गुरुवार, 3 अगस्त 2017

एक ओंकार सतनाम - प्रवचन-5

नानक भगता सदा विगासु—(प्रवचन—पांचवां)
पउड़ी: 8

सुणिऐ सिध पीर सुरि नाथ। सुणिऐ धरति धवल आकास।।
सुणिऐ दीप लोअ पाताल। सुणिऐ पोहि न सकै कालु।।
'नानकभगता सदा विगासु। सुणिऐ दुख पाप का नासु।।


पउड़ी: 9

सुणिऐ ईसर बरमा इंदु। सुणिऐ मुख सालाहणु मंदु।।
सुणिऐ जोग जुगति तनि भेद। सुणिऐ सासत सिमृति वेद।।
'नानकभगता सदा विगासु। सुणिऐ दुख पाप का नासु।।


पउड़ी: 10

सुणिऐ सतु संतोखु गिआनु। सुणिऐ अठसठि का इस्नानु।।
सुणिऐ पड़ि पड़ि पावहि मानु। सुणिऐ लागै सहज धिआनु।।
'नानकभगता सदा विगासु। सुणिऐ दुख पाप का नासु।।

पउड़ी: 11

सुणिऐ सरा गुणा के गाह। सुणिऐ सेख पीर पातिसाह।।
सुणिऐ अंधे पावहि राहु। सुणिऐ हाथ होवै असगाहु।।
'नानकभगता सदा विगासु। सुणिऐ दुख पाप का नासु।।


हावीर ने चार घाट कहे हैंजिनसे उस पार जाया जा सकता है। दो घाट तो समझ में आते हैं--साधु कासाध्वी का;शेष दो घाट थोड़े कठिन मालूम होते हैं--श्रावक का और श्राविका का। श्रावक का अर्थ हैजो श्रवण में समर्थ हैजो सुनने की कला सीख गयाजिसने जान लिया कि सुनना कैसेजिसने पहचान लिया कि सुनना क्या है।
महावीर ने कहा है कि कुछ तो साधना कर-करके उस पार पहुंचते हैंकुछ केवल सुन कर उस पार पहुंच जाते हैं। जो सुनने में समर्थ नहीं हैउसे ही साधना की जरूरत पड़ती है। अगर तुम सुन ही लो पूरी तरह तो कुछ करने को बाकी नहीं रह जातासुनने से ही पार हो जाओगे।
इसी श्रवण की महिमा को बताने वाले नानक के ये सूत्र हैं। ऊपर से देखने पर अतिशयोक्तिपूर्ण मालूम पड़ेंगे कि क्या सुनने से सब कुछ हो जाएगाऔर हम तो सुनते रहे हैं--जन्मों-जन्मों से और कुछ भी नहीं हुआ! हमारा अनुभव तो यही कहता है कि सुन लो--कितना ही सुन लो--कुछ भी नहीं होताहम वैसे ही बने रहते हैं। हमारे चिकने घड़े पर शब्द का कोई असर ही नहीं पड़तागिरता हैढलक जाता हैहम अछूते जैसे थेवैसे ही रह जाते हैं। अगर हमारा अनुभव सही है तो नानक सरासर अतिशय करते हुए मालूम पड़ेंगे। लेकिन हमारा अनुभव सही नहीं हैक्योंकि हमने कभी सुना ही नहीं है। न सुनने की हमारी तरकीबें हैंपहले उन्हें समझ लें।
पहली तरकीब तो यह है कि जो हम सुनना चाहते हैंवही हम सुनते हैंजो कहा जाता हैवह नहीं। हम बड़े होशियार हैं। हम वही सुनते हैं जो हमें बदले न। जो हमें बदलता हैउसे हम सुनते ही नहींहम उसके प्रति बहरे होते हैं। और यह कोई संतों का ही कथन होऐसा नहीं हैजिन लोगों ने वैज्ञानिक ढंग से मनुष्य की इंद्रियों पर शोध की हैवे भी कहते हैं कि हमअट्ठान्नबे प्रतिशत सूचनाओं को भीतर लेते ही नहींसिर्फ दो प्रतिशत को लेते हैं। हम वही देखते हैंवही सुनते हैंवही समझते हैंजो हमसे तालमेल खाता हैजो हमसे तालमेल नहीं खाता वह हम तक पहुंचता ही नहीं। बीच में बहुत सी हमने रुकावटें खड़ी कर रखी हैं।
और जो तुमसे तालमेल खाता हैवह तुम्हें कैसे बदलेगावह तो तुम जैसे होउसे और मजबूत करेगा। जिससे तुम्हारी बुद्धि राजी होती हैकनविन्स होती हैवह तुम्हें कैसे रूपांतरित करेगावह तो तुम्हें और आधार दे देगा जमीन मेंऔर मजबूत पत्थर दे देगाजिन पर तुम बुनियाद उठा कर खड़े हो जाओगे।
हिंदू वही सुनता है जिससे हिंदू-मन मजबूत हो। मुसलमान वही सुनता है जिससे मुसलमान-मन मजबूत हो। सिक्ख वही सुनता है जिससे सिक्ख की धारणा मजबूत हो। तुम अपने को मजबूत करने के लिए सुन रहे होतुम अपनी धारणाओं में और भी गहरे उतर जाने के लिए सुन रहे होतुम अपने मकान को और मजबूत कर लेने के लिए सुन रहे होतब तुम सुनने से वंचित रह जाओगे। क्योंकि सत्य का न तो सिक्ख से कोई संबंध हैन हिंदू सेन मुसलमान से। तुम्हारी कंडीशनिंगतुम्हारे चित्त का जो संस्कार हैउससे सत्य का कोई भी संबंध नहीं है।
जब तुम अपनी सब धारणाओं को हटा कर सुनोगेतभी तुम समझ पाओगे कि नानक का अर्थ क्या है! और अपनी धारणाओं को हटाने से कठिन काम जगत में दूसरा नहीं हैक्योंकि वे बहुत बारीक हैंमहीन हैंपारदर्शी हैं। वे दिखाई भी नहींपड़तींकांच की दीवाल है। जब तक तुम टकरा ही न जाओतब तक पता ही नहीं चलता कि दीवाल हैतब तक लगता है कि खुला आकाश तो दिखाई पड़ रहा हैचांदत्तारे दिखाई पड़ रहे हैंलेकिन बीच में एक कांच की दीवाल है।
जब मैं बोल रहा हूंतो कभी तुम भीतर कहते होहां ठीक--जब तुमसे मेल खाता हैकभी तुम भीतर कहते होयह बातजंचती नहीं--जब तुमसे मेल नहीं खाता। तो तुममैं जो कह रहा हूंउसे नहीं सुन रहे होजो तुमसे मेल खाता हैजो तुम्हें और सजाता-संवारता हैशक्तिशाली करता हैवही तुम सुन रहे हो। शेष को तुम छोड़ ही दोगे। शेष को तुम भूल ही जाओगे। अगर कोई बात तुमने सुन भी लीजो तुम्हारे विपरीत पड़ती हैतो तुम उसे भीतर खंडित करोगेतर्क जुटाओगेहजार उपाय करोगे कि यह ठीक नहीं हो सकता। क्योंकि एक बात तो तुम मान कर बैठे हो कि तुम ठीक हो। तो जो तुमसे मेल खाएवही सच;जो तुमसे मेल न खाएवह झूठ।
अगर तुम सत्य को ही पा गए होतो फिर सुनने की कोई जरूरत ही नहीं है। वह भी तुमने पाया नहीं हैसुनने की जरूरत भी कायम हैसत्य को खोजना भी हैऔर इस धारणा से खोजना है कि सत्य मुझे मिला ही हुआ है! तुम कैसे खोज सकोगे?
सत्य के पास तो नग्नशून्यखाली हो कर जाना पड़ेगा। सत्य के पास तो तुम्हें अपनी सारी धारणाओं को छोड़ देना पड़ेगा। तुम्हारे सारे विश्वासतुम्हारे सिद्धांततुम्हारे शास्त्र अगर बीच में रहे तो तुम कभी भी न सुन पाओगे। और जो तुमसुनोगे और समझोगे कि मैंने सुना हैवह तुम्हारी अपनी ही प्रतिध्वनि होगी। वह नहीं जो कहा गया थावह जो तुम्हारे भीतर प्रतिध्वनित हुआ। तुम अपने ही मन की कोठरी को प्रतिध्वनित होते हुए सुनते रहोगे। तब तुम्हें नानक के वचन बड़े अतिशयोक्तिपूर्ण मालूम पड़ेंगे।
दूसरा ढंग बचने का है कि लोग अक्सरजब भी कोई महत्वपूर्ण बात कही जाएतंद्रा में हो जाते हैं। वह भी मन का बचाव है। वह भी बड़ी गहरी प्रक्रिया है। जब भी कोई चीज तुम्हें छूने के करीब होतब तुम सो जाओगे।
मैं एक बड़े पंडित के घर मेहमान था। वे बड़े विद्वान हैंशास्त्रों के ज्ञाता हैं और रामायणी तो उन जैसा दूसरा नहीं। लाखों लोग उन्हें सुनते हैं। रात जब हम दोनों सोने गए तो एक ही कमरे में बिस्तर थेप्रकाश बुझा कर हम अपने बिस्तरों पर लेट गए। तभी मैंने सुना कि उनकी पत्नी अंदर आयी और उनके कान में कुछ फुसफुसा कर बोली। वह मुझे सुनाई पड़ गया। पत्नी ने कहाऐ जीसुनो! मुन्ना सो नहीं रहा हैचल कर उसे कुछ कह दो। तो पंडित जी ने कहा कि मेरे चल कर कहने से क्या होगा! पत्नी ने कहा कि मैंने लाखों लोगों को तुम जब बोलते हो--तुमने बोलना शुरू किया नहीं कि उन्होंने सोना शुरू किया नहीं--लाखों लोगों को तुम्हारी सभा में सोते देखा हैतो यह एक अकेले मुन्ने का क्या बस है! चल कर दो शब्द इससे कह दो,तो सो जाए।
धर्म सभा में लोग नींद पूरी करने के लिए ही जाते हैं। जिनको रात में नींद नहीं आतीउनको भी धर्म सभा में नींद आ जाती है। क्या होता हैतुम्हारे मन का कोई खेल हैतरकीब है। तुम जो नहीं सुनना चाहतेउसके प्रति तुम नींद में अपने कोढांक लेते होअपने को बचा लेते हो। नींद तुम्हारा रक्षा-कवच है। तो तुम ऐसे लगते हो कि सुन रहे होलेकिन तुम सजग नहीं होते। और बिना सजगता के कैसे सुना जा सकेगा।
तुम बोलते वक्त सजग होते होसुनते वक्त सजग नहीं होते। और ऐसा कोई धर्म सभा में ही होता होऐसा नहीं हैजब भी कोई दूसरा तुमसे बोलता हैतभी तुम सजग नहीं होतेक्योंकि एक इंटरनल डायलाग हैएक भीतर चलने वाला वार्तालाप है,जिसमें तुम दबे हो। दूसरा बोले जाता है। तुम ऐसा भाव भी प्रकट करते हो कि मैं सुन रहा हूंलेकिन वह भाव-भंगिमा हैभीतर तुम बोले जा रहे हो। और जब तुम भीतर बोल रहे हो तो तुम किसको सुनोगेतुमभीतर जो बोल रहा हैउसको ही सुनोगे। क्योंकि बाहर के बोलने वाले की आवाज तो तुम्हारे तक पहुंच ही न पाएगी। तुम्हारी अपनी आवाज की गूंज काफी है। और इसलिए तो तुम्हें नींद मालूम होने लगती है। क्योंकि तुम अपने से ऊबे हुए हो।
जब तुम बोलते होतब तुम थोड़े सजग होते हो। लेकिन जब तुम सुनते होतब तुम मूर्च्छित होने लगते होक्योंकि तुम अपने से ऊबे हुए हो। यह बात तो तुम कई दफे भीतर कर चुके हो जो आज फिर कर रहे हो। यह तो पुनरुक्ति है। उससे ऊब पैदा होती है। उससे नींद मालूम होने लगती है। वह भी बचाव है। और वह इस बात की खबर है कि भीतर एक वार्तालाप चल रहा है।
भीतर का वार्तालाप जो तोड़ देगावही सुनने में समर्थ होता है। श्रवण की कला तब उपलब्ध होती हैजब भीतर का वार्तालाप बंद हो जाता है। और एक क्षण को भी भीतर का वार्तालाप बंद हो जाए तो तुम पाओगे आकाश खुल गयाअनंत आकाश खुल गया। और सब जो अनजाना थाजाना हो गया। जिसकी थाह न थीउसकी थाह मिल गयी। जो अपरिचित था,उससे परिचय बना। जिससे कोई पहचान न थी--जो अजनबी था--वह अपना हुआ। अचानक!
यह जगत तुम्हारा घर है। अगर एक क्षण को भी तुम्हारा भीतर का वार्तालाप टूट जाए...सारे सत्संगों कासारे गुरुओं का एक ही लक्ष्य है कि किस भांति तुम्हारे भीतर का वार्तालाप तोड़ा जाए। वे उसे ध्यान कहेंमौन कहेंयोग कहेंनाम स्मरण कहेंइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सारी चेष्टा यह है कि भीतर तुम्हारी जो एक सतत धारा चल रही है शब्दों कीउसको छिन्न-भिन्न कैसे करना! उसमें बीच में खुली जगह कैसे आ जाए! थोड़ी भी देर को खुली जगह आ जाए तो तुम समझ पाओगे कि नानक क्या कह रहे हैं।
नानक कहते हैं, 'श्रवण से ही सिद्धपीरदेवता और इंद्र होते हैं। श्रवण से ही धरती और आकाश स्थित है। श्रवण से ही द्वीपलोकपाताल चल रहे हैं। श्रवण से ही मृत्यु स्पर्श नहीं करती। नानक कहते हैंश्रवण से ही भक्त सदा आनंदित होते हैं और श्रवण से ही दुख तथा पाप का नाश होता है।'
सुणिऐ सिध पीर सुरि नाथ। सुणिऐ धरति धवल आकास।।
सुणिऐ दीप लोअ पाताल। सुणिऐ पोहि न सकै कालु।।
नानक भगता सदा विगासु। सुणिऐ दुख पाप का नासु।।
भरोसा नहीं आता कि सुनने से ही कोई सिद्धपीरदेवता और इंद्र हो जाता है! और सुनने से ही धरती और आकाश चल रहे हैं! और सुनने से ही द्वीपलोकपाताल खड़े हैं! सुनने से ही मृत्यु स्पर्श नहीं करती! अतिशयोक्ति मालूम पड़ती है।
जरा भी अतिशयोक्ति नहीं है। क्योंकि जैसे ही तुम्हें सुनने की कला आयीतुम्हें जीवन से परिचित होने की कला आ गयी। और जैसे ही तुम्हें अस्तित्व का बोध होना शुरू हुआतुम पाओगे कि जैसा सन्नाटा तुम्हारे भीतर है सुनने के क्षण में,श्रवण के क्षण में जैसी शून्यता तुम्हारे भीतर हैवही शून्यता तो सारे अस्तित्व का आधार है। उससे ही आकाश टिका हैउससे ही पाताल टिका है। उसी शून्य परउसी मौन में तो सारा जगत परिभ्रमण कर रहा है। उसी मौन में बीज टूटता है और वृक्ष बनता है। उसी मौन में सूरज उगता है। उसी मौन में चांदत्तारे बनते हैं और बिखरते हैं। जब तुम अपने भीतर शब्दों को शून्य कर देते होतब तुम उस जगह पहुंच गए जहां से सृष्टि पैदा होती है और जहां सृष्टि लीन होती है।
ऐसा हुआ कि एक मुसलमान फकीर नानक के पास आया और उसने कहा कि मैंने सुना है कि तुम चाहो तो क्षण में मुझे राख कर दो और तुम चाहो तो क्षण में मुझे बना दो। यह चमत्कार हैमुझे भरोसा नहीं आता। पर आदमी ईमानदार थामुमुक्षु थाऐसे ही कुतूहल से नहीं आ गया था। साधक थाजो पूछा थाबड़ी अभीप्सा से पूछा था।
नानक ने कहा तो फिर आंख बंद कर लो और शांत हो कर बैठ जाओतो जो तुम चाहते होवह मैं करके ही दिखा दूं। वह फकीर आंख बंद करके शांत हो कर बैठ गया।
अगर मुमुक्षु न होता तो भयभीत हो जाता। क्योंकि जो पूछा थाखतरनाक पूछा था कि राख कर दोमिटा दोफिर बना दो। प्रलय और सृष्टि तुम्हारे हाथ में हैऐसा मैंने सुना है।
सुबह का वक्त--ऐसी ही सुबह रही होगी। एक गांव के बाहर एक वृक्ष के नीचेएक कुएं के पास नानक बैठे थे। उनके भक्त मरदाना और बाला मौजूद थे। वे भी थोड़े हैरान हुए कि ऐसा तो नानक ने कभी किसी से कहा नहीं! और अब क्या होगा! वे भी सजग हो गए। उस क्षण जैसे आस-पास वृक्ष भी सजग हो गए होंगे। पत्थर भी सजग हो गए होंगे। क्योंकि नानक ने कहाबैठ जाओआंख बंद करोशांत हो जाओ। जैसे ही तुम शांत हो जाओगेमैं चमत्कार दिखा दूंगा।
वह फकीर शांत हो कर बैठ गया। बड़ी आस्था का आदमी रहा होगा। वह भीतर बिलकुल शून्य हो गया। नानक ने उसके सिर पर हाथ रखा और ओंकार की ध्वनि की। और कहानी कहती है कि वह आदमी राख हो गया। फिर नानक ने ओंकार की ध्वनि की। और कहानी कहती हैवह आदमी फिर निर्मित हो गया।
अगर कहानी को ऊपर से पकड़ोगे तो चूक जाओगे। लेकिन भीतर यह घटना घटी। जब वह सब भांति शांत हो गया और नानक ने ओंकार की ध्वनि कीश्रवण को उपलब्ध हुआभीतर का वार्तालाप टूट गया। सिर्फ ओंकार की ध्वनि गूंजी। उस ध्वनि के गूंजने के बाद प्रलय की स्थिति भीतर अपने आप हो जाती है। सब खो गया--सब संसारसब सीमाएं--राख हो गयाना-कुछ हो गया। भीतर कोई भी न बचाखोजे से भी कोई न मिला। कोई था ही नहींघर सूना था। फिर नानक ने ओंकार की ध्वनि की। वह आदमी वापस लौटा। उसने आंखें खोलीं। उसने चरणों मेंपैरों में सिर रखा और कहा कि मैं तो सोचता थायह असंभव है। लेकिन यह करके दिखा दिया!
कहानी को मानने वाले इसे न समझ पाएंगे। वे तो समझते हैं कि वह आदमी राख हो गयाफिर राख से नानक ने उसको बना दिया। ये सब नासमझी की बातें हैं। तब तुम समझे नहींचूक गए। पर भीतर प्रलय और सृष्टि की घटना घटती है।
लेकिन वह फकीर सुनने में समर्थ था। जब कोई सुनने में समर्थ होता है तो तुम मुझे ही थोड़े सुनोगे! सुनने की कला आ गयी। मैं तो बहाना हूंगुरु तो बहाना है। सुनने की कला आ गयी तो जब वृक्षों में हवाएं बहेंगीतब भी तुम सुनोगे। और उस सन्नाटे में तुम्हें ओंकार का नाद सुनाई पड़ेगाजीवन का जो मूल स्वर हैवह सुनाई पड़ेगा। पर्वत से पानी का झरना गिरेगा,उसके नाद को तुम सुनोगे। उस नाद में तुम पाओगे कि सभी शून्य में टिका है। नदियां उसी में बहती हैंसागर उसी में लीन होते। तुम आंख बंद कर दोगे तो तुम अपनी ही हृदय की धड़कन सुनोगेखून की गति की धीमी-धीमी आवाज सुनोगे। और तुम पाओगेयह मैं नहीं हूंमैं तो सुनने वाला हूंमैं तो साक्षी हूं। फिर तुम्हें मृत्यु स्पर्श न कर पाएगी। जिसे सुनने की कला आ गयीउसे कुछ भी जानने को बाकी न रहा।
इसलिए नानक कहते हैं, 'श्रवण से ही सिद्धपीरदेवता और इंद्र होते हैं। श्रवण से धरती और आकाश स्थित हैं। श्रवण से ही द्वीपलोकपाताल चल रहे हैं।'
सारा अस्तित्व श्रवण से हो रहा है। श्रवण का अर्थ हुआसारा अस्तित्व शून्य से हो रहा है। और जब तुम श्रवण में होते होतब शून्य की छाप तुम पर आती हैतब शून्य तुम में गूंजता है। वही गूंज अस्तित्व की मौलिक गूंज है। वही ध्वनि अस्तित्व की मूल इकाई है।
'श्रवण से ही मृत्यु स्पर्श नहीं करती।'
और एक बार तुमने सुनना जान लियाफिर कैसी मृत्यु! क्योंकि सुनने वाले को साक्षी का बोध हो जाता है। अभी तुम सोच-सोच कर सुनते हो। सोचने वाला तो मरेगा। सोचने वाला तो मरणधर्मा है। जिस दिन तुम बिना सोचे सुनोगेसिर्फ सुनोगे,उस दिन तो विटनेससाक्षी हो जाओगे। इधर मैं बोलूंगाउधर तुम्हारा मस्तिष्क सुनेगाऔर एक तीसरा भी तुम्हारे भीतर होगा,जो देखेगा कि सुना जा रहा है। उस दिन एक नए तत्व का तुम्हारे भीतर आविर्भाव होगा। एक नई प्रक्रिया संगठित होगी। एक नया क्रिस्टलाइजेशन होगा। वह है साक्षी का। साक्षी की कोई मृत्यु नहीं है।
इसलिए नानक कहते हैं, 'श्रवण से ही मृत्यु स्पर्श नहीं करती। नानक कहते हैंश्रवण से ही भक्त सदा आनंदित होते हैं और श्रवण से ही दुख तथा पाप का नाश होता है।'
कैसे चुप हो जाओ और कैसे तुम्हारे भीतर का चलने वाला सतत वार्तालाप टूटेकैसे क्षण भर को बादल छटें और खुला आकाश दिखायी पड़ेकैसे सिलसिला भीतर मिटे--यही सारी प्रक्रिया है।
यहां तुम बैठे हो। मैं बोल रहा हूं। साथ ही साथ तुम्हें बोलने की कोई भी तो जरूरत नहीं है। तुम चुप हो सकते हो। बस पुरानी आदत हैवह भीतर बोले चली जा रही है। आदत की वजह से!
एक छोटे से बच्चे से मैं पूछ रहा था कि तेरी छोटी बहन बोलने लगी या नहीं! उसने कहाबोलने तो लगीकब का सीख गई बोलना! अब सब उसको मौन होना सिखा रहे हैं। अब वह चुप ही नहीं होतीबोलती ही रहती है। पहले बिलकुल चुप थी तो हम सबने मिल कर बोलना सिखाया और अब सब मिल कर चुप होना सिखा रहे हैंजो कि ज्यादा कठिन काम मालूम होता है।
तुम बिन बोले आएक्या तुम्हारा दिल बोलते-बोलते जाने का हैतब तुम जीवन से भी वंचित हो जाओगे और मृत्यु का भी परम स्पर्शपरम आनंद तुम्हें न हो सकेगा। तुम चुप आएचुप ही जाने की तैयारी करो। बोलना बीच में हैसंसार के लिए हैउपयोगी है। जब तुम दूसरे से बात कर रहे होतब बोलने का उपयोग है। जब तुम चुप बैठे होतब बोलना पागलपन है। बोलना एक प्रक्रिया हैजिससे हम दूसरे से संबंधित होते हैं। चुप होना दूसरी प्रक्रिया हैजिससे हम अपने से ही संबंधित होते हैं। चुप रहोगे तो दूसरे से संबंधित होना मुश्किल हैबोलोगे तो अपने से संबंधित होना मुश्किल है। बोलना तो एक सेतु है,जिसके माध्यम से हम दूसरे तक पहुंचते हैं। चुप होना एक सेतु हैजिससे हम अपने तक पहुंचते हैं। कहीं तुम साधन की भूल कर रहे हो।
अगर कोई आदमी चुपचाप बैठा रहेकिसी से बोले ही नतो उसका कोई संबंध निर्मित न होगा। धीरे-धीरे लोग उसे भूल जाएंगे। इसलिए गूंगे से दीन आदमी दूसरा नहीं दिखाई पड़ताअंधा भी उतना दीन नहीं मालूम पड़ता जितना गूंगा दीन मालूम पड़ता है। तुम कभी गौर करो। गूंगे पर सबसे ज्यादा दया आएगी। क्योंकि अंधा देख नहीं पातायह सच हैलेकिन फिर भी संबंध तो बना लेता है। पति हो सकता हैपत्नी बन सकता हैबेटे से बोल सकता हैमित्र बना सकता हैसमाज का हिस्सा हो सकता है। गूंगा अपने में बंद! कहीं जाने का कोई उपाय नहींकिसी से संबंध होने के लिए कोई रास्ता नहीं खुलता। गूंगा जैसे किसी से संबंधित न हो पाएगा। और उसकी तुम अड़चन समझो। बाहर जाना चाहता हैनहीं जा सकता। उसके इशारे गौर से देखो। कितनी तड़प से इशारे करता है और जब तुम नहीं समझते हो तो कैसा बेहाल हो जाता है! कैसा हेल्पलेसकैसा असहाय अपने को पाता है! गूंगे से ज्यादा दयनीय कोई भी नहींक्योंकि गूंगा समाज का हिस्सा नहीं हो पाता। मित्र नहीं बना सकता। किसी से बोल नहीं सकता। किसी से अपने प्रेम की चर्चा नहीं कर सकता। किसी से अपने हृदय की बात नहीं कह सकता। किसी से अपना दुख नहीं कह सकता कि थोड़ा हल्का हो जाए।
जैसे गूंगा असमर्थ हो जाता है दूसरे से संबंध बनाने मेंवैसे ही तुम असमर्थ हो गए हो अपने से संबंध बनाने में। क्योंकि वहां तुम बोले जा रहे हो। वहां गूंगे होने की जरूरत है। वहां बिलकुल चुप हो जाने की जरूरत हैक्योंकि दूसरा वहां है ही नहीं। वार्तालाप किससे कर रहे होकिससे बोल रहे हो भीतरखुद ही जवाब दे रहे होखुद ही प्रश्न उठा रहे हो--यही तो विक्षिप्तता का लक्षण है। पागल में और तुममें फर्क क्या हैपागल जोर-जोर से खुद से बात करता हैतुम धीरे-धीरे करते होबस इतना ही फर्क है। किसी दिन तुम भी जोर-जोर से करने लगोगे। तब तुम भी पागल हो जाओगे। अभी तुम पागलपन को जैसे दबा-दबा कर बैठे होवह कभी भी फूट सकता है। वह नासूर हैउससे मवाद कभी भी बह सकती है।
भीतर की वार्ता क्यों चल रही हैक्या कारण हैआदत! पूरे जीवन तुम्हें सिर्फ बोलना सिखाया गया है। बच्चा घर में पैदा होता है तो जो पहली बात हम सिखाने की कोशिश करते हैंवह यह कि किसी तरह बोले। और जो बच्चा जितनी जल्दी बोलता हैवह उतना उपयोगी सिद्ध होता है समाज में। उसको लोग प्रतिभाशाली कहते हैंवह जितनी जल्दी बोलता है। जितनी देर से बोलता हैउतना प्रतिभाहीन कहते हैं। बोलने की कला सामाजिक कला है। मनुष्य समाज का हिस्सा है। इसलिए हम पहली चिंता यह करते हैं कि बच्चा बोले। और जब बच्चा बोलता है तो मां-बाप कितने प्रसन्न होते हैं!
फिर जीवन की जितनी भी जरूरतें हैंसब बोलने से पूरी होती हैं। भूख लगी तो बोलोप्यास लगी तो बोलोकहो। जीवन की रक्षा है बोलने में। मौन का फायदा ही क्या है! इस जिंदगी में कोई फायदा नहीं दिखाई पड़ता। मौन इस संसार में कोई भी तो अर्थ नहीं रखता। मौन से तुम क्या खरीदोगेमौन से क्या बाजार से लाओगेमौन से कौन सी जरूरत पूरी होगीबोलने से शरीर की सब जरूरतें पूरी होती हैं। और इसलिए बोलने के हम अभ्यस्त होते जाते हैं। फिर तो हम रात भी बोलते हैंनींद में भी बोलते हैं। फिर हम चौबीस घंटे बोलते ही रहते हैं। फिर बोलना हमारे भीतर आटोनामसयंत्रवत हो जाता है।
हम बोलते ही रहते हैं। रिहर्सल करते हैं। किसी से बोलने के पहले भीतर बोलते हैं कि क्या कहेंगे। बोलने के बाद फिर दुहराते हैं कि क्या कहा। फिर धीरे-धीरे हम यह भूल ही जाते हैं कि इस बोलने के द्वारा हम कुछ खो रहे हैं। बाहर तो लाभ हो रहा हैभीतर विनाश हो रहा है। संसार में तो गति हो रही हैअपने से संबंध टूट रहे हैं। दूसरों से तो जुड़ रहे हैंअपने से दूर जा रहे हैं। दूसरों के तो पास आ रहे हैंखुद की निकटता खोती जा रही है। फिर जितने तुम कुशल हो जाओगे इसमेंउतना ही मौन कठिन हो जाएगा। आदत! और आदत को कोई एक क्षण में नहीं तोड़ सकता।
तुम समझ भी लोतुम्हें बिलकुल समझ में भी आ जाए कि बात सही हैखुद से बोलने की क्या जरूरत हैजब कोई चलता है तो पैर चलाता हैबैठे-बैठे तो पैर चलाने की कोई जरूरत नहीं। क्योंकि कहीं और जाना हो तो पैर चलाने पड़ते हैंजब कहीं जाना ही नहीं होबैठे होतब पैर क्यों चलाना! जब भूख लगती है तब कोई खाना खाता हैजब भूख न लगी हो तब कोई खाना खाता रहे तो विक्षिप्त हो जाएगा। जब नींद आती हो तब सो जाना पड़ता है। जब नींद न आती हो तब सोने की चेष्टा करनी व्यर्थ परेशान होना है। लेकिन यह तुम बोलने के संबंध में कभी नहीं सोचते कि जब जरूरत हो तब हम इसका उपयोग करेंगेजब जरूरत न होगी तब बंद कर देंगे।
ऐसा लगता है कि तुम भूल ही गए हो कि बोलने की प्रक्रिया रोकी और जारी की जा सकती है। बिलकुल की जा सकती है। अन्यथा सारे धर्म असंभव हैं। धर्म संभव होते हैं मौन से। इसीलिए श्रवण की इतनी तारीफ कर रहे हैं नानक। इधर श्रवण की तारीफ गौर से समझो तो मौन की तारीफ है। वह महिमा मौन की है कि तुम चुप हो जाओताकि तुम सुन सको कि क्या कहा जा रहा है। तुम अपने में ही डूबे बैठे होतुम अपनी ही चलाए जा रहे होतुम अपनी ही बोले जा रहे हो--यह समझ में आ जाए तो भी तुम इसी क्षण रोक नहीं सकते। क्योंकि आदतें समय लेती हैं जाने में। और आदतों को तोड़ना हो तो विपरीत आदत बनाने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है।
तो मौन का अभ्यास करना पड़ेगा। साधुओं के सत्संग में रहने का एक ही तो अर्थ है कि तुम मौन का अभ्यास करो। गुरु के पास जाने का एक ही तो प्रयोजन है कि वहां तुम्हें बोलने को क्या हैसिर्फ सुनने को हैतुम सुनोगेचुप बैठोगे। गुरु के पास तुम वार्तालाप करने थोड़े ही जाते हो।
एक मित्र कुछ दिन पहले आए। उन्होंने कहाआपसे कुछ चर्चा करनी है। मैंने कहाचर्चा करनी है तो आप करेंमैंसुनूंगालेकिन फिर मैं नहीं बोलूंगा। उन्होंने कहा कि नहींविचार का लेन-देन। मैंने कहाआपके पास विचार हों तो मुझे कुछ लेना नहींकुछ देना नहीं। निर्विचार हों तो मैं कुछ दे सकता हूं। और आपके पास कुछ देने को हो तो मैं लेने को राजी हूं।
कुछ भी देने को नहीं हैलेकिन विचार का लेन-देन करना है! लोग कहते हैंऐक्सचेंज आफ थाट्स--तुम्हारा पागलपन तुम मुझे दोमेरा पागलपन मैं तुम्हें दूं। वैसे ही दोनों काफी पागल थे और लेन-देन की कोई जरूरत न थी।
गुरु के पास हम वार्तालाप के लिए नहीं आतेचुप होने आते हैं। और जब हम चुप हो जाते हैंतभी वह बोल सकता है;जब हम चुप हो जाते हैंतभी हम सुन सकते हैं। श्रवण की महिमा को तुम मौन की महिमा समझनाक्योंकि श्रवण संभव ही तभी होगा जब तुम चुप हो। और तुम्हारे चुप होने के लिए तुम्हें थोड़े अभ्यास करने पड़ेंगे।
क्या करोगे चुप होने के लिएकुछ और ज्यादा करना नहीं। कभी दिन में चौबीस घंटे में जब सुविधा होघड़ी भर के लिए शांत हो कर बैठ जाओ। भीतर का वार्तालाप चलेगा। तुम उसमें सहयोगी मत बनो। यह सूत्र है। चल रही है चर्चा भीतर,तुम सुनोजैसे कोई दो आदमी बात कर रहे हैंलेकिन तुम दूर रहो। तुम उसमें बीच में मत पड़ जाओ। तुम उलझो मत! तुम सुनते रहो कि मन का यह कोना मन के दूसरे कोने से बोल रहा हैमैं सुन रहा हूं। जो आए आने दो। न तुम दबाओन तुमहटाओन तुम रोकने की कोशिश करोतुम सिर्फ साक्षी रहो।
बहुत कुछ कचरा निकलेगाक्योंकि बहुत कुछ तुम दबाए बैठे हो। और मन को कभी खुली छूट नहीं मिली हैफुर्सत नहीं मिली है। जब फुर्सत दोगे तो मन घोड़े की जैसे लगाम टूट गई होऐसा भागेगा। भागने दो। तुम बैठे देखते रहो। बस उस देखने में ही धीरज है। क्योंकि तुम्हारी तबीयत होगीघोड़े पर सवार हो जाओतुम्हारी तबीयत होगीलगाम पकड़ लोतुम्हारी तबीयत होगीघोड़े को बाएं चलाओ कि दाएं चलाओ! पुरानी आदत! उसे तोड़ने के लिए तुम्हें थोड़ा सा धैर्य रखना पड़ेगा--कि घोड़े को जाने दोमन जहां जाए जाने दोमैं सिर्फ देखूंगा। मैं कोई नियंत्रण न करूंगा। एक शब्द दूसरे शब्द को लाएगाक्योंकि सब चीजें जुड़ी हैं। एक शब्द उठेगाहजार शब्द उठेंगेक्योंकि कोई भी चीजें असंबंधित नहीं हैं।
फ्रायड ने इस प्रक्रिया का बड़ा उपयोग किया। यह योग की बड़ी पुरानी प्रक्रिया है। फ्रायड को तो शायद पता भी नहीं था,लेकिन उसने पूरे मनोविश्लेषण को इसी के ऊपर आधारित किया। फ्री एसोसिएशन आफ थाट--सब चीजें जुड़ी हैं। एक विचार आता हैउसके कुंदे में फंसा हुआ दूसरा आता हैउसके कुंदे में फंसा तीसरा आता है--एक शृंखला बन जाती है।
एक ट्रेन में मैं सफर कर रहा था। बड़ी भीड़ थी। और टिकिट चेकर आया और एक बूढ़ा आदमी ठीक मेरी सीट के नीचे छिपा हुआ था। उसने उससे पूछाऐ बूढ़ेटिकिट दिखा! वह बूढ़ा वहीं गिड़गिड़ाने लगाहाथ जोड़ने लगाऔर कहाक्षमा कर दें,इस बार बस माफ कर दें। न तो टिकिट है पास और न एक पाई है जेब में। लड़की की शादी करनी हैउसी सिलसिले में गांव जा रहा हूं। बड़ी कृपा होगी! दया आ गई उस टिकिट चेकर कोवह आगे बढ़ गया। लेकिन दूसरी सीट के नीचे एक जवान आदमी भी छिपा हुआ था। उसने सिर्फ मजाक में उससे कहाक्यों भाईतुमको भी अपनी बेटी की शादी करनी है क्याटिकिटकहां हैउस आदमी ने कहाहजूरटिकिट तो नहीं है। और बेटी की शादी नहीं करने जा रहा हूं। मैं उस बूढ़े का होने वाला जंवाई हूं।
ऐसे ही चीजें जुड़ी हैं--कोई जंवाई हैकोई ससुर हैदोनों छिपे हैं। उनको थोड़ा बाहर लाने की जरूरत है। तुम्हारे भीतर सारी शृंखला बंधी है। तुम खुद ही हैरान होओगेचकित होओगे कि कैसे-कैसे विचार से कैसे-कैसे विचारों का संबंध जुड़ा हैवे कहां से चले आते हैं! तुम भयभीत भी होओगेक्योंकि लगेगा कहीं मैं पागल तो नहीं हो रहा हूं!
मगर यह बड़ा अदभुत प्रयोग है। तुम जो भी हो रहा है होने दो। अगर सुविधा हो तो और भी अच्छा होगा कि तुम जोर से बोलोताकि तुम सुन भी सको। क्योंकि मन में तो महीन होती हैं बातेंहो सकता हैतुम सचेतन न रह सको। तुम्हारे भीतर जो चल रहा हैउसे तुम जोर से बोलो! सुनो भी और भीतर सजगता भी रखो कि मैं दूर रहूंगाजो भी हो रहा हैउसे बोल दूंगा निष्पक्षतटस्थ भाव से। गाली आएगी तो गालीअपशब्द आएगा तो अपशब्दराम का नाम आएगा तो राम का नामओंकार आएगा तो ओंकार--जो भी आएगामैं बोल दूंगा और सुनता रहूंगा।
अगर तुम तीन महीने सतत एक घंटा रोज इस साहचर्य से गुजर जाओतो तुम धीरे-धीरे तीन महीने के बाद अनुभव करना शुरू करोगे कि अब विचार कम आ रहे हैं। क्योंकि तुम्हारा पुराना जो संरक्षित कोष थावह कम होता जा रहा है। अब चीजें कम रह गई हैं। कभी-कभी एक शब्द आता हैफिर उसकी हुक में बंधा हुआ कोई शब्द नहीं आतावह अकेले ही आ कर रह जाता है। थोड़ी देर टिकता हैखो जाता है। छह महीने के बाद तुम पाओगे कि कभी-कभी बीच में अंतराल आने लगाएक पल को कुछ भी नहीं होतातुम अकेले रह जाते हो। उसी पल में श्रवण की क्षमता शुरू होगी।
लेकिन छह महीने बड़े धैर्यपूर्वक मन को उलीचना जरूरी हैक्योंकि जिंदगी भर उसे भरा है। छह महीने भी अगर तुम बड़े धैर्यपूर्वक करो तो ही यह हो पाएगानहीं तो छह साल भी लग सकते हैंछह जन्म भी लग सकते हैं। तुम्हारे ऊपर निर्भर है कि तुम कितनी त्वरा सेकितनी समग्रता से इस प्रयोग को करते हो।
और कई बार ऐसा मौका आएगा कि तुम भूल ही जाओगे कि हमें सिर्फ देखना है। तुम सवार हो जाओगे घोड़े परयात्रा पर निकल जाओगे। तुम संबंधित हो जाओगेतुम लीन हो जाओगेतादात्म्य हो जाएगा। किसी विचार के साथ आइडेंटिटी हो जाएगी। और तब तुम चूक गएतब प्रयोग असफल हो गया। जैसे ही खयाल आएफिर घोड़े से नीचे उतर जाओ। शब्दों को चलने दोतुम उन पर मत चढ़ो। शब्दों को जहां जाना होजाने दोतुम उनके पीछे अनुसरण भर करो। तुम सिर्फ देखते रहो पीछे-पीछेक्या हो रहा है।
तो धीरे-धीरे मौनबहुत धीरे-धीरे मौन की पदचाप सुनाई पड़ेगी। और जिस दिन तुम्हें मौन की पदचाप सुनाई पड़ेगी,उसी दिन तुम्हें श्रवण की कला का भी अनुभव होगा। उस दिन तुम सुन सकोगे। उस दिन तुम्हें गुरु को खोजने न जाना पड़ेगा। उस दिन तुम जहां रहोगेवहीं गुरु है। वहां वृक्ष में हवा चलेगीफूल झरेगासूखा पत्ता गिरेगातुम उसे भी सुन सकोगे। आकाश में बादल गरजेंगेबिजली चमकेगीनदी में बाढ़ आएगीतुम उसे भी सुन सकोगे। समुद्र के किनारे तुमुल नाद होगातुम उसे भी सुन सकोगे। एक पक्षी गुनगुनाएगा गीतएक बच्चा रोएगारास्ते पर कुत्ता भौंकेगातुम वहां भी सुन सकोगे।
सुनने की कला आ जाए तो गुरु चारों तरफ है। और सुनने की कला न आए तो सभी सिद्ध-पुरुष तुम्हारे सामने बैठे हों,तो भी गुरु नहीं हैं। गुरु होता है उसी क्षण जब तुम सुनने में समर्थ हो गए।
इसलिए नानक कहते हैं, 'श्रवण से ही भक्त आनंदित होते हैं। श्रवण से ही दुख तथा पाप का नाश होता है।'
अगर तुम्हें सुनने की कला आ गई तो तुम परम आनंदित हो जाओगेक्योंकि तुम साक्षी हो गए। साक्षी ही तो आनंद है। श्रवण घटामन खो गयामन का खो जाना ही तो आनंद है। मन के पार चले जाना ही तो आनंद है। श्रवण हुआशब्द की शृंखला टूट गईशब्द की शृंखला के अतीत हो जाना ही तो आनंद है। वही अतिक्रमणट्रांसेंडेंस है। अब तुम शब्दों की घाटी में न रहे। अब तुम उत्तुंग शिखर हो गएजहां शब्द पहुंचते नहींशब्दों की धूल नहीं पहुंचती। जहां परम मौन हैजहां मौन कभी टूटा ही नहींअब तुम उस शिखर पर खड़े हो। उस शांति के शिखर से आनंद के सिवाय और कोई गूंज पैदा नहीं होती। उस शांति के शिखर पर तुम परम-धन्यता को उपलब्ध होते हो।
'श्रवण से ही दुख तथा पाप का नाश हो जाता है।'
जिसने सुन लियाजिसने सुनना जान लियाफिर कैसा पाप! क्योंकि पाप होता है विचार के साथ संबंधित होने से। इसे थोड़ा समझो।
मन में एक विचार उठा। रास्ते से एक कार गुजरी। एक झलकमन में एक विचार आ गया कि यह कार मेरे पास हो। अब तुम इसमें संयुक्त हो गए। अब यह कार कैसे तुम्हारे पास होतुम इस धुन में लग गए। ईमानदारी से मिले तो ईमानदारी सेबेईमानी से मिले तो बेईमानी से--कार होनी चाहिए। अगर कार नहीं है तो अब तुम सो न सकोगे। अब तुम्हारी जिंदगी में एक कठिनाई आ गईजब तक हल न हो जाए तब तक तुम चैन न पा सकोगे। रात सपने में कारदिन सोचने में कारअब कार तुम्हें घेरे हुए है!
हुआ क्याकार निकली थीएक विचार उठा। क्योंकि मन में तो जो भी चीज निकलेगीउसके साथ तत्क्षण प्रतिबिंब बनेंगे। उस विचार के साथ तुम संयुक्त हो गएतुम दूर न रह सके।
एक सुंदर स्त्री निकलीतुम्हारे मन में एक विचार उठा। मन में विचार उठेयह बिलकुल ठीक हैक्योंकि मन तो दर्पण है। वह तो है ही इसलिए कि जो भी आसपास घटेउसमें प्रतिबिंबित हो। लेकिन तुम तत्क्षण जुड़ गए। सुंदर स्त्री का प्रतिबिंब बनता और सुंदर स्त्री चली जातीप्रतिबिंब भी चला जातातुम साक्षी रहतेतो पाप का कोई उपाय न होता। लेकिन अब किसी भी तरह यह स्त्री चाहिए। राह से मिलेराह सेबेराह मिलेबेराहप्रेम से मिलेप्रेम सेहिंसा से मिलेहिंसा सेअगर न हो सके प्रेम तो बलात्कारलेकिन अब यह स्त्री चाहिए।
अब एक विचार ने तुम्हें ग्रसित कर लिया। एक छाया तुम्हारे मन से गुजरी थीतुम उसे गुजरते देख लेते और तुम अपने को दूर खड़ा रखते और देखते रहते कि छाया बनी और गयीतो कोई पाप न उठता। सब पाप उठते हैंक्योंकि तुम विचार के साथ एक हो जाते हो। फिर विचार तुम्हें इस बुरी तरह पकड़ लेता है--एक झंझावात की तरहएक आंधी की तरह--कि तुम्हें झकझोर देता है। और विचार के साथ जा कर भी कुछ मिलता नहीं। दुख मिलता है। तुमने इतना दुख पाया हैवह विचार के साथ जा कर पाया है। पर इतना भी तुम्हें होश नहीं है कि तुम देख सको कि सब दुख विचार के साथ जा कर पाया है। और सब आनंद निर्विचार में घटित होता है।
नानक कहते हैंश्रवण से दुख तथा पाप का नाश होता है। क्योंकि पाप का फल है दुख। पाप है बीजफल है दुख। इधर पाप गयाउधर दुख गया। और जब न पाप है और न दुख हैतब तुम जिस अवस्था में होवही समाधि हैवही आनंद है!
नानक भगता सदा विगासु। सुणिऐ दुख पाप का नासु।।
'सुनने में जो समर्थ हो गयाउसके दुख और पाप नष्ट हो गए। और नानक कहते हैंवैसा भक्त आनंद को उपलब्ध हो जाता है। और उसका आनंद विकसित ही होता चला जाता है।'
यह विगासु शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है। इसमें दोनों बातें छिपी हैं--आनंद और निरंतर विकासमान। तो आनंद तो एक फूल है जो खिलता ही चला जाता है। ऐसी कोई घड़ी नहीं आती जब पूरा फूल खिल जाएखिलता ही चला जाता है। पूरे से भी ज्यादा;और पूराऔर पूराऔर परिपूर्ण खिलता चला जाता है। जैसे सुबह का सूरज उगता है और उगता ही चला जाता है और कोई अस्त न होऐसा वह आनंद है। फूल खिलता है और मुरझाए नकोई अस्त न होऐसा वह आनंद है।
हृदय में जब शून्यता घनी होती हैमौन का जन्म होता हैतो फिर आनंद की लहरें उठती ही चली जाती हैं। ध्यान रखनाआनंद कोई ऐसी घटना नहीं है कि जो वस्तुओं की तरह हैतुमने एक दफे पा लिया और खतम हो गई। वह बढ़ती ही चली जाती है। एक दफा जिसने पा लीवह बढ़ती ही चली जाती है। उसकी बढ़ती की कोई सीमा नहीं है।
इसलिए तो हम कहते हैंपरमात्मा अनंत है। और इसलिए हम कहते हैंपरमात्मा आनंद है। क्योंकि आनंद अनंत है। तुम कभी उसे पूरा पा न पाओगे। और हर बार तुम पाओगे कि और बढ़ता जा रहा है। और हर जगह तुम पाओगे कि तुम पूरे तृप्त हो। यह पहेली है और बुद्धि से सोचने पर हल नहीं होती। क्योंकि बुद्धि कहती हैअगर मिल गया और तृप्ति हो गई तो अब और बढ़ने को क्या बचा! तृप्ति भी बढ़ती हैक्योंकि तृप्ति जीवंत हैवस्तु नहीं है। तृप्ति एक जीवंत घटना है।
आनंद कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि ले आए खरीद कर एक सेरदो सेरबात खतम हो गईअनंत है। एक बार तुम उतर गए तो तुम डूबते ही चले जाते हो। और मजे की बात यह है कि हर घड़ी लगता है कि पूरा मिलाऔर फिर भी बढ़ता है।
पूर्ण भी विकासमान है। पूर्ण भी मृत नहीं हैरुक नहीं गया हैफैलता चला जा रहा है। इसलिए तो हमने इस अस्तित्व को ब्रह्म कहा है। ब्रह्म का अर्थ होता हैजो विस्तृत होता ही चला जाता है। ब्रह्म का अर्थ हैजिसके विस्तार की सीमा कभी नहीं आतीजो उतना ही नहीं हैजितना कल थाजो उतना ही नहीं हैजितना आज हैजो रोज फैलता चला जाता है। जिसका फैलाव अंतहीन है। ब्रह्म शब्द का अर्थ होता हैअंतहीन फैलाव।
'श्रवण से ही विष्णुब्रह्मा और इंद्र होते हैं। श्रवण से ही बुरे मुख से भी उसकी प्रशंसा के गीत निकलने लगते हैं। श्रवण से ही योग की युक्ति और शरीर के भेद ज्ञात होते हैं। श्रवण से ही शास्त्रस्मृति और वेद का अनुभव होता है। नानक कहते हैं कि श्रवण से ही भक्तगण सदा आनंदित होते हैं तथा दुख और पाप का नाश होता है।'
सुन लिया जिसने सत्य कोगुरुवाणी कोजिसने जाना है उसकी सुगंध कोजिसने जाना है उसके पास बैठना जो सीख गया हैजिसे इतनी कला आ गई कि वह चुप हो कर किसी के पास बैठ जाए जिसे घटना घटी हैतो जिसके भीतर घटी है,उससे बह कर तुम्हारे भीतर प्रविष्ट होने लगती है।
ज्ञान संक्रामक है। आनंद संक्रामक है। तुम्हारे द्वार खुले हों तो बस हवा के झोंके की तरह आनंद तुममें आ जाता हैउस आदमी के पास सेजिसके पास था। उसका कुछ कम नहीं होतातुम्हारा बढ़ जाता है। बंटने से उसका भी बढ़ता हैक्योंकि उतना ही विस्तीर्ण हो जाता है। चुप अगर तुम हो तो तुम्हारे भीतर जगह है। और ध्यान रखनाअस्तित्व शून्यता को पसंद नहीं करता। तुम इधर शून्य हुए और उधर अस्तित्व ने तुम्हें भरा।
जैसे नदी में तुम पानी भर लो एक घड़े मेंतुम भर भी नहीं पाए कि चारों तरफ से पानी दौड़ कर खाली जगह को भर देता है। तुम हवा में से हवा को निकाल लोचारों तरफ से हवाएं दौड़ कर उसे भर देती हैं। अस्तित्व खाली जगह को पसंद नहीं करता। तुम एक बार खाली होने को राजी भर हो जाओ कि हमेशा ताजी हवाओं से भर दिए जाते हो। तुम इधर खाली हुएउधर भरे। इस कोने से तुम बाहर निकलेउधर से परमात्मा भीतर आया। तुम जब तक अपने से ही भरे होतब तक खाली रहोगे। जिस दिन खाली हो जाओगेउस दिन उस परम ऊर्जा से भर जाओगे।
नानक कहते हैंजिनके जीवन में पाप है और जिनके मुख से कभी सुंदर शब्द नहीं निकलेशुभ-वाणी जिनसे कभी प्रकट नहीं हुईजिनके ओठों से सदा अपशब्द निकलेजिनके मस्तिष्क में सदा अभिशाप रहाऐसे बुरे लोग भी अगर एक बार सुन लेंतो महिमा से भर जाते हैं। श्रवण की छोटी सी झलक भी तुम्हें ताजा कर देती हैनहला देती है।
नानक पापियों से पाप छोड़ने को नहीं कह रहे हैं। वे कह रहे हैंतुम सिर्फ सुन लो। पाप छूट जाएगा सुनने से। नानक पापियों को सुधरने को नहीं कह रहे हैं कि तुम पहले सुधर जाओ तब तुम सुन पाओगे। तब तो असंभव हो जाएगातब तो तुम कभी भी न पहुंच पाओगे। अगर यह शर्त हो कि पहले जब तक तुम शुद्ध न हो जाओगे तब तक सुन न सकोगेतो तुम कभी सुन ही न सकोगे। तब तो तुम्हारे जीवन में कोई आशा नहीं।
नानक कह रहे हैंतुम सुन लोपाप की चिंता छोड़ोबुराई की चिंता छोड़ो। सुनते ही तुम्हारे जीवन में एक नए सूत्र का आविर्भाव होगाएक नई चिनगारी पड़ेगीजो तुम्हारे सारे पाप को जला देगी। तुम्हारा सारा अतीत राख हो सकता हैअगर तुम मौन हो जाओ।
क्योंकि है ही क्या पापअतीत में भी तुमने किया क्या हैविचार के साथ संयुक्त हो गए थे और फिर विचार को कृत्य बनाने में लग गए थे--यही तो सारा पाप है। आज तुम विचार से अलग हो जाओकृत्य टूट जाएकर्ता खो जाए--अतीत से भी संबंध टूट गया। तब तुम ऐसा पाओगे कि अतीत भी एक स्वप्न थाइससे ज्यादा नहीं। तुमने जन्मों-जन्मों में जो कियावह भी कर्ता होने की भ्रांति के कारण हुआ था। आज भ्रांति टूट गईवे सब कृत्य समाप्त हो गए।
नानक की बात बहुत लोगों को समझ में नहीं पड़ेगी। क्योंकि लोग सोचते हैं कि जो-जो पाप किए हैंउन पापों के प्रायश्चित में पुण्य करने पड़ेंगे। और जब तक हम पुण्य न करेंगे तब तक पाप कैसे कटेंगेजो बुरा किया हैउसके ठीकसमतौल में तराजू पर भला करना पड़ेगा। हिसाबी-किताबी दिमाग के लोग ठीक ही कहते हैं कि अगर एक बुरा कृत्य किया तो एक भला कृत्य करोतब तो समतौल होगा। अगर ऐसा होना है तो तुम कभी मुक्त न हो सकोगे। क्योंकि अनंत जन्मों से तुम पाप कर रहे होअनंत जन्म तुम्हें लगेंगे पुण्य करने में। और इस बीच भी तुम पाप करने से बचोगेइसका कोई भरोसा है! तब तो यह शृंखला टूट ही नहीं सकती। तब तो मोक्ष असंभव है।
अनंत जन्मों से किए हुए पाप हैं। इनके अगर एक-एक पाप का चुकतारा करना होअगर परमात्मा कोई दुकानदार हो या अदालत का कोई मैजिस्ट्रेट हो और अगर इनका एक-एक पाप का चुकतारा करना होतो यह चुकतारा कब पूरा होगाऔर इस बीच--तुम अगर पुण्य ही पुण्य करते रहो तो चुकतारा अनंत काल में हो पाएगा--लेकिन इस बीच तुमसे आशा है कि तुम पुण्य ही पुण्य करते रहोगे?
नहींज्ञानियों ने कुछ और ही बात कही है। ज्ञानी किसी दूसरे ही गणित से चलते हैं। वे कहते हैंपाप का सवाल नहीं है,पाप के मूल का सवाल है।
यह वृक्ष खड़ा है सामनेतुम पचास साल से पानी दिए हो इस वृक्ष कोक्या तुम सोचते हो पचास साल लगेंगे पानी वापस निकालने मेंतब यह वृक्ष मरेगाजड़ को आज काट दोयह आज मरना शुरू हो जाएगा। पत्ते एक-एक तोड़ने में शायद पचास साल लगेंफिर भी वृक्ष न टूटे! क्योंकि पुराने पत्ते टूटेंगेनए आ जाएंगे। और अब तो वृक्ष इतना बड़ा हो गया है कि तुम्हें पानी देने की जरूरत भी नहीं। अब तो वह जमीन से अपना पानी ले लेता है।
नहींपत्ते अगर काटे तो यह वृक्ष कभी टूटने वाला नहीं। सच तो यह है कि पत्ते तुम एक काटोगेदो आ जाएंगे। वही तो कलम की सारी कला है। इधर काटो उधर नए आए। अगर तुम पाप काटोगेनए पाप आ जाएंगे। जड़ पकड़ो! जड़ क्या हैकर्म पत्ते हैंकर्ता का भाव जड़ है। अगर तुम कर्ता-भाव को काट दोइसी वक्त वृक्ष सूख गया। सारा स्रोत तुम्हारे कर्ता-भाव से आ रहा था कि मैं कर रहा हूं। कर्ता-भाव को तोड़ने की कला साक्षी है। साक्षी यानी श्रवण।
इसलिए नानक ऐसी अनूठी महिमा गा रहे हैं। वे कह रहे हैं कि तुम चुप हो कर सुन लो। क्योंकि सुनने के क्षण में तुम कर्ता नहीं रहोगे। सुनना पैसिवअकर्ता का भाव है। सुनने में तुम्हें कुछ भी तो नहीं करना पड़तातुम सिर्फ बैठे हो। सुनना कोई क्रिया थोड़े ही है! तुम्हें कुछ करना थोड़े ही पड़ता है!
बड़े मजे की बात है--देखना हो तो कम से कम आंख खोलनी पड़ती हैकान खुले ही हुए हैं। देखना हो तो कम से कम आंख खोलने की क्रिया करनी पड़ती हैसुनना हो तो कान खोलने की क्रिया भी नहीं करनी पड़ती। वे खुले ही हुए हैं। इसलिए देखने में तो थोड़ा सा कर्ता का भाव आ भी जाएसुनने में कर्ता के भाव का कोई उपाय ही नहीं है। कोई दूसरा बोल रहा हैतुम खाली बैठे हो। तुम बिलकुल निष्क्रिय हो। तुम पैसिव हो। तुम अक्रिया में हो। इसलिए देखने से भी वह महिमा उपलब्ध नहीं होती जो सुनने से उपलब्ध होती है।
इसलिए श्रवण पर इतना जोर दिया है। महावीर कहते हैंसम्यक श्रवण। बुद्ध कहते हैंसम्यक श्रवण। नानक अदभुत महिमा का वर्णन कर रहे हैं। सुन लोवहां कोई कर्ता नहीं है। वहां कोई है नहीं सुनने के क्षण में। अगर तुम चुप हो तो कौन है भीतरसुनने के क्षण में सन्नाटा है। एक आवाज गूंजती हैगुजर जाती है। कोई भी नहीं है भीतर। विचार आया कि तुम आए। जब विचार नहीं होतातुम भी नहीं होते। अहंकार विचारों के जोड़ का नाम है। श्रवण अर्थात निरअहंकार दशा।
कहते हैं नानक, 'श्रवण से ही योग की युक्ति और शरीर के भेद ज्ञात होते हैं।'
यह बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है।
सुणिऐ जोग जुगति तनि भेद। सुणिऐ सासत सिमृति वेद।।
नानक भगता सदा विगासु। सुणिऐ दुख पाप का नासु।।
पश्चिम में शरीर-शास्त्रियों को बड़ी पहेली रही है कि पूर्वीय मनीषियों ने शरीर के रहस्य-भेद कैसे जाने! क्योंकि न तो पूरब में लाश बचायी जाती है। पश्चिम में सर्जरी विकसित हो सकी और शरीर का ज्ञान हो सकाक्योंकि ईसाइयत मुर्दे को बचाती है। हिंदू तो जलाते रहे। तो यहां तो मरा हुआ आदमी पाना डिसेक्शन के लिए असंभव था। राख बचती हैउसमें क्याखोजिएगाइधर आदमी मरा कि हमने जलाया। तो हिंदू तो मरे हुए आदमी को जलाते रहेबचाया नहीं। पश्चिम में संभव हो सका कि कब्रों से लाशें खोद ली गईं और उनकी जांच-पड़ताल कर ली गई। उससे आदमी के शरीर का ज्ञान हुआ।
पूरब में कैसे ज्ञान हुआफिर पश्चिम में भी ज्ञान अभी हो पायावह भी अभी पूरा नहीं हुआजब कि इतने वैज्ञानिक साधन उपलब्ध हैंजिनसे शरीर की रत्ती-रत्ती जांच हो सकती है। लेकिन पूरब में कैसे ज्ञान हुआऔर ज्ञान करीब-करीब ठीक-ठीक हुआगणित की तरह ठीक हुआ। न साधन थेन लाशें उपलब्ध थींन वैज्ञानिक विकास थातकनीक नहीं थीटेक्नालाजीनहीं थीकैसे यह हुआबहुत विचार इस पर चलता है। नानक के इस सूत्र में उस विचार का उत्तर है।
'श्रवण से ही योग की युक्ति और शरीर के भेद ज्ञात होते हैं।'
जब तुम शून्य हो कर भीतर विराज जाते होतब तुम्हें अपना ही शरीर भीतर से दिखाई पड़ने लगता है। अभी तुमने अपने शरीर को भी बाहर से देखा हैतो चमड़ी दिखाई पड़ती है। जब तुम अपने शरीर को भीतर से देखोगे तो नाड़ियों का विराट जाल दिखाई पड़ेगा। एक अनूठा अनुभव होता हैजब पहली दफा शरीर भीतर से दिखाई पड़ता है। तुम तो अभी ऐसे हो जैसे अपने ही मकान को चारों तरफ से देखा हैभीतर गए नहीं। बाहर-बाहर घूम रहे हो। तो मकान के बाहर का पलस्तर दिखाई पड़ता है। बस वही तुम्हारा अनुभव है।
जब तुम भीतर जाओगेजैसे राजमहल में बैठे हुए आदमी को महल भीतर से दिखाई पड़ता है--भीतर का साज-शृंगार,भीतर की सजावट--वैसे ही तुम जब शांत हो कर अपने भीतर बैठ जाते होजब मन उलझन खड़ी नहीं करता...। क्योंकि मन सदा बाहर ले जाता है। जैसे ही तुम मन के साथ बंधे कि तुम बाहर गए। मन बाहर जाने का द्वार है। सोचोगे क्याजो भी सोचोगेबाहर होगा--धन होगास्त्री होगीमकान होगाकार होगीइज्जत होगीपद-प्रतिष्ठा--जो भी सोचोगेबाहर होगा। विचार के सभी आब्जेक्टविषय-वस्तुएं बाहर हैं। तुम सोचोगे क्याबाहर का ही कुछ सोचोगे। जैसे ही तुम निर्विचार हुएबाहर जाना बंद हुआ। ऊर्जा भीतर ठहर गई। तुम अपने सिंहासन पर बैठे और पहली दफे तुम्हें शरीर भीतर से दिखाई पड़ना शुरू हुआ! तब तुम पाओगेयह शरीर छोटा नहीं हैछोटा दिखाई पड़ता है।
इसलिए तो हिंदू कहते हैंअंड में ब्रह्मांड समाया। इस छोटे से शरीर में--मिनिएचर--समस्त ब्रह्मांड छिपा हुआ है। यह छोटा सा शरीर जैसे सारे ब्रह्मांड की छोटी सी अनुकृति है। जो कुछ सारे जगत में हैवह सब इस छोटे से शरीर में छोटे परिमाण में--एक माडल। जैसे कोई ताजमहल का माडल बनाता हैसब बिलकुल ताजमहल जैसापर छोटी आकृति। ऐसा ही प्रत्येक जीवन समस्त अस्तित्व की छोटी आकृति है।
नानक कहते हैंजो चुप हो गयामौन हो गयाजिसने श्रवण की कला सीख ली और जो अपने ही भीतर अपने शरीर को भी सुनने लगाउसे शरीर के भेदयोग की युक्तिसब ज्ञात हो जाती है।
पतंजलि ने जो भी योग-शास्त्र में लिखा हैवह किसी दूसरों के शरीर की जांच से नहींअपने ही शरीर के भीतर के अनुभव से लिखा है। और वे वचन अभी भी शत-प्रतिशत सही हैंकोई अंतर नहीं पड़ा। योग ने जितनी विधियां खोजी हैंवे अपने ही शरीर के अनुभव से खोजी हैं।
अगर तुम शांत हो कर बैठोगे--कुछ उदाहरण के लिए मैं तुम्हें कहूं--जैसे ही तुम शांत हो कर बैठोगेतुम पाओगेतुम्हारे श्वास की गति बदल गई तत्क्षण। विचार बंद हुएश्वास की गति बदल जाती है। विचार चलेश्वास की गति बदल जाती है। जब तुम शांत हो कर बैठोगेअगर तुमने पहचान लिया कि श्वास की गति बदलीअब कैसी गति है श्वास की! जब भी तुम शांत होना चाहो श्वास की वही गति कर लोतुम तत्क्षण शांत हो जाओगे। तुम्हें एक रहस्य पता चल गयातुम्हें एक कुंजी हाथ में आ गई।
जब तुम बिलकुल शांत हो कर बैठेतब तुम देखो कि तुम्हारी रीढ़ की क्या स्थिति है। जब तुम शांत हो कर बैठोगेतुम पाओगेरीढ़ अपने-आप नब्बे का कोण बना लेती है जमीन से। स्वस्थ आदमी होबूढ़ा न होबीमार न होतो जैसे ही शांत होगारीढ़ नब्बे का कोण बना लेगी। तुम्हें एक कुंजी हाथ आ गई। जब भी तुम शांत होना चाहोरीढ़ को नब्बे का कोण बना दो जमीन से। ऐसे धीरे-धीरे योगी अनुभव करता है कि क्या उसके भीतर हो रहा है।
जैसे ही तुम शांत हो कर बैठोगेतुम पाओगे कि जितने तुम शांत होते होतुम्हारी रीढ़ से कोई ऊर्जा ऊपर की तरफ उठनी शुरू हो जाती है। तुम उसे प्रत्यक्ष देखोगेअनुभव करोगे। एक उष्ण ताप तुम्हारी रीढ़ में दौड़ने लगेगा। तरंगें विद्युत की तुम्हारी रीढ़ में उठने लगेंगीजिनका तुमने कभी अनुभव नहीं किया था। और जैसे-जैसे वे तरंगें ऊपर जाएंगीवैसे-वैसे तुम आह्लादित पाओगे। जैसे-जैसे वे तरंगें ऊपर उठेंगीवैसे-वैसे तुम्हारा दुखउदासी कम और आनंद का भाव बढ़ने लगेगा। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ेगी तरंगों कीवैसे-वैसे तुम पाओगे कि जीवन की क्षुद्रता छूट गईदूर घाटी में पड़ी रह गईतुम जैसे किसी पर्वत पर चले आए हो। वह धुआं गांव-बस्ती कालोगों की चर्चा काबातचीत काउपद्रव कासब पीछे छूट गया। तुम बड़े दूर निकल आए हो।
इसलिए तो हमने रीढ़ को मेरुदंड कहा है। मेरु पर्वत का नाम हैजो स्वर्ग में है। और जब कोई व्यक्ति इस छोटे से मेरुदंड की आखिरी ऊंचाई पर पहुंच जाता हैतो वह वही ऊंचाई है जो मेरु पर्वत की है स्वर्ग में। उस ऊंचाई और इस ऊंचाई में कोई फर्क नहीं है। और जो आखिरी शिखर है--जहां हिंदू शिखा रखते हैंजो सातवां द्वार हैजहां से ऊर्जा अनंत में मिलती है--जब तुम्हारी तरंगें वहां से विकीर्ण होने लगेंगीब्रह्मचर्य उपलब्ध हो जाएगा। तब तुम्हें ब्रह्मचर्य के लिए कुछ भी करना नहीं पड़ेगा। और जब भी तुम्हें वासना पकड़े तो वासना को दबाने की कोई जरूरत न रह जाएगीतुम बस रीढ़ को सीधा करके उन तरंगों को ऊपर जाने दोतो जो ऊर्जा वासना से बहती थीवही ऊर्जा ब्रह्मचर्य बन जाएगी। ऊर्जा तो वही हैएनर्जी वही है;पहले द्वार से निकलती है तो प्रकृति में चली जाती हैसातवें द्वार से निकलती है तो परमात्मा में चली जाती है।
ऐसे जो व्यक्ति चुप हो कर बैठने की कला सीख लेगाउसे उसका ही शरीर हजार-हजार अनुभव दे देगा। अपने ही शरीर से तुम सारे योग शास्त्र को जान सकते हो। पतंजलि को पढ़ने की जरूरत नहीं। सच में तो पतंजलि के शास्त्र बाद में ही पढ़ने की जरूरत है। क्योंकि वे तुम्हें आश्वस्त कर देते हैं कि सब ठीक हो रहा है। तुम जब भीतर प्रयोग करना शुरू करते होतब शास्त्र का उपयोग इतना ही है कि तुम कई बार डरोगे कि पता नहीं क्या हो रहा है। अनजान में जा रहे होक्या होगाक्या नहीं होगा--भय पकड़ेगा। शास्त्र तुम्हें आश्वस्त कर देगा कि तुम अनजान में नहीं जा रहे होजो भी गए हैंइसी रास्ते से गए हैं। जिन्होंने भी पायाऐसे ही पाया है। ये-ये घटनाएं उन्हें भी घटी हैंऔर आगे ये-ये घटनाएं घटने की संभावना हैतुम भयभीत न होओआश्वस्त रहो। शास्त्र गवाहियां हैं ज्ञानियों की। लेकिन असली ज्ञान शास्त्र से नहीं होताअसली ज्ञान तो खुद के भीतर शांत होने से होता है।
इसलिए कहते हैं नानकशास्त्रस्मृति और वेद श्रवण से ज्ञात होते हैं।
नानक कहते हैं, 'श्रवण से भक्तगण सदा आनंदित होते हैं। और दुख और पाप का नाश होता है। श्रवण से ही सत्य,संतोष और ज्ञान उपलब्ध होता है। श्रवण से ही अड़सठ तीर्थों का स्नान प्राप्त होता है। श्रवण से ही पढ़-पढ़ कर मान मिलता है। श्रवण से ही सहज ध्यान लगता है। नानक कहते हैंश्रवण से भक्तगण आनंदित होते हैं और दुख तथा पाप का नाश होता है।'
सुणिऐ सतु संतोखु गिआनु। सुणिऐ अठसठि का इस्नानु।।
सुणिऐ पड़ि पड़ि पावहि मानु। सुणिऐ लागै सहज धिआनु।।
नानक भगता सदा विगासु। सुणिऐ दुख पाप का नासु।।
अड़सठ तीर्थ हिंदुओं ने माने हैंजिनमें स्नान करने से परम मुक्ति मिलती है। लेकिन वे अड़सठ तीर्थ तो नक्शे पर बताए गए तीर्थों की भांति हैं। शरीर के भीतर अड़सठ बिंदु हैंजिनसे गुजर कर पुण्य की उपलब्धि होती है।
हिंदुओं ने बड़ा अदभुत काम किया है। पृथ्वी पर किसी जाति ने ऐसा अदभुत काम नहीं किया। बाहर तो प्रतीक हैं और उन प्रतीकों में जब हम भटक गए तो हिंदुओं की सारी जीवन-चेतना खो गई। हम कहते हैं कि गंगा जल रामेश्वरम में ले जा कर चढ़ा रहे हैं। भीतर शरीर के बिंदु हैं। एक बिंदु से ऊर्जा को लेना है और दूसरे बिंदु पर चढ़ाना है। एक बिंदु से ऊर्जा को खींचना है और दूसरे बिंदु तक पहुंचाना है। तब तीर्थ यात्रा हुई। पर हम अब पानी ढो रहे हैंगंगा से और रामेश्वरम तक। हमने पूरी पृथ्वी को नक्शे की तरह बना लिया थाआदमी का फैलाव। आदमी के भीतर बड़ा सूक्ष्म है सब कुछ। उसको समझाने के लिए ये प्रतीक थे। और इन प्रतीकों को हमने सत्य मान लिया तो हम भटक गए। प्रतीक कभी सत्य नहीं होतेसत्य की तरफ इशारे होते हैं।
नानक कहते हैं, 'श्रवण से सत्य मिलतासंतोष मिलताज्ञान उपलब्ध होता। श्रवण से अड़सठ तीर्थों का स्नान प्राप्त होता है।'
तुम अगर चुप हो गए तो तुम्हें भीतर के तीर्थ दिखाई पड़ने शुरू हो जाते हैं। तुम अगर चुप हो गए तो तुम्हें सोचना नहीं पड़ता कि सत्य क्या हैतुम्हें दिखाई पड़ता है कि सत्य क्या है। जब तक सोचना हैतब तक सत्य होगा ही नहींमत होगा,धारणा होगीकंसेप्ट होगाओपीनियन होगासत्य नहीं होगा। सत्य तो अनुभव है। और जब तुम्हें दिखाई पड़ता हैतुम सोचोगे क्यों!
'संतोष उपलब्ध होता।'
क्योंकि जब तक तुम विचार के साथ चलोगेअसंतुष्ट रहोगे। क्योंकि विचार हजार चीजें सुझाता है--यह करोयह करो,यह करो। कर-कर के तुम असंतुष्ट हो। विचार कहे ही चला जाता है। नयी वासनाएं जन्माता है। संतोष तो तभी होगा जब तुम विचार का साथ छोड़ दोगे। विचार की दोस्ती बड़ी बुरी है। उसी दोस्ती ने भटकाया। अगर कोई कुसंग है जगत मेंतो विचार का। अगर किसी का संग-साथ छोड़ देना हैतो विचार का। उपयोग करो उसकासंग-साथ की कोई जरूरत नहीं। उपयोग करो तो बहुत शुभ है। उसकी मान कर चलने लगे तो सब उपद्रव है। विचार शराब की तरह हैउसकी मान कर चले कि भटकाएगा। और तब तुम्हें जीवन में कुछ भी सूझे न सूझेगा कि अब क्या करें और क्या न करें।
मुल्ला नसरुद्दीन एक रात ज्यादा पी गया। घर आने की हिम्मत न रही। जो भी ज्यादा पी जाएउसकी घर आने की हिम्मत कम हो जाती है। जवाब देना पड़ेगा और जवाब कुछ सूझता नहीं। पैर लड़खड़ाते हैं। वह यहां-वहां भटकता रहा। आधी रात एक कांस्टेबल ने उसे पकड़ लिया और कहा कि क्या कर रहे होजवाब दो! वह बिलकुल चुप खड़ा रहा। उस कांस्टेबल ने कहा कि जल्दी जवाब देते हो कि कोतवाली ले चलूं! मुल्ला नसरुद्दीन ने कहाअगर जवाब ही दे सकते तो शाम को अपने घर ही न चले गए होते! जवाब ही तो नहीं है।
विचार एक नशा हैविचार के पास कोई जवाब नहीं है। जवाब ही होता तो कभी के तुम अपने घर चले गए होते।किसलिए भटक रहे हो आधी रात में रास्तों परकोई उत्तर नहीं है अपने जीवन को समझाने का। विचार के पास उत्तर है ही नहीं। निर्विचार में उत्तर है।
इसलिए नानक कहते हैंसंतोषसत्य--श्रवण सेअड़सठ तीर्थों का स्नान--श्रवण सेश्रवण से ही सहज ध्यान लगता है।
अगर तुम सुन ही लोध्यान हो गया। ध्यान के बिना तुम सुन ही न पाओगे। ध्यान का मतलब क्या हैजहां मन नहीं,वह अवस्था ध्यान। जहां अंतरंग वार्तालाप नहींवह अवस्था ध्यान है।
'श्रवण से श्रेष्ठ गुणों की थाह मिलती है। श्रवण से ही शेखपीरबादशाह होते। श्रवण से ही अंधे राह पाते। श्रवण से ही अथाह हाथ आ जाता। नानक कहते हैंश्रवण से ही भक्तगण सदा आनंदित होते हैंदुख और पाप का नाश होता है।'
सुणिऐ सरा गुणा के गाह। सुणिऐ सेख पीर पातिसाह।।
सुणिऐ अंधे पावहि राहु। सुणिऐ हाथ होवै असगाहु।।
नानक भगता सदा विगासु। सुणिऐ दुख पाप का नासु।।
श्रवण से अंधे को राह मिल जाती है। श्रवण से भिखारी बादशाह हो जाता है। श्रवण से जिसकी थाह नहीं मिलती थीजो अथाह लगता थाउसकी थाह मिल जाती है।
विचार छोटी चम्मच की तरह हैजिससे तुम सागर को नाप रहे हो। श्रवणसागर में उतर जाना है। थाह तभी मिलती है जब तुम डूबोगे। चम्मचों से तौलने से थाह नहीं मिलती।
अरिस्टोटल बहुत बड़ा विचारक हुआ यूनान का। गुजर रहा था एक समुद्र के तट सेसोच रहा थाअपने सोच में खोया था। एक आदमी को उसने देखा कि जो छोटा-सा गङ्ढा खोद कर चम्मच से सागर का पानी गङ्ढे में डाल रहा था। जिज्ञासा जगीपूछा कि भाई क्या करते हो! उस आदमी ने कहासाफ हैपूछना क्याआंख हो तो दिखाई पड़ना चाहिए! सागर को खाली करने का इरादा है। इस गङ्ढे में भर कर रहूंगा।
अरिस्टोटल हंसा और कहापागल हो गए होहोश में होकहीं सागरों को चम्मचों से तौला गयाचम्मचों से गङ्ढों में भरा गयाक्यों अपना जीवन नष्ट कर रहे होवह आदमी खिलखिला कर हंसने लगा और उसने कहा कि मैं तो सोचता था,पागल तुम हो! क्योंकि तुम और भी बड़े सागर को विचार की चम्मच में भरने की कोशिश में लगे हो। कहते हैंअरिस्टोटल ने उस आदमी को खोजने की बहुत कोशिश कीलेकिन पता न चल पाया कि वह कहां चला गया।
बात उसने ठीक ही कही थी। विचार कितना छोटा है! अस्तित्व कितना बड़ा है! इस विराट अस्तित्व को तुम विचार सेतौलत्तौल कर कहां ले जाओगेक्या करोगेसिर तुम्हारा कितना छोटा है! यह ब्रह्मांड कितना बड़ा है। तुम्हारे हाथ कितने छोटे हैं! तुम्हारी पहुंच कितनी छोटी है। यह विराट कितना विराट है। तुम व्यर्थ की चेष्टा में लगे हो! शायद वह आदमी कभी सागर को गङ्ढे में उतार भी लेक्योंकि एक चम्मच भी कम होता है तो सागर कम होता हैक्योंकि सागर की भी सीमा है। लेकिन तुम कभी भी उसे न पा सकोगे विचार से।
इसलिए नानक कहते हैंभिखारी बादशाह हो जाता हैजैसे ही मौन होता है। अथाह की थाह मिल जाती है। अज्ञात से परिचय बन जाता है। अनजान प्रियतम हो जाता है। श्रवण से अंधे राह पाते। श्रवण से अथाह हाथ आ जाता। नानक कहते,श्रवण से भक्तगण सदा आनंदित होते हैं और दुख और पाप का नाश होता है।

आज इतना ही।

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