गुरुवार, 3 अगस्त 2017

एक ओंकार सतनाम - प्रवचन-6

ऐसा नामु निरंजनु होइ—(प्रवचन—छठवां)
पउड़ी: 12

मंनै की गति कही न जाइ। जे को कहै पिछै पछुताइ।।
कागद कलम न लिखणहारू। मंनै का बहि करनि विचारू।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।

पउड़ी: 13

मंनै सुरति होवै मनि बुधि। मंनै सगल भवन की सुधि।।
मंनै मुहि चोटा न खाइ। मंनै जम के साथ न जाइ।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।


पउड़ी: 14

मंनै मारग ठाक न पाइ। मंनै पति सिउ परगटु जाइ।।
मंनै मगु न चलै पंथु। मंनै धरम सेती सनबंधु।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।

पउड़ी: 15

मंनै पावहि मोखु दुआरु। मंनै परवारै साधारु।।
मंनै तरै तारे गुरु सिख। मंनै नानक भवहि न भिख।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।


नन शब्द को समझें। विचार और मनन दोनों ही मन की क्रियाएं हैंपर दोनों बड़ी भिन्न हैं। भिन्न ही नहींवरन विपरीत भी।
एक तैरने वाले को देखें--एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता हैलेकिन रहता नदी की सतह पर है। अ से बब से स स्थान बदलता हैगहराई नहीं बदलती। फिर पानी में डुबकी लगाने वाले को देखें--वह भी स्थान बदलता हैलेकिन गहराई बदलती हैअ से अ एकअ दोअ तीन--एक ही स्थान पर गहरा उतरता है डुबकी लगाने वाला। तैरने वाला एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता हैगहराई में नहीं जाता है।
विचार तैरने जैसा हैमनन डुबकी जैसा है। विचार में एक शब्द से दूसरे शब्द पर हम जाते हैंमनन में एक ही शब्द की गहराई में जाते हैं। स्थान नहीं बदलतागहराई बदलती है।
विचार रेखाबद्ध प्रक्रिया हैसतह वही बनी रहती है। तुम चाहे दुकान की बात सोचोचाहे मोक्ष कीसतह में कोई फर्क नहीं पड़तारहते तुम पानी की सतह पर ही हो। तुम चाहे परमात्मा के संबंध में सोचो और चाहे पत्नी केसोच की सतह वही बनी रहती है।
मनन से सतह की जगह गहराई में यात्रा शुरू होती है। मनन में एक ही शब्द को उसकी समस्तता मेंउसके गहरे तलों तक प्रवेश करने की चेष्टा करनी होती है।
मनन ही मंत्र है। इसे ठीक से समझ लें तो यह पूरा सूत्र साफ हो जाएगा। और नानक की सारी शिक्षाओं का सार मनन है। इसलिए तो एक नाम ओंकार--बस उस एक ओंकार के नाम कोएक सतनाम को अपने शिष्यों को वे देते रहे।
उस पर सोचना नहीं हैउसमें डूबना है। उस पर विचार नहीं करना हैउसकी गहराई में डुबकी लगानी है। एक ही नाम गूंजता रहेगा--ॐॐ...और जैसे-जैसे नाम की गूंज बढ़ेगीवैसे-वैसे तुम्हारी गहराई का तल बदलेगा।
तीन तल हैं। पहले सोच्चारतुम जोर से उच्चार करते हो ओंकार का--ॐ...। ओंठ का प्रयोग होता हैबाहर वाणी गूंजतीहैइसको हम वाणी का तल कहें। फिर तुम ओंठ बंद कर लेते होजीभ भी नहीं हिलातेमन में ही गूंज होती है--ॐ...। यह दूसरा तल है। यह पहले तल से गहरा है। इसमें शरीर का उपयोग नहीं हो रहा। ओंठजीभ सब बंद हैंसिर्फ मन का उपयोग हो रहा है। तुम एक सीढ़ी नीचे उतर गए। फिर तीसरी सीढ़ी हैजहां मन का भी उपयोग नहीं हो रहा हैजहां तुम ओंकार की ध्वनि नहीं करतेतुम सिर्फ चुप हो कर सुनते हो और ध्वनि गूंजती है। तब मन भी गया। जैसे ही मन गयामनन हुआ। मनन यानी मन का न हो जाना। जहां मन न हुआवहां मनन शुरू हुआ।
सबसे पहलेतुम्हारे भीतर ओंकार की ध्वनि गूंजती है जन्म के साथ। तुम्हें बच्चे प्रसन्न दिखाई पड़ते हैं--अकारणअपने झूले में पड़े टांगें फेंक रहे हैंहाथ हिला रहे हैंमुस्कुरा रहे हैं। माताएं समझती हैं कि शायद पिछले जन्म की कोई स्मृति आ रही है तो आनंदित हो रहे हैं। क्योंकि कोई कारण तो नहीं है आनंदित होने का--न कोई चुनाव जीता हैन कोई धन कमा लिया हैन कोई प्रतिष्ठा पा ली हैअपने झूले में पड़ेअभी यात्रा शुरू ही नहीं हुईअभी प्रसन्नता क्या हैमनस्विद भी बड़ी चिंता करते रहे हैं कि बच्चे की प्रसन्नता का कारण क्या हैजहां तक मनस्विदों की समझ जाती हैवे मानते हैं कि शारीरिक स्वास्थ्य है। क्योंकि बच्चा प्रसन्न हैक्योंकि शरीर से स्वस्थ है।
लेकिन जहां तक योगियों की खोज ले जाती हैवहां कारण दूसरा है। शरीर का स्वास्थ्य काफी नहीं है। भीतर ओंकार का नाद गूंज रहा हैएक मधुर संगीत भीतर गूंज रहा हैजो बच्चा सुनता हैउसकी तारी लग जाती है। सुनता हैमुस्कुराता है,आनंदित होता है। स्वास्थ्य तो बाद में भी रहेगालेकिन यह प्रसन्नता खो जाएगी। पीछे भी स्वस्थ रहेगालेकिन यह नाद खो जाएगा। ओंकार की ध्वनि को सुनना मुश्किल हो जाएगाक्योंकि शब्दों की पर्त उसे घेर लेगी।
ध्वनि--एक ओंकार सतनाम--वह पहली घटना है। वहां जीवन का स्रोत है। फिर शब्दों का जमाव है। वह हमारी शिक्षा,संस्कारसमाजसभ्यता! फिर तीसरी पर्त हैशब्दों का उच्चारण--बोलनाबातचीतवार्तालाप। जब तुम बोल रहे होतब तुम अपने से सबसे ज्यादा दूर हो। इसलिए तो नानक कहते हैं कि पहले सुनना सीख लोक्योंकि जब तुम सुन रहे होतब तुम मध्य में हो। तब तुम बोलने की तरफ भी जा सकते हो और चाहो तो शून्य की तरफ भी जा सकते हो। तुम बीच में खड़े हो।
तीन स्थितियां हुईं--ओंकार की स्थितिउच्चार की स्थिति और दोनों के मध्य में भाव और विचार की स्थिति। जब तुम सुन रहे हो--श्रवण--तब तुम भाव और विचार की स्थिति के बीच में खड़े हो। अभी तुम दोनों तरफ झुक सकते होदाएं या बाएं। जो तुमने सुनाअगर तुम दूसरे को बताने निकल पड़ेतो तुम वार्ता में उतर गए। जो तुमने सुनाअगर तुम उसको गुनने लगे,मनन करने लगेतो तुम शून्य में चले गए। और बारीक है फासला। और हर व्यक्ति को अपने भीतर फासले को ठीक से समझ कर संतुलन को व्यवस्था देनी पड़ती है।
मनन उसी क्षण शुरू हो जाता हैजब तुम किसी एक शब्द की गहराई में उतरने लगते हो। और कोई भी शब्द काम दे सकता है। लेकिन ओंकार से सुंदर कोई शब्द नहींक्योंकि वह शुद्ध ध्वनि है। अल्लाह भी काम देता हैराम भी काम देता है,कृष्ण भी काम देता है। और कोई ये बड़े-बड़े नाम लेने की जरूरत नहीं है। अंग्रेजी के महाकवि टेनिसन ने लिखा है कि मैं अपना ही नाम दुहरा लेता हूं और तारी लग जाती हैटेनिसन...टेनिसन...टेनिसन...उससे भी लग जाएगी।
कोई भी एक शब्द की गहराई में तुम उतरोगे तो धीरे-धीरे शब्द छूट जाएगा। और धीरे-धीरे जैसे-जैसे शब्द छूटेगावैसे-वैसे मनन शुरू हो जाएगा। शब्द तो छूट जाता है। सभी मंत्र छूट जाते हैं। तभी तो महामंत्र का उदघोष होता है जब मंत्र छूट जाते हैं। क्योंकि मंत्र तो तुम्हारे ही मन कीतुम्हारी ही पकड़ है। महामंत्र तो गूंज ही रहा है। तो मंत्र महामंत्र में नहीं ले जाता,मंत्र तो तुम्हें केवल चुप करवाता है। महामंत्र सुनाई पड़ने लगता है।
और सभी मंत्र तुम्हें सुनने की कला सिखाते हैं। और सभी मंत्र तुम्हें तैरने की जगह डुबकी लगाना सिखाते हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर कब तक जाते रहोगेएक जन्म से दूसरे जन्म तक कब तक जाते रहोगेएक घटना से दूसरी घटना को कब तक बदलते रहोगेएक परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति तक कब तक तुम्हारी यात्रा जारी रहेगीकब वह शुभ क्षण आएगा जब तुम जहां होउसी की गहराई में डुबकी लगाओगेकहीं और न जाओगेमनन उसी क्षण घटेगा। इस बात को खयाल में रख कर नानक का सूत्र समझने की कोशिश करें।
'मनन की गति कही नहीं जा सकती।'
मंनै की गति कही न जाइ। जे को कहै पिछै पछुताइ।।
'मनन की गति कही नहीं जा सकती। और जो इसे कहता हैपीछे पछताता है।'
क्योंमनन की गति इसलिए नहीं कही जा सकती कि पहली तो बात यह है कि वह गति ही नहीं हैवह अगति है। वहां यात्रा शुरू नहीं हो रहीबंद हो रही है। वह हमें गति जैसी लगती है।
तुमने कभी देखातुम ट्रेन में जब चलते हो तो तुम्हें लगता है कि वृक्ष भागे जा रहे हैं। भाग तुम रहे होलगता है वृक्ष भागे जा रहे हैं। तुम्हारी सदा की गति के कारण जब मन ठहरने लगता हैतब भी तुम्हें ऐसा लगता है कि यह भी गति है। लेकिन जब तुम ठहर ही जाओगेजब तुम्हारी गाड़ी बिलकुल रुक जाएगीतब अचानक तुम पाओगे कि सब वृक्ष-पहाड़ भी रुक गए। वे भाग ही नहीं रहे थे।
तुम्हारे भीतर जो छिपा हैवह कभी चला ही नहीं है। उसने कभी एक कदम नहीं उठाया। उसने कोई यात्रा नहीं की। तीर्थयात्रा भी नहीं की। वह कहीं गया ही नहीं घर के बाहर। वह सदा से वहीं है।
मन भागता रहा है और मन की गति इतनी तीव्र है कि वह जो न भागा हुआ हैवह भी भागा हुआ मालूम पड़ता है। जब मन रुकने लगता हैवह भी रुकने लगता है। जब मन बिलकुल रुक जाता हैमन पाता है कि सब रुका हुआ है। गति को तो कहा जा सकता हैअगति को कैसे कहोगेकहां से कहां गएइसकी तो चर्चा हो सकती है। इसलिए तो यात्री किताबें लिख सकते हैं। लेकिन जो आदमी घर में ही बैठा रहावह क्या लिखेगा! कहीं गया ही नहींकुछ घटना ही न घटीकोई परिस्थिति ही न बदलीकहने को क्या है?
अशांत आदमी की जिंदगी की कहानी तुम लिख सकते होशांत आदमी की जिंदगी की कहानी क्या लिखोगे! कहानी ही नहीं है। उपन्यासकारनाटककारसाहित्यकारसभी का अनुभव है कि जिंदगी तो बुरे आदमी की होती है। अच्छे आदमी की क्या जिंदगी! इसलिए अगर तुम अच्छे आदमी के आधार पर कोई उपन्यास लिखो तो वह लिखा ही न जा सकेगा। उसकी जिंदगी में कुछ नहीं होता। इसलिए सभी कहानियां बुरे आदमी के आसपास लिखनी पड़ती हैं।
तुम यह मत समझना कि रामायण राम के आसपास हैवह रावण के आसपास है। रावण ही असली नायक हैराम तो नंबर दो हैं। रावण को हटा दो फिर तुम राम की कथा लिखो! न जाए सीता चोरीन हो सब उपद्रव--सब कथा शांत है! राम की क्या कोई कथा है! तुम परमात्मा की क्या कथा लिखोगेवह जैसा थावैसा ही रहा है। उसमें कभी भी रूपांतर नहीं हुआ;कहानी बनी ही नहीं। इसलिए तो परमात्मा की कोई आत्मकथा नहीं है। उसके संबंध में हम कुछ भी नहीं लिख सकते। लिखने के लिए यात्रा जरूरी है।
विचार के संबंध में बहुत कुछ लिखा जा सकता हैनिर्विचार के संबंध में क्या लिखोगे! निर्विचार के संबंध में क्या कहोगे! जो भी कहोगेवह गलत होगा। पीछे पछताओगे।
इसलिए ज्ञानी जब भी बोलते हैंतभी पछताते हैं। क्योंकि बोलते ही उन्हें लगता है कि जो कहना थावह कह नहीं पाए;और जो नहीं कहना थावह कह दिया। जो कहना थाजो समझाना थावह सुनने वाला समझ नहीं पाया है। जो वह समझ गयावह प्रयोजन न था।
इसलिए लाओत्से कहते हैं कि सत्य के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकताऔर कुछ भी कहाअसत्य हो जाएगा। जितना तुम जानोगेउतना ही तुम पाओगे कि कहना मुश्किल है। एक-एक शब्द कहना कठिन हो जाता हैक्योंकि तुम्हारे भीतर कसौटी हैजिससे तुम जांचते हो। हर शब्द ओछा मालूम पड़ता हैबहुत छोटा मालूम पड़ता है। बहुत बड़ा घटा हैशब्द में समाता नहीं। बड़ा आकाश मिल गया है और शब्द की छोटी-छोटी कैपसूल में उसे भरना है। वह भरता नहीं।
और फिर जब तुम बोलते होतब पछतावा और भी बढ़ जाता है। क्योंकि सुनने वाले तक जो बात पहुंचती हैवह कुछ और ही है। जो तुमने कही थीउसका सब रागउसका सब रंग बदल गयाउसकी वेशभूषा बदल गयी। तुमने दिया था हीरादेने में ही पत्थर हो गया। तुमने दिया था असली सिक्काहस्तांतरण में ही खोटा हो गया। वह दूसरे के पास पहुंचते हीतुम उसकी आंखों में जो देखते होपाते हो कि वह तो नहीं पहुंचा जो तुमने दिया थाकुछ और पहुंच गया। और अब यही वह दूसरा आदमी ढोता रहेगा।
ऐसे ही तो संप्रदाय चल रहे हैं। ऐसे ही तो हजारों की भीड़ चल रही है। जो कभी नहीं दिया गया थाउसे वे ढो रहे हैं। अगर महावीर लौट आएं तो जैनियों को देख कर छाती पीटेंगे। अगर बुद्ध लौट आएं तो बौद्धों पर रोएंगे। अगर जीसस लौट आएं तो लड़ाई फिर वही की वही शुरू हो जाएगी कि जो यहूदियों से थीवही ईसाइयों से शुरू हो जाएगी। क्योंकि जो उन्होंने कहा थावह तो जैसे पहुंचा ही नहींकुछ और ही पहुंच गया। नानक अगर लौट आएं तो जितना नाराज सिक्ख पर होंगेउतना किसी और पर नहीं। क्योंकि किसी और से क्या नाराज होना! जिनसे कहा थाउन पर ही नाराज हुआ जा सकता है। क्योंकि वे कुछ और ही ढो रहे हैं।
हम बड़े होशियार हैं। नानक जैसा व्यक्ति जब बोलता हैतब हम अपने अर्थ उसमें जोड़ लेते हैंअपने मतलब के अर्थ! हम नानक के अनुसार अपने को नहीं ढालतेहम नानक के शब्दों को अपने अनुसार ढाल लेते हैं। यह हमारी तरकीब है। इससे सब ठीक हो जाता है।
दो ही उपाय हैं।
मैंने सुना हैएक बहुत बड़ी धनपति महिला थी। थोड़े झक्की स्वभाव की थी। बड़ी कलात्मक रुचि की थी और हर चीज के संबंध में बड़ी जिद्दी थी। उसके पास एक ऐश-ट्रे थीजो कि एक दिन गिर गयी। बड़ी बहुमूल्य थीबड़ी कीमती थी। और वह बड़ी मुश्किल में पड़ गयी। उसने कलाकारों को बुलाया और उसने कहा कि बिलकुल ऐश-ट्रे जैसी थी वैसी ही बना दो। क्योंकि उसने ऐश-ट्रे के हिसाब से अपना पूरा कक्ष सजाया हुआ था। उसी रंग की दीवालें थीं। उसी रंग का फर्श था। उसी रंग के पर्दे थे। ऐश-ट्रे आधार थीवह आत्मा थी उस पूरे घर की।
अनेक चित्रकारों ने कोशिश की। लेकिन बड़ी मुश्किल थी। ठीकबिलकुल ठीक रंग का मेल नहीं बैठ पाता था। आखिर एक चित्रकार ने कहा कि मैं बना दूंगालेकिन मुझे समय चाहिए और बीच में कोई बाधा न देजब सब पूरा हो जाए तभी तुम भीतर आओ। तो एक महीना उसने ले लिया। महिला भी हैरान हुई कि एक महीना! ऐश-ट्रे को! उसने कहा कि अब उसमें इतने दिन तुमने कोशिश कर लीइतने लोग मेहनत कर लिएअब मुझे वक्त दो।
एक महीना वह अंदर घुसा रहा। महिला अंदर आयीतृप्त हो गयी। बिलकुल मिला दिया था उसने सब। बाद में किसी चित्रकार ने उस चित्रकार से पूछाजो सफल हो गया थाकि भईहम सब असफल हो गएतुमने सफलता कैसे पायीउसने कहा कि मैंने पहले ऐश-ट्रे तैयार की और फिर उसी रंग में सब दीवालें पेंट कर दीं। वे सब के सब दीवालों के हिसाब से ऐश-ट्रे को पेंट करने की कोशिश कर रहे थे। वह असंभव मामला था। जरा-सा भी फर्क रह जाता था तो बस गड़बड़ हो जाती थी।
नानक तुमसे बोलते हैंतो दो ही उपाय हैं। एक तो यह है कि तुम नानक के रंग में ढल जाओ तो तृप्ति मिलेनहीं तो बेचैनी रहेगी। नानक जैसे व्यक्ति के पास बेचैनी शुरू होगीक्योंकि तुम आग के पास हो। या तो तुम जल जाओ। जैसे नानक जल गएऐसे तुम जल जाओ। जैसे नानक राख हो गएऐसे राख तुम हो जाओ। जैसे नानक दास हो गएऐसे दास तुम हो जाओ। जैसे नानक खो गएऐसे तुम खो जाओ। बूंद गिर जाए सागर में। एक उपाय तो यह कि तुम नानक के रंग में रंग जाओ।
अगर यह न हो सके तो दूसरा उपाय यह है कि नानक जो कहते हैंउसको तुम अपने रंग में रंग लो। दूसरा सरल है,बिलकुल सरल है। इसलिए तो जो कहा जाता हैहम वही नहीं सुनतेहम जो सुनना चाहते हैंवही सुनते हैं। जो बताया जाता हैहम उसमें से वही अर्थ निकाल लेते हैंजो हमारे अनुकूल है। हम सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होतेहम सत्य को ही अपने पक्ष में खड़ा कर लेते हैं। हम सत्य के साथ नहीं जातेहम सत्य को ही अपने पीछे लाते हैं।
और यही फर्क है असली खोजी और नकली खोजी में। असली खोजी सत्य के पीछे जाने को तैयार होता है--चाहे सत्य कहीं भी ले जाएचाहे कोई भी परिणाम होचाहे जीवन गंवाना पड़ेचाहे सब खो जाए--सत्य का खोजी सत्य के पीछे जाता है। सब गंवाने को तैयार है। दूसरा भी सत्य का खोजी--जो धोखे में हैधोखेबाज है--वह सत्य के पीछे नहीं जातावह सत्य को अपने पीछे लाता है। और जब भी तुम सत्य को अपने पीछे लाते होतभी वह असत्य हो जाता है।
तुम्हारे पीछे सत्य कैसे आएगातुम्हारे पीछे असत्य ही आ सकता है। क्योंकि तुम असत्य होतुम्हारी छाया असत्य होगी। तुम चाहो तो सत्य के पीछे जा सकते होलेकिन सत्य तुम्हारे पीछे नहीं आ सकता। सत्य तुम्हारी धारणाओं में नसमाएगा। सत्य तुम्हारे बर्तनों में न आएगा। सत्य तुम्हारे मस्तिष्क के लिए काफी बड़ा है। और सत्य तुम्हारे पीछे कैसे हो सकता है?
इसलिए नानक कहते हैं--
मंनै की गति कही न जाइ। जे को कहै पिछै पछुताइ।।
'वह जो कहता हैपीछे पछताता है।'
एक और कारण भी ध्यान में रख लेना चाहिएउस कारण भी पछतावा होता हैजो मैंने शुरू-शुरू में कहा। जब भी तुम मनन के करीब पहुंचने लगोगेतभी तुम मध्य में आ जाओगे। वहां से दो गतियां हैं। या तो तुम दूसरों को बताने निकल पड़ोतो तुम पछताओगे। इसलिए जब भी दूसरे को बताने का खयाल उठेगुरु से पूछ लेना। गुरु जब तक न कहेमत बताने जाना किसी को। क्योंकि तुम अपने पर भरोसा मत करना।
अहंकार के खेल बड़े सूक्ष्म हैं! जरा-सा मिला नहीं कि वह बहुत की घोषणा करने लगता है। मुट्ठी-भर मिला नहीं कि वह पूरे आकाश का दावा कर देता है। जरा-सी झलक आई नहीं कि तुमने कहा कि सूरज उग गया। बूंद भी टपकी नहीं कि तुम सागर की चर्चा करने लगे। और फिर चर्चा में चर्चा बढ़ती चली जाती है। फिर धीरे-धीरे चर्चा में बूंद भी खो जाती हैझलक भी मिट जाती हैलोग थोथे पंडित हो कर रह जाते हैं। बहुत जानते हैंबिना जाने। बहुत कहते हैंबिना अनुभव किए। अगर तुम उनके जीवन में बहुत गौर से देखो तो तुम पाओगे कि जो वे कहते हैंउसके ठीक विपरीत चलते हैं।
एक ट्रेन में ऐसा हुआ। गाड़ी छूट गयी थी और मुल्ला नसरुद्दीन भाग कर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। डंडा भी उसने पकड़ लिया। एक पैर भी पायदान पर रख दिया। तभी गार्ड ने उसे नीचे खींच लिया और कहा कि बड़े मियांचलती गाड़ी मेंचढ़ना जुर्म हैनीचे उतरें। मुल्ला उतर गया। फिर गाड़ी करीब-करीब निकलने के करीब थी प्लेटफार्म के बाहरतब गार्ड का डब्बा आया। गार्ड छलांग लगा कर अपने डब्बे में चढ़ने लगा। मुल्ला ने झटक कर उसको नीचे पटक लिया और कहाबड़े मियांदूसरों को मना करते हो और खुद वही काम करते हो!
पंडित की अवस्था ऐसी ही है। वह जो दूसरों को कह रहा हैउसमें सिर्फ कहने का रस है। उसमें जीवन की सरिता नहीं बह रही है। वह उसका अपना अनुभव नहीं है। और यह खतरा सदा है।
जब तुम मध्य में आओगेउच्चार को छोड़ोगेशब्द में ठहरोगे--वहां से दो मार्ग खुलते हैं। एक मार्ग है पंडित होने का। क्योंकि अब तुम शब्द के मालिक हो जाओगे। अब तुम शब्द में खड़े हो। तुमने एक पर्त पार कर ली है। तुमने कुछ थोड़ी भनक भी पायी है। अब तुम्हारे सामने दो मार्ग हैंएक तो ज्ञानी का और एक पंडित का। पंडित का मार्ग है कि तुम फिर बाहर चले जाओ उच्चार की दुनिया मेंसमझाने लगो। ज्ञानी का मार्ग है कि अब तुम शब्द को भी छोड़ दोपूर्ण अनुच्चार में लीन हो जाओ। इसलिए गुरु जब तक न कहेदूसरे को बताने मत जाना।
बुद्ध का एक शिष्य पूर्ण काश्यप हुआ। वह ज्ञान को उपलब्ध हो गयालेकिन चुपचाप बुद्ध के पीछे छाया की तरह चलता रहा। वर्ष भर बादउसकी उपलब्धि के वर्ष भर बाद बुद्ध ने उसे बुलाया कि अब तू मेरी छाया की तरह क्यों भटक रहा हैअब तू जा! और जो तूने जाना हैलोगों को बता। पूर्ण ने कहामैं आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा करता था। क्योंकि मन का क्या भरोसा! बताने में कहीं रस आ जाए और जो बामुश्किल पाया हैकहीं बताने में खो जाए! कहीं अकड़ आ जाएकहीं अहंकार निर्मित होने लगे कि मैं जानता हूं।
ज्ञान को पाना कठिन हैखोना आसान है। क्योंकि बड़ा सूक्ष्म मार्ग है। भटक सकते हो जरा में।
तो पूर्ण काश्यप ने कहाजब आप समझेंगे कि बता सकता हूंतब आप खुद ही कहेंगे। इसलिए मैं चुप था।
गुरु जब तक न कहेतब तक बताने मत जानानहीं तो पछताओगे। और पछतावा भारी होगा कि करीब-करीब पहुंचते थे किनारे के और भटक गए। नाव लगने को ही थी फिर किनारा दूर हो गया। हाथ पहुंचने के ही करीब थे कि तुम किसी और दूसरी बात में लीन हो गए। पांडित्य आखिरी प्रलोभन हैक्योंकि अहंकार आखिरी प्रलोभन है।
नानक कहते हैं--
मंनै की गति कही न जाइ। जे को कहै पिछै पछुताइ।।
'मनन की गति कहीं नहीं जा सकती। जो इसे कहता हैवह पीछे पछताता है। न कागज है न कलम हैन लिखने वाला है जो मनन की स्थिति पर विचार कर सके।'
कहेगा कौनक्योंकि जैसे-जैसे मनन गहरा होता हैवैसे-वैसे कर्ता तो खोता जाता हैमन तो समाप्त होने लगता है। मनन मन की मृत्यु है।
मन कह सकता हैलिख सकता हैबोल सकता हैबता सकता है। मन की सारी कुशलता बताने की है। तो तुम जो नहीं भी जानते होवह भी मन बता सकता है। और बार-बार बता कर तुम इस भ्रांति में भी पड़ सकते हो कि मैं जानता हूं। क्योंकि जिस बात को तुम बार-बार बताते होतुम भूल ही जाते हो कि मैंने भी इसे जाना या नहीं! तुम्हें लगने लगता हैमैं भी जानता हूं। सोचनाक्या तुम वे ही बातें कहते हो जो तुम जानते होया वे बातें भी कहते हो जो तुम जानते नहीं?
तुम जानते हो परमात्मा कोनहीं जानतेतो तुम मत कहना किसी से कि है। तुमने जाना सत्य कोनहीं जानते हो,तो मत बताना किसी को कि है। क्योंकि खतरा यह नहीं है कि दूसरा भ्रांति में पड़ेगाखतरा यह है कि बार-बार दुहरा कर तुम खुद ही भ्रांति में पड़ जाओगे। बार-बार पुनरुक्ति करने से तुम्हें यह भरोसा आ जाएगा कि मैं जानता हूं।
और यह बड़ी सूक्ष्म...एक बार यह खयाल आ गया कि मैं जानता हूंबिना जानेतो फिर तुम्हारी नौका कभी भी किनारे न लग पाएगी। सोए को तो जगाया जा सकता हैलेकिन जागा हुआ जो पड़ा हैउसे फिर कैसे जगाएं! अज्ञानी को उठाया जा सकता हैलेकिन ज्ञानी जो बना खड़ा हैउसे कैसे उठाएं! तुम फिर उनके पास जाने से ही बचोगेजहां तुम्हारा अज्ञान प्रगट होता हो। तुम उनके ही पास जाओगेजहां तुम्हारा ज्ञान मजबूत होता हो।
पंडित अज्ञानी को खोजेगा। पंडित ज्ञानी से बचेगा। अगर नानक गांव आ जाएं तो पंडित गांव छोड़ कर भाग जाएगा। क्योंकि पंडित को डर एक ही है कि कहीं कोई वह स्थिति न दिखा देजो असली स्थिति है। कहीं कोई पर्दा न उघाड़ दे। बामुश्किल पर्दे को सम्हाल पाएबामुश्किल स्थिति बनी है कहने की कि हम जानते हैंकोई इसे उखाड़ न दे। और यह इतनी कमजोर हैक्योंकि झूठी हैकमजोर होगी ही। यह तोड़ी जा सकती है जरा सी ही चोट से।
नानक कहते हैंजहां न कागजन कलमन लिखने वाला हैतो मन की स्थिति तो वहां रही नहींमनन पर विचार कौन करे! और मनन की कौन खबर लाए!
'वह निरंजन नाम ही ऐसा है कि जो कोई मनन करता हैउसका मन ही जानता है।'
बसतुम जानोगे! गूंगे का गुड़ हो जाएगा और कह न पाओगेओंठ बंद हो जाएंगे। अवरुद्ध हो जाएगा कंठ। हृदय भर जाएगा। इतना भर जाएगा कि तुम रो सकोगेहंस सकोगेकह न सकोगे। लोग तुम्हें पागल समझेंगेपंडित नहीं। क्योंकि तुम्हारे भीतर इतना भरा होगा कि तुम्हारे रोएं-रोएं से छलकेगा। तुम नाच सकोगेतुम गा सकोगेलेकिन तुम कह न सकोगे।
इसलिए तो नानक गाए चले जाते हैं। मरदाना बजाए चला जाता हैनानक गाए चले जाते हैं। जब भी नानक से कोई कुछ पूछता तो वे मरदाना को इशारा कर देते कि शुरू कर दे वाद्यऔर कहतेसुनो! और गीत शुरू हो जाता। नानक ने यह सब गाया हैकहा नहीं है।
अगर तुम ज्ञानी के वचन को ठीक से समझो तो तुम पाओगे कि अगर वह कहता भी होतो भी गाता है। तुम एक काव्य उसमें पाओगे। वह अगर बैठा भी हैतो भी नाचता है। तुम एक नृत्य उसमें पाओगे। और तुम पाओगे कि उसके आसपास की हवा में एक नशा है--नशाजो सुलाता नहींजगाता है। नशाजो विस्मृति में नहीं ले जातासुरति को लाता है। और अगर तुम राजी हो उसके साथ बहने को तो वह तुम्हें बड़े अज्ञात तटों की तरफ ले जाएगा। अगर तुम उतरने को राजी हो उसके साथ सागर में तो वह तुम्हें बड़ी दूर की यात्रा पर ले जाएगा--आखिरी यात्रा परजहां सब यात्राएं समाप्त हो जाती हैं।
लेकिन ज्ञानी के पास जो सुर हैवह वक्ता का कम और गायक का ज्यादा है। वह बोलने वाला कमगाने वाला ज्यादा है। क्योंकि जो पाया हैवह बोल कर तो कहा ही नहीं जा सकता है। गीत शायद उसकी भनक दे दे। शायद थोड़ी-सी गीत में उसकी झलक आ जाए। शायद तुम मस्त हो जाओ।
गुरजिएफ कहा करता था कि कला दो तरह की होती है। एक कला तो साधारण कला हैजिसमें चित्रकारमूर्तिकार,संगीतज्ञ अपने मनोभाव प्रकट करता है। जैसे पिकासोबड़े से बड़े चित्रकार हों तो भी अपने मनोभाव प्रकट करते हैं। जो उनकी मनोदशा हैउसे चित्र मेंगीत में बांधते हैं। यह साधारण कला है। इसे गुरजिएफ सब्जेक्टिव आर्ट कहता है--विषयीगत। और दूसरी कला को वह आब्जेक्टिव आर्ट कहता है--विषयगत। वह कहता हैताजमहल दूसरे तरह की कला हैया अजंता-एलोरा कीगुफाएं दूसरे तरह की कलाएं हैं। इन कलाओं में जो चित्रकार हैमूर्तिकार हैवह अपना कोई भाव प्रकट नहीं कर रहा है। इन कलाओं में वह सिर्फ एक स्थिति पैदा कर रहा है। उस स्थिति के माध्यम से देखने वाले में कोई भाव पैदा होगा।
बुद्ध की एक प्रतिमा है। तुम उसे अगर देखते भी रहो--अगर सच में ही आब्जेक्टिव आर्ट होजिसने बनाया है उसने बुद्धत्व को जाना हो--तो प्रतिमा को देखते-देखते तुम्हें तारी लग जाएगी। प्रतिमा को देखते-देखते-देखते तुम पाओगे कि तुम अपने ही भीतर किसी गहरी खाई में उतर गएकिसी गहराई में चले गए। प्रतिमा को देखते-देखते ही डुबकी लग जाएगी। प्रतिमा मनन हो जाएगी।
मंदिरों में प्रतिमाएं हमने ऐसे ही नहीं रखी थीं! वे आब्जेक्टिव आर्ट...। संगीत हमने ऐसे ही नहीं पैदा किया थासंगीत पहले तो समाधि से ही जन्मा। पहले संगीत के जन्मदाता तो समाधिस्थ पुरुष थे। उन्होंने भीतर ओंकार का नाद सुना। फिर उस नाद को उन्होंने खोजा कि कैसे उस नाद की प्रतिलिपि बाहर पैदा की जा सकती है। ताकि जिन्हें उस भीतर के नाद का पता नहींवह शायद बाहर के नाद से ही थोड़ा उन्हें स्वाद लग जाए! मंदिर में हम प्रसाद बांटते हैं। मंदिर आने के लिए कोई न आए,शायद प्रसाद के लिए ही आ जाए! छोटे बच्चे तो कम से कम पहुंच ही जाते हैं। चलो प्रसाद के बहाने ही सहीलेकिन मंदिर में आना भी मूल्यवान है। शायद बाहर की धुन ही थोड़ा-सा प्रसाद बन जाए और उस धुन में तुम्हें भीतर की याद आ जाए। संगीत में जो रस हैवह समाधि की ही झलक का है। नृत्य हमने पैदा किए थेवे आब्जेक्टिव आर्ट थे। उनको देखते-देखते तुम अचानक किसी और लोक में भीतर खो जाओगेनाव तट से छूट जाएगी।
नानक के संबंध में यह स्मरण रखना कि नानक जो भी कहे हैंवह गाया है उन्होंने। जो भी कहना चाहा हैउसे नाद के साथ पहुंचाया है। क्योंकि असली चीज नाद है। जो कह रहे हैंवह असली बात नहीं हैवह तो बहाना है। तुम्हारे भीतर स्वरगुंजाना है। और अगर स्वर ठीक से गूंजने लगे तो तुम्हारे भीतर जो विचार की प्रक्रिया हैवह छिन्न-भिन्न हो जाएगी और तुम दूसरे तल पर पहुंच जाओगे शब्द के। और अगर तुम राजी हो बहने कोअगर तुम किनारे से जकड़े नहीं होअगर तुमने किनारे को पागल की तरह पकड़ नहीं रखा हैअगर तुम छोड़ने की हिम्मत रखते होतो तीसरी घटना भी घट जाएगी। मनन पैदा हो जाएगा।
कहते हैं नानकमनन पर कौन क्या कहे! न कागजन कलमन लिखने वालामनन की स्थिति पर विचार कौन करे!
'पर वह नाम निरंजन ही ऐसा है कि जो कोई मनन करता हैउसका मन ही जानता है।'
वह गूंगे का गुड़ हैजो चख लेता हैवह जानता है। फिर जिंदगी भर भूलता नहींअनंत जन्मों तक नहीं भूलताअनंत काल तक नहीं भूलता। एक बार स्वाद आ गया उसका तो वह स्वाद तुमसे बड़ा हैतुम उसे भूल न सकोगे। वह स्वाद इतना बड़ा है कि तुम उस स्वाद में समा जाओगेवह स्वाद तुममें न समाएगा। वह स्वाद सागर जैसा हैतुम बूंद जैसे उसमें खो जाओगे।
अगर ठीक से समझो तो परमात्मा का तुम स्वाद कैसे लोगे! परमात्मा ही तुम्हारा स्वाद ले लेता हैअगर तुम राजी हो। तुम उस स्वाद में लीन हो जाते होडूब जाते होएकतानता सध जाती है। वह नाम निरंजन ही ऐसा है।
'मनन से ही मन और बुद्धि में सुरति-स्मरण का उदय होता है।'
जैसे-जैसे तुम वार्तालाप में जाते होवैसे-वैसे स्मृति खो जाती है। तुमने कभी सोचा हो न सोचा होअब सोचनानिरीक्षण करना--तुम्हारी जिंदगी के अधिकतम उपद्रव तुम्हारे बोलने से पैदा होते हैंनब्बे प्रतिशतउससे भी ज्यादा। तुम अगर न बोलो तो नब्बे प्रतिशत उपद्रव तो तुम्हारे तत्क्षण गिर जाएं। तुम कुछ बोलते हो और उलझन में पड़ते हो।
क्या हो जाता है बोलने सेक्योंकि बोलने की अवस्था में सबसे कम स्मृति रहती हैसबसे कम सुरति--अवेयरनेस! क्योंकि बोलने में ध्यान दूसरे पर होता हैअपने पर ध्यान चूक जाता है। जब तुम बोलते होतब तुम दूसरे की तरफ जा रहे होतुम्हारा तीर दूसरे की तरफ जा रहा है। तो तीर का पिछला हिस्सा अपनी तरफ होता हैतीर का फल दूसरे की तरफ होता है। चेतना एक तीर है। वह दूसरे को देखती है। जिससे तुम बोल रहे होउस पर ध्यान होता है। अपने पर ध्यान चूक जाता है। और इसलिए उस गैर-भान की अवस्था में तुमसे बातें निकल जाती हैंजिनके लिए तुम जन्मों तक पछताते हो।
तुम किसी स्त्री से कह बैठे कि मैं तुझे प्रेम करता हूं। यह कभी सोच कर भी नहीं गए थे। यह पहले कभी खयाल में भी नहीं आया था। बात-बात में बात हो गयी। अब फंसे! अब इससे लौटना मुश्किल हो गया। अब इस बात से और बातें निकलेंगी। जैसे पत्तों में पत्ते लगते जाते हैंवैसे बात में बात लगती जाती है। अब चल पड़े तुम एक यात्रा पर।
तुमने कभी खयाल नहीं किया है। खयाल करोगे तो साफ हो जाएगा कि जीवन की सारी झंझटों की कड़ियां शब्दों से शुरू होती हैं। और फिर एक शब्द जब बोल दिया तो फिर अहंकार जकड़ लेता है कि अब उसकी पूर्ति करनी भी जरूरी है।
तुम एक स्त्री को प्रेम करते हो। तुम उससे कहते होजन्मों-जन्मों तुझे प्रेम करूंगा। क्षण का तुम्हें भरोसा नहींकल का तुम विश्वास नहीं दिला सकते। कल सुबह क्या होगाकोई जानता नहीं। लेकिन अभी तुम जन्मों-जन्मों के लिए बात कह रहे हो। अगर तुम जरा भी होश में हो तो तुम इतना ही कहोगे कि इस क्षण मुझे प्रेम मालूम पड़ता हैकल का क्या पतालेकिन उससे अहंकार को रस न आएगा। क्योंकि जब तुम्हें प्रेम पता चलता है तो तुम सोचते होअब सदा प्रेम करूंगा। 'सदाका तुम्हें पता हैक्या अर्थ होता हैहर स्थिति में तुम प्रेम कर सकोगे?
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उससे पूछ रही थी कि अब तुम पहले जैसा मुझे प्रेम नहीं करतेमैं बूढ़ी हो गई हूंइसीलिए?शरीर मेरा जर्जर हो गया हैइसीलिएझुर्रियां पड़ गई हैंइसीलिएऔर याद है तुम्हें धर्मगुरु के सामने तुमने कहा था कि सुख-दुख में साथ देंगे!
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहासुख-दुख में साथ देंगेबुढ़ापे का किसने कहा थातो सुख-दुख में तो साथ दे ही रहे हैं। बुढ़ापे की बात ही नहीं उठी थी।
तुम आज जब कह रहे हो तो तुम्हें पता है कि सदा का कितना अर्थ होता हैउसमें कितनी चीजें छिपी हैंलेकिन आज तुम कह दोगेकल फिर इस आश्वासन को पूरा करने में मुश्किल पड़ेगी। न पूरा कर पाओगे तो पछताओगेपूरा करोगे तो दुखी होओगे। क्योंकि जब प्रेम हाथ से छूट जाएगानहीं बचेगातब तुम क्या करोगेकैसे उसे जबर्दस्ती लाओगेतब एक प्रवंचना का जाल शुरू होता है।
अगर व्यक्ति अपने शब्द का होश रख सकेजो कि कठिन हैशब्द के तल पर कठिन हैक्योंकि शब्द के तल पर तुम्हारी नजर दूसरे पर हैइसलिए अपना होश तुम कैसे रखोगेसिर्फ बुद्धों के लिए बोलना ठीक है। क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की साधना से दो फल वाला तीर पैदा कर लिया है। उनके पास ऐसी चेतना है--उसी चेतना का नाम सुरति है--जब तीर में दो फल हैंदूसरे की तरफअपनी तरफ। जब चेतना दोनों तरफ एक साथ देख पाती हैजब चेतना तुममें बातचीत करने में खो नहीं जातीसजग बनी रहती हैबोलने वाला बोलता रहता हैसाक्षी भीतर खड़ा रहता हैतब एक भी शब्द तुम्हें किसी झंझट में न ले जाएगा। अन्यथा शब्द तुम्हें झंझट में ले जाएंगे।
एक सूफी कहानी है। गुरु ने चार शिष्यों को मौन के लिए भेजा। सांझ हो गयी। मस्जिद में चारों बैठे हैं। दीया नहीं जलाया किसी ने। नौकर पास से गुजरता था। तो एक ने कहाऐ भाईरात हुई जा रही हैदीया जला दे। दूसरे ने कहातुम बोल गए और गुरु ने मना किया था! और तीसरे ने कहाक्या कर रहे होतुम भी बोल गए! गुरु ने मना किया था। और चौथे ने कहाहम ही ठीकहम अभी तक नहीं बोले।
बोलने में एक विस्मरण है। यह कहानी तुम्हें हंसने जैसी लगती हैतुम्हारी ही कहानी है। तुम चुप बैठोतब पता चलेगा कि बोलने का कितना मन होने लगता है। तुम चुप बैठोतब पता चलेगा कि भीतर तुम किस तरह बोलने लगते हो। और बाहर कोई भी बहाना मिल जाए कि सुरति खो जाओगे।
कहानी का मतलब क्या हैकहानी का मतलब हैउन चारों में से किसी को स्मरण न रहा कि हम चुप होने के लिए यहां बैठे हैं। और कहानी का मतलब है कि जब नौकर निकला पास सेदूसरा आयाध्यान दूसरे पर गयासुरति चूक गयी।
नानक कहते हैंमनन से ही मन और बुद्धि में सुरति उदय होती है।
सुरति शब्द बड़ा प्यारा है। यह बुद्ध के सम्यक स्मरण से आता है। बुद्ध ने बड़ा जोर दिया स्मृति पर--राइटमाइंडफुलनेस पर--कि तुम जो भी करोस्मरणपूर्वक करना। बोलो तो स्मरणपूर्वक बोलना। चलो तो स्मरणपूर्वक चलना। आंख भी हिलाओपलक भी हिले--स्मरणपूर्वक। होश खो कर मत करना कुछ। क्योंकि जो तुम होश खो कर करोगेवही पाप है। और जो तुम होश खो कर करोगेउससे ही तुम अपने से दूर निकलते जाते हो। अपने पास आने की एक ही विधि है कि तुम ज्यादा से ज्यादा होश सम्हालना। कैसी भी परिस्थिति होतुम एक चीज मत खोना--सब खो जाने देना--वह है होश! घर में आग लगी हो तो भी तुम होशपूर्वक घर के बाहर निकलना।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने एक संस्मरण लिखा है कि उनको वाइसराय ने सम्मान के लिए बुलाया था। गरीब आदमी थे। पुराना बंगाली ढंग का कुरताकमीजधोती पहनते थे। फटे-पुराने कपड़े थे। मित्रों ने कहा कि वाइसराय की सभा में इन कपड़ों में जाना उचित नहींअच्छे कपड़े बना देते हैं। बात उनको भी जंची। एक-दो दफे इनकार भी किया। लेकिन फिर उनको भी लगा कि ठीक नहीं हैतो कपड़े बनवा लिए।
कल सुबह वाइसराय की सभा में जाने को हैंउसके एक दिन पहले की घटना है। सांझ को लौटते थे बगीचे से टहल कर। सामने ही एक मुसलमान अपने कपड़े पहने हुए--चूड़ीदार पायजामाशेरवानीहाथ में छड़ी लिए--बड़े शौक से शाम की चहलकदमी करते हुए जा रहा है घर वापस। एक आदमी भागा हुआ आया और उसने कहामीर साहिबआपके घर में आग लग गयीजल्दी करिए। लेकिन वह वैसे ही चलता रहाचाल में जरा भी फर्क न आया--जरा भी! जैसे नौकर आया ही नहींजैसे नौकर ने कुछ कहा ही नहींजैसे कुछ भी नहीं हुआ होवह जैसा थाठीक वैसा ही रहा। सुर जरा भी न बदला उसका। नौकर समझा कि शायद मालिक ने सुना नहींक्योंकि आग लगने का मामला है। उसने कहा कि आप समझे या नहींसुना आपने या नहींकिस विचार में खोए हैंमकान में आग लग गयी!
नौकर कंप रहा हैपसीना-पसीना हैबड़ा उत्तेजित है। और नौकर है! उसका कुछ भी नहीं जल रहा है। उस मुसलमान ने कहासुन लिया! लेकिन मकान में आग लग गयीइस वजह से क्या जिंदगी भर की चाल बदल देंआते हैं।
ईश्वरचंद्र पीछे ही थे। उन्होंने सुना तो बड़े हैरान हुए। तो उन्होंने भी सोचा कि जिंदगी भर के कपड़े बदलें वाइसराय के लिए! और यह एक आदमी है...वह वैसे ही...! पीछे गए उसके। देखेंयह आदमी अनूठा है। वह आदमी वैसे ही गयाजैसे वह रोज जाता था। वही चाल रहीवही छड़ी का हिलना रहा। घर पहुंच गया। आग लगी है। उसने नौकरों से कह दिया कि बुझाओ! और स्वयं बाहर खड़ा रहा। सब इंतजाम कर दियालेकिन उस आदमी में रत्ती भर भी फर्क नहीं है। ईश्वरचंद्र ने लिखा है कि मेरा हृदय श्रद्धा से झुक गया। ऐसा आदमी तो मैंने देखा नहीं।
यह किस चीज को सम्हाल रहा हैउसका नाम सुरति हैउसका नाम स्मृति है। यह एक बात को सम्हाले हुए है कि अपने होश को नहीं खोना है। जो हो रहा हैहो रहा है। जो किया जा सकता हैवह कर रहे हैं। जो करने योग्य हैवह किया जाएगा। लेकिन स्मृति कभी भी खोने योग्य नहीं है। इस दुनिया में ऐसी कोई भी चीज नहीं है इतनी मूल्यवानजिसके लिए तुम सुरति को खोओ।
लेकिन तुम छोटी-छोटी चीजों में खो देते हो। एक रुपए का नोट गिर गयाऔर देखो तुम कैसे पगला जाते हो। एकदम ढूंढ़ रहे हैं पागल की तरह! जहां नहीं हो सकतावहां भी ढूंढ़ रहे हो।
किसी आदमी को देखो! घर में उसकी कोई चीज खो गयी। चीज बड़ी होवह छोटा सा डिब्बा भी खोल कर देख रहा है कि शायद...। तुम स्मृति को खोने को तैयार ही हो। खोने को तैयार होयह कहना भी शायद ठीक नहीं। तुम्हारे पास है ही नहीं,तुम खोओगे क्यातुम मूर्च्छित...।
नानक कहते हैं, 'मनन से मन और बुद्धि में सुरति का उदय होता है।'
जैसे-जैसे ओंकार गहरा बैठता हैपहले तुम्हारा उच्चार बंद होता हैवैसे ही तीर भीतर की तरफ मुड़ता है। क्योंकि अब बाहर कोई न रहाजिससे बोलना है। बोलना यानी बाहर से संबंध बनाना। बोलना यानी सेतु। उससे हम दूसरे तक जाते हैं। वह संवाद है। वह दूसरे और हमारे बीच का नाता है। वह तोड़ लिया। नहीं बोलना। चुप हो गए।
चुप का अर्थ हैयात्रा उल्टी हो गयी। तीर वापस लौटा। अंतर्यात्रा शुरू हुई। उसी वक्त से स्मृति की पहली झलक आनी शुरू हो जाएगी। तुम पाओगेतुम हो। तुम पहली दफा जाग कर पाओगे कि मैं हूं। अब तक सब दिखायी पड़ता थातुम भर नहीं दिखायी पड़ते थे। तुम भर छाया में खड़े थे। दीया तले अंधेरा था। अब तुम जागोगे। फिर जैसे-जैसे गहराई बैठेगी ओंकार कीमनन शब्द पर आएगावैसे-वैसे सजगता बढ़ेगी--उसी अनुपात में।
तुम ऐसा समझोजैसे तराजू के दो पलड़े हैं। एक पलड़ा ऊपर उठता है तो दूसरा उसी अनुपात में नीचे आता है। जिस अनुपात में तुम भीतर जाते होउसी अनुपात में सुरति बढ़ती है। और तीसरे तल पर जहां शब्द भी खो जाता हैसिर्फ ओंकार की ध्वनि रह जाती हैनाद रह जाता है--एक ओंकार सतनाम--वहां अचानक परिपूर्ण सुरति हो जाती है! तुम जाग कर खड़े होते होजैसे हजारों साल की नींद टूट गयी। अंधेरा गयाप्रकाश आया। जन्मों-जन्मों से तुम जैसे सोए थे और एक सपना देख रहे थे। सपना विच्छिन्न हो गयासुबह हो गयी। भोर हुई। ब्रह्ममुहूर्त पहली दफा आया!
'मनन से ही सभी भुवनों की सुधि आती है। मनन से ही मुंह में मार नहीं खानी पड़ती। मनन से ही यम के साथ नहीं जाना पड़ता। वह नाम निरंजन ही ऐसा है कि जो कोई मनन करता हैउसका मन ही जानता है।'
मंनै सुरति होवै मनि बुधि। मंनै सगल भवन की सुधि।।
मंनै मुहि चोटा न खाइ। मंनै जम के साथ न जाइ।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।
जिस दिन तुम जागते होउस दिन तुम्हें पता चलता है कि यह अनंत आकाशये भुवनयह अस्तित्वयह परमात्मा की अनंत लीला पहली दफे तुम्हें दिखायी पड़ती है। जब तक तुम अपनी ही वासना में खोए थेअपने ही मन में डूबे थेतब तक तुम्हें कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता थातुम अंधे थे। मन अंधापन हैमनन है आंख का खुल जाना।
नानक कहते हैं, 'मनन से ही सभी भुवनों की सुधि आती है।'
ये अनंत लोकसब प्रकट हो जाते हैं। जीवन अपनी परिपूर्ण महिमा में प्रकट होता है। तब तुम देख पाते हो रत्ती-रत्ती में उसके हस्ताक्षरपत्ते-पत्ते पर उसका नामरोएं-रोएं में उसकी धुनहवा के झोंके-झोंके में उसी का गीत। तब यह जीवनतब यह अस्तित्व पूरा का पूरा उसकी महिमा को प्रकट करता है।
अभी तुम पूछते होजीवन में क्या हैलोग पूछते हैंक्या है अर्थ जीवन काक्या प्रयोजन हैक्यों हम पैदा किए गए हैंलोग पूछते हैंकिसलिए जिंदा रहें?
पश्चिम के बहुत बड़े विचारक मार्शल ने लिखा है कि जिंदगी में एक ही तो सवाल है और वह है आत्महत्या। कि हमकिसलिए जिंदा रहेंक्यों न हम आत्महत्या कर लें?
यह बेहोशी की आखिरी अवस्था हैजहां आत्महत्या घटित होती हैजहां तुम जीवन के बहुमूल्य उपहार को फेंक देते हो वापस। क्योंकि तुम्हें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता उसमें।
और इससे विपरीत एक घटना घटती हैजब तुम जागते हो। तब इतनी महिमा हैइतनी अपरंपार महिमा है! उसके भुवन खुलते चले जाते हैंपर्त-पर्त चारों तरफ रहस्य खड़ा हो जाता है। तब तुम्हें जीवन का अर्थजीवन का आनंद--जिसको हमने समाधि कहा है--उस क्षण तुम जानते हो कि क्यों जीवन है।
अभी तुम जान ही नहीं सकते। अभी तुम कितना ही पूछोकोई कितना ही कहेकोई कह दे कि परमात्मा को पाना जीवन का लक्ष्य हैतो भी कुछ हल नहीं होता। समाधि को पाना जीवन का लक्ष्य हैतो भी कुछ हल नहीं होता। बात कुछजंचती नहीं है। बात जंच ही नहीं सकती। जंचेगी तब जब सुधि आएगी। ये नानकबुद्धकबीरये तुम्हें तब तक न जंचेंगे,जब तक सुधि न आएगी। तब तक ये जंचेंगे कि होंगेठीक हैकहते होंगे कुछ! आमतौर से तो तुम समझते हो कि ये लोग--कुछ दिमाग इनका ठीक नहीं। अपना दिमाग तुम ठीक समझते हो और तुम्हारे दिमाग से तुम पहुंचे कहांतुम्हारे दिमाग से तुम आत्महत्या के करीब पहुंच रहे हो। कैसे खतम कर लें! कुछ सार नहीं मालूम पड़ता। कैसे फेंक दें इस बहुमूल्य उपलब्धि को जो जीवन है! इस भेंट को हम कैसे लौटा दें!
जैसे ही जागते होवैसे ही जीवन का रहस्य खुलना शुरू हो जाता है। फूल खिलता हैउसकी पंखुड़ी-पंखुड़ी अनंत आनंद बन जाती है।
'मनन से ही मुंह में मार नहीं खानी पड़ती।'
नानक तो सीधे-सादे गांव के ग्रामीण हैं। पर जो बात कह रहे हैंवह बड़े पते की है। वे यह कह रहे हैं कि अगर तुमने मनन से कुछ बोला तो तुम्हें कभी अपने शब्दों पर लौटना नहीं पड़ता वापसपीछे नहीं जाना पड़ता। अगर मनन से ही तुम्हारा शब्द निकला तो तुम्हें कभी अपने शब्दों को थूक कर नहीं चाटना पड़तानहीं तो रोज चाटना पड़ेगा। रोज थूकोगेरोज चाटोगे। रोज मुंह पर मार खानी पड़ेगी। क्योंकि तुम जो बोल रहे होवह बेहोशी में बोल रहे हो। तुम जो बोल रहे होवह अहंकार की निद्रा में बोल रहे हो। तुम्हारा बोलना नींद में बोला गया है। तुम होश में नहीं हो कि क्या तुम कह रहे हो। क्या तुम कर रहे हो,उसका तुम्हें कुछ पता नहीं है। कहां तुम जा रहे होक्यों तुम जा रहे होतुम्हें कुछ पता नहीं है। तो तुम्हें रोज ही मुंह पर मार खानी पड़ेगी।
आज तुम कहोगे कि प्रेम करता हूं और कल तुम सुबह पाओगे कि प्रेम तिरोहित हो गया। अभी तुम चाहते हो कि हत्या कर दूंघड़ी भर बाद तुम चाहोगे कि कैसे इस आदमी को जिला लूं वापस! बड़ी भूल हो गयी। अभी तुम कुछ कहते होघड़ी भर बाद कुछ हो जाता है। तुम्हारा कोई भरोसा नहीं। तुम बदलता हुआ मौसम हो। तुम्हारे भीतर कोई भी तत्व थिर नहीं है,क्रिस्टलाइज्ड नहीं है। तुम्हें प्रतिक्षण मुंह पर मार खानी पड़ेगी।
नानक कहते हैं, 'मनन से ही मुंह पर मार नहीं खानी पड़ती और मनन से ही यम के साथ नहीं जाना पड़ता।'
मरते तो सभी हैंलेकिन सभी यम के साथ नहीं जाते। यह एक प्रतीक है। इसे थोड़ा समझ लें। मरते सभी हैंलेकिन कभी-कभी कोई स्मरणपूर्वक मरता है। बस फिर यम के साथ नहीं जाना पड़ता। जब तक तुम विस्मरण में मरते होतब तक तुम्हें यम के साथ जाना पड़ता। यम का अर्थ हैभय। जब आदमी बेहोशी में मरता है--जिसकी जिंदगी भर बेहोशी में बीती--तो मरते वक्त कंपता हैरोता हैचीखता हैचिल्लाता हैअपने को किसी तरह बचाना चाहता है। आखिरी दम तक पकड़ रखना चाहता है सांस को कि किसी तरह बच जाऊं। कोई भी बहाना! कोई भी बचा ले! रोता हैगिड़गिड़ाता है। यह जो सारे भय की दशा हैयह जो भय का काला मुंह हैयह जो भैंसे पर सवार भय है--इसका नाम यम है।
लेकिन जो आदमी स्मरण से मरता हैजिसके भीतर कोई भय नहींजिसने जीवन को जाग कर देखाउसका भय चला जाता है। तब वह पाता है कि मृत्यु तो जीवन की परिपूर्णता हैअंत नहीं। और मृत्यु भय नहीं हैवह परमात्मा का द्वार है। वह पाता है कि मृत्यु तो आमंत्रण हैवह तो उसमें लीन हो जाने की प्रक्रिया है। तब वह न घबड़ाता हैन वह कंपता हैन वह रोता हैन वह चिल्लाता है। तब वह आनंदमग्न उस परम सौंदर्य में प्रवेश करता है। तब वह अपने प्रिय से मिलने जैसे जा रहा हो।
नानक जिस दिन मरेउस दिन उनके ओंठों पर जो शब्द थेवे बड़े कीमती हैं। नानक ने कहाफूल खिल गए हैं! वसंत आ गया है! वृक्षों पर बड़ा गीतों का कलकल नाद है!
किस जगत की वे बात कर रहे हैंलोगों ने समझा कि वे जिस गांव में पैदा हुए थेवह मौसम था फूलों के आने का और वृक्षों पर पक्षियों की कलकलाहट काउसी की बात कर रहे हैं। मरते वक्त बचपन की याद आ गयी। और नानक पर लिखने वाले सभी लोगों ने यही भूल की है। यह मैं तुमसे पहली बार कहता हूं कि इसका उनके गांव से कोई संबंध न था। यह संयोग की बात थी कि मौसम वसंत का था। उनके गांव में भी फूल खिले होंगेवृक्षों में नए पत्ते आ गए थे और पक्षी कलरव कर रहे थे। यह ठीक है। यह संयोग की बात है। लेकिन नानक मरते वक्त जन्म को याद करेंगेनानक मरते समय कुछ और देख रहे हैं। प्रतीक तो इसी जगत के उपयोग करना पड़ेंगेक्योंकि जिनसे वे कह रहे हैं...। आखिरी घड़ी में वे एक परम सौंदर्य में प्रवेश कर रहे हैंजहां फूल खिले हैंजो कभी नहीं मुरझातेजहां पक्षियों के गीत सदा ही गूंजते रहते हैंजहां शाश्वत है सौंदर्य।
जैसे ही कोई व्यक्ति जीवन को जाग कर जीता हैमृत्यु परिसमाप्ति नहीं हैपरिपूर्णता है। मृत्यु अंत नहीं हैपरम फूल है। जीवन की परम अवस्था है। मृत्यु में हम कुछ खोते नहींकुछ पाते हैं। इस तरफ द्वार बंद होता हैउस तरफ द्वार खुलता है। ज्ञानी नाचता हुआ जाता हैगाता हुआ जाता है। अज्ञानी रोता हुआ जाता हैचिल्लाता हुआ जाता है। अज्ञानी यमदूत के साथ जाता हैअपने ही कारण। कोई यम नहीं है। कोई भैंसे पर सवार यम तुम्हारे पास नहीं आता। तुम्हारा भय तुम्हारा यम है। तुम अभय हो गएफिर परमात्मा खुद अपनी बांहें फैलाता है।
तुम जो होवैसा ही तुम्हारा मृत्यु का अनुभव होगा। इसलिए मृत्यु कसौटी है। आदमी कैसा मरता हैइससे पता चलता है कि कैसा जीया। अगर प्रफुल्लित मरता हैशांत मरता हैआनंदभावअहोभाव से मरता हैतो सारा जीवन कीमती था,मूल्यवान था। यह पूर्णाहुति है। अगर रोता-चिल्लाता मरता है तो जीवन एक संताप थानर्क था।
इसलिए नानक कहते हैं, 'मनन से ही यम के साथ नहीं जाना पड़ता। वह नाम निरंजन ही ऐसा है कि जो कोई मनन करता हैउसका मन ही जानता है। मनन से ही मार्ग में बाधा नहीं आती। मनन से ही कोई प्रतिष्ठा के साथ विदा होता है। मनन से ही कोई मार्ग से नहीं भटकता। मनन से ही धर्म से संबंध बनता है। वह नाम निरंजन ही ऐसा है कि जो कोई मनन करता हैउसका मन ही जानता है।'
मंनै मारग ठाक न पाइ। मंनै पति सिउ परगटु जाइ।।
मंनै मगु न चलै पंथु। मंनै धरम सेती सनबंधु।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।
बाधाएं तुम्हारे बाहर नहीं हैंबाधाएं तुम्हारे भीतर हैं। और तुम्हारे भीतर बाधाएं हैंक्योंकि तुम मूर्च्छित हो। और बाधाओं को मिटाने का और कोई उपाय नहीं है। अगर तुम एक-एक बाधा को मिटाने में लग जाओगेतो तुम कभी न मिटा पाओगे। बाधाओं को मिटाने का एक ही मार्ग है कि तुम भीतर जाग जाओसभी बाधाएं खो जाती हैं।
ऐसा समझो कि तुम्हारा घर है अंधेरे से भरा। तुम आते होहर कोने-कातर में डर मालूम पड़ता है कि पता नहींप्रेत हों,भूत होंचोर होंडाकू-लुटेरे होंहत्यारे हों। पूरा घर हैबड़ा भवन हैकोने-कोने में भय है। हजार तरह के भय हैं। तुम एक-एक भय से कैसे जीतोगेकितने चोर हैंकितने धोखेबाज हैंकितने लुटेरे हैंकितने हत्यारे हैंक्या पता! सांप हैंबिच्छू हैंजहर हैक्या पता! अंधेरे में क्या छिपा है! तुमने अगर एक-एक से निपटने की कोशिश की तो तुम हारोगे।
नहींएक-एक से निपटा नहीं जा सकता। निपटने का एक ही उपाय है कि तुम दीया जला लो। एक दीए के जलने से सारे भय समाप्त हो जाते हैंघर प्रकाशित हो जाता है। फिर जो भी हैतुम देख लेते हो। फिर जो भी तुम देख लेते होउससे निपटने का मार्ग बन जाता है।
सच तो यह हैजैसा बुद्ध ने कहा है कि अंधेरे घर में चोर आकर्षित होते हैं। घर में दीया जलता हो तो चोर उस घर से बच कर निकलते हैं। जिस घर पर कोई पहरा नहीं हैचोर और लुटेरे और डाकू और हत्यारे उस तरफ आते हैं। जिस घर पर पहरेदार हैउससे वे जरा दूर ही चलते हैं। भीतर दीया जल रहा हो और सुरति का पहरेदार खड़ा हो तो तुम्हारे भीतर कोई बाधा नहीं आतीअन्यथा सब बाधाएं आती हैं।
एक दिन सुबह-सुबह मुल्ला नसरुद्दीन ने मुझे आ कर कहा कि अब कुछ करना ही होगामैं बहुत परेशान हूं। और एक चिट्ठी मेरे हाथ में दी। किसी की चिट्ठी थीजिसमें लिखा था कि नसरुद्दीनअगर तुमने मेरी स्त्री का पीछा करना बंद नहीं किया तो तीन दिन के भीतर गोली मार दूंगा। नसरुद्दीन ने कहाबोलोक्या करें! मैंने कहा कि इसमें इतना उलझने की जरूरत क्या हैउसकी स्त्री का पीछा करना बंद कर दो। नसरुद्दीन ने कहाकिसकी स्त्री का पीछा करना बंद कर देंनाम तो लिखा ही नहीं। अब कोई एक स्त्री हो तो पीछा बंद कर दूं।
एक बाधा हो तो मिटा दोबाधाएं अनंत हैं। अनंत स्त्रियों का पीछा चल रहा है। अनंत कामनाएं हैं। एक को मिटाओदस खड़ी हो जाती हैं। एक से बचो दस बन जाती हैं। अगर तुम ऐसा एक-एक से उलझते रहे तो तुम कभी भी पार न पा सकोगे। कुछ विधि चाहिएजो अकेली सारी बाधाओं का अंत कर दे। वही विधि जो बता देवह गुरु। वही गुर जो समझा देवह गुरु।
तो नानक कहते हैं, 'मनन से मार्ग में बाधा नहीं आती।'
तुम जपो ओंकारपहुंच जाने दो ओंकार को अजपा की स्थिति तकफिर तुम्हारी आंखें खुल जाती हैं। मार्ग में बाधा नहीं आतीक्योंकि बाधाएं तुम खुद ही खड़ी करते थे। कोई और तुम्हारा शत्रु नहीं हैजिसे हटा दिया जाए। तुम ही अपने शत्रु हो। तुम्हारी मूर्च्छा ही तुम्हारी शत्रु है। उसके ही कारण तुम उलझे हो। और तुम कितना ही सम्हाल कर चलोतुम नयी बाधाएं खड़ी करते रहोगे।
दुनिया में नियंत्रण रखने वाले लोग हैंसंयम रखने वाले लोग हैंक्या फर्क पड़ता है! किसी तरह सम्हाल कर चलते हैं। संयम अंत नहीं हैसुरति अंत है। संयम का मतलब यह है कि किसी तरह अपने को सम्हाल कर चल रहे हैं कि भटक न जाएं। लेकिन भटकने का सुर तो भीतर गूंज रहा हैवह कभी भी भटका देगा। किसी तरह चलते रहोगे सम्हाल करकिसी भी दिन घाट से नीचे उतार देगारास्ते के नीचे उतार लेगा। मौके की बात है। और संयमी आदमी सदा डरा रहेगाक्योंकि भीतर तो असंयम उबल रहा है।
नानक कह रहे हैं, 'मनन से मार्ग में बाधा नहीं आती। मनन से कोई प्रतिष्ठा के साथ विदा होता है।'
इस प्रतिष्ठा से तुम यह मत समझना कि सरकार इक्कीस तोपें छोड़ती हैंकि जुलूस दो मील लंबा होता हैकि आकाश से हवाई जहाज से फूल बरसाए जाते हैंकि सभी अखबारों के मुखपृष्ठ पर तुम्हारी फोटो छपती है। इस प्रतिष्ठा से नानक का कोई संबंध नहीं है। यह प्रतिष्ठा है भी नहीं।
एक और प्रतिष्ठा है जो दूसरों पर निर्भर नहीं होती। जो दूसरे पर निर्भर हैवह क्या प्रतिष्ठा! एक और प्रतिष्ठा है जो आंतरिक गरिमा की है। प्रतिष्ठा से वह आदमी विदा होता हैजिसको मृत्यु परमात्मा का मिलन मालूम होती है। वह आनंदभावसेअहोभाव से विदा होता है। वह जीवन को धन्यवाद देता हुआ विदा होता है। वह चारों तरफ अनुग्रह के भाव से विदा होता है। तुम उसके अनुग्रह की छाप उसके चेहरे पर पाओगेउसके रोएं-रोएं पर लिखी पाओगे। चाहे उसे कोई पहुंचाए नचाहे वह रास्ते के किनारे किसी झाड़ के नीचे मर गया होपशु-पक्षी उसे खा जाएंलेकिन उसकी प्रतिष्ठा है। वह प्रतिष्ठा आंतरिक गरिमा है।
मृत्यु भय नहीं हैतब तुम प्रतिष्ठा से विदा होते हो। मृत्यु अगर भय है तो तुम प्रतिष्ठा से विदा नहीं हो सकते। कैसे विदा होओगे प्रतिष्ठा सेरोतेगिड़गिड़ातेभीख मांगतेकितने ही लोग तुम्हें पहुंचा देंइससे क्या फर्क पड़ता है! कितने ही लोग बैंड-बाजे बजा देंइससे क्या फर्क पड़ता है। उनके बैंड-बाजे के शोरगुल में तुम्हारा दुख न छिपेगाबरसते फूलों के नीचे तुम्हारी सड़ती हुई गंध न छिपेगी। उनकी गरजती तोपों के भीतर तुम्हारे भीतर का जो तुमुल संताप थावह न छिपेगा। तुम्हारी मौत अप्रतिष्ठित रहेगी।
जब नानक कहते हैं कि मनन से ही कोई प्रतिष्ठा के साथ विदा होता हैतो वे कहते हैं कि आत्म-प्रतिष्ठा सेएक भीतरी सम्मानअहोभाव से।
'मनन से ही मार्ग से नहीं भटकता। मनन से ही धर्म से संबंध बनता है।'
शास्त्र कितना ही पढ़ोधर्म से संबंध न बनेगा। मंदिरमस्जिदगुरुद्वाराकोई धर्म से संबंध न जोड़ पाएगा। क्योंकि तुम्हीं तो गुरुद्वारा जाओगे--सोएमूर्च्छित! तुम जो दुकान पर बैठे थेवही गुरुद्वारा जाएगा। तुम्हारा ढंग बदलना चाहिए। तुम्हारा ढंग बदल जाए तो सब बदल गया। अन्यथातुम सब करते रहोगे...।
नानक हरिद्वार गए और एक घटना घटी। पितृ-पक्ष चलता था और लोग कुएं पर पानी भर कर आकाश में अपने पुरखों को भेज रहे थे। नानक ने भी बाल्टी उठा लीकुएं से पानी भरा और लोग तो पूरब की तरफ मुंह करके भेज रहे थेउन्होंने पश्चिम की तरफ बाल्टी उलटानी शुरू कर दी। और जोर से कहापहुंच मेरे खेत में। जब दस-पांच बाल्टी डाल चुके और सब जगह खराब कर दीपानी से भर दीतो लोगों ने पूछा कि आप यह कर क्या रहे हैंआपका दिमाग ठीक हैऔर पुरखों को जो पानी चढ़ाया जाता हैवह सूर्य की तरफपूर्व की तरफआप यह पश्चिम की तरफ उलटा धंधा कर रहे हैं! और यह क्या कहते हैं कि पहुंच मेरे खेत मेंकहां खेत है तुम्हारा?
नानक ने कहायहां से कोई दो सौ मील दूर है। लोग हंसने लगे। उन्होंने कहातुम पागल होशक तो हमें पहले ही हुआ था। कहीं दो सौ मील दूर यह पानी पहुंच सकता हैनानक ने कहातुम्हारे पुरखे कितनी दूर हैंउन्होंने कहा कि वे तो अनंत दूरी पर हैं। तो नानक ने कहा कि जब अनंत दूरी तक पहुंच रहा हैतो दो सौ मील फासला क्या बहुत बड़ा है! जब तुम्हारे पुरखों तक पहुंच जाएगा तो हमारे खेत तक भी पहुंच जाएगा।
नानक क्या कह रहे हैंनानक यह कह रहे हैंथोड़ा चेतो! तुम क्या कर रहे होथोड़ा होश संभालो! कहां पानी ढाल रहे होइस तरह की मूढ़ताओं से क्या होगा?
लेकिन सारा धर्म इस तरह की मूढ़ताओं से भरा है। कोई पुरखों को पानी पहुंचा रहा हैकोई गंगाओं में स्नान कर रहा है कि पाप धुल जाएंगेकोई पत्थर की मूर्तियों के सामने बिना किसी भाव केबिना किसी अर्चना केसिर झुकाए बैठा है और मांग कर रहा है संसार की। धर्म के नाम पर हजार तरह की मूढ़ताएं प्रचलित हैं।
इसलिए नानक कहते हैंन तो शास्त्र से मिलेगान संप्रदाय से मिलेगान अंधे अनुकरण से मिलेगा। धर्म का संबंध होता ही तब हैजब कोई व्यक्ति मनन को उपलब्ध होता है।
जब कोई व्यक्ति जाग जाता हैभीतर सुरति आती है। बस जहां से ओंकार का नाद शुरू होता हैवहीं से धर्म का संबंध शुरू होता है। जिस दिन तुम समर्थ हो जाओगे नाद को सुनने मेंकरने वाले नहीं रहोगेसिर्फ सुनने वालेऔर भीतर नाद हो रहा हैऔर तुम आह्लादित होतुम साक्षी होतुम द्रष्टा हो--उसी दिन तुम्हारा धर्म से संबंध जुड़ जाएगा। निश्चित ही यह धर्म मजहब नहीं हो सकता। यह धर्म रिलीजन नहीं हो सकता। इस धर्म का वही अर्थ है जो बुद्ध के धम्म का। इस धर्म का वही अर्थ है जो महावीर के धर्म का।
धर्म का अर्थ हैस्वभाव। जो लाओत्से का अर्थ है ताओ सेवही धर्म से अर्थ है नानक का। तुम अपने स्वभाव से जुड़ जाओगे। और स्वभाव में हो जाना ही परमात्मा में हो जाना है। स्वभाव से हट जानाखो जाना है। स्वभाव में लौट आनावापस घर पहुंच जाना है।
'वह नाम निरंजन ही ऐसा है कि जो कोई मनन करता हैउसका मन ही जानता है।'
'मनन से ही मोक्ष-द्वार की प्राप्ति होती है। मनन से ही परिवार को बचा लिया जाता है। मनन से ही गुरु तरता है और शिष्य को तारता है। नानक कहते हैंमनन से ही भिक्षा के लिए नहीं भटकना पड़ता। वह नाम निरंजन ही ऐसा है कि जो कोई मनन करता हैउसका मन ही जानता है।'
मंनै पावहि मोख दुआरु। मंनै परवारै साधारु।।
मंनै तरै तारे गुरु सिख। मंनै नानक भवहि न भिख।।
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।
द्वार तुम्हारे भीतर हैभटकाव तुम्हारे भीतर है। बाधाएं तुम्हारे भीतर हैंमार्ग तुम्हारे भीतर है। सिर्फ दीया जल जाए तो तुम दोनों को देख लोगे--क्या है असत्यक्या है सत्य। दीया जल जाए तो तुम देख लोगे कि कामना है असत्य और कामना का अनुकरण है संसार। दीया जल जाए तो तुम देख लोगेअकामना है सत्य और अकामना है मोक्ष का द्वार।
तुम बंधते होक्योंकि तुम मांगते हो। मांग है बंधन। तुम नहीं बंधोगेअगर तुम मांगोगे नहीं। जब तक तुम मांगते रहोगेतुम बंधते रहोगे। तुमने न मालूम कितनी जंजीर गढ़ ली हैं। तुम्हारी हर मांग जंजीर बन जाती है। तुमने मांगा कि तुम फंसे। तुमने मांगा कि तुम कारागृह में प्रविष्ट हुए। और तुम मांगते ही चले जाते होतो कारागृह मजबूत होता चला जाता है।
नानक कहते हैं कि मनन से ही मोक्ष-द्वार की प्राप्ति होती है। क्योंकि जैसे ही तुम जागेसाफ दिखलायी पड़ जाता है--न मांगोगेन बंधोगेन आकांक्षा होगीन बंधन होगान चाह होगीन जंजीरें होंगी। और जब कोई चाह नहींमोक्ष का द्वार खुल गया। अचाह मोक्ष का द्वार है।
'मनन से ही परिवार को बचा लिया जाता है।'
किस परिवार की बात करते हैं नानकनिश्चित ही उस परिवार की तो नहीं करते हैं--पत्नीबच्चेभाई-बहन--क्योंकि वह तो नानक भी नहीं बचा सके। वह तो कोई नहीं बचा सका। वह तो परिवार है ही नहीं। एक और परिवार है--गुरु और शिष्य का परिवार। वही परिवार है। क्योंकि वहीं प्रेम अपने शुद्धतम रूप में घटित होता हैक्योंकि वहीं प्रेम अचाह से घटित होता हैवहां प्रेम अकारण घटित होता है।
पिता से प्रेम होता हैक्योंकि उसने जन्म दिया हैकारण है। पत्नी से प्रेम होता हैक्योंकि शरीर की वासना हैकारण है। बेटे से प्रेम होता हैबुढ़ापे का सहारा हैआशा हैकारण है। गुरु से क्या संबंधइसलिए तो जगत में गुरु खोजना बहुत मुश्किल हो जाता हैक्योंकि अकारण प्रेम खोजना है। बस प्रेम हैकोई कारण नहीं। न उससे कोई आशा हैन कोई आकांक्षा है। अगर तुम आशा और आकांक्षा से गुरु के पास गए तो परिवार न बन सकोगे उसके। उसके पास तो तुम्हें अकारण ही जाना होगा। कारण से तो तुम संसार में बहुत भटक लिए होक्या पायाबिना किसी कारण केसहज भाव सेबस हो गया!
इसलिए तो श्रद्धा को अंधी कहा है। अंधी दिखती है सोचने वालों को। वे पूछते हैंक्यों इस आदमी के पीछे पागल हो?मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैंउनके घर के लोग कहते हैंक्यों रजनीश के पीछे पागल होदिमाग खराब हो गया है?
वे निश्चित ही पागल हैं। और सच कहा जाए तो ठीक ही कहते हैं घर के लोग कि दिमाग खराब हो गया है। वह दिमाग जिससे संसार चलता हैनिश्चित ही खराब हो गया है। एक नया प्रेम बना है। और इस नए प्रेम के लिए कोई तर्क नहीं दे सकते हो। किसी को सिद्ध भी नहीं कर सकते कि इस प्रेम में कोई कारण है। सिद्ध करने में उनको खुद ही लगेगा कि असंभव है।
नानक कहते हैं कि मनन से ही परिवार को बचा लिया जाता है।
एक गुरु का एक परिवार निर्मित होता है। और जब वह परिवार संप्रदाय बन जाता हैतब नुकसान शुरू हो जाता हैजब तक वह परिवार रहता हैतब तक एक बात। जब बुद्ध पैदा होते हैं तो हजारों लोग उनके परिवार में सम्मिलित होते हैं। नानक पैदा होते हैंहजारों लोग उनके परिवार में सम्मिलित होते हैं। जो लोग नानक के परिवार में सम्मिलित होते हैंयह सम्मिलित होना ही बड़ी भारी घटना है। क्योंकि यह अकारण-जगत में प्रवेश हैअकारण प्रेम में प्रवेश है। यह नानक का रंग और रस लग गया। यह धुन पकड़ गयी। यह पागल हुए जा रहे हैं।
लेकिन फिर नानक विदा हो जाएंगे। जो परिवार में अपनी स्वेच्छा से सम्मिलित हुए थेवे विदा हो जाएंगे। फिर उनके बच्चे और बेटे भी सिक्ख रहेंगेवह संप्रदाय है। क्योंकि जिस प्रेम को तुमने नहीं चुनावह तुम्हें रूपांतरित नहीं कर सकता। नानक को चुनना बड़ी क्रांति है। फिर सिक्ख के घर में पैदा होना और अपने को सिक्ख मानना कोई क्रांति नहीं है।
मुसलमान के घर में मुसलमान पैदा होता हैहिंदू के घर में हिंदूजैन के घर में जैनसिक्ख के घर में सिक्ख। संप्रदाय का अर्थ हैजो तुम्हें जन्म से मिले। और परिवार का अर्थ हैजो तुमने अपनी स्वेच्छा से चुना हो। धार्मिक व्यक्ति हमेशा स्वेच्छा से चुनेगा। अधार्मिक व्यक्ति सांप्रदायिक होगाजन्म से चुनेगा
तुम जन्म से जैन होकोई हिंदू हैकोई बौद्ध है। लेकिन जन्म से कोई हिंदूजैनबौद्धसिक्ख हो सकता हैजन्म से खून मिल सकता हैहड्डी-मांस-मज्जा मिल सकती है। आत्मा कैसे मिलेगी?
और इसलिए दुनिया में एक बड़ी अनबूझ घटना घटती रहती है कि जब गुरु जिंदा होता हैतब एक रोशनी होती है,जिसमें वह खुद भी तिरता है और दूसरों को भी तैराता है। जब गुरु जिंदा होता हैतब एक जीवंत घटना घटती है! फिर गुरु विदा हो जाता हैवे जो प्राथमिक--जिन्होंने अपने जीवन की चढ़ोत्तरी की थीजिन्होंने अपने जीवन को भेंट किया थादांव पर लगाया था--वे विदा हो जाते हैं। तब उनके घर में बच्चे पैदा होते हैं। ये बच्चे फिर सिक्ख होंगेजैन होंगेबौद्ध होंगे। धर्म से इनका कोई संबंध न होगा।
एक बात ठीक से समझ लेनाधर्म व्यक्ति का अपना निर्णय है। जन्म से कोई धार्मिक नहीं हो सकता। उस निर्णय से जो परिवार बनता है...।
नानक कहते हैं, 'मनन से ही परिवार बचा लिया जाता है। मनन से ही गुरु तरता है और शिष्य को तारता है।'
नानक कहते हैं, 'मनन से ही भिक्षा के लिए नहीं भटकना पड़ता।'
जैसे-जैसे मनन गहरा होता हैमांगना ही छूट जाता है। संसार क्या हैभिक्षा के लिए भटकना है। तुम गौर करो कि तुम क्या कर रहे होतुम मांग रहे हो। चौबीस घंटे मांग जारी है। तुम भिखारी हो।
नानक कहते हैं, 'मनन से ही भिक्षा के लिए नहीं भटकना पड़ता।'
मनन से आदमी सम्राट हो जाता हैशहंशाह हो जाता हैबादशाह हो जाता है। मनन उसे मुक्त कर देता है भिक्षा से। मनन से वह मिल जाता हैजिसके पार पाने को कुछ बचता नहीं। मनन से परमात्मा मिल जाता हैफिर और क्या मांगना है?आखिरी मंजिल आ गयी! अब आगे कुछ मांगने को कहां हैसब मिल गया! कुछ शेष कहां रहासमाधि मिल गयीसब मिल गया! भिक्षा-वृत्ति छूट जाती है।
'वह नाम निरंजन ही ऐसा है कि जो कोई मनन करता हैउसका मन ही जानता है।'
ऐसा नामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ।।

आज इतना ही।

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