जो भी आदमी ने कहा हैवह सारी चर्चा असमर्थता की चर्चा है। असहाय अवस्था कीहेल्पलेसनेस की। जैसे कोई बहुत बड़ी घटना के करीब आ कर अवाक हो जाता हैवैसे ही परमात्मा के करीब आ कर आदमी अवाक हो जाता है। अवाक का अर्थ हैजहां 'वाक', वहां वाणी खो जाती है। जहां बोलना नहीं होता। हतप्रभ! वाणी रुद्धसांस तक ठहर जाती है। उसके जानने के क्षण में तुम बिलकुल ही रुक जाते हो। न विचार की गति होती हैन शब्द की गति होती हैन श्वास की गति होती है। हृदय भी नहीं धड़कता। क्योंकि उतनी धड़कन भी चूकना हो जाएगी। उतना कंपन भी बिछुड़ना हो जाएगा।
उस अवाक क्षण में नानक ने ये वचन कहे हैं। ये वचन किसी को समझाने को नहींअपनी व्यथा को प्रकट करने को कहे हैं।
नानक कहते हैं, 'अंत नहीं उसके गुणों का। न ही उसके कथन का अंत है।'
अंतु न सिफती कहणि न अंतु। अंतु न करणै देणि न अंतु।।
अंतु न वेखणि सुणणि न अंतु। अंतु न जापै किआ मनि मंतु।।
अंतु न जापै कीता आकारु। अंतु न जापै पारावारु।।
'उसके गुणों का अंत नहीं हैन उसके कथन का ही अंत है। उसके कामों का अंत नहींऔर उसके दानों का भी अंत नहीं। न उसके दर्शन का अंत हैऔर न उसके श्रवण का अंत है। उसके मन के रहस्यों का भी अंत नहीं जाना जा सकता। उसके किए हुए सृष्टि-प्रसार का कोई अंत नहीं। उसके ओर-छोर का अंत नहीं। उसका अंत जानने के लिए कितने बिल्लाते हैंतो भी उसका अंत नहीं पाया जा सकता। कोई भी उसका अंत नहीं जानता है।'
इन वचनों में तीन बातें खयाल में ले लेने जैसी हैं। एकजब तक तुम्हें लगता है कि तुमने परमात्मा को जाना तब तक तुम भ्रांति में हो। तब तक तुम किसी भूल में हो। क्योंकि जिसे तुम ने जान लियावह परमात्मा न होगा। जिसे तुमने नाप लियावह परमात्मा न होगा। जिसकी थाह तुम ने पा लीवह परमात्मा न होगा।
तुम किसी तालत्तलैया में डुबकी लगा रहे होओगेतुम सागर के करीब नहीं पहुंचे। तुम किसी छोटी-मोटी घाटी में उतर गए होओगे। तुम ने उसके अंतहीन खड्ड को नहीं जानाजहां गिरना शुरू होता है तो अंत नहीं आता। तुमने कोई छोटी-मोटी ऊंचाई पा ली होगी। गांव के पास का कोई टीला तुम चढ़ गए होगे। लेकिन तुमने उसका गौरीशंकर नहीं जाना जहां चढ़ने का कोई उपाय नहीं है। हिमालय के गौरीशंकर पर तो हम चढ़ जाते हैं--देर-अबेरकठिनाई सेमुसीबत से। उसके गौरीशंकर पर हम कभी न चढ़ पाएंगे। यह असंभव है।
यह असंभव क्यों हैइसे थोड़ा समझ लें।
यह असंभव इसलिए है कि हम उसके ही अंग हैं। और अंग अंगी को कैसे जानेगायह मेरा हाथ हैयह मुझे कैसे जानेगाऔर इस हाथ से मैं दुनिया की सब चीजें पकड़ लूंलेकिन इस हाथ से मैं अपने को कैसे पकड़ पाऊंगायह मेरी आंख है। यह आंख सब कुछ देख लेयह मुझे कैसे देख पाएगीऔर पूरा-पूरा कैसे देख पाएगीयह आंख मेरा ही हिस्सा है।
अंश कभी अंशी को नहीं जान सकता। झलकें मिलेंगीलेकिन पूर्णता कभी न होगी। हम इस विराट के अंश हैंइसलिए कठिनाई है। अगर हम अलग होते परमात्मा सेतो हम उसे जान लेते। हम अगर भिन्न होतेतो हम उसे पकड़ लेते। हम अगर पृथक होतेतो हम उसके चारों ओर चक्कर लगा कर परिक्रमा कर लेते। लेकिन हम उसके ही हिस्से हैं। उसकी ही धड़कन हैं हम। उसकी ही श्वास-प्रश्वास हैं। कैसे उसका चक्कर लगाएंकैसे उसकी परिक्रमा करेंकैसे उसे पकड़ें?
मनुष्य एक कण है उस विराट में। एक बूंद है उस सागर में। तो यह छोटी सी बूंद कैसे सागर को पकड़ लेयह छोटी सी बूंद कैसे पूरे सागर को जान ले?
यह बड़े मजे की बात है। यह बूंद सागर में है। और यह बूंद सागर ही है। तो एक अर्थ में तो सागर को जानती है। बड़े गहन अर्थ में सागर को जानती है। क्योंकि सागर इससे भिन्न नहीं है। लेकिन फिर भी एक अर्थ में सागर को नहीं जान सकती,क्योंकि सागर अभिन्न है।
यह धार्मिक जीवन का सब से बड़ा पैराडाक्स हैसब से बड़ा विरोधाभास है। परमात्मा को हम जानते भी हैं एक अर्थ में,क्योंकि हम कैसे बिना जाने रहेंगेवह हममें धड़कता हैहम उसमें धड़कते हैं। हम उससे दूर नहीं हैं। इंच भर का फासला नहीं है। इसलिए हम उसे जानते भी हैं एक अर्थ मेंपहचानते भी भलीभांति हैं। और फिर भी बिलकुल नहीं जानते। क्योंकि हम तो अंश हैं। अंश पूर्ण को कैसे जान सकेगाहम उसमें डूबते हैंतैरते हैं। हम उसमें रह कर कभी उसे विस्मरण भी करते हैंकभी उसका स्मरण भी करते हैं। कभी हम पास लगते हैंकभी दूर लगते हैं। और कभी-कभी किन्हीं स्पष्टता के क्षणों में ऐसा लगता हैजान लिया। हृदय आपूर हो जाता हैपहचान लिया। रिकग्निशन हो गया। आ गयी प्रज्ञाबोध हुआ। फिर बोध खो जाता है। फिर गहन अंधकार हो जाता है। फिर हम डगमगाने लगते हैं। लेकिन जानने और न जानने के मध्य का यह जो क्षण हैयही धार्मिक व्यक्ति की स्थिति है।
बुद्ध से कोई पूछता है परमात्मा के संबंध मेंवे चुप रह जाते हैं। क्या कहें उसके संबंध मेंविरोधाभास कहे नहीं जा सकते। अगर बुद्ध कहेंमैं जानता हूंतो भूल हो गयी। क्योंकि कौन कह सकता है कि जानते हैंऔर बुद्ध अगर कहें कि नहीं जानतातो गलत बात हैक्योंकि जानते हैं।
एक दिन सुबह-सुबह एक पंडित ने बुद्ध को पूछाबुद्ध चुप ही रहे। वह चला गया तो आनंद ने बुद्ध को कहा कि आप कुछ तो बोलते! वह बहुत बड़ा पंडित है। वह बड़ा जानकार है और योग्य अधिकारी आदमी था। आपको उसे कुछ कहना था।
बुद्ध ने कहाक्योंकि वह अधिकारी था इसलिए बोलना और भी मुश्किल हो गया। यदि मैं कहूं हैतो गलत है। क्योंकि जब तक पूरा न जान लिया जाएकिस तरह कहो कि हैकिस तरह कहो कि मैंने जान लियाकौन कहे कि मैंने जान लिया?सब दावे अहंकार के हैं। और अहंकार तो उसे कभी भी नहीं जान सकता। और अगर मैं कहूं कि नहीं हैया कहूं कि मैंने नहीं जानातो भी गलत हैक्योंकि मैं जानता हूं। और वह आदमी योग्य थासमझदार थाइसलिए चुप रह जाना पड़ा। और वह आदमी मेरी चुप्पी का अर्थ समझाक्योंकि वह आदमी झुक कर प्रणाम करके गया।
तभी आनंद को खयाल आया कि वह आदमी बहुत अहोभाव से झुक कर प्रणाम कर के गया है। तो आनंद ने पूछा कि हैरानी की बात हैयह मेरे खयाल में न आया। क्या वह समझ गया?
तो बुद्ध ने कहा कि घोड़े तीन तरह के होते हैं। एकतुम उन्हें मारो तभी वे इंच-इंच कर के सरकेंगे। दूसरेउन्हें मारने की उतनी जरूरत नहींधमकाना काफी है। और तीसरेउन्हें धमकाने की भी जरूरत नहींकोड़ा बताने की भी जरूरत नहींकोड़ेकी छाया काफी है--शैडो आफ दि व्हिप! यह तीसरी तरह का घोड़ा था। इसे न मारने की जरूरत थीन धमकाने की जरूरत थी,इसे सिर्फ छाया बता दी कोड़े की और वह समझ गया और यात्रा पर निकल गया।
शब्द तो कोड़ा हैमौन छाया है। शब्द की जरूरत पड़ती हैक्योंकि वह घोड़ा पास नहींजो कोड़े की छाया मात्र से यात्रा पर निकल जाए। बुद्ध ने कहावह आदमी समझ गया।
यही तो स्थिति है कि जो जान लेता हैवह कह नहीं सकता कि मैं जानता हूंऔर यह भी नहीं कह सकता कि मैं नहीं जानता हूं। दोनों के मध्य में वैसी घटना घटती है।
नानक कहते हैंअंत नहीं उसका।
जितना कहो थोड़ा है। कहते चले जाओ और तुम पाते हो कि वह तो सदा शेष है। तुमने कुछ भी कहा नहीं। कथन हमेशा अधूरा है। सभी शास्त्र अधूरे हैं। कोई पूरा शास्त्र पृथ्वी पर नहीं है। हो नहीं सकता। क्योंकि पूरे शास्त्र का अर्थ ही यह होगा,जिसने परमात्मा को पूरा कह दिया। सभी शास्त्र अधूरे हैं। और सभी शास्त्र उन घोड़ों के लिए हैं जो कोड़ों की छाया नहीं समझ सकते।
'न अंत है उसके गुणों कान उसके कथन का अंत हैन उसके कामों कान उसके दानों का।'
जैसे-जैसे व्यक्ति के जीवन में धर्म की गहराई बढ़ती हैवैसे-वैसे उसके काम तो दिखायी पड़ते ही हैंउसके दान दिखायी पड़ने शुरू होते हैं।
यह दूसरी बात है। काम तो चारों तरफ फैला हुआ है। लेकिन अधिक लोगों को तो काम भी दिखायी नहीं पड़ता। वे कहते हैंकहां है परमात्मावे पूछते हैंकौन है स्रष्टासृष्टि को देख कर भी उन्हें इशारा नहीं मिलता। यह चारों तरफ इतना विस्तार हैयह उन्हें दिखायी ही नहीं पड़ता। वे पूछते हैंकिसने बनायाकौन है बनाने वालाहै भी कोई बनाने वालाइतने विराट कार्य-जाल के पीछे उन्हें कोई हाथ नहीं दिखायी पड़ता। और मजे की बात हैयही वे लोग हैंजो दूसरी दिशाओं में अंधों की तरह मान लेते हैं।
आज तक किसी वैज्ञानिक ने इलेक्ट्रान नहीं देखा। विद्युत का आखिरी कणजिसको विज्ञान कहता हैजिसके आधार से सारा जगत बना है। इलेक्ट्रान के ही संगठन से सारा जगत निर्मित है। लेकिन आज तक किसी वैज्ञानिक ने इलेक्ट्रान देखा नहीं। और न आशा है कभी देख पाने की। फिर वैज्ञानिक कैसे यह मान लेता है कि इलेक्ट्रान हैवह कहता हैउसके परिणाम दिखायी पड़ते हैं।
कारण सूक्ष्म हैंपरिणाम स्थूल हैं। हाथ नहीं दिखायी पड़ते परमात्मा केलेकिन कृत्य दिखायी पड़ता है। इलेक्ट्रान को तो मान लेते हैं हमक्योंकि परिणाम दिखायी पड़ते हैं। परमात्मा को इनकार करते हैं। परिणाम चारों तरफ मौजूद हैं।
फूल खिलता हैयह परिणाम है। लेकिन कोई हाथ छिपे उसे खिलाते हैंअन्यथा कैसे फूल खिलेगाबीज टूटता हैयह परिणाम है। लेकिन कोई बीज को तोड़ता हैअंकुरित करता है। और जहां पत्थर जैसा लग रहा था बीजवहां सुकोमल फूलखिलने शुरू हो जाते हैं।
सब तरफ उसके हस्ताक्षर हैंलेकिन हाथ नहीं दिखायी पड़ते। हाथ दिखायी पड़ेंगे भी नहीं। क्योंकि जीवन सूक्ष्म और स्थूल का संतुलन है। कारण सदा सूक्ष्म होता हैकार्य सदा स्थूल होता है। कारण दिखायी नहीं पड़ते। परमात्मा महाकारण है। लेकिन कार्य तो चारों तरफ दिखायी पड़ रहे हैं।
तो तीन तरह के लोग हैं जगत में। तीन तरह के घोड़ेजिनको बुद्ध ने कहा। एकजिनको उसके काम भी दिखायी नहीं पड़ते। बिलकुल अंधे! वे पूछते हैंकैसा परमात्माकैसा स्रष्टाक्या सबूत हैइतनी बड़ी सृष्टि सबूत नहीं है! वे और कोई सबूत चाहते हैं। इतना बड़ा प्रमाण प्रमाण नहीं हैवे और कोई प्रमाण चाहते हैं! और जिनको इतना बड़ा प्रमाण नहीं दिखता,उन्हें कोई और प्रमाण समझ में आ सकेगाइससे बड़ा और क्या प्रमाण हो सकता है कि जीवन एक क्रमबद्ध गति सेसंतुलित गति से चल रहा है। विराट-लीला में कहीं भी कोई विच्छेद नहीं है। धारा अनवरत है। अहर्निश एक संगीत बज रहा है। जैसा होना चाहिए वैसा ही हो रहा है। यह जगत कोई केयास नहींकासमास है। यह कोई ऐसा ही संयोगवशात घट रहा हैऐसा नहीं है। इसके पीछे सुनिश्चित नियम काम कर रहा है।
उसी नियम को हम ने धम्म कहा हैधर्म कहा है। लाओत्से ने ताओ कहा है। नानक ने हुक्म कहा है--उस नियम का नाम है। जब नानक कहते हैंसब उसके हुक्म से हो रहा हैतो तुम ऐसा मत समझना कि वह कहीं खड़ा है हेड कांस्टिबल की तरह और कह रहा हैकरो! हुक्म का मतलब है कि जगत एक आर्डर है। एक व्यवस्था है। एक अराजकता नहीं है। यहां कुछ भी नहीं हो रहा है। होने के पीछे सुनियोजित हाथ है। सुनियोजित व्यवस्था है। होने के पीछे प्रयोजन है। जो हो रहा है वह एक लक्ष्य की तरफएक अंत की तरफ विकासमान है।
अगर तुम्हें सृष्टि नहीं दिखायी पड़ती तो तुम बिलकुल अंधे हो। बहुत लोग हैं जिनको सृष्टि के पीछे कोई सृजन का हाथ नहीं दिखायी पड़ता। एक छोटी सी मूर्ति रखी होतो तुम तत्क्षण पूछते होकिसने बनायीएक छोटा सा चित्र टंगा हो दीवाल परतो तुम तत्क्षण पूछते होकौन है चित्रकारतुम कभी भी नहीं सोचते कि अनायाससंयोगवशात यह मूर्ति बन गयी होगी। अनायाससंयोगवशातप्राकृतिक कारणों से यह चित्र टंग गया होगा।
लेकिन इतना विराट चित्र टंगा है चारों तरफपत्ती-पत्ती पर उसकी कला हैऔर तुम्हें परमात्मा दिखायी नहीं पड़ता! तुमने जैसे पक्का ही कर रखा है उसकी तरफ पीठ रखने का। जैसे तुम न देखने की जिद कर रहे हो। जैसे तुम देखना ही नहीं चाहते। जैसे कि देखने में तुम्हें खतरा मालूम पड़ रहा है। जैसे कि देखने से तुम डरे हुए हो।
निश्चित ही डर है। क्योंकि जैसे ही तुम्हें उसका हाथ दिखायी पड़ेगातुम जैसे हो वैसे ही न रह सकोगे। जिसको भी परमात्मा के कृत्य की भनक पड़ जाएगीउसे पूरी जिंदगी बदलनी पड़ेगी। क्योंकि अगर उसका हाथ सब तरफ हैतो तुम जैसा कर रहे हो अभी तकवैसा ही न कर पाओगे। तुम्हारा सारा आचरण गलत हो जाएगा। अभी तुम ऐसे चल रहे हो जैसे कोई परमात्मा नहीं है। करो दर्ुव्यवहारकरो पापकरो अनाचरण। अभी जो भी करना है करोक्योंकि कोई परमात्मा नहीं है। अभी तुम्हें जैसे पूरी छूट है।
जैसे ही तुम्हें उसका हाथ दिखायी पड़ेगातुम्हारी छूट समाप्त हो जाएगी। तब तुम्हें सोच कर करना पड़ेगा। तब तुम्हें विचार कर करना पड़ेगा। तब तुम्हें ज्यादा ध्यान और सुरति रखनी पड़ेगी। क्योंकि वह देख रहा है। क्योंकि वह मौजूद है। क्योंकि सब जगह वह छिपा है। और तुम किसी के साथ भी कुछ करोतुम उसी के साथ कर रहे हो। जेब काटो किसी कीउसी की ही कटेगी। चोरी करो किसी कीउसी की ही होगी। हत्या करो किसी कीतुम उसे ही मारोगे।
इसलिए आदमी का एक बड़ा वर्ग उसे देखना ही नहीं चाहता। उसको देखने में झंझट है। उसकी मौजूदगी--तुम वही न रह सकोगेजो तुम हो। तुम्हें आमूल क्रांति से गुजरना पड़ेगा। तुम्हें जड़-मूल बदल जाना पड़ेगा। और यह बदलाहट इतनी बड़ी है कि इस झंझट से बेहतर यही है कि तुम उसे इनकार करते चले जाओ।
नीत्से ने सौ साल पहले कहा है कि गाड इज डेड एंड नाउ मैन इज टोटली फ्री--ईश्वर मर गया है और आदमी अब परिपूर्ण स्वतंत्र है। वही परिपूर्ण स्वतंत्रता चाहने के लिए तुम ईश्वर को इनकार करते हो। तब तुम्हें छूट है। तब तुम कुछ भी चाहोकरो। तब कोई नहीं है जिसके हाथ में निर्णय है। तब तुम स्वच्छंद हो। जो स्वच्छंद रहना चाहता हैवह परमात्मा को न देखने की जिद करता रहेगा। तुम उसे कितना ही दिखाओवह इनकार करता रहेगा।
और इनकार किया जा सकता है। क्योंकि स्थूल कृत्य दिखायी पड़ता हैसूक्ष्म कर्ता तो दिखायी नहीं पड़ता। तो लोग कहते हैंसृष्टि अपने आप चल रही है। सब अपने आप हो रहा है। लेकिन यही तो परमात्मा की परिभाषा है कि जो अपने आप चल रहा है और अपने आप हो रहा है। जो स्वयंभू है।
दूसरा वर्ग हैजो परमात्मा के काम तो देख लेता है और उसके छिपे हाथ को भी स्वीकार कर लेता हैलेकिन वह स्वीकृति बौद्धिक है। वह धमकी में आ गया है। वह डरा हुआ है। वह भयभीत है। तुम ऐसे ही आदमी को मंदिर मेंगुरुद्वारे मेंमस्जिद में प्रार्थना करते पाओगे। नंबर दो का आदमी। वह भय के कारण वहां गया है। वह धमकी में आ गया है। जिंदगी का कोड़ा उस पर जोर से पड़ गया है। वह डरा है। वह प्रार्थना कर रहा है। वह मांग रहा है सुरक्षाआश्वासनधनप्रतिष्ठा,पद। वह कुछ मांग ले कर गया है।
भय हमेशा भिखारी है। और भय हमेशा मांगता हैकुछ मिल जाएकुछ मिल जाए। वह कामों की थोड़ी सी भनक उसके कान में पड़ी है। और उसे थोड़ा सा एहसास हुआ है भय के कारणकि परमात्मा हैतो वह डरा हुआ है। लेकिन उसे तीसरी बात का कोई पता नहीं चल रहा है--परमात्मा के दानों का। इसलिए तो वह मांग रहा है।
तीसरा आदमी है--जिसको नानक भक्त कहेंगे--उसे कृत्य दिखायी पड़ रहे हैंचारों तरफ सृष्टि उसका हाथ बता रही है,और कृत्य ही नहीं दिखायी पड़ रहेउसे परमात्मा का दानउसका प्रसाद भी दिखायी पड़ रहा है। प्रसाद को देखना सूक्ष्म बात है। वह कोड़े की छाया को देखना है। उसे दिखायी पड़ रहा है कि अहर्निश उसका दान मिल रहा है। मांगने को और बचा क्या है?मांगना क्या है! सिर्फ उसे धन्यवाद देना है।
इसलिए परम भक्त मंदिर धन्यवाद देने जाता हैमांगने नहीं। उसकी कोई मांग ही नहीं है। अगर परमात्मा सामने खड़ा हो कर भी उसको कहे कि तू कुछ मांग लेतो भी वह मांगेगा नहीं। क्योंकि वह कहेगासब दिया ही हुआ है। सब पहले से ही जरूरत से ज्यादा दिया हुआ है। मेरी योग्यता से ज्यादा तुमने मुझे पहले ही दिया हुआ है। किस मुंह से मांगूं! और मांगने में तो शिकायत होगी कि तुमने कुछ कम दिया है।
तुम्हें जीवन मिला हैयह क्या कम हैलेकिन जीवन की तुम कोई कीमत नहीं करते।
मैंने सुना है कि एक कंजूस--महाकंजूस--की मौत करीब आयी। उसने करोड़ों रुपए इकट्ठे कर रखे थे। और वह सोच रहा था कि आज नहीं कल जीवन को भोगूंगा। लेकिन इकट्ठा करने में सारा समय चला गयाजैसा कि सदा ही होता है। जब मौत ने दस्तक दीतब वह घबड़ाया कि समय तो चूक गया। धन भी इकट्ठा हो गयालेकिन भोग तो मैं पाया नहीं। सोच ही रहा था कि भोगना है। यह तो वह जिंदगी भर से सोच रहा था और स्थगित कर रहा था कि जब सब हो जाएगा तब भोग लूंगा।
उसने मौत से कहा कि मैं एक करोड़ रुपए दे देता हूंसिर्फ चौबीस घंटे मुझे मिल जाएं। क्योंकि मैं भोग तो पाया ही नहीं। मौत ने कहा कि यह सौदा नहीं हो सकेगा। उसने कहा कि मैं पांच करोड़ दे देता हूंमैं दस करोड़ दे देता हूं--एक चौबीस घंटे! आखिर वह इस बात पर राजी हो गया कि मैं सब दे देता हूं--सिर्फ चौबीस घंटे!
यह सब उसने इकट्ठा किया पूरा जीवन गंवा कर। अब वह सब देने को राजी है चौबीस घंटे के लिए। क्योंकि न तो उसने कभी खुले मन से सांस लीन कभी फूलों के पास बैठान उगते सूरज को देखान चांदत्तारों से बात कीन खुले आकाश के नीचे हरी दूब पर कभी क्षण भर लेटा। जीवन को देखने का मौका न मिला। धन इकट्ठा करता रहा और सोचता रहाआज नहीं कलजब सब मेरे पास होगातब भोग लूंगा। सब देने को राजी है!
लेकिन मौत ने कहा कि नहीं। कोई उपाय नहीं। तुम सब भी दोतो भी चौबीस घंटे मैं नहीं दे सकती हूं। कोई उपाय नहींसमय गया। तुम उठोतैयार हो जाओ।
तो उस आदमी ने कहाएक क्षण! वह मेरे लिए नहींमैं लिख दूंमेरे पीछे आने वाले लोगों के लिए। मैंने जिंदगी गंवायीइस आशा में कि कभी भोगूंगाऔर जो मैंने कमाया उससे मैं मृत्यु से एक क्षण भी लेने में समर्थ न हो सका।
उस आदमी ने यह एक कागज पर लिख दिया और खबर दी कि मेरी कब्र पर इसे लिख देना।
सभी कब्रों पर यही लिखा हुआ है। तुम्हारे पास पढ़ने की आंखें हों तो पढ़ लेना। और तुम्हारी कब्र पर भी यही लिखा जाएगाअगर चेते नहीं। अगर तुम देखोतो तुम्हें जो मिला है वह अपरंपार है।
जीवन का कोई मूल्य हैएक क्षण के जीवन के लिए तुम कुछ भी देने को राजी हो जाओगे। लेकिन वर्षों के जीवन के लिए तुमने परमात्मा को धन्यवाद भी नहीं दिया। मरुस्थल में मर रहे होगे प्यासेतो एक घूंट पानी के लिए तुम कुछ भी देने को राजी हो जाओगे। लेकिन इतनी सरिताएं बह रही हैंवर्षा में इतने बादल तुम्हारे घर पर घुमड़ते हैंतुमने एक बार उन्हें धन्यवाद नहीं दिया। अगर सूरज ठंडा हो जाएगा तो हम सब यहीं के यहीं मुर्दा हो जाएंगेइसी वक्त! लेकिन हमने कभी उठ कर सुबह सूरज को धन्यवाद न दिया!
असल में आदमी का एक बड़ा अदभुत तर्क है। जो उसके पास होता है वह उसे दिखायी नहीं पड़ता। जो नहीं होता है वह दिखायी पड़ता है। जब तुम्हारा दांत एक टूट जाएगातब तुम्हारी जीभ बार-बार उसी जगह जाएगी। जब तक दांत था तब तक कभी न गयी। खाली जगह को टटोलेगी। तुम चेष्टा भी करोगे कि जीभ को वहां न ले जाएंक्या सार हैलेकिन जीभ वहीं-वहीं जाएगी।
आदमी का मन खाली जगह को टटोलता है। भरी जगह के प्रति अंधा हैखाली के प्रति आंखें हैं। जो तुम्हारे पास है,तुमने कभी उसका हिसाब लगाया हैऔर जब तक तुम्हें वह हिसाब साफ न हो जाएतुम परमात्मा के दानों का हिसाब न लगा पाओगे। वे अनंत हैं।
लेकिन कम से कम जो तुम्हें मिला हैवहां से तो तुम सोचो। जो तुमने पाया हैउसे तुम देखो। और चारों तरफ उसके दानों की वर्षा हो रही है। जैसे हर कृत्य के पीछे उसका हाथ हैवैसे ही हर कृत्य के पीछे उसका दान है। यह पूरा अस्तित्व तुम्हारे लिए खिल रहा है। यह पूरा अस्तित्व उसकी भेंट है। और जब कोई इसको देख पाता हैतब एक नयी तरह की भक्ति का जन्म होता है।
एक है नास्तिकवह अकड़ा हुआ है अहंकार से। एक है आस्तिकवह कंप रहा है भय से। वे दोनों ही धार्मिक नहीं हैं। धार्मिक है तीसरा व्यक्तिजो नाच रहा है अहोभाव से। जो आनंदमग्न है कि जो मिला है वह अपरंपार है।
नानक कहते हैं, 'न उसके कृत्यों का कोई अंत हैन उसके दानों का कोई अंत है। और उसके मन के रहस्यों का भी अंत जाना नहीं जा सकता। उसके किए हुए सृष्टि-प्रसार का कोई अंत नहीं। उसके ओर-छोर का अंत नहीं। उसका अंत जानने के लिए कितने बिल्लाते हैंतो भी उसका अंत नहीं पाया जाता। कोई भी उसका अंत नहीं जानता। जितना अधिक उसको कहिएउतना ही अधिक वह होता जाता है। वह साहब महान है और उसका स्थान ऊंचा हैउससे भी ऊंचा उसका नाम है।'
यह जरा कठिन लगेगा समझने में।
'उससे भी ऊंचा उसका नाम है।'
नाम कैसे उससे ऊंचा होगाहमारे लिएयात्रियों के लिए उसका नाम उससे ऊंचा है। क्योंकि उसके नाम के द्वारा ही हम उस तक पहुंचेंगे। नाम छूट जाए तो उस तक पहुंचने का रास्ता टूट गयासेतु गिर गया। तो हमारे लिए तो उसका नाम ही उससे महान है। यात्रा-पथ मंजिल से महत्वपूर्ण है। क्योंकि यात्रा-पथ के बिना मंजिल तक पहुंचना असंभव है।
इसलिए नानक कहते हैं कि उसका एक नाम जो जान लेता है उसे कुंजी मिल गयी। कुंजी महल से भी बड़ी है। कुंजी महल में छिपी संपदा से ज्यादा मूल्यवान है। ऐसे तो दिखायी पड़ती है लोहे का टुकड़ा। लेकिन वही लोहे का टुकड़ा अनंत खजानेको खोलेगा।
उसका नामजिसको नानक ओंकार कहते हैंवही कुंजी है। उस कुंजी से उसका द्वार खुलेगा। और अगर ओंकार की सुरति तुम्हारे भीतर बैठने लगीतो वह कुंजी तुम अपने भीतर ढाल लोगे। वह कुंजी कुछ ऐसी नहीं है कि कोई तुम्हें दे दे। वह तुम्हें ढालनी पड़ेगी। तुम्हें ही वह कुंजी बन जाना पड़ेगा। तुम ही धीरे-धीरे ओंकार की ध्वनि में गूंजते-गूंजते कुंजी बन जाओगे। तुम में ही वह क्षमता प्रकट हो जाएगी कि उसके द्वार को तुम खोल लो।
मनुष्य की दो अवस्थाएं हैं। एक अवस्था है विचार की। और एक अवस्था है निर्विचार की। विचार की अवस्था में तुम हो। जहां मन में तूफान चलते ही रहते हैं। मन का आकाश सदा बदलियों से भरा रहता है। ऊहापोहअनंत विचार! एक भीड़ मन में लगी रहती है। एक बाजार भरा हुआ है। यह विक्षिप्त जैसी दशा है। एक दूसरी अवस्था है निर्विचार की। जहां बाजार खाली हो गयादुकानें बंद हो गयींविचार जा चुके। हाट उजड़ गयी। सन्नाटा हो गया। चुप्पी हो गयी। जब तक तुम विचार से भरे हो,तब तक तुम संसार से जुड़े रहोगे। जैसे ही तुम निर्विचार हुए कि तुम परमात्मा से जुड़ गए। तुम खाली हुए कि द्वार खुला।
विचार से निर्विचार तक जाने की जो कुंजी हैवह उसका नाम है। ओंकार की धुन तुम्हारे भीतर समा जाए। पहले तो ओंकार का जप। सुबह उठ आएया रात कभी एकांत अंधेरे में बैठ गए अपने कमरे मेंऔर जोर से ओंकार का उच्चार किया कि तुम्हारे चारों तरफ ओंकार की धुन गूंजने लगे। और ओंकार का बड़ा मधुर संगीत है। क्योंकि वह अनंत का संगीत है। ओंकार कोई मनुष्य निर्मित ध्वनि नहीं है। वह अस्तित्व में गूंजती हुई लयबद्धता है। तुम जैसे ही ओंकार की ध्वनि जोर से करोगे,तुम्हारे चारों तरफ तुम्हारे रोएं-रोएं पर उसकी छाप अंकित होने लगेगी। यह जाप की स्थिति है--जप।
फिर धीरे-धीरे ओंठ बंद कर लेना और जिस तरह बाहर गुंजा रहे थे ओंकार कोवैसे ही भीतर गुंजाना। तब ओंठ बंद रहेंगे। जीभ शांत रहेगी। कंठ चुप रहेगा। सिर्फ मन में ही गूंज होगी। यह जाप और अजाप के बीच की मध्य कड़ी है।
यह गूंज भीतर बढ़ती जाएबढ़ती जाएबढ़ती जाएतो धीरे-धीरे तुम इस गूंज को करना भी और सुनना भी। दो काम करना। भीतर ओंकार की गूंज भी करना और सुनना भी कि यह गूंज हो रही है। फिर धीरे-धीरे करने को छोड़ते जाना और सुनने को बढ़ाते जाना। और एक ऐसी घड़ी आती है जब करना तुम बंद कर देते हो और गूंज अपने से होती है। तुम सिर्फ सुनते हो। तब अजपा-जाप शुरू हो गया।
और जब गूंज अपने से होती हैतब असली ओंकार प्रकट हुआ। अब यह तुम नहीं कर रहे हो। अब यह तुम्हारे होने में से ही प्रकट हो रही है। अब यह तुम्हारे जीवन के भीतर बहते हुए झरने का नाद है। और जिस दिन तुम इसे सुन लोगेफिर तुम उसे चौबीस घंटे सुन सकते हो। क्योंकि यह तो हो ही रहा है। इसे करने की जरूरत नहीं है। तुम जब भी जरा भीतर आंख बंद करोगेवहां यह नाद सुनायी पड़ने लगेगा।
जब भी चिंता पकड़ेतनाव पकड़ेबेचैनी होक्रोध आएतुम आंख बंद कर के जरा ही इस नाद को सुन लेना। एक नाद की भनक--क्रोध तिरोहित हो जाएगा। नाद का जरा सा बोध--घृणा समाप्त हो जाएगी। नाद का जरा सा स्मरण और तुम पाओगे चित्तजो तुम्हें बेचैन किए थातत्क्षण हट गया। यह ऐसे ही हो जाता हैजैसे अंधेरा घर में भरा हो और तुम टार्च का बटन दबाओप्रकाश हो जाता हैअंधेरा खो जाता है। ऐसे ही भीतर के नाद को तुम सुनोक्षणभर को भी सुन लोतो बाहर का जो भी अंधकार थाउसी वक्त टूट जाता है।
इसलिए तो नानक इतना जोर देते हैंएक ओंकार सतनाम। सारी साधना उनकी इस वास्तविक ओंकार के नाद को पा लेने की है। इसी को उन्होंने सबद कहा है। इसी को वे नाम कहते हैं। और नानक कहते हैंतुझ से भी बड़ा तेरा नाम है। तू अंतहीन है। तू विराट हैतुझसे भी बड़ा तेरा नाम है। क्योंकि हमारे लिए तो नाम का सहारा है। नाम से ही हम तुझ से जुड़ेंगे। तू है भीहमें पता नहीं। नाम से ही हमें तेरी खबर आएगी। नाम से ही हम धीरे-धीरे तेरी तरफ खिंचेंगे। और एक ऐसी घड़ी आती है कि जब नाद अपने आप गूंजता हैतो तुम खींच लिए जाते हो परमात्मा की तरफ।
वैज्ञानिक कहते हैंएक ऊर्जा है जिसका नाम ग्रेवीटेशनगुरुत्वाकर्षण है। हम जमीन पर इसीलिए हैं कि जमीन हमको खींचे हुए है। अगर जमीन हमें छोड़ देहम आकाश में खो जाएं। जमीन हमें अपनी तरफ खींचे है। इसलिए तो पत्थर को हम फेंकते हैंवह वापस जमीन पर गिर जाता है। जमीन उसे खींच रही है। हर चीज को जमीन खींचे हुए है। इसका नाम ग्रेवीटेशनहै।
इस युग में एक बहुत महत्वपूर्ण महिला हुईसिमन वैल। उसने कहा कि जिस तरह ग्रेवीटेशन हैउसी तरह एक और शक्ति हैउसका नाम है ग्रेस। उसने एक बड़ी महत्वपूर्ण किताब लिखी हैग्रेस एंड ग्रेवीटेशन। न तो ग्रेवीटेशन दिखायी पड़ता है,जमीन का गुरुत्वाकर्षण दिखायी तो पड़ता नहींलेकिन फिर भी खींचे हुए है।
अभी वैज्ञानिक चिंतित हो रहे हैं। क्योंकि कल ही अखबारों में खबर थी कि गुरुत्वाकर्षण कम हो रहा है। बहुत छोटी मात्रा में कम हो रहा हैलेकिन कम हो रहा है। और अगर कम होता गया तो जमीन बिखर जाएगी। क्योंकि जमीन उसी शक्ति की वजह से चीजों को पकड़े हुए है। वृक्ष जमीन में गड़े हैंआदमी जमीन पर चल रहा हैपक्षी आकाश में उड़ रहे हैंजानवर चल रहे हैंवह सब गुरुत्वाकर्षण से। जमीन का गुरुत्वाकर्षण कम हो जाएचुंबक उसकी कम हो जाएसब चीजें बिखर जाएंगी,अनंत में खो जाएंगी। पर गुरुत्वाकर्षण दिखायी नहीं पड़ताजो जमीन से बांधे हुए है।
सिमन वैल ने बड़ी अच्छी बात कही है कि ठीक ऐसे ही ग्रेस भी दिखायी नहीं पड़ती। ग्रेसजिसको नानक प्रसाद कहते हैंउसकी अनुकंपा कहते हैं। जमीन हमें बांधे हुए है नीचे की तरफवह हमें बांधे हुए है ऊपर की तरफ। जैसे ही जैसे तुम्हारे भीतर ओंकार का नाद बढ़ता हैवैसे ही वैसे जमीन की कशिश कम हो जाती है और उसकी कशिश बढ़ती जाती है। एक ऐसी घड़ी आती है कि तुम बिलकुल निर्भार हो जाते हो। इसलिए तो योगियों को बहुत बार ऐसा अनुभव होता है।
यहां मेरे पास जो लोग गहरा ध्यान कर रहे हैंउनमें से अनेकों को अनुभव हुआ है कि अचानक ध्यान करते-करतेउन्हें लगा कि वे जमीन से उठ गए। बाहर से दिखायी भी नहीं पड़ता किसी को कि वे उठ गए हैं। वे भी अपनी आंख खोल कर देखते हैंतो उठे नहीं हैंअपनी जगह पर बैठे हैं। लेकिन आंख बंद करते हैं तो भीतर से लगता है कि जमीन से उठे हैं।
वह भ्रांति नहीं है। जैसे ही चित्त निर्भार हो जाता हैउसकी ध्वनि गूंजती हैवैसे ही वेटलेसनेस का अनुभव होता है। तुम्हारा यह शरीर तो जमीन पर ही बना रहता हैलेकिन तुम्हारा भीतर का शरीर जमीन से हट जाता हैऊपर उठ जाता है। और अगर यह यात्रा जारी रहे तो एक दिन तुम पाओगे कि तुम्हारे दो शरीर हो गए। एक शरीर जमीन पर बैठा हैदूसरा शरीर ऊपर उठ गया है और नीचे जमीन पर बैठे शरीर को देख रहा है। उन दोनों के बीच एक पतला सा धागा प्रकाश का हैजो जोड़े हुए है।
इसलिए ध्यान रखनाअगर कोई भी ओंकार का प्रयोग कर रहा हो और ध्यान में बैठा होतो उसे चौंका कर मत हिलाना। उसे कभी धक्का दे कर मत उठाना। क्योंकि उससे कभी भी खतरे हो सकते हैं। अगर उसके दोनों शरीरों के बीच फासला हो उस समयसूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर थोड़े अलग हो गए होंऔर भीतर का शरीर ऊपर उठ गया होऔर तुम धक्के दे दोतो उन दोनों का संतुलन सदा के लिए बिगड़ जाएगा। उन दोनों के बीच जो तालमेल हैवह सदा के लिए अस्तव्यस्त हो जाएगा। वह तालमेल बहुत सूक्ष्म है।
ठीक ध्यान की अवस्था में व्यक्ति इस शरीर के बाहर निकलता हैफिर वापस लौट आता है। और जब तुम इस कला में पूरे पारंगत हो जाते हो कि कैसे बाहर निकलेंकैसे भीतर आ जाएंतुम जान गए कि कैसे परमात्मा में प्रवेश करें और कैसे वापस लौट आएं। तब इस संसार और परमात्मा में कोई विरोध नहीं रह जाता। तुम रहो इस शरीर में और उसकी सुरति बनी रहती है। मन का धागा वहां जुड़ा रहता है।
नानक कहते हैं, 'उसका नाम उससे भी महान है। जितना बड़ा वह हैवह आप ही अपने को जान सकता है। यदि कोई उतना ऊंचा हो तो वह उस ऊंचे को जान सकता है। नानक कहते हैंजिस पर उसकी कृपा-दृष्टि होती हैउसी पर उसकी देन,उसका दान उतरता है।'
यह जरा समझने जैसा है और जटिल है। क्योंकि जगत में दो साधना-पद्धतियां हैंसिर्फ दो! एक साधना-पद्धति का आधार संकल्प हैऔर एक साधना-पद्धति का आधार समर्पण है। दोनों पहुंचा देती हैं। लेकिन मार्ग दोनों बड़े विपरीत हैं।
महावीरपतंजलिगोरखउनकी साधना-पद्धति संकल्प की है। प्रयास करना है। और संपूर्ण जीवन की शक्ति को प्रयास बना देना है। जिस दिन तुम्हारे भीतर रत्ती भर भी बची हुई शक्ति न रह जाएगीजिस दिन तुम अपने को पूरा दांव पर लगा दोगेउसी दिन घटना घट जाएगी। जिस दिन संकल्प पूरा हो जाएगाभीतर कोई भाग न बचेगाकोई भी चीज तुमने बचायी न होगीसभी कुछ दांव पर रख दिया होगाउसी दिन संकल्प पूरा हो जाएगा। उसी दिन तुम परमात्मा से मिल जाओगे। उसी दिन घटना घट जाएगी।
दूसरा मार्ग है समर्पण का। नानकमीराचैतन्यउन सबका मार्ग बिलकुल भिन्न है। और वह मार्ग यह है कि हमारे प्रयास से उपलब्धि नहीं होतीउसके प्रसाद से उपलब्धि होती है। हमारी चेष्टा से कुछ न होगाउसकी अनुकंपा से सब कुछ होगा। इसका यह मतलब नहीं कि तुम प्रयास मत करनाइसका मतलब इतना ही है कि तुम प्रयास पर भरोसा मत रखना। अकेले प्रयास पर भरोसा मत रखना। प्रयास तो तुम करनालेकिन यह बात जानते रहना कि होगा उसकी अनुकंपा से।
यह बड़ा महत्वपूर्ण है। क्योंकि अगर प्रयास का ही भरोसा हो तो अहंकार के जन्मने की संभावना है। इसलिए यह हो सकता है कि योगी अकड़ जाए और समझने लगे कि सब मेरे कारण हो रहा है। जो भी हो रहा हैमैं कर रहा हूं। और यह अहंकार अगर बन जाए तो इससे छुटकारा बहुत मुश्किल है। धन का अहंकार छोड़ना आसान है। पद का अहंकार छोड़ना आसान है। लेकिन प्रयास का अहंकार छोड़ना बड़ा कठिन है।
तो संकल्प के मार्ग पर जो सब से बड़ा खतरा हैवह यह है कि कहीं प्रयास करते-करते अहंकार मजबूत न हो जाए। कहीं ऐसा न लगे कि सब मुझ से हो रहा हैमैं कर रहा हूं इसलिए हो रहा है। तो मैं महत्वपूर्ण हो जाऊंगापरमात्मा भी गौण हो जाएगा। तब सब करने के बादसब द्वार खोलने के बाद आखिरी द्वार पर मैं अटक जाऊंगा। यह खतरा है संकल्प के मार्ग का।
इसलिए महावीरपतंजलिगोरखउस वर्ग के यात्री एक बात पर बहुत जोर देते हैं कि अहंकार छोड़ोअहंकार छोड़ो। प्रयास करो और अहंकार छोड़ो। कहीं प्रयास अहंकार के साथ चला तो हर प्रयास अहंकार को मजबूत कर देता है। तुम जो भी करते हो उससे लगता हैमैं मजबूत हो रहा हूं। मैंने किया जपतपयोगमैंने सिद्धियां पायीं। और यह अकड़ अगर साथ आ गयी तो सब व्यर्थ हो गया।
इसलिए नानक कहते हैंप्रयास करोलेकिन याद रखो मन में कि होगा उसकी अनुकंपा से।
तो वह आखिरी खतरा जो संकल्प में आता हैनहीं आएगा। लेकिन तब दूसरा खतरा है। संकल्प के मार्ग पर आखिर में खतरा आता है और समर्पण के मार्ग पर पहले ही खतरा है। और पहले ही खतरे से निपट लेना बेहतर है।
पहला खतरा यह है कि कहीं ऐसा न हो जाए कि तब तुम सोचो कि कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। होगा जब उसकी ही कृपा सेतो हम क्या करेंतो यह न करने का बहाना बन जाए! तब तुम सोचते रहोगेहोगा उसकी कृपा से जब होना है,हमारे करने से क्या होता है! और तुम जिंदगी की जो व्यर्थता हैउसमें ही उलझे रहो। क्योंकि जब वह चाहेगातब होगा। जब उसकी मर्जी होगीहोगा। हम क्या करेंयह कहीं संसार में भटकने के लिए आधार न बन जाए। यह कहीं क्षुद्र को करने का रास्ता न बना रहे। और यह कहीं तरकीब न होबहाना न हो टालने काकि जब उसको करना होगा करेगाहम क्या कर सकते हैंसमर्पण के मार्ग पर पहले ही खतरा है कि कहीं तुम आलस्य में न डूब जाओ।
इसलिए प्रयास तो पूरा करना है। और फल सदा उसकी कृपा से मिलेगायह स्मरण रखना है। तो नानक बार-बार दोहराते हैं कि जिस पर उसकी कृपा-दृष्टि होती हैउसी पर उसकी देनउसका दान उतरता है। लेकिन कृपा-दृष्टि उसकी किस पर होती हैउसी पर होती हैजो प्रयास से अपने को तैयार करता है।
इसे थोड़ा समझें। क्योंकि सामान्य जीवन में कृपा-दृष्टि का बड़ा अलग अर्थ है। कृपा-दृष्टि का मतलब यह है कि क्या वह भी पक्षपाती हैकि अपनों कर कृपा करता है और दूसरों को छोड़ देता हैकि किसी को चुन लेता है और उसी पर कृपा करता हैऔर किसी को छोड़ देता है। यह तो अन्याय होगा। परमात्मा के साथ अन्याय को तो हम जोड़ ही नहीं सकते। फिर तो कोई सार ही न रहा। फिर तो पापी पर उसकी कृपा हो सकती है और पुण्यात्मा पर न हो। फिर तो सब करना व्यर्थ है।
नहींउसकी कृपा-दृष्टि का यह अर्थ नहीं है कि वह किसी को अकारण चुन लेता हैकि खुशामदियों को चुन लेता हैकि स्तुति करने वालों को चुन लेता है। उसकी कृपा-दृष्टि तो सभी पर बरस रही है। वर्षा उसकी सभी पर हो रही है। लेकिन कुछ लोग अपनी मटकी को उलटा किए बैठे हैं। जिनकी मटकी उलटी हैकृपा-दृष्टि तो उन पर भी हो रही हैलेकिन उनकी मटकी भर नहीं पाती। कुछ लोग अपनी मटकी सीधी किए बैठे हैं। उनकी मटकी भर जाती है। तुम्हारी मटकी सीधी होने से वर्षा नहीं हो रही है। वर्षा तो हो ही रही है। लेकिन तुम्हारी मटकी सीधी होगी तो भर जाएगी। और तुम कितनी ही मटकी सीधी करोअगर वर्षा नहीं हो रहीतो कैसे भरेगी?
इसलिए नानक कहते हैंभरना तो उसकी कृपा-दृष्टि से होता हैलेकिन इतना तो प्रयास तुम्हें करना पड़ेगा कि मटकी को तुम सीधी रखो। इतना ध्यान तुम्हें रखना पड़ेगा कि मटकी में तलहटी है या नहीं! फूटी तो नहीं है! इतना ध्यान तुम्हें रखना पड़ेगा कि मटकी उलटी तो नहीं रखी है! तिरछी तो नहीं रखी है! कि कृपा बरसे भी तो भी भर न पाए। अनुकंपा आए भी तो भी बह जाए।
हर आदमी पर उसकी अनवरत वर्षा हो रही है। परमात्मा अनवरत वर्षा है। लेकिन तुम कुछ उलटे-सीधेआड़े-तिरछे हो। तुम वंचित रह जाते हो अपने कारण।
इसे समझ लेना। यह बड़ा उलटा दिखायी पड़ेगा। वंचित रहते हो तुम अपने कारणपाओगे उसके कारण। मिलेगा उसके प्रसाद सेखोओगे अपने कारण। समर्पण के मार्ग पर यह स्मरण रखना जरूरी है कि अगर मैं खो रहा हूं तो मैं ही कुछ उलटा हूं। अगर पाऊंगा तो उसकी अनुकंपा है। अगर तुम यह याद रख सको तो अहंकार के सघन होने की कोई जगह न रह जाएगी। तुम्हारे भीतर कोई स्थान न बचेगा जहां अहंकार मजबूत हो जाए। और जिसके पास अहंकार नहींउसके पास परमात्मा है।
'उसकी महान कृपा का वर्णन नहीं हो सकता। वह दाता इतना महान है कि उसमें बदले में पाने की तिल मात्र भी लालच नहीं।'
और दान का अर्थ समझ लेना। तुम भी दान देते होलेकिन उसमें पाने की कोई आकांक्षा छिपी रहती है। तुम अगर भिखारी को दो पैसे भी देते हो तो भी पाने की आकांक्षा रहती है कि शायद स्वर्ग में इसका प्रतिकार मिलेगा। और न सही स्वर्ग मेंकम से कम मोहल्ले-पड़ोस के लोग देख लेंगे कि मैं दानी हूं। इज्जत बढ़ेगीप्रतिष्ठा मिलेगी।
एक अंधा आदमी एक चर्च में जाता था। अंधा भी थाबहरा भी था। बहुत जोर से कोई चिल्लाए तो बामुश्किल सुन सकता था। तो चर्च में न तो प्रवचन पुरोहित का उसे सुनायी पड़ता थान चर्च में चलता भजन-संगीत उसे सुनायी पड़ता था। न वह कुछ देख सकता था। पर जाता नियम से था। एक दिन एक आदमी ने उससे पूछा कि हमारी कुछ समझ में नहीं आतातुमकिसलिए यहां आते होन तुम देख सकतेन तुम सुन सकते होतो किसलिए इतनी परेशानी उठाते होउस आदमी ने कहा,मैं इसलिए आता हूं ताकि दूसरे देख लें कि मैं चर्च आने वाला धार्मिक आदमी हूं। और तुम्हारे पास भला आंखें होंलेकिन आते तुम भी इसीलिए हो। और भला तुम्हारे पास कान होंआते तुम भी इसीलिए हो।
मंदिरगुरुद्वारामस्जिद जाना भी सामाजिक कृत्य हो गया है। एक औपचारिकता हैजो निभानी पड़ती है। तुम अगर दो पैसे दान भी देते हो तो भी प्रतिकार छिपा है। तुम कुछ पाना चाहते हो। वह दान न रहासौदा हो गया।
सौदा और दान में यही तो फर्क है। जब तुम कुछ वापस पाना चाहते होतब सौदा। तब तो बड़ा कठिन हो जाएगा। तब तो तुमने कभी दान नहीं दिया। तुमने सदा सौदा ही किया है। और लोग जो तुम्हारा शोषण करते हैंभलीभांति समझ गए हैं कि तुम सौदा ही करते हो। तो वे तुम्हें समझाते हैं कि यहां दो एकवहां मिलेंगे लाख। यहां दो ब्राह्मण कोवहां पाओगे। यहांचढ़ाओवहां फल मिलेगा। करोड़ गुना प्राप्त होगा स्वर्ग में। जो तुम्हारा शोषण करते हैंवे भी समझ गए हैं कि तुम सौदागर हो! दान तो तुम दे नहीं सकते।
क्या तुम ऐसे मंदिर में भी दान दोगेजहां कहा जाए कि तुम दान दो भलामिलेगा कुछ भी नहींदोतुम्हारी मर्जी,तुम्हारी खुशीवापस कुछ न पाओगे। उस मंदिर में दान देने वाला खोजना मुश्किल हो जाएगा। वह मंदिर गिर ही जाएगा। उसका बनना ही मुश्किल है। वैसा मंदिर कहीं भी नहीं है।
जब तुम परमात्मा के दान की बात सोचो तो तुम अपनी भाषा का हिसाब मत रखना। तुम यह मत सोचना कि जैसा दान तुम देते हो। नानक कहते हैं कि वह देता है और तुम से कुछ पाना नहीं चाहता। तुम्हारे पास है भी क्या जो तुम दोगे?उसका दान शुद्ध हैअनकंडीशनल है। उसमें कोई शर्त नहीं हैबेशर्त है।
तुमने वापस क्या दिया हैजीवन तुमने पाया था! और तुम्हारे जीवन में प्रेम आयातुमने वापस क्या दिया हैऔर तुमने कुछ हलकी झलकें भी पायीं अगर स्वास्थ्य कीसौंदर्य कीसत्य कीतो तुम ने वापस क्या दिया हैबड़े आश्चर्य की बात है कि हम कभी इस भांति सोचते ही नहीं कि हमें जो मिला हैउसके उत्तर में हमने क्या दिया है?
तुम्हें जो मिला हैअगर तुम्हें खयाल आ जाएतो तुम अनंत तक नाचते रहोगे उत्सव में। तुम उसका गुणगान करते रहोगे। यह गुणगान किसी भय से पैदा न होगा। यह गुणगान सिर्फ अहोभाव होगाकि जो दिया हैवह इतना ज्यादा है। और बिना कारण दिया है। न कोई योग्यता हैन कोई लौटाने का उपाय है। पिता के ऋण से मुक्त हुआ जा सकता हैमां के ऋण से मुक्त हुआ जा सकता हैपरमात्मा के ऋण से कैसे मुक्त होओगेवह दान बेशर्त है।
तो नानक कहते हैं, 'वह दाता इतना महान है कि उसमें बदले में पाने की तिल मात्र भी लालच नहीं है।'
बहुता करम लिखिआ न जाइ। बडा दाता तिलु न तमाइ।।
'कितने ही बड़े योद्धा होंउससे मांगते ही रहते हैं।'
और हमारे भिखारी तो मांगते ही हैंहमारे योद्धा भी मांगते हैं। हमारे भिखारी और हमारे सम्राटों में बहुत फर्क नहीं है। मात्रा का ही फर्क होगा। क्योंकि मांगते तो दोनों ही रहते हैं।
और ध्यान रखनाजब मांग मिट जाती हैतभी तुम्हें उसका दान दिखायी पड़ना शुरू होता है। तुम्हारी मांग के धुएं के कारण दान तुम्हें दिखायी नहीं पड़ता। तुम मांगे ही चले जाते हो। तुम्हें फुर्सत नहीं कि तुम देख लो जो मिल रहा है। जिस दिन मांग बंद होती हैउस दिन दान दिखायी पड़ता है। जिस दिन मांग बंद होती हैउस दिन प्रार्थना का गलत रूप गिर जाता है,सही रूप प्रकट होता है।
'मांगने वालों की गिनती का विचार भी नहीं किया जा सकता। कितने ही विकारों में खप कर नष्ट हो जाते हैं।'
नानक यहां बड़ी महत्वपूर्ण बात कह रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि तुम्हारा मांगना भी ऐसा अंधा है कि तुम जो मांगते हो उसको पा कर ही नष्ट होते हो। तुम मांगते भी गलत हो।
तुम गौर से देखोतुम्हारी जिंदगी जितने कष्ट में हैउस कष्ट का कारण अगर तुम खोजोगेतो कहीं न कहीं तुम्हारी अपनी ही मांग पाओगे। तुम बड़े पद पर होना चाहते हो। फिर बड़े पद की चिंताएं हैं। रात नींद नहीं आती। दिन चैन नहीं मिलता। पश्चिम में वे कहते हैं कि अगर चालीस साल की उम्र होते-होते तुम्हें हार्ट अटैक का पहला दौरा न पड़ेतो उसका मतलब साफ है कि तुम असफल आदमी हो। चालीस साल की उम्र तक हार्ट अटैक का दौरा पड़ना ही चाहिए। सफल आदमी का लक्षण वह है। अगर पेट में अल्सर न हो जाएंतो तुम गरीब आदमी हो। क्योंकि अमीर को अल्सर होना ही चाहिए। चिंताएं इतनी होंगी कि अल्सर होना जरूरी है।
सफल आदमी सफलता की मांग कर-कर के पाता क्या हैऔर जो उसने मांगामिल जाता है। बड़े मजे की बात तो यह है कि तुम जो मांगोगेमिल जाएगा। देर-अबेर मिल ही जाएगा। इसलिए मांगना थोड़ा सोच-समझ कर। क्योंकि फिर पछताना मत। पहले मांगने में समय गंवायाफिर पछताने में समय गंवाओगे
तुम गौर से अगर अपनी जिंदगी का विश्लेषण करो तो तुम पाओगे कि तुम अपने ही हाथ मुसीबत में फंसे हो। तुम ने जो-जो मांगा थावही पा कर फंस गए हो। वह मिल गया। तुम्हें धन चाहिए थाधन मिल गया। पर धन के साथ धन की चिंता भी आती है। और धन के साथ आत्मा का सिकुड़ाव भी आता है। और धन के साथ हजार तरह के रोग भी आते हैं। और धन के साथ हजार तरह का अभिमानअहंकार भी आता है। वह सब भी उसके साथ है। जुड़ा हुआ है। उसे तुम छोड़ न सकोगे। तुम जो मांगते होमिल जाता है। और फिर तुम पछताते हो।
तो नानक कहते हैं, 'कितने ही विकारों में खप कर नष्ट हो जाते हैं।'
अपनी ही मांग! अपनी ही प्रार्थनाएं!
'कितने ही ऐसे हैंजो ले-ले कर मुकर जाते हैं।'
एहसान भी नहीं मानते हैं। मांग कर लेते हैंमिल जाता है। धन्यवाद भी नहीं देते।
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन रोज सुबह नमाज के वक्त जोर से चिल्ला कर कहता थाहे परमात्मा! एक बात खयाल रखजब भी लूंगापूरे सौ रुपए लूंगा। कम मैं न लूंगा। जब भी तुझे देना होसौ की पूरी थैली गिरा देना। और ध्यान रखनिन्यान्नबे भी न लूंगा।
पड़ोस का एक आदमी रोज यह सुनता था। उसे मजाक सूझी! उसने कहा कि रोज यह एक ही बात किए जा रहा है। और निन्यान्नबे तो यह लेगा नहीं। तो खतरा भी नहीं है। तो उसने एक थैली में निन्यान्नबे रुपए रख करजब दूसरे दिन वह नमाज पढ़ रहा थाउसके छप्पर में से नीचे गिरा दी।
उसने नमाज बीच में ही छोड़ कर पहले रुपए गिने और फिर कहावाह रे वाह! एक रुपया थैली का काट ही लिया!
आदमी धन्यवाद भी देने को राजी नहीं है। उसने फिर भी शिकायत ही की कि वाह रे वाह! एक रुपया काट ही लिया थैली का!
सुना है मैंने कि एक बहुत बड़ा धनपति समुद्र-यात्रा से वापस लौट रहा था। भयंकर तूफान उठा। जहाज अब डूबा तब डूबाऐसी हालत हो गयी। पहले तो वह कोरी-कोरी प्रार्थना करता रहा। लेकिन जब जिंदगी बिलकुल मौत के करीब आ गयीतब उसने कहा कि अगर आज बच गयाअगर तूने आज बचा लिया परमात्मातो मेरा जो महल है राजधानी मेंउसे बेच कर गरीबों को बांट दूंगा। तूफान शांत हो गया। नाव किनारे लग गयी। अब वह अमीर मुश्किल में पड़ा। पछताने लगा कि यह तूफान तो शांत हो ही जाना था। मैं नाहक फंस गया। लेकिन लोगों ने भी सुन लिया। उसने इतने जोर से कह दियावह भी एक गलती हो गयी। इसलिए तो लोग चुप-चुप प्रार्थना करते हैं। सारे जहाज के लोगों ने सुन लिया। और लोग जहाज से उतरे नहीं कि सारे नगर में खबर फैल गयी कि धनपति ने प्रार्थना की है कि उसके महल को बेच देगा और गरीबों को बांट देगा। वह बहुत झंझट में पड़ा। बहुत सोच-विचार किया।
आखिर एक दिन उसने गांव में खबर कर दी कि ठीक हैमकान बेचना हैजिनको भी खरीदना होआ जाएं। दस लाख का मकान था। बड़े खरीददार इकट्ठे हुए। बड़ा महल था। राजधानी में उससे महत्वपूर्ण कोई मकान न था। सब बड़े हैरान हुए जब उस अमीर ने घोषणा की कि यह मकान और यह बिल्लीजो दरवाजे पर बंधी हैदोनों साथ ही बिकेंगे। बिल्ली का दाम दस लाख रुपया और मकान का दाम एक रुपया। मगर दोनों साथ!
लोग बहुत हैरान हुए कि यह क्या पागलपन हैऔर बिल्ली का दाम कभी सुना दस लाखऔर इस महल का दाम सिर्फ एक रुपयालेकिन लोगों ने कहा कि हमें इससे क्या प्रयोजन! खरीददार मिल गए। दस लाख का मकान था हीऔर बिल्ली भी एक रुपए की थी। इसमें कुछ ऐसी अड़चन न थी। तो दस लाख में बिल्ली खरीद ली और एक रुपए में मकान। उसने दस लाख जेब में रख लिए और एक रुपया गरीबों में बांट दिया। क्योंकि जो वचन दे चुका था कि महल को बेच कर गरीबों में बांट दूंगा!
परमात्मा के साथ भी लोग लीगलकानूनी संबंध रखते हैं। वहां से भी तो हिसाब...निकाल ही लेते हैं रास्ता।
मिल जाए तोनानक कहते हैंबहुत ऐसे हैं जो ले-ले कर मुकर जाते हैं।
मिल जाता है तब कहते हैंसंयोग की बात है। यह तो होने ही वाला था। हो गया। बहुत से तो ऐसे हैं जो इतना भी नहीं कहते। बात ही भूल जाते हैं कि मांगा और मिला। हमने कभी मांगा भी थायह भी भूल जाते हैं। एहसानउसका अनुग्रह भी नहीं मानते।
'कितने ऐसे हैं जो मांगते रहते हैंऔर वह देता रहता हैऔर वे खाते रहते हैं।'
और कभी उस मांगने और खाने की वृत्ति के ऊपर नहीं उठते हैं। भोगते रहते हैं। और भोग करीब-करीब ऐसा है कि उससे कोई कहीं पहुंचता नहीं। कुछ पाता नहीं। सिर्फ समय गंवाता है। कितना ही खाओक्या मिलेगाकितना ही पहनोक्या मिलेगाकितने ही हीरे-जवाहरात से सजा लो शरीर कोक्या मिलेगाजीवन के बहुमूल्य क्षण ऐसे ही जा रहे हैंजिनमें प्रार्थना हो सकती थीजिनमें ध्यान का धन मिल सकता था। जीवन ऐसे ही जा रहा हैकंकड़-पत्थरों के इकट्ठा करने में।
नानक कहते हैं, 'और कितने ऐसे भी हैंजिन पर सदा दुख और भूख की मार पड़ती रहती हैफिर भी जिन्हें स्मरण नहीं आता।'
खुद की ही मांगों के कारण दुख की मार पड़ती रहती है फिर भी जागते नहीं कि हम जो मांगते हैं उसी से दुख पाते हैं। हमारे कष्ट हमारी ही आकांक्षाओं के फल हैं। और हमारे नर्क हमारी ही वासनाओं से आते हैं। पर हम संबंध ही नहीं जोड़ते। हम दोनों को अलग ही कर के देखते हैं। तुम सदा सुख मांगते होलेकिन कभी तुम ने यह देखा कि तुम्हारी सारी वासनाएं तुम्हें दुख में ले जाती हैंऔर फिर भी तुम कहते होसुख क्यों नहीं मिलताजैसे कोई आदमी सूरज की तरफ पीठ करके चलता हो और कहता हो कि मुझे प्रकाश क्यों नहीं मिलतासूरज के दर्शन क्यों नहीं होते?
सूरज के दर्शन तो अभी हो सकते हैंलेकिन वासना में जाता हुआ चित्त दुख में जाएगानर्क में जाएगाअंधेरे में जाएगा। और तुम्हारी प्रार्थनाएं भी तुम वासनाओं में ही रंग लेते हो। भक्त अपनी वासना को भी प्रार्थना के प्रति समर्पित करता है। तुम अपनी प्रार्थना को भी अपनी वासना की सेवा में लगा देते हो।
तो नानक कहते हैंकितने ही ऐसे हैंजिन पर दुख की मार पड़ती रहती हैफिर भी जागते नहीं।
कितने जन्मों से तुम पर दुख की मार पड़ रही है! नहींबुद्ध का हिसाब ठीक नहीं है। घोड़े चार तरह के होते हैं। एक,जिनको मारो तो भी इंच नहीं हिलते। जिनको मार-मार कर मार डालो--असली अड़ियल घोड़े! वे हटते ही नहीं। तुम जितना मारो,उतना मजबूती से वे रुक जाते हैं।
क्योंकि कितने दुख की मार पड़ रही हैफिर भी तुम सचेत नहीं होते। तुम झेले चले जाते हो। तुम आदी हो गए हो। तुम धीरे-धीरे मान ही लिए हो कि दुख ही जीवन का ढंग है। तुम भूल ही गए हो कि जीवन परमानंद है। जीवन परम उत्सव है। और अगर तुम दुखी होतो अपनी किसी भूल के कारण हो।
'हे दाताये भी तेरे ही दान हैं।'
और नानक कहते हैं कि ये भी तेरे ही दान हैं। लोग मांगते हैं और तू दिए चला जाता है। ध्यान रखनातुम ने अगर गलत मांगातो गलत भी मिल जाएगा। क्योंकि अस्तित्व तुम्हें देने को बेशर्त राजी है। तुम ने अगर गलत मांगातो गलत भी मिल जाएगा। क्योंकि परमात्मा देता है और तुम्हारी स्वतंत्रता में कोई बाधा नहीं डालता। तुम ने अगर भटकाव मांगातो भटकाव मिल जाएगा।
इसे थोड़ा समझें। क्योंकि इससे एक सवाल उठता है कि परमात्मा तो जानता है कि क्या गलत है। हम गलत मांगते हों। वह गलत क्यों दे?
अगर परमात्मा तुम्हारी मांग को पूरा न करे तो तुम्हारी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है। तब तुम धागों से बंधीकठपुतलियां हो जाते हो। फिर वह जो चाहे वह तुम्हें दे। तुम्हारी मांग की भी स्वतंत्रता न रह जाएतब तो मनुष्य की सारी गरिमा खो जाती है। मनुष्य की गरिमा यही है कि वह गलत भी जा सकता है। सही जाना चाहेसही जा सकता है। गलत जाना चाहेगलत जा सकता है। स्वतंत्रता की संभावना है। तुम बिलकुल जकड़े नहीं हो जंजीरों में। तुम्हें सचेतन अवसर है चुनाव का। तुम जहां जाना चाहो। तुम्हें परमात्मा कहीं से अवरोध नहीं देता। वह तुम्हारा विरोध नहीं करता। वह तुम्हारे बीच में खड़ा नहीं होता। वह सब तरफ तुम्हें मार्ग देता है। सब तरफ दिशाएं खुली हुई हैं। तुम चाहो तो गिर जाओ आखिरी नर्क तकतो भी तुम्हें वह रोकेगा नहीं। तुम चाहो तो तुम उठ जाओ आखिरी स्वर्ग तकतो भी वह तुम्हें रोकेगा नहीं। हर हालत में उसकी शक्ति तुम्हें मिलती रहेगी। उसका दान बेशर्त है। और उसके दान में तुम्हें परतंत्र बनाने की चेष्टा नहीं है। वह तुम्हें देता है और तुम जैसा भी उपयोग करना चाहो कर लो।
इसलिए नानक कहते हैं कि 'हे दाताये भी तेरे ही दान हैं। बंधन और मुक्ति तेरी ही आज्ञा से होते हैं।'
लेकिन मांगते हम हैं। हम बंधन मांगते हैं तो बंधन घट जाता है। आज्ञा उसकी है। हुक्म उसका है। कानून उसका है। नियम उसका है। जैसे तुम वृक्ष पर चढ़ जाओ और कूद पड़ोतो हड्डी टूट जाएगी। जो जमीन का गुरुत्वाकर्षण तुम्हें संभालता था और गिरने नहीं देता थावही हड्डी टूटने का कारण हो जाएगा। तुम जमीन पर सीधे चलोगुरुत्वाकर्षण तुम्हारे चलने में सहारा देता है। तुम इरछे-तिरछे चलो तो गिर जाते होफ्रैक्चर हो जाता है। शक्ति वही है।
शक्ति निरपेक्ष हैतटस्थ है। परमात्मा बिलकुल निरपेक्ष और तटस्थ है। तुम अगर ठीक से उपयोग कर लोतो तुम परम अनुभव को उपलब्ध हो जाते हो। तुम अगर गलत भटकोतो तुम जीवन के गहन से गहन गर्त में गिर जाते हो। नानक कहते हैंसब तुझ से ही मिलता हैस्वर्ग भीनर्क भीलेकिन मांग हमारी है पीछे। कानून तेरा काम करता हैलेकिन हम मांग-मांग कर खुद फंस जाते हैं।
मैंने सुना है कि एक राजनीतिज्ञ मरा। बड़ा नेता था। और बड़ा होशियार आदमी था। पुराना खिलाड़ी था। और सब तरह के दांव-पेंच जानता था। जब वह स्वर्ग के द्वार पर पहुंचातो उसने कहा कि पहले मैं स्वर्ग और नर्क दोनों देख लेना चाहता हूं। फिर मैं चुनाव करूंगा कि कहां रहना है। स्वर्ग दिखाया गया। उसे स्वर्ग थोड़ा उदास लगा--राजनीतिज्ञ थादिल्ली में रहने का आदी था। स्वर्ग जरा उदास लगा। जो लोग सदा उत्तेजना में रहे हैंउन्हें स्वर्ग उदास लगेगा ही! क्योंकि वहां लोग शांत थे। न कोई शोरगुल थान कोई उपद्रव था। न कोई झगड़ा-झांसा था। न कोई आंदोलन हो रहा था। न कोई घेराव हो रहा था। कुछ भी नहीं हो रहा था।
पूछाअखबार?
तो कहाअखबार यहां छपता नहीं।
क्योंकि अखबार तभी छपे जब कोई न्यूज होजब कोई समाचार हो। समाचार ही कुछ नहीं है। यहां बस सब शांति है। समाचार का मतलब ही उपद्रव होता है। कुछ उपद्रव हो तो समाचार! तुम अगर समाचार बनना चाहोतो कुछ उपद्रव करो। तुम समाचार बन जाओगे। खाली बैठे रहो अपने झाड़ के नीचे बुद्ध बनेकोई समाचार नहीं है।
उसने कहा कि यह तो बड़ा उदास-उदास साफीका-फीका सा लगता है। मैं नर्क भी देख लेना चाहता हूं। पहुंचा नर्क। जंचा बहुत। दिल्ली को भी मात करता था। कई अखबार छपते थे। बड़े आंदोलनबड़ा शोरगुलबड़ी रौनकचहल-पहलहोटलेंसंगीत,बाजेवह जंचा। उसने कहा कि यह बात जंचती है। लेकिन हम तो सदा पृथ्वी पर उलटा ही सुनते रहे कि स्वर्ग में बड़ा आनंद है और नर्क में बड़ा कष्ट है। यह हालत उलटी है। शैतान से कहा--जो कि द्वार पर स्वागत करने आया था--कि मामला क्या है?पृथ्वी पर तो लोग उलटा ही समझे बैठे हैं। मैं भी अगर चुपचाप स्वीकार कर लेता तो स्वर्ग में फंस जाता। हम तो जो मरता है,उसको कहते हैंस्वर्गवासी हुआ। यहां आना चाहिए। यह आने योग्य जगह है। जिंदगी मालूम पड़ती हैरंग हैरौनक हैवैभव है! पृथ्वी पर उलटी खबर क्यों है?
शैतान ने कहाकारण है। मेरी वहां कोई सुनता नहीं। और विपरीत पक्ष के लोगों ने प्रचार कर रखा है। ये धार्मिक लोग स्वर्ग का प्रचार कर रखे हैं सदा से। और मेरी कोई सुनता नहीं। और मैं अगर किसी को कहूं भीतो लोग कहते हैं कि शैतान है,सावधान! तो मेरे साथ बड़ा अन्याय हुआ है। और अब आप अपनी आंखों से देख लो।
राजनीतिज्ञ ने लौट कर देवदूत से कहा--जो स्वर्ग से यहां तक पहुंचाने आया था--कि मैंने चुन लिया। तुम वापस लौट जाओ। मैं नर्क में ही रहूंगा।
जैसे ही उसने चुनादरवाजा बंद हुआऔर एकदम नर्क की शकल बदल गयी। जैसे कि फिल्मों में चित्र एकदम से बदल जाता है। और अनेक लोग उस पर टूट पड़े। और घूंसा-बाजीऔर उसको पटकने लगे जलते कड़ाहों में। उसने कहा कि यह क्या कर रहे होऔर अब तक सब ठीक था। शैतान ने कहा कि वह विजिटर्स के लिए था। अब असली नर्क शुरू होता है। वह तो ऐसे हीजो टूरिस्टविजिटर्सउनको दिखाने के लिए बना रखा था। अब असली चीज! एक दफा चुन लियाअब आप निवासी हो गए। अब आप मजा देखोगे
नर्क भी लोग चुनते हैं। क्योंकि हर वासना का शुरू का हिस्सा विजिटर्स के लिए है। हर वासना का प्राथमिक चरण लुभाने के लिए है। वह शो-विंडो है। वह असली चीज नहीं है। वह सिर्फ प्रलोभन है। वह विज्ञापन है। एक बार चुन ली वासनाफिर असली नर्क शुरू होता है। तुम चुन-चुन कर अपने ही हाथ नर्क में पड़े हो।
और स्वर्ग शुरू में बे-रौनक है। क्योंकि आनंद शुरू में बे-रौनक होगा ही। क्योंकि आनंद परम शांति है। और दुख शुरू में बड़ा रंग-रौनक वाला मालूम पड़ता हैक्योंकि उत्तेजना है। तुम उत्तेजना को चुनते होदुख पाते हो। जिस दिन तुम शांति को चुनोगेउस दिन तुम आनंद पाओगे। होता सब उसके हुक्म से हैउसके कानून से। लेकिन उसका कानून तुम जैसी मांग करते होवैसा ही तुम्हारे अनुकूल ढल जाता है। वह तटस्थ है। वह अपनी मांग को तुम्हारे ऊपर नहीं थोपता। और थोप भी देतो भी तुम राजी न होगे। क्योंकि स्वर्ग अगर तुम्हें जबर्दस्ती दे दिया जाए तो नर्क से भी बदतर मालूम पड़ेगा। नर्क भी तुम अपनी मौज से चुनोतो स्वर्ग है। क्योंकि तुम्हारी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहनी चाहिए।
यह एक बारीक से बारीक सवाल है मनुष्य के दर्शन-शास्त्र का कि परमात्मा और मनुष्य की स्वतंत्रता साथ-साथ कैसे हो सकती है?
इसलिए महावीर ने परमात्मा को इनकार कर दिया। क्योंकि उससे स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी। अगर सब उसी के हुक्म से हो रहा है तो आदमी की स्वतंत्रता का अंत हो गया। और जब स्वतंत्रता न रहीतो आत्मा का क्या मूल्यइसलिए महावीर ने कहाकोई परमात्मा नहींस्वतंत्रता है। ऐसे लोग हुए जिन्होंने कहा कि कोई स्वतंत्रता नहीं हैभाग्य है। परमात्मा हैकोई स्वतंत्रता नहीं है।
नानक दोनों के मध्य में हैं। वे कहते हैंमनुष्य की स्वतंत्रता है और परमात्मा भी है। स्वतंत्रता मांग की है। तुम जो चाहो मांगो। उसके लिए प्रयास करोवह मिलेगा। लेकिन मिलता परमात्मा की अनुकंपा से है। दुख मांगो तो भी मिल जाता है।
अब यह बड़े मजे की बात है कि तुम दुख क्यों मांगे चले जाते होऔर अगर तुम ही सुख नहीं मांग रहे होतो परमात्मा लाख उपाय करेतुम्हें सुख नहीं दे सकता।
ऐसा हुआ। सूफी फकीर जुन्नैद हुआ। वह कहता थाकिसी को जबर्दस्ती सुख नहीं दिया जा सकता। किसी को जबर्दस्ती शांति नहीं दी जा सकती।
मैं भी राजी हूं। बहुत लोगों को मैंने भी कोशिश कर के देख ली कि जबर्दस्ती भी दे दो...असंभव है। तुम जितना देने की जबर्दस्ती करोगेउतना आदमी चौंक कर भागता है कि कोई खतरा है। आनंद भी नहीं दे सकते किसी को। क्योंकि कोई लेने को राजी नहीं है।
तो एक दिन एक भक्त ने कहा कि यह बात मैं मान ही नहीं सकता। तो हम एक प्रयोग करें। वह एक आदमी को लाया और उसने कहा कि यह आदमी बिलकुल दीन-दरिद्र है। और सम्राट आपके भक्त हैं। आप उनसे कहें कि इसको एक करोड़ स्वर्ण-अशर्फियां दे दें। फिर हम देखें कि कैसे यह आदमी दीन-दरिद्र रहता है। कैसे दुखी रहता है। जुन्नैद ने कहाठीक!
एक दिन प्रयोग किया गया। और एक करोड़ अशर्फियां एक बहुत बड़े मटके में भर कर एक नदी के पुल के बीच में रख दी गयीं। पुल पर आवागमन बंद कर दिया गया। और वह आदमी रोज शाम को टहलने उस पुल पर से निकलता था। ठीक उस वक्त आवागमन बंद कर दियाभरा हुआ मटका अशर्फियों का रख दिया बीच पुल परकोई नहीं है। और दूसरी तरफ सम्राट,जुन्नैद और उसके साथीजो प्रयोग कर रहे थेवे चुपचाप खड़े हो गए।
तो कोई अड़चन नहीं है इस आदमी को। कोई पुलिस नहीं हैकोई जनता नहीं हैखाली पुल पर मटका रखा हुआ है,खुला हुआ। स्वर्ण की अशर्फियां चमक रही हैं सूरज की धूप में। और वह आदमी चला आ रहा है उस तरफ से।
पर बड़ी हैरानी की बात है! वह आदमी मटकी के पास से गुजर गया और दूसरी तरफ आ गया। उसने मटकी को न तो देखान छुआ। जुन्नैद और उसके साथियों ने उसे पकड़ा और कहा कि तुम्हें मटकी दिखायी नहीं पड़ी?
उसने कहा कि कैसी मटकीजब मैं पुल पर आया तब मुझे एक खयाल उठा कि आज पुल पर कोई भी नहीं है। कई दिन से खयाल उठता थालेकिन कर नहीं सकता था। आज प्रयोग कर लूं। कई दिन से सोचता था कि आंख बंद कर के पुल पार कर सकता हूं कि नहीं! लेकिन भीड़-भाड़ रहती थीतो कभी कर नहीं पाया। आज सन्नाटा देख कर मैंने कहा कि अब कर लेना चाहिए। तो मैं आंख बंद कर के गुजर रहा था। कैसी मटकीकिस मटकी की बात कर रहे होऔर प्रयोग सफल रहा। आंख बंद किए पुल पार किया जा सकता है।
जुन्नैद ने कहायह देखो! जिसे चूकना है वह कोई खयाल पैदा कर लेगा और चूक जाएगा। जो चूकने के लिए ही तैयार हैतुम उसे बचा न सकोगे।
परमात्मा भी तुम्हें वह नहीं दे सकताजिसे लेने के लिए तुम तैयार नहीं हो गए हो। तुम अगर दुख के लिए तैयार हो,दुख। तुम अगर सुख के लिए तैयार होसुख। तुम वही पाते हो जो तुम्हारी तैयारी है। मिलता उसकी अनुकंपा से है। पाते तुम अपनी तैयारी से हो। बरसता वह सदा है। भरते तुम तभी होजब तुम तैयार होते होउन्मुख होते हो।
'बंधन और मुक्ति तेरी ही आज्ञा से है। हे दाताये भी तेरे ही दान हैं। कोई दूसरा इसमें कुछ भी नहीं कर सकता। जो कोई गप्प हांकने वाला इसमें कुछ कहने जाता हैउसे अपनी मूर्खता का पता तब चलता हैजब उसके मुंह पर मार पड़ती है। वह आप ही जानता है और आप ही देता है। उसका वर्णन भी विरला ही कर सकता है। वह जिसे भी चाहे अपनी स्थिति का गुण प्रदान कर सकता है। नानक कहते हैंवह बादशाहों का भी बादशाह है।'
'कोई गप्प हांकने वाला...।'
और बहुत हैं धर्म के जगत में गप्प हांकने वाले। क्योंकि जितनी सुविधा गप्प हांकने की धर्म के जगत में हैउतनी और कहीं भी नहीं है। क्योंकि सारा मामला ही अलौकिक है। और सारा मामला ही रहस्यपूर्ण है। और सारा मामला अंधकार में है। प्रमाण तो कुछ है नहीं। इसलिए बहुत गप्पें धर्म के नाम पर चलती हैं।
इसलिए तो दुनिया में तीन सौ धर्म हैं। नहीं तो तीन सौ धर्म हो सकते हैंधर्म होता तो एक ही होतातीन सौ धर्म कैसे हो सकते हैं। और इन तीन सौ धर्मों के भी तीन हजार संप्रदाय हैं छोटे-मोटे। निश्चित ही सत्य के संबंध में बहुत सी गप्पें हांकीगयी हैं। और रास्ता तो कुछ भी नहीं है जांचने का कि क्या गप्प है और क्या सही है! और गप्प हांकने वाले बहुत कुशल हैं।
महावीर सात नर्कों की बात करते थे कि सात नर्क हैं। कैसे प्रमाण लगाओगेकैसे पता लगाओगे कि सात हैंमहावीर का विरोधी था मक्खली गोसाल नाम का एक आदमी। जब उसके शिष्यों ने उसे जा कर कहा कि तुम्हें भी पता हैकि महावीर कहते हैंसात नर्क हैं! उसने कहा कि महावीर को पूरा पता नहींनर्क सात सौ हैं।
अब क्या करोगेयह मक्खली गोसाल ठीक कहता है कि महावीर ठीक कहते हैंरास्ता क्या है दोनों के बीच तय करने का कि कौन सही है?
लेकिन वही हुआजो नानक कहते हैं। मक्खली गोसाल के जीवन में वही हुआ। उसने जीवन भर गप्पें हांकींमरते वक्त पछताया। क्योंकि जब मौत करीब आयी तब वह घबड़ाया कि अब क्या होगाजब मौत करीब आयी तब वह कंपने लगा। जब मौत करीब आयी तब उसने अपने भक्तों से कहा कि जो भी मैंने कहा हैवह सब झूठ था। और तुम मेरी लाश को सड़कों परघसीटो। जब मैं मर जाऊं तो तुम मेरी लाश को सड़कों पर घसीटना और लोगों से कहना मेरे मुंह पर थूकें। क्योंकि इस मुंह से मैंने सिवाय झूठ के और कुछ भी नहीं बोला।
पर मक्खली गोसाल भी आदमी हिम्मत का रहा होगानहीं तो यह भी कौन करे! और यह आदमी भी ईमानदार रहा होगा। नहीं तो जिंदगी भर झूठ बोलता रहाएक क्षण भर के लिए और साध लेता चुप्पीऔर मर जाता। तो शायद मक्खलीगोसाल का धर्म होता। क्योंकि उसके बड़े भक्त थे और उसके कई मानने वाले थे। वह महावीर के बड़े से बड़े प्रतियोगियों में से एक था। पहले महावीर का शिष्य था। फिर जब उसने कुछ थोड़ा सा सीख लियातो उसने अलग संप्रदाय खड़ा करने की कोशिश की।
निश्चित ही गप्प हांकने वाला होगा। क्योंकि जब महावीर को पता चलातो महावीर ने कहा कि यह तो बड़ी हैरानी की बात हैउसे तो अभी पहली झलकें भी नहीं मिली थीं। लेकिन वह महावीर के पास--जो वे कहते थेसमझाते थे--वह सब उसने समझ लिया। होशियार आदमी थाकुशल आदमी थाबोल सकता थालिख सकता थापंडित था। उसने अपना संप्रदाय खड़ा कर लिया।
महावीर जब गांव में आएजिस गांव में मक्खली गोसाल ठहरा थातो उन्होंने कहा कि मैं मक्खली गोसाल को मिलूंगा। क्योंकि वह मेरा पुराना शिष्य है। और उससे पूछूंगापागल! तू यह क्या कर रहा हैतुझे खुद भी पता नहीं है। मक्खली गोसालसे मिलना हुआ। तो झूठ बोलने वाले का तुम भरोसा ही नहीं कर सकते। उसने महावीर को ऐसा देखा जैसा कभी देखा ही न हो।
महावीर ने कहा कि क्या तू बिलकुल भूल गया कि तू वर्षों मेरे साथ रहा?
मक्खली गोसाल ने कहाआप भ्रांति में हैं। जो आपके साथ था वह आत्मा तो जा चुकी। इस शरीर मेंउसी शरीर में यह नयी आत्मा तीर्थंकर की प्रवेश कर गयी है। मैं वह नहीं हूं जो आपके साथ था। यह देह भर आपके साथ थीयह मुझे पता है। सुना है। लेकिन वह आदमी मर चुकाजो तुम्हारा शिष्य था। इसलिए भूल कर अब किसी से यह मत कहना कि मक्खलीगोसाल मेरा शिष्य था। यह तो एक तीर्थंकर की आत्मा मुझ में प्रवेश कर गयी है।
महावीर चुप रह गए होंगे। अब इस आदमी से क्या कहना! और उसका बड़ा प्रभाव था। उसके हजारों भक्त थे। लेकिन फिर भी आदमी अच्छा रहा होगा। मरते वक्त उसे यह एहसास तो हो गया!
वही नानक कह रहे हैं कि जो कोई गप्प हांकने वाला इसमें कुछ कहने जाता हैतो उसे अपनी मूर्खता का पता तब चलता हैजब उसके मुंह पर मार पड़ती है।
जब मौत की मार पड़ती हैऔर जब जिंदगी हाथ से छूटने लगती हैतब उसे पता चलता है कि मैं व्यर्थ ही बातें करता रहा स्वर्गों-नर्कों की। और मुझे कुछ भी पता नहीं। और जिंदगी हाथ से बीत गयी। मैं जिंदगी के कोई आधार न रख पाया। कागज की नावें बहाता रहा। अब डूबने का वक्त आयातब पता चलता है।
सम्हलना! कभी भी धर्म के संबंध में जो पता न होभूल कर मत कहना। पता हो तो ही कहनाअन्यथा चुप रहना। क्योंकि मन बड़े अन्वेषण कर लेता है। मन बड़े आविष्कार कर लेता है। मन खोजने में बड़ा कुशल है। और एक दफा तुम्हारा मन खोजने लगे और बातें करने लगे और चर्चा चल पड़ेतो एक जाल शुरू हो जाता है जो अपने आप बढ़ता है। तुम्हें फिर कुछ करना नहीं पड़ता। एक शब्द दूसरे को पैदा कर देता है। एक बात दूसरी बात को पैदा कर देती है। फिर तुम आगे बढ़ने लगते हो।
ऐसा हुआ कि एक धर्मगुरु एक सराय में आ कर ठहरा। उसने अपना घोड़ा झाड़ के नीचे बांधा। मुल्ला नसरुद्दीन यह देख रहा था। घोड़ा बड़ा प्यारा था और बड़ा कीमती था। और धर्मगुरु प्रसिद्ध थाऔर अपने घोड़े से उसका बड़ा लगाव था। वह दूर-दूर की यात्रा अपने घोड़े पर करता था। वह दोपहर के विश्राम के लिए रुका।
मुल्ला नसरुद्दीन घोड़े के पास गया। घोड़े को सहलाया। जब वह घोड़े को सहला रहा था और खुश हो रहा था--घोड़ा सच में बड़ा बहुमूल्य था--तभी एक घोड़े का खरीददार पास से निकलता था। उसने नसरुद्दीन से कहातुम्हारा घोड़ा है?
अब इतना शानदार घोड़ा! कहना मुश्किल हो गया कि अपना नहीं है।
नसरुद्दीन ने कहाहांअपना ही घोड़ा है।
उस आदमी ने कहाबेचते होबात में बात बढ़ गयी।
नसरुद्दीन ने कहाखरीदने की हिम्मत है?
हजार रुपए का घोड़ा थानसरुद्दीन ने दो हजार दाम मांगे। न कोई देगान कोई बात उठेगीबात खतम हो जाएगी। वह आदमी दो हजार देने को तैयार हो गया। अब बात यहां तक बढ़ गयी थी कि पीछे लौटना मुश्किल हो गया। तो उसने बेच दिया। फिर उसने सोचाऐसा कुछ हर्जा भी क्या हैदो हजार मुफ्त हाथ लग रहे हैं। और धर्मगुरु सोया हुआ है।
वह जब दो हजार गिन कर खीसे में रख ही रहा था--खरीददार तो घोड़ा ले कर जा चुका-- धर्मगुरु बाहर आया। भागने का मौका न मिला। तो रुपए तो उसने खीसे में रख लिएअब क्या करेकुछ सूझा नहींतो जहां घोड़ा खड़ा थावहां घोड़े की रस्सी अपने गले में डाल कर और घास का एक टुकड़ा मुंह में ले कर खड़ा हो गया।
धर्मगुरु खुद भी बहुत घबड़ाया। देखी उसने यह हालततो उसके भी हाथ-पैर कांप गए कि यह हुआ क्या हैयह मामला क्या हैउसने कहाभाई यह क्या कर रहे होबात क्या है!
नसरुद्दीन ने कहाअब आपसे क्या छिपाना! सच बात कह दूं?
उस धर्मगुरु ने कहा कि मुझे तुम्हारी सच बात जानने का कोई प्रयोजन नहीं। मैं यह पूछता हूंवह मेरा घोड़ा कहां है?क्योंकि तुम तो मुझे आदमी पागल मालूम पड़ते हो। मेरा घोड़ा कहां है?
नसरुद्दीन ने कहा कि आपके घोड़े की बात और मेरी बात दो अलग-अलग बातें नहीं हैं। मैं ही आपका घोड़ा हूं।
धर्मगुरु ने कहा कि यह तुम क्या कह रहे होहोश में होशराब पीए होक्या मामला है?
नसरुद्दीन ने कहा कि आप पूरी कहानी सुन लें। बीस साल पहले एक स्त्री के साथ मैंने व्यभिचार कियापाप किया। परमात्मा बहुत नाराज हो गया और उसने गुस्से में मुझे घोड़ा बना दिया--आपका घोड़ा। ऐसा मालूम होता है कि मेरा दंड पूरा हो गया है और मैं वापस आदमी हो गया हूं। मेरा नाम नसरुद्दीन है।
धर्मगुरु भी घबड़ा गया। परमात्मा की ऐसी नाराजगी कि आदमी को घोड़ा बना दिया! एकदम घुटने पर टिक गया। खुद भी परमात्मा से प्रार्थना की उसने कि क्षमा करपाप तो मैंने भी बहुत किए हैं। मगर दया कर। तेरी अनुकंपा का सहारा मांगता हूं। फिर उसने नसरुद्दीन से कहाभाईयह तो ठीक हैअब मुझे आगे जाना है। अब जो हुआहुआ। तुम अपने घर जाओ और मैं बाजार जा कर घोड़ा खरीद लूं।
वह बाजार गया तो घोड़े बेचने वाले की दूकान पर उसने अपने घोड़े को खड़ा पाया। तो और उसकी छाती घबड़ा गयी। वह पास गया घोड़े के और कान में बोलानसरुद्दीन फिर सेइतनी जल्दी?
एक दफा मन शुरू कर दे झूठतो जैसे झाड़ों में पत्ते लगते हैंऐसे फिर झूठ में और झूठ लगते जाते हैं। एक झूठ को बचाना हो तो फिर हजार झूठ बोलने पड़ते हैं। फिर झूठ इतने हो जाते हैं कि तुम भूल ही जाते हो कि वे झूठ हैं। फिर बार-बार बोलने से वे सच जैसे मालूम पड़ने लगते हैं। फिर तुम झूठ से सम्मोहित हो जाते हो।
और हजारों ऐसे झूठ हैं जो प्रचलित हैं। जिनका कोई सत्य से संबंध नहीं है। और धर्म के संबंध में सब से ज्यादा आसानी है। क्योंकि वहां कोई परीक्षण का उपाय नहींकोई प्रयोगशाला नहीं जिसमें जांच हो सकेकौन सही हैइसके निर्णय का कोई आधार नहीं। धर्म तो भरोसे पर जीता है। वहां कोई वैज्ञानिक परीक्षण तो हो नहीं सकता। इसलिए स्मरण रखनाअन्यथा पछताओगे। एक शब्द भी झूठ मत बोलना। झूठ बोलने की मन की बड़ी गहरी आदत है।
मेरे पास लोग आते हैं। कहते हैं कि हम दस साल से विपश्यना कर रहे हैंबौद्ध-ध्यान कर रहे हैं। मैं उनसे पूछता हूं कि कुछ हुआऔर उनके चेहरे पर तत्क्षण भाव आ जाता है कि कुछ नहीं हुआ। लेकिन वे कहते हैं कि हांबहुत कुछ हो रहा हैकई अनुभव हो रहे हैं। अब मैं उनका चेहरा देख रहा हूं कि कुछ भी नहीं हुआ है। कहते हैंअनुभव हो रहे हैं। फिर थोड़ी देर बात यहां-वहां की करके मैं उनसे पूछता हूं कि सच-सच कहोकुछ हुआअगर हुआ होतो फिर मुझसे बात करने की कोई जरूरत नहींआगे बढ़ो। अगर न हुआ हो तो पहले तो यह पक्का करो कि नहीं हुआ हैतब मैं आगे हाथ लूं। तो वे कहते हैं कि ऐसे अगर आप पूछते हैंतो कुछ हुआ तो नहीं है।
अब दो क्षण पहले ही यह आदमी कहता थाबहुत कुछ हो रहा है। क्योंकि यह मानने का भी मन नहीं होता कि दस साल से कुछ कर रहा हूं और कुछ भी नहीं हुआ।
मन बहुत बेईमान है। उससे सावधान रहना। और जितना तुम मन के जाल में पड़ जाओगेउतना एक दिन पछताओगे। क्योंकि जीवन चुक जाएगाऔर जब मौत सिर पर आ खड़ी होगीतब तुम पछताओगे कि क्यों व्यर्थ मैं झूठ में अपने कोगंवाता रहा?
'जो कोई गप्प हांकने वाला इसमें कुछ कहने जाता हैउसे अपनी मूर्खता का पता तब चलता हैजब उसके मुंह पर मार पड़ती है। वह आप ही जानता है और आप ही देता है।'
परमात्मा आप ही जानता हैआप ही देता है। जानना उसका हैदेना भी उसका है। हमें तो सिर्फ पात्र होना काफी है। ज्ञान उसका है। अस्तित्व उसका है। दोनों हमें मिल जाएंगे। सिर्फ हमें राजी होना जरूरी है। उन्मुख होना जरूरी है। उसकी तरफ आंखें उठाना जरूरी है। मन के जाल में पड़ने की कोई भी जरूरत नहीं। न तो मन ज्ञान दे सकता हैन अस्तित्व दे सकता है। मन तो सिर्फ झूठ दे सकता है। मन की जो सुनता हैवह झूठ में उतर जाता है। मन कुछ भी नहीं दे सकता।
तुमने शायद एक पुरानी कहानी सुनी होगी कि एक आदमी ने बड़ी भक्ति की। और देवता प्रसन्न हो गए। तो देवता ने उस आदमी को एक शंख दिया। शंख की खूबी यह थी कि जो तुम उससे मांगोमिल जाए। कहो एक महलतो तत्क्षण महल तैयार हो जाए। कहो सुस्वादु भोजनतत्क्षण थाली लग जाए। बड़ा कीमती शंख था। वह आदमी बड़ा आनंदित हुआ। वह आदमी बड़े महलों मेंबड़े सुख से रहने लगा।
फिर एक दिन एक धर्मगुरु यात्रा करते हुए उस महल में रुका। उसने भी इस शंख के बाबत बात सुनी। लालच पकड़ा। उसके पास भी एक शंख था। उस शंख का नाम महाशंख था। उसने इस आदमी को कहा कि क्या तुम शंख के पीछे पड़े हो! मैंने भी भक्ति की बहुत। मैंने महाशंख पाया। इस महाशंख की बड़ी खूबी है। तुम मांगो एक महलयह देता है दो।
उस आदमी का लोभ जागा। उसने कहा कि बताओ! उसने महाशंख निकाला। बड़ा शंख था। उस धर्मगुरु ने उसे नीचे रखा और कहा कि भाईएक महल बना दे। उसने कहाएक क्योंदो क्यों नहीं?
जंच गयी बात। उस आदमी ने अपना शंख गुरु को दे दियाधर्मगुरु को। महाशंख ले लिया। फिर बहुत खोजा उस गुरु कोउसका पता न चला। क्योंकि वह महाशंख सिर्फ बोलता था। तुम कहोदोतो वह कहेचार क्यों नहींतुम कहोचारतो वह कहेआठ क्यों नहींमगर बसइसी तरह बात चलती थी। लेने-देने का कोई काम ही न था। वह बिलकुल महाशंख था।
मन महाशंख है। जो कुछ मिलता है परमात्मा सेमन तो सिर्फ कहता हैइतना क्यों नहींऔर ज्यादा क्यों नहींमन तो बातचीत है। मन तो एक झूठ है। मन से कुछ भी नहीं घटता।
और तुम परमात्मा को छोड़ कर मन को पकड़ लिए हो। वह दोहरे की बात करता है। उससे लोभ जगता है। लेकिन कभी तुम सोचोमन ने कभी कुछ दियामन से कुछ मिला?
नानक कहते हैं, 'वह आप ही जानता और आप ही देता है। उसका वर्णन भी विरला कर सकता है। वह जिसे चाहे अपनी स्तुति का गुण प्रदान कर सकता है। नानक कहते हैंवह बादशाहों का बादशाह है।'
और एक बात आखिरीजो इस सूत्र में बहुत कीमती है।
झुन-नुन एक फकीर हुआ इजिप्त में। और जब उसे परमात्मा की प्रतीति हुईतो उसने यह उदघोष सुना। परमात्मा ने कहा कि इसके पहले कि तू मुझे खोजने निकलतामैंने तुझे पा लिया था। और अगर मैंने तुझे न पाया होतातो तू मुझे खोजने ही न निकलता।
नानक यही कह रहे हैं कि वह जिसे चाहे उसे स्तुति का गुण प्रदान कर सकता है।
सच तो यह हैतुम उसे खोजने ही तब निकलते होजब उसने तुम्हारे द्वार पर दस्तक दे दी। तुम अपने आप उसे खोजने भी कैसे निकलोगेतुम्हें उसकी खोज का बोध भी कैसे आएगातुम्हें उसका स्मरण भी कैसे भरेगाउसकी स्तुति भी कैसे पैदा होगी?
फिर कितनी ही देर लग जाए खोजने मेंअसल में उसने तुम्हें पा ही लिया है। इसलिए तुम खोजने निकले हो। वह आ ही गया है तुम्हारे जीवन मेंइसलिए तो खोज शुरू हुई है। उसकी प्यास जग गयी है। नानक कहते हैंवह भी उसी ने हीजगायी है।
नानक का मार्ग यह है--सब उसी पर छोड़ देना है। अपने हाथ में कुछ मत रखना। क्योंकि अकड़ बड़ी सूक्ष्म है। तुम यह भी कहोगे कि मैं खोजीमैं साधकमैं जिज्ञासुमैं मुमुक्षु हूं। मैं परमात्मा को खोज रहा हूं।...
यह मैं कहीं से भी निर्मित न होइसलिए नानक कहते हैंतेरी मर्जी से ही स्तुति का गुण मिलता है। हम तो तेरी महिमा भी तभी गा सकेंगे जब तू गवाए। तेरे बिना हमसे तेरी स्तुति भी न हो सकेगी। और तो बात करनी फिजूल है। हम तेरी तरफ आंख भी नहीं उठा सकेंगेअगर तू ही हमारी आंखों को सहारा न दे। हमारे पैर तेरी तरफ न जा सकेंगेअगर तू ही उन्हें उस तरफ न ले जाए। हम तेरी धारणा कातेरे विचार का भीतेरा सपना भी न देख सकेंगेअगर तूने पहले ही हमें चुन न लिया हो।
नानक इस भांति अहंकार की सारी जड़ काट देते हैं। और जहां अहंकार नहींवहां उसका द्वार खुला है। जहां अहंकार नहींवहां ओंकार का नाद अनायास शुरू हो जाता है। तुम्हारे अहंकार के शोरगुल के कारण ही वह धीमी और छोटी आवाज सुनायी नहीं पड़ती।

आज इतना ही।

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