शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

अनहद में बिसराम - प्रवचन-10

दिनांक 20नवम्बरसन् 1980


पहला प्रश्न: भगवानश्री दत्ताबाल आपसे बहुत बुरी तरह जल-भुन गए हैं। लगता है कि उन्हें पहले से ही आपसे व्यक्तिगत रूप से जलन थी। और अब उन्हें विवेकानंद का बहाना मिल गया है। उन्होंने कहा है कि आचार्य रजनीश चरसगांजाभांग खिला-पिला कर लोगों को समाधि दिलाते हैं,जब कि विवेकानंद सिर्फ छूकर ही समाधि दिला देते थे!
उन्होंने और भी निम्न बातें आपके संबंध में कही हैंकृपया प्रकाश डालें।
पहली कि आचार्य रजनीश स्वघोषित भगवान हैं।
दूसरी कि आचार्य रजनीश अज्ञानी हैं।
तीसरी कि आचार्य रजनीश का व्यक्तित्व अत्यंत महत्वहीन है।
चौथी कि आचार्य रजनीश ने हिंदू देवताओं को कामी और भोगी कह कर हिंदू धर्म का अपमान किया है।
पांचवीं कि आचार्य रजनीश की तुलना विवेकानंद से कभी भी नहीं हो सकती है।
छठवीं कि स्वामी विवेकानंद ने अकालग्रस्त लोगों की सहायता के लिए अपना आश्रम बेचने की तैयारी दिखाई थी। क्या आचार्य रजनीश ऐसा कर सकते हैं?
और सातवीं कि श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि अगले जन्म में मैं एक हरिजन की कुटिया की सफाई करूंगा। क्या आचार्य रजनीश भी ऐसा कर सकते हैं?

 वंदना!
श्री दत्ताबाल ने जो भी कहा हैसोचने योग्य है।

पहली तो बातमंगला भारती ने कुछ सूचनाएं श्री दत्ताबाल के संबंध में भेजी हैंउन्हें खयाल में लेना।
पहली कि एक साल पहले कोल्हापुर के महालक्ष्मी के मंदिर में श्री दत्ताबाल और उनके साथियों ने नशे में चूर होकर जब प्रवेश कियातब मंदिर के पुजारी ने उन्हें मूर्ति के करीब जाने से मना किया। लेकिन उन्होंने उस पुजारी की मार-पीट की और झगड़ा भी किया। बात यहां तक बढ़ गई कि पुलिस आई और इन लोगों को पुलिस हिरासत में बंद किया गया।
मंगला ने यह भी लिखा है कि श्री दत्ताबाल मद्यपान ही नहीं करतेमांसाहारी भी हैं। और हिंदू धर्म के अभिमान से इतने भरे हुए हैं कि उनकी इच्छा थी कि स्वयं को विवेकानंद का उत्तराधिकारी सिद्ध करते और हिंदू धर्म की विजय-पताका पृथ्वी पर फहराते। इस हेतु उन्होंने दत्ताबाल मिशन नामक संस्था स्थापित कीलेकिन वहां कोई आता-जाता नहीं! बड़ी ही दयनीय अवस्था हो गई है अब उनकी! पूरे असफल हो गए हैं। अब फिर से अपना नाम प्रकाश में लाने के लिए आपके विवेकानंद के प्रवचन का जैसे उन्हें सहारा मिल गया है। दस-बारह साल से वे आपके प्रतिर् ईष्या से जल रहे हैं। और अब तो वे पूना वालों को भी भड़का रहे हैं। पहलवान होने के कारण वे बुद्धि का जरा भी उपयोग न करते हुए आपके विरोध में बिलकुल ही बचकानी और मूढ़ता भरी बातें करते हैं। आपकी किसी बात का जवाब सप्रमाण देना उनके लिए असंभव सिद्ध हुआ है। इसलिए अब अपनी असलियत पर उतर आए हैं!
मंगला भारती ने यह भी लिखा है कि भगवानउन्हीं के बारे में एक घटना याद आ रही है: दस या बारह साल पहले दत्ताबाल के प्रवचन पूना में हुए थे। सोफा पर बैठ कर वे प्रवचन दे रहे थे। पर शराब के नशे में इस तरह डूबे थे कि उन्हें खुद का भी कोई होश नहीं था। दृश्य बड़ा ही देखने जैसा था! अपनी जगह से वे एक बार बाईं तरफ और एक बार दाईं तरफ इस तरह बार-बार हिल रहे थेऔर चंचलता के कारण हिलना भी इतना जल्दी हो रहा थाकि उनके पाजामे की दो नाड़ियांजो कि नीचे की तरफ लटक रही थींवे भी हिल रही थीं! हमें तो बड़ी हंसी आई थीतब भी और अब भी। क्योंकि जिन्हें खुद का होश नहीं रहतावे आप जैसे बुद्धपुरुष को होश की बातें समझा रहे हैं! अब तो हद हो गई मूढ़ता की भी!

मनुष्य अक्सर दूसरों में वही देख लेता हैजो भीतर छुपाए होता है। मैंने किसे गांजाचरस और भांग पीने को कहा हैजरूर डुबाता हूं किसी नशे मेंमगर वह नशा इस दुनिया का नशा तो नहीं! मस्ती भी चाहता हूं कि छाए लोगों मेंगीत भी उगें,आनंद भी होउत्सव भी। मगर वह सब तो आकाश से उतरने वाली मधुवर्षा है। उसके लिए लोगों को तैयार करता हूं। निश्चित हीयह मधुशाला है। लेकिन मधुशाला उसी अर्थों मेंजिस अर्थ में बुद्ध का संघ मधुशाला थीकृष्ण का सत्संग मधुशाला थी। यहां रिंद ही इकट्ठे हैं! मगर यह शराब बेहोश नहीं करतीहोश में लाती है।

आए हैं समझाने लोग।
हैं कितने दीवाने लोग।

दैरो-हरम में चैन जो मिलता,
क्यों जाते मैखाने लोग।
जान के सब कुछ भी न जाने,
हैं कितने अनजाने लोग।

वक्त पे काम नहीं आते हैं,
ये जाने-पहचाने लोग।

अब जब मुझको होश नहीं है,
आए हैं समझाने लोग।

एक ऐसी भी बेहोशी हैजो बेहोशी भी नहीं। एक ऐसी भी मस्ती हैजो अंगूर की शराब से नहीं मिलतीआत्मा की शराब से मिलती है।
दत्ताबाल को जो भीतर दबा पड़ा हैवह मेरे दर्पण में दिखाई पड़ गया होगा।
और तूने पूछा है वंदना, "कि प्रतीत होता हैवे आपसे व्यक्तिगत रूप से जले-भुने थे।'
स्वभावतःजिनको किसी भी धर्म की मतांधता हैऔर जिन्हें यह भ्रांति है कि वे हिंदू धर्म की पताका सारे जगत में फहराना चाहते हैंउन्हें मुझसे अड़चन तो हो ही जाएगी।
और फिर इतने दीवानों की यहां जमातदुनिया के कोने-कोने से आने वाले खोजियों का यह जमघटयह मेला--न मालूम कितने लोगों की छातियों पर सांप लोट गए हैं! विवेकानंद से क्या लेना-देना है उन्हें।
चार सालपांच साल पहले मुझसे मिलने के लिए व्यक्तिगत रूप से आना चाहते थे। एकांत में मुझसे मिलना था। मैंने खबर भेजी कि मैं तो एकांत में किसी से मिलता नहीं। जैसे सबसे मिलता हूंवैसे आपसे मिल सकता हूं। जरूर आ जाएं। मगर विशिष्टता चाहिएएकांत! उससे उन्हें बड़ी चोट लगी। बहुत भुनभुना गए। तब से उनको अड़चन है।
कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त!
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया।
किसको पड़ी है विवेकानंद से?
कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त!
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया।
मगर आदमी रोता भी हैतो उसके लिए भी आवरण खोजता हैमुखौटे खोजता हैबहाने खोजता है।
क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फितरत छिपी रहे।
नकली चेहरा सामने आए असली सूरत छिपी रहे।
खुद से भी जो खुद को छिपाए क्या उनसे पहचान करें,
क्या उनके दामन से लिपटें क्या उनका अरमान करें,
जिनकी  आधी  नीयत  उभरे  आधी  नीयत  छिपी  रहे।
मुखौटों से भरे हुए लोग! लेकिन धर्म के नाम से यही चलता रहा हैचल रहा है।
और मेरे साथ एक धर्म के पताका फहराने वालों को ही नहींसभी धर्मों की पताका फहराने वालों को अड़चन होगी। क्योंकि मेरा किसी धर्म से कोई लगाव नहींधार्मिकता से प्रेम है। और मेरे हिसाब में तो जो धार्मिक हैवह हिंदू नहीं हो सकतामुसलमान नहीं हो सकताईसाई नहीं हो सकता। धार्मिक होना पर्याप्त है। इस पर कोई विशेषण न लगाए जा सकते हैंन आवश्यक हैं। विशेषण लगाने से तो बात खराब हो जाएगीबात बिगड़ जाएगी। विशेषण तो सीमा दे देते हैं। विशेषण परिधि बना देते हैं। वह जो मुक्त आकाश की तरह हैउसे एक छोटा सा आंगन कर देते हैं।
यहां मेरे पास सारे धर्मों के लोग इकट्ठे हैं। संभवतः मनुष्य-जाति के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। पहली बार एक अभूतपूर्व घटना घट रही है। सारे धर्मों के लोग इकट्ठे हैं। लेकिन उन्होंने अपने विशेषणों को ऐसे हटा कर रख दिया हैजैसे कोई कूड़े-करकट को घर से सुबह साफ करके फेंक देता है। अब तो उनका एक ही धर्म हैध्यान! अब तो उनका एक ही धर्म हैप्रेम! ध्यान अपने लिएप्रेम सबके लिए। ध्यान--अंतर्यात्राप्रेम--बहिर्यात्रा।
बसधर्म के ये दो पहलूये दो चाकऔर धर्म की गाड़ी चल पड़ती हैअनंत यात्रा पर चल पड़ती है। ये दो पंख--प्रेम और ध्यान के--फिर अनंत दूरी भी तय की जा सकती है।
जितनी बातें तूने लिखी हैंउनमें से एक-एक बात का विचार कर लेना उपयोगी है।
पहली तो बातविवेकानंद स्वयं समाधि के अनुभव के बिना मरे। उनकी खुद की डायरी सबूत है। मरने के तीन दिन पहले भी उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है कि मैं अभी तक वह पा नहीं सका जो पाना थाअभी तक वह प्रकाश घटित नहीं हुआ है। रामकृष्ण की बातों को वे दोहराते रहेऔर ढंग से दोहराते रहे। पंडित थे। प्रगाढ़ पंडित थे। मेधावी थे। प्रतिभाशाली थे। लेकिन मेधा और प्रतिभा समाधि नहीं है। न पांडित्य प्रज्ञा है।
लेकिन हिंदू धर्म की अकड़ थी। उसी अकड़ के कारण भारत में विवेकानंद को सम्मान मिला। सम्मान मिलने का और कोई कारण न था। इतना ही कारण था कि हिंदू धर्म का जो आहत अहंकार थाउसको विवेकानंद ने आक्रामक रूप दिया।
अब उनका यह कहना कि जो व्यक्ति हिंदू धर्म के विपरीत कुछ कहेगा उसे समुद्र में उठा कर फेंक दूंगाकोई धार्मिक व्यक्ति की बात नहीं। यह तो अधार्मिक चित्त की बात है। अगर हिंदू धर्म के समर्थन में कुछ कहने की स्वतंत्रता हैतो हिंदू धर्म के विरोध में भी कहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। अन्यथा सत्य की शोध कैसे होगी?
हिंदुओं में सिर्फ दो ही मुसलमान हुएएक दयानंद और एक विवेकानंद! इन दोनों की बुद्धि मुसलमान की थी। इन दोनों में न सहिष्णुता हैन उदारता है। दत्ताबाल ने स्वयं उल्लेख किया है। और इसलिए वे मेरी तुलना विवेकानंद से नहीं कर सकते। मैं भी नहीं करना चाहता। वे करने को राजी भी होंतो मैं इनकार करूंगा।
दत्ताबाल ने लिखा है कि कहां विवेकानंदजिन्होंने कहा कि जो हिंदू धर्म का विरोध करेगा उसको समुद्र में उठा कर फेंक दूंगा! और कहां आचार्य रजनीशनर्म गद्दों पर सोने वाले!
मैं दोनों में कुछ संबंध नहीं देख पाया! और नर्म गद्दे पर सोने में ऐसा कौन सा अधर्म हैहांकिसी को समुद्र में फेंकना जरूर अधर्म की बात है। और स्वयं भगवान विष्णु क्षीर-सागर में विश्राम कर रहे हैं! और नरम गद्दा कहां से खोजोगे?
अब मेरे पास बहुत लोग थेयोग्य लोग थेलेकिन मैंने कहा कि लक्ष्मीतू ही सम्हाल ले सचिव का पद! उसने कहाक्योंमैंने कहा कि तू लक्ष्मी है। मुझे तो क्षीर-सागर में विश्राम करना है। ऐसे तो मेरे पास बहुत योग्य लोग थे। लक्ष्मी को बेचारी को कुछ पता ही क्या था इस दुनिया के काम-धंधे का! लेकिन मैंने कहायही ठीक रहेगा। इससे पुरानी कथा भी फिर जी उठेगी!
यह तो पुराना ढंग है। क्षीर-सागर में विश्राम करने में तो कोई अड़चन नहीं। लेकिन किसी को क्षीर-सागर में उठा कर फेंक देने की बात तो सुनी नहीं!
नहींतुलना मेरी उनके साथ हो ही नहीं सकती।
दत्ताबाल ने उल्लेख किया है--और इस तरह की बहुत कहानियों का हिंदुओं के मन पर खूब असर पड़ा--कि विवेकानंद प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रहे हैं। दो अंग्रेज उनके दोनों तरफ बैठे हैं। एक अंग्रेज कहता है कि मेरे बगल में एक सूअर का बच्चा बैठा हुआ है! दूसरा अंग्रेज कहता है कि मेरे बगल में भी एक गधा बैठा हुआ है! और विवेकानंद कहते हैं कि मैं दोनों के बीच में बैठा हुआ हूं।
हिंदुओं को यह बात बहुत जंची। मगर मैं पूछता हूं कि गधे के बीच और सूअर के बच्चे के बीच विवेकानंद बैठ कर क्या उपनिषद साध रहे थेअरेउठ कर खड़े हो जाना था। ऐसे सत्संग में बैठना चाहिए क्यामगर हिंदू अहंकार को सुख मिला।
और सवाल यह उठता है...। मैं अगर प्रथम श्रेणी में चलूं तो चल सकता हूंमुझे चलना ही चाहिए। क्योंकि मैं वही कहता हूं जो करता हूंऔर वही करता हूं जो कहता हूं। मैं ऐश्वर्य-विरोधी नहीं हूं। और विवेकानंद तो अपना आश्रम बेचने को तैयार थे अकालग्रस्तदीन-दरिद्रों की सेवा में। प्रथम श्रेणी में यात्रा करके क्या कर रहे थेइनको तो तृतीय श्रेणी में चलना चाहिए! यह तो पाखंड हो गया। मैं तो प्रथम श्रेणी में चल सकता हूंकोई इसको पाखंड नहीं कह सकता। मैं तो तृतीय श्रेणी में चलूंतो पाखंड हो जाएगा! क्योंकि मेरे सिद्धांत के विपरीतकहता कुछकरता कुछ! मैं तो वही करता हूं जो कहता हूं। विवेकानंद प्रथम श्रेणी में क्या कर रहे थे?
और अगर ये दोनों आदमी मूढ़ थेतो विवेकानंद ने कुछ ज्यादा बुद्धिमत्ता जाहिर नहीं की। उन मूढ़ों के साथ खुद भी मूढ़ता ही प्रकट की! और जब देख लिया कि एक तरफ गधा बैठा हैएक तरफ सूअर का बच्चा बैठा हैतो उठ कर खड़े हो जाना थाकि भई ऐसे सत्संग में मैं कहां तक बैठूं!
मगर नहींहिंदू अहंकार को इस तरह की कहानियों से खूब रस मिला।
दत्ताबाल कहते हैं कि विवेकानंद ने पहल की थी कि मैं अकालग्रस्त लोगों के लिए अपने आश्रम को बेचने को तैयार हूं।
पूछता मैं यह हूं कि बेचापहल की थीकहा था। सवाल हैबेचाक्या कहने से अकाल मिट गया थाऔर फिर सवाल यह है कि विवेकानंद का रहा होगा आश्रम। अपनी चीज हो तो बेच सकते हो। मुझसे पूछ रहे हैं कि क्या मैं भी यही कर सकता हूं?मेरा तो कोई आश्रम है नहीं! मैं तो यहां मेहमान हूं। न तो इस आश्रम में मैं ट्रस्टी हूं। न इस आश्रम के किसी पद पर हूं। मुझे छोड़ कर इस आश्रम में सभी का कुछ न कुछ हक है! मेरा कोई भी हक नहीं है। मेरी कोई कानूनी हैसियत नहीं है।
मुझे अगर इस आश्रम के ट्रस्टी--फलीभाईलक्ष्मीलहरू--कहें कि अब आप जाइए! तो मैं संत से कहूंगा कि संत चलो! संत को तो मुझे ले जाना पड़ेगाक्योंकि दो तंदूर की रोटी बना देगाछोले की सब्जीलस्सी का गिलासबस काफी है!
मुझसे तो जिस दिन कह देंउसी दिन मुझे बाहर हो जाना पड़ेक्योंकि मेरा यहां कोई अधिकार ही नहीं! मैं इस आश्रम को बेचने की बात तो कैसे करूंअपना होतो कोई बेच सकता हैमेरा तो यहां कुछ भी नहीं है। और इसलिए तो मजा है। अपना कुछ इसमें है नहींइसलिए चिंता कुछ है नहीं! रहे तो ठीकजाए तो ठीक।
मैं पूरे आश्रम में भी कभी घूमा नहीं हूं। जो घंटे भर के लिए भी आश्रम में आता हैवह भी पूरा आश्रम देख लेता है। मुझे तो सात साल हो गएमैंने पूरा आश्रम देखा नहीं! पूरे आश्रम की बात छोड़ोमैंने लाओत्सुजहां मैं रहता हूंउस भवन के भी सारे कमरों में नहीं गया हूं! सिर्फ अपने कमरे को छोड़ कर कहीं नहीं गया हूं।
यूं लोगों को देख कर लगता होगा कि राल्स में चलता हूं! औरों की तो बात छोड़ोअभी एक मित्र कृष्णमूर्ति को मिल कर आए,तो कृष्णमूर्ति तक को यह बात कहनी पड़ी। कृष्णमूर्ति से मुझे आशा नहीं थी! दत्ताबाल वगैरह की मैं कोई गिनती नहीं करता। मगर कृष्णमूर्ति ने भी यह कहा कि आप भी जाते हैं उस खतरनाक आदमी के पास जिसने कि भारत में सबसे ज्यादा मंहगी कार रख छोड़ी है?
वह कार मेरी है नहीं भइया! कार में बैठ गएतो तुम्हारी हो गई क्याअब आज छोटा सिद्धार्थ मेरे साथ बैठ कर आ गयातो कोई सिद्धार्थ की हो गईकार शीला की है। मैं तो सिर्फ मेहमान हूं। और यह तो सिर्फ भारत में सबसे कीमती कार है। अभी शीला गई है अमरीका कि दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती कार ले आए!
अब मैं क्या करूं! मेरी कार होतो बेच दूं। मगर मेरी कार है नहींन मेरा मकान हैन मेरा आश्रम है। विवेकानंद का रहा होगा। तो उन्होंने पहल की कि बेच दूं। हालांकि बेचा-किया नहीं! यही तो मजा है। इस देश में लोग बातों के धनी हैं!
मेरा कुछ भी नहीं हैबेचने का सवाल ही नहीं उठता। न बेचने का सवाल उठता हैन खरीदने का। क्योंकि खरीदने के लिए भी मेरे पास कुछ नहीं है। और इसलिए मुझसे ज्यादा मस्त आदमी इस दुनिया में दूसरा नहीं। कोई आएकोई जाएसब बराबर है। न मेरा कुछ जातान मेरा कुछ आता!
लेकिन ये प्रश्न सोच लेने जैसे हैं।
पहला। यह प्रश्न बहुतों के मन में उठता है और विचारणीय है।
वंदना! श्री दत्ताबाल ने कहा, "आचार्य रजनीश स्वघोषित भगवान हैं!'
यह आलोचना बहुत तरफ से उठती है। सवाल यह है कि कभी कोई और तरह का भगवान भी दुनिया में हुआ हैक्या तुम सोचते होकृष्ण को किसी म्युनिसिपल कमेटी ने भगवान घोषित किया थाकि बुद्ध को किसी पंचायत ने सर्टिफिकेट दिया थाक्या जीसस को यहूदी धर्मगुरुओं ने प्रमाणित किया थाक्या महावीर को जनता ने वोट देकर भगवान चुना थाये सब स्वघोषित थे। मेरा कसूर क्या हैइसके सिवाय कोई उपाय ही नहीं है। स्वघोषणा के सिवाय और कोई उपाय नहीं है। भगवान होने की घोषणा तो स्वानुभव है।
लेकिन यह आलोचना बार-बार उठती है। और जो लोग यह आलोचना करते हैंवे कभी भी यह विचार नहीं करते कि जीसस,मोहम्मदजरथुस्त्रकृष्णरामबुद्धमहावीर--कौन स्वघोषित नहीं थाकौन था जिसके पास सर्टिफिकेट होऔर इन सबको भगवान मानने वाले मुझ पर आलोचना उठाते हैं कि मैं स्वघोषित भगवान हूं!
यह अनुभव ही ऐसा है कि सिवाय स्वघोषणा के और क्या होगाक्या अज्ञानियों से वोट लेकर तय करना पड़ेगातब तो फिर जैसे कि राष्ट्रपति खड़े होते हैंवैसे खड़े हो गए दस-पंद्रह भगवान! चुनाव हो गया। जो जीत गयावह जीत गया। जो हार गया,वह हार गया! तो कभी कार्टर हो गए भगवान! कभी रीगन हो गए भगवान! जो जीत जाए! सालदो साल रहेफिर हार गए तो फिर खतम!
यह तो अनुभव की बात है। मैं घोषणा करता हूं कि मैं भगवान हूंक्योंकि इसके अतिरिक्त और कोई उपाय ही नहीं है। बुद्ध को जब परम समाधि मिलीतो उन्होंने जो पहली घोषणा कीवह यही थी कि मैंने परम सत्य को पा लिया है। मैंने परम संबोधि पा ली है। मैं उस अवस्था को पा गयाजिसको सम्यक संबुद्धत्व कहा जाता है। मैंने अपने सारे शत्रुओं का विनाश कर दिया--भीतर के शत्रुओं का। मैं अरिहंत हुआ। जीसस ने घोषणा की कि मैं और परमात्मा जिसने जगत बनायाएक हैं। यही तो कसूर थाइसीलिए तो सूली लगी। क्योंकि लोग यही पूछ रहे थे उनसे भी कि आप ही घोषणा कर रहे हैं!
मगर अगर मेरे सिर में दर्द होतो कौन घोषणा करेगा कि मेरे सिर में दर्द हैमैं ही कहूंगा कि मेरे सिर में दर्द है। और मेरा दर्द ठीक हो जाएतो भी मुझे ही कहना होगा कि मेरा दर्द ठीक हो गया! कौन घोषणा कर सकता है इस बात कीअगर मेरे भीतर अंधेरा हैतो मैं जानता हूंऔर अगर रोशनी हैतो मैं जानता हूं। और जो खुद अंधे हैंवे क्या देखेंगे कि मेरी आंखें खुल गई हैं!
भगवत्ता का अनुभव तो स्वघोषित ही हो सकता है। उपनिषद में जिस ऋषि ने कहाअहं ब्रह्मास्मि! उसने किसके आधार पर कहा कि मैं ब्रह्म हूंऔर अलहिल्लाज मंसूर ने घोषणा कीअनलहक! मैं परमात्मा हूं! वह किसके आधार परस्वानुभव के आधार पर! और कोई आधार न कभी थान कभी होगा। यह कोई चुनाव की बात तो नहीं! यह किसी समिति के द्वारा निर्णीत तो नहीं होना है!
इसलिए मैं स्वीकार करता हूं कि मैं स्वघोषित भगवान हूंक्योंकि जो भी भगवत्ता को उपलब्ध हुए हैंसभी स्वघोषित हैं। इनकार करना होसब को कर दो। लेकिन यह बेईमानी मत करो कि मुझ पर एक अलग नियम लगाओ और बाकी सब पर एक अलग नियम लगाओ।
दूसरा उन्होंने कहा, "आचार्य रजनीश अज्ञानी हैं।'
यह बात सच है! इसे मैं स्वीकार करता हूं। मैं अज्ञानी हूंक्योंकि मैं तो उपनिषद के इस सूत्र को मानता हूं कि ज्ञानी महा अंधकार में भटक जाते हैं।
सुकरात ने तो कम से कम इतना कहा कि मैं इतना ही जानता हूं कि मैं कुछ भी नहीं जानता। मगर इतना तो कहा कि मैं इतना ही जानता हूं। मैं मानता हूं कि इतनी ही कमी रह गई। मैं तुमसे कहता हूंमैं इतना भी नहीं जानता कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं। परम अज्ञानी हूंमहा अज्ञानी हूं। छोटा-मोटा काम ही मैं नहीं करता! जब काम ही करना होतो बड़ा। अज्ञान भी क्या! महा अज्ञान। मुझे कुछ भी नहीं मालूम। कबीरदास ने तो कहा कि मसि कागद छुओ नहीं। उन्होंने तो छुआ भी नहीं था। मैंने छुआ जरूरलेकिन फिर भी तुमसे कहता हूं कि मसि कागद छुओ नहीं! अरे नहीं छुआयह कोई बड़ी बात हुईछूकर और नहीं छुआयह कुछ बात हुई! चले पानी में और भीगे भी नहींयह कुछ बात हुई! कबीरदास तो चले ही नहींकिनारे पर ही बैठे रहे। कहा भी है उन्होंने कि--
      जिन खोजा तिन पाइयांगहरे पानी पैठ।
      मैं  बौरी  खोजन  गईरही  किनारे  बैठ।।
तुम किनारे बैठोगे महाराजतो फिर कैसे खोजोगेमैंने डुबकी भी मारीऔर गीला भी नहीं हुआ। तो कहता हूं कि मसि कागद छुओ नहीं। बिलकुल अज्ञानी हूं।
मगर परमात्मा को जानने में अज्ञान बाधा ही कब रहाबाधा खड़ी होती है ज्ञान से।
कबीर कहते हैं: लिखा-लिखी की है नहींदेखा-देखी बात।
लिखा-लिखी की नहीं है। इसलिए ज्ञान क्या करेगादेखा-देखी बात। देखने की बात है।
तो यह तो मैं स्वीकार करता हूं कि मैं अज्ञानी हूं। और अज्ञान में ही मैंने जाना भगवत्ता को। अज्ञान का अर्थ हैमैंने सारे ज्ञान को इनकार कर दिया। सारे ज्ञान को झाड़ कर अलग कर दिया। और जब सारे ज्ञान से छुटकारा हो गयातो जो शेष बच रहता हैवही भगवत्ता हैवही दिव्यता है।
उन्होंने कहा कि "आचार्य रजनीश का व्यक्तित्व अत्यंत महत्वहीन है।'
यह भी सच है। पहली तो बातमेरा कोई व्यक्तित्व ही नहीं। व्यक्तित्व तो झूठी चीज है। वह तो जिनके पास आत्मा नहीं है,उनको ओढ़ना पड़ता है व्यक्तित्व। जिनके पास आत्मा हैउनको व्यक्तित्व की जरूरत क्याऔर महत्वहीनयह भी सच है। महत्ता की आकांक्षा ही दीन लोगों को होती है।
पश्चिम के बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक एडलर ने कहा हैमहत्वाकांक्षी वे ही लोग होते हैंजो हीन-ग्रंथि से पीड़ित होते हैं। यह दुनिया में पताका फहराने की आकांक्षाहीनता की ग्रंथि है। झंडा ऊंचा रहे हमारा! ये बचकानी बुद्धि के लक्षण हैं। फिर झंडा किस बात का हैइससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। बसऊंचा रहना चाहिए! क्योंकि भीतर का गङ्ढा दिखाई पड़ता है। झंडे को ऊंचा करके भुलाने की चेष्टा चलती है।
ये दत्ताबाल के जो पैर छोटे हैं और ऊपर का हिस्सा बड़ा है...। अब यह मंगला ने लिखा कि बैठे सोफा पर बोल रहे थे और पाजामे का नाड़ा लटका और डोल रहा था! वह पाजामा था मंगलापाजामे की उनको जरूरत हैअरेजरा लंबा जांघिया रहा होगा! पैर भी तो होना चाहिए पाजामे के लिए!
लेनिन का मनोविश्लेषण जिन लोगों ने किया हैउनकी भी बीमारी यही थी लेनिन कीकि पैर छोटे थे। वे कुर्सी भी ऐसी बनवाते थेजो बड़ी होती। उनके पैर जमीन से नहीं लगते थे। और टेबल ऐसी बनवाते कि पैर छिपे रहते। अपने पैरों को बचा कर चलते थे। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लेनिन को बस एक ही धुन थी कि किसी तरह सिद्ध कर दें कि महत्वपूर्ण व्यक्ति हूं मैं। क्योंकि वह जो पैरों की दीनता थी छोटे होने कीवह बड़ा कष्ट दे रही थी।
अडोल्फ हिटलर का जिन लोगों ने मनोविश्लेषण किया हैउनका कहना है कि उसका एक अंडकोष छोटा थाएक बड़ा। उस कारण ही वह परेशान था! वही उसकी जिंदगी भर की पीड़ा थी। उसे सिद्ध करना था दुनिया में कि मैं कुछ हूं।
यह दत्ताबाल को भी कुछ हीन-ग्रंथि पकड़ी हुई है! उसी हीनता की ग्रंथि से पीड़ित हैं।
बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति तो साधारण होता हैउसका कोई व्यक्तित्व होता ही नहीं। वह तो अति सामान्य हो जाता हैसहज हो जाता हैसाधारण हो जाता है। भूख लगीभोजन कर लियानींद आईसो गए। सुबह हुईउठेसांझ हुईसोए। उसका जीवन तो सहजस्वस्फूर्त हो जाता है। उसमें क्या असाधारणताक्या विशिष्टता?
यह विशिष्टता का मोह और असाधारण होने की आकांक्षा अहंकार के ही अलग-अलग नाम हैंऔर कुछ भी नहीं।
और उन्होंने कहा कि "आचार्य रजनीश ने हिंदू देवी-देवताओं को कामी और भोगी कह कर हिंदू धर्म का अपमान किया है।'
मैं क्या करूंतुम्हारे पुराण अपमान कर रहे हैं। अपने पुराण उठा कर देख लो। तुम्हारे सारे पुराण तुम्हारे देवी-देवताओं की कामवासनालिप्साभोगइससे भरे पड़े हैं। तुम्हारे देवताओं का जो प्रमुख देवता है इंद्रवह किसी भी ऋषि-मुनि को तपश्चर्या करते देख कर घबड़ा जाता हैउसका सिंहासन डोलने लगता हैइंद्रासन डोलने लगता है! घबड़ाहट पैदा हो जाती है उसको कि अब आया कोई दावेदार! तत्क्षण भेजता है उर्वशी-मेनकाओं कोकि जाओ भ्रष्ट करो इसे! और खुद भी भ्रष्ट करने में कुछ पीछे नहीं!
और कैसा मजा है! कैसे पुराण हैं! और किन बेईमानों ने लिखे हैं! कि इंद्र ने अहिल्या को भ्रष्ट कियाऔर सजा बेचारी अहिल्या को भुगतनी पड़ी! पत्थर होना पड़ा अहिल्या कोऔर कसूर था इंद्र का! कुछ न्याय भी होता है! कुछ थोड़ी तो न्याय-बुद्धि हो!
शरद जोशी का एक व्यंग्य मैं कल पढ़ रहा थावह मुझे पसंद आया। शरद जोशी ने लिखा है कि मैंने जब पहली बार यह श्लोक सुना कि यत्र नारी पूज्यन्तेतत्र रमन्ते देवतातो मेरे मन में तभी से देवताओं के चरित्र पर शक होने लगा है। क्योंकि मैं सोचता हूंअगर किसी इलाके में नारी की पूजा हो रही हैतो उधर देवता लोगों के चक्कर काटने का क्या मतलबयह तो कोई शराफत की बात न हुई! कि पराई बहू-बेटियां जहां उनके बाप-भाई और पतियों के खर्च पर आनंद कर रही हैंजैसे बाग में झूला झूल रही हैंया शापिंग कर रही हैंया टी.वी. देख रही हैं। अपने रूप-सौंदर्य-स्वास्थ्य आदि गुणों के कारण घर और बाहर उनका रौब छाया हुआ है...। पता नहींकितने लोग उनमें से कितनी लड़कियों को पाने की साधना में गजलें गा रहे हैं! कविता छपाने की कोशिश में हैं! अर्थात बड़ा पूजामय वातावरण है!
सुंदर लड़कियां पुरुषों के सपनों में आ-जा रही हैं। स्वस्थ पुरुष शरीफ घरों की खिड़कियों के पास से लड़कियों के दर्शनों की अभिलाषा में गुजर रहे हैं। अर्थात बिलकुल नारी पूज्यन्ते का वातावरण है।
संपादकगण अपने मुखपृष्ठों पर नारी की अधखुली तस्वीर छाप कर अभिभूत हैं! लेकिन भारतीय छपाई है! खराब होने के कारण महात्मागण बहुत दुखी हैं! क्योंकि तस्वीरें साफ-साफ समझ में नहीं आतीं। सो महात्मागण शिकायत कर रहे हैं कि नारी का अनादर हो रहा है!
पति अपनी पत्नियों की आरतियां उतार रहे हैं। उतारनी ही पड़ती है! हर पति को उतारनी पड़ती है!
ऐसे दिव्य माहौल में देवता क्या लेने को रमन्ते हैंबंबइया भाषा का उपयोग किया है: कायकू रमन्तेकिसके वास्ते रमन्ते?बिना रमन्ते काम नहीं चलता क्याघर में मां-बहनें नहीं हैं जो इधर-उधर रमन्तेजब देखो तभी रमन्ते! रमन्ते ही रमन्ते! और कुछ नहीं करन्ते! इंसान शांति से अपनी पत्नी की पूजा भी नहीं कर सकतायों ही रमन्ते! हर कहीं रमन्ते! ये देवता हैं कि कालेज के लफंगे छोकरे हैंइससे तो बेहतर हो कि सूत्र को बदल लो। यत्र नारी बलात्कारस्तेरमन्ते तत्र देवता! जहां नारी पर बलात्कार हो रहा होवहां रमो भैया!
जहां नारी की पूजा हो रही हैजैसे हेमा मालिनी की पूजा हो रही हैवहीं-वहीं देवता रमन्ते! कायकू रमन्तेइन्हें और कोई काम नहींकोई घर-गृहस्थी नहींबंबई-बंबई में ही रमन्ते! तभी तोकायकू रमन्तेरमन्ते ही रमन्ते!
मैं क्या करूंतुम्हारे पुराणों में सारी कथा यह है। मेरा कोई कसूर नहीं। मैंने तुम्हारे पुराण नहीं लिखे। ऐसी भूल मैं कभी करूंगा भी नहीं। ऐसा कचरा मैं कभी लिखूंगा भी नहीं। अगर तुम्हें अपने पुराणों के कारण हिंदू धर्म का अपमान होता दिखाई पड़ता है,पुराणों को होली में चढ़ा दो।
श्री दत्ताबाल ने कहा कि "श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि अगले जन्म में मैं एक हरिजन की कुटिया की सफाई करूंगा। क्या आचार्य रजनीश भी ऐसा कह सकते हैं?'
मुझे पता नहीं कि श्री रामकृष्ण ने ऐसा कहा था या नहीं। लेकिन दत्ताबाल कहते हैंतो माने लेता हूं कि कहा होगाजरूर कहा होगा!
अब सवाल यह हैक्या इस जन्म में रामकृष्ण को कोई हरिजन नहीं मिल रहा थाजो अगले जन्म में...! हरिजनों की कोई कमी हैकोई हरिजनों की कुटियाओं की कमी हैइस जन्म में तो काली मैया की पूजा कर रहे हैं! पत्थर की मूर्ति पूज रहे हैं! आरती उतार रहे हैंघंटी बजा रहे हैं! जिंदगी भर वही करते रहे। और हरिजन की कुटिया की सफाई अगले जन्म में करेंगे! क्या चालबाजियां हैं! कौन रोकता है अभी करने सेऔर एक ही कुटिया की सफाई करना हैसो कर ही दो न! अगले जन्म के लिए क्या टाल रहे हो?
छह-छह घंटेआठ-आठ घंटे काली मैया की पूजा हो रही है! उन्हीं काली मैया कीजिनके लिए बकरे काटे जा रहे हैं! खून बहाया जा रहा है! कलकत्ते की काली के सामने जितना खून बहा हैदुनिया के किसी मंदिर में कभी नहीं बहा। जितनी प्राणियों की हिंसा कलकत्ते की काली के लिए हुई हैउतनी दुनिया के किसी देवता के सामने नहीं हुई। मगर वही कटे हुए बकरों का मांस और खून प्रसाद रूप में वितरित होता है! प्रसाद की तो बड़ी महिमा है!
ये डोंगरे जी महाराज क्या खाक प्रसाद बंटवाते हैं! लस्सी-बूंदी! अरे यह कोई प्रसाद हैअसली प्रसाद बंटता है कलकत्ते की काली के मंदिर में!
यह रामकृष्ण परमहंस को कोई शूद्र नहीं मिल रहा थादूर तो नहीं था शूद्र। क्योंकि जिनके मंदिर में वे पुजारी का काम करते थेरानी रासमणिरानी रासमणि खुद ही शूद्र थी! उसका ही बनवाया हुआ मंदिर था। रामकृष्ण परमहंस चौदह रुपए महीने की नौकरी पर वहीं तो पुजारी का काम करते थे। शूद्रों की कोई कमी थी!
सच तो यह है कि विवेकानंद खुद ही शूद्र हैं। कायस्थों की गिनती और कहां करोगेकायस्थों की गिनती व्यवस्था से शूद्रों में ही होगी। असल में कायस्थ शब्द ही शूद्र का पर्यायवाची है--काया में स्थित! आत्मस्थ हो तो ब्राह्मण और कायस्थ हो तो शूद्र। और क्या चाहिए! सीधा-साफ हिसाब है।
रामकृष्ण परमहंस अगले जन्म में सफाई करेंगे! बड़ी गजब की बात कही! जिंदगी भर ये पत्थर की मूर्ति पूजते रहे! तो यहीं कर लेनी थी! एकाध कुटिया साफ कर लेते। इसके लिए अगले जन्म का क्यों उपद्रव लेना!
और वे मुझसे पूछते हैं, "क्या आचार्य रजनीश ऐसा कर सकते हैं?'
पहली तो बातमैं अपनी कुटिया की सफाई नहीं करता! किसी ब्राह्मण की कुटिया की सफाई नहीं की तो हरिजन की कुटिया की सफाई क्या खाक करूंगाअरेअपनी-अपनी कुटिया की सफाई करो!
मैं जब विश्वविद्यालय में विद्यार्थी थातो अपना बिस्तर दरवाजे के पास लगाए रखता था कि सीधा अपने बिस्तर में कूद जाता थाजिसमें कमरे की सफाई न करनी पड़े! कौन झंझट करे! अरे रोज सफाई करोफिर कचरा इकट्ठा। फिर सफाई करोफिर कचरा इकट्ठा। इधर भीतर की सफाई से फुर्सत नहीं हैबाहर की सफाई में कौन पड़े! और क्या फायदाक्या मिल जाने वाला हैकचरा थोड़ा कम हुआ कि ज्यादाकमरा ही है! और कोई अपना हैअरेआज यहां कल वहां! होस्टल ही तो ठहरासरायघर है। तो मैं तो दरवाजे परबिलकुल दरवाजे पर अपने बिस्तर को लगा कर रखता थाकि सीधा दरवाजे से कूद जाना बिस्तर में,और बिस्तर से कूद जाना बाहर। न देखना भीतरन झंझट में पड़ना।
मगर मेरे प्रोफेसरों को दया आती। मेरे आस-पास के विद्यार्थियों को दया आती। मेरे साथ दो लड़कियां पढ़ती थींउनको दया आती। वे मुझसे कहतीं कि हमें आज्ञा दो कि आपका आकर एक दिन कमरा साफ कर दिया करें--सप्ताह में कम से कम एक दिन!
मैंने कहाक्यों नाहक परेशान करना! तुम साफ करोगीवह फिर धूल जम जाएगी। और मैं वहां जाता ही नहींउस स्थान में,जहां धूल जमी है! फायदा क्या है साफ करने कामगर फिर भी कोई न कोई आकर साफ करता। तुम्हारी मर्जी! तुम्हें सेवा करके अगर मोक्ष पाना हैपाओ! हम तो अपने बिस्तर पर मोक्ष में हैं!
और अगले जन्म की तो बड़ी मुश्किल है। अगला जन्म मेरा होना नहीं! रामकृष्ण का होना होगातो वे करें अगले जन्म में! मेरा तो यह आखिरी जन्म हैदत्ताबाल! अब आगे कोई मेरा जन्म नहीं है। तुम जानोतुम्हारे रामकृष्ण जानें! उनका होगा आगे जन्म।
यह तो दत्ताबालअगर यह बात रामकृष्ण ने कही होतो यह सिद्ध कर रहे हैं कि रामकृष्ण अभी मुक्त नहीं हुए। क्योंकि मुक्ति के बाद कहां जन्म है! मुक्ति के बाद कैसा जन्म है! यह तो इसका अर्थ इतना हुआ कि अभी भी बंधे हैं। और यह भी एक वासना ही रही कि एक हरिजन की कुटिया साफ करनी है। अरेइतनी छोटी सी वासना! कर-करा लेते साफझंझट मिट जातीअगले जन्म का उपद्रव खतम हो जाता। अब होंगे कहीं पैदाकर रहे होंगे कोई हरिजन की कुटिया साफ!
यह भी क्या पतन हुआ! इसी को कहते हैं योगभ्रष्ट होना! कहां से कहां पहुंचे! काली मैया की पूजा करते-करते अब हरिजन की कुटिया साफ कर रहे हैं!
मेरा तो कोई अगला जन्म नहीं है। मेरा तो काम पूरा हो चुका है। अब मुझे लौटना नहीं है। इसलिए कैसे वायदा करूंदत्ताबाल,कि अगले जन्म में आकर हरिजन की कुटिया साफ करूंगा!
और दूसरी बात यह है कि मैं तो ब्राह्मण और शूद्र का भेद मानता नहीं। जो मानते हों भेदवे इन चिंताओं में पड़ें। मेरे लिए तो हरिजन शब्द का उपयोग करना शूद्र के लिए गलत है। हरिजन तो वह जो हरि को जाने।
क्या पागलपन है! बिना ब्रह्म को जाने ब्राह्मण बने बैठे हैं लोगऔर बिना हरि को जाने हरिजन बने बैठे हैं लोग! ब्रह्म को जाने सो ब्राह्मणहरि को जाने सो हरिजन। एक ही मतलब हुआ दोनों बातों काचाहे हरि कहोचाहे ब्रह्म कहो। मेरे लिए तो ये सारे लोग हीजब तक ब्रह्म को नहीं जान लिए हैंतब तक हरिजन नहीं हैंब्राह्मण नहीं हैंशूद्र ही हैं। और इन्हीं की कुटियाएं तो साफ करने में लगा हूं। लेकिन कुटियाएं मेरे लिए भीतर हैंबाहर नहीं। बाहर की कुटिया मैं क्या साफ करूं! असली सफाई में लगा हूं।
भीतर तुम्हारी आत्मा का स्नान हो जाए--उसको ही मैं ध्यान कहता हूं। भीतर तुम स्वच्छ हो जाओ--उसी को मैं स्वास्थ्य कहता हूं। भीतर तुम आनंदमग्न हो जाओउत्सव आ जाएदीए ही दीए जल जाएंफूल ही फूल खिल जाएं--तो तुमने जानातुमने जीयातुमने पहचाना। उसको मैं संन्यास कहता हूं। उसी कार्य में लगा हुआ हूं।
अजब जुनूंने-मुसाफत में घर से निकला था,
खबर नहीं है कि सूरज किधर से निकला था।

यह कौन फिर से उन्हें रास्तों पे छोड़ गया,
अभी-अभी तो अजाबे-सफर से निकला था।

ये तीर दिल में मगर बेसबब नहीं उतरा,
कोई तो हर्फ लबे-चारागर से निकला था।

वो कैस अब जिसे मजनू पुकारते हैं "फराज'
तेरी तरह कोई दीवाना घर से निकला था।

मैं तो दीवाना हूं। और मेरे पास दीवाने इकट्ठे हैं।
वो कैस अब जिसे मजनू पुकारते हैं "फराज'
तेरी  तरह  कोई  दीवाना  घर  से  निकला  था।
मुझसे तुम हिसाब-किताब की बातें न पूछो। यहां कोई हिसाब-किताब नहींकोई गणित नहीं। यहां तो प्रेम एक शास्त्र हैऔर ध्यान एकमात्र धर्म है।


 दूसरा प्रश्न: भगवानमेरा प्रश्न भी वही हैजो कि श्री निर्मल घोष का था। आदेश दें कि मैं क्या करूं कि इस देश की दीन-हीनताभुखमरीपाखंडकाहिलताऔर सड़ांध मिट जाए!

 दयानंद!
यह सब हो सकता है। लेकिन हजार-हजार बाधाएं हैं। और बाधाएं गलत लोगों की तरफ से नहीं हैं। बाधाएं उन लोगों की तरफ से हैंजिन्हें तुम भला समझते होसाधु समझते होसंत समझते होमहात्मा समझते हो। बाधाएं उनकी तरफ से हैंजो तुम्हारे पंडित हैंतुम्हारे पुरोहित हैंतुम्हारे इमाम हैंतुम्हारे पादरी हैं। बाधाएं उनकी तरफ से हैंजो तुम्हारे नीति के निर्धारक हैंतुम्हारे नेता हैं।
इसलिए बड़ी कठिन बात है। क्योंकि उन्होंने ही तो तुम्हारे मन को रचा है। उन्होंने ही तुम्हारे अंतःकरण पर छाप छोड़ी है। वे बाहर भी खड़े हैंउनके हाथ में बाहर भी बंदूक है। और वे तुम्हारे भीतर भी अंतःकरण बन कर खड़े हैं। उन्होंने तुम्हें दोनों तरफ से कसा है। बाहर से जंजीरें पहनाई हैंभीतर से जंजीरें पहनाई हैं।
मगर फिर भी क्रांति घट सकती हैघटनी चाहिए। समय आ गया है कि घटे।
फेंक दो--
अपनी पुरानी कल्पनाओं के कफन,
हे कवि!
ग्रहण से पहले नया सूरज उगाना है
तुम्हें अब।
हो चुका है प्यार काफी दीप से भी,
शलभ से भी,
तारिकाओं से,
गगन से,
चांद से,
चंचल कमल से,
विरह डूबी प्रिया का अब,
राजरथ आए न आए।
कली की अभ्यर्थना,
सहकार को भाए न भाए।
जीर्ण चिथड़ों से बुने उपमान मैले,
अब सहेजो।
अश्रु डूबी यक्ष-पाती मेघमाला में,
न भेजो।
लो नए परिधाननूतन स्वरनए त्यौहार लाओ,
लो नया चश्मानया आलोक देखो,
अब नया संधाननूतन लक्ष्य देखो।
फेंक दो--
अपनी पुरानी कल्पनाओं के कफन,
हे कवि!
ग्रहण से पहले नया सूरज उगाना है,
तुम्हें अब।

फेंकना होगा कफन जो हम ओढ़े बैठे हैं। लेकिन हम तो समझते हैंवह चुनरी है! हम तो समझते हैंवह बड़ा बहुमूल्य है,कफन नहीं।
इसलिए पहली बात तो यह समझना जरूरी है कि भारत इतना दीन-हीन क्यों हैक्या कारण हैकिसका हाथ हैकौन से दुर्भाग्य ने इसे ग्रसाइसकी छाती पर कौन से चट्टान रखे हैं कि यह दबा जा रहा हैमरा जा रहा हैकिसने बनाया इसे भूखापाखंडीकाहिलकिसने इसके जीवन में सड़ांध भर दी है?
पहले तो मूल कारण खोजने पड़ेंदयानंद! और मूल कारण बड़े गहरे हैंसदियों पुराने हैं। जब तक इस देश में कर्मवाद की गलत व्याख्या प्रचलित रहेगीदीनता-हीनता मिट नहीं सकती। क्योंकि तुमने दीनता-हीनता को सांत्वना के बड़े सुंदर वस्त्रों में ढांक रखा है।
सदियों से तुमने यह समझाया है लोगों को कि तुम गरीब हो इसलिए कि तुमने पिछले जन्म में पाप किए थे! तुम अमीर हो इसलिए कि तुमने पिछले जन्म में पुण्य किए थे! चाहे शास्त्र हिंदुओं के होंचाहे जैनों केचाहे बौद्धों केइस बात पर राजी हैं--तीनों धर्मों के शास्त्र इस बात पर राजी हैं--कि महावीर राजा के घर में पैदा हुएहजारों हाथीहजारों घोड़ेरथ! क्योंक्योंकि पिछले जन्म में उन्होंने बहुत पुण्य कर्म किए थे। बुद्ध राजा के घर में पैदा हुएपिछले जन्मों के पुण्यों का फल! कृष्णराम,सब राजाओं के बेटे! एक तीर्थंकर गरीब घर में पैदा न हुआ! एक अवतार गरीब घर में पैदा न हुआ! एक बुद्ध गरीब घर में पैदा न हुआ! हो कैसे सकता हैगरीब हो तो उसका मतलब ही साफ है कि अतीत में तुमने बहुत दुष्कर्म किए हैं! पाप-कर्म किए हैं! बुद्धत्व को पाओगे कैसेतीर्थंकर होओगे कैसे?
यह बात भयंकर है। यह जहर हैजिसने भारत की आत्मा को नष्ट कियासड़ांध से भर दिया। मेरे हिसाब में कर्म का सिद्धांत गलत नहीं हैमगर उस सिद्धांत की जो व्याख्या की गई वह गलत है। मेरे हिसाब में कर्म का सिद्धांत तो वैज्ञानिक है: आग में हाथ डालोगेतो हाथ जलेगा। लेकिन अभी! अगले जन्म में नहीं। यह अगले जन्म की बात बेईमानी से भरी हुई है। हाथ अभी डालोगेऔर जलेगा अगले जन्म मेंकिसी की गर्दन अभी काटोगेऔर कटेगी अगले जन्म में?
कर्म और उसका फल संयुक्त है। जैसे हर सिक्के के दो पहलूऐसे कर्म और फल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इधर कर्म,इधर फल। यहां देर नहीं है। तुमने कहावत सुनी है कि परमात्मा के घर में देर हैअंधेर नहीं। वह कहावत बेईमानों ने गढ़ी होगी। मैं तुमसे कहता हूंन देर हैन अंधेर है। प्रकृति के नियम मेंपरमात्मा के नियम में कैसी देर और कैसी अंधेर! अगर देर हो गईतो वही तो अंधेर है। और फिर अगर थोड़ी देर हुईतो ज्यादा हो सकती है। फिर देर को लंबाया जा सकता है। फिर फाइल पड़ी रहे जन्मों-जन्मों तक! फिर पूजा-पत्री तुम करते ही रहोसत्यनारायण की कथा करवाते रहोयज्ञ-हवन करवाते रहो,फाइल पड़ी रहेगी! अंधेर फिर तो होता चला जाएगा।
नहींदेर ही नहीं है। तुम जब क्रोध करते होतब क्रोध के साथ ही तुम्हारे भीतर जो जहर फैलता हैजो आग जलती हैवह उसका फल है। अगले जन्म में नहींबात यहीं हैनगद है।
मेरे लिए धर्म नगद है और तुम्हें समझाया गया है कि धर्म उधार है! तुम अगर अभी प्रेम करोगेतो अभी तुम्हारे जीवन का फूल खिलेगा। तुम अगर अभी बांसुरी बजाओगेतो अभी बांसुरी बजेगीअभी गीत जागेगा। तुम अभी गाली दोगेतो अभी गाली खाओगे। अभी प्रेम बांटोगेतो अभी प्रेम पाओगे।
मैं चाहता हूं कि कर्म का सिद्धांत इस वैज्ञानिक व्यवस्था को समझ ले। हम जो करते हैंवह अभी हमें मिल जाता हैइसी क्षण। कल की कोई बात नहीं।
लेकिन कल की बात क्यों ईजाद करनी पड़ीकल की बात पंडित-पुरोहितों ने इसलिए ईजाद की कि वे समझाने में असमर्थ हुए बहुत सी बातें। जैसे कि बेईमानों को उन्होंने देखा धन कमा रहे हैंऔर ईमानदारों को देखा कि भूखों मर रहे हैं। बसउनको मुश्किल खड़ी हुई। अब क्या करेंअब कैसे इस बात को लीपापोती करेंक्योंकि बेईमान छाती पर चढ़े बैठे हैं। दादागिरी कर रहे हैं। और ईमानदार सड़ रहे हैं। उनकी छाती पर ये ही दादा चढ़े बैठे हैं! तो अब किस तरह समझाएं?
एक ही उपाय था कि पिछले जन्म पर बात को टाल दें। कि ये जो तुम्हारी छाती पर चढ़े बैठे हैंइनके पास धन हैपद है,प्रतिष्ठा हैयह इस जन्म की बुराइयों के कारण नहीं है। यह पिछले जन्म की भलाइयों के कारण है। इस जन्म की बुराइयों का फल तो ये अगले जन्म में भोगेंगे! और तुम जो छाती कुचली जा रही है तुम्हारीयह तुम्हारे इस जन्म की ईमानदारी का परिणाम नहीं हैपिछले जन्मों में की गई बेईमानियों का फल है। इसका पुण्य-फल तो तुम्हें अगले जन्म में मिलेगा।
इससे तरकीब मिल गई। इससे इस समाज की व्यवस्था कोजैसी है वैसा का वैसा बनाए रखने के लिए तर्क का सहारा मिल गया। यह पूंजीपतियों की ईजाद है। यह न्यस्त स्वार्थों की ईजाद है।
इस देश से दीनता मिट सकती है। कोई कारण नहीं है। अगर अमरीका से मिट सकती हैतो भारत से क्यों नहीं मिट सकती?भारत की भूमि कोई कम उर्वरा नहीं है। भारत के पास सब है। लेकिन सिर्फ भारत की बुद्धि को विकृत कर दिया गया है,विक्षिप्त कर दिया गया है। इस विक्षिप्तता से हम छूट जाएंतो आज दीनता-हीनता बदल सकती है।
तो पहला तो काम यह करो दयानंदकि कर्म के सिद्धांत का जो गलत रूपांतरण तुम्हारे प्राणों में समाविष्ट हो गया हैउसे निकाल फेंको। भाग्यवाद बैठ गया है सिर पर! कि हम क्या कर सकते हैंविधाता ने लिख दिया है!
विधाता ने कुछ भी नहीं लिखा है। तुम जब आते होकोरे कागज की तरह आते हो। फिर तुम अपना भाग्य खुद ही लिखते हो। किसी और ने नहीं लिखा है।
लेकिन हमारे मन में यह धारणा बिठाई गई है कि भगवान लिख देता है किस्मत। लिख दिया जिसके जीवन में गरीबीवह गरीब रहेगाऔर लिख दी अमीरीवह अमीर रहेगा।
बिलकुल झूठी बात है। बिलकुल व्यर्थ बात है। यह पोषण है व्यवस्था के लिए। जो न्यस्त स्वार्थों की व्यवस्था हैउसको सहारा देना है। भाग्यवाद उसके लिए सबसे बड़ी सुरक्षा है।
इसलिए भारत में कभी कोई क्रांति नहीं हो सकी। क्योंकि क्रांति के लिए बुनियादी आधार नहीं मिलते। यह भाग्यवाद हमारी क्रांति को बुझा देता है।
भाग्य नहीं है। भाग्य हम निर्मित करते हैं।
तुम्हें नैतिकता की अस्वाभाविक धारणाएं समझाई गई हैंइसलिए पाखंड है। पाखंड का अर्थ क्या होता हैतुमसे अगर कुछ अस्वाभाविक करने को कहा जाएतो पाखंड होगा ही। पाखंड का इतना ही मतलब होता है कि तुम प्रकृति के अनुकूल नहीं,बल्कि प्रतिकूल चलने की कोशिश कर रहे हो। चल तो न पाओगे। न चल पाओगेतो फिर तुम्हें एक इंतजाम करना पड़ेगाकम से कम दिखाना पड़ेगा कि चल रहे हैं। तब तुम्हारी जिंदगी में दोहरापन हो जाएगाभीतर कुछबाहर कुछ। बाहर एक काम करोगेभीतर दूसरा काम करोगे। बाहर मंदिर में पूजा करोगेगीता पढ़ोगे। और भीतरभीतर सब तरह की वासनाओं के जाल चलते रहेंगे।
इस देश को इसके असंभव मूल्यों से मुक्त कराना जरूरी हैतो पाखंड मिटेगा।
मनुष्य की सहजता को स्वीकार करो। जो भी प्रकृति ने मनुष्य को दिया हैउसका रूपांतरण तो करना हैलेकिन दमन नहीं। और हमें दमन ही सिखाया गया है। तो सब अजीब हो गया है! कुछ का कुछ हो गया है! सब लोग मुखौटे लगाए हुए हैं। किसी आदमी की असली शक्ल पहचान में नहीं आती कि कौन कौन है!
चंदूलाल को उनके मित्र ने लताड़ा। कहाअरे चंदूलाल! शर्म नहीं आती बुढ़ापे मेंबाल सफेद हो गएदांत गिर गएऔर कल शाम एक पतली कमरटाइट जीन्स और लहरदार लंबे बालों वाली वह कौन सी छोकरी थी जिसके साथ मीठा-मीठा बतियाते चले जा रहे थे?
हिश! छोकरी कैसी! चंदूलाल ने कहावह मेरा दामाद था।
मित्र बड़ा हैरान हुआ। उसने कहाअरे माफ करना भाई चंदूलालभूल हो गई! और दूसरा छींटदार बुशर्ट वाला लड़कावह कौन था?
अरे वहवह मेरी कुन्नी थीमेरी बेटी!
यहां सब गड़बड़ हो गया है। यहां कुछ पता ही नहीं चलता कि कौन कौन है! कौन कुन्नी हैकौन दामाद है! कौन आदमी है,कौन औरत है! कुछ साफ नहीं है।
यहां साधु असाधुओं में मिल जाएं तो मिल जाएंसाधुओं में नहीं मिलते! साधुओं में तो पाखंडियों का जाल है। सब तरह के बेईमानसब तरह के चोरसब तरह के नैतिक रूप से भ्रष्ट लोग! मगर अगर उन्होंने राम-नाम की चदरिया ओढ़ रखी हैतो बस पर्याप्त है!
और जब ये झूठी बातें बहुत प्रचलित की जाएंगीतो आदमी तो विज्ञापनों से जीता हैआदमी का मन तो विज्ञापनों से भरा होता है।
अब रोज-रोज पढ़ोगे कि लक्स टायलेट साबुन से सौंदर्य उपलब्ध हो जाता हैतो सुंदर कौन नहीं होना चाहता! और जो देखो अभिनेत्री वही कह रही है: लक्स टायलेट साबुन! पढ़ोतो लक्स टायलेट! फिल्म देखोतो लक्स टायलेट! रास्ते से गुजरोतो लक्स टायलेट! तो फिर जो भी सुंदरी दिखाई पड़ती हैउसका चेहरा नहीं दिखाई पड़ताएकदम लक्स टायलेट साबुन दिखाई पड़ने लगता है! हर सुंदरी की फोटो के साथ लक्स टायलेट साबुन छपा हुआ है। दोनों का संयोग हो जाता है।
पावलव ने इस पर बहुत खोज कीसंयोग का सिद्धांत। वह अपने कुत्ते को खाना खिलाता और घंटी बजाता। खाना जब सामने रखतातो कुत्ते की लार टपकतीजो बिलकुल स्वाभाविक हैऔर घंटी बजाता। पंद्रह दिन बाद खाना तो नहीं रखासिर्फ घंटी बजाईऔर कुत्ते की लार टपकने लगी! अब घंटी से कुत्ते की लार टपकने का कोई संबंध नहीं। कुत्ता कोई भक्त थोड़े ही है! न भक्त हैन भगवान है। घंटी बजा रहे होऔर वह लार टपका रहा है!
यह संयोग का सिद्धांतउसने कहा कि दोनों का संयोग हो गया। लार टपकती थीतब घंटी भी बजती थीरोटी भी देखता था। देखता था और घंटी बजती थी। रोटी में और घंटी में संबंध हो गया। अब घंटी बजाना काफी हैलार टपकने लगती है।
कोई भी चीज बेचनी होसुंदर स्त्री पहले खड़ी करो! कुछ भी अंट-शंट बेचना होसुंदर स्त्री खड़ी कर दोफिर लार टपकने लगेगी! पहले सुंदर स्त्री पर टपकेगीस्वभावतः। फिर लक्स टायलेट साबुन पर टपकेगी। फिर तुम बाजार गए साबुन खरीदने। दुकानदार पूछता हैकौन सा साबुनएकदम तुम्हारे मुंह से निकल जाता हैलक्स टायलेट! फिर तुम नहीं सोचते कि क्योंतुम यही सोचते हो कि बहुत सोच-विचार करके कह रहे हैंलक्स टायलेट साबुन! मगर वे विज्ञापन काम कर रहे हैं। उन्होंने संयोग करवा दिया।
पहले जब पहली दफे बिजली के विज्ञापन बनेतो वे ठहरे रहते थे अक्षरलक्स टायलेट लिखा रहता था। फिर मनोवैज्ञानिकों ने कहाइससे भी ज्यादा कारगर यह होगा कि इनको बुझाओ-जलाओबुझाओ-जलाओ। और प्रयोग किए और पाया कि वह ठीक,वह ज्यादा काम करता है। क्योंकि अगर लक्स टायलेट साबुन बिजली के थिर अक्षरों में लिखा रहेऔर तुम वहां से गुजरोतो एक दफा पढ़ोगेबस। अगर वह जलेफिर बुझेफिर जलेफिर बुझेतो जितनी बार जलेगा-बुझेगाउतनी बार तुमको पढ़ना पड़ेगा! तुम कोई बुद्ध थोड़े ही हो कि चार फीट ही नीचे देख कर चलोगे! कि अपने को देखना ही नहीं ऊपर क्या हो रहा है! होने दोबिकने दो लक्स टायलेट साबुन!
नहींनीचे कौन देखता है! अरेसबकी आंखें ऊपर टिकी हुई हैं। वह जितनी बार जलेगा-बुझेगाउतनी बारलक्स टायलेट साबुन! लक्स टायलेट साबुन! वह उतर रहा है भीतर। बूंद-बूंद भीतर जा रहा है। धीरे-धीरे तुम्हारी आत्मा में लक्स टायलेट साबुन भर गया!
तो तुम्हें जो भी नैतिक धारणाएं हजारों साल तक समझाई गई हैंचाहे कितनी ही असंभव होंकितनी ही मूर्खतापूर्ण हों...।
अब दत्ताबाल ने अपने लेख में लिखा है कि वीर्य को ऊपर चढ़ाने की एक बड़ी गहरी तरकीब है।
अब यह मूर्खतापूर्ण बात है। वीर्य को ऊपर कभी चढ़ाया जा सकता नहीं। क्योंकि चढ़ाने के लिए कोई व्यवस्था ही शरीर में नहीं है। कोई न तो नाड़ी हैन कोई स्नायुओं का जाल है। वीर्य को ऊपर चढ़ाया ही नहीं जा सकताचाहे तुम कितना ही शीर्षासन करोलाख करो शीर्षासन। अरेटोंटी ही नहीं है भीतर कि वीर्य ऊपर चढ़ जाए! टोंटी भी तो होनी चाहिए। भीतर जाल भी तो होना चाहिए।
डी.एच.लारेंस ने लिखा है कि वह अपने कुछ मित्रों को लेकर पेरिस की प्रदर्शनी दिखाने ले गया था। वे मित्र थे खानाबदोश अरब के। अब अरब में सबसे ज्यादा तकलीफ है पानी की। पेरिस की होटल! उन्हें किसी चीज में रस ही नहीं। न पेरिस देखने जाएंन प्रदर्शनी देखने जाएंदिन भर बाथरूम में घुसे रहें! बैठे फव्वारे के नीचे! लेटे टब में! बसउनके लिए सबसे बड़ा गुलछर्रा वही था। रेगिस्तानी बेचारेक्या करें!
जिस दिन जाने का दिन आयासब सामान तो रख दिया गया जाकर कारों मेंलेकिन वे जितने खानाबदोश थेबादायून थेवे सब नदारद! लारेंस ने थोड़ी देर रास्ता देखा और पूछा कि भईवे गए कहांउन्होंने कहावे सब बाथरूमों में घुसे हुए हैं!
वह भागाऊपर पहुंचा कि इसमें हम तो गाड़ी चूक जाएंगे! क्या कर रहे होदरवाजा खोलो! दरवाजा खोलातो देख कर हैरान हुआ। वे सब के सब नल की टोंटियां निकालने की कोशिश कर रहे थे! पूछायह तुम क्या कर रहे हो?
उन्होंने कहाये टोंटियां तो हम न छोड़ेंगे! अरेदाम लगते हों तो लग जाएं। ये तो बड़ी गजब की टोंटियां हैं! इन टोंटियों को ले जाएंगे हम तो अपने साथ। अपने घर में लगा लेंगे टोंटियों को। और जब खोलापानी ही पानी!
लारेंस ने कहापागलो! इन टोंटियों के पीछे नालियों का जाल है। ये टोंटियां अकेली काम न आएंगीअगर तुम टोंटियां खोल कर भी ले गए। तो मैं तुमको बाजार से टोंटियां दिलवाए देता हूंइनको खोलने के पीछे मत पड़ो। मगर उन टोंटियों से कुछ भी नहीं निकलेगा। उनके पीछे तो नलों का जाल है। जालों के पीछे दूर सरोवर है। बड़ा लंबा विस्तार है। वह तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता,तुम्हें सिर्फ टोंटी दिखाई पड़ रही है!
वीर्य को ऊपर चढ़ाना! पागल हो गए हो तुमकिसी शरीर-शास्त्री से तो पूछो! हमारे अजित सरस्वती से पूछो! वे तो गायनोकोलाजिस्ट हैं। वे तुम्हें बता सकेंगे कि वीर्य कैसे ऊपर चढ़ सकता है?
दत्ताबाल वीर्य को ऊपर चढ़ाने की बातें बता रहे हैं लोगों को! मगर ये सदियों से सुनी गई बातें हैंतो लोगों को भरोसा आता है।
ये मूढ़तापूर्ण बातें हैं। वीर्य इत्यादि कोई ऊपर नहीं चढ़ता। हांकामवासना रूपांतरित होती है। काम राम बन सकता है। लेकिन कोई वीर्य ऊपर नहीं चढ़ जाता। और चढ़ जाएतो तुम्हारी खोपड़ी गंदी हो जाए!
समझोखोपड़ी में वीर्य चढ़ गया किसी के! अब गए ये काम से। और यह खोपड़ी में वीर्य चढ़ जाएगातो कभी नाक से बहेगा,कभी आंख से आएगाकभी कान से निकलेगा। इनकी हालत बड़ी खस्ता हो जाएगी! मक्खियां भिनभिनाएंगी! देवता तो दूरभूत-प्रेत भी इनके आस-पास न रमेंगे। जो देखेगावही भागेगा दूर! सड़ जाएगा यह आदमी!
मगर व्यर्थ की और मूर्खतापूर्ण बातें अगर बहुत दिन तक प्रचारित की जाएंतो पकड़ जाती हैं। और प्रचार करने वालों को तो कोई संकोच लगता ही नहीं!
एक अंग्रेज यात्रा पर आया हुआ था। उसने देखा हिमालय में बड़ी चर्चा है एक साधु की कि सात सौ साल उसकी उम्र है। भीड़ लगी हुई थी। उसने देखा कि ज्यादा से ज्यादा सत्तर साल का हो सकता है--ज्यादा से ज्यादा। सात सौ सालहद्द हो गई! और वह जड़ी-बूटी बेच रहा थाकि जो भी यह जड़ी-बूटी लेगावह भी सात सौ साल का हो जाएगा। यह जड़ी-बूटी गारंटी हैसात सौ साल तो जिंदा रखेगी हीकम से कमज्यादा कोई भला जिंदा रह जाए। मैं सबूत हूं।
उसने कहाकुछ पता लगाना चाहिए! भारतीय तो खरीद रहे थेक्योंकि भारतीयों को पता वगैरह लगाने का तो हिसाब ही नहीं होता! श्रद्धा करना इनका नियम है। अब जब कह रहा हैतो वृद्ध आदमी हैठीक ही कह रहा होगा। खरीद रहे थे जड़ी-बूटी।
अंग्रेज था वहइतने जल्दी श्रद्धा नहीं कर सका। उसने देखा कि एक छोकरा उसकी जड़ी-बूटी बेचने में सहायता कर रहा है। तोल रहा है इत्यादिपैसे इकट्ठे कर रहा है। उसने उस छोकरे को अलग बुलाया और पांच रुपए का नोट दिया और कहाभइया,तू एक बात बता! तेरे गुरु की सच में कितनी उम्र है?
उसने कहा कि भईमैं नहीं कह सकता। मेरी तो कुल उम्र तीन सौ साल है! तीन सौ साल से उनके साथ हूं। अब उनकी कितनी उम्र हैवे जानें!
वह छोकरा तो कोई बारहत्तेरह साल का था! अंग्रेज ने तो अपना सिर ठोंक लिया। उसने कहाहद्द हो गई। यह छोकरा भी बदमाश है! तीन सौ साल सेकह रहा हैइनके गुरु के साथ हूं। मैं क्या कह सकता हूं! सात सौ साल कहते हैंतो होंगे। जरूर होंगे! वे पांच रुपए भी गए! यह छोकरा भी बदमाश है!
क्या आप दावे के साथ कह सकते हैं कि इस दवा के रगड़ने से सिर पर बाल उग आएंगेचंदूलाल ने दवाफरोश से पूछा।
दावा कैसा हुजूर! पिछले हफ्ते एक साहब ने इस्तेमाल की। कल शाम मियां-बीबी में जूती-पैंजार हुई। मोहल्ले वालों ने सिर के बाल पकड़ कर दोनों को जुदा किया और सोचते ही रह गए कि कौन सा सर मियां का था और कौन सा बीबी का! सात दिन में!
पाखंड है इसलिए कि तुम असंभव को मूल्य बनाए हुए हो। आदमी को हमने इस देश में सामान्य होने का अवसर ही नहीं दिया। हमने उसे साधारणप्राकृतिक होने की सुविधा ही नहीं दी। न हमने उसकी किसी चीज को अंगीकार किया जो प्राकृतिक थी। हमने मूल्य थोप दिए। असंभव मूल्य! उनको वह पूरा कर पाता नहीं बेचारातो क्या करेअगर स्वीकार करे कि पूरा नहीं कर पातातो लोग हंसी-मजाक उड़ाते हैं। लोग कहते हैंअरेतुम आदमी हो कि पशु! हम तो पूरा कर रहे हैंतुमसे क्यों पूरा नहीं होता?
तो उसे भी कहना पड़ता है कि पूरा कर रहा हूं। बिलकुल पूरा कर रहा हूं। सिद्धांत बड़े ऊंचे हैंबिलकुल सही साबित होते हैं! यह उसको भी चेहरा बना कर रखना पड़ता है। और भीतर जो उसे करना हैकरना होता है। इस तरह पाखंड पैदा होता है। पीछे के दरवाजे से एक जीवनबाहर के दरवाजे से एक जीवन।
सरदार बिचित्तर सिंह अमृतसर के माई सेवा बाजार में अपने बालों के लिए कंघा खरीद रहे थे। दुकानदार ने एक जैसे दिखने वाले दो कंघों का दाम पच्चीस पैसे और पचास पैसे बताया। बिचित्तर सिंह ने पूछा कि दूसरे कंघे के पचास पैसे क्योंदुकानदार ने कंघे का ऊपरी भाग दिखाते हुए कहा कि यह देखोयहां छोटी कृपाण भी फिट की गई है।
बिचित्तर सिंह ने खुश होते हुए कहायार तू एक रुपया ले लेमगर मैंनूं ओहू कंघा दे दो जिहदे विच कच्छा वी फिट होवे! फिर तो मजा ही मजा आ जाए!
अरेसरदार होने के लिए पांच ही चीजें तो जरूरी हैंपांच ककार। कंघा होना चाहिएसमझो एक-बटा-पांच सरदार हो गए! कच्छा हुआऔर एक अंग जुड़ गया! कृपाण हुईफिर तो कहना ही क्याऔर तीसरा अंग जुड़ गया! कड़ा हुआफिर तो क्या कहना;चार अंग जुड़ गए! अब बचा ही क्या! केश और होना चाहिए। अब जब कंघा ही हैतो केश बढ़ाने में क्या दिक्कत! पांच क हो गए पूरेकि सिक्ख हो गए!
क्या सरल बात निकाल दी! और बिचित्तर सिंह ने बेचारे ने कुछ गलत बात न पूछी। उसने कहायह तो बड़े मजे की बात है। कंघा में तीन चीजें आ गईंअब दो ही बचीं। अरेदो-चार केश और लपेट लिए तो चौथी भी हो गई! और कंघा ही में एक कड़ा और पहना दियाफिर कहना ही क्या! कंघा रहा जेब में कि सब चीजें पूरी हो गईं। सरदारी पूरी हो गई!
जब तुम व्यर्थ की बातों को आदर देना शुरू करोगे और सार्थक और प्राकृतिक जीवन को इनकार करोगेतो पाखंड पैदा होता है।
अब तुम पूछते हो दयानंदपाखंड कैसे जाए?
आज जा सकता हैअभी जा सकता है। मगर उसके साथ तुम्हें हिम्मत करनी होगी। तुम्हें स्वीकार करना पड़ेगा जीवन की सहजता को।
अब तुम कहते होइतनी काहिलता हैयह कैसे जाएगी?
यह काहिलता इसलिए है कि तुम्हें सिखाई गई है काहिलता। तुम्हें कहा गया हैपरमात्मा के बिना इशारे के पत्ता नहीं हिलता! अरेतो तुम क्यों हिलो! जब पत्ता ही नहीं हिलता। और जब उसको हिलाना होगा हिलाएगा! जब तक नहीं हिलाना हैतुम लाख कोशिश करोहिला नहीं सकते! तो फिर कोशिश ही क्यों करनीसब परमात्मा पर छोड़ कर बैठ गए होइसलिए काहिल हो।
जीवन कर्म है। और कर्म का त्याग हमने सिखाया लोगों को! हम कहते हैंसंन्यास का अर्थ है कर्म को छोड़ दो! और संन्यासी महात्मा है। मैं तुमसे कहता हूंकर्म के साथ ध्यान को जोड़ दो। और संन्यास पूरा हो गया। कर्म को छोड़ना नहीं हैकर्म को ध्यान के साथ जोड़ना है। और तब यह काहिलता मिट जाएगी।
और यह इतनी सड़ांध जो दिखाई पड़ती हैयह इसीलिए है। जब कमल कमल न हो पाएतो कीचड़ ही रह जाती है। कीचड़ कमल हो जाएतो सुगंधऔर कमल कमल न हो पाएकीचड़ ही रह जाएतो दुर्गंध।
यह देश कीचड़ ही रह गया। और इस देश को कीचड़ बनाए रखने में तुम्हारे महात्माओं का हाथ हैतुम्हारे धर्मों का हाथ है,तुम्हारे तथाकथित नैतिक गुरुओं का हाथ है। और जब तक तुम इस सारी गुलामी से मुक्त न होओगेइस देश के भाग्य का सूर्योदय नहीं हो सकता है।
लेकिन सब तुम्हारे हाथ में है। सूर्योदय हो सकता है। उसी की हम यहां चेष्टा में लगे हैं।

शोरकेवल शोर चारों ओर
दर्द होता जा रहा मुंहजोर
इस तरह भटका हुआ है आदमी
शून्य में लटका हुआ है आदमी
एक तिनके सी बची है जिंदगी
सांस की डोर हुई कमजोर।

हर दिशा ने आचरण बदले
किस तरह बागी उमर सम्हले
इस कदर पथरा गया है मन
भीगती है आंख की बस कोर।

एक पत्ता तक नहीं अपना
खेत और खलिहान हैं सपना
एक दिन आकर रहेगी रोशनी
आज कुहरे में ढंकी है भोर।

आज तो जरूर रात हैलेकिन सुबह हो सकती है।

आज इतना ही।

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