शनिवार, 5 अगस्त 2017

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा-भाग-2 - प्रवचन-18

28 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

1-वेदों में वर्णित होमापक्षी की कथा का आशय समझाने के लिए भगवान से निवेदन।

2-क्या कैवल्य में साक्षी भी प्रकाश के साथ समाहित हो जाता है?

3-हे भंते! मा शीला के मन में भाव उठा दीजिए न!...

4-अब हद से गुजर चुकी मुहब्बत तेरी! 

5-प्रार्थना है कि अब रंग चढ़ा दें!

6-संसार क्या है?






पहला प्रश्न :

वेदों में होमापक्षी की कथा है। यह चिड़िया आकाश में बहुत ऊंचे पर रहती है। वहीं पर अंडे देती है। अंडा देते ही वह गिरने लगता है। परंतु इतने ऊंचे से गिरता है कि गिरते—गिरते बीच में ही फूट जाता है। तब बच्चा गिरने लगता है। गिरते—गिरते ही उसकी आंखें खुलती हैं और पंख निकल आते हैं। आंखें खुलने से जब वह बच्चा देखता है कि मैं गिर रहा हूं और जमीन पर गिर कर चूर—चूर हो जाऊंगातब वह एकदम अपनी मां की ओर फिर ऊंचे चढ़ जाता है। इस कथा का आशय समझाने की अनुकंपा करें।

नरेंद्र ! यह कथा किसी पक्षी की कथा नहींमनुष्य की कथा है। मनुष्य के पतनमनुष्य के बोध की कथा है। ऐसा ही मनुष्य है। आकाश में हमारा घर हैऊंचाइयों पर हमारा घर हैलेकिन जन्म के साथ ही हम गिरना शुरू हो जाते हैं। गिरने का कोई अंत नहीं है। क्योंकि खाई अतल है। कोई तल नहीं है खाई का। हम गिरते जा सकते हैं और गिरते जा सकते हैं। ऐसी कोई सीमा नहीं है जहां अनुभव में आए कि बस इसके आगे गिरना और नहीं हो सकता। और भी हो सकता हैऔर भी हो सकता है।
अंतिम पापी कभी हुआ नहीं। कभी होगा नहीं। क्योंकि पाप में और परिष्कार हो सकते हैं। पाप में और नई ईजाद हो सकती है पाप में और नई कलाएं जोड़ी जा सकती हैं।
गिरने का कोई अंत नहीं है। गिरते ही गिरते किसी दिन आंख खुलती है। गिरने की चोट से ही आंख खुलती है। गिरने की पीड़ा से ही आंख खुलती है। और उसी आंख के खुलने में मनुष्य को अपने घर की याद आनी शुरू  होती है। उस आंख का खुलना है—दर्शनदृष्टि। नहीं तो हम अंधे हैं। ये बाहर की आंखें खुली हैं इससे यह मत सोच लेना कि तुम्हारे पास आंखें हैं। अगर तुम्हारे पास आंखें हैं तो फिर बुद्ध के पास क्या थातुम्हारे पास आंखें हैं तो फिर महावीर के पास क्या थातुम्हारे पास आंखें हैं तो फिर जिनको हमने द्रष्टा कहा हैउनके पास क्या थानहीं तुम्हारे पास आंख नहीं है। तुम्हारे पास सिर्फ आंख की भ्रांति है।
हमारी आंखें वैसी ही हैं जैसे तुमने मोर के पंख पर बनी आंखें देखी हों। उनसे दिखाई कुछ नहीं पड़ताआंखें भर हैं। हमारी आंखें मोरपंखी हैं। चित्रित हैं। दिखता कुछ नहीं हैसूझता कुछ नहीं हैबुझता कुछ नहीं है। टटोल—टटोल कर गिरते—उठते हम चलते रहते हैं। आंख तो तब है जब तुम्हें अपने घर की याद आ जाए।
आंख तो तब है जब तुम्हें ऊंचाई का स्मरण आ जाए। तुम कहां से आए होकिस स्रोत से आए होजब उसकी प्रतीति सघन हो जाएतब समझना कि आंख खुली। और उसी क्षण क्रांति शुरू हो जाती है। उसी क्षण अनुलोम समाप्त हुआविलोम प्रारंभ हुआ। उसी क्षण अदम क्राइस्ट बन जाता है। उसी क्षण हम परमात्मा से दूर जाने के बजाय उसके पास आने शुरू हो जाते हैं। और पंख हमारे पास हैंआंख हमारे पास नहीं है। आंख हो तो हम पंखों का सम्यक उपयोग कर लें। शक्ति हमारे पास है,दृष्टि हमारे पास नहीं है। इसलिए हमारी शक्ति आत्मघाती हो जाती है। हम अपनी ही तलवार से अपने को ही छिन्न—भिन्न कर लेते हैं। किसी और ने तुम्हें थोड़े ही काटा हैकिसी और ने तुम्हें खंडित थोड़े ही किया हैतुमने ही अपने को खंडित किया है,तुमने ही अपने को काटा है। कोई और तुम्हें नहीं मार रहा हैतुम्हीं अपने को मार रहे हो। महावीर ने कहा हैमनुष्य ही अपना मित्र और मनुष्य ही अपना शत्रु है। शत्रु तब तक जब तक आंख नहीं। तब तक हाथ में आई हुई ऊर्जा भी आत्मघाती सिद्ध होती है। और मित्र उस दिन से जिस दिन आंख खुली। आंख बंद और आंख खुलने के बीच जो घटना हैउसको मैं संन्यास कह रहा हूं। आंख खुलेइसकी आकांक्षा  संन्यास है। आंख बंद है इसकी प्रतीति होने लगेतो आंख खुल जाए इसकी आकांक्षा  भी पैदा होने लगती है।
यहां पूरी चेष्टा यही है कि तुम्हें यह स्मरण आ जाए कि तुम्हारे पास आंख अभी है नहीं। तुम्हें स्मरण आ जाए कि तुम्हारा जो ज्ञान है थोथा हैझूठा है। तुम्हें ये स्मरण आ जाए कि जिसे तुमने जीवन समझा हैवह सपने से ज्यादा नहीं है और इससे तुम कुछ निकाल न पाओगे। जैसे कोई रेत से तेल निकालने की कोशिश कर रहा हैऐसे ही जीवन में हारोगे। विषाद में मरोगे। ये आशाएं जो तुमने संजो रखी हैंकोई भी काम आनेवाली नहीं हैं। क्योंकि इन आशाओं का अस्तित्व से कोई सामंजस्य नहीं है। ये तुम्हारे निजी सपने हैं। ये सपने पूरे नहीं हो सकते। अस्तित्व का सहयोग मिले तो कोई चीज पूरी हो सकती है। और अस्तित्व का सहयोग तभी मिलता है कि जब तुम्हारा अहंकार मरता है। अहंकार गिराता हैनिर—अहंकार उठाता है। अहंकार अंधापन हैनिर— अहंकार आंख है।
यह होमापक्षी की कथा मनुष्य की अंतर कथा है। अंतर—व्यथा भी। और इसे तुम ठीक से समझ लो तो मनुष्य का पूरा यात्रापथ समझ में आ जाए।
फिर से सुनो—
यह होमा बहुत ऊंचे आकाश में रहता है। ये तो प्रतीक हैं। हम ऊंचाई से आते हैं।
चार्ल्स डार्विन ने पश्चिम में एक विचार प्रतिपादित किया—विकासवाद का। वह विचार समस्त धर्मों के विपरीत है। विकासवाद का अर्थ होता है—हम नीचाई से ऊपर की तरफ आ रहे हैं। पतन नहीं हो रहा हैविकास हो रहा है। समस्त बुद्धों ने इससे भिन्न बात कही है। उन्होंने कहा है—मनुष्य का पतन हुआ हैहम ऊंचाई से नीचाई की तरफ आ रहे हैं। बुद्धों ने कहा है कि हम परमात्मा से नीचे गिरे हैं! यह हमारा पतन है। डार्विन ने कहा है—हम बंदरों से ऊपर उठे हैं। यह हमारा विकास है। बुद्धों ने कहापरमात्मा हमारा पिता है और चार्ल्स डार्विन कहता है—बंदर हमारे पिता हैं। चार्ल्स डार्विन की बात के पीछे भी थोड़ा बल हैनहीं तो जीतती नहीं बात। ऊपर से देखने में ऐसा ही लगता कि डार्विन ही ठीक हैविकास हो रहा हैदेखो बैलगाड़ी की जगह हवाई जहाजतो विकास हो गया। यह जीवन को एक तरह से देखने का ढंग हुआ। तलवार की जगह एटम बमयह विकास हो गया। लेकिन बुद्धों से पूछो। बुद्ध कहते हैं—तलवार जिसने खोजी थी और जिसने एटम बम खोजा हैइनमें विकास नहीं हुआ हैपतन हो गयाक्योंकि तलवार छोटी—मोटी हिंसा की खबर देती थीएटम बम विराट हिंसा की खबर देता है। जिन्होंने तलवार से काम चला लिया थावे बहुत बड़े हिंसक नहीं थे। हमारा तो एटम बम से भी काम नहीं चलता है। तो हाइड्रोजन बम! और अब और आगे बात चल रही है कि हम और भी नए बम खोज लें। हमारी चेष्टा यह है कि एक ही बम सारी पृथ्वी को डुबाने में समर्थ हो जाए। ये विकास है?
एक तरफ से देखो तो विकास है—तलवार से एटम बम बड़ा विकास मालूम होता है। तलवार एकाध को मार सकती थी,एटम बम लाखों को मार सकता है।
हाइड्रोजन बम करोड़ों को मार सकता है। मारने की कला में बड़ा विकास हो गया। लेकिन मारनेवाला आदमी विकसित हुआहिंसा विकास हैहिंसा तो पतन है।
आदमी और विकृत हो गया।
जिंदगी को देखने के ढंग पर सब निर्भर करता हैतुम कैसे देखते हो।
आज लोग ज्यादा पढ़े—लिखे हैंनिश्चित। आज से दस हजार साल पहले गैर पढ़े—लिखे लोग थे। कोई लिखना नहीं जानता थाकोई पढ़ना नहीं जानता था। इस हिसाब से देखो तो आज का आदमी विकसित है। किताब पढ़ लेता हैअखबार पढ़ लेता है। लेकिन दस हजार साल पहले जो आदमी थावह ज्यादा शात थाज्यादा आनंदित थाज्यादा प्रफुल्लित था। उसके जीवन में एक राग थाएक छंद था। वह सब छंद खो गया। उस छंद को देखो तो पतन हो गया है। अखबार की कतरनें बढ़ती चली गई हैंछंद खोता चला गया है। पढ़ाई—लिखाई हो गई बहुतमस्तिष्क में बहुत—सी सूचनाएं संगृहीत हो गई और हृदय बिलकुल सिकुड़ गया है। अगर मस्तिष्क को देखोतो मात्रा बढ़ी हैमात्रा का विकास हुआ है। लेकिन अगर हृदय को देखो तो गुण गिरा है गुण का पतन हुआ है।
मूल्यवान क्या है—गुण या मात्राक्याटिटी या क्वालिटी?
अगर आदमी को देखो तो कभी झोपड़ी में रहता थाफिर अच्छे मकानों में रहाअब महलों में रह रहा है। आज गरीब से गरीब आदमी जो कपड़े पहने हुए हैंवे सम्राटों को उपलब्ध नहीं थे। अशोक और अकबर के पास तुम जैसे अच्छे कपड़े नहीं थे। बिजली का पंखा नहीं था। न रेडियो थान टेलीविजन था। आज गरीब से गरीब आदमी भी एक अर्थ में अशोक और अकबर से ज्यादा आगे हैं—विकसित हैं। चीजें बढ़ गइ।
आदमी के पास परिग्रह का विस्तार बढ़ गया। लेकिन परिग्रह के विस्तार को बढ़ाने वाला आदमी विकसित आदमी है?यह सवाल है। क्योंकि जितना परिग्रह बढ़ता हैउतनी चिंता बढ़ती है। उतनी अशांति बढ़ती हैउतनी बेचैनी बढ़ती हैउतनी विक्षिप्तता बढ़ती है। चीजों की गिनती कर रहे होतो विकास मालूम होता है। लेकिन चीजों का विकास क्या आदमी का विकास है?
लोग कहते हैं जीवन—स्तर बढ़ गया। स्टैंड़र्ड आफ लाइफ। अच्छा मकान है। अच्छी सड़कें हैंअच्छे कपड़े हैंअच्छी दवाइयां हैं—जीवन स्तर बढ़ गया। इसको जीवन—स्तर कहते होबसइतने पर जीवन समाप्त हो जाता हैजीवन गुण की बात है। क्या इसीलिए तुम बुद्ध का जीवन— स्तर नीचा कहोगेक्योंकि वह भिक्षापात्र लेकर सड़क पर भीख मांगते हैंतुम्हारे बड़े से बड़े अरबपति—तुम्हारे राकफेलरतुम्हारे मार्गनतुम्हारे फोर्ड—सोचते हों कि बुद्ध से उनके पास बड़ा जीवन—स्तर हैमहावीर नग्न खड़े हैंइसलिए क्या उनका जीवन— स्तर तुमसे नीचा हैउनके पास वस्त्र नहीं हैंआत्मा हैगुणवत्ता हैभगवत्ता है।
डार्विन की बात अगर हम केवल मात्रा को सोचें तो ठीक मालूम होती है। अगर भीतर के गुणों को सोचें तो ठीक नहीं मालूम होती।
यह होमा की कथा मनुष्य की चेतना के निरंतर पतन की कथा है।
इसलिए इस देश में हमने जो विभाजन किया हैवह देखते होचार कालों में समय को बांटा है। पहला कालसतयुग। फिर द्वापर। फिर त्रेता। फिर कलि। श्रेष्ठतम युग पहले। फिर प्रतिक्षण पतन होता जाता है। फिर एक—एक टाग टूटती जाती है। आदमी अपंग होकर गिर पड़ता है कलि में। दोनों हाथदोनों पैरसब टूट गए। इसके पीछे बड़ा गहरा मनोविज्ञान है। इसे तुम एक—एक आदमी की जिंदगी में भी देख सकते हो।
बच्चा पैदा होता हैतब वह सतयुग में होता है। बच्चे के जीवन में श्रद्धा होती हैसरलता होती हैनिर्दोष भाव होता है। सौंदर्य होता है। आह्लाद होता है। आश्चर्यविमुग्ध बच्चा जीता है। छोटे बच्चे को देखोअभी— अभी ताजे पैदा हुए बच्चे को देखो! वह सतयुग में है। सतयुग के लिए तुम्हें दार्शनिक सिद्धातों में जाने की जरूरत नहीं हैछोटे बच्चे को देखोवह सतयुग में है। फिर धीरे— धीरे पतन शुरू होता है। अहंकार पैदा होगा। पतन शुरू हुआ। फिर परिग्रह बढ़ेगा। पतन और शुरू हुआ। और आखिर में तुम एक आदमी को देखोबुढ़ापे मेंवह कलियुग है। सब यंत्रवत हो जाता है। जिंदगी बोझ हो जाती है। बूढ़ा आदमी मशीन की तरह हो जाता है। जीता है किसी तरहसांस लेता किसी तरहअब मरने की तैयारी हैमरने के सिवाय और कोई भविष्य नहीं है।
इसलिए इस देश में हमने कहा है कि कलियुग के बाद प्रलय हो जाएगी। मृत्यु! कलियुग के बाद फिर कोई और समय नहीं बचतामृत्यु ही बचती है। यह आदमी के सामान्य प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की कहानी है। और जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की कहानी हैवही मनुष्य जाति की भी कहानी है।
होमापक्षी गिरना शुरू होता है ऊंचाई सेपरमात्मा के घर से। पहले अंडे में छिपा होता है। फिर अंडा भी टूट जाता है—गिरते—गिरते—गिरते। फिर पंख भी निकल आते हैं—गिरते—गिरते—गिरते। फिर आंख भी खुल जाती है—गिरते—गिरते। और जब आंख खुलती है तब उसे समझ में आता है कि क्या हो रहा है! जब तक आंख नहीं खुली थीतब तक शायद वह सपना देखता हो कि मैं ऊंचाइयों पर जा रहा हूं, विकास हो रहा है। कि मैं अपनी मां को कितना पीछे छोड़ आया! हर बच्चा ऐसा ही सोचता है कि मैं अपने मां—बाप को कितना पीछे छोड़ आया!
पश्चिम के बहुत हंसोड़ लेखक मार्क टवेन ने लिखा है कि मैं जब सत्रह साल का था और विश्वविद्यालय से पहली दफा घर आयातो मुझे लगा—अरेमेरे माता—पिता कितने गंवार हैं! फिर जब मैं चौबीस वर्ष का हो गया और विश्वविद्यालय से सारी शिक्षाएं पूरी कर के लौटातब मैं बड़ा चकित हुआ कि इन सात—आठ सालों में मेरे मां—बाप ने बड़ा विकास कर लियाये बड़े बुद्धिमान हो गए। जैसे—जैसे समझ बढ़ी वैसे—वैसे माता—पिता में बुद्धिमत्ता दिखाई पड़ी। जितनी समझ कम थीउतने माता—पिता बुद्ध मालूम होते थे। जवानी में हर युवक सोचता है कि मां—बाप मेरे मूढ़ हैं।
क्यों
सोचता है मैं विकास कर रहा हूं। मैं आगे जा रहा हूं। मेरे मां—बाप को पता क्या हैये अभी भी पुराने ढर्रे के लोग अभी भी पुरानी रूढ़ि में चल रहे हैं और जी रहे हैं। इन्हें कुछ पता नहीं है। जिंदगी कहां से कहां चली गईइन्हें कुछ पता नहीं है। जवानी में हर आदमी क्रांतिकारी होता है और सोचता है कि मैं जिंदगी को बड़े आगे ले जा रहा हूं। वह सिर्फ जवानी का भ्रम है। पक्षी जब तक उसकी आंखें बंद हैं यही सोचता होगा कि मैं आगे बढ़ता जा रहा हूं कितना आगे बढ़ता जा रहा हूं! कितना दूर निकल आयामां बाप को कितने पीछे छोड़ आया! बेचारी मांवहीं के वहीं हैं। जब आंख खुलती हैतब उसे पता चलता है कि मैं दूर तो निकल आया लेकिन आगे नहीं निकल आया हूं। दूर निकल आना अनिवार्यरूप से आगे निकल जाना नहीं है। दूर निकल जाना गिरना भी हो सकता हैउठना भी हो सकता है। और उठना तो आंख खुलने के बाद ही संभव है। क्योंकि आंख खुली हो तभी पंखों का सदुपयोग हो सकता है।
तुम हो होमापक्षी! प्रत्येक व्यक्ति होमापक्षी है।
वेदों में दो शब्द बड़े बहुमूल्य हैं—होमा और सोमा। दोनों समझने जैसे हैं। दोनों प्रतीक हैं। शायद दोनों का जन्म एक ही शब्द से हुआ होगा। क्योंकि कुछ लोग स को ह उच्चारण करते हैं। तो होमा और सोमा हो सकता है एक ही शब्द से आए हों,सिर्फ उच्चारण— भेद हो गया है। इस स और ह के कारण ही तो हिंदुस्तान का नाम पड़ा। जब आर्य भारत में आकर बसे तो उनका ही एक हिस्सा ईरान में बसा। उनका एक कबीला ईरान में बसा। ईरान का पुराना नाम है—आयरान। आयरान से ही ईरान बना। आर्यों का एक कबीला ईरान में बस गया और एक कबीला भारत में आकर बस गया। भारत का पुराना नाम है— आर्यावर्त्त। और ईरान का पुराना नाम है— आयरान। ईरान में जो आर्य बसेवे स का उच्चारण ह की तरह करते थे। इसलिए जब उन्होंने पहली दफा भारत की यात्राएं कीं— अपने मित्रों से मिलने आए होंगेअपने सगे—संबंधियों से मिलने आए होंगे—तो सिंधु नदी को उन्होंने हिंदू नदी कहा। उसी से हिंदू शब्द पैदा हुआ। उसी से हिंदुस्तान शब्द पैदा हुआ। और उसी से इंडिया शब्द पैदा हुआ। उन्होंने इसको हिंदू कहा और जब इसे वे वापिस ले गए और उनके द्वारा यह शब्द जाकर पश्चिम की तरफ यात्रा पर निकला,तो कुछ जातिया थींजो ह का उच्चारण इ की तरह करती हैंतो उन्होंने हिंदू को इंदु उच्चारण करना शुरू किया। इंदु से इंड़स। इसलिए अंग्रेजी में सिंधु नदी का नाम है—इंड़स। और फिर इंड़स से इंडिया। भारत का नाम इंडिया हो गया। ये सारी बात पैदा हुई सिर्फ इसी बात से कि कुछ लोग ह की तरह उच्चारण करते थे स का।
होमा और सोमा एक ही शब्द होंगेसिर्फ उच्चारण भेद हो गया है। सोमा का अर्थ होता है—वह परम मादक द्रव्यजिसे पीकर आदमी सदा के लिए मस्त हो जाता है। वह आखिरी शराबजिसे पी लेने पर फिर नशा नहीं उतरता। 
वेदों में सोमा की बड़ी प्रशंसा है। और यह मान कर कि सोमा नाम की कोई जड़ी—बूटी होती होगी—जैसे भंग और गाजा होता है—क्योंकि नशे की बात हैन मालूम कितने लोग सोमा की तलाश करते रहे हैं सदियों से।
अभी भी तलाश जारी है। अभी पश्चिम के एक बहुत बड़े वैज्ञानिक ने कोई बीस वर्ष हिमालय में तलाश करके किताब लिखी—बड़ी किताब लिखी कि मैंने खोज ली वह जड़ी—बूटी। वह जड़ी—बूटी है ही नहींखोजोगे कैसेसोमा तो सिर्फ प्रतीक है,जैसे होमा एक प्रतीक है।
अब तुम होमापक्षी को खोजने मत निकल जाना! नहीं तो कहीं नहीं मिलेगा। यह बात हो ही नहीं सकती कि इतनी ऊंचाई पर मा अंडा दे। ऊंचाई पर रहेगी कैसेघोंसला कहां बनाएगीअंडे को रखेगी कहांइतनी ऊंचाई तो कोई भी नहीं है जहां से अंडा गिरे और गिरते ही गिरतेगिरते ही गिरते पक्षी निकल आएऔर गिरते ही गिरतेगिरते ही गिरते पंख निकल आएंऔर गिरते ही गिरतेगिरते ही गिरते आंखें खुल जाएंऐसी तो कोई ऊंचाई नहीं है। यह प्रतीक कथा है। सोमा भी कोई जड़ी—बूटी नहीं हैवह परमात्मा को पी जाने का नाम है। वह परम औषधि को पी जाने का नाम है। ये प्रतीक हैं। जब कोई व्यक्ति सोमरस पी लेता है—सोमरस यानी प्रभु—रसरसों वै सः—जब प्रभु के रस को कोई पी लेता हैतो फिर जो मस्ती आती हैवह कभी टूटती नहीं। यहां तो जितने भी रस उपलब्ध हैं सबकी मस्ती टूट ही जाती है। क्षणभंगुर है। अभी हैअभी समाप्त हो जाएगी।
कीमती से कीमती शराब भी कितनी देर काम आएगीथोड़ी देर विस्मरण हो जाता हैफिर सब वही जाल शुरू हो जाता है। मगर भक्ति का एक ऐसा रस हैएक ऐसी मधुशाला हैजहा अगर तुमने पी लियातो बस पी लिया। उसको पीते ही तुम मिट जाते हों—विस्मरण नहीं होतेमिट ही जाते होगल ही जाते होखो ही जाते हो।
सोमा प्रतीक है परम रस का। और होमा प्रतीक है उस परम गृह काउस मातृगृह काउस मातृभूमि का जहां से हम आए हैं। हम बड़ी ऊंचाइयों से आ रहे हैं। हम अगम्य ऊंचाइयों से आ रहे हैं। हमारे तथाकथित गौरीशंकर इत्यादि कुछ भी नहीं हैंबच्चों के खिलौने हैंजिन ऊंचाइयों से हम आ रहे हैं। हम परमात्मा से आ रहे हैं। कोई अभी अंडे में ही है। जो अंडे में ही है,उसे धर्म शब्द अर्थहीन मालूम होता है। उसे हैरानी होती है लोग जब धर्म चर्चा के लिए जाते हैंया सत्संग के लिए जाते हैंवह कहता है—क्या करते होमैं सिनेमा जा रहा हूं चलो वहा! वहा कुछ रस हैकुछ आनंदतुम जाते कहां होधर्म में रखा क्या हैअभी वह अंडे में है। जो अंडे में हैउसे अंडे के बाहर क्या है यह पता नहीं हो सकता। अभी वह कहता है— धन कमाओ,राजनीति में उतरोचुनाव लड़ोंपद—प्रतिष्ठा बनाओइसमें कुछ सार है। यह तुम किस धुन में पड़ गए होतुम गलत रास्ते पर जा रहे हो। जिंदगी में कुछ कर जाओकुछ निशान छोड़ जाओहस्ताक्षर छोड़ जाओ। कि तुम्हारी लते याद करेंइतिहास में तुम्हारी याद रह जाए। यह धर्म इत्यादि में लग कर तो तुम खो जाओगे। और धर्म इत्यादि सब झूठ हैं।
मार्क्स ने कहा है कि धर्म अफीम का नशा है। मार्क्स अंडे में ही रहा होगा। जो अंडे में हैअगर उससे तुम आकाश की बात करोगेचांद—तारों की बात करोगेवह कहेगा—पागल हो तुमसपने देख रहे हो। तुम कोई नशे में हो। कहां का आकाश?मुझे तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता। जो मुझे नहीं दिखाई पड़तावह हो कैसे सकता हैइस दुनिया में अधिक लोग अंडे में हैं। अभी अंडा भी नहीं टूटावे गिरते ही जा रहे हैं गिरते ही जा रहे हैं। कुछ लोग अंडे में ही रह कर मर जाते हैं।
अंडा भी तभी टूट सकता है जब तुम थोड़े पंख फड़फड़ाओ। तुम जरा भीतर से चोंच मारो! तुम अंडे से राजी मत हो जाओ! तुम अपनी सुरक्षा से राजी मत हो जाओ! तुम थोड़े—से अभियान करोथोड़ी खोजबीन करोथोड़ी जिज्ञासा करो— अथातो भक्ति जिज्ञासा! अंडा टूटेगामगर तुम कुछ भीतर से करोगे तो टूटेगा। बाहर तो कोई तोड़ नहीं सकता। बाहर से यह अंडा तोड़ा नहीं जा सकताइसकी कुंजी भीतर से ही तोड़ी जा सकती है। बाहर से तो कोई तोड़ेगा तो और कठिन हो जाता हैक्योंकि तुम भीतर से रक्षा करने लगते हो। तुम आत्मरक्षा में लग जाते हो। तुम भयभीत हो जाते हो। तुम्हीं साहस जुटाओगे तो अंडा टूटेगा। 
कुछ का अंडा टूट जाता हैमगर उनकी आंखें नहीं खुलतीं। फिर वे बंद आंखों से गिरना शुरू हो जाते हैं। ऐसे लोग धर्म के संबंध में विचार तो करते हैंलेकिन धर्म का आचरण नहीं करते। सोचते हैं। कहते हैंधर्म अच्छी बात हैईश्वर इत्यादि की सैद्धातिक चर्चा करते हैंगीता इत्यादि पढ़ते हैंकुरान पढ़ते हैंशब्द कंठस्थ कर लेते हैंलेकिन उनके जीवन में कोई रंग नहीं होता। जीवन को नहीं रंगते। बातचीत ही होता है धर्म। बकवास होता है धर्म। बहुत लोग ऐसे ही बकवास करते समाप्त हो जाते हैं।
बहुत थोड़े से सौभग़यशाली लोग हैं जो आंख खोलने की चेष्टा में संलग्न होते हैं। भजन से खुलती है आंख। भजन की ऊर्जा में ही आंख के खुलते की संभावना—या ध्यान से खुलती है आंख। एक ही बात को कहने के दो ढंग। ध्यान से या भजन से आंख खुलती है। भजन के संबंध में मत सोचते रहोभजन करो। धर्म तुम्हारा कृत्य हो तो आंख खुलेगी। और आंख खुलते ही क्रांति घट जाती है। आंख खुलते ही दिखाई पड़ता है—तुम गिर रहे हो। रोज—रोज गिरते जा रहे हो। हम सब मृत्यु के मुंह में गिरते जा रहे हैं। वही है जमीन से टकराकर टूट जाना।
देखते नहीं कितने लोग टूटकर गिर गए हैं और अपनी कब्रों में पड़े हैंतुम भी कितनी देर चलोगेजल्दी ही टकरा जाओगेटूटोगे और कब्र में समा जाओगे। कोई भी खो गई घडी वापस नहीं मिलती। जो समय गयागया। आंख खुलते ही दिखाई पड़ता है कि बहुत मैं गंवा चुका हूं। अब और गंवाने की जरूरत नहीं। तत्सण दिशा रूपातरित हो जाती है।
पंख तो तुम्हारे पास ही हैंआंख न हो तो अपने पंख भी नहीं दिखाई पड़ते। आंख न हो तो मैं कितनी संपदा लेकर पैदा हुआ हूं यह भी दिखाई नहीं पड़ता। आंख न हो तो पता ही नहीं चलता कि मेरे भीतर हीरे—जवाहरातों की खदानें हैं। प्रभु का राज्य मेरे भीतर है। परमात्मा ने पूरा पाथेय देकर भेजा है। मगर आंख तो चाहिए ही चाहिए। कहते रहते हैं बुद्ध और क्राइस्ट और कृष्ण कि परमात्मा का राज्य तुम्हारे भीतर हैतुम सुन भी लेते हो फिर अपनी दुकान पर बैठ जाते हो। सुन लेते हो और अनसुना कर देते हो। क्राइस्ट ने बहुत बार अपने शिष्यों से  कहा है कि अगर आंखें हों तो देख लोमैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं। कान हों तो सुन लो मैं चिल्ला रहा हूं। जिनसे कहा थाउनके पास तुम जैसी ही आंखें थींतुम जैसे ही कान थे। अंधों से बात नहीं कर रहे थे। लेकिन साधारण आदमी अंधा ही तो हैबहरा ही तो हैलंगड़ा ही तो है। सोचता ही हैकरता नहीं। और कृत्य से जीवन रूपांतरित होता है।
कुछ लोग सौभाग्यशाली हैंजिनकी आंख खुलती है। बस आंख खुलने का क्षण संन्यास का क्षण है। फिर उसके बाद रूपांतरण हो जाता है। विलोम शुरू हुआवापसी की यात्रा शुरू हुई। बेटा बाप की तरफ वापिस लौटने लगा। जो अदम प्रभु के राज्य से निष्कासित हो गया थावह फिर प्रभु की तलाश में चल पड़ा। अपने घर की खोज।
इस होमापक्षी की कथा को कथा मान कर तुम पढ़ लोगे तो चूक जाओगे इसका रस। इसमें पूरी प्रक्रिया छिपी हुई है।
चंचला के बाहु का अभिसार बादल जानते हों,
किंतु वज़ाघात केवल प्राण मेरेपंख मेरे।
कब किसी से भी कहा मैंने कि उसके रूप—मधु की
एक नन्ही बूंद से भी आंख अपनी सार आया,
कब किसी से भी कहा मैंने कि उसके पंथरज का
एक लघु कण भी उठाकर शीश पर मैंने चढ़ाया,
कम नहीं जाना अगर जाना कि इसका देखने को
स्वप्न भी क्या मूल्य पड़ता है चुकाना जिंदगी को,
चंचला के बाहु का अभिसार बादल जानते हों,
किंतु वज़ाघात केवल प्राण मेरेपंख मेरे।
जब भरे—भूरे घनों के बीच में दामिनी दमकती
तब अचानक एक बिजली दौड़ जाती है परों में,
धन्यभागी हैं वेबिजली की चमक जब आकाश में गज जाती है तो जिनके पर फडूफडा उठते हैं। बुद्ध में और कृष्ण में और क्राइस्ट में हुआ क्याबिजली चमकी। जिनमें थोड़ा भी प्राण थाजो थोडे भी जीवंत थेउनके पंख फडूफडा गए। जो मुर्दा थेउनको कुछ भी न हुआ। वे जैसे थे वैसे ही बैठे रहे।
जब भरे—भूरे घनों के बीच में दामिनी दमकती
तब अचानक एक बिजली दौड़ जाती है परों में,
और जब नभ है गरजता इस तरह लगता कि कोई
दुर्निवार पुकारता अधिकारआज्ञा के स्वरों में,
पुकारे तुम गये हो बहुत बारपुकारे तुम जा रहे हो,
पुकारे तुम अभी जा रहे होमैं तुम्हें पुकार रहा हूं लेकिन तुम सिकुडे बैठे हो। तुम अपना छोटा—मोटा संसार बना लिये हो। तुम उसी संसार में जकडे बैठे हो। तुमने दो कौडी की चीजें इकट्ठी कर ली हैंउनको संपदा मान ली हैवहीं अटके होऔर गिर रहे हो रोज और गिर रहे हो हर पलऔर जल्दी ही टकराओगे श्रइम से और चूर—चूर हो जाओगे।
और जब नभ है गरजता इस तरह लगता कि कोई
दुर्निवार पुकारता अधिकारआशा के स्वरों में,
कब धरा छुटीहवा में कब उठापैठा गगन में,
धंस गया कितनाकिधर कोकुछ नहीं मालूम होता,
मैं स्वयं खिंचता कि मुझको खींचता आकाश,
इससे सर्वथा अनजान बेकल प्राण मेरे,
पंख मेरे चंचला के बाहु का अभिसार बादल जानते हों,
किंतु वज़ाघात केवल प्राण मेरेपंख मेरे।
सुनते हो?
और जब नभ में गरजता इस तरह लगता कि कोई
दुर्निवार पुकारता अधिकारआज्ञा के स्वरों में
जब भी सत्य उतरता है तो दुर्निवार आज्ञा के स्वरों में उतरता है। बुद्धों के वचन अधिकार पूर्ण वचन हैं। दार्शनिक के वचनों में झिझक होती है। दार्शनिक कहते हैं—शायद ऐसा हो! बुद्धपुरुष कहते हैं—ऐसा है! मैं रहा प्रमाण। और तुम चलोआओ मेरे साथ और तुम भी बन जाओगे प्रमाण। दार्शनिक कहता हैमैं सोचता हूं अनुमान करता हूं शायद ऐसा होशायद ईश्वर हो,होना चाहिएहोगा ही। दार्शनिक जीवन को नहीं बदल पाता। दार्शनिकों में और द्रष्टाओं में यही फर्क है। दार्शनिक अंधे आदमी की तरह है रोशनी के संबंध में वक्तव्य दे रहा है। जो कह रहा है कि होनी चाहिए। इतने लोग कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। रोशनी जरूर होनी चाहिएबिना रोशनी के कैसे जीवन होगाअनुमान लगाता हैतर्क करता हैविचार करता हैशास्त्र उल्लेख करता है।
द्रष्टा में क्या फर्क हैजिसने रोशनी देखी। बुद्धपुरुष और उनके वक्तव्य अधिकार के वक्तव्य होते हैं। वहा झिझक नहीं होती। वहा जैसा है उसको वैसा ही कहा जाता है।
जब भरे—भूरे घनों के बीच में दामिनी दमकती
तब अचानक एक बिजली दौड़ जाती है परों में,
और जब नभ है गरजता इस तरह लगता कि कोई
दुर्निवार पुकारता अधिकारआशा के स्वरों में,
कब धरा छूटीहवा में कब उठापैठा गगन में,
धंस गया कितनाकिधर कोकुछ नहीं मालूम होता,
और तब जिनके पास थोड़ा भी साहस हैथोड़ी भी आत्मा हैजिनके भीतर सब मर ही नहीं गया हैसब सड़ ही नहीं गया हैवे उठ चल पड़ते हैं। वे पंख फैला देते हैं। वे अज्ञात की यात्रा पर निकल जाते हैं।
कब धरा छूटीहवा में कब उठापैठा गगन में
धंस गया कितनाकिधर कोकुछ नहीं मालूम होता
एक दुर्निवार आकांक्षा का जन्म होता है। एक अभीप्सा पैदा होती हैजिस पर सब दाव लगा देने का मन हो जाता है। 
मैं स्वयं खिंचता कि मुझको खींचता आकाश,
और तब यह भी पता नहीं चलता कि मैं खिंच रहा हूं आकाश की तरह कि आकाश मुझे खींच रहा है। इतनी तल्लीनता होती है उस खिंचाव मेंइतना एकात्मा होता हैकि तय करना मुश्किल हो जाता है। जो मेरे पास आकर सच में ही संन्यास की यात्रा पर निकल गये हैंउनको तय करना निश्चित हो मुश्किल है कि उन्होंने संन्यास लिया हैया मैंने उन्हें संन्यास दिया है।
कब धरा छूटीहवा कब उठापैठा गगन में
धंस गया कितनाकिधर कोकुछ नहीं मालूम होता,
मैं स्वयं खिंचता कि मुझको खींचता आकाश,
इससे सर्वथा अनजान बेकल प्राण मेरेपंख मेरे।
इसका कुछ पता नहीं चलता मगर यात्रा शुरू हो जाती। यहां ऐसे लोग हैं जिनको सब पता है और यात्रा नहीं करते। और यहां ऐसे लोग हैं जिन्हें कुछ पता नहीं और यात्रा कर लेते हैं। जो यात्रा कर लेंगेवे ही वस्तुत: जानेंगे। जो अपनी सड़ी—गली सूचनाओं कोउधार और बासी सूचनाओं को लिए बैठे रहेंगेवे कितना ही बड़ा पाडित्य इकट्ठा कर लेंउनका पाडित्य उनके अज्ञान को छिपाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।
मैं स्वयं खिंचता कि मुझको खींचता आकाश,
इससे सर्वथा अनजान बेकल प्राण मेरेपंख मेरे।
चंचला के बाहु का अभिसार बादल जानते हों
किंतु वज़ाघात केवल प्राण मेरेपंख मेरे।
जीवन का आघातवज़ाघात अनुभव करो! खोलो आंख! अगर अपने अंडे में बंद हो अब तक सुरक्षा केतो तोड़ो अपने अंडे कोखोलो आंखदेखो अपने पंख! तुम्हारा पंख ही आकाश का प्रमाण है। पंख है तो आकाश जरूर होगा। और पंख हैं तो ऊंचाइयां जरूर होंगीनहीं तो पंख होते किसलिएपंख होते कैसेइस जगत में कुछ भी अकारण नहीं है! तुम्हारे भीतर अगर ईश्वर को खोजने की आकांक्षा  है तो ईश्वर होना ही चाहिए। नहीं तो आकांक्षा न होती। पंख ही न होते अगर आकाश न होता। कैसे पंख होतेकिसलिए पंख होतेकहां से पंख होतेउनका प्रयोजन क्या होतानिष्प्रयोजन तो कुछ नहीं है। तुम्हारा पंख इस बात का प्रमाण है कि आकाश हैऊंचाइयां हैंजो जाननी हैं। और जिन्हें बिना जाने कोई तृप्ति नहीं हो सकती।
बनो होमापक्षी! और तुम होमापक्षी बनो तो एक दिन सोमा का पान होगा। तुम होमापक्षी बनो तो एक दिन सोमरस तुम्हारे कंठ से उतरेगा। तुम उस परमात्मा को पी सकोगे। उसे बिना पीए तृप्ति नहीं। इस जगत का जल कितना ही पीओफिर—फिर प्यास लग आती है। उस जगत का एक बूंद भी कंठ से उतर जाएतो प्यास सदा को समाप्त हो जाती है।


दूसरा प्रश्न :


भंते! सात जुलाई उन्नीस सौ सतहत्तर को दिन की दुपहरी में पहली बार पता लगा कि बिना आंखों के भी देखा जा सकता है। आंखें बंद थींहोश में थापूरी विश्रांति में थादेखा कि एकाएक अदभुत प्रकाश ही प्रकाश है चारों ओर उस प्रकाश में पीठ के पीछे चीजें भी दिखायी दे रही थीं। उस समय न ही मैंने तर्क उठाया कि यह क्या हो रहा हैजो हो रहा उसका मैं सिर्फ साक्षी था। क्या कैवल्य में साक्षी भी प्रकाश के साथ समाहित हो जाता है?


पूछा है शुभकरण पुगलिया ने। 
शुभ हुआशुभकरण! सत्य हुआ। और यह जो भावयह जो प्रश्न मन में उठा कि क्या कैवल्य में साक्षी भी प्रकाश के साथ समाहित हो जाता हैयह बहुमूल्य है। उस अंतिम घड़ी में द्वैत नहीं रह जाता। कौन साक्षीकिसका साक्षीउस अंतिम घड़ी में भक्त और भगवान नहीं रह जाता। कौन भक्तकौन भगवानकौन दृश्यकौन द्रष्टावहा एक ही बचता है। न दृश्य रह जाता हैन द्रष्टा रह जाता हैसिर्फ दर्शन रह जाता है। न ताता रह जातान ज्ञेय रह जातासिर्फ ज्ञान—ऊर्जा रह जाती। प्रकाश मात्र ही रह जाता हैसाक्षी नहीं बचता।
जब तक साक्षी हैतब तक कितना ही गहरा अनुभव होअंतिम अनुभव नहीं हुआ। जब तक तुम देखनेवाले मौजूद नहीं हो। तब तुम जो देख रहे होवह तुमसे अलग हैतुमसे भिन्न है। वह आत्म— अनुभव नहीं है। तुम द्र ष्टा हो और तुम्हारे पास कोई चीज घट रही है। फिर वह कितनी ही सूक्ष्म हो! एक मोमबत्ती जल रही है तुम्हारे कमरे मेंउसकी रोशनी तुम देखे रहे हो,यह साधारणस्थूल रोशनी है। फिर तुम्हारे भीतर कोई दिया जल उठा—बिन बाती बिन तेलन तेल है न बाती है लेकिन दिया जल उठालेकिन तुम देखनेवाले अभी भी होतो बहुत भेद नहीं है। पहला दिया स्थूल थादूसरा दिया सूक्ष्म है। पहला दिया शरीर के बाहर थादूसरा दिया शरीर के भीतर हैलेकिन अभी भी तुम इससे अलग खड़े हो। क्योंकि तुम द्रष्टा हो। तुम देख रहे हो कि रोशनी है। रोशनी दिखायी पड़ रही है।
स्मरण रखनाआध्यात्मिक अनुभव अनुभव जैसा होता ही नहीं। इसलिए सभी अनुभव या तो शारीरिक होते हैंया मानसिक होते हैं। यह बहुत गहरा मानसिक अनुभव हुआ। प्यारा अनुभव हुआमगर उस पर रुक नहीं जाना है। पहुंचना तो वहा है जहा अनुभव और अनुभोक्ता एक हो जाएंजहा दृश्य और द्रष्टा और एक हो जाएं। उस आखिरी घड़ी को ही कैवल्य कहा है। कैवल्य का अर्थ ही यही होता है—केवल एक बचाकेवल बचा।
प्यारा शब्द हैजैनों काकैवल्य। वह एक ही सूचना देता है। मात्र एक बचा। शुद्ध एक बचा। वहा फिर कोई अनुभव नहीं रह जाते। इसलिए अंतिम अनुभव अनुभव जैसा नहीं होता है।
और बिना आंखों के देखा जा सकता है। क्योंकि आंखों से देखा ही क्या हैआंखों से किसने कब क्या देखा हैये चमड़े की आंखें देखने की भ्रांति भर देती हैं। इनसे काम चल जाता है बाहर के जगत मेंतुम एक दूसरे से टकराते नहीं होरास्ते से गुजर कर अपने घर आ जाते होदीवाल से नहीं निकलते होदरवाजे से निकल जाते होऐसा इनका उपयोग हैलेकिन और क्या दिखायी पड़ता हैऊपर की टकराहट बच जाती हैभीतर की टकराहट तो नहीं बचती इन आंखों से। ऊपर से तुम देखकर निकल जाते होभाईयहां एक आदमी खड़ा हैइससे बचकर निकल जाएं लेकिन भीतरभीतर तो आदमी— आदमी में टकराहट चलती है। महत्वाकाक्षागला घोंट टकराहट चलती है। पत्नी—पति सेबाप—बेटे सेभाई— भाई सेटकराहट चल रही है। भीतर की आंख आती है तो यह टकराहट भी चली जाती है। टकराहट ही नहीं बचती। कोई वैमनस्य नहीं बचताकोई वैर नहीं बचता। प्रेम ही प्रेम शेष रह जाता है।
और अभी इस आंख से तुम्हें दूसरे थोड़े— बहुत दिखायी पड़ जाते हैंथोड़े—बहुत हीक्योंकि उनका भी वास्तविक अंग दिखायी नहीं पड़ता। तुम्हें जब कोई आदमी दिखायी पड़ता है तो उसकी देह ही दिखाई पड़ती हैउसकी आत्मा दिखायी नहीं पड़ती। वही उसका असली अंग है। देह तो ऊपर की खोल है। जैसे किसी ने किताब का कवर भर देखा होकिताब के भीतर क्या है कुछ दिखायी नहीं पड़ता। असली चीज तो किताब के भीतर हैकवर में तो नहीं। कवर कैसा ही प्यारा हो तो भी असली चीज तो किताब के भीतर है। विषय—वस्तु तो भीतर है। देह तो केवल ढक्कन है। आवरण है। आत्मा तो भीतर है। वह तो इन आंखों से दिखायी नहीं पड़ती। अपनी ही आत्मा नहीं दिखायी पड़ती इन आंखों सेतो दूसरे की तो कैसे दिखायी पड़ेगी। इसलिए सम्यक—दृष्टिठीक आंख आत्म— अनुभव का नाम है। जब तुम्हें भीतर स्वयं का भाव समझ में आ जाए कि मैं कौन हूं उस भाव के साथ तुम्हें औरों के भीतर भी दिखायी पड़ने लगेगा कि वे भी कौन हैं। और तब तुम पाओगे कि एक ही फैला हुआ है। कैवल्य का विस्तार है।
दूसरा प्रश्न पूछा है शुभकरण पुंगलिया ने ही— 
पंद्रह वर्षों से आपके चरण स्पर्श करने की उत्कट इच्छा है। और अभी मैं आपके पास हूं। मैंने आपके चरण स्पर्श के लिए मा शीला से प्रार्थना भी की। मा शीला ने कहा कि भाव उठेगा तो भगवान से मिलवा दूंगी। हे भंते! मा शीला के मन में भाव उठा दीजिए न! ताकि मेरा अंतराय—कर्म टूटे और आपके चरणों में गिरकर समुदघात चैतन्य का समस्त अस्तित्व में फैलाव कर सकूं।

शीला में भाव उठाने से कुछ भी न होगा! और शीला का मतलब भी यही था। उसका मतलब यह नहीं था कि शीला में जब भाव उठेगातबउसका मतलब यही था कि जब तुममें भाव उठेगातब। तुम्हारे भीतर इच्छा तो है पैर छूने कीभाव अभी नहीं उठा है। इच्छा और भाव में बड़ा फर्क है। भाव का अर्थ होगा कि तुम सच में ही झुकने को तैयार हो गए। लेकिन तुमने अभी संन्यास भी नहीं लिया है। भाव तो नहीं उठा हैइच्छा हैएक वासना है। और बाहर के चरण छूकर होगा भी क्याजब तक कि तुम्हारे भीतर झुक जाने की ऐसी भाव दशा न आ जाए कि समर्पित हो जाऊंतब तक असली समर्पणअसली झुकाव नहीं घटा। शीला का मतलब वही था। शीला बडी रहस्यवादी है। उसने ठीक बात कही कि जब भाव उठेगा?
उसने इतना ही कहा कि तुम्हारी इच्छा तो हैजाहिर हैपंद्रह साल से तुम कहते हो तो झूठ न कहते होओगेठीक ही कहते होलेकिन भावभाव बडी और बात है। भाव का मतलब है कि अब ऊपर ही ऊपर से क्या झुकनाऊपर के चरण क्या छूनेअब भीतर से ही एकता बना लें। संन्यास का और क्या अर्थ होता हैइतना ही अर्थ। और अब तो तुम्हारे जीवन में थोडे भीतर के अनुभव भी लगने लगे। अब तो संन्यास की घडी आ गई। पंद्रह वर्ष बाहर के चरण छूने का ही विचार करते रहेक्या पंद्रह जन्म भीतर के चरण छूने का विचार करोगे?
ऐसा समय मत गवाओ।
बहारे—जा फजा जाकर चमन से फिर भी आती है
घटा काली बरस कर एक दफा फिर भी तो छाती है
सितारे दिन को बुझ जाते हैं फिर शब को चमकते हैं
फलक पर रात भर शोखी से हंस—हंसकर दमकते हैं
सफक की झील में खुर्शीद शब को डूब जाता है
दरे कसरे उफक से झाक कर फिर मुस्कुराते हैं
अगर मुरझा गए हैं फूल और गुंचे तो क्या परवा,
खिजां के बाद ही ये फूल और गुंचे फिर भी महकेंगें
बाहर आते ही तायर डालियों पे फिर भी चहकेंगें
अगर तारीक रात आती है ऐ हमदम तो आने दे
अगर जंगल की नदी खुश्क होती है तो हो जाए
कभी तो चांदनी रात आकर यह जुल्मत मिटाएगी  
यह नदी के फिर सुरीले और शीरीं गीत गाएगी
निशा गुजरी हुई घडियों का लेकिन फिर नहीं मिलता
कमल मुरझा के दिल का एक दफे फिर से नहीं खिलता।
इतना खयाल रखोसब लौट आता हैसब वापिस आ जाता हैनिशा गुजरी हुई घड़ियों का लेकिन फिर नहीं मिलता,लेकिन जो समय बीत गयाफिर उसका निशान भी नहीं मिलता। तुम यहां होतुम इतने से ही राजी हो जाओगे कि मेरे चरण छू के चले जाओइतने से हल हो जाएगाइतने से हल होता है तो शीला को मैं कहे देता हूं कि शुभकरण को आज भेज देना। इतने से क्या होगाऔर जब मैं तुम्हें सब देने को राजी हूं तब तुम इतना सा लेने को क्योंमैं कृपण देने में नहीं हूं तुम लेने में कृपण हो रहे हो! हद हो गई कंजूसी की भी!
निशा गुजरी हुई घड़ियों का लेकिन फिर नहीं मिलता।
कल की कौन जानेमैं होऊंतुम न होओतुम होओमैं न होऊंहम दोनों हों और फिर मिलना न हो सके।
चीन की एक बड़ी पुरानी कथा है। एक वजीर को सम्राट ने फांसी की सजा दे दी। नाराज हो गया थाकुछ बात ऐसी हो गई। ऐसे वजीर से प्रेम भी बहुत थालेकिन राजा तो राजा थे। जरा—सी बात हो गई और इतना नाराज हो गया कि नाराजगी में कह दिया कि फासी लगा दो। सात दिन बाद फासी लग जाए। लेकिन नियम था उस राज्य का कि फासी के एक दिन पहले सम्राट जिस को भी फासी होती थी उससे मिलने जाता था। फिर यह तो उसका वजीर था। तो वह गया मिलने।
वजीर बहादुर आदमी थाअनेक युद्धों में लड़ा थाछाती पर बड़े घाव थे उसके। कभी उसकी आंख में आंसू नहीं देखा गया था। राजा को देखते ही उसकी आंख से आंसू झर—झर गिरने लगे। राजा ने कहा— आश्चर्य! क्या तुम मृत्यु से ड़र गए हो?मैं तुम्हें जन्म भर से जानता हूं र तुम जैसा हिम्मतवर आदमी इस राज्य में दूसरा नहींतुम्हें मैंने कभी रोते नहीं देखातुम रो क्यों रहे होबात क्या हैतुम कहो मुझसेबात क्या हैउसने कहा—कुछ भी बात नहींअब कहने से कुछ सार नहीं। अब जो हो गया हो गया। लेकिन मैं मौत के कारण नहीं रो रहा हूं र मैं तुम्हारे घोड़े के कारण रो रहा हूं। वह जो घोड़ा सम्राट चढ़कर आया है। बाहर बौध दिया हैसींखचों से दिखाई पड़ रहा है। सम्राट ने कहा—घोड़े के कारणघोड़े के कारण क्यों रोओगे तुम?पहेली मत बूझोमुझे बात सीधी—सीधी कहो। वजीर ने कहा—अब आप नहीं मानते तो कहे देता हूं। मैंने जिंदगी भर एक कला सीखीबड़ी मेहनत से कला सीखी कि मैं घोड़े को आकाश में उड़ना सिखा सकता हूं। मगर एक खास जाति के घोड़े को ही वह उड़ना सिखाया जा सकता हैऔर वह घोड़ा मुझे न मिला सो न मिला। आज जब कि मरने का दिन आ गयायह घोड़ा सामने खड़ा है! आप जिस घोड़े पर बैठ कर आए हैंइसकी मैं तलाश में जिंदगी भर से था। इस जाति का घोड़ा उड़ना सीख सकता है। सम्राट को तो आकांक्षा  जगी कि अगर घोड़ा उड़ना सीख जाए! तो उन दिनों तो घोड़ा सबसे बड़ी ताकत थीऔर अगर घोड़ा उड़ता होतब तो कहना क्यातो यह सम्राट का साम्राज्य सारे जगत में फैल जाएगा। उसने कहातू फिकिर मत करकितना समय लगेग घोड़े को उड़ना सीखने मेंवजीर ने कहा—एक साल लगेग। सम्राट ने कहा—तों एक साल के लिए तुझे हम जेल से बाहर निकाल लेते हैं। अगर घोड़ा उड़ना सीख गया तो आधा राज्य भी तुझे दूंगा और अपनी बेटी से विवाह भी कर दूंगा। और अगर घोड़ा उड़ना नहीं सीखातो ठीक हैअभी सूली लगती हैसाल भर बाद लग जाएगी।
वजीर तो उस घोड़े पर बैठकर अपने घर लौट आया। घर तो पत्नी रो रही थीबच्चे रो रहे थेमां रो रही थीबाप रो रहा थाकि आखिरी दिन आ गया और अभी तक कुछ आसार नहीं है क्षमा के। बेटे को लौटा देखकर बाप तो समझ ही नहीं सका। पत्नी तो एकदम दीवानी हो गई खुशी में। सबने घेर लिया कि कैसे बचेक्या हुआवह हंसा और उसने कहा कि ऐसे बचाये घटना घटी। पत्नी और जोर से रोने लगीमां और छाती पीटने लगीउसने कहा—तुमने यह क्या कियाहमें सब पता है कि तुम्हें कुछ पता नहींतुम उड़ना कुछ सिखा नहीं सकते घोड़े को। तुमने कब सीखाकहां सीखाइसकी तुमने कभी बात ही नहीं की। उस वजीर ने कहा—मैं कुछ जानता नहीं घोड़ा उड़ने इत्यादि के संबंध मेंयह तो एक कहानी गढ़ी है। उन्होंने कहा अब मुझे यह और मुसीबत में डाल दिया। ये सात दिन हमारे इतने कष्ट से कटे हैंअब यह साल और कष्ट से कटेगा। इससे तो बेहतर था तुम मर ही जाते। हमें लटका दिया फांसी पर साल भर के लिए और। और अगर मांगा ही था तो कम से कम दस साल तो मांगते। उस वजीर ने कहा—पागल हो गए हो! एक साल का क्या भरोसाराजा मर सकता हैमैं मर सकता हूं, और कम से कम घोड़ा तो मर ही सकता है। एक साल का भरोसा क्या हैकुछ भी हो सकता है। फिकिर न करो!
और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसा हुआ कि तीनों ही मर गए। राजा भी मर गयावजीर भी मर गयाघोड़ा भी मर गया।
निशा गुजरी हुई घड़ियों का लेकिन फिर नहीं मिलता
तुम्हारे भीतर फूल खिलने शुरू हुए हैं। अवसर मत चूको! झुकने की आकांक्षा है तो झुक ही जाओ! फिर झुके तो उठना क्यासंन्यास का इतना ही तो अर्थ हैझुके तो झुकेफिर उठना क्याफिर लाख अड़चनें होंफिर लाख झंझटें आएंफिर लाख बदनामी होलाख लोग पागल समझें! बस शुभकरण को वही अड़चन होगीकलकत्ता में रहते हैंवहा लोग पागल समझेंगे। फिकिर क्या हैयही कलकत्ते के लोग कल परसों तुम्हें अर्थी सजाकर मरघट पहुंचा आएंगे। इनकी चिंता क्या हैइनके पागल समझने से हर्ज क्या है?
शुभकरण जैन मालूम होते हैंउनकी भाषा से। जैनों से ड़र रहे होंगे। मुनिसाधु इत्यादि पीछा करेंगे कि यह तुम्हें क्या हो गयास्वीकार कर लेना कि भ्रष्ट हो गएपागल हो गएअब करें क्याकुछ पता नहीं।
जब भरे— भूरे घनों के बीच में दामिनी दमकती
तब अचानक एक बिजली दौड़ जाती है परों में,
और जब नभ है गरजता इस तरह लगता कि कोई
दुर्निवार पुकारता अधिकारआशा के स्वरों में
मैं तुम्हें पुकार रहा हूं—दुर्निवार अधिकारआज्ञा के स्वरों में। 
कब धरा छूटीहवा में कब उठापैठा गगन में
धंस गया कितनाकिधर कोकुछ नहीं मालूम होता,
मैं स्वयं खिंचता कि मुझको खींचता आकाश,
इससे सर्वथा अनजान बेकल प्राण मेरेपंख मेरे।
चंचला के बाहु का अभिसार बादल जानते हों
किंतु वज़ाघात केवल प्राण मेरेपंख मेरे।
कह देनापागल हो गया हूं। कह देनामैं क्या करूंमैं खिंचा कि आकाश ने खींचाक्या हुआकुछ पता नहीं। कह देनामैं करता क्याबिजली ऐसी चमकी कि मेरे पंख फड़केकि उड़े बिना नहीं रहा जा सका। लोगों के मंतव्यों के कारण लोग रुके हैं। लोगों का मूल्य क्याउनके मंतव्यों का मूल्य क्याउनके मंतव्यों से तुम्हें मिलेगा क्याउनके मंतव्यों से किसको कब कुछ मिला हैसाहस करो! शीला को तो मैं भाव उठा देता हूं मगर उससे कुछ भी न होगातुम्हीं भाव उठाओ! समय आ गया। ठीक घड़ी हैउसे चूको मत।
कभी तो बीच से उठेगा शर्म का पर्दा
कभी तो उनकी मेरी बेतकुल्लुफी होगी 
घड़ी आ गई। बेतकल्लुफी हो सकती है। मेरा निमंत्रण। पर्दा उठ सकता है। लेकिन पर्दा मैंने नहीं डाला है। न पर्दा शीला ने डाला है। पर्दा तुम्हीं डाले हो। तुम्हीं उठाओगे तो उठेगा।
मैंने सुना हैएक नाटककार के परिश्रम से लिखे गए अनेक नाटक मंच पर असफल हो गए। वह बहुत चिंतित रहने लगा। एक दिन उसने अपनी प्रेमिका से कहा कि मैं आत्महत्या की सोचता हूं। अब जीने में कुछ सार नहीं। मैंने जितने नाटक लिखेजितने नाटक रचेसब असफल हो गए। मेरी असफलता बड़ी गहरी है। मैं बिलकुल विजड़ित हो गया हूं मैं टूट गया हूं। उसकी प्रेमिका ने कहा— आशा न छोड़ो! अब तुम नाटक लिखना बंद करोहम तुम दोनों मंच पर नाटक खेलेंगे। कैसेनाटककार ने पूछा! उसकी प्रेमिका ने कहा—पहले दृश्य में मैं गीत गाऊंगीफिर पर्दा उठेगा। फिरनाटककार ने पूछादूसरे दृश्य में मैं नृत्य करूंगी। फिरनाटककार ने पूछाउसने कहा—फिरफिर पर्दा उठेगा! औरतीसरे दृश्य मेंतब नाटककार ने पूछाऔर तू ही तू ही दृश्य दिखा रही हैऔर मैं क्या करूंगातो उसकी प्रेयसी ने कहा—आप क्या समझते हैं पर्दा अपने— आप उठ जाएगा?तुम पर्दा उठाना!
पर्दा अपने— आप नहीं उठतायह तो सच है। मगर शीला के उठाए भी न उठेगाशुभकरण! तुम्हीं को उठाना पड़ेगा,तुम्हीं ने डाला है।
मैं तो तैयार हूं कि पर्दा उठे। और तुम्हारी आत्मा भी भीतर तैयार हो गई हैऔर तुम्हारी आकांक्षा  भी जगी हैलेकिन तुम कुछ भयभीत होकुछ संकोच से भरे हों—कुछ छोटे—मोटे ड़र। जाने दो अब उन छोटे—मोटे ड़रो  को। इस जगत में कुछ भी चिंता योग्य नहीं है। जहां सभी खो जाना हैवहा क्या चिंता!

तीसरा प्रश्न :


हांनाम तो धर चुकी मुहब्बत तेरी
बदनाम तो कर चुकी मुहब्बत तेरी 
कहते हैं जो लोग हम समझते भी नहीं
अब हद से गुजर चुकी मुहब्बत तेरी 


पूछा है स्वामी शिरीष भारती ने।
अभी हद से गुजरी नहीं होगी! अभी थोड़ी— थोड़ी कमी होगी। अन्यथा पूछने को कौन बचताकहने को कौन बचताऐसी घड़ी आती है जरूर जब हद से मुहब्बत गुजर जाती है। तब तो पता ही नहीं चलता। पता करने वाला ही डूब जाता है। तुम प्रेम में तो होलेकिन कुछ—कुछ. अपने को बचा रहे होओगे। अपने को समझा भी रहे होओगे कि प्रेम अब हद से आगे गुजर गया।
प्रेम बड़ी अनूठी घटना है। इस जगत में प्रेम सबसे बड़ा पशलपन है। मगर सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता भी। प्रेम बड़ा विरोधाभास है। प्रेम की बड़ी पीड़ा भी है और बड़ा आनंद भी। पीड़ा है कि अहंकार को मरना पड़ता है। और आनंद हैक्योंकि निर— अहंकार में ही आनंद अवतरित होता है। फिर जिसको हमने अब तक प्रेम समझा है इस दुनिया मेंवह तो क्षणभंगुर का प्रेम होता है। वह तो जैसे प्याली में तूफान। जो प्रेम मैं तुम्हें सिखा रहा हूं र वह क्षणभंगुर का प्रेम नहीं हैवह शाश्वत का प्रेम है। उसकी कहां हद हैतुम अपनी हद से गुजर जाओगेमगर उस प्रेम की कहां हद हैवह प्रेम बेहद है। अनहद उसका नाम है। उसकी कोई सीमा नहीं है। जिस प्रेम की सीमा होती हैवह प्रेम सासारिक। जिस प्रेम की कोई सीमा नहीं होतीवही प्रेम आध्यात्मिक।
मगरतुम्हारी अड़चनें मैं समझता हूं। तुमने इन पंक्तियों में अपनी अड़चन की तरफ ही इशारा किया है।
आखिर हमें कहना ही पड़ा हाले—दिल अपना
अच्छे हैं वही लोग जो उल्फत नहीं करते
तुमने निवेदन किया है कुछ इन पंक्तियों में। पीड़ा तो है प्रेम की। बड़ी पीड़ा तो यही है कि तुम मिटते जाते हो। तुम धीरे—धीरे गलते जाते हो। तुम मेरे पास आते हो तब तुम्हें यह पता भी नहीं होता। तुम तो मेरे पास आते हो और सबल होने कोतुम तो मेरे पास आते हो अपने अहंकार को और भर लेने को। कि थोड़ा ज्ञान बढ़ेथोड़ा ध्यान बढ़ेसंसार में तो थोड़ा कब्जा है हीथोड़ा परलोक में भी कब्जा हो जाए। थोड़ा पुण्य बढ़े। यहां तो सब ठीक—ठाक जमा लिया हैस्वर्ग में भी इंतजाम कर लूं—जाने के पहले तैयारी कर लूं—आरक्षण करवा लूं।
इधर तो जीत की काफी पताकाएं फहरा दी हैंअब वहा स्वर्ग में भी बड़ा झंडा गड़ा दूं। तुम आते इस तरह की आकांक्षाओं से। और मैं धीरे— धीरे तुम्हारे झंडे गिराने लगता हूं। और मैं धीरे— धीरे तुम्हारी धारणाओं को बदलने लगता हूं। एक बार तुम मेरे प्रेम में पड़ गए तो फिर धीरे— धीरे धीरे तुम राजी होते जाते हो। एक दिन तुम्हारा सारा अहंकार खो जाता है। मगर अहंकार बिना जद्दो—जहद के नहीं जाता। बड़ी पीड़ा देता है।
लेकिन अगर प्रेम लग गया तो जाना ही पड़ता है चाहे कितना ही लड़े। उसकी हार फिर सुनिश्चित है। प्रेम का एक छोटा सा बीज भी अहंकार के पहाड़ को मिटा देने को काफी है। प्रेम की एक छोटी बूंद भी अहंकार के समुद्रों को हरा देने के लिए पर्याप्त है।
आह वह बात कि जिस बात पे दिल दे बैठे
याद करने पर भी आती नहीं याद मुझे
ऐसा भी हो जाएगा एक दिन कि जब अहंकार बिलकुल चला जाएगाये पहाड़ टूट जाएगातब तुम्हें याद भी न आएगा कि कौन—सी बूंद गिरी थीकौन—सी बूंद इस पहाड़ को गला गईकिस बात पर दिल दे बैठे थेशायद उसका पता भी न चले,वह इतनी सूक्ष्म रही होइतनी छोटी रही हो।
पीडा उठती होगी अहंकार के गलने से। और पीडा उठती होगी लोग चारों तरफ तुम्हारे संबंध में न मालूम क्या—क्या कहने लगे होंगेहंसना उनकी बातों परक्योंकि सच पूछो तो वे ही पागल हैं। वे क्षुद्र के साथ प्रेम किए बैठे हैं। आज नहीं कल जब नींद टुटेगीबहुत पछताके। तुमने विराट से दोस्ती बांधी। आज तुम कितने ही पागल लगते होआखिर में तुम्हीं विजेता सिद्ध होओगे। अंततः विजय तुम्हारी है। सत्यमेव जयते। छोटी—मोटी जीते झूठ भी कर लेता हैलेकिन आखिरी विजय सत्य की है। भय मत करना।
तू रह न सकी फूलों में ऐ फूल की खुशबू
कांटो में रहे और परेशान न हुए हम
प्रेम के कांटे चुभेंगेपीडा भी देंगे,
मगर भयभीत मत होनाघबड़ाना मत।
तू रह न सकी फूलों में ऐ फूल की खुशबू
कांटो में रहे और परेशान न हुए हम
परेशान मत होना। ये काटे जो अभी काटो जैसे लग रहे हैंयही फूलों में रूपांतरित हो जाते हैं। जीवन की बडी अपूर्व कीमिया है। बडी रहस्यपूर्ण रसायन है। यहां दुख सुख हो जाते हैं। यहां नर्क स्वर्ग हो जाते हैं। यहां मृत्यु महाजीवन का द्वार बन जाती है।
और कठिनाइयां बढेगीतुम्हारा प्रेम जैसे—जैसे लगेगा परमात्मा की तरफजैसे—जैसे तुम उस रस में विभोर होओगेवैसे—वैसे तुम संसार में बहुत अर्थों में बेकाम होने लगोगे। तुम्हारा रस वहा कम होगा। दौडूधूप कम हो जाएगी। यह बिलकुल स्वाभाविक है। जितने से काम चल जाएउतने से तृप्ति हो जाएगी। दूसरों को लगेगातुम हार गए। दूसरों को लगेगातुमने पराजय स्वीकार कर ली। दूसरों को लगेगातुम उदास हो गए। दूसरों की कही गई बातों पर बहुत ध्यान मत देना। तुम तो अपने भीतर देखनाऔर देखना कि क्या तुम हार गए होया जीत अब शुरू हुई
मुहब्बत में वही है काम का दिल
जिसे नाकाम समझा जा रहा है
यहां जगत में जो नाकाम होता जाता हैवही परमात्मा में सफल होता है।
और यह कोई साधारण प्रेम नहीं है। साधारण प्रेम भी बडी पीडाएं देता हैतो असाधारण प्रेम तो असाधारण पीडाएं देगा। लेकिन साधारण प्रेम के सुख भी साधारण हैंअसाधारण प्रेम के सुख भी असाधारण हैं।
प्रेम का राग न गाना पगले
प्रेम नगर मत जाना पगले
राह यह है पुरखारपगले
प्रेम बड़ा आजार
 कंटकाकीर्ण रास्ता है प्रेम का।
और प्रेम बड़ा दुखदाई है।
प्रेम का राग न गाना पगले
प्रेम नगर मत जाना पगले
राह यह है पुरखारपगले
प्रेम बड़ा आजार
प्रेम में रोना ही होता है
जीवन खोना ही होता है
जीत हो कि हारपगले
प्रेम बड़ा आजार
इस संसार में प्रीति नहीं है
कोई किसी का मीत नहीं है
झूठा जग का प्यारपगले
प्रेम बड़ा आजार
तू ही बता क्या पाया आखिर
प्रीति किए पछताया आखिर
अब रोना बेकार,
पगले प्रेम बड़ा आजार
इस जगत का प्रेमसाधारण प्रेम भी बड़ा पीडादायी है। सुख की तो थोड़ी—सी झलक हैकहींकभी। एक सुगंध आती और खो जाती। दुर्गंध ज्यादा है। एक अंश में कभी कहीं कोई आनंद का भाव उठता हैनिन्यानबे प्रतिशत तो अंधेरा ही अंधेरा है। एक किरण कभी फूटती है। मगर उस एक किरण के लिए लोग कितना दुख झेल लेते हैं!
मैं तुम्हें जिस प्रेम की तरफ ले जा रहा हूं वहा शत—प्रतिशत प्रकाश की संभावना हैसौ प्रतिशत किरणें तुम पर बरसेंगी। स्वभावत: बहुत निखरना होगाबहुत जलना होगाबहुत आग से गुजरना होगा। हिम्मत चाहिएपागल की हिम्मत चाहिए। हिम्मत चाहिएजुआरी की हिम्मत चाहिए।
लेकिनयह आधी बात हैकि प्रेम दुख हैकि प्रेम पीडा है। प्रेम आनंद भी हैप्रेम मस्ती भी है। वह दूसरा हिस्सा है प्रेम का। और जितनी बडी पीडा उतने ही बड़े आनंद की संभावना है। पीडा ही पीडा का हिसाब रखोगे तो जल्दी ही घबड़ा जाओगेआनंद का भी हिसाब रखना।
आगाजे—मुहब्बत में वह इक सुबह खरामां
आंखों में समेटे हुए सौ रंग के तूफां
अब तक है तसब्यूर में वह बेदार नजार
वह मस्त समा अब भी आंखों में है रक्‍सां
दुजदीदा निगाहों में वोह दुजदीदा तबस्सुम 
वोह बर्क मुजस्सिम कभी पिन्हा कभी उरियां
अंगड़ाई—सी लेकर हुई बेदार मुहब्बत
जज्वात की मस्ती हुई खुशाँद—गुलिस्तां
खूब फूल खिल रहे हैं। नजर काटो पर ही मत अटका लेना। काटो की ही गिनती मत करते रहना। और ध्यान रखना,हजार काटो में भी एक फूल खिलेतो एक फूल की कीमत हजार काटो की पीडा से बहुत ज्यादा है! फिर मैं तुमसे कहता हूं—हजारों फूल खिल रहे हैं। इसलिए नकारात्मक दृष्टि को छोडो। कुछ लोग ऐसे हैं जो नकार को ही गिनती करते रहते हैं। वे रास्ते के कंकड़—पत्थर गिनते रहते हैं। और रास्ते पर जो आनंद की वर्षा होती है, उसकी उन्हें चिंता ही नहीं है। वे क्षुद्र अड़चनों का हिसाब—किताब रखते हैं और विराट का प्रसाद बरसता हैउसको ऐसे स्वीकार कर लेते हैं जैसे वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार था।
इस भ्रांति से बचना। तो जल्दी ही तुम्हें साफ हो जाएगा कि मुहब्बत एक तरफ से मारती हैदूसरी तरफ से जिलाती है। एक तरफ से मिटाती हैदूसरी तरफ से बनाती है। अहंकार को गला देती हैऔर आत्मा को जन्मा देती है।
मृत्‍यु जैसा है प्रेम। और जन्म जैसा भी। सूली पर चढ़ना हैऔर सिंहासन पर विराजमान होना भी। सिंहासन को मृत्यु जैसा देखोसूली को तो सीढ़ी बनाओ। सूली सीढ़ी है सिंहासन की। और मृत्यु द्वार है नये जन्म का!

चौथा प्रश्न :


भगवानआपने यह क्या गोलमाल कर दिया हैरविवार के प्रश्नोत्तर में आपने मेरे प्रश्न के उत्तर में कहा कि पूरे रंग जाओ। उसके एक दिन पहले मैं संन्यास में दीक्षित हुआ था। प्रार्थना है कि अब रंग चढ़ा दें!


पूछा है स्वामी कृष्ण वेदात ने।
संन्यास रंगे जाने की शुरुआत हैअंत नहीं। कपड़ों को रंगने से शुरू करते हैंक्योंकि उसकी भी हिम्मत नहीं रह गई है लोगों मेंफिर देह को लोगेफिर मन को लोगेफिर आत्मा को रंगौ। जैसे—जैसे तुम्हारी हिम्मत बढ़ती जाएगीवैसे—वैसे रंग फैलता जाएगा। रंगरेज के हाथ में पड़ गए हो। घबड़ाओ मत। कपड़े से तो सिर्फ शुरुआत है। उंगली पकड़ में आ गई है तो पहुंचा बहुत दूर नहीं है। एक बार तुमने इशारा दे दिया कि मैं रंगे जाने को तैयार हूं— और तुमने तो शायद इसलिए दिया हो इशारा कि कपड़े ही तो रंगने हैंऔर क्या होना है—मगर तुम्हारी तरफ से इशारा क्या मिल जाता है मुझे कि रंगने के लिए तुम तैयार हो,फिर तो मैं तुमसे दुबारा नहीं पूछता! फिर तो मैं रंगता ही चला जाता हूं।
फिर यह लंबी यात्रा है। बहुत डुबकियां देनी होंगी तुम्हें रंग की गागर में। डुबकी पर डुबकिया देनी होंगी। क्योंकि  जन्मों—जन्मों से तुम्हारे रंग उड़ गए हैं। तुम्हें परमात्मा की कोई याद ही नहीं रही है। तुम कहां छोड़ दिए हो परमात्मा को तुम्हें स्मरण भी नहीं है। डुबकी पर डुबकियाबार—बार चोट पर चोटहर तरह से तुम्हें जगाने का उपाय— ध्यान सेभक्ति सेप्रेम सेभजन सेगीत सेनृत्य सेशब्द सेशून्य सेशास्त्र सेसत्संग सेहर तरह के उपाय किए जा रहे हैं। परेशान न होओ। रंगने की अंतिम घड़ी भी करीब आ जाएगी। तुमने पहले की हिम्मत की हैतो तुम आखिरी के अधिकारी भी हो गए।
तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में जो मैंने कहा कि पूरे रंग जाओकपड़े का रंग जाना पूरा रंग जाना तो नहीं है। कपड़े के रंगे जाने से तो सिर्फ तुम्हारी तरफ से एक भावभंगिमा सूचित हुई कि मैं तैयार हूं। फिर तुम्हारी आत्मा को एकदम रंगा जाए तो शायद तुम झेल भी न पाओ। झेलने की क्षमता धीरे— धीरे विकसित होती है। एकदम से आकाश टूट पड़ेतो तुम शायद दब ही जाओ। आहिस्ता— आहिस्ता। शनै:— शनै:। तुम्हारी हिम्मत बढ़ती जाती है और प्रसाद बढ़ता जाता है। क्रमिक। जल्दबाजी कुछ आवश्यक भी नहीं है। और पूरा रंगनातो उसका अर्थ होता है—सिद्ध हो जाना। जब रंगने को कुछ न बचा तो उसका अर्थ हुआ कि तुम परमात्मा हो गए। लंबी यात्रा है। लेकिन ध्यान रखनालाओत्सू का प्रसिद्ध वचन है कि हजारों मील की यात्रा एक—एक कदम चल कर पूरी हो जाती है। और दो कदम तो कोई भी एक साथ नहीं चल सकताएक कदम ही एक बार में चलना पड़ता। और हजारों मील की यात्रा एक—एक कदम चलकर पूरी हो जाती है।
तो कृष्ण वेदाततुमने पहला कदम उठा लिया। अगर तुम मुझसे पूछो तो मैं पहले कदम को आधी यात्रा कहता हूं। सबसे कठिन पहला कदम है। फिर दूसरा कदम तो सहज होता हैक्योंकि वह भी पहले जैसा होता है। फिर तीसरा भी सहज होता हैक्योंकि वह भी पहले जैसा होता है। एक कदम उठा लिया तो कला आ गई। अब तुम रंगरेज के हाथ में पड़ ही गए हो,पूरे रंग दिए जाओगे।
गोलमाल इसलिए हुआ कि तुमने अपने संन्यास का नाम नहीं लिखा था प्रश्न में। तो दो ही कारण हो सकते थे। एक कारण तो हो सकता था कि तुमने प्रश्न संन्यास लेने के पहले लिखा हो। तो प्रश्न गैर—संन्यासी मन से उठा थाइसलिए मुझे कहना पड़ा कि रंगों। प्रश्न गैर—संन्यासी मन से उठा थाइसलिए मुझे कहना पड़ा कि संन्यासी बनो। या दूसरी संभावना यह है कि तुमने प्रश्न तो संन्यास लेने के बाद ही लिखा होलेकिन पुरानी आदतवश पुराना नाम लिख गए हो। तो भी जरूरी है कि तुम्हें याद दिलाया जाएकि पुराने को अब छोड़ोनहीं तो रंग में बाधा पड़ेगी। अब पुराने को जाने दोअब पुराने को विदा,अलविदा। अब पुराने से नाता तोड़ लो।
नए नाम का यही तो अर्थ है कि तुम्हारा नया जन्म हो। अतीत तुम जिए हो तीस सालचालीस सालपचास साल,उसकी बड़ी धूल जम गई है। एक खंड़हर पड़ा है पचास साल का। कुछ लोग तो उसी खंड़हर में सुधार करते रहते हैं—रिनोवेशन करते रहते हैं। वे उसी में इधर—उधर सहारे लगाते रहते हैंइंटे चुनते रहते हैंकहीं पलस्तर गिर गया है तो पलस्तर कर दिया,कहीं रंग उड़ गया है तो रंग कर दियाकहीं छप्पर टूट गया है तो छप्पर नया बिठा दिया। उसी पुराने में सारा करते रहते हैं। मगर पुराना पुराना हैखंड़हर खंड़हर है। मैं खंड़हरों के पुनरुद्धार में विश्वास नहीं करता। मैं कहता हूं गिरा दो जमीन तकहटा दो इसे बिलकुलनया ही बना लेंगे।
और पुराने में छोटे—छोटे फर्क करते रहो तो कभी हो नहीं पाते फर्कक्योंकि पुराने की ताकत बड़ी होती है। सौ चीजें पुरानीउसमें तुम एक नई डाल देते होवे निन्यानबे पुरानी उस एक को भी पुरानी कर लेती हैं। उनका बल ज्यादा होता है। इसलिए उचित यही है कि पुराना अध्याय बंद! इसलिए नया नाम देता हूं ताकि तुम संन्यास के क्षण से सोचने लगो कि यह तुम्हारा जन्म हुआ। बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को कहा था—संन्यास के बाद अपनी उस संन्यास के दिन में गिनना। वह ठीक बात थी। एक     दिन बहुत मजा हो गया। एक बूढ़ा संन्यासी बुद्ध के चरणों में सिर झुकाने आया—कोई होगा सत्तर साल का आदमी। और बुद्ध अक्सर पूछते थे कि हे भिक्षुतेरी उस कितनी हैसम्राट प्रसेनजित बुद्ध से मिलने आया थावह उनके पास ही बैठा हुआ था। जब बुद्ध ने उस भिक्षु से पूछाहे भिक्षु तेरी उस कितनी हैतो उसने कहा—चार वर्ष। प्रसेनजित तो बड़ा चौंका। सत्तर साल— अस्सी साल का बूढ़ाकह रहा है—चार वर्ष! कहीं मेरे सुनने में भूल तो नहीं हो गईउसने बुद्ध को फिर कहा कि जरा फिर से पूछिएमैं जरा सुनने में चूक गयायह कितना कह रहा हैबुद्ध ने कहायह कहता है—चार वर्ष। और आप इसमें कोई प्रश्न नहीं उठा रहे हैंप्रसेनजित ने कहायह चार वर्ष कह रहा है! यह कम से कम सत्तर का तो है ही। अस्सी का भी हो सकता है।
बुद्ध हैसेउन्होंने कहा—तुम्हें पता नहींहम इस तरह ही गणना करते हैं। यह चार वर्ष पहले संन्यासी हुआ। उसके पहले जो छियासठ वर्ष जीयाउनकी क्या गिनती है! वे तो सपने में गएउनको क्या गिनना हैसपने के कृत्यों का तुम हिसाब तो नहीं रखते हो। कोई तुमसे पूछे कि तुम्हारे पास कितना धन हैतो तुम उतना ही बताते हो जितना जागने में तुम्हारे पास है। तुम उसमें वह नहीं जोड़ते जो तुम सपनों में भी होते हो। सपने में तुम्हारे पास करोड़ों होते हैं। और तुम यह नहीं कहते कि भाईजागने में तो बस ये सौ रुपए हैंमगर सपने में करोड़ भी होते हैंतो सौ धन करोड़। सपने का धन तुम नहीं जोड़ते।
क्यों नहीं जोड़ते?
सपने का धन धन ही नहीं है। मूर्च्छा का धन धन ही नहीं है। मूर्च्छा का जीवन भी जीवन नहीं है।
जाने दो अतीत को। और मैं जानता हूं कि आदत आदत हैछूटते—छूटते ही छूटती है। जाते—जाते ही जाती है। देर लगती है। अचानक कोई तुमसे तुम्हारा नाम पूछेगा संन्यास के बादतुम्हें फिर पुराना नाम याद आ जाएगा। कुछ दिन तक आता रहेगा। संन्यास के बाद भी कोई पूछेगा—तुम्हारी जातितुम्हारा धर्मतुम्हें फिर पुराना याद आ जाएगाकि मैं जैन हूं र कि मैं हिंदू हूं कि मैं बौद्ध हूं। भूलते— भूलते भूलेगा। इसलिए भी कहा कि पूरे रंग जाओसंन्यस्त हो जाओ।
संन्यास लेने से ही संन्यास नहीं हो जाता है। कोई संन्यास लेकर भी संन्यास से वंचित रह सकता हैसंन्यास को अगर ऐसे ही औपचारिकता के ढंग से ले लिया हो। कुछ लोग ले लेते हैंमैं बड़ा चकित हूं विशेषकर भारतीय। झूठा संन्यास ले लेते हैं! विदेश से आनेवाले लोग झूठा नहीं लेते हैं। उसका कारण है। उन्हें संन्यास का कुछ पता ही नहीं है। समझते हैंसमझने की चेष्टा करते हैंसोचते—विचारते हैंपूछते हैं कि संन्यास क्या हैक्यों लेनाक्या होगाविचार करतेमंथन करते। लेकिन भारतीय को तो पता ही है कि संन्यास अच्छी चीज है। और उस अच्छे संन्यास में कुछ थोड़े काटे थेवे भी मैंने अलग कर दिए हैं। न घर छोड़ना हैन द्वार छोड़ना हैन पत्नीन बच्चा। तो मन कहता हैफिर संन्यासी होने का मजा भी क्यों न ले लिया जाएकुछ खोना भी नहीं है और संन्यास भी मिलता होइतनी सुगमता से मिलता हो तो ले ही लो।
तो एक तो भारतीय मन को पता है कि संन्यास क्या हैसंन्यास की महिमा पता है। और फिर मैंने संन्यास के बीच की सारी बाधाएं अलग कर दी हैंतो सोचता है लेने में हर्ज क्या हैले लेता है।
याकिन्हीं और कारणों से भी ले लेता है। ऐसे अक्सर मौके आ जाते हैं। कोई संन्यास लेकरमैं पूछता हूं उससे कि ध्यान करोवह कहता है कि ध्यान तो अभी मैं क्या करूंअसली में इसलिए मैंने संन्यास लिया है कि मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती। मैंने सोचा कि आपसे जुड़ जाऊंतो शायद तबियत ठीक हो जाए। इसलिए संन्यास लिया है। सब इलाज करवा चुका। तो संन्यास एक इलाज है! सोचा कि अब सब करवा चुकाअब यह आखिरी भी करके देख लेना चाहिए।
एक महिला एक बच्चे को लेकर आ गई। वह बच्चा आ ही नहीं रहा हैवह उसको घसीट रही हैकि इसको संन्यास दे दें! इसका दिमाग खराब हैऔर हम सब इलाज करवाकर देख लिएअब सोचा कि चलो संन्यास ही दिलवा दें। अब यह तो संन्यास नहीं होगा! यह तो कैसा संन्यास होगाभारतीय मन धर्म के साथ इतने दिन रहा है कि धर्म के साथ भी बेईमानी करने में कुशल हो गया है।
फिर ऐसे भी लोग हैं जो यहां आकर संन्यास ले लेते हैं... एक भाव में आ गएयहां सब गैरिक लोगों को देखकर तरंग आ गईआंसू बहेमग्न हुएसुनासमझा। मगर जब ट्रेन में बैठते हैं वापिसतो घबड़ाहट शुरू होती है कि अब घर वापिस जा रहे हैं! कुछ ऐसे भी हैं जो रास्ते में ही कपड़ा अपना पेटी में छिपा लेते हैं। घर जाकर खबर ही नहीं देते। मुझे पत्र लिखते हैं कि हम बड़े अपराधी हैंलेकिन क्या करेंहिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं कि पत्नी को बता देंकि दफ्तर में बता देंकि लोगों को पता चल जाए कि संन्यासी हो गए हैं। मुझसे लोग संन्यास लेते वक्त पूछते हैं कि अगर माला को भीतर छिपाए रखें तो कुछ हर्ज तो नहीं हैमाला बाहर और भीतर का सवाल नहीं हैमगर भीतर छिपाने का भाव! वहा हर्ज है। किसी को पता न चले। एक सज्जन संन्यास लेकर गएजब वह कोई दो—तीन महीने बाद वापिस आए तो मैंने उनसे पूछागैरिक वस्त्रों का क्या हुआऔर मेरी आंखें खराब नहीं हैं। उन्होंने कहाआप देखते नहींयह गैरिक वस्त्र तो पहने हुए हूं। तब मैंने बहुत गौर से देखातो पता चला—हांसफेद रंग में थोड़ी—सी झलक है! तो कोई खोजे बहुतचश्मा लगाकरतो शायद समझ में आए कि हीथोड़ी—सी झलक है।
ऐसा धोखा चलता!
वे कपड़े बिलकुल सफेद मालूम पड़ रहे हैंथोड़ा—सा रंगएक रत्ती भर रंग बाल्टी भर पानी में डालकर और कपड़े उन्होंने हिला लिए होंगे! जब मैंने बहुत गौर से देखामैंने कहा जरा करीब आओमैं और गौर से देखूं—हालांकि मेरी आंखें खराब नहीं हैं—तब मैंने कहा कि हीमालूम तो होता है। मैं तो समझा कि कपड़े दो—चार दिन से धोए नहीं हैंयात्रा में थोड़ी सफेदी खो गई है।
इसलिए संन्यास ले लेने से ही संन्यास हो गयाऐसा मत मान लेना। शुरुआत हुई। फिर बहुत कुछ करना है। बुनियाद रखी गईफिर भवन उठाना है।

आखिरी प्रश्न :

संसार क्या है?


सोये—सोये देखा गया परमात्मा। मूर्छित अवस्था में देखा गया परमात्मा। मन के माध्यम से देखा गया परमात्मा संसार है। और चूंकि मन क्षणभंगुर हैइसलिए मन में बनते प्रतिबिंब भी क्षणभंगुर होते हैं। तुमने देखारात पूर्णिमा का चांद निकला होझील शांत होतो झील पर पूर्णिमा का चांद बनता हैप्रतिबिंब बनता है। जरा—सी
एक कंकड़ी फेंकनाजरा—सी कंकड़ी और झील कैप गईऔर झील डोल गईऔर लहरें उठ गइतरंगें उठ गई और चांद हजार टुकड़ों में टूट गया। चांद नहीं टूटता है हजार टुकड़ों मेंध्यान रखनासिर्फ लहर में जो प्रतिबिंब बनता था वही टूटता है। झील का बना प्रतिबिंब टूटता है हजार टुकड़ों मेंचांद नहीं टूटता। प्रतिबिंब क्षणभंगुर हैचांद तो क्षणभंगुर नहीं है।
हम मन की झील के द्वारा परमात्मा को देखते हैंतो जो प्रतिबिंब बनता है—और वह प्रतिबिंब क्षणभंगुर होगाक्योंकि मन में हजारों विचार की तरंगें चल रही हैं—इसलिए टूट—टूट जाता हैखंड़—खंड़ हो जाता है। इसलिए संसार में कभी सुख संभव नहीं हैक्योंकि सुख बन भी नहीं पाता और उखड़ जाता है। यहां झील में कंकड़ पड़ते ही जाते हैं। तुम बड़े प्रसन्न जा रहे थे रास्ते परआज बड़े खुश थेसुबह से ही ताजे थेघर में भी कोई झंझट नहीं हुई थीघर से मस्ती से निकले थे और एक आदमी तुम्हारे पास से गुजर गया—उसने कुछ खास नहीं कियासिर्फ नमस्कार नहीं कीरोज नमस्कार करता थाआज नहीं की—बसएक कंकड़ पड़ गया। कंकड़ डाल भी नहीं और पड़ गया। उसने कुछ किया नहींसिर्फ कुछ करता था जो आज उसने नहीं कियामुंह फेर कर निकल गयाबस चिंता पैदा हो गईलहरें उठने लगींबदला लेने का भाव होने लगा कि यह आदमीइसके साथ मैंने कितना भला किया—सारी झील लहरों से पट गई! खो गया सब सुखतरंग भूल गई। जरा—सी बात तुम्हारे मन को डावांडोल कर जाती है।
इसलिए इस मन के द्वारा कभी सुख तो मिल नहीं सकता। सुख तो शाश्वत में है। मन को हटाकर जगत को देख लेते ही परमात्मा मिल जाता है। झील में मत देखो चांद कोझील से आंखें हटाओचांद को ही देखो। परमात्मा और संसार दो नहीं हैंसंसार परमात्मा की ही छाया है। इसलिए उसे माया कहते हैं।
मैं हसीन कलियों से आगोश सजा लूं तो क्या
अपने गमखानों में इक शमअ जला लूं तो क्या
मुस्कुरा लूं भी तो क्या साज बजा लूं तो क्या 
वक्त की तल्सिए—गुफ्तार तो मिटने से रही
ये समय की जो कड़वाहट हैये तो मिटती ही नहीं है।
मैं हसीन कलियों से आगोश सजा लूं तो क्या
मैं अपनी गोदी में फूल ही फूल भर लूं तो भी क्या होगाफूल जल्दी ही कुम्हला जाएंगे।
अपने गमखानों में इक शमअ जला लूं तो क्या
और अपनी दुख से भरी जिंदगी में एक दिया भी जला लूं तो क्यादिया जल्दी ही बुझ जाएगातेल चुक जाएगाबाती मिट जाएगी।
मुस्कुरा लूं भी तो क्या....... 
कितनी देर मुस्कुराओगेमुस्कुराहट आई और गई।  
... साज बजा लूं तो क्या
और कितनी देर वीणा छेड़ोगेगीत उठेंगेसंगीत के स्वर उठेंगे और खो जाएंगे।
वक्त की तल्सिए—गुफ्तार को मिटने से रही
यह जो समय का उपद्रव है— और समय यानी मन। खयाल करनामन के कारण ही समय पैदा हुआ है। जैसे ही मन चला जाता हैसमय चला जाता है। जीसस से उनके एक शिष्य ने पूछा कि तुम्हारे प्रभु के राज्य में सबसे खास बात क्या होगीजीसस ने कहादेयर शैल बी टाइम नो लंणरवहा समय नहीं होगा।
महावीर कहते हैंसमाधि में समय नहीं होगासमयातीतकालातीत। सारे ज्ञानियों ने कहा हैकाल मिट जाता हैसमय मिट जाता है। और जहा काल मिट जाता हैसमय मिट जाता हैवहा मृत्यु भी मिट जाती है। इसलिए तो हमने काल के दोनों अर्थ किए हैं—समय और मृत्यु। दोनों मिट जाते हैं। अमृत का अनुभव हो जाता है।

शाश्वत जहां मिल गया वहा समय भी नहीं रहामृत्यु भी नहीं रही। मिटने वाली कोई चीज ही न रही तो मृत्यु कैसे रहेगीअमिट से मिलन हो गयानित्य से मिलन हो गया।
मैं हसीन कलियों से आगोश सजा लूं तो क्या
अपने गमखानों में इक शमअ जला लूं तो क्या
मुस्कुरा लूं भी तो क्या साज बजा लूं तो क्या 
वक्त की तल्सिए—गुफ्तार तो मिटने से रही
चूम लूं चांद के शक्काक किनारे भी अगर
तोड़ लूं उड़कर यह रंगीन सितारे भी अगर
मोड़ दूं जीस्त के बहते हुए धारे भी अगर
वक्त की तल्सिए—गुफ्तार तो मिटने से रही
पी भी लूं मस्त निगाहों के इशारों से अगर
तल्सिए—जीस्त मिटा भी दूं उठाकर सागर
मजरे—गमको बना भी लूं जो फिरदौसे—नजर
वक्त की तल्सिए—गुफ्तार तो मिटने से रही
यह रविश और यह हालात बदल भी जाएं
यह तसब्यूर यह खयालात बदल भी जाएं
यह शऊर और यह जज्वात बदल भी जाएं
वक्त की तल्सिए—गुफ्तार तो मिटने से रही
घुटके रह जाएगी इक दिन यह सिसकती आवाज
मुंतसिर टूटके हो जाएगा शीराजए—राज
जल्वए—नाज से भर जाएगी आगोशे—नियाज
वक्त की तल्सिए—गुफ्तार तो मिटने से रही
सब छिन्न—भिन्न हो जाएगा। कितना ही गोद भरो फूलों सेसब छिन्न—भिन्न हो जाएगा। कितने ही दिए जलाओसब बुझ जाएंगे। आकाश के तारे भी तोड़ लाओसब व्यर्थ हो जाएगा।
घुट के रह जाएगी इक दिन यह सिसकती आवाज
और कितने ही गीत गाओऔर कितनी ही वीणा बजाओ...
घुटके रह जाएगी इक दिन यह सिसकती आवाज
मुंतसिर टूट के हो जाएगा शीराजए—राज
सब टूट जाएगासब बिखर जाएगा।
जल्वए—नाज से भर जाएगी आगोशे—नियाज
वक्त की तल्सिए—गुफ्तार तो मिटने से रही
कितने ही सुख यहां बना लोसब उजडू जाएंगे। और कितने ही घर यहां बना लोसब गिर जाएंगे। यहां सब रेत पर बनाए हुए घर हैंऔर पानी में चलाई गई कागज की नावें हैं। और समय की तल्सीसमय की कड़वाहटसमय का जहर कायम रहता है।
संसार का अर्थ है—समय। समय अर्थात मन। मन और समय एक ही ऊर्जा के दो नाम हैं। इधर मन गया... तुम जरा देखना! अगर किसी समय में ऐसा हो जाए कि मन में कोई विचार न होंतो उसी के साथ तुम पाओगे—समय भी न रहा। घडी चलती रहेगीतुम्हारे भीतर की घडी ठहर जाएगी। ध्यान में घंटों बीत जाते हैं और पता नहीं चलता कि कितना समय बीत गया। ध्यान में कुछ बीतता ही नहीं। ध्यान में उसका पता चलता है जो सदा है और कभी बीतता नहीं। बीतना सिर्फ मन में होता है।
संसार सत्य की झलक है। और झलक मन की झील में। और मन की झील जरा—से कंकड़ों से डोल जाती है। इसलिए मन के सहारे तुम जो भी बसाओगेटूट जाएगाउखड़ जाएगाबिगड़ जाएगाछिन्न—भिन्न हो जाएगा।
मन से हटो। मन से मुक्त हो जाओ। अ—मन की दशा खोजो। नो माइंड़। उस अ—मन की दशा में मुक्ति हैमोक्ष है,ब्रह्म है। और फिर से तुम्हें दोहरा दूं कि संसार और परमात्मा दो नहीं हैं। एक ही हैं। लेकिन परमात्मा को ही मन के द्वारा देखने से संसार की भ्रांति पैदा होती है। और बिना मन के देखने से सारी भ्रांतिया मिट जाती हैं। सत्य का अनुभव हो जाता है। सत्य का साक्षात्कार हो जाता है।
आज इतना ही।

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