मंगलवार, 15 अगस्त 2017

अष्‍टावक्र: महागीता-भाग-2 - प्रवचन--05

दिनांक: 30 सितंबर, 1976;
      श्री रजनीश आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

आप आज मौजूद हैंतो भी मनुष्य नीचे और नीचे की ओर जा रहा हैजबकि बद्धों के आगमन पर मनुष्यता कोई शिखर छूने लगती है। हजारों आंखें आपकी ओर लगी हैं कि शायद आपके द्वारा फिर नवजागरण होगा और धर्म का जगत निर्मित होगा। कृपया बताएं कि यह विस्फोट कब और कैसे होगाक्योंकि बदलना तो दूरउलटे लोग आपका ही विरोध कर रहे हैं।


 हली बातमनुष्यता सदा ऐसी की ऐसी ही रही है। कुछ विरले मनुष्य बदलते हैंमनुष्यता जरा भी नहीं

 बदलती बाहर की स्थितियां बदलती हैंव्यवस्थाएं बदलती हैंभीतर मनुष्य वैसा का ही वैसा रहता है! तो पहले तो इस भ्रांति को छोड़ दो कि आज का मनुष्य पतित हो गया है।
सदा का मनुष्य ऐसा ही था। बुद्ध के समय में भी लोग ऐसे ही प्रश्न पूछते हैं बुद्ध सेकि आज का मनुष्य पतित हो गया हैआप कुछ करें। लाओत्सु से भी ऐसे ही प्रश्नकन्‍फ्यूशियस से भी ऐसे ही प्रश्न। पुराने से पुराना शास्त्र खोज लेंपुराने से पुराना शास्त्र यही रोना रोता है कि मनुष्य पतित हो गया है।
बेबिलोन में छह हजार वर्ष पुरानी एक ईंट मिली है जिस पर शिलालेख है। उस शिलालेख में यही लिखा है कि आज के मनुष्य को क्या हो गयापतित हो गया!
छह हजार साल पहले भी यही बात है। हर समय के आदमी ने ऐसा सोचा है कि आज का मनुष्य पतित हो गया है। इसके पीछे कुछ मनोवैज्ञानिक कारण हैं। अतीत के मनुष्यों का तो तुम्हें पता नहीं। उनके संबंध में तो तुम कुछ भी नहीं जानते। बुद्ध के संबंध में तो तुम कुछ जानते होलेकिन बुद्ध किन मनुष्यों के बीच जी रहे थेउनके संबंध में तुम कुछ भी नहीं जानते हो। बुद्ध के संबंध में तो शास्त्र हैंउनकी महिमा के गीत हैंउनकी महिमा के गीत को तुम उस समय की मनुष्यता की महिमा मत समझ लेना। अगर सच में ही बुद्ध के समय के लोग ऊंचे होते तो बुद्ध की कौन फिक्र करता? अंधेरे काले बादलों में ही बिजली चमकती है। बुद्ध इतने बड़े होकर दिखाई पड़ेयह छोटे मनुष्यों के कारण ही संभव था। अगर बुद्ध जैसे ही मनुष्य होते बड़ी संख्या में तो बुद्ध को कौन पूछताकौन खयाल करता?
सोचोकोहिनूर हीरा कीमती हैक्योंकि अकेला है। अगर गावगली—कूचेराह के किनारेनदी के तटों पर कोहिनूरों के ढेर लगे होते तो कोहिनूर को कौन पूछता?
राम की हम याद करते हैंक्योंकि जमाना राम जैसा नहीं था। कृष्ण की हम याद करते हैंक्योंकि जमाना कृष्ण जैसा नहीं था। जमाना तो रावण जैसा रहा होगा और जमाना तो कंस जैसा रहा होगा।
आदमी सदा से ऐसा ही है। लेकिन अतीत के संबंध में एक धारणा बन जाती है कि अतीत सुंदर थाक्योंकि अतीत के सुंदरतम लोगों की खबरें तुम तक आती हैंअतीत के सुंदरतम गीत गूंजते हुए सदियों में तुम्हारे पास आते हैं। बाजार की भीड़— भाड़छीना—झपटी तो भूल जाती हैसुंदरतम बचता हैफूल बचते हैंकाटे तो भूल जाते हैं।
और आजजो तुम्हारे निकट लोग हैं उनमें तुम्हें काटे दिखाई पड़ते हैंकांटे ही कांटे सब तरफ दिखाई पड़ते हैं। समसामयिक बुद्धपुरुष दिखाई भी नहीं पड़ताक्योंकि इतने कीटों की भीड़ में भरोसा भी करना मुश्किल है कि गुलाब का फूल खिल सकता है।
तो जब कोई बुद्धपुरुष मौजूद होता हैउस पर भरोसा नहीं आताक्योंकि बुद्धपुरुष तो एक होता है और अबुद्धपुरुष अरबों—खरबों होते हैं। भरोसा आए भी कैसेलेकिन जब समय बीत जाता है तो उस एक की तो याद गूंजती रहती है और उन अनेकों का विस्मरण हो जाता है। तब तुम्हारे सब मूल्यांकन अस्तव्यस्त हो जाते हैं।
आदमी सदा से ऐसा ही रहा है। न तो अतीत के समय का आदमी श्रेष्ठ थान तुम निकृष्ट हो। न अतीत के समय का आदमी निकृष्ट थान तुम श्रेष्ठ हो। आदमी आदमी जैसा हैचीजों में फर्क पड़ गए हैं। यह बात निश्चित है कि अतीत का आदमी फिएट कार की आकांक्षा नहीं करता थाक्योंकि फिएट कार नहीं थी। इससे तुम यह मत सोच लेना कि आज आदमी बड़ा पतित हो गया हैदेखो फिएट कार की आकांक्षा करता है। अतीत का आदमी एक शानदार घोड़े की आकांक्षा करता थाएक अच्छी बग्घी की आकांक्षा करता थारथ की आकांक्षा करता था। आकांक्षा वही है। बग्घी की जगह फिएट आ गईआकांक्षा में कोई फर्क नहीं पड़ा है।
अतीत का आदमी ऐसा ही लोभी थाऐसा ही कामी थाऐसा ही क्रोधी थानहीं तो बुद्धपुरुष पागल हैं जो समझाएं कि क्रोध मत करोवासना में मत पड़ोजो लोगों को समझाएंलोभ छोड़ो। तुम्हारे सारे शास्त्र शिक्षा क्या देते हैंशिक्षा किसको दी जाती हैअगर लोग अलोभी थे तो बुद्ध पागल थे जो लोगों को कहते कि लोभ छोड़ो। लोग तो लोभ छोड़े ही हुए थे—वे कहते,आप भी बातें क्या कर रहे हैंलोभी यहां है कौनचालीस साल निरंतर बुद्ध गांव—गांव घूम कर लोगों को समझाते रहे. लोभ छोड़ोईर्ष्या छोड़ोमहत्वाकांक्षा छोड़ोअहंकार छोड़ो! निश्चित ही ये बातें लोगों में रही होंगीअन्यथा ये औषधियां किसको बांटी जा रही थीं ? लोग बीमार रहे होंगे।
तुम्हारे शास्त्र गवाह हैं कि किस लोगों के बीच में लिखे गए होंगे। जो बीमारी होती है उसकी चिकित्सा का आयोजन करना होता है लोग कामी रहे होंगे इसलिए तो ब्रह्मचर्य की इतनी प्रशंसा है। अगर लोग ब्रह्मचारी ही थे तो की प्रशंसा का क्या प्रयोजन था?
लाओत्सु ने कहा है : अगर लोग धार्मिक हों तो धर्म—शास्त्र व्यर्थ। ठीक कहा है। अगर लोग सचमुच धार्मिक हों तो धर्म —शास्त्र की क्या जरूरत?
या दूसरी तरफ से देखें। कृष्ण ने कहा है कि जब—जब धर्म की हानि होगी मैं आऊंगा। तो उस वक्त क्यों आए थेधर्म की हानि हो गई होगी। सीधी—सी बात है. जब—जब अंधेरा घिरेगासाधु—संत सताए जाएंगेतब—तब आऊंगा। तो उस समय यह घड़ी घट गई होगी।
अगर तर्क को ठीक से समझेंतो जब तुम्हारे घर में कोई बीमार होता है तभी वैद्य को बुलाते हैं। जब कोई समाज पतित होता है तो उसे उठाने की चेष्टा होती है।
इतने अवतारइतने तीर्थंकर किसलिए पैदा होते हैंकहीं—न—कहीं आदमी गलत रहा होगा। तोपहली तो बात यह समझ लेना कि आदमी सदा से ऐसा ही है।
यह जो हमें भांति पैदा होती हैइसके पीछे और भी कारण हैं। सभी को ऐसा खयाल है कि बचपन बड़ा सुंदर था,स्वर्णिम! सभी को! हालांकि बच्चों से पूछोकोई बच्चा इस बात के लिए राजी नहीं कहने को कि स्वर्णिम काल बचपन है। बच्चे जल्दी से जल्दी बड़े होना चाहते हैं। बच्चा बाप के बगल में कुर्सी पर खड़ा हो जाता है और कहता हैदेखो तुमसे.। वह उसकी आकांक्षा का सबूत हैवह चाहता हैतुमसे बड़ा हो जाए।
एक छोटे बच्चे को स्कूल में एक शिक्षक ने मारा उसने कुछ भूल—चूक की थी। मारने के बाद उसे फुसलायासमझाया और कहा, 'बेटा देखयह मैं हूं इसीलिए कि तुझे मैं प्रेम करता हूं। उस बेटे ने आंख से आंसू पोंछते हुए कहा कि प्रेम तो मैं भी आपको बहुत करता हूं, लेकिन प्रमाण अभी दे नहीं सकता।
छोटे बच्चों से पूछोवे जल्दी से जल्दी बड़े हो जाना चाहते हैं। लेकिन बाद में याद रह जाती है सिर्फ कि बचपन बड़ा सुंदर था। कैसे हो सकता है बचपन सुंदरक्योंकि तुम बचपन में बिलकुल ही परतंत्र थेहर बात के लिए असहाय थेदीन थे और हर बात के लिए तुम्हें किसी का मुंह तकना पड़ता था। ऐसी परतंत्र अवस्थाऐसी स्वतंत्रता—हीन अवस्था कैसे सुंदर हो सकती हैलेकिन बाद में यही याद रह जाती है कि बचपन बड़ा सुंदर था।
मनोवैज्ञानिक कहते हैंइसके पीछे एक कारण है। आदमी का मनजो दुखपूर्ण है उसे भुला देता हैक्योंकि दुख को याद रखना कठिन है। दुख इतना ज्यादा है कि अगर हम दुख को याद रखें तो हम जी न सकेंगे। तो जो दुखपूर्ण है उसे हम हटा देते हैंउसे हम अचेतन मेंगर्त में डाल देते हैं। और जो सुखद—सुखद है उसकी फूलमाला बना लेते हैंजैसे—जैसे हम आगे बढ़ते जाते हैं जो सुखद हैउसको इकट्ठा करते जाते हैं। जो सुखद नहीं है उसे छोड़ते चले जाते हैं। तो पीछे के संबंध में हम जो भी वक्तव्य देते हैंवे सब गलत होते हैं।
और यही स्थिति बड़े पैमाने पर समाज के संबंध में सही है। हम सोचते हैं कि अतीत में सब सुंदर थासब स्वर्णयुग अतीत में हो चुके। यह बात हर हाल में गलत हैक्योंकि अगर अतीत इतना सुंदर था तो यह वर्तमान उसी अतीत से पैदा हुआ हैयह और भी सुंदर होना चाहिए। अगर बचपन इतना सुंदर था तो जवानी उसी बचपन से आई हैयह बचपन से ज्यादा सुंदर होनी चाहिए। अगर जवानी सुंदर थी तो बुढ़ापा जवानी से आया हैबुढ़ापा जवानी से भी ज्यादा सुंदर होना चाहिए। और अगर जीवन तुम्हारा सचमुच आह्लाद था तो मृत्यु भी नृत्य होगीउत्सव होगीक्योंकि मृत्यु उसी जीवन का सार—निचोड़ है।
लेकिन तुम तो देखते हो कि बचपन सुंदर था जवानी सेजवानी सुंदर बुढ़ापे सेजीवन सुंदरमृत्यु सुंदर कभी नहीं! यह तो तुम दुख—दुख को छोड़ते जाते होसुख—सुख को चुनते जाते हो। सुख तुम्हें मिलता तो नहींलेकिन जो कुछ भी क्षणभंगुर स्मृतियां रह जाती हैंउन्हीं को तुम सजा—संवार कर रख लेते हो।
तुम आए हो उन्हीं समाजों से जिनको लोग स्वर्णयुग कहते हैंसतयुग कहते हैं। यह कलियुग सतयुग से पैदा हुआ है। अगर यह कलियुग बुरा है तो कहावत है कि फल से वृक्ष का पता चलता है। अगर फल गलत है तो वृक्ष सड़ा हुआ रहा होगा,बीज से ही सड़ा हुआ रहा होगा। तुम सबूत हो इस बात के कि सारा मनुष्य—जाति का अतीत तुमसे बेहंतर तो नहीं रहाकिसी हालत में नहीं रहा। तुमसे शायद बुरा भले रहा होतुमसे बेहंतर तो नहीं हो सकताक्योंकि तुम उसके फल हो।
तो पहली तो मैं यह भ्रांति तुम्हारे मन से हटा देना चाहता हूं। मैं तुमसे यह भी नहीं कहना चाहता कि तुम श्रेष्ठ हो। तुमसे यह भी नहीं कहना चाहता कि तुम निकृष्ट हो। तुमसे मैं एक बहुत सीधा—सादा प्रस्ताव करता हूं कि तुम वैसे ही हो जैसे सदा से मनुष्य रहा है। इसलिए यह चिंताविचार छोड़ कर इस बात पर ध्यान दो कि कुछ मनुष्यों ने कभी—कभी जीवन में क्रांति की है। तुम सबकी चिंता भी भूल जाओ। तुम तो इतनी ही फिक्र कर लो कि तुम्हारे जीवन में प्रकाश उतर आएतुम्हारा दीया जल जाए तो बस काफी है।
'आप मौजूद हैं तो भी मनुष्य नीचे की ओरनीचे की ओर जा रहा है।'
मैं किसी को नीचे की ओर जाते नहीं देखता और न किसी को ऊंचे जाते देखता। लोग कोल्ह के बैल की तरह घूम रहे हैं,वहीं के वहीं घूम रहे हैं। आंख पर पट्टियां बंधी हैंसोचते हैं कहीं जा रहे हैं। कोई कहीं नहीं जा रहा है। कभी—कभी कोई एकाध व्यक्तिं आंख से पट्टियां हटा देता है—धारणाओ कीसिद्धातो  कीधर्मों कीराजनीतियों कीखोल कर देखता हैदेखता है. अरेमैं एक वर्तुल में घूम रहा हूं कोल्ह का बैल! वह निकल पड़ता है वर्तुल के बाहर। उस वर्तुल के बाहर छलांग लगा लेना ही संन्यास है।
इस समाज में कभी धर्म आने वाला नहीं हैकुछ संन्यासियों के जीवन में धर्म आने वाला है। धर्म तो महाक्रांति है—और क्रांति व्यक्ति में ही घट सकती है। समाज में तो ज्यादा से ज्यादा सुधार घटते हैंलीपा—पोती चलती है। मकान वही का वही रहता हैकहीं पलस्तर गिर गया तो चढ़ा दियाकहीं रंग खराब हो गया तो रंग कर दियाकहीं छप्पर खराब हो गया तो कुछ खपरे बदल दियेकहीं दीवाल गिरने लगी तो सहारे और टेक लगा दी—मगर मकान वही का वही रहता है। क्रांति तो व्यक्ति में घटती है। नितांत रूप से वैयक्तिक है क्रांति।
तो मैं तो किसी को नीचे —ऊंचे जाते नहीं देखता। समाज तो वहीं का वहीं है।
पूछा है. '……जबकि बुद्धपुरुषों के आगमन पर मनुष्यता कोई शिखर छूने लगती है। '
मनुष्यता नहींकुछ मनुष्य! कुछ मनुष्यों में छिपी मनुष्यता जरूर छूने लगती है। लेकिन उस शिखर को छूने वाले लोगों की संख्या सदा बड़ी होती है। कभी करोड़ में एक आदमी बुद्धों के साथ उस अनंत यात्रा पर निकलता है। आज तुम्हें लगता है कि बुद्ध के समय में बड़ी क्रांति हुई होगीया के समय में बड़ी क्रांति हुई होगीलेकिन अगर तुम अनुपात देखो तो तुम चकित हो जाओगे। बुद्ध जिस गाव से गुजरते हैं अगर उसमें दस हजार आदमी हैं तो दस भी सुनने को आ जाएं तो बस पर्याप्त है। और उन दस में भी जो सुनने आ गए हैंउनमें से एक भी सुन ले तो बहुत। सुनने आ जाने से ही थोड़े ही कोई सुन लेता है। आज तुम्हें लगता है कि बहुत लोग...।
अभी जो मुझे सुन रहे हैंउनकी संख्या नगण्य है। जो मुझे समझ रहे हैं उनकी और भी नगण्य है। जो मुझे समझ कर अपने जीवन को बदल रहे हैं उनकी और भी नगण्य है। समय बीत जाने पर यही संख्या बड़ी दिखाई पड़ने लगेगी।
आज जैनों की संख्या तीस लाख से ज्यादा नहीं है। अगर महावीर ने तीस आदमियों को बदला हो तो दो हजार साल में उनसे तीस लाख की संख्या पैदा हो सकती है। बहुत ज्यादा लोगों को नहीं बदला होगा। ढाई हजार साल में जैनियों की संख्या तीस लाख है। तीस जोड़े इतनी बड़ी संख्या पैदा कर सकते हैं ढाई हजार साल में। बहुत थोड़े से लोग बदले होंगे।
बदलाहट सदा थोड़े से लोगों में आती है। हीउन थोड़े से लोगों में मनुष्यता जो है वह बड़े ऊंचे शिखर छूने लगती है। मगर तुम इसकी चिंता न करकेइसकी ही चिंता करो कि तुम्हारे भीतर वह शिखर छुआ जा रहा है या नहींकहीं ऐसा न हो कि तुम सबकी चिंता में खुद को बिसार बैठो। और वहीं घटना घट सकती है। सबकी चिंता में तुम तो चूक ही जाओगे और सब को कोई लाभ न होगा। '.. हजारों आंखें आपकी ओर लगी हैं कि शायद आपके द्वारा फिर नवजागरण होगा। '
ये भ्रांतियां छोड़ो। किसी के द्वारा कभी कोई नवजागरण न हुआ हैन होनेवाला है। कितने सत्पुरुष हुए! तुम ये भ्रांतियां कब तक बांधे रहोगेये भ्रांतियां तुम्हें भटकाती हैं। इनके कारण तुम जो क्रांति कर सकते थेवह नहीं करतेतुम बैठ कर प्रतीक्षा करते होहोगा। जैसे किसी और का काम है! जैसे यह मेरी जिम्मेवारी है। जैसे नहीं होगा तो मैं दोषी! तब तो तुम सभी बुद्धपुरुषों को दोषी पाओगेक्योंकि वह नवजागरण अब तक नहीं आया।
मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं. वह कभी नहीं आएगा।
अंग्रेजी में उस नवजागरण के लिए जो शब्द हैउटोपियावह बहुत अच्छा है। उटोपिया शब्द का ही अर्थ होता हैजो न कभी आयान कभी आएगा। वह सिर्फ तुम्हारी आकांक्षा है—और नपुंसक आकांक्षा है। दूसरे के लिए प्रतीक्षा क्यों कर रहे हो?
मेरे पास लोग आते हैं और कहते हैं अब अवतार का जन्म कब होगा?' तुम क्या कर रहे हो? जन्माओ अवतार को अपने भीतर! तुम यह उत्तरदायित्व क्यों टालते होकिस पर टाल रहे हो? मेरे पास लोग आते हैंवे कहते हैं. 'भगवान सुनता नहीं। इतनी आहें उठ रही हैंभगवान कहा है? आता क्यों नहीं?' ये मनुष्य की जालसाजियाये धारणाएं! इनसे एक तरकीब तुम अपने भीतर बना लेते हो कि हमें तो कुछ करना नहींबैठकर राह देखनी हैजब आएगा तब होगा। कोई मसीहा आएगाकोई पैगंबर आएगाकोई अवतार आएगा।
आ चुके पैगंबरआ चुके मसीहाआ चुके अवतार—और नवजागरण नहीं आया। तुम कब जागोगेकितने अवतारकितने तीर्थंकर आ चुके! कहां नवजागरण आयाकहां हुई क्रांति रू
नहींतुम्हारी भ्रांति है। किसी दूसरे से होने वाली नहीं है। तुममें घटना घटेगी। समूह में कभी घटना नहीं घटेगी। समूह में जो घटती है वह राजनीति हैव्यक्ति में जो घटता हैवह धर्म। तुम राजनीति को धर्म पर आरोपित मत करो। अगर लोग सोना चाहते हैं तो कौन जगाएगाकैसे जगाएगा मेअगर ज्यादा जगाने वाला गड़बड़ करेगासोने वाले उसकी हत्या कर देंगे। वही तो हुआ। जीसस को सूली पर लटका दियासुकरात को जहर पिला दिया। ये लोग जरा ज्यादा शोरगुल मचाने लगे।
अब जिसको सोना हैतुम उठ कर और घंटा बजाने लगे सुबह से और कहने लगे प्रभात —वेला
आ गईजागो! पर जिसको सोना हैवह कहता है. सोना और जागना तो कम से कम मेरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। दूसरा आदमी आ कर घंटा बजाने लगे कि जागो तो उसे गुस्सा आएबिलकुल स्वाभाविक है। और सोने वाले लोग ज्यादा हैं। सोए ही हैं। घंटे बजाने वाले आते हैं और चले जाते हैं और सोने वाले करवट भी नहीं बदलते। या बहुत—से—बहुत करवट बदल लेते हैंफिर सो जाते हैं। थोड़े नाराज हो जाते हैं। अगर भले हुए तो कहते हैं, 'महाराजनमस्कार! आप बड़े महात्मा हैं! मगर अभी मुझ दीन को छोड़ोअभी मेरी सुविधा नहीं जागने की। जपता जरूर। आपकी बात बिलकुल ठीक है। '
लोग कहते हैं कि आपकी बात बिलकुल ठीक हैकि छोडोमेरा पिंड छोड़ो।
अब कौन विवाद करेसोने वाला विवाद कैसे करेसोने वाला कहता हैमुझे सोने दो। माना कि ब्रह्ममुहूर्त है और उठना चाहिए ब्रह्ममुहूर्त मेंऔर कभी हम जरूर उठेंगेऔर याद रखेंगे तुम्हारी बात और तुम्हारा नाम स्मरण करेंगेतुम्हारी पूजा भी करेंगेफोटो लटका लेंगेमूर्ति लगा देंगेसदा—सदा तुम्हें पूजेंगे—मगर अभी छोड़ो! अभी मुझे नींद आ रही है। अभी मैं इस योग्य नहींअभी मैं पात्र नहीं। अभी घर हैगृहस्थी हैबच्चे हैंपत्नी है —अभी इनको सम्हालने दोएक दिन तो मोक्ष की तरफ जाना हैआप बिलकुल ठीक कहते हैं।
इसीलिए तुम पूजा करते होमंदिर बनाते हो। तुम्हारे मंदिर और तुम्हारी पूजाएं तुम्हारे बचने की विधियों का अंग हैं। जो दुष्ट हैंवे झगड़ने को खड़े हो जाते हैंजो सज्जन हैंवे पूजा करने को। मगर जगने को कोई राजी नहीं।
हमने भारत में सूली नहीं दी—सज्जनों का देश है! मारपीटझगड़ा—झांसे में हम भरोसा नहीं करते—अहिसकों का देश है! शाकाहारियों का देश है! बड़ी पुरानी हमारी परंपरा है। हम कहते हैंजिसको हाथ जोड़ करपैर छू कर छुटकारा पाया जा सकता हैउसको सूली पर क्यों लटकानाऔर सूली पर लटकाने से झंझट ही बढ़ती हैआखिर सोने वाले आदमी को सूली बनाना पड़े,ले जाओसूली पर लटकाओ..। पैर छू लिए कि महाराज साष्टाग दंडवत हैआप जाएं! हमने समझ ली तरकीब।
तो जो जीसस के साथ यहूदियों ने कियावह हमने बुद्ध के साथ नहीं किया। कभी इक्के—दुक्के किसी पागल ने पत्थर फेंक दियालेकिन आमतौर से समाज ने कहा कि आप ईश्वर के अवतार हैं। महावीर को हमने थोड़ी—बहुत गाली—गलौज दी,लेकिन कोई जहर नहीं पिला दियाजैसा सुकारात को यूनान में पिला दिया। हमने कबीरको कोई मंसूर की तरह काट नहीं डाला हैजैसा मुसलमानों ने मंसूर को काट दिया। सज्जनों का देश है! हम तरकीब ज्यादा बेहंतर जान गए। हम समझ गए कि जहां सुई से काम हो जाता हैवहां तलवार की क्या जरूरतमंदिर में बिठा देते हैंमूर्ति बना देते हैंफूल चढ़ा देंगेशास्त्र बना देते हैं—और क्या चाहिएमगर जगाने की कोशिश मत करो!

 समाज कभी भी नहीं जागेगा। समाज तो सोई हुई भीड़ है। इस भीड़ में से कभी—कभी कोई विरला पुरुष जागता है।
तो तुम यह तो पूछो ही मतयह तो बात ही मत करो। मैं तुम्हारी किसी भ्रांति में किसी तरह का सहारा देने को तैयार नहीं हूं। मैं नहीं तुमसे कहता कि मेरे द्वारा नवजागरण आएगासारी दुनिया में क्रांति हो जाएगीराम—राज्य स्थापित हो जाएगा। हो चुकीं ये पागलपन की बातें बहुत। राम से नहीं हुआ रामराज्य स्थापिततो किसी दूसरे से कैसे हो जाएगाकृष्ण से नहीं हुआहार गए सिर पटक—पटक कर! बुद्ध से नहीं हुआतो मुझसे कैसे हो जाएगा?
नहींबुद्ध और कृष्ण और राम ने वैसी भ्रांति पाली ही नहींवह भ्रांति तुम पाले हुए हो। बुद्ध तो बार—बार कहते हैं कि अपने दीये बनोमेरे द्वारा कुछ भी न होगा। महावीर बार—बार कहते हैं. अपनी शरण जाओमेरी शरण आने से क्या होगा पड
महावीर ने तो बहुत साफ कहा है कि मैं स्वयं जागा हूं, मैं तुम्हारे कल्याण के लिए नहीं आया हूंयद्यपि जैन अभी भी कहे जाते हैं कि जगत के कल्याण के लिए उनका जन्म हुआ। महावीर कहते हैंमैं तुम्हारे कल्याण के लिए नहीं आयाक्योंकि कोई दूसरा तुम्हारा कल्याण कैसे करेगाऔर अगर दूसरा तुम्हारा कल्याण कर सके तो वह कल्याण भी दो कौड़ी का होगा। उसमें तुम्हारा विकास फलित नहीं होगातुम्हारी आंतरिक उत्कांति घटित नहीं होगी। वह उधार होगाबासा होगा। तो महावीर कहते हैं. अपनी शरण जाओसमझोअपने को जगाओ!
'…… धर्म का जगत कब निर्मित होगा?'
झूठे सपने मत देखो। जगत अधर्म का रहेगा। इसमें कभी—कभी धार्मिक व्यक्ति गाते रहेंगे। यह रात तो अंधेरी रहेगी। इसमें कभी—कभी कोई तारे जगमगाते रहेंगे। अब तुम यह प्रतीक्षा मत करो कि कब पूरी रात बदलेगी। तुम तो इसकी फिक्र करो कि मैं जगमगाने लगा या नहीं गुम तुम जगमगा गएतुम्हारे लिए रात समाप्त हो गई। तुम जिस दिन जगमगाएतुम्हारी सुबह हो गई।
इसे मैं बार—बार दोहराना चाहता हूं कि यह क्रांति व्यक्ति के अंतस्तल में घटती है! यह बड़ी आंतरिक हैआत्यंतिक रूप से निजी है। समूहभीड़ से इसका कुछ नाता नहीं।
पूछा है : 'क्योंकि बदलना तो दूर. कब होगा विस्फोटकैसे होगाबदलना तो दूर उल्टे लोग आपका विरोध कर रहे हैं। '
वे सदा से करते रहे हैं। कुछ नया नहीं इसमें। वे विरोध न करें तो आश्चर्य होगा। विरोध उन्हें करना ही चाहिए। वह उनकी पुरानी आदत है।
जैन शास्त्रों में उल्लेख है : एक मुनि नदी में स्नान करने उतरा। एक बिच्छु को उसने तैरते देखाडुबकी खाते। कि मर न जाएतो उसने हाथ पर चढा कर उसे घाट पर रख देना चाहालेकिन जब तक उसने घाट पर रखाउसने दो —तीन डंक मार दिए। और जैसा कि तुमने देखा होगाचींटे को अगर हटाने की कोशिश करो तो जिस दिशा से हटाओ वह उसी दिशा की तरफ भागता है। बड़े जिद्दी होते हैं। जितनी नासमझीउतनी ही जिद्द। तो बिच्छु तो बिच्छु! उसको छोड़ा तो वह फिर भागा पानी की तरफ। उस मुनि ने फिर उसे उठाया और फिर किनारे पर रखा। फिर उसने दो—तीन डंक मार दिए।
एक मछुआ राह के किनारे खड़ा है। वह कहने लगा कि महाराज वह आपको डंक मारे जा रहा हैअब छोड़ो भीमरने भी दो! वह मुनि हंसने लगा। उसने कहा कि वह अपनी आदत नहीं छोड़तामैं अपनी आदत छोड़ दूंदेखें कौन जीतता हैबिच्छु है तो यह मान कर ही चलना चाहिए कि वह डंक मारेगाइसमें कुछ नया तो नहीं कर रहा है। न मारे डंक और अचानक कहे कि धन्यवादतो घबड़ाहट होगीतो भरोसा न आएगा।
जब भी कोई सोए हुए लोगों को जगाने की कोशिश करेगा तो वे डंक मारेंगेवे नाराज होंगे। उनकी बात मेरी समझ में आती हैमैं उसमें कुछ एतराज भी नहीं करता। मुझे बिलकुल समझ में आता है. सोए हुए को जगाओ तो नाराजगी होती है। यह भी हो सकता है कि तुम से कह कर सोया हो कि सुबह चार बजे उठा देनामुझे ट्रेन पकड़नी हैलेकिन उसको भी चार बजे उठाओ तो वह भी गुस्सा दिखलाता है। वह भी तुम्हें दुश्मन की तरह देखता है. कि अरेकहा था ठीक हैमगर इसका यह मतलब थोड़े ही है कि जगाने ही लगो। अब कह दियाभूल हो गईमगर अब पीछे तो न पड़ो। रुग्ण आदमी को दवा दो तो भी वह पीने में आनाकानी करता है।
बच्चे जैसे हैं लोगनासमझ हैं। उनकी तरफ से विरोध बिलकुल स्वाभाविक है। अगर इस विरोध का तुम मनोविज्ञान समझो तो बड़े चकित होओगे। वे विरोध इसीलिए कर रहे हैं कि उन्हें बात जंचने लगी है कि बात में कुछ सचाई है। नहीं तो वे विरोध भी नहीं करते। उन्हें डर लगने लगा है कि यह आदमी कहीं जगा ही न दे। उनके विरोध की केवल इतनी ही सार्थकता है कि वे शंकित हो गए हैं कि अगर इस आदमी को सुनाइसकी बात को जरा गौर से सुनाविरोध का धुआं खड़ा न कियाअपनी आंखें विरोध से न भर लीं तो कहीं यह बात समझ में न आ जाएकहीं यह बात हृदय में न उतर जाएकहीं यह बीज आत्मा में पड़ न जाए।
तो उनका विरोध सांकेतिक है। वे कह रहे हैं कि अब या तो हमें विरोध करना पड़ेगा या साथ चलना पड़ेगा—अब दो ही उपाय छोड़े हैं। इसलिए सदा उन्होंने विरोध किया है। उनके विरोध की मैं निंदा नहीं कर रहा हूं, मैं उसे स्वीकार करता हूंवह बिलकुल स्वाभाविक है। वे जिस दिन विरोध न करेंगे उस दिन समझना कि उनका अब बुद्धत्व में कोई रस नहीं रहा। वे बड़े दुर्दिन होंगेजब बुद्धपुरुष आएगा और लोग बिलकुल विरोध न करेंगे—लोग कहेंगेमजे से आपको जो कहना है कहोजो करना है करोहमारा मनोरंजन होता हैआप बड़े मजे से कहो। लोग ताली बजाएंगे और अपने घर चले जाएंगेकोई विरोध न करेगा। उस दिन कठिनाई होगी।
ध्यान रखनाविरोध का मतलब ही हैलगाव शुरू हो गया। घृणा प्रेम का रूप है। जो आदमी घृणा करने लगाअब ज्यादा देर नहीं हैवह प्रेम भी कर सकेगा।
उपेक्षा खतरनाक है। बुद्धपुरुष आएं और लोग उनकी उपेक्षा कर देंवे राह से निकलेंन कोई विरोध करेन कोई प्रेम करेलोग कहें कि ठीक आपकी मर्जीआपका जैसा दिल आप कहेंजो आपको रहना है आप रहेंहमें कोई एतराज नहीं। जरा सोचो उस स्थिति की बात कि कोई विरोध न करेकोई पक्ष में नहींकोई विपक्ष में नहींबुद्ध आएंकहें और चले जाएंकोई लकीर ही न छूटे किसी पर—तो दुर्दिन होगा। तो उसका अर्थ हुआ कि अब बुद्धत्व में इतना भी रस नहीं रहा लोगों का। अब कोई विरोध भी नहीं करता।
विरोध तो रागात्मक है।
एक यहूदी हसीद फकीर ने किताब लिखी थी। किताब बड़ी बगावती थी। हसीद बड़े बगावती फकीर हैं। और उसने अपने देश के सबसे बड़े यहूदी धर्मगुरु को वह किताब भेजीखुद अपनी पत्नी के हाथ भेजी। और उसने कहा कि कुछ फिक्र न करना। जो भी होतू उसमें उलझना मतसिर्फ देखते रहना क्या हो रहा हैसब मुझे आ कर वैसा का वैसा बता देना। वह गई। जैसे ही किताब उसने दी
पंडित के हाथ मेंउसने किताब उलट कर देखीदेखा कि हसीद फकीर की है। वह तो ऐसा तिलमिला गया कि जैसे हाथ में अंगारा रख दिया हो। उसने तो किताब उठा कर बाहर फेंक दी अपने मकान के। उसने कहा कि मेरे हाथ अपवित्र हो गएमुझे स्नान करना पड़ेगा। वह तो आग—बबूला हो गया।

उसके पास ही एक दूसरा पुरोहित बैठा थाएक दूसरा धर्मगुरु। उसने कहा कि माना कि वह बगावती हैमगर उसने किताब भेंट भेजीतुम थोड़ी देर बाद फेंक देतेयह पत्नी को तो चले जाने देते! उसने भेजी तो! उसने तो प्रेम से भेजीउपहार दिया। इस पत्नी को चले जाने देतेफिर फेंक देते। इतनी जल्दी क्या थीऔर तुम्हारे घर में इतनी किताबें हैंइतनी बड़ी लायब्रेरी हैउसमें यह एक किताब पड़ी भी रहती तो क्या बिगाड़ देती?
पत्नी वापिस लौटी। पति ने पूछाक्या हुआउसने कहा कि प्रधान पुरोहित ने तो किताब एकदम बाहर फेंक दीवे तो ऐसे नाराज हो गए कि मुझ पर हमला न कर दें। उन्होंने तो ऐसे किया कि जैसे मैंने हाथ में अंगारा रख दिया हो। मगर उनके पास ही एक दूसरे धर्मगुरु बैठे थे। उन्होंने कहा कि नहींयह करना उचित नहीं हैपत्नी को चले जाने देतेफिर फेंक देतेया फिर रखी रहती किताबइतनी किताबें पड़ी हैं! तुम्हारे घर में विरोधियों की किताबें भी रखी हैंतो यह तो यहूदी हैमाना कि बगावती है। रख लेतेपड़ी रहती लायब्रेरी मेंक्या बिगड़ता था?
पति ने कहा. जिसने किताब फेंकीउसे तो हम किसी न किसी दिन बदल लेंगेलेकिन दूसरे से हमारा कोई संबंध नहीं बन सकता।
समझे आप मतलब?
जिसने किताब फेंकीउससे तो रागात्मक संबंध बन गया। वह कम से कम इतना तो राग है उसकाजोश तो आया! उसने कुछ किया तोतरंग तो उठी। वह जो बैठ कर शांति से कह रहा हैरख लोडाल दोकिनारे में पडी रहेगी लायब्रेरी में,वह उपेक्षा से भरा आदमी हैउससे हम कभी कोई संबंध न बना पाएंगे। इस धर्मगुरु को तो हम बदल लेंगेलेकिन दूसरे धर्मगुरु से हमारा कोई संबंध न बन पाएगा। मैं दूसरे के लिए दुखी हूं।
पत्नी तो बहुत चौंकी। वह तो सोचती थीदूसरा भला आदमी हैपहला आदमी बुरा है। लेकिन उसके पति ने कहा कि पहला आदमी तो हमारे चक्कर में आ ही चुका हैदूसरा खतरनाक है। मैं तुमसे कहता हूं कि पहला तो उठा कर किताब पडेगा। जिसने इतने जोश से फेंकी है वह बिना पढ़े नहीं रह सकताक्योंकि इस जोश को कैसे शांत करेगावह तो उत्सुक हो ही गया। मैं उसका पीछा करूंगारात सपने में दिखाई पडूगा। मैं उसके सिर के आसपास घूमूंगा। वह सोचेगाकई बार कि फेंकना था कि नहीं फेंकना थादेख तो लूं इसमें लिखा क्या है!
जो मेरा विरोध करते हैंवे निश्चित रूप से मेरी किताब पढ़ते हैं—यह तुम खयाल रखना। उनसे मेरा संबंध बन चुका है। उनसे मेरे हृदय का नाता जुड़ गया हैधीरे— धीरे खींच लूंगा। लेकिन जो विरोध भी नहीं करतेविरोध तक नहीं करतेउनके साथ बड़ा मुश्किल है। उनके हृदय का दरवाजा पाना बहुत मुश्किल है। उनके दरवाजे सब बंद हैं।
और यह बिलकुल स्वाभाविक है। जितनी क्रांति की बात होगीउतनी ही कठिनाई होती है। लोग परंपरा से जीते हैं। लोग परंपरा में सुविधा और सुरक्षा पाते हैं। बदलाहट साहसियों का काम है,
दुस्साहसियों का काम है। उतना साहस जिसमें नहीं होतावह विरोध न करे तो क्या करेउसका विरोध तो समझोवह यह कह रहा है कि इतना साहस मुझ में नहीं हैतो या तो मैं यह स्वीकार करूं कि मैं कायर और कमजोर हूं और या सिद्ध करूं कि यह बात गलत है। तो पहले वह कोशिश करता है सिद्ध करने की कि बात गलत हैजाने योग्य है ही नहींइसलिए हम नहीं जाते। नहीं तो उसे साफ हो जाएगाअगर जाने योग्य है और नहीं जातेतो फिर हम कायर हैं। अहंकार को फिर चोट लगती है। वह अहंकार की सुरक्षा है विरोध।
लेकिन जब कोई व्यक्ति मुझमें और उसके अहंकार में चुनाव करने लगातो एक न एक दिन उसे मुझे चुनना ही होगा,क्योंकि अहंकार सिवाए नर्क के कुछ देता ही नहीं। उस चुनाव को तुम कब तक किए चले जाओगे?

 दूसरा प्रश्न :

आपने कहा कि उपदेश सबसे लेना चाहिएलेकिन आदेश अपनी अंतरात्मा सेअपने विवेक से। प्रश्न है कि जब तक विवेक न हो तब तक कैसे पता चले कि जो आवाज अंदर से आ रही हैवह विवेक—जन्य है या मन का ही एक खेल हैकृपया प्रकाश डालें।

स्‍वाभाविक प्रश्न उठेगा। मैंने कहाउपदेश सबसे ले लेनाआदेश अपने । से लेना। तुम्हारा प्रश्न संगत है। तुम पूछते होतय कैसे होगा कि जो हम कर रहे हैंजो हम मान कर चल रहे हैंजिस दिशा को हमने चुनावह हमारी अंतरात्मा का आदेश है या हमारे मन का ही खेल है?
चलो! चलने से ही पता चलेगा। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि तुम हमेशा सही चल पाओगे। यह मैंने कहा भी नहीं। तुम बहुत बार चूकोगे। लेकिन चूक—चूक कर ही तो पता चलता है कि गलत क्या है और सही क्या है। तुम बहुत बार गिरोगे;गिर—गिर कर ही तो पता चलता है कि कैसे चलना चाहिए ताकि न गिरे।
छोटा बच्चा चलना शुरू करता है। अगर वह कहे कि मुझे बिलकुल ऐसी तरकीब चाहिएसौ प्रतिशत गारंटी की कि गिरूं न—तो वह कभी चलेगा नहींकभी चल ही न पाएगा। फिर वह किसी की गोदी में ही चढा रहेगा। गिरना तो पड़ेगा। और जब मां कहती हैबेफिक्र हो कर तू चलगिरेगा
थोड़े ही—तो वह जानती है कि गिरेगा। लेकिन गिरने के सिवाए चलना सीखने का कोई उपाय नहीं।
तुम साइकिल चलाने के संबंध में किताब पढ़ लोकिताब में सब समझाया हो कि किस तरह संतुलन कायम करना चाहिएकिस तरह पैडल चलाने चाहिएकिस तरह हैंडल पकड़ना चाहिए— इससे कुछ न होगा। तुम लाख किताब को कंठस्थ करके साइकिल चलाने जाओदो—चार बार गिरोगेहाथ—पैर पर पट्टी बंधेगीचमड़ी दो—चार बार छिलेगी। मगर उसी गिरने से तुम्हें संतुलन की प्रतीति होगीक्या है संतुलन। किताब में लिखने से थोड़े ही पता चलता है कि संतुलन क्या हैबैलेंस क्या है?वह तो साइकिल पर चढ़ने से पता चलता है।
अब दो चाक की साइकिलऔर सधी रह जाती हैचमत्कार है। गिरना तो बिलकुल नियमानुसार हैनहीं गिरना,चमत्कार है। मगर दो —चार बार गिर कर तुमको खयाल आने लगता है। अब वह खयाल ऐसा है कि कोई दूसरा कितना ही जिंदगी से साइकिल चला रहा हो तो भी तुम्हें दे नहीं सकता। कोई तुम्हें दे नहीं सकता कि यह लो मैं तुम्हें अपनी समझ दिए देता हूं। वह कितना ही समझा देफिर भी तुम्हें गिरना पड़ेगा।
तो जब मैंने तुमसे कहाउपदेश सबसे लेनातो मैंने कहा जितने साइकिल सवार होंसबसे पूछ लेना। मगर इससे तुम यह मत समझ लेना कि तुम्हें साइकिल चलाना आ गया। चढ़ना तो तुम्हें ही पड़ेगा। और इससे मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि तुम्हें सौ प्रतिशत गारंटी है कि तुम न गिरोगे। ऐसी गारंटी मैं देता ही नहीं। गारंटी इतनी दे सकता हूं कि जरूर गिरोगेमगर गिर—गिर कर सीखोगे। कई बार गलत रास्तों पर भटक जाओगे। लेकिन अगर अपने ही कारण भटके तो लौट आओगेअगर दूसरे के कारण भटके तो कभी न लौट सकोगे। क्योंकि जो आदमी दूसरे के पीछे चल रहा है उसे कभी पता ही नहीं चलता है कि मैं ठीक जा रहा हूं कि गलत जा रहा हूं।
जैसे कि तुम किसी साइकिल सवार के पीछे कैरियर पर बैठे हुए होतुम्हें थोड़े ही बैलेंस आएगा! हालांकि तुम भी साइकिल पर सवार होलेकिन तुम्हें संतुलन नहीं आएगा। तुम जन्मों—जन्मों तक बैठे रहो दूसरे की साइकिल के पीछेयात्रा भी होगीमगर संतुलन नहीं आएगा।
और असली बात संतुलन है।
तो तुम किसी की पीठ के पीछे चल पड़ो.. .तुम जब किसी के पीछे चलते हो तो तुम इसी भय के कारण तो चलते हो,कहीं हम चलें तो भूल न हो जाएतो हम जानकार के पीछे चलें! लेकिन हो सकता है कि जानकार भी तुम्हारी जैसी ही बुद्धि का होकिसी और जानकार के पीछे चल रहा हो और वे भी इसी बुद्धि के हों—और अक्सर इसी बुद्धि के लोग हैं—तो  तुम पाओगे कि एक आदमी दूसरे के पीछे चल रहा हैदूसरा तीसरे के पीछे चल रहा हैतीसरा किसी और केजो कि मर चुके हैंवे किसी और के पीछे चलते थे जो कि बहुत पहले मर चुके हैंवे किसी और के पीछे चलते थेजो कभी हुए ही नहीं। अब चले जा रहे हैं! अब इनको कभी पता नहीं चलेगा कि गलती हो रही हैक्योंकि गलती होने का उपाय नहीं हैयह तो क्यू हैऔर इसका छोर खोजना मुश्किल है। गलती तो तब पता चले जब क्यू का छोर पता चले।
अब अष्टावक्र की मान कर चलने लगें जनकजनक की मान कर चलने लगें कोई औरकोई औरपांच हजार साल में अब तो तुम्हें पता लगाना मुश्किल हो जाएगा कि गलती कहां हो रही है।
यह तो बड़ा क्यू है। इसमें तो अष्टावक्र गिरे तो भी तुम्हें पता न चलेगा कि वे गिर गए खड्ड में। काम नहीं आई उनकी गीता। वे तड़प रहे हैं पड़े हुए। उसका भी तुम्हें पता नहीं चलेगा। तुम तो भेड़—चाल से चलते चले जाओगे। जब दस—पांच हजार साल में तुम भी उनके ऊपर गिरोगेउनकी हड्डियों परतब तुम्हें पता चलेगा कि यह तो भूल हो गई है। लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होगी।
नहींभूल कर किसी के पीछे मत चलना। सुन लेनाजान लेनासमझ लेनालेकिन उत्तरदायित्व सदा अपना अपने हाथ में रखना। तो उसका लाभ हैकम से कम क्यू तो नहीं है आगे। तुम गिरोगे तो पता तो चलेगा कि मैं गिरा। तुम गिरोगे तो गिरना क्यों हुआकिस कारण से हुआ—इसका तो पता चलेगा! अगली बार उस तरह का कारण न दोहरेइसकी समझ तो आएगी। दस—पांच बार गिर कर तुम्हें साइकिल चलाने की कला आ जाएगी। वह कला हैविज्ञान नहीं। विज्ञान होता तो दूसरा दे देता। कला कोई दे नहीं सकताकला सीखनी पड़ती है अनुभव से।
तो तुमने मुझसे पूछा है कि 'प्रश्न है जब तक विवेक न हो तब तक कैसे पता चले कि जो आवाज अंदर से आ रही है वह विवेक—जन्य है या मन का ही एक खेल है?'
कोई उपाय नहीं है जानने का। अनुभव से ही तुम्हें धीरे — धीरे पता चलेगा। कैसे पता चलेगाजो मन का खेल हैउससे तुम हमेशा तकलीफ में पड़ोगे—हमेशा तकलीफ में पड़ोगेदुख आएगा! और जो मन का खेल नहीं हैउससे हमेशा आनंद की स्फुरणा होगी। वही कसौटी है। जो भीतर से आ रहीअंतरात्मा सेउसका फल सदा ही आनंद हैसच्चिदानंद है। जो मन का है जालउससे तुम हमेशा दुख पाओगे। दुख से पता चलेगा। करके ही पता चलेगा किससे दुख मिलाकिससे सुख मिला। जिससे सुख मिलेवह सत्य की तरफ जा रही है यात्राऔर जिससे दुख मिलेवह असत्य की तरफ जा रही है यात्रा।
तुमने सुना हैपढ़ा है कि नर्क में दुख है। अच्छा हो इसे थोड़ा उल्टा कर लो : दुख में नर्क है। तो जहां—जहां दुख मिले,तुम समझ लेना कि नर्क की तरफ चल रहे होगड्डे में गिर रहे हो। जहां—जहां सुख मिलेतरंग आए समाधि कीलहर उठे,गीत फूटेखिले भीतर के इंद्रधनुषसुवास उठेसंगीत जन्मे—समझना कि चल रहे स्वर्ग की तरफ।
चलते—चलतेगिरते —उठते आदमी सीखता है। एक भूल कभी मत करना—और वह भूल है. बैठे मत रह जाना भूल के डर से। भूल करनी ही होगी। हौएक ही भूल को दुबारा करने की कोई जरूरत नहीं। तो बोधपूर्वक भूल करना। और एक भूल जब हो जाए और पता चल जाए तो पछताते मत बैठे रहना कि भूल हो गई। उतना अनुभव हुआ। लाभ हुआ। अब आगे ऐसी भूल दुबारा न होइसकी गांठ बांध लेना। ऐसे धीरे — धीरे तुम पाओगेभूल कम होती गईंकम होती गईंएक दिन भूल समाप्त हो गई और तुम्हारे जीवन में विवेक का उदय हो गया।
तुमसे मैं यह पूछता हूं—तुमने पूछा है कि अगर हम दूसरे से उपदेश न लें तो हमें कैसे पक्का पता चलेगा कि क्या ठीक और क्या गलतक्या मन का खेल और कया विवेक की आवाज? '—मैं तुमसे पूछता हूं बिना विवेक के जगे तुम कैसे पक्का करोगे कि किसकी मानें और किसकी न मानेंप्रश्न तो वही का वही है। हजारों लोग हैंहजारों शास्त्र हैंहजारों शास्ता हैं,सबके मंतव्य अलग हैंसबकी दृष्टि अलग है—इसमें तुम किसको चुनोगेमहावीर को चुनोगे कि कृष्ण को चुनोगेकैसे
चुनोगेक्योंकि महावीर कहते हैंचींटी भी न मरेनहीं तो सडोगे नरकों में। कृष्ण कहते हैं. फिक्र ही मत करसब उसकी लीला है! तू बेधड़क मार। तू मारने वाला कौनऔर फिर कभी आत्मा मारी गई हैन हन्यते हन्यमाने शरीरे। यह तो शरीर ही गिरता—उठता हैआत्मा कभी मरती नहीं। तू तलवार से काटेगातब भी नहीं कटती। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि। तू फिक्र ही छोड़,यह तो खेल है!
किसकी मानोगेकैसे तय करोगेकौन ठीक इन दो गुरुओं मेंतय करने का लोगों ने एक सस्ता रास्ता निकाल लिया है. जिस घर में पैदा हुए। अगर जैन घर में पैदा हुए तो महावीर को मानेंगे। यह भी कोई बात हुईसिर्फ घर में पैदा हो जाने से! हिंदू घर में पैदा हुए तो कृष्ण को मान लेंगे! कैसे तय करोगे कौन ठीक हैअंततः तो तुम्हीं को तय करना है।
जब तुम गुरु भी चुनते होतब तुम कैसे तय करते हो यह अंतरात्मा से आवाज उठी कि मन की आवाज हैतुम बच नहीं सकते। यह निर्णय तो तुम्हारा ही होगा। तुम अगर मुझे गुरु चुन लोतो तुम कैसे पक्का करोगे कि इस आदमी की बातचीत में उलझ गएसम्मोहित हो गएप्रीतिकर थी बातचीततर्कयुक्त थी—इसलिए उलझ गए या कि सच में यह आदमी जाग्रत पुरुष हैकैसे तय करोगेक्या उपाय हैक्या कसौटी हैतुम्हीं तो तय करोगे न! तो वही प्रश्न वहीं का वहीं खड़ा है।
जब तय तुम्हीं को करना है तो एक बात साफ है कि परमात्मा ने निर्णय की शक्ति प्रत्येक व्यक्ति को दी हुई है और निर्णय किसी दूसरे पर नहीं छोड़ा जा सकता। तुम निर्णायक हो।
सुनो मेरीसमझो मेरी। हृदयपूर्वक समझने की कोशिश करोसमग्रता से समझने की कोशिश करो। लेकिन जब अंतिम निर्णय लोगेतो निर्णय तो तुम्हीं लोगे कि यह आदमी ठीक कह रहा है कि गलतइसकी मान कर चलें कि न चलें। तो तुम कुछ भी करोचाहे किसी के पीछे चलोचाहे न चलोचाहे अपने पैर चलोचाहे किसी के कंधे पर सवार हो कर चलो—निर्णायक तुम ही होजिम्मेवारी तुम्हारी है। तुम तो चाहते हो जिम्मेवारी टल जाए। तो कल अगर गड्डे में गिरो तो तुम मेरी गर्दन पकड़ लो कि देखोगिराया गड्डे मेंमैं तो आपके पीछे चल रहा था!
इसलिए मैं पहले ही कहे दे रहा हूं. मेरे पीछे चलने से कुछ मतलब नहीं है। गड्डे में गिरोगे तो तुम गिरोगे। और गड्डे में गिरोगे तो मैं गड्डे के किनारे खड़े हो कर हसूंगामैं कहूंगामैंने पहले ही कह दिया था। तुम्हारी मर्जी थीतुम मेरे पीछे चले,फिर भी सुन कर चले। मैंने पहले ही कह दिया था कि अगर गिरोगे तो तुम गिरोगे। तुम मुझसे यह न कह सकोगे कि हम तो आपके पीछे चल रहे थे। आपने ही चुना था। मेरे पीछे चलना भी आपने चुना था। मैंने जबर्दस्ती थोप नहीं दिया था। जबर्दस्ती कौन किस पर थोप देता हैकैसे थोपा जा सकता है?
लेकिन आदमी उत्तरदायित्व से बचता है। आदमी चाहता हैकिसी के कंधे पर जिम्मेवारी हो जाए तो कल हम कह तो सकेंअगर अदालत हो कहीं परमात्मा कीतो हम कह सकें हम तो बिलकुल निर्दोष हैंये गेरुए वस्त्र इस आदमी ने पहना दिए थे। अब क्या पक्का है तुम्हें कि परमात्मा गेरुए वस्त्र के पक्ष में होगाकुछ पक्का नहीं है। बुद्ध ने पीले वस्त्र चुन लिए थेहो सकता हैपरमात्मा पीले वस्त्र के पक्ष में हो। पार्श्वनाथ ने सफेद वस्त्र चुन लिए थेहो सकता है परमात्मा सफेद वस्त्रों के पक्ष में हो। और महावीर नग्न खड़े हो गए थेहो सकता है परमात्मा न्यूइडस्ट हो। करोगे क्यायह तो परमात्मा जब आएगातभी। उस वक्त तुम यह न कह सकोगे कि हमें तो कुछ पता ही नहीं थाहमें तो इस आदमी ने कह दियागैरिक वस्त्र पहन लो,हमने गैरिक वस्त्र पहन लिए।
नहींतब तुम्हें जवाब स्वयं ही देना होगा। यह चुनाव भी तुम्हारा चुनाव है। अगर तुमने यह चुना कि मेरे प्रति समर्पित हो जाओयह भी तुम्हारा संकल्प हैयह भी तुमने ही चाहा है। इस तरह तुम इस बात को सदा ही याद रखना कि तुम्हीं निर्णायक होतुम्हीं उत्तरदायी हो और अंतिम रूप से जो भी फलित होगाघटित होगाउसका श्रेय भी तुम्हारा है।
ऐसा मान कर जो व्यक्ति चलता है—वही सत्य का शोधकखोजी।
खतरे तो हैं ही। जीवन जोखिम है। और जो जितने ज्यादा खतरे उठाता हैउतना ही जानने में समर्थ हो पाता है। जो लोग खतरे नहीं उठातेवे मिट्टी के लौंदे रह जाते हैं। उनके जीवन में कोई धार नहीं होती। उनके जीवन में कोई त्वरा नहीं होती। कोई चमक नहीं होती। उनके जीवन में प्रतिभा नहीं होती। तुम जा कर देख सकते होऐसे मिट्टी के लौंदे तुम्हें आश्रमों में बैठे मिलेंगेमंदिरों में बैठे मिलेंगे—घंटियां बजा रहेपूजा कर रहेकोई उपवास कर रहा——मिट्टी के लौंदे हैं! उन आंखों में तुम बिजलियां न पाओगेऔर उनके प्राणों में तुम वह ऊर्जा न पाओगेजो ऊर्जा सत्य को पाने के लिए अत्यंत अनिवार्य है। तुम उन्हें मुर्दा पाओगे। तुम उन्हें लाश की तरह पाओगे।
तो मैं तुमसे यह कहता हूं कि ऐसे तुम मत बन जाना। तुम अपनी निजता को बचाना और अपनी निजता को निखारना। और कितनी ही कठिनाई होकभी अपनी निजता को मत खोना। क्योंकि निजता ही तुम्हारी आत्मा है और उसी आत्मा में छिपा है सत्य।
बुद्ध ने अंतिम वचन कहा है आनंद को. 'अप्प दीवो भव!अपना दीया स्वयं बन। आनंद रोने लगा था बुद्ध को जाता देख करबुद्ध चले। घबड़ा गया होगा। इन्हीं के पीछे चलता रहा चालीस— व्यालीस साल। पूरा जीवन दाव पर लगा दिया। इन्हीं की पीठ के सिवाए कुछ देखा नहीं। इन्हीं के पीछे चलता रहाउठता रहाबैठता रहाआज ये चलेतो रोने लगा! स्वाभाविक था रोना। उसने कहा कि मैं तो अभी तक पहुंचा नहीं और आपके जाने की घड़ी आ गई। तो बुद्ध ने कहा. मैंने तुझे कभी कहा ही नहीं कि मैं तुझे पहुंचा दूंगा। अपना दीया खुद बन! और आनंदशायद मेरे कारण बाधा पड़ती रही होतो अब मैं जा रहा हूं;अब वह बाधा भी न रहेगी। अब तेरे सामने कोई पीठ न होगीअब तेरे सामने खुला आकाश होगा।
और आश्चर्य की घटना है कि आनंद चौबीस घंटे बाद ही ज्ञान को उपलब्ध हुआ। व्यालीस साल में जो न हो सकावह चौबीस घंटे में हुआ। यह बात तीर की तरह चुभ गई। यह बात तो उसकी समझ में आ गई कि आज बुद्ध चलेअब मैं अकेला रह गया।
अकेले तो हम सदा से हैं। किसी के पीछे चलो तो भी तुम अकेले होभ्रांति भर पैदा होती है कोई साथ है। इस अकेलेपन को तुम पहले से ही याद रखो। बुद्ध ने आनंद से अंत में कहा थामैं अपने 'आनंदोंसे प्रथम से कह रहा हूं कि तुम अपने दीये स्वयं बनो। तब कोई जरूरत नहीं कि मेरे जाने के बाद चौबीस घंटे में तुम ज्ञान को उपलब्ध होओतुम मेरे रहते चौबीस क्षण में ज्ञान को उपलब्ध हो सकते हो। क्योंकि ज्ञान को उपलब्ध होने का कुल अर्थ इतना ही है कि यह जीवन मेरा है और मैं उत्तरदायी हूं। भूल होगीचूक होगी तो मैं जिम्मेवार हूं। मैं उत्तरदायित्व पूरा अपने हाथ में लेता हूं। मैं अपनी मालकियत अपने ऊपर घोषणा करता हूं।
इसलिए तो तुम संन्यासियों को मैं स्वामी कहता हूं। स्वामी का अर्थ है. तुम्हारी मालकियत तुम्हारे हाथ में है। यह मैंने घोषणा कर दी कि अब तुम स्वामी हुए। अब तुम्हारा कोई भी स्वामी नहीं है। अब तुम अपने स्वामी हो। यह तुम्हारा स्वामित्व है।
इस घोषणा के साथ ही सत्य की यात्रा शुरू होती है। और इस घोषणा को जिस दिन तुम पूरा—पूरा अनुभव कर लोगेउस दिन आ गई मंजिलउस दिन आ गया अपना घर।
सिखलाका वह ऋत् एक ही अनल है,
जिंदगी नहीं वहांजहां नहीं हलचल है।
जिनमें दाहकता नहींन तो गर्जन है, '
सुख की तरंग का जहां अंध वर्जन है।
जो सत्य राख में सने रुक्ष रूठे हैं,
छोड़ो उनकोवे सही नहींझूठे हैं।
जो सत्य राख में सने रुक्ष रूठे हैं।
छोड़ो उनकोवे सही नहींझूठे हैं।
जीवंत सत्य तो तुम्हारे भीतर पैदा होगा। बाहर से तुम जो भी ले आए होसब कूड़ा—कर्कट हैकिसी और से इकट्ठा कर लिया हैसब उधार और बासा और व्यर्थ है। आग लगा दो उस सब में। वे सब सत्य राख में सने हैं।
तुम्हारा सत्य तुम्हारे भीतर पैदा होगा। तुम्हारे सत्य के लिए तुम्हें ही प्रसव—पीड़ा से गुजरना होगा। तुम्हारा सत्य तुम्हारे भीतर जन्मेगा। तुम्हें उस सत्य के लिए गर्भ बनना होगाऔर प्रसव—पीड़ा से गुजरना होगा।
खयाल किया तुमनेकोई स्त्री को बच्चा पैदा नहीं होतावह किसी के बच्चे को गोद ले लेती है। ऐसे मन समझाना हो जाता है।
मैं तुमसे कहता हूं. सत्यों को गोद मत लेना। यह तो बड़ी झूठ हो जाएगी। और हम सबने सत्य गोद ले लिए हैं। कोई हिंदू बना बैठा हैकोई ईसाईकोई मुसलमानकोई जैन। हमने सब सत्य उधार ले लिए हैं।
नानक का सत्य हैतुम सिक्ख बने बैठे होयह सत्य तुम्हारा नहीं है। नानक ने इसके लिए पीड़ा सहीनानक ने गर्भ धारण किया—इस सत्य को जन्म दिया। तुम मुक्त लिए बैठे हो। तुमने इसके लिए कुछ भी नहीं किया। न तुम आग में गएन तुम जलेन तुम भटकेन तुम गिरे—तुम्हें यह मुक्त मिला। पीड़ा निखारती है। मुफ्त मिलने से कुछ भी निखार नहीं आता।
गोद मत लेना सत्यों को—जन्माना। और जब तुम जन्माने में समर्थ हो पाओगेतभी तुम्हारे भीतर वह तरंग उठेगी निजता कीव्यक्तिगत की। तुम अद्वितीय बनोगे। अद्वितीयता धर्म का आखिरी फल है।
और यह भी मैं जानता हूं कि अचानक आज तुम पूरे सत्य को न पा सकोगे। इंच—इंच चलना होगाघिसटना होगा—और चढ़ाई बड़ी है और पहाड़ ऊंचा हैऔर सांस घुटेगीऔर सब बोझ छोड़ देना होगाक्योंकि जरा भी बोझ नहीं ले जाया जा सकता। जैसे—जैसे पहाड़ पर कोई चढ़ने लगता हैवैसे—वैसे बोझ कम करना पड़ता है। जब हिलेरी एवरेस्ट पर पहुंचाउसके पास कुछ भी नहीं था। पानी की बोतल भी थोड़े पीछे उसे छोड़ देनी पड़ीक्योंकि उतना बोझ ढोना भी मुश्किल हो गया। जितनी ऊंचाई होती है उतना बोझ मुश्किल हो जाता है। सब सामान ले कर आया थावे धीरे — धीरे सब छूट गएधीरे— धीरे सब डालता गयाराह के किनारे रखता गयाक्योँकि उनका खींचना मुश्किल होने लगा था। जब पहुंचा तो अकेला थाखाली था।
और जिस गौरीशंकर की चढ़ाई की मैं तुमसे बात कर रहा हूं वह तो आखिरी ऊंचाई है अस्तित्व की। वह आज न घट जाएगी। इंच—इंच जलना और तपना होगा। धीरे— धीरे तुम छोड़ पाओगे। मगर छोड़ने का खयाल रहे।

            बांसों—बांस उछलती लहरें।

            देख लिया है चांद सलोना,
लेकिन हाथ रह गया बौना।
रह—रहकर कर मलती लहरें,
बांसों—बांस उछलती लहरें।

            शीतलता कैसी बिखरा दी,
पानी में ही आग लगा दी।
बुझती और सुलगती लहरें,
बांसों—बांस उछलती लहरें।

            स्वप्न —लोक के यात्रा — पथ पर,
भावुकता ने रचा स्वयंवर,
असफल हो सिर हरनती लहरें,
बांसों — बांस उछलती लहरें।

 चांद तो दिखाई पड़ने लगता है उपदेश सेतुम बांसों—बांस उछलने लगते हो। मगर इतने से चांद मिल न जाएगा। उपदेश से चांद नहीं मिलेगाउपदेश से चांद दिखेगा। मिलेगा तो तुम्हारे अपने जीवन को एक अनुशासन और आदेश देने से।
वह जो मैंने कहा कि तुम उपदेश सब से ले लेनाआदेश स्वयं देना—उसका इतना ही अर्थ है। महावीरबुद्धकृष्ण,क्राइस्टनानककबीरउनके पास तुम्हें पहली दफे चांद की स्मृति आएगी कि चांद है। पहली दफे तुम्हारी जमीन में गड़ी आंखें ऊपर उठेंगी और आकाश को देखेंगी। तुम उछलोगे खूब। जीवन बड़ी प्रफुल्लता से भर जाएगा।
सदगुरु के पास होना एक अपूर्व अनुभव है। तो फिर सत्य को पहुंच जाना तो कैसा अपूर्व होगासोच लो! सदगुरु के पास होना भी अपूर्व अनुभव है। जिसे सत्य मिला हैउसके पास होना भी अपूर्व अनुभव है।
बांसों —बांस उछलती लहरें
देख लिया है चांद सलोना
लेकिन हाथ रह गया बौना।
रह—रहकर कर मलती लहरें
बांसों—बांस उछलती लहरें!
तुम्हारा हृदय उछलने लगेगातरंगें लेने लगेगा : चांद दिखाई पड़ने लगा!
लेकिन उपदेश को ही तुम सब मत समझ लेना—शुरुआत हैप्रारंभ है। चांद तक चलना हैचांद तक पहुंचना है। और तुम अपने ही पैरों से पहुंच पाओगे। कोई किसी और के पैरों से कभी नहीं पहुंचा है। अप्प दीपो भव! अपने दीए बनो!

 तीसरा प्रश्न :

मैं आंसू का एक झरना हूं? लेकिन हूं कंधा हुआ अरसे से। कैसे चट्टान हटे बुद्धि की, कैसे मैं फूट कर बह निकलूं?

पूछा है 'योग प्रीतमने। प्रीतम कवि हैं। और कवि के लिए सदा एक कठिनाई है। और कठिनाई यह है कि कवि का अस्तित्व तो होता है हृदय काअभिव्यक्ति होती है बुद्धि की। तो कवि के भीतर एक द्वंद्व होता हैएक सतत द्वंद्व है। जो उसे कहना हैवह शब्दों के पार है। और जो उसे कहने का माध्यम हैवे शब्द हैं। जो वह उडेलना चाहता हैवह हृदय है—और उडेलना पड़ता है बुद्धि की भाषा में। सब कट—पिट जाता हैसब खंड—खंड हो जाता हैछितर जाता है।
इसलिए कवि सदा पीड़ा में रहता है। कवि कभी तृप्त नहीं हो पाता। और जो कवि तृप्त हो जाए वह बहुत छोटा कवि है;तुकबंद कहना चाहिएकवि नहीं। जितना बड़ा कवि हो उतनी अतृप्ति होती है। तडुफता है कुछ प्रगट होने को। और जब उसे प्रगट करना चाहो तब मिलते हैं छोटे —छोटे शब्दजिनमें वह समाता नहीं। बड़ा आकाश है हृदय का और शब्दों के भीतर जगह नहीं हैस्थान नहींअवकाश नहीं।
तो कह—कह कर भी कवि कह नहीं पाता। जीवन भर गा—गा कर भी गा नहीं पाता। जिसे गाने आया था वह तो अनगाया ही रह जाता है। जिसके लिए जीवन भर चाहा था कि प्रगट कर देवह
अप्रगट ही रह जाता है।
तो कवि की दुविधा है। वह दुविधा यह है कि भाव तो प्रगट करना है और बुद्धि से प्रगट करना है। अगर कवि इसमें ही उलझा रहे तो सदा बेचैन और असंतुष्ट रहेगा।
कवि एक साथ दो संसारों में जीता हैतो बड़ा तनाव होता है। पश्चिम में बहुत—से कवि आत्महत्या कर लिए। और बहुत—से कवि पागल हो जाते हैं। और अक्सर कवि शराब पीने लगते हैं। और उसका कुल कारण इतना है कि उनके भीतर इतनी बेचैनी होती है कि उस बेचैनी को ढालने के लिए सिवाय शराब केबेचैनी को ढांकने के लिए सिवाय शराब के और कुछ मिलता नहीं। किसी तरह अपने को विस्मरण करना चाहते हैंवह तनाव भारी है।
कवि तब तक खिंचा रहता है जब तक कि संत न बन जाए। कवि तब तक असंतुष्ट रहता है जब तक संत न बन जाए। संत बनने का अर्थ है कि अब बुद्धि से प्रगट करने की चेष्टा छूटती हैअब प्रगट करने की चेष्टा विचार से छूटती हैऔर नए ढंग पकड़ता है कवि। जैसे मीरा नाचने लगीबजाने लगी अपना सितारकि बाऊल ले लेते इकताराले लेते एक डुगीबजाने लगते डुग्गी और बजाने लगते इकतारा और नाचने लगते। जो बड़े—बड़े कवि नहीं कह पातेवे बाऊल कह पाते हैं। कि चैतन्य महाप्रभु नाचने लगे। वे जो कहना चाहते थेवह नाच से ज्यादा आसानी से कहा जा सकता है। शब्द उसके लिए ठीक माध्यम नहीं हैं। तो जब तक कवि रहस्य को अपने समग्र व्यक्तित्व से प्रगट न करने लगेतब तक अड़चन होती है।
'मैं आंसू का इक झरना हूं,—पूछा है—'लेकिन हूं रुंधा हुआ अरसे से!'
रुंधे हुए होइसीलिए आंसू के झरने होऐसा प्रतीत होता है। जैसे ही आंसू प्रगट हुआमुस्कान बन जाता है। मुस्कान रुंधी रह जाएआंसू हो जाती है। रुंधी मुस्कान का नाम ही आंसू है।
इसलिए तो तुम जब कभी रो लेते हो तो हलके हो जाते हो। और अगर तुम दिल भर कर रो लो तो तुम्हारे चेहरे पर एक स्मित आ जाता हैएक प्रसाद आ जाता हैएक आशीष की वर्षा हो जाती है तुम्हारे ऊपर। इसलिए तो रोने में इतना प्रसाद है।
पुरुषों ने खो दिया प्रसाद। स्त्रियों के चेहरे पर थोड़ा प्रसाद शेष रहा हैक्योंकि उन्होंने रोने की क्षमता कभी नहीं खोई। स्त्रियों ने बहुत कुछ खोयालेकिन एक बहुत बहुमूल्य चीज बचा लीवह रोने की क्षमता। पुरुषों ने बहुत कुछ बचायाशक्ति,पदप्रतिष्ठा। लेकिन कुछ बहुत बहुमूल्य खो दियावह रोने की क्षमता खो दी। उनकी आंखें गीली नहीं हो पातीं। और जिसकी आंखें गीली नहीं हो पातीं उसका हृदय धीरे— धीरे पथरीला हो जाता है।
तो मैं तुमसे कहूंगा : प्रीतमअगर तुम्हें लगता है आंसू का झरना भीतर पड़ा है—
'... रुंधा हुआ अरसे से
कैसे चट्टान हटे बुद्धि की?
कैसे मैं फूट कर बह निकलूं?'
और तुम जो प्रश्न पूछ रहे होवह फिर बुद्धि का है—'कैसे?' तुम बुद्धि से ही बुद्धि को न हटा सकोगे। रोओदिल भर कर रोओ। कौन रोकता हैपहले संकोच लगेगातो एकांत में चले गएवृक्षों के पास बैठ लिए। वृक्ष तुम्हारा बिलकुल भी अपमान न करेंगे कि रो रहेअरे स्त्रैण मालूम होते! वृक्ष तुमसे बिलकुल न कहेंगे कि प्रीतम रोओ मतयह पुरुष जैसा नहीं मालूम पड़ताअरे बहादुर आदमीतुम रो रहेचले जाओ पहाड़ियों मेंचले जाओ नदी के तट पर। रोओ! वृक्ष तुम्हें स्वीकार करेंगे। नदियां तुम्हें स्वीकार कर लेंगी! पहाड़ तुम्हें स्वीकार कर लेंगे। दिल भर कर रोओ। रोने के लिए 'कैसेक्या पूछनारोना शुरू करो।
रोना तो एक कृत्य है। कैसे का कोई सवाल नहीं है। कैसे का तो मतलब यह है कि अब तुम पहले इंतजाम करोगेविधि—विधान करोगेअनुष्ठान करोगेआयोजन करोगे कि कैसे रोएं। तो क्या करोगेमिर्ची पीस कर आंखों में डालोगेतो रोना झूठा हो जाएगा।
अभिनेता वैसा करते हैं। अब रामलीला में राम को रोना पड़ रहा है और सीता का उन्हें कोई दर्द है नहीं। सीता है भी नहीं सीतागांव का कोई लड़का ही बना हुआ है। हो सकता है राम और सीता में झगड़ा भी हो। तो अब क्या करनातो मिर्च का थोड़ा—सा मसाला बना लेते हैं। उसको हाथ में लगाए रखते हैं। जब रोना पड़ता है राम को तो वे अपनी आंख में लगा लेतेआंसू बहने लगते हैं। आयोजन करके जो रोना आएगावह झूठा हो जाएगा। चेष्टा से जो आंसू आएंगेवे आंसू न रहेउनका प्रसाद—गुण खो गया। इतना कुछ है चारों तरफ इतना दुख हैउसे देखकर रोओ! इतनी पीड़ा हैउसे देखकर रोओ! इतना आनंद हैउसे देखकर रोओ! इतने फूल खिले हैंउन्हें देखकर रोओ! इतने चांद—तारे हैंउन्हें देखकर रोओ! रोने के लिए क्या कमी हैपूरा आयोजन है। और रोओ—ध्यानपूर्वक! डोलो रोने में! नाचो रोने में! बहने दो आंसुओ की धार!
शुरू—शुरू में कठिनाई होगीक्योंकि बहुत दिन का अवरुद्ध है तो शायद तुम भूल गए होओ। स्वात में जाकर बैठ जाओ और प्रतीक्षा करो। किसी—न—किसी दिन तुम अचानक पाओगेआंखों से आंसू बहने लगे अकारण।
लोग सोचते हैंकारण चाहिए। घर में कोई मरेगा तो रोके। मृत्यु रोज घट रही हैतुम्हारे घर में घटेगीइसके लिए क्या प्रतीक्षा करते होजीवन मृत्यु से घिरा है। चले जाओ मरघट पर।
बुद्ध भेज देते थे अपने भिक्षुओं को मरघट पर कि तीन महीने वहीं ध्यान कर लो। कोई लाश आएगीजलेगीतुम बैठ कर देखते रहो।
रोना है तो हर जगह सुविधा है। कारण खोजने की कोई विशेष जरूरत ही नहींसब जगह कारण मौजूद है। देखते हो,वृक्ष पर पत्ता थाकल तक हरा थाआज पीला हो गया! देखते रहो उस पीले होते पत्ते को—और तुम पाओगे तुम्हारी आंखें डबडबा आईं। और तुम पाओगे वह पत्ता पीला होकर गिरने लगावह टूट गयाअब जमीन पर पड़ा है। ऐसे ही सब गिर जाएगा। ऐसे ही तुम गिर जाओगे। ऐसा गिरना ही होने वाला है।
जो फलासो झरा। यहां जो जन्मासो मरा। यहां सब तरफ इन हरे—से—हरे वृक्षों को भी मृत्यु की काली छाया घेर कर खड़ी है।
फिर कोई दुख ही जरूरी नहीं है रोने के लिएसुख भी! इतनी मृत्यु के घिराव में भी जीवन नष्ट नहीं होता—देखो तो इस अपूर्व चमत्कार को! इतने कांटे हैंफिर भी फूल खिले चले जाते हैं। मौत रोज—रोज आती हैफिर भी बच्चे जन्मे जाते हैं। परमात्मा थकता नहीं। मौत जीत नहीं पाती। जीवन हारता नहींजीवन बढ़ता ही चला जाता है। आये मौत कितनीजीवन फिर नई तरंगें ले कर उठ आता
है। मौत आती रहती है और जीवन बढ़ता जाता है।
इस अहोभाव को देखोइस आनंद भाव को देखो! इस अपने होने को सोचो। यह होना इतना आश्चर्यजनक है —तुम देख पाते होसोच पाते होअनुभव कर पाते हो। तुम होइतना ही काफी है। यह भाव ही तुम्हें डोला जाएगा।
तो स्वात में बैठोशिथिल हो जाओधारणाएं छोड़ो। देखो आकाश के तारों कोकि बहती नदी की धार कोकि आकाश में उठे हुए वृक्षों कोकि घूमते— भटकते बादलों को। इस जीवन—प्रकृति के चमत्कार से घिर जाओ। और तुम पाओगे आंखों से आंसू बहने लगे।
विधि की नहीं बात करूंगाक्योंकि तुम पूछते हो 'कैसे?' कैसे में तो अड़चन हो जाएगी। कैसे ही से तो रुकावट पड़ गई है।
फूट कर बह निकलने में बुद्धि बाधा नहीं दे रही है। तुम बुद्धि को पकड़े होइसलिए बाधा है। इसे भी खयाल में ले लेना। लोग सोचते हैंबुद्धि बाधा दे रही है। बुद्धि बाधा नहीं दे रही।
चैतन्य महाप्रभु के पास कुछ कम बुद्धि न थी। लेकिन फर्क इतना ही है कि उन्होंने बुद्धि को पकड़ा नहीं। बुद्धि अपनी जगह हैहृदय उसे डुबाता हुआसरोबोर करता हुआ बहता रहता है। बुद्धि बाधा नहीं डालती। सच तो यह हैजहां चट्टानें होती हैं। वहां नदी में संगीत आ जाता है।
तुमने देखाझरना जब चट्टानों से बह कर निकलता है तो झरने में संगीत आ जाता है! चट्टानें न हों तो संगीत खो जाता है। झरना कुछ रिक्त हो जाता है बिना चट्टानों के। झरने में शोर नहीं रह जातास्वर नहीं रह जाता। झरना नीरव हो जाता है। झरने की वाणी खो जाती है।
तो मैं तो तुमसे कहता हूं बुद्धि की फिक्र ही मत करो। बुद्धि को रहने दो पत्थर की तरहचट्टानों की तरहबहो बुद्धि के ऊपर सेबहो बुद्धि को घेर कर। और तुम पाओगे कि तुम्हारे हृदय के बहते झरने पर जब बुद्धि की चट्टानों की टक्कर होती है तो उठेगा एक संगीतउठेगा एक निनादएक मरमर! वही काव्य है। वही असली कविता है।
एक तो ऐसी कविता है जो भाव उठता है और उसको तुम चेष्टा करके बुद्धि के शब्दों में ढालते हो—वही तुम्हारी अड़चन है अभी। एक और भी कविता हैजो बहती अनायासबुद्धि की चट्टानों से टकराती। उस टकराहट से जो रव पैदा होता हैजो लय पैदा होती हैवह जो गुनगुनाहट पैदा हो जाती है—वह एक कविता है। उस कविता में अर्थ कम होगालय ज्यादा होगी। उस कविता में व्याकरण कम होगासंगीत ज्यादा होगा। उस कविता को शायद बुद्धि के ढांचे में समझा ही न जा सकेलेकिन फिर भी हृदय उससे आंदोलित होगा।
आधुनिक काव्य की यही खूबी है। उसने व्याकरण छोड़ीलयबद्धता पुराने ढंग कीमात्राछंद का आयोजन छोड़ा। नई कविता शुद्ध कविता है। पुरानी कविता से उसने बड़ी ऊंचाई ली है। यह बहुत लोगों की समझ में नहीं आतीक्योंकि बहुत लोग सीमा के बाहर को नहीं समझ पाते। बहुत लोग व्याकरण के बाहर को नहीं समझ पाते। बहुत—से लोग परिभाषा के बाहर को नहीं समझ पाते।
ऐसा नए चित्रों में भी हुआ हैनई मूर्तियों में भी हुआ हैनई कविता में भी हुआ है। सारे जगत में एक विस्फोट हुआ है—वह विस्‍फोट हृदय को बहाने से है। बुद्धि के पत्थर पड़े रहने दो। इससे हानि नहीं है। इससे बुद्धि के इन पत्थरों से थोड़ी समृद्धि ही बढ़ेगी।
और कवि को चाहिए प्रेमचाहिए प्रार्थनाचाहिए परमात्माअन्यथा अड़चन रहेगी। जब तक कविता भजन नै बनेतब तक दुविधा रहेगी। और जब तक कविता प्रार्थनापूर्ण न हो जाएअर्चना न बनेनैवेद्य न बनेतब तक अड़चन रहेगी।

            कौन है अंकुश
इसे मैं भी नहीं पहचानता हूं।
पर सरोवर के किनारे
कंठ में जो जल रही है,
उस तृषाउस वेदना को जानता हूं।
आग है कोई नहीं जो शांत होती
और खुल कर खेलने से निरंतर भागती है।
टूट गिरती हैं उमंगें
बाहुओं का पाश हो जाता शिथिल है,
अप्रतिभ मेंफिर उसी दुर्गम जलधि में डूब जाता
फिर वही उद्विग्न चिंतन
फिर वही पृच्छा चिरंतन
रूप की आराधना का मार्ग
आलिंगन नहीं तो और क्या है?
स्नेह का सौंदर्य को उपहार
रस चुंबन नहीं तो और क्या है?
रक्त की उत्तप्त लहरों की परिधि के पार कोई सत्य हो तो,
चाहता हूं भेद उसका जान लूं
पंथ औसौंदर्य की आराधना का
व्योम में यदि
शून्य की उस रेख को पहचान लूं।
पर जहां तक भी उडूं
इस प्रश्न का उत्तर नहीं है।
मृत्तिमहद् आकाश में ठहरें कहां पर
शून्य है सब
और नीचे भी नहीं संतोष।
मिट्टी के हृदय से
दूर होता ही कभी अंबर नहीं है।
इस व्यथा को झेलता
आकाश की निस्सीमता में
घूमताफिरताविकलविभ्रांत
पर कुछ भी न पाता
प्रश्न जो गढ़ता
गगन की शून्यता में गज कर सब ओर
मेरे ही श्रवण में लौट आता।
मैं न रुक पाता कहीं
फिर लौट आता हूं पिपासित
शून्य से साकार सुषमा के भुवन में
युद्ध से भागे हुए
उस वेदना—विह्वल युवक—सा
जो कहीं रुकता नहीं
बेचैन जा गिरता अकुंठित
तीर—सा सीधे प्रिया की गोद में।
नींद जल का स्रोत है
छाया सघन है
नींद श्यामल मेघ है
शीतल पवन है।
किंतु जग कर देखता हूं
कामनाएं वर्तिका—सी बल रही हैं
जिस तरह पहले पिपासा से विकल थीं
प्यास से आकुल अभी भी जल रही हैं।
प्राण की चिरसगिनी यह वहि
इसको साथ लेकर
भूमि से आकाश तक चलते रहो
मर्त्य नर का भाग्य
जब तक प्रेम की धारा न मिलती
आप अपनी आग में जलते रहो।
मर्त्य नर का भाग्य
जब तक प्रेम की धारा न मिलती
आप अपनी आग में जलते रहो!

 काव्य एक यात्रा का प्रारंभ हैअंत नहीं। काव्य की अंतिम पूर्णाहुति तो प्रेम में है।
कवि का हृदय तो केवल इस बात की सूचना दे रहा है कि प्रेम की बड़ी गहरी संभावना हैजो नहीं घट रहा है। करो प्रेम!
तुम पूछोगे 'कैसेफिर। प्रेम के लिए 'कैसेकी कोई भी जरूरत नहीं। शुरू करोऐसे ही जैसे
कोई तैरना शुरू करता हैअनगढ़ हाथ फेंकता है। कोई भी तो यहां जन्म से ही सीखा हुआ नहीं आता। सभी को हाथ इरछे—तिरछे फेंकने पड़ते हैं। फिर धीरे— धीरे तैरने की कुशलता आ जाती है।
करो प्रेम! वृक्षों से करोपशु—पक्षियों से करोमित्रों से करोप्रियजनों से करो। जहां मौका मिले प्रेम का, —खो मत।
हम बड़े अजीब हैं! हम प्रेम के संबंध में बड़े कृपण हैं। प्रेम में हम ऐसे कंजूस हैं कि जिनसे हम कहते हैंहमारा प्रेम है,उनसे भी हम बामुश्किल से प्रेम का संबंध बनाते हैंजैसे कि कुछ लुटा जा रहा हैजैसे कि प्रेम क्या कर लेंगेतो कुछ खो जाएगाजैसे कि प्रेम क्या दे देंगे किसी को तो कुछ मिट जाएगा भीतरजैसे कि कुछ कम हो जाएगा। प्रेम ऐसी संपदा नहीं है। यह तिजोड़ी नहीं है आदमियों कीकि तुमने अगर दस रुपए किसी को दे दिए तो दस रुपए कम हो गए। यह कुछ मामला ही और है। यह तो ऐसे है जैसे कुएं से कोई पानी भर ले। तुम भर लो पुराना पानीनया ताजा झरना कुएं में फूटा चला आ रहा है। पुराने को हटाओनया मिलता है। सड़े को हटाओगले को हटाओ—ताजा मिलता है। जैसे कुएं से पानी को भरते रहो तो कुआं जीवंत रहता हैझरने जागे रहते हैंनई—नई धारें फूटती रहती हैंसागरदूर का सागरकुएं को भरता रहताभरता रहता। बीच की मिट्टी छानती है। सागर के पानी को सीधे नहीं पीया जा सकता। पीयोगे तो मर जाओगे। लेकिन बीच की मिट्टी सागर के पानी को छान लेती हैछान देती है। और कुएं में पानी भागा चला आ रहा है। अगर तुम भरोगे न पानीबांटोगे नहीं पानीतुम कहोगे मेरा कुआ खाली हो जाएगा—तो तुम्हारा कुआ सडेगामरेगा। धीरे — धीरे झरने बहेंगे नहींतो सूख जाएंगे।
अब तुम पूछते हो कि झरनों को कैसे खोलेंमैं अवरुद्ध पड़ा हूं एक अरसे सेरुंधा पड़ा हूं कैसे खोलूं इस झरने कोमैं कहता हूं : बांटो प्रेम! निमंत्रण दो लोगों को! जहां मौका मिल जाए— परिचित सेअपरिचित सेअपने सेपराए सेपहचान वाले सेअजनबी से! प्रेम में कुछ भी तो तुम्हारा खर्च नहीं होता है। दो! जरूरी नहीं कि तुम कुछ दो ही.।
टालस्टॉय ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मैं एक दिन जा रहा था एक राह के किनारे सेएक भिखमंगे ने हाथ फैला दिया। सुबह थीअभी सूरज ऊगा था और टालस्टॉय बड़ी प्रसन्न मुद्रा में थाइंकार न कर सका। अभी— अभी चर्च से प्रार्थना करके भी लौट रहा थातो वह हाथ उसे परमात्मा का ही हाथ मालूम पड़ा। उसने अपने खीसे टटोलेकुछ भी नहीं था। दूसरे खीसे में देखावहा भी कुछ नहीं था। वह जरा बेचैन होने लगा। उस भिखारी ने कहा कि नहींबेचैन न होंआपने देना चाहा,इतना ही क्या कम है! टालस्टॉय ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। और टालस्टॉय कहता हैमेरी आंखें आंसुओ से भर गईं। मैंने उसे कुछ भी न दियाउसने मुझे इतना दे दिया। उसने कहा कि आप बेचैन न हों! आपने टटोलादेना चाहा—इतना क्या कम हैबहुत दे दिया!
न दे कर भी देना हो सकता है। और कभी—कभी दे कर भी देना नहीं होता। अगर बेमन से दिया तो देना नहीं हो पाता। अगर मन से देना चाहान भी दे पाएतो भी देना घट जाता है—ऐसा जीवन का रहस्य है।
बांटते चलो! धीरे— धीरे तुम पाओगेजैसे—जैसे तुम बांटने लगे ऊर्जावैसे—वैसे तुम्हारे भीतर से कहीं परमात्मा का सागर तुम्हें भरता जाता। नई—नई ऊर्जा आतीनई तरंगें आतीं। और एक दफा यह तुम्हें गणित समझ में आ जाए. .यह जीवन का अर्थशास्त्र नहीं हैयह परमात्मा का अर्थशास्त्र हैयह बिलकुल अलग है। जीवन का अर्थशास्त्र तो यह है कि जो हैअगर नहीं बचाया तो लुटे। इसको तो बचानानहीं तो भीख मांगोगे!
मैंने सुनाएक भिखमंगा मुल्ला नसरुद्दीन के द्वार पर भीख मांग रहा था। मुल्ला ने उसे खूब दिल खोल कर दिया। खिलायापिलायावस्त्र पहनाएजाने लगा तो दस का नोट भी दिया। फिर मुल्ला ने उससे पूछा कि तुम आदमी तो भले मालूम पड़ते होतुम्हारे चेहरे से संस्कार मालूम पड़ता है। तुम्हारे वस्त्र भी यद्यपि दीनमलिन हैंफटे—पुराने हैंलेकिन कीमती मालूम होते हैं। यह दशा तुम्हारी कैसे हुई?
वह कहने लगाजैसे आप कर रहे हैंऐसे ही मैं करता था। जल्दी आपकी भी यही दशा हो जाएगी। दे—दे कर यह दशा हुई। बांटता रहाउसी में लुट गया।
तो एक तो इस बाहर के जगत का अर्थशास्त्र है : यहां छीनो तो मिलेगायहां दो तो खो जाएगा। एक भीतर का अर्थशास्त्र हैकबीर ने कहा दोनों हाथ उलीचिए! उलीचते रही तो नया आता रहेगा। बांटते रहो तो मिलता रहेगा। जो बचाया वह गयाजो दिया वह बचा। जो तुमने बांट दिया और दे दियावही तुम्हारा है अंतर के जगत में।
तो दो काम करो : प्रेम बाटो और आंसुओ को आने दो।
और दोनों साथ—साथ हो जाएंगेक्योंकि दोनों एक ही घटना के हिस्से हैं। जितना हृदय में प्रेम बंटने लगता हैउतनी आंखें गीली होने लगती हैंनम होने लगती हैं।
प्राण की चिरसगिनी यह वहि
इसको साथ ले कर
भूमि से आकाश तक चलते रहो
मर्त्य नर का भाग्य
जब तक प्रेम की धारा न मिलती
आप अपनी आग में जलते रहो।
यह जो आज जलन हैयही कल फूल की तरह खिलेगी। यह आज जो अग्नि हैयही कल तुम्हारे भीतर कमल बनेगी। मगर बांटों! प्रेम सूत्र है। और प्रेम के जगत में 'कैसेका कोई संबंध नहीं! बेशर्त बांटी। यह भी मत कहना 'किसको'! यह तो कंजूस पूछता है। पात्र— अपात्रयह भी कंजूस पूछता है। हम कौन हैं तय करें—कौन पात्रकौन अपात्रजो मिल जाएदे दो।
और जो तुमसे तुम्हारे प्रेम को ले लेउसका धन्यवाद माननाआभार माननाइंकार भी कर सकता था। उसने इंकार न कियातुम धन्यभागी हो। उसने तुम्हें अपने को लुटाने का थोड़ा मौका दियाक्योंकि उस लुटाने से ही तुम और भरोगेउसे धन्यवाद देना!
प्रेम जीवन में आए तो धीरे— धीरे प्रार्थना भी आ जाती है। और जब तक काव्य की क्षमता भजन न बनेजब तक काव्य प्रार्थना न बनेतब तक कवि को बड़ी बेचैनी रहेगी।
तुम्हारा काव्य जब उपनिषद बन जाएतो कवि मर जाता है और ऋषि का जन्म होता है। ऋषि और कवि दोनों शब्दों का एक ही अर्थ है। फर्क इतना ही है कि कवि चेष्टा करके हृदय के भावों को शब्दों में डालता हैऔर ऋषि निश्चेष्टा से,सहजता सेसहज स्फुरणा सेभाव को बहने देता है मस्तिष्क की चट्टानों पर से। उससे जो रव पैदा होता हैजो संगीत पैदा होता है—वही उसका काव्य है। और वही उसका नैवेद्य है प्रभु के चरणों में।

 आखिरी प्रश्न

मेरे माजी के तल्स अंधेरों में,
बता 'रजनीश क्या देखा तूने?
गर्दिश —ए— अथ्याम में था उलझा,
या बाहर उलझनों से आते देखा?
(मेरे अतीत के गहरे अंधेरे में क्या देखाक्या मैं भाग्य—चक्र में उलझा था या भाग्य— चक्र के बाहर आ रहा था।)

दिनेश ने पूछा है।
उलझे तो अभी भी हो। और भाग्य—चक्र में आदमी उलझा ही रहता है जब तक पूरा न जाग जाए। भाग्य—चक्र का अर्थ ही इतना होता है कि हम बेहोशी से चले जा रहे हैं। भाग्य होता ही बेहोश आदमी का है। होश से भरे आदमी का कोई भाग्य नहीं होता। बेहोश आदमी के संबंध में ज्योतिषी भविष्यवाणी कर सकते हैं। होश वाले आदमी के संबंध में कोई ज्योतिषी कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता। क्योंकि होश से भरा हुआ आदमी क्या करेगाइसका कोई निर्णय अतीत के हाथों में नहीं है। बेहोश आदमी क्या करेगायह सब अतीत पर निर्भर है।
अगर तुम्हारा अतीत बता दिया जाएपता होतो तुम्हारे भविष्य की भी घोषणा की जा सकती है। तुमने कल भी क्रोध किया थापरसों भी क्रोध किया थाऔर पूरी पीछे क्रोध किया था—तुम कल भी क्रोध करोगेइसमें कुछ अड़चन नहीं है। क्योंकि तुम वही करोगे जो तुम करते रहे हो। तुम आदत से चलते होयंत्रवत हो। भाग्य यानी यंत्रवत जीवन।
जैसे—जैसे होश जगता हैध्यान जगता हैआदमी भाग्य के बाहर होने लगता है। फिर तुम अतीत से संचालित नहीं होते। फिर प्रतिक्षण जो घटता हैउसके साथ तुम्हारा संवाद होता है। वह संवाद सीधा है। वह पुरानी आदत के कारण नहीं। उसका कोई निर्धारण तुम्हारे पीछे के अनुभवों से नहीं होता। इस क्षण की मौजूदगी और इस क्षण की उपस्थिति और इस क्षण का बोध ही उसका निर्णायक होता है। लेकिन 'दिनेशके जीवन में चेष्टा तो है बाहर आने की—और वही शुभ है। चेष्टा है तो बाहर आना भी हो जाएगा।
मुझे इसकी चिंता नहीं है कि तुमने क्या किया। तुमने पाप किएतुमने बुरे कर्म किए—मुझे उसकी कोई चिंता नहींया कि तुमने पुण्य किए। न तो मेरे लिए पुण्य का कोई मूल्य है और न पाप का कोई मूल्य हैक्योंकि पुण्य भी तुमने सोए—सोए किएपाप भी तुमने सोए—सोए किए। तुम चोर थे तो सोए थेतुम संत थे तो सोए थे। मेरे लिए तो एक ही बात का मूल्य है कि अब तुम्हारे मन में जागने की आकांक्षा पैदा हुई। उस आकांक्षा पर सब निर्भर है। वही आकांक्षा जीवन की सबसे बड़ी घटना है। मैं कि बरबादे—निगाराने—दिलाआरा ही सही,
मैं कि रुसवा—ए—मय— ओ—सागरो —मीना ही सही,
मैं कि मक्यूले —गुलो —नरगिसे—सहला ही सही,
फिर भी मैं खाके —रहे—साहिदे —नजरा हूं दोस्त।
मैं कि बरबादे —निगाराने —दिलाआरा ही सही।
हृदय आकर्षक सुंदरियों द्वारा बरबादमान लिया यही सही है।
मैं कि रुसवा—ए—मय— ओ—सागरो —मीना ही सही
या कि शराब के प्याले और सुराही के द्वारा अपमानितमान लियातो वह भी ठीक।
मैं कि मक्यूले —गुलो—नरगिसे —सहला ही सही
और या कि फूलोंनरगिस के फूलऐसी आंखों वाली सुंदरियों द्वारा मारा हुआ! ठीकवह भी ठीकवह भी स्वीकार कर लिया।
फिर भी मैं खाके—रहे—साहिदे —नजरा हूं दोस्त।
फिर भी मैं पारखियों के मार्ग की धूल हूं। बसवही बात मूल्यवान है।
'दिनेशके भीतर पारखी का जन्म हो रहा है। आकांक्षा पैदा हो रही है—आकांक्षा के पार जाने की। पूरब के क्षितिज पर सूरज की पहली किरणों की लाली प्रगट होने लगी।
नहींतुम्हारे अतीत सेतुम्हारे माजी से मुझे कुछ लेना—देना नहीं।
तुमने सपने देखे हैं अब तकअब जागने की पहली झलक आ रही है। नींद टूटने के करीब है—वही मूल्यवान है। तुम सम्राट थे कि दरिद्रतुम साधु थे कि असाधुकि तुमने अब तक पुण्यों का अंबार लगा लिया था कि पापों के संग्रह कर .लिए थे—सब बात व्यर्थ है। वह सब तुमने नींद—नींद में किया थावे सब सपने थे। अब सपना टूटने की घड़ी करीब आ रही है। ध्यान के प्रति प्रेम पैदा हुआ हैवही बात महत्वपूर्ण है।
और 'दिनेशकी तैयारी है मिटने की—वही बात महत्वपूर्ण है। जो मिटने को तैयार हैवह अतीत से मुक्त हो जाएगा। क्योंकि तुम हो ही अतीत का संग्रह।
हम जो निरंतर कहते हैं यहां कि अहंकार छोड़ दोतो उसका मतलब सिर्फ इतना ही होता है कि तुम अब तक जो अतीत ने तुम्हें बनाया है उसे विस्मृत करोउससे अपने को विच्छिन्न कर लोताकि ताजे के लिए घटने के लिए जगह बन सके।
बावरेअहेरी रे! कुछ भी अवध्य नहीं तुझे,
सब आखेट है।
एक बस मेरे मन—विवर मेंदुबकी कलोंच को,
दुबकी ही छोड़ करक्या तू चला जाएगा?
ले मैं खोल देता हूं कपाट सारे
मेरे इस खंडहर की
शिरा—शिरा छेद दे
आलोक की अनि से अपनी।
गढ़ सारा ढाह कर ढूह भर कर दे,
विफल दिनों की तू कलोंच पर मान जा
मेरी आंखें आज जा
कि तुझे देखूं
देखूं और मन मेंकृतज्ञता उमड़ आए
पहनूँ सिरोपे सेये कनक तार तेरे
बावरेअहेरी!
'दिनेशकी प्रार्थना मुझे सुनाई पड़ रही है.
ले मैं खोल देता हूं कपाट सारे
मेरे इस खंडहर की
शिरा—शिरा छेद दे
आलोक की अनि से अपनी!
और वही शुभ घड़ी हैवही भाग्योदय हैजब तुम किसी के पास जा कर कह सकीमिटा दो मुझे। गढ़ सारा डाह कर,ढूह भर कर दे
विफल दिनों की तू कलोंच पर मान जा
मेरी आंखें आज जा!
ध्यान यानी आंखों का आंजना है। ध्यान यानी आंखों को ताजा करना हैनया करना हैअतीत की धूल झाडूना है!
'मेरे माजी के तल्स अंधेरों में
बता 'रजनीशक्या देखा तूने?'
नहींतुम्हारे अतीत की मैं चिंता ही नहीं करता। जो गयागया। जो बीता सो बीता।
'गर्दिश—ए—अथ्याम में था उलझा
या बाहर उलझनों से आते देखा?' '
नहींअभी आए नहीं बाहर। लेकिन बाहर आने की पहली आकांक्षा उठी। और पहली आकांक्षा का उठ आना आधी यात्रा का पूरा हो जाना है।
ले मैं खोल देता हूं कपाट सारे,
मेरे इस खंडहर की
शिरा—शिरा छेद दे
आलोक की अनि से अपनी।
इधर मैं प्रकाश लिए बैठा हूं, तुम अगर तैयार हो हृदय को खोल देने कोतो मृत्यु घटेगी और तुम्हारा नया जन्म भी होगा। सूली भी लगेगी और तुम्हारा पुनर्जन्म भी होगा।
पर मिटने की तैयारी चाहिएपूरी—पूरी मिटने की तैयारी चाहिए! वही संन्यास है. अतीत से अपने को विच्छिन्न कर लेना;अतीत की भूमि से अपनी जड़ों को बिलकुल उखाड़ लेना। नई भूमि की तलाश है संन्यास। जैसे अब तक जो था व्यर्थ थाजो हुआ हुआनहीं हुआ नहीं हुआअब हम उससे सब संबंध छोड़ लेते हैंअब आगे उसका कोई हिसाब न रखेंगेऔर अब पीछे लौट—लौट कर न देखेंगे। गढ सारा ढाह करढूह भर कर दे
विफल दिनों की तू कलोंच पर मान जा
मेरी आंखें आज जा।
मैं तैयार हूं! अगर तुम तैयार होतो मैं तैयार हूं तुम्हारी आंखें आजने को। थोडी तकलीफ भी होती है जब आंखें आजी जाती हैं। आंसू भी बहते हैंआंख बंद कर लेने का भी मन होता है। वह सब स्वाभाविक है। लेकिन अगर साहस हो तो परमात्मा सुनिश्चित घट सकता है।
मेरी तैयारी हैअगर तुम भी तैयार हो तो कोई रुकावट रुकावट नहीं बन सकती। छोड़ो पीछे कोआगे की सुधि लो।

 हरि ओंम तत्सत्!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें