शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

अनहद में बिसराम - प्रवचन-09

दिनांक 19नवम्बरसन् 1980


पहला प्रश्न: भगवानमैं एक विचारशील युवक हूंजिसे अपने देश के मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं। यह अंधविश्वासों तथा दकियानूसी विचारों से दबा हमारा भारत बिलकुल नरक बन गया है। मेरा खून खौल-खौल उठता है इसकी सड़ी-गली स्थिति देख कर और इस अभागे देश के लिए कुछ करने के लिए अधीर हो उठता हूं।
भगवानएक व्यक्ति के नाते इस देश के प्रति मेरा क्या कर्तव्य हैमैं क्या करूं कि इस देश की दीन-हीनताभुखमरीपाखंडकाहिलता और सड़ांध मिट जाए?

 निर्मल घोष!
पहली बातअकेले विचारशील होने से कुछ भी न होगा। अंधेरा होतो रोशनी के विचार से मिटता नहीं। रोशनी चाहिए! बीमारी होतो स्वास्थ्य का कितना ही चिंतन करोकुछ हाथ न लगेगा। औषधि चाहिए! विचार तो नपुंसक है।
विचारशीलता कोई बहुत महत्वपूर्ण बात नहीं। ध्यान चाहिए!
ध्यान अपूर्व ऊर्जा है। और ध्यान से संभव है भीतर के दीए का जल जाना। उस रोशनी में तुम भीतर भी देख सकोगेबाहर भी देख सकोगे। ध्यान से मिलती है दृष्टिदर्शन। विचार तो अंधे आदमी का अंधेरे में टटोलना है। विचारक की कोई बड़ी मूल्यवत्ता नहीं है।
दर्शनशास्त्र की परिभाषा की जाती है: अंधेरी रात मेंएक अंधेरे कक्ष मेंएक अंधे आदमी के द्वारा एक काली बिल्ली की तलाश,जो कि वहां है ही नहीं!
पहले तो आंख चाहिएनहीं तो तुम समस्याओं को ही न समझ पाओगे। और समाधान खोजने निकल गएतो समस्याएं तो अपनी जगहतुम्हारे समाधान और नई-नई समस्याएं ले आएंगे।
इस देश के उपद्रवों में एक गहन से गहन उपद्रव यही है। इसने बहुत सोचा है! सोचने की कुछ कमी नहीं की। विचार में हम किससे पीछे हैं! दुनिया की कोई जाति इस भांति विचारक होने का दावा नहीं कर सकतीजैसा हम कर सकते हैं। पांच हजार वर्षों की सुनिश्चिततर्कशुद्ध परंपरा है। मगर हाथ क्या आयाविचार से हाथ कुछ आता ही नहीं--पांच हजार साल या पचास हजार साल।
विचार तो कोरे शब्दों का जमाव है। ध्यान से रूपांतरण होता है।
तो पहली तो बात तुमसे कहूंगानिर्मल घोषविचारशील होयह काफी नहीं। युवक होयह भी काफी नहीं। क्योंकि युवावस्था में खून तो यूं ही खौल उठता है। इसके लिए कुछ खास कारणों की जरूरत नहीं होती। कारण हों तो ठीककारण न हों तो ठीक। युवावस्था में खून तो खौलता हैजैसे वर्षा में वर्षा होती हैसर्दी में सर्दी होती हैगरमी में गरमी होती है। युवावस्था में खून खौलता हैबुढ़ापे में खून सर्द होकर जम जाता हैबर्फ की चट्टान की तरह।
न तो बूढ़े आदमी का कोई गौरव है। अगर बूढ़ा आदमी कहे कि अब मैं शांत हो गयाशीतल हो गयातो यह शीतलता और यह शांति कुछ मूल्य नहीं रखती। यह तो सिर्फ पतझड़ का लक्षण है। यह तो मौत करीब आने लगीउसकी पगध्वनियां हैं।
और ऐसे ही जवान आदमी का खून खौल जाएतो कुछ खूबी मत समझना। यह तो बहाने ही तलाश करता हैयह तो खौलना ही चाहता है। जवानी के मौसम में खून का खौलना बिलकुल स्वाभाविक है। कारण कुछ भी हो सकता है। कारण का मूल्य ही नहीं है। अगर कारण न होगातो तुम कारण ईजाद कर लोगे।
खून तो खौलेगालेकिन अकेले तुम्हारे खून के खौलने से क्या होगासिर्फ तुम्हें थोड़ी तकलीफ होगीथोड़ी बेचैनी होगी। बहुत ही समझदारी का काम कियातो थोड़ी चाय डाल लेनातो चाय भी खौल जाएगी! जवानी का थोड़ा मजा आ जाएगाऔर क्या होगा! शक्कर तो मिलती नहींनहीं तो मैं कहताथोड़ी शक्कर डाल लेना! तो बिना शक्कर की ही चाय पी लेना! खून खौल रहा हैईंधन का काम ले लो। ईंधन भी मुश्किल हो गया! गैस मिलती नहींकोयला मिलता नहींकेरोसिन मिलता नहीं! अच्छा है कि कम से कम तुम्हारा खून तो खौलता हैइस पर केटली चढ़ा दोइसके पहले कि यह ठंडा हो जाए। जब ठंडा होने लगेतब कुल्फी जमा लेना! ठंडा भी होगा। इसको बहुत कीमत मत दो।
लेकिन हर जवान को यह वहम होता है। जैसे हर बच्चे को तितलियां पकड़ने का नशा चढ़ता है। जैसे तितलियां पकड़ लेगा तो कुछ हो जाएगा! जैसे तितलियां पकड़ लेगा तो कुछ मिल जाएगा! कंकड़-पत्थर बीन लेता हैरंगीन पत्थरजैसे हीरे-जवाहरात हों! गुड्डियों का विवाह रचाता है। वह सब ठीक है। वे बचपने के लक्षण हैं। ऐसे ही जवानी में खून खौलता है। हर छोटी-मोटी चीज पर जवान मरने-मारने को तत्पर हो जाता है! उसको मरने-मारने के लिए कोई भी बहाना चाहिए--राजनीति होधर्म होदेश हो,जाति हो--कोई भी बहाना मिल जाएवह मरने-मारने को राजी है! और ये कोई छोटे-मोटे लोग नहींजिनको तुम बड़े-बड़े लोग कहते होउनके साथ भी यही मामला है।
अभी-अभी विवेकानंद का एक वक्तव्य पढ़ रहा था कि जो व्यक्ति हिंदू धर्म के खिलाफ बोलेगाउसे उठा कर समुद्र में फेंक दूंगा!
यह भाषायह ढंग एक मतांध हिंदू का हो सकता है। ये शब्द आक्रामक सांप्रदायिकता के लक्षण हैंन तो संस्कृति केन संतत्व के। और किसी को समुद्र में फेंक दोगेइससे क्या होगाअगर वह आदमी होशियार हुआतो पूरे समुद्र को हिंदू धर्म के खिलाफ खड़ा कर देगा!
और मुसलमान भी इसी के लिए तैयार हैं! और ईसाई भी इसी के लिए तैयार हैं! जमीन पर किसी को रहने दोगे कि सभी को समुद्र में फेंक देना हैक्योंकि जैन हिंदू धर्म के खिलाफ बोल रहे हैं हजारों साल से। विवेकानंद ने क्या कियाकितने जैन समुद्र में फेंकेऔर बौद्ध हिंदू धर्म के खिलाफ बोल रहे हैं ढाई हजार साल से। कितने बौद्धों को विवेकानंद ने समुद्र में फेंका?और मुसलमानऔर ईसाईऔर न मालूम कितने वर्ग हैं नास्तिकों के--और कुछ नए नहींचार्वाक से लेकर कार्ल माक्र्स तक--कितनों को विवेकानंद ने समुद्र में फेंक दिया?
मगर जवानी में उत्तेजक बातें कहने का मजा होता है। एक तरह का पागलपन है जवानी। एक तरह की मूढ़ता है जवानी। जवान मूर्खता न करे तो आश्चर्य! उससे कुछ न कुछ मूढ़ता होगी। तो विचार अकेला नपुंसक है और जवानी अकेली अंधी है। इन दोनों को राह पर लगाने के लिए सिवाय ध्यान के कोई मार्ग नहीं हैनिर्मल घोष! ध्यान तुम्हारे विचार को प्राण देगा और तुम्हारी जवानी को समझ देगा।
तो पहला तो काम करो कि ध्यान में उतरोताकि ठीक-ठीक समस्याओं को देख सको। समस्याएं निश्चित हैं। मगर तुमने जो प्रश्न पूछा हैउस प्रश्न में ही जाहिर है कि तुम्हें समस्याएं स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ रही हैं।
जैसे तुम कहते हो, "मैं एक विचारशील युवक हूं।'
यह भी अहंकार की भाषा है। अभी क्या खाक विचार किया होगा! और अभी से तुम्हें विचारशील होने की भ्रांति चढ़ गई।
सुकरात तो अपने अंतिम जीवन के क्षणों में कहता हैमैं इतना ही जानता हूं कि मैं कुछ भी नहीं जानता!
यह है विचारशीलता। अगर विचारशीलता ही कहना होतो यह सुकरात है विचारशील। यह है द्रष्टा। जीवन भर के चिंतन-मनन के बाद यह उदघोषणाकि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं! जीवन रहस्य है इतना बड़ा कि कहां कौन जान पाया!
उपनिषद कहते हैंजो कहे मैं जानता हूंजानना कि नहीं जानताजो कहे कि मैं नहीं जानता हूंशायद जानता हो! उपनिषद यह भी कहते हैं कि अज्ञानी तो अंधकार में भटक ही जाते हैंमगर ज्ञानी महा अंधकार में भटक जाते हैं।
इस भ्रांति को उतारो। यह तो पहला कर्तव्य तुम्हारा अपने प्रति। और इसके पहले कि तुम दूसरों के प्रति कोई कर्तव्य करने जाओइसके पहले कि तुम देश की सेवा करने में लग जाओथोड़ी अपनी सेवा कर लो! नहीं तो अक्सर यह होता है कि जिनके दीए खुद ही नहीं जले हैंवे दूसरों के दीए जलाने निकल पड़ते हैं! कैसे जलाएंगेखुद की ज्योति तो होतो ज्योति बांटी जा सकती है। खुद की ज्योति न होतो फिर क्रोध आता है कि यह दूसरा दीया जलता क्यों नहीं! नाराजगी पैदा होती है। खून खौल-खौल जाता है! फिर जरा-जरा सी बातों में खून खौल जाता है। और मजबूरी समझ में नहीं आती कि बात असल यह है कि तुम्हारे भीतर की ही ज्योति अभी नहीं हैऔर तुम दूसरे दीए में ज्योति डालने चले हो! बेचारा दूसरा दीया करे भी तो क्या करे?उसका कसूर कहां है?
पहले तो यह अहंकार छोड़ो। क्या तुमने अभी विचार किया हैजो तुमने प्रश्न पूछा हैवह कुछ बहुत विचारशीलता प्रकट नहीं करता है। मैं उसको एक-एक अंग चर्चा करूंगातो तुम्हारे खयाल में आ जाएगा।
तुम कहते हो, "मैं एक विचारशील युवक हूंजिसे अपने देश के मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं।'
इससे ही जाहिर होता है कि तुम्हें देश के अतीत का कुछ बोध नहीं है। मौजूदा हालात मुझे पसंद नहीं! इसका अर्थ यह हुआ कि पहले हालात बेहतर थे। इसका अर्थ यह हुआ कि पहले सब ठीक थासतयुग थास्वर्णयुग था। अब सब विकृत हो गया। मौजूदा हालात पसंद नहीं! यह विचारशीलता हुईयह तो इस देश का थोथे से थोथा पंडित रोज बक रहा है यही कि मौजूदा हालात पसंद नहीं!
और क्या तुम्हें पता हैमौजूदा हालात कभी भी पसंद थे किसी को?
चीन में छह हजार साल पुरानाआदमी की चमड़ी पर लिखा हुआ एक वक्तव्य मिला हैजिसमें ये शब्द हैं कि मुझे देश के मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं। छह हजार साल पहले! बेबीलोन में करीब-करीब इतनी ही पुरानी एक ईंट मिली हैजिस पर वक्तव्य है--वक्तव्य ऐसा कि तुम पढ़ो तो लगे आज सुबह-सुबह ही पूना हेराल्ड का संपादकीय है--मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं। विद्यार्थी गुरुओं की नहीं सुनते हैंअनुशासन भ्रष्ट हो गया है। छह हजार साल पुराना पत्थर! बच्चे मां-बाप की नहीं सुनते। परिवार की आधारशिला टूट गई है। प्रेम तिरोहित हो गया है संसार से। घृणा और वैमनस्य का राज्य है!
छह हजार साल पहले भी यही बात! आज भी यही बात! हालात कब अच्छे थेसभी शास्त्र कहते हैंपहले अच्छे थे। मगर यह पहले कब था?
यह पहले कभी भी नहीं था। पहले हालात और भी बुरे थे।
राम के समय को तुम रामराज्य कहते हो। हालात आज से भी बुरे थे। कभी भूल कर रामराज्य फिर मत ले आना! एक बार जो भूल हो गईहो गई। अब दुबारा मत करना।
राम के राज्य में आदमी बाजारों में गुलाम की तरह बिकते थे। कम से कम आज आदमी बाजार में गुलामों की तरह तो नहीं बिकता! और जब आदमी गुलामों की तरह बिकते रहे होंगेतो दरिद्रता निश्चित रही होगीनहीं तो कोई बिकेगा कैसेकिसलिए बिकेगादीन और दरिद्र ही बिकते होंगे। कोई अमीर तो बाजारों में बिकने न जाएंगे। कोई टाटाबिड़लाडालमिया तो बाजारों में बिकेंगे नहीं।
स्त्रियां बाजारों में बिकती थीं! वे स्त्रियां गरीबों की स्त्रियां ही होंगी। उनकी ही बेटियां होंगी। कोई सीता तो बाजार में नहीं बिकती थी। उसका तो स्वयंवर होता था। तो किनकी बच्चियां बिकती थीं बाजारों में?
और हालात निश्चित ही भयंकर रहे होंगे। क्योंकि बाजारों में ये बिकती स्त्रियां और लोग--आदमी और औरतें दोनोंविशेषकर स्त्रियां--राजा तो खरीदते ही खरीदते थेधनपति तो खरीदते ही खरीदते थेजिनको तुम ऋषि-मुनि कहते होवे भी खरीदते थे! गजब की दुनिया थी! ऋषि-मुनि भी बाजारों में बिकती हुई स्त्रियों को खरीदते थे!
अब तो हम भूल ही गए वधु शब्द का असली अर्थ। अब तो हम शादी होती है नई-नईतो वर-वधु को आशीर्वाद देने जाते हैं। हमको पता ही नहीं कि हम किसको आशीर्वाद दे रहे हैं! राम के समय में--और राम के पहले भी--वधु का अर्थ होता थाखरीदी गई स्त्री! जिसके साथ तुम्हें पत्नी जैसा व्यवहार करने का हक हैलेकिन उसके बच्चों को तुम्हारी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा! पत्नी और वधु में यही फर्क था। सभी पत्नियां वधु नहीं थींऔर सभी वधुएं पत्नियां नहीं थीं। वधु नंबर दो की पत्नी थी। जैसे नंबर दो की बही होती है नजिसमें चोरी-चपाटी का सब लिखते रहते हैं! ऐसी नंबर दो की पत्नी थी वधु।
ऋषि-मुनि भी वधुएं रखते थे! और तुमको यही भ्रांति है कि ऋषि-मुनि गजब के लोग थे। कुछ खास गजब के लोग नहीं थे। वैसे ऋषि-मुनि अभी भी तुम्हें मिल जाएंगे।
एक मां अपने छोटे से बच्चे को कह रही थी कि बेटातू नौ-नौ बजे उठता है! अरेऋषि-मुनि की संतान होब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए! ऋषि-मुनि हमेशा ब्रह्ममुहूर्त में उठते थे!
उस बेटे ने कहा कि नहीं मांऋषि तो कभी आठ बजे के पहले नहीं उठते। मुझे पता है। और मुनि भी कभी नौ बजे के पहले नहीं उठते।
मां ने कहातू यह कहां की बातें कर रहा है?
उसने कहामुझे मालूम है। ऋषि कपूर आठ बजे उठता है और दादा मुनि अशोक कुमार नौ बजे उठते हैं!
इन ऋषि-मुनियों में और तुम्हारे पुराने ऋषि-मुनियों में बहुत फर्क मत पाना तुम। कम से कम इनकी वधुएं तो नहीं हैं! कम से कम ये बाजार से स्त्रियां तो नहीं खरीद ले आते! इतना बुरा आदमी तो आज पाना मुश्किल है जो बाजार से स्त्री खरीद कर लाए। आज यह बात ही अमानवीय मालूम होगी। मगर यह जारी थी!
रामराज्य में शूद्र को हक नहीं था वेद पढ़ने का! यह तो कल्पना के बाहर थी बात कि डाक्टर अंबेदकर जैसा शूद्र और राम के समय में भारत के विधान का रचयिता हो सकता था! असंभव। खुद राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था--गरम सीसाउबलता हुआ सीसा! क्योंकि उसने चोरी सेकहीं वेद के मंत्र पढ़े जा रहे थेवे छिप कर सुन लिए थे। यह उसका पाप थायह उसका अपराध था। और राम तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! राम को तुम अवतार कहते हो! और महात्मा गांधी रामराज्य को फिर से लाना चाहते थे। क्या करना हैशूद्रों के कानों में फिर से सीसा पिघलवा कर भरवाना हैउसके कान तो फूट ही गए होंगे। शायद मस्तिष्क भी विकृत हो गया होगा। उस गरीब पर क्या गुजरीकिसी को क्या लेना-देना! शायद आंखें भी खराब हो गई होंगी। क्योंकि ये सब जुड़े हैंकानआंखनाकमस्तिष्कसब जुड़े हैं। और दोनों कानों में अगर सीसा उबलता हुआ...!
तुम्हारा खून क्या खाक उबल रहा है निर्मल घोष! उबलते हुए शीशे की जरा सोचो! उबलता हुआ सीसा जब कानों में भर दिया गया होगातो चला गया होगा पर्दों को तोड़ करभीतर मांस-मज्जा तक को प्रवेश कर गया होगामस्तिष्क के स्नायुओं तक को जला गया होगा। फिर इस गरीब पर क्या गुजरीकिसी को क्या लेना-देना है! धर्म का कार्य पूर्ण हो गया। ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया कि राम ने धर्म की रक्षा की। यह धर्म की रक्षा थी!
और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात खराब हैं!'
युधिष्ठिर जुआ खेलते हैंफिर भी धर्मराज थे! और तुम कहते होमौजूदा हालात खराब हैं! आज किसी जुआरी को धर्मराज कहने की हिम्मत कर सकोगेऔर जुआरी भी कुछ छोटे-मोटे नहींसब जुए पर लगा दिया। पत्नी तक को दांव पर लगा दिया!
एक तो यह बात ही अशोभन हैक्योंकि पत्नी कोई संपत्ति नहीं है। मगर उन दिनों यही धारणा थीस्त्री-संपत्ति! उसी धारणा के अनुसार आज भी जब बाप अपनी बेटी का विवाह करता हैतो उसको कहते हैं कन्यादान! क्या गजब कर रहे हो! गाय-भैंस दान करो तो भी समझ में आता है। कन्यादान कर रहे हो! यह दान हैस्त्री कोई वस्तु हैये असभ्य शब्दये असंस्कृत हमारे प्रयोग शब्दों के बंद होने चाहिए। अमानवीय हैंअशिष्ट हैंअसंस्कृत हैं।
मगर युधिष्ठिर धर्मराज थे। और दांव पर लगा दिया अपनी पत्नी को भी! हद्द का दीवानापन रहा होगा। पहुंचे हुए जुआरी रहे होंगे। इतना भी होश न रहा। और फिर भी धर्मराज धर्मराज ही बने रहेइससे कुछ अंतर न आया। इससे उनकी प्रतिष्ठा में कोई भेद न पड़ा। इससे उनका समादर जारी रहा।
भीष्म पितामह को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर ब्रह्मज्ञानी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! गुरु द्रोण को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर गुरु द्रोण भी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! अगर कौरव अधार्मिक थेदुष्ट थेतो कम से कम भीष्म में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी! और बाल-ब्रह्मचारी थे और इतनी भी हिम्मत नहींतो खाक ब्रह्मचर्य था यह! किस लोलुपता के कारण गलत लोगों का साथ दे रहे थेऔर द्रोण तो गुरु थे अर्जुन के भीऔर अर्जुन को बहुत चाहा भी था। लेकिन धन तो कौरवों के पास थापद कौरवों के पास थाप्रतिष्ठा कौरवों के पास थी। संभावना भी यही थी कि वही जीतेंगे। राज्य उनका था। पांडव तो भिखारी हो गए थे। इंच भर जमीन भी कौरव देने को राजी नहीं थे।
और कसूर कुछ कौरवों का होऐसा समझ में आता नहीं। जब तुम्हीं दांव पर लगा कर सब हार गएतो मांगते किस मुंह से थेमांगने की बात ही गलत थी। जब हार गए तो हार गए। खुद ही हार गएअब मांगना क्या है?
लेकिन गुरु द्रोण भी अर्जुन के साथ खड़े न हुएखड़े हुए उनके साथ जो गलत थे।
यही गुरु द्रोण एकलव्य का अंगूठा कटवा कर आ गए थे अर्जुन के हित मेंक्योंकि तब संभावना थी कि अर्जुन सम्राट बनेगा। तब इन्होंने एकलव्य को इनकार कर दिया था शिक्षा देने से। क्योंक्योंकि शूद्र था।
और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं!'
निर्मल घोषएकलव्य को मौजूदा हालात उस समय के पसंद पड़े होंगेउस गरीब का कसूर क्या था अगर उसने मांग की थी,प्रार्थना की थी कि मुझे भी स्वीकार कर लो शिष्य की भांतिमुझे भी सीखने का अवसर दे दोलेकिन नहींशूद्र को कैसे सीखने का अवसर दिया जा सकता है!
मगर एकलव्य अनूठा युवक रहा होगा। अनूठा इसलिए कहता हूं कि उसका खून नहीं खौला। खून खौलता तो साधारण युवकदो कौड़ी का। सभी युवकों का खौलता हैइसमें कुछ खास बात नहीं। उसका खून नहीं खौला। शांत मन से उसने इसको स्वीकार कर लिया। एकांत जंगल में जाकर गुरु द्रोण की प्रतिमा बना ली। और उसी प्रतिमा के सामने शर-संधान करता रहा। उसी के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा। अदभुत युवक था। उस गुरु के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा जिसने उसे शूद्र के कारण इनकार कर दिया थाअपमान न लिया। अहंकार पर चोट तो लगी होगीलेकिन शांति सेसमता से पी गया।
धीरे-धीरे खबर फैलनी शुरू हो गई कि वह बड़ा निष्णात हो गया है। तो गुरु द्रोण को बेचैनी हुईक्योंकि बेचैनी यह थी कि खबरें आने लगीं कि अर्जुन उसके मुकाबले कुछ भी नहीं। और अर्जुन पर ही सारा दांव था। अगर अर्जुन सम्राट बनेऔर सारे जगत में सबसे बड़ा धनुर्धर बनेतो उसी के साथ गुरु द्रोण की भी प्रतिष्ठा होगी। उनका शिष्यउनका शागिर्द ऊंचाई पर पहुंच जाएतो गुरु भी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। उनका सारा का सारा न्यस्त स्वार्थ अर्जुन में था। और एकलव्य अगर आगे निकल जाएतो बड़ी बेचैनी की बात थी।
तो यह बेशर्म आदमीजिसको कि ब्रह्मज्ञानी कहा जाता हैयह गुरु द्रोणजिसने इनकार कर दिया था एकलव्य को शिक्षा देने सेयह उससे दक्षिणा लेने पहुंच गया! शिक्षा देने से इनकार करने वाला गुरुजिसने दीक्षा ही न दीवह दक्षिणा लेने पहुंच गया! हालात बड़े अजीब रहे होंगे! शर्म भी कोई चीज होती है! इज्जत भी कोई बात होती है! आदमी की नाक भी होती है! ये गुरु द्रोण तो बिलकुल नाक-कटे आदमी रहे होंगे! किस मुंह से--जिसको दुत्कार दिया था--उससे जाकर दक्षिणा लेने पहुंच गए!
और फिर भी मैं कहता हूंएकलव्य अदभुत युवक थादक्षिणा देने को राजी हो गया। उस गुरु कोजिसने दीक्षा ही नहीं दी कभी! यह जरा सोचो तो! उस गुरु कोजिसने दुत्कार दिया था और कहा कि तू शूद्र है! हम शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते!
बड़ा मजा है! जिस शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकतेउस शूद्र की भी दक्षिणा स्वीकार कर सकते हो! मगर उसमें षडयंत्र थाचालबाजी थी।
उसने चरणों पर गिर कर कहाआप जो कहें। मैं तो गरीब हूंमेरे पास कुछ है नहीं देने को। मगर जो आप कहेंजो मेरे पास होतो मैं देने को राजी हूं। यूं प्राण भी देने को राजी हूं।
तो क्या मांगामांगा कि अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर मुझे दे दे!
जालसाजी की भी कोई सीमा होती है! अमानवीयता की भी कोई सीमा होती है! कपट कीकूटनीति की भी कोई सीमा होती है! और यह ब्रह्मज्ञानी! उस गरीब एकलव्य से अंगूठा मांग लिया। और अदभुत युवक रहा होगानिर्मल घोषदे दिया उसने अपना अंगूठा! तत्क्षण काट कर अपना अंगूठा दे दिया! जानते हुए कि दाएं हाथ का अंगूठा कट जाने का अर्थ है कि मेरी धनुर्विद्या समाप्त हो गई। अब मेरा कोई भविष्य नहीं। इस आदमी ने सारा भविष्य ले लिया। शिक्षा दी नहींऔर दक्षिणा मेंजो मैंने अपने आप सीखा थाउस सब को विनष्ट कर दिया।
ये अर्जुन के पक्ष में उसका अंगूठा काट लाए थे! हालात अच्छे नहीं थे। हालात कभी अच्छे नहीं रहे। हालात बहुत बुरे थे। असल में हालात बहुत बुरे थेइसीलिए तो आज बुरे हैं। नहीं तो आज कैसे बुरे हो जाते! आज आया कहां सेयह सारे कलों की निष्पत्ति है। वह जो बीत गया अतीतउसका ही निचोड़ है। उससे ही तो पैदा हुआ है। हम कहते हैंवृक्ष को उसके फल से जाना जाता हैबाप को उसके बेटे से जाना जाता है। तुम्हारे वर्तमान से तुम्हारे अतीत का पता चलता हैऔर तो कोई पता चलने का आधार नहीं होता। तुम्हारा वर्तमान कह रहा है कि तुम्हारा अतीत बहुत बदतर था।
इसलिए पहली तो बातअगर तुम ध्यान में उतरोगेतो तुम्हें यह दिखाई पड़ेगी कि हालात हमेशा से खराब थे। मामला आसान नहीं हैउथला-उथला नहीं है। बीमारी आज की नहीं हैसंक्रामक हैऔर बहुत गहरी हैबहुत दूर तक घुस गई हैहड्डियों में प्रवेश कर गई है। अगर तुमने ठीक से बीमारी को न समझातो तुम ऊपर ही ऊपर पलस्तर करते रहनापुल्टिस बांधते रहना। अब कैंसर कोई पुल्टिस बांधने से ठीक होने वाले नहीं हैं। कैंसर का इलाज करने के पहले यह तो जानना जरूरी है कि यह कैंसर है। चिकित्सा के पहले निदान जरूरी है। और ध्यान के बिना कोई निदान नहीं।
तुम्हारा यह कहना कि "आज के हालात मुझे बिलकुल पसंद नहीं...।'
तुम्हारी पसंदगी और नापसंदगी का सवाल नहीं हैक्योंकि बहुतों को पसंद हैं। अगर पसंदगी-नापसंदगी से तय होना हैतब तो मामला बड़ा मुश्किल हो जाएगा। जिनके भी स्वार्थ निहित हैं इसी मौजूदा स्थिति मेंउनको तो पसंद हैं। पंडित कोपुरोहित को,राजनेता कोधनपति कोउनको तो पसंद हैंबिलकुल पसंद हैंबहुत रास आ रहे हैं। तुमको पसंद नहीं हैं। लेकिन तुम्हारी नापसंदगी निर्णायक नहीं हो सकती। सवाल तो इसका है कि सच मेंपसंदगी-नापसंदगी को छोड़ करहालात क्या हैंनिष्पक्ष होकर देखना पड़ेगा। निष्पक्ष होकर देखोगेतो ही निदान कर सकोगे।
यह थोड़े ही सवाल है कि डाक्टर को तुम्हारी बीमारी पसंद नहीं है या तुम्हारी बीमारी पसंद है। सवाल यह है कि तुम्हारी बीमारी तुम्हें खा रही हैडाक्टर को पसंद हो कि नापसंद होयह सवाल नहीं है। तुम्हारी बीमारी संघातक हैप्राण-लेवा है। इसको निष्पक्ष भाव से देखना होगा।
तुम कहते हो, "यह अंधविश्वासों तथा दकियानूसी विचारों से दबा हुआ हमारा भारत बिलकुल नरक बन गया है।'
इसलिए मैंने ध्यान की शर्त पहले लगाना चाही। जब तक यह तुम्हारा खयाल हैहमारा भारततब तक तुम उसी बीमारी के अंग होतुम उस बीमारी को ठीक नहीं कर सकते।
दुनिया सिकुड़ कर बहुत छोटी हो गई हैअब यह मेरात्तेरा नहीं चलेगा। अब यह मेरात्तेरा मूर्खतापूर्ण है। यह बैलगाड़ी का जमाना नहीं है। जमीन इतनी छोटी हो गई है! न्यूयार्क में चाय पीओलंदन में सुबह का भोजन लोऔर सांझ को पूना में आकर अपच झेलो! इतने करीब हो गई है! इस छोटी दुनिया में हमारा भारत! फिर हमारे की सीमाएं कहां बनाओगेफिर महाराष्ट्रियन को लगता हैहमारा महाराष्ट्र! और यह देश तो हमारा गजब का है! यहां राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र है! ऐसा दुनिया में कहीं भी नहीं। छोटे डब्बे के भीतर बड़ा डब्बा! राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र! क्या-क्या लोग हैं! कैसे-कैसे लोग हैं! और फिर इसको भी कहां तोड़ोगे?किस जगह जाकर सीमा बनाओगेटुकड़े-टुकड़े होते जाते हैं।
विज्ञान ने दुनिया को अब एक कर दिया। अब यह मेरा भारत जब तक रहेगातब तक बीमारी नहीं मिट सकती। क्योंकि भारत तुम्हारा हैतो अमरीका क्यों परेशान होतुम्हारी गरीबी को दूर करने के लिए अमरीका अपने वैभव में थोड़ी सी क्षीणता क्यों करेकिसलिए करेऔर मजा यह है कि लाख अपने धन में कमी करे तुम्हारी दीनता को दूर करने के लिएतो भी तुम दुश्मन रहोगेतो भी तुम्हारीर् ईष्या की आग जलती रहेगी।
अमरीका के संबंध में सारी दुनिया में जोर् ईष्या हैवह उसके वैभव के कारण है। और मजा यह है कि अमरीका जितनी सहायता करता है दुनिया कीगरीबों कीउतना और कोई नहीं करता। अमरीकी चिंतक बड़े हैरान हैं कि हम सेवा करते हैं--दूध भेजेंदवाइयां भेजेंकपड़े भेजेंकंबल भेजेंअकाल पड़े तो सामान भेजेंभूकंप आए तो सामान भेजें।
और ऐसा ही नहीं कि अपने वालों को। अगर रूस को भी जरूरत पड़ती है गेहूं कीतो अमरीका देता है! सब को हम सहायता दें,और फिर भी हम सब के दुश्मन! किसी के मन में अमरीका के प्रति सदभाव नहीं--किसी के मन में। अमरीका के जो अपने को दोस्त मानते हैंउनके मन में भी सदभाव नहीं।
असल में समृद्धि के प्रति इतनीर् ईष्या होती हैइतनी जलन होती है...। और जितना दीन-हीन होता है व्यक्तिउतनी हीर् ईष्या से उबलता होता है। उसको तुम कितना ही दोवह तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेगा। अमरीका को कोई क्षमा नहीं कर रहा है। कोई क्षमा कर नहीं सकता।
तो अमरीका किसलिए परेशान होसहायता देऔर गालियां खाए! जगह-जगह सहायता पहुंचाएऔर जगह-जगह उसके झंडे जलाए जाएं! और उसकी एंबेसियों में आग लगाई जाए! प्रयोजन क्या है फिर?
यह मेरेत्तेरे का भाव अब जाना चाहिए। विज्ञान ने दुनिया को उस जगह लाकर खड़ा कर दिया हैजहां हम चाहें तो पृथ्वी को स्वर्ग बना सकते हैं। मगर पृथ्वी तब तक स्वर्ग नहीं बन सकतीजब तक हम पृथ्वी के एक होने की घोषणा नहीं करते। और हमारे भीतर इतने बंटाव हैं! हिंदू को फिक्र है हिंदू कीमुसलमान मरता हो तो मरे! हिंदू को क्या करना हैमुसलमान को फिक्र है मुसलमान कीहिंदू मरता हो मरे! मुसलमान को क्या करना हैऔर बात इतने पर ही नहीं रुकती। अगर शूद्र मरता है तो मरेब्राह्मण को क्या करना है! टुकड़े में टुकड़े बंटते चले जाते हैं। ऐसे तो हल नहीं हो सकता।
इस विराट समस्या को हल करने का एक ही उपाय है कि पृथ्वी पर कोई राष्ट्र न रह जाएं। क्योंकि हमारी सत्तर प्रतिशत ऊर्जा एक-दूसरे से रक्षा करने में लग रही हैजब कि रक्षा की कोई जरूरत ही नहीं है। प्रयोजन क्या हैसत्तर प्रतिशत शक्ति हमारी युद्ध में व्यय हो रही हैजब कि युद्ध बिलकुल ही व्यर्थ हैउसकी कोई जरूरत ही नहीं है।
लेकिन राजनेता कैसे जीएगाअगर सीमाएं न होंतो राजनेता गया! अगर युद्ध न होंतो सेनापतियों का और सेनाओं का क्या होऔर अगर युद्ध न होंतो सैन्य विशेषज्ञों काऔर बम बनाने वाले कारखानों काऔर हथियार ढालने वाले धनपतियों का क्या हो?
नोबल प्राइज मिलती है आज। प्रत्येक नोबल प्राइज के साथ कोई बीस लाख रुपया होता है करीब। और हर क्षेत्र में नोबल प्राइज दी जाती है प्रतिवर्ष। लेकिन जिस आदमी ने नोबल प्राइज शुरुआत कीवह आदमी बम बनाने वाला इस दुनिया का सबसे बड़ा उद्योगपति था। उसने सारा धन इकट्ठा किया बम बनाने से। पहला महायुद्ध नोबल के ही बमों से लड़ा गया। लाखों लोग मरे उसके ही बमों से। और आज नोबल पुरस्कार शांति के लिए दिया जाता है। गजब की दुनिया है! मजेदार लोग हैं! धन आया है सब हिंसा सेखून सेलहूलुहान है। न लेने वालों को संकोच हैन देने वालों को कोई संकोच है।
ये जो करोड़ों रुपए प्रतिवर्ष नोबल प्राइज में मिलते हैंवह आदमी इतना धन इकट्ठा करके छोड़ गया है! यह सिर्फ ब्याज से ही नोबल प्राइज दी जा रही है। उसके मूल धन को तो इससे कोई हानि पहुंचती ही नहीं। मूल धन तो जमा है। यह मूल धन आया है संगीनों सेबमों सेहिंसक अस्त्रों सेशस्त्रों से। मूल धन तो जमा है। अनंत काल तक उस मूल धन के सिर्फ ब्याज से ये नोबल प्राइज दी जाती रहेंगी। करोड़ों रुपए की नोबल प्राइज हर साल बांट दी जाएगी--साहित्य मेंशांति के लिएसौमनस्य के लिएसेवा के लिए--हर चीज के लिए नोबल प्राइज है। और कोई यह फिक्र नहीं करता कि यह पैसा आया कहां सेऔर यूं नहीं है कि नोबल प्राइज की घोषणा करने के बाद नोबल ने कोई अपने कारखाने बंद कर दिए थे। नोबल के कारखाने भी जारी रहे। शांति-पुरस्कार भी बंटने लगाऔर कारखाने भी जारी रहे! युद्ध का सामान भी बनता रहाऔर शांति का पुरस्कार भी बंटता रहा!
यहां बड़े निहित स्वार्थ हैं। सीमाओं में सारे स्वार्थ बंधे हुए हैं। और बड़ी हैरानी की बात यह है कि सीमाओं की जरूरत क्या है?क्या जमीन बिना सीमाओं के नहीं हो सकतीजमीन पर यूं भी कोई सीमाएं नहीं हैंसब सीमाएं नक्शों में हैं। क्या फर्क पड़ता है कि एक जिला हिंदुस्तान में है कि पाकिस्तान में हैउस जिले के लोग खुश रहेंकहीं भी रहें। भारत में रहें कि पाकिस्तान में रहेंक्या फर्क पड़ता है! मगर इंच-इंच के लिए उपद्रव है। किसी को इसकी चिंता नहीं है कि आदमी सुख से रहेआनंद से रहे। इसकी फिक्र है कि किसकी सीमा के भीतरऔर इस पर सत्तर प्रतिशत ऊर्जा व्यय हो रही है!
तो पहली तो बाततुम यह भाषा छोड़ोहमारा भारत! ये भारत और चीन और जापानया तो सब हमारे हैं या कोई भी हमारा नहीं। यह सारी पृथ्वी हमारी हैयह उदघोषणा होनी चाहिए।
मैं राष्ट्रों के विरोध में हूं। मैं राष्ट्रीयता के विरोध में हूं। मैं एक अंतर्राष्ट्रीय समाज चाहता हूं। तो वह जो सत्तर प्रतिशत हर देश खराब कर रहा है युद्ध के लिए...। और वह भी खराब होने की बड़ी अजीब हालत है।
तुम्हारा पड़ोसी डंड-बैठक लगा रहा है। तुमने देख लिया खिड़की में से कि वह डंड-बैठक लगा रहा है! तुमको घबड़ाहट फैली। तुम्हारी पत्नी ने कहाक्या कर रहे हो मुन्ना के बाप! पड़ोसी डंड-बैठक लगा रहा है! तुम भी डंड-बैठक लगाओ! अरेदूध-जलेबी खाओ। लस्सी पीओ। अभी बूंदी तैयार करती हूं! यह कमबख्त पड़ोसी कुछ खतरनाक इरादा रखता है! इसके इरादे नेक नहीं। सो तुम भी डंड-बैठक लगाने लगे! पड़ोसी ने देखा कि अरेमुन्ना के बाप भी डंड-बैठक लगा रहे हैं! मामला कुछ गड़बड़ है। पड़ोसी ने देखा कि लस्सी पी रहे हैं! लाला लस्सी पी रहे हैं! पड़ोसी के प्राण संकट में पड़े। उसको भी बूंदी बनवानी पड़ेगी। बुंद में समुंद समाना! फिर उसको बूंदी ही बूंदी दिखाई पड़ेगी। जहां देखेगावहीं मोतीचूर के लड्डू।
अब चला दांव-पेंच। एक-दूसरे पर नजर रखने लगे। और एक-दूसरे पर नजर रखेंगेयह भी एक-दूसरे को समझ में आएगा कि दूसरा नजर रखता है। छिप-छिप कर देखता है। जब मैं लस्सी पीता हूंछिप-छिप कर देखता है! दूसरा देखता है कि जब भी मेरे घर में बूंदी बनती हैछप्पर पर चढ़ कर देखता है! जासूसी कर रहा है। जरूर इसके इरादे बुरे हैं! बसअब फिक्र छोड़ो। अब सब काम-धाम व्यर्थ है। अब तो सारा काम यह है कि मारो जितने डंड-बैठक लगा सकते हो। और जितनी बूंदी पचा सकोपचाओ! इसके पहले कि कुछ खतरा हो जाए।
यही हो रहा है। एक देश दूसरे देश पर नजर रखता है। पाकिस्तान ने अमरीका से इतने शस्त्र ले लिए! बसभारत में तहलका,शोरगुलकि पाकिस्तान तैयारी कर रहा है! कि इसके सिपाही डंड-बैठक मार रहे हैं! कि इसके फौजी सीमाओं पर संगीनें लेकर टहल रहे हैं! अल्लाहो अकबर बोल रहे हैं!
और वे भी बेचारे क्या करें न बोलें तो! वे देखते हैं कि इधर हनुमान चालीसा पढ़ा जा रहा है! लोग भुजाएं फड़का रहे हैं! बमबम भोले की आवाज लगा रहे हैं! तो कुछ खतरा है।
तो हिंदुस्तान तत्क्षण दंडवत करता है रूस की कि जल्दी से अस्त्र-शस्त्र भेजो! इधर पाकिस्तान को खबर लगती है कि रूस से अस्त्र-शस्त्र आ रहे हैंमामला खतरा है। अमरीका के चरणों पर गिरो! तो यह पागलपन जारी है। छोटे-मोटे देश भीजैसे नेपाल,उसको फिकर लगी हैक्योंकि सिक्किम को भारत पी गया। अब कहीं ऐसा नेपाल को न पी जाए! तो वह चीन की खुशामद में लगा रहता है। और बड़े देशों को भी यही छोटे देश धंधे का उपाय हैं। इन्हीं को एक-दूसरे के प्रति शंकित रखोतो अस्त्र-शस्त्र बिकते हैं। नहीं तो अस्त्र-शस्त्र कैसे बिकेंउनका सारा का सारा उद्योग गिर जाए! सारा अर्थशास्त्र अस्त्र-शस्त्रों पर टिका हुआ है! यह अर्थशास्त्र क्या है अनर्थशास्त्र है।
यह जब तक हमारे और तुम्हारे का भाव न जाएगातब तक हम इस पृथ्वी को मूढ़ताओं से मुक्त नहीं कर सकते हैं। इसलिए तुम यह तो खयाल छोड़ ही दोहमारा भारत! यह भी दंभ हैव्यर्थ का दंभ हैदो कौड़ी की बात है। क्या हमारा! मगर मूढ़ताएं ऐसी ही होती हैं। मूढ़ताएं दिखाई नहीं पड़तीं। इसलिए मैंने कहासिर्फ विचार से काम न चलेगाध्यान की आंख चाहिएतो मूर्खता दिखाई पड़ेगी।
क्या-क्या बातें होती हैं! एक वक्तव्य देखा आज सुबह। दत्ताबाल ने एक वक्तव्य दिया है मेरे खिलाफ कि यह छत्रपति शिवाजी की भूमि...!
अब छत्रपति शिवाजी से मुझे क्या लेना-देना! और छत्रपति शिवाजी कौन सी खास बात है। अरेकोई भी छाता लगा लोछत्रपति हो जाओ! छाते ही छाते मिल रहे हैं। अभी तो बरसात खतम हुई हैजितने चाहो उतने ले लो। सस्ते मिल रहे हैं। छत्रपति होने से क्या होता हैछत्रपति शिवाजी की भूमि! जैसे कोई भारी बात हो गई यह छत्रपति शिवाजी का होना! मगर बसइस तरह के अहंकार।
छत्रपति शिवाजी की भूमिदत्ताबाल ने कहा। और उन्होंने अपने लिए कहा कि मेरे जैसे सिंह इस भूमि में अभी मौजूद हैं! सिंह की छाती वाले लोग मौजूद हैं! मैं आचार्य रजनीश को चुनौती देता हूं वाद-विवाद की।
मैंने तो दत्ताबाल को कभी देखा नहींलेकिन दर्शन से मैंने पूछा थाकोई पांच-सात-दस वर्ष हो गए तब। वह दत्ताबाल को सुन कर आई थी। तो मैंने पूछा कि कैसे लगेतो उसने कहाबैठे रहें तो बिलकुल ठीक। खड़े हो जाएंतो सब गड़बड़! मैंने कहा,बात क्या हैतो वह कहने लगी कि छाती तो बड़ी हैमगर पैर बहुत छोटे हैं! सो बैठे रहें सो ठीक। खड़े होते ही से सब गड़बड़ हो जाता है!
सो वे लिख रहे हैं कि सिंह जैसी छाती वाले...।
वह तो ठीकमगर पैरों का भी तो खयाल करो! और सिंह की छाती कोई बड़ी खूबी की बात है! कोई भी ऐरे-गैरे-नत्थूखैरे सिंह कीसभी की छाती होती है। उसमें क्या बात है! सरकस के सिंहों की भी होती हैजंगली सिंहों की भी होती हैइसमें कौन सी खास बात हैआदमी होकर और सिंहों से अपनी तुलना करनापतन है और कुछ भी नहीं। तो किसी लायंस क्लब में भरती हो जाओऔर क्या करो! इसमें इतना शोरगुल मचाने की क्या जरूरत है?
और सत्य का निर्णय कोई वाद-विवाद से होता हैसत्य का अनुभव होता हैकोई वाद-विवाद तो होता नहीं। सत्य का कोई शास्त्रार्थ तो होता नहीं। मुझसे वाद-विवाद करके क्या निर्णय होगामैंने सत्य जाना। तुमने अगर सत्य जाना होतो सौभाग्य की बात है। अब वाद-विवाद क्या करनाऔर अगर तुमने सत्य न जाना होतो वाद-विवाद से तुम जान सकोगेफिर उसके लिए तो शिष्यत्व चाहिए। वाद-विवाद से हल नहीं होगी बात। वाद-विवाद तुम क्या खाक करोगे!
लेकिन उनको बेचैनी क्या हो गईक्योंकि मैंने विवेकानंद की कुछ आलोचना कर दी। बसउससे उनको बेचैनी हो गई। कहा कि विवेकानंद तो मेरे प्राण हैं!
जिसके भी प्राण किसी और में होते हैंउसके पास अपने प्राण नहीं होतेयह खयाल रखना। विवेकानंद तुम्हारे प्राण हैंवे तो मर चुके कभी के! सो तुम लाश ढो रहे हो अब। प्राण दूसरे मेंतो तुममें क्या है फिरतुम फिर पिंजड़े ही हो! प्राण तो विवेकानंद में हैं। और वे तो बेचारे गए!
अड़चन क्या आ जाती है इस तरह के लोगों को?
विवेकानंद की आलोचना हो गईतो उनका अतीत गौरवभारत का गौरवछत्रपति शिवाजी की भूमिसब को चोट लग गई एकदम।
जब तक तुम्हारा यह "हमारा भारतऐसा भाव बना रहेगातब तक तुम कभी भी अंधविश्वासों और दकियानूसी विचारों से न तो खुद को मुक्त कर पाओगेन किसी और को मुक्त कर पाओगे। दकियानूसी विचार यही तो हैउसकी जड़ यही तो हैहमारा! फिर गलत भी होतो अपना अपना है। अरेअपनी मां अगर कुरूप भी होतो कोई कुरूप थोड़े ही कहता है! अपना बाप अगर गधा भी होतो कोई गधा थोड़े ही कहता है! ऐसे वक्त पड़ जाए तो लोग गधे को बाप भला कह देंमगर कितना ही वक्त पड़ जाएअपने बाप को गधा थोड़े ही कहते हैं! मगर तुम कहो या न कहोइससे क्या फर्क पड़ता है!
ध्यान की आंख चाहिए कि तुम देख सकोअपने और पराए का सवाल नहीं है। सही सही हैचाहे पराया हो। और गलत गलत हैचाहे अपना हो।
मैं एक घर में कोई पांच-सात साल मेहमान था। जब विद्यार्थी थातो उस घर में रहा। उनका झगड़ा पड़ोसी से हो गया। थोड़े डरे। जैनी आदमी थे। जितने डरपोक हैंसभी अहिंसा को परम धर्म मानते हैं। डरपोक के लिए यह सुरक्षा हैअहिंसा परमो धर्मः। इससे एक लाभ यह रहता है कि भई हिंसा वगैरह नहीं। मतलब यह है कि हम तो कर ही नहीं सकते हिंसातुम भी मत करनाक्योंकि अहिंसा परमो धर्मः! परम धर्म का पालन करो। हम भी करेंतुम भी करो।
जैनी थेथोड़े घबड़ाए। पड़ोसी से झगड़ा हो गया। मैं उनके घर में रहता थातो मुझसे बोले कि कुछ करना पड़ेगा! मैंने कहामैं तो पड़ोसी के साथ हूं।
उन्होंने कहाक्या कह रहे होकहते क्या होअरेरहते हमारे साथ होरहते हमारे घर में होऔर पड़ोसी का साथ दोगे?
मैंने कहाबात उसकी सही है। मैं तो जिसकी बात सही हैउसके साथ हूं। घर की फिक्र करूं कि बात की फिक्र करूं?
उन्होंने तो मुझे ऐसे देखाजैसे मुझे पहली दफा देखा हो! थोड़ी देर तो बिलकुल चुप ही बैठे रहेगुमसुम हो गए। कहने लगेयह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था कल्पना में कि तुम अपने वाले होकर धोखा दोगे!
मैंने कहाअपने वाले होने का सवाल नहीं है। तुम्हारी बात ही गलत है। मैं साथ देने वाला नहीं हूं। अगर मार-पीट की नौबत आईतो मैं तुम्हारी पिटाई करूंगा। और मैं कोई अहिंसा परम धर्म मानता भी नहीं। और तुमने बात उठा दीतो ठीक। अभी पड़ोसी ने पूछा नहीं है मुझसे। मगर मैं बता दूंगा उसको कि मैं तुम्हारे साथ हूं।
वे कहने लगे कि यह तो मेरे सोच-विचार में ही नहीं आता!
मैंने कहाफिर सोचो-विचारो। दिनदो दिन का वक्त निकाल लो। तुम सोचो-विचारो। तुम्हारी बात गलत हैवह मैं समझाने को तुम्हें राजी हूं। लेकिन अगर तुम अपनी गलत बात पर ही जिद्द करने पर अड़े होतो मैं पड़ोसी के साथ हूं। फिर चाहे यह घर रहे कि जाए! और फिर जरूरी थोड़े ही है कि घर जाए हीक्योंकि जो जीतेगा वह रहेगा घर में!
वे कहने लगेक्या इसका मतलब कि मुझे घर से जाना पड़ेगा?
जिसकी लाठीउसकी भैंस! अगर मैं और पड़ोसी दोनों मिल कर जीत गएतो मैं भी रहूंगा और पड़ोसी भी इसी में रहेगा। तुम अपना समझो!
वे कहने लगेमजाक का मामला नहीं है। तुम मजाक समझ रहे हो।
मैंने कहामजाक की बात मैं कर ही नहीं रहा। मैं मजाक की बात करता ही नहीं। मैं तो हर बात गंभीर करता हूं। और वक्त आएगा तो पता चल जाएगा तुम्हें।
यह देख कर उन्होंने फिर वक्त आने ही नहीं दिया। उन्होंने पड़ोसी से समझौता ही कर लिया कि यह झगड़े-झांसे का मामला है। अपने ही घर में अपनी दुश्मनी करने वाला मौजूद हो...! मगर उस दिन से वे मुझसे शंकित हो गए। फिर मुझसे खुल कर बात न करें। कुछ कटे-कटे रहें।
मैंने कहातुम्हारी मर्जी। मगर गलत तुम थेयह अगर तुम समझ लोतो तुम मेरे प्रति धन्यवाद अनुभव करोगे। झगड़ा भी बच गयापिटे-कुटे भी नहींबात भी समाप्त हो गई। और मैंने ही समाप्त करवाई। अगर तुम समझो दोनोंतो दोनों को अनुगृहीत होना चाहिए। अगर मैं तुम्हारे साथ होतातो सोचोझगड़ा होने वाला था।
सत्य के साथ खड़े होना सीखो। सत्य अपना और पराया नहीं होता। न हिंदू होतान मुसलमान होतान जैनन ईसाई। सत्य तो सत्य हैउसका कोई विशेषण नहीं होता। और सत्य का कोई विवाद भी नहीं होता। एक दृष्टि होती हैदेखने की एक आंख होती है।
अंधविश्वास जरूर भरे हुए हैं। लेकिन सभी विश्वास अंधे होते हैं। अंधविश्वास शब्द से इस भ्रांति में मत पड़ जाना कि कुछ विश्वास ऐसे भी होते हैंजो अंधे नहीं होते। अंधविश्वास शब्द से यह भ्रांति पैदा होती है। विश्वास मात्र अंधे होते हैं।
विश्वास का अर्थ क्या होता हैजो नहीं जानाउसे मानना। यही तो अंधापन है। जिसे जानाउसे मानने की जरूरत ही नहीं पड़ती। जिसको जानाजाना। जिसको नहीं जानाउसी को मानना पड़ता है।
सूरज ऊगता है। क्या तुम सोचते हो दुनिया बंटी हुई है उन लोगों में कि कुछ लोग सूरज को मानते हैं कि ऊगता है और कुछ लोग मानते हैं कि नहीं ऊगतादुनिया में कोई बंटाव नहीं हैकोई झगड़ा नहीं हैकोई संप्रदाय नहीं हैकि ये सूरज को मानने वाले लोगये सूरज को न मानने वाले लोग! वृक्ष हरे हैंइसमें कोई झगड़ा नहीं है।
लेकिन ईश्वर है या नहींइसमें झगड़ा है। जिस चीज में भी झगड़ा होसमझ लेना कि उसमें मान्यता काम कर रही हैजानना काम नहीं कर रहा है। झगड़ा ही इस बात का सबूत है कि अभी विवाद हो सकता हैक्योंकि मामला धुंधला है।
अंधविश्वास से ऐसा मत समझना कि कुछ ऐसे भी विश्वास होते हैंजो आंख वाले होते हैंकोई विश्वास आंख वाला नहीं होता। सब विश्वास अंधे होते हैं। राम में विश्वास करोकि कृष्ण मेंकि बुद्ध मेंकि मोहम्मद मेंकि जीसस मेंकुछ फर्क नहीं पड़ता। विश्वास कियाकि तुम अंधे हुए।
अब ये दत्ताबाल हैंविवेकानंद में विश्वास करते हैं।
यह अंधापन है। अपनी अनुभूति होनी चाहिए। मैं अपने बल से कुछ कह रहा हूं। किसी विवेकानंदकिसी रामकृष्णकिसी रमण,किसी कृष्णकिसी बुद्धकिसी महावीर की गवाही की भी मुझे कोई जरूरत नहीं है। मैं जो कह रहा हूंवह मेरा अनुभव है। किसी को रुच जाएरुच जाए। रुच जाए तो प्रयोग करना पड़ेगाविश्वास नहीं।
इसलिए मेरा जो संन्यासी हैवह कोई मेरा अनुयायी नहीं है। इस बात को स्मरण रखना। मेरा संन्यासी तो सिर्फ मेरे साथ प्रयोग करने को राजी हुआ है। मेरा संन्यासी तो वैज्ञानिक है।
विज्ञान में एक शब्द है: परिकल्पनाहाइपोथीसिस। वह शब्द प्यारा है। उसका मतलब विश्वास नहीं होताउसका मतलब होता है कामचलाऊ स्वीकारखोज के लिए। खोज के लिए मान लेते हैं कि दो और दो चार होते हैं। अब खोज करेंगे। मान नहीं लिया कि दो और दो चार होते हैं। सिर्फ खोज के लिए अंगीकार कर लिया है कि चलोइस परिकल्पना को मान कर चलते हैं कि दो और दो चार होते हैंअब खोज करेंगे कि यह परिकल्पना सही है या नहींनिर्णय तो प्रयोग से होगा।
जैसे विज्ञान में निर्णय प्रयोग से होता हैवैसे ही धर्म में निर्णय योग से होता है। प्रयोग अर्थात बाहर का योगयोग अर्थात भीतर का प्रयोग। विज्ञान में जैसे परीक्षण होता हैवैसे ही धर्म में भी परीक्षण होता है। विज्ञान अनुभव-निर्भर होता हैधर्म अनुभूति-निर्भर होता है।
मेरे प्राण किसी में भी नहीं हैं। अब दत्ताबाल कहते हैं कि वे मुझसे विवाद करना चाहते हैंचुनौती देना चाहते हैं। निष्प्राण आदमियों से मैं क्या विवाद करूंअपने प्राण होने चाहिए! कुछ अपना अनुभव होना चाहिए!
न विवेकानंद के पास अपने प्राण थे। उनके प्राण रामकृष्ण में थे! खुद विवेकानंद ने कहा है कि मैं नहीं जानतालेकिन मैं एक व्यक्ति को जानता हूं जो जानता है।
यह तो उधार बात हो गई! विवेकानंद के प्राण रामकृष्ण में! और दत्ताबाल के प्राण विवेकानंद में! यह तो हद्द हो गई। यह तो बहुत ही दूर हो गया मामला। यह तो उधार से भी उधार हो गई बात। अब इसमें तो कुछ भी बचा नहीं।
मेरा संन्यासी अपने प्राण मुझ पर नहीं रख रहा है। मेरा संन्यासी मेरे साथ हैताकि अपने प्राण खोज सके। मैं उसका प्राण नहीं हूं। कोई किसी दूसरे का प्राण नहीं हो सकता।
विश्वास का अर्थ होता हैअब खोज की जरूरत न रही। परिकल्पना का अर्थ होता हैअब खोज की शुरुआत हुई। चलोमाने लेते हैं कामचलाऊ कि ईश्वर है। अब हम खोजेंगे। हम आस्तिक नहींहम नास्तिक नहींक्योंकि दोनों ने विश्वास कर लिया। आस्तिक भी अंधे होते हैंनास्तिक भी अंधे होते हैं। उनकी धारणाएं विपरीत होती हैंमगर इससे क्या फर्क पड़ता है! दो अंधे आदमी एक-दूसरे की तरफ पीठ करके खड़े हो जाएंइसका कोई अर्थ होता है कि उनके पास आंख आ गईदोनों अंधे हैंपीठ करके खड़े हैं।
आस्तिक भी अंधा होता हैनास्तिक भी अंधा होता है। रूस में अधिकतम लोग नास्तिक हैंक्योंकि सरकार नास्तिकता पढ़ाती हैस्कूल नास्तिकता पढ़ाते हैंमां-बाप नास्तिकता पढ़ाते हैंआस्तिकता खतरनाक चीज है। हिंदुस्तान में लोग आस्तिक हैं,क्योंकि मां-बाप आस्तिकता पढ़ाते हैंस्कूलविद्यालयविश्वविद्यालयपंडित-पुरोहितसंत-महंतमहात्मासब आस्तिकता पढ़ाते हैं। आस्तिकता सुगम बात हैनास्तिकता खतरनाक बात है।
उन्नीस सौ सत्रह के पहले रूस भी इसी तरह आस्तिक थाजैसे तुम आस्तिक हो। और क्रांति के दस साल बाद नास्तिक हो गया! तुम भी दस साल से ज्यादा न लोगे। अगर यहां कम्युनिस्ट क्रांति हो जाएदस साल में वे ही लोगजो गीता लिए फिरते थेवे कार्ल माक्र्स की किताब दास कैपिटल को बगल में दबाए हुए घूमने लगेंगे। यही दत्ताबाल जैसे लोगजिनके प्राण अभी विवेकानंद में हैंइनके प्राण एकदम से कार्ल माक्र्स में हो जाएंगे। क्योंकि जिसकी प्रतिष्ठा हैउसके साथ होने में मजा हैउसके साथ बल है।
मेरे साथ होने में तो हिम्मत चाहिए। मेरे साथ होने के लिए तो प्रयोग करने का दुस्साहस चाहिएक्योंकि मैं तुम्हें कोई विश्वास नहीं दे रहा हूं। मैं तो सिर्फ तुम्हें इशारे दे रहा हूं कि इन रास्तों से मैंने खोजा। तुम भी कोशिश करो। शायद...। खयाल रखना कि मैं कह रहा हूंशायद! क्योंकि जो मेरे लिए रास्ता ठीक सिद्ध हुआजरूरी तो नहीं कि तुम्हारे लिए भी ठीक सिद्ध हो। शायद तुम्हें भी मिल जाए! कोशिश कर लेने में कुछ बुराई नहीं। न भी मिलातो भी कोशिश का फायदा है। इतना चलने का व्यायाम ही होगा। इतना अभ्यास ही होगा। इतनी खोज-बीन की सुधि आएगी। कम से कम इतनी परीक्षा तो कर लेने का गणित आ जाएगा। इतना विज्ञान तो सीख लोगे। कम से कम इतना तो तय है कि यह पता चल जाएगा कि इस रास्ते पर मेरा सत्य नहीं है। तो कोई और रास्ते पर खोजूं।
एडीसन प्रयोग कर रहा था बिजली के संबंध में। सात सौ प्रयोग किए और सात सौ बार असफल गया। तीन साल लग गए। उसके विद्यार्थीउसके सहयोगीसब थक मरे। लेकिन उसे कोई थकान नहीं। रोज सुबह हाजिर हो जाए। फिर लग पड़े। रात बारह बजे तक लगा रहे। एक दिन उसके सारे सहयोगियों ने कहा कि अब तो क्षमा करें! तीन साल हो गएसात सौ प्रयोग हम कर चुकेअसफल होते गए। अब और क्या चाहिएअसफलता निश्चित हो गई!
एडीसन चौंका। एडीसन ने कहाअसफलता निश्चित हो गईअरेपागल हुए हो! सफलता करीब आ रही है। सात सौ दरवाजे हमने खटखटा कर देख लिए। अगर एक हजार दरवाजे होंतो तीन सौ ही बचे अब। और अगर सात सौ एक ही दरवाजे होंतो सिर्फ एक ही बचा अब। हम करीब आ रहे हैं। सात सौ दरवाजे हमने खटखटा कर देख लिएवहां नहीं पाया। हम असफल नहीं हुए।
विज्ञान में कभी कोई असफल होता ही नहीं। हारोतो भी जीत है। जीतोतो भी जीत है। हारेतो इतना तय हो गया कि यह रास्ता हमारे लिए नहीं था। तो और रास्ते पर खोजें। एक रास्ते से छुटकारा हुआ। पहुंच गएतो ठीक है। जीत ही जीत है। नहीं पहुंचेतो एक रास्ते से मुक्ति हुई। थोड़े रास्ते बचे। ऐसे रास्ते कटते-कटते वही रास्ता मिल जाएगाजिससे पहुंचना होता है।
और फिर मैं यहां सारे रास्ते उपलब्ध कर रहा हूं। ऐसा पृथ्वी पर कभी भी नहीं हुआ है। यहां ध्यान की सारी पद्धतियां उपलब्ध हैं। अगर एक से न पहुंचोतो दूसरी पकड़ाता हूं। दूसरी से न पहुंचोतो तीसरी पकड़ाता हूं।
विश्वासियों का यहां काम नहीं हैक्योंकि सभी विश्वास अंधे होते हैं। यहां तो आंख खोलनी है। और आंख खोलने के लिए परीक्षणप्रयोगअनुभव...!
तुम कहते हो, "यह अंधविश्वासों तथा दकियानूसी विचारों से दबा हुआ भारत...।'
सभी विचार दकियानूसी होते हैं। और सभी विश्वास अंधे होते हैं। विचार का अर्थ ही दकियानूसी होता है। असल में विचार कभी मौलिक नहीं होताहो ही नहीं सकता। अंधा आदमी कितना ही सोचे प्रकाश के संबंध मेंक्या कोई मौलिक बात सोच पाएगा?कैसे सोच पाएगाअरेप्रकाश तो बहुत दूरअंधकार के संबंध में भी कोई मौलिक बात न सोच पाएगा। अंधा आदमी प्रकाश या अंधकार के संबंध में कुछ सोच ही नहीं सकता। ज्यादा से ज्यादा इतना ही कर सकता है कि औरों ने जो कहा है प्रकाश और अंधकार के संबंध मेंउसको कंठस्थ कर ले और दोहराने लगे। बसइतना ही कर सकता है। शास्त्रीय हो सकता हैपांडित्यपूर्ण हो सकता है।
लेकिन प्रकाश के संबंध में लाख जान लोतो भी प्रकाश को जानना और बात है।
यह देश दकियानूसी विचारों से दबा हैक्योंकि यह देश विचारों से दबा है। और सभी विचार दकियानूसी होते हैं। यह दत्ताबाल का वक्तव्य देखो! इससे तुम्हें समझ में आएगा कि किस तरह विचार दकियानूसी होते हैं।


 सत्य वेदांत ने पूछा है: भगवानआपके विवेकानंद पर व्यक्त किए गए विचार से क्षुब्ध होकर श्री दत्ताबाल ने एक अत्यंत बेसिर-पैर का लेख पूना के तरुण भारत में प्रकाशित करवाया है। उनका अनर्गल प्रलाप मुख्यतः इस प्रकार है:
आपने विवेकानंद को कागजी गुलाब कहा है। परंतु स्वयं रामकृष्णकेशवचंद्र तथा राजा राममोहन राय की तुलना में विवेकानंद को सहस्रदल कमल कहा करते थे।

 इससे मुझे कोई एतराज नहीं। क्योंकि केशवचंद्र और राजा राममोहन राय की तुलना में विवेकानंद निश्चित ही सहस्रदल कमल थे।
इसको मैं कहता हूंमूढ़तापूर्ण बातेंजिन्हें सोचने की भी अकल नहीं है।
मैंने कहारामकृष्ण की तुलना में विवेकानंद कागजी फूल थे। थोड़ा फर्क तो समझो! रामकृष्ण की तुलना में विवेकानंद कागजी फूल थे। रामकृष्ण अगर असली कमल हैंतो विवेकानंद केवल कागजी कमल हैं। और रामकृष्ण ने कहाकेशवचंद्र तथा राजा राममोहन राय की तुलना में विवेकानंद सहस्रदल कमल थे। मैं भी राजी। मगर बात ही और हो गई।
केशवचंद्र को तो मैं कागजी फूल भी नहीं कह सकता। केशवचंद्र तो केवल तार्किक थेबस तार्किक। और तर्क तो वेश्या जैसा होता है। तर्क की कोई निष्ठा नहीं होती। जैसे वेश्या की कोई निष्ठा नहीं होती। जो पैसा देउसके साथ! जो खरीद लेउसकी!
केशवचंद्र तो तार्किक थे। विवेकानंद कम से कम रामकृष्ण के चरणों में तो बैठे थे! कम से कम कमल का संग-साथ तो हुआ था! और अगर तुम बगीचे से भी निकल जाओफूलों को छुओ भी मततो भी थोड़ी-बहुत गंध तुम्हारे कपड़ों से लिपटी हुई चली आती है। और अगर तुम फूल को छू लोतब तो स्वभावतः तुम्हारे हाथों में थोड़ी गंध आ जाती है। हाथ फूल नहीं हो जाते,लेकिन गंध तो आ जाती है।
विवेकानंद रामकृष्ण के पास थेनिकट थे। इससे थोड़ी सी गंध रामकृष्ण की उनसे प्रवाहित हुई। इसलिए रामकृष्ण का थोड़ा सा स्वर उनको छू गया था। उसके कारण ही मैंने उन्हें इतना आदर दिया कि कम से कम कागजी कमल कहा! केशवचंद्र को तो मैं कागजी कमल भी नहीं कहूंगा। केशवचंद्र को तो कोई संबंध ही नहीं है कमल से। न कमल देखा हैन कमल सुना है।
और राजा राममोहन राय तो बेचारे एक समाज-सुधारक थे। और समाज-सुधारकों को तो मैं उपद्रवी मानता हूं। दुनिया में अगर समाज-सुधारक न होंतो समाज बड़ी शांति से रहे! मगर ये समाज-सुधारक उसे शांति से नहीं रहने देते। ये नए-नए उपद्रव खड़े करते रहते हैं। तुम्हारे ही हित के लिए तुम्हारी छाती पर सवार रहते हैं। ये कहते हैंहम तो सेवा करेंगे!
मैं जयपुर से लौट रहा था। कोई बारह बजे होंगेएक स्टेशन पर गाड़ी रुकी। एक आदमी भीतर घुस आयाएकदम मेरे पैर दबाने लगा! नींद मेरी खुली। मैंने कहाभाई तू यह क्या कर रहा है?
उसने कहाआप बिलकुल सोइए। मैं तो सेवा कर रहा हूं। मैं तो जयपुर भी आया थामगर लोगों ने मुझे आपकी सेवा करने ही नहीं दी। वे भीतर ही न घुसने दें! तो मैंने भी कहाठीक है। देख लेंगे!
मैंने कहातू उनको देख भैया! मैंने तो तुझे रोका नहीं। तू मुझे क्यों सताता है!
उन्होंने कहाआप बिलकुल बीच में पड़ें ही मत। ज्यादा समय भी नहीं हैगाड़ी फिर निकल जाएगी। आप तो शांति से सोएं। मैं तो सेवा करूंगा! मैं तो सेवा करके रहूंगा!
मैंने कहातुझे अगर मुझे सोने देना होतो फिर तुझे सेवा करनी बंद करनी पड़ेगी। क्योंकि तू इतने जोर से पैर दबा रहा है,मुझे पैर दबवाने की आदत नहीं हैकि मैं सोऊं तो कैसे सोऊं?
उसने कहा कि आप अपनी जानो! मैं यह पुण्य का अवसर नहीं छोड़ सकता हूं।
अब इसको कहते हैं सेवा करने वाले लोग! इन्हें पुण्य का अवसर नहीं छोड़ना है!
करपात्रीहिंदुओं के एक बड़े प्रसिद्ध महात्मा हैं। उन्होंने एक किताब लिखी हैसमाजवाद और रामराज्य। उसमें उन्होंने समाजवाद के खिलाफ जो बहुत सी बातें कही हैंउनमें एक बात बड़ी मजेदार कही। वह यह कि समाजवाद कभी नहीं आना चाहिएक्योंकि अगर समाजवाद आ गयातो धर्म का क्या होगाक्योंकि धर्म की तो आधारशिला दान है। कहा ही है कि दान से बड़ा कोई पुण्य नहीं और लोभ से बड़ा कोई पाप नहीं। धर्म का आधार तो दान है। जब न कोई अमीर होगान कोई गरीब होगातो कौन दान देगा और कौन दान लेगा?
देखते होतर्क क्या साफ है! इसलिए समाजवाद तो कभी नहीं चाहिएइससे तो धर्म का विनाश हो जाएगा! धर्म को बचाने के लिए गरीब का बचना जरूरी है। नहीं तो दान किसको दोगेबात तो जंचती है। बात तो तर्कपूर्ण है। अगर दान से ही धर्म होने वाला हैतो गरीबों का रखना आवश्यक है। उनकी सुरक्षा करोबचाओ। गरीबी मिटने मत दो। अनाथ बच्चे चाहिएभिखमंगे चाहिएभूखे चाहिएबीमार लोग चाहिएबूढ़े चाहिएविधवाएं चाहिए। ये तो बिलकुल आवश्यक हैंनहीं तो इनके बिना धर्म ही नष्ट हो जाएगा! इन्हीं पर तो चढ़-चढ़ कर महात्मागण स्वर्ग तक पहुंचते हैं। ये तो सीढ़ियां हैं मोक्ष की। और तुम सीढ़ियां ही मिटाए दे रहे हो! समाजवाद यानी सीढ़ियां ही खतम! न देने को कोईन लेने को कोई! तो धर्म विनष्ट हो जाएगा। ये समाज-सुधारक हैं! ये कहते हैंसेवा होनी चाहिए।
मैं चाहूंगा ऐसी दुनियाजहां सेवा की कोई जरूरत न होजहां किसी को सेवा की कोई जरूरत न हो। मैं चाहूंगा ऐसी दुनिया,जहां इन समाज-सुधारकों की कोई आवश्यकता न हो।
यह तो बड़ी अजीब सी स्थिति है! यह स्थिति यूं है कि एक समाज-सुधारक एक काम कर जाता है। वही काम बाद में पता चलता है बीमारी सिद्ध हो गया! फिर दूसरा समाज-सुधारक उसको सुधारता है। वह दूसरी बीमारी खड़ी करता है। फिर तीसरा आता है। यह एक षडयंत्र है।
दो आदमी एक धंधा करते थेपार्टनर थे। हालांकि धंधा उनका एक थामगर काम बड़े अलग-अलग थे। एक का काम थागांव में जानाऔर रात जब लोग सोए होंउनकी खिड़कियों पर कोलतार पोत आना। और दूसरे का काम थादूसरे दिन सुबह से आवाज लगाना गांव में कि भाईकिसी को कोलतार तो साफ नहीं करवाना?
स्वभावतःजो-जो सुबह उठ कर देखते कि अरेउनकी खिड़की पर कोलतार लगा है! बुलाते कि भैयाअच्छे मौके पर आ गए। संयोग की बातयह कोलतार साफ करना है!
तब दिन भर वह आदमी कोलतार साफ करतापैसे कमाता। तब तक दूसरा आदमी दूसरे गांव में कोलतार पोतता! यूं उनका धंधा खूब चलता। एक कोलतार पोत आतादूसरा उसकी सफाई कर आता।
मनु महाराज समझा गएसती होना चाहिए। और राजा राममोहन राय समझाते हैं कि सती नहीं होना चाहिए। एक कोलतार पोतता हैएक कोलतार साफ करता है! एक समझाता है कि शूद्र होना चाहिएक्योंकि शूद्र हुए ब्रह्मा के पैरों सेनहीं तो व्यवस्था ही नष्ट हो जाएगी। ये चार तो खंभे हैं समाज के। एक खंभा गिर गयातो पूरा का पूरा मंदिर गिर जाएगा। और दूसरा समझाता है कि शूद्र को तो छुटकारा दिलाना चाहिए शूद्रता से। ये तो हरिजन हैंदरिद्रनारायण हैं। बस यूं धंधा चलता है।
सदियों से समाज-सुधारक आते रहे। एक काम सुधार जाते हैंदूसरा आ जाता है उसको सुधारने! तीसरा आ जाता है उसको सुधारने! आदमी जहां का तहां यूं धक्के खाता रहता है।
राजा राममोहन राय एक समाज-सुधारक हैं। केशवचंद्र केवल एक तार्किक पंडित हैं। दोनों का कोई भी मूल्य नहींदो कौड़ी मूल्य नहीं। इसलिए दत्ताबाल से मैं राजी। मगर वे मेरी बात नहीं समझे। मैंने तुलना की थी रामकृष्ण सेऔर उन्होंने तुलना ही बदल दी।
"आगे उन्होंने कहाकेवल पैसे के बल पर आप बुद्धिवादीतपस्वी व भगवान होने का आभास करवाते हैं। तथा विवेकानंद के प्रति द्वेष है। विवेकानंद लोगों को अपने हाथ से छूकर समाधि देते थेजब कि आप में ऐसी कोई अतींद्रिय शक्ति भी नहीं,जैसी रासपुटिन में थी!'
यह थोड़ा सोचने जैसा है। अगर पैसे के बल पर कोई बुद्धिवादी हो सकता हैतो फिर टाटाबिड़ला बुद्धिवादी होंगेमैं कैसे बुद्धिवादी हो पाऊंगा! और सच पूछो तो मेरे पास एक पैसा नहीं! जेब ही नहीं है! पैसा भी हो तो कहां रखूंखाली हाथ आया;खाली हाथ हूंखाली हाथ जाऊंगा!
यह किसने उनको कह दिया कि मैं पैसे के बल पर बुद्धिवादी हूं?
अगर पैसे के बल पर लोग बुद्धिवादी होते होंतब तो फिर बहुत पैसे वाले हैंउनको बुद्धिवादी होना चाहिए! और मैंने कब कहा कि मैं बुद्धिवादीमैं तो बुद्धि का दुश्मन! बुद्धि को पोंछना ही तो मेरा काम! बुद्धि तो बीमारी है। लोग कैसे बुद्धि से मुक्त हो जाएंयही तो मेरी एकमात्र चेष्टा है--विचार सेबुद्धि सेमन से।
यह किस पागल ने दत्ताबाल को खबर दे दी! या उनके भीतर कौन सा पागलपन पैदा हो गया!
और किसने कहा कि मैं तपस्वीआंख का अंधा भी नहीं कह सकता कि मैं तपस्वी! तपस्वी राल्स रायस गाड़ियों में चलते हैं?महलों में रहते हैंवातानुकूलित कमरों में रहते हैंमैं और तपस्वीअरेपैर भी एक जगह रख लेता हूंतो हिलाता नहीं! तुम क्या तपस्वी की बात कर रहेअंगद का भला हिल गया होमेरा पैर नहीं हिलता! मुझे कौन तपस्वी कहेगान सिर के बल खड़ा होतान कोई योग साधतान कोई उपवास करतान कोई व्रतन कोई नियम। मुझे कौन तपस्वी कहेगातपस्वियों को भ्रष्ट करनाइसके लिए तो सारे मैं आयोजन करता हूं! तपस्वियों को कैसे डगमगाना!
ये क्या-क्या बातें इनको पकड़ गई हैं कि तपस्वी और भगवान होने का आभास करवाते हैं!
आभास क्यों करवाऊंगामैं हूं ही। आभास वह करवाएजो न हो। और मैं ही भगवान हूंऐसा थोड़े हीदत्ताबाल को पता नहीं,वे भी हैं। वे लाख समझें कि सिंह हैंसिंह नहींभगवान हैं! सभी भगवान हैं। जहां चेतना हैवहां भगवत्ता है।
हांकुछ भगवान सोए हैंजैसे दत्ताबाल। कोई जाग जाता है। जागने-सोने में कोई गुणात्मक भेद नहीं है। अरे जो सोया हैजग सकता है। जो अभी सोया थाअभी जग गया! जो अभी भी सोया हैथोड़ी देर बाद जग सकता है। जो सोने की क्षमता रखता हैवह जगने की क्षमता भी रखता है। सोया हुआ भी भगवान हैजागा हुआ भी भगवान है। सोए हुए को पता नहीं होता;दत्ताबाल जैसा वह सोचता हैमेरे प्राण विवेकानंद में हैं! विवेकानंद सोचते हैंमेरे प्राण रामकृष्ण में! ये सोए हुओं के लक्षण। जागे हुए के लक्षणकि वह जानता है कि मेरे प्राण मेरे भीतर। मेरी आत्मा मेरे भीतर। मेरा परमात्मा मेरे भीतर। परमात्मा आत्मा का ही शुद्धतम अनुभव हैऔर कुछ भी नहीं।
यह कोई विशिष्टता नहीं है। यह भ्रांति कब छूटेगी इस देश से! सदियों से ऋषि दोहराते रहेअहं ब्रह्मास्मि! और यही नहीं कि मैं ब्रह्म हूंयह भी दोहराते रहेतत्वमसि! तुम भी वही हो! और फिर भी ये हिंदू धर्म के ठेकेदारभारतीय संस्कृति के ठेकेदार,विवेकानंद के ठेकेदारइनको इतना भी समझ में नहीं आता कि किसी को भगवान होना थोड़े ही पड़ता है। भगवान तो हम हैं ही। लाख भुलाने की कोशिश करोतो भी भूल नहीं सकते। लाख मिटाने की कोशिश करोतो भी मिटा नहीं सकते। भगवान होना हमारा स्वभाव हैहमारा स्वरूप है।
और वे कहते हैं कि मेरे भीतर विवेकानंद के प्रति द्वेष है।
विवेकानंद! बेचारों के पास ऐसा क्या है जिसके लिए मैं द्वेष करूंमुझे तो ऐसा कुछ दिखाई नहीं पड़ता जिसमें कि द्वेष हो! न तो मुझे कोई ऐसी गरिमाऐसी महिमा दिखाई पड़ती है। न विवेकानंद के विचारों में कोई ऐसा प्रगाढ़ बुद्धत्व दिखाई पड़ता है। सब उधार है! सब बासा है!
और विवेकानंद ने स्वीकार किया है कि मैं जो भी कह रहा हूंवह सब रामकृष्ण का अनुभव हैमेरा नहीं। विवेकानंद से जब अमरीका में किसी ने कहा कि आप जो कहते हैंवह बहुत प्रभावित करता है! तो उन्होंने कहा--यह विनम्रता उनमें थी--कहा कि काशतुम उसे देख लेतेजिसके शब्दों को मैं दोहरा रहा हूं! तब तुम जानते कि मैं तो कुछ भी नहींमैं तो केवल प्रतिध्वनि मात्र हूं।
तो विवेकानंद में क्या है जिससे मुझे द्वेष होजब मुझे बुद्ध से द्वेष नहीं हैलाओत्सु से द्वेष नहीं हैजीसस से द्वेष नहीं हैजरथुस्त्र से द्वेष नहीं हैमहावीर से द्वेष नहीं है--जिनके पास कुछ है। रामकृष्ण से द्वेष नहीं हैरमण से द्वेष नहीं है,कृष्णमूर्ति से द्वेष नहीं है--जिनके पास कुछ है। तो बेचारे विवेकानंद से क्या द्वेष होगा! विवेकानंद तो दरिद्रनारायणहरिजन!
उन्होंने कहा कि विवेकानंद लोगों को अपने हाथ से छूकर समाधि देते थे!
जो समाधि हाथ से छूकर दी जाती हैवह समाधि नहीं होती। नहीं तो बुद्ध पागल थे! किसी से भी छुआ लेते! रामकृष्ण पागल थेजिंदगी भर मेहनत कीकिसी से भी छुआ लेते!
और विवेकानंद ने छूकर कितने लोगों को समाधि दीविवेकानंद को खुद को भी समाधि मिली थीआखिरी समयमरते समय तक पीड़ित थे और परेशान थेबेचैन थेचिंतित थेसंतापग्रस्त थे!
छू लेने से कहीं समाधियां मिलती हैंऔर अगर छू लेने से समाधियां मिलने लगेंतो समाधि दो कौड़ी की हो गई। समाधि अनुभव हैकिसी के छूने से नहीं मिलती। यह कोई छूत की बीमारी थोड़े ही है! और छूने से मिलेतो कोई छीन भी ले! अरे,किसी ने दीऔर कोई दूसरे मिल गए महात्माउन्होंने ले ली! तुम वहीं के वहीं रहे! एक ने छूकर दे दीदूसरे ने छूकर ले ली--कि जा भाग! अपने काम से लग!
लेने-देने का सवाल ही नहीं है। समाधियां ली नहीं जातींदी नहीं जातीं।
लेकिन यह सब व्यर्थ की बकवासजिनको तुम तथाकथित विचारक कहते होउनके भीतर पैदा होती है।
सारे विश्वास अंधे हैं। सारे विचार दकियानूसी हैं। और निश्चित हीभारत इनके कारण नर्क बन गया है। खून के खौलने से कुछ भी न होगा। बुद्धि से मुक्त होओध्यान में उतरो। जरूरनिर्मल घोषतब तुम माध्यम बन सकते हो परमात्मा के। उसका संगीत तुमसे बह सकता है। उसकी वाणी तुमसे उतर सकती है। उसकी सुगंध तुमसे आ सकती हैलोगों के जीवन में वसंत ला सकती है।

आज इतना ही।

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