गुरुवार, 3 अगस्त 2017

एक ओंकार सतनाम - प्रवचन-12

आखि आखि रहे लिवलाइ—(प्रवचन—बारहवां)
पउड़ी: 26


अमुल गुण अमुल वापार। अमुल वापारीए अमुल भंडार।।
अमुल आवहि अमुल लै जाहि। अमुल भाव अमुला समाहि।।
अमुलु धरमु अमुलु दीवाणु। अमुलु तुलु अमुलु परवाणु।।
अमुलु बखसीस अमुलु नीसाणु। अमुलु करमु अमुलु फरमाणु।।
अमुलो अमुलु आखिया न जाइ। आखि आखि रहे लिवलाइ।।
आखहि वेद पाठ पुराण। आखहि पड़े करहि वखियाण।।
आखहि बरमे आखहि इंद। आखहि गोपी तै गोविंद।।
आखहि ईसर आखहि सिध। आखहि केते कीते बुध।।
आखहि दानव आखहि देव। आखहि सुरि नर मुनि जन सेव।।
केते आखहि आखणि पाहि। केते कहि कहि उठि उठि जाहि।।
एते कीते होरि करेहि। ता आखि न सकहि केई केइ।।
जेवडु भावै तेवड होइ। 'नानकजाणै साचा सोइ।।
जे को आखै बोल बिगाडु। ता लिखीए सिरि गावारा गावारु।।



नानक उस परमात्मा की स्तुति में ऐसे बोलते हैंजैसे एक मदहोश आदमी बोले। वे किसी पंडित के वचन नहीं हैं;वरन उसके वचन हैंजो प्रभु की शराब में पूरी तरह डूब गया है। इसीलिए वे दोहराते चले जाते हैं। मस्ती में बोले गए वचन हैं। जैसे शराबी बोल रहा हो रास्ते के किनारे खड़े हो कर--बोले चला जाता है। एक ही बात को बहुत बार कहे चला जाता है। ऐसी ही किसी गहरी शराब में डूब कर वे बोल रहे हैं।
बाबर नानक के समय भारत आया। उसके सिपाहियों ने नानक को भी संदिग्ध समझ कर कैद कर लिया। लेकिन धीरे-धीरे बाबर तक खबर पहुंचने लगी कि यह कैदी कुछ अनूठा है। और इस कैदी के आस-पास एक हवा हैजो साधारण मनुष्यों की नहीं। और एक मस्ती है कि यह कैदी कारागृह में भी गाता रहता है। और यह खबर बाबर को लगी कि यह कुछ ऐसा आदमी है कि इसे कैद किया नहीं जा सकता। इसकी स्वतंत्रता भीतरी है।
तो कहते हैंउसने संदेश भेजा नानक को कि तुम मुझसे मिलने आओ। नानक ने कहा कि मिलने तो तुम्हें ही आना पड़े। क्योंकि नानक वहां हैजहां से अब मिलने जाने का कोई सवाल नहीं।
बाबर खुद मिलने कारागृह में आया। नानक से बहुत प्रभावित हुआ। नानक को साथ ले गया अपने महल में। और उसने बहुमूल्य से बहुमूल्य शराब नानक को पीने के लिए निमंत्रित किया। नानक हंसेऔर उन्होंने एक गीत गाया। जिस गीत का अर्थ है कि मैं परमात्मा की शराब पी चुका। अब इस शराब से मुझे नशा न चढ़ेगा। आखिरी नशा चढ़ गया है। अच्छा हो बाबर कि तुम ही मेरी शराब पीयोबजाय अपनी शराब पिलाने के।
ये गीत शराबी के गीत हैं। इसलिए नानक कहे चले जाते हैं। या तो एक छोटे बच्चे की तरहया एक शराबी की तरह। वेगुनगान करते हैं। उसमें बहुत हिसाब नहीं है। और न ही इन वचनों कोसाजा-संवारा गया है। ये अनगढ़ पत्थरों की तरह हैं।
एक कवि लिखता हैतो सुधारता है। हेर-फेर करता है। जमाता है। व्याकरण की चिंता करता है। लय कीपद कीछंद की फिक्र करता है। मात्राओं का हिसाब रखता है। बहुत बदलाहट करता है। रवींद्रनाथ की हैसियत का महाकवि भी! अगर रवींद्रनाथ की डायरियां देखेंतो कटी-पिटी हैं। एक-एक लाइन को काट-काट कर फिर से लिखा हैबदला हैफिर जमाया है।
ये वचन न तो बदले गए हैं और न जमाए गए हैं। ये तो वैसे ही हैंजैसे नानक ने कहे थे। ये तो बोले गए हैं। इनमें कुछ हिसाब नहीं हैन भाषा कान मात्रा कान पद कान छंद का। अगर इनमें कोई छंद हैतो भीतरी आत्मा का है। और अगर इनमें कोई व्याकरण हैतो वह मनुष्य की नहींपरमात्मा की है। और इनमें अगर कोई लय मालूम पड़ती हैतो वह लय भीतर के नशे की है। वह काव्य की नहीं है। इसलिए तो नानक कहे जाते हैं। जब भी उनसे कोई पूछतातो वे गा कर ही जवाब देते थे। उनसे कोई सवाल पूछता और वे कहतेसुनिए। और मर्दाना अपना साज छेड़ देता और वे गीत गाना शुरू कर देते।
इस बात को याद रखना। अगर इस बात को याद न रखा तो ऐसा लगेगाक्या नानक पुनरुक्ति किए चले जाते हैंकि उसके गुण अपारकि उसका मूल्य अपार। फिर वे कहे ही चले जाते हैं।
ना! ये मस्ती में गुनगुनाए गए शब्द हैं। ये किसी दूसरे से कहे गए नहीं हैं। ये अपनी ही मस्ती मेंअपने ही भीतर गुनगुनाए गए हैं। दूसरे ने सुन लिया हैयह दूसरी बात है। यह खयाल में रहेगा तो बहुत अर्थ प्रकट होने शुरू होंगे।
कहते हैं नानक, 'उसके गुण अमूल्य हैं। और उसके व्यापार भी अमूल्य हैं। उसके व्यापारी भी अमूल्य हैं। और उसके भंडार भी अमूल्य हैं। जो लेने आता है वह अमूल्य है। जो ले जाता है वह अमूल्य है। उसका भाव अमूल्य है। उसकी समाधि अमूल्य है। उसका धर्म अमूल्य है। उसका दरबार अमूल्य है।'
अमुल गुण अमुल वापार। अमुल वापारीए अमुल भंडार।।
अमुल आवहि अमुल लै जाहि। अमुल भाव अमुला समाहि।।
अमुलु धरमु अमुलु दीवाणु। अमुलु तुलु अमुलु परवाणु।।
अमुलु बखसीस अमुलु नीसाणु। अमुलु करमु अमुलु फरमाणु।।
अमुलो अमुलु आखिया न जाइ। आखि आखि रहे लिवलाइ।।
पहली बात कि वह अमूल्य है। उसका सभी कुछ अमूल्य है। मूल्य आंकने का कोई उपाय भी नहीं है। क्योंकि न तो कोई बांट हैजिससे हम उसे तौल सकेंन कोई मापदंड हैजिससे हम उसे माप सकें। कोई उपाय ही नहीं हैजिससे हम अंदाज लगा सकें कि वह कितना हैक्या हैकहां तक फैला हुआ है?
और जो भी उसको मापने जाता हैधीरे-धीरे पाता हैसारे मापदंड टूट जाते हैं। सब तराजुएं गिर जाती हैं। न केवल मापदंड टूटते हैंवरन माप करने वाला मन भी टूट जाता है।
संस्कृत में शब्द हैमाया। माया उसी धातु से बना हैजिससे माप। और अंग्रेजी का मेजर शब्द भी उसी से बना है,जिससे माप। फ्रेंच का मीटर शब्द भी उसी से बना हैजिससे माप। और अंग्रेजी का मैटर शब्द भी उसी से बना हैजिससे माप। जिससे माया बना हैउसी से मैटरउसी से मेजरउसी से माप।
बड़ा महत्वपूर्ण शब्द है माया। माया का अर्थ हैजो मापा जा सके। जिसको हम तौल सकेंजिसकी नाप हो सके। और जिसे हम न तौल सकेंवही ब्रह्म है। तो जो-जो तुम तौल लोसमझ लेना कि माया है। जिस-जिस का मूल्य तुम आंक लो,समझ लेना कि माया है। जिस-जिस की परिभाषा तुम कर लोसमझ लेना कि माया है। जिसकी परिभाषा न हो सकेजिसको तुम तौलोखुद थक जाओ और न तौला जा सकेजिसको तौलने बैठो और पाओ कि इन बटखरों से कैसे हम उसे तौलेंगेऔर तौलते रहेंगे तो अनंत-अनंत काल भी बीत जाएगा तो भी कुछ चुकेगा नहींकोई तौल पूरी नहीं होगीजहां तुम अमाप के करीब आ जाओसमझ लेना कि धर्म शुरू हुआ।
इसलिए विज्ञान कभी धर्म को न जान पाएगा। क्योंकि विज्ञान की पूरी विधि ही तौलना है। तराजू विज्ञान का प्रतीक है। मापना ढंग है। तो विज्ञान कभी भी परमात्मा के पास न आ पाएगा। और इसलिए विज्ञान सदा कहता रहेगा कि परमात्मा नहीं है। क्योंकि विज्ञान मानता ही उस चीज को हैतो तौली जा सके। जिसको हम प्रयोग कर सकें। प्रयोगशाला की तराजू पर जिसकी कोई नाप-जोख हो सके। माक्र्स ने कहा है कि अगर परमात्मा प्रयोगशाला में प्रकट हो सके तो ही मैं मानूंगा। लेकिन अगर परमात्मा प्रयोगशाला में प्रकट हो जाए तो वह परमात्मा ही न होगा।
क्या तुम्हें प्रतीत नहीं होता कि कुछ अमाप हमारे चारों तरफ हैमाप के भीतर भी छिपा है।
एक फूल हैतुम जाओइसे प्रयोगशाला में तौल सकते होक्योंकि फूल में वजन है। नाप सकते हो लंबाईचौड़ाई। फूल का विश्लेषण कर सकते हो तो पता चल जाएगा किन-किन द्रव्योंरासायनिक तत्वों से मिल कर बना है। केमिस्ट्री पता चल जाएगी।
लेकिन एक चीज फूल में अमाप हैवह सौंदर्य है। तुम सब तौल लोगे। और जब तुम फूल का सारा एनालीसिससारा विश्लेषण कर चुकोगेतो अचानक पाओगे कि फूल तो खो चुका है इस विश्लेषण मेंइसमें सौंदर्य का तो कोई पता न चला। इसलिए वैज्ञानिक सौंदर्य को स्वीकार नहीं करेगा।
और बड़े आश्चर्य की बात है कि फूल को देख कर जो पहला भाव तुम्हारे मन में उठता हैवह सौंदर्य का है। और वही विज्ञान में खो जाता है। विज्ञान में जो चीज नष्ट हो जाती हैवही पहली चीज है जो तुम्हें प्रतीत होती है। फूल को देख कर जो पहला अंतर्भावजो पहली ऊर्मि उठती है जीवन मेंजो भीतर की चेतना में पहला प्रतिबिंब पड़ता हैवह सौंदर्य का है। अनकहा! अनबोला! भीतर एक भाव जगता है। एक बादल भीतर घेर लेता है सौंदर्य का। वही विज्ञान की पकड़ में खो जाता है।
एक छोटा बच्चा नाच रहा हैखेल रहा हैहंस रहा है। उसे देख कर जो पहली प्रतीति होती हैवह जीवन कीऊर्जा की,एनर्जी की। उस बच्चे को विज्ञान को दे दें। विज्ञान इसकी जांच-पड़ताल कर के सब पता लगा देगा। नाप-जोख पूरा कर देगा,लिस्ट बना देगा। लेकिन उसमें जीवन खो जाएगा। विज्ञान बता देगाकितना एलम्युनियमकितना लोहाकितना मैगनेसियमइस बच्चे की हड्डियों में हैकितना फासफोरसकितनी मिट्टीकितना पानी...।
मैंने सुना हैएक वैज्ञानिक अपने मित्र के साथ रास्ते से गुजर रहा था। और एक बहुत सुंदर युवती पास से गुजरी। मित्र ठिठक गया। वैज्ञानिक ने कहाबहुत परेशान मत हो। नब्बे परसेंट तो पानी है।
आदमी के शरीर में नब्बे परसेंट तो पानी है ही। और बाकी दस परसेंट भी चीजें ही हैंजिनको हम बोतलों में बंद कर सकते हैं। कहते हैं कि आदमी के शरीर की सब चीजों का मूल्य पांच रुपए से ज्यादा नहीं है। लोहा निकाल लेंफासफोरसनिकाल लें। और बेचने जाएं तो पांच रुपए से ज्यादा का नहीं है। इसीलिए तो लाश को जला देते हैं। क्योंकि निकालने में ज्यादा खर्च हो जाएगाउतनी बिक्री नहीं होगी। किसी काम का नहीं है।
विज्ञान सब नाप लेगाऔर आखिर में कहेगा कि कोई आत्मा नहीं पायी। आत्मा मिलेगी भी नहींक्योंकि आत्मा अमाप है। यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है आज कि मापने के द्वारा अगर अमाप का पता न चलेतो हम यह कहते हैं कि अमाप है ही नहीं। बुद्धिमान अगर हम होंतो हम कहेंगेहमारे माप के ढंग माया तक जाते हैंब्रह्म तक नहीं। तो हमें कोई और ढंग खोजना चाहिए जो मापने का नहीं है। ताकि हम उसे जान सकें।
विज्ञान का ढंग है--मापनाखोजनाजांचनापरिभाषा। धर्म का ढंग बिलकुल अलग है। धर्म का ढंग है--न खोजनान मापनान परिभाषा करनावरन खो जानालीन हो जानाडूब जानाअपने को डुबा देना। वैज्ञानिक अलग बना रहता है अपनी खोज से। धार्मिक लीन हो जाता हैडूब जाता हैएक हो जाता है।
नानक एक बार लाहौर में ठहरे। तो लाहौर का जो सब से धनी आदमी थावह उनके चरणों में नमस्कार करने आया। वह बहुत धनी आदमी था। लाहौर में उन दिनों ऐसा रिवाज था कि जिस आदमी के पास एक करोड़ रुपया होवह अपने घर पर एक झंडा लगाता था। इस आदमी के घर पर कई झंडे लगे थे। इस आदमी का नाम थासेठ दुनीचंद। उसने नानक के चरणों में सिर रखा और कहा कि कुछ आज्ञा दें मुझे। मैं कुछ सेवा करना चाहूं। और बहुत है आपकी कृपा से। आप जो भी कहेंगेवह मैं पूरा कर दूंगा।
नानक ने अपने कपड़ों में छिपी हुई एक छोटी सी कपड़े सीने की सुई निकालीदुनीचंद को दीऔर कहाइसे सम्हाल कर रखना। और मरने के बाद मुझे वापस लौटा देना।
दुनीचंद अपनी अकड़ में था। उसे समझ ही न आयी। उसे कुछ खयाल ही न आया कि यह क्या नानक कह रहे हैं! उसने कहाजैसी आपकी आज्ञा। जो आप कहेंकर दूंगा। अकड़ का समय होता है आदमी के मन कातब आदमी अंधा होता है कि कुछ चीजें असंभव हैं। धन से तो हो ही नहीं सकतीं। घर लौटा। लेकिन घर लौटते-लौटते उसे भी खयाल आया कि मर कर लौटा देंगे! लेकिन जब मैं मर जाऊंगातब इस सुई को साथ कैसे ले जाऊंगा?
वापस लौटा। और कहा कि आपने थोड़ा बड़ा काम दे दिया। मैं तो सोचाबड़ा छोटा काम दिया है। और क्या मजाक कर रहे हैंसुई को बचाने की जरूरत भी क्या हैलेकिन संतों का रहस्य! सोचाहोगा कुछ प्रयोजन। लेकिन क्षमा करें। यह अभी वापस ले लें। क्योंकि यह उधारी फिर चुक न सकेगी। अगर मैं मर गया तो सुई को साथ कैसे ले जाऊंगा?
तो नानक ने कहासुई वापस कर दो। प्रयोजन पूरा हो गया है। यही मैं तुमसे पूछता हूं कि अगर एक सुई न ले जा सकोगेतो तुम्हारी जो करोड़ों-करोड़ों की संपदा हैउसमें से क्या ले जा सकोगेअगर एक छोटी सी सुई को तुम न ले जा सकोगे पारतो और तुम्हारे पास क्या हैजो तुम ले जा सकोगेदुनीचंदतुम गरीब हो। क्योंकि अमीर तो वही है जो मौत के पार कुछ ले जा सके।
लेकिन जो भी मापा जा सकता हैवह मौत के पार नहीं ले जाया सकता। जो अमाप हैइम्मेजरेबल हैजिसको हम माप नहीं सकतेवही केवल मौत के पार जाता है।
दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं। एकजो मापने की ही चिंता करते रहते हैं। खोज करते हैं उसकीजो मापा जा सकता हैतौला जा सकता है। और एकजो उसकी खोज करते हैंजो तौला नहीं जा सकता। पहले वर्ग के लोग धार्मिक नहीं हैंसंसारी हैं। दूसरे वर्ग के लोग धार्मिक हैंसंन्यासी हैं।
अमाप की खोज धर्म है। और जिसने अमाप को खोज लियावह मृत्यु का विजेता हो गया। उसने अमृत को पा लिया। जो मापा जा सकता हैवह मिटेगा। जिसकी सीमा हैवह गलेगा। जिसकी परिभाषा हो सकती हैवह आज हैकल खो जाएगा। हिमालय जैसे पहाड़ भी खो जाएंगे। सूर्यचांदतारे भी बुझ जाएंगे। बड़े से बड़ाथिर से थिर...पहाड़ को हम कहते हैंअचल;वह भी चलायमान है। वह भी खो जाएगा। वह भी बचेगा नहीं। वह भी थिर नहीं है। जहां तक माप जाता है वहां तक सभी अस्थिर हैपरिवर्तनशील है। जहां तक माप जाता हैवहां तक लहरें हैं। जहां माप छूट जाता हैसीमाएं खो जाती हैंवहीं से ब्रह्म का प्रारंभ है।
इसलिए नानक कहते हैं, 'गुण अमूल्य हैं। उसके व्यापार भी अमूल्य हैं।'
तुम मूल्य न आंक सकोगे। इसलिए तो बड़ी कठिनाई है। नेपोलियन का तुम मूल्य आंक सकते हो। सिकंदर का मूल्य आंक सकते हो। क्योंकि उसकी संपदा और साम्राज्य ही उसका मूल्य है। लेकिन बुद्ध का तुम कैसे मूल्य आंकोगेनानक का क्या मूल्य हैजिनके पास कुछ हैपजेशंसउनका तुम मूल्य आंक सकते हो। क्योंकि जो उनके पास हैवही उनकी आत्मा है। अगर करोड़ हैतो करोड़अगर दस करोड़ हैतो दस करोड़। लेकिन जिनके पास कुछ नहीं हैकेवल परमात्मा हैउनका मूल्य तुम कैसे आंकोगे?
इसलिए तो बहुत बार हम नानक को देख नहीं पाते। बहुत बार बुद्ध हमारे करीब से गुजरते हैं और हम अंधे की तरह खड़े रहते हैं। क्योंकि हमने तो नापने की ही कला सीखी है। वही हमें दिखायी पड़ता है। अगर बुद्ध के हाथ में हीरा होतातो हीरा हमें दिखायी पड़ेगाबुद्ध हमें दिखायी नहीं पड़ेंगे। और हीरा दो कौड़ी का है। और बुद्ध अमूल्य हैं। लेकिन दिखायी हमें हीरा पड़ेगा।
हमारी आंखेंहमारे सोचने का ढंगहमारा मन! इसे खयाल में ले लें। बाहर जो माप का जगत हैवही भीतर मन है। इसलिए मन और माया एक है। बाहर मापना हैभीतर मापने वाला है। वह मन है। संसार और मन--यह एक जोड़ा। बाहर जो अमाप हैब्रह्मउससे मन का कोई नाता नहीं बनता। उससे आत्मा का नाता बनता है। क्योंकि भीतर भी एक अमाप है। तुम जैसे हो उसी से तुम्हारा संबंध हो सकेगा। मन की सीमा हैइसलिए उससे तुम सीमित को जान सकोगे। आत्मा की कोई सीमा नहीं हैइसलिए तुम असीम को जान सकोगे। मूल्य क्या है परमात्मा काकोई भी तो मूल्य नहीं है!
जीसस के संबंध में कहानी है कि जुदास ने उन्हें केवल तीस चांदी के सिक्कों में बेच दिया दुश्मनों के हाथ में। हमें हैरानी लगती है कि जीसस जैसा मनुष्यजैसा कभी-कभी घटता है इस संसार मेंउसे जुदास तीस रुपए में बेच सकाभरोसा नहीं आता।
लेकिन तुम भी बेचते। तीस में न बेचतेतीस हजार में बेचतेफर्क क्या पड़ता हैतीस और तीस हजार में कोई भी फर्क नहीं है। क्योंकि माप यानी माप। लेकिन एक बात समझ लेने जैसी है कि जुदास को जीसस के पास बरसों रह कर भी जीसस दिखायी नहीं पड़े। और जब किसी ने कहा कि हम तीस रुपए देते हैंपता ठिकाना दे दोताकि हम इस आदमी को पकड़ लें। तो तीस रुपए ज्यादा मूल्यवान मालूम पड़े।
हमें वही दिखायी पड़ता हैजिसका हम मूल्य आंक सकते हैं। हम मूल्य से फंसे हैं।
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैंध्यान से क्या मिलेगाक्या फायदाध्यान करने से कौन सा लाभ होगाऐसा नहीं है कि उन्हें पता नहीं है कि ध्यान से परमात्मा मिलेगा। वह उन्हें पता है। लेकिन परमात्मा में लाभ नहीं दिखायी पड़ता। ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने न सुना हो कि ध्यान से आनंद मिलेगा। लेकिन आनंद का बाजार में कोई भी तो मूल्य नहीं है। बेचने जाओगे तो कौन खरीदेगावे पूछते हैंभाषा उनकी जो हैवे यह पूछ रहे हैं कि कुछ मूल्य करके बताएं कि कितने मूल्य की चीज ध्यान से मिलेगी?
ठीक भी है उनका पूछना। क्योंकि सारी इकानामिक्ससारा अर्थशास्त्र जीवन कामूल्य के हिसाब से चलता है। एक घंटा हम ध्यान करेंगेउस एक घंटे में अगर हम बाजार में काम करेंगेतो पचास रुपएसौ रुपए कमा लेंगे। सौ रुपए घंटे भर में बाजार में कमा लेंगे और सौ रुपए के मूल्य का कुछ ध्यान में मिलता होज्यादा का कुछ मिलता होतो हमें समझ में आता है कि कुछ करने योग्य है। और अगर सौ रुपए के मूल्य की चीज न मिलती हो ध्यान मेंतो क्या सार! वे यह पूछ रहे हैं कि हमें ठीक-ठीक मूल्य कर के बता दें कि ध्यान से हमें कितने मूल्य का लाभ होगातो हम हिसाब लगा लेंअपनी इकानामिक्स को ठीक से जमा लें।
लेकिन ध्यान में जो मिलता हैउसका तो कोई भी मूल्य नहीं है। और जब तक तुम मूल्य की खोज कर रहे होतब तक तुम ध्यान में जा न सकोगे। क्योंकि मूल्य का जगत तुम्हें पकड़े रहेगा। संसार यानी मूल्य का जगत। और परमात्मा यानी जहां तुम निर्मूल्य में प्रवेश करते होया अमूल्य में प्रवेश करते हो।
'उसके गुण अमूल्य हैं। उसके व्यापार अमूल्य हैं। उसके व्यापारी भी अमूल्य हैं। और उसके भंडार भी अमूल्य हैं।'
कौन है उसका व्यापारीजिनको हम संत कहते हैंसिद्ध कहते हैंबुद्ध कहते हैंवे उसके व्यापारी हैं। वे तुम्हें बेचने आए हैं कुछजो तुम खरीदने की हिम्मत नहीं कर पाते। वे तुम्हें कुछ देना चाहते हैंजो अमूल्य है। लेकिन तुम लेने को तैयार नहीं। तुम्हारे खयाल में ऐसा लगता है कि जो मुफ्त मिलता हैवह बिना मूल्य का होगा। परमात्मा मुफ्त मिलता है। इसलिए तुम उसकी चिंता नहीं करते। अगर उस पर भी दाम लगे होंतो तुम उसकी चिंता करोगे। बुद्धनानककबीरव्यापारी हैं। लेकिन व्यापार बड़ा गड़बड़ है उनका। वह हमारी समझ के बाहर है व्यापार। वह हमें व्यापारी मालूम ही नहीं पड़ते।
ऐसी कहानी है कि नानक को घर में कुछ करते न देखकर पिता ने कहा कि अब तुम इतना ही करो कम से कम,बिलकुल काहिलव्यर्थ मत बनो। किसी के काम के भी तो थोड़े सिद्ध होओ!
पिता को भी नानक में दिखायी नहीं पड़ा कि इस आदमी में कुछ मूल्यवान है। कभी-कभी दूसरे आकर नानक के पिता को कह जाते थे कि बड़ा मूल्यवान है। लेकिन नानक के पिता को कभी भरोसा नहीं आया। कि मूल्यवान क्या खाक हैएक पैसा कमाने की अकल नहींसिर्फ गंवाना जानता है। मूल्यवान कैसेइस जगत में जो कमाना हैउस जगत में वह गंवाना है। उस जगत में जो कमाना हैवह इस जगत में गंवाने जैसा मालूम पड़ता है!
तो नानक को कहा कि कुछ न बने तो तुम कम से कम जानवरों को जंगल ले कर चरा आओ। इतना तो कर ही सकते हो। यह तो आखिरी काम हैजो बुद्धू से बुद्धू कर सकता है। जब लोग नाराज होते हैं अपने बेटों परतो वे कहते हैंअगर कुछ न बनातो ढोर चराओगे। वह आखिरी है।
नानक के बाप ने कहातो अब तुम यही करो। यह बैठ कर गीत गाकरयह आकाश की तरफ आंखें लगा कर कहीं दुनिया चली है! बाप संसारी आदमी हैं। और बेटे की चिंता कर रहे हैं कि बेटा कुछ काम का हो जाएनहीं तो कैसे जीएगा!
नानक राजी हो गए। लेकिन नानक के राजी होने का कारण दूसरा था। नानक राजी हुएक्योंकि नानक ने हमेशा पाया कि आदमियों की बजाय जानवरों की संगत में ज्यादा शांति है। क्योंकि जानवर कम से कम इकानामिक्स तो नहीं मानते। कोई अर्थशास्त्र तो नहीं है उनका। धनपैसाहिसाब तो नहीं लगाते। जीते हैं। तो नानक एकदम राजी हो गए। उन्हें सदा पसंद था गाय-भैंसों के पास बैठना। कम से कम पैसे की बात तो वहां नहीं चलती। चुप्पी तो होती है। लाभ-हानि का हिसाब नहीं होता। और कम से कम जानवरों ने उसकी मर्जी पर अपने को छोड़ दिया है। उनका कोई अहंकार तो नहीं है।
तो वे चले गए गाय-भैंसों को लेकर। लेकिन ऐसे आदमी के साथ सदा उपद्रव होगा। गाय-भैंसें चरने लगीं। और उन्होंने उनसे कहाचरो मजे सेआनंद से। वे आंख बंद कर के अपनी मस्ती में लीन हो गए। पास के खेत में सब जानवर घुस गए। और उन्होंने सब खेत साफ कर दिया। तो वह आदमी पागल हुआ भागा हुआ आयाजो खेत का मालिक था। और उसने कहा,यह तुमने क्या करवाया हैइसके पैसे भरने पड़ेंगे एक-एक। मेरी पूरी फसल नष्ट हो गयी। नानक ने आंख खोली और कहातू घबड़ा मत। उसके ही जानवर हैंउसने ही चरवाया हैउसका ही खेत है। तू घबड़ा मत। बड़ा वरदान तुझ पर बरसेगा।
उस आदमी ने कहाचुप रह! बकवास मत कर। वरदान बरसेगामैं बरबाद हो गया।
वह भागा हुआ गया। नानक के बाप को पकड़ा। और गांव का जो मुखिया थाउसके पास नानक के बाप को पकड़ कर ले गया कि पूरी फसल चुकानी पड़ेगी। वह जो मुखिया थावह नानक का भक्त था। वह मुसलमान था। बूलर उसका नाम था--शाह बूलर। उसने कहानानक को भी पूछ लेना चाहिएक्या हुआनानक को बुलाया गया।
नानक ने कहासब उसी की मर्जी से हो रहा है। उसके हुक्म से। और सब ठीक ही होगा। और उसी ने जानवर भेजे। और उसी ने फसल उगायी। और जब उसने एक बार उगायीतो वह हजार बार उगा सकता है। घबड़ाने की क्या बात हैमुझे नहीं लगता कि कोई भी नुकसान हुआ है।
तो उस आदमी ने कहा कि सब साथ चलेंमेरा खेत बरबाद पड़ा है। और यह आदमी कहता हैकोई नुकसान नहीं हुआ।
कहानी कहती है कि जब वे वापस पहुंचे तो पाया कि खेत लहलहा रहा है। वहां कोई नुकसान नहीं हुआ। सच तो ऐसा कि आस-पास के खेत फीके पड़े हैं। और इस खेत में जैसी फसल आयी हैऐसी कभी देखी नहीं गयी
यह कहानी घटी होन घटी होपर बड़े मतलब की है। जो उस पर छोड़ देता है उसके खेत की फसल का क्या कहना! और नानक ने उस पर छोड़ दिया। तो नानक के जीवन में ऐसी फसल आयी जैसी कि किसी के जीवन में कभी-कभी मुश्किल से आती है। पर छोड़ने की हिम्मत...।
वह खेत का मालिक तो भरोसा ही न कर सका कि यह क्या हुआ है! इस जगत में सबसे बड़ा चमत्कार हैपरमात्मा पर अपने को छोड़ देना। और तब तुम्हारे जीवन में ऐसा घटने लगेगा रोज-रोजजिसके लिए जवाब देना बिलकुल मुश्किल है। जिसको समझाना मुश्किल है। जिसकी कोई रैशनलकोई तर्कयुक्त व्याख्या नहीं हो सकती।
इतना ही अर्थ है कहानी का कि जो उस पर छोड़ देते हैंउनके जीवन में प्रतिपल ऐसी घटनाएं घटने लगती हैंजिनका कि कोई बुद्धियुक्त हल नहीं हो सकता। जो पहेलियां मालूम होती हैं।
क्योंक्योंकि जब अमाप तुम्हारे जीवन में प्रवेश करता हैतब पहेलियां शुरू हो जाती हैं। पहेली का एक ही अर्थ है,रहस्य का एक ही अर्थ हैकि तुमने माप की दुनिया से आंखें उठा लीं अमाप की तरफ। सीमा की तरफ से तुम हटे और असीम की तरफ झुके। ज्ञात को तुमने थोड़ा छोड़ा और अज्ञात तुम्हारे जीवन में आया। जैसे ही तुम अज्ञात को थोड़ी सी जगह देते हो अपने जीवन मेंवैसे ही रहस्य घटने शुरू हो जाते हैं। चमत्कार की फसल उठनी शुरू हो जाती है।
नानक व्यापारी हैं किसी और दूसरी दुनिया के। और उस दूसरी दुनिया के व्यापारियों के साथ हमने सदा दर्ुव्यवहारकिया है। जीसस को हमने सूली पर लटका दिया। सुकरात को जहर पिला दिया। और हमने सूली भी न दी होजहर भी न पिलाया होतो भी हमने उस दुनिया के व्यापारियों की बात कभी नहीं सुनी। हमने पूजा भी की होतो भी नहीं सुनी। पूजा भी हमारी एक तरकीब है बचने की। कि हम कहते हैंआप बहुत महान हो। हम आपको कैसे पा सकते हैंतो आपके चरणों में हम फूल चढ़ाते हैं। लेकिन हम तो जैसे हैंवैसे ही रहेंगे।
और हम पूजा करके वैसे ही बने रहते हैं। तुम्हारी पूजा झूठी हैअगर तुम वैसे ही बने रहते हो। एक ही कसौटी है पूजा के सच होने की कि पूजा तुम्हें बदले। अगर तुमने सच में नानक को आदर दियातो तुम दूसरे ही आदमी हो जाओगे। लेकिन तुम नानक को आदर भी देते हो और वही के वही आदमी बने रहते होतो आदर झूठा है। और आदर भी बचने की तरकीब है। तुम कहते होहां! हम मानते हैं कि आप जो कहते हैं बिलकुल ठीक है। लेकिन अभी हमारा समय नहीं आया। जब आएगातब हम भी इस मार्ग पर चलेंगे। लेकिन अभी संसार में बहुत काम करने बाकी हैं। पहले उनको निपटा लेने दें। और जल्दी भी क्या हैकल!
हम पोस्टपोन करते हैं। हमारा आदर भी बड़ा होशियारी से भरा है। ध्यान रखनाआदर ज्यादा चालाक तरकीब है। जहर पिलाना सीधी-सादी बात है। कि हम इस आदमी से छुटकारा पाना चाहते हैं। इसलिए यूनान में उन्होंने सुकरात को जहर पिला दिया। यहूदियों ने जीसस को सूली पर लटका दिया। हिंदुस्तान ज्यादा चालाक है। क्योंकि पुरानी जाति! ज्यादा होशियार है। हमने बुद्ध कोनानक कोमहावीर कोकृष्ण कोसूली पर नहीं चढ़ाया और न ही जहर पिलाया। हमने उनकी पूजा की।
और ध्यान रखनायहूदी जीसस को सूली पर चढ़ा कर अभी तक छुटकारा नहीं पा सके। यहूदी के पीछे जीसस घूम रहा है। क्योंकि जिसको तुम सूली दोगेउसके लिए तुम्हारे भीतर एक अपराध का भाव पैदा हो जाएगा। अभी तक जीसस से छुटकारा नहीं हुआ है यहूदियों का। और कभी नहीं होगा। क्योंकि एक अपराध का भाव भीतर बैठ गया है। और बार-बार उन्हें जीसस की याद आती है।
लेकिन हमने पहले ही छुटकारा कर लिया है। हमें किसी की याद नहीं आती। हम बहुत होशियार लोग हैं। हमने दिन बांध दिए हैं याददाश्त के कि तुम्हारा जन्म-दिन आएगा तो हम तुम्हारी याद कर लेंगे। बाकी समय तुम हम पर कृपा करो! हमें अपना व्यापार करने दो। अभी हमारी उत्सुकता उस दुनिया के व्यापार में नहीं है। भारत बहुत चालाक है। इसलिए हमने किसी को फांसी नहीं दी। क्योंकि हम छुटकारे की सरल तरकीबें जानते हैं। इतना उपद्रव क्यों खड़ा करेंऔर सूली देने का मतलब यह है कि हमने तुम्हें बहुत गंभीरता से लिया।
हम तुम्हारी पूजा करेंगे। यह बड़ी सरल और अहिंसात्मक प्रक्रिया है छूटने की। हम तुम्हें भगवान कहेंगे। गुरु कहेंगे। संत कहेंगे। सिद्ध पुरुष कहेंगे। लेकिन तुम हमें 'हमरहने दो। तुम वहां मंदिर की वेदी पर रहोहम यहां संसार में। और जब कभी हमें संसार में किसी चीज की जरूरत होगीतो हम तुमसे मांग लेंगे। हम तुम्हारा उपयोग करेंगेलेकिन हम तुम्हारे कारण बदलेंगे नहीं।
यह ज्यादा चालाकज्यादा होशियार कौम है। पुरानी कौम है। बूढ़े आदमी हमेशा चालाक हो जाते हैं। क्योंकि जिंदगी भर का अनुभव उन्हें बता देता है कि बचने की तरकीबें कुशलता से निकाली जा सकती हैं। इतना जाल--जहर खरीदना और जहर पिलाना और सूली लगाना--इतना उपद्रव क्या करना! मंदिर की वेदी पर बिठा दोछुटकारा हो जाता है। हमने अपने उन सब व्यापारियों कोजो दूसरे जगत की खबर लाएपूज्य बना लिया। और पूज्य बनाकर हमारा निपटारा हो गया। नाता-रिश्ता तय हो गया। कि हम भक्त हैंतुम भगवान हो। हम पुजारी हैंतुम आराध्य हो। बात निपट गयी!
असली सवाल हैनानक हो जाना। असली सवाल नानक की पूजा नहीं है। असली सवाल गुरुग्रंथ पर फूल चढ़ाना नहीं है,असली सवाल गुरुग्रंथ हो जाना है कि तुम्हारे शब्द का उच्चार उस एक ओंकार की ध्वनि लाने लगे। लेकिन तब तुम्हें बदलाहट से गुजरना पड़े।
'उसके व्यापारी भी अमूल्य हैं।'
और इसीलिए तो हम पहचान नहीं पाते। इसीलिए तो हमें लगता है कि वे जो कुछ कह रहे हैंवह हमारे तर्क में नहीं बैठता। वे जो कुछ बता रहे हैंवह हमारी समझ के साथ संगत नहीं होता। तो हम अपने बीच और उनके बीच एक दीवाल खड़ी कर लेते हैं। और हमने अपने भीतर कंपार्टमेंट बना लिए हैं।
जब तुम गुरुद्वारा जाते हो तब तुम और तरह के आदमी होते हो। जब तुम दूकान पर बैठते हो तब तुम और तरह के आदमी होते हो। जब तुम मंदिर जाते हो तब देखो तुम्हारा भाव! आंखों से आंसू बह रहे हैंतुम ऐसे गदगद मालूम होते हो! मस्जिद में तुम्हें नमाज पढ़ते देखनाऔर फिर बाजार में तुम्हें दूकान पर देखनाभरोसा ही नहीं आता कि तुम एक आदमी हो। ऐसा लगता हैतुम दो आदमी हो। यह भी बचने की बड़ी कुशल तरकीब है।
तो हम एक कोना अलग ही बना दिए हैं धर्म का। वह हमारा संडे-कार्नर है। वहां हम सुबह चर्च जाते हैं। और चर्च से हम बाहर निकले कि हम उस कोने को वहीं छोड़ आते हैं। फिर सात दिन हम उसे आंख उठा कर भी नहीं देखते। जैसे धर्म का संबंध हमारे चर्च में होने से है! और बाकी जिंदगीबाकी जिंदगी हम अपने हिसाब से चलते हैं। चर्च मेंगुरुद्वारे मेंमंदिर मेंहम इन व्यापारियों की बात सुनते हैं। वह भी सुनने की है। वह भी हम कहां ठीक से सुनते हैं! वह भी एक सामाजिक उपचार है।
नानक कहते हैं, 'उसके व्यापारी भी अमूल्य हैं।'
और अगर तुम उसकी तरफ जाना चाहते हो तो उसके व्यापारियों को समझने की कोशिश करना। और उसके व्यापारी भी तुम्हें अकूत मालूम पड़ेंगे। उनको भी तुम तौल न सकोगे। तुम्हारी बुद्धि उनके साथ भी थक जाएगी। तुम्हारे मापदंड वहां भी गिर जाएंगे। तुम पाओगे कि तुम उन्हें जिस तरह से भी तौलोतुम उन्हें पाते होवे तुम्हारी तौल से बड़े हैं।
'जो लेने आता है वह अमूल्य हैजो ले जाता वह अमूल्य है।'
वहां अमूल्य का ही सारा कारोबार है--अकूत काअमाप का। वहां ग्राहक भी जो आता है वह भी अमूल्य है। वहां जो सामान ले जाता है वह भी अमूल्य है। वहां बिक्री ही उस एक की हो रही है--एक ओंकार सतनाम।
'उसका भाव अमूल्य हैउसकी समाधि अमूल्य है।'
तुम्हारे भीतर उसका भाव भी पैदा हो जाएतो तुम दूसरे जगत में प्रवेश कर गए। तुम फिर यहां नहीं हो। उसका भाव पैदा हो जाए तो तुम कहीं और चले गए।
रामकृष्ण के सामने कोई परमात्मा का नाम ले देतावहीं वे खड़े हो जाते। आंख बंद हो जाती और आंसुओं की धार लग जाती। शरीर जड़ हो जाता। वे कहीं और चले गए। वे अब यहां नहीं हैं। स्मरण मात्र! और एक नया आयाम भीतर खुल गया। तत्क्षण कोई और दुनिया खुल गयी। यह दुनिया बंद हो गयी। इस दुनिया के दरवाजे बंद हो गए। और एक नए लोक का द्वार खुल गया।
नानक कहते हैंउसका भावस्मरण मात्रउसकी सुरतिजरा सी उसकी स्मृतिएक रेखा--और तुम कहीं और चले गए। उसका भाव ही जब परिपूर्ण हो जाता है तो उसका नाम समाधि है।
भाव और समाधि के भेद को समझ लें। भाव का अर्थ हैएक झलक। भाव का अर्थ हैएक तरंग। भाव का अर्थ हैएक क्षण को तुम उसमें डूबेलेकिन तुम बने रहे। डुबकी तो लगायीमिटे नहीं। जैसे पानी में कोई डुबकी लगाए। कितनी देर डुबकी लगाएगाएक क्षण बाद बाहर आ जाएगा। और डुबकी जब लगाए हुए हैतब भी मौजूद तो है ही!
शेख फरीद हुआ एक सिद्ध पुरुष। नानक के ही करीब-करीब समय में। एक दिन नदी जा रहा था स्नान करने और एक भक्त ने पूछा कि भगवान कैसे पाया जाएउसने कहातू मेरे साथ आ। नदी के किनारे भक्त से कहाचल पहले स्नान कर लें। फिर तुझे बता दूंगा। और मौका लगा तो स्नान करने में ही बता दूंगा।
भक्त थोड़ा डरा। भगवान की बात पूछी! और यह आदमी कह रहा है कि स्नान करने में ही बता दूंगाअगर मौका लगा। थोड़ा भय भी आया। लेकिन अब पूछ बैठा थाफंस गए! न भी न कर सका। और जिज्ञासा भी जगी कि पता नहीं! शायदनदी में कुछ बताए। तो उतर गया स्नान करने।
जैसे ही उसने डुबकी लगायीशेख फरीद उसके ऊपर सवार हो गया और उसे नीचे दबाने लगा। वह भक्त तड़फड़ाने लगा। हाथ-पैर फेंकने लगा। सारी ताकत दांव पर लगा दी। भक्त ऐसे कमजोर दुबला था। शेख फरीद तगड़ा आदमी था। बा-मुश्किल,लेकिन सारी ताकत लगा दीतो फरीद को भी उसने फेंक दिया। बाहर निकल कर बोला कि तुम मैं समझा कि संत होलेकिन हत्यारे मालूम पड़ते हो। यह कोई ढंग हुआ! यह कोई बात हैतुम पागल हो या होश में होअगर नहीं मालूमतो पहले ही कह देना था।
फरीद ने कहा कि पीछे कर लेंगे यह हिसाब-किताब कि होश में हूं कि पागल हूं। कि कौन होश में हैकौन पागल है! पहले मैं यह पूछता हूं--क्योंकि वक्त निकल गया तो तू भूल जाएगातेरी स्मृति कमजोर है--मैं तुझ से यह पूछता हूं कि जब मैं तुझे पानी में दबाए ही जा रहा थातब तेरे मन में कितने विचार थे?
उसने कहाविचार! पागल हुए होएक ही भाव था कि किसी तरह बाहर निकल आऊं और एक श्वास हवा मिल जाए। विचार कहांबस एक भाव था कि किसी तरह बाहर आ जाऊं! और एक श्वास...!
फरीद ने कहाबस तू समझ गया। जिस दिन ऐसा ही कोई विचार न होगा और एक भाव होगा परमात्मा काउस दिन तू जान लेगा। और जब तक जीवन दांव पर न लगाएगातब तक परमात्मा को जानना मुश्किल है।
भाव का अर्थ हैजहां कोई विचार न रहा। केवल उसकी सुरति रह गयी। मगर तुम भी होथोड़ी देर में तुम पानी के बाहर आ जाओगे। समाधिभाव की परिपूर्ण दशा है। तुम गए तो गए! प्वाइंट आफ नो रिटर्न। वहां से फिर तुम वापस नहीं आते। फिर वह भाव सदा रहता है। फिर तुम भाव के साथ एक हो गए। वह डुबकी नहीं हैवह लीनता है। तुम पानी ही हो गए। अब कौन बाहर आएगाकौन भीतर जाएगाजैसे तुम नमक के पुतले थे और पिघल गए पानी में और खो गए। जैसे तुम शक्कर की डली थे और पानी में खो गए और एक हो गए। अब कोई पानी को चखेगा तो तुम्हारा स्वाद पाएगा। लेकिन अब तुम एक हो गए! अब तुम अलग नहीं हो। भाव में तुम अलग होते हो। क्षण भर की झलक मिलती है। समाधि में तुम एक हो गए होते हो। झलक शाश्वत हो जाती है।
नानक कहते हैंउसका भाव भी अमूल्य है। समाधि का तो कहना क्या!
अमुल भाव अमुला समाहि
'उसका धर्म अमूल्य हैउसका दरबार अमूल्य है। तुला अमूल्य है। प्रमाण अमूल्य है। उसका वरदान अमूल्य है। उसका प्रतीक अमूल्य है।'
इसे थोड़ा समझें। उसका प्रतीक भी अमूल्य है। प्रतीक के साथ बड़ी जटिलता है। हिंदू हैंउन्होंने हजारों प्रतीक खोजे हैं। मूर्तियां बनायींतीर्थ बनाएये सब प्रतीक हैं। मुसलमान को समझ में भी नहीं आता कि मूर्ति में क्या रखा हुआ हैवह मूर्ति को तोड़ देता है। और तोड़ कर उसे ऐसा भी लगता है कि जब मूर्ति अपनी ही रक्षा नहीं कर सकतीतो भक्तों की क्या खाक रक्षा करेगी?
दयानंद को भी ऐसा ही हुआ अनुभव। वह पूजा करते थे। रात सो गएऔर देखा कि एक चूहा मूर्ति पर चढ़ा हैऔर मूर्ति चूहे को भी नहीं भगा सकती! पर मुसलमान भी चूकते हैं और दयानंद भी चूके। क्योंकि प्रतीकप्रतीक है। प्रतीक परमात्मा नहीं है।
प्रतीक का अर्थ होता है कि उसके सहारे तुम किसी यात्रा पर जा रहे हो। वह खुद मंजिल नहीं है। समझोतुम्हारी प्रेयसी ने तुम्हें एक रूमाल भेंट कर दियावह चार आने का है। अगर बाजार में तुम उसे बेचने जाओगे तो दो आना भी नहीं मिलेगा। पहले तो कोई खरीदने को तैयार ही नहीं होगा कि पुराने रूमाल का क्या करेंगेपर गुदड़ी बाजार में शायद कोई दो आने में खरीद ले। लेकिन तुम्हें तुम्हारी प्रेयसी ने दिया है वह रूमाल। उसका मूल्य लगाना कठिन है। हिसाब ही लगाना कठिन है। तुम उसे साज-संवार कर रखते हो। वह कहीं खो न जाए!
तुम्हारे लिए वह रूमाल सिर्फ रूमाल नहीं हैप्रतीक है। उस रूमाल के साथ प्रेयसी से तुम्हारा नाता जुड़ा है। इस बात को कोई दूसरा न जान सकेगा। दूसरे के लिए वह सिर्फ रूमाल होगा। तुम्हारे लिए वह सिर्फ रूमाल नहीं है। किसी गहरे अर्थ में तुम्हारी प्रेयसी उस रूमाल के साथ संयुक्त है। वह रूमाल तुम्हारी प्रेयसी की हवा को छुआ है। उस रूमाल ने तुम्हारी प्रेयसी के हाथों में स्पर्श पाया है। प्रेयसी ने उस रूमाल का चुंबन लिया है और तुम्हें भेंट किया है। प्रेयसी ने अपने हाथों से थोड़ी सी कसीदाकारी की है। वह प्रेयसी बड़े गहरे अर्थों में उस रूमाल में समा गयी है। किसी और के लिए वह प्रतीक साधारण रूमाल है,तुम्हारे लिए वह साधारण रूमाल नहीं है।
क्या फर्क हैतुम्हारे लिए प्रतीक है। दूसरों के लिए रूमाल है।
हिंदू की मूर्तिहिंदू के लिए प्रतीक हैअगर उसने भाव को संजोया है। मुसलमान के लिए साधारण पत्थर है। जैन की मूर्तिजैन के लिए प्रतीक हैहिंदू के लिए पत्थर है। बुद्ध की मूर्तिबौद्ध के लिए प्रतीक हैजैन के लिए किसी मूल्य की नहीं। प्रतीक का मूल्य भाव पर निर्भर होता है। प्रतीक का कोई सार्वजनिक मूल्य नहीं होता। प्रतीक प्राइवेट है। वह एक निजी बात है। जो जानता हैवह जानता है। जिसका उससे लगाव हैउसका लगाव है।
इसलिए भूल कर भी कभी किसी के प्रतीक के खिलाफ कुछ मत कहना। क्योंकि वह तुम्हारे लिए साधारण हैऔर तुम भी सच हो। और जिसके लिए वह असाधारण हैवह भी सच है।
तुम भी सच हो कि यह रूमाल रूमाल हैक्या छाती से चिपकाए फिरते होऔर खो जाए तो डर क्या हैहजार खरीद कर ला देंगे। बाजार में मिलता है। लेकिन जिसके लिए वह प्रतीक हैवह भी सच है। क्योंकि यह रूमाल फिर नहीं मिल सकता। ऐसा रूमाल दुबारा नहीं मिल सकता। यह रूमाल अनूठा है। पर यह जो अनूठापन हैयह निजी घटना है।
नानक कहते हैं, 'उसके प्रतीक भी अमूल्य हैं।'
वह तो अमूल्य है हीलेकिन अगर तुमने किसी प्रतीक के माध्यम से उसकी झलक पायी हैवह भी अमूल्य है। और प्रत्येक प्रतीक का सम्मान करना है। क्योंकि कौन जाने किस के लिए उससे रास्ता मिलता हो! और किसी के प्रतीक को कभी गलत मत कहना। क्योंकि प्रतीक गलत और सही होते ही नहीं। किसी के लिए प्रतीक होते हैंकिसी के लिए नहीं होते। प्रतीक के गलत और सही होने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
अब बड़ी हैरानी की बात है। मुसलमान को दिखायी पड़ता है कि सारी मूर्तियां व्यर्थ हैं। लेकिन काबा का पत्थरउसको वे चूमते हैं। उस पत्थर पर जितने चुंबन पड़े हैंदुनिया के किसी पत्थर पर नहीं पड़े। वह पत्थर चुंबनों से भर गया है। उस पत्थर के एक-एक इंच पर अरबों-अरबों चुंबन पड़ चुके हैं। पिछले चौहद सौ वर्षों में करोड़ों-करोड़ों लोगों ने उस पत्थर को चूमा है। ऐसा कोई पत्थर खोजना मुश्किल है। मुसलमान को वह पत्थर तो चूमने जैसा लगता हैहिंदू की मूर्ति तोड़ने जैसी लगती है। क्योंकि वह पत्थर उसके लिए प्रतीक है। और यह प्रतीक नहीं है।
लेकिन धार्मिक व्यक्ति को इतनी समझ होनी ही चाहिए कि जो मेरे लिए प्रतीक नहीं हैवह दूसरे के लिए प्रतीक हो सकता है। और प्रतीक निजी घटना है। और उसको सार्वजनिक रूप से सिद्ध करने का कोई भी उपाय नहीं है। क्योंकि वह भाव की बात है। वह अंतर्भाव है। वह बड़ी गहन और भीतरी घटना है। उसको बाहर लाने का उपाय नहीं। बाहर लाते-लाते ही वह खो जाती है।
किसी आदमी के लिए पीपल का वृक्ष प्रतीक है। तुम उससे मत कहना कि क्या वृक्ष को पूज रहे होपागल हो गए हो?सवाल किस को पूज रहे हो यह है ही नहींसवाल पूजा का हैकिस बहाने पूजा हो जाए! सभी बहाने ठीक हैं। और सभी बहाने गलत हैं। अगर तुम वैज्ञानिक ढंग से सोचोतो पीपल का वृक्षपीपल का वृक्ष है। पत्थरपत्थर हैरूमालरूमाल है। लेकिन विज्ञान का क्या लेना-देना है यहां! धर्म प्रेम का राज्य हैतर्क और बुद्धि का नहीं।
पर बड़े मजे की बात हैहर आदमी अपने प्रतीक को तो मान कर चलता हैदूसरे के प्रतीक के साथ झंझट खड़ी हो जाती है। तुम अपनी प्रेयसी के रूमाल को तो सम्हाल कर रखे होदूसरों को भी सम्हाल कर रखने दो। वह उनकी प्रेयसियों के रूमाल हैं।
नानक कहते हैंप्रतीक भी! जिससे इशारा भी मिल जाए।
अब समझो कि किसी आदमी को अगर पीपल के वृक्ष के देवता में ही रस हैऔर वह यदि पीपल के वृक्ष के पास समाधिस्थ हो जाता हैऔर आनंदमग्न हो कर नाचने लगता हैतो असली सवाल वृक्ष थोड़े ही है! असली सवाल तो यह आनंदमग्न नृत्य है। यह नृत्य जहां भी घटित हो जाएजिस बहाने भी उसकी याद आ जाएवही अमूल्य है।
'उसका वरदान अमूल्य है। उसका प्रतीक अमूल्य है। उसकी कृपा अमूल्य है। और उसकी आज्ञा अमूल्य है। वह अमूल्य से भी कितना अमूल्य हैइसका बखान नहीं हो सकता। उसका बखान ही करते-करते कितने ध्यानस्थ होते रहते हैं।'
उसके बखान का प्रयोजन ही इतना है। इसे थोड़ा समझें। नानक बार-बार कहते हैंउसका बखान नहीं हो सकता। कोई उपाय नहीं बखान करने का। और फिर भी बखान करते चले जाते हैं। कर क्या रहे हैं नानकयदि उसका बखान नहीं हो सकता,तो ये सारे शब्द कर क्या रहे हैंयह सब उसका बखान है। तब एक बड़ी तार्किक पहेली खड़ी हो जाती है।
अनेक लोग मुझसे आ कर पूछते हैं कि बुद्ध कहते हैंकुछ कहा नहीं जा सकता। फिर बुद्ध बोलते क्यों हैंमुझसे कहते हैंकि आप कहते हैंकुछ कहा नहीं जा सकता। और आप रोज बोले चले जाते हैं! संगति नहीं मालूम पड़ती।कन्सिस्टेन्सी नहीं मालूम पड़ती।
इसे थोड़ा समझें। नानक कहते हैंउसका बखान नहीं हो सकताऔर बखान किए चले जा रहे हैं। क्योंकि बखान करते-करते ही समाधि लग जाती है। बखान तो नहीं हो पाता। लेकिन उसकी चर्चा करनी ही इतनी मधुर है! चर्चा हो नहीं पाती। कह कर भी कुछ कहा नहीं जाता। अनकहाअनकहा रह जाता है। लेकिन उसकी चर्चा करना ही इतना आनंदपूर्ण है कि उसकी चर्चा करते-करते ही ध्यान लग जाता है। बोल-बोल कर कुछ कहा तो नहीं जा सकतालेकिन बोलते-बोलते-बोलते बोलने वाला खो जाता है।
'उसका बखान ही करते-करते कितने ध्यानस्थ हो जाते हैं। वेद उसका वर्णन करते हैं। पुराण उसका पाठ करते हैं। विद्वान उसका वर्णन करते हैं और बखान करते हैं। इंद्र और ब्रह्मा उसका वर्णन करते हैं। गोपी और गोविंद उसका वर्णन करते हैं। विष्णु और सिद्ध उसका वर्णन करते हैं। अनेक-अनेक बुद्ध उसका वर्णन करते हैं। दानव और देव भी उसका वर्णन करते हैं। सुरनर और मुनिजन और सेवकजन उसका वर्णन करते हैं।'
उसका वर्णनवर्णन के लिए नहीं है। उसका वर्णन भी ध्यान की एक विधि है। उसकी चर्चा उसमें खो जाने का एक उपाय है। उसकी बात करना उसकी तरफ उन्मुख होने का मार्ग है। जहां उसकी बात चलती हो वहां बैठ कर उसकी बात सुन लेना भी--तुम्हारे भीतर भी शायद एक-आध बूंद की वर्षा हो जाए! शायद तुम्हारे प्यासे कंठ पर भी कोई चीज पड़ जाए। शायद अनायास कुछ सुनायी पड़ जाए। शायद तुम्हारी वधिरता को तोड़कर कोई शब्द भीतर प्रवेश कर जाए। शायद तुम्हारी अंधी आंखें भी थोड़ी सी रोशनी से भर जाएं। और तुम्हारी बुद्धि के विचार भी थोड़ी देर को उसकी चर्चा के राग मेंउसकी चर्चा के रंग मेंउसकी चर्चा के संगीत में डूब जाएं। थोड़ी देर को तुम चुप हो जाओ। तुम्हारी भीतरीजो चल रही वार्तालाप की विधि हैवह विच्छिन्न हो जाए। तुम्हारा इंटरनल डायलाग टूट जाए!
इसलिए नानक उसके गीत गाते हैं। उसके गीत गाते हैंक्योंकि गाते-गाते गायक उसमें खो सकता है। गाते-गाते सुनने वाला भी उसमें खो सकता है। और इसलिए नानक ने कहा नहींगाया। क्योंकि गाने से ज्यादा आसान होगा। और संगीत का भी उपयोग किया। क्योंकि तुम्हारा सुर भीतर का सध जाएगा। थोड़ी देर को संगीत की थाप में तुम शायद उस गहन शांति को एक क्षण को भी छू लोजिसका स्वाद फिर भूले नहीं भूलेगा।
इसलिए नानक साधु-संगत का बड़ा मूल्य मानते हैंकि जहां उसकी चर्चा चल रही हो वहां बैठनासुनना। सुनते-सुनते,धीरे-धीरे तुम पर भी रंग चढ़ जाएगा। अगर तुम बगीचे से गुजरोगेतो अनजाने भी तुम्हारे वस्त्रों में फूलों की गंध थोड़ी सी साथ आ जाएगी। और तुम अगर सुबह के सूरज के पास खड़े होओगेतो उसकी उत्तप्त और ताजी किरणें तुम्हारे खून को भी आंदोलित करेंगी। और रात अगर तुम चांद के पास बैठोगेलेट जाओगे भूमि पर और देखोगे आकाश में चांद कोतो उसकी शीतलता थोड़ी सी तुम्हारे भीतर भी मार्ग बनाएगी। साधु-संगत का अर्थ हैजहां उसका गुणगान हो रहा हो।
हिंदुओं ने कहा हैजहां उसकी निंदा हो रही होवहां अपने कान बंद कर लेना। जहां उसकी चर्चा हो रही होवहां तुम अपने समस्त व्यक्तित्व को कान ही बना देनासिर्फ सुनने वाले हो जाना।
इसलिए तो नानक कहते हैं बार-बारसुनिए। वे उसकी चर्चा कर रहे हैं। उसका बखान कर रहे हैं। लेकिन एक बात बार-बार स्मरण दिलाते हैं कि बखान करने से भी उसका बखान होता नहीं। क्योंकि कहीं तुम इस भूल में मत पड़ जाना कि जो कहा हैउससे उसका माप हो गया। जो कहा हैउससे इशारा हुआ। उससे माप नहीं हुआ। जो कहा हैउससे वह चुक नहीं गया। पूरा का पूरा चुक नहीं गया। शुरुआत हुईअंत नहीं हुआ। इसलिए बखान भी करते हैंऔर कहते हैं कि उसका बखान हो भी नहीं सकता।
'वेद उसका वर्णन करते हैं। शास्त्र उसका वर्णन करते हैं।'
और बड़ी अदभुत बात कही कि--
'गोपी और गोविंद भी उसका वर्णन करते हैं।'
गोपी और गोविंद तो बोलते ही नहींवे तो नाचते हैं। लेकिन उस नाच में भी उसका ही वर्णन है। उस नृत्य में भी उसकी ही खबर है। गोपी और गोविंद तो चर्चा ही कहां करते हैं! वे तो नाचते हैं। रासलीला होती है चांद तले। गोविंद नाचते हैं गोपियोंके साथ। लेकिन नानक कहते हैंवह भी उसी का वर्णन है।
ढंग अलग हैं। कोई नाच कर कहता हैकोई गा कर कहता हैकोई चुप हो कर कहता हैकोई बोल कर कहता है। लेकिन सभी उसका वर्णन है। और जिसने उसे जान लियावह कुछ भी करेउसके हर कृत्य मेंउसके हर इशारे मेंगेस्चर में उसी का वर्णन है। बुद्ध का हाथ भी उठेतो उस हाथ में भी उसी की तरफ इशारा है। बुद्ध की आंख भी खुलेतो वह आंख भी उसी की तरफ इशारा है। बुद्ध चुप होंतो भी उसी की बात कर रहे हैं। बुद्ध बोलेंतो भी उसी की बात कर रहे हैं।
फिर हर व्यक्ति के अलग ढंग हैं। बुद्ध नाच नहीं सकते। वह उनके व्यक्तित्व में नहीं है। वह उन्हें जमेगा भी नहीं। नाचते हुए बड़े असंगत मालूम पड़ेंगे। नाच से उनका तालमेल न होगा। वे प्यारे लगते हैं बोधिवृक्ष के नीचे। जैसे बैठे हैंवैसे ही। वही उनका नृत्य है। वे कंपते भी नहींकंपन भी नहीं है। हिलते भी नहींडुलते भी नहीं। ठीक पत्थर की तरह!
बुद्ध की मूर्ति के कारण ही अरबी और अरबी से संबंधित भाषाओं मेंमूर्ति के लिए जो शब्द है वह 'बुतबन गया। बुत,बुद्ध का अपभ्रंश है। बुद्ध इतने मूर्तिवत हैं कि अगर तुम उन्हें जिंदा भी पाओगे तो लगेंगे कि संगमरमर की मूर्ति हैं। अगर बुद्ध के पीछे करोड़ों-करोड़ों मूर्तियां बनीं संगमरमर कीतो उसका कारण था। बुद्ध वैसे लगते थे। उनका होने का ढंग इतना मौन था। वहां कोई कंपन न था। नृत्य तो बहुत मुश्किल हैवे ऐसे बैठे थे जैसे कि पत्थर हों। संगमरमर का पत्थर ठीक उनकी याद दिलाता है। वैसे ही शीतलवैसे ही थिर। लेकिन वही बुद्ध का ढंग है। उस तरह वे कहते हैं।
कृष्ण नाच रहे हैं। बड़ा उल्टा ढंग है उनका बुद्ध से। तुम सोच भी नहीं सकते कि बुद्ध मोर-मुकुट बांधे खड़े हैं। बड़े नाटकीय लगेंगे। जंचेगा भी नहीं। लेकिन कृष्ण को तुम अगर बुद्ध की तरह बिठा दोतो वे भी उतने ही नाटकीय लगेंगे। वह भी नहीं जंचेगाअभिनय मालूम पड़ेगाझूठा लगेगा। कृष्ण पर रोपा नहीं जा सकेगा। कृष्ण का व्यक्तित्व और ढंग का है। वे मोर-मुकुट में ही शोभते हैं। वे नाच रहे हैं। चारों तरफ गोपियों का नृत्य चल रहा है।
लेकिन नानक कहते हैंगोपी और गोविंद के नृत्य में भी उसका ही बखान है।
यह बड़ा प्यारा वक्तव्य है नानक का कि उसकी ही खबर है। हजारों तरह से बुद्धों ने उसे कहा है। जाग्रत-पुरुषों ने उसे कहा है। इशारे हजारों हैं। जिसकी तरफ इशारा हैवह एक है--एक ओंकार सतनाम।
'ब्रह्मा और इंद्र उसका वर्णन करते हैं। विष्णु और सिद्ध उसका वर्णन करते हैं। अनेक-अनेक बुद्ध उसका वर्णन करते हैं। कितने तो वर्णन कर पाते हैं। और कितने वर्णन करते-करते ही विदा हो जाते हैं। उसने जो किया हैवह उसे और भी करेगा। उसका हिसाब कोई भी नहीं लगा सकता है। वह जैसा चाहता हैवैसा ही हो जाता है।'
ये शब्द बहुत विचारने जैसे हैं।
एते कीते होरि करेहि। ता आखि न सकहि केई केइ।।
जेवडु भावै तेवड होइ। नानक जाणै साचा सोइ।।
उसका वर्णन इसलिए भी नहीं हो सकता कि परमात्मा कोई पूरी हो गयी घटना नहीं है। अगर कोई चीज पूरी हो गयी हो,तो वर्णन हो सकता है। लेकिन कोई चीज अगर अधूरी होतो वर्णन कैसे होगाकोई चीज अगर होती ही जा रही होतो वर्णन कैसे होगा?
अगर किसी आदमी की आत्मकथा लिखनी होतो उसके मरने तक हमें रुकना पड़ेगा। अगर उसकी जीवन-कथा हमें लिखनी होतो मृत्यु के बाद ही लिखी जा सकती है। क्योंकि आदमी अभी अधूरा है। अभी और अध्याय बाकी हैं।
परमात्मा की जीवन-कथा कैसे लिखेंक्योंकि वह कभी भी मरेगा नहींकभी पूरा नहीं होगा। कभी आखिरी चरण नहीं आएगाजहां हम कह दें--दि एंड। जहां इति श्री हो जाए। वह होता ही रहेगा। परमात्मा सतत होना है। इटरनलशाश्वत अभिव्यक्ति। वह फूल खिलता ही चला जाता है। उसकी पंखुड़ियां उस जगह नहीं आतींजहां हम कह देंफूल पूरा खिल गया। वह सदा से खिल रहा है। और सदा खिलता रहेगा।
यह जो परमात्मा की अनंत होने की क्षमता हैइसलिए वर्णन सब अधूरे हैं। सब कपड़े छोटे पड़ जाते हैंवह बड़ा होता जाता है। इसलिए जितनी हमने परमात्मा की मूर्तियां बनायींऔर जितने हमने वर्णन किएवे सब अधूरे पड़ गए। वह ऐसेजैसे हम छोटे बच्चे को कपड़े बना देते हैं। वे फिर छोटे पड़ जाते हैंक्योंकि बच्चा बड़ा हो रहा है। एक उम्र आ जाती हैफिर नाप ठहर जाता है। फिर कपड़े का डर नहीं होता। फिर कपड़ा हम जो बना लेते हैंवह काम आता है। फिर नाप निश्चित हो जाता है। फिर दर्जी को बार-बार नाप देने की जरूरत भी नहीं पड़ती। वह नाप नोट कर लेता है। लेकिन बच्चों के नाप नोट नहीं किए जा सकतेक्योंकि वे बढ़ते जा रहे हैं।
और परमात्मा सदा बढ़ रहा है। इसलिए जितने कपड़े हम बनाते हैंसब छोटे पड़ जाते हैं। इसलिए सब शास्त्र छोटे पड़ जाते हैंऔर पुराने पड़ जाते हैं। इसलिए तो नए धर्म आविर्भाव होते हैं। और नए बुद्ध पुरुष फिर से उसका बखान करते हैं। और जब नए बुद्ध पुरुष उसका बखान करते हैंथोड़ी देर तक वह बखान सही रहता है। क्योंकि कपड़े फिर छोटे हो जाते हैं। और सदा जरूरत रहेगी बुद्ध पुरुषों की कि वे उसका गीत गाते रहें। और हर नया गीतथोड़ी देर ही लागू होता है। जितनी देर हम गाते हैंउतनी देर भी लागू नहीं हो पाता। क्योंकि वह रोज बढ़ता जा रहा है। हमारे गाने की क्षमता छोटीऔर उसके बढ़ने की क्षमता बहुत बड़ी है।
इसलिए तो अगर तुम पिछले पांच हजार साल का धर्मों का इतिहास देखोतो तुम पाओगे परमात्मा की शक्ल बदलती गयी है। परमात्मा की शक्ल नहीं बदलतीहमारा वर्णन छोटा होता है। फिर हमें बदलाहट करनी पड़ती है। फिर हमें उसमें हेर-फेर करना पड़ता है। फिर कुछ काटना-छांटना पड़ता है। फिर नए नाक-नक्श देने पड़ते हैं। जब तक हम दे पाते हैंतब तक वह आगे जा चुका है। जब तक हम नाक-नक्श सुधारते हैं तब तक हम पाते हैं कि वह कुछ और हो गया है। सभी अधूरा रहेगा।
हिंदू बड़े अदभुत लोग हैं। इसलिए उन्होंने परमात्मा की ऐसी भी मूर्तियां बनायीं जिनमें नाक-नक्श नहीं हैं। सिर्फ हिंदुओं ने ऐसा काम किया है। अन्यथा दुनिया में और जगह भी मूर्तियां बनती हैं तो नाक-नक्श हैं। हिंदू एक पत्थर को उठा लेते हैं,सिंदूर से रंग देते हैंहनुमान जी हो गए! न नाक हैन नक्श है। क्योंकि हिंदू कहते हैंक्या नाक-नक्श बनाना! जब तक हमबनाएंगेतब तक वह आगे निकल जाएगा। तो यह पत्थर काम देगा।
हिंदुओं ने शंकर कीशिव की जो प्रतिमा बनायी है--शिव-लिंगउसमें कोई भी नाक-नक्श नहीं है। वह अंडाकार है। और वह शाश्वत प्रतिमा है। वह सदा लागू रहेगी। परमात्मा कैसा ही हो जाएइससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन हम जो भी उसका वर्णन करेंगेहम कर भी नहीं पाएंगे कि हम पाएंगे कि वर्णन आउट आफ डेट हो गया।
नानक कहते हैंएते कीते होरि करेहि
और उसने इतना किया है अब तकऔर भी करता रहेगा। अब तक इतना हुआ हैऔर भी होता रहेगा।
ता आखि न सकहि केई केइ।।
और अगर वह पूरा हो गया होता तो हम कुछ आख लेतेहिसाब लगा लेते। लेकिन वह और आगे होता ही रहेगा। और क्या होता रहेगा इसका अनुमान भी करना असंभव है। अनप्रेडिक्टिबल है। परमात्मा के संबंध में हम कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि वह कैसा हो जाएगा! या संसार क्या रूप-रंग लेगा! सब अज्ञात में छिपे हैं।
'जो उसने कियावह उसे और भी करेगा। उसका हिसाब कोई भी नहीं लगा सकता। वह जैसा चाहता हैवैसा हो जाता है।'
उसका भाव--और वैसी घटना घट जाती है। ईसाई कहते हैंयहूदी कहते हैं कि परमात्मा ने कहाहो जा! और जगत हो गया।
हमारे कृत्य में और भाव में अंतर होता है। क्योंकि हमारी शक्ति सीमित है। अगर आप चाहते हैं एक मकान बनानातो आज भाव उठता हैदो साल बाद मकान बन पाएगा। यह दो साल का समय लगता हैक्योंकि हमारी शक्ति सीमित है। अगर शक्ति थोड़ी ज्यादा होतो एक साल में बन जाएगा। शक्ति और थोड़ी ज्यादा होतो एक दिन में बन जाएगा। और अगर शक्ति सर्वज्ञ होपरिपूर्ण होजैसी की परमात्मा की हैतो फिर भाव में और कृत्य में समय का भेद न रहेगा।
इसलिए समय हमारे लिए हैपरमात्मा के लिए कोई समय नहीं है। समय मानवीय घटना है। परमात्मा के लिए समय है ही नहीं। क्योंकि समय है ही इसीलिएक्योंकि हम कमजोर हैं। हमारी कमजोरी से समय है।
कभी तुमने खयाल न किया होलेकिन अब खयाल करना। जितने तुम कमजोर होओगेउतना समय लंबा मालूम पड़ेगा। समझो कि तुम्हारी पत्नी बुखार से बीमार है। एक सौ चार डिग्री बुखार है। और तुम भागे हुए बाजार जाते होदवा खरीद कर पांच मिनट में वापस लौट जाते हो। लेकिन पत्नी कहती हैबहुत देर लगा दी। बुखार में समय लंबा मालूम पड़ता है।
अब तो इसके वैज्ञानिक प्रमाण भी जुट गए हैं कि जब आदमी बुखार में होता है तो समय लंबा मालूम पड़ता है। बीमार आदमी को समय ज्यादा मालूम पड़ता है। बीमार आदमी को ही नहींबीमार आदमी के पास तुम बैठो घड़ी भरतो बहुत लंबी मालूम पड़ती है। अगर कोई आदमी मर रहा होऔर उसके पास बैठो रात भरतो ऐसा लगेगा कि अंत ही नहीं आता। रात लंबी ही होती चली जाती है। जब तुम स्वस्थ होते होसमय छोटा हो जाता है। जब तुम प्रफुल्लित होते होसमय छोटा हो जाता है। जब तुम दुखी होते होलंबा हो जाता है। हमारी शक्ति पर समय निर्भर है।
परमात्मा परिपूर्ण शक्ति हैओम्नीपोटेंटसर्वशक्तिमान। उसके लिए कोई भी समय नहीं है। उसका भाव ही कृत्य हो जाता है। तो नानक कहते हैं--
जेवडु भावै तेवड होइ।
जो भाव करता हैवैसा ही घट जाता है। उसी क्षण घट जाता है। क्षण की भी देरी नहीं होती। युगपतसाइमलटेनियस। इधर भावउधर घटना हो जाती है। भाव ही कृत्य है।
नानक कहते हैं, 'इसे जो जान लेवही सत्य है।'
इस वचन के दो अर्थ हो सकते हैं।
जेवडु भावै तेवड होइ। नानक जाणै साचा सोइ।।
इस वचन के दो अर्थ हो सकते हैंकि इस बात को जो जान लेवह स्वयं सत्य हो गया। वही सच हैजो इस बात को जान ले। परमात्मा की इस सर्वशक्तिमत्ता को जो जान लेवही सत्य है।
और दूसरा अर्थ हो सकता हैकि नानक कहते हैंवह सत्य पुरुष ही अपने को जानता है। हम उसे न जान सकेंगे। क्योंकि न उसके भविष्य का हमें कोई बोध है और न अतीत का। और वह कभी पूरा नहीं होगा। पूरा होता रहेगा। पूर्णता से और पूर्णता...और पूर्णता...। वह अपूर्ण नहीं हैजो अपूर्ण से पूर्ण हो रहा होवह पूर्ण से पूर्णतर हो रहा है।
तो एक अर्थ हो सकता हैकि वही केवल जानता है। हमारे सब अनुमानअनुमान हैं। दूसरा अर्थ हो सकता हैकि जो परमात्मा की इस सर्वशक्तिमत्ता को अनुभव कर लेता हैवही सच है। वह व्यक्ति भी सत्य हो गया।
'पर यदि कोई उसका वर्णन करने का दंभ भरेतो उसकी गिनती गंवारों में भी गंवार की होनी चाहिए।'
जे को आखै बोल बिगाडु। ता लिखीए सिरि गावारा गावारु।।
अगर गंवारों की कोई फेहरिश्त बनानी हो तो सबसे ऊपरसिर पर उसका नाम लिखना चाहिएजो यह दंभ करे कि उसका वर्णन किया जा सकता है।
वर्णन नानक करते हैंक्योंकि वर्णन पड़ा रसपूर्ण है। वर्णन डुबो देता है। वर्णन ध्यान है। उसके भाव की बात करते-करते,करते-करते हृदय खिल जाता है। भीतर उमंग पैदा हो जाती है। रस बहने लगता है। लेकिन अगर कोई सोचता हो कि उसका वर्णन हो सकता हैतो वह गंवारों में गंवार है।
ज्ञानी वही हैजो जानता हैउसका वर्णन नहीं हो सकता। वर्णन करता हैक्योंकि उसका नाम लेने में बड़ा आनंद है। चर्चा उसकी करता हैचर्चा बड़ी प्रीतिकर है। उसी-उसी की बात करता है। कुछ दूसरी बात ही नहीं करता। क्योंकि उसकी बात करते-करते उसका द्वार खुलता है। उसकी चर्चा उसके द्वार पर दस्तक देने जैसी है।
तुमने कभी खयाल किया हैजब पहला बच्चा पैदा होता हैतब मां उसी-उसी की चर्चा करती है। पड़ोसियों से करती है,घर मेहमान आते हैंउनसे करती है। वे ही बातें बार-बार दोहराती है।
प्रेमी जब किसी के प्रेम में पड़ जाता हैतो अपनी प्रेयसी से बार-बार कहता है कि मैं तुझे प्रेम करता हूं। बार-बार कहता हैतुझ से ज्यादा सुंदर कोई भी नहीं। बार-बार कहता हैतू अनूठी हैअद्वितीय है। बार-बार कहता हैतुझ जैसा कभी कोई हुआ ही नहीं। बार-बार कहता है कि मैं धन्यभागी हूं। और न तो प्रेयसी समझती है कि पुनरुक्ति हैकि क्या बार-बार दोहरा रहे होऔर न प्रेमी को यह खयाल आता है कि ये मैं बार-बार वही बातें क्यों कह रहा हूंक्योंकि बार-बार दोहराने सेप्रेम की बात दोहराने से प्रेम बढ़ता है। बार-बार दोहराने सेगहन होता है। बार-बार दोहराने सेजैसे भंवरा फूल के पास घूमता हैऐसी गुनगुनाहट प्रेयसी के पास गूंजने लगती है।
जो साधारण प्रेम में होता हैवही परमात्मा के प्रेम में होता है--विराट पैमाने पर। पैमाना बदल जाता हैबात वही है।
तो नानक कहे चले जाते हैं। अगर तुम प्रेमी नहीं होतो तुम हैरान होओगे कि क्या यह वही-वही बात लंबी किए जा रहे हैं! यह जपुजी तीन शब्दों में पूरा हो जाता हैएक नाम ओंकारया एक ओंकार सतनाम। क्या बार-बार कहे जा रहे हैंलेकिन बड़ा रस ले रहे हैं। और अगर तुम्हारे भीतर भी भाव का जन्म होगातो तुम भी पाओगेयह पुनरुक्ति बड़ी मधुर है।
एक मां ने सुना--उसका बेटा रात सोने जा रहा है। और उसे कहा गया है कि रोज प्रार्थना कर के सोना--तो उसने कान लगा कर सुना कि वह प्रार्थना कर रहा है कि नहींउसने एक शब्द कहाऔर कंबल ओढ़ कर अंदर हो गया। मां अंदर गयी,उसने कहाइतनी जल्दी प्रार्थना पूरी हो गयीउसने कहारोज-रोज वही-वही क्या कहनामैं रोज कह देता हूंडिट्टो! जो कल कहा थावही। और क्या परमात्मा इतना समझदार नहीं है कि समझ न पाए?
बुद्धि तो यही कहना चाहेगीकह दो डिट्टोक्या बार-बार दोहराना! लेकिन भाव दोहराना चाहेगा। हृदय डिट्टो को जानता ही नहीं। हृदय दोहराता है। दोहरा-दोहरा कर रसलीन होता है। जितना दोहराता हैउतना डूबता है। यह भंवरे की गुनगुन है। और यह गुनगुन बड़ी कीमती है। पर भाव होतो ही समझ में आ सकती है।
पर ध्यान रखनाइसलिए नानक अंत में फिर दोहराते हैं कि इस दंभ में मत पड़ जाना कि उसका वर्णन हो सकता है। वैसा दंभ आ जाएतो गंवारों में गंवार! वर्णन कर-कर के तुम्हारा अहंकार खो जाएतो तुम बुद्धिमानों में बुद्धिमान। और वर्णन करते-करते यह अहंकार आ जाए कि मैं वर्णन करने वाला हूंमैंने वर्णन कर लियाजो कोई न कह सका वह मैंने कह दियाजो कोई न बता सका वह मैंने बता दियातो फिर गंवारों में गंवार!

आज इतना ही।

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