मंगलवार, 15 अगस्त 2017

अष्‍टावक्र: महागीता-भाग-2 - प्रवचन--12

दिनांक: 7 अक्‍टूबर, 1976;

      श्री रजनीश आश्रम, पूना।
अष्टावक्र उवाच:

            कृताकृते न द्वंद्वानि कदा शांतानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाभ्रव त्यागपरोऽव्रती ।। 83।।
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा व बुभुत्सोयशमं गताः ।। 84।।
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितय दूषितम्।
असारं निंदितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ।। 85।।
काउसौ कालो वया: किं वा यत्र द्वंद्वानि नो नृणाम्।
तान्युयेक्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाघ्नुयात।। 86।।
नाना मतं महर्षीणां साधुनां योगिनां तथा।
द्वष्टव निर्वेदमापन्‍न: को न शाम्यति मानव:।। 87।।
कृत्वा मूर्तियरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरू:।
निर्वेदसमतायक्तया यस्तारयति संसते: ।। 88।।
पश्य भूतविकारास्त्‍वं भूतमात्रान् यथार्थत:।
तत्‍क्षणाद बंधनिर्मुक्त: स्वरूयस्थो भविष्यसि।। 89।।
वासना एव संसार ड़ति सर्वा विमुज्‍च ता:।
तत्यागो वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा ।। 90।।


ष्टावक्र ने कहा :
'किया और अनकिया कर्मऔर द्वंद्व किसके कब शांत हुए हैं! इस प्रकार निश्चित जान कर इस संसार में उदासीन (निर्वेद) हो कर अव्रती और त्यागपरायण हो। '
कृताकृते च द्वंद्वानि कदा शातानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निवेंदाद्भ्रव त्यागपरोग्वृती।।
बहुत बहुमूल्य सूत्र है। एक—एक शब्द को ठीक से समझने की कोशिश करें।
'किया और अनकिया कर्म...। '
मनुष्य उससे ही नहीं बंधता जो करता हैउससे भी बंध जाता है जो करना चाहता है। किया या नहींइससे बहुत भेद नहीं पड़ताकरना चाहा था तो बंधन निर्मित हो जाता है। चोरी की या नहीं—अगर की तो अपराध हो जाता हैलेकिन न की हो तो भी पाप तो हो ही जाता है।
पाप और अपराध का यही भेद है। सोचातो पाप तो हो गया। कोई पकड़ नहीं सकेगा। कोई अदालतकोई कानून तुम्हें अपराधी नहीं ठहरा सकेगाअपने घर में बैठ कर तुम सोचते रहो—डाके डालनाचोरी करनीहत्या करनी—कौन नहीं सोचता है!
विचार पर समाज का कोई अधिकार नहींजब तक कि विचार कृत्य न बन जाए। इस कारण तुम इस भांति में मत पड़ना कि विचार करने में कोई पाप नहींक्योंकि तुमने विचार कियातो परमात्मा के समक्ष तो तुम पापी हो ही गए। तुमने सोचा—इतना काफी हैतुम तो पतित हो ही गए। विचार की तरंग उठीन बनी कृत्यइससे भेद नहीं पड़तालेकिन तुम्हारे भीतर तो मलिनता प्रविष्ट हो गई।
कियातो अपराध बन जाता हैन कियासोचातो भी पाप बन जाता है। और अपराध से तो बचने के उपाय हैंक्योंकि कानूनअदालतपुलिसइनसे बचने की व्यवस्थाएं खोजी जा सकती हैंखोज ली गई हैं। जितने कानून बनते हैंउतना कानून से बचने का उपाय भी निकल आता है। आखिर वकीलों का सारा काम ही वही है।
'वकीलशब्द सूफियों का है—बडी बुरी तरह विकृत हुआ। वकील के जो मौलिक अर्थ हैंवे हैं. जो परमात्मा के सामने तुम्हारा गवाह होगा कि तुम सच हो। मुहम्मद वकील हैं। वे परमात्मा केn
सामने गवाही देंगे कि हीयह आदमी सच है। लेकिन फिर वकील शब्द का तो बड़ा अजीब पतन हुआ। अब तो तुम झूठ हो या सचतुम्हारे लिए जो गवाही दे सकता है और प्रमाण जुटा सकता है कि तुम सच होवस्तुत: तुम जितने झूठे होउतना ही जो प्रमाण जुटा सके कि तुम सच हो—वह उतना ही बड़ा वकील। अगर तुम सच हो और वकील तुम्हें सच सिद्ध करेतो उसकी वकालत का क्या मूल्यकौन उसको वकील कहेगावकील तो हम उसी को कहते हैं इस दुनिया मेंजो झूठ को सच करेसच को झूठ करे।
सूफियों का शब्द था वकील—और वकील का अर्थ था : गुरु तुम्हारा वकील होगा। वह तुम्हें परमात्मा के सामने प्रमाण देगा कि मेरी गवाही सुनोयह आदमी सच है। जीसस ने कहा है अपने अनुयायियों से कि 'तुम घबड़ाना मतआखिरी क्षण में मैं तुम्हारा गवाह रहूंगा। मेरी गवाही का भरोसा रखना। 'वह वकालत है।
लेकिन साधारणत: तो वकील का अर्थ हैजो तुमसे कहे : घबड़ाओ मतपाप कियाझूठ बोलेचोरी की—कोई फिक्र मत करोकानून से बचने का उपाय है। आदमी ऐसा कोई कानून तो खोज ही नहीं सकताजिससे बचने का कोई उपाय न हो। आदमी ही कानून खोजता हैआदमी ही कानून से बचने का उपाय भी खोज लेगा।
अपराध से तो तुम बच सकते हो—और अक्सर बड़े अपराधी बच जाते हैंछोटे अपराधी पकड़े जाते हैं। जिसको बचाने वाला कोई नहींवे फंस जाते हैं। जिनको बचाने के लिए धन हैसुविधा हैसंपत्ति हैवे बच जाते हैं। बड़े अपराधी नहीं पकड़े जाते। बड़े अपराधी तो सेनापति हो जाते हैंराजनेता हो जाते हैं। बड़े अपराधी तो इतिहास—पुरुष हो जाते हैं। छोटे अपराधी कारागृहों में सड़ते हैं।
लेकिन जहां विचार का संबंध हैवहां कोई तुम्हें बचा न सकेगा। यहां तुमने विचार किया कि तुम पतित हो ही गए। ऐसा अगर होता कि अभी तुम विचार करते और कई जन्मों के बाद पतित होतेतो बीच में हम कोई उपाय खोज लेतेरिश्वत खिला देते। ऐसा कोई उपाय नहीं है। विचार किया कि तुम पतित हुए।
तुमने देखाजब तुम भीतर विचार करते हो क्रोध कातो तुम्हारे लिए तो क्रोध घट ही गया! तुम तो उसी में उबल जाते हो। तुम तो जल जाते होतुम तो दग्ध हो जाते हो। फिर तुमने क्रोध किया है या नहीं कियायह दूसरी बात है। भीतर— भीतर तो छाले पड़ गएभीतर— भीतर तो घाव हो गए। वह तो क्रोध के भाव में ही हो गए। क्रोध में ही क्रोध का परिणाम है।
इसलिए परमात्मा को धोखा देने का उपाय नहीं है। उसने परिणाम को कारण से दूर नहीं रखा है। आग में हाथ डालो तो ऐसा नहीं कि इस जन्म में हाथ डालोगे और अगले जन्म में जलोगेहाथ डाला कि जल गये।
यहां भी आदमी ने तरकीबें निकाली हैं। लोग कहते हैं : अभी करोगेअगले जन्म में भरोगे। क्या मजे की बात कह रहे हैं! वे कह रहे हैं : अभी पाप करोगेअगले जन्म में मिलेगा फलइतनी तो अभी सुविधा है! कौन देख आया अगले जन्म की! और तब तक बीच में कुछ पुण्य कर लेंगेबचने का कुछ उपाय कर लेंगेपूजाप्रार्थनाअर्चना कर लेंगेपंडितपुरोहित को नौकरी पर लगा देंगेमंदिर बना देंगेदान करेंगेधर्मशाला बना देंगे—कुछ कर लेंगे! अभी तो होता नहीं!
पंडितों ने तुम्हें समझाया है कि धर्म उधार है। यह हो नहीं सकताक्योंकि धर्म तो उतना ही वैज्ञानिक है जितना विज्ञान। अगर विज्ञान नगद है तो धर्म उधार नहीं हो सकता। आग में हाथ डालते हो तो अभी जलते हो। क्रोध करोगे तो भी अभी जलोगे। बुरा सोचोगे तो बुरा हो गया।
विचार से मनुष्य पाप करता है और जब पाप को कृत्य तक ले आता है तो अपराध हो जाते हैं। अपराधों से तो बचने का उपाय हैलेकिन अगर तुमने सोच लिया बुरा विचारतो बस घटना घट गईअब बचने की कोई सुविधा न रहीजो होना था हो गया।
अष्टावक्र कहते हैं : 'किया और अनकिया कर्म और द्वंद्वसुख और दुख का संघर्षणकिसके कब शांत हुए हैं!'
बड़ी अनूठी बात कह रहे हैं। वे कह रहे हैं तुम इनको शांत करने में मत लग जानाअन्यथा और अशांत हो जाओगे। ये कब किसके शांत हुए हैं!
तुमने कभी कोई ऐसा आदमी देखाजिसके सुख—दुख शांत हो गए होंमहावीर की भी मृत्यु होती तो पेचिस की बीमारी से होती। बुद्ध की मृत्यु होती है तो विषाक्त भोजन शरीर में फैल जाता है—विष के कारण होती है। जीसस सूली पर लटक कर मरते हैं। सुकरात जहर पी कर मरता है। रमण को कैंसर थारामकृष्ण को कैंसर था। सुख—दुख कब किसके शांत हुए! सुख—दुख तो चलते ही रहेंगे—और विचार भी!
किये — अनकिये कर्मों से भी बिलकुल छुटकारा नहीं हो सकता। तुम कैसे छुटकारा करोगेतुम कहो कि हम बिलकुल बैठ जाएंगेहम कुछ करेंगे ही नहीं—यही तो पुराने ढब का संन्यासी कहता है : हम बैठ जाएंगेकुछ करेंगे ही नहीं—लेकिन बैठना कर्म है। बैठे —बैठे हजारों चीजें हो जाएंगी। तुम बैठोगेसांस तो लोगेसांस लोगे तो पूछो वैज्ञानिक सेवह कहता है एक श्वास में लाखों जीवाणु मर जाते हैं। हो गई हत्याहो गई हिंसा। बांध लो कितनी ही मुंहपट्टी मुंह परबन जाओ जैन तेरापंथी मुनि,बांध लो मुंहपट्टी—कुछ फर्क नहीं पड़ता। तुम्हारी पट्टी से टकरा कर मर जाएंगे। मुंह तो खोलोगेबोलोगे तोश्रावकों को समझाओगे तोवह जो मुंह से गर्म हवा निकलती हैउसमें मर जाएंगे। भोजन तो करोगेपानी तो पीयोगेकुछ तो करोगे ही—जब तक जीवन है कृत्य तो रहेगा। और प्रत्येक कृत्य के साथ कुछ न कुछ हो रहा है। प्रत्येक कृत्य में कुछ न कुछ हिंसा हो ही रही है। जीवन हिंसाशून्य हो ही नहीं सकता। भाग जाओगेछोड़ दोगे सब—जहां जाओगे वहां कुछ न कुछ करना पड़ेगा। भीख तो मांगोगे?
कृत्य तो जारी रहेगाजीवन का अनिवार्य अंग है। जीवन जब शून्य हो जातातभी कृत्य शून्य होता है। और जब कुछ करोगे तो कुछ विचार भी चलते रहेंगे। अब संन्यासी बैठा हैउसे भूख लगी है तो विचार न उठेगा कि भूख लगीमहावीर को भी उठता होगा कि भूख लगीनहीं तो भिक्षा मांगने क्यों जातेविचार तो स्वाभाविक हैउठेगा कि अब भूख लगी। रास्ते पर अंगारा पड़ा हो तो महावीर भी हों तो बच कर निकलेंगेउनको भी तो विचार उठेगा कि अंगारा पड़ा हैइस पर पैर न रखूं पैर जल जाएगा। तुम पत्थर महावीर की तरफ फेंकोगे तो उनकी आंख भी झप जाएगी। इतना तो विचार होगा नइतनी तो तरंग होगी नकि पत्थर आ रहा हैआंख फूटी जाती हैआंख झपा लो!
विचार तो उठता रहेगाक्योंकि विचार भी जीवन का अनुषंग है। जब तक श्वास चलती हैतब तक विचार भी उठता रहेगा। इसका क्या अर्थ हुआक्या इसका अर्थ हुआ कि आदमी के शांत होने का कोई उपाय नहींनहींउपाय है। उसी उपाय की तरफ इंगित करने के लिए अष्टावक्र कहते हैं कि पहले यह समझ लो कि कौन—कौन से उपाय काम नहीं आएंगे। छोड़ कर भागना काम नहीं आएगा। कर्म से बचना काम नहीं आएगा। विचार से लड़ना काम नहीं आएगा।
कृताकृते च द्वंद्वानि कदा शांतानि कस्य वा।
तू मुझे बता जनककिसके कब विचार शांत हुए हैंकिसके कब द्वंद्वदुख शांत हुए?
जीवन है तो द्वंद्व है। दिन को जागोगेतो रात सोओगे नद्वंद्व शुरू हो गयादोहरी प्रक्रियाएं हो गईं। श्रम करोगे तो विश्राम करोगे। सुख होगा तो उसके पीछे दुख आएगाजैसे दिन के पीछे रात आती है। रात के पीछे फिर दिन चला आ रहा है। हर सुख के पीछे दुख हैहर दुख के पीछे सुख है—श्रृंखला बंधी है। श्वास भीतर लोगे तो फिर बाहर भी तो छोड़ोगे ननहीं तो फिर भीतर न ले सकोगे। बाहर लोगे श्वास तो भीतर जाएगीभीतर लोगे तो बाहर जाएगी—द्वंद्व जारी रहेगा।
इस जीवन की सारी गति द्वंद्वात्मक है। दो पैर से आदमी चलता है। सब चलने में दो की जरूरत है। दो पंख से पक्षी उड़ता है। उड़ने में दो की जरूरत है। एक पंख काट दोपक्षी गिर जाएगा। एक पैर काट दोआदमी गिर जाएगा।
जीवन द्वंद्व से चलता है। जो निर्द्वंद्व हुआ वह तत्‍क्षण गिर जाएगा। इसलिए तो परमात्मा तुम्हें कहीं दिखाई नहीं पड़ता। जो भी दिखाई पड़ता हैवह द्वंद्व से घिरा होगा। जहां द्वंद्व गयावहां दृश्य भी गयावहां व्यक्ति अदृश्य हो जाता है। जीवन तो उसी अदृश्य का दृश्य होना है।
इसलिए अष्टावक्र कहते हैं. किया—अनकिया कर्मद्वंद्व किसके कब शांत हुए! तो तू इस उलझन में मत पड़ जाना कि इनको शांत करना है।
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैंमन में बड़ा क्रोध हैइसे कैसे शांत करेंमैं उनसे कहता हूं झंझट में मत पड़ो। क्रोध को कौन कब शांत कर पाया हैतुम तो साक्षी— भाव से देखो—जों है सो है—और देखते से ही शांत होना शुरू हो जाता है। लेकिन यह शांति बड़ी और है।
इसका यह अर्थ नहीं है कि तरंगें नहीं उठेंगीतरंगें उठती रहेंगीलेकिन तुम तरंगों से दूर हो जाओगे। तरंगें उठती रहेंगी,लेकिन इन तरंगों से तुम्हारा तादात्म्य टूट जाएगा। तुम ऐसा न समझोगे. ये तरंगें मेरी हैं। भूख लगेगी तो तुम ऐसा न समझोगे : मुझे भूख लगीतुम समझोगे. शरीर को भूख लगी। पैर में कांटा चुभेगा तो तुम समझोगे : शरीर को पीड़ा हुई। विचार तो उठेगा—तुम में भी उठता हैमहावीर में भी उठता है। तुममें उठता है : अरेमुझे पीड़ा हुई! महावीर को उठता है : अरेशरीर को कांटा गड़ा! जब तुम मरोगे तो तुम्हें विचार उठता है. मैं मरा! जब रमण मरते हैंतो उन्हें विचार उठता है यह शरीर के दिन पूरे हुए। मृत्यु तो होगी ही। वह तो जन्म के साथ ही बंधा है द्वंद्व।
'इस प्रकार निश्चित जान कर इस संसार में उदासीन हो कर अव्रती और त्यागपरायण हो। '
एक—एक शब्द कोहिनूर जैसा है!
'इस प्रकार निश्चित जान कर...। '
एवं ज्ञात्वेह.......।
ऐसा जान कर!






'निश्चित जान करका क्या अर्थ हैसुन कर नहींकिसी और के जानने से उधार ले कर नहीं—ऐसा जीवन का अवलोकन करके। ऐसा जीवन को देख कर कि द्वंद्व यहां रुक कैसे सकता हैयहां विचार समाप्त कैसे हो सकते हैंसागर की सतह पर तो चलती ही रहेंगी तरंगें। हवा के इतने झकोरे हैंसूरज निकलेगाबादल आएंगेहवा चलेगीतूफान उठेंगे—सतह पर तो सब चलता ही रहेगा। इतना ही हो सकता है कि तू सतह पर मत रहतू सरक जरासरक कर अपने केंद्र पर आ जा।
प्रत्येक के भीतर एक ऐसी जगह है जहां कोई तरंग नहीं पहुंचती। तुम तरंग को रोकने की चेष्टा मत करोतुम तो वहां सरक जाओ जहां तरंग नहीं पहुंचती। बाहर तुम बैठे होसुबह हैसर्दी के दिन हैंधूप सुहावनी लगतीमीठी लगतीफिर थोड़ी देर में सूरज ज्यादा गर्म हो आयाऊपर आ गयाऊपर उठने लगापसीना—पसीना होने लगे—अब तुम क्या करते होक्या तुम सूरज के ऊपर पानी छिड़कते हो कि चलो ठंडा कर दो सूरज को थोड़ातुम चुपचाप सरक जाते अपने घर की छाया मेंतुम हट आते छप्पर के नीचे।
अब कोई आदमी ले कर हांज और सूरज को ठंडा करने की कोशिश करने लगेतो उसको तुम पागल कहोगे। तुम कहोगे.'अरे पागल! सूरज को कौन कब शांत कर पाया!यही अष्टावक्र कह रहे हैं. जब सूरज बहुत गर्म हो जाए तो चले जाना भूमिगत कमरों मेंजहां कोई सूरज की किरण न पहुंचती हो। सरकते जाना भीतर!
प्रत्येक के भीतर एक ऐसी जगह है जहां कोई तरंग नहीं पहुंचतीवही तुम्हारा केंद्र हैवही तुम्हारा स्वरूप है। उस गहराई में ही तुम्हारा वास्तविक 'होनाहै।
'इस प्रकार निश्चित जान कर—एवं ज्ञात्वेह—ऐसा जान कर...। '
मगर यह मैं कहूं, इससे न होगा। अष्टावक्र कहेंइससे भी न होगा। वेद—कुरान कहते रहे हैंकुछ भी नहीं होता। जब तक तुम न जानोगेजब तक यह तुम्हारी प्रतीति न बनेगी..।
ज्ञान मुफ्त नहीं मिलता और उधार भी नहीं मिलता—जीवन के कड़वे—मीठे अनुभव से मिलता हैजीवन जी कर मिलता हैजीवन को जीने में जो पीड़ा हैतप हैउस सबको झेल कर मिलता है। 'ऐसा निश्चित जान कर आदमी इस संसार में उदासीन हो जाता है। '
'उदासीनशब्द बड़ा प्यारा है। आसीन का मतलब तो तुम समझते ही हो. बैठ जानाआसन। उदासीन का अर्थ है अपने में बैठ जानाअपनी गहराई में बैठ जानाऐसे सरक जाना अपने भीतर कि जहां बाहर की कोई तरंग न पहुंचती हो।
हैरिगेल ने बड़ी मीठी घटना लिखी है अपने झेन गुरु के बाबत। हैरिगेल जापान में था और तीन वर्षों तक धनुर्विद्या सीखता था एक झेन गुरु से। धनुर्विद्या भी ध्यान को सिखाने के लिए एक माध्यम है। तीन वर्ष पूरे हो गए थे और हैरिगेल उत्तीर्ण भी हो गया था—बामुश्किल उत्तीर्ण हो पाया। क्योंकि पाश्चात्य बुद्धि तकनीक को तो समझ लेती हैटेक्योलॉजिकल है,लेकिन उससे गहरी किसी बात को समझने में उसे बड़ी अड़चन होती है।
वह झेन गुरु कहता था : तुम चलाओ तो तीरलेकिन ऐसे चलाओ जैसे तुमने नहीं चलाया। अब यह बड़ी मुश्किल बात है। हैरिगेल निष्णात धनुर्विद था। सौ प्रतिशत उसके निशाने ठीक बैठते थे। लेकिन वह गुरु कहता : नहींअभी इसमें झेन नहीं हैअभी इसमें ध्यान नहीं है।
हैरिगेल कहता मेरे निशाने बिलकुल ठीक पड़ते हैंअब और क्या चाहिए?
यह पाश्चात्य तर्क है कि जब निशाने सब ठीक लग रहे हैंसौ प्रतिशत ठीक लग रहे हैंतो अब और क्या इसमें भूल—चूक हैलेकिन झेन गुरु कहता. हमें तुम्हारा निशाना ठीक लगता है कि नहींइससे सवाल नहींतुम ठीक हो या नहींइससे सवाल है। निशाना चूके तो भी चलेगा। निशाने की फिक्र किसको हैतुम न चूको।
बात बड़ी कठिन थी। वह कहता. तुम ऐसे तीर चलाओ कि चलाने वाले तुम न रहोकर्ता तुम न रहोतुम सिर्फ साक्षी। चलाने दो परमात्मा कोचलाने दो विश्व की ऊर्जा कोमगर तुम न चलाओ।
अब यह बड़ी कठिन बात है। हैरिगेल कहेगा कि मैं न चलाऊ तो मैं फिर तीर को प्रत्यंचा पर रखूं ही क्योंअब जो रखूंगा तो मैं ही रखूंगा। जब खींका प्रत्यंचा को तो मैं ही खींकाकौन बैठा है खींचने वालाऔर जब तीर का निशाना लगाऊंगा तो मैं ही लगाऊंगाकौन बैठा है देखने वाला औरतीन वर्ष बीत गए और गुरु ने उससे कहा कि अब बहुत हो गयाअब तुम्हारी समझ में न आएगा। यह बात नहीं होने वालीतुम वापिस लौट जाओ।
तो आखिरी दिन वह छोड़ दिया. उसने खयाल कियाअपने से होने वाला नहीं है या यह कुछ पागलपन का मामला है। वह गुरु से विदा लेने गया है। गुरु दूसरे शिष्यों को सिखा रहा है। तीन वर्ष उसने कई बार गुरु को तीर चलाते देखालेकिन यह बात दिखाई न पड़ी थी। नहीं दिखाई पड़ी थीक्योंकि खुद की चाह से भरा था कि कैसे सीख लूंकैसे सीख लूंबड़ा भीतर तनाव था। आज सीखने की बात तो खत्म हो गई थी। वह विदा होने को आया है—आखिरी नमस्कार करने। कुछ भी हो इस गुरु ने तीन वर्ष उसके साथ मेहनत तो की है। तो वह बैठा है एक बेंच परगुरु दूसरे शिष्यों को सिखा रहा है। वह खाली हो जाए,तो हैरिगेल उससे क्षमा मांग ले और विदा ले ले। खाली बैठे— बैठे उसको पहली दफा दिखाई पड़ा कि अरेगुरु उठाता है प्रत्यंचा,लेकिन जैसे उसने नहीं उठाई। कोई तनाव नहीं है उठाने में। रखता है तीरलेकिन जैसे उदासीन। चढ़ाता है हाथखींचता है हाथ,लेकिन जैसे प्रयोजन—शून्यसूना—सूनाभीतर कोई चाहत नहीं है कि ऐसा होजैसे कोई करवा ले रहा है! तुमने फर्क देखा पू तुम अपनी प्रेयसी से मिलने जा रहे हो तो तुम्हारी गति और होती हैऔर किसी के संदेशवाहक हो कर जा रहे होकिसी ने चिट्ठी दे दी कि जरा मेरी प्रेयसी को पहुंचा देनातो तुम रख लेते हो उदासीन मन से खीसे मेंतुम्हें क्या लेना—देना! चले जाते होदे भी देते होमगर वह गतित्वराज्वरजो तुम्हारी प्रेयसी की तरफ जाने में होता हैवह तो नहीं होतातुम सिर्फ संदेशवाहक हो।
तुमने देखापोस्टमैन आता हैडाकिया! तुम्हें लाख रुपये की लाटरी मिल गई होवह ऐसे ही चला आता है कि जैसे दो कौड़ी का लिफाफा पकड़ा रहा है। तुम्हें हैरानी होती है कि अरेतू कैसा पागल हैलाख रुपये मुझे मिल गए और तू बिलकुल ऐसे ही चला आ रहा है जैसे रोज आता है—वही रोनी सूरतवही साइकिल पर सवार चला आ रहा है! मगर उसे क्या लेना—देना हैसंदेशवाहकसंदेशवाहक है।
देखा हैरिगेल ने कि गुरु ठीक कहता थामैं चूकता रहा हूं। वह उठाऔर चकित हुआ थोड़ा,
क्योंकि उसे लगा. मैं नहीं उठा हूं कोई चीज उठी! वह उठ कर गुरु के पास गयाउसने गुरु के हाथ से तीर—कमान ले लिया,चढ़ायानिशाना मारा और गुरु प्रफुल्लित हो गयाउसने गले से लगा लिया। उसने कहाहो गया! आज 'उसनेचलाया। आज तू उदासीन था। तीन वर्ष में जो न हो पायावह आज आखिरी घड़ी में हो गया।
उसकी खुशी में उसने गुरु को निमंत्रण दिया कि आज मेरे साथ भोजन करें। गुरु आयाएक सात—मंजिल मकान में भोजन करने बैठेअचानक भूकंप आ गया। जापान में आमतौर से भूकंप आ जाते हैं। सब भागेपूरा भवन कंप गया। हैरिगेल खुद भी भागा। भागने में उसे यह भी याद न रही कि गुरु कहां है। सीडी पर भीड़ हो गईक्योंकि कोई पचीस—तीस आदमियों को उसने बुलाया था। तो उसने पीछे लौट कर देखागुरु तो शांत आंख बंद किए बैठा हैजहां बैठा थावहीं बैठा है। हैरिगेल को यह इतना मनमोहक लगा—यह घटनागुरु का यह निश्चित रहनायह भूकंप का होनायह मौत द्वार पर खड़ीयह मकान अभी गिर सकता हैसात—मंजिल मकान हैकंपा जा रहा है जड़ों सेऔर गुरु ऐसा बैठा है निश्चितजैसे कुछ भी नहीं हो रहा है! वह भूल ही गया भागना। ऐसा कुछ जादू गुरु की मौजूदगी में उसे लगा! कुछ ऐसी गहराईजो उसने कभी नहीं जानी! वह आ कर गुरु के पास बैठ गयाकंप रहा हैलेकिन उसने कहा कि मेहमान घर में बैठा हो और मेजबान भाग जाएयह तो अशोभन है—तो मैं भी बैठूंगाफिर जो इनका होगामेरा भी होगा। भूकंप आया और गयाक्षण भर टिका। गुरु ने आंख खोलीऔर जहां से बात टूट गई थी भूकंप के आने और लोगों के भागने के कारणउसे फिर वहीं से शुरू कर दिया।
हैरिगेल ने कहा. छोड़िए भीअब मुझे कुछ याद नहीं कि कौन—सी हम बात कर रहे थे। वह बात आयी—गयी हो गईइस संबंध में कुछ अब मुझे जानना नहीं। मुझे कुछ और जानने की उत्सुकता है। इस भूकंप का क्या हुआहम सब भागेआप नहीं भागे?
गुरु ने कहा : तुमने देखा नहींभागा मैं भी। तुम बाहर की तरफ भागेमैं भीतर की तरफ भागा। तुम्हारा भागना नासमझी से भरा हैक्योंकि तुम जहां जा रहे हो वहां भी भूकंप है। पागलोजा कहां रहे होइस मंजिल पर भूकंप है तो छठवीं पर नहीं हैतो पांचवीं पर नहीं हैतो चौथी पर नहीं हैक्या पहली मंजिल पर नहीं हैतुम अगर किसी तरह मकान के बाहर भी निकल गएतो सड़क पर भी भूकंप है। तुम भूकंप में ही भागे जा रहे हो। तुम्हारे भागने में कुछ अर्थ नहीं है। मैं ऐसी जगह सरक गयाजहां कोई भूकंप कभी नहीं जाते। मैं अपने भीतर सरक गया। इस भीतर सरक जाने का नाम है 'उदासीन'—अपने भीतर बैठ गए!
भूकंप आएगा तो शरीर तक जा सकता हैज्यादा से ज्यादा मन तक जा सकता हैइससे पार भूकंप की कोई गति नहीं है। तुम्हारी आत्मा में भूकंप के जाने का कोई उपाय नहीं है। क्योंकि उन दोनों के होने का ढंग इतना अलग है कि एक—दूसरे का कहीं मिलन नहीं हो सकता। भूकंप आएगा तो शरीर पर तो निश्चित परिणाम होगाक्योंकि शरीर इसी मिट्टी का बना हैइसी भूमि का बना हैजिसमें भूकंप आया है। दोनों की तरंगें एक हैं। दोनों एक ही धातु से निर्मित हैंएक ही द्रव्य से निर्मित हैं। तो पूरी भूमि कैप रही हो तो तुम्हारा शरीर न कंपेयह नहीं हो सकताशरीर तो कंपेगा।
यही तो कहते अष्टावक्र कि अरे पागलकौन कब शांत हुआकौन कब सुख—दुख के पार
हुआएक सीमा तक तो सब कंपता ही रहेगा। भूकंप आएगा तो महावीर को भी आएगाकोई तुम्हारा शरीर ही थोड़े ही टूटेगा?अगर महावीर होंगे तो उनका शरीर भी टूटेगा। शरीर तो मिट्टी का हैतो मिट्टी के नियम काम करेंगे। और जब भूकंप आएगा और शरीर टूटेगातो मन भी विचलित होगाक्योंकि मन तो शरीर का गुलाम हैक्योंकि मन तो शरीर का सेवक हैक्यौंकि मन तो शरीर का ही अपने को बचाए रखने का एक उपाय हैअपनी सुरक्षा है।
जब भूख लगती है तो मन कहता भूख लगीक्योंकि शरीर अबोल हैगंगा हैतो उसने एक बोलने वाले का सहारा ले रखा है। प्यास लगती है तो मन कहता है प्यास लगीशरीर कह न सकेगा। तो जैसा तुमने सुना होगा कि एक अंधे आदमी ने और एक लंगड़े आदमी ने दोस्ती कर ली थी—दोनो भिखमंगे थेएक—दूसरे को सहारा देते थे। अंधा देख नहीं सकता थालंगड़ा चल नहीं सकता था। अंधा चल सकता थालंगड़ा देख सकता था—दोनों की दोस्ती काम आई। अंधा बैठा लेता था लंगड़े को अपने कंधों परदोनों भिक्षा मांग आते थे। दोनों अकेले तो असमर्थ थेदोनों साथ—साथ बड़े समर्थ हो जाते थे।
शरीर में घटना घटती हैमन में अंकन होता है। मन और शरीर का संयोग है। मनोवैज्ञानिक तो कहते हैंमन और शरीर इस तरह दो चीजों की बात नहीं करनी चाहिए—मनोशरीर। एक ही घटना हैउसका एक बाहर का हिस्सा हैएक भीतर का हिस्सा है। तो अब नवीन मनोविज्ञान में शरीर और मन ऐसे दो शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाताबल्कि 'मनोशरीरका प्रयोग किया जाता हैसाइकोसोमैटिक। दोनों संयुक्त हैं।
इसलिए जो शरीर में घटता हैउसी तरंगें मन तक पहुंच जाती हैं। सच तो यह है शरीर में घटा नहीं कि तरंगें पहुंच जाती हैं। कभी—कभी तो शरीर में घटने के पहले पहुंच जाती हैं। जैसे कोई आदमी छुरा लिए चला आ रहा है मारने तुम्हेंतो अभी शरीर में तो छुरा लगा नहींलेकिन मन में खबर पहले पहुंच जाएगी।
मन की जरूरत ही यही है कि कुछ घटेउसके पहले खबर दे दे कि बचोयह आदमी छुरा मारने आ रहा है। तुम जब सोए होतब कोई छुरा मारने आएतो मन सोया रहता है। शरीर तो मौजूद रहता हैलेकिन शरीर तो अंधा हैशरीर को तो कुछ दिखाई पड़ता नहींकोई आ जाएछुरा मार जाएतो कुछ पता न चलेगा। तुम जागे हो तो मन सजग है। मन तो ऐसा है जैसे तुमने हवाई जहाज में राडार देखा हो। जैसे राडार का उपकरण दो सौ मील दूर तक देखता रहता हैक्योंकि हवाई जहाज की गति इतनी है अब तोध्वनि से भी ज्यादा गति हैकि अगर दो सौ मील दूर तक दिखाई न पड़े तो दुर्घटना हो जाएगी। क्योंकि एक क्षण लगेगा दो सौ मील पार करने में। अगर हवाई जहाज आठ सौ मील प्रति घंटे की रफ्तार से जा रहा हैतो कितनी देर लगने वाली हैतो अगर हवाई जहाज के सामने ही जब कोई चीज आ जाए तब दिखाई पड़ेतब तो गएतब तो तुम्हारे देखने और बचाने के बीच समय न होगा। तो राडार देखता है दो सौ मीलछह सौ मीलहजार मील दूर—बादल हैं,बिजली चमक रही हैपानी गिर रहा हैक्या हो रहा है?
मन राडार है। वह देखता हैकौन छुरा मारने आ रहा हैवह देखता हैअरेयह वृक्ष गिर रहा हैहट जाओ! वह देखता हैराह पर कांटे पड़े हैंबच जाओ। मगर है वह शरीर का सेवकशरीर
की सेवा में रत है। वह शरीर का ही विकसिततम रूप है। वह शरीर की ही शुद्ध ऊर्जा है।
इसलिए जब शरीर कंपेगातब तो मन कंपेगा ही। कभी—कभी तो शरीर नहीं भी कंपता और मन कंप जाता है। जैसे कि तुमसे कोई कह दे कि भूकंप आने वाला हैअभी आया नहींतब इस शरीर को तो कुछ पता नहीं चल रहालेकिन मन कैप जाएगा कि भूकंप आने वाला है।
देखा अभीपेकिंग में कई दिनों तक लोग घर के बाहर तंबू डाले पड़े रहे! भूकंप आने वाला हैइसकी संभावना से मन तो कंप गयामन तो घबड़ा गया।
अभी यहां कोई जोर से चिल्ला दे, 'आगआग'—इनमें से कई भाग खड़े होंगे। आग न भी लगी होतो भी भाग खड़े होंगे,क्योंकि इसकी सुविधा कहा मिलेगी कि जांच—पड़ताल करेंमन ने सुना आग कि भागा मन।
देखा तुमनेकोई कह दे नीबू और तत्‍क्षण लार मन में बहनी शुरू हो जाती है! अभी नीबू शरीर में डाला नहींलेकिन नीबू शब्द—और भीतर लार बहनी शुरू हो गई! मन तैयारी करने लगा कि नीबू करीब आ रहा है। शब्द आया है तो शायद यथार्थ भी आता होगा।
उस झेन गुरु ने हैरिगेल को कहा : भागे तुमलेकिन तुम्हारा भागना व्यर्थ थाक्योंकि तुम भूकंप में ही भागे जाते थे। भागा मैं भीयद्यपि तुम्हें दिखाई न पड़ामैं भीतर की तरफ भागा। मैंने तत्‍क्षण अपना तादात्म्य शरीर और मन से अलग कर लिया इन पर भूकंप घट सकता हैइनसे दोस्ती अभी ठीक नहीं। मैं तत्‍क्षण अपने को अलग कर लिया। शरीर कंपता रहामन कंपता रहा—मैं भीतर बैठा देखता रहा। भूकंप उग जाता तो शरीर मरतामन टूटताबिखरतामेरा कुछ होने वाला नहीं था। नैनं छिदति शस्त्राणि—नहीं शस्त्र उसे छेद पातेनैनं दहति पावकः —नहीं आग उसे जला पाती है।
'किया और अनकिया कर्म और द्वंद्व किसके कब शांत हुए हैं! इस प्रकार निश्चित जान कर इस संसार में उदासीन,निर्वेद हो कर अव्रती और त्यागपरायण हो। '
तुमने 'उदासीनशब्द सुना होगा। लेकिन इसका ठीक—ठीक अर्थ शायद कभी न समझा होगा। लोग तो समझते हैं. उदासीन का संबंध उदास से है। लोग सोचते हैं : जो जिंदगी से उदास हो गए वे उदासीन। उदास से उदासीन का कुछ लेना—देना नहीं। क्योंकि जिंदगी में जो उदास हो गए हैंवे तो उदासीन हो ही नहीं सकते। जिंदगी में उदास होने का तो इतना ही मतलब है कि अभी उनकी बुद्धि जागी नहींनहीं तो उदास होने को भी यहां कुछ नहीं है। यहां प्रफुल्लित होने को भी कुछ नहीं है,उदास होने को भी कुछ नहीं है। न यहां पाना है न देना है। हानि—लाभ न कछु! अगर लाभ हो सकता हो तो तुम प्रफुल्लित हो जाते होअगर हानि होने लगे तो उदास हो जाते होलेकिन यहां तो न हानि है न लाभ।
इसलिए उदासीन का उदास शब्द से कोई अर्थ नहींभला भाषा—शास्त्र कुछ भी कहते होंमुझे उसका प्रयोजन नहीं है। मैं तुम्हें कुछ आत्म—शास्त्र की बात कह रहा हूं, भाषा—शास्त्री मैं हूं भी नहीं। उदासीन का अर्थ है. अपने भीतर जो आसीनउद— आसीन। जो अपने भीतर बैठ गया! जो अपने अंतरतम में बैठ गया! और वहां से देखने लगा लीलावहां साक्षी हो गया। और सारा जगत बाहर काभीतर का सब दृश्य—मात्रनाटक हो गया।
जो ठीक से जान लेता है—अष्टावक्र कहते है—वह उदासीन हो जाता है। वह फिर यह भी नहीं
कहता कि मुझे शांत होना है। वह कहता है न मैं शांत हो सकता हूं न अशांतमैं तो द्रष्टा हूं। यह शांत और अशांत होने की बात भी मन के साथ तादात्म्य के कारण है। वह यह भी नहीं कहता कि मुझे सुखी होना हैक्योंकि यह सुखी होना और दुखी होनासाथ—साथ चलने वाला है। जो सुखी होना चाहता हैवह दुखी भी होगा। दोनों पंख चाहिए उड़ने के लिए। तुम अकेले सुखी होना चाहते हो—तुम व्यर्थ की आकांक्षा कर रहे होजो कभी सफल नहीं हो सकती। जितने तुम सुखी होना चाहोगेउतने दुखी हो जाओगे। जिसने जान लियावह तो कहता है : अब मुझे न सुखी होनान दुखीन शांतन अशांत।
लोग आते हैं मेरे पास। वे कहते हैंध्यान हमें सीखना— हैक्योंकि हम शांत होना चाहते हैं। उन्हें ध्यान का अर्थ भी पता नहीं है। ध्यान का अर्थ होता है. ऐसी भीतर की अवस्थाजहां न शांति है न अशांति। वहीं शांति है—जहां शांति भी नहीं। क्योंकि जहां तक शांति हैवहां तक अशांत होने का उपाय है।
तुम बैठे हो तो तुमने देखा होगाकभी—कभी घर में कोई आदमी ध्यान में उत्सुक हो जाता है तो वह शांत हो कर बैठा है। किसी बच्चे ने किलकारी मार दीवह अशांत हो गया। यह भी कोई शांति हुईकि आप बड़े ध्यान—मंदिर में बैठे हैंध्यान कर रहे हैं और पत्नी ने एक प्याली गिरा दी—और ऐसे मौके पर पत्नी जरूर गिरा देगी—और आप बौखला गए कि अशांति हो गईकि पड़ोसी ने रेडियो चला दिया और आप अशांत हो गएकि पड़ोसी के यहां बड़े अधार्मिक हैंपापी हैंनर्क जाएंगेध्यान भ्रष्ट कर दिया!
जो भ्रष्ट हो जाएवह ध्यान नहीं। जिससे तुम डांवांडोल हो जाओ वह ध्यान नहीं। प्यालियों के टूटने सेरेडियो के चल पड़ने सेबच्चे के हंसने से जो बिखर जाता होवह है ही नहीं। तुम किसी तरह अपने को सम्हाल—सम्हाल कर बैठे थेमगर वह सम्हाल कर बैठा होना सिर्फ नियंत्रण थाकोई गहरा अनुभव नहीं था। थे तो तुम बिलकुल करीब सतह केशायद सिर डुबा लिया थालेकिन थे बिलकुल सतह के करीब। जरा—सी चोट बाहर से आयी कि तुम अस्तव्यस्त हो गये।
ध्यान न तो शांति है न अशांति। ध्यान तो वैसी चित्त की साक्षी—दशा हैजहां तुम शांति को उठते देखते और आसक्त नहीं होतेजहां तुम अशांति को उठते देखते और विक्षुब्ध नहीं होते। तुम कहतेयह तो मन का खेल हैचलता रहेगाये तो सागर की लहरें हैंचलती रहेंगीइनसे क्या लेना—देना है! तुम दूर बैठे उदासीन देखते रहते।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भ्रव.......!
'निर्वेदशब्द का ठीक वही अर्थ हैजो उदासीन का। समझो।
निर्वेद का अर्थ होता है : ऐसी दशाजहां कोई भाव—तरंग से तुम्हारा संबंध न रह जाए। वेद का अर्थ होता है : भाव—तरंग। वेद का अर्थ होता है : ज्ञान—तरंग। इसलिए तो हम हिंदुओं के शास्त्र को वेद कहते हैं। इसलिए तो हम दुख को वेदना कहते हैंभाव—तरंगपीड़ा घेर लेती। निर्वेद का अर्थ है. जहां न तो ज्ञान की तरंग रह जाएन भाव की तरंग रह जाए। क्योंकि ज्ञान की तरंग उठती है मस्तिष्क में और भाव की तरंग उठती है हृदय में—और तुम दोनों के पार जब बैठ जाओन वहां भाव उठे न ज्ञान उठेन तो तुम्हें लगे कि कुछ मैं जानने वाला हूं न तुम्हें लगे कि मैं कुछ भावने वाला
हूंजहां ज्ञान और भाव दोनों से दूर खड़े तुम मात्र साक्षी रह जाओकिसी तरंग से तुम्हारा कोई तादाक्य न रह जाए। ये दो ही तरंगें हैं तुम्हारे भीतरइनसे जब तुम तीसरे हो जाओ—तों निर्वेद। वही उदासीन का अर्थ है। जो निर्वेद हो गयावही उदासीन हो गया।
'ऐसा निश्चित जान कर संसार में उदासीन हो कर अव्रती और त्यागपरायण हो।'
बड़ी बहुमूल्य बात आगे आती है—अव्रती! तुम चौंकोगेक्योंकि तुम तो कहते हो : व्रती! आदमी को व्रती होना चाहिए! हम कहते हैं : फलां आदमी बड़ा त्यागी—व्रती है! जब किसी का हमें बड़ा सम्मान करना होता है तो हम कहते हैं. महान त्यागीव्रती! लेकिन अष्टावक्र कह रहे हैंअव्रती। अष्टावक्र निश्चित ही अदभुत क्रांतिकारी व्यक्ति हैं। वे कह रहे हैं : जिसने व्रत लियावह तो धोखे में पड़ जाएगा। क्योंकि व्रत तो जबर्दस्ती है। व्रत का अर्थ तो है हठ। व्रत का अर्थ तो है आग्रह। अव्रती का अर्थ है : जिसका कोई आग्रह नहींजिसकी कोई मंसा नहींजो नहीं कहता कि ऐसा ही हो।
समझोएक आदमी चोर है। वह व्रत ले लेता है मंदिर में जा कर कि अब मैं चोरी नहीं करूंगा। क्या घटेगा इसके भीतर?यह आदमी चोर है। व्रत लेने से ही तो चोरी नहीं रुक सकती है। नहीं तो दुनिया में सभी व्रत ले लेते और संत हो जाते। इसने मंदिर में जा कर व्रत लिया कि मैं चोरी नहीं करूंगा। किसी महात्मा के चरणों में सिर झुका कर कहा कि आशीर्वाद दें कि मेरा व्रत पूरा हो कि मैं चोरी नहीं करूंगा। समूह—समाज के समक्ष इसने घोषणा की कि अब मैं चोरी नहीं करूंगा। यह कर क्या रहा हैयह कर यह रहा है कि यह चोरी के खिलाफ अपने अहंकार को खड़ा कर रहा हैयह कहता है अब मंदिर में समूह के समक्ष,हजार आदमियों के सामने कह दियाअब अगर चोरी की तो वह तो यूके को निगलना होगा। लोग क्या कहेंगे कि अरेपतित हो गए!
और जब कोई व्रत का नियम लेता हैतो समाज उसमें फूल—मालाएं उसके गले में डालताउसका जुलूस निकालता,अखबारों में फोटो छापतामहात्मा आशीर्वाद देतेमहात्मा गवाह बनतेसमाज चारों तरफ से प्रशंसा के फूल बरसाने लगता। व्रती को इतनी प्रशंसा मिलती है कि अहंकार मजबूत होता है। अब उसके सामने अड़चन आएगी। अगर वह चोरी करने जाए तो इतना अहंकार खोने की हिम्मत होनी चाहिए।
तो जितना व्रती को सम्मान दिया जाता हैउतना ही उसका अहंकार परिपुष्ट हो जाता है। और अब अहंकार को लड़ाता है वह अपनी पुरानी आदत के खिलाफ। इतना ही कुल अर्थ है व्रती का। व्रती में कुछ और मामला नहीं है।
अब तुम सोचोचोरी से छूटे और अहंकार में फंसे—यह कुछ मुक्ति न हुईइससे चोरी बेहतर थी। इससे चोरी बुरी नहीं थी। यह तो कुएं से बचे और खाई में गिरे! और इससे भी चोरी नष्ट नहीं हो जाएगीचोरी भीतर— भीतर सुलगेगीअहंकार ऊपर—ऊपर पताका फहराएगाचोरी भीतर— भीतर सुलगेगी। और भीतर सतत एक संघर्ष होगाचौबीस घंटे एक लड़ाई चलेगी।
अब समझ लो कि लाख रुपये इस आदमी को रास्ते के किनारे पड़े मिल जाएंअब इसको बड़ी मुश्किल हो जाएगी कि क्या करूं! अब यह लाख बचाऊं कि अहंकार बचाऊंएक हाथ बढ़ाका कि उठा लूं एक हाथ रोकेगा कि अरेयह क्या कर रहे हो?इसी को समाज अंतःकरण कहता हैकॉनशिएन्स कहता है। कॉनशिएन्स बड़ी समाज की गहरी तरकीब है। वह तुम्हें एक तरह का अहंकार
दे देता हैजिसको तुम अंतःकरण कहते हो। तुमसे बचपन से कहा गया है कि तुम बड़े कुलीन होबड़े घर में पैदा हुएहिंदू मुसलमानईसाई! खयाल रखना—अपनी इज्जत काअपने परिवार काअपने वंश काअपने कुल काअपने धर्म काअपने राष्ट्र का! स्मरण रखनातुम कौन हो! तुम कोई साधारण पुरुष नहीं हो। तुम हिंदू होकि मुसलमान होकि ईसाई हो! बाकी सब साधारण हैं।
मुल्ला जब मरने लगा तो लोगों ने उसकी प्रार्थना सुनी—वह कह रहा था परमात्मा से कि हे प्रभुमैंने चोरी की है बहुत बारयह सच हैऔर मैं कई बार अचौर्य के व्रत से पतित हुआ हूं। मैंने दूसरों की स्त्रियों की तरफ बुरी नजर से देखा हैयह भी सच हैमैं व्यभिचारी हूं। और मैंने कोई बड़ी—बड़ी चोरियां ही की होंयह भी नहीं हैमैंने मुर्गियां तक पड़ोसियों की चुरा ली हैं। और मैं सब तरफ से बेईमान हूं झूठा हूं। झूठ मेरी आदत में शुमार हो गई हैसच मुझसे बोला नहीं गया। मैं दुष्ट भी हूं। छोटी—मोटी बात पर झगड़ा मुझे बिलकुल आसान हैमारपीट आसान है। इतना ही नहींमैंने एक आदमी की हत्या भी कर दी है। और हत्या के विचार तो मेरे मन में सदा उठते रहे हैं। यह सब हैलेकिन एक बात तुमसे कहना चाहता हूं कि मैंने सब कुछ किया होलेकिन अपना धर्म कभी नहीं खोया! अब यह बड़े मजे की बात है! अब यह धर्म क्या हैमैंने अपना 'दीनकभी नहीं खोयारहा सदा मुसलमान ही! उस संबंध में मैंने कभी ऐसा नहीं कि ईसाई हो गयाकि हिंदू हो गया—रहा सदा मुसलमान ही! धर्म मैंने कभी नहीं खोया! इतनी बात मैं जरूर तुझसे कहूंगायह तू याद रखना! लाख बुरे काम कर लिए होंलेकिन धर्म कभी नहीं खोया!
अब लोग धर्म बचा रहे हैं। धर्म भी अहंकार का हिस्सा हो जाता है। कुलप्रतिष्ठामान मर्यादा.।
और तुम थोड़ा सोचोतुमने कसम ले ली कि चोरी नहीं करेंगे—और चोर का तुम्हारा मन हैऔर यह अहंकार हैअब इन दोनों में संघर्ष चलेगाएक युद्ध तुम्हारे भीतर पैदा होगामहाभारत तुम्हारे भीतर चलेगा। तुम आ गए जोश—खरोश मेंसुन रहे थे किसी साधु —संत की बातउसने तुमको घबड़ा दिया कि अगर काम—वासना रही तो नर्क में सडोगे। और उसने खूब स्पष्ट चित्र खींचेरंगीनश्री डायमेंशनलकि वहां आग की लपटें हैंऔर कड़ाहे जल रहे हैं तेल केऔर उन कड़ाहों में डाले जाओगे,मरोगे भी नहीं और सेंके भी जाओगे और उबाले भी जाओगेऔर मरोगे भी नहींऔर कीड़े तुम्हारे शरीर में छेद बना—बना कर दौड़ेंगेऔर मरोगे भी नहीं और छिद्र—छिद्र हो जाओगे। उसने खूब तस्वीर खींची रंगीन और तुम्हें बिलकुल घबड़ा दिया। उस घबड़ाहट के भावावेश के क्षण में तुम खड़े हो गएतुमने कहा. मैं ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा लेता हूं।
अब मरे! घर तक लौटते—लौटते जब शांत हो जाओगे थोड़ेउद्विग्नता थोड़ा बैठेगीमंदिर की हवा से थोड़े दूर जाओगे और तुम्हें याद आएगा. यह क्या कर बैठेअब फांसी लगी! व्रती हो गए! और लोगों ने तालियां बजा दीं। और लोग तो कोई भी बुद्ध बन रहा हो तो ताली बजाते हैं। लोगों की तालियों से बड़े सावधान रहना।
एक अदभुत फकीर थे. महात्मा भगवानदीन। वे कभी—कभी मेरे पास रुकते थे। मेरी तो छोटी उम्र थीलेकिन उनका मुझसे बड़ा लगांव था। वे कभी मेरे गांव से गुजरते तो मेरे पास जरूर रुकते। उनकी एक खूबी थी जब वे बोलतेअगर कोई ताली बजा दे तो बड़े नाराज हो जाते। वे उठ कर ही
खड़े हो जाते कि अब मैं बोलूंगा ही नहींक्यों ताली बजाईमैंने उनसे कहा कि लोग ताली बजा रहे हैंआप इतने नाराज होते हैंवे कहते लोग ताली ही तब बजाते हैंजब कोई आदमी बुद्धपन करता है। मैंने जरूर कोई गलती की होगी। पहली तो बात,इन बुद्धओं को अगर मैं सच बात कहूं तो समझ में न आएगीगलत कहूं तभी समझ में आती है—और तभी ये ताली बजाते हैं। ताली बजाई कि मैं तत्काल समझ जाता हूं कि हो गई कोई गलती।
वे ठीक कहते हैं। जैसा आदमी है उसको देख कर ऐसा ही लगता है। आदमी तो उसी बात पर ताली बजाता है जो उसको जंचती है। जब तुम किसी के ब्रह्मचर्य के व्रत लेने पर ताली बजाते होतो मतलब क्या हैतुम यह कह रहे हो कि लेना तो हम भी चाहते हैंलेकिन अभी नहीं। तुमने हिम्मत कीबड़ा अच्छातुम आगे बढ़ेबड़ा अच्छा। तुम शहीद हो रहे होबड़ा अच्छाजाओ। हमारी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं।
मगर यही लोग जिन्होंने ताली बजाईअब नजर रखेंगे। अब वे देखेंगे कि कहीं सिनेमा में तो नहीं बैठे हो ब्रह्मचर्य का व्रत ले करयहां होटल में बैठे क्या कर रहेक्लब में क्या कर रहेयह किसकी स्त्री के साथ चले जा रहे?
मेरे एक संन्यासी ने संन्यास लिया—एक युवक ने। वह कुछ दिन बाद मेरे पास आया कि मेरी पत्नी को भी संन्यास दे दो। तो मैंने कहामामला क्या हैउसने कहा कि मैं गरीब आदमी हूं अब मैं ये गेरुए वस्त्र पहन कर अपनी पत्नी के साथ कहीं जाता हूं तो लोग रोक लेते हैं कि किसकी पत्नी हैसंन्यासी.! लोग भला धार्मिक न होंलेकिन दूसरे को तो धार्मिक बनाने में उत्सुक रहते ही हैं! 'यह किसकी पत्नी को ले कर जा रहे हो?' झगड़ा—झांसा खड़ा करते हैं। इसको भी आप संन्यास दे दें।
मैंने उसको संन्यास दे दिया। वह आठ दिन बाद फिर आया कि मेरे बेटे को.। क्योंकि लोग कहते हैं कि बाबा जीकिसका बच्चा भगाए ले जा रहे हो? यह गेरुआ तो खतरनाक है! क्योंकि लोगों की अपेक्षाएं हैं।
लोग ताली बजा देंगेफूल—माला पहना देंगे—उनकी फूल—माला में छिपी फांसी को मत भूल जाना। उन्होंने गर्दन पर हाथ रख लियाअब वे कहेंगे. कहां जा रहे होक्या कर रहे होकैसे उठतेकैसे बैठतेकिससे बात करतेकितनी देर सोते?ब्रह्ममुहूर्त में उठते कि नहींअब वे सब तरफ तुम्हारी जांच रखेंगे। उन्होंने जो ताली बजाई थी उसका बदला लेंगे। और तुम मरेतुम मुश्किल में पड़ेक्योंकि कामवासना कसम खाने से मिटती होतीइतनी आसान बात होतीतो सारी दुनिया कामवासना के बाहर हो गयी होती। अब यह ब्रह्मचर्य खींचेगा और यह कामवासना खींचेगी और इन दोनों के बीच तुम पिसोगे। दो पाटन के बीच अब तुम्हारी बुरी तरह मरम्मत होगी! बार—बार तुम वासना में गिरोगे और बार—बार तुम अपने को सम्हाल कर बाहर निकालोगे और बार—बार गिरोगे। तुम्हारा जो अब तक थोड़ा—बहुत आत्म—गौरव था वह भी नष्ट हो जाएगा। तुम पाओगे : मुझ जैसा पापी कोई भी नहीं!
मंदिर में जा कर लोग सिर्फ यही समझ कर लौटते हैं कि हम जैसा पापी कोई भी नहीं।
अष्टावक्र कहते हैं.
'अव्रती! त्यागपरायण!'
यही मैं भी तुमसे कहता हूं। तुम्हारा बोध ही तुम्हारा व्रत होउससे ज्यादा व्रत की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हें समझ में आ गई है बातबस काफी है। इसके लिए समाज की स्वीकृति और समादर की कोई भी जरूरत नहीं है। तुम समझ गएतुम्हें ब्रह्मचर्य में रस आने लगा बिलकुल ठीक हैअब व्रत की क्या जरूरत हैव्रत तो इतना ही बताता है कि रस अभी आया नहीं थासिर्फ लोभ पैदा हुआ था। ब्रह्मचर्य का लोभ पैदा हुआ तो व्रत।
अगर समझ में ही आ गयातो तुम ऐसी तो कभी कसम नहीं खाते कि मैं कसम खाता हूं कि सदा दो और दो चार ही जोडूगा। तुम जानते हो कि दो और दो चार होते हैंइसमें जोड़ना क्या हैकसम क्या खानी हैऔर अगर तुम जा कर किसी मंदिर—मस्जिद में कसम खाओ कि हे सदगुरुमुझे आशीर्वाद देंअब से मैं दो और दो चार ही जोडूगातो साफ है कि तुम विक्षिप्त हो। और जो तुम्हें आशीर्वाद देवह तुमसे भी आगे है विक्षिप्तता में। तुम्हारा दिमाग खराब है। तुम्हें शक है कि तुम दो और दो पांच जोड़ोगे। उस शक से लड़ने के लिए तुम इंतजाम कर रहे हो पहले से। तुम्हें अपनी भीतरी अवस्था का पता है कि जब मैं जोडूगा तो दो और दो पांच होंगे। 'नहीं—नहींकसम खा लोपहले से इंतजाम कर लो!वह भीतर तो तुम जानते ही हो कि दो और दो पांच होने वाले हैंइसलिए कसम खा कर इंतजाम कर लोरुकावट डाल दो कि दो और दो चार हों। लेकिन यह ज्ञान नहीं हैयह बोध नहीं है—यह लोभ है।
लोभी व्रती होता हैबोध को उपलब्ध व्यक्ति अव्रती होता है। इसका यह अर्थ नहीं कि उसके जीवन में क्रांति नहीं होती—उसी के जीवन में क्रांति होती है! व्रत के कारण कहीं क्रांतिया हुई हैंअगर व्रत के कारण क्रांति हो सके तो इसका अर्थ हुआ कि ऊपर से थोपने सेजबर्दस्ती आग्रह अपने ऊपर आरोपित कर लेने से आत्मा बदल जाएगी—यह तो नहीं हो सकता। तुम व्रत के कारण सैनिक तो हो सकते होसंन्यासी नहीं हो सकते। तुम व्रत के कारण एक अभ्यास कर ले सकते होएक हठ कर ले सकते हो और एक खास ढंग में चलने की आदत बना ले सकते होलेकिन उससे तुम्हारे जीवन में सूर्योदय न होगा। सूर्योदय तो अव्रती का होता है।
अव्रती का अर्थ इतना ही है कि जो तुम्हें दिखाई पड़ता हैवह करनालेकिन इसकी घोषणा क्या करनीइसके लिए किसी की स्वीकृति क्या लेनीजो तुम्हें समझ में आ गया हैअगर ठीक से आ गया हैतो अपने—आप तुम्हारे आंचरण में आना शुरू हो जाएगा। समझ आंचरण में रूपांतरित होती ही हैउससे अन्यथा न हुआ है न हो सकता है। इसलिए व्रत की कहां जरूरत है?
मेरे पास कोई आता है कि मुझे व्रत दे दें ब्रह्मचर्य कामैं कहता हूं. पागलपन मत करना। मैं तुम्हारे किसी पागलपन में सम्मिलित नहीं हो सकता हूं। तुम्हें अगर ब्रह्मचर्य में रस आने लगा है—बहो उस तरफमगर व्रत नहीं! कोई मुझसे कहता है कि आप मुझे कसम दिलवा दें कि मैं सदा ध्यान करूंकभी फ्लू न। मैं तुम्हें यह कसम नहीं दिलवातामैं किसी पाप में भागीदार नहीं होता। तुम्हें अगर समझ आ गईतो तुम ध्यान करोगे। और अगर ध्यान में रस आएगा तो वही रस नियम बनेगा। आज करोगे और कल नहीं करोगेतो कल तुम पाओगे. कुछ चूकाकुछ खोयाकुछ गंवायादिन ऐसे ही गया! एक तंद्रा छाई रही। तो परसों तुम फिर करोगे। कर—करके तुम जानोगे कि जब तुम करते हो तो एक उज्ज्वलताएक पवित्रताएक शुचिता का जन्म होता है! करने से पता चलेगा कि तुम ताजे—ताजे रहतेएक स्वच्छताजैसे सद्य:स्नात! चौबीस घंटे जीवन की सब उलझनों के बीच भी तुम गैर—उलझे बने रहते। उपद्रव हैंचलते रहते हैंकाम— धाम हैव्यवसाय हैआपाधापी है—लेकिन भीतर कहीं कोई सूत्र जुड़ा रहता अंतरात्मा से। और वहां सब शांत हैन कोई आपाधापी हैन कोई व्यवसायन कोई उपद्रव। कर—करके तुम्हें पता चलेगा कि अगर एक दिन भोजन न करो तो उतनी हानि नहीं हैजितनी ध्यान न करने से। एक दिन अगर स्नान न करो तो चल जाएगा। क्योंकि भोजन शरीर का कृत्य हैध्यान आत्मा का। ध्यान आत्मा का भोजन है। अगर ऐसा किसी दिन हो कि आज समय ज्यादा नहीं हैया तो भोजन करना छोडूं या ध्यान कर लूं तो तुम ध्यान करोगे। मगर व्रत के कारण नहीं। क्योंकि व्रत के कारण किया तो धोखा होगा।
मैं राजस्थान जाता था अक्सरतो राह में एक जगह मुझे ट्रेन बदलनी पड़ती थीवहां कोई दो—तीन घंटे रुकना पड़ता। सांझ का वक्त होता तो कुछ मुसलमान मित्रों को मैं देखता कि वे स्टेशन पर अपना कपड़ा बिछा कर नमाज पढ़ रहे हैं। मैं घूमता रहताक्योंकि दों—तीन घंटे वहां ट्रेन खड़ी रहती तो प्लेटफार्म पर घूमता रहता। मगर जो नमाज पढ़ रहे हैंवे बीच—बीच में लौटकर देखते जाते कि ट्रेन कहीं छूट तो नहीं गई!
एक सज्जन मेरे ही डिब्बे में एक बार यात्रा कर रहे थेतो रास्ते में उनसे पहचान भी हो गई। वे मौलवी थेधर्मगुरु थे। जब वे भी यही करने लगे—उस स्टेशन पर मैंने देखा कि उन्होंने भी बिछा लिया कपड़ा और अपनी नमाज कर रहे हैंलेकिन बीच—बीच में देखते जाते है। तो मैं उनके पीछे गयामैंने उनका सिर पकड़ कर उस तरफ कर दिया। अब वे नमाज में थे तो कुछ बोल भी न सकेनाराज तो बहुत हुएभनभना गए।
वे उठे तो एकदम नाराज हो गए कि यह क्या मामला हैआपने मेरा सिर क्यों मोड़ामैंने कहा कि या तो इस तरफ कर लोक्योंकि ट्रेन और परमात्मा दोनों को साथ—साथ याद न कर सकोगे। अगर ट्रेन की याद करनी है तो छोड़ो यह बकवास,काहे के लिए नमाजकौन कह रहा हैमैंने तो नहीं कहा! अगर परमात्मा को याद करना है तो भूलो इस ट्रेन को कम से कम आधा घड़ी के लिएछूट जाएगीबहुत से बहुत इतना ही होगा नपरमात्मा रह गया हाथ में और ट्रेन छूट गई तो क्या खाक छूटाकुछ भी नहीं छूटा—दूसरी ट्रेन आती है।
अगर परमात्मा की याद में इतना भी नहीं भूल पाते.. तो मैंने उनसे सूफियों की एक कहानी कही। एक सूफी नमाज पढ़ रहा था और एक औरत भागी हुई निकलीउसको धक्का देती हुईउसके कपड़े पर पैर डालती हुई। वह बड़ा नाराज हुआ! बड़ा नाराज हुआलेकिन नमाज में था तो बोल नहीं सका। जल्दी उसने नमाज पूरी की कि इसका पीछा करेंकैसी बदतमीज औरत,इतना भी ध्यान नहीं! लेकिन जब वह नमाज करके उठा तो वह औरत वापिस आ रही थीतो उसने उसे पकड़ा। उसने कहा कि सुन बदतमीज औरत! तुझे इतना भी पता नहीं कि कोई ध्यान कर रहा हैनमाज कर रहा हैप्रार्थना कर रहा हैतो इस तरह,इस तरह सलूक करना चाहिए कि तू मुझे धक्का देतीमेरे कपड़े पर पैर रखती निकल गई?
उसने कहा. क्षमा करेंमुझे याद भी नहीं। मैं अपने प्रेमी से मिलने जाती थी। मुझे याद भी नहीं कि आप कहां बैठे थे,कहा नमाज पढ़ रहे थेकौन नमाज पढ़ रहा थाकौन नहीं पढ़ रहा थामुझे याद नहीं। वर्षों बाद मेरा प्रेमी आता थामैं उसे लेने गांव के बाहर द्वार पर जाती थी। क्षमा करें! लेकिन एक बात आपसे पूछती हूं : मैं अपने प्रेमी से मिलने जाती थी— क्षणभंगुर प्रेमीआप अपने प्रेमी से मिलने गए थेआपकोमेरे पैर कपड़े पर पड़ गएमेरा धक्का लगाइसका समझ में आ गयाआप परमात्मा से मिल रहे थेतब तो मेरी प्रार्थना आपसे बेहतर है। माना कि मैं किसी के शरीर के मोह में पड़ी हूं और यह मोह ठीक नहींलेकिन कम से कम है तो! और माना कि तुम परमात्मा के मोह में पड़े होमगर है कहां?
कहते हैंउस सूफी के जीवन में क्रांति हो गई इस बात से। उसने कहाअब नमाज तभी पड़ेंगे जब प्रेम होगाअन्यथा क्या सार है?
व्रत से नहीं—बोध से। व्रत से नहीं—प्रेम से। व्रत से नहींनियम से नहींकिसी बाहरी अनुशासन से नहीं—अंतरभाव से!
'अव्रती और त्यागपरायण हो!'
बड़ी उल्टी बातबड़ा कंट्राडिक्यानबड़ा विरोधाभास है। कहते हैं कि तू व्रत तो मत लेलेकिन तेरा बोध ही तेरे जीवन में त्याग बन जाएबस। त्याग को लाना न पड़ेबोध के पीछे छाया की तरह आए।
एवं ज्ञात्वेह निवेंदाद्भ्रव त्यागपरोउव्रती।
इसे याद रखना। यही मेरे संन्यास का सूत्र भी है।
अव्रती त्यागपर: भव।
त्यागी बनो—त्याग की कसम खा कर नहीं। त्यागी बनो—त्यागी बनना चाहिएऐसे निर्णय और आग्रह से नहीं। त्यागी बनो—इसलिए नहीं कि त्यागी को सम्मानसमादरप्रतिष्ठा मिलती है। त्यागी बनो—अव्रतबिना किसी लोभ केबिना किसी नियम केबिना किसी आग्रह के अनाग्रह— भाव से। त्यागी बनो—बोध से। कचराकचरा दिखाई पड़े तो छूट जाएगा। कचरे को छोड़ने की कसम नहीं लेनी है। कचराकचरा दिखाई पड़ेइसकी चेष्टा करनी है। ज्ञान त्याग है। वे ही छोड़ पाते हैं जो जागते हैं और देखते हैं।
'हे प्रियलोकव्यवहारउत्पत्ति और विनाश को देख कर किसी भाग्यशाली की ही जीने की कामनाभोगने की वासना और ज्ञान की इच्छा शांत हुई है। '
किसी भाग्यशाली की ही! लोकव्यवहार को देख कर—ठीक से देख कर!
जीवन में जो चल रहा है चारों तरफउसका ठीक से अवलोकन करो। शास्त्र में मत जाओ खोजने। शास्त्र में नियम मिलेंगे और शास्त्र से व्रत आएगा। खोजो जीवन में—वहां से बोध मिलेगा और बोध का कोई व्रत नहीं है। बोध पर्याप्त है। उसे व्रत के सहारे की जरूरत नहीं है। व्रत तो अंधे के हाथ की लकड़ी हैऔर बोधआंख वाले आदमी की आंख है। आंख वाले आदमी को लकड़ी नहीं चाहिए। व्रत तो बैसाखी है लूले—लंगड़े की। जिसको बोध नहीं हैउसके लिए व्रत चाहिएवह बैसाखी के सहारे चलता है। लेकिन जिसके अंग और देह स्वस्थ हैंउसके लिए बैसाखी की कोई जरूरत नहीं होती। जिसके अंग स्वस्थ हैं,वह तो अपने पैर से चलता है। व्रत दूसरे से उधार मिलते हैं—बोध अपना है।
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता:।।
हे प्रियलोकव्यवहार को ठीक से अवलोकन करके—लोकचेष्टा अवलोकनात्—ठीक से जाग करजीवन में जो हो रहा है,उसे देखो।
कोई पैदा हो रहाकोई मर रहा—जोड़ो! इस हिसाब को जोड़ो कि जो पैदा होतामरता। किसी के पास दीनता हैदरिद्रता है—वह दुखी है। धनी को देखोधन हैसब कुछ है—और दुखी है। यहां ऐसा लगता हैसुखी होने का किसी को कोई उपाय नहीं। विफल रो रहा हैसफल रो रहा है। कुरूप रो रहा हैसुंदर रो रहा है। बीमार रो रहा हैस्वस्थ रो रहा है। यहां जैसे रुदन ही,हाहाकार मचा है।
'जीवन के ठीक से अवलोकन से किसी भाग्यशाली को ही जीने की कामनाभोगने की वासना और ज्ञान की इच्छा शांत हुई है।'
तीन बातें कह रहे हैं. जीने की कामनाजीवितेच्छा! जीवन को देखो तोफिर कामना करो जीने की। यहां जीवन में रखा क्या हैधरा क्या हैजीवन को गौर से तो देखो! इसकी आकांक्षा करने योग्य हैतो लोग यह तो देखते ही नहींलोग इस जीवन को तो देखते ही नहीं गौर सेपरलोक की आकांक्षा करने लगते हैं। तो व्रत पैदा होता है। इस लोक को ही गौर से देखो,तो जीवितेच्छा विलीन हो जाती हैजीवन की आकांक्षा नहीं रह जाती। और जिसकी जीवन की आकांक्षा न रहीउसका परलोक है। जिसके जीवन की आकांक्षा न रहीउसका परम जीवन है।
अब तुम फर्क समझना। फर्क बहुत बारीक है। जिस आदमी ने इस जीवन की व्यर्थता को देखा और पहचानावह किसी जीवन की भी आकांक्षा नहीं करता। उसकी आकांक्षा ही विलीन हो जाती हैदेख कर ही विलीन हो जाती है।
मैंने सुना हैएक युवक संन्यासी गांव से गुजरता था। वह बचपन से ही संन्यासी हो गया था। पिता मर गएमां मर गईकोई और पालने वाला न था। गांव के एक के संन्यासी ने उसे पाला। फिर का संन्यासी हिमालय चला गयातो वह बच्चा भी उसके साथ हिमालय चला गया। वह हिमालय में ही बड़ा हुआ। अब का संन्यासी मर गया थातो वह वापिस दुनिया में लौट रहा था। युवा थास्वस्थ था। वह पहले ही गांव में आयातो उसने देखा एक बारात जा रही है। उसने कभी बारात नहीं देखी थी। बैड—बाजा बज रहा था। एक् युवक घोड़े पर सवार हैबड़े लोग पीछे जा रहे हैं। उसने पूछायह क्या हैतो किसी ने समझाया कि बारात है। उसने पूछाबारात यानी क्या?
तो किसी ने समझाया कि भई तुम्हें इतना भी बोध नहीं है। यह जो घोड़े पर बैठा हैयह दूल्हा हैइसका विवाह होने वाला है एक लड़की से।
उसने कहाफिर क्या होगातो किसी ने उसको पकड़ कर पास ले गया कि तू यहां आतुझे कुछ भी पता नहीं। उसने उसे सब समझाया कि फिर क्या होगा—शादी होगी इनकीभोग करेंगे एक—दूसरे काफिर इनका बच्चा पैदा होगा।
बारात तो निकल गई। संन्यासीरात हो गई थीतो गांव के बाहर जा कर कुएं के पाट पर सो रहागर्मी के दिन थे। सपना उसने देखा कि घोड़े पर सवार हैबैंड—बाजे बज रहे हैंबारात चल रहीफिर उसकी शादी हो गईफिर वह अपनी पत्नी के साथ सो रहा है। और पत्नी ने उससे कहा कि जरा सरकोमुझे भी तो जगह दो। वह जरा सरका कि कुएं में गिर गया। सारा गांव इकट्ठा हो गया। हैरानी तो गांव को और इसलिए हुई कि वह कुएं में पड़ा—पड़ा खूब खिलखिला कर हंस रहा है। लोगों ने पूछा : अरे भई हंसते क्यों होउसने कहाहंसे नहीं तो क्या करेंमुझे निकालो तो मैं अपनी कथा कहूं। उसे निकाला। लोगों ने पूछाहंसते क्यों होकुएं में गिरनातो मौत हो जाए—और तुम हंसते होउसने कहाहंसने की बात हो गई। सपने की स्त्री ने कुएं में गिरा दियाअसली स्त्री क्या न करती होगी लोगों के साथ!
उसने कहा : बचे! सपने के अनुभव ने जगा दिया। अब कोई बारात नहींअब यह घोड़े—वोड़े पर चढ़ना अपने से होने वाला नहीं। इतना काफी है अनुभव। सपने की झूठी स्त्री ने ऐसा धक्का दिया कि भले—चंगे सोएमैं जिंदगी भर से सोता आ रहा हूं कुओं परकभी नहीं गिरा। इस स्त्री ने कहाजरा सरको..। असली स्त्रियां क्या न करती होंगी?
अगर बोध हो तो सपना भी जगा देता है। अगर बोध न हो तो जीवन भी ऐसा ही बीत जाता है तुम उसका हिसाब भी नहीं लगा पाते।
लोकचेष्टा अवलोकनात्.......।
लोक की चेष्टाओं का अवलोकन!
कस्य धन्यस्य अपि........।
और कोई धन्यभागी ही जीवन की चेष्टाओं का अवलोकन करता है। अधिक लोग तो शास्त्रों में खोजते उसेजो चारों तरफ बरस रहा हैजो चारों तरफ मौजूद हैउसे शब्दों में खोजतेजो हर घड़ी मौजूद हैजो कहीं से भी पकड़ा जा सकता है सूत्रउसके लिए व्यर्थ के तर्क और सिद्धांत और विवाद में पड़ते हैं।
कस्य धन्यस्य अपि.......।
इसलिए अष्टावक्र कहते हैं : कोई धन्यभागी कभी जीवन का ठीक अवलोकन करके..।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता:।।
तीन चीजों से मुक्त हो जाता है—जीने की इच्छा सेभोगने की इच्छा से और जानने की इच्छा से। तुम चकित होओगे : जानने की इच्छा भी—कि मैं और ज्यादा जान लूं और ज्यादा जान लूं पंडित हो जाऊंमहापंडित हो जाऊंसब कुछ जान लूँ जो दुनिया में है—वह भी बंधन का कारण है। इच्छा—मात्र बंधन का कारण है। और तीन ही इच्छाएं हैं। या तो आदमी जीवन की इच्छा से भरा रहता है तो धन कमाता हैपद की प्रतिष्ठा खोजता है। या भोगने की वासना से भरता हैतो शराब पीता है,वेश्यागमन करता हैभागता—फिरता भोगने। और तीसरे तरह के लोग हैं जो ज्ञान की आकांक्षा करते हैं। वे शास्त्राध्ययनतर्क को निखारते हैंसिद्धातों पर धार धरते हैंवाद—विवाद में पड़े रहते हैं। ये तीन तरह के साधारण लोग हैं।
चौथा व्यक्ति वह है—धन्यभागीजिसकी कोई आकांक्षा नहींजो न भोगना चाहतान जानना चाहतान जीना चाहता;जो कहता है : देख लिया सबइसमें कुछ भी नहीं है।
'यह सब अनित्य हैतीनों तापों से दूषित हैसारहीन हैनिंदित हैत्याज्य है—ऐसा निश्चय कर वह शांति को प्राप्त होता है।'
ये तीनों दौड़े सिर्फ तीन ताप ले आती हैं।
अनित्य सर्वमेवेद तापत्रितय दूषितम्।
असार निंदित हेयमिति निश्चित्य शाम्यति।
इदम् सर्वम् अनित्यम्......।
यह सब अनित्य हैअसार है—ऐसा बोध! अवलोकन से—याद रखना! शास्त्र से नहींउधार नहीं—अवलोकन से। अपनी ही आंख के अनुभव से। आधि—दैविकआधि— भौतिकआध्यात्मिक— तीन तरह के दुख। शरीर का दुखमन का दुखआत्मा का दुख। बसइतना ही मिलता है इस जगत मेंऔर कुछ मिलता नहीं। दुख ही दुख मिलता हैऔर कुछ मिलता नहीं। राख ही राख हाथ आती है अंततःकुछ और हाथ आता नहीं।
असारम् निंदितम् हेयम् इति निश्चित्य शाम्यति।
ऐसा जान कर कि यह बिलकुल व्यर्थ हैनिंदित हैअसार हैशांति उपलब्ध हो जाती है।
इति निश्चित्य शाम्यति......।
जैसे ही यह निश्चय हो जाताकि यह जगत असार हैशांति फलित हो जाती है।
'वह कौन काल है और कौन—सी अवस्था हैजिसमें मनुष्य को द्वंद्वसुख—दुख न होउनकी उपेक्षा करयथाप्राप्त वस्तुओं में संतोष करने वाला मनुष्यसिद्धि को प्राप्त होता है। '
ऐसा कोई काल नहीं हैजैसा कि लोग सोचते हैंजैसा कि पुराण कहते हैं कि कभी ऐसा था। जैन—शास्त्र कहते हैं. सुखमा—सुखमाएक ऐसा काल था जब सुख ही सुख थाफिर ऐसा काल आया जब सुखमा—दुखमासुख और दुख मिश्रित थे,फिर ऐसा काल आ गया दुखमा—दुखमादुख ही दुख। या हिंदू कहते हैं. ऐसा काल था सतयुगजब सुख ही सुख थारामराज्य था। लेकिन ये सब मन की कल्पनाएं हैं।
दुनिया में दो तरह के कल्पनाशील लोगों ने दो तरह की धारणाएं बनाई हैं। एक कहते हैं अतीत में था स्वर्ग। सभी पुराने धर्म यही कहते हैं कि अतीत में सब ठीक था। दूसराजो नया पागलपन है दुनिया मेंवह है कम्यूनिज्मसाम्यवाद—वें कहते हैं,भविष्य में है स्वर्ग। लेकिन इसे तुम जान लो। स्वर्ग कभी नहीं रहा है। न राम के समय में रामराज्य था। रामराज्य ही होता तो रामकथा के बनने की कोई जगह नहीं थी। अगर सुख ही सुख हो तो समाचार होते ही नहीं। रामकथा बनेगी कहां सेसीता चुराएगा कौनचौदह वर्ष का वनवास खुद राम को भोगना पड़ा। सब तरह की कलह और सब तरह की राजनीति थी। खुद की सौतेली मां धोखा दे गई। खुद का बाप कामी और लोलुप सिद्ध हुआ। पत्नी की गलत बात मान कर भी—लेकिन पत्नी युवा थी—अपने प्यारे से प्यारे बेटे को घर के बाहर भेज दियाजंगल भेज दिया। तुम कहते हो रामराज्य?
सीता को राम ले भी आए लंका से छुड़ा करतो जो पहले शब्द उन्होंने कहेवे कुछ बड़े अच्छे शब्द नहीं। उन्होंने सीता से कहा. तू यह मत सोचना कि तेरे लिए मैंने युद्ध कियायह युद्ध तो प्रतिष्ठाकुल के लिए किया। फिर जरा—सी बात पर कि किसी धोबी ने कह दिया अपनी औरत को कि तूने क्या समझा है! कह दियामैं कोई राम नहीं हूं। एक रात धोबिन कहीं और रह गई तो धोबी नाराज हो गयाउसने कहा कि मैं कोई राम नहीं हूं तूने समझा क्या है मुझेकि वर्षों रावण के घर रह आई सीता और फिर भी स्वीकार कर लिया! इतनी—सी बात सेअग्नि—परीक्षा ले लेने के बाद भीसीता को जंगल में फेंक दिया। राजनीति ज्यादा रही होगीरामराज्य कम। अगर ऐसा ही था तो सीता के साथ खुद भी जंगल चले गए होते। 'अगर ऐसा ही था,मर्यादा ही रखनी थीतो सीता को भी ले जाते जंगल और खुद भी चले गए होते।
लेकिन सब कहानियां हैं कि रामराज्य था। दीन थेदरिद्र थेदुखीपीड़ित थे—सब तरह के लोग थे। सब तरह के उपद्रव,सब तरह की जालसाजियांसब तरह की कूटनीति—राजनीति थी। कब था सुखअब उससे लोग घबड़ा गए। अतीत का सुख,अतीत के उटोपिआ व्यर्थ हो गएतो लोगों ने नए ईजाद कर लिए। नए पुराणकार हैं मार्क्सएंजिल्सलेनिनमाओ। अब इन्होंने नए पुराण ईजाद कर लिए। ये कहते हैंभविष्य में होगा।
एक बात तो पक्की हैकोई भी नहीं कहता कि अभी हैक्योंकि अभी कहोगे तो दुनिया में कौन मानेगाकैसे मानेगा?दुख ही दुख दिखाई पड़ता है। अभी तो दुख ही दुख दिखाई पड़ता है। या तो कहोकभी था या कभी होगा। अब इसमें कुछ विवाद करना मुश्किल हो जाता है—कभी थाकुछ निर्णायक नहीं हैं। मगर शायद अतीत को तो खंडित भी किया जा सकता है,भविष्य को कैसे खंडित करोगेइसलिए कम्यूनिज्म और भी चालाक है। वह कहता है. भविष्य में होगास्वर्णयुग आता हैआने वाला है। तुम कुर्बान होओ उसके लिएतो आएगा।
अष्टावक्र कहते हैं, 'वह कौन काल हैकौन अवस्था हैजिसमें मनुष्य को द्वंद्व न रहा होसुख—दुख न रहे हों त्र: '
नहींकिसी काल की प्रतीक्षा मत करोकिसी स्थिति की प्रतीक्षा मत करो। एक चैतन्य की क्रांति चाहिए। वह क्रांति कैसे घटित होगी?
'उनकी उपेक्षा करयथाप्राप्त वस्तुओं में संतोष करने वाला मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
'यथा प्राप्तवर्ती सिद्धिम!
जो मिला है! जो मिला हैउसमें ही बरतने वाला पुरुष मोक्ष को उपलब्ध हो जाता है।
जो हैउसमें ही बरतो। उससे ज्यादा की चाह मत करो। उससे अन्यथा कभी नहीं हुआ हैकभी नहीं होगा। ऐसा ही रहा है। कथा यही की यही है। युग बदलते हैंआदमी नहीं बदलता। चीजें बदलती हैंचैतन्य नहीं बदलता। सब समय में ऐसा ही रहा है। यही वारदातेंयही झंझटेंयही उपद्रव— कमोबेश—मगर सब ऐसा ही रहा है।
'कौन सिद्धि को उपलब्ध होता है?'
अष्टावक्र कहते हैं. जो जैसा हैजो मिला हैजो वर्तमान है—यथा प्राप्तवर्ती—जो हैजो मिला हैउसमें जो संतोष मान लेता कि ठीक है।
तो दौड़ पैदा नहीं होती। तो अभीप्सा पैदा नहीं होतीआकांक्षा पैदा नहीं होतीचाह पैदा नहीं होती। संतोष पैदा होता है कि जो हैठीक है। जो हैइससे अन्यथा हो नहीं सकताअन्यथा कभी हुआ नहींअन्यथा कभी होगा नहीं—इसलिए अन्यथा की चाह नहीं करनी।
'उनकी उपेक्षा करयथाप्राप्त वस्तुओं में संतोष कर लेने वाला मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।'
'महर्षियों केसाधुओं केयोगियों के अनेक मत हैं। ऐसा देख कर उपेक्षा को प्राप्त हुआ कौन
मनुष्य शांति को नहीं प्राप्त होता है?'
यह भी बड़ी महत्वपूर्ण बात वे कहते हैं।
नाना मतं महर्षीणां......।
महर्षियों के बहुत—से सिद्धांत हैंदार्शनिकों के बड़े सिद्धांत हैं। अगर उनमें उलझे तो कोई पारावार नहीं हैभटकते ही रहोगे। साधुओं के अनेक सिद्धांत हैंयोगियों के अनेक सिद्धांत हैं। सिद्धातों की भरमार है। जीवन एक हैजीवन को समझाने वाली दृष्टियां बहुत हैं। और जिसको तुम सुनोगेवही ठीक लगेगा। जिसको तुम पढ़ोगेवही ठीक लगेगा। निश्चित ही तुमसे ज्यादा प्रतिभाशाली लोगों ने उनको ईजाद किया हैमहर्षियों ने ईजाद किया हैयोगियों ने ईजाद किया है। तो उन्होंने जरूर बड़ा तर्कबल भरा है उनमें। तुम उससे प्रभावित हो जाओगे। लेकिन जब तुम दूसरे को सुनोगेदूसरा ठीक लगने लगेगा। जब तुम तीसरे को सुनोगेतीसरा ठीक लगने लगेगा। ऐसे तो तुम न घर के रहोगे न घाट के। ऐसे तो तुम दर—दर के भिखारी हो जाओगे।
अष्टावक्र कहते हैं. ऐसा देख कर कि अनेक मत हैंबुद्धिमान व्यक्ति मतों को ही छोड़ देता हैमतों की झंझट में ही नहीं पड़ता। ऐसा देख कर कि अनेक शास्त्र हैं—कौन ठीककुरान कि बाइबिलवेद कि धम्मपदकौन सहीकौन गलतइस झंझट में बुद्धिमान आदमी नहीं पड़ता। इस झंझट में जो पड़ जाते हैं वे कभी इस झंझट के बाहर नहीं आ पाते हैं। उस झंझट का कोई अंत ही नहीं है। उसमें तो एक उलझन में से दूसरी उलझन निकलती चली जाती है। एक प्रश्न का उत्तर हल करोतो उस उत्तर में से दस नए प्रश्न खड़े हो जाते हैं। चलता ही चला जाता है। अंतहीन श्रृंखला है। उससे कभी कोई बाहर नहीं आ पाता।
नाना मतं महर्षीणां साधुनां योगिक तथा।
दृष्टव निर्वेदमापत्र को न शाम्यति मानव:।।
'ऐसा देखकर कि इस विवाद में क्या सार हैयह कहीं ले जाएगा नहीं..'
दृष्टव निवेंदमापत्र को न शाम्यति मानव:।
'ऐसा कौन व्यक्ति है जो इतनी—सी बात समझ कर शांत न हो जाए?'
शांत अगर होना है तो सिद्धातों से बचना। शांत अगर होना है तो मतवादों से बचना। शांत अगर होना हो तो हिंदू मुसलमानईसाईजैनबौद्ध होने से बचना। शांत अगर होना हो तो स्वयं में खोजनासिद्धातों में मत भटक जाना।
नाना मतं महर्षीणां.......।
और सभी महर्षि हैंझंझट तो यह है! अगर ऐसे ही होता कि एक आदमी बुरा होता और एक आदमी अच्छा होतातो अच्छे की हम मान लेतेबुरे की हम छोड़ देते। यहां झंझट बड़ी गहरी हैदोनों अच्छे हैं। किसको पकड़ोकिसको छोड़ो! जीसस की सुनो कि मुहम्मद की? कि महावीर कीसभी अदभुत पुरुष हैं! सभी के व्यक्तित्व में बड़ा चमत्कार है। जब वे कहते हैं तो उनकी बातों में सम्मोहन है। लेकिन उलझना मत।
ऐसा देख कर कि यह तो सिद्धांत और दर्शनशास्त्र का जाल चला ही आ रहा हैकभी समाप्त नहीं हुआ.......।
दर्शनशास्त्र से एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं मिला हैऔर तर्क से जीवन को हल करने वाला एक आधार नहीं मिला है। और तर्क बड़ा दोगला है। और तर्क से तुम ऐसा भी सिद्ध कर सकते हो और वैसा भी सिद्ध कर सकते हो। तर्क वेश्या जैसा है। तर्क का कुछ लेना—देना नहीं।
मैं एक बड़े वकील हरि सिंह गौर से परिचित था। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय का निर्माण किया। वे बड़े वकील थेसारी दुनिया के ख्यातिलब्ध वकील थे। प्रिवि कौंसिल में एक मुकदमा था। वे किसी महाराजा की तरफ से मुकदमा लड़ रहे थे। वे तो जिसके पक्ष में खड़े हो जाते थेवह जीतेगा ही—यह निश्चित था। इसलिए वे कुछ ज्यादा फिक्र भी नहीं करते थे।
धीरे— धीरे उनकी प्रतिष्ठा ऐसी हो गई थी कि वे जिसके पक्ष में होंवह जीतने ही वाला है। तो विरोधी तो पस्त हो जाते थे। उनका ज्ञान— भंडार भी बहुत था। और उनके पास काम भी बहुत था। एक दिल्ली में दफ्तर थाएक पेकिंग मेंएक लंदन में। भागे फिरते थे तीनों जगह। काम भी बहुत थाउलझन भी बहुत थी। रात किसी पार्टी में संलग्न थे और देर से आए और सो गए और देख नहीं पाए फाइल। सुबह अदालत में जाना पड़ा बिना फाइल देखेतो सीधे खड़े हो गएभूल गए कि किसके पक्ष में हैं—और विपक्षी के पक्ष में दलील देने लगे।
विपक्षी के पक्ष में उन्होंने घंटे भर तक दलील की। बड़ा सन्नाटा छा गया अदालत में कि यह हो क्या रहा है! मजिस्ट्रेट भी बेचैनविरोधी वकील भी बेचैन कि यह मामला क्या हैविरोधी भी बेचैन! और उनका जो आदमी थाजिसके पक्ष में वे लड़ रहे थे—किसी महाराजा के—वह तो पसीने—पसीने हो गया कि जब अपना ही वकील यह कह रहा हैतो अब क्या रहाअब तो कोई उपाय नहीं है। अब तो मारे गए।
आखिर उनके सेक्रेटरी ने हिम्मत जुटाईउनके पास जा कर कान में कहा कि आप यह क्या कर रहे हैंयह तो आपने अपने आदमी को मार डाला। आपने तो बुरी तरह उसे खराब कर दिया। अब तो यह मुकदमा जीतना मुश्किल है।
उन्होंने कहाक्या मतलब? क्या मैं विरोधी की तरफ से बोल रहा हूंउन्होंने कहाघबड़ा मत! उन्होंने टाई—वाई ठीक की और मजिस्ट्रेट से कहा कि महानुभावअभी मैंने वे दलीलें दीं जो मेरा विरोधी वकील देगाअब मैं इनका खंडन शुरू करता हूं।
और खंडन शुरू कर दिया और मुकदमा जीत गए। और बड़ी सुगमता से जीतेक्योंकि अब विरोधी को कुछ कहने को बचा ही नहींवह जो कहता और जितनी अच्छी तरह से कह सकता थाउससे भी ज्यादा अच्छी तरह से उन्होंने कह ही दिया थाअब कुछ बचा ही नहीं था कहने कोऔर उसका खंडन भी कर दिया था।
तर्क की कोई निष्ठा नहीं है। तर्क तो वेश्या है। वह तो किसी के भी साथ खड़ा हो जाता है। जिसमें भी थोड़ी अक्ल हो,तर्क उसी के आसपास नाचने लगता है। उससे तुम चाहो ईश्वर को सिद्ध कर दोचाहो ईश्वर को असिद्ध कर दो। तुम चाहो आत्मा को सिद्ध कर दोतुम चाहो आत्मा को असिद्ध कर दो।
अष्टावक्र कहते हैं. बुद्धिमान पुरुष वही है जो तर्क में आस्था नहीं रखतातर्क का त्याग कर देता है। यह देख कर कि साधुओं केयोगियों केमहर्षियों के बहुत मत हैंतो एक बात तो सच है
कि मतों में सत्य नहीं हो सकतानहीं तो बहुत मत नहीं होते। सत्य तो मतातीत है। तर्कों में सत्य नहीं हो सकतानहीं तो तर्क का एक ही निष्कर्ष होता। तो सत्य तो तर्कातीत है।
ऐसा देख कर मतों के प्रति उपेक्षा पैदा हो जाती है। और जो उस उपेक्षा को प्राप्त होता हैवह मनुष्य निश्चित ही शांति को प्राप्त हो जाता है।
'जो उपेक्षासमता और युक्ति द्वारा चैतन्य के सच्चे स्वरूप को जान कर संसार से अपने को तारता हैक्या वह गुरु नहीं है?'
यह बड़ा महत्वपूर्ण सूत्र है। अष्टावक्र कह रहे हैं कि गुरु तेरे भीतर छिपा है। अगर तू उपेक्षासमता और युक्ति द्वारा चैतन्य के सच्चे स्वरूप को जान लेतो मिल गया तुझे तेरा गुरु।
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरु:।
क्या यही गुरु नहीं हैसमता सेउपेक्षा सेयुक्ति द्वारा स्वयं के चैतन्य—स्वरूप को जान लेना—क्या यही गुरु नहीं है?क्या यही जान लेने की घटना पर्याप्त नहीं है?
निवेंदसमतायुक्ला यस्तारयति संसृते:।
बाहर जिसको तुम गुरु की तरह स्वीकार भी करते हो... जनक ने अष्टावक्र को स्वीकार किया है। जनक अष्टावक्र को ले आया है अपने राजमहल में और कहा. गुरुदेवमुझे समझाएं ज्ञान क्यामुक्ति क्यासच्चिदानंद परमात्मा क्यामुझे समझाएं।
गुरु का यह अंतिम कृत्य है कि वह समझाए कि जो मैंने तुझे समझायावह तेरे भीतर ही घट सकता है। गुरु की यह अंतिम कृपा है कि वह शिष्य को गुरु से भी छुटकारा दिला दे। यह आखिरी काम है। जो गुरु यह न करेवह सदगुरु नहीं। जो गुरु शिष्य को उलझा ले और फिर अपने में ही उलझाए रखेवह गुरु ही नहीं है। क्योंकि वह फिर इस शिष्य का शोषण कर रहा है। फिर उसकी चेष्टा यही है कि तुम शिष्य ही बने रहो।
लेकिन वास्तविक गुरु तो जल्दी ही जैसे ही तुम्हारे शिष्यत्व का काल पूरा हुआ और बोध का जागरण शुरू हुआ—कहेगा कि अबअब मेरी तरफ देखने की जरूरत नहींअब भीतर देखअब आंख बंद कर। मैं तो दर्पण था। तब तक मेरी जरूरत थी,जब तक तेरी अपनी आंख साफ न थी। अब तो तू अपनी ही आंख से देख लेगा। मैंने तुझे जो दिखाया वह वही था जो तू भी देख सकता है। मेरी जरूरत पड़ी थीक्योंकि तू बेहोश था। अब मेरी कोई जरूरत नहीं रही।
'जो उपेक्षासमता और युक्ति द्वारा चैतन्य के सच्चे स्वरूप को जान कर अपने को तारता हैक्या वही गुरु नहीं है?'
वही गुरु है! गुरु तो भीतर है। बाहर का गुरु तो केवल प्रतीक—रूप है। जो तुम्हारे भीतर घटना हैवह किसी में घट गया हैबस। लेकिन आत्यंतिक घटना तुम्हारे भीतर घटती है।
बाहर के गुरु से संकेत ले लेनालेकिन बाहर के गुरु को जंजीर मत बना लेना। बाहर का गुरु तुम्हारा कारागृह बन जाए,इससे सावधान रहना।
जरथुस्त्र का बड़ा बहुमूल्य वचन है। जब जरथुस्त्र अपने शिष्यों को छोड़ कर बाहर जाने लगाविलीन होने को अपनी अंतिम समाधि मेंतो उसने कहा, 'अब आखिरी सूत्र. जरथुस्त्र से सावधान रहना! आखिरी सूत्र जरथुस्त्र से सावधान रहना। बस,इतना कह कर वह पहाडों में चला गया।
'बिवेयर ऑफ जरथुस्त्रा!सब समझायाआखिर में यह समझाया कि अब मुझसे सावधान रहनाकहीं ऐसा न हो कि तुम मुझसे बंध जाओ! कहीं तुम्हारी आसक्ति मुझ पर न टिक जाए! नहीं तो फिर चूक हो गई।
दर्पण में तुम्हारा चेहरा दिखाई पड़ता है। इससे तुम यह मत समझ लेना कि दर्पण में तुम्हारा चेहरा हैनहीं तो पागल हो जाओगे। फिर दर्पण लिए फिरोगे कि अब दर्पण न ले जाएंगे तो चेहरा घर ही छूट जाएगा।
मुल्ला नसरुद्दीन एक धनपति के घर मस्जिद के लिए कुछ दान मांगने गया। जैसे कि धनपति होते हैंधनपति ने ऐसा खिड़की से झांक कर देखादेखा कि मुल्ला आया हैजरूर कुछ दान मांगने आया होगा। उसने अपने दरबान को कहा कि कह दो कि वे बाहर गए हैं। मुल्ला ने भी देख लिया था। उस सिर को मुल्ला भी देख चुका था खिड़की से।
दरबान ने कहा कि महानुभावआप गलत समय आए मालिक बाहर गए हैं।
तो मुल्ला ने कहाकोई हर्जा नहींहम फिर आ जाएंगे। मालिक आ जाएं तो हमारी तरफ से मुफ्त एक सलाह उनको दे देना कि बाहर तो जाएंलेकिन सिर घर न छोड़ कर जाया करें। इसमें कभी खतरा हो सकता है।
अगर तुमने समझा कि दर्पण में तुम्हारा चेहरा हैतो फिर तुम्हें दर्पण को ले कर घूमना पड़ेगानहीं तो चेहरा घर छूट जाएगाबिना चेहरे के तुम जाओगे।
गुरु तो दर्पण हैतुम्हें तुम्हारा चेहरा पहचनवा देता है। लेकिन एक दफा पहचान आनी शुरू हो गईतो अंततः तो अपने भीतर ही खोजना है।
गुरु तो वही है जो तुम्हें तुम्हारे गुरु से मिला दे। गुरु तो वही है जो तुम्हारे भीतर के सोए गुरू को जगा दे। स्वयं में छिपा है गुरु। बाहर का गुरु तो केवल प्रतिध्वनि है तुम्हारे भीतर के गुरु की।
'जब भूत—विकारों कोदेहइंद्रिय आदि को यथार्थत: भूत—मात्र देखेगाउसी क्षण तू बंध से मुक्त हो कर अपने स्वभाव में स्थित होगा।'
पश्य भूतविकारास्ल भूतमात्रान् यथार्थत:।
जो जैसा हैजब तू उसको वैसा ही देखने लगेगा।
तत्क्षणाद् बंध निर्मुक्त:।
उसी क्षण तू बंधन से मुक्त हो जाएगा।
स्वरूपस्थो भविष्यसि।
और अपने स्वभाव में थिर हो जाएगा। पहुंच जाएगा उस आंतरिक केंद्र पर जहां कोई तरंग नहीं पहुंचती।
'जब भूत—विकारों कोदेहइंद्रिय आदि को यथार्थत: वैसा ही देखेगाजैसे वे हैं.।'
शरीर को जब तू शरीर की भांति देखेगा। अभी हम देखते हैं : मेरा शरीरमैं शरीरमेरा मनमैं मन। अभी हम चीजों को वैसा देखते हैं जैसी वे नहीं हैंहम अन्यथा देखते हैं। और हम अन्यथा इसलिए देखते हैं कि अभी हमारी देखने की क्षमता ही साफ नहीं हैबड़ी धूमिल हैकुछ का कुछ दिखाई पड़ता है।
अष्टावक्र कहते हैं. जो जैसा हैउसे वैसा ही देख लेना है। शरीरशरीर है। मनमन है। और मैं तो दोनों के पार हूं—जो दोनों को देखतादोनों को पहचानता।
तुमने कभी खयाल कियामन में क्रोध आता हैतब भी तो कोई तुम्हारे भीतर देखता है कि क्रोध आ रहा है। तुमने उस भीतर देखने वाले को थोड़ा पहचानने की कोशिश की—कौन देखता है क्रोध आ रहा हैजब क्रोध आता है तो कोई देखता है क्रोध आ रहा है। तुम देखते हो कि शरीर में जहर फैल रहा हैहिंसा की भावना उठ रही है। कौन देखता हैकौन देखता हैकोई अपमान कर देता है तो अपमान हो जाता हैतुम्हारे भीतर कोई देखता है कि मैं अपमानित अनुभव कर रहा हूं। कौन देखता है कि अपमान हो गया?
तुम मुझे सुन रहे हो। मैं यहां बोल रहा हूं तुम वहां सुन रहे हो—यह बोलने और सुनने के पीछे तुम्हारा साक्षी खड़ा हैजो यह देख रहा है कि तुम सुन रहे हो। और कभी—कभी तुम्हारा साक्षी तुमसे यह भी कहेगा कि तुमने सुना तोफिर भी सुना नहीं,चूक गए!
तुम एक पन्ना पढ़ते हो किताब कापूरा पन्ना पढ़ जाते हों—अचानक खयाल आता है कि अरेपढ़ते तो रहेलेकिन चूक गए! यह किसको याद आयापढ़ने के अतिरिक्त भी तुम्हारे पीछे कोई खड़ा है—अंतिम निर्णायक—जो कहता हैफिर से पढ़ो,चूक गए! यह जो अंतिम है तुम्हारे भीतरयही तुम्हारा स्वरूप है।
'जो जैसा है उसे वैसा ही देख ले कर उसी क्षण तू बंध से मुक्त हो कर अपने स्वभाव में स्थिर होगा। '
'वासना ही संसार है। इसलिए वासना को छोड़।'
संसार को नहीं! वासना संसार हैइसलिए वासना को छोड़।
'वासना के त्याग से संसार का त्याग है। अब जहां चाहे वहां रह।'
बड़े क्रांतिकारी वचन हैं! अब जहां चाहे वहां रह! अब संसार में रहना हैसंसार में रहबाजार में रहना हैबाजार में रह। अब जहां चाहे वहां रह। बसतेरा साक्षी सुस्पष्ट बना रहेफिर कुछ और चाहिए नहीं।
वासना एव संसार इति सर्वा विमुज्‍च ता:।
तत्यागो वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा।
जैसा है फिर तू जहां है फिर तू बिलकुल ठीक है और सुंदर है। कहीं कुछ करने को नहीं है। बसएक बात जानते रहने को है कि मैं सिर्फ साक्षी—मात्र! अहो चिन्मात्रम्!
वासना एव संसार:.।
इस भेद को समझना। लोग तुमसे कहते हैंवासनाएं छोड़ो तो संसार छूटेगा। लोग तुमसे कहते हैंवासनाएं छोड़ो तो संसार छूटेगा। वासनाएं नहीं हैंवासना है। कोई बहुत वासनाएं नहीं हैंवासना तो एक ही है। वासना तो एक ही वृत्ति है : कुछ होना हैकुछ पाना है। उनके नाम तुम कुछ भी रखो। किसी को धन पाना हैकिसी को पद पाना हैकिसी को मोक्ष पाना है—वासना तो एक ही है। वासना का अर्थ है : जो मैं हूं उससे मैं राजी नहींकुछ और होना चाहिएतब मैं राजी होऊंगा। वासना का अर्थ है : जो हैउससे मैं नाराजऔर जो नहीं है वह होना चाहिए। जब तुम जो है उससे राजी हो जाओगेऔर जो नहीं है उसकी मांग न करोगे—वासना गई।
वासना एव संसार:...।
और वासना ही संसार है!
कुछ हैं जो कहते हैं : संसार छोड़ोतब वासना छूटेगी। गलत कहते हैं। संसार छोड़ने से कुछ भी न होगा। तुम जंगल में भाग जाओगेवासना तुम्हारे साथ छाया की तरह लगी रहेगी। तुम मंदिर में बैठ जाओगे वासना तुम्हारा पीछा करेगीवहीं संसार बन जाएगा। जहां तुम होवहां वासना होगी। वासना होगीवहीं संसार निर्मित हो जाएगा। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता।
वासना एव संसार:... ।
वासना संसार हैइसलिए वासना छूट जाए!
इति ज्ञात्वा......।
ऐसा जो जान लेता है।
तासर्वा विमुडच.......।
वह सबसे मुक्त हो ही गया। उससे सब छूट गया। इस सत्य को पहचान लिया कि वासना ही संसार हैबस इस पहचान में ही सब छूट हो गई।
वासना त्यागात तत्याग:..।
इधर वासना गईवहां संसार गया।
अद्य यथा तथा स्थिति।
फिर तेरी जनकजहां मर्जी होवहां रह। फिर जहां चाहे वहां रह।
इस सूत्र को भी खयाल में ले लेना। इसका यह अर्थ हुआ कि फिर जहां पाए अपने कोवहीं ठीक है। फिर जो हो रहा हो,वही ठीक है। महल में पाए तो महल ठीक हैजंगल में पाए तो जंगल ठीक है।
एक फकीर एक सम्राट का मित्र था। सम्राट उस फकीर से बहुत ही प्रभावित था। इतना प्रभावित था कि एक दिन उसने कहा कि प्रभुमुझसे देखा नहीं जाता कि इस वृक्ष के नीचे धूपछायागर्मी में आप बैठे रहेंराजमहल चलें!
सोचा था सम्राट ने कि जब मैं यह कहूंगाफकीर कहेगा कि 'नहीं—नहींनहीं—नहींराजमहल और मैंमैं छोड़ चुका संसार!ऐसा कहा होता फकीर ने तो सम्राट प्रसन्न हुआ होता। उसके मन में और भी फकीर के प्रति आदर बढ़ा होता। लेकिन फकीर मेरे जैसा रहा होगा। वह उठ कर खड़ा हो गया। उसने कहाघोड़ा इत्यादि कहां हैसम्राट थोड़ा सकुचाया कि अरेयह कैसा त्यागी! मगर अब कुछ कह भी न सकता था। ले आया घोड़ालेकिन बेमन से लाया। वह तो फकीर चढ़ कर घोड़े पर बैठ गया। उसने कहा कि चलो।
ले आया महललेकिन मजा चला गया। क्योंकि मजा तो यही था सम्राट का कि महात्यागी गुरु! यह कैसा त्यागीअब लेकिन कह भी कुछ नहीं सकताअपने हाथ से ही फंस गयाबुला लाया। उसको अच्छे से अच्छे कमरे में रखाजो श्रेष्ठतम,सुंदरतम महल का हिस्सा था। वह वहीं रहने लगा। वह जैसे वृक्ष के नीचे बैठा रहा थावह सुंदर महल में बैठा रहने लगा।
कुछ दिन बाद सम्राट की बेचैनी बढ़ने लगी। उसने कहायह तो बात अजीब हो गई। छह महीने बीत जाने पर उसने कहा कि महाराज एक प्रश्न उठता रहा है.।
फकीर ने कहाइतनी देर क्यों कीप्रश्न तो उसी दिन उठ गया था जब मैंने कहाघोड़ा ले आओ!
सम्राट डरा। उसने कहा कि आपको पता है?
'पता कैसे नहीं होगाक्योंकि तत्‍क्षण तुम्हारा चेहरा बदल गया था। उसी क्षण मेरा तुमसे संबंध छूट गयाजब मैंने घोड़े से संबंध जोड़ा। उसी क्षण मैं कोई त्यागी नहीं रहा तुम्हारे लिए। बोलोछह महीने क्यों रुकेइतनी देर क्यों तकलीफ सही?मुझे पता है कि तुम बेचैन हो रहे। क्या है?'
कहा, 'इतना—सा पूछना है कि अब तो मुझमें और आपमें कुछ भी अंतर नहीं है। अब तो ठीक आप भी मेरे जैसे हैं—महल में रहते हैंसुख—सुविधानौकर—चाकरअच्छा खाना—पीना! भेद तो तब थाजब आप बैठे थे वृक्ष के नीचे—आप फकीर थे,त्यागी थेमहात्मा थेमैं राजा थाभोगी था। अब क्या भेद है?'
उस फकीर ने कहाजानना चाहते हो भेदतो गांव के बाहर चलो।
राजा ने कहाठीक।
दोनों गांव के बाहर गए। फकीर ने कहाथोड़ी दूर और चलें।
दोपहर हो गई। सम्राट ने कहाअब बता भी देंबताना है तो कहीं भी बता देंअब आधा जंगल आ गया यह।
नहींउसने कहा कि थोड़ी दूर और। सूरज अस्त होते ही समझा दूंगा।
सूरज अस्त होने लगा। सम्राट ने कहाअब... अब बोलें!
उसने कहा कि इतना ही समझाना है कि अब मैं वापिस नहीं जा रहा। तुम जाते हो कि चलते होसम्राट ने कहामैं कैसे चल सकता हूं आपके साथमहल हैपत्नी हैबच्चे हैंसारी व्यवस्था..। मैं कैसे चल सकता हूं?
फकीर ने कहालेकिन मैं जा रहा हूं। फर्क समझ में आया?
सम्राट उसके पैर पर गिर पड़ा 1 उसने कहा कि नहींमुझे छोड़े मतमुझसे बड़ी भूल हो गई। उसने कहामैं तो अभी फिर घोड़े पर बैठने को तैयार हूं। लेकिन तुम फिर मुश्किल में पड़ जाओगे। ले आघोड़ा कहां है?
जब अष्टावक्र कह रहे हैं तो उनका इशारा यही है : अब जहां चाहेवहां रह।
अद्य यथा तथा स्थिति:।
फिर जो होजैसा हों—ठीक हैस्वीकार है। तथाता! ऐसे तथाता के भाव में जो रहता हैउसी को बौद्धों ने तथागत कहा है।
बुद्ध का एक नाम है : तथागत। तथागत का अर्थ है : जो हवा की तरह आताहवा की तरह चला जातापूरब कि पश्चिम का कोई भेद नहींउत्तर कि दक्षिण का कोई भेद नहीं। रेगिस्तानों में बहे हवा कि मरूद्यानों में बहे हवा—कुछ भेद नहीं। जो ऐसा आया और ऐसा गया! तथागत! जिसे सब स्वीकार है!
अद्य यथा तथा स्थिति:।
इस सूत्र को महावाक्य समझो। इस पर खूब—खूब ध्यान करना। इसे धीरे — धीरे तुम्हारे अंतरतम में विराजमान कर लेना। यह तुम्हारे मंदिर का जलता हुआ दीया बने—तो बहुत प्रसाद फलित होगाबहुत आशीष बरसेंगे!
तुम वही हो सकते होजिसको अष्टावक्र ने कहा है. कस्य धन्यस्य अपि! कोई धन्यभागी! तुम वही धन्यभागी हो सकते हो। उसका ही मैंने तुम्हारे लिए द्वार खोला है।

 हरि ओंम तत्सत्!

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