सोमवार, 7 अगस्त 2017

अजहूं चेत गंवार - प्रवचन-08

1-क्या ध्यान की तरह भक्ति भी एकाकीपन से ही शुरू होती है?

2-पलटूदास जी कहते हैं : "लगन-महूरत झूठ सबऔर बिगाड़ैं काम'। और नक्षत्र-विज्ञान कहता है कि लग्न-मुहूर्त से काम बनने की संभावना बढ़ जाती है?

3-काम पकने पर उसमें रुचि क्षीण होने लगती है। प्रेम पकने पर क्या होता है?

4-सब कुछ दांव पर लगा देने का क्या अर्थ है?

5-प्रबल जीवेषणा के होते हुए भी किस भांति भक्त को अपने हाथ से अपना सीस उतारना संभव होता है?

6-संत पलटूदास उसे गंवार कहते हैं जो जगत् की झूठी माया में फंसा है और उसे बेवकूफजो प्रेम की ओर कदम बढ़ाता है। फिर बुद्धिमान कौन है?


पहला प्रश्न : ध्यान है एकाकी की उड़ान--एकाकी तक। भक्ति है एकाकी की उड़ान--परमात्मा तक। क्या ध्यान की तरह भक्ति भी एकाकीपन से ही शुरू होती है?

धर्म का जन्म ही एकांत में हैएकाकीपन में है। जहां तक भीड़ हैजहां तक भीड़ में लगाव हैजहां तक भीड़ के बिना रहना क्षणभर को कठिन है--वहां तक धर्म नहींसंसार है।
और ध्यान रहेभीड़ से भागकर ही कोई भीड़ से नहीं भाग जाता है। भीड़ में होकर भी कोई एकांत में हो सकता है। भीड़ भीतर नहीं होनी चाहिए। और एकांत में होकर भी भीड़ में हो सकता है। दूर हिमालय की गुफा में बैठकर भी तुम अगर चिंतन करो औरों कामित्रों काप्रियजनों काशत्रुओं काबाजार कादुकान का--तो तुम भीड़ में हो।
तो भीड़ मनोवैज्ञानिक जरूरत जब तक हैजब तक ऐसा लगता है कि बिना भीड़ के मैं मिटाबिना भीड़ के मैं न रह सकूंगाचाहिए ही भीड़बाहर हो तो ठीकबाहर न हो तो भीतर खड़ी कर लूंगा--तब तक तुम संसार में हो।
संसार मन की इस रुग्ण दशा का नाम है कि "दूसरों के बिना मैं नहीं हो सकता हूंपरनिर्भरता का नाम हैकि मेरा अस्तित्व दूसरों के होने पर ही निर्भर हैकि मेरा सुख दूसरे पर ही निर्भर हैअकेला मैं दुःखी हूंदूसरा मुझे सुख देगा। फिर पति होपत्नी होमां होपिता होभाई होमित्र हो--मगर कोई दूसरा मुझे सुख देगा! सुख दूसरे के पास हैमैं भिखारी हूं।यह संसार है।
सुख मेरा मेरे भीतर हैमैं सम्राट हूं--यह धर्म।
तो धर्म का जन्म ही एकांत में होता है। लेकिन एकांत का मतलब अकेलापन नहीं होता। भूलकर मत सोचना कि एकांत का मतलब अकेलापन होता है। अकेलापन तो एक नाकारात्मक दशा है।
जैसे सब घर के बाहर चले गए और तुम अकेले रह गए--यह एकांत नहीं है। घर में अकेले होमगर मन हजार दौड़ें भर रहा है। घर में अकेले होमगर अकेले होने में रस तो नहीं आ रहाअकेले होने में छंद तो पैदा नहीं हो रहामगन तो नहीं होमस्त तो नहीं हो--उदास हो। सोचते हो कोई आ जाए,कोई मित्र ही द्वार खटखटा देकोई पड़ोसी बुला लेकोई आ जाए! और अगर कोई न आए तो रेडियो चला लोटेलीविजन देखने लगोअखबार पढ़ो,उपन्यास पढ़ो--मगर खो जाओ कहीं!
अकेलापन तब--जब एकांत काटता हो। एकांत तब--जब अकेलेपन में रस की धार बहे।
तो एकांत और अकेलेपन का फर्क भी समझ लेना।
एकांत तब -- जब तुम परम आनंदित होतुम्हें याद भी नहीं आती दूसरे कीक्षणभर को भी दूसरे का विकल्प खड़ा नहीं होतादूसरे का विचार लहराता नहीं। तुम परम मस्ती में हो। तुम डोल रहे हो अपनी मस्ती में। तुम अपने को ही पी रहे हो। तुम्हारे भीतर से गीत उठ रहे हैं। तुम्हारे भीतर परम शांति है--नकारात्मक नहींमरघट की नहीं--ऐसी शांति जहां जीवन के फूल खिलते हैंऐसी शांति जहां परमात्मा की सुवास उठती हैजीवंत शांतिआह्लादित  शांति इस फर्क की भी ख्याल में ले लेना। शांति मूर्दा भी होती हैमूर्दा का मतलब होता है उदासी कीनीराश हताश शांति,आह्लादित भी होती हैनाचती हुई भी होती है। और जब नाचती हुई होती है तो ही परमात्मा तक ले जाती है। जब उदास होती है तो तुम पत्थर के ढेले की तरह पड़े रह जाते हो राह के किनारेतुम्हारे जीवन में गति नहीं होतीगत्यात्मकता नहीं होतीसरित-प्रवाह नहीं होता। तुम बहते नहीं;सूखी तलैया हो जाते हो। और रोज-रोज पानी सूखता और मछली रोज-रोज तड़पती और दुःखी होती और परेशान होती।
बहती हुई शांति!
कल-कल की ध्वनि से भरी हुई शांति!
परधर्म तो शुरू होता ही एकांत में है। फिर धर्म चाहे भक्ति का हो और चाहे ध्यान काचाहे प्रेम काचाहे ज्ञान का--इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता।
एकांत दो प्रकार का हो सकता हैक्योंकि मनुष्य-जाति दो भागों में बंटी है। एकजिसको कार्ल गुस्ताव जुंग ने बहिर्मुखी व्यक्ति कहा हैऐक्स्ट्रोवर्ट और एकजिसको अंतर्मुखी व्यक्ति कहा हैइंट्रोवर्ट।
दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एकजिनके लिए आंख खोलकर देखना सहज हैजो अगर परमात्मा के सौंदर्य को देखना चाहेंगे तो इन वृक्षों की हरियाली में दिखाई पड़ेगाचांदत्तारों में दिखाई पड़ेगाआकाश में मंडराते शुभ्र बादलों में दिखाई पड़ेगासूरज की किरणों मेंसागर की लहरों में,हिमालय के उत्तुंग हिमाच्छादित शिखरों मेंमनुष्यों की आंखों मेंबच्चों की किलकिलाहट में।
बहिर्मुखी का अर्थ हैउसका परमात्मा खुली आंख से दिखेगा। अंतर्मुखी का अर्थ हैउसका परमात्मा बंद आंख से दिखेगाअपने भीतर। वहां भी रोशनी है। वहां भी कुछ कम चांदत्तारे नहीं हैं। कबीर ने कहा है हजार-हजार सूरज। भीतर भी हैं! इतने ही चांदत्तारेजितने बाहर हैं। इतनी ही हरियालीजितनी बाहर है। इतना ही विराट भीतर भी मौजूद हैजितना बाहर है।
बाहर और भीतर संतुलित हैंसमान अनुपात में हैं। भूलकर यह मत सोचना कि तुम्हारी छोटी-सी देहइसमें इतना विराट कैसे समाएगायह विराट तो बहुत बड़ा हैबाहर विराट हैभीतर तो छोटा होगा! भूलकर ऐसा मत सोचना। तुमने अभी भीतर जाना नहीं। भीतर भी इतना ही विराट है--भीतरऔर भीतरऔर भीतर! उसका भी कोई अंत नहीं है। जैसे बाहर चलते जाओचलते जाओकभी सीमा न आएगी विश्व की--ऐसे ही भीतर डूबते जाओडूबते जाओडूबते जाओकभी सीमा नहीं आती अपनी भी। यह जगत्‌ सभी दिशाओं में अनंत है। इसलिए हम परमात्मा को अनंत कहते हैंअसीम कहते हैंअनादि कहते हैं । सभी दिशाओं में!
महावीर ने ठीक शब्द उपयोग किया है। महावीर ने अस्तित्व को "अनंतानंतकहा है। अकेले महावीर ने--और सब ने अनंत कहा है। लेकिन महावीर ने कहाअनंतता भी अनंत प्रकार की हैएक प्रकार की नहीं हैएक ही दिशा में नहीं हैएक ही आयाम में नहीं है--बहुत आयाम में अनंत हैअनंतानंत! इधर भी अनंत हैउधर भी अनंत है! नीचे की तरफ जाओ तो भी अनंत हैऊपर की तरफ जाओ तो भी अनंत! भीतर जाओबाहर जाओ--जहां जाओ वहां अनंत है। यह अनंता एकांगी नहीं हैबहु रूपों में है। अनंत प्रकार से अनंत है--यह मतलब हुआ अनंतानंत का।
तो तुम्हारे भीतर भी उतना ही विराट बैठा है। अब या तो आंख खोलो--और देखोया आंख बंद करो--और देखो! देखना तो दोनों हालत में पड़ेगा। द्रष्टा तो बनना ही पड़ेगा। चेतना तो पड़ेगा ही। चैतन्य को जगाना तो पड़ेगा। सोए-सोए काम न चलेगा।
बहुत लोग हैं जो आंख खोलकर सोए हुए हैं। और बहुत लोग हैं जो आंख बंद करके सो जाते हैं। सो जाने से काम न चलेगाफिर तो आंख बंद है कि खुली हैबराबर हैतुम तो हो ही नहींदेखनेवाला तो है ही नहीं--तो न बाहर देखोगे न भीतर देखोगे। यह आंख बीच में है। पलक खुल जाए तो बाहर का विराटपलक झप जाए तो भीतर का विराट।
बहिर्मुखी का अर्थ हैजिसे परमात्मा बाहर से आएगा। अंतर्मुखी का अर्थ जिसे परमात्मा भीतर से आएगा। अंतर्मुखी ध्यानी होगाबहिर्मुखीभक्त। इसलिए अंतर्मुखी परमात्मा की बात ही नहीं करेगा। परमात्मा की कोई बात ही नहींपरमात्मा तो "परहो गया। अंतर्मुखी तो आत्मा की बात करेगा। इसलिए महावीर नेबुद्ध ने परमात्मा की बात नहीं की। वे परम अंतर्मुखी व्यक्ति हैं। और मीरांचैतन्यइन्होंने परमात्मा की बात की। ये परम बहिर्मुखी व्यक्ति हैं। अनुभव तो एक का ही है क्योंकि बाहर और भीतर जो है वह दो नहीं हैवह एक ही है। मगर तुम कहां पहुंचोगेबाहर से पहुंचोगे या भीतर सेइससे फर्क पड़ जाता है। इधर से कान पकड़ोगे या उधर सेइतना ही फर्क है। कान तो वही हाथ में आएगा। आता तो परमात्मा ही हाथ में है। जब भी कुछ हाथ में आता हैपरमात्मा ही हाथ में आता है। और तो कुछ है ही नहीं हाथ में आने को। जिस हाथ में आता है वह हाथ भी परमात्मा है। परमात्मा ही परमात्मा के हाथ में आता है।
मगर बहिर्मुखी एक ढंग से यात्रा करता हैअंतर्मुखी दूसरे ढंग से। बहिर्मुखी मूर्ति रखेगा भगवान कीमंदिर बनाएगाश्रृंगार लगाएगा भगवान को,नाचेगा मूर्ति के आसपास। सूर्य को नमस्कार करेगा। चांदत्तारों में देवताओं का निवास बनाएगा। ठीक है। जैसे भी होउस परम सौंदर्य की प्रतीति होनी चाहिए।
अंतर्मुखी मूर्ति इत्यादि हटा देगाउसकी कोई जरूरत नहीं है। न साज-श्रृंगारकरेगा परमात्मा का।
ऐसा हुआ : राबिया एक सूफी फकीर औरतके घर दूसरा सूफी फकीरहसन ठहरा हुआ था। सुबह हुईअंधेरा कटासूरज निकला। हसन बाहर खड़ा था झोंपड़े के। इस अपूर्व सुबह को देखकर मगन हो उठा। भक्त था। नाचने लगा। और उसने आवाज दी राबिया को कि "राबियातू भीतर बैठी क्या कर रही हैबाहर आबड़ी सुंदर सुबह निकली है! परमात्मा की ऐसी सुंदर सुबह है और तू भीतर बैठी क्या कर रही हैसूरज ने अपना जाल फैला दिया है। पक्षी गीत गा रहे हैं। सुबह की शीतल हवा है। रात का अंधेरा कट गया है। ये परम आनंद के क्षण हैं। तू भीतर बैठी क्या कर रही है?'
और पता है राबिया ने क्या कहाराबिया खिलखिला कर हंसी और उसने कहाहसनतुम्हीं भीतर आओ। क्योंकि बाहर तुम जिस सूरज को देख रहे होमैं उस सूरज बनानेवाले को अपने भीतर देख रही हूं।
उसने "भीतरका मतलब बिल्कुल गहरा लिया। उसने झोंपड़े के भीतर की बात ही नहीं की। उसने कहातुम जिसे देख रहे होबाहरउसके बनानेवाले को मैं भीतर देख रही हूं। सूरज बाहर सुंदर है क्योंकि उसके हाथ की छाप है। जहां-जहां उसका हस्ताक्षर हैवहां-वहां सौंदर्य हैवहां-वहां धन्यता हैवहां-वहां प्रसाद है। लेकिन मैं उसी को देख रही हूं। तुम्हीं आंख बंद करो और भीतर आओ हसनकब तक बाहर घूमते रहोगे?
यह भक्त और ज्ञानी का फर्क है। हसन भक्त हैराबिया ज्ञानी है। अगर तुम मुझसे पूछो तो न तो जो बाहर रस ले रहा हैउसे भीतर आने की जरूरत हैन भीतर जो रस ले रहा हैउसे बाहर आने की जरूरत है। जो जहां रस ले रहा हैउसी रस में डूबते-डूबते निमज्जित हो जाएखो जाए।
तो न तो मैं हसन से कहूंगाभीतर आओ। अगर मैं वहां होता तो हसन से कहतातुम बाहर नाचो। और राबिया से कहतातू भीतर नाचन हसन को भीतर बुला। और न हसनतू राबिया को बाहर बुलाक्योंकि राबिया को बाहर दिखाई न पड़ेगा--अंतर्मुखी है। और हसन को भीतर दिखाई न पड़ेगा--बहिर्मुखी है।
और ध्यान रखनाबहिर्मुखी और अंतर्मुखी में कोई मूल्यांकन नहीं कर रहा हूं कि इनमें कौन अच्छाकौन बुरा। कोई अच्छा-बुरा नहीं। जहां से प्रभु मिल जाएप्रभु का मिलना अच्छा।
पूछा है तुमनेः "ध्यान है एकाकी की उड़ान एकाकी तक। भक्ति है एकाकी की उड़ान परमात्मा तक। क्या ध्यान की तरह भक्ति भी एकाकीपन से शुरू होती है?'
निश्चित ही। दोनों एकाकीपन से ही शुरू होती हैं। दोनों ही भीड़ से मुक्त होकर शुरू होती हैं। लेकिन दोनों का स्वाद थोड़ा भिन्न होता है। प्रथम तो भिन्न होता हैअंततः एक हो जाता है। मार्ग शुरू में भिन्न होते हैं। नदी एकघाट बहुतेरे। घाटों के ढंग अलग-अलग हैं। नदी एक है। अगर घाट पर ध्यान रखोगे तो भेद मालूम पड़ेगाअगर नदी पर ध्यान करोगे तो भेद मालूम नहीं पड़ेगा। जो जाना जाता है वह तो एकजिसके द्वारा जाना जाता हैवह तो एक--लेकिन जिन विधियों से जाना जाता हैवे अनेक। घाट बहुतेरे।
भक्त का एकाकीपन अलगज्ञानी का एकाकीपन अलग--प्रथम चरण में। तुम बड़े हैरान होओगे कि एकाकीपन और एकाकीपन कैसे अलग हो सकते हैं! समझने की कोशिश करो। जब भक्त एकाकी होता है तो अपने को मिटाने लगता हैतभी एकाकी हो पाता है। जब परमात्मा बचता है और भक्त मिट जाता है--तो एकाकी। एक बचा। जब तक भक्त भी रहता हैतब तक दो। इसलिए भक्त की सारी चेष्टा है : परमात्मा बचेमैं मिट जाऊं। कबीर कहते हैं : प्रेम गली अति सांकरीतामें दो न समाय। या तो मैं या तू। अगर यही मामला है तो "मैंको मिटा दूंगा।
इसलिए तो कहा पलटू ने कि जो अपने हाथ से सीस काटने को तैयार हो वही इस मार्ग पर कदम बढ़ाए। इतना जो पागल होऐसा जो मर्द होवही कदम बढ़ाए। अपने को मिटा डालना होगापोंछ डालना होगा। एक ही बचेगा। परमात्मा बचेगा।
ज्ञानी क्या करता हैध्यानी क्या करता हैध्यानी भीड़ को छोड़ता हैपरमात्मा को भी छोड़ देता है। वह कहता हैजब तक यह परमात्मा है तब तक तो दूजा बचा है। इसलिए बौद्ध झेन फकीरों ने कहा हैअगर बुद्ध भी रास्ते पर मिल जाएं तो उठाकर तलवार दो टुकड़े कर देनाताकि तुम अकेले बचोदूसरा नहीं चाहिए। झेन फकीरों ने कहा है कि अगर बुद्ध का नाम भी स्मरण आ जाए तो कुल्ला करके मुंह साफ कर लेना।
ये बुद्ध के भक्त इस तरह कह रहे हैं। यह ज्ञान का मार्ग है। ये कहते हैंदूसरे की ज़रा भी जगह नहीं हैएक ही बचना चाहिए। तुम्हारी चेतना मात्र बचेकोई भी न बचे। चेतना में कोई दृश्य न बचेकोई दिखाई पड़नेवाला न बचे। कोई भी बचा है दूसराभगवान भी बचा है दूसरातो अड़चन है।
रामकृष्ण के गुरु तोतापुरी ने रामकृष्ण को कहा थाजब तक यह तेरी काली बची हैतब तक तू अभी मुक्त नहीं हुआ। यह काली तो गिरानी पड़ेगी। यह काली तो हटानी पड़ेगी।
यह ज्ञानी बोल रहा है भक्त से। क्योंकि अभी तो बचा दूसराद्वि बचीद्वैत बचा। अद्वैत चाहिए। दर्पण बचे और दर्पण में किसी का भी प्रतिबिंब न बचे। पहले प्रतिबिंब बनता था लोगों काअब नहीं बनतालेकिन परमात्मा का बनने लगा। मगर परमात्मा भी तो "परहै।
तो ज्ञानी कहता है, "परको बिल्कुल भुला दो, "परको बिल्कुल छोड़ दो। अकेले तुम ही बचो। राम का स्मरण भी न बचे। राम की प्रतिमा भी न बचे। शुद्ध निर्विकारनिर्विकल्प चैतन्य बचे। वहां पहुंच गए।
फर्क समझना। ध्यानी सब "परको छोड़कर--"परमें परमात्मा भी सम्मिलित है--जब अकेला बच जाता हैतो एकाकी। और भक्त सबको छोड़ कर परमात्मा को बचा लेता है। सब में स्वयं भी सम्मिलित है। सब को छोड़कर परमात्मा को बचा लेता है। तब एकाकी।
मगर परमात्मा बचे या आत्मा बचेजब एक ही बचता है तो उन दोनों का स्वाद एक ही हो जाता है। फिर उसके नाम का ही फर्क है। जिसको महावीरआत्मा कहते हैं उसी को शंकरपरमात्मा कहते हैं। फिर नाम का ही भेद है। फिर ज़रा भी फर्क नहीं रहा। जहां एक ही बचाअब तो नाम की ही बात रही। तुम उसे क्या कहते हो--आत्मा कहोपरमात्मा कहो। ध्यानी आत्मा कहेगाक्योंकि ध्यानी तो परमात्मा को छोड़ ही चुकामिटा ही चुका। तो अब तो जो बची हैवह मेरा ही शुद्धतम रूप है। अहं ब्रह्मास्मि! मैं ही ब्रह्मा हूं।
और भक्त तो यह कैसे कहेगा कि मैं ही ब्रह्म हूं! वह तो कहेगा : मैं तो गयापहले ही जा चुका। वह तो कब का जा चुका। अब एकाकी ब्रह्मा मात्र है। अब तो तू ही है!
दोनों ही एकाकी से शुरू होते हैंभीड़ को छोड़कर और दोनों परम एकांत में पूर्ण होते हैं। शुरू में थोड़े-थोड़े भेद होंगे--अंतर्मुखता केबहिर्मुखता के। अंतिम चरण में कोई भेद नहीं रह जाताअभेद प्रकट होता है।
दूसरा प्रश्न : पलटूदास जी कहते हैं : "लगन-महूरत झूठ सबऔर बिगाड़ैं काम'। और नक्षत्र-विज्ञान कहता है कि लगन-महूरत से काम बनने की संभावना बढ़ जाती है।... ?

नक्षत्र-विज्ञान सांसारिक मन की ही दौड़ है। ज्योतिषियों के पास कोई आध्यात्मिक पुरुष थोड़े ही जाता है। ज्योतिषियों के पास तो संसारी आदमी जाता है। कहता है : भूमि-पूजा करनी हैनया मकान बनाना हैतो लगन-महूरतकि नई दुकान खोलनी हैतो लगन-महूरतकि नई फिल्म का उद्घाटन करना हैलगन महूरतकि शादी करनी है बेटे कीलगन-महूरत।
संसारी डरा हुआ है : कहीं गलत न हो जाए! और डर का कारण हैक्योंकि सभी तो गलत हो रहा हैइसलिए डर भी है कि और गलत न हो जाए! ऐसे ही तो फंसे हैंऔर गलत न हो जाए!
संसारी भयभीत है। भय के कारण सब तरफ सुरक्षा करवाने की कोशिश करता है। और जिससे सुरक्षा हो सकती हैउस एक को भूले हुए है। वही तो पलटू कहते हैं कि जिस एक के सहारे सब ठीक हो जाएउसकी तो तू याद ही नहीं करताऔर सब इंतजाम करता है : लगन-महूरत पूछता है। और एक विश्वास सेएक श्रद्धा सेउस एक को पकड़ लेने से सब सध जाए--लेकिन वह तू नहीं पकड़ताक्योंकि वह महंगा धंधा है। उस एक को पकड़ने में स्वयं को छोड़ना पड़ता हैसिर काट कर रखना होता है।
इसलिए वह तो तुम नहीं कर सकते। तुम कहते हो : हम दूसरा इंतजाम करेंगेसिर को भी बचाएंगे और लगन-महूरत पूछ लेंगेसुरक्षा का और इंतजाम कर लेंगेऔर व्यवस्था कर लेंगेहोशियारी से चलेंगेगणित से चलेंगेआंख खोलकर चलेंगेसंसार में सुख पाकर रहेंगे।
ज्योतिषी के पास सांसारिक आदमी जाता है। आध्यात्मिक आदमी को ज्योतिषी के पास जाने की क्या जरूरत! आध्यात्मिक व्यक्ति तो ज्योतिर्मय के पास जाएगाकि ज्योतिषी के पास जाएगाचांदत्तारों के बनानेवाले के पास जाएगा कि चांदत्तारों की गति का हिसाब रखनेवालों के पास जाएगा?
और फिर आध्यात्मिक व्यक्ति को तो हर घड़ी शुभ हैहर पल शुभ है। क्योंकि हर पल का होना परमात्मा में हैअशुभ तो हो कैसे सकता है! कोई भी महूरत अशुभ तो कैसे हो सकता है! यह समय की धारा उसी के प्राणों से तो प्रवाहित हो रही है। यह गंगा उसी से निकली हैउसी में बह रही हैउसी में जा कर पूर्ण होगी।
आध्यात्मिक व्यक्ति को तो सारा जगत् पवित्र हैसब पल-छिन सब घड़ी-दिन शुभ है। ये तो गैर-आध्यात्मिक की झंझटें हैं। वह सोचता है : कोई भूल-चूक न हो जाएठीक समय में निकलूंठीक दिन में निकलूंठीक दिशा में निकलूंमहूरत पूछ कर निकलूं।
किससे डरे होतुमने मित्र को अभी पहचाना ही नहींवह सब तरफ छिपा है। तुम कैसा इंतजाम कर रहे होऔर तुम्हारे इंतजाम किए कुछ इंतजाम हो पाएगा?
कितना तो सोच-सोच कर आदमी विवाह करता है और पाता क्या है तुम कभी सोचते भी हो कि सब विवाह इस देश में लगन-महूरत से होते हैं और फिर फल क्या होता हैफिल्मों का फल छोड़ दो। जिंदगी का पूछ रहा हूं। फिल्में तो सब शादी हुईशहनाई बजी. . . और खत्म हो जाती हैं,वहीं खत्म हो जाती हैं। शहनाई बजते-बजते ही फिल्म खत्म हो जाती है क्योंकि उसके आगे फिल्म को ले जाना खतरे से खाली नहीं है। सब कहानियां यहां समाप्त हो जाती हैं कि राजकुमारी और राजकुमार का विवाह हो गया और फिर वे सुख से रहने लगे। और उसके बाद फिर कोई सुख से रहता दिखाई पड़ता नहीं। असल में उसके बाद ही दुःख शुरू होता है। मगर उसकी बात छेड़ना ठीक भी नहीं है।
इतने लगन-महूरत को देखकर तुम्हारा विवाह सुख लाता हैइतना लगन-महूरत देखकर चलते होजिंदगी में कभी रस आता हैइतना सब हिसाब बनाने के बाद भी आती तो हाथ में मौत हैजो सब छीन लेती हैजो तुम्हें नग्न कर जाती हैदीन कर जाती हैदरिद्र कर जाती है। हाथ में क्या आता है इतने सारे आयोजन-होशियारी के बादइतने चतुराई के बादपलटू कहते हैं कि अपनी चतुराई पकड़े हुए होमगर इस चतुराई का परिणाम क्या हैआखिरी हिसाब में तुम्हारे हाथ क्या लगता है?
सिकंदर भी खाली हाथ जाता है। यहां सभी हारते हैं। संसार में हार सुनिश्चित है। चाहे शुरू में कोई जीतता मालूम पड़े और हारता मालूम पड़े-- अलग-अलग लेकिन आखिर में सिर्फ हार ही हाथ लगती है। जीते हुओं के हाथ भी हार लगती हैऔर हारे हुओं के हाथ हार तो लगती ही है। यहां जो दरिद्र वे तो दरिद्र रह ही जाते हैयहां जो धनी है वे भी तो अंततः दरिद्र  सिद्ध होते हैं। यहां जिनको कोई नहीं जानता थाजिनका कोई नाम नहीं थाकोई प्रसिद्धि नहीं थीकोई यश नहीं था--वे तो खो ही जाते हैंलेकिन जिनको खूब जाना जाता थाबड़ी प्रसिद्धि थी--वे भी तो खो जाते हैं। मिट्टी सब को समा लेती है। चिता की लपटों में सभी समाहित हो जाता है। रेखा भी नहीं छूट जाती।
कितने-कितने लोग इस जमीन पर नहीं रह चुके हैं! तुम जहां बैठे होवैज्ञानिक कहते हैंजमीन के एक-एक इंच पर कम-से-कम दस-दस आदमियों की लाशें गड़ी हैं। हम सब मरघट में बैठे हैं। जहां भी हो वहां मरघट है। पूरी जमीन पर मरघट कई दफे बन चुका बिगड़ चुका। आज यहां बस्ती हैकभी मरघट था। आज जहां मरघट हैकभी बस्ती बन जाएगी। कितनी दफे उलट-फेर हो चुके हैं! यह जमीन कितनों को लील गई है! यह तुम्हें भी लील जाएगी। कितनों का नाम रह गया हैऔर नाम रह भी जाए तो कोई क्या रहता है! जब तुम ही न रहे तो नाम के रहने से भी क्या होता है?
लगन-महूरत पूछ कर पहुंचते कहां होइसका भी कभी हिसाब किया कि लगन-महूरत ही पूछते रहोगेसांसारिक पूछता है लगन-महूरत। जितना सांसारिक आदमी होजितना महत्त्वाकांक्षी होउतना लगन-महूरत पूछता है। दिल्ली में तुम पाओगेसब तरह के ज्योतिषी अड्डा जमाए बैठे हैं। चुनाव के समय उनकी खूब बन जाती है। सभी राजनेता के अपने-अपने ज्योतिषी हैं। और वे ज्योतिषी उनको कहते हैं कि बसइस मुहूरत में खड़े हो जाओइस मुहूरत में भर देना फार्म चुनाव काइस मुहूरत में ऐसा करनायह ताबीज बांध लोयह गंडा बांध लोइस बार जीत निश्चित है।
मेरे एक मित्र हैंज्योतिष का धंधा करते हैं। और यह तो सब बेईमानी के धंधों में एक धंधा है। उन्होंने एक कारीगरी कीउससे खूब प्रसिद्ध हुए। राष्ट्रपति के चुनाव में दो व्यक्ति खड़े थेदोनों को जा कर कह आए कि आपका सफल होना निश्चित है। दोनों को कह आए। दो में से एक तो कोई होगा ही। जो हो गया उसके पास जा कर पहुंचेउसने तो उसके चरण भी छू लिए और उनको लिखित सर्टिफिकेट भी दिया कि इनका ज्योतिष बड़ा सही हैये कह कर गए थे मुझसे। दोनों को कह आए थे। जो हार गयाउसकी तो बात ही खत्म हो गई। अब उसके पास जाने की जरूरत ही नहीं हैउसको याद भी नहीं है कि कौन आयाकौन गया। मगर जो जीत गयाउसको याद दिलाने पहुंच गएउससे सर्टिफिकेट ले आए।
जब वे सर्टिफिकेट ले आए तो मैंने उनसे पूछामुझे पता है तुम्हारा ज्योतिष कितनाकैसा है! मुझे पता है कि ज्योतिष में कितना क्या। तुमने यह घोषणा कैसे की थी?
उन्होंने कहा कि अब आपसे क्या छुपाना! दोनों की घोषणा कर आए थे। एक तो जीतेगा ही न। जो जीतेगा उससे सर्टिफिकेट ले आएंगे।
उसका सर्टिफिकेट ले आएफिर सारे अखबारों में सर्टिफिकेट छपवा दिया। राष्ट्रपति के साथ तस्वीर निकलवा कर छपा दी। तब से उनका धंधा खूब चल निकला। अब तो लोग उनके पास काफी आते हैं। और जब सौ आदमी आते हैंतुम उनसे कहते ही चले जाओ कि यह होगावह होगाउसमें से कुछ को तो होने वाला हैपचास को होनेवाला है। जिनको हो जाएगा उनकी भीड़ बढ़ती जाती है। जिनको नहीं होता वे दूसरे ज्योतिषी खोजते हैं;तुम नहीं जंचते उनकोबात खत्म हो गईवे किसी और के चक्कर में पड़ेंगे। लेकिन तुम्हारे पास जिनको लाभ हो जाता हैवे आने लगते हैंउनकी भीड़ बढ़ने लगती हैउनका शोरगुल बढ़ने लगता है। फिर जब नया आदमी आता है तो वह देखता है कि इतने लोगों को लाभ हो रहा है तो जरूर लाभ होता होगा।
ये सब मनोवैज्ञानिक धंधे हैं। इनका मौलिक आधार सम्मोहन है। ये सब भ्रांति से चलते हैं और भ्रांति तब तक चलती है जब तक आदमी को यह भ्रम है कि संसार में कुछ पा लूंगा। डर तो लगता है कि मिलना मुश्किल है। किसको मिला! लेकिन उपाय कर लूंगा। तो फिर उपाय में कोई कमी न रह जाए। तो सभी उपाय कर लूं। इसमें अब मुहूरत भी पूछ ही लूंकौन जाने. . .।
मैंने सुना है एक बड़े वैज्ञानिक के संबंध में कि वह अपनी बैठक में --स्वीडन में रहता था--घोड़े का नाल लटकाए हुए था। एक अमरीकन पत्रकार उसे मिलने गया। उसने कहा कि "आश्चर्यआप इतने बड़े वैज्ञानिकनोबल पुरस्कार के विजेताऔर आप यह घोड़े का नाल लटकाए हुए हैं!स्वीडन में लोग लटकाते हैं। उससे लाभ होता है। घोड़े का नाल लटकाने से लोगों को लाभ होता है।
अलग-अलग धारणाएं हैं लोगों की लाभ की। ". . . मगर आप ! आप इस अंधविश्वास में पड़े हैं!'
वह वैज्ञानिक हंसने लगा। उसने कहा कि मैं इसको बिल्कुल नहीं मानता। यह बिल्कुल अंधविश्वास है।
तो फिर उसने कहा : जब आप कहते ही हैं कि यह बिल्कुल अंधविश्वास है और नहीं मानतेतो फिर अपनी बैठक में क्यों लटकाए हुए हैं?
उन्होंने कहा : जिस आदमी ने यह मुझे दियाउसने कहा कि मानो या न मानोलाभ तो होगा ही।
देखते हैं आदमी का लोभ कैसा है! "मानो या न मानोलाभ तो होगा ही!'
"तो मैंने सोचा देख ही लें लटका कर। मानता तो मैं नहीं हूं। है तो अंधविश्वास। लेकिन जिसने मुझे दिया है वह कहता है : मानो या न मानोलाभ होगा ही।'
लाभ की आकांक्षा है तो तुम फंसोगे कहीं न कहीं। लगन-मुहूरत देखकर कहीं न कहीं फंसोगे।
पलटू तो बड़ी गहरी बात कह रहे हैं। पलटू तो कह रहे हैं : आध्यात्म के खोजी को क्या लगन-मुहूरतपरमात्मा को पाने के लिए कोई विधि-विधान थोड़े ही करना पड़ता है! सब झूठ हैकहते हैं पलटू। लगन-मुहूरत झूठ सब।
परमात्मा में जाना हो तो हर मुहूरत मुहूरत है। यही क्षण जा सकते हो। तुम्हारे ऊपर निर्भर है। परमात्मा रोक थोड़े ही रहा है। वह यह थोड़े ही कह रहा है कि ठीक समय पर आना।
और जिस क्षण बुद्ध को ज्ञान हुआवह मुहूरत शुभ था या नहींलेकिन इस पूरी पृथ्वी पर अज्ञानी पड़े रहे और उनमें से तो किसी को न हुआ। मुहूरत शुभ था। बुद्ध को हुआ। जिस क्षण मीरां को हुआमुहूरत शुभ थालेकिन और तो किसी को न हुआ।
तुम पर निर्भर है। मुहूरत तो प्रतिपल शुभ हैतुम जब आंख खोल लोगे तब हो जाएगा।
पलटूदास यह कह रहे हैं कि अगर पकड़ना ही हो तो क्या छोटे-मोटे ज्योतिषियों को पकड़ते होउस ज्योतिर्धर को पकड़ो। जिसने समय बनायाउसी की शरण गह लो। जिसने सब पल-छिन बनाए उसकी याद से भर जाओ . . । तो कहते हैंजब राम की याद आ जाएजब उसके नाम का स्मरण हो जाएवही शुभ घड़ी है। जब याद करो तभी शुभ घड़ी है।

तीसरा प्रश्न : काम पकने पर उसमें रुचि क्षीण होने लगती है। प्रेम पकने पर क्या होता है?

जो भी पक जाएगा उसमें रुचि क्षीण हो जाती है। जिसमें पकान आ गईहम उसके आगे बढ़ गए। पका फल वृक्ष से गिर जाता है। पका कि गिरा। कच्चा होता हैतब तक वृक्ष पर होता है। जब तक कच्चा होता है तब तक इसीलिए वृक्ष पर होता है कि अभी पकना है और वृक्ष के रस की जरूरत है। रस मिलेगा तो पकेगा। जब पक गया तो गिर जाएगाक्योंकि वृक्ष को और भी कच्चे फल हैं जिन पर ध्यान देना है। अब तुम पक गएतुम गिर गए। इसलिए तो पके व्यक्ति फिर नहीं लौटते। बुद्ध फिर नहीं लौटते पलटूफिर नहीं लौटते--पक गए। यह संसार के वृक्ष से उन्होंने जितना रस लेना थाले लियागिर गए इस वृक्ष से।
जो पक जाता है जीवन मेंउससे ही मुक्ति हो जाती है। तुम थोड़ा चौंकोगे। क्योंकि तुम सोचते थे कि काम पक जाएगाकाम की वासना पक जाएगी तो गिर जाएगीफिर प्रेम का जन्म होगा। फिर प्रेम पकेगातब क्या होगाजब प्रेम पकेगा तो प्रेम भी गिर जाएगा और प्रार्थना पैदा होगी। और जब प्रार्थना भी पक जाएगी तो प्रार्थना भी गिर जाती है। तब शून्य रह जाता है। "गिरह हमारा सुन्न मेंअनहद में विसराम'! तब कुछ भी नहीं बचता।
काम गिरा--प्रेम आया। वही ऊर्जा जो काम में लगती थीमुक्त होकर प्रेम बन जाती है। फिर प्रेम पकाप्रेम भी गिर गयाफिर वही ऊर्जा जो प्रेम को पकाती थीप्रार्थना बन जाती है। फिर एक दिन प्रार्थना भी जाती है।
ऐसा थोड़े ही है कि बुद्ध अब भी कहीं किसी लोक में बैठे हुए ध्यान कर रहे हैं और मीरां किसी लोक में बैठी है और अभी भी नाच रही है। यह तो पागलपन हो जाएगा। हर चीज पक जाती हैहर चीज की पकान का क्षण आ जाता हैसमाप्त हो जाती है। और जहां सब समाप्त हो जाता हैउसी को हम परमात्मा कहते हैं। जहां कुछ भी पकने को शेष न रहाकुछ भी कच्चा न रहाउसी घड़ी को हम परमात्मा की घड़ी कहते हैं। सब पक गया,सबसे मुक्ति हो गई। जो-जो कच्चा है उससे बंधन बना रहता है।
इसलिए तो मैं निरंतर तुमसे कहता हूंकिसी भी वासना को कच्ची मत रखना। पका ही लेना। डरना मत। भयभीत मत होना। अगर धन पाने की आकांक्षा हो तो पा ही लेनाबीच में मत लौट आना। मेरी सुनकर मत लौट आना। कोई कहता हो धन में कुछ भी नहीं हैउसकी सुनकर लौट मत आना। तुम्हें दिखना चाहिए कि कुछ भी नहीं हैदूसरे के दिखने से क्या होता हैमैंने पुकारा कि धन में कुछ भी नहीं है और तुम्हें अभी धन में बहुत कुछ दिखाई पड़ रहा था : तुम मेरे मोह में पड़ गएतुम मेरी बात में पड़ गएतुम्हें मेरी बात का तर्क समझ में आ गया। तर्क समझ में आ गयालेकिन तर्क से कोई अनुभव तो बनता नहीं। मैंने तुम्हें चुप कर दियातुम मुझसे जूझ न पाएविवाद न कर पाए। मैंने बड़े तर्कों से तुम्हें शांत कर दियातुम मेरे साथ चलने लगे। लेकिन तुम्हारा मन तो बाजार की तरफ दौड़ता रहेगा। तुम्हारी देह मेरे साथ हो जाएगीतुम्हारा मन बाजार में ही दौड़ता रहेगा। तुम्हें धन अभी पाना था। अभी महत्त्वाकांक्षा भीतर बनी रहेगी। रात तुम सपने देखोगे। जब कभी ध्यान करने बैठोगे तो ध्यान तो न हो पाएगाधन ही धन की याद आएगी तब तुम परेशान होओगे। तुम कहोगे कि क्या बात हैकि मैं ध्यान करने बैठता हूं और धन की याद क्यों आती हैकुछ भी अड़चन नहीं हैसीधी-सी बात है कि धन अभी पका नहीं था। अभी तुमने अपने अनुभव से नहीं जाना था कि धन व्यर्थ है। तुम्हें तो लगता है अभी भी कि सार्थक है। मेरी बात सुनकर चले आए। "कानों सुनी सो झूठ सबआंखों देखी सांच'। आंख पर भरोसा करनाकान पर नहीं।
इस देश में यह दुर्घटना बहुत घटी है। घटने का कारण कि इस देश का सौभाग्य कि यहां बहुत संत-पुरुष हुए । वह सौभाग्य हमने अपने दुर्भाग्य में बदल लिया। हमने संतों की अमृत वाणी सुनी। हमें उनकी बात जंची। न केवल उनका तर्क प्रबल थाउनके व्यक्तित्व का वजन भी प्रबल था। हमने उनके पास यह अनुभव किया कि वे जो कहते हैंठीक ही कहते होंगे। मगर ठीक ही कहते होंगे। ठीक ही हैऐसा हमारे अनुभव से गवाही नहीं मिलती। उनके व्यक्तित्व की गरिमा नेउनके ज्योतिर्मय रूप नेउनकी चिंमय-धारा ने हमें आंदोलित कियाप्रभावित किया : हम पीछे चल पड़े और हमारा मन संसार में भटकता रहा। इससे इस देश में बड़ी दुर्गति हुई। लोग कहने को धार्मिक हैं और भीतर इतने सांसारिकजितने कि दुनिया में तुम कहीं न पाओगे। यहां धन को गाली दिए जाते हैं और धन की पकड़ जितनी इस देश में है उतनी कहीं भी नहीं है। धन है भी नहीं पकड़ने को अब--पकड़ ही है। और धन को गाली भी दिए जाते हैं।
अकसर तो ऐसा लगता है कि धन को इसलिए गाली दिए जाते हैं जैसे लोमड़ी ने अंगूरों को खट्टा कहा था। पहुंच नहीं सकी थीछलांग बहुत मारी थी। मगर अंगूर के गुच्छे दूर थे। एक खरगोश छिपा देखता था। उसने पूछा : मौसीक्या बात हैबड़ी थकी-मांदी कहां जा रही होअंगूर तक पहुंच नहीं सकी क्या?'
लोमड़ी नाराज हुई। उसने कहा : "नासमझ छोकरे! अंगूर खट्टे हैं।'
आदमी का अहंकार ऐसा है कि जिसको न पा सके उसको खट्टा कहने लगता है। मगर पाने की वासना तो भीतर चलती रहेगी। यह लोमड़ी रात में भी सपना देखेगी और उछलेगी अंगूरों को पकड़ने के लिए और यह कल फिर आएगी जब कोई भी देखता न होगा। फिर प्रयास करेगी। परसों भी आएंगी। और अगर यहां कोई लोग होंगे तो कुछ बहाना करके गुजर जाएगी। लेकिन आएगी बार-बार। हजार उपाय करेगीसीढ़ी लगाने की चेष्टा करेगी,कोई। मार्ग खोजेगी। अभ्यास करेगी ऊंची छलांग लगाने का। और कहती रहेगी कि अंगूर खट्टे हैं। ऐसे अहंकार को भी बचाएगी।
इस देश में ऐसा हो गया। जितनी धन पर पकड़ इस देश में है दुनिया में किसी देश में नहीं है। जिन देशों को तुम भौतिकवादी कहते हो--अमरीका या ऐसे देश--धन की इतनी पकड़ नहीं है। अमरीकी जितनी आसानी से धन छोड़ता हैहिंदुस्तानी छोड़ता ही नहीं है--एक पैसा नहीं छोड़ता।
इधर मुझे रोज का अनुभव है। यहां पश्चिम से इतने लोग आए हैं! धन पर उनकी कोई पकड़ ही नहीं है : कूड़ा-कर्कट है। ठीकजैसा संतों ने कहा है, "हाथ का मैल है', वैसा ही अनुभव करते हैं। लेकिन हिंदुस्तानियों की पकड़ भारी है। है भी नहींअंगूरों तक पहुंच भी नहीं पाए और अंगूर खट्टे हैंयह भी दोहराए चले जाते हैं।
कैसे यह हुआयह दुर्घटना कैसे घटीयह एक बड़े सौभाग्य के कारण घटी। यह बड़ा चमत्कार हैबड़ा विरोधाभास है। सौभाग्य यह कि परम संत इस देश में हुए। उन्होंने बड़े अनुभव की बात कहीउन्होंने अपने अनुभव की बात कही। उनके लिए तो पक गई थी बात। बुद्ध ने जब कहा कि धन में कुछ भी नहीं है तो जानकर कहा। तुमने जब मान लियातब तुमने बिना जाने मान लियाबस वहीं भूल हो गई। तो तुम अड़चन में पड़ जाते हो।
एक मित्र ने पूछा है प्रश्न कि "आपने कहा कि कबीर को भोले-भाले लोग ही समझ पाएपंडित वंचित रह गए।और "आपको समझने के लिए तो केवल जिनके पास धन है वे ही आ सकते हैंभोले-भाले  सीधे-साधे गरीब नहीं आ सकते। इसका क्या कारण है?'
कई बातें समझ लेने जैसी हैं। एक : गरीब होने से कोई भोला-भाला और सीधा-सादा नहीं होता। इस भूल में मत पड़ना। यह तर्क हमारे मन में बड़ा गहरा है कि कोई गरीब ही है तो भोला-भाला है। गरीब होने से कोई भोला-भाला हो जाता हैगरीब होना पर्याप्त है भोला-भाला होने के लिएजब भी हम "भोले-भालेशब्द का उपयोग करते हैंहम उसमें "गरीबभी जोड़ देते हैंजैसे कि गरीब होना कुछ भोले-भाले होने का प्रमाण-पत्र है! गरीब होने से यह कुछ पता नहीं चलता कि तुम भोले-भाले हो। इससे सिर्फ इतना ही पता चलता है कि तुम कुशल नहीं हो। दौड़ तो तुम्हारी भी है।
गरीब भी धन के पीछे उसी तरह दौड़ रहा है जिस तरह अमीर दौड़ रहा है। अमीर सफल हो गया हैगरीब सफल नहीं हुआ है। दौड़ में ज़रा भी फर्क नहीं है।
 तो दुनिया में दो तरह के धनी लोग हैं : धनाढय और धनाकांक्षी। गरीब तो यहां कोई है ही नहीं। गरीब तो कभी कोई मुश्किल से होता है। जिस दिन बुद्ध ने छोड़ा राजमहलउस दिन गरीब पैदा हुआ। गरीब का मतलब यह होता है : धन व्यर्थ है मगर जिसके पास धन है ही नहींवह धन को व्यर्थ कैसे कहेगावह अंगूर खट्टे ही कह सकता है। बुद्ध को मैं गरीब कहता हूं।
जीसस का बड़ा प्रसिद्ध वचन है : ब्लैसिड ऑर दि पुअर इन स्पिरिट! (धन्य हैं वेजो आत्मा से दरिद्र हैं।) क्या मतलब इसकाकौन-सी दरिद्रता की बातें कर रहे हो?
महावीर और बुद्ध की बात हो रही है। जिन्होंने अनुभव से जान लिया कि धन व्यर्थ हैइस व्यर्थता के बोध के कारण धन उनके हाथ से छूट गया। "छोड़ा', ऐसा भी नहीं कहता। जो व्यर्थ हैवह छूट जाता हैछोड़ना नहीं पड़ता। "त्यागा', ऐसा भी नहीं कहता। कूड़े-कर्कट को कोई त्यागता हैतुम रोज कूड़ा-कर्कट साफ करते हो घर में और कचरे-घर में फेंक आते हो--तो तुम कोई जाकर अखबार के दफ्तर में खबर थोड़े ही करते हो कि आज फिर कूड़ा-कर्कट त्याग दियाछाप देना खबर!
कूड़ा-कर्कट है तो बात खत्म हो गईत्यागना क्या है?
बुद्ध और महावीर गरीब हैं--उस अर्थ में गरीब जिस अर्थ में जीसस कह रहे हैं। लेकिन क्या तुम सोचते हो कि जिनको तुम गरीब कहते होवे इस अर्थ में गरीब हैंउनकी दौड़ तो उतनी ही हैमहत्त्वाकांक्षा उतनी ही है। सफल नहीं हो रहे हैं।
असफलता का नाम भोला-भालापन हैअकुशलता है। भोला-भालापन क्या हैतुम सोचते होगांव के आदमी भोले-भाले हैंइस भ्रांति में मत पड़ना। गांव के लोग उतने ही दांव-पेंच में लगे हैं जितने दांव-पेंच में शहर के लोग लगे हैं। हांगांव के दांव-पेंच अलग हैंक्योंकि गांव की दुनिया अलग है। गांव में आदमी दांव-पेंच करता है कि उसके पास एक अच्छी बग्घी हो जाए। फिएट कार की कोशिश नहीं करतायह बात सच हैक्योंकि फिएट कार गांव की दुनिया में नहीं है। मगर एक अच्छी बग्घी हो जाए और वह भी दिखला दे गांव के मालगुजार को कि तुझसे ज्यादा शानदार घोड़ा मेरे पास हैतुझसे ज्यादा शानदार बग्घी मेरे पास है! यह दौड़ उसकी भी है।यही  छोटे नगर का आदमी फिएट के लिए कोशिश करता है कि यह देख,मेरे पास फिएट हैदिखा दूं गांव को! बंबई का आदमी होता है तो रॉल्सरायस की कोशिश करता है। मगर यह कोशिश एक ही है। ये अलग-अलग तल के लोग हैंअलग-अलग वातावरण के लोग हैंमगर इनकी दौड़ एक ही है। दौड़ में कुछ फर्क नहीं है।
सिर्फ गांव का होने से भोला-भाला मत कह देना। अकसर लोग जब भी "भोले-भालेशब्द का उपयोग करते हैं तो "गरीबभी जोड़ देते हैं। गरीब होना सिर्फ इस बात का सबूत है कि तुम दूसरों से कम चालाक होबस। चालाक नहीं होइस बात का सबूत नहीं है। तुम दूसरों से कम चालाक हो। तुम्हारी कुशलता कम है। तुम ईमानदार होइस बात का सबूत नहीं है। बेईमानी में तुम्हारी निपुणता कम हैतुम दीक्षित कम हो। चाहते तो तुम भी वही होजो दूसरे कर रहे हैं या पाने की कोशिश में है या पा लिया है। मगर तुम उपाय नहीं खोज पाते हो।
गरीब से गरीब आदमी के मन में भी धन की वैसी ही आकांक्षा है--प्रबल आकांक्षा है--जैसी धनी आदमी के मन में है। कोई फर्क नहीं है। हर गरीब कोशिश में लगा है कि धनी हो जाए। तो कहां की दरिद्रता हैकौन-सा भोला-भालापन है?
मेरे देखे कभी कोई धनी तो धन से मुक्त हो सकता हैगरीब धन से कभी मुक्त नहीं हो पाता। इसलिए यह आकस्मिक नहीं है. . . यह आकस्मिक नहीं है कि जो धन पाकर धन की व्यर्थता को देख लिए हैंवे धर्म में उत्सुक हों। यह आकस्मिक नहीं है। यह बिल्कुल गणित के अनुसार है। और अगर तुम कभी ऐसा भी पाओ कि कोई गरीब आदमी धर्म में वस्तुतः उत्सुक है तो उसका केवल इतना ही मतलब होता है कि पिछले जन्मों में धन की दौड़ देख चुकाऔर कुछ मतलब नहीं होता। आज की गरीबी के कारण उत्सुक नहीं हो रहा हैः कल की बीती अमीरी के कारण उत्सुक हो रहा है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कोई गरीब आदमी धार्मिक नहीं हो सकता। हो सकता है। पलटू गरीब ही रहे। कबीर गरीब ही रहे। दरिया गरीब ही रहे। लेकिन यह जन्मों-जन्मों में जो धन की दौड़ जानी है और धन की व्यर्थता जानी हैउसका ही संचित सार है। यह गरीबी से नहीं निकला है अनुभव कि धन व्यर्थ है। कैसे निकलेगाजिसके पास धन नहीं है; "धन व्यर्थ है'-- ऐसा अनुभव कैसे निकलेगाधन व्यर्थ हैयह जानने के लिए धन का होना जरूरी है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जिनके पास धन हैउन सभी को यह अनुभव निकल आएगा। लेकिन जिनको यह अनुभव निकलता हैउनके पास तो धन होना चाहिए।
जो कामवासना की दौड़ में दौड़े हैंउनके जीवन में कामवासना की व्यर्थता साफ हो जाती है। जिन्होंने पद की दौड़ में भाग लिया है वे धीरे-धीरे पद की व्यर्थता को देखने लगते हैं। जो पद की दौड़ में हैंधन की दौड़ में हैंमहत्त्वाकांक्षा की दौड़ में हैंधन भी जिनके पास हैपद भी जिनके पास है और फिर भी उनको पद और धन की व्यर्थता नहीं दिखाई पड़ती--वे गंवार हैंउनके पास बुद्धि नहीं हैवे बुद्धू हैं।
मेरे देखेअगर कोई गरीब आदमी धर्म में उत्सुक हो जाए तो बड़ा बुद्धिमान है और अमीर आदमी धर्म में उत्सुक न हो तो बड़ा बुद्धू है। गरीब उत्सुक हो जाए तो वह यही बता रहा है कि उसके पास बड़ी प्रज्ञाबड़ी समझ है! समझ जन्मों-जन्मों में इकट्ठी की होगीनिचोड़ है उसके पास। गरीब रहते और धर्म में उत्सुक हो गयाइसके लिए बड़ी क्रांतिकारी समझ चाहिए। और धन होते हुए भी धन से जो मुक्त न होउसके लिए बड़ी जड़ बुद्धि चाहिएः सब है और उसको दिखाई नहीं पड़ता कि इसमें कुछ भी सार नहीं है। जब सब हो तो दिखाई पड़ना ही चाहिए कि इसमें कुछ भी नहीं है।
निरंतरसदा हीजब भी कोई देश धनी होता हैतब धार्मिक होता है। और जब कोई देश दरिद्र हो जाता है तो उसके पास एक ही धर्म बचता है;उसको कम्यूनिज्म कहोसमाजवाद कहो या कुछ और नाम दो। गरीब देश के पास एक ही धर्म बचता है : साम्यवाद। केवल अमीर देश के पास ही धर्म होता है। यह बुद्ध और महावीर के समय इस देश में ऊंचाई देखी। स्वर्ण-शिखर देखे। यह देश सोने की चिड़िया थी। तब इसने धर्म की उड़ान ली।
आज यह देश गरीब है। आज इस गरीब देश के पास धर्म की केवल राख रह गई हैलाश रह गई है। इसका असली भाव तो आज कम्यूनिज्म का है;असली भाव तो समाजवाद का है। इसलिए राजनेता कोई भी होपार्टी कोई भी बदलेलेकिन समाजवाद की तरफ दोनों को सिर झुकाना पड़ता है। गैर-समाजवादी को भी समाजवाद का नारा लगाना पड़ता हैतो ही वोट मिलता है। कोई समाजवादी हो या न होइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन लोग एक बात जानते हैं कि जनता भूखी हैदीन हैदरिद्र है और एक ही भाषा समझ सकती है आज--वह भाषा हैः कैसे अच्छा मकान मिले,कैसे अच्छे वस्त्र मिलेंकैसे अच्छा भोजन मिलेकैसी नौकरी मिले।
और यह बात ठीक भी हैइसमें कुछ बुराई भी नहीं हैकुछ गलती भी नहीं है। भूखा आदमी भोजन की भाषा समझता है। कितनी सदियों से हमने सुना है और कहा है : "भूखे भजन न होहिं गोपाला!ठीक ही बात है। भूखे भजन नहीं हो सकते। भूख में कैसा भजन! भूख में भूख का ही भजन होता हैगोपाल की कैसे याद आएगोपाल पर तो नाराजगी आती है।
तो यह कुछ आकस्मिक नहीं है कि जो समृद्ध हैंवे धर्म में उत्सुक होते हैं। वे ही उत्सुक हो सकते हैं। गरीब अभी धन में उत्सुक होगा। और गरीब अगर जाए भी मंदिरजाए भी मस्जिदजाए भी गुरुद्वारा तो वह धन के ही मांगने के लिए जाता हैध्यान मांगने के लिए नहीं जाता।
मेरे पास आ जाते हैं कभी ऐसे लोगतो उनकी मांग बड़ी अजीब होती है। यहां मैं रोज देखता हूं। अगर पश्चिम से कोई आता हैसमृद्ध देश से कोई आता हैउसके प्रश्न अलग होते हैं। वह पूछता है कि मन में चिंताएं हैंइनसे कैसे छुटकारा होवह पूछता है कि मन उद्विग्न हैयह कैसे शांत होवह पूछता है कि जीवन में कोई अर्थ नहीं मालूम पड़ताअर्थ कैसे आए?
इस देश से लोग आ जाते हैंतो उनका सवाल अजीब ही होता है! कोई कहता है कि मेरे लड़के की तबीयत खराब हैआपकी कृपा हो जाए तो वह ठीक हो जाएकि मेरे पति की नौकरी छूट गई हैआप कुछ आशीर्वाद दो! यह बड़ी दयाजनक स्थिति है। मेरे पास नौकरी के लिए आशीर्वाद मांगने आने का मतलब क्या होता हैऔर जो मेरे पास नौकरी के लिए आशीर्वाद मांगने आता हैउसकी धर्म में कोई रुचि हो सकती हैअभी तो संसार ही नहीं पकाअभी सत्य की तरफ उठना कैसे होगा?
जो जीवन के सब सुखद-दुःखद अनुभवों से गुजरता हैजो जीवन के सब बुरे-भले अनुभवों को झेलता है और जिसकी प्रज्ञा प्रौढ़ हो जाती है--वही व्यक्ति धार्मिक हो पाता है।
तुमने पूछा है : "काम पकने पर उसमें रुचि होने लगती हैप्रेम पकने पर क्या होता है?'
काम यानी शरीर। प्रेम यानी मन। प्रार्थना यानी आत्मा ये तीन तल हैं। जब काम से थक जाते हो तो प्रेम का जन्म होता है। जब कामुकता थक जाती है तो प्रेम का सूत्रपात होता है। जब तक तुम कामुकता से भरे हो तब कैसा प्रेमतब तक तो तुम केवल शरीर में उत्सुक होदूसरे व्यक्ति में तो उत्सुक होते नहीं। तुम शोषण करते हो। जब काम थक जाता हैऔर अनुभव में आ जाता है कि काम से कुछ मिलने को नहीं हैतब दूसरे व्यक्ति के भीतर शरीर ही नहीं दिखाई पड़तादूसरे के भीतर छिपा हुआ "व्यक्तिअनुभव में आना शुरू होता है। एक नई दिशा खुलती है। तुम्हारे जीवन में प्रेम का सूत्रपात होता है। कोमल तंतु प्रेम के खुलते हैं।
जब प्रेम भी पक जाता हैतब तुम दूसरे व्यक्ति में व्यक्ति ही नहीं देखतेदूसरे व्यक्ति में तुम्हें आत्मा दिखाई पड़ती हैपरमात्मा का आवास दिखाई पड़ता है--तब प्रार्थना शुरू होती है।
काम को ऐसे समझो कि कली--फूल की कली। प्रेम को ऐसे समझो कि कली खिल गईफूल बन गया। और प्रार्थना को ऐसे समझो कि सुवास मुक्त हो गई फूल सेहवा गंध से भर गई। लेकिन जब प्रार्थना भी पक जाती हैतो वह भी शांत हो जाती है। जब काम भी गयाप्रेम भी गयाप्रार्थना भी गई,सब चला गया और मात्र शून्य रह गया भीतरन कोई भाव उठते न कोई विचार उठतेन कोई संसार बचान कोई मोक्ष बचान पदार्थ बचा और न परमात्मा बचाजहां अब कोई चीज बची ही नहीं--वहां तुम मूलस्रोत पर आ गए। यहीं क्रांति घटती है। यहीं समाधि फलित होती है। इस अवस्था को ही हमने निर्वाण कहा है। यह परम दशा है। फिर इससे गिरना नहीं होता। जो इसमें पहुंच गयाउसको बुद्ध ने कहा "अनागामीहो गयाअब वह वापिस न लौटेगाअब उसका पुनः आगमन न होगा।
लेकिन ध्यान रखनाकाम अगर पका न और तुमने जल्दबाजी की और भाग कर प्रेम पकड़ना चाहातो तुम्हारा प्रेम झूठा रहेगा। अगर प्रेम पका न और तुम प्रार्थना को बुला लाएतो तुम पूरे हृदय से न बुला सकोगेतुम्हारी प्रार्थना में छुपा हुआ प्रेम नीचे खींचता रहेगा। इसलिए हर सीढ़ी पर ठीक से पैर जमाओ और हर सीढ़ी को ठीक से कर लो। और जब तक थोड़ा भी रस रहेरुके रहनाजल्दी नहीं हैअनंत काल मौजूद है। कोई घबड़ाहट नहीं है। जब उस सीढ़ी से पूरी तरह छुटकारा हो जाएज़रा भी राग न रह जाएज़रा भी रस न रह जाएज़रा भी भाव न रह जाए--तब दूसरी सीढ़ी पर कदम रखना। तब तुम्हारे कदमों में एक मजबूती होगी और तुम जहां होओगे वहां पूरे-पूरे होओगेअधूरे-अधूरे नहींखंड-खंड नहीं। नहीं तो एक पैर एक नाव में और दूसरा पैर दूसरी नाव में। तब बड़ी बेचैनी और बड़ी दुविधा पैदा होती है। दो घोड़ों पर सवार कभी मत बनना।
और यहां ऐसे लोग हैं जो तीनत्तीन घोड़ों पर एक साथ सवार हैं। काम अभी चल ही रहा है। प्रेम का राग भी छेड़ दिया है। प्रेम का राग उठ ही रहा है। ओर प्रार्थना के लिए शांत होने की चेष्टा भी कर रहे हैं। तो कुछ भी नहीं हो पाता। काम के कारण प्रेम नहीं हो पाता और प्रेम के कारण प्रार्थना नहीं हो पाती। प्रार्थना के कारण ठीक से प्रेम भी नहीं हो पाता--और प्रेम के कारण प्रार्थना नहीं हो पाती। प्रार्थना के कारण ठीक से प्रेम भी नहीं हो पाता--और प्रेम के कारण ठीक से काम भी नहीं हो पाता। जीवन एक बिगूचनएक विडंबना हो जाती है। लोग किंकर्तव्यविमूढ़ होकर खड़े हो जाते हैं। चौराहे पर खड़े हैं और चारों मार्गों पर जाने की चेष्टा कर रहे हैंएक तरफ हाथ बढ़ा दिया हैएक तरफ पैर बढ़ा दिया हैएक तरफ सिर लगा दिया। तो तुम विक्षिप्त हो जाओगे।

चौथा प्रश्न : सब कुछ दांव पर लगा दने का क्या अर्थ है?
अर्थ तो सीधा-साफ है। सब कुछ यानी सब कुछ। अर्थ पूछते होकुछ बचाने का मन होगा। अर्थ पूछते होकोई तरकीब निकालना चाहते हो। सीधी-सी बात है। इसकी व्याख्या करनी होगी?
अगर तुमसे कोई कहे कि सब वस्त्र उतार डालोतो तुम पूछोगे कि सब वस्त्र उतार डालने का क्या अर्थ हैसब वस्त्र उतार डालने का मतलब सब वस्त्र।
कोई तुमसे कहे कि सब सामान यहीं रख दोभीतर न ले जाओतो तुम पूछते हो कि सब सामान रखने का क्या अर्थ सब सामान यानी सब सामान। इस पर पूछने जैसा क्या है?
सब कुछ दांव पर लगा देने का अर्थ है कि तुम्हारी अपनी बुद्धिमत्ता से तुम अब तक नहीं पहुंचेअब अपनी बुद्धिमत्ता को चढ़ा दो। चालबाजियां न करो। होशियारियां न करो। लोग होशियारियां कर रहे हैं। इसलिए सद्गुरु को मिल कर भी तुम नहीं मिल पाओगे। क्योंकि तुम सद्गुरु के साथ भी चालबाजियां करते हो।
यहां लोग आ जाते हैं। एक सज्जन आ गए। संन्यास ले लिया। जब उन्होंने संन्यास लियातभी मुझे लगा। मैंने उनसे पूछा : "आप काहे को संन्यास ले रहे हैंकिसलिए संन्यास ले रहे हैं?' तो उन्होंने कहा कि अब आपने पूछ लिया तो कैसे छिपाऊं! इसलिए ले रहा हूं कि शायद संन्यास लेने से ध्यान लग जाए।
फिर मैंने उनसे पूछा कि और यहां से लौटकर घर ये गैरिक वस्त्र पहन सकेंगेउन्होंने कहा कि अब आपने जब पूछ ही लिया तब कैसे छिपाऊं! यही सोचा कि चलो यहां तो ले लोअब घर कौन आप देखने आने वाले हैं! ट्रेन में बदल लूंगा कपड़े। घर जाते वक्त अपने कपड़े फिर पहन लूंगा। लेकिन यहां तो ले लो। शायद यहां लेने से ध्यान में गति आ जाए।
यह चालबाजी है। अब तुम बेईमानी कर रहे हो। और बेईमानी से सोचते हो कि ध्यान में गति आ जाएगी! किसको धोखा दे रहे होअपने को ही धोखा दे रहे हो। तुमसे कहा किसने कि तुम संन्यास ले लोतुम ध्यान करो। ध्यान करने से संन्यास आ सकता हैसंन्यास लेने से कैसे ध्यान आ जाएगातुम ध्यान करो। कम से कम थोड़े निष्कपट यहां तो रहो! यहां भी तुम कपट और चाल कर रहे हो। यहां भी तुम सोच रहे हो कि यहां लेने में क्या हर्जा हैले लोयहां तो कोई देख भी नहीं रहाकिसी को घर पता भी नहीं चलेगा!
. . . अब दूर गोहाटी से आए हैं। गोहाटी कहां किसको खबर होनेवाली है कि तुमने यहां गैरिक वस्त्र पहन लिए थे। या अगर पता भी चल जाएगातुम कह दोगेः "वहां पहन लिए थेवहां सब लोग पहने हुए थेसोचासबसे संग-साथ हो जाना अच्छा हैजैसा देश वैसा वेषअपने घर अपने वस्त्रों में पहुंच जाएंगे।मैं तो तुम्हारा पीछा नहीं करूंगागोहाटी नहीं आऊंगा--देखने कि अब तुम कपड़े पहने हुए हो कि नहीं पहने हुए हो। मगर तुम चूक गए मौका। यहां अगर आए थे पंद्रह-बीस दिन के लिए तो वे पंद्रह-बीस दिन भी खराब कर लिएतुम अपनी बेईमानी यहां लेकर आ गए।
लोग चालबाजियां कर रहे हैं। लोग परमात्मा के साथ भी. . . मौका लगे तो उसकी भी जेब काट लेंमौका लग जाए तो उसको भी लूट लें।
सब दांव पर लगाने का अर्थ होता है : चालबाजियां अब और नहीं। अब तुम सब खोलकर ही रख दो। तुम कह दो : "यह मैं हूं! बुरा-भला जैसा हूं,स्वीकार कर लें। बुराइयां नहीं हैंऐसा भी नहीं कहता। भलाइयां भलाइयां हैंऐसा दावा भी नहीं करता। यह हूं बुरा-भलासब का जोड़त्तोड़ हूं। इसे स्वीकार कर लें। अब आपके हाथ में हूंअब जैसा बनाना चाहें बना लें।'
पूछा है "योग चिंमयने। यह प्रश्न योग चिंमय का है। योग चिंमय में ऐसी बेईमानी है। प्रश्न अकारण नहीं उठा है। होशियारी है। करते भी हैं तो . . .अगर मैं कहूंगा तो कुछ करते भी हैं तो उतनी ही दूर तक करते हैं जहां तक उनकी बुद्धि को जंचता हैउससे एक इंच आगे नहीं जाते। होशियारी बरतते हैं। होशियारी बरतोकोई हर्जा नहीं--मेरा कुछ हर्जा नहीं हैतुम ही चूक जाओगे। तो चूकते चले जा रहे हैं। यहां मेरे पास आनेवाले प्राथमिक लोगों में से हैं और पिछड़ते जा रहे हैं। चूंकि सब दांव पर लगाने की हिम्मत नहीं है। अपनी बुद्धि को बचाकर लगाते हैं। वे कहते हैं: "इत्ता तो हिसाब अपना रखना ही पड़ेगा। कल आप कहने लगो कि गङ्ढे में कूद जाओ तो कैसे कूद जाऊंगादेख लेता हूं कि ठीक हैनीचे मखमल बिछी है तो कूद जाता हूं। अब गङ्ढे में पत्थर पड़े होंतब तो मैं रुक जाऊंगा। जब तक मखमल बिछी हैतब तक कूदूंगाजब गङ्ढे में देखूंगा पत्थर पड़े हैं तो मैं कहूंगा कि अब नहीं कूद सकता।'
. . . तो अपनी होशियारी को लेकर चलोगे--चूक जाओगे। फिर मुझे दोष मत देना। दोष तुम्हारा ही था। अपने को बेशर्त न छोड़ो।
और ऐसे बहुत मित्र हैं। और अगर चूकते हैं तो नाराज होंगेसोचेंगे कि शायद उन पर मेरी कृपा कम हैशायद मैं पक्षपाती हूं। लेकिन कभी यह न देखेंगे कि क्यों चूक रहे हैंकिस कारण चूक रहे हैं।
मन चालबाज है।
मैंने सुनाएक आदमी ने अखबार में खबर दी : आवश्यकता है एक नौकर की। विज्ञापन पढ़कर एक आदमी नौकरी के लिए आया। नौकरी की आशा से आनेवाले उम्मीदवार ने पूछा कि मुझे वेतन क्या मिलेगाउस आदमी ने कहाजिसने विज्ञापन दिया थाकि वेतन कुछ नहीं मिलेगाकेवल खाना मिलेगा। आदमी गरीब था। उसने कहा : "चलो ठीक हैखाना ही सही। और कामकाम क्या होगा?'--नौकर ने पूछा। उन सज्जन ने कहा : "सबेरे-शाम दो वक्त गुरुद्वारा जाकर लंगर में खाना खा आओ और साथ ही हमारे लिए खाना बांधकर लेते आओ।'
आदमी बड़ा बेईमान है! खूब तरकीब निकाली कि लंगर में खाना खा लेनातुम भी खा लेनातुम्हारा खाना भी हो गयाखत्म! तुम्हारी नौकरी भी चुक गई और मेरे लिए खाना लेते आना। यह तुम्हारा काम है।. . .तो मुफ्त में सब हो गया।
ऐसे ही लोग आध्यात्म भी बड़ी होशियारी से करना चाहते हैं--मुफ्त में कर लेना चाहते हैं: "कुछ लगे नाकुछ रेखा न खिंचेकुछ दांव पर ना लगे! अपने को बचाकर घट जाए घटना। मुफ्त मिल जाए। कोई प्रयास न करना पड़े और कोई कठिनाई न झेलनी पड़े।'
और जहां तुम्हारे अहंकार को चोट होजहां तुम्हारी बुद्धि को चोट हो--वहीं पीछे हट जाओगे। और वहीं कसौटी है।
इसलिए पलटू ठीक कहते हैं कि कोई मर्द हो तो बढ़े। मर्द ही नहीं--पागल होतो हिम्मत करे इतनी।
सब दांव पर लगा देने का अर्थ हैः पागल की तरह दांव पर लगा देनाफिर पीछे लौटकर देखना नहीं। अंधे की तरह दांव पर लगा देनाफिर पीछे लौटकर देखना नहीं। पहले दांव पर लगाने के लिए खूब सोच लोविचार लो। कोई यह नहीं कह रहा है कि सोचो-विचारो मत। खूब सोचोखूब विचारोवर्षों बिताओचिंतन-मनन करोसब तरफ से जांच-परख कर लोलेकिन एक बार जब निर्णय कर लो कि ठीक हैठीक आदमी के करीब आ गएयही आदमी है--जब ऐसा लगे कि यही आदमी है तो फिर आगा-पीछा न सोचो। फिर सब चरणों में रख दो। फिर कहो कि ठीक हैअब तुम्हारे साथ चलता हूं : नरक जाओ तो नरकस्वर्ग जाओ तो स्वर्गअब तुम जहां रहोगे वहीं मेरा स्वर्ग है।और तुम जैसे रखोगे वही मेरा स्वर्ग है।
अहंकार दांव पर लगा देने का अर्थ है।
तुम संन्यास भी लेते हो तो तुम अहंकार दांव पर नहीं लगाते।
दो तरह के लोग संन्यास लेते हैं। एक हैंजो संन्यास सोच-विचार कर लेते हैंजो कहते हैंहम सोचेंगे-विचारेंगेसब तरह का पक्ष-विपक्ष करेंगेफिर अपना निर्णय लेंगेफिर संन्यास लेंगे। दूसरे हैंजो भाव से संन्यास लेते हैंविचार से नहीं। बड़ा अन्य संन्यास है उनका। आंसुओं के माध्यम से संन्यास लेते हैंतर्क के माध्यम से नहीं। रस-विभोर होकर संन्यास लेते हैंनिष्पत्ति से नहींनिष्कर्ष से नहीं। बुद्धि को एक तरफ रखकर संन्यास लेते हैं। मेरे पास आते हैंउनसे मैं पूछता हूं: "कुछ सोच लो।वे कहते हैं : "सोचना क्या!मैं उनसे कहता हूं: "पहले विचार लो।वे कहते हैं: "विचारना क्या!'आपको देखाबात हो गई। आप अगर अपात्र समझें तो न दें। आप अगर न दें तो आपकी मर्जी । मगर मैं लेने को हूं। और अब सोचना-विचारना नहीं है। सोच-विचार तो बहुत कर चुका और जिंदगी भर सोच-विचार में गंवा दी और कुछ हाथ में न लगा। अब एक काम तो मुझे कर लेने दें बिना सोच-विचार के। यह भाव से उठा संन्यास है।
चिंमय ने जब संन्यास लिया तो काफी सोच-विचार किया और अभी भी सोच-विचार चल रहा है। बड़ी सोच-विचार सेबड़ा हिसाब लगाया होगा भीतर! दिन बिताए। बड़ी झिझकते-झिझकते संन्यास में प्रवेश किया। और अभी भी प्रवेश हो नहीं पायाअभी भी दरवाजे पर अटके हैं। अभी भी दरवाजे पर खड़े हैं। अभी भी उस सीमा पर खड़े हैंजहां से वापिस लौटना संभव है। उससे आगे नहीं बढ़ते हैं कि जहां से वापिस लौटना कठिन हो जाएजहां से कि वापिस लौटा ही न जा सकेउस सीमा तक नहीं जाते। फिर चूकेंगे। चूक रहे हैं। और जब चूकेंगे तो दोष मुझे देंगे। यह भी मजा है। जब चूकोगे तो स्वभावतः कहीं तो दोष दोगेकिसी को तो दोष दोगे!. . . तो मुझे ही दोष दोगे।
एक स्त्री से कोई पूछ रहा था कि तेरी खिड़की का कांच कैसे टूट गयाउसने कहाः "मुझसे मत पूछोमेरे पति से पूछो। उन्होंने तोड़ा है।उसने पूछा : "लेकिन तेरे पति को तो मैं अभी बाहर पूछा हूं। वे कहते हैं कि पत्नी से पूछो।पत्नी ने कहा : "उन्हीं ने तोड़ा है। खड़े थे इस खिड़की के पास और जब मैंने उनकी तरफ बेलन फेंका तो नामर्द की तरह हट गएतो कांच फूट गया। किसने तोड़ान हटतेन टूटता। उन्हीं से पूछो।'
आदमी का मन सदा दूसरे को दोष देने की वृत्ति से भरा होता है। अगर तुम्हें न घटेगा तो तुम मुझ पर नाराज होओगे। और कभी तुम्हें भूलकर भी यह खयाल न आएगा कि अगर नहीं घटा तो कहीं ऐसा तो नहीं था कि कुछ मैं चालबाजियां करता रहा। खूब समझ लेना। अगर तुम्हारी समझदारी इतनी ही तुम्हारे काम आ जाए कि तुम यह समझ पाओ कि समझदारी की यह बात नहीं हैयह काम दीवानों का हैयह काम मस्तों और पागलों का है--तो घटना घट जाएगीसब दांव पर लग जाएगा।
कह न ठंढी सांस में

अब भूल वह जलती कहानी

आग हो उर में तभी

दृग में सजेगा आज पानी

हार भी तेरी बनेगी

मानिनी जय की पताका

राख क्षणिक पतंग की है

अमर दीपक की निशानी

वेध दो मेरा हृदय

माला बनूंप्रतिकूल क्या है?

मैं तुम्हें पहचान लूं इस कूल

तो उस कूल क्या है?

शिष्य तो बंधने को तैयार है।

बेध दो मेरा हृदय

माला बनूंप्रतिकूल क्या है?
बस माला का फूल बन जाऊं. . . "बेध दो मेरा हृदयछेद दो मेरा हृदय। माला बनूंप्रतिकूल क्या है? ' तुम्हारे छेदने में कुछ दुश्मनी नहीं है। छेद दो,नहीं तो माला का हिस्सा नहीं बन पाऊंगा।

मैं तुम्हें पहचान लूं इस कूल

तो उस कूल क्या है?
कहीं भी पहचान हो जाए--इस कूल तो यहांउस कूल तो वहां--जहां ले चलो। चलने को राजी हूं।

मैं तुम्हें पहचान लूं इस कूल

तो उस कूल क्या है?

कह न ठंढी सांस में

अब भूल वह जलती कहानी

आग हो उर में तभी

दृग में सजेगा आज पानी

हार भी तेरी बनेगी

मानिनी जय की पताका।
शिष्य जब हारता है तो ही विजेता होता है। गुरु से हार जाने से बड़ी और कोई विजय नहीं है। गुरु से जीतने की कोशिश तुम्हारी हारने की संभावना है। गुरु से जीतने की चेष्टाअपने को बचाए रखने का प्रयास--तुम्हारी पराजय है। यह विरोधाभासी वचन ठीक से खयाल में रखना। धन्यभागी हैं वे जो गुरु से हार जाएंक्योंकि वहीं जीत गए।

हार भी तेरी बनेगी

मानिनी जय की पताका

राख क्षणिक पतंग की

है अमर दीपक की निशानी

बेध दो मेरा हृदय माला बनूंप्रतिकूल क्या है?

मैं तुम्हें पहचान लूं इस कूल

तो उस कूल क्या है?

पांचवां प्रश्न : प्रबल जीवेषणा के होते हुए भी किस भांति भक्त को अपने हाथ से अपना सीस उतारना संभव होता हैकृपा करके समझाइए।

जब तक प्रबल जीवेषणा हैतब तक यह संभव नहीं होता।
जब तक प्रबल जीवेषणा है--लस्ट फॉर लाइफ--जब तक जीने की महान् आकांक्षा हैतब तक तो तुम भक्त बनते ही नहींशिष्य बनते ही नहीं। जीवेषणा की पराजय. . . बहुत-बहुत तरह से जांच लेने के बाद जब तुम पाते हो कि जीवन में कुछ है ही नहींकुछ और चाहिए जो जीवन से ऊपर हो--तब।
बुद्ध ने राजमहल छोड़ा। उस रात. . . बड़ी मीठी कहानी बौद्धशास्त्रों में है। बुद्ध युवा थे। सब उनके पास था। सुंदर पत्नी थी। और उसी रात उनको बेटा जन्मा था। बुद्ध ने उसका नाम राहुल रखा। बड़ा सोचकर रखा। राहुल का मतलब होता हैः राहुजिसके चक्कर में कभी चांद पड़ जाता हैतो ग्रहण लग जाता है। तो बुद्ध ने कहा है कि यह और बेटा हो गया आज. . .। भागने का मैं विचार किए बैठा थापत्नी रोकने को काफी थीपिता रोकने को काफी थेराजमहलधन-दौलतसाम्राज्यसब रोकने को काफी था--और राहुल भी आ गए हैं! यह राहु भी आ गया! अब इस बेटे का मोह मुझे रोकेगा।
इसलिए नाम "राहुलरखा। और इस डर से कि अब कहीं यह बेटा मुझे न रोक लेउसी रात भाग गए। जब महल से निकलेरथ पर सवार हुएतो कहते हैं: देवताओं ने रास्तों पर फूल बिछा दिएकमल के फूल बिछा दिएकि घोड़ों के पैरों की आवाज न होकहीं राजमहल जग न जाए! नहीं तो एकयह जो महाक्रांति का क्षण आया है एक आदमी के जीवन मेंयह रुक जाएगाअवरुद्ध हो जाएगा। सदियों में कभी कोई बुद्ध होता है। जगत् प्रतीक्षा करता है सद्गुरु की। यह मौका चूक न जाए. . .।
दरवाजे ऐसे थे नगर केकि खुलते थे तो उनकी मीलों तक आवाज होती थी। तो देवताओं ने दरवाजे ऐसे खोले कि ज़रा भी आवाज न हो। सारे पहरेदार गहन निद्रा में सुला दिए। ज्योतिषियों ने कहा था बुद्ध के पिता को कि जिस दिन इसका बेटा पैदा होगाउस दिन सावधान रहना। बेटा जब पैदा हुआ तो पहरे बहुत बढ़ा दिए गए थेसब तरफ फौजें लगा दी गई थींकि उनके भागने की संभावना थी। सारे पहरेदार देवताओं ने सुला दिए।
ये देवता इतनी फिक्र क्यों कर रहे हैंयह कहानी बड़ी मीठी है-- प्रतीकात्मक है। यह इतना ही कह रही है कि सारा अस्तित्व आह्लादित होता है जब कोई व्यक्ति सत्य की तरफ उन्मुख होता है। सब तरह से सहारा मिलता है। सब तरफ से सहयोग मिलता है। जब कोई असत्य की तरफ जाता है तो सारा जगत् तुम्हारा दुश्मन हो जाता है। और जब कोई सत्य की तरफ जाता है तो सारा जगत् तुम्हारा साथी हो जाता है। बस तुम जाओ भर।
फिर जब महल छोड़कर दूर वन में निकल आए और अपने सारथी से कहा कि अब तुम लौटा ले जा रथ कोमेरे इस प्यारे घोड़े कोमुझे क्षमाकरमैं चला जंगलमैं सत्य की खोज पर निकला हूं--उस बूढ़े सारथी ने आंखों में आंसू भरे हुए कहा : "आप यह क्या कर रहे हैंयह सुंदर महलयह सुंदर पत्नीये सब सुख-भोग आप छोड़कर जा रहे हैं। और इसी को पाने के लिए तो हर आदमी तड़फ रहा है। हर आदमी ऐसे ही महल चाहता हैऐसा ही धनऐसी सुंदर पत्नी ऐसा सुंदर बेटा चाहता है। आप इसको छोड़कर जा रहे हैंआप होश में हैं?'
बुद्ध ने कहा : मैं पीछे लौटकर देखता हूंमुझे तो महल नहीं दिखाई पड़ता है--केवल लपटें दिखाई पड़ती हैं। मुझे कोई पत्नी नहीं दिखाई पड़तीकोई बेटा नहीं दिखाई पड़ता। सब तरफ आग लगी है। और जितने जल्दी मैं खोज लूं कि जीवन का सत्य क्या हैउतना ही अच्छा । इसके पहले कि मैं जल जाऊं इस आग मेंइसके पहले कि यह जीवन मौत में परिणत हो जाए--मैं खोज लेना चाहता हूंमैं सब दांव पर लगा देना चाहता हूं। सब दांव पर लगा देना चाहता हूं। जो कुछ मेरे पास हैसब छोड़ने को तैयार हूं। लेकिन यह मैं जानना चाहता हूं कि जीवन का सत्य क्या है!'
बुद्ध ने जिस परिपूर्णता से यह बात कहीकहते हैं वह जो बूढ़ा सारथी थाउसकी भी समझ में आई। बात तो सच थी। जीवन उसने भी देख लिया था। पाया तो कुछ भी न था। लेकिन अभी तक उसे खयाल न आया था कि जीवन के पार भी कोई जीवन हो सकता है! कहते हैंवह भी उतरा और बुद्ध के पीछे जंगल में प्रविष्ट हो गया।
मगर यहां तक बात रुक गई होती तो भी ठीक थी। इतिहास नहीं है यह--यह पुराण है। कहते हैंघोड़ा जब यह सुन रहा थाबुद्ध जब समझा रहे थे सारथी कोतो घोड़े ने भी सुना। घोड़े को भी बड़ा प्रेम था। बचपन से बुद्ध को लेकर घुमाने निकलता था यह घोड़ा। यह बुद्ध का प्यारा घोड़ा था। उसकी आंख से आंसू टपके। और जब बुद्ध और सारथी भी जंगल में चले गएतो कहते हैं घोड़ा भी जंगल में चला गया।
यह बात मुझे बड़ी प्यारी लगती है कि घोड़ा भी जंगल में चला गया! उसे भी बात दिखाई पड़ी कि जब बुद्ध के जीवन में कुछ नहीं ,  जब मनुष्य के जीवन में कुछ नहीं हैतो मुझ घोड़े के जीवन में क्या रखा है! उसकी जीवेषणा बुझ गई। वह भी खोज पर निकल गया। उसने कहा : अगर बुद्ध सब दांव पर लगाते हैं तो मैं भी सब दांव पर लगा दूंगा।
बाद में किसी ने बुद्ध से पूछा है कि उस घोड़े का क्या हुआ। बुद्ध ने कहा कि वह सत्य को खोजते मर गया--भविष्य में कभी बुद्ध होगा।
सब दांव पर घोड़े ने भी लगा दिया! भाव चाहिए। अब घोड़े के पास विचार तो नहीं हैलेकिन घोड़ा भी रोता है। घोड़े के भी आंसू गिरते हैं। घोड़े के पास बहुत बुद्धि तो नहीं है। लेकिन प्रेम था इस आदमी से--इस बुद्ध से! और यह जब जाने लगा तो इसको भी चौंक आईचेत आयाहोश आया।
प्रबल जीवेषणा जब तक हैतब तक तो तुम शिष्य न बन सकोगेभक्त न बन सकोगे। लेकिन प्रबल जीवेषणा ही तुम्हें उस घड़ी ले आती हैजहां जीवेषणा गिर जाती है। जीवेषणा में दौड़-दौड़ कर एक दिन पता चलता है : इस जीवन में कुछ भी नहीं है। जिस दिन यह पता चलता है कि इस जीवन में कुछ भी नहींउस दिन पलट गएउसी दिन "पलटूका जन्मउसी दिन तुम लौटे। उस दिन तुम्हारी नई खोज शुरू होती है। फिर तुम धन नहीं खोजतेध्यान खोजते होसंसार नहीं खोजतेसंन्यास खोजते होबंधन नहीं खोजतेमोक्ष खोजते होवासना नहीं खोजतेप्रार्थना खोजते हो। जब ऐसी खोज शुरू हो जाती हैतो ही समर्पण होता हैतो ही कोई सीस को उतारकर रखने को राजी होता है।

आखिरी प्रश्न : संत पलटू दास उसे गंवार कहते हैं जो जगत् की झूठी माया में फंसा है और उसे बेवकूफजो प्रेम की ओर कदम बढ़ाता है। फिर बुद्धिमान कौन है?

गंवार उसे कहा उन्होंने जो अभी संसार में उलझा हैइसे होश नहीं यह क्या कर रहा है। इसे गंवार कहा--उनकी तरफ से जिन्हें होश आ गया हैजो जाग गए हैंउनकी तरफ से इसे गंवार कहा--उनकी तरफ से जिन्हें होश आ गया हैजो जाग गए हैंउनकी तरफ से इसे गंवार कहा कि तू जाग । और फिरजो परमात्मा के प्रेम में संलग्न हो रहा हैउसको बेवकूफ-बेवकूफपागल कहा। यह किसकी तरफ से कहायह उनकी तरफ से कहाजो सोए हुए हैं।
ये सापेक्ष शब्द हैं। ये दोनों शब्द दो अलग ढंग से कहे गए दो तरफ से कहे गए। पहला तो पलटू ने अपनी तरफ से कहाः "अजहूं चेत गंवार! अब जाग! बहुत हो गया।फिर दूसरा तो व्यंग्य में कहामजाक में कहाहास्य में कहा। दूसरा कहा कि देखसोच-समझ कर जागनाक्योंकि यह पागलों का काम है। दुनिया तुझे पागल कहेगी। दुनिया हंसेगी। दुनिया कहेगी : दिमाग खराब हुआ इसका। तेरी पद-प्रतिष्ठा जाएगी। तेरा सत्कार-सम्मान जाएगा। वे ही लोग जो कल तक कहते थे "तू बुद्धिमान है', वे ही कहेंगे बेवकूफ। वे ही जो कल तक सलाह मांगने आते थेवे ही तुझे सलाह देने आने लगेंगे कि "यह क्या कर रहे होतुम्हारा दिमाग ठीक हैकुछ होश में होकिसकी बातों में पड़े होकहां उलझ गएअरेबस यह संसार ही है--वे ही कहेंगे--"खाओ-पीओमौज करोइससे ज्यादा कुछ भी नहीं है। यह कहां का परमात्माकिसकी बातों में पड़ रहे हो! कब किसको दिखाकब किसको मिला?'
तो पलटू मजाक में कह रहे हैं दूसरी बात। वे कह रहे हैं कि अगर पागल बनने की तैयारी हो...। क्योंकि दुनिया पागल कहेगी। अब खयाल रखनासंत तो बहुत कम हैं जो तुमको गंवार कहेंना के बराबर हैं। ऐसा आदमी कभी-कभार तुम्हें मिलेगा जो तुम्हें गंवार कहे। और तुम अगर उसके पास न जाओ तो तुम्हें सुनने का सवाल भी न उठेगा। लेकिन यह संसार तो चारों तरफ हैजो तुम्हें पागल कहेगा।
तो अगर तुम्हें यह चुनना हो कि संतों के द्वारा गंवार कहे जाना चुननाकि संसार के द्वारा पागल कहे जाना चुनना--तो तुम सोचोगे कि संत कितने हैंकभी कोई बुद्धकभी कोई महावीरकभी कोई नानक कह देगा गंवारमगर इनसे मिलना भी कहां होना है! क्या फिक्र पड़ी है इनकी! इनको झुठलाया जा सकता है। हम इनके पास ही न जाएंगेपर न मारेंगे वहां। सुनेंगे नहीं इनकी बात। और इक्के-दुक्के आदमियों की बात का भरोसा भी क्या?दुनिया तो बहुमत में मानती है। यह भीड़इससे कहां जाओगेयह पागल कहेगी। यह जगह-जगह उंगली उठाएगी। यह जगह-जगह कांटे बिछाएगी। जहां जाओगे वहां कहेगी तुम्हारा दिमाग खराब हो गया। और यह भीड़ परायों की नहीं हैअपने वाले भी कहेंगे। खुद की पत्नी हंसेगी। खुद के बेटे-बच्चे हंसेंगे। खुद के प्रियजन-परिजन मजाक उड़ाने लगेंगे। यह भीड़ बड़ी है।
पलटू दोनों शब्दों का उपयोग कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि अगर आना हो इस तरफचेतना होअगर गंवारी छोड़नी हो तो पागल होना पड़ेगा,क्योंकि सारी दुनिया तुम्हें पागल कहेगी। मगरअगर तुम्हें एक संत पुरुष भी मिल जाए कहने को कि अब तुम गंवार न रहेतो कहने दो सारी दुनिया को पागलकुछ हर्जा नहीं है। एक संत का वक्तव्य पर्याप्त है। इस सारी दुनिया के वक्तव्यों का कोई मूल्य नहीं है। एक बुद्ध तुम्हें आशीष देने को मिल जाए तो सारी दुनिया को देने दो गालियांइनकी गालियां कुछ न कर पाएंगी। एक बुद्ध का आशीष पर्याप्त होगा। वह आशीर्वाद नाव बन जाएगी। वह तुम्हें उस पार ले जाएगी।
और संसार तो गालियां देता है। संसार की कुछ खूबियां हैं। वह गाली देता है--कुछ कारणों से। पहला तोजब कोई व्यक्ति कुछ अनूठे ढंग के काम करने लगता हैकि प्रार्थना करने लगा कि पूजा करने लगा कि नाचने लगाकि गीत गुनगुनाने लगाकि नाम स्मरण करने लगा--तो संसार के लोगों को बेचैनी होती है। यह बेचैनी स्वाभाविक है। यह बेचैनी इस बात की है कि इस आदमी की मौजूदगी से उन्हें अपने पर शक होने लगता है कि हम कहीं गलत तो नहीं कर रहेकहीं हम भूल तो नहीं कर रहे! और यह बात खटकती है कि कोई आदमी हमें दिखा रहा है कि हम भूल कर रहे हैं। वे झपटते हैं--प्रतिरोध मेंप्रतिशोध मेंप्रतिक्रिया में। वे सिद्ध करना चाहते हैं कि तुम गलत हो। जरूर उनकी भीड़ है। वे चारों तरफ से टूट पड़ते हैं इस आदमी पर कि तुम गलत हो।
मेरे एक मित्रमेरे एक संन्यासी ने पटना से लिखा। संन्यास लेकर गएबड़े आनंद-मग्न थे। जब मुझसे विदा लेने आए थेतब भी मैंने उनसे कहा था कि थोड़ा संभालना इस आनंद-मग्नता कोइसको ज्यादा छलकने मत देनाक्योंकि लोग समझ न पाएंगे। लोग समझेंगे पागल हो गए।
पर वे बोले : "रोक भी कैसे सकता हूंयह छलक रही है।और जरूर वे मस्त थेगहरी मस्ती में थे। और दस दिन बाद ही उनका पत्र आया कि आपने ठीक ही कहा था। मैं बड़ी झंझट में पड़ गया हूं। अस्पताल में भरती हूं । घर के लोग समझते हैंमेरा दिमाग खराब हो गया है। क्योंकि घर के लोग कहते हैं कि "बिना कारण तुम प्रसन्न क्यों होकभी तो प्रसन्न नहीं थे पहले! तुम बिना कारण हंसते क्यों होअकेले बैठे-बैठे तुम हंसते क्यों होबीच रात में उठकर क्यों बैठ जाते होआंख बंद करके क्या करते हो?'
पत्नी-बच्चेपरिवारसबने मिलकर--उन्होंने लिखा कि--मुझे अस्पताल में भरती कर दिया। और यहां मैं हंसता हूं या भजन गाता हूं तो डॉक्टर कहता है कि भाई यह तुम बंद करोनहीं तो इलेक्ट्रिक शॉट देने पड़ेंगेदवाई से अगर नहीं माने। तो मुझे और हंसी आती है कि यह भी खूब हो रहा है। मैं जिंदगीभर दुःखी रहाकोई इलेक्ट्रिक शॉट देने न आया। मैं जिंदगीभर परेशान थाबेचैन थाचिंता में था--और किसी ने मुझे पागल न समझायह भी खूब हुई! जिंदगी में पहली दफा आनंद की थोड़ी-सी गंध मिली--और मैं पागल हो गया! और मेरी पत्नी भी नहीं समझतीउसको मैं समझाता हूं,वह कहती हैः "तुम चुप रहोतुम बिल्कुल बोलो ही मत! तुम होश में नहीं हो।मैंने अपने बेटे को बुला कर कहा कि तू पढ़ा-लिखा हैशायद तू कुछ समझ जाए. . .। उसने कहा कि आप शांत ही रहिएडॉक्टर ने बोलने की मनाही की है। आप बकवास करो ही मत। आप ज्ञान की बातें मत बघारो। आपका दिमाग खराब हो गया है।
अब इस आदमी से कोई भी नहीं पूछता कि यह आदमी को भीतर क्या हो रहा है! इसको तो लोग बोलने ही नहीं देते। और उनका लिखना भी ठीक है;वे कहते हैं कि इससे मुझे और हंसी आ रही है। इससे मैं और यह जगत् का खेल देख कर प्रसन्न हो रहा हूं। मगर मेरी प्रसन्नता उन्हें दिक्कत में डाले दे रही है।
पूछा है कि अब मुझे अस्पताल से बाहर निकलने को मिलेगा कि नहींउनके घर के लोगों को लिखवाया। किसी तरह से छूटेआकर मिलकर गए। उनको बहुत समझाकर भेजा है कि अब प्रसन्नता अपनी भीतर संभालना। यह गगरी भर गई हैइसको छलकने मत देना। और यह जो हीरा भी मिल गया हैइसको गांठ बांध लोइसको बार-बार खोलकर देखना मत। क्योंकि लोग जब तुम्हें देखेंगे कि तुम अपनी गांठ खोलकर बार-बार देखते हो,उनको तो हीरा दिखाई नहीं पड़ेगाउनके पास तो आंखें नहीं हैंवे कहेंगे : "देखते क्या हो बार-बार खोल करहै तो कुछ भी नहीं।हीरा तुम्हें दिखाई पड़ेगातो तुमको हंसी आएगी कि इन अंधों कोकिसी को दिखाई नहीं पड़ता। और उनको दिखाई नहीं पड़ेगावे भी क्या करेंउनकी भी मजबूरी है।
इसलिए कहा पागल।
इसलिए पलटू सावधान कर रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि इस रास्ते पर आना होगंवारी से मुक्त होना होतो पागल होने की तैयारी रखना। क्योंकि जो पागल हैंवे ही इस सूली पर चढ़ने जाते हैं।
यह जो सूली लगती है--सारी दुनिया को दिखाई पड़ने में--यह सिंहासन है। लेकिन सिंहासन तो उसको दिखाई पड़ेगा जो इस पर विराजमान हो जाता हैया उन थोड़े-से लोगों को दिखाई पड़ेगा जो विराजमान हो गए हैं। उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। मगर शेष भीड़बहुमत तो विक्षिप्त समझेगापागल समझेगा।
पश्चिम के पागलखानों में ऐसे बहुत-से लोग बंद हैंजो पागल नहीं हैंजो पूरब में होते तो हम उन्हें परमहंस कहते।
पश्चिम का एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक है : आर०डी० लैंग। उसने एक बड़ी क्रांति पैदा कर रखी है। उसने इन पागलों के लिए बड़े जोर से आंदोलन चलाया है कि ये पागल नहीं हैंये मस्त लोग हैं--जिनको सूफी "मस्तकहते हैंहिंदू "परमहंसकहते हैं। ये मस्त हैंइनको तुम पागलखानों में डाले हुए हो और इनको सता रहे हो और इनके हाथों में जंजीरें पहना दी हैं! और इनका कोई कसूर नहीं हैइनका सिर्फ कसूर इतना है कि ये प्रसन्न हैं,आनंदित हैं।
यह दुनिया इतनी दुःखी है कि यहां आनंदित होना अपराध है। यह दुनिया इतनी... इतनी गंवार है कि यहां बुद्धिमान होना गंवारों की आंखों में पागल सिद्ध हो जाना है।

आज इतना ही।

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