रविवार, 13 अगस्त 2017

अष्‍टावक्र: महागीता-भाग-1 - प्रवचन--01

11 सितंबर 1976
ओशो आश्रम, पूना।

जनक उवाच।

कथं ज्ञानमवाम्मोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्य ब कथं प्राप्तमेतद ब्रूहि मम प्रभो।। १।।


अष्टावक्र उवाच।

मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्यज।
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज।। 2।।
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुधौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्दि मुक्तये।।3।।
यदि देहं पृथस्कृत्य निति विश्राम्ब तिष्ठसि।
अधुनैव सखी शांत: बंधमक्तो भविष्यसि।।4।।
न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचर:।
असंगोऽमि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव।।5।।
धर्माऽधमौं सुखं दुःख मानसानि न तो विभो।
न कर्ताऽसि न भोक्ताऽसि मुक्त एवासि सर्वदा।।6।।


क अनूठी यात्रा पर हम निकलते हैं। मनुष्य—जाति के पास बहुत शास्त्र हैंपर अष्टावक्र—गीता जैसा शास्त्र नहीं। वेद फीके हैं। उपनिषद बहुत धीमी आवाज में बोलते हैं। गीता में भी ऐसा गौरव नहींजैसा अष्टावक्र की संहिता में है। कुछ बात ही अनूठी है!

सबसे बड़ी बात तो यह है कि न समाजन राजनीतिन जीवन की किसी और व्यवस्था का कोई प्रभाव अष्टावक्र के वचनों पर है। इतना शुद्ध भावातीत वक्तव्यसमय और काल से अतीतदूसरा नहीं है। शायद इसीलिए अष्टावक्र की गीता,अष्टावक्र की संहिता का बहुत प्रभाव नहीं पड़ा।
कृष्ण की गीता का बहुत प्रभाव पड़ा। पहला कारण : कृष्ण की गीता समन्वय है। सत्य की उतनी चिंता नहीं है जितनी समन्वय की चिंता है। समन्वय का आग्रह इतना गहरा है कि अगर सत्य थोड़ा खो भी जाये तो कृष्ण राजी हैं।
कृष्ण की गीता खिचड़ी जैसी हैइसलिए सभी को भाती हैक्योंकि सभी का कुछ न कुछ उसमें मौजूद है। ऐसा कोई संप्रदाय खोजना मुश्किल है जो गीता में अपनी वाणी न खोज ले। ऐसा कोई व्यक्ति खोजना मुश्किल है जो गीता में अपने लिए कोई सहारा न खोज ले। इन सबके लिए अष्टावक्र की गीता बड़ी कठिन होगी।
अष्टावक्र समन्वयवादी नहीं हैं—सत्यवादी हैं। सत्य जैसा है वैसा कहा है—बिना किसी लाग—लपेट के। सुनने वाले की चिंता नहीं है। सुनने वाला समझेगानहीं समझेगाइसकी भी चिंता नहीं है। सत्य का ऐसा शुद्धतम वक्तव्य न पहले कहीं हुआन फिर बाद में कभी हो सका।
कृष्ण की गीता लोगों को प्रिय हैक्योंकि अपना अर्थ निकाल लेना बहुत सुगम है। कृष्ण की गीता काव्यात्मक है : दो और दो पांच भी हो सकते हैंदो और दो तीन भी हो सकते हैं। अष्टावक्र के साथ कोई खेल संभव नहीं। वहां दो और दो चार ही होते हैं।
अष्टावक्र का वक्तव्य शुद्ध गणित का वक्तव्य है। वहां काव्य को जरा भी जगह नहीं है। वहां कविता के लिए जरा—सी भी छूट नहीं है। जैसा है वैसा कहा है। किसी तरह का समझौता नहीं है। कृष्ण की गीता पढ़ो तो भक्त अपना अर्थ निकाल लेता हैक्योंकि कृष्ण ने भक्ति की भी बात की हैकर्मयोगी अपना अर्थ निकाल लेता हैक्योंकि कृष्ण ने कर्मयोग की भी बात की हैज्ञानी अपना अर्थ निकाल लेता हैक्योंकि कृष्ण ने शान की भी बात की है। कृष्ण कहीं भक्ति को सर्वश्रेष्ठ कहते हैंकहीं ज्ञान को सर्वश्रेष्ठ कहते हैंकहीं कर्म को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं।
कृष्ण का वक्तव्य बहुत राजनैतिक है। वे राजनेता थे—कुशल राजनेता थे! सिर्फ राजनेता थेइतना ही कहना उचित नहीं—कुटिल राजनीतिज्ञ थेडिप्लोमैट थे। उनके वक्तव्य में बहुत—सी बातों का ध्यान रखा गया है। इसलिए सभी को गीता भा जाती है। इसलिए तो गीता पर हजारों टीकाएं हैंअष्टावक्र पर कोई चिंता नहीं करता। क्योंकि अष्टावक्र के साथ राजी होना हो तो तुम्हें अपने को छोड़ना पड़ेगा। बेशर्त! तुम अपने को न ले जा सकोगे। तुम पीछे रहोगे तो ही जा सकोगे। कृष्ण के साथ तुम अपने को ले जा सकते हो। कृष्ण के साथ तुम्हें बदलने की कोई भी जरूरत नहीं है। कृष्ण के साथ तुम मौजूं पड़ सकते हो।
इसलिए सभी सांप्रदायिकों ने कृष्ण की गीता पर टीकाएं लिखीं—शंकर नेरामानुज नेनिम्बार्क नेवल्लभ नेसबने। सबने अपने अर्थ निकाल लिए। कृष्ण ने कुछ ऐसी बात कही है जो बहु—अर्थी है। इसलिए मैं कहता हूं काव्यात्मक है। कविता में से मनचाहे अर्थ निकल सकते हैं।
कृष्ण का वक्तव्य ऐसा है जैसे वर्षा में बादल घिरते हैं. जो चाहो देख लो। कोई देखता है हाथी की सूंड़कोई चाहे गणेश जी को देख ले। किसी को कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता—वह कहता हैकहां की फिजूल बातें कर रहे होबादल हैं! धुआ—इसमें कैसी आकृतियां देख रहे हो?
पश्चिम में वैज्ञानिक मन के परीक्षण के लिए स्याही के धब्बे ब्लाटिंग पेपर पर डाल देते हैं और व्यक्ति को कहते हैं,देखोइसमें क्या दिखायी पड़ता हैव्यक्ति गौर से देखता हैउसे कुछ न कुछ दिखाई पड़ता है। वहां कुछ भी नहीं हैसिर्फ ब्लाटिंग पेपर पर स्याही के धब्बे हैं—बेतरतीब फेंके गयेसोच—विचार कर भी फेंके नहीं गये हैंऐसे ही बोतल उंडेल दी है। लेकिन देखने वाला कुछ न कुछ खोज लेता है। जो देखने वाला खोजता है वह उसके मन में हैवह आरोपित कर लेता है।
तुमने भी देखा होगा. दीवाल पर वर्षा का पानी पड़ता हैलकीरें खिंच जाती हैं। कभी आदमी की शक्ल दिखायी पड़ती है,कभी घोड़े की शक्ल दिखायी पड़ती है। तुम जो देखना चाहते होआरोपित कर लेते हो।
रात के अंधेरे में कपड़ा टंगा है— भूत—प्रेत दिखायी पड़ जाते हैं।
कृष्ण की गीता ऐसी ही है—जों तुम्हारे मन में हैदिखायी पड़ जायेगा। तो शंकर ज्ञान देख लेते हैंरामानुज भक्ति देख लेते हैंतिलक कर्म देख लेते हैं—और सब अपने घर प्रसन्नचित्त लौट आते हैं कि ठीककृष्ण वही कहते हैं जो हमारी मान्यता है।
इमर्सन ने लिखा है कि एक बार एक पड़ोसी प्लेटो की किताबें उनसे माग कर ले गया। अब प्लेटो दो हजार साल पहले हुआ—और दुनिया के थोड़े —से अनूठे विचारकों में से एक। कुछ दिनों बाद इमर्सन ने कहाकिताबें पढ़ ली हों तो वापस कर दें। वह पड़ोसी लौटा गया। इमर्सन ने पूछाकैसी लगींउस आदमी ने कहा कि ठीक। इस आदमीप्लेटो के विचार मुझसे मिलते—जुलते हैं। कई दफे तो मुझे ऐसा लगा कि इस आदमी को मेरे विचारों का पता कैसे चल गया! प्लेटो दो हजार साल पहले हुआ हैइसको शक हो रहा है कि इसने कहीं मेरे विचार तो नहीं चुरा लिए!
कृष्ण में ऐसा शक बहुत बार होता है। इसलिए कृष्ण परसदियां बीत गईंटीकाएं चलती जाती हैं। हर सदी अपना अर्थ खोज लेती हैहर व्यक्ति अपना अर्थ खोज लेता है। कृष्ण की गीता स्याही के धब्बों जैसी है। एक कुशल राजनीतिज्ञ का वक्तव्य है।
अष्टावक्र की गीता में तुम कोई अर्थ न खोज पाओगे। तुम अपने को छोड़ कर चलोगे तो ही अष्टावक्र की गीता स्पष्ट होगी।
अष्टावक्र का सुस्पष्ट संदेश है। उसमें जरा भी तुम अपनी व्याख्या न डाल सकोगे। इसलिए लोगों ने टीकाएं नहीं लिखीं। टीका लिखने की जगह नहीं हैतोड़ने—मरोड़ने का उपाय नहीं हैतुम्हारे मन के लिए सुविधा नहीं है कि तुम कुछ डाल दो। अष्टावक्र ने इस तरह से वक्तव्य दिया है कि सदियां बीत गईंउस वक्तव्य में कोई कुछ जोड़ नहीं पायाघटा नहीं पाया। बहुत कठिन है ऐसा वक्तव्य देना। शब्द के साथ ऐसी कुशलता बड़ी कठिन है।
इसलिए मैं कहता हूं एक अनूठी यात्रा तुम शुरू कर रहे हो।
अष्टावक्र में राजनीतिज्ञों की कोई उत्सुकता नहीं है—न तिलक कीन अरविंद कीन गांधी कीन विनोबा कीकिसी की कोई उत्सुकता नहीं है। क्योंकि तुम अपना खेल न खेल पाओगे। तिलक को उकसाना है देश— भक्तिउठाना है कर्म का ज्वार—कृष्ण की गीता सहयोगी बन जाती है।
कृष्ण हर किसी को कंधा देने को तैयार हैं। कोई भी चला लो गोली उनके कंधे पर रख करवे राजी हैं। कंधा उनका,पीछे छिपने की तुम्हें सुविधा हैऔर उनके पीछे से गोली चलाओ तो गोली भी बहुमूल्य मालूम पड़ती है।
अष्टावक्र किसी को कंधे पर हाथ भी नहीं रखने देते। इसलिए गांधी की कोई उत्सुकता नहीं हैतिलक की कोई उत्सुकता नहीं हैअरविंदविनोबा को कुछ लेना—देना नहीं है। क्योंकि तुम कुछ थोप न सकोगे। राजनीति की सुविधा नहीं है। अष्टावक्र राजनीतिक पुरुष नहीं हैं।
यह पहली बात खयाल में रख लेनी जरूरी है। ऐसा सुस्पष्टखुले आकाश जैसा वक्तव्यजिसमें बादल हैं ही नहींतुम कोई आकृति देख न पाओगे। आकृति छोड़ोगे सबबनोगे निराकारअरूप के साथ जोड़ोगे संबंध तो अष्टावक्र समझ में आयेंगे। अष्टावक्र को समझना चाहो तो ध्यान की गहराई में उतरना होगाकोई व्याख्या से काम होने वाला नहीं है।
और ध्यान के लिए भी अष्टावक्र नहीं कहते कि तुम बैठ कर राम—राम जपो। अष्टावक्र कहते हैं : तुम कुछ भी करोवह ध्यान न होगा। कर्ता जहां है वहां ध्यान कैसाजब तक करना है तब तक भ्रांति है। जब तक करने वाला मौजूद है तब तक अहंकार मौजूद है।
अष्टावक्र कहते हैं : साक्षी हो जाना है ध्यान—जहां कर्ता छूट जाता हैतुम सिर्फ देखने वाले रह जाते होद्रष्टा—मात्र! द्रष्टा—मात्र हो जाने में ही दर्शन है। द्रष्टा—मात्र हो जाने में ही ध्यान है। द्रष्टा—मात्र हो जाने में ही ज्ञान है।
इसके पहले कि हम सूत्र में उतरेंअष्टावक्र के संबंध में कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं। ज्यादा पता नहीं हैक्योंकि न तो वे सामाजिक पुरुष थेन राजनीतिकतो इतिहास में कोई उल्लेख नहीं है। बस थोड़ी—सी घटनाएं ज्ञात हैं—वे भी बड़ी अजीब,भरोसा करने योग्य नहींलेकिन समझोगे तो बड़े गहरे अर्थ खुलेंगे।
पहली घटना—अष्टावक्र पैदा हुए उसके पहले कीपीछे का तो कुछ पता नहीं है—गर्भ की घटना। पिता—बड़े पंडित। अष्टावक्र—मां के गर्भ में। पिता रोज वेद का पाठ करते हैं और अष्टावक्र गर्भ में सुनते हैं। एक दिन अचानक गर्भ से आवाज आती है कि रुको भी! यह सब बकवास है। ज्ञान इसमें कुछ भी नहीं—बस शब्दों का संग्रह है। शास्त्र में ज्ञान कहांज्ञान स्वयं में है। शब्द में सत्य कहांसत्य स्वयं में है।
पिता स्वभावत: नाराज हुए। एक तो पिताफिर पंडित! और गर्भ में छिपा हुआ बेटा इस तरह की बात कहे! अभी पैदा भी नहीं हुआ! क्रोध में आ गएआगबबूला हो गए। पिता का अहंकार चोट खा गया। फिर पंडित का अहंकार! बड़े पंडित थेबड़े विवादी थेशास्त्रार्थी थे। क्रोध में अभिशाप दे दिया कि जब पैदा होगा तो आठ अंगों से टेढ़ा होगा। इसलिए नाम—अष्टावक्र। आठ जगह से कुबड़े पैदा हुए। आठ जगह से ऊंट की भांतिइरछे—तिरछे! पिता ने क्रोध में शरीर को विक्षत कर दिया। ऐसी और भी कथाएं हैं।
कहते हैंबुद्ध जब पैदा हुए तो खड़े—खड़े पैदा हुए। मां खड़ी थी वृक्ष के तले। खड़े—खड़े.. मां खड़ी थी खड़े—खड़े पैदा हुए। जमीन पर गिरे नहीं कि चलेसात कदम चले। आठवें कदम पर रुक कर चार आर्य—सत्यों की घोषणा कीकि जीवन दुख है—अभी सात कदम ही चले हैं पृथ्वी पर—कि जीवन दुख हैकि दुख से मुक्त होने की संभावना हैकि दुख—मुक्ति का उपाय है;कि दुख—मुक्ति की अवस्था हैनिर्वाण की अवस्था है।
लाओत्सु के संबंध में कथा है कि लाओत्सु बूढ़े पैदा हुएअस्सी वर्ष के पैदा हुएअस्सी वर्ष तक गर्भ में ही रहे। कुछ करने की चाह ही न थी तो गर्भ से निकलने की चाह भी न हुई। कोई वासना ही न थी तो संसार में आने की भी वासना न हुई। जब पैदा हुए तो सफेद बाल थेअस्सी वर्ष के बूढ़े थे। जरथुस्त्र के संबंध में कथा है कि जब जरथुस्त्र पैदा हुए तो पैदा होते से ही खिलखिला कर हंसे। मगर इन सबको मात कर दिया अष्टावक्र ने। ये तो पैदा होने के बाद की बातें हैं। अष्टावक्र ने अपना पूरा वक्तव्य दे दिया पैदा होने के पहले।
ये कथाएं महत्वपूर्ण हैं। इन कथाओं में इन व्यक्तियों के जीवन की सारी सार—संपदा हैनिचोड़ है। बुद्ध ने जो जीवन भर में कहा उसका निचोड़. बुद्ध ने आष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया. तो सात कदम चलेआठवें पर रुक गये। आठ अंग हैं कुल। पहुंचने की अंतिम अवस्था है सम्यक समाधि। उस समाधि की अवस्था में ही पता चलता है जीवन के पूरे सत्य का। उन चार आर्य—सत्यों की घोषणा कर दी।
लाओत्सु बूढ़ा पैदा हुआ। लोगों को अस्सी साल लगते हैंतब भी ऐसी समझ नहीं आ पाती। बूढ़े हो कर भी लोग बुद्धिमान कहां हो पाते हैं! बूढ़ा होना और बुद्धिमान होना पर्यायवाची तो नहीं। बाल तो धूप में भी पकाये जा सकते हैं।
लाओत्सु की कथा इतना ही कहती है कि अगर जीवन में त्वरा होतीव्रता हो तो जो अस्सी साल में घटता है वह एक क्षण में घट सकता है। प्रज्ञा की तीव्रता हो तो एक क्षण में घट सकता है। बुद्धि मलिन हो तो अस्सी साल में भी कहां घटता है!
जरथुस्त्र जन्म के साथ ही हंसे। जरथुस्त्र का धर्म अकेला धर्म है दुनिया में जिसको 'हंसता हुआ धर्मकह सकते हैं। अतिपार्थिवपृथ्वी का धर्म है! इसलिए तो पारसी दूसरे धार्मिकों को धार्मिक नहीं मालूम होते। नाचते—गातेप्रसन्न! जरथुस्त्र का धर्म हंसता हुआ धर्म हैजीवन के स्वीकार का धर्म हैनिषेध नहीं हैत्याग नहीं है। तुमने कोई पारसी साधु देखा—नंग—धड़ंग खड़ा हो जायेछोड़ देधूप में खड़ा हो जायेधूनी रमा कर बैठ जायेनहींपारसी—धर्म में जीवन को सतानेकष्ट देने की कोई व्यवस्था नहीं है। जरथुस्त्र का सारा संदेश यही है कि जब हंसते हुए परमात्मा को पाया जा सकता है तो रोते हुए क्यों पाना?जब नाचते हुए पहुंच सकते हैं उस मंदिर तक तो नाहक काटे क्यों बोनेजब फूलों के साथ जाना हो सकता है तो यह दुखवाद क्योंइसलिए ठीक हैप्रतीक ठीक है कि जरथुस्त्र पैदा होते ही हंसे।
इन कथाओं में इतिहास मत खोजना। ऐसा हुआ है—ऐसा नहीं है। लेकिन इन कथाओं में एक बड़ा गहरा अर्थ है।
तुम्हारे पास एक बीज पड़ा है। जब तुम बीज को देखते हो तो इससे पैदा होने वाले फूल की कोई भी तो खबर नहीं मिलती। यह क्या हो सकता हैइसकी भनक भी तो नहीं आती। यह कमल बनेगाखिलेगाजल में रहेगा और जल से अछूता रहेगासूरज की किरणों पर नाचेगा और सूरज भी ईर्ष्यालु होगा—इसके सौंदर्य सेइसकी कोमलता सेइसकी अपूर्व गरिमाइसके प्रसाद सेइसकी सुगंध आकाश में उड़ेगी—यह बीज को देख कर तो पता भी नहीं चलता। बीज को तो देख कर इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकताअनुमान भी नहीं कर सकता। लेकिन एक दिन यह घटता है।
तो दो तरह से हम सोच सकते हैं। या तो हम बीज को पकड़ लें जोर से और हम कहेंजो बीज में दिखाई नहीं पड़ा वह कमल में भी घट नहीं सकता। यह भ्रम है। यह धोखा है। यह झूठ है।
जिनको हम तर्कनिष्ठ कहते हैंसंदेहशील कहते हैंउनका यही आधार है। वे कहते हैंजो बीज में नहीं दिखायी पड़ा वह फूल में हो नहीं सकताकहीं भ्रांति हो रही है।
इसलिए संदेहशील व्यक्ति बुद्ध को मान नहीं पातामहावीर को स्वीकार नहीं कर पाताजीसस को अंगीकार नहीं कर पाता। क्योंकि वे कहते हैंहमने जाना इनको।
जीसस अपने गाव में आयेबड़े हैरान हुए. गाव के लोगों ने कोई चिंता ही न की। जीसस का वक्तव्य है कि पैगंबर की अपने गांव में पूजा नहीं होती। कारण क्या रहा होगाक्यों नहीं होती गाव में पूजा पैगंबर कीगाव के लोगों ने बचपन से देखा : बढ़ई जोसेफ का लड़का है! लकड़ियां ढोते देखारिंदा चलाते देखालकड़ियां चीरते देखापसीने से लथपथ देखासड़कों पर खेलते देखाझगड़ते देखा। गाव के लोग इसे बचपन से जानते हैं—बीज की तरह देखा। आज अचानक यह हो कैसे सकता है कि यह परमात्मा का पुत्र हो गया!
नहींजिसने बीज को देखा हैवह फूल को मान नहीं पाता। वह कहता हैजरूर धोखा होगाबेईमानी होगी। यह आदमी पाखंडी है।
बुद्ध अपने घर वापस लौटेतो पिता. सारी दुनिया को जो दिखाई पड़ रहा था वह पिता को दिखायी नहीं पड़ा! सारी दुनिया अनुभव कर रही थी एक प्रकाशदूर—दूर तक खबरें जा रही थींदूर देशों से लोग आने शुरू हो गये थेलेकिन जब बुद्ध वापस घर आये बारह साल बादतो पिता ने कहा मैं तुझे अभी भी क्षमा कर सकता हूँ यद्यपि तूने काम तो बुरा किया है,सताया तो तूने हमें, अपराध तो तूने किया हैलेकिन मेरे पास पिता का हृदय है। मैं माफ कर दूंगा। द्वार तेरे लिए खुले हैं। मगर फेंक यह भिक्षा का पात्र! हटा यह भिक्षु का वेश! यह सब नहीं चलेगा। तू वापस लौट आ। यह राज्य तेरा है। मैं का हो गयाइसको कौन सम्हालेगाहो गया बचपना बहुतअब बंद करो यह सब खेल!
बुद्ध ने कहा. कृपा कर मुझे देखें तो! जो गया था वह वापिस नहीं आया है। यह कोई और ही आया है। जो आपके घर पैदा हुआ था वही वापिस नहीं आया है। यह कोई और ही आया है। बीज फूल हो कर आया है। गौर से तो देखो।
पिता ने कहातू मुझे सिखाने चला हैपहले दिन सेजब तू पैदा हुआ थातबसे तुझे जानता हूं। किसी और को धोखा देना। किसी और को समझा लेनाभ्रम में डाल देना। मुझे तू भ्रम में न डाल पायेगा। मैं फिर कहता हूं। मैं तुझे भलीभांति जानता हूं। मुझे कुछ सिखाने की चेष्टा मत कर। क्षमा करने को मैं राजी हूं।
बुद्ध ने कहा : आपऔर मुझे जानते हैं! मैं तो स्वयं को भी नहीं जानता था। अभी—अभी किरणें उतरी हैं और स्वयं को जाना हूं। क्षमा करें! लेकिन यह मुझे कहना ही पड़ेगा कि जिसको आपने देखावह मैं नहीं हूं। और जहां तक आपने देखावह मैं नहीं हूं। बाहर—बाहर आपने देखाभीतर आपने कहां देखामैं आपसे पैदा हुआ हूं लेकिन आपने मुझे निर्मित नहीं किया। मैं आपसे आया हूं जैसे एक रास्ते से कोई राहगीर आता हैलेकिन रास्ता और राहगीर का क्या लेना—देनाकल रास्ता कहने लगे कि मैं तुझे पहचानता हूं तू मेरे से ही तो होकर आया है—ऐसे ही आप कह रहे हैं। आपके पहले भी मैं था। जन्मों—जन्मों से मेरी यात्रा चल रही है। आपसे गुजरा जरूर हूं ऐसा मैं औरों से भी गुजरा हूं। और भी मेरे पिता थेऔर भी मेरी माताएं थीं। लेकिन मेरा होना बडा अलग— थलग है।
कठिन है बहुतअति कठिन है! अगर बीज देखा तो फूल पर भरोसा नहीं आता।
एक तो ढंग है अश्रद्धालु कातर्कवादी कासंदेहशील काकि वह कहता है कि बीज को हम पहचानते हैंतो फूल हो नहीं सकता। हम कीचड़ को जानते हैंउस कीचड़ से कमल हो कैसे सकता हैसब गलत! सपना होगा। भ्रांति होगी। किसी मोह—जाल में पड़ गये होओगे। किसी ने धोखा दे दिया। कोई जादू कोई तिलिस्म। एक तो यह रास्ता है।
एक रास्ता है श्रद्धालु का—प्रेमी काभक्त कासहानुभूति से भरे हृदय का—वह फूल को देखता है और फूल से पीछे की तरफ यात्रा करता है। वह कहता हैजब फूल में ऐसी सुगंध हुईजब फूल में ऐसी विभा प्रगट हुईजब फूल में ऐसी प्रतिभा,जब फूल में ऐसा कुंआरापन दिखातो जरूर बीज में भी रहा होगा। क्योंकि जो फूल में हुआ है वह बीज में न होतो हो ही नहीं सकता।
ये सारी कथाएं घटी हैंऐसा नहीं। जिन्होंने अष्टावक्र के फूल को देखाउनको यह खयाल में आया कि जो आज हुआ है वह कल भी रहा होगा—छिपा थाअवगुंठित थापरदे में पड़ा था। जो आज हैअंत में हैवह प्रथम भी रहा होगा। जो मृत्यु के क्षण में दिखायी पड़ रहा हैवह जन्म के क्षण में भी मौजूद रहा होगाअन्यथा पैदा कैसे होता!
तो एक तो ढंग है फूल से पीछे की तरफ देखनाऔर एक है बीज से आगे की तरफ देखना। गौर से देखो तो दोनों में सार—सूत्र एक ही हैदोनों की आधारभित्ति एक ही हैलेकिन कितना जमीन— आसमान का अंतर हो जाता है! जो बीज वाला है,वह भी यह कह रहा है कि जो बीज में नहीं है वह फूल में कैसे हो सकता है! यह उसका तर्क है। फूल वाला भी यही कह रहा है। वह कह रहा हैजो फूल में है वह बीज में भी होना ही चाहिए। दोनों का तर्क तो एक है। लेकिन दोनों के देखने के ढंग अलग हैं। बड़ी अड़चन है!
मुझसे कोई पूछता था कि आपके साथ बचपन में बहुत लोग पढ़े होंगे—स्कूल मेंकालेज में—वे दिखायी नहीं पड़ते! वे कैसे दिखायी पड़ सकते हैं! उनको बड़ी अड़चन है। वे भरोसा नहीं कर सकते। अति कठिन है उन्हें।
कल ही मेरे पास रायपुर से किसी ने एक अखबार भेजा। श्री हरिशंकर परसाई ने एक लेख मेरे खिलाफ लिखा है। वे मुझे जानते हैंकालेज के दिनों से जानते हैं। हिंदी के मूर्धन्य व्यंग्यलेखक हैं। मेरे मन में उनकी कृतियों का आदर है। लेख में उन्होंने लिखा है कि जबलपुर की हवा में कुछ खराबी है। यहां धोखेबाज और धूर्त ही पैदा होते हैं—जैसे रजनीशमहेश योगीमूंदड़ा। तीन नाम उन्होंने गिनाए। धन्यवाद उनकाकम से कम मेरा नाम नंबर एक तो गिनाया। इतनी याद तो रखी! एकदम बिसार नहीं दिया। बिलकुल भूल गये होंऐसा नहीं है।
लेकिन अड़चन स्वाभाविक हैसीधी—साफ है। मैं उनकी बात समझ सकता हूं। यह असंभव है—बीज को देखा तो फूल में भरोसा! फिर जिन्होंने फूल को देखाउन्हें बीज में भरोसा मुश्किल हो जाता है। तो सभी महापुरुषों की जीवन—कथाएं दो ढंग से लिखी जाती हैं। जो उनके विपरीत हैंवे बचपन से यात्रा शुरू करते हैंजो उनके पक्ष में हैंवे अंत से यात्रा शुरू करते हैं और बचपन की तरफ जाते हैं। दोनों एक अर्थ में सही हैं। लेकिन जो बचपन से यात्रा करके अंत की तरफ जाते हैंवे वंचित रह जाते हैं। उनका सही होना उनके लिए आत्मघाती हैजो अंत से यात्रा करते हैं और पीछे की तरफ जाते हैंवे धन्यभागी हैं। क्योंकि बहुत कुछ उन्हें अनायास मिल जाता हैजो कि पहले तर्कवादियो को नहीं मिल पाता।
अब न केवल मैं गलत मालूम होता हूं मेरे कारण जबलपुर तक की हवा उनको गलत मालूम होती है. कुछ भूल हवा—पानी में होनी चाहिए! यद्यपि मैं उनको कहना चाहूंगाजबलपुर को कोई हक नहीं है मेरे संबंध में हवा—पानी को अच्छा या खराब तय करने का। जबलपुर से मेरा कोई बहुत नाता नहीं है। थोड़े दिन वहां था। महेश योगी भी थोड़े दिन वहां थे। उनका भी कोई नाता नहीं है। हम दोनों का नाता किसी और जगह से है। उस जगह के लोग इतने सोए हैं कि उन्हें अभी खबर ही नहीं है। महेश योगी और मेरा जन्म पास ही पास हुआ। दोनों गाडरवाड़ा के आस—पास पैदा हुए। उनका जन्म चीचली में हुआमेरा जन्म कुछवाड़े में हुआ। अगर हवा—पानी खराब है तो वहां का होगा। इसका दुख गाडरवाड़ा को होना चाहिए—कभी होगा। या सुख...। जबलपुर को इसमें बीच में आना नहीं चाहिए।
लेकिन मन कैसे तर्क रचता है!
अब जो अष्टावक्र की कथा को देखेगावह सुनते से ही कह देगा : 'गलत! असंभव!यह तो कथा जिन्होंने लिखी है उनको भी पता है कि कहीं कोई गर्भ से बोलता है! वे तो केवल इतना कह रहे हैं कि जो आखिर में प्रगट हुआ वह गर्भ में मौजूद रहा होगाजो वाणी आखिर में खिली वह किसी न किसी गहरे तल पर गर्भ में भी मौजूद रही होगीअन्यथा खिलती कहां से,आती कहां सेशून्य से थोड़े ही कुछ आता है! हर चीज के पीछे कारण है। नहीं देख पाये हों हमलेकिन था तो मौजूद। ये सारी कथाएं इसी का सूचन देती हैं।
अष्टावक्र के संबंध में दूसरी बात जो ज्ञात हैवह है जब वे बारह वर्ष के थे। बस दो ही बातें ज्ञात हैं। तीसरी उनकी अष्टावक्र—गीता हैया कुछ लोग कहते हैं 'अष्टावक्र—संहिता'। जब वे बारह वर्ष के थे तो एक बड़ा विशाल शास्त्रार्थ जनक ने रचा। जनक सम्राट थे और उन्होंने सारे देश के पंडितों को निमंत्रण दिया। और उन्होंने एक हजार गायें राजमहल के द्वार पर खड़ी कर दीं और उन गायों के सींगों पर सोना मढ़ दिया और हीरे—जवाहरात लटका दियेऔर कहा, 'जो भी विजेता होगा वह इन गायों को हांक कर ले जाये।
बड़ा विवाद हुआ! अष्टावक्र के पिता भी उस विवाद में गये। खबर आई सांझ होते—होते कि पिता हार रहे हैं। सबसे तो जीत चुके थेवंदिन नाम के एक पंडित से हारे जा रहे हैं। यह खबर सुन कर अष्टावक्र भी राजमहल पहुंच गया। सभा सजी थी। विवाद अपनी आखिरी चरम अवस्था में था। निर्णायक घड़ी करीब आती थी। पिता के हारने की स्थिति बिलकुल पूरी तय हो चुकी थी। अब हारे तब हारे की अवस्था थी।
अष्टावक्र दरबार में भीतर चला गया। पंडितों ने उसे देखा। महापंडित इकट्ठे थे! उसका आठ अंगों से टेढ़ा—मेढ़ा शरीर! वह चलता तो भी देख कर लोगों को हंसी आती। उसका चलना भी बड़ा हास्यास्पद था। सारी सभा हंसने लगी। अष्टावक्र भी खिलखिला कर हंसा। जनक ने पूछा. 'और सब हंसते हैंवह तो मैं समझ गया क्यों हंसते हैंलेकिन बेटेतू क्यों हंसा?'
अष्टावक्र ने कहा. 'मैं इसलिए हंस रहा हूं कि इन चमारों की सभा में सत्य का निर्णय हो रहा है!बड़ा... आदमी अनूठा रहा होगा! 'ये चमार यहां क्या कर रहे हैं?'
सन्नाटा छा गया!.. चमार! सम्राट ने पूछा. 'तेरा मतलब?' उसने कहा: 'सीधी—सी बात है। इनको चमड़ी ही दिखायी पड़ती हैमैं नहीं दिखायी पड़ता। मुझसे सीधा—सादा आदमी खोजना मुश्किल हैवह तो इनको दिखायी ही नहीं पड़ताइनको आड़ा—टेढ़ा शरीर दिखायी पड़ता है। ये चमार हैं! ये चमड़ी के पारखी हैं। राजनमंदिर के टेढ़े होने से कहीं आकाश टेढ़ा होता हैघड़े के फूटे होने से कहीं आकाश फूटता हैआकाश तो निर्विकार है। मेरा शरीर टेढ़ा—मेढ़ा हैलेकिन मैं तो नहीं। यह जो भीतर बसा है इसकी तरफ तो देखो! इससे तुम सीधा—सादा और कुछ खोज न सकोगे।
यह बड़ी चौंकाने वाली घोषणा थीसन्नाटा छा गया होगा। जनक प्रभावित हुआझटका खाया। निश्चित ही कहां चमारों की भीड़ इकट्ठी करके बैठा है! खुद पर भी पश्चात्ताप हुआअपराध लगा कि मैं भी हंसा। उस दिन तो कुछ न कहते बना,लेकिन दूसरे दिन सुबह जब सम्राट घूमने निकला था तो राह पर अष्टावक्र दिखायी पड़ा। उतरा घोड़े सेपैरों में गिर पड़ा। सबके सामने तो हिम्मत न जुटा पायाएक दिन पहले। एक दिन पहले तो कहा था, 'बेटेतू क्यों हंसता है?' बारह साल का लड़का था। उम्र तौली थी। आज उम्र नहीं तौली। आज घोड़े से उतर गयापैर पर गिर पड़ा—साष्टांग दंडवत! और कहा : पधारें राजमहलमेरी जिज्ञासाओं का समाधान करें! हे प्रभुआयें मेरे घर! बात मेरी समझ में आ गई है! रात भर मैं सो न सका। ठीक ही कहा : शरीर को ही जो पहचानते हैं उनकी पहचान गहरी कहां! आत्मा के संबंध में विवाद कर रहे हैंऔर अभी भी शरीर में रस और विरस पैदा होता हैघृणाआकर्षण पैदा होता है! मर्त्य को देख रहे हैंअमृत की चर्चा करते हैं! धन्यभाग मेरे कि आप आये और मुझे चौंकाया! मेरी नींद तोड़ दी! अब पधारो!
राजमहल में उसने बड़ी सजावट कर रखी थी। स्वर्ण—सिंहासन पर बिठाया था इस बारह साल के अष्टावक्र को और उससे जिज्ञासा की। पहला सूत्र जनक की जिज्ञासा है। जनक ने पूछा हैअष्टावक्र ने समझाया है।
इससे ज्यादा अष्टावक्र के संबंध में और कुछ पता नहीं है—और कुछ पता होने की जरूरत भी नहीं है। काफी हैइतना बहुत है। हीरे बहुत होते भी नहींकंकड़—पत्थर ही बहुत होते हैं। हीरा एक भी काफी होता है। ये दो छोटी—सी घटनाएं हैं।
एक तो जन्म के पहले की : गर्भ से आवाज और घोषणा कि 'क्या पागलपन में पड़े होशास्त्र में उलझे होशब्द में उलझे होजागो! यह ज्ञान नहीं हैयह सब उधार है। यह सब बुद्धि का ही जाल हैअनुभव नहीं है। इसमें रंचमात्र भी सार नहीं है। कब तक अपने को भरमाये रखोगे?'
और दूसरी घटना : राजमहल में हंसना पंडितों का और कहना अष्टावक्र काकि जीवन में देखने की दो दृष्टियां हैं—एक आत्म—दृष्टिएक चर्म—दृष्टि। चमार चमड़ी को देखता है। प्रज्ञावान आत्मा को देखता है।
तुमने गौर कियाचमार तुम्हारे चेहरे की तरफ देखता ही नहींवह जूते को ही देखता है। असल में चमार जूते को देख कर सब पहचान लेता है तुम्हारे संबंध में कि आर्थिक हालत कैसी हैसफलता मिल रही है कि विफलता मिल रही हैभाग्य कैसा चल रहा है। वह सब जूते में लिखा है। जूते की सिलवटें कह देती हैं। जूते की दशा कह देती है। जूते में तुम्हारी आत्मकथा लिखी है। चमार पढ़ लेता है। जूते में चमकजूते का ताजा और नया होनाचमार तुमसे प्रसन्नता से मिलता है। जूता ही उसके लिए तुम्हारी आत्मा का सबूत है।
दर्जी कपड़े देखता है। तुम्हारा कोट—कपड़ा देख कर समझ लेता हैहालत कैसी है।
सबकी अपनी बंधी हुई दृष्टियां हैं।
सिर्फ आत्मवान ही आत्मा को देखता है। उसकी कोई दृष्टि नहीं है। उसके पास दर्शन है।
एक छोटी घटना और—जों अष्टावक्र के जीवन से संबंधित नहींरामकृष्ण और विवेकानंद के जीवन से संबंधित हैलेकिन अष्टावक्र से उसका जोड़ है—फिर हम सूत्रों में प्रवेश करें।
विवेकानंद रामकृष्ण के पास आयेतब उनका नाम 'नरेंद्रनाथथा।विवेकानंदतो बाद में रामकृष्ण ने उनको पुकारा। जब आये रामकृष्ण के पास तो अति विवादी थेनास्तिक थेतर्कवादी थे। हर चीज के लिए प्रमाण चाहते थे।
कुछ चीजें हैं जिनके लिए कोई प्रमाण नहीं—मजबूरी है। परमात्मा के लिए कोई प्रमाण नहीं हैहै और प्रमाण नहीं है। प्रेम के लिए कोई प्रमाण नहीं हैहै और प्रमाण नहीं है। सौंदर्य के लिए कोई प्रमाण नहीं हैहै और प्रमाण नहीं है।
अगर मैं कहूं देखो ये खजूरिना के वृक्ष कैसे सुंदर हैंऔर तुम कहो, 'हमें तो कोई सौंदर्य दिखायी नहीं पड़ता। वृक्ष जैसे वृक्ष हैं। सिद्ध करें।मुश्किल हो जायेगी। कैसे सिद्ध करें कि सुंदर हैं! सुंदर होने के लिए सौंदर्य की परख चाहिए—और तो कोई उपाय नहीं। आंख चाहिए—और तो कोई उपाय नहीं।
कहते हैंमजनू ने कहा कि लैला को जानना हों तो मजनू की आंख चाहिए। ठीक कहा। लैला को देखने का और कोई उपाय ही नहीं।
मजनू को बुलाया था उसके गाव के राजा ने और कहा था. तू पागल है! मैं तेरी लैला को जानता हूं साधारण—सी लड़की हैकाली—कलूटीकुछ खास नहीं। तुझ पर मुझे दया आती है। ये मेरे राजमहल की बारह लड़कियां खड़ी हैंये इस देश की सुंदरतम स्त्रियां हैंइनमें से तू कोई भी चुन ले। यह तुझे रोते देख कर मेरा भी प्राण रोता है।
उसने देखा और उसने कहा. इनमें तो लैला कोई भी नहीं। ये लैला के मुकाबले तो दूरउसके चरण की धूल भी नहीं।
सम्राट कहने लगा. मजनू तू पागल है।
मजनू ने कहा : यह हो सकता है। लेकिन एक बात आपसे कहना चाहता हूं—लैला को देखना हो तो मजनू की आंख चाहिए। ठीक कहा मजनू ने।
अगर वृक्षों के सौंदर्य को देखना हो तो कला की आंख चाहिए—और कोई प्रमाण नहीं है। अगर किसी के प्रेम को पहचानना हो तो प्रेमी का हृदय चाहिए—और कोई प्रमाण नहीं है। और परमात्मा तो इस जगत के सारे सौंदर्य और सारे प्रेम और सारे सत्य का इकट्ठा नाम है। उसके लिए तो ऐसा निर्विकार चित्त चाहिएऐसा साक्षी— भाव चाहिएजहां कोई शब्द न रह जायेकोई विचार न रह जायेकोई तरंग न उठे। वहां कोई धूल न रह जाये मन की और चित्त का दर्पण परिपूर्ण शुद्ध हो! प्रमाण कहां?रामकृष्ण से विवेकानंद ने कहा : प्रमाण चाहिए। है परमात्मा तो प्रमाण दें।
और विवेकानंद को देखा रामकृष्ण ने। बड़ी थी संभावनाएं इस युवक की। बड़ी थी यात्रा इसके भविष्य की। बहुत कुछ होने को पड़ा था इसके भीतर। बड़ा खजाना थाउससे यह अपरिचित है। रामकृष्ण ने देखाइस युवक के पिछले जन्मों में झांका। यह बड़ी संपदाबड़े पुण्य की संपदा ले कर आ रहा है। यह ऐसे ही तर्क में दबा न रह जाये। कराह उठा होगा पीड़ा और करुणा से रामकृष्ण का हृदय। उन्होंने कहा, 'छोड़प्रमाण वगैरह बाद में सोच लेंगे। मैं जरा बूढ़ा हुआमुझे पढ़ने में अड़चन होती है। तू अभी जवानतेरी आंख अभी तेज—यह किताब पड़ी हैइसे तू पढ़।’ वह थी अष्टावक्र—गीता। जरा मुझे सुना दे।'
कहते हैंविवेकानंद को इसमें तो कुछ अड़चन न मालूम पड़ीयह आदमी कुछ ऐसी तो कोई खास बात नहीं मांग रहा है! दो—चार सूत्र पढ़े और एक घबड़ाहटऔर रोआं—रोआं कंपने लगा! और विवेकानंद ने कहामुझसे नहीं पढ़ा जाता। रामकृष्ण ने कहा : पढ़ भी! इसमें हर्ज क्या हैतेरा क्या बिगाड़ लेगी यह किताबतू जवान है अभी। तेरी आंख अभी ताजी हैं। और मैं बूढ़ा हुआमुझे पढ़ने में दिक्कत होती है। और यह किताब मुझे पढ़नी है तो तू पढ़ कर सुना दे।
कहते हैं उस किताब को सुनाते—सुनाते ही विवेकानंद डूब गये। रामकृष्ण ने देखा इस व्यक्ति के भीतर बड़ी संभावना है,बड़ी शुद्ध संभावना हैजैसी एक बोधिसत्व की होती है जो कभी न कभी बुद्ध होना जिसका निर्णीत हैआज नहीं कलभटके कितना हीबुद्धत्व जिसके पास चला आ रहा है। क्यों अष्टावक्र की गीता रामकृष्ण ने कही कि तू पढ़ कर मुझे सुना दे?क्योंकि इससे ज्यादा शुद्धतम वक्तव्य और कोई नहीं। ये शब्द भी अगर तुम्हारे भीतर पहुंच जायें तो तुम्हारी सोयी हुई आत्मा को जगाने लगेंगे। ये शब्द तुम्हें तरंगायित करेंगे। ये शब्द तुम्हें आह्लादित करेंगे। ये शब्द तुम्हें झकझोरेंगे। इन शब्दों के साथ क्रांति घटित हो सकती है।
अष्टावक्र की गीता को मैंने यूं ही नहीं चुना है। और जल्दी नहीं चुना—बहुत देर करके चुना हैसोच—विचार कर। दिन थे,जब मैं कृष्ण की गीता पर बोलाक्योंकि भीड़— भाड़ मेरे पास थी। भीड़— भाड़ के लिए अष्टावक्र—गीता का कोई अर्थ न था। बड़ी चेष्टा करके भीड़— भाड़ से छुटकारा पाया है। अब तो थोड़े—से विवेकानंद यहां हैं। अब तो उनसे बात करनी हैजिनकी बड़ी संभावना है। उन थोड़े से लोगों के साथ मेहनत करनी हैजिनके साथ मेहनत का परिणाम हो सकता है। अब हीरे तराशने हैं,कंकड़—पत्थरों पर यह छैनी खराब नहीं करनी। इसलिए चुनी है अष्टावक्र की गीता। तुम तैयार हुए होइसलिए चुनी है।
 पहला सूत्र :
जनक ने कहा, 'हे प्रभोपुरुष ज्ञान को कैसे प्राप्त होता है। और मुक्ति कैसे होगी और वैराग्य कैसे प्राप्त होगायह मुझे कहिए! एतत मम लूहि प्रभो! मुझे समझायें प्रभो!'
बारह साल के लड़के से सम्राट जनक का कहना है : 'हे प्रभु! भगवान! मुझे समझायें!
एतत मम लूहि!
मुझ नासमझ को कुछ समझ दें! मुझ अज्ञानी को जगायें!तीन प्रश्न पूछे हैं—
'कथं ज्ञानम्! कैसे होगा ज्ञान!'
साधारणत: तो हम सोचेंगे कि 'यह भी कोई पूछने की बात हैकिताबों में भरा पड़ा है।’ जनक भी जानता था। जो किताबों में भरा पड़ा हैवह ज्ञान नहींवह केवल ज्ञान की धूल हैराख है! ज्ञान की ज्योति जब जलती है तो पीछे राख छूट जाती है। राख इकट्ठी होती चली जाती हैशास्त्र बन जाती है। वेद राख हैं—कभी जलते हुए अंगारे थे। ऋषियों ने उन्हें अपनी आत्मा में जलाया था। फिर राख रह गये। फिर राख संयोजित की जाती हैसंगृहीत की जाती हैसुव्यवस्थित की जाती है। जैसे जब आदमी मर जाता है तो हम उसकी राख इकट्ठी कर लेते हैं—उसको फूल कहते हैं। बड़े मजेदार लोग हैं! जिंदगी में जिसको फूल नहीं कहाउसकी हड्डिया—वड्डिया इकट्ठी कर लाते हैं—कहते हैं, 'फूल संजो लाये'! फिर सम्हाल कर रखते हैंमंजूषा बनाते हैं। जिसको जिंदगी में कभी फूल का आदर नहीं दियाजिसको जिंदगी में कभी फूल की तरह देखा नहींजब मर जाता है—आदमी पागल है—तब उसकी हड्डी कोराख को फूल कहते हैं!
ऐसे ही जब कोई बुद्ध जीवित होता हैतब तुम सुनते नहीं। जब कोई महावीर तुम्हारे बीच से गुजरता हैतब तुम नाराज होते हो। लगता हैयह आदमी तुम्हारे सपने तोड़ रहा हैया तुम्हारी नींद में दखल डाल रहा है।यह कोई जगाने का वक्त हैअभी—अभी तो सपना आना शुरू हुआ थाअभी—अभी तो जरा जीतना शुरू किया था जिंदगी मेंअभी—अभी तो दाव ठीक लगने लगे थेतीर ठीक—ठीक जगह पड़ने लगा था—और ये सज्जन आ गये! ये कहते हैंसब असार है! अभी—अभी तो चुनाव जीते थे:पद पर पहुंचने का रास्ता बना था—और ये महापुरुष आ गये! ये कहते हैंयह सब सपना हैइसमें कुछ सार नहींमौत आयेगीसब छीन लेगी! और छोड़ो भीजब मौत आयेगी
तब देखेंगेबीच में तो इस तरह की बातें मत उठाओ!'
लेकिन जब महावीर मर जातेबुद्ध मर जातेतब उनकी राख को हम इकट्ठी कर लेते हैं। फिर हम धम्मपद बनाते हैं,वेद बनाते हैं। फिर हम पूजा के फूल चढ़ाते हैं।
जनक भी जानता था कि शास्त्रों में सूचनाएं भरी पड़ी हैं। लेकिन उसने पूछा, 'कथं ज्ञानम्कैसे होगा ज्ञान?' क्योंकि कितना ही जान लोज्ञान तो होता ही नहीं। जानते जाओजानते जाओशास्त्र कंठस्थ कर लोतोते बन जाओएक—एक सूत्र याद हो जायेपूरे वेद स्मृति में छप जायें—फिर भी ज्ञान तो होता नहीं।
'कथं ज्ञानम्?
कैसे होगा ज्ञानकथं मुक्तिमुक्ति कैसे होगी?'
क्योंकि जिसको तुम ज्ञान कहते होवह तो बांध लेता उलटेमुक्त कहां करताज्ञान तो वही है जो मुक्त करे। जीसस ने कहा हैसत्य वही है जो मुक्त करे। ज्ञान तो वही है जो मुक्त करे—यह ज्ञान की कसौटी है। पंडित मुक्त तो दिखाई नहीं पड़ताबंधा दिखाई पड़ता है। मुक्ति की बातें करता हैमुक्त दिखाई नहीं पड़ताहजार बंधनों में बंधा हुआ मालूम पड़ता है।
तुमने कभी गौर कियातुम्हारे तथाकथित संत तुमसे भी ज्यादा बंधे हुए मालूम पड़ते हैं! तुम शायद थोड़े—बहुत मुक्त भी होतुम्हारे संत तुमसे भी ज्यादा बंधे हैं। लकीर के फकीर हैंन उठ सकते स्वतंत्रता सेन बैठ सकते स्वतंत्रता सेन जी सकते स्वतंत्रता से।
कुछ दिनों पहले कुछ जैन साध्वियों की मेरे पास खबर आई कि वे मिलना चाहती हैंमगर श्रावक आने नहीं देते। यह भी बड़े मजे की बात हुई! साधु का अर्थ होता हैजिसने फिक्र छोड़ी समाज कीजो चल पड़ा अरण्य की यात्रा परजिसने कहा,अब न तुम्हारे आदर की मुझे जरूरत है न सम्मान की। लेकिन साधु—साध्वी कहते हैं, 'श्रावक आने नहीं देते! वे कहते हैंवहां भूल कर मत जाना। वहां गये तो यह दरवाजा बंद!यह कोई साधुता हुईयह तो परतंत्रता हुईगुलामी हुई। यह तो बड़ी उलटी बात हुई। यह तो ऐसा हुआ कि साधु श्रावक को बदलेउसकी जगह श्रावक साधु को बदल रहा है। एक मित्र ने आ कर मुझे कहा कि एक जैन साध्वी आपकी किताबें पढ़ती हैलेकिन चोरी सेटेप भी सुनना चाहती हैलेकिन चोरी से। और अगर कभी किसी के सामने आपका नाम भी ले दो तो वह इस तरह हो जाती है जैसे उसने कभी आपका नाम सुना ही नहीं।
यह मुक्ति हुई?
जनक ने पूछा, 'कथं मुक्ति?
कैसे होती मुक्तिक्या है मुक्तिउस ज्ञान को मुझे समझायेंजो मुक्त कर देता है।
स्वतंत्रता मनुष्य की सबसे महत्वपूर्ण आकांक्षा है। सब पा लोलेकिन गुलामी अगर रही तो छिदती है। सब मिल जाये,स्वतंत्रता न मिले तो कुछ भी नहीं मिला। मनुष्य चाहता है खुला आकाश। कोई सीमा न हो! वह मनुष्य की अंतरतमनिगढ़तम आकांक्षा हैजहां कोई सीमा न होकोई बाधा न हो। इसी को परमात्मा होने की आकांक्षा कहोमोक्ष की आकांक्षा कहो।
हमने ठीक शब्द चुना है 'मोक्ष'; दुनिया की किसी भाषा में ऐसा प्यारा शब्द नहीं है। स्वर्गफिरदौस—इस तरह के शब्द हैं,लेकिन उन शब्दों में मोक्ष की कोई धुन नहीं है। मोक्ष का संगीत ही अनूठा है। उसका अर्थ ही केवल इतना है : ऐसी परम स्वतंत्रता जिस पर कोई बाधा नहीं हैस्वतंत्रता इतनी शुद्ध कि जिस पर कोई सीमा नहीं है।
पूछा जनक ने, 'कैसे होगी मुक्ति और कैसे होगा वैराग्यहे प्रभुमुझे समझा कर कहिए!अष्टावक्र ने गौर से देखा होगा जनक की तरफक्योंकि गुरु के लिए वही पहला काम है कि जब कोई जिज्ञासा करे तो वह गौर से देखे. 'जिज्ञासा किस स्रोत से आती हैपूछने वाले ने क्यों पूछा है?' उत्तर तो तभी सार्थक हो सकता है जब प्रश्न क्यों किया गया हैवह समझ में आ जाये,वह साफ हो जाए।
ध्यान रखनासदज्ञान को उपलब्ध व्यक्तिसदगुरु तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं देता—तुम्हें उत्तर देता है! तुम क्या पूछते होइसकी फिक्र कम हैतुमने क्यों पूछा हैतुम्हारे पूछने के पीछे अंतरचेतन में छिपा हुआ जाल क्या हैतुम्हारे प्रश्नों की आड़ में वस्तुत: कौन—सी आकांक्षा छिपी है..!
दुनिया में चार तरह के लोग हैं—ज्ञानीमुमुक्षुअज्ञानीमूढ़। और दुनिया में चार ही तरह की जिज्ञासाए होती हैं। ज्ञानी की जिज्ञासा तो नि:शब्द होती है। कहना चाहिएज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा होती ही नहीं—जान लियाजानने को कुछ बचा नहींपहुंच गयेचित्त निर्मल हुआशांत हुआघर लौट आयेविश्राम में आ गये! तो ज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा जैसी होती ही नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि ज्ञानी सीखने को तैयार नहीं होता। ज्ञानी तो सरलछोटे बच्चे की भांति हो जाता है—सदा तत्पर सीखने को।
जितना ज्यादा तुम सीख लेते होउतनी ही सीखने की तत्परता बढ़ जाती है। जितने तुम सरल और निष्कपट होते चले जाते होउतने ही सीखने के लिए तुम खुल जाते हो। आयें हवाएंतुम्हारे द्वार खुले पाती हैं। आये सूरजतुम्हारे द्वार पर दस्तक नहीं देनी पड़ती। आये परमात्मातुम्हें सदा तत्पर पाता है।
ज्ञान—ज्ञान को संगृहीत नहीं करताज्ञानी सिर्फ ज्ञान की क्षमता को उपलब्ध होता है। इस बात को ठीक से समझ लेना,क्योंकि पीछे यह काम पड़ेगी। ज्ञानी का केवल इतना ही अर्थ है कि जो जानने के लिए बिलकुल खुला हैजिसका कोई पक्षपात नहींजानने के लिए जिसके पास कोई परदा नहींजिसके पास जानने के लिए कोई पूर्व—नियोजित योजनाढांचा नहीं। ज्ञानी का अर्थ है ध्यानी जो ध्‍यान पूर्ण है।
तो देखा होगा अष्‍टावक्र ने गौर सेजनक में झांक कर : यह व्यक्ति ज्ञानी तो नहीं है। यह ध्यान को तो उपलब्ध नहीं हुआ है। अन्यथा इसकी जिज्ञासा मौन होतीउसमें शब्द न होते।
बुद्ध के जीवन में उल्लेख है—एक फकीर मिलने आया। एक साधु मिलने आया। एक परिव्राजक घुमक्कड़। उसने आकर बुद्ध से कहा : 'पूछने योग्य शब्द मेरे पास नहीं। क्या पूछना चाहता हूं उसे शब्‍दों में। बांधने की मेरे पास कोई कुशलता नहीं। आप तो जानते ही हैंसमझ लें। जो मेरे योग्य हो, कह दें।
यह ज्ञानी की जिज्ञासा है।
बुद्ध चुप बैठे रहेउन्होंने कुछ भी न कहा। घड़ी भर बादजैसे कुछ घटा! वह जो आदमी चुपचाप बैठा बुद्ध की तरफ देखता रहा थाउसकी आंख से आंसुओ की धार लग गईचरणों में झुका नमस्कार किया और कहा, 'धन्यवाद! खूब धन्यभागी हूं! जो लेने आया थाआपने दिया।वह उठकर चला भी गया। उसके चेहरे पर अपूर्व आभा थी। वह नाचता हुआ गया।
बुद्ध के आसपास के शिष्य बड़े हैरान हुए। आनंद ने पूछा. 'भंते! भगवान! पहेली हो गई। पहले तो यह आदमी कहता है कि मुझे पता नहीं कैसे पूछ— पता नहीं किन शब्दों में पूछ— यह भी पता नहीं क्या पूछने आया हूर फिर आप तो जानते ही हैं सबदेख लें मुझेजो मेरे लिए जरूरी होकह दें। पहले तो यह आदमी ही जरा पहेली था.. यह कोई ढंग हुआ पूछने का! और जब तुम्हें यही पता नहीं कि क्या पूछना है तो पूछना ही क्योंपूछना क्याखूब रही! फिर यहीं बात खत्म न हुईआप चुप बैठे सो चुप बैठे रहे! आपको ऐसा कभी मौन देखा नहींकोई पूछता है तो आप उत्तर देते हैं। कभी—कभी तो ऐसा होता है कि कोई नहीं भी पूछता तो भी आप उत्तर देते हैं। आपकी करुणा सदा बहती रहती है। क्या हुआ अचानक कि आप चुप रह गये और आंख बंद हो गईऔर फिर क्या रहस्यमय घटा कि वह आदमी रूपांतरित होने लगा। हमने उसे बदलते देखा। हमने उसे किसी और ही रंग में डूबते देखा। उसमें मस्ती आते देखी। वह नाचते हुए गया है—आंसुओ से भरा हुआगदगदआह्लादित! वह चरणों में झुका। उसकी सुगंध हमें भी छुई। यह हुआ क्याआप कुछ बोले नहींउसने सुना कैसेऔर हम तो इतने दिनों सेवर्षों से आपके पास हैंहम पर आपकी कृपा कम है क्यायह प्रसादजो उसे दियाहमें क्यों नहीं मिलता?'
लेकिन ध्यान रहेउतना ही मिलता है जितना तुम ले सकते हो।
बुद्ध ने कहा, 'सुनो। घोड़े..।आनंद से घोड़े की बात कीक्योंकि आनंद क्षत्रिय थाबुद्ध का चचेरा भाई था और बचपन से ही घोड़े का बड़ा शौक था उसेघुड़सवार था। प्रसिद्ध घुड़सवार थाप्रतियोगी था बड़ा! उन्होंने कहा, 'सुन आनंद!बुद्ध ने कहा : 'घोड़े चार प्रकार के होते हैं। एक तो मारो भी तो भी टस से मस नहीं होते। रही से रही घोड़े! जितना मारो उतना ही हठयोगी हो जाते हैंबिलकुल हठ बांध कर खड़े हो जाते हैं। तुम मारो तो वे जिद्द बना लेते हैं कि देखें कौन जीतता है! फिर दूसरे तरह के घोड़े होते हैं. मारो तो चलते हैंन मारो तो नहीं चलते। कम से कम पहले से बेहतर। फिर तीसरे तरह के घोड़े होते हैं : कोड़ा फटकासेमारना जरूरी नहीं। सिर्फ कोड़ा फटकारोआवाज काफी है। और भी कुलीन होते हैं—दूसरे से भी बेहतर। फिर आनंदतुझे जरूर पता होगा ऐसे भी घोड़े होते हैं कि कोड़े की छाया देख कर भागते हैंफटकारना भी नहीं पड़ता। यह ऐसा ही घोड़ा था। छाया काफी है।
अष्टावक्र ने देखा होगा गौर से।
जब तुम आ कर मुझसे कुछ पूछते हो तो तुम्हारे प्रश्न से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल तुम हो। कभी—कभी तुम्हें भी ऐसा लगता होगा कि तुमने जो नहीं पूछा थावह मैंने उत्तर दिया है। और कभी—कभी तुम्हें ऐसा भी लगता होगा कि शायद मैं टाल गया तुम्हारे प्रश्न कोबचाव कर गयाकुछ और उत्तर दे गया हूं। लेकिन सदा तुम्हारी भीतरी जरूरत ज्यादा महत्वपूर्ण हैतुम क्या पूछते होयह उतना महत्वपूर्ण नहीं। क्योंकि तुम्हें खुद ही ठीक पता नहींतुम क्या पूछते होक्यों पूछते हो। उत्तर वही दिया जाता हैजिसकी तुम्हें जरूरत है। तुम्हारे पूछने से कुछ तय नहीं होता।
देखा होगा अष्टावक्र ने. ज्ञानी तो नहीं है जनक। अज्ञानी है फिर क्याअज्ञानी भी नहीं है। क्योंकि अज्ञानी तो अकड़ीला,अकड़ से भरा होता है। अज्ञानी तो झुकना जानता ही नहीं। यह तो मुझे बारह साल की उम्र के लड़के के पैरों में झुक गया,साष्टांग दंडवत की। यह अज्ञानी के लिए असंभव है। अज्ञानी तो समझता है कि मैं जानता ही हूं मुझे कौन समझायेगा! अज्ञानी अगर कभी पूछता भी है तो तुम्हें गलत सिद्ध करने को पूछता है। क्योंकि अज्ञानी तो यह मान कर ही चलता है कि पता तो मुझे है हीदेखें इनको भी पता है या नहीं! अज्ञानी परीक्षा के लिए पूछता है। नहींइसकी आंखेंजनक की तो बड़ी निर्मल हैं। मुझ बारह साल के अनजान—अपरिचित लड़के को सम्राट होते हुए भी इसने कहा, 'एतत मम बूहि प्रभो! हे प्रभुमुझे समझा कर कहें!नहींयह विनयशील हैअज्ञानी तो नहीं है। मूढ़ है क्या फिरमूढ़ तो पूछते ही नहीं। मूढ़ों को तो पता ही नहीं है कि जीवन में कोई समस्या है।
मूढ़ और बुद्धपुरुषों में एक समानता है। बुद्धपुरुषों के लिए कोई समस्या नहीं रहीमूढ़ों के लिए अभी समस्या उठी ही नहीं। बुद्धपुरुष समस्या के पार हो गये : मूढ़ अभी समस्या के बाहर हैं। मूढ़ तो इतना मूर्च्‍छित है कि उसे कहां सवाल? 'कथं ज्ञानम्'—मूढ़ पूछेगा? 'कथं मुक्ति'—मूढ़ पूछेगा?  'कैसे होगा वैराग्य'—मूढ़ पूछेगाअसंभव!
मूढ़ अगर पूछेगा भी तो पूछता हैराग में सफलता कैसे मिलेगीमूढ़ अगर पूछता भी है तो पूछता हैसंसार में और थोड़े ज्यादा दिन कैसे रहना हो जायेमुक्ति..! नहींमूढ़ पूछता है बंधन सोने के कैसे बनेंबंधन में हीरे—जवाहरात कैसे जड़ें?मूढ़ पूछता भी है तो ऐसी बातें पूछता है। ज्ञान! मूढ़ तो मानता ही नहीं कि ज्ञान हो सकता है। वह तो संभावना को ही स्वीकार नहीं करता। वह तो कहता हैकैसा ज्ञानमूढ़ तो पशुवत जीता है।
नहींयह जनक मूढ़ भी नहीं है—मुमुक्षु है।
'मुमुक्षुशब्द समझना जरूरी है। मोक्ष की आकांक्षा—मुमुक्षा! अभी मोक्ष के पास नहीं पहुंचाज्ञानी नहीं हैमोक्ष के प्रति पीठ करके नहीं खड़ामूढ़ नहीं हैमोक्ष के संबंध में कोई धारणाएं पकड़ कर नहीं बैठाआज्ञानी भी नहीं है—मुमुक्षु है। मुमुक्षु का अर्थ हैसरल है इसकी जिज्ञासान मूढ़ता से अपवित्र हो रही हैन अज्ञानपूर्ण धारणाओं से विकृत हो रही है। शुद्ध है इसकी जिज्ञासा। सरल चित्त से पूछा है।
अष्टावक्र ने कहा, 'हे प्रिययदि तू मुक्ति को चाहता है तो विषयों को विष के समान छोड़ दे और क्षमाआर्जवदया,संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर।
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्यज।
शब्द 'विषयबड़ा बहुमूल्य है—वह विष से ही बना है। विष का अर्थ होता हैजिसे खाने से आदमी मर जाये। विषय का अर्थ होता हैजिसे खाने से हम बार—बार मरते हैं। बार—बार भोगबार—बार भोजनबार—बार महत्वाकांक्षाईर्ष्याक्रोधजलन—बार—बार इन्हीं को खा—खा कर तो हम मरे हैं! बार—बार इन्हीं के कारण तो मरे हैं! अब तक हमने जीवन में जीवन कहा जाना,मरने को ही जाना है। अब तक हमारा जीवन जीवन की प्रज्वलित ज्योति कहांमृत्यु का ही धुआ है। जन्म से ले कर मृत्यु तक हम मरते ही तो हैं धीरे—धीरेजीते कहांरोज—रोज मरते हैं! जिसको हम जीवन कहते हैंवह एक सतत मरने की प्रक्रिया है। अभी हमें जीवन का तो पता ही नहींतो हम जीयेगे कैसेयह शरीर तो रोज क्षीण होता चला जाता है। यह बल तो रोज खोता चला जाता है। ये भोग और विषय तो रोज हमें चूसते चले जाते हैंजराजीर्ण करते चले जाते हैं। ये विषय और कामनाएं तो छेदों की तरह हैंइनसे हमारी ऊर्जा और आत्मा रोज बहती चली जाती है। आखिर में घड़ा खाली हो जाता हैउसको हम मृत्यु कहते हैं।
तुमने कभी देखाअगर छिद्र वाले घड़े को कुएं में डालो तो जब तक घड़ा पानी में डूबा होता हैभरा मालूम पड़ता है;उठाओपानी के ऊपर खींचो रस्सीबस खाली होना शुरू हुआ! जोर का शोरगुल होता है। उसी को तुम जीवन कहते होजलधारें गिरने लगती हैंउसी को तुम जीवन कहते होऔर घड़ा जैसे—जैसे पास आता हाथ केखाली होता चला जाता है। जब हाथ में आता हैतो खाली घड़ा! जल की एक बूंद भी नहीं! ऐसा ही हमारा जीवन है।
बच्चा पैदा नहीं हुआभरा मालूम होता हैपैदा हुआ कि खाली होना शुरू हुआ। जन्म का पहला दिन मृत्यु का पहला दिन है। खाली होने लगा। एक दिन मरादो दिन मरातीन दिन मरा! जिनको तुम 'जन्म—दिनकहते होअच्छा हो, 'मृत्यु—दिनकहो तो ज्यादा सत्यतर होगा .। एक साल मर जाते होउसको कहते होचलो एक जन्म—दिन आ गया! पचास साल मर गयेकहते हो, 'पचास साल जी लियेस्वर्ण—जयंती मनाएं!पचास साल मरे। मौत करीब आ रही हैजीवन दूर जा रहा है। घड़ा खाली हो रहा है! जो दूर जा रहा हैउसके आधार पर तुम जीवन को सोचते हो या जो पास आ रहा है उसके आधार परयह कैसा उलटा गणित! हम रोज मर रहे हैं। मौत करीब सरकती आती है।
अष्टावक्र कहते हैं. विषय हैं विषवतक्योंकि उन्हें खा—खा कर हम सिर्फ मरते हैंउनसे कभी जीवन तो मिलता नहीं।
'यदि तू मुक्ति चाहता हैहे तातहे प्रियतो विषयों को विष के समान छोड़ देऔर क्षमाआर्जवदयासंतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर।
अमृत का अर्थ होता हैजिससे जीवन मिलेजिससे अमरत्व मिलेजिससे उसका पता चले जो फिर कभी नहीं मरेगा।
तो क्षमा!
क्रोध विष हैक्षमा अमृत है।
आर्जव!
कुटिलता विष हैसीधा—सरलपनआर्जव अमृत है।
दया!
कठोरताक्रूरता विष हैदयाकरुणा अमृत है।
संतोष।
असंतोषका कीड़ा खाए चला जाता है। असंतोष का कीड़ा हृदय में कैंसर की तरह हैफैलता चला जाता हैविष को फैलाए चले जाता है।
संतोष—जो है उससे तृप्तिजो नहीं है उसकी आकांक्षा नहीं। जो है वह काफी से ज्यादा है। वह है ही काफी से ज्यादा। आंख खोलोजरा देखो!
संतोष कोई थोपना नहीं है ऊपर जीवन के। जरा गौर से देखोतुम्हें जो मिला है वह तुम्हारी जरूरत से सदा ज्यादा है! तुम्हें जो चाहिए वह मिलता ही रहा है। तुमने जो चाहा हैवह सदा मिल गया है। तुमने दुख चाहा है तो दुख मिल गया है। तुमने सुख चाहा है तो सुख मिल गया है। तुमने गलत चाहा तो गलत मिल गया है। तुम्हारी चाह ने तुम्हारे जीवन को रचा है। चाह बीज हैफिर जीवन उसकी फसल है। जन्मों—जन्मों में जो तुम चाहते रहे हो वही तुम्हें मिलता रहा है। कई बार तुम सोचते हो हम कुछ और चाह रहे हैंजब मिलता है तो कुछ और मिलता है—तो तुम्हारे चाहने में भूल नहीं हुई है सिर्फ तुमने चाहने के लिए गलत शब्द चुन लिया था। जैसे—तुम चाहते हो सफलतामिलती है विफलता। तुम कहते होविफलता मिल रही हैचाही तो सफलता थी।.
लेकिन जिसने सफलता चाही उसने विफलता को स्वीकार कर ही लियावह विफलता से भीतर डर ही गया है। विफलता के कारण ही तो सफलता चाह रहा है। और जब—जब सफलता चाहेगा तब—तब विफलता का खयाल आयेगा। विफलता का खयाल भी मजबूत होता चला जायेगा। सफलता तो कभी मिलेगीलेकिन रास्ते पर यात्रा तो विफलता—विफलता में ही बीतेगी। विफलता का भाव संगृहीभूत होगा। वह इतना संगृहीभूत हो जायेगा कि वही एक दिन प्रगट हो जायेगा। तब तुम कहते हो कि हमने तो सफलता चाही थी। लेकिन सफलता के चाहने में तुमने विफलता को चाह लिया।
लाओत्सु ने कहा है : सफलता चाहीविफलता मिलेगी। अगर सचमुच सफलता चाहिए होसफलता चाहना ही मतफिर तुम्हें कोई विफल नहीं कर सकता।
तुम कहते हो : हमने सम्मान चाहा थाअपमान मिल रहा है। सम्मान चाहता ही वही व्यक्ति हैजिसका अपने प्रति कोई सम्मान नहीं। वही तो दूसरों से सम्मान चाहता है। अपने प्रति जिसका अपमान है वही तो दूसरों से अपने अपमान को भर लेना चाहता हैढांक लेना चाहता है। सम्मान की आकांक्षा इस बात की खबर है कि तुम अपने भीतर अपमानित अनुभव कर रहे होतुम्हें अनुभव हो रहा है कि मैं कुछ भी नहीं हूं दूसरे मुझे कुछ बना देंसिंहासन पर बिठा देंपताकाएं फहरा देंझंडे उठा लें मेरे नाम के—दूसरे कुछ कर दें!
तुम भिखमंगे हो! तुमने अपना अपमान तो खुद कर लिया जब तुमने सम्मान चाहा। और यह अपमान गहन होता जायेगा।
लाओत्सु कहता हैमेरा कोई अपमान नहीं कर सकताक्योंकि मैं सम्मान चाहता ही नहीं। यह सम्मान को पा लेना है। लाओत्सु कहता हैमुझे कोई हरा नहीं सकताक्योंकि जीत की हमने बात ही छोड़ दी। अब हराओगे कैसे! तुम उसी को हरा सकते हो जो जीतना चाहता है अब यह जरा उलझा हुआ हिसाब है।
इस दुनिया में सम्मान उन्हें मिलता है जिन्होंने सम्मान नहीं चाहा। सफलता उन्हें मिलती है जिन्होंने सफलता नहीं चाही। क्योंकि जिन्होंने सफलता नहीं चाही उन्होंने तो स्वीकार ही कर लिया कि सफल तो हम हैं हीअब और चाहना क्या है?सम्मान तो हमारे भीतर आत्मा का है हीअब और चाहना क्या हैपरमात्मा ने सम्मान दे दिया तुम्हें पैदा करकेअब और किसका सम्मान चाहते होपरमात्मा ने तुम्हें काफी गौरव दे दिया! जीवन दिया! यह सौभाग्य दिया कि आंख खोलोदेखो हरे वृक्षों कोफूलों कोपक्षियों को! कान दिए—सुनो संगीत कोजलप्रपात के मरमर को! बोध दिया कि बुद्ध हो सको! अब और क्या चाहते होसम्मानित तो तुम हो गये! परमात्मा ने तुम्हें प्रमाण—पत्र दिया। तुम भिखारी की तरह किनसे प्रमाण—पत्र मांग रहे होउनसेजो तुमसे प्रमाण—पत्र मांग रहे हैं?
यह बड़ा मजेदार मामला है : दो भिखारी एक—दूसरे के सामने खड़े भीख मांग रहे हैं! यह भीख मिलेगी कैसेदोनों भिखारी हैं। तुम किससे सम्मान मांगरहे होकिसके सामने खड़े होयह अपमान कर रहे हो तुम अपना। और यही अपमान गहन होता जायेगा।
संतोष का अर्थ होता है : देखोजो तुम्हारे पास है। देखो जरा आंख खोल करजो तुम्हें मिला ही है। यह अष्टावक्र की बड़ी बहुमूल्य कुंजी है। यह धीरे—धीरे तुम्हें साफ होगी। अष्टावक्र की दृष्टि बड़ी क्रांतिकारी हैबड़ी अनूठी हैजड़—मूल से क्रांति की है।
'संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर।'
क्योंकि असत्य के साथ जो जीयेगा वह असत्य होता चला जायेगा। जो असत्य को बोलेगाअसत्य को जीयेगास्वभावत: असत्य से घिरता चला जायेगा। उसके जीवन से संबंध विच्छिन्न हो जाएंगेजड़ें टूट जाएंगी।
परमात्मा में जड़ें चाहते हो तो सत्य के द्वारा ही वे जड़ें हो सकती हैं। प्रामाणिकता और सत्य के द्वारा ही तुम परमात्मा से जुड़ सकते हो। परमात्मा से टूटना है तो असत्य का धुआ पैदा करोअसत्य के बादल अपने पास बनाओ। जितने तुम असत्य होते चले जाओगे उतने परमात्मा से दूर होते चले जाओगे।
'तू न पृथ्वी हैन जल हैन वायु हैन आकाश है। मुक्ति के लिए आत्मा कोअपने को इन सबका साक्षी चैतन्य जान।'
सीधी—सीधी बातें हैंभूमिका भी नहीं है। अभी दो वचन नहीं बोले अष्टावक्र ने कि ध्यान आ गयाकि समाधि की बात आ गई। जानने वाले के पास समाधि के अतिरिक्त और कुछ जताने को है भी नहीं। वह दो वचन भी बोलेक्योंकि एकदम से अगर समाधि की बात होगी तो शायद तुम चौंक ही जाओगेसमझ ही न पाओगे। मगर दो वचन—और सीधी समाधि की बात आ गई!
अष्टावक्र सात कदम भी नहीं चलतेबुद्ध तो सात कदम चलेआठवें कदम पर समाधि है। अष्टावक्र तो पहला कदम ही समाधि का उठाते हैं।
'तू न पृथ्वी हैन जलन वायुन आकाश'—ऐसी प्रतीति में अपने को थिर कर।मुक्ति के लिए आत्मा कोअपने को इन सबका साक्षी चैतन्य जान।'
'साक्षीसूत्र है। इससे महत्वपूर्ण सूत्र और कोई भी नहीं। देखने वाले बनो! जो हो रहा है उसे होने दोउसमें बाधा डालने की जरूरत नहीं। यह देह तो जल हैमिट्टी हैअग्नि हैआकाश है। तुम इसके भीतर तो वह दीये हो जिसमें ये सब जल,अग्निमिट्टीआकाशवायु प्रकाशित हो रहे हैं। तुम द्रष्टा हो। इस बात को गहन करो।
साक्षिणां चिद्धूपं आत्मानं विदि.......
यह इस जगत में सर्वाधिक बहुमूल्य सूत्र है। साक्षी बनो! इसी से होगा शान! इसी से होगा वैराग्य! इसी से होगी मुक्ति!
प्रश्न तीन थेउत्तर एक है।
'यदि तू देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम कर स्थित है तो तू अभी ही सुखीशात और बंध—मुक्त हो जायेगा।
इसलिए मैं कहता हूं यह जड़—मूल से क्रांति है। पतंजलि इतनी हिम्मत से नहीं कहते कि 'अभी ही।’ पतंजलि कहते हैं, 'करो अभ्यास—यमनियमसाधो—प्राणायामप्रत्याहारआसनशुद्ध करो। जन्म—जन्म लगेंगेतब सिद्धि है।
महावीर कहते हैं, 'पंच महाव्रत! और तब जन्म—जन्म लगेंगेतब होगी निर्जरातब कटेगा जाल कर्मों का।
सुनो अष्टावक्र को
यदि देह पृथस्कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि।
अधुनैव सुखी शांत: बंधमुक्तो भविष्यसि।।
'अधुनैव!अभीयहींइसी क्षण! 'यदि तू देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम कर स्थित है...!अगर तूने एक बात देखनी शुरू कर दी कि यह देह मैं नहीं हूंमैं कर्ता और भोक्ता नहीं हूंयह जो देखने वाला मेरे भीतर छिपा है जो सब देखता है—बचपन था कभी तो बचपन देखाफिर जवानी आयी तो जवानी देखीफिर बुढ़ापा आया तो बुढ़ापा देखाबचपन नहीं रहा तो मैं बचपन तो नहीं हो सकता—आया और गयामैं तो हूं! जवानी नहीं रही तो मैं जवानी तो नहीं हो सकता— आई और गईमैं तो हूं! बुढ़ापा आयाजा रहा हैतो मैं बुढ़ापा नहीं हो सकता। क्योंकि जो आता है जाता हैवह मैं कैसे हो सकता हूं! मैं तो सदा हूं। जिस पर बचपन आयाजिस पर जवानी आईजिस पर बुढ़ापा आयाजिस पर हजार चीजें आईं और गईं—मैं वही शाश्वत हूं।
स्टेशनों की तरह बदलती रहती है बचपनजवानीबुढ़ापाजन्म—यात्री चलता जाता। तुम स्टेशन के साथ अपने को एक तो नहीं समझ लेते! पूना की स्टेशन पर तुम ऐसा तो नहीं समझ लेते कि मैं पूना हूं! फिर पहुंचे मनमाड तो ऐसा तो नहीं समझ लेते कि मैं मनमाड हूं! तुम जानते हो कि पूना आयागयामनमाड आयागया—तुम तो यात्री हो! तुम तो द्रष्टा हों—जिसने पूना देखापूना आयाजिसने मनमाड़ देखामनमाड आया! तुम तो देखने वाले हो!
तो पहली बात : जो हो रहा है उसमें से देखने वाले को अलग कर लो!
'देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम..।
और करने योग्य कुछ भी नहीं है। जैसे लाओत्सु का सूत्र है—समर्पणवैसे अष्टावक्र का सूत्र है—विश्रामरेस्ट। करने को कुछ भी नहीं है।
मेरे पास लोग आते हैंवे कहते हैंध्यान कैसे करेंवे प्रश्न ही गलत पूछ रहे हैं। गलत पूछते हैं तो मैं उनको कहता हूं करो। अब क्या करोगे! तो उनको बता देता हूं कि करोकुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा—अभी तुम्हें करने कीं खुजलाहट है तो उसे तो पूरा करना होगा। खुजली है तो क्या करोगे! बिना खुजाए नहीं बनता। लेकिन धीरे—धीरे उनको करवा—करवा कर थका डालता हूं। फिर वे कहते हैं कि अब इससे छुटकारा दिलवाओ! अब कब तक यह करते रहेंमैं कहता हूं मैं तो पहले ही राजी था,लेकिन तुम्हें समझने में जरा देर लगी। अब विश्राम करो!
ध्यान का आत्यंतिक अर्थ विश्राम है। ाउ
चिति विश्राम्य तिष्ठसि
जो विश्राम में ठहरा देता अपनी चेतना कोजो होने मात्र में ठहर जाता...!
कुछ करने को नहीं है। क्योंकि जिसे तुम खोज रहे होवह मिला ही हुआ है। क्योंकि जिसे तुम खोज रहे होउसे कभी खोया ही नहीं। उसे खोया नहीं जा सकता। वही तुम्हारा स्वभाव है। अयमात्मा ब्रह्म! तुम ब्रह्म हो! अनलहक! तुम सत्य हो! कहां खोजते होकहां भागे चले जाते होअपने को ही खोजने कहां भागे चले जाते होरुकोठहरो! परमात्मा दौड़ने से नहीं मिलताक्योंकि परमात्मा दौड़ने वाले में छिपा है। परमात्मा कुछ करने से नहीं मिलताक्योंकि परमात्मा करने वाले में छिपा है। परमात्मा के होने के लिए कुछ करने की जरूरत ही नहीं है—तुम हो ही!
इसलिए अष्टावक्र कहते हैं. चिति विश्राम्य! विश्राम करो! ढीला छोड़ो अपने को! यह तनाव छोड़ो! कहां जातेकहीं जाने को नहींकहीं पहुंचने को नहीं है।
और चैतन्य में विश्राम. तो तू अभी हीइसी क्षणअधुनैवसुखीशात और बंध—मुक्त हो जायेगा।
अनूठा है वचन! नहीं कोई और शास्त्र इसका मुकाबला करता है।
'तू ब्राह्मण आदि वर्ण नहीं है और न तू कोई आश्रम वाला है और न आंख आदि इंद्रियों का विषय है। असंग और निराकार तू सबकाविश्व का साक्षी है। ऐसा जानकर सुखी हो।
अब ब्राह्मण कैसे टीका लिखें!
'तू ब्राह्मण आदि वर्ण नहीं है.।
अब हिंदू इस शास्त्र को कैसे सिर पर उठायें! क्योंकि उनका तो सारा धर्म वर्ण और आश्रम पर खड़ा है। और यह तो पहले से ही अष्टावक्र जड़ काटने लगे। वे कहते हैंतू कोई ब्राह्मण नहीं हैन कोई शूद्र हैन कोई क्षत्रिय है। यह सब बकवास है! ये सब ऊपर के आरोपण हैं। यह सब राजनीति और समाज का खेल है। तू तो सिर्फ ब्रह्म हैब्राह्मण नहींक्षत्रिय नहींशूद्र नहीं!
'तू ब्राह्मण आदि वर्ण नहीं और न तू कोई आश्रम वाला है।
और न तो यह है कि तू कोई ब्रह्मचर्य—आश्रम में है कि गृहस्थ—आश्रम में हैकि वानप्रस्थ कि संन्यस्तकोई आश्रम वाला नहीं है। तू तो इस सारे स्थानों के भीतर से गुजरने वाला द्रष्टासाक्षी है। अष्टावक्र की गीताहिंदू दावा नहीं कर सकते,हमारी है। अष्टावक्र की गीता सबकी है। अगर अष्टावक्र के समय में मुसलमान होतेहिंदू होतेईसाई होतेतो उन्होंने कहा होता, 'न तू हिंदू हैन तू ईसाई हैन तू मुसलमान है।’ अब ऐसे अष्टावक्र को.. कौन मंदिर बनाये इसके लिए! कौन इसके शास्त्र को सिर पर उठाये! कौन दावेदार बने! क्योंकि ये सभी का निषेध कर रहे हैं। मगर यह सत्य की सीधी घोषणा है।  'असंग और निराकार तू सबकाविश्व का साक्षी है—ऐसा जान कर सुखी हो!'
अष्टावक्र यह नहीं कहते कि ऐसा तुम जानोगे तो फिर सुखी होओगे। वचन को ठीक से सुनना। अष्टावक्र कहते हैंऐसा जान कर सुखी हो!
न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचर।
असंगोsसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव।।
सुखी भव! अभी हो सुखी!
जनक पूछते हैं, 'कैसे सुख होगाकैसे बंधन—मुक्ति होगीकैसे ज्ञान होगा?'
अष्टावक्र कहते हैंअभी हो सकता है। क्षणमात्र की भी देर करने की कोई जरूरत नहीं है। इसे कल पर छोड़ने का कोई कारण नहींस्थगित करने की कोई जरूरत नहीं। यह घटना भविष्य में नहीं घटतीया तो घटती है अभी या कभी नहीं घटती। जब घटती है तब अभी घटती है। क्योंकि 'अभीके अतिरिक्त कोई समय ही नहीं है। भविष्य कहां हैजब आता है तब अभी की तरह आता है।
तो जो भी ज्ञान को उत्पन्न हुए हैं—'अभीउत्पन्न हुए हैं। कभी पर मत छोड़ना—वह मन की चालाकी है। मन कहता है,इतने जल्दी कैसे हो सकता हैतैयारी तो कर लें!
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, 'संन्यास लेना है.. लेंगे कभी।’ 'कभी!कभी न लोगे! कभी पर टाला तो सदा के लिए टाला। कभी आता ही नहीं। लेना हो तो अभी। अभी के अतिरिक्त कोई समय ही नहीं है। अभी है जीवन। अभी है मुक्ति। अभी है अज्ञानअभी है ज्ञान। अभी है निद्राअभी हो सकता जागरण। कभी क्यों? कठिन होता है मन कोक्योंकि मन कहता है तैयारी तो करने दो! मन कहता है, 'कोई भी काम तैयारी के बिना कैसे घटता है? आदमी को विश्वविद्यालय से प्रमाण—पत्र लेना है तो वर्षों लगते हैं। डाक्टरेट करनी है तो बीस—पचीस साल लग जाते हैंमेहनत करते—करतेफिर आदमी जाकर डाक्टर हो पाता है। अभी कैसे हो सकते हैं?'
अष्टावक्र भी जानते हैं : दुकान करनी हो तो अभी थोड़े खुल जायेगी! इकट्ठा करना पड़ेआयोजन करना पड़ेसामान लाना पड़ेदुकान बनानी पड़ेग्राहक खोजने पड़ेविज्ञापन भेजना पड़े—वर्षों लगते हैं! इस जगत में कोई भी चीज 'अभीतो घटती नहींक्रम से घटती है। ठीक है। अष्टावक्र भी जानते हैंमैं भी जानता हूं। लेकिन एक घटना यहां ऐसी है जो अभी घटती है—वह परमात्मा है। वह तुम्हारी दुकान नहीं हैन तुम्हारा परीक्षालय हैन तुम्हारा विश्वविद्यालय है। परमात्मा क्रम से नहीं घटता। परमात्मा घट ही चुका है। आंख भर खोलने की बात है—सूरज निकल ही चुका है। सूरज तुम्हारी आंख के लिए नहीं रुका है कि तुम जब आंख खोलोगेतब निकलेगा। सूरज निकल ही चुका है। प्रकाश सब तरफ भरा ही है। अहर्निश गज रहा है उसका नाद! ओंकार की ध्वनि सब तरफ गंज रही है! सतत अनाहत चारों तरफ गंज रहा है! खोलो कान! खोलो आंख!
आंख खोलने में कितना समय लगता हैउतना समय भी परमात्मा को पाने में नहीं लगता। पल तो लगता है पलक के झपने में। पल का अर्थ होता हैजितना समय पलक को झपने में लगताउतना पल। मगर परमात्मा को पाने में पल भी नहीं लगता।
विश्वसाक्षी असंगोउसि निराकारो। सुखी भव!
अभी हो सुखी! उधार नहीं है अष्टावक्र का धर्म—नगदकैश..।
'हे व्यापकधर्म और अधर्मसुख और दुख मन के हैं : तेरे लिए नहीं हैं। तू न कर्ता है न भोक्ता है। तू तो सर्वदा मुक्त ही है।
मुक्ति हमारा स्वभाव है। ज्ञान हमारा स्वभाव है। परमात्मा हमारा होने का ढंग हैहमारा केंद्र हैहमारे जीवन की सुवास हैहमारा होना है।
धर्माउधमौं सुखं दुःखं मानसानि न तो विभो।
अष्टावक्र कहते हैं, 'हे व्यापकहे विभावानहे विभूतिसंपन्न! धर्म और अधर्मसुख और दुख मन के हैं।’ ये सब मन की ही तरंगें हैं। बुरा कियाअच्छा कियापाप कियापुण्य कियामंदिर
बनायादान दिया—सब मन के हैं।
न कर्ताउसि न भोक्ताउसि मुक्त एवासि सर्वदा।
'तू तो सदा मुक्त है। तू तो सर्वदा मुक्त है।
मुक्ति कोई घटना नहीं है जो हमें घटानी है। मुक्ति घट चुकी है हमारे होने में! मुक्‍ति से बना है यह अस्तित्व। इसका रोआं—रोआंरंच—रंच मुक्ति से निर्मित है। मुक्ति है धातुजिससे बना है सारा अस्तित्व। स्वतंत्रता स्वभाव है। यह उदघोषणा,बस समझी कि क्रांति घट जाती है। समझने के अतिरिक्त कुछ करना नहीं है। यह बात खयाल में उतर जायेतुम सुन लो इसे मन भर करबस! तो आज इतना ही कहना चाहूंगा. अष्टावक्र को समझने की चेष्टा भर करना। अष्टावक्र में 'करनेका कोई इंतजाम नहीं है। इसलिए तुम यह मत सोचना कि अब कोई तरकीब निकलेगी जो हम करेंगे। अष्टावक्र कुछ करने को कहते ही नहीं। तुम विश्राम से सुन लो। करने से कुछ होने ही वाला नहीं है। इसलिए तुम कापी वगैरहनोटबुक ले कर मत आना कि लिख लेंगेकुछ आयेगा सूत्र तो नोट कर लेंगेकरके देख लेंगे। करने का यहां कुछ काम ही नहीं है। इसलिए तुम भविष्य की फिक्र छोड़ कर सुनना। तुम सिर्फ सुन लेना। तुम सिर्फ मेरे पास बैठ कर शात भाव से सुन लेनाविश्राम में सुन लेना। सुनते—सुनते तुम मुक्त हो जा सकते हो।
इसलिए महावीर ने कहा है कि श्रावक मुक्त हो सकता है—सिर्फ सुनते—सुनते! श्रावक का अर्थ होता है जो सुनते—सुनते मुका हो जाये। साधु का तो अर्थ ही इतना है कि जो सुन—सुन कर मुक्त न हो सकाथोड़ा कमजोर बुद्धि का है। कुछ करना पड़ा। सिर्फ कोड़े की छाया काफी न थी। घोड़ा जरा कुजात है। कोड़ा फटकारातब थोड़ा चलाया मारा तो थोड़ा चला।
छाया काफी है। तुम सुन लेनाकोड़े की छाया दिखाई पड़ जायेगी।
तो अष्टावक्र के साथ एक बात स्मरण रखना : कुछ करने को नहीं है। इसलिए तुम आनंद— भाव से सुन सकते हो। इसमें से कुछ निकालना नहीं है कि फिर करके देखेंगे। जो घटेगा वह सुनने में घटेगा। सम्यक श्रवण सूत्र है।
अधुनैव सुखी शांत: बंधमुक्तो भविष्यसि।
अभी हो जा मुका! इसी क्षण हो जा मुका! कोई रोक नहीं रहा। कोई बाधा नहीं है। हिलने की भी जरूरत नहीं है। जहां है,वहीं हो जा मुक्त। क्योंकि मुक्त तू है ही। जाग और हो जा मुक्त!
असंगोउसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव।
हो जा सुखी! एक पल की भी देर करने की कोई जरूरत नहीं है। छलांग हैक्यांटम छलांग! सीढ़ियां नहीं हैं अष्टावक्र में। क्रमिक विकास नहीं हैसडनइसी क्षण हो सकता है!

हरि ओम तत्सत्!

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