मंगलवार, 15 अगस्त 2017

अष्‍टावक्र: महागीता-भाग-2 - प्रवचन--07

दिनांक: 2 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

कपिल ऋषि के सांख्य—दर्शनअष्टावक्र की महागीता और कृष्णमूर्ति की देशना में क्या देश—काल अनुसार अभिव्यक्ति का ही भेद हैकृपा करके समझाइये!

 त्य तो कालातीत हैदेशातीत है। सत्‍य को तो देश और काल से कोई संबंध नहीं। सत्य तो शाश्वत हैसमय की सीमा के बाहर है। लेकिन अभिव्यक्ति कालातीत नहीं हैदेशातीत नहीं है। अभिव्यक्ति समय के भीतर हैसत्य समय के बाहर है। जो जाना जाता हैवह तो समय में नहीं जाना जातालेकिन जो कहा जाता हैवह समय में कहा जाता है। जो जाना जाता हैवह तो नितांत एकांत मेंवहां तो कोई दूसरा नहीं होता। लेकिन जो कहा जाता हैवह तो दूसरे से ही कहा जाता है।

सत्य की घटना तो घटती है व्यक्ति मेंअभिव्यक्ति की घटना घटती है समाज मेंसमूह में। तो स्वभावत:कपिल जिनसे बोलेउनसे बोले। अष्टावक्र ने जिससे कहाउससे कहा। कृष्णमूर्ति जिससे बोलते हैंस्वभावत: उससे ही बोलते हैं। भेद अभिव्यक्ति में पड़ेगा। लेकिन जो जाना गया हैवह अभिन्न है।
इसका यह अर्थ मत समझ लेना कि कृष्णमूर्ति अष्टावक्र को दोहरा रहे हैंया अष्टावक्र कपिल को दोहरा रहे हैंया कपिल कृष्णमूर्ति को दोहरा रहे हैं। कोई किसी को दोहरा नहीं रहा है। जब तक दोहराना है तब तक सत्य का कोई अनुभव नहीं है। दोहराया गया सत्यअसत्य हो जाता है। जाना हुआ सत्य ही सत्य है। माना हुआ सत्यअसत्य है। प्रत्येक ने स्वयं जाना है।
और जब कोई सत्य को जानता है स्वयंतो उसे ऐसा जरा भी भाव पैदा नहीं होता कि ऐसा किसी और ने भी जाना होगा। वह घटना इतनी अलौकिकइतनी अद्वितीयइतनी मौलिक है कि प्रत्येक व्यक्ति जब जानता है तो ऐसा ही अनुभव करता है : पहली बारप्रथम बार यह किरण उतरी!
जैसे कि जब कोई व्यक्ति किसी के प्रेम में पड़ता हैतो क्या उसे लगता है यह प्रेम किसी और ने कभी जाना होगा?पृथ्वी पर अनेक प्रेमी हुएअनंत प्रेमी हुएलेकिन जब भी प्रेम की किरण उतरती है किसी हृदय मेंतो उसे लगता है ऐसा प्रेम बस मैं ही जान रहा हूं। क्योंकि प्रेम पुनरुक्ति नहीं हैतुम किसी से उधार नहीं लेते। जब घटता है तो तुम्हें घटता है। और जब घटता है तो तुम्हें तो पहली बार ही घटता है। दूसरों को घटाइसका न तो तुम्हें पता हो सकता.। दूसरों को कैसा घटाइसका कोई अनुभव भी तुम्‍हें नहीं हो सकता। तुम्हें तो अपना ही अनुभव प्रतीत होता है।
इसलिए सत्य जब भी घटता है तो मौलिक उदघोषणा होती है। इस कारण ही अनुयायी बड़े धोखे में पड़ जाते हैं। अनुयायी भी दावा करने लगते हैं कि जो कपिल ने जाना वह किसी ने नहीं जानाजो अष्टावक्र ने जाना वह किसी ने नहीं जानाजो कृष्णमूर्ति कहते हैं वह किसी ने नहीं कहा। यह अनुयायी की भ्रांति है। यही जाना गया हैअन्यथा जानने को कुछ है ही नहीं। और यही कहा गया है। शब्दों के कितने ही भेद होंसुनने वालों के कितने ही भेद हों—यही जाना गया हैयही कहा गया है!
लेकिन जब भी यह जाना जाता है तो सत्य का यह गुणधर्म है कि उसके साथ—साथ मौलिक होने की स्फुरणा होती है। तुम्हें लगता हैबस पहली दफा! न ऐसा कभी हुआन ऐसा फिर कभी होगा। जब बुद्ध को सत्य का अनुभव हुआ तो उन्होंने उदघोषणा की. अपूर्व! पहले कभी हुआ नहींऐसा मुझे अनुभव हुआ है।
यह उनके संबंध में घोषणा है। लेकिन शिष्यों ने समझा कि अपूर्व! अर्थात किसी को ऐसा नहीं हुआजैसा बुद्ध को हुआ है। भ्रांति हो गई। फिर बुद्ध के पीछे चलने वाला दावा करता है कि जो बुद्ध को हुआ वह महावीर को नहीं हुआ। जो बुद्ध को हुआ वह शंकर को नहीं हुआ। जो बुद्ध को हुआ वह अपूर्व है। खुद बुद्ध का वचन है कि जो मुझे हुआ वह अपूर्व है।
लेकिन बुद्ध के वचन का अर्थ बड़ा भिन्न है। बुद्ध सिर्फ अपने अनुभव की बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैंऐसा मुझे कभी न हुआ था। यह सुबह पहली बार हुई। यह रात पहली बार टूटी। यह अंधेरा पहली बार हटा है।
अनुत्तर अपूर्व समाधि—बुद्ध ने कहा। लेकिन जब भी किसी को समाधि घटती हैतभी अनुत्तर अपूर्व होती है। उपद्रव होता है सुनने वालेश्रावकअनुयायीपाथिक से। जैसे ही तुम सुनते होएक बड़ी अड़चन होती है।
मैं तुमसे कुछ कह रहा हूं, जब तक मैंने नहीं कहा तब तक सत्य हैजैसे ही मैंने कहा और तुमने सुनाअसत्य हुआ। क्योंकि जो मैं कह रहा हूं वह मेरा अनुभव है। जो तुम सुन रहे होवह तुम्हारा अनुभव नहीं। जो मैं कह रहा हूं, वह मेरी प्रतीति हैजो तुम सुन र्रहे होवह ज्यादा से ज्यादा तुम्हारा विश्वास होगा। विश्वास असत्य है। तुम मानोगेतुमने जाना नहीं। मानने से उपद्रव खड़ा होता है। फिरमानने वालों में संघर्ष खड़ा होता है। क्योंकि किसी ने बुद्ध को सुनाकिसी ने महावीर को सुना,किसी ने कपिल कोकिसी ने अष्टावक्र कोकिसी ने कृष्णमूर्ति को। उन्होंने अलग— अलग अभिव्यक्तियां सुनीं। एक ही गीत है,लेकिन हर कंठ से स्वर भिन्न हो जाते हैं।
तुम्हें पता है ध्वनि—शास्त्री क्या कहते हैंआधुनिक ध्वनि—शास्त्र की बड़ी से बड़ी खोजों में एक खोज यह है कि जैसे तुम्हारे अंगूठे का चिह्न भिन्न होता हैऐसे प्रत्येक आदमी की आवाज भिन्न होती है। साऊंड—प्रिंट! दो आदमियों की आवाज एक जैसी नहीं होती। इतना वैभिन्य है व्यक्तित्वों काकि दो आदमियों की आवाज भी एक जैसी नहीं होती। गीत एक ही दोहराओराग भिन्न हो जाता है। गीत एक ही दोहराओस्वर भिन्न हो जाता है। गीत एक ही दोहराओरंग भिन्न हो जाता है।
तो कृष्णमूर्ति जो कहते हैंउस पर उनकी ध्वनि की छाप हैउनके व्यक्तित्व की छाप हैउनके हस्ताक्षर हैं। कपिल जो कहते हैंउस पर उनके हस्ताक्षर हैं। इन हस्ताक्षरों में अगर उलझ गए तो संप्रदाय बनेगाऔर अगर हस्ताक्षर को हटा कर मूल को देखने की चेष्टा की तो धर्म का जन्म होता है।
सब संप्रदायों के भीतर कहीं धर्म छिपा है। संप्रदाय वस्त्रों की भांति हैं। और जब तक तुम वस्त्रों को अलग न कर दोगे और निर्वस्त्र धर्म को न खोज लोगेतक तक तुम्हें धर्म का कोई पता नहीं चलेगा। हिंदू मुसलमानईसाईसिक्खजैन—ये सब संप्रदाय हैं। ये अभिव्यक्तियों के भेद हैं। यह एक ही बात को अलग —अलग भाषाओं में कहने के कारण इतनी भिन्नता मालूम होती है। और भाषाएं अनेक हो सकती हैं। सभी धर्म भाषाओं जैसे हैं।
लेकिन मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि तुम इन सभी धर्मों के बीच कोई समन्वय स्थापित करो। उस भ्रांति में मत पड़ना। वह भ्रांति बौद्धिक होगी। अष्टावक्र को पढ़ोकृष्णमूर्ति को पढ़ोकपिल को पढ़ोफिर उनके बीच समानता खोजो और जो—जो मेल खाता लगे उसे इकट्ठा करो और फिर एक सिंथीसिसएक समन्वय बनाओ—वह सब बुद्धि का जाल होगा। उससे कुछ तुम्हें धर्म का पता न चलेगा। जहां पहले तीन संप्रदाय थेवहां चार हो जाएंगे बस। एक तुम्हारा संप्रदाय और संयुक्त हो जाएगा।
एक गांव में कुछ लोग झगड़ रहे थे। मुल्ला नसरुद्दीन पास से गुजरता था। तो उसने कहाभई! झगड़ते क्यों होयह निपटारा तो बातचीत से हो सकता है। इतनी तलवारें क्यों खींचे हुए होखूनखतरा हो जाएगारुको!
उसने गांव के दो—चार पंच इकट्ठे कर दिए और कहा कि आप... तो दोनों पार्टियों ने अपने पांच—पाच पंच चुन लिए.. ये निर्णय कर देंगे झगड़े का।
जब शाम को मुल्ला वहा वापिस पहुंचा तो देखाजहां सुबह थोडे —से झगड़ने वाले थे वहां और भारी भीड़ है। तलवारें खिंची हैं। उसने कहामामला क्या है?
उन्होंने कहा कि अब ये पंच भी लड़ रहे हैं। पहले तो सुबह विवादी थेवे लड़ रहे थेअब ये पंच भी लड़ रहे हैं। और तो कोई उपाय नहीं है। किसी ने सलाह दी कि नसरुद्दीन पंचों के लिए भी पंच नियुक्त करो। नसरुद्दीन ने कहाअब बहुत हो गया। अब मुझे अक्ल आ गई। यह तो सुबह ही निपट लेते तुमतो बेहंतर थायह तो झगड़ा और बढ़ गया।
जो समन्वयवादी हैं इनसे संप्रदाय समाप्त नहीं होते। जहां तीन संप्रदाय होते हैंवहां इन तीन की जगह यह चारचौथा समन्वय अल्लाह ईश्वर तेरे नाम! चौथा खड़ा हो जाता खै। उसके अपने दावे शुरू हो जाते हैं। समन्वय का उसका दावा हो जाता है।
तुमने देखामहावीर के साथ ऐसा हुआ! महावीर ने कहा कि सभी सत्य की अभिव्यक्तियां सत्य हैंआशिक सत्य हैं;ष्णेई अभिव्यक्ति पूर्ण सत्य नहीं है। इसलिए महावीर ने एक सिद्धात को जन्म दिया—स्यादवाद। स्यादवाद का अर्थ होता है मैं भी ठीक हूं, तुम भी ठीक होवह भी ठीक है। कुछ न कुछ तो ठीक सभी में है। इसलिए हम क्यों झगड़ेस्यादवाद का अर्थ है. सभी के भीतर सत्य के अंश की स्वीकृतिताकि विवाद न होव्यर्थ का झगड़ा न हो। लेकिन परिणाम क्या हुआस्यादवाद का अलग एक झगड़ा खड़ा हो गया।
एक जैन मुनि से मैं बात कर रहा था। मैंने उनसे कहा कि आप मुझे संक्षिप्त में कहिए कि स्यादवाद का अर्थ क्या है?उन्होंने कहास्यादवाद का अर्थ है कि कोई भी पूर्ण सत्य नहीं हैसभी सत्य आशिक हैं। सभी में सत्य है थोड़ा— थोड़ा। हम सभी के सत्य को देखते हैंहम विवादी नहीं हैंहम संवादी हैं।
मैंने थोड़ी देर इधर—उधर की बात कीऔर मैंने पूछा कि मैं आपसे एक बात पूछता हूं : स्यादवाद पूर्ण सत्य है या नहीं?उन्होंने कहाबिलकुल पूर्ण सत्य है।
अब यह स्यादवाद पूर्ण सत्य है! अब अगर इसको कोई कहे कि यह आशिक सत्य हैयह भी आशिक सत्य हैतो झगड़ा खड़ा हो जायेगा। सब आशिक सत्य हैंलेकिन जो मैं कह रहा हूं वह पूर्ण सत्य है—यही तो झगड़ा था। इसी झगड़े को हल करने को स्यादवाद खोजा गया। अब स्यादवाद भी झगड़ा करने वालों में एक हिस्सा हो गयाएक पार्टी। वह भी एक विवाद है। वह भी एक संप्रदाय है। अगर स्यादवाद समझा गया होता तो जैनों का कोई संप्रदाय होना नहीं चाहिएक्योंकि स्यादवाद के आधार पर संप्रदाय खड़ा नहीं हो सकता। स्यादवाद का अर्थ ही यह है कि सभी में सत्य है और किसी में पूर्ण सत्य नहीं हैइसलिए संप्रदाय खड़े करने की कोई जगह नहीं है। संप्रदाय का तो मतलब ही यह होता है कि सत्य यहां हैवहां नहीं है। स्यादवाद ने तो संप्रदाय की जड़ काटी थी। लेकिन जैनों का एक संप्रदाय खड़ा हैजो अब स्यादवाद की रक्षा करता है।
इन तीनों के बीच तुमसे मैं समन्वय खोजने को नहीं कह रहा हूं। मैं तुमसे यही कह रहा हूं कि अगर तुम ध्यान की गहराइयों में गएतुम साक्षी— भाव को उपलब्ध हुए तो अचानक तुम्हें दिखाई पड़ेगा कि इस साक्षी के शिखर पर बैठ कर पता चलता है : सभी मार्ग इसी पहाड़ के शिखर की तरफ आते हैं। उन मार्गों के प्रारंभ होने के बिंदु कितने ही भिन्न होंउनकी अंतिम पूर्णाहुति एक ही शिखर पर होती है। सभी मार्ग वहीं आ जाते हैं जहां साक्षी— भाव है। कैसे तुम आते होयह तुम्हारी मर्जी है—बैलगाड़ी परघोड़े परपैदलहवाई जहाज परट्रेन परमोटरबस में.। कैसे तुम आते होयह तुम्हारी मर्जी है। अगर जरा भी समझदारी हो तो इसमें कोई झगड़ा करने की जरूरत नहीं—कोई घोड़े पर आ रहा हैकोई बैलगाड़ी पर आ रहा हैअपनी— अपनी मौज। कोई मस्जिद से आ रहा हैकोई मंदिर से आ रहा हैकोई प्रार्थना करके आ रहा हैकोई ध्यान करके आ रहा हैकोई नाच करकोई चुप बैठकर। लेकिन अगर साक्षी—भाव जग रहा हैअगर तुम्हारे भीतर जागरूकता की किरण फूट रही है,प्रभात हो रहा हैहोश गहन हो रहा है —अब तुम बेहोशी से नहीं जीतेहोश से जीने लगे हो और तुम्हारे जीवन में करुणा और प्रेम की छाया आने लगी हैतुम्हारे जीवन से क्रोध और हिंसा विसर्जित होने लगे हैं।
बस दो बातें जानने की हैं। वे दो बातें भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भीतर ध्यान घटता है तो बाहर प्रेम घटता है। बाहर प्रेम घटता है तो भीतर ध्यान अनिवार्य रूप से घटता है। अगर प्रार्थना करो तो प्रेम घटेगा और ध्यान उसके पीछे आएगा। अगर ध्यान करो तो ध्यान घटेगा और प्रार्थना उसके पीछे से आएगी। तुम दो में से कोई एक साध लोदूसरा अपने— आप सध जाता है।
साक्षी में पहुंच कर ही तुम्हें सारे जगत के सत्यों के बीच समन्वय की प्रतीति होगी। उस अनुभव की तरफ मेरा इशारा है। इसे तुम बौद्धिक समन्वय बनाने की कोशिश मत करना।

 दूसरा प्रश्न :

आपने कल कहा कि सभी साधनाएं गोरखधंधा हैं। लेकिन साथ ही आप अपने संन्यासियों के लिए ध्यान करना अनिवार्य कर रखे हैं। इससे मन दुविधा में पड़ता है। ध्यान नहीं करने से लगता है कुछ चूक हो रही है और करने पर मन कहता है कि समय तो नहीं गंवा रहे होकृपापूर्वक मार्गदर्शन करें।

 निश्चित ही सभी अनुष्ठान गोरखधंधे हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि तुम अनुष्ठान करना मत। जैसे कि मैं तुमसे कहूं नाव पर सवार हो जाओलेकिन उस पार जा कर उतर जाना। तुम कहो कि आप तो दुविधा में डाल रहे हैं. एक हाथ से तो कहते हैंसवार हो जाओ और तत्‍क्षण कहते हैंउतर जाना। अगर उतरना ही है तो हम नाव पर चढ़े ही क्योंऔर अगर चढ़ ही गए तो फिर उतरें क्योंयह तो आप दुविधा में डालते हैंचढ़ने को भी कहते हैंउतरने को भी कहते हैं।
लेकिन इसमें दुविधा है। नाव पर चढ़ना होगा और नाव से उतरना भी होगा।
दुनिया में दो तरह के पागल हैं। वे बड़े तार्किक हैं। तर्क बड़ा विक्षिप्त होता है। ठीक है तर्क यह। मैंने सुना है कि कुछ लोग तीर्थ—यात्रा को जा रहे हैं—हरिद्वार। और ट्रेन पर बड़ी भीड़— भड़क्का है। और एक आदमी बड़ी कोशिश कर रहा हैलेकिन चढ़ नहीं पा रहा। किसी ने ऐसे ही मजाक में उससे कहा कि अरेइतने क्यों मरे जा रहे हो चढ़ने के लिएआखिर उतरना पड़ेगा! तो वह आदमी रहा होगा बड़ा विचारकवह उतर ही गया। उसने चढ़ने की कोशिश छोड़ दी। उसके साथी जो अंदर चढ़ गये थेउन्होंने कहा कि भईतू खड़ा क्यों हैगाड़ी छूटने को हो रही हैचढ़! उसने कहा कि तुम्हें पता नहींउतरना पड़ेगा। जब उतरना ही है तो चढ़ने के लिए इतनी धक्कम— धक्की क्या करनीसमझ गयेयहीं उतर गये।
वे घबडाएक्योंकि गाड़ी छूटी जा रही है। और उस आदमी को साथ ले आये हैंकहां उसे छोड़ जाएंउनमें से कुछ उतरे और जबर्दस्ती उसे चढ़ाया। वह चिल्लाता—चीखता रहा। उसने कहायह कर क्या रहे होजब उतरना ही है तो हम क्यों इस मुसीबत में फंसे?
पर उन्होंने उसकी कोई फिक्र नहीं की। उन्होंने कहाविवाद पीछे कर लेंगेपहले तू चढ़! अब तुझे हम कहां छोड़ जायें यहां अनजान जगह में?
कहीं गांव से आते थे। खैर किसी तरह उसको चढ़ा लिया। बड़ी मुश्किल वह चढ़ा। एक तो वैसे ही भीड़ थी और वह चढ़ने में झगड़ा खड़ा कर रहा था। वहक उतर जाना चाहता था। चढ़ गया। फिर हरिद्वार आ गया। अब उतारने की झंझट खड़ी हुई। वह उतरता नहीं। वह कहता हैजब चढ़ ही गयेजब एक दफा चढ़ ही गये तो अब क्या उतरना बार—बारअब फिर चढ़ने की झंझट होगी। इसलिए हम चढ़े ही रहेंगे। अब हमें तुम यहीं छोड़ दोतुम जाओ।
अब उसको वे जबर्दस्ती उतार रहे हैं। वह आदमी चिल्ला रहा है कि तुम कैसे असंगत होक्षण भर पहले चढ़ातेक्षण भर बाद उतारते—असंगति तो देखो! तुम मुझे दुविधा में डाल रहे हो। तुम मुझे सीधा सार—सूत्र कह दो कि या चढ़ना या उतरना,तो हम निपटा लें। हम वही हो जाएं।
तुम जिंदगी को इतना तर्क से अगर चले तो बड़ी बुरी तरह चूकोगे। अगर तुम चढ़ोगे ही नहीं तो तीर्थ नहीं पहुंचोगे। और अगर चढ़े ही रह गए तो भी तीर्थ नहीं पहुंचोगे।
इसलिए मैं तुमसे कहता हूं कि ध्यान भी करना और एक दिन स्मरण रखना कि ध्यान भी छोड़ देना है। दोनों बातें तुमसे कहता हूं। तुम तो चाहोगे कि कोई एक कहूं तो तुम्हें सुविधा हो जाए। तुम सुविधा की फिक्र कर रहे होतुम साधना की फिक्र नहीं कर रहे हो। तुम सुविधा खोज रहे हो। तुम क्रांति नहीं खोज रहे हो।
तो सुविधाओं में दो उपाय हैं। या तो मैं तुमसे कहूं कि करो ही मत। जैसे कृष्णमुर्ति कहते हैं— उनकी बात सीधी—साफ है—ध्यान करने की कोई जरूरत नहीं। जिनको ध्यान नहीं करना है वे उनके पास इकट्ठे हो गए हैंयद्यपि उन्हें कुछ भी नहीं हुआ।
मेरे पास आते हैं लोग। वे कहते हैंहम कृष्णमूर्ति को सुनते —सुनते थक गए। हमें बात भी समझ में आ गई कि ध्यान इत्यादि में कुछ भी नहीं हैमगर हमें कुछ हुआ भी नहीं है। कुछ हुआ भी नहीं है और समझ में भी आ गया है कि ध्यान इत्यादि में कुछ भी नहीं है।
ये इसी पार रह गएनाव पर न चढ़े। फिर दूसरी तरफ महेश योगी या उन जैसे लोग हैंजो कहते हैं. 'ध्यानध्यान,ध्यान! करो!और फिर कभी नहीं कहते कि इसे छोड़ना है। तो कुछ लोग हैं जो बस जप रहे हैं रामरामरामराम। राम—राम जपते ही चले जाते हैं। जिंदगी गुजर गई। वे भी मेरे पास आ जाते हैं। वे कहते हैंराम—राम जपते हम थक गएअब कब तक जपते रहें? और ध्यान तो छोड़ा नहीं जा सकता। ध्यान तो धर्म की विधि है।
तुम मेरी स्थिति को समझने की कोशिश करो। मैं तुमसे कहता हूं, ध्यान शुरू करो। नहीं तो खतरा है कि तुम कृष्णमूर्ति जैसी आखिरी बात सुन कर बैठ गए। यह बात सही हैनाव छोड़ देनी है —मगर उस किनारेइस किनारे नहीं। और कृष्णमुर्ति ने नाव छोड़ीइसलिए तुमसे कह रहे हैं कि छोड़ दो नाव। लेकिन यह उस किनारे की बात हैइस किनारे की बात नहीं है। इस किनारे छोड़ दी तो तुम कभी उस किनारे न पहुंचोगे। तुमने कृष्णमूर्ति को नाव से उतरते देखा हैयह सच हैतुम मत उतर जानाक्योंकि तुम इस किनारे ही हो। तुम अगर उतर गए तो भटक जाओगे। और तुमने महेश योगी को चढ़ते देखा नाव पर,यह भी सच है। अब चढ़े ही मत रह जाना। क्योंकि दूसरा किनारा आ जाए तो उतरने का खयाल रखना।
मैं तुम्हें जब ये विरोधाभासी बातें कहता हूं कि ध्यान करो और ध्यान छोड़ो भीतो ये दो किनारों की बातें हैं। इस किनारे से शुरू करोउस किनारे पर छोड़ देना। अगर मैं कहूं सिर्फ ध्यान करोतो एक खतरा पैदा होगाजब छोड़ने की बात आएगीतुम छोड़ न सकोगे। अगर मैं सिर्फ इतना ही कहूं कि छोड़ दोतो तुम करोगे ही नहींछोड़ने की संभावना का सवाल ही नहींकरोगे ही नहीं तो छोड़ोगे क्या खाक?
मैं तुमसे कहता हूं : कमाओ और दान कर दो! कमाने में भी मजा हैफिर दान करने में तो बहुत मजा है। ध्यान में बहुत रस हैफिर ध्यान के छोड़ने में तो महारस है।
दुविधा में पड़ने की तुम्हें जरूरत नहीं। सीधी—साफ बात है। मैं सभी विरोधों का उपयोग करना चाहता हूं। तुम चाहते हो अविरोधी वक्तव्यजिसमें तुम्हें अड़चन न होतुम लकीर के फकीर बन
जाओ और चल पड़ो। तुम लकीर के फकीर बनने को इतने आतुर हो कि बस तुम्हें एक झंडा पकड़ा दिया जाएबस तुम चलते रहोगे।
निश्चित ही मेरी बात में विरोधाभास हैक्योंकि सारा जीवन विरोधाभास से निर्मित है। जन्म होता .हैमृत्यु होती है—यह विरोधाभास है। तुम जीवन से नहीं कहते. यह क्या मामला हैतुम परमात्मा .से कभी खड़े हो कर शिकायत नहीं करते कि यह क्या मामला हैअगर जन्म दिया तो मारते क्यों हो फिरऔर अगर मारना ही है तो जन्म देना ही बंद कर दो।
तुम कहो तो भी परमात्मा तुम्हारी सुनेगा नहीं। कई लोगों ने कई बार कहा भी है। लेकिन परमात्मा जन्म देता हैमृत्यु देता है। एक हाथ से जन्म देता हैदूसरे हाथ से जन्म वापिस ले लेता है। यहां रात होतीदिन होता। यहां गर्मी आतीसर्दी आती। यहां मौसम बदलते रहते। यही तो जीवन की रसमयता है। राही विरोध का मिलन है। अगर इकहरा होता जीवन तो इसमें रस न होताइसमें समृद्धि न होती। यहां विपरीत संघात मिल कर अपूर्व संगीत का जन्म होता है। यहां जन्म और मृत्यु के बीच जीवन का खेल चलता हैजीवन का रास रसा जाता है
वही मैं तुमसे कह रहा हूं : ध्यान करो भी और ध्यान रखना कि छोड़ना है। एक दिन छोड़ना है। —विधि का एक दिन विसर्जन कर देना है।
तुमने देखाहिंदू इस संबंध में बड़े कुशल हैं। गणेश जी बना लिए मिट्टी केपूजा इत्यादि कर ली—जा कर समुद्र में समा आए। दुनिया का कोई धर्म इतना हिम्मतवर नहीं है। अगर मंदिर में मुर्ति रख ली तो फिर सिराने की बात ही नहीं उठती। फिर वे कहते हैं अब इसकी पूजा जारी रहेगी। हिंदुओं को हिम्मत देखते हो! पहले बना लेते हैंमिट्टी के गणेश जी बना लिए। मिट्टी के बना कर उन्होंने भगवान का आरोपण कर लिया। नाच—कूदगीतप्रार्थना—पूजा सब हौ गई। फिर अब वह कहते हैंअब चलो महाराजअब हमें दूसरे काम भी करने हैं! अब आप समुद्र में विश्राम करोफिर अगले साल उठा लेंगे।
यह हिम्मत देखते होइसका अर्थ क्या होता हैइसका बड़ा सांकेतिक अर्थ है. अनुष्ठान का उपयोग कर लो और समुद्र में सिरा दो। विधि का उपयोग कर लोफिर विधि से बंधे मत रह जाओ। जहां हर चीज आती हैजाती हैवहा भगवान को भी बना लोमिटा दो। जो भगवान तुम्हारे साथ करता है वही तुम भगवान के साथ करो—यही सज्जन का धर्म है। वह तुम्हें बनाता,मिटा देता। उसकी कला तुम भी सीखो। तुम उसे बना लोउसे विसर्जित कर दो।
जब बनाते हिंदू तो कितने भाव से! दूसरे धर्मों के लोगों को बड़ी हैरानी होती है। कितने भाव से बनातेकैसा रंगतेमूर्ति को कितना सुंदर बनातेकितना खर्च करते! महीनों मेहनत करते हैं। जब मूर्ति बन जातीतो कितने भाव से पूजा करतेफूल— अर्चनभजनकीर्तन! मगर अदभुत लोग हैं! फिर आ गया उनकी विसर्जन का दिन। फिर वे चले बैंड—बाजा बजातेतो भी नाचते जाते हैं। जन्म भी नृत्य हैमृत्यु भी नृत्य होना चाहिए। चले परमात्मा को सिरा देने! जन्म कर लिया थामृत्यु का वक्त आ गया।
इस जगत में जो भी चीज बनती है वह मिटती है। और इस जगत में हर चीज का उपयोग कर लेना है और किसी चीज से बंधे नहीं रह जाना है—परमात्मा से भी बंधे नहीं रह जाना है। मैं नहीं
कहता कि हिंदुओं को ठीक—ठीक बोध है कि वे क्या कर रहे हैं। लेकिन जिन्होंने शुरू की होगी यात्रा उनको जरूर बोध रहा होगा। लोग भूल गये होंगे। अब उन्हें कुछ भी पता न हो कि वे क्या कर रहे हैं। मूर्च्छा में कर रहे होंगे। पुरानी परंपरा है कि बनाया,विसर्जन कर रहे होंगेलेकिन उसका सार तो समझो। सार इतना ही है कि विधि उपयोग कर ली। फिर विधि से बंधे नहीं रह जाना है। अनुष्ठान पूरा हो गयाविसर्जन कर दिया।
वही मैं तुमसे कहता हूं : नाचोकूदोध्यान करोपूजाप्रार्थना—इसमें उलझे मत रह जाना। यह पथ हैमार्ग हैमंजिल नहीं। जब मंजिल आ जाए तो तुम यह मत कहना कि 'मैं इतना पुराना यात्रीअब मार्ग को छोड़ दूंछोड़ो! इतने दिन जन्मों—जन्मों तक मार्ग पर चलाअब आज मंजिल आ गईतो मार्ग को धोखा दे दूंदगाबाजगद्दार हो जाऊं? जिस मार्ग से इतना साथ रहा और जिस मार्ग ने यहां तक पहुंचा दियाउसको छोड़ दूंमंजिल छोड़ सकता हूं, मार्ग नहीं छोड़ सकता। 'तब तुम समझोगे कि कैसी मूढ़ता की स्थिति हो जाएगी। इसी मंजिल को पाने के लिए मार्ग पर चले थेमार्ग से नाता—रिश्ता बनाया था—वह टूटने को ही था।
मार्ग की सफलता ही यही है कि एक दिन घड़ी आ जाए जब मार्ग छोड़ देना पड़े।
ध्यान के जो परम सूत्र हैंउनमें एक सूत्र यह भी है कि जब ध्यान छोड़ने की घड़ी आ जाये तो ध्यान पूरा हुआ। जब तक ध्यान छूट न सकेतब तक जानना अभी कच्चा हैअभी पका नहीं। जब फल पक जाता है तो वृक्ष से गिर जाता है। और जब ध्यान का फल पक जाता हैतब ध्यान का फल भी गिर जाता है। जब ध्यान का फल गिर जाता है तब समाधि फलित होती है।
पतंजलि ने ध्यान की प्रक्रिया को तीन हिस्सों में बांटा है. धारणाध्यानसमाधि। धारणा छोटी—सी पगडंडी हैजो तुम्हें राजपथ से जोड़ देती है। तुम जहां हो वहां से राजपथ नहीं गुजरता। एक छोटी—सी पगडंडी हैजो राजपथ से जोड़ती है। मार्ग,जो राजमार्ग से जोड़ देता है—धारणा। फिर राजमार्ग— ध्यान। फिर राजमार्ग मंजिल से जोड़ देता है—मदिर सेअंतिम गंतव्य से। धारणा छूट जाती है जब ध्यान शुरू होता है। ध्यान छूट जाता जब समाधि आ जाती है।
इसलिए ध्यान करना—उतने ही भाव से जैसे गणेश को हिंदू निर्मित करते हैंउतने ही अहोभाव से! ऐसा मन में खयाल मत रखना कि 'इसे छोड़ना है तो क्या तो क्या रंगनाकैसे भी बना लिया क्या फिक्र करनी कि सुंदर है कि असुंदर हैकोई भी रंग पोत दिएचेहरा जंचता है कि नहीं जंचताआंख उभरी कि नहीं उभरीनाक बनी कि नहीं—क्या करना हैअभी चार दिन बाद तो इसे विदा कर देना होगातो कैसे ही बना—बनू कर पूजा कर लो। नहींतो फिर पूजा हुई ही नहीं। तो छोड़ने की घड़ी आएगी ही नहीं। जब बने ही नहीं गणेश तो विसर्जन कैसे होगा?
तो जब ध्यान करोतब ऐसे करना जैसे सारा जीवन दाव पर लगा है। तब ही उस महाघडी का आगमन होगावह महासौभाग्य का क्षण आएगा—जब तुम पाओगे अब विसर्जन का समय आ गयाअब ध्यान को भी छोड़ देंअब ध्यान से भी ऊपर उठ जाएंअब समाधिअब समाधानअब मंजिल।
तो मैं तुमसे यह विरोधाभास कहता हूं कि जो ध्यान को समग्रता से करेंगे वे ही एक दिन ध्यान को समग्रता से छोड़ पाएंगे। और जिन्होंने ऐसे—ऐसे कियाकुनकुने—कुनकुने कियाऔर कभी उबले नहीं और भाप न बनेउनकी कभी छोड़ने की घड़ी न आएगी। वे इसी किनारे अट्के रह जाएंगे।
जैन शास्त्रों में एक कथा है। एक साधु स्नान कर रहा है। और वह देख रहा है कि एक आदमी आयावह नाव में बैठा,पतवार चलाईलेकिन कुछ हैरान है। वह साधु हंसने लगा। उस आदमी ने पूछा कि मेरे भाईतुम्हें शायद पता होमामला क्या हैयह नाव चलती क्यों नहीं?
उस साधु ने कहा कि सज्जन पुरुषमहाशय! नाव किनारे से बंधी है। पतवार चलाने से कुछ भी न होगा। पहले खूंटी से रस्सी तो खोल लो!
वे पतवार चला रहे हैंतेजी से चला रहे हैं! यह सोच कर कि शायद धीमे— धीमे चलाने से नाव नहीं चल रही हैतो और तेजी से चलाओ। पसीने—पसीने हुए जा रहे हैं। लेकिन नाव किनारे से बंधी है। उसे छोड़ा नहीं गया। नाव चलाने के पहले किनारे से छोड़ लेना जरूरी है।
तो अगरतुमने आधे— आधे मन से ध्यान किया तो नाव किनारे से छूटेगी ही नहीं। तो तुम उस किनारे कभी पहुंचोगे ही नहीं। उतरने की घड़ी कभी आएगी ही नहीं।
अष्टावक्र ने जनक को कहा कि सब अनुष्ठान बंधन हैं। बिलकुल ठीक कहा। लेकिन तुम यह याद रखना कि यह नाव उस किनारे पहुंच गई हैतब कहे गए वचन हैं। इसलिए मैंने इसको महागीता कहा। कृष्ण की गीता को मैं सिर्फ गीता कहता हूं;अष्टावक्र की गीता को महागीता। क्योंकि कृष्ण की गीता अर्जुन से कही गई है—इस किनारे पर। वह नाव पर सवार ही नहीं हो रहा है। वह भाग— भाग खड़ा हो रहा है। वह कह रहा है, 'मुझे संन्यास लेना है। मैं नाव पर नहीं चढ़ता। क्या सार हैमुझे जाने दो। वह भाग रहा है। वह कहता है, 'मेरे गात शिथिल हो गए। मेरा गांडीव ढीला हो गया। मैं नहीं चढ़ना चाहता। वह रथ पर बैठा हैसुस्त हो गया है। वह कहता हैनाव पर मुझे चढ़ना ही नहीं। कृष्ण उसे पकड़—पकड करसमझा—समझा कर नाव पर बिठाते हैं। कृष्ण की गीता सिर्फ गीता हैइस किनारे अर्जुन को नाव पर बिठा देना है। अष्टावक्र की गीता महागीता है। यह उस किनारे की बात है। ये जनक उस किनारे हैंलेकिन नाव से उतरने को शायद तैयार नहींया नाव में बैठे रह गए हैं। बहुत दिनों तक नाव में यात्रा की हैनाव में ही घर बना लिया है।
अष्टावक्र कहते हैं : उतर आओ। सब अनुष्ठान बंधन हैंअनुष्ठान छोड़ो!
कृष्ण कहते हैं. उतरो संघर्ष मेंभागो मत! सब परमात्मा पर छोड़ दो। वह जो करवाएकरो। तुम निमित्त—मात्र हो जाओ। इस नाव में चढ़ना ही होगा। यही तुम्हारी नियतितुम्हारा भाग्य है।
अगर अर्जुन नाव में चढ़ जाए—चढ़ ही गया कृष्ण की बात मान कर—तो खतरा हैवह भी बड़ा तर्कनिष्ठ व्यक्ति था। एक दिन उसको फिर अष्टावक्र की जरूरत पड़ेगीक्योंकि वह उस किनारे जा कर उतरेगा नहीं। जितना विवाद उसने चढ़ने में किया थाउससे कम विवाद वह उतरने में नहीं करेगाशायद ज्यादा ही करे। क्योंकि वह कहेगाकृष्ण चढ़ा गए हैं। अब उतरना एक तरह की गद्दारी होगी। यह तो अपने गुरु के साथ धोखा होगा। बामुश्किल तो मैं चढ़ा थाअब तुम उतारने आ गएमैं तो पहले ही कह रहा था कि मुझे चढ़ना नहीं है। यह भी क्या खेल है?
और अष्टावक्र कहते हैंसब अनुष्ठान बंधन हैं। ध्यान बंधन हैधारणा बंधन हैयोग बंधन हैपूजा—प्रार्थना बंधन है—सब बंधन हैं।
कृष्ण की गीता उसके लिए है जो अभी अ ब स सीख रहा है अध्यात्म का। अष्टावक्र की गीता उसके लिए है जिसके सब पाठ पूरे हो गएदीक्षांत का समय आ गया। कृष्ण की गीता दीक्षारंभ है।
अष्टावक्र की गीता दीक्षांत—प्रवचन है। इन दोनों गीताओं के बीच में सारी यात्रा पूरी हो जाती है। एक

 चढ़ा देता है अनुष्‍ठानों में, एक उतार लेती है, अनुष्‍ठानों से। एक बताती है गणेश को कैसे निर्मित करोकैसे भाव— भक्ति सेकैसे रंग भरीएक बताती हैकैसे नाचतेगीत गुनगुनाते विसर्जित करो।
ऐसा जन्म और मृत्यु के बीच जीवन हैऐसे ही नाव में चढ़ने और नाव से उतरने के बीच परमात्मा का अनुभव है।

 तीसरा प्रश्न :

जब मैं आपका प्रवचन सनता हूं तो न जाने क्यों उसके प्रेम—संगीत में खो जाता हूं। मुझे लगता है कि आप सितार बजा रहे हैं और मैं तबला बजा रहा हूं। कभी लगता है कि मैं तानपूरा बजा रहा हूं और आप तान लगा रहे हैं। प्रभुमुझे यह क्या हो गया हैकृपा कर मुझे थामें!

 थामेंधक्का देंगे! ऐसी शुभ घड़ी आ गईतुम कहते होकृपाकर थामेंयही तो मैं चाहता हूं कि सभी को होजो तुम्हें हुआ है।

 यह जो मैं कह रहा हूं, यह शब्‍द नहीं, संगीत ही है। और इसे अगर तुम सुनना चाहते हो तो सुनने की जो श्रेष्‍ठतम व्‍यवस्‍था है वह यही कि तुम भी मेरे संगीत में सहभागी हो जोओ। मेरी इस लय में तुम भी तानपूरा तो बजाओ कम से कम। तुम ऐसे दूर—दूर खड़े न रह जाओ। तुम इस आर्केस्ट्रा के अंग बन जाओतभी तुम समझ पाओगे।
शुभ हो रहा हैसौभाग्य की घटना घट रही है। तुम डरो मत। दो तबले पर ताल! बजाओ तानपूरा! साथ मेरे गाओसाथ मेरे नाचो। इसी नृत्य में तुम खो जाओगे। इसी खोने से तुम्हारा वास्तविक होना शुरू होगा। इसी नृत्य में तुम विसर्जित हो जाओगेतुम्हारी सीमाएं असीम में डब जाएंगी। अचानक तुम पहली दफा जागोगे और पाओगे कि तुम कौन! इसी खो जाने में नींद टूटेगीईजागरण होगा।
और तुम कहते हो प्रभु थामें। समझ रहा हूं तुम्हारी अड़चन भीतुम्हारे प्रश्न को भी समझ रहा हूं। क्योंकि जब कोई ऐस,ा डूब,ने लगतातो घबड़ाहट स्वाभाविक होती है कि यह क्या हो रहाकहीं मैं पागल तो नहीं हुआ जा रहायहां कैसी वीणा और कैसा तबला?
पूछने में भी तुम डरे होओगे। प्रश्न को मैंने कहा तो बहुत लोग हंसे भी। उनको भी लगायह
क्या पागलपन हैतुमको भी लगा होगाक्या पागलपन हैयह मैं कर क्या रहा हूंयहां सुनने आया हूं कि तबला बजानेऔर यह कैसा तानपूरा मैंने साध लिया। यह कैसी कल्पना में मैं उलझा जा रहा हूं, यह कोई सम्मोहन तो नहींयह कोई मन की विक्षिप्तता तो नहींयह कैसी लहर मुझमें उठी?
मत घबड़ाओयही लहर तुम्हें ले जाएगी उस पार। यही लहर नाव बनेगी। इसी लहर पर चढ़ने को कह रहा हूं। चढ़ जाओ इस लहर पर। इस लहर को चूको मत। यह लहर डुबाए तो डूब जाओ। यह उबारे तो उबरोडुबाए तो डूबो। इस लहर के साथ अपना तादात्म्य कर लो। इस लहर से लड़ो मत। इसके विपरीत तैसे मत। इससे बचने की चेष्टा मत करो।
तब बुला जाता मुझे उस पार जो
दूर के संगीत—सा वह कौन है?
जो तुम्हें बुला रहा हैवह अभी दूर का संगीत है। तुम उसके साथ अगर तानपूरा बजाने लगेवह करीब आने लगेगा।
तब बुला जाता मुझे उस पार जो
दूर के संगीत—सा वह कौन है?
अभी दूर है संगीत। सहभागी बनो।
एक तो सुनने का ढंग होता है कि सुन रहे हैं—तटस्थ भाव सेजैसे कुछ लेना—देना नहीं। सुन रहे हैं—एक निष्‍क्रिय अवस्था में मुर्दे की तरह। कान हैं तो सुन रहे हैं। एक तो निष्कि्रय सुनना है। और एक सक्रिय सुनना है —प्रफुल्लित,आनंदमग्ननाचते हुएसहयोग करते हुएजैसे मैं नहीं बोल रहा हूं तुम्हीं बोल रहे होजैसे तुम्हारा ही भविष्य बोल रहा हैजैसे तुम्हारे ही भीतर छिपी हुई संभावना बोल रही है। मैं तुम्हारी ही गुनगुनाहट हूं। जो गीत तुम अभी गाए नहीं और गाना हैउसी की तरफ थोड़े—से पाठ तुम्हें दे रहा हूं।
अभी जो तुम्हें लगेगा तानपूरा हैबजाते—बजाते वही तुम्हारी वीणा हो जाएगी। अभी तुम मेरे साथ बजाओगेधीरे— धीरे तुम पाओगे तुम और मैं का फासला तो समाप्त हो गयान तो मैं हूं, न तुम हों—परमात्मा बजा रहा है। और तब तुम इस योग्य हो जाओगे कि कोई तुम्हारे पास आए तो वह अपना तानपूरा बजाने लगे।
प्राणों के अंतिम पाहुन!

            चांदनी धुला अंजन—सा
विद्युत मुस्कान बिछाता
सुरभित समीर पंखों से
उड़ जो नभ में घिर आता
वह वारिद तुम आना बन!

            ज्यों श्रौत पथिक पर रजनी
छाया—सी आ मुस्काती
भारी पलकों में धीरे
निद्रा का मधु खुलकाती
त्यों करना तुमबेसुध जीवन!

            अज्ञात लोक से छिप—छिप
ज्यों उतर रश्मिया आतीं
मधु पीकर प्यास बुझाने
फूलों के उर खुलवातीं
छिप आना तुम छाया तन!
आने दो मुझेतुम्हारे भीतर आने दो। थामने की बात ही मत उठाओ। तुम्हें मदमस्त होना है। तुम्हें शराबी बनना है। तुम्हें डोलना है किसी मदिरा में। थामने की बात ही मत उठाओ।
तुम्हारा डर मैं समझता हूं —कि यह क्या हो रहा हैकहीं मैं अपना होश तो न खो दूंगाकहीं मैं बेसुध तो न हो जाऊंगा?
ज्यों श्रौत पथिक पर रजनी
छाया—सी आ मुस्काती
भारी पलकों में धीरे
निद्रा का मधु खुलकाती
त्यों करना तुम बेसुध जीवन!
यही अब तुम्हारी प्रार्थना हो :
त्यों करना तुम बेसुध जीवन!
तुम मुझसे कहो कि जल्दी करो! तुम मुझसे कहो कि अब ऐसा भय मुझे न रहे कि मैं कुछ थाम कर रुक जाऊं। तुम मुझसे कहो कि अब मुझे डुबाओमुझे बेसुध करो। क्योंकि तुमने जिसे अब तक सुध समझी है वह तो बेसुधि थी। तुमने जिसे अब तक होश समझा है वह तो बेहोशी थी। और तुम जिसे अब तक जागरण समझते थे वह सपनों से ज्यादा नहीं था। वह बड़ी गहन अंधेरी रात और नींद थी। अब यह जो बेसुधि मैं तुम्हें देना चाहता हूं जो बेहोशी तुम्हें पिलाना चाहता हूं —यह होश का आगमन है। यह तुम्हें बेहोशी लगती हैक्योंकि तुम जिसे अब तक होश समझे थेयह उससे विपरीत है। यह मदिरा ऐसी है जो होश लाती है।
अज्ञात लोक से छिप—छिप
ज्यों उतर रश्मिया आतीं
मधु पीकर प्यास बुझाने
फूलों के उर खुलवातीं
छिप आना तुम छाया तन!
तुम मुझे आने दो। तुमने जो कहा है. थामें! उसका अर्थ हुआ कि तुम भयभीत हो गये हो। उसका अर्थ हुआअगर मैं तुम्हारे द्वार पर दस्तक दूंगा तो तुम द्वार न खोलोगे। उसका अर्थ हुआ कि तुम मुझे पास देख कर द्वार बंद कर लोगे। उसका अर्थ हुआ कि तुम पागलपन से घबड़ा रहे हो।
लेकिन ध्यान रखनाधर्म एक अनूठा पागलपन है—ऐसा पागलपन जो बुद्धिमानों की बुद्धियों से बहुत ज्यादा बुद्धिमान हैऐसा पागलपन जो साधारण बुद्धि से बहुत पार और अतीत हैऐसा पागलपन जो परमात्मा के निकट ले जाता है।
दुनिया में दो तरह के लोग पागल हो जाते हैं : एक तो वेजो बुद्धि से नीचे गिर जाते हैंऔर एक वे जो बुद्धि के पार निकल जाते हैं।
इसलिए आश्चर्य की बात नहीं है कि मनस्विद संतो  को पागलों के साथ ही गिनते हैं—दोनों को एबनार्मल...। मनोविज्ञान की किताबों में तुम संतो  के लिए और पागलों के लिए अलग—अलग विभाजन न पाओगे। उनके हिसाब से दो ही तरह के आदमी हैं—नार्मलएबनार्मलसाधारण और रूग्‍ण। साधारण तुम हो। रुग्ण दो तरह के लोग हैं—फिर वे किसी ढंग के रुग्ण हों;चाहे धार्मिक रुग्ण होंचाहे अधार्मिक होंचाहे नास्तिकचाहे आस्तिक—लेकिन एबनार्मल हैं।
अभी भी जीसस पर किताबें लिखी जाती हैं पश्चिम मेंजिनमें दावा किया जाता है कि जीसस पागल थेन्यूरोटिक थे। अभी हिंदुस्तान में मनोविज्ञान का उतना प्रभाव नहीं हैइसलिए बुद्ध और महावीरअष्टावक्र अभी बचे हैं। लेकिन ज्यादा दिन यह बात चलेगी नहीं। जल्दी ही हिंदुस्तान के मनोवैज्ञानिक भी हिस्मत जुटा लेंगे। अभी उनकी इतनी हिम्मत भी नहीं हैलेकिन जल्दी हिम्मत जुटा लेंगे। जो जीसस के खिलाफ लिखा जा रहा हैवह किसी न किसी दिन महावीर के खिलाफ लिखा जाएगा। और तुम पक्का समझो कि जीसस को पागल सिद्ध करने के लिए उतने प्रमाण नहीं हैंजिससे ज्यादा प्रमाण महावीर को पागल सिद्ध करने के लिए मिल जाएंगे।
तुमने देखामहावीर नग्न खड़े हैं! कम से कम जीसस कपड़े तो पहने हैं। अब यह तो पागलपन है। तुमने देखामहावीर अपने बालों को लोच कर उखाड़ते हैं! पागलों का एक खास समूह होता है जो अपने बाल लोच कर उखाड़ता है। तुमने पागलों को देखा होगातुमने कभी खुद भी देखा होगाजब तुम पर कभी पागलपन चढ़ता हैतो तुम कहते होबाल लोच लेने का मन होता है। कहावत है च कि बाल लोच लेने का मन होता है। स्त्रियों को गुस्सा आ जाता है तो बाल लोच लेती हैं—किसी पागलपन के क्षण में! बहुत पागल हैं पागलखानों में जो अपने बाल लोच लेते हैं। महावीर अपने बाल लोच लेते थे। केश लुंच।
तुम्हारे पास एक गाली है—नंगा—लुच्चा। वह सबसे पहले महावीर को दी गई थी। क्योंकि वे नंगे थे और बाल लोंचते थे। नंगा—लुच्चा! अगर महावीर में खोजना हो पागलपन तो पूरा मिल जाएगा। लेकिन मनोवैज्ञानिक अभी कुछ भी नहीं जानते हैं। जो उनका विभाजन हैअज्ञानमय है। यह भी हो सकता है कि एक आदमी शराब के नशे में चल रहा हो रास्ते पर—डावांडोल,डगमगाताऔर कोई किसी के प्रेम में मदमस्त हो कर चल रहा होऔर कोई किसी प्रार्थना में डोल रहा हो। तीनों राह पर डावांडोल चल रहे होंपैर जगह पर न पड़ते होंसमाए न समाते होंभीतर की खुशी ऐसी बही जा रही हो—पीछे से तुम तीनों को देखो तो तीनों लगेंगे कि शराबी हैं। क्योंकि जैसा शराबी डांवांडोल हो रहा हैवैसी ही मीरा भी डावांडोल हो रही हैवैसे ही चैतन्य भी डांवांडोल हो रहे हैं। जैसे शराबी गीत गुनगुना रहा हैवैसी मीरा भी गीत गुनगुना रही है। पीछे से तुम देखोगे तो तुम्हें दोनों एक जैसे लगेंगे। लेकिन कहां मीरा और कहां शराबी! कहा चैतन्य और कहां शराबी! शराबी ने बुद्धि गंवा दी शराब पी कर। मीरा ने भी बुद्धि गंवा दी।
मीरा कहती हैसब लोक—लाज खोई। कोई और बड़ी शराब पी ली! अंगसे से बनती है जो शराबवही तो शराब नहीं। एक और भी शराब हैजो प्रभु—प्रेम से बनती है। वह पी ली। वह भी मदमस्त है।
लेकिन मीरा रुग्ण नहीं है। अगर मीरा रुग्ण है तो फिर तुम्हारे स्वास्थ्य की परिभाषाएं गलत हैं। क्योंकि मीरा जैसी मस्त और आनंदित है.. .स्वास्थ्य का लक्षण ही मस्ती और आनंद होना चाहिए। साधारणजिसको मनोवैज्ञानिक कहते हैं नार्मलवह तो बड़ा अशांतबेचैनपरेशानदुखी दिखाई पड़ता है। यह कोई स्वास्थ्य की परिभाषा हुईये चिंताग्रस्त लोगदुखी लोगपरेशान लोगजिनके जीवन में कभी कोई फूल नहीं खिलाकोई सरगम नहीं फूटाकोई रसधार नहीं बही—ये स्वस्थ लोग हैंअगर यही स्वस्थ लोग हैं तो समझदार लोग तो मीरा का पागलपन चुनेंगे। वह चुनने योग्य है। पागलपन सहीनाम से क्या फर्क पड़ता हैगुलाब को तुम क्या नाम देते होइससे क्या फर्क पड़ता हैगुलाब तो गुलाब है। गुलाब तो गुलाब ही रहेगातुम गेंदा कहो,इससे क्या फर्क पड़ता है?
तुम महावीर को पागल कहोइससे क्या फर्क पड़ता हैया परमहंस कहोइससे क्या फर्क पड़ता हैमहावीर महावीर हैं।
यह तुम खयाल में लेना। घबड़ा मत जाना।
मेरे पास अगर तुम होतो निश्चित ही किसी शराब के पिलाने का आयोजन चल रहा है। यह मधुशाला है। इसे मंदिर कहने से बेहंतर मधुशाला ही कहना उचित है। यहां मैं चाहता हूं कि तुम डोलो नाचो! यहां तुम किसी गहरी मस्ती में उतरो! नया आयाम खुले!
दूर दिल से सब कदूरत हो गई है
जीस्त कितनी खूबसूरत हो गई है!
थोड़ा पीओ मुझे!
दूर दिल से सब कदूरत हो गई है
सब चिंताफिक्रबेचैनीअशांतिसब दूर हो जाएगी!
जीस्त कितनी खूबसूरत हो गई है!
और जिंदगी बड़ी खूबसूरत हो जाएगी। एक—एक फूल में हजार—हजार फूल खिलते दिखाई पड़ेंगे। इस कदर सतही है दुनिया की मसर्रत
दिल को फिर गम की जरूरत हो गई है।
और जब तुम जिंदगी के असली आनंद को जानोगे तो तुम चकित हो जाओगे। तुम पाओगे इस दुनिया के सुख से तो परमात्मा कोपरमात्मा के विरह मेंपरमात्मा के बिछोह में पैदा होने वाला दुख बेहतर है। इस दुनिया के सुखों से तो परमात्मा के बिछोह में रोना बेहतर है। इस दुनिया की मुस्कूराहटों से तो परमात्मा के लिए बहे आंसू बेहतर हैं।
इस कदर सतही है दुनिया की मसर्रत
दिल को फिर गम की जरूरत हो गई है।
यूं बसी है मुझमें तेरी याद साजन
मेरे मन—मदिर की मूरत हो गई है।
तेरी याद ने दिल को चमका दिया,
तेरे प्यार से यह सभा सज गई है।
जबाँ पर न आया कोई और नाम,
तेरा नाम ही रात—दिन भज गई है।
मेरे दिल में शहनाई—सी बज गई है।
इस शहनाई को बजने दो। इस इकतारे को बजने दो। इस तानपूरे को बजने दो। उठने दो तबले पर धुन। नाचोगाओ,गुनगुनाओ!
मेरी दृष्टि मेंधर्म वही है जो नाचता हुआ है। और दुनिया को एक नाचते हुए परमात्मा की जरूरत है। उदास परमात्मा काम नहीं आया। उदास परमात्मा सच्चा सिद्ध नहीं हुआ। क्योंकि आदमी वैसे ही उदास थाऔर उदास परमात्मा को ले कर बैठ गया। उदास परमात्मा तो लगता है उदास आदमी की ईजाद हैअसली परमात्मा नहीं। नाचताहंसता परमात्मा चाहिए! और जो धर्म हंसी न दे और जो धर्म खुशी न दे और जो धर्म तुम्हारे जीवन को मुस्कुराहटों से न भर देउत्सव से न भर देउत्साह से न भर दे—वह धर्मधर्म नहीं हैआत्महत्या है। उससे राजी मत होना। वह धर्म बूढ़ों का धर्म है या मुर्दों का धर्म है—जिनके जीवन की धारा बह गई है और सब सूख गया है। धर्म तो जवान चाहिए! धर्म तो युवा चाहिए! धर्म तो छोटे बच्चों जैसा पुलकताफुदकतानाचताआश्चर्य — भरा चाहिए! तो मैं यहां तुम्हें उदास और लंबे चेहरे सिखाने को नहीं हूं। और मैं नहीं चाहता कि तुम यहां बड़े गंभीर हो कर जीवन को लेने लगो। गंभीरता ही तो तुम्हारी छाती पर पत्थर हो गई है। गंभीरता रोग है। हटाओ गंभीरता के पत्थर को।
वह पत्थर सरक रहा है और तानपूरा बजने को हैऔर तुम कहते हो थामो! तुम कहते होथामो मुझे! कहो कि धक्का दो! कहो कि ऐसा धक्का दो कि मैं तो मिट ही जाऊंतानपूरा ही बजता रहे।

चौथा प्रश्न :

जिंदगी देने वालेसुन!
तेरी दुनिया से जी भर गया
मेरा जीना यहां मुश्किल हो गया।
रात कटती नहींदिन गुजरता नहीं,
जख्म ऐसा दिया जो भरता नहीं।
आंख वीरान हैदिल परेशान है,
गम का सामान है
जिंदगी देने वाले सुन!
तेरी दुनिया से जी भर गया।

गर जी सचमुच भर गया हैअगर सच में ही दुनिया से जी भर गया है तो उसका परिणाम उदासी नहीं है। उसका परिणाम निराशा भी नहीं है। उसका परिणाम तो एक अपूर्व उत्कुल्लता का जन्म है। जिसका जीवन से जी भर गया—अर्थ हुआ कि उसने जान लिया कि जीवन व्यर्थ है। अब कैसी निराशानिराशा के लिए तो आशा चाहिए। इसे समझने की कोशिश करो।
जब तक तुम्हारे जीवन में आशा है कि कुछ मिलेगा जिंदगी सेकुछ मिलेगा—तब तक जिंदगी तुम्हें निराश करेगी,क्योंकि मिलने वाला कुछ भी नहीं है। जिस दिन तुम्हारी आशा छूट गईउसी दिन निराशा भी छूट गई। लोग सोचते हैं : जब आशा छूट जाएगी तो हम बिलकुल निराश हो जाएंगे। आशा छूट गईफिर तो निराश होने का उपाय ही नहीं। क्योंकि आशा,निराशा साथ ही विदा हो जाते हैं। आशा की छाया है निराशा। जितनी तुम आशा करोगे उतनी निराशा पलेगी। उतने ही तुम हारोगे। जीतना चाहा तो ही हार सकते हो।
लाओत्सु कहता है. मुझे कोई हरा नहीं सकता क्योंकि मैं जीतना चाहता ही नहीं। कैसे हराओगे उस आदमी को जो जीतना चाहता ही नहीं। लाओत्सु कहता है मैं हारा ही हुआ हूं मुझे तुम हराओगे कैसे?
जिस आदमी को जीतने की आकांक्षा हैवह हारेगा—और जितनी ज्यादा आकांक्षा हैउतना ज्यादा हारेगा। जो आदमी धनी होना चाहता है वह निर्धन रहेगा—और जितना ज्यादा धनी होना चाहता है उतना निर्धन रहेगा। क्योंकि उसकी धन की अपेक्षा कभी भी भर नहीं सकती। जितना मिलेगा वह छोटा मालूम पड़ेगाओछा मालूम पड़ेगा। उसकी आकांक्षा का पात्र तो बड़ा है। उस पात्र में सभी जो मिलेगाखो जाएगा।
इस सूत्र को खयाल में लेना : तुम्हारी आशा निराशा की जन्मदात्री है। तुम्हारी आकांक्षा तुम्हारी विफलता का सूत्र— आधार है। तुम्हारी मांग तुम्हारे जीवन का विषाद है।
अगर सच में ही जीवन से जी भर गया..। लगता नहीं।
'जिंदगी देने वाले सुन
तेरी दुनिया से जी भर गया।'
अभी भरा नहीं। थक गए होओगे। आशाएं पूरी नहीं हुईंलेकिन आशाएं समाप्त नहीं हो गई हैं। जिसको तुम जीवन से जी भर जाना कहते होवह विषाद की अवस्था है। तुम जो चाहते थे वह नहीं हुआइसलिए ऊब गए हो। लेकिन अगर अभी परमात्मा कहे कि हो सकता हैतुम फिर दौड़ पड़ोगे।
अगर कोई तुम्हें फिर से कह दे कि दौड़ जाओअभी मिल जाएगाबस पास ही है—तुम फिर चल पडोगेफिर आशा का दीया जलने लगेगा।
यह तुम्हारी हार हैसमझ नहीं। यह तुम्हारी पराजय हैलेकिन बोध नहीं। और पराजय को बोध मत समझ लेना। पराजित आदमी बैठ जाता है थक करलेकिन गहरे में तो अभी भी सोचता रहता है : मिल जाता शायदकुछ और उपाय कर लेता! शायद कोई और ढंग होगा खोजने का! मैंने शायद गलत ढंग से खोजाठीक न खोजा। या मैंने पूरी ताकत न लगाई खोजने में!
तुम कितनी ही ताकत लगाओसंसार में हार सुनिश्चित है। संसार में जीत होती नहीं।
मैंने सुना हैएक महिला एक दुकान पर बच्चों के खिलौने खरीद रही है। एक खिलौने को वह जमाने की कोशिश कर रही हैजो टुकड़े —टुकड़े में है और जमाया जाता है। उसने बहुत कोशिश कीउसके पति ने भी बहुत कोशिश कीलेकिन वह जमता ही नहीं। आखिर उसने दुकानदार से पूछा कि सुनोपांच साल के बच्चे के लिए हम यह खिलौने खरीद रहे हैंन मैं इसको जमा पाती हूं न मेरे पति जमा पाते हैं। मेरे पति गणित के प्रोफेसर हैं। अब और कौन इसको जमा पाएगामेरा पांच साल का बच्चा इसको कैसे जमाएगा?
उस दुकानदार ने कहासुनेंपरेशान न हों। यह खिलौना जमाने के लिए बनाया ही नहीं गया। यह तो बच्चे के लिए एक शिक्षण है कि दुनिया भी ऐसी ही हैकितना ही जमाओयह जमती नहीं। यह तो बच्चा अभी से सीख ले जीवन का एक सत्य.। इसको जमाने की कोशिश करेगा बच्चाहजार कोशिश करेगामगर यह जमाने के लिए बनाया ही नहीं गयायह जम सकता ही नहीं। इसमें तुम चूकते ही जाओगे। इसमें हार निश्चित है।
संसार एक प्रशिक्षण है। यह जमने को है नहीं। यह कभी जमा नहीं। यह सिकंदर से नहीं जमा। यह नेपोलियन से नहीं जमा। यह तुमसे भी जमने वाला नहीं है। यह किसी से कभी नहीं जमा। अगर यह जम ही जाता तो बुद्धमहावीर छोड़ कर न हट जातेउन्होंने जमा लिया होता। बुद्ध—महावीरों से नहीं जमातुमसे नहीं जमेगा। यह जमने को है ही नहीं। यह बनाया ही इस ढंग से गया है कि इसमें हार सुनिश्चित हैविषाद निश्चित है।
यह जागने को बनाया गया है कि तुम देख—देख करहार—हार कर जागो। एक दिनजिस दिन तुम जाग जाओगेतुम्हें यह समझ आ जाएगी कि यह जमता ही नहीं—नहीं कि मेरे उपाय में कोई कमी हैनहीं कि मैंने मेहनत कम कीनहीं कि मैं बुद्धिमान पूरा न थानहीं कि मैं थोड़ा कम दौड़ाअगर थोड़ा और दौड़ता तो पहुंच जाता। जिस दिन तुम समझोगे यह जमने को बना ही नहींउस दिन विषाद मिट जाएगा। उस दिन सब भीतर की पराजयहारसब खो जाएगी। उस दिन तुम खिलखिला कर हसोगे। तुम कहोगेयह भी खूब मजाक रही!
इस मजाक को जान कर ही हिंदुओं ने जगत को लीला कहा। खूब खेल रहा! इस संसार से तुम जब तक अपेक्षा रखे हो,तब तक बेचैनी है।
ऐ दिले—मर्ग— आशना खत का जवाब सुन लिया?
और तू बेकरार हो! और तू इंतजार कर!
बैठे हैंबड़ी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि प्रेयसी का पत्र आता होगा।
ऐ दिले —मर्ग— आशना!
ऐ प्रेयसी पर मिटे हुए दिल।
ऐ दिले—मर्ग— आशनां खत का जवाब सुन लिया?
और तू बेकरार हो! और तू इंतजार कर!
अब जागोबहुत हो चुका इंतजार! देखो, —यहां कुछ मिलने को है नहीं। खेल हैखेल की तरह खेल लो। इसमें भटक मत जाओ। इसको अति गंभीरता से मत लो।
और तुम तो ऐसे पागल हो कि फिल्म देखने जाते होउसी को गंभीरता से ले लेते हो। देखाफिल्म में किसी की हत्या हो जाती हैअनेक आहें निकल जाती हैं! पागल हो गए होकुछ तो होश रखो! लोगों के रूमाल अगर तुम फिल्म के बाद पकड़ कर एक —एक के देखो तो गीले पाओगे। आंसू बह जाते हैंपोंछ लेते हैं अपने आंसू जल्दी सेरूमाल छिपा लेते हैं। अच्छा है वह तो अंधेरा रहता है सिनेमागृह मेंतो कोई देख नहीं पाता। पत्नी भी बगल में रो रही हैपति भी रो रहे हैं। दोनों पोंछ कर अपना...। मगर दोनों को यह समझ में नहीं आ रहा कि पर्दे पर कुछ भी नहीं है। धूप—छांव! लेकिन वह भी प्रभावित कर जाती है। उससे भी तुम बड़े आंदोलित हो जाते हो। प्रतीक प्रभावित कर जाते हैं। शब्द प्रभावित कर जाते हैं।
तो स्वाभाविक है कि यह जीवन जो चारों तरफ फैला हैइतना विराट मंचइसमें अगर तुम भटक जाओ तो कुछ आश्चर्य नहीं! तुम होश में नहीं होतुम मूर्च्छित हो।
'जिंदगी देने वाले सुन
तेरी दुनिया से जी भर गया
मेरा जीना यहां मुश्किल हो गया। '
मुश्किलइसका मतलब है कि अभी भी अपेक्षा बनी हैनहीं तो क्या मुश्किल हैमुश्किल का मतलब है. अभी भी तुम चाहते हो कुछ सुविधा हो जातीकुछ सफलता मिल जातीकुछ तो राहंत दे देते। एकदम हार ही हार तो मत दिलाए चले जाओ। कुछ बहाना तोकुछ निमित्त तो रहे जीने का। 'रात कटती नहींदिन गुजरता नहीं
जख्म ऐसा दियाजो भरता नहीं। '
फिर से गौर से देखो। क्योंकि जानने वालों ने तो कहा कि जगत माया हैइससे जख्म तो हो ही नहीं सकता। यह तो ऐसा ही है—अष्टावक्र बार—बार कहते हैं—जैसे रज्जू में सर्प। जैसे कोई आदमी अंधेरे में देख कर रस्सी और भाग खड़ा हो कि सांप हैभागने में पसीना—पसीना हो जाएछाती धड़कने लगेहृदय का दौरा पड़ने लगे—और कोई दीया ले आए और कहे कि पागल,जरा देख भी तोवहां न कुछ भागने को हैन कुछ भयभीत होने को है! रस्सी पड़ी है।
मेरे गांव में एक कबीरपंथी साधु थे। वे यह रज्जू में सर्प का उदाहरण सदा देते। छोटा—सा थातब से उन्हें सुनता था। जब भी उनको सुनने जाता तो यह उदाहरण तो रहता ही। यह बड़ा प्राचीनभारत का उदाहरण है। आखिर एक दफा मुझे सूझा कि यह आदमी इतना कहता है कि संसार तो रज्जू में सर्पवतजरा इसकी परीक्षा भी कर ली जाए।
तो वे रोज मेरे घर के सामने से रात को निकलते थे। उनका मकान मेरे घर के पीछेनाले को पार करके थातो एक रस्सी में एक पतला धागा बांध कर मैं अपने घर में बैठ गया। रस्सी को दूसरी तरफ सड़क के किनारे नाली में डाल दिया। जब वे निकले अपना डंडा इत्यादि लिए हुएतो मैंने धीरे से वह धागा खींचना शुरू किया। मैं दूसरी तरफ बैठा हूंइसलिए उस।
और जब रस्सी उन्होंने देखी सरकती हुईतो वे ऐसे भागेऐसी चीख—पुकार मचा दी कि मैं एक खाट के पीछे छिपा था,उनकी चीख—पुकार में खाट गिर गईमैं पकड़ा गया। बहुत डाट पड़ी कि यह यह बात ठीक नहीं हैएक बूढ़े आदमी के साथ ऐसा मजाक करना! पर मैंने कहायह मजाक उन्होंने सुझाया है। मैं थक गया सुनते—सुनते—रज्यू में सर्पवतरज्जू में सर्पवत! तो मैंने सोचा कि कम से कम ये तो न घबड़ाकेये तो पहचान लेंगे कि रस्सी है। ये भी चूक गए तो औरों का क्या कहना?
यह संसार प्रतीत होताभासमान होता। और भासमान ऐसा होता है कि लगता है सच है। लेकिन तुम एक दिन नहीं थे और एक दिन फिर नहीं हो जाओगे। यह जो बीच का थोड़ी देर का खेल हैयह एक दिन सपने जैसा विलीन जाएगा। पीछे लौट कर देखोतुम तीस साल जी लिएचालीस साल जी लिएपचास साल जी लिए—ये जो पचास साल तुम जीयेआज क्या तुम पक्का निर्णय कर सकते हो कि सपने में देखे थे पचास साल या असली जीये थेअब तो सिर्फ स्मृति रह गई। स्मृति तो सपने की भी रह जाती है। आज तुम्हारे पास क्या उपाय है यह जांच करने का कि जो पचास साल मैंने जीएये वस्तुत: मैं जीया था। वस्तुत: या एक सपने में देखी कथा हैबडी मुश्किल में पड़ जाओगे। बड़ा चित्त बेचैन हो जाएगा अगर सोचने बैठोगे। अगर इस पर ध्यान करोगे तो बड़े बेचैनपसीने —पसीने हो जाओगे। क्योंकि तुम पकड़ न पाओगे सूत्र कि यह कैसे सिद्ध करें कि जो मैंनेसोचता हूं कि देखावह सच में देखा थाया केवल एक मृग—मरीचिका थी?
मरते वक्त जब मौत तुम्हारे द्वार पर खड़ी हो जाएगी और मौत का अंधकार तुम्हें घेरने लगेगाक्या तुम्हें याद न आएगी कि जो मैं साठसत्तरअस्सी साल जीवन जीयावह थातुम कैसे तय करोगे कि वह थामृत्यु सब पोंछ जाएगी। कितने लोग इस जमीन पर रहेकितने लोग इस जमीन पर गुजर गएआए और गए—उनका आज कोई भी तो पता—ठिकाना नहीं है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि तुम जिस जगह बैठे हो वहा कम से कम दस आदमियों की लाशें गड़ी हैं। इतने लोग इस जमीन पर मर चुके हैं। इंच—इंच जमीन कब्र है। तुम यह मत सोचना कि कब गांव के बाहर है। जहां गांव है वहा कभी कब थीकभी कब्रिस्तान थामरघट था। जहां अब मरघट हैवहा कभी गांव था। सब चीजें बदलती रही हैं। कितने करोड़ों वर्षों में! जमीन का एक—एक इंच आदमी की लाशों से पटा है। हर इंच पर दस लाशें पटी हैं। तुम जहां बैठे होवहा दस मुर्दे नीचे गड़े हैं। तुम भी धीरे से ग्यारहवें हो जाओगेउन्हीं में सरक जाओगे।
फिर इस सब दौड़— धूप काइस आकांक्षा— अभिलाषा काइस महत्वाकांक्षा का क्या अर्थ हैक्या सार हैइस सत्य को देख कर जो जागताफिर वह ऐसा नहीं कहता कि 'रात कटती नहींदिन गुजरता नहीं। फिर वह ऐसा नहीं कहता कि 'जख्म ऐसा दिया जो भरता नहीं। आंख वीरान हैदिल परेशान हैगम का सामान है। 'यह तो सब आशा— अपेक्षा की ही छायाएं हैं। इनसे कोई धार्मिक नहीं होता। और इनके कारण जो आदमी धार्मिक हो जाता हैवह धर्म के नाम पर संसार की ही मांग जारी रखता है। वह मंदिर में भी जाएगा तो वही मांगेगा जो संसार में नहीं मिला है! उसका स्वर्ग उन्हीं चीजों की पूर्ति होगी जो संसार में नहीं मिल पायी हैंउनकी आकांक्षा वहां पूरी कर लेगा। इसलिए तो स्वर्ग में हमने कल्पवृक्ष लगा रखे हैंउनके नीचे बैठ गए,सब पूरा हो जाता है।
मैंने सुनाएक आदमी भूले— भटके कल्पवृक्ष के नीचे पहुंच गया। उसे पता नहीं था कि यह कल्पवृक्ष है। वह उसके नीचे बैठाबड़ा थका था। उसने कहा, 'बड़ा थका—मादा हूं। ऐसे में कहीं कोई भोजन दे देता। मगर कहीं कोई दिखाई पड़ता ही नहीं। 'ऐसा उसका सोचना ही था कि अचानक भोजन के थाल प्रगट हुए। वह इतना भूखा था कि उसने ध्यान भी न दिया कि कहां से आ रहे हैंक्या हो रहा हैभूखा आदमीमर रहा था। उसने भोजन कर लिया। भोजन करके उसने सोचाबड़ी अजीब बात है। मगर दुनिया हैयहां सब होता हैहर चीज होती है। इस वक्त तो अब चिंता करने का समय भी नहींपेट खूब भर गया है। उसने डट कर खा लिया है। जरूरत से ज्यादा खा लियातो नींद आ रही है। तो वह सोचने लगा कि एक बिस्तर होता तो मजे से सो जाते। सोचना था कि एक बिस्तर लग गया। जरा सा शक तो उठा मगर उसने सोचा, ' अभी कोई समय है! अभी तो सो लोदेखेंगे। अभी तो बहुत जिंदगी पड़ी हैजल्दी क्या हैसोच लेंगे। सो भी गया। जब उठा सो करअब जरा निश्चित था। अब उसने देखा चारों तरफ कि मामला हो क्या रहा है। यहां कोई भूत—प्रेत तो नहीं हैं! भूत—प्रेत खड़े हो गएक्योंकि वह तो कल्पवृक्ष था। उसने कहामारे गए! तो मारे गए! कि भूत—प्रेत झपटे उन परवे मारे गए!
कल्पवृक्ष की कल्पना कर रखी है स्वर्ग में। जो—जो यहां नहीं हैवहा सिर्फ कामना से मिलेगा। तुमने देखाआदमी की कामना कैसी है! यहां तो श्रम करना पड़ता हैकामना से ही नहीं मिलता। श्रम करोतब भी जरूरी नहीं कि मिले। कहां मिलता?श्रम करके भी कहां मिलतातो इससे ठीक विपरीत अवस्था स्वर्ग में है। वहां तुमने सोचातुमने सोचा नहीं कि मिला नहीं। तत्‍क्षण! उसी क्षण! समय का जरा भी अंतराल नहीं होता। लेकिन ध्यान रखनातुम वहा भी सुखी न हो सकोगे।
देखाइस आदमी की क्या हालत हुई! जहां सब मिल जाएगा वहां भी तुम सुखी न हो सकोगे। क्योंकि सुखी तुम तब तक हो ही नहीं सकते जब तक तुम सुख में भरोसा करते हो।
सुख से जागो! सुख से जागने से ही दुख विसर्जित हो जाता है।
बुद्ध के पास एक आदमी आया—उनका भिक्षु थाउनका संन्यासी था। उसने बहुत दिन ध्यान कियाबहुत शांत भी हो गया। एक दिन ध्यान करते —करते उसे खयाल आया कि बुद्ध ने असली बातों  के तो जवाब ही नहीं दिए। वह आया उनके पास भागा हुआ। उसने कहा कि सुनिएन तो आपने कभी बताया है कि ईश्वर है या नहींन आपने कभी यह बताया है कि स्वर्ग है या नहींन आपने कभी यह बताया है कि आत्मा मर कर कहा जाती हैपुनर्जन्म होता कि नहींइन बातों  के उत्तर दें।
बुद्ध ने कहासुनोअगर मैं इन बातों  के उत्तर दूं तो तुम्हारे तक उत्तर पहुंचने के पहले मैं मर जाऊंगा और तुम्हारे समझने के पहले तुम मर जाओगे। इन बातों  के उत्तर व्यर्थ हैं। ये तो ऐसे हैं जैसे किसी आदमी को तीर लग गया हो और वह मरने के करीब पड़ा हो और मैं उससे कहूं कि ला मैं तेरा तीर खींच लूंऔर वह कहेरुकोपहले मेरी बातों  के उत्तर दो. 'यह तीर किस दिशा से आयायह किसने चलायाचलाने वाला मित्र था कि दुश्मन थाभूल से लगा कि जान कर मारा गया? तीर जहर—बुझा है या साधारण हैपहले इन बातों  के उत्तर दो!तो मैं उस आदमी को कहूंगाफिर तू मरेगा। मुझे पहले तीर खींच लेने देफिर तू फिक्र करना इन प्रश्नों की। अभी तो बच जा।
तो बुद्ध ने उस भिक्षु को कहा कि मैंने तुम्हें बताया है कि जीवन में दुख है और मैंने तुम्हें बताया है कि जीवन के दुख से मुक्त होने का मार्ग है। मेरी देशना पूरी हो गई। इससे ज्यादा मुझे तुम्हें कुछ नहीं बताना। तुम्हारा दुख मिट जाएफिर तुम जानोखोज लेना।
यह बड़े सोचने जैसी बात है। बुद्ध ने ऐसा क्यों कहाक्या बुद्ध ईश्वर के संबंध में उत्तर नहीं देना चाहते थेबुद्ध जानते हैं कि तुम ईश्वर को भी दुख के कारण ही खोज रहे हो। जिस दिन दुख मिट जाएगातुम ईश्वर इत्यादि की बकवास बंद कर दोगे। ईश्वर भी तुम्हारी दुख की ही आकांक्षा है कि किसी तरह दुख मिट जाए। संसार में नहीं मिटा तो स्वर्ग में मिट जाए। यहां तो मांग—मांग कर हार गयेयहां तो न्याय मिलता नहींपरमात्मा के घर तो मिलेगा!
लोग कहते हैंवहां देर है अंधेर नहीं। कहते हैंचाहे देर कितनी हो जायेजन्म के बाद मिलेजन्मों के बाद मिलेमरने के बादलेकिन न्याय तो मिलेगा। अंधेर नहीं है।
लेकिन तुम्हारी आकांक्षाएं अपनी जगह खड़ी हैं। तुम कहते होकभी तो भरी जायेंगी! देर हैअंधेर नहीं।
बुद्ध ने कहामैंने दो ही बातें सिखाईं : दुख हैइसके प्रति जागोऔर दुख से पार होने का उपाय है—साक्षी हो जाओ! बस इससे ज्यादा मुझे कुछ कहना नहींमेरी देशना पूरी हो गई। तुम ये दो काम कर लोबाकी तुम खोज लेना।
और बुद्ध ने बिलकुल ठीक कहा। जिस आदमी का दुख मिट गया वह बिलकुल चिंता नहीं करता कि स्वर्ग है या नहीं। स्वर्ग तो हो ही गयाजिस आदमी का दुख मिट गया। और जिस आदमी का दुख मिट गया वह नहीं पूछता कि ईश्वर है या नहींजिस आदमी का दुख मिट गयावह स्वयं ईश्वर हो गया। अब और बचा क्या?
जिसने पूछा है प्रश्नउसे बहुत कुछ समझने की जरूरत है। जिंदगी को आकांक्षाओं के पर्दे से मत देखो। जिंदगी को अपेक्षाओं के ढंग से मत देखो। जैसी जिंदगी है उसे देखो और बीच में अपनी आकांक्षा को मत लाओ। और तब तुम अचानक पाओगे. सांप खो गयारस्सी पड़ी रह गई। फिर उससे भय भी पैदा नहीं होताजख्म भी नहीं लगतेहार भी नहीं होतीपराजय भी नहीं होतीविषाद भी नहीं होता। और उससे तुम्हारे भीतर उस दीए का जलना शुरू हो जाएगाजिसको अष्टावक्र साक्षी— भाव कह रहे हैं।
दुख को देखो। सुख को चाहो मतदुख को देखो।
दो ही तरह के लोग हैं दुनिया मेंसुख को चाहने वाले लोगऔर दुख को देखने वाले लोग। जो सुख को चाहता है वह नये—नये दुख पैदा करता जाता हैक्योंकि हर सुख की आकांक्षा में नये दुख का जन्म है। और जो दुख को देखता हैदुख विसर्जित हो जाता है। और दुख के विसर्जन में सुख का आविर्भाव है।
मैं फिर से दोहरा दूं : दो ही तरह के लोग हैंऔर तुम्हारी मर्जी जिस तरह के लोग तुम्हें बनना हो बन जाना।
सुख को मांगोदुख बढ़ता जाएगा। क्योंकि सुख मिलता ही नहींमांगने से मिलता ही नहीं;
इसलिए दुख बढ़ता जाता है। फिर जितना दुख बढ़ता हैउतना ही तुम सुख की मांग करते हो—उतना ही ज्यादा दुख बढ़ता है। पड़े एक दुष्टचक्र मेंजिसके बाहर आना मुश्किल हो जाएगा। इसी को तो ज्ञानियों ने संसार—चक्र कहा है— भवसागर! बड़ा सागर बनता जाता हैक्योंकि जैसे—जैसे तुम्हारा दुख बढ़ता हैतुम सोचते हो : और सुख की खोज करें। और सुख की खोज करते हो,और दुख बढ़ता है। अब इसका कहीं पारावार नहींइसका कोई अंत नहीं। भवसागर निर्मित हुआ।
दूसरे तरह के लोग हैंजो दुख को देखते हैं। दुख हैठीक है। इससे विपरीत की आकांक्षा करने से क्या सार हैइसे देख लें : यह कहां हैक्या हैकैसा हैदुख तथ्य है तो इसके प्रति जाग जाएं। तुम इसका छोटा—मोटा प्रयोग करके देखो। जब भी तुम उदास होदुखी होबैठ जाओ शांत अपने कमरे में। रहो दुखी! वस्तुत: जितने दुखी हो सको उतने दुखी हो जाओ। अतिशयोक्ति करो। तिब्बत में एक प्रयोग है. अतिशयोक्ति। ध्यान का गहरा प्रयोग है। वे कहते हैंजिस चीज से तुम्हें छुटकारा पाना होउसकी अतिशयोक्ति करोताकि वह पूरे रूप में प्रगट हो जाये, .ऐसा मंद—मंद न हो। तुम दुखी हो रहे होबंद कर लो द्वार—दरवाजेबैठ जाओ बीच कमरे के और हो जाओ दुखीजितने होना है। तडुफोआह भरोचीखोलोटना—पोटना हो जमीन परलोटो—पोटोपीटना हो अपने कोपीटो—लेकिन दुख की अतिशयोक्ति करो। दुख को उसकी पूरी गरिमा में उठा दोदुख की आग जला दो। और जब दुख की आग भभक कर जलने लगेधू—धू करके जलने लगेतब बीच में खड़े हो कर देखने लगो : क्या हैकैसा है दुख 2: इस दुख के साक्षी हो जाओ।
तुम चकित हो जाओगेतुम हैरान हो जाओगे कि तुम्हारे साक्षी बनते ही दुख दूर होने लगातुम्हारे और दुख के बीच फासला होने लगातुम साक्षी बनने लगेफासला बड़ा होने लगा। तुम और भी साक्षी बनने लगेफासला और बड़ा होने लगा। और जैसे—जैसे फासला बड़ा होने लगासुख की धुन आने लगीसुख की सुवास आने लगी। क्योंकि दुख का दूर होनायानी सुख का पास आना। धीरे— धीरे तुम पाओगेदुख इतने दूर पहुंच गया कि अब समझ में भी नहीं आता कि है या नहींदूर तारों पर पहुंच गया और सुख की वीणा भीतर बजने लगी। फिर एक ऐसी घड़ी आती हैजब दुख चला ही गया। जब दुख चला जाता है,तो जो शेष रह जाता हैवही सुख है।
सुख तुम्हारा स्वभाव है। सुखदुख के विपरीत नहीं है। तुम्हें सुख पाने के लिए दुख से लड़ना नहीं है। दुख का अभाव है सुख। दुख की अनुपस्थिति है सुख। दुख को तुम देख लो भर आंख—और दुख गया। यही करो तुम क्रोध के साथ। यही करो तुम लोभ के साथ। यही करो तुम चिंता के साथ। और सौ में से नब्बे मौकों पर तो शरीर के दुख के साथ भी तुम यही कर सकते हो।
अभी पश्चिम में बड़े मनोवैज्ञानिक प्रयोग चल रहे हैंजिन्होंने इस बात की सच्चाई की गवाही दी है। सौ में निन्यानबे मौकों पर सिरदर्द केवल साक्षी— भाव से देखने से चला जाता है —निन्यानबे मौके पर। एक ही मौका है जब कि शायद न जाए,क्योंकि उसका कारण शारीरिक होअन्यथा उसके कारण मानसिक होते हैं।
तुम्हें अब जब दुबारा सिरदर्द हो तो जल्दी से सेरिडॉन मत ले लेनाएस्थो मत ले लेना। अब की बार जब दुख हो तो ध्यान का प्रयोग करनातुम चकित होओगे। यह तो प्रयोगात्मक है। यह तो अब वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैधार्मिक रूप से तो सदियों से सिद्ध रहा हैअब वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है। जब तुम्हारे सिर में दर्द होतुम बैठ जाना। उस दर्द को खोजने की कोशिश करना कहां है ठीक— ठीकताकि तुम अंगुली रख सकोकहां है। पूरे सिर में मालूम होता है तो खोजने की कोशिश करना : कहां है ठीक—ठीकतुम चकित होओगे : जैसे तुम खोजते होदर्द सिकुड़ने लगता हैउसकी जगह छोटी होने लगती है। पहले लगता था पूरे सिर में हैअब लगता है एक थोड़ी—सी जगह में है। और खोजते जानाऔर खोजते जानाऔर खोजते जानादेखते जाना भीतर—और जरा भी चेष्टा नहीं करना कि दुख न होदर्द न होहै तो हैस्वीकार कर लेना। और तुम अचानक पाओगेएक ऐसी घड़ी आएगी कि दर्द ऐसा रह जाएगा जैसे कि कोई सुई चुभो रहा है। इतने—सेछोटे—से बिंदु पर! और तब तुम हैरान होओगे कि कभी—कभी दर्द खो जाएगा। कभी—कभी लौट आएगा। कभी—कभी फिर खो जाएगा। कभी—कभी फिर लौट आएगा। और तब तुम्हें एक बात साफ हो जाएगी कि जब भी तुम्हारा साक्षी— भाव सधेगादर्द खो जाएगा। और जब भी साक्षी— भाव से तुम विचलित हो जाओगेदर्द वापिस लौट आएगा। और अगर साक्षी— भाव ठीक सध गया तो दर्द बिलकुल चला जाएगा।
इसे तुम जरा प्रयोग करके देखो। मानसिक दुख तो निश्चित रूप से चले जाते हैंशायद शारीरिक दुख न जाएं। अब किसी ने अगर सिर में पत्थर मार दिया हो तो उसके लिए मैं नहीं कह रहा हूं। इसलिए सौ में एक मौका छोड़ा है कि तुमने अपना सिर दीवाल से टकरा लिया होफिर दर्द हो रहा होतो वह दर्द शारीरिक है। उसका मन से कुछ लेना—देना नहीं। लेकिन अगर किसी ने सिर में पत्थर भी मार दिया हो तो भी अगर तुम साक्षी— भाव से देखोगे तो दर्द मिटेगा तो नहींलेकिन एक बात साफ हो जाएगी कि तुम दर्द नहीं हो। तुम दर्द से भिन्न हो। दर्द रहेगा। अगर मानसिक दर्द है तो मिट जाएगा। अगर शारीरिक दर्द है तो दर्द रहेगा। लेकिन दोनों हालत में तुम दर्द के पार हो जाओगे। मानसिक होगा तो दर्द गयाअगर शारीरिक होगा तो दर्द रहालेकिन अब मुझे दर्द हो रहा हैऐसी प्रतीति नहीं होगी। दर्द हो रहा हैजैसे किसी और के सिर में दर्द हो रहा हैजैसे किसी और के पैर में दर्द हो रहा हैजैसे किसी और को चोट लगी है। बड़े दूर हो जाएगा। तुम खड़े देख रहे हो। तुम द्रष्टासाक्षी—मात्र!
घबड़ाओ मत।
'जिंदगी देने वाले सुन!
तेरी दुनिया से जी भर गया।
मेरा जीना यहां मुश्किल हो गया। '
यह जिसने तुम्हें जिंदगी दी हैउसके कारण नहीं हुआ हैयह तुम्हारे कारण हुआ है। इसलिए घबड़ाओ मतक्योंकि अगर उसके कारण हुआ होतब तो तुम्हारे हाथ में कुछ भी नहीं। तुम्हारे कारण हुआ हैइसलिए तुम्हारे हाथ में सब कुछ है। तुम जागो तो यह मिट सकता है। और ये गीत गाने से कुछ भी न होगा—कुछ करना होगा! कुछ श्रम करना होगाताकि भीतर की निद्रा टूटे।
निद्रा टूट सकती है। यह जो अंधेरा दिखाई पड़ रहा हैयह सदा रहने वाला नहीं है। सुबह हो सकती है।
यह एक शब की तडूफ हैसहर तो होने दो
बहिश्त सर पे लिए रोजगार गुजरेगा।
फिजा के दिल से परअपशा है आरजू —ए—गुबार
जरूर इधर से कोई शहसवार गुजरेगा।
'नसीमजागोकमर को बांधो
उठाओ बिस्तर कि रात कम है।
रात तो गुजर ही जाएगी। तैयारी करो!
'नसीमजागोकमर को बांधो
उठाओ बिस्तर कि रात कम है।
साक्षी— भाव बिस्तर का बांध लेना हैकि अब तो सुबह होने के करीब है। और तुमने जिस दिन बांधा बिस्तरउसी दिन सुबह करीब आ जाती है। यह सुबह कुछ ऐसी है कि तुम्हारे बिस्तर बांधने पर निर्भर है। इधर तुमने बांधाइधर तुमने तैयारी कीतुम जाग कर खड़े हो गए—सुबह हो गई!
सुबह अर्थात तुम्हारा जाग जाना। रात अर्थात तुम्हारा सोया रहना।
रो—रो कर दर्द की बातें कर लेने से कुछ हल न होगा। यह तो तुम करते ही रहे हो। यह रोना तो काफी हो चुका है। यह तो जन्मों—जन्मों से तुम रो रहे हो और कह रहे हो कि कोई कर देदुनिया को बनाने वाला हो या न हो। तुम किससे प्रार्थना कर रहे होउसका तुम्हें कुछ पता भी नहीं है। हो न होहोबहरा होहोऔर तुम्हें दुख देने में मजा लेता होहोऔर तुम्हारा दुख उसे दुख जैसा दिखाई न पड़ता हो—तुम किससे प्रार्थना कर रहे होऔर वह है भीइसका कुछ पक्का नहीं है।
आदमी ने अपने भय में भगवान खड़े किए हैं और अपने दुख में मूइrातयां गढ़ ली हैंऔर अपनी पीड़ा में किसी का सहारा खोजने के लिए आकाश में आकार निर्मित कर लिए हैं। इनसे कुछ भी न होगा। अष्टावक्र या बुद्ध या कपिल तुमसे इस तरह की बातें करने को नहीं कहते।
वे तो कहते हैंजो हो सकता है वह एक बात है कि तुम्हारे भीतर चैतन्य हैइतना तो पक्का हैनहीं तो दुख का पता कैसे चलतादुख का जिसे पता चल रहा है उस चैतन्य को और निखारोसाफ—सुथरा करो! कूड़े—कर्कट से अलग करो। उसको प्रज्वलित करोजलाओ कि वह एक मशाल बन जाए। उसी मशाल में मुक्ति है।

 आखिरी सवाल—और आखिरी सवाल

 सवाल नहीं है :

एकटि नमस्कारे प्रभु,
एकटि नमस्कारे!
सकल देह लूटिए पडूक
तोमार ए संसारे
घन श्रावण—मेघेर मतो
रसेर भारे नम नत
एकटि नमस्कारे प्रभु,
एकटि नमस्कारे!
समस्त मन पडिया थाक,
तव भवन—द्वारे
नाना सरेर आकल धारा
मिलिए दिए आत्महारा
एकटि नमस्कारे प्रभु,
एकटि नमस्कारे!
समस्त गान समाप्त होक,
नीरव पारावारे
हंस येमन मानस—यात्री
तेमन सारा दिवस—रात्रि
एकटि नमस्कारे प्रभुएकटि नमस्कारे!
समस्त प्राण स्टे चलूक महामरण—पारे!
स्वामी आनंद सागरेर प्रणाम!
 नंद सागर ने निवेदन किया हैप्रश्न तो नहीं है। लेकिन सार्थक पंक्तियां हैं। उन्हें स्मरण रखना।
'सकल देह लूटिए पडूक,
तोमार ए संसारे!'
तेरे इस संसार में सब लुट गया! अब तो एक नमस्कार ही बचा है।
'एकटि नमस्कारे प्रभु,
एकटि नमस्कारे!
सकल देह लूटिए पडूक,
तोमार ए संसारे
घन श्रावण—मेघेर मतो'
और जैसे आषाढ़ में मेघ भर जाते हैं जल से।
'रसेर भारे नम्र नत'..
और रस से भरे हुए झुक जाते पृथ्वी पर और बरस जाते हैं।
'एकटि नमस्कारे प्रभु,
एकटि नमस्कारे!'
ऐसा मैं बरस जाऊं तुम्हारे चरणों में जैसे
रस से भरे हुए मेघ बरस जाते हैं।
'समस्त मन पडिया थाक
तब भवन द्वारे!'
और तेरे भवन के द्वार पर सारे मन को थका कर तोड़ डालूं मन से मुक्त हो जाऊं तेरे द्वार परबस इतनी ही प्रार्थना है।
'नाना सुरेर आकुल धारा
मिलिए दिए आत्महारा
एकटि नमस्कारे प्रभु
एकटि नमस्कारे!
समस्त गान समाप्त होक
नीरव पारावारे!'
ऐसा हो कि मेरे सब गीत अब खो जाएंकेवल नीरव पारावर बचे! शून्य का गीत शुरू हो स्वरहीन रवहीन गीत शुरू हो!
समस्त गान समाप्त होक
नीरव पारावारे!'
अब आखिरी गीत नीरव होबिना कहे होबिना शब्दों का हो! अब मौन ही आखिरी गीत हो। हंस येमन मानस—यात्री
तेमन सारा दिवस—रात्रि।
ये प्राण तो मानस—सरोवर के लिएमान—सरोवर के लिए उड़ रहे हैं। ये प्राण तो हंस जैसे हैं जो अपने घर के लिए तडूफ रहे हैं।
हंस येमन मानस—यात्री
तेमन सारा दिवस—रात्रि।
अहर्निश बस एक ही प्रार्थना है कि कैसे उस शून्य मेंकैसे उस महाविराट मेंकैसे उस मानसरोवर में इस हंस की वापिसी हो जाए! कैसे घर पुन: मिले!
एकटि नमस्कारे प्रभु
फीट नमस्कारे!
समस्त प्राण उड़े चलूक
महामरण—पारे। '
ऐसा कुछ हो कि सारे प्राण अब इस जन्म और मृत्यु को छोड़ करजन्म और मृत्यु के जो अतीत है उस तरफ उड़ चलें।
ऐसी बस एक नमस्कार शेष रह जाए! बसऐसी एक प्रार्थना शेष रह जाए और मेघों की भांति तुम्हारे प्राण झुक जाएं अनंत के चरणों में—तो  सब प्रसाद—रूप फलित हो जाता हैघट जाता है। तुम झुको कि सब हो जाता है। तुम अकड़े खड़े रहो कि वंचित रह जाते हो।
तुम्हारे किएतुम्हारी अस्मिता और अहंकार सेऔर तुम्हारे संकल्प सेदौड़— धूप ही होगी। तुम्हारे समर्पण सेतुम्हारे विसर्जन सेतुम्हारे डूब जाने से महाप्रसाद उतरेगा। तुम झुको।
'रसेर भारे नम्र नत
घन श्रावण—मेघेर मतो
एकटि नमस्कारे प्रभु
एकटि नमस्कारे!
समस्त मन पडिया थाक
समस्त गान समाप्त होक
समस्त प्राण उड़े चलूक
महामरण—पारे!'
जीवन का परम सत्य मृत्यु के पार है। जीवन का परम सत्य वहीं है जहां तुम मिटते हो। तुम्हारी मृत्यु ही समाधि है। और तुम्हारा न हो जाना ही प्रभु का होना है। जब तक तुम हो—प्रभु रुकाअटका। तुम दीवाल हो। तुम मिटे कि द्वार खुला! सीखो मिटना!
और मिटने के दो ही उपाय हैं या तो साक्षी बन जाओ—जो कि अष्टावक्रकपिलकृष्णमूर्तिबुद्ध इनका उपाय हैया प्रेम में डूब जाओ—जो कि मीराचैतन्यजीससमोहम्मदइनका मार्ग है। दोनों ही मार्ग ले जाते हैं—या तो बोधया भक्ति। मगर दोनों मार्ग का सार—सूत्र एक ही है। बोध में भी तुम मिट जाते होक्योंकि अहंकार साक्षी में बचता नहींऔर प्रेम में भी तुम मिट जाते होक्योंकि प्रेम में अहंकार के बचने की कोई संभावना नहीं। तो एक बात सार—निचोड़ की है. अहंकार न रहे तो परमात्मा प्रगट हो जाता है।

 हरि ओंम तत्सत्!

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