गुरुवार, 3 अगस्त 2017

एक ओंकार सतनाम - प्रवचन-4

जे इक गुरु की सिख सुणी—(प्रवचन—चौथा)
पउडी-6
तीरथि नावा जे तिसु भावाविणु भाणे कि नाइ करी।
जेती सिरठि उपाई वेखाविणु करमा कि मिलै लई
मति बिच रतन जवाहर माणिकजे इक गुरु की सिख सुणी
गुरा इक देहि बुझाई--
सभना जीआ का इकु दातासो मैं बिसरि न जाई।।

पउड़ी: 7

जे जुग चारे आरजा। होर दसूणी होई।।
नवा खंडा विचि जाणीऐ। नालि चलै सभु कोई।।
चंगा नाउ रखाइकै। जसु कीरति जगि लेइ।।
जे तिसु नदर न आवई। त बात न पुछै केइ।।
कीटा अंदरि कीटु करि। दोसी दोसु धरे।।
'नानकनिरगुणि गुणु करे। गुणुवंतिआ गुणु दे।।
तेहा कोई न सुझई। जि तिसु गुणु कोई करे।।

क रात नानक अचानक घर छोड़कर चले गए। किसी को पता नहींकहां हैं। खोजा गया साधुओं की संगत मेंमंदिरों में--जहां संभावना थी--पर कहीं भी वे मिले नहीं। और तब किसी ने कहामरघट की तरफ जाते देखा है। भरोसा किसी को न आया। मरघट अपनी मर्जी से कोई जाता ही कैसे हैमरघट ले जाने के लिए तो चार आदमियों की जरूरत पड़ती है। बामुश्किल कोई जाता है। मरा हुआ आदमी भी जाना नहीं चाहतातो जिंदा आदमी के तो जाने का कोई सवाल नहीं। लेकिन जब नानक को कहीं नहीं पायातो लोग मरघट पहुंचे।
मरघट में उन्होंने धूनी जमा रखी थी। बैठे थे ध्यान में। घर के लोगों ने कहापागल हो गए होघर-द्वार छोड़ कर,बच्चे-पत्नी छोड़ कर यहां क्या कर रहे होयह मरघट हैयह पता है?
नानक ने कहायहां जो आ गया वह फिर कभी मरता नहीं। और जिसे तुम घर कहते होवहां जो भी है वह आज नहीं कल मरेगा। फिर मरघट कौन सी जगह हैजहां लोग मरते हैं वह मरघटया जहां लोग कभी नहीं मरते वह मरघटऔर फिर जब एक दिन यहां आ ही जाना हैतो चार आदमियों के कंधे पर चढ़ कर क्या आनाशोभा नहीं देता। मैं खुद ही चला आया हूं।
यह घटना बड़ी महत्वपूर्ण है। जो होना ही हैउससे नानक का संघर्ष नहीं है। जो होना ही है उसका स्वीकार है। मृत्यु भी होनी हैउसका भी स्वीकार है। और क्या कष्ट देना दूसरों को वहां तक ले जाने के लिएखुद उठकर ही चले जाना बेहतर है।
जो होगाउससे हमारा विरोध बना रहता है। हमारी अपनी चाह हैऐसा न हो। नानक की अपनी कोई चाह नहीं। जो उसकी चाह हैअगर मृत्यु भी उसकी चाह हैतो वह भी नानक को स्वीकार है।
उस रात नानक को लोग समझा-बुझा कर घर ले आए। लेकिन नानक फिर वैसे ही आदमी न रहे जैसे थे। कुछ उनके भीतर मर ही गया। और किसी नए का जन्म हो गया। जब कोई मरता है भीतर पूरी तरहतभी नए का जन्म होता है। जन्म की वही प्रक्रिया है। मरघट से गुजरना ही होगा। और जो जान कर गुजर जाएहोश से गुजर जाएउसे नया जन्म मिलता है। वह नया जन्म नया शरीर का जन्म नहीं। वह नया जन्म नयी चेतना का आविर्भाव है।
तुम डरे हो। और जहां भय है वहां भगवान से कोई संबंध न हो सकेगा। तुम जितने पूजा-पाठ कर रहे होवे भय के कारण हैंभगवान के प्रेम में नहीं। तुम तीर्थ जा रहे होस्नान कर रहे होधूप-दीप जला रहे होवे सब भय के कारण हैं,भगवान के प्रेम में नहीं। तुम्हारा धर्म तुम्हारे भय की औषधि हैतुम्हारे आनंद का उत्सव नहीं। तुम करते हो सब सुरक्षा के लिएतुम इंतजाम सब जुटाते होजैसे तुम धन जुटाते होमकान बनाते होबैंक बैलेंस बनाते होबीमा करवाते होऐसा ही भगवान भी तुम्हारा बीमा है। तुम्हारे तीर्थतुम्हारे स्नानतुम्हारे पूजा-पाठसब तुम्हारी सुरक्षाएं हैं भय की।
और भय से कभी कोई उस तक पहुंचाभय कोई पहुंचने का ढंग हैभय तो टूटने का ढंग है। प्रेम जुड़ने का ढंग है। भय से तो दूरी होती हैप्रेम से निकटता होती है। और प्रेम और भय कहीं भी नहीं मिलते। जब भय पूरा छूट जाता है तब प्रेम का उदय होता है। जब तक भय बना रहता है तब तक तुम घृणा कर सकते होघृणा को साज-संवार सकते होलेकिन प्रेम नहीं कर सकते।
कैसे तुम प्रेम करोगे जिससे तुम भयभीत होजिससे भय है उससे तुम संघर्ष करोगेसमर्पण कैसे करोगे। और अगर समर्पण भी करोगेतो वह भी संघर्ष की ही एक नयी तरकीब होगीकि चलोशायद इससे ही भय से छुटकारा हो जाए।
लोग तीर्थ जा रहे हैंस्नान कर रहे हैंइस स्नान में कोई उत्सव नहीं है। केवल पापों से छुटकारे की आकांक्षा है। जो बुरा किया हैसोचते हैंगंगा में स्नान से बह जाएगा। लेकिन बुरा तुमने किया हैऔर गंगा में स्नान से कैसे बह जाएगागंगा का दोष क्या है तुम्हारी बुराई मेंबुरा तुम करोगेगंगा किस लिए धोने को बहती रहेगीऔर बुराई तुमने जो की हैवह शरीर की तो नहीं हैचेतना की है। गंगा का पानी उस चेतना को छू भी कैसे पाएगाहांतुम गंदे होगंगा में स्नान से स्वच्छ हो जाओगे। धूल लगी है शरीर परगंगा धो देगी। लेकिन धूल लगी है तुम मेंवह शरीर पर लगी नहीं हैतो गंगा क्या करेगी?
शरीर को धोने के लिए तो गंगा ठीकआत्मा को धोने का वह उपाय नहीं। कोई और गंगा खोजनी पड़ेगी। पुरानी कथा है कि एक गंगा तो जमीन पर बहती है और एक गंगा स्वर्ग में। तुम्हें स्वर्ग की गंगा खोजनी पड़ेगी। क्योंकि पृथ्वी की गंगा शरीर को छुएगीपृथ्वी की हैशरीर तक उसकी पहुंच है। स्वर्ग की गंगा तुम्हें छुएगीतुम्हें धो देगी। लेकिन स्वर्ग की गंगा तुम कैसेखोजोगेकहां खोजोगेये सूत्र स्वर्ग की गंगा की खोज के लिए कहे गए हैं।
'यदि मैं उसको भा गयातो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया।'
उसको भा जाना स्वर्ग की गंगा को खोज लेना है। उसको भा जाना बड़ा गहरा सूत्र है। इसे समझने की थोड़ी कोशिश करो।
एक तो तुम उसे भाओगे तभीजब तुम उसके विरोध में नहीं खड़े हो। तुम उसे भाओगे तभीजब तुमने सब भांति अपने को उसमें लीन कर दिया है। तुम उसे भाओगे तभीजब तुम्हारा कर्ता-भाव मिट गया है। परमात्मा कर्ता हैतुम निमित्त हो। बस! तुम भा जाओगे।
लेकिन अभी तो तुम्हारे भीतर धुन बजती है कि मैं कर्ता हूं। पूजा भी करते हो तो भी कर्ता तुम ही रहते हो। तीर्थों में स्नान करते हो तो भी कर्ता तुम ही रहते हो। दान करते हो तो भी कर्ता तुम ही रहते हो। सब व्यर्थ हुआ। स्नान भी व्यर्थ गया,दान भी व्यर्थ गयापूजा बेकार हुई। क्योंकि कर्ता का भाव! अभी तुम सोचते होमेरा है।
धार्मिक व्यक्ति में और अधार्मिक व्यक्ति में एक ही अंतर है। धार्मिक व्यक्ति के लिए कर्ता परमात्मा हैअधार्मिक व्यक्ति के लिए कर्ता वह स्वयं है। मेरे किए कुछ हो सकता हैयह भाव ही अधर्म है। उसके किए ही सब हो रहा हैयह भाव धर्म है। तुम उसे प्यारे हो जाओगे।
तुम अपने ही हाथ से उसकी तरफ पीठ किए खड़े हो। तुम्हारा कर्तापन ही तुम पीठ किए हो। जैसे ही तुम कर्तापनछोड़ोगेसन्मुख हो जाओगे। विमुखता मिट जाएगी।
तुमने किया क्या हैन जन्म तुम्हारान जीवन तुम्हारान मृत्यु तुम्हारीसब वही कर रहा है। लेकिन बीच के अंतराल में तुम अपने कर्ता होने का भाव जुटा लेते हो। और वह जो कर्ता का भाव है फिर वह पाप करे तो भी पापपुण्य करे तो भी पाप। इसे खयाल में ले लेना।
तुम सोचते हो पाप करना पाप है और पुण्य करना पुण्य है। तुम गलती में हो। कर्ता होना पाप हैअकर्ता होना पुण्य है। अगर पुण्य करते वक्त भी तुम कहते होमैंने किया--मंदिर बनाएपूजा कीइतने व्रत-उपवास किएइतनी बार तीर्थ गयाकाशी गयाहज गयाहाजी हुआ--यह तुम जितना कहोगेमैंने कियासब पाप हो गया। इसलिए पाप का संबंध कर्म से नहींभाव से है। तुम अगर अकर्ता-भाव से कर सको तो इस जगत में कोई भी पाप नहीं है। अगर तुम कर्ता-भाव से करो तो इस जगत में सभी कुछ पाप है।
कृष्ण अर्जुन को गीता में यही कह रहे हैं कि तू कर्ता-भाव छोड़ दे और वह जो करवा रहा हैवही कर। उसकी जो मर्जी वह होने दे। तू बीच में मत आ। तू अपनी तरफ से चुनाव मत कर। तू विचार मत कर कि क्या ठीक है और क्या गलत है। तू जानेगा भी कैसे कि क्या ठीक है और क्या गलत हैतेरे देखने की सीमा कितनीतेरी समझ कितनीतेरा अनुभव कितना?तेरा होश कितनातू इस छोटे से दीए से देखने की कोशिश मत करइसकी रोशनी चार फीट से ज्यादा दूर नहीं पड़ती। और जीवन का विस्तार अनंत है। वह तुझसे जो करवा रहा है तू कर। तू बीच में मत खड़ा हो। तू सिर्फ माध्यम बन जा। जैसे बांसुरी से कोई गीत गाए और बांसुरी केवल राह देऐसी तू राह दे। निमित्त हो जा।
जो निमित्त हो गया वह उसका प्यारा हो गया। जो कर्ता बना रहा वह दुश्मन बना रहा। उसका प्रेम तो फिर भी बरसता रहेगाक्योंकि उसका प्रेम बेशर्त है। तुम क्या होइससे कोई संबंध नहीं। लेकिन तुम ही उसे पाने में असमर्थ हो जाओगे। जैसे घड़ा सीधा रखा हो और वर्षा हो रही हो तो भर जाएगा। वर्षा तो होती ही रहेगीघड़ा उलटा रखा है तो खाली रह जाएगा। वर्षा तो उलटे घड़े पर भी होती रहेगीक्योंकि वर्षा तो बेशर्त है। उसका प्रेम किसी शर्त से बंधा नहीं है कि तुम ऐसे हो जाओ तो मैं प्रेम करूंगा।
इसे भी समझ लेना। नानक का यह वचन सुनकर कई लोगों को लगेगा कि मैं ऐसा हो जाऊं तो वह मुझे प्रेम करेगा। नहींउसका प्रेम तो बरस ही रहा है। अगर उसके प्रेम में भी शर्त हो तो मनुष्य और परमात्मा के प्रेम में कोई अंतर न रह जाए। यही तो मनुष्य के प्रेम की पीड़ा है कि हम कहते हैंतुम ऐसा करोगे तो मैं प्रेम करूंगातुम ऐसे होओगे तो मैं प्रेम करूंगा। मेरी शर्तें पूरी करोगे तो मैं प्रेम करूंगाअन्यथा मैं प्रेम खींच लूंगा। बाप बेटे से यही कह रहा हैपत्नी पति से यही कह रही हैमित्र मित्र से यही कह रहा है कि तुम ऐसा करो। अगर तुम ऐसा किए तो मुझे जंचोगे
इस कारणइस प्रेम के अनुभव के कारणतुम यह मत सोच लेना कि नानक यह कह रहे हैं कि परमात्मा तुम्हें तब प्रेम करेगा जब तुम कुछ शर्तें पूरी करोगे। नहींउसका प्रेम तो बरस रहा है। शर्तें पूरी करोगे तो तुम सीधे घड़े की भांति हो जाओगे। उसकी वर्षा हो रही हैभर जाएगी। तुम लबालब हो जाओगे। तुम बहने लगोगे भर कर। न केवल उसका प्रेम तुम्हें मिलेगा,तुमसे औरों को भी मिलने लगेगा।
गुरु हम उसी को कहते हैं कि जिसका घड़ा इतना भर गया परमात्मा के प्रेम से कि अब समाता नहीं। वही औरों के घड़ोंपर भी बहने लगा। गुरु का मतलब ही इतना है कि जिसकी अपनी जरूरत पूरी हो गई। जिसकी चाह बुझ गई। जिसकी तृष्णा शांत हो गई। जिसका घड़ा इतना भर गया कि अब वह देने में समर्थ है। अब वह न दे तो क्या करेजैसे बादल जब भर जाए पानी से तो बरसेगाहलका होगा। जब फूल भर जाए गंध से तो गंध बिखरेगी
ऐसे ही जब तुम्हारा घड़ा भर जाएगा उसके प्रेम सेतुम्हारे चारों तरफ बंटने लगेगाबहेगा। और उसकी वर्षा का तो कोई अंत नहीं। एक बार तुम्हें पता चल जाए कि सीधे होने से भरना शुरू हो जाता हैवह वर्षा तो होती ही रहती हैतुम कितना ही उलीचो। हजार हाथ से उलीचो तो भी उलीच न पाओगे। तो यह खयाल रखना कि नानक जब यह कह रहे हैंतो उनका प्रयोजन तुमसे है।
'यदि मैं उसको भा गयातो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया।'
उसको तो तुम भाए ही हुए होअन्यथा तुम होते कैसेअगर वह एक क्षण को भी न चाहता तुम्हारा होनातो तुम तिरोहित हो जाते। तुम्हारी श्वास-श्वास में वही है। तुम्हारी हर धड़कन में वही है। अस्तित्व ने तुम्हें चाहा है। अस्तित्व ने तुम्हें प्यार किया है। अस्तित्व ने तुम्हें बनाया है। तुम कैसे होइसकी फिक्र नहीं हैअस्तित्व तुम्हें अभी भी जीवन दे रहा है। उसे तुम तो भाए ही हुए हो। लेकिन तुम उलटे खड़े हो। तुम पीठ किए हो। तुम उसके प्रेम से भी डरे हो। तुम उससे भागे हुए हो। वह तुम्हें भरना चाहता हैतुम बचना चाहते हो।
इसलिए जब नानक कहते हैंयदि मैं उसको भा गयातो अर्थ है--जब मैं सीधा हुआसन्मुख हुआ। जब मैंने भय छोड़ा।
भय के कारण ही तुम अपने घड़े को उलटा किए बैठे हो कि कहीं कुछ गलत न भर जाए। भय के कारण ही तुमने दरवाजे बंद कर रखे हैं। कि कहीं कोई चोरदुश्मन भीतर न आ जाए। भय के कारण ही तुमने अपने हृदय को सब तरफ से बंद कर लिया है। लेकिन जब तुम दरवाजे बंद कर लेते हो और चोर-डाकू नहीं आ सकतातो प्रेमी भी नहीं आ सकता। क्योंकि द्वार तो वही हैजहां से चोर आता है वहीं से प्रेमी आता है। तो यह हो सकता है कि तुमने इंतजाम कर लिया हो चोर के न आने कालेकिन ध्यान रखनातुमने प्रेमी के आने का द्वार भी बंद कर रखा है। और वह जिंदगी किस काम की जिसमें प्रेमी न आयान आया चोरतो भी किस काम की?
तुम इतने भयभीत होइसलिए तुम अपने को उलटा किए होकुछ प्रवेश न कर जाए। फिर तुम खाली हो। फिर तुम रोते हो कि मैं खाली हूंकि मेरे द्वार कोई अतिथि नहीं आताकि कोई मेरे द्वार पर दस्तक नहीं देता। तुम्हारे भय ने तुम्हें परमात्मा से विमुख कर रखा है।
और मजा यह है कि तुम्हारा सारा धर्म तुम्हारे भय का विस्तार है। तुम्हारे सब तथाकथित भगवान तुम्हारे भय की ही धारणाएं हैं। तुम भय के कारण उन्हें स्वीकार किए हो। तुम डरते हो। तुम संदेह करने में भी डरते होइसीलिए संदेह नहीं कर रहे हो। आस्था तुम में पैदा नहीं हुई है। संदेह करने के डर के कारण अगर तुम आस्थावान बने हुए होतो तुम्हारी आस्था थोथी है। थोथे से सत्य का क्या संबंध होगातुम्हारी आस्था ऊपर-ऊपर है। उस गहनतम से तुम्हारा कैसे मिलन होगाऔर आस्था ऊपर हो तो भीतर तो संदेह छिपा ही है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक चुनाव में खड़ा हुआ। उसे कुल तीन ही वोट मिले। एक उसका खुद का अपनाएक उसकी पत्नी काऔर एक किसी अज्ञात व्यक्ति का। तो पत्नी बोलीहूं! संदेह सच निकलाजल्दी बताओ यह दूसरी औरत कौन है?
भीतर तुम्हारे जो पड़ा हैवह कहीं भी बहाना खोज लेगा। तुम भीतर अगर संदेह से भरे होतो ऊपर की आस्थाऊपर का प्रेम कहीं भी टूट जाएगा। कितनी देर लगेगीजरा सी कोई घटनाऔर तुम्हारा ईश्वर पर संदेह उठ जाता है। तुम्हारे पैर में कांटा लग जाएसंदेह उठ जाता है। सिर में दर्द हो जाएसंदेह उठ जाता है। नौकरी छूट जाएसंदेह उठ जाता है।
संदेह छिपा ही पड़ा है। फूट आता है मवाद की तरह। जरा सी चोट और मवाद बाहर आ जाती है। इस मवाद को तुम कितना ही छिपाओ आस्था की मलहम सेकुछ हल न होगा। किसे तुम धोखा दे रहे होकौन तुम्हारे धोखे में आ रहा हैतुम खुद भी अपने धोखे में नहीं आ रहे हो तो दूसरा तो कोई क्या आएगातुम भी भलीभांति जानते हो कि तुम्हारी आस्था भय के कारण है। और भीतर संदेह भरा है।
तो तुम जाओतीर्थों में करो स्नान। जाओ मंदिरों मेंगुरुद्वारों मेंगिरजों मेंकरो पूजा-प्रार्थनासब व्यर्थ है। क्योंकि जब तक तुम्हारे हृदय से आस्था का स्वर न उठेतब तक तुमने उसे पुकारा ही नहीं। और जब तुम भय से जाओगे तो तुम जरूर कुछ मांगोगे। क्योंकि भय हमेशा मांगता है। और जो मांगता है वह मिल जाएतो आश्वस्त होता है। न मिले तो संदेह गहन होता है। तुम सदा मांगते हो। आस्था सिर्फ धन्यवाद देने जाती है। आस्थावान भी मंदिर जाएगा तो धन्यवाद देने कि तूने पहले ही काफी दिया है। तूने योग्यता से ज्यादा पहले ही दिया है। तेरी कृपा है। तेरी अनुकंपा है। आस्थावान सदा अनुग्रह से भरा रहेगा। और जहां अनुग्रह हैवहां संदेह नष्ट हो जाता है। जहां मांग हैवहां संदेह मौका खोज रहा है। तुम मांगते होपूरा हो जाए तो संदेह को छिपाए रखोगेन पूरा हो तो संदेह बाहर आ जाएगा। मांग शायद परीक्षा है।
जीसस के जीवन में उल्लेख है कि जब वे चालीस दिन की अपनी गहन साधना में गएतो शैतान उनके पास आया। और उसने कहा कि शास्त्रों में लिखा है कि जब तीर्थंकरपैगंबर पैदा होता हैतो परमात्मा उसकी रक्षा करता है। तो तुम कूद जाओ इस पहाड़ से। अगर तुम सच में ही पैगंबर होतो उसके देवदूत तुम्हें हाथ फैलाए नीचे सम्हालने को मिलेंगे।
जीसस ने कहावह तो ठीक है। लेकिन शास्त्रों में यह भी लिखा है कि उसकी परीक्षा केवल वे ही लेते हैं जो संदेह से भरे हैं। मुझे कोई संदेह नहीं है। देवदूत निश्चित नीचे खड़े मिलेंगे। लेकिन मैं उसकी परीक्षा कैसे लूंक्योंकि परीक्षा तो संदेह से भरे हुए लोग ही लेते हैं। तुम ठीक कहते हो। देवदूत निश्चित खड़े हैं। लेकिन परीक्षा लेने का मतलब ही क्या होता हैकि मुझे कुछ संदेह थाकि पता नहीं खड़े हैं या नहीं। और पता नहीं कि वह बचाता भी है या नहीं। और पता नहीं कि मैं उसका पैगंबर भी हूं या नहीं।
जहां संदेह हैवहां परीक्षा है। जहां संदेह हैवहां जांच है। जहां संदेह हैवहां तुम मांग खड़ी करते हो। मांग तुम्हारी परीक्षा का उपाय है कि कर दो यह पूराअगर तुम हो। अगर पूरा हो जाएतो तुम हो। अगर पूरा न होतो तुम नहीं हो।
आस्थावान व्यक्ति परमात्मा की कोई परीक्षा नहीं लेता। आस्थावान तो अनुगृहीत हैवह मांग नहीं करता। और जिस दिन तुम मांग बंद कर दोगेतुम्हारा भय समाप्त होने लगेगा। जैसे-जैसे तुम अनुग्रह से भरोगेमांग हटेगीवैसे-वैसे तुम पाओगे कि तुम्हारा मुख परमात्मा की तरफ होने लगा। घड़ा सीधा हो गया। और जैसे-जैसे तुम सीधे होओगेथोड़ी-थोड़ी उसके अमृत की वर्षा की बूंदें तुम में पड़ेंगीतुम्हारा भय मिट जाएगा। तब तुम पाओगे कि वही बरस रहा हैमैं नाहक ही भयभीत था। तब तुम द्वार खुले छोड़ दोगे। क्योंकि वही आता हैमैं नाहक भयभीत था। चोर में भी वही आता हैबेईमान में भी वही आता है। और जब तक तुम सभी में उसको देख न लोगे तब तक तुम उसे देख ही न पाओगे।
नानक कहते हैं, 'यदि मैं उसको भा गयातो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया।'
तीरथि नावा जे तिसु भावाविणु भाणे कि नाइ करी।
'और यदि नहीं भाया उसेतो नहा-धोकर क्या करूंगा?'
नहीं भाया उसेतो नहा-धोकर तैयारी भी किस के लिए करनी हैनहीं भाया उसेतो मेरा नहाना-धोना भी मेरा अहंकार मजबूत करेगा।
तीर्थयात्री को देखो! जब हज से कोई हाजी होकर लौटता है तब उसे देखो! तब एक अकड़ लेकर लौटता है। विनम्र होकर लौटना चाहिए था। हज अगर सच में हुआअगर तीर्थयात्रा हो गईतो आदमी बदल कर लौटेगाअहंकार वहीं छोड़कर लौट आएगा। लेकिन वहां से वह अकड़ कर आता है। तीर्थयात्री जब लौटता हैतो आशा रखता है स्वागत-समारंभ की। लोग पैर छुएंगे और कहेंगे कि गजब किया! कि तीर्थ हो आएबड़ा पुण्य किया।
पुण्य से भी तुम अहंकार को ही भरना चाहते हो। तुम उपवास भी करते हो तो शोभायात्रा की अपेक्षा रखते हो। बैंड-बाजे लोग बजाएंगांव-गांव खबर हो जाए कि तुमने कितने उपवास किए। वहां भी तुम अहंकार को ही खोज रहे हो। और जितना अहंकार मजबूत होता हैउतने ही तुम विमुख हो जाओगे। तुम जितने ज्यादाउतने विमुख। इस गणित को ठीक से खयाल में रख लेना। तुम जितने कमउतने सन्मुख। तुम बिलकुल नहींवही तुम्हारे द्वार पर खड़ा है। तब चोर भी आएतो वही आता है। तब भय किसी का भी नहीं रह जाताक्योंकि वही है।
'यदि मैं उसको भा गया तो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया। और यदि नहीं भाया तो नहा-धोकर क्या करूंगा? उसने जितनी सृष्टि की और जो दृश्य हैउसमें कर्म के बिना किसको क्या मिला?'
इस सृष्टि में तो जो भी मिलता है वह कर्म से मिलता है। और इसी से एक बड़ी भ्रांति हो जाती है। भ्रांति यह हो जाती है कि जैसे इस सृष्टि में सब कुछ कर्म से मिलता हैऐसे ही परमात्मा को भी पाना हो तो कुछ कर्म करना होगातब मिलेगा।
इसे थोड़ा समझें। जगत में सभी चीजें कर्म से मिलती हैंप्रेम कर्म से नहीं मिलताप्रार्थना कर्म से नहीं मिलती,आराधना कर्म से नहीं मिलतीआस्था कर्म से नहीं मिलतीपरमात्मा का सान्निध्य कर्म से नहीं मिलता। क्योंक्योंकि कर्म से तो कर्ता ही मजबूत होता है। धन कमाना हो तो बैठे-बैठे नहीं मिलेगा। धन कमाना हो तो कर्म करना पड़ेगा। यश कमाना हो तो बैठे-बैठे न मिलेगा। कर्म करना होगादौड़-धूप करनी होगीआपाधापी करनी होगीचिंतितपरेशान होना होगा। इस संसार में कुछ भी पाना हो तो श्रम ही मार्ग है। तो इससे हमें खयाल उठता हैजब क्षुद्र को पाने में इतना श्रम करना पड़ता हैतो विराट को पाने में और कई गुना ज्यादा श्रम करना पड़ेगा। वहीं हमारा गणित गलत हो जाता है।
इस जगत में जो नियम हैंउस जगत में ठीक उसके विपरीत यात्रा है। इस जगत में कुछ भी पाना है तो परमात्मा की तरफ पीठ करनी पड़ती हैइसलिए श्रम करना पड़ता है।
इसे थोड़ा समझें। जितना उसका सहारा हम छोड़ते हैंउतनी ही हमें मेहनत उठानी पड़ती है। क्योंकि हम ही को करना पड़ता है जो वह कर देता। तो उसके श्रम की पूर्ति फिर हमको अपने ही श्रम और पसीने से करनी पड़ती है। इस संसार में जाने का अर्थ हैउसकी तरफ पीठ। उसका सहारा कम। उसके अमृत की धारा नहीं बहती। बहती रहती हैहम नहीं उसको उपलब्ध करते। हमारे द्वार बंद होते हैं। हम अपने ही तईं जीना चाहते हैं। हम स्वावलंबी होना चाहते हैं।
इसलिए तो नानक कहते हैं बार-बार कि वह साहब है और मैं दास। स्वावलंबी होने की चेष्टा ही अहंकार की चेष्टा है। तो जितना हम स्वावलंबी होना चाहते हैंजितना हम चाहते हैं कि मैं कर लूंगाउतना ही उसकी शक्ति का सहारा हम नहीं ले रहे हैं। ऐसे समझोजैसे कि कोई आदमी हवा के रुख से विपरीत चप्पुओं से नाव चला रहा है। नानक ने उसका ही गुर दिया है कि जरूरत नहीं है चप्पुओं को चलाने की और विपरीत हवा में जाने की। जिस तरफ उसकी हवाएं ले जाएंअपनी नाव के पाल उन्हीं हवाओं के सहारे छोड़ दो।
रामकृष्ण कहते थे कि तुम चलाते ही क्यों हो चप्पूतुम हवा के रुख के साथ क्यों नहीं बहतेखोल दो पाल और विश्राम करो। हवाएं खुद लिए जा रही हैं। हवाएं खुद लिए जा रही हैं उस किनारे की तरफ। ठीक समय और ठीक हवाओं के रुख का ध्यान रखना जरूरी हैबस! कोई और श्रम करने की जरूरत नहीं है। जब हवाएं दूसरे किनारे की तरफ जा रही हों तब नाव को छोड़ दो। जब हवाएं इस तरफ आ रही हों तो फिर नाव को छोड़ दो। तुम व्यर्थ बीच में श्रम क्यों करते हो?
हवाओं के विपरीत जाओगे तो श्रम करना पड़ेगा। नदी से उलटे बहोगे तो मेहनत करनी पड़ेगीफिर भी कहीं पहुंचोगे न,थकोगे। सिर्फ थकोगे। संसार की पूरी दौड़ के बाद आदमी के चेहरे को देखोसिवाय थकान के तुम वहां कुछ भी न पाओगे। मरने के पहले ही लोग मर गए होते हैं। बिलकुल थक गए होते हैं। विश्राम की तलाश होती है कि किसी तरह विश्राम कर लें। क्यों इतने थक जाते हो!
आदमी बूढ़ा होता हैकुरूप हो जाता है। तुमने जंगल के जानवरों को देखाबूढ़े होते हैंलेकिन कुरूप नहीं होते। बुढ़ापे में भी वही सौंदर्य होता है। तुमने बूढ़े वृक्षों को देखा हैहजार साल पुराना वृक्ष! मृत्यु करीब आ रही हैलेकिन सौंदर्य में रत्तीभर कमी नहीं होती। और बढ़ गया होता है। उसके नीचे अब हजारों लोग छाया में बैठ सकते हैं। सौंदर्य में कोई फर्क नहीं पड़ता। सौंदर्य और गहन हो गया होता है। बूढ़े वृक्ष के पास बैठने का मजा ही और है। वह जवान वृक्ष के पास बैठने से नहीं मिलेगा। अभी जवान को कोई अनुभव नहीं है। बूढ़े वृक्ष ने न मालूम कितने मौसम देखे। कितनी वर्षाएंकितनी सर्दियांकितनी धूप,कितने लोग ठहरे और गएकितना संसार बहाकितनी हवाएं गुजरींकितने बादल गुजरेकितने सूरज आए और गएकितनेचांदों से मिलन हुआकितनी अंधेरी रातें--वह सब लिखा है। वह सब उसमें भरा है। बूढ़े वृक्ष के पास बैठना इतिहास के पास बैठना है। बड़ी गहरी परंपरा उसमें से बही है।
बौद्धों नेजिस वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान हुआउसे बचाने की अब तक कोशिश की है। वह इसीलिए कि उसके नीचे एक परम घटना घटी है। वह वृक्ष उस अनुभव से अभी आपूरित है। वह वृक्ष अभी भी उस स्पंदन से स्पंदित है। वह जो महोत्सव उसके नीचे हुआ थावह जो बुद्ध परम ज्ञान को उपलब्ध हुए थेवह जो प्रकाश बुद्ध में जला थाउस प्रकाश की कुछ किरणें अभी भी उसे याद हैं। और अगर तुम बोधिवृक्ष के पास शांत होकर बैठ जाओतो तुम अचानक पाओगे ऐसी शांतिजो तुम्हें कहीं भी न मिली थी। क्योंकि तुम अकेले ही शांत नहीं हो रहे हो। उस वृक्ष ने एक अपरिसीम शांति जानी है। वह अपने अनुभव में तुम्हें भागीदार बनाएगा।
बूढ़े वृक्ष सुंदर हो जाते हैं। बूढ़े सिंह में और ही सौंदर्य होता हैजो जवान में नहीं होता। जवान में एक उत्तेजना होती है,जल्दबाजी होती हैअधैर्य होता हैवासना होती है। बूढ़े में सब शांत हो गया होता है। लेकिन आदमी कुरूप हो जाता है। क्योंकि आदमी थक जाता है। वृक्ष परमात्मा के खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं। उन्होंने पाल खोल रखे हैं। जहां उसकी हवा ले जाएवे वहीं जाने को राजी हैं। तुम उसके खिलाफ लड़ रहे हो। आदमी अकेला उसके खिलाफ लड़ता है। इसलिए थकता हैटूटता हैजराजीर्ण होता है। अगर जीवन एक संघर्ष है तो यह होगा ही।
इस संसार में जो भी पाना हैउसके लिए कर्म करना पड़ता है। लेकिन परमात्मा को पाने के लिए किसी कर्म की कोई जरूरत नहीं। पूजा नहींप्रार्थना नहींयोग नहींतप नहींजप नहीं। कर्म से उसे पाया ही नहीं जा सकता। उसे प्रेम से पाया जाता है। प्रेम और कर्म की दिशा अलग-अलग है।
प्रेम एक भाव है। और जब तुम प्रेम करते होतो ध्यान रखनादुनिया में एक ही चीज है जो थकती नहीं--वह प्रेम। बाकी सब चीजें थक जाती हैं। क्योंकि प्रेम कोई श्रम नहीं है। तुम जितना प्रेम करोउतना ही प्रेम करने में कुशल हो जाते हो। प्रेम की जितनी तुम्हारी अनुभूति बढ़ेउतना ही तुम पाओगेतुम प्रेम करने में समर्थ हो गए हो। प्रेम बढ़ता ही जाता है। प्रेम के ज्वार में भाटा कभी आता ही नहीं। वह हमेशा चढ़ता हैउतार नहीं है।
लेकिन प्रेम एक प्रसाद है। वह तुम्हारा श्रम नहीं है। ठीक से समझो तो प्रेम तुम्हारा विश्राम है। इसीलिए तो जब तुम प्रेम में होते होतुम अपने को ताजा पाते होविश्राम में पाते हो। साधारण प्रेम में भी! अगर एक व्यक्ति से तुम्हारा प्रेम हैवह तुम्हारे पास बैठ जाता हैतो तुम पाते होसब थकान मिट गई। तुम हलके हो गए। ताजे हो गए। प्रफुल्लित हो गए। श्रम की सारी धूल झड़ गयी। तो परमात्मा के प्रेम की तो तुम कल्पना कर सकते हो।
जिस दिन उस प्रेम का जन्म होगा उस दिन कैसा श्रम! कैसी थकान! परमात्मा को प्रयास से नहीं पाया जाताप्रसाद से पाया जाता है। इसलिए नानक कहते हैंगुरु प्रसाद। परमात्मा से तुम्हारा सीधा संबंध आज नहीं हो सकता। आंखें उसके लिए तैयार नहीं हैं।
अगर तुम्हें सूरज को देखने के लिए आंखों को तैयार करना हो तो दीए से शुरुआत करनी पड़ती है। दीए की ज्योति पर त्राटकफिर और बड़ी ज्योति पर त्राटकफिर और बड़ी ज्योति पर त्राटक। फिर धीरे-धीरे सूरज की तरफ। अन्यथा तुम जैसे हो,अभी तो सूरज तुम्हारी आंखों को अंधा कर देगा।
अगर घड़े को भी सीधा करना होतो पहले गुरु की तरफ...। गुरु तैयारी है। और जब तुम उससे भरने को राजी हो जाओगे और भर कर पुलकित और आनंदित होओगेऔर तुम्हारे सब भय विसर्जित हो जाएंगेतब तुम परमात्मा की तरफ खुल पाओगे। एकदम परमात्मा की तरफ खुलना खतरनाक भी हो सकता है। तुम शायद झेल ही न पाओ उतने बड़े दान को। आकाश से गंगा उतारनी हो तो भगीरथ चाहिए। गंगा को तुम झेल न पाओगे। हर कोई न झेल पाएगा। तुम तो छोटे से डबरे में डूब जाओगे।
इसलिए नानक गुरु पर बड़ा जोर देते हैं। जोर इसलिए है कि गुरु तुम्हें तैयार करेगा। तैयार करेगा गुरुउससे जो बह रहा है अगर तुम उसे झेलने में धीरे-धीरे समर्थ हो गएतो तुम भगीरथ हो जाओगे। फिर स्वर्ग की गंगा को भी झेल सकोगे।
परमात्मा पाया जाता हैकृत्य से नहीं। इस सृष्टि में सभी कुछ कर्म से पाया जाता है। परमात्मा कैसे पाया जाता है?
'जो गुरु की एक सिखावन सुन लेता है।'
गुरु की एक सिखावन सुन लेने से परमात्मा मिल सकता हैतुम्हारे कुछ करने से नहीं।
'उसकी मतिजो गुरु की एक सिखावन सुन लेता हैरत्न और जवाहर और माणिक जैसी हो जाती है। बहुमूल्य हो जाती है।'
लेकिन गुरु की एक सिखावन सुनना भी मुश्किल है। क्योंकि गुरु की एक सिखावन सुनने के लिए भी तुम्हें अपना पूरा जीवन रूपांतरित करना होगा। तुम जैसे होवहां तो तुम्हें कुछ भी सुनाई न पड़ेगा। गुरु की सिखावन के लिए तुम्हें गुरु की तरफ उन्मुख होना पड़ेगा। तुम्हें उसके पास चुप और शांत बैठने की कला सीखनी पड़ेगी। तुम जब उसके पास आओ तो तुम्हें सिर अपना घर ही छोड़ कर आना पड़ेगा। अगर तुम सिर अपने साथ ले आए तो तुम सुन न सकोगे। सिखावन भी दी जाएगी तो अर्थ तुम अपने निकाल लोगे। तुम्हारा सिर बीच में सब रूपांतरित कर देगाबदल देगा। कुछ कहा जाएगाकुछ तुम सुनोगे। और तुम खाली हाथ आए थेखाली हाथ वापस लौट जाओगे।
क्योंकि गुरु की सिखावन मस्तिष्क से नहीं सुनी जाती। सिर से उसका कोई लेना-देना नहीं है। गुरु की सिखावन तो हृदय से सुनी जाती है। तुम गुरु की सिखावन सुनते वक्त विचार नहीं करते कि वह ठीक कह रहा है या गलत कह रहा है। इसलिए तो आस्था से सुनी जाती है। गुरु कह रहा है इसलिए ठीक। तुम सोचने वाले नहीं हो। निर्णायक नहीं हो कि वह ठीक कह रहा है कि गलत कह रहा है। अगर तुम अभी भी सोचने वाले होतो तुम शिक्षक के पास होगुरु के पास नहीं हो। तब तुम विद्यालय में होसाध-संगत में नहीं। वहां तुम सोचो कि क्या ठीक हैक्या गलत। लेकिन निर्णायक तुम ही हो।
गुरु के पास आने का अर्थ है कि मैं निर्णय कर-कर के थक गया। निर्णय मुझसे नहीं होता। गुरु के पास आने का अर्थ है कि मैं सोच-सोच कर थक गयामैं कुछ भी सोच नहीं पाता। गुरु के पास आने का अर्थ है कि मैं अपने से परेशान हो गया। और मैं अपने को छोड़ने आया हूं। इसको संक्षिप्त में कहें तो श्रद्धा है।
गुरु के पास तुम तभी आ सकते हो जब तुम अपने से भलीभांति परेशान हो गए हो। अगर तुम अभी भी समझते हो कि तुम समझदार होतो गुरु के पास आने का कोई अर्थ नहीं। अभी तुम ही अपने गुरु हो। अभी कुछ दिन और भटको। अभी कुछ और तकलीफ झेलो। अभी संदेह कर-कर के कुछ और पीड़ा इकट्ठी करो। अभी और संताप जरूरी है तुम्हें पकाने को। लेकिन जिस दिन तुम अपने से ऊब जाओउसी दिन गुरु के पास आना। कच्चे आने से कोई सार नहीं है।
इसलिए बड़ी कठिनाई होती है। लोग गुरु के पास चले आते हैं और तैयार नहीं होते। तैयारी का मतलब है कि अभी वे अपने पर भरोसा करते हैं। तो गुरु जो कहेगा उसमें सोचेंगेक्या सहीक्या गलत! उसमें से चुनेंगे। जो जंचेगा वह मानेंगेजो नहीं जंचेगा वह नहीं मानेंगे। तो तुम अपनी ही मान रहे हो।
इसको श्रद्धा मत कहना। इसको समर्पण भी मत समझना। तुमने कुछ भी छोड़ा नहीं है। गुरु के पास जाने का तो एक ही राज है कि तुम अपने को छोड़ कर जाना। फिर वह जो कह रहा हैसही है। फिर तुम्हें निर्णय करने को कुछ बचा नहीं। और तब तुम उसकी सिखावन सुन पाओगे। क्योंकि ऐसे समग्र हृदय से ही सिखावन सुनी जा सकती है। और तभी तुम सिक्ख हो पाओगे। जिसने सिखावन सुनी वह सिक्ख हुआ।
सिक्ख शब्द बड़ा प्यारा है। वह संस्कृत के शिष्य से बना है। जो सीखने को तैयार है वह सिक्ख। जो सिखावन सुनने को तैयार है वह सिक्ख। जो अभी अपनी ही अकड़ से जी रहा हैजो अभी सीखने को तैयार नहींवह सिक्ख नहीं है। तुम वस्त्र पहन सकते हो सिक्ख केउससे कुछ हल नहीं होता। तुम ढंग बना सकते हो सिक्ख काउससे कुछ हल नहीं होता। क्योंकि सिक्ख होना एक हार्दिक घटना है।
कहते हैं नानक--
मति बिच रतन जवाहर माणिकजे इक गुरु की सिख सुणी
और हजार बातें सुनने से भी कुछ नहीं होगा। एक ही सुन लेने से सब हो जाता है। और तुम कितना सुन चुके होफिर भी कुछ नहीं होता। कितना पढ़ चुके होफिर भी कुछ नहीं होता। कारण साफ है। तुमने सुना ही नहींजहां से सुनना चाहिए था।
दो रास्ते हैं सुनने के। एक रास्ता है बुद्धि का। जब बुद्धि सुनती हैतो बुद्धि हमेशा द्वैत से सुनती है। सोचती है,ठीक या गलत। सहीया न सही। मानूंन मानूं। बुद्धि कभी अहंकार के पार नहीं जाती। बुद्धि हृदय को तो पागल मानती है। बुद्धि हृदय का भरोसा नहीं करती।
इसलिए तो तुम सब ने हृदय को मार डाला है। क्योंकि हृदय का भरोसा नहींकब कौन सा काम करवा देजो कि पीछे महंगा पड़े।
रास्ते से निकलते होभूखे को देखकर हृदय कहता हैदे दो। बुद्धि कहती हैरुको। पहले पक्का पता लगा लो कि यह आदमी धोखा तो नहीं दे रहा है! यह कोई व्यवसायी भिखारी तो नहीं! और यह भी तो देखो कि यह भला-चंगा हैकमाता क्यों नहींबुद्धि हजार बातें कहेगी। हृदय में एक भाव उठा थाबुद्धि उसे दबा देगी।
प्रेम उठेगाबुद्धि कहेगीखतरनाक रास्ता है। प्रेम अंधा है। कहां जाते होआंख से चलोहोश सम्हाल कर चलो। प्रेम ने कई को बरबाद किया है। बुद्धि का रास्ता राजपथ की तरह साफ-सुथरा हैप्रेम का रास्ता पगडंडी की तरह है। जंगलों में भटक जाती है। कहां जा रहे होरास्ते से मत उतरो। जहां भीड़ चल रही हैवहीं चलो। सब जहां हैंवहीं ठीक हैअकेले कहां जाते हो?
प्रेम अकेले का रास्ता है। इसलिए तो प्रेम प्राइवेसी चाहता हैएकांत चाहता है। प्रेम कहेगादे डालो। बुद्धि कहेगीपहले सोचोविचारोसब पता लगा लोफिर देना। तब तुम कभी न दे पाओगे। प्रेम कहता हैसमर्पण कर दोकिसी के चरणों में सिर रख दो और छोड़ दो अपने को। बुद्धि कहेगीऐसा कहीं चलेगा! दुनिया में बड़ी धोखा-धड़ी है। श्रद्धा के नाम पर न मालूम कितने लोग लूट रहे हैं।
मगर तुम्हारे पास है क्या जो लुट जाएगातुम्हारे पास है क्या जो तुम दे दोगे और चुक जाएगासिवाय दीन-दरिद्रता के भीतर कुछ भी नहींलेकिन उसको भी बचाए रखते हो। और बुद्धि की तुम सुन कर जीयोगे तो धीरे-धीरे हृदय सिकुड़ताजाता है। हृदय धीरे-धीरे टूट ही जाता है। इतना फासला हो जाता है कि हृदय की खबर ही तुम तक नहीं आ पाती। बुद्धि इतने बीच में द्वार लगा देती है। फिर तुम प्रेम भी करते हो तो बुद्धि से ही करते हो।
तुमने कभी खयाल कियाकि तुम्हारा प्रेम भी खोपड़ी से आता हैहृदय से नहीं। तुम भला कहो कि मैं बड़े हृदय से प्रेम करता हूं। लेकिन ये शब्द भी बुद्धि से ही आते हैं। तुम अपने हृदय में जांच-पड़ताल करोगेवहां कुछ होता नहीं मालूम पड़ता। वहां न कोई पुलक हैन कोई नृत्य हैन कोई संगीत है। वहां कोई कंपन भी नहीं है।
गुरु की सिखावन तो हृदय से सुनी जा सकती है। कबीर ने कहा हैजो सिर को काट कर जमीन पर धर देचले हमारे साथ। किस सिर की बात कर रहे हैंइस सिर को काटने से कुछ नहीं होगा।
बोधिधर्म एक बौद्ध फकीर हुआ। वह चीन गया। वह बड़ा अनूठा आदमी था। वह दीवाल की तरफ मुंह कर के बैठता था,लोगों की तरफ पीठ। वह कहता थाजब कोई शिष्य आएगा तो उस तरफ मुंह कर लूंगा। तुमसे क्या बात करनीऔर तुमसे बात करनी या दीवाल से बात करनी बराबर है।
फिर एक आदमी आयाहुईनेंग। वह पीछे खड़ा रहा चौबीस घंटे तक। और उसने कहा कि बोधिधर्म! इस तरफ सिर करो। बोधिधर्म चुप रहा। तो उसने अपना हाथ काट कर बोधिधर्म को भेंट किया। और उसने कहा कि अगर देर की तो सिर काट दूंगा। बोधिधर्म ने कहाइस सिर को काटने से कुछ भी न होगा। अगर उस सिर को काटने की तैयारी हो...। हुईनेंग ने कहा कि सब तैयारी करके आया हूं। जो कहोवह करने की तैयारी है।
नौ साल में पहली दफा बोधिधर्म ने किसी व्यक्ति की तरफ चेहरा किया। हुईनेंग उसका उत्तराधिकारी हुआ। लेकिन उसने पहले पूछा कि इस सिर को काटने से कुछ भी न होगाउस सिर को...!
कौन सा वह सिर हैवह जो भीतर अस्मिता हैअहंकार है। मैं हूं और मैं निर्णायक हूं--तो तुम शिष्य न हो सकोगेतो तुम सिखावन न सीख सकोगे।
'और गुरु की जो एक सिखावन सुन लेता हैउसकी मति माणिक जैसी हो जाती है।'
उसकी चेतना एक स्वच्छता कोपारदर्शिता को उपलब्ध हो जाती है। वह आर-पार देखने लगता है। विचार वहां हट जाते हैंक्योंकि हृदय में कोई विचार नहीं है। बुद्धि वहां से बहुत दूर पड़ जाती है। सब धुआं बुद्धि का वहां से हट जाता है। एक स्वच्छताएक ताजगी! और वही ताजगी स्नान है गंगा का।
नानक ठीक कहते हैं, 'यदि मैं उसको भा गयातो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया है। और यदि मैं उसे न भायातो नहा-धोकर क्या करूंगा?'
वह है एक भीतर का स्नानजहां जीवन स्वच्छचेतना स्वच्छ हो जाती है। जहां तुम सोचते नहींजहां तुम सिर को उतार कर रख देते हो। सिर है भी उधार। हृदय तो तुम लेकर आए थे संसार मेंसिर संसार ने दिया है। जब तुम पैदा हुए थे तो तुम हृदय थे। तब तुम्हारे पास सिर बिलकुल न था। भीतर कोई विचार न थे। आकाश खाली और कोरा थानिर्दोष था। फिर एक-एक करके शब्द और विचार तुम्हें दिए गए। फिर समाज ने तुम्हें सिखाया। फिर समाज ने तुम्हें संस्कारित कियाकंडीशंड किया। फिर संस्कार डाल-डाल कर तुम्हारी बुद्धि को तैयार किया। जिन-जिन चीजों की संसार में जरूरत हैउनके लिए तैयार किया। और जिन-जिन चीजों से संसार में खतरा हैउनको दबाया। तुम्हारे भीतर एक द्वैत निर्मित हुआ। हृदय और बुद्धि अलग-अलग टूट गई।
बुद्धि का अर्थ हैजो समाज ने सिखायाजो तुम लेकर न आए थे। बुद्धि उधार हैसिर दिया हुआ है। हृदय तुम्हारा अपना है। और यही दुविधा है कि जो अपना हैवह अपना नहीं रहा। और जो पराया हैवह अपना हो गया। जो ऊपर-ऊपर से थोपा गया हैवह तुम्हारा केंद्र बन गया हैऔर तुम्हारा केंद्र तुम्हें बिलकुल ही विस्मृत हो गया है।
इसे हटा दोतो ही तुम सिखावन सुन सकोगे। सिखावन सुनते ही तुम...एक सिखावन काफी है। कोई हजार की जरूरत नहीं। एक बात भीएक गुर भी काफी है। और वह गुर क्या है?
नानक कहते हैं, 'एक गुर से सब हल हो जाता हैकि सभी प्राणियों का दाता एक हैउसे मैं न भूलूं'
सभना जीआ का इकु दातासो मैं बिसरि न जाई।
बस उसका मुझे विस्मरण न होइतनी सिखावन काफी है। इसे थोड़ा समझें। स्मरण और विस्मरण दो शब्द गौर से समझ लें। स्मरण का अर्थ है कि जिसकी सतत प्रतीति भीतर बनी रहे। तुम कुछ भी करोचलोफिरोउठोबैठोउसकी सतत प्रतीति बनी रहे।
जैसे एक गर्भिणी स्त्री होती है। काम करती हैखाना बनाती हैबिस्तर लगाती हैलेकिन पूरे वक्त गर्भ का स्मरण बना रहता है। एक नया हृदय उसके शरीर में धड़कना शुरू हुआ है। एक नए जीवन का अंकुर फूटा हैउसकी प्रतीति बनी रहती है। गर्भिणी स्त्री चलती और ढंग से है। तुम स्त्री को चलते देख कर कह सकते हो कि वह गर्भिणी है। वह बात भी करती रहेगी चलते वक्ततो भी एक स्मरण भीतर बना हुआ है। एक सतत धार भीतर बह रही है कि एक जीवन को सम्हालना है।
स्मरण का अर्थ है कि वह कोई अलग चेष्टा नहीं है। क्योंकि अगर अलग चेष्टा हो तो भूल-भूल जाएगा। खाना बनाओगे,भूल जाएगा। बाजार में दूकान पर बेचने जाओगे सामानभूल जाएगा। किसी से बात करोगेभूल जाएगा। तो अगर तुम ऐसा राम-रामराम-रामराम-राम जपते होवह स्मरण नहीं है। क्योंकि उसको तुम कब तक जपोगेसोओगेभूल जाएगा। साइकिल चलाओगेभूल जाएगा। और अगर उसे न भूलेसड़क पर भी याद रखने की कोशिश कीतो टक्कर खाओगे। किसी का भोंपू बजेगा और तुम्हें सुनाई न पड़ेगा। जो स्मरण तुम चेष्टा से करोगेजो तुम्हारी बुद्धि में गूंजेगावह स्मरण नहीं है।
जो तुम्हारे रोएं-रोएं में समा जाए--उसको नानक अजपा जाप कहते हैं। जिसको जपना भी न पड़े। क्योंकि जपना तो ऊपर ही ऊपर होगा। जो तुम्हारे रोएं-रोएं में समा जाएतुम उठोबैठोचलोफिरोकुछ भी करोजिसकी याद बनी रहेउस याद का नामस्मरण। उसको नानककबीर सुरति कहते हैं। इसलिए उनका योग सुरति योग कहलाता है। सुरति का अर्थ है--स्मरण,स्मृति।
और एक दशा है विस्मरण कीविस्मृति की। कि तुम्हें और सब तो याद हैएक बात तुम्हें बिलकुल भूल गई कि तुम कौन हो! और जिसे यह ही भूल गया है कि मैं कौन हूंउसे कैसे याद आ सकता है कि यह अस्तित्व क्या है!
गुरजिएफ ने पश्चिम में इस सदी में सेल्फ रिमेंबरिंगसुरति पर बड़ी मेहनत की। गुरजिएफ की पूरी विधि यह थी कि तुम चौबीस घंटे स्मरण रखो कि मैं हूं। सिर्फ यह स्मरण कि मैं हूं। अगर यह स्मरण सघन होता जाएतो तुम्हारे भीतर एक केंद्र निर्मित होता है। एक क्रिस्टलाइजेशन होता है। तुम्हारे भीतर कोई चीज सघन हो जाती है। मजबूत हो जाती है। सतत चोट से तुम्हारे भीतर एक संघटित तत्व का उदय होता है।
लेकिन गुरजिएफ की विधि में एक खतरा हैजो खतरा महावीर की विधि में भी है। जो खतरा पतंजलि के योग में भी है। और वह खतरा यह है कि कहीं तुम इस संगृहीत हुए तत्व को अहंकार के साथ न जोड़ बैठो। क्योंकि वे बहुत करीब-करीब हैं। जिसको गुरजिएफ क्रिस्टलाइज्ड सेल्फ कहता हैयह जो नया गठन तुम्हारे भीतर हुआ हैकहीं इस पर अहंकार हावी न हो जाए। कहीं तुम इससे अकड़ न जाओ। कहीं तुम यह न कहने लगो कि मैं ही हूं। यह डर हैकहीं तुम परमात्मा को इनकार न कर दो। तो तुम पहुंच-पहुंच कर भी चूक गए। तुम बिलकुल किनारे गए और लौट आए। तुम आखिरी जगह पहुंच गए थे और वापस हो गए।
यह खतरा महावीर की विधि में है। क्योंकि महावीर की विधि में भी आत्मभाव को गहन करना है। परमात्मा की कोई जगह नहीं है। महावीर कहते हैंजब आत्मभाव परिपूर्ण हो जाएगातो वहीं से परमात्मा प्रगट होगा। वही परमात्मा हो जाएगा। यह ठीक है। महावीर को ऐसा हुआ। लेकिन महावीर के पीछे चलने वालों को ऐसा हुआ दिखाई नहीं पड़ता। इसलिए तो महावीर की धारा सिकुड़ गई। उसमें खतरा है। और खतरा यह है कि आत्मा के नाम पर कहीं अहंकार उदघोषणा न करने लगे।
इसलिए जैन मुनि को तुम जितना अहंकारी पाओगेकिसी दूसरे मुनि को उतना अहंकारी न पाओगे। जैन मुनि हाथ जोड़ कर झुक भी नहीं सकतानमस्कार भी नहीं कर सकता। किसको नमस्कार करेतुम नमस्कार करो तो वह नमस्कार का उत्तर भी नहीं दे सकता। वह सिर्फ आशीर्वाद दे सकता है। उसके हाथ जुड़ते ही नहीं। विधि बिलकुल सही हैलेकिन बड़ी सुगमता से खतरा है। हर विधि का खतरा हैवह याद रखना जरूरी है।
नानक की विधि में वह खतरा नहीं है। क्योंकि नानक खुद को स्मरण करने को नहीं कहते। वे कहते हैं कि सभी प्राणियों का एक दाता हैउसे मैं न भूलूं। सब के भीतर एक का ही वास है। अनेक के भीतर एक छिपा है--एक ओंकार सतनाम। पत्ते-पत्ते में वही कंपता है। हवा के झोंके में वही बहता है। बादल मेंआकाश मेंचांदत्तारों मेंकण-कण मेंमिट्टी मेंसबमें वही है। उसे मैं न भूलूं। वह मुझे याद रहे। उसकी याददाश्त घनी होती जाए। उसकी याददाश्त मेरे भीतर क्रिस्टलाइज्ड हो जाए। वह मेरे भीतर एक सघन तत्व बन जाए।
तो इसमें अहंकार का कोई खतरा नहीं है। इसमें तुम कभी अहंकारी न हो सकोगे। इसलिए नानक से विनम्र ज्ञानी खोजना कठिन है। क्योंकि अगर वही हैतो तुम सभी को हाथ जोड़ सकते हो। तुम सभी के पैर छू सकते होक्योंकि सभी में वही है। और जिसके तुम पैर छू रहे हो चाहे उसे पता न होलेकिन तुम्हें तो पता है।
यह खतरा नानक की विधि में नहीं हैलेकिन एक दूसरा खतरा है। और वह खतरा यह है कि सभी में वही हैउसकी स्मृति कहीं ऐसा न हो कि आत्मविस्मृति बन जाए। कहीं ऐसा न हो कि वह सबमें हैइसलिए तुम भूल ही जाओ कि मैं भी हूं। तो एक गहरी नींद लग जाएगी। योगत्तंद्रा हो जाएगी। तब तुम बेहोश-बेहोश से जीने लगोगे। तुम उसे सब जगह देखोगेसिर्फ अपने में न देख पाओगे। वह चारों तरफ दिखाई पड़ेगा। दसों दिशाएं उससे भर जाएंगीलेकिन ग्यारहवीं तुम्हारी दिशा अछूती रह जाएगी। तो तुम उसका गुण-गान करोगेतुम उसकी महिमा गाओगेलेकिन तुम खुद उस महिमा से वंचित रह जाओगे। यह खतरा है।
लेकिन यह खतरा पहले खतरे से छोटा खतरा है। क्योंकि जो सोया है उसे जगाया जा सकता है। लेकिन जो अहंकार से भर गया है उसकी नींद भयंकर है। वह कोमा में है। उसे जगाना बहुत मुश्किल है। वह कोई साधारण नींद में नहीं है। उसको तुम हिलाओ-डुलाओकोई फर्क न पड़ेगा। तंद्रा तोड़ी जा सकती है। इसलिए योगियों ने उसे अलग से नाम दिया हैयोगत्तंद्रा। उसको निद्रा भी नहीं कहा। क्योंकि निद्रा को तोड़ने में थोड़ी तकलीफ है। तंद्रा को तोड़ने में जरा भी तकलीफ नहीं है। तुम तंद्रा में हो और कोई ताली बजा दे तो टूट जाएगी।
नानक का मार्ग महावीर के मार्ग से सुगम है। पर खतरे को हमेशा याद रखना चाहिए। हर मार्ग का खतरा तो होगा ही। क्योंकि हर मार्ग पर भटकने की संभावना हैहर मार्ग से च्युत हो जाने की संभावना है। और तुम ऐसे हो कि अगर तुम्हें खतरा न बताया जाएतो पूरी संभावना है कि तुम भटक जाओगे। महावीर का मार्ग त्याग में भटक गया। नानक का मार्ग भोग में भटक गया।
क्योंकि महावीर ने कहा कि संसार को बिलकुल छोड़ दो। भोग का कणमात्र न बचने दो। तुम परम संन्यस्त हो जाओ। उसका परिणाम यह हुआ कि महावीर के त्यागी संसार के दुश्मन हो कर जीए। और जब तुम किसी के दुश्मन हो कर जीते हो तो जिसके तुम दुश्मन होउससे तुम बंधे रह जाते हो। जिससे तुम्हारी शत्रुता है उसे तुम भूल नहीं पाते। उसका स्मरण बना रहता है। तो महावीर का जो त्यागी है वह चौबीस घंटे संसार से लड़ रहा है। लड़ने की वजह से संसार का स्मरण कर रहा है। आत्मा वगैरह का स्मरण तो एक तरफ रह गया हैभोजनकपड़ाउठनाबैठनाकहां सोनानहीं सोनाउस सब में उसकी झंझट लगी हुई है। वह भटक गया त्याग में।
नानक ने ठीक दूसरी बात कही कि सब कुछ वही है। सब कुछ उसी का है। संसार को छोड़ कर कहीं जाने की कोई जरूरत नहीं। संसार में ही वह मौजूद है। तो नानक का मानने वाला संसार में भटक गया। नानक ने कहा कि संसार को छोड़कर कहीं जाने की जरूरत नहींइसका मतलब यह नहीं कि संसार काफी है। संसार में ही उसको खोजना है।
इसलिए तुम देखोपंजाबी हैंसिक्ख हैंसिंधी हैंनानक को मानने वाला जो वर्ग है इस मुल्क में उसको तुम देखो। खाने मेंपीने मेंकपड़े पहनने में सारा जीवन उसका लगा हुआ है। वह सोच रहा है कि संसार से बाहर तो कुछ है ही नहींबस यही सब कुछ है।
संसार में रह कर उसे पाना है। संसार सब कुछ नहीं है। संसार छोड़ कर जाने की कोई जरूरत नहीं। लेकिन तब खतरा है। तब संसार ही सब कुछ बन जाए। इसलिए नानक के पीछे चलने वाला वर्ग संसारी हो कर रह गया है। उसके देखने-सोचने का सब ढंग संसारी है।
ये बड़े खतरे हैं। हर मार्ग के साथ खतरा है। और अगर तुम खतरे से सचेत नहीं होतो सौ में निन्यान्नबे मौके पर तुम खतरे में ही जाओगे। क्योंकि तुम्हारी बुद्धि जैसी हैवह ठीक तो चल ही नहीं सकती। वह तिरछी चलती है।
तुमने कभी गधे को चलते देखावह कभी बीच रास्ते पर नहीं चलता। वह हमेशा दीवालइस तरफ या उस तरफअति पर चलता है। बुद्धि को गधा कहना उचित है। तुम बुद्धुओं को गधा कहते होलेकिन बुद्धिमानी ही गधापन है। क्योंकि बुद्धि चलती ही किनारे सेएक अति पकड़ती या दूसरी अति। और बुद्धिमान का लक्षण हैमध्य में होना। और वहां खतरा है।
इसलिए नानक की परम गुह्य बातें खो गईं। सिक्ख तो हैंनानक का सिक्ख कहांजिसने सिखावन सुनी होजिसने अपने सिर को छोड़ा होजो श्रद्धा और हृदय से भरा हो। और जिसने एक बात स्मरण रखी हो, 'एक गुर से सब हल हो जाता हैकि सभी प्राणियों का एक है दाताउसे मैं कभी न भूलूं'
वह स्मरण बना रहे। उसकी सतत प्रतीति बनी रहे। उठते-बैठते वह मुझमें समा जाए। मैं जो भी करूंवह उसके स्मरण के साथ ही हो। तो तुम संसार में रहते हुए संसार के पार हो जाओगे। यहां रहते हुए वहां पहुंच जाओगे। मंदिर जाने की जरूरत नहींघर ही मंदिर हो जाएगा। साधारण कामकाज उसकी विशिष्ट गरिमा से भर जाएगा। तुम्हारा कोई काम साधारण न रहेगा,असाधारण हो जाएगा। जहां भी तुम नहाओगे वहीं गंगा होगी।
लेकिन डर है कि तुम सोच लोफिर कुछ करने को नहीं बचा। फिर हम जहां नहा रहे हैं वहीं ठीक है। गंगा का सवाल नहीं हैतुम्हारा सवाल है। तुम जब भिन्न होते हो तो गांव की साधारण सी नदी गंगा हो जाती है। और तुम जब भिन्न नहीं होतेतुम गंगा को भी साधारण नदी बना लेते हो। तुम्हारे साधारण और असाधारण होने का सवाल है।
क्या है साधारणपनसाधारणपन है बिना स्मरण के जीना। और असाधारणपन है उसके स्मरण से जीना। और उसका स्मरण मूल्यवान है। उसके लिए कुछ भी खोना पड़े तो तुम तैयार रहोगेलेकिन उसके स्मरण को खोने को तैयार न रहोगे।
इसलिए नानक कहते हैं, 'सिखावन जो सुन लेताउसकी बुद्धि रत्नजवाहर और माणिक जैसी हो जाती है।'
क्यों माणिकरत्न और जवाहर की वे बात कर रहे हैंवे इसलिए कर रहे हैं कि अगर जरूरत पड़ेगी तो तुम कुछ और छोड़ दोगेलेकिन माणिक को न छोड़ोगे। तुम्हारे खीसे में रुपए का नोट है और माणिक पड़ा हैजरूरत पड़ी तो तुम रुपए का नोट छोड़ दोगे। जरूरत पड़ी तो तुम पूरा घर छोड़ दोगेलेकिन माणिक को न छोड़ोगे। क्योंकि तुम जानते होवह सबसे मूल्यवान है। जीवन से सब छूट जाए लेकिन स्मरण न छूटेगा। क्योंकि तुम जानते होसब जीवन दो कौड़ी का है। वह स्मरण माणिक की भांति है। वह सर्वाधिक बहुमूल्य है।
'अगर किसी की आयु चारों युगों के बराबर हो जाएउससे भी दस गुनी हो जाएअगर नवों खंड के लोग उसे जानते हों और उसके साथ चलते होंजिसको सुनाम प्राप्त होऔर जिसकी कीर्ति सारे जगत में फैली होवह भी अगर उसकी दृष्टि में नहीं जंचता हैतो कोई भी मूल्य नहीं है। उसके पूछ का कोई भी अर्थ नहीं हैउसे कोई भी नहीं पूछता।'
जे जुग चारे आरजा। होर दसूणी होई।।
नवा खंडा विचि जाणीऐ। नालि चलै सभु कोई।।
चंगा नाउ रखाइकै। जसु कीरति जगि लेइ।।
जे तिसु नदर न आवई। त बात न पुछै केइ।।
नानक कहते हैं कि तुम्हारे पास चारों युगों की उम्र होसतयुग से लेकर कलियुग तकजितनी इस सृष्टि की उम्र है,उतनी तुम्हारी उम्र होउससे भी दस गुनी हो जाएनवों खंडों के लोगसारे सृष्टि के लोग तुम्हें जानते होंतुम्हारे साथ चलते होंबड़ा तुम्हारा सुनाम होसारे जगत में तुम्हारी कीर्ति होफिर भी अगर उसकी दृष्टि में तुम न जंचेतो कुछ भी सार नहीं है।
इसे थोड़ा सोचें। और हमारी यही तलाश हैसारी दुनिया हमें जान लेसारी दुनिया का साम्राज्य हमारा होउम्र होधन होसुयश होसुनाम होयही हमारी खोज है। और नानक कहते हैंतुम सब पा लोतुम पूरी सृष्टि के मालिक हो जाओ,लेकिन उसे न जंचोतो कुछ भी सार नहीं है।
क्या बात हैक्या कारण है?
सब पा कर भी तुमने कभी किसी को तृप्त होते देखापूछो अरबपतियों सेपूछो सिकंदरों सेहिटलरों से। तुमने कभी उन्हें तृप्त देखाकभी तुमने उनके आसपास ऐसा भावऐसी हवा देखीजो खबर देती हो कि सब मिल गया?
उलटी ही हालत है। जितना तुम ऐसे लोगों के करीब जाओगेउतना ही पाओगेउनकी दरिद्रता बड़ी है। उनका भिक्षापात्रबड़ा हो गया हैवे और मांग रहे हैं। नवखंड काफी नहीं हैं। चारों युगों की उम्र पर्याप्त नहीं है। उनकी मांगजो भी मिल जाए,उससे बड़ी है। उनका अभाव अनंत है। वह भरा नहीं जा सकता। उसे भरने का कोई उपाय नहीं। उनकी तृष्णा दुष्पूर हैउनकी चाह की कोई सीमा नहीं है। वह जो भी मिल जाता हैचाह आगे चली जाती है।
चाह आगे ही चलती जाती है। चाह तुमसे मीलों आगे चलती है। तुम जहां जाते होवह तुमसे पहले पहुंच जाती है। और जितना ज्यादा तुम्हारे पास होता हैउतना ही तुम्हें एहसास होने लगता है कि तुम किसी गलत मार्ग पर चल रहे हो। क्योंकि तृप्ति तो मिलती ही नहीं। लौट भी नहीं सकते। क्योंकि अहंकार कहता हैकहां लौटकर जाते हो?
दो भिखमंगे एक झाड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे। और एक भिखमंगा रो रहा थाशिकायतें कर रहा था। जब सम्राट रोते हैं और शिकायतें करते हैंतो बिचारा भिखमंगा! वह कह रहा थायह भी कोई जीवन है। आज इस गांवकल उस गांव। बिना टिकट सफर करो। कहीं भी उतार दिए जाओ। जो देखो वही उपदेश देमांगो रोटीमिले उपदेश। जो देखो वही कहेभले-चंगे हो,जाओ काम करो। हर जगह अपमानहर जगह निंदायह भी कोई जीवन हैऔर खदेड़े जाते हैं हर जगह से। पुलिस वाले सदा पीछे खड़े हैं। जहां सोओ वहीं से उठाए जाओरात पूरी नींद भी एक जगह नहीं ले सकते।
तो दूसरे ने कहातो फिर तुम यह काम छोड़ ही क्यों नहीं देतेउसने कहाक्याक्या मैं स्वीकार कर लूं कि मैं असफल हो गया?
भिखमंगा भी स्वीकार कर नहीं सकता कि वह असफल हो गया है। तो करोड़पति तो कैसे स्वीकार करेतो राजनीतिज्ञ तो कैसे स्वीकार करे कि असफल हो गया है?
नहींवह कहता हैसिद्ध कर के रहूंगा। हालांकि आज तक कोई भी सिद्ध न कर पाया। नहीं तो महावीरबुद्धनानक सब मूढ़ हैं। कोई भी सिद्ध नहीं कर पाया कि मिलने से कुछ मिलता है। लेकिन अहंकार पीछे नहीं लौटना चाहता। अहंकार कहता हैऔर आगे बढ़ो। शायद थोड़ी ही दूर हो मंजिल। कौन जानता हैदो कदम और। आशा का जाल फैलता चला जाता है। और अहंकार पीछे नहीं लौटने देताआशा आगे की तरफ खींचती है। आशा भविष्य का रास्ता बनाती जाती है। अहंकार कहता है,इतने चल आएऔर अब तक कभी स्वीकार न की कमजोरी कि हम गलत मार्ग पर हैंअब कैसे स्वीकार करोढांक लोछिपा लोकिसी तरह चलते जाओ। कभी सफलता मिलेगी ही निश्चित।
तुम्हारे सब सफल लोगों के भीतर असफलता के आंसू छिपे हैं। वे प्रकट नहीं करते। इसलिए उनके पब्लिक फेसेस और उनके प्राइवेट फेसेस अलग हैं। उनका जो चेहरा वे दिखाते हैं जनता मेंवह अलग है। उनका चेहरा जो वे अपने बाथरूम में आईने में देखते हैंवह बिलकुल अलग है। तुम उन्हें रोते पाओगे। जब जनता में देखोगेतब तुम उन्हें मुस्कुराते पाओगे। उनकी मुस्कुराहट झूठी है। उस मुस्कुराहट के भीतर कुछ भी नहीं हैसिर्फ आंसू छिपे हैं।
नानक कहते हैं कि सब मिल जाए तो भी तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति तो तभी मिलती हैयदि तुम उसे भा जाओ। और तब नंगे फकीर को भी मिल जाती है। जिसके पास कुछ नहीं हैउसे भी हमने आनंदित देखा है। और जिनके पास सब है उन्हें भी दुखी।
तो जरूर तृप्ति का सूत्र कहीं और है। वह तुम्हारे पास क्या हैइससे उसका कोई संबंध नहीं। तुम्हारा परम-सत्ता से क्या संबंध हैउससे उसका संबंध है। तुम्हारे पास क्या हैइससे निर्णय नहीं होता कि तुम तृप्त हो। तुम और परमात्मा के बीच क्या नाता हैउस दिशा में तुमने कैसे सूत्र बांधे हैंउससे पता चलता है कि तुम तृप्त हो या अतृप्त हो। अगर उससे नाता बन गया,अगर तुम उसकी तरफ सन्मुख हो गए...और वही है अर्थ इस बात का कि अगर तुम उसे जंच गए।
तुम तो उसे जंचे ही हुए होनहीं तो वह तुम्हें पैदा क्यों करेतुम उसे जंचे ही हुए होअन्यथा वह तुम्हें इतना अवसर क्यों देतुम उसे जंचे ही हुए हो। लेकिन तुम पीठ किए खड़े हो। जंच जाने का अर्थ हैजब तुम उन्मुख हो जाते हो। और तुम जब उसकी सूरत को सब सूरतों में देखते होऔर तुम हर जगह उसी का वास पाते होपत्थर भी तुम्हें धोखा नहीं दे सकता। तुम पत्थर में भी उसी को धड़कते पाते हो। जब तुम सब तरफ उसी को पाते होतब तुम जंच गए।
नानक कहते हैंयदि मैं उसको भा गयातो मैंने तीर्थों में स्नान कर लिया। उतरी स्वर्ग की गंगा तुम्हारे ऊपर। यह गंगा जो हिमालय से बहती है प्रयाग और काशी छूती हुईइस गंगा में नहाने से कुछ भी न होगा। उसकी गंगा उतरनी चाहिए। उसको जंच जाना चाहिए। भा गए तुम उसे! स्वीकार हो गए!
'वह भी अगर उसकी दृष्टि में नहीं जंचतातो कोई उसे नहीं पूछता।'
कितना तुम पा लोव्यर्थ है। तुम्हारा सब पाना गहरे अर्थों में गंवाना है। तुम्हारी सब संपदा सिवाय विपदा के और कुछ भी नहीं। एक ही संपदा है--उसको जंच जाना। वही जब तुम्हारी खोज बन जाती हैतो तुम संसार में संन्यासी हो गए। करते तुम सब होध्यान उसका रखते हो। घूमते तुम सब तरफ होनजर उस पर रखते हो। क्षुद्रबड़े छोटे काम में लगे रहते हो,लेकिन विस्मरण उसका नहीं होने देते। वह तुम्हारे भीतर है।
यह जो सुमिरन हैयह जो सुरति हैयह जो अजपा जाप है--धीरे-धीरे-धीरे तुम जंच जाओगे। तुम उसे भा जाओगे। और जिस दिन तुम उसे भा जाते होउस दिन तुम्हारे जीवन में नृत्य उतरता हैउत्सव उतरता है। उस दिन तुम्हारे पास कुछ भी नहीं होता। और सब कुछ होता है।
'वह कीटों में भी कीट बना दिया जाता हैऔर दोषी भी उस पर दोष मढ़ने लगते हैं।'
वह जो परमात्मा से वंचित हैसब पा लेतो भी कीटों में कीट बना दिया जाता हैऔर दोषी भी उस पर दोष मढ़नेलगते हैं।
'नानक कहते हैं कि वह गुणहीनों को गुणी बना देता हैऔर गुणवानों को और गुण देता है। प्रभु के सिवाय और कोई नहीं है जो गुण प्रदान कर सके।'
प्रभु के सिवाय और कोई नहीं है जो तुम्हें गुण प्रदान कर सके। तुम उसे अगर चूक गए तो सब चूक गए। वही निशाना है। याद रखो प्रतिपलवही निशाना है। अगर तुम्हारे जीवन का तीर उस तक न पहुंचातो कहीं भी पहुंच जाएवह असफलता है। एक ही सफलता हैवह परमात्मा को पा लेना है। और सब असफलताएं हैं। एक ही उपलब्धि हैउसे जंच जाना।
तुम कभी सोचो। तुम किसी को प्रेम करते हो और तुम जंच जाते होप्रेमी तुम्हें स्वीकार कर लेता हैप्रेमी तुम्हें हृदय से लगा लेता हैतब तुम्हारे जीवन में कैसी पुलक आती है! तब तुम्हारे पैर जमीन पर नहीं पड़ते। तब तुम हवा में उड़ते हो। जैसे तुम्हें पंख लग जाते हैं। और कुछ अज्ञात घूंघर तुम्हारे जीवन में बजने लगते हैंजो तुमने कभी न सुने। तुम्हारे चेहरे की रौनक बदल जाती हैरंग बदल जाता है। तुम्हारी आंखें किसी और ही बात की खबर देने लगती हैं।
प्रेम को छिपाना इसीलिए तो मुश्किल है। तुम सब छिपा लोप्रेम को तुम नहीं छिपा सकते। अगर तुम्हें किसी से प्रेम हो गयातो वह प्रगट होगा ही। उसको बचाने का कोई भी उपाय नहीं। क्योंकि तुम चलोगे और ढंग सेउठोगे और ढंग सेतुम्हारी आंखें उसकी खबर देंगी। तुम्हारा रोआं-रोआं उसकी खबर देगा। क्योंकि प्रेम एक स्मरण है। साधारण जीवन में भी अगर तुम्हारा प्रेमी तुम्हें स्वीकार कर ले तो तुम इतनी पुलक से भर जाते होतुम जरा हिसाब लगाओपूरा अस्तित्व तुम्हें स्वीकार कर ले तब तुम्हारी पुलक कैसी होगीपूरा अस्तित्व तुम्हें प्रेम करेहृदय से लगा लेआलिंगन घटित होतुम पूरे अस्तित्व के साथ प्रेम में बंध जाओ...।
यही तो मीरा कह रही है कि कब कृष्ण तुम मेरी शय्या पर आओगेये प्रतीक प्रेमी के हैं। मीरा कह रही हैमैंने सेज-शय्या को संवार कर रखा है। फूलों से तुम्हारी सेज बनाई है। कब तुम आओगेकब तुम मुझे स्वीकार करोगे?
भक्त भगवान के लिए ऐसा ही प्यासा हैप्रेयसी जैसे प्रेमी के लिएजैसे चकोर स्वाति की बूंद के लिए। प्यासा हैपुकार रहा हैफिर एक बूंद भी तृप्ति बन जाती है। एक बूंद भी मोती बन जाती है। और जब उतनी पुकार और प्यास से कोई जीता हैतो साधारण पानी मोती हो जाता है।
अगर उतनी ही पुकार और प्यास होतो गुरु की एक सिखावन माणिक बन जाएगी। एक बूंद काफी है। एक बूंद सागर हो जाएगी। और जिसने गुरु की सिखावन समझ ली...सिखावन ही क्या हैछोटा सा सूत्र है। समझ लो तो बहुत छोटा है। न समझोतो अनंत जन्म बीत जाते हैं। छोटा सा सूत्र हैनानक कहते हैंगुरा इक देहि बुझाईसारी प्यास बुझा देता है एक गुर।
सभना जीआ का इकु दातासो मैं बिसरि न जाई।।
बसउसको भर मैं विस्मरण न करूं। एक छोटा सा गुर सारी प्यास बुझा देता है। सारी तृष्णा मिटा देता है। सारी चाह खो जाती है।
नानक कहते हैं, 'वह गुणहीनों को गुणवान बना देता है। गुणी बना देता है।'
उसकी तरफ चेहरा हुआ कि तुम पात्र हुए। पात्र तुम सदा ही थेखाली थे। उसकी तरफ चेहरा हुआभर गए। उसकी महिमा ने तुम्हें आकर आंदोलित कर दिया। वीणा तो तुम्हारी सदा से तैयार थी। तुमने उसके हाथों में सौंप दीउसकी अंगुलियों ने छुआसंगीत का जन्म हो गया। संगीत सोया थाअंगुलियों की प्रतीक्षा थी। लेकिन तुम सौंपो अपनी वीणा को उसे तब!
उस सौंपने का नाम ही श्रद्धा है। सौंपने का नाम ही शिष्यत्व हैसिक्ख हो जाना है। सौंपने का नाम ही समर्पण। उस सौंपने का नाम ही संन्यास। कि तुम अपनी वीणा उसके हाथों में दे दो और तुम कहोजो तेरी मर्जी। तेरी मर्जी अब मेरा जीवन होगी। मैं तुझे स्मरण रखूं इतना मेराशेष सब तेरा। तू मुझे कभी न भूले इतनी मेरी मांग। और सारी मांग समाप्त। एक छोटा सा गुर!
नानक कहते हैं, 'वह गुणहीनों को गुणी बना देता है। और गुणवानों को और गुण देता है।'
एक ही तो गुण है जीवन में कि तुम्हारे पात्र में वह समा जाएभर जाएकि तुम अकेले न रहोउसका संग-साथ हो जाएकि तुम अकेले न भटको। अन्यथा तुम उसे खोजोगे कई जगहपाओगे न।
कोई उसे धन में खोजता है कि शायद कोई संगी-साथी मिल जाए। कोई पत्नी में खोजता हैकोई पति में खोजता है। लेकिन वह सब खोज अधूरी है। तुम जब तक उसको सीधा न खोजोगेतुम उसे न पा सकोगे। उसको पाते ही सब दुर्गुण बिसर जाते हैं।
इसलिए नानक तुमसे न कहेंगे कि एक-एक दुर्गुण को मिटाओ। क्योंकि वे तो अनंत हैं। चोरी छोड़ोबेईमानी छोड़ोहत्याछोड़ोक्रोध छोड़ोकामलोभमोहमत्सरक्या-क्या छोड़ोगेवे तो अनंत हैं। नानक तुमसे नहीं कहते कि तुम उनको छोड़ने में लग जाओ एक-एक को।
नानक तो कहते हैं कि तुम उन्मुख हो जाओ परमात्मा की तरफ। उसको स्मरण करो। और जैसे ही वह तुम्हारी तरफ देखेगाउसकी नजर तुम पर पड़ेगी कि सब बदल जाएगा। तुम स्वीकार हो गए। तुम जंच गए। क्रोध अपने से तिरोहित हो जाएगा। लोभ अपने से गिर जाएगा।
जिसने उसे पा लियाउसको कैसा लोभ! अब क्या पाने को बचाजिसने उसे पा लियाअब कैसा क्रोध! अब कौन क्रोध करने को बचा हैजिसने उसे पा लियाअब कैसा काम! अब कैसी वासना! परम संभोग घटित हो गया। अस्तित्व के साथ मिलन हो गया। आखिरी विवाह हो गया। अब किस प्रेमी की तलाशकबीर कहते हैंमैं राम की दुलहनिया! मैं उसकी दुलहन हूं। और जब राम से लगाव हो गया और जब राम की दुलहन बन गएअब कैसी कामवासना?
कामवासना में हम उसी को खोजते थे। गंदे नदी-नालों में हम उसी की गंगा को खोजते थे। तृप्त नहीं होते थेक्योंकि उस गंदगी से हम तृप्त न हो सकेंगे। ऐसे हीजैसे हंस को हम पानी पिला रहे हों नदी-नाले कागंदानालियों काऔर हंस तृप्त न होता हो! उसे मानसरोवर चाहिए। तुम्हारा हंस भी मानसरोवर मांगता है। स्फटिक जैसा स्वच्छ जल मांगता है। परमात्मा से कम तुम्हारी प्यास को कोई भी बुझा न सकेगा। और जैसे ही तुम उसकी तरफ मुड़ेसब दुर्गुण गिर जाते हैं। तुम गुणों से भर जाते हो।
'गुणियों को और गुण दे देता है। कहते हैं नानकप्रभु के सिवाय और नहीं है कोई जो गुण प्रदान कर सके।'
नानक निरगुणि गुणु करे। गुणुवंतिआ गुणु दे।।
तेहा कोई न सुझई। जि तिसु गुणु कोई करे।।
उसके अतिरिक्त तुम कहीं भी भटकोतृप्त न हो सकोगे। उसके अतिरिक्त तुम भटक ही रहे हो जन्मों-जन्मों से और अभी तक तुम्हें होश नहीं आया। आशा अभी भी बंधी है कि शायद उसके बिना पहुंच जाएंगे। और अहंकार पीछा कर रहा है कि इतने-इतने दिन कियाअब उसको ऐसे ही गंवा दें?
तुम उस तरह के आदमी हो कि एक आदमी मकान बनाएऔर मकान जीर्ण-जर्जर होउसकी नींव ठिकाने की न होरेत पर रखी हो। और अचानक जब मकान बनने के करीब आएतब कोई कहे कि इस मकान के भीतर मत जानायह मकान गिर जाएगाइसमें तुम मरोगे। तो तुम्हारा मन कहेगा कि इतना खर्च कियाइतनी मेहनत कीइतनी मुश्किल से बनाया। क्या वर्षों की मेहनत को ऐसे ही जाने देंऔर तुम्हारे मन में आशा उठेगी कि कौन जाने गिरे न गिरे! कौन जाने यह विशेषज्ञ गलत हो! और अब तक तो खड़ा ही रहा हैतो क्या कठिनाई है कि आगे भी खड़ा रहेबसयही तुम्हारी हालत है।
जैसे कोई आदमी रास्ते पर भटक जाए और हम उससे कहें कि तू रास्ता पीछे छोड़ आया है।
मैं पढ़ रहा था...एक कवि अपने संस्मरण लिख रहा है। उसने अपने संस्मरण मुझे देखने भेजे। उसमें एक संस्मरण मुझे सच में पसंद आया।
उसने लिखा है कि वह भटक गया। हिमालय के एक तराई में यात्रा को गयारास्ता भटक गया। तो एक झोपड़े के सामने उसने अपनी कार खड़ी की। एक स्त्री ने दरवाजा खोला। और उसने पूछा उससे कि मैं ठीक रास्ते पर तो हूंमैं मनाली पहुंचना चाहता हूंपहुंच जाऊंगा नउस स्त्री ने गौर से देखा और उसने कहा कि मुझे अभी यह ही पता नहीं कि तुम किस तरफ जा रहे होतुम जा किस तरफ रहे होकवि ने सोचा कि पहाड़ी स्त्री हैसमझदार ज्यादा नहीं दिखाई पड़ती। तो उसने कहा कि तू इतना ही मुझे बता दे कि मेरी गाड़ी का प्रकाश जो हैवह ठीक मनाली के रास्ते की तरफ पड़ रहा हैउसने कहाएक प्रकाश पड़ रहा है--लाल वाला!
जब कोई तुम से कहे--पचास मील चल कर तुम आ गएया हजार मील चलकर आ गएऔर तुम कितने मील चल चुके होकुछ गिनती नहीं--अचानक कहे कि तुम्हारा लाल प्रकाश तो गंतव्य की तरफ पड़ रहा हैतो तुम्हें धक से सदमा पहुंचेगा। इसका मतलब हैपीछे लौटना पड़ेगा। तुम्हारा अहंकार कहेगा कि थोड़ी और कोशिश कर लो। कौन जाने यह स्त्री सही हो या न हो! पागल होझूठ बोलती होकोई प्रयोजन हो इसकाकोई लक्ष्य होभटकाना चाहती होक्या भरोसा?
पीछे लौटने में अहंकार को चोट लगती है कि क्या मैं इतनी देर तक गलत थाइसलिए बच्चों को सिखाना आसानबूढ़ों को सिखाना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि उनका मतलब है कि वे चल चुके साठ सालसत्तर साल। क्या सत्तर साल तक वे गलत थेइसलिए बच्चे को तो सिखाना आसान हैक्योंकि वह चला ही नहीं। कोई अहंकार नहीं। तुम जहां चलाओ वह चलने को राजी है। बूढ़ाजहां चलाओ वहां चलने को राजी नहींउसके रास्ते पक्के हैं। वह कहता हैमेरा रास्ता ठीक। क्योंकि उन्हीं रास्तों पर उसका अहंकार निर्भर है।
और तुम सब बूढ़े हो। न मालूम कितने जन्मों से चल रहे हो। वही तो अड़चन है। इसलिए छोड़ने की हिम्मत भी नहीं होती। क्योंकि इतने-इतने जन्मों की चेष्टा व्यर्थ गईइतने-इतने जन्मों तक मैं अज्ञानी थाइसलिए तो ज्ञानी के पास जाने में तुम डरते हो। पहुंच भी जाओतो अपने को बचाते हो। पच्चीस दलीलें और तरकीबें खोज-खोज कर बचाते हो। कहीं उसकी वर्षा तुम पर हो ही न जाए! कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे ज्ञान का और अनुभव का चोगा गिर जाए।
और ध्यान रखोतुम्हें पीछे लौटना पड़े। क्योंकि रास्ता तो तुम बहुत पीछे छोड़ आए हो। इसलिए तो जीसस कहते हैं कि फिर से बच्चे की भांति हो जाओ। वह लौटने के लिए कह रहे हैं। कि कृपा करोलौटोरास्ता पीछे छूट गया है। फिर से बच्चे की तरह हो जाओ। बुद्धि को हटा दो। और बहुत गुणों की वर्षा होगी। वह सदा हुई है।
नानक कुछ बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं। न कोई बड़े अमीर हैं। साधारण घर में पैदा हुए हैं। न कोई बड़ी शिक्षा हुई है। पहले दिन ही पाठ चला और बंद हो गया। फिर भी वर्षा हो गई।
जब नानक पर हो गईजब कबीर पर हो गई वर्षातुम पर क्यों न होगीबसकहीं एक ही बात चूक रही है। वह यह कि तुम विमुख खड़े हो। पीठ किए खड़े हो।
'एक ही गुर से सब हल हो जाता हैकि सभी प्राणियों का एक दाता हैउसे मैं न भूलूं'
गुरा इक देहि बुझाई--
सभना जीआ का इकु दातासो मैं बिसरि न जाई।।

आज इतना ही।

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