मंगलवार, 15 अगस्त 2017

अष्‍टावक्र: महागीता-भाग-2 - प्रवचन--08

दिनांक: 3 अक्‍टूबर, 1976;
      श्री रजनीश आश्रम पूना।
     
     जनक उवाच।

मथ्यनन्तमहाम्मोधौ विश्वयोत ड़तस्तत:!
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्लसहिध्याता।। 74।।
मय्यनन्तमहाम्मोधौ जगद्वीचि स्वभावत:।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न न क्षति:।। 75।।
मय्यनन्तमहाम्मोधौ विश्व नाम विकल्पना।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थित:।। 76।।
नात्मा भावेष नो भावस्तत्रानन्ते निरंजने।
ड़त्यसक्तोउसह: शान्त एतदेवाहमास्थिता:।। 77।।
अहो चिन्यात्रमेवाह मिन्द्रजालोपमं जगत्।
अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्यना।। 78।।


त्य को कहा नहीं जा सकताइसीलिए बार—बार कहना पड़ता है। बार—बार कह कर भी पता चलता है कि फिर छूट गया। फिर छूट गया। जो कहना थावह नहीं समा पाया शब्दों में।
अरब में एक कहावत है कि पूर्ण मनुष्य नहीं बनाया जा सकता। इसलिए परमात्मा रोज नये बच्चे पैदा करता जाता है। अभी भी कोशिश कर रहा है पूर्ण मनुष्य को बनाने की—हारा नहींथका नहींहताश नहीं हुआ है।

ठीक वैसी ही स्थिति सत्य के संबंध में भी है। सनातन से बुद्धपुरुष कहने की चेष्टा करते रहे हैं। हजार—हजार ढंग से उस तरफ इशारा किया हैलेकिन फिर भी जो कहना था वह अनकहा रह गया है। उसे कहा ही नहीं जा सकता है। स्वभाव से ही शब्द में बंधने की कोई संभावना नहीं है। जैसे कोई मुट्ठी में आकाश को नहीं भर ले सकता।
एक आश्चर्य की बात देखी! मुट्ठी बांधो तो आकाश बाहर रह जाता हैमुट्ठी खोल दो तो आकाश मुट्ठी में होता है। खुली मुट्ठी में तो होता हैबंधी मुट्ठी में खो जाता है। तो मौन में तो सत्य होता हैशब्द में खो जाता है। शब्द तो बंधी मुट्ठी हैमौन खुला हाथ है। लेकिन फिर भी बुद्धपुरुष कहने की चेष्टा करते है—करुणावशांत। और शुभ है कि चेष्टा जारी है। सत्य भला न कहा जा सकेलेकिन सत्य को कहने की जो चेष्टा है वह चलती रहनी चाहिएक्योंकि उसी चेष्टा में बहुत—से सोये व्यक्ति जागते हैं। सुन कर सत्य मिलता भी नहींलेकिन सुन—सुन कर प्यास तो जग जाती हैसत्य की खोज की आकांक्षा तो प्रज्वलित हो जाती है।
मैं तुमसे कह रहा हूं जो कुछजान कर कह रहा हूं कि तुम तक नहीं पहुंचेगा। लेकिन फिर भी जो मैं कहूंगावह भला न पहुंचेतुम्हारे जीवन के भीतर छिपी हुई अग्नि में घी का काम करेगाअग्नि प्रज्वलित होगी। सत्य तुम्हें मिले न मिले,लेकिन तुम्हारे भीतर सोई हुई अग्नि को ईंधन मिलेगा। इसी आशा में सारे शास्त्रों का जन्म हुआ है। लेकिन अगर तुम सत्य को पकड़ने की चेष्टा में शब्द में उलझ जाओ तो चूक गये। जैसे कि कोई गीत तो कंठस्थ कर ले और गीत के भीतर छिपा हुआ अर्थ भूल जाए। तोतो  को देखा! याद कर लेते हैं। राम—राम रटने लगते हैं। भजन भी दोहरा देते हैं।
तुम शब्द सीख ले सकते हो। सुंदर शब्द उपलब्ध हैं। और तुम्हें ऐसी भ्रांति भी हो सकती है कि जब शब्द आ गया तो सत्य भी आ गया होगा। शब्द तो केवल खाली मंजूषा है। सत्य तो आता नहींइसलिए शब्द को कभी भूल कर सत्य मत समझ लेना और शास्त्र को सिर पर मत ढोना।
अष्टावक्र की यह महागीता है। इससे शुद्धतम वक्तव्य सत्य का कभी नहीं दिया गया और कभी दिया भी नहीं जा सकता। फिर भी तुम्हें याद दिला दूं इन शब्दों में मत उलझ जाना। ये शब्द खाली हैं। ये बड़े प्यारे हैं—इसलिए नहीं कि इनमें सत्य हैये बड़े प्यारे हैंक्योंकि जिस आदमी से निकले हैं उसके भीतर सत्य रहा होगाये बड़े प्यारे हैंकयोंकि जिस हृदय से उमगे हैंजहां से उठे हैंवहां सत्य का आवास रहा होगा।
सदगुरु के पास या सदवचनों के सान्निध्य में कुछ ऐसी घटना घटती हैजैसे सुबह कुहासा घिरा हो और तुम घूमने गये होतो एकदम भीग नहीं जातेकोई वर्षा तो हो नहीं रही है कि तुम भीग जाओलेकिन अगर घूमते ही रहेघूमते ही रहेतो वस्त्र धीरे— धीरे आर्द्र हो जाते हैं। वर्षा हो भी नहीं रही कि तुम भीग जाओकि तर—बतर हो जाओलेकिन कुहासे में अगर घूमने गये हो तो घर लौट कर पाओगे कि वस्त्र थोड़े गीले हो गये।
सत्संग में ऐसा ही गीलापन आताआर्द्रता आतीवर्षा नहीं हो जाती। लेकिन अगर तुम शास्त्र के शुद्ध वचनों को शांति से सुनते रहे और शब्दों में न उलझेतो कुहासे की तरह शब्दों के आसपास लिपटी हुई जो गंध आती है वह तुम्हें सुगंधित कर जायेगीऔर तुम्हें प्रज्वलित कर जायेगीतुम्हारे भीतर की मशाल को ईंधन बन जायेगी।
कवि ने गीत लिखे नये—नये बार—बार
पर उसी एक विषय को देता रहा विस्तार—
जिसे कभी पूरा पकड़ पाया नहीं;
जो कभी किसी गीत में समाया नहीं
किसी एक गीत में वह अट गया दिखता
तो कवि दूसरा गीत ही क्यों लिखता?
तुम्हें बहुत बार लगेगा अष्टावक्र वही कहे जाते हैंजनक वही दोहराए चले जाते हैं।
कवि ने गीत लिखे नये—नये बार—बार
पर उसी एक विषय को देता रहा विस्तार—
जिसे कभी पूरा पकड पाया नहीं;
जो कभी किसी गीत में समाया नहीं
एक गीत हार जाताकवि दूसरा गीत रचता है। लेकिन जो उसने पहले गीत में गाना चाहा था वही वह दूसरे गीत में गाना चाहता है।
विन्सेंट वानगाग को किसी ने पूछा कि तुमने अपने जीवन में कितने चित्र बनाये हैंउसने कहा कि बनाये तो बहुत,लेकिन बनाना एक ही चाहता था।
ठीक कहा। उस एक को बनाने की चेष्टा में बहुत बने और वह एक हमेशा रह जाता हैवह बन नहीं पाता है।
रवींद्रनाथ मरण—शैया पर थे। उनकी आंखों से आंसू टपकते देख कर उनके एक मित्र ने कहाआपऔर रोते हैंअरे धन्यवाद दो! प्रभु ने तुम्हें सब कुछ दिया। तुमसे बड़ा महाकवि नहीं हुआ। तुमने छह हजार गीत लिखे जो संगीत में बंध सकते हैं। पश्चिम में शैली की बड़ी ख्याति हैउसने भी दो हजार ही गीत लिखे हैं जो संगीत में बंध जाएं। तुमने छह हजार लिखे। और क्या चाहते होअब किसलिए रोते होअब तो शांति से विदा हो जाओ।
रवींद्रनाथ हंसने लगे। उन्होंने कहाइसलिए रोता भी नहीं। इधर प्रभु से निवेदन कर रहा था भीतर— भीतरआंख में आंसू आ गये। निवेदन कर रहा थायह भी कैसा मजाक है! अभी तो मैं साज बिठा पाया था। अभी गीत गाया कहांअभी तो साज बिठा पाया था। और यह विदा की बेला आ गई। यह कैसा अन्याय हैये छह हजार गीत जो मैंने गायेयह तो सिर्फ साज का बिठाना था।
जैसे तुमने देखातबलची तबले को ठोंकता—पीटतावीणाकार वीणा को कसता। उस वीणा को कसने से जो आवाज निकलती हैतारों को खींचने सेजांचने से जो आवाज निकलती हैउसे संगीत मत समझ लेनावह तो केवल अभी आयोजन किया जा रहा है।
रवींद्रनाथ ने कहाअभी तो आयोजन पूरा होने को आया था। अब मैं गा सकता थाऐसा लगता थाऔर यह विदा होने का वक्त आ गयायह कैसा अन्याय है?
जिन्होंने भी कुछ कहने की कोशिश की हैसभी का यही अनुभव है। जो गाना हैवह अनगाया रह जाता है। जो कहना हैअनकहा छूट जाता है।
फिर दूसरी तरफ से चेष्टा होती है कि चलोइस आयाम से नहीं हुआदूसरे आयाम से हो जाएगाये शब्द काम न आये,कोई और शब्द काम आ जायेंगेइससे न जल सका दीयाकिसी और बात से जल जाएगा। लेकिन दीया जल सकता नहीं,क्योंकि शब्द और सत्य का मिलन होता नहीं। फिर भीअगर तुमने शांति से सुनातुमने अगर पीयातो शब्द तो खो जाएगा,लेकिन शब्द के पास कुहासे की तरह जो आभामंडल थावह तुम्हारे भीतर की अग्नि को प्रज्वलित कर देगातुम प्यासे हो जाओगे।
जनक के आज के सूत्रपीछे जो सूत्र थे उन्हीं के सिलसिले में हैंउन्हीं की क्रमबद्धता में हैं। पीछे के चार सूत्र बड़े क्रांतिकारी थे। अब उन्हीं का विस्तार है। और वस्तुत:पूरी महागीता में उन्हीं का विस्तार होगा। उन चार सूत्रों में जो मौलिक बात थी वह इतनी ही थी कि अष्टावक्र ने कहा है जनक को कि अब तू ज्ञान को उपलब्ध हो जा। और जनक कहते हैंज्ञान को उपलब्ध हो जाऊंयह भी आप कैसी बात कह रहे हैंज्ञान को उपलब्ध हो गया हूं! यह आप कैसी बात कर रहे हैं कि ज्ञान को उपलब्ध हो जाओजैसे कि ज्ञान मुझसे कुछ भिन्न हो! मेरा स्वभावमेरा बोध है। इति ज्ञानं! यही ज्ञान है। यह जो साक्षी का अनुभव हो रहा हैयही ज्ञान है। 'हो जाओमें तो ऐसा लगता है भविष्य में होगा। 'हो जाओमें तो ऐसा लगता हैकुछ साधन करना पड़ेगाविधान करना पड़ेगाअनुष्ठान करना पड़ेगा। 'हो जाओमें तो ऐसा लगता है यात्रा करनी होगीमंजिल भविष्य में हैमार्ग तय करना होगा।
जनक ने कहानहीं—नहीं! आप मुझे उलझाने की कोशिश मत करें और आप मुझे ऐसे प्रलोभन न दें। हो गया हैघट गया है। और जब कह रहे हैं कि घट गया है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि पहले नहीं घटा थाअब घटा है। इसका इतना अर्थ है कि घटा तो सदा ही से थामुझे ही बोध न थामुझे स्मरण न था। संपत्ति तो मुझमें पड़ी थीमैं उधर आंख को न ले गया;मैं कहीं और खोजता रहा।
मिलने में कोई अड़चन न थीमेरी गलत खोज ही अड़चन थी। ऐसा नहीं था कि मेरा श्रम पूरा नहीं थामेरी साधना पूरी नहीं थीया मेरे साधन अधूरे थेया मैंने पूरी जीवन—ऊर्जा को दाव पर न लगाया था—ऐसा नहीं था। सिर्फ जहां मुझे देखना था वहां मैंने नहीं देखा था। मैंने अपने भीतर नहीं देखा था। खोजने वाले ने खोजने वाले में नहीं देखा थाकहीं और खोज रहा था। देखा भीतरहो गया। 'हो गया', कहना पड़ता है भाषा मेंकहना तो ऐसा चाहिए. वही हो गया जो सदा से था।
बुद्ध को ज्ञान हुआ तो बुद्ध से किसी ने पूछाक्या मिलाबुद्ध ने कहामिला कुछ भी नहीं। जो मिला ही हुआ था,उसका पता चला। जो मिला ही हुआ थाजिसे खोने का कोई उपाय ही नहीं है! अष्टावक्र बड़े प्रसन्न हो रहे होंगे सुन कर जनक के उत्तर। शायद ही कभी किसी शिष्य ने गुरु की आकांक्षा को इस परिपूर्णता से पूरा किया है। क्योंकि शिष्य की उत्सुकता तो होने में होती हैबनने में होती हैविकसित होने मेंसमृद्ध होने मेंज्ञानवान होने मेंशक्तिसंपन्न होने मेंसिद्धि पाने में। अष्टावक्र बड़े प्रफुल्लित हुए होंगे। उनका मन बहुत मग्न हुआ होगा। क्योंकि जो जनक कह रहे थे वही अष्टावक्र सुनना चाहते थे।
तेरे हुस्ने—जवाब से आई
मेरे ली सवाल की खुशबू।
जरूर जनक के जवाब में अपने सवाल की आत्यंतिक सुगंध को अष्टावक्र ने अनुभव किया होगा। इधर भीतर तो वह प्रफुल्लित हो रहे होंगेलेकिन बाहर उन्होंने रुख बड़े कठोर बना रखा है। बाहर तो परीक्षक हैं। बाहर तो आंखें जांच रही हैं। पैनी धार आंखों की जनक के हृदय को काट रही है।
गुरु को कठोर होना ही चाहिए—यही उसकी करुणा है। वह तो आत्यंतिक स्थिति में ही कहेगा कि ठीकउसके पहले नहीं। जब तक जरा—सी भी संभावना है भूल— भटक कीतब तक वह कुरेदे जाएगातब तक वह काटे जाएगातब तक वह और उपाय करेगा कि तुम फंस जाओ,, और उपाय करेगा कि कहीं तुमसे भूल—चूक हो जाए।
जनक ने कहा 'मुझ अंतहीन महासमुद्र मेंविश्व—रूपी नाव अपनी ही प्रकृत वायु से इधर—उधर डोलती है। मुझे असहिष्णुता नहीं है। '
यह सूत्र इतना सरल मालूम होता हैलेकिन बड़ा गहन है! इसमें उतरने की कोशिश करो। खूब ध्यान से सुनोगे तो ही उतर सकोगे। इस सूत्र का यह अर्थ हुआ कि दुख आए चाहे सुखदोनों ही प्रकृति से उत्पन्न हो रहे हैं। मेरे चुनाव की सुविधा कहां है! मुझसे पूछता कौन है! जैसे समुद्र में लहरें उठ रही हैं—छोटी लहरेंबड़ी लहरेंअच्छी लहरेंबुरी लहरेंसुंदरकुरूप लहरें—यह समुद्र का स्वभाव है कि ये लहरें उठती हैं। ऐसे ही मुझ में लहरें उठती हैं—सुख कीदुख कीप्रेम कीघृणा कीक्रोध की,करुणा की। ये स्वभाव से ही उठती हैं और इधर—उधर डोलती हैं। इसमें मैंने चुनाव नहीं किया हैचुनाव छोड़ दिया है। और जब से चुनाव छोड़ा तभी से असहिष्णुता भी चली गई। करने को ही कुछ नहीं है तो असहिष्णुता कैसे हो?
मेरे पास लोग आते हैंवे कहते हैं कि किसी तरह अशांति के बाहर निकाल लें। मैं उनसे कहता हूं कि तुम अशांति को स्वीकार कर लो। एकदम उन्हें समझ में नहीं आताक्योंकि वे आए हैं अशांति को छोड़ने। मैं उनसे कहता हूं, अशांति को स्वीकार कर लो। उनके आने का कारण बिलकुल भिन्न है। वे चाहते हैं कि कोई अशांति से छुड़ा दे। कोई विधि होगीकोई उपाय होगाकोई औषधि होगीकोई मंत्र—तंत्रकुछ यज्ञ—हवन—कुछ होगाजिससे अशांति छूट जाएगी। और दुनिया में सौ गुरुओं में निन्यानबे ऐसे हैं कि तुम जाओगे तो वे जरूर तुम्हें कुछ कह देंगे कि यह करो तो अशांति छूट जाएगी।
मेरी अड़चन यह है कि मैं जानता हूं अशांति को छोड़ने का कोई उपाय ही नहीं है—स्वीकार करने का उपाय है। और स्वीकार करने में अशांति विसर्जित हो जाती है। मैं जब कहता हूं अशांति विसर्जित हो जाती है तो तुम यह मत समझना कि अशांति छूट जाती है। अशांति होती रहे या न होती रहेतुम अशांति से छूट जाते हो। तुमसे अशांति छूटे या न छूटेतुम अशांति से छूट जाते हो।
इस मन की व्यवस्था को समझें। मन अशांत हैतुम कहते हो शांत होना चाहिए। मन तो अशांत थाएक और नई अशांति तुमने जोड़ी कि अब शांत होना चाहिए। मन की अशांति को समझो। तुम्हारे पास दस हजार रुपये हैंतुम दस लाख चाहते थेइसलिए मन अशांत है। जितना है उससे तुम तृप्त न थे। जो नहीं है वह तुम मांग रहे थे। 'नहींकी मांग से अशांति आई। अशांति आती है अभाव से। जो हैउससे अशांति कभी नहीं आती हैजो नहीं हैउसकी मांग से आती है। जो पत्नी तुम्हारी हैउससे सुंदर चाहिए। जो पति तुम्हारा हैउससे ज्यादा यशस्वी चाहिए। जो बेटा तुम्हारा हैउससे ज्यादा बुद्धिमान चाहिए। जैसा मकान हैउससे बड़ा चाहिए। जितनी तुम्हारी प्रतिष्ठा हैउससे गहरी चाहिए। जो पद तुम्हारे पास हैउससे आगे का पद चाहिए। अशांति आती है उसकी मांग से जो तुम्हारे पास नहीं है। फिरजब तुम अशांत हो गए तो अब तुम एक और नई बात मांगना शुरू करते हो—पुराना जाल तो कायम है और उसी जाल का गणित और फैलता है—अब तुम कहते होमुझे शांति चाहिए। अब शांति नहीं है तुम्हारे पासअब तुम्हें शांति चाहिए। तुम समझेइसका मतलब हुआ कि अब जाल और भी जटिल हो जाएगा।
जो आदमी साधारणत: अशांत है और शांति की झंझट में नहीं पड़ा हैवह उस आदमी से ज्यादा शांत होता है जो शांत होना चाहने की झंझट में पड़ गया है। यह एक और उपद्रव हुआ। अशांत तो तुम थे हीतर्क था कि जो नहीं है वह होना चाहिए;अब शांति नहीं हैशांति होना चाहिए। एक और नई झंझट शुरू हुई।
जो तथाकथित धार्मिक लोग हैंउनसे ज्यादा अशांत व्यक्ति तुम दूसरे न पाओगे। सांसारिक व्यक्ति उतने अशांत नहीं हैं। मंदिरों मेंमस्जिदों में झुके लोगपूजागृहों में बैठे लोगतपश्चर्या उपवास करते लोग तुम्हें जितने अशांत दिखाई पड़ेंगे उतने तुम्हें साधारण लोगहोटलों में बैठेचाय पीतेअखबार पढ़तेउतने अशांत न दिखाई पड़ेंगे। कम से कम उनके पास एक ही अशांति है—वे संसार में कुछ पाना चाहते हैं। धार्मिक व्यक्ति के पास दोहरी अशांति है—वह परलोक में भी कुछ पाग चाहता है। न केवल परलोक में कुछ पाना चाहता हैयहां भी शांति पाना चाहता हैआनंद पाना चाहता हैध्यान पाना चाहता है। और सारा जाल इतना ही है कि तुम अगर कुछ पाना चाहते हो तो तुम और अशांत होते जाओगे।
मैं कहता हूं—जब कोई शांति की खोज में आता—कि तुम अशांति को स्वीकार कर लो। उसे समझाता हूं। कभी—कभी उसकी समझ में भी आ जाता है। यह बात कठिन है : 'अशांति को स्वीकार कर लो! तो फिर शांत कैसे होंगे?' तुम्हारी बात भी मेरी समझ में आती है। लेकिन मैं तुमसे कहता
हूं. जब भी कोई शांत हुआ हैअशांति को स्वीकार करके हुआ है। सुन कर मुझेसमझ कर मुझे कोई राजी हो जाता है कि 'अच्छातो स्वीकार कर लेते हैंफिर शांत हो जाएंगेस्वीकार कर लेते हैंफिर शांत हो जाएंगेकब तक शांत होंगेचलो स्वीकार कर लेते हैं। 'तो मैं उनसे कहता हूं यह तुमने स्वीकार किया ही नहीं। अभी भी तुम्हारी मांग तो कायम है कि शांत होना है। स्वीकार करने का अर्थ है. जैसा हैवैसा हैअन्यथा हो नहीं सकता। जैसा हैवैसा ही होगा। जैसा हुआ हैवैसा ही होता रहा है।
जब तुम इस भांति स्वीकार कर लेते हो तो पीछे यह प्रश्न खड़ा नहीं होता कि स्वीकार करने से हम शांत हो जाएंगे?और शांति उसी घटना की स्थिति हैजब जो है स्वीकार है। फिर कैसे अशांत होओगे बताओ मुझेफिर क्या उपाय है अशांत होने काजो हैजैसा है—स्वीकार है। फिर तुम्हें कौन अशांत कर सकेगाकैसे अशांत कर सकेगाफिर तो अगर अशांति भी होगी तो स्वीकार है। फिर तो दुख भी आएगा तो स्वीकार है। फिर तो मौत भी आएगी तो स्वीकार है। तुमने चुनाव छोड़ दिया,तुमने संकल्प छोड़ दियातुम समर्पित हो गये। तुमने कहाअब जो है वही है। और उसी दिन वह महाक्रांति घटती है जिसका इस सूत्र में इंगित है।
मयि अनंत महाम्भोधौ विश्वपोत इतस्तत:।
'मुझ अंतहीन महासमुद्र में विश्व—रूपी नाव अपनी ही प्रकृत वायु से इधर—उधर डोलती है।
'भ्रमति स्वान्तवातेन न मम अस्ति असहिष्णुता
अब मैं जान गया कि यह स्वभाव ही है। कोई मेरे विपरीत मेरे पीछे नहीं पड़ा है। कोई मेरा शत्रु नहीं है जो मुझे अशांत कर रहा है। ये मेरे ही स्वभाव की तरंगें हैं। यह मैं ही हूं। यह मेरे होने का ढंग है कि कभी इसमें लहरें उठती हैंकभी लहरें नहीं उठतींकभी सब शांत हो जाता हैकभी सब अशांत हो जाता है। यह मैं ही हूं और यह मेरा स्वभाव है।
एक मित्र ने पूछा कि आप कहते हैंआत्मा जब मुक्त हो जाएगी तब परिपूर्ण आनंद में होगीस्वतंत्र होगीलेकिन क्या फिर आत्मा में वासना नहीं उठ सकतीऔर अगर वासना फिर नहीं उठ सकती तो पहले ही वासना क्यों उठीक्योंकि आत्मा तो स्वभाव से ही स्वतंत्र हैशुद्ध—बुद्ध है। पहले से ही वासना क्यों उठी?
उन मित्र को... उनका प्रश्न बिलकुल स्वाभाविक हैतर्कयुक्त है। उनको यह खयाल में नहीं आ रहा कि वासना का उठना भी आत्मा की स्वतंत्रता का हिस्सा है। यह किसी ने उठा नहीं दी तुममें। यह तुम्हारा स्वभाव है। वासना भी उठती है तुम्हारे स्वभाव में और मोक्ष भी उठता है तुम्हारे स्वभाव में। जब वासना उठती है तो तुम संसारी हो जाते हो। जब वासना उठती है तो तुम देह में प्रवेश कर जाते हो। जब वासना से थक जाते हो तो मुक्त हो जाते हो। मगर दोनों तुम्हारे ही स्वभाव हैं। ऐसा नहीं है कि वासना कोई शैतान तुम में डाल रहा है और मोक्ष तुम लाओगे। वासना भी तुम्हारीमोक्ष भी तुम्हारा। और जिसने ऐसा समझ लियाउसे एक बात खयाल में आ जाएगी कि अगर आत्मा में वासना न उठ सके तो वह आत्मा मुक्त ही नहीं। क्योंकि मुक्ति ऐसी क्या मुक्ति हुईअगर तुम्हें स्वर्ग जाने की ही मुक्ति हो और नरक जाने के लिए दरवाजे ही बंद हों और जा ही न सकोतो यह मुक्ति कोई पूरी मुक्ति न हुई। यह स्वर्ग भी बेमजा हो जाएगा। इसका भी स्वाद खो जाएगा। मुंह कड़वाहट से भर जाएगा स्वर्ग में जा कर।
स्वर्ग का मजा ही यह है कि नरक जाने की भी सुविधा है। सुख का मजा यही है कि दुखी होने की सुविधा है। विपरीत के कारण ही जीवन में सारा रंग हैसारा संगीत है। अगर विपरीत न हो तो सब संगीत खो जाए। वीणावादक अंगुलियों से तार को छेडता है तो संगीत है। अंगुलियों और तार में जो संघर्ष होता है वही संगीत है। संघर्ष बंद हो जाएसंगीत शून्य हो जाए,संगीत खो जाए।
स्त्री और पुरुष के बीच जो विपरीतता हैवही प्रेम है। अगर विपरीतता समाप्त हो जाएप्रेम विदा हो जाए। संसार और मोक्ष के बीच जो विकल्प हैवही स्वतंत्रता है। स्वतंत्रता का मतलब यह है कि अगर मैं चाहूं तो मैं नरक की आखिरी परत तक जा सकता हूं, कोई मुझे रोकने वाला नहीं। और अगर मैं चाहूं तो स्वर्ग की सब ऊंचाइयां मेरी हैंमुझे कोई रोकने वाला नहीं। यह मेरा निर्णय है। और ये दोनों मेरे स्वभाव हैं। नरक मेरी ही निम्नतम दशा हैस्वर्ग मेरी ही उच्चतम दशा है। समझो कि नरक मेरे पैर हैं और स्वर्ग मेरा सिर है। मगर दोनों मेरे हैं और भीतर मेरा खून दोनों को जोड़े हुए है।
भ्रमति स्वान्तवातेन.........।
अपनी ही हवा हैउसी से भ्रम पैदा हो रहा है। डावांडोल होती नौका।
'मुझ अंतहीन महासमुद्र में विश्व—रूपी नाव अपनी ही प्रकृत वायु से इधर—उधर डोलती है। मुझे असहिष्णुता नहीं है।'
जनक कहते हैंअब मैं चुनाव नहीं करना चाहता। मैं यह नहीं चाहता कि नाव न डोलेक्योंकि वह मेरा आकर्षण कि नाव न डोलेमेरे मन का तनाव बनेगा।
जब भी तुमने कुछ चाहाजब भी तुमने कुछ चाह कीतनाव पैदा हुआ। जब भी तुमने स्वीकार कियाजो हैतभी तनाव खो गया। अगर तुमने चाहा कि अज्ञान हटे और ज्ञान आए—उपद्रव शुरू हुआ। अगर तुमने चाहा कि वासना मिटेनिर्वासना आए—पडे तुम झंझट में! अगर तुमने चाहा संसार से मुक्ति होमोक्ष बने मेरा साम्राज्य—अब तुमने एक तरह की परेशानी मोल लीजो तुम्हें चैन न देगी।
जनक बड़ी अदभुत बात कह रहे हैं। जनक कह रहे हैं : संसार और मोक्ष दोनों ही मुझमें उठती तरंगें हैं। अब मैं चुनाव नहीं करताजो तरंग उठती हैदेखता रहता हूं। यह भी मेरी है। यह भी स्वाभाविक है।
देखा इस स्वीकार— भाव को! फिर कैसी असहिष्णुताफिर तो सहिष्णुता बिलकुल ही नैसर्गिक होगी। जो हो रहा हैहो रहा है। बड़ी कठिन है यह बात स्वीकार करनीक्योंकि अहंकार के बड़े विपरीत है।
कोई मेरे पास आया और कहने लगामैं महाक्रोधी हूं, मुझे क्रोध से मुक्त होना है। मैंने उससे पूछा कि तू महाक्रोधी क्यों हैइसको थोड़ा समझ। अहंकार के कारण होगा।
उसने कहाआप ठीक कहते हैं। और मैंने कहाउसी अहंकार के कारण तू कहता है कि मुझे क्रोध से बाहर होना है,क्योंकि क्रोध के कारण अहंकार को चोट लगती है। तो क्रोध के पीछे भी अहंकार है और अक्रोधी बनने के पीछे भी अहंकार है। जब भी तू क्रोध करता है तो तेरी प्रतिमा नीचे गिरती हैतेरे अहंकार को भाता नहीं है। तू चाहता है कि लोग तुझे संत की तरह पूर्जेचरण छुए तेरे।
तेरे क्रोध के कारण वह सब गड़बड़ हो जाता है। तेरे कोई चरण नहीं छूता। चरण कौन तेरे छुएनमस्कार कौन करे तुझेतो अब तू चाहता है कि क्रोध से कैसे छूटें। लेकिन मूल जड़ तो वही की वही है। जिसके कारण तू क्रोध करता था—जिस अहंकार के कारण—वही अहंकार अब संत— महात्मा बन जाना चाहता है। इसे समझ और अब तू चुनाव छोड़ दे। मैं तुझसे कहता हूंतू क्रोधी हैतू राजी हो जा. ठीक हैमैं क्रोधी हूं। और क्रोध के जो परिणाम हैंवे होंगे। कोई तुझे सम्मान नहीं देगाठीक हैबिलकुल ठीक है। सम्मान देना ही क्यों चाहिए। कोई तेरा अपमान करेगाठीक है। क्रोधी हूं इसलिए अपमान होता है।
समझने की कोशिश करना। अगर यह व्यक्ति क्रोध को समझ लेस्वीकार कर ले तो क्या क्रोध बचेगा?
उस व्यक्ति ने दो दिन पहले मुझे पत्र लिखा था कि मुझे अब बचाएंमुझे बाहर निकालेंक्योंकि मैं वेश्या के घर जाने लगा हूं और ये और लोग मुझे संत मानते हैंसाधु मानते हैं। और अगर मैं पकड़ा गया या किसी को पता चल गया तो फिर क्या होगा?
देखते हैंवही अहंकार नए—नए रूप लेगा! वही अहंकार वेश्या के घर ले जाएगा। वही अहंकार संत बनने की आकांक्षा पैदा करवा देगा।
उस व्यक्ति को मैंने कहातू एक काम कर। या तो तू स्वीकार कर ले कि तू वेश्यागामी है और घोषणा कर दे कि मैं वेश्यागामी हूं। बात खत्म हो गई। फिर न तुझे डर रहेगान भय रहाफिर तुझे जाना है जानहीं जाना है न जा। तेरी मर्जी है। तेरे लिए शायद अभी यही उचित होगा. जो हो रहा है ठीक हो रहा है। मैं तुझे नहीं कहता कि मत जा। अगर इस स्वीकार— भाव से यह गिर जाए वृत्ति तो ठीकतो तू जाग जाएगा। तब जागरण को स्वीकार कर लेनाअभी सोने को स्वीकार कर। और स्वीकार के माध्यम से ही सोने और जागरण के बीच सेतु बनता है।
क्या किया उस व्यक्ति नेवह चीखामेरे सामने ही चिल्लाया कि मुझे बुद्ध बनने से कोई भी नहीं रोक सकता! इतने जोर से चीखा कि शीला मेरे पास बैठी थीवह एकदम कैप गई।
वही क्रोधवही अहंकार नए—नए रूप ले लेता है। अब बुद्ध बनने से कोई नहीं रोक सकता! जैसे कि मैं उसको बुद्ध बनने से रोक रहा हूं! क्योंकि मैंने उससे कहास्वीकार कर ले। जो हो रहा हैस्वीकार कर ले! जैसा है स्वीकार कर ले।
यह बात चोट कर गई। यह कैसे स्वीकार कर लें! बुरा से बुरा आदमी भी यह स्वीकार नहीं करता कि मैं बुरा हूं। इतना ही मानता है कि कुछ बुराई मुझमें हैहूं तो मैं आदमी अच्छा। देखोअच्छा होने की कोशिश में लगा हूं। पूजा करताप्रार्थना करताध्यान करतासाधु —सत्संग में जाता—आदमी तो मैं अच्छा हूंजरा कमजोरी हैथोड़ी— थोड़ी बुराई कभी हो जाती हैमिट जाएगी धीरे— धीरे! कभी नहीं मिटेगी। क्योंकि यह अच्छाई तुम्हारी बुराई को छिपाने का उपाय भर है। यह साधु—सत्संगतुम्हारे भीतर जो क्रोध पड़ा हैउसके लिए आडू है। ये अच्छी— अच्छी बातें और ये अच्छी— अच्छी कल्पनाएं कि कभी तो संत हो जाऊंगाबुद्ध बनने से कोई भी मुझे रोक नहीं सकता—यह अहंकार अब बड़ी अच्छी आडू ले रहा हैबड़े सुंदर पर्दे में छिप रहा है—बुद्ध होने का पर्दा!
अगर मन को तुम ठीक से देखोगे तो जनक की बात का महत्व समझ में आएगा। स्वीकार है!
यह भी स्वाभाविक हैवह भी स्वाभाविक है। जो इस घड़ी हो रहा हैउससे अन्यथा मैं नहीं होना चाहता। इस बात की क्रांति को समझेजो इस क्षण हो रहा हैवही मैं हूं. क्रोध तो क्रोधलोभ तो लोभकाम तो काम। इस क्षण मैं जो हूं वही मैं हूंऔर इससे अन्यथा की मैं कोई मांग नहीं करता और न अन्यथा का कोई आवरण खड़ा करता हूं।
अक्सर अच्छे— अच्छे आदर्शों के पीछे तुम अपने जीवन के घाव छिपा लेते हो। हिंसकअहिंसक बनने की कोशिश में लगे रहते हैं। कभी बनते नहींबन सकते नहीं। क्योंकि अहिंसक बनने का एक ही उपाय है—और वह है : .हिंसा को परिपूर्ण रूप से स्वीकार कर लेना। क्रोधी करुणा की चेष्टा करते रहते हैं—कभी नहीं बन सकते। हो सकता है ऊपर—ऊपर आवरण ओढ़ लेंपाखंड रच लेंलेकिन बन नहीं सकते। कामी ब्रह्मचर्य की चेष्टा में लगे रहते हैं। जितना कामी पुरुष होगा उतना ही ब्रह्मचर्य में आकर्षित होता है। क्योंकि ब्रह्मचर्य के आदर्श में ही छिपा सकता है अपनी कामवासना की कुरूपता कोऔर तो कोई उपाय नहीं। आज तो गलत हैकल अच्छा हो जाऊंगा—इस आशा में ही तो आज को जी सकता हैनहीं तो आज ही जीना मुश्किल हो जाएगा।
मैं तुमसे कहता हूं : कल है ही नहींतुम जो आज होवही तुम हो। इसको समग्र— भावेनइसको परिपूर्णता से अंगीकार कर लेते ही तुम्हारे जीवन से द्वंद्व विसर्जित हो जाता है। तुम जो हो होअन्यथा हो नहीं सकतेद्वंद्व कहांचुनाव कहां?जैसे तुम होवैसे हो। यही तुम्हारा होना है। प्रभु ने तुम्हें ऐसा ही चाहा है। इस घड़ी प्रभु को तुम्हारे भीतर ऐसी ही घटना घटाने की आकांक्षा है। इस घड़ी समस्त जीवन तुम्हें ऐसा ही देखना चाहता हैऐसे ही आदमी की जरूरत है। तुम्हारे भीतर यही विधि हैयही भाग्य है।
'मुझ अंतहीन महासमुद्र में विश्व—रूपी नाव अपनी प्रकृत वायु से इधर—उधर डोलती है। '
कभी क्रोध बन जातीकभी करुणा बन जातीकभी कामकभी ब्रह्मचर्यकभी लोभकभी दान—इधर—उधरइतस्तत:! मुझे लेकिन असहिष्णुता नहीं है। मैं इससे अन्यथा चाहता नहीं। इसलिए मुझे कुछ करने को नहीं बचा है। गया कृत्य। अब तो मैं बैठ कर देखता हूं कि लहर कैसी उठती है। भ्रमति स्वांतवातेन.।
भटक रही अपनी ही हवा से। न कहीं जानानहीं मुझे कुछ होना। कोई आदर्श नहीं हैकोई लक्ष्य नहीं है। अब तो मैं बैठ गया। अब तो मैं मौज से देखता हूं। सब असहिष्णुता खो गई।
जब तुम कहते हो मैं क्रोधी हूं और मुझे अक्रोधी होना है—तो इसका अर्थ समझेतुम क्रोध के कारण बहुत असहिष्णु हो रहे हो। तुम क्रोध को धैर्य के साथ स्वीकार नहीं कर रहे। तुम बड़े अधैर्य में हो। तुम कहते हो, 'क्रोध और मैं! मुझ जैसा पवित्र पुरुष और क्रोध करे —नहींयह बात जंचती नहीं। मुझे क्रोध से छुटकारा चाहिए! मुझे मुक्त होना है! मैं उपाय करूंगायम—नियम साधूंगाआसन—व्यायाम करूंगाधारणा — ध्यान करूंगामुझे लेकिन क्रोध से मुक्त होना है!तुमने अधैर्य बता दिया। तुमने कह दिया कि जो हैतुम उसके साथ राजी नहींतुम कुछ और चाहते हो। बस वहीं से तुम अशांत होने शुरू हुए।
असहिष्णुता अशांति का बीज है।
जनक कह रहे हैं. ये लहरें हैं। कभी—कभी क्रोध आताकभी—कभी काम आताकभी—कभी
लोभ आता। इतस्तत:! यहां—वहां! स्वांतवातेन! भटकता सब कुछ! पर मैं तो देखता हूं। अब मुझे कुछ लेना—देना नहीं। अब मेरा कोई भी आग्रह नहीं है कि ऐसा हो जाऊं। मैं जैसा हूं, बस प्रसन्न हूं। आदर्श —मुक्ति में सहिष्णुता है। और मैं किसे संन्यासी कहता हूंउसी व्यक्ति को संन्यासी कहता हूं जिसने आदर्शों का त्याग कर दिया। अब तुम जरा चौकोगे। तुमने सदा यही सुना है कि जिसने संसार का त्याग कर दिया वही संन्यासी। मैं तुमसे कहता हूं. जिसने आदर्शों का त्याग कर दियावह संन्यासी। क्योंकि आदर्श के त्याग के बाद असहिष्णु होने का कोई उपाय नहीं रह जाता।
तुम जरा करके तो देखो। एक महीना सही। एक महीनातुम जो हैउसे स्वीकार कर लो। किसी ने कुछ कहाऔर तुम क्रोधित हो गए—स्वीकार कर लो। स्वीकार करने का मतलब यह नहीं कि तुम सिद्ध करो कि मेरा क्रोध ठीक है। तुम इतना ही स्वीकार कर लो कि मैं आदमी क्रोधी हूं। और दूसरे से कहना कि भई क्रोधी से दोस्ती बनाईतो कांटे तो चुभेंगे। मैं आदमी क्रोधी हूं। गलती तुम्हारी है कि मुझसे दोस्ती बनाईकि मुझसे पहचान की। अब अगर मेरे साथ रहोगे तो क्रोध कभी—कभी होने वाला है। मैं तुम्हें यह भी वचन नहीं देता कि कल मैं अक्रोधी हो जाऊंगा। कल का किसको पता है! जहां तक मैं जानता हूं अतीत में कभी भी अक्रोधी नहीं रहाइसलिए बहुत संभावना तो यही है कि कल भी क्रोधी रहूंगा। तुम सोच लो। मैं पश्चात्ताप भी नहीं कर सकताक्योंकि पश्चात्ताप बहुत बार कर चुकाउससे कुछ हल नहीं होतावह धोखा सिद्ध होता है। क्रोध कर लेता हूं?पछता लेता हूं फिर क्रोध करता हूं। पश्चात्ताप का क्या सार हैतुमसे इतना ही कहता हूं कि अब पश्चात्ताप की लीपापोती भी न करूंगा।
पश्चात्ताप का मतलब होता है. लीपापोती। तुम किसी से क्रोधित हो गएफिर घर लौट कर आएतुमने सोचा. 'यह भी क्या हुआबीच बाजार में भद्द करवा लीलोग क्या सोचेंगे! अब तक सज्जन समझे जाते थे। लोग कहते थे कि बड़े गुरु—गंभीर! आज सब उथलापन सिद्ध हो गया। लोग सोचते थे स्वर्ण—पात्रअल्युमीनियम के सिद्ध हुएजरा में एकदम गरमा गए। अब कुछ करोप्रतिमा खंडित हो गईऔंधे मुंह पड़ी है! उठाओसिंहासन पर फिर बिठाओ। फिर तुम गए सोच—विचार कर कहाक्षमा करना भाई! मैं करना नहीं चाहता थाहो गया!
सोचते होक्या लोग कहते हैंलोग कहते हैं—मैं करना नहीं चाहता थाहो गया! मेरे बावजूद हो गया। न—मालूम कैसे हो गया! कौन शैतान मेरे सिर चढ़ गया।
सुनते हो लोगों की बातेंअब खुद शैतान हैंयह स्वीकार न करने का उपाय कर रहे हैं। 'कौन शैतान मेरे सिर चढ़ गया। कैसी दुर्बुद्धिलेकिन होश आयापछताने आया हूं, क्षमा करना। '
तुम कर क्या रहे होतुम यह कर रहे हो कि वह जो प्रतिमा तुम्हारी बीच बाजार में खंडित हो गईवह जो गिर पड़ी जमीन परउसे तुम उठा रहे हो। तुम कह रहे हो कि मैं बुरा आदमी नहीं हूं। भूल—चूक हो गई। भूल—चूक किससे नहीं हो जाती! आदमी भूल—चूक करता ही है।
तुम्हें अपने आदमी होने की याद ही तब आती है जब तुम भूल—चूक करते हो। तब तुम कहते हो. टू इर्र इज झूमन। भूल—चूक करना तो आदमी है। और तुम्हें आदमी होने की याद नहीं आतीक्षमा मांग कर या उसके चरण छू कर. वह भी सोचता है कि नहींआदमी तो अच्छा है। वह भी क्यों सोचता है कि आदमी अच्छा हैक्रोध करके तुमने उसके अहंकार को चोट पहुंचा दी थीतो वह नाराज था। अब तुमने उसके पैर छू लिएफूल चढ़ा आएगुलदस्ता भेंट कर आए। वह भी सोचता है कि आदमी तो अच्छा है। वह क्यों सोचता हैतुमसे उसे भी कुछ लेना—देना नहीं। न तुम्हें उससे कुछ लेना—देना है। वह सोचता है आदमी अच्छा हैक्योंकि अब तुमने उसके अहंकार पर फूल रख दिए। घड़ी भर पहले चांटा मार आए थे तो वह तमतमा गया थाबदला लेने की सोच रहा थाअदालत में जाने की सोच रहा था। तुम फूल रख आएझंझट बची। अदालत भी बची। प्रतिष्ठा तुम्हें मिली। उसका अहंकार भी प्रतिष्ठित हो गयातुम्हारा भी प्रतिष्ठित हो गया। संसार फिर वैसा ही चल पड़ा जैसा तुम्हारे चांटा मारने के पहले चल रहा था। फिर जगह पर आ गईं चीजें। फिर वहीं के वहीं खड़े हो गए जहां थे।
नहींजिस व्यक्ति को वस्तुत: समझना होवह जाएगा—पश्चात्ताप करने नहींस्वीकार करने। वह जाएगा कहने कि भाई देख लियाआदमी मैं कैसा हूंतुम्हारी धारणा मेरे प्रति गलत थी। तुम जो सोचते थे कि मैं आदमी अच्छा हूं वह गलत धारणा थी। मेरा असली आदमी प्रगट हो गया। और अच्छा हुआ कि प्रगट हो गया। अब तुम सोच लो, .आगे मुझसे संबंध रखना कि नहीं रखना। मैं कोई भरोसा नहीं देता कि कल ऐसा फिर न होगा। मैं भरोसे—योग्य नहीं हूं। मैं भरोसा दूं भी तो भरोसा रखना मतक्योंकि मैंने पहले लोगों को भरोसे दिए और धोखा दिया। मैं आदमी बुरा हूं। शैतानियत मेरा स्वभाव है।
सोचते हो तुम इसका क्या परिणाम होगादूसरे पर क्या होगावह दूसरा जानेलेकिन तुम्हारे भीतर एक सरलता आ जाएगी। तुम एकदम सरल हो जाओगे। तुम एकदम विनम्र हो जाओगे। यह पश्चात्ताप नहीं हैयह स्वीकार— भाव है। तुमने सब चीजें साफ कर दीं अपने बाबतकि तुम आदमी कैसे हो। और तुमने अपने बाबत कोई भ्रम नहीं संजोया है। और तब एक क्रांति घटित होती है। वह क्रांति घटती है स्वीकार के इस महासत्य सेइस महासूत्र से। तुम अचानक पाते हो कि धीरे— धीरे क्रोध मुश्किल हो गयाअब क्रोध करने का कारण क्या रहाक्रोध तो इसलिए हो जाता था कि कोई तुम्हारे अहंकार को गिराने की कोशिश कर रहा थातो क्रोध हो जाता था। अब तो तुमने खुद ही वह प्रतिमा गिरा दी। तुम तो उसे खुद ही कचरे —घर में फेंक आए। अब तो कोई तुम्हें क्रोधित कर नहीं सकता। ध्यान रखनाहमारा मन सदा होता है जिम्मेवारी दूसरे पर छोड़ दें। हम सब यही करते हैं। हजार—हजार उपाय से हम यही काम करते हैं कि हम दूसरे पर जिम्मेवारी छोड़ देते हैं।
एक आदमी को मैं जानता हूं—महाक्रोधी। उससे मैंने पूछाइतना क्रोध कैसे हो गया हैउसने कहाक्या करूंमेरा बाप बड़ा क्रोधी था। उसकी वजह सेबचपन से ही कुसंस्कार पड़ गए।
मगर यह आदमी जो कह रहा हैहंसना मत। फ्रायड भी यही कह रहा है। बड़े से बड़े मनोवैज्ञानिक भी यही कह रहे हैं। सारा उपाय यह चलता है कि किसी पर हटा दो जिम्मेवारी। पुराने धर्म भी यही कहते थे। अगर तुम पूरी मनुष्य—जाति का इतिहास देखो तो अष्टावक्र या जनक जैसी बात को कहने वाले इने—गिनेउंगलियों पर गिने जा सकेंइतने लोग मिलेंगेबाकी सब लोग तो कुछ और कह रहे हैं।
ईसाइयत कहती है कि परमात्मा ने अदम को और हब्बा को स्वर्ग के बगीचे से बाहर खदेड़ दियाक्योंकि उन्होंने आज्ञा का उल्लंघन किया था। जब परमात्मा आया और उसने अदम से पूछा कि 'तूने क्यों खाया इस वृक्ष का फलतुझे मना किया गया था। उसने कहा, 'मैं क्या करूंयह हब्बाइसने मुझे फुसलाया। देखते हैंशुरू हो गई कहानी! उसने अपनी जिम्मेवारी हब्बा पर फेंक दी। यह इस पत्नी को देखिएअब मैं पति ही हूं, और पति की तो आप जानते ही हैं हालतें! अब पत्नी कहे और पति न माने तो झंझट। अब अगर पति को पत्नी और परमात्मा में चुनना हो तो इसको ही चुनना पड़ेगा। मानाआपकी आशा मुझे मालूम हैमगर इसकी आशा भी तो देखिए! यह फल ले आई और कहने लगी चखोतो मुझे खाना पड़ा।
तो परमात्मा ने हब्बा से पूछा कि तुझे भी पता थाफिर तू क्यों फल लाईउसने कहामैं क्या करूंवह शैतान सांप बन कर मुझसे कहने लगा। सांप कहने लगा मुझसे कि खाओ इसका फल। उसने मुझे काफी उत्तेजित किया। उसने कहाइस फल को खाने से तुम मनुष्य नहींपरमात्म—रूप हो जाओगे। परमात्मा स्वयं इसका फल खाता है और तुम्हें कहता हैमत खाओ। जरा धोखा तो देखो! यह ज्ञान का फलइसी को खाकर परमात्मा ज्ञानी है और तुमको अज्ञानी रखना चाहता है। तो साधारण स्त्री हूं फुसला लिया उसने।
स्त्री का सदा से यही कहना रहा है कि दूसरों ने फुसला लिया। हर पति जानता है कि पत्नी कहती है कि हम तुम्हारे पीछे न पड़े थे। तुम्हीं हमारे पीछे पड़े थेतुम्हीं ने फुसला लिया और यह झंझट खड़ी कर दी।
…….मैं क्या करूंसांप ने फुसला लिया!
अगर सांप भी बोल सकता होतातो किसी और पर टाल देता। हो सकता थावृक्ष पर ही टाल देता कि यह वृक्ष ही विज्ञापन करता है कि जो मेरे फल को खाएगा वह ज्ञान को उपलब्ध हो जाएगा। लेकिन सांप बोल नहीं सकता थाउसने शायद सुना भी न होगा कि मामला क्या चल रहा है। आदमी— आदमी के बीच की बात थीवह चुपचाप रहाइसलिए कहानी वहा पूरी हो गईनहीं तो कहानी पूरी हो नहीं सकती थी।
मार्क्स कहता हैसमाज जिम्मेवार है। अगर तुम बुरे हो तो इसलिए बुरे होक्योंकि समाज बुरा है। यह कुछ फर्क न हुआ। यह वही पुरानी चाल हैनाम बदल गया।
हिंदू कहते हैंविधिभाग्यविधाता ने ऐसा लिख दियातुम क्या करोगेछोड़ो किसी पर! विधाता लिख गया है! जब पैदा हुए थे तो माथे पर लिख गया कि ऐसा—ऐसा होगातुम क्रोधी बनोगेकामी बनोगेकि साधुकि संतकि क्या तुम्हारी जिंदगी में होगा—स्ब लिखा हुआ है। सब तो पहले से तय किया हुआ हैहमारे हाथ में क्या हैतो वही करवा रहा हैसो हो रहा है।
फ्रायड कहता है कि बचपन में मां —बाप ने जो संस्कार डालेतुम्हारे मन पर जो संस्कारित हो गयाउसका ही परिणाम है।
लेकिन ये सब तरकीबें हैं एक बात से बचने की कि यह मेरा स्वभाव हैयह जो भी हो रहा है मेरा स्वभाव है। इस महंत सत्य से बचने की सब तरकीबें हैंईजादें हैंआविष्कार हैं कि कैसे हम टाल दें। और मैं उसी को हिम्मतवर कहता हूं वही है साहसीजो जनक की भांति कह दे कि अपनी ही प्रकृत वायु से इधर—उधर डोलती लहरें हैं।
भ्रमति स्वांतवातेन!
मन असहिष्णुता न अस्ति
मुझे कोई असहिष्णुता नहीं है। मैं इसमें कुछ फर्क नहीं करना चाहतागुरुदेव! अष्टावक्र से उन्होंने कहाजो हैहैमैं राजी हूं। मेरे राजीपन में जरा भी ना—नुच नहीं है।
इससे महाक्रांति का उदय होता है। इस सत्य को जिस दिन तुम देख पाओगेतुम पाओगे बिना कुछ किए सब हो जाता है।
'मुझ अंतहीन महासमुद्र में जगतरूपी लहर स्वभाव से उदय होचाहे मिटे..। '
सुनो!
'मुझ अंतहीन महासमुद्र में जगतरूपी लहरस्वभाव से उदय हो चाहे मिटेमेरी न वृद्धि है और न हानि है।'
न यहां कुछ खोतान यहां कुछ कमाया जाता। फिर क्या फिक्रन तो क्रोध में कुछ खोता है और न करुणा में कुछ कमाया जाता है। बड़ी अदभुत बात है! यह सब सपना है।
मयि अनंत महाम्भोधौ जगद्वीचि स्वभावत:।
स्वभाविक रूप से उठ रही हैं जगत की लहरें। छोटी—बड़ीअनेक— अनेक रूपअच्छी—बुरीशोरगुल उपद्रव करतीशांत—स्ब तरह की लहरें उठ रही हैं।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न न क्षति:।
न तो वृद्धि होतीन क्षति होती। कुछ भी मेरा तो कुछ आता—जाता नहीं।
रात तुमने सपना देखाचोर हो गए कि साधु हो गए—सुबह उठ कर तो दोनों सपने बराबर हो जाते हैं। सुबह तुम यह तो नहीं कहते कि रात हम साधु हो गए थे सपने में। तो तुम कुछ गौरव तो अनुभव नहीं करते। और न सुबह तुम कोई अगौरव और ग्लानि अनुभव करते हो कि चोर हो गए थे कि हत्यारे हो गए थे—सपना तो सपना है। सपना तो टूटा कि गया।
तो जनक कहते हैं कि ये चाहे बनें चाहे मिटें! आप मुझसे कहते हैं कि जगत से मुक्त हो जाऊंआप बात क्या कर रहे हैंयह जो हो रहा हैहोता रहेगाहोता रहा हैहोता रहेमुझे लेना—देना क्या हैन तो ऐसा करने से मुझे कुछ लाभ होतान वैसा करने से मुझे कुछ हानि होती है। यहां चुनाव करने को ही कुछ नहीं है। यहां लाभ—हानि बराबर है।
हानि न लाभ कछु! यहां कुछ है ही नहीं हानि—लाभतुम नाहक ही खाते—बही फैलाए और लिख रहे हो बड़ी हानि—लाभ के—इसमें लाभ हैइसमें हानि हैयह करें तो लाभयह करें तो हानि।
जनक कहते हैंजो हो रहा हैहो रहा है। मैं तो सिर्फ देख रहा हूं।
जगद्वीचि स्वभावत: उदेतु वा अस्तम्।
मेरे किए परिवर्तन होने वाला भी नहीं है। क्योंकि स्वभाव में कैसे परिवर्तन होगापतझर आती हैपत्ते गिर जाते हैं। वसंत आता हैफिर नई कोंपलें उग आती हैं। जवानी होती हैवासना उठती है। बुढ़ापा आता हैवासना क्षीण हो जाती है। मेरे किए हो भी नहीं रहा है। मैं कर्ता नहीं हूं। तो छोड़ना कैसाभागना कैसात्याग करना कैसा?
अष्टावक्र ने एक जाल फैलाया है परीक्षा के लिए और उससे कहा कि तू त्याग करयह सब छोड़ दे! जब तुझे ज्ञान हो गयातू कहता है कि तुझे ज्ञान हो गया तो अब तू सब त्याग कर दे। अब यह शरीर मेरायह धन मेरायह राज्य मेरायह सब तू छोड़ दे।
जनक कहते हैंमेरे छोड़ने सेपकड़ने से संबंध ही कहां हैयह मेरा है ही नहीं जो मैं छोड़ दूं। मैंने इसे कभी पकड़ा भी नहीं है जो मैं इसे छोड़ दूं। यह अपने से हुआ हैअपने से खो जाएगा।
स्वभावत: उदेतु वा अस्तम्
मे न वृद्धि: च न क्षति।
मैं तो इतना ही देख पा रहा हूं कि न तो इसके होने से मुझे कुछ लाभ हैन इसके न—होने से मुझे कुछ लाभ है।
यह बड़ी अदभुत बात है। यही परम संन्यास है। बैठे दुकान पर तो बैठे। हो रही दुकानतो चल रही हैतो चले! बंद हो जाए तो बंद हो जाए! जब दीवाला निकल गया तो प्रसन्नता से बाहर आ गए! जब तक चलती रहीचलती रही! करोगे क्या?चलती थी तो साथ थेनहीं चलती तो रुक गए। इस भांति जो ले लेवैसा व्यक्ति कभी अशांत हो सकता हैवैसा व्यक्ति कभी उद्विग्न हो सकता हैवैसे व्यक्ति के जीवन में कभी तनाव हो सकता हैउसकी विश्रांति आ गई। बचपन था तो बचपन के खेल थेजवानी आई तो जवानी के खेल हैंबुढ़ापा आया तो बुढ़ापे के खेल हैं। बच्चे खेल— खिलौनों से खेलते हैंजवान,व्यक्तियों से खेलने लगतेकेसिद्धातो  से खेलने लगते हैं।
बचपन में कामवासना का कोई पता नहीं है। तुम समझाना भी चाहो बच्चे कोतो समझा नहीं सकते कि कामवासना क्या है। कोई अभी उठी नहीं तरंग। अभी स्वभाव वासनामय नहीं हुआ। अभी स्वभाव ने वासना की तरंग नहीं उठाई। फिर जवान हो गया आदमीउठीं वासना की तरंगें। फिर तुम लाख समझाओ।
मुल्ला नसरुद्दीन मरता था। अपने बेटे को उसने पास बुलाया और कहने लगा कि कहने को तो बहुत कुछ हैलेकिन कहूंगा नहीं। बेटे ने पूछाक्योंउसने कहा कि मेरे बाप ने भी मुझसे कहा था लेकिन मैंने सुना कहां! कहने को तो बहुत कुछ हैकहूंगा नहीं। पर बेटा कहने लगाआप कह तो देंमैं सुनूं या न सुनूं। उसने कहा कि फिर देखमेरे बाप ने भी मुझसे कहा था कि स्त्रियों के चक्कर में मत पड़नामगर मैं पड़ा। और एक के चक्कर में नहीं पड़ाइस्लाम जितनी आज्ञा देता हैनौ स्त्रियां पूरे नौ विवाह किएऔर भोगा! खूब नरक सहा। तुझसे भी मैं कहना चाहता हूं, लेकिन कहना नहीं चाहता। क्योंकि मैं जानता हूं तू भी पड़ेगा। मेरे कहने से कुछ होगा नहीं। बाप मेरा मरा था तो कह गया था शराब मत पीनापर मैंने पीखूब पी,और सड़ा। और तू भी सडेगाक्योंकि जो मैं नहीं कर पायामेरा बेटा कर पाएगा—यह भी मुझे भरोसा नहीं है। इतनी ही याद रखना कि इतना मैंने तुझसे कहा था कि कहने से कोई सुनता नहींअनुभव से ही कोई सुनता है। तो एक बार भूल करेकर लेनाखूब अनुभव कर लेना उसकालेकिन दुबारा वही भूल मत करना। और अगर तू मुझे मौका दे—वह कहने लगा—तो इतना कहना चाहता हूं स्त्रियों की झंझट में तू पड़ेगालेकिन एक समय में एक ही स्त्री की झंझट में पड़ना। अगर इतना भी संयम साध सके तो काफी है।
आदमी के भीतर कुछ होता है जो स्वाभाविक है। जवान होता आदमी तो वासना उठेगी। के सोचते हैं कि उन्हें कोई बड़ी भारी संपदा मिल गईक्योंकि अब उनमें वासना के प्रति वैसा राग नहीं रहाया उनमें अब वैराग्य उठ रहा है। यह बुढ़ापे का खेल है वैराग्य। राग जवानी का खेल हैवैराग्य बुढ़ापे का खेल है। जैसे राग स्वाभाविक है एक खास उम्र मेंएक खास उम्र में वैराग्य स्वाभाविक है।
इसलिए हिंदुओं ने तो ठीक कोटि ही बांट दी थी कि पच्चीस साल तक विद्याअर्जनब्रह्मचर्यफिर पचास साल तक भोगगृहस्थ—जीवनफिर पचहत्तर तक वानप्रस्थ जीवन—सोचनासोचना की अब संन्यास लेनाअब संन्यास लेना। वानप्रस्थ यानी सोचनाकि जाना जंगलजाना जंगलजाना—करना नहीं। थोड़े गए गांव के बाहर तकफिर लौट आए—ऐसे बीच में उलझे रहना। फिर पचहत्तर के बाद संन्यास—अगर मौत इसके पहले न आ जाए तो! अक्सर तो मौत इसके पहले आ जाएगी और तुम्हें संन्यासी होने की झंझट नहीं पड़ेगी। अगर मौत न आ जाए इसके पहलेतो संन्यास। पचहत्तर के बाद हिंदुओं ने संन्यास रखा। हिंदुओं की सोचने की पद्धति बड़ी वैज्ञानिक है। क्योंकि पचहत्तर के बाद संन्यास वैसा ही स्वाभाविक हैजैसे जवान आदमी में वासना उठतीतरंगें उठतीमहत्वाकांक्षा उठती—धन कमा लूं पद—प्रतिष्ठा कर लूं। ठीक एक ऐसी घड़ी आती हैजब जीवन— ऊर्जा रिक्त हो जाती हैझुक जाती हैतुम थक चुके होते—तब वैराग्य उठने लगता। थकान वैराग्य ले आती है।
यह पद्धति हिंदुओं की साफ वैज्ञानिक है और इसीलिए बुद्ध और महावीर दोनों ने इस पद्धति के खिलाफ बगावत की। उन्होंने कहा कि जो वैराग्य पचहत्तर के बाद उठतावह कोई वैराग्य हैवह तो यंत्रवत है। वह तो उठता ही है। वह तो मौत करीब आने लगीउसकी छाया है। वह कोई वैराग्य हैवैराग्य तो वह है जो भरी जवानी उठता है।
बुद्ध और महावीर ने जो क्रांति कीउस क्रांति का भी तर्क यही है। वे कहते हैंमान लियातुम्हारा हिसाब तो ठीक है,लेकिन जो पचहत्तर साल के बाद संन्यास उठेगावह कोई उठाइस फर्क को समझना।
जैन या बौद्धउनकी संस्कृति श्रमण संस्कृति कहलाती है—श्रम वहां मूल्यवान हैपुरुषार्थ! वहां विधिभाग्यस्वभाव—इन सबकी कोई व्यवस्था नहीं है। वहां तो तुम्हारा संकल्प और श्रम! इसलिए स्वभावत: उन्होंने जवानी में संन्यास को डालने की चेष्टा कीक्योंकि जवान आदमी श्रम करेगा —तो संन्यासी हो सकेगासंकल्प से जूझेगासंघर्ष करेगातो संन्यासी हो सकेगा। इसलिए तुम जैन संन्यासी को जितना अहंकारी पाओगे उतना हिंदू संन्यासी को न पाओगे। और मुसलमान संन्यासी को तो तुम बिलकुल ही अहंकारी न पाओगे। क्योंकि उसने कुछ छोड़ा ही नहीं हैसिर्फ समझा हैकर्ता का कोई भाव ही नहीं है।
जैन संन्यासी बहुत अहंकारी होगाक्योंकि उसने बहुत कुछ किया है। भरी जवानी में या बचपन में सब छोड़ दिया है—धनद्वारघरवासनामहत्वाकांक्षा! उठ तो रही हैं भीतर तरंगेंवह उन्हें दबाए बैठा है। तो वह जितना उनको दबाता है उतना ही वह चाहता है सम्मान मिलेक्योंकि वह काम तो बड़ा मेहनत का कर रहा हैकठिन काम कर रहा है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक दफ्तर में नौकरी की दरखास्त दी थी। और जब वह इंटरव्यू देने गया तो उस दफ्तर के मालिक ने पूछा कि तुम्हें टाइपिंग आती हैतुमने टाइपिस्ट के लिए दरखास्त दी?
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहानहींआती तो नहीं। तो उसने कहाहद हो गई। जब टाइपिंग नहीं आती है तो दरखास्त क्यों दीऔर फिर न केवल इतनाहद हो गईतुमने इसमें तनख्वाह दुगनी
मांगी है!
मुल्ला ने कहाइसलिए तो मांगी दुगनीकि उतर टाइपिंग आती तो आधे से ही कर देते काम। आती तो है नहींमेहनत बहुत पड़ेगी। मेहनत का तो सोचो!
तो जवानी में जो संन्यासी हो जाएतो वह आदमी बहुत अहंकार की प्रतिष्ठा मांगेगा। वह कहता हैजरा देखो भी तो,जवान हूं अभी और संन्यास लिया हूं! जीवन की धार के विपरीत बहा हूं। गंगोत्री की तरफ तैर रहा हूं, जरा देखो तो!
हिंदू का संन्यास तो है गंगा के साथगंगासागर की तरफ तैरना। और जैन का संन्यास है गंगोत्री की तरफ तैरनाधार के उल्टे। तो वह आग्रह मांगता है कि कुछ मुझे प्रतिष्ठा मिलनी चाहिएनहीं तो किसलिए मेहनत करूंतो बजाओ तालियां,शोभा—यात्रा निकालोचारों तरफ बैड—बाजे करो! जैन मुनि आएं गांव मेंतो बड़ा शोरगुल मचाते हैं। हिंदू संन्यासी आता हैचला जाता हैऐसा कुछ खास पता नहीं चलता। मुसलमान फकीर का तो बिलकुल पता नहीं चलता। क्योंकि उसने तो कुछ छोड़ा नहीं है बाहर से। हो सकता है उसकी पत्नी होदूकान हो। सूफी तो कुछ भी नहीं छोड़ते। सूफियों को तो पहचानना तक मुश्किल है।
जब एक गुरु किसी दूसरे सूफी के पास अपने शिष्य को सीखने भेजता हैतो ही पता चलता है कि वह दूसरा गुरु है,नहीं तो पता ही नहीं चल सकता था। क्योंकि हो सकता हैदरी बुनने का काम कर रहा होजिंदगी भर से दरी बना कर बेच रहा हो। या जूता बना रहा हो और जिंदगी भर से जूते बना रहा हो।
गुरजिएफ जब सूफी फकीरों की खोज में पूरब आया तो बड़ी मुश्किल में पड़ा। कैसे उनका पता लगे कि कौन आदमी है?क्योंकि वे कोई अलग— थलग दिखाई नहीं पड़तेजीवन में रमे हैं। तो उसने लिखा है कि बामुश्किल से सूत्र मिलने शुरू हुए। बामुश्किल से!
उसने किसी मुसलमान को पूछा कि मैं सूफी फकीरों का पता लगाना चाहता हूं। दमिश्क की गलियों में भटकता था कि कहीं खोज ले। मगर कैसे पता चलेतो उसने कहातुम एक काम करो। तुम पता न लगा सकोगे। तुम तो जा कर मस्जिद में जितनी देर बैठ सकोनमाज पढ़ सकोपढ़ो। किसी सूफी की तुम पर नजर पड़ जाएगी तो वह तुम्हें पकड़ेगा। तुम तो नहीं पकड़ पाओगे। क्योंकि शिष्य कैसे गुरु को खोजेगागुरु ही शिष्य को खोज सकता है।
यह बात जंची गुरजिएफ को। वह बैठ गया मस्जिद मेंदिन भर बैठा रहताआधी— आधी रात तक वहां बैठ कर नमाज पढ़ता रहताकिसी की तो नजर पड़ेगी—और नजर पड़ी। एक बुजुर्ग उसे गौर से देखने लगाकुछ दिन के बाद। एक दिन वह बुजुर्ग उसके पास आयाउसने कहा कि तुम मुसलमान तो नहीं मालूम होतेफिर इतनी नमाज क्यों कर रहे हो?
उसने कहा कि मैं किसी सदगुरु की तलाश में हूं और मुझे कहा गया है कि मैं तो न खोज पाऊंगा। अगर मैं यहां नमाज पढ़ता रहूं तो शायद किसी की नजर मुझ पर पड़ जाएकोई बुजुर्गवार। आपकी अगर नजर मुझ पर पड़ गई और अगर आप पाते हों कि मैं इस योग्य हूं कि किसी सूफी के पास मुझे भेज देंतो मुझे बता दें।
उसने कहा कि तुम आज रात बारह बजे फलां—फलां जगह आ जाओ। वह जब वहां पहुंचा तो
चकित हुआ। जिससे उसे मिलाया गयावह होटल चलाता थाचाय इत्यादि बेचता थाचायघर चलाता था। और उस चायघर में तो गुरजिएफ कई दफे चाय पी आया था। न केवल यहीउस चाय वाले से पूछ चुका था कई बार कि अगर कोई सूफी का पता हो तो मुझे पता दे दो। तो वह चाय वाला हंसता था कि भई धर्म में मुझे कोई रुचि नहींतो मुझे तो कुछ पता नहीं।
वही आदमी गुरजिएफ के लिए गुरु सिद्ध हुआ। उसने गुरजिएफ से कहा कि बस अब तेरा वर्ष दो वर्ष तक तो यही काम है कि कप—प्याले साफ कर। कप—प्याले साफ करवाते—करवाते ध्यान की पहली सुध उस गुरु ने देनी शुरू की।
एक अमरीकन यात्री ढाका पहुंचा। किसी ने खबर दी कि वहा एक सूफी फकीर है—जो पहुंच गया है आखिरी अवस्था में;फना की अवस्था में पहुंच गया हैजहां मिट जाता है आदमी। तुम उसे पा लो तो कुछ मिल जाए।
तो वह ढाका पहुंचा। उसने जा कर एक टैक्सी की और उसने कहा कि मैं इस—इस हुलिया के आदमी की तलाश में आया हूं, तुम मुझे कुछ सहायता करो। उसने कहा कि जरूर सहायता करेंगेबैठो। वह इसे ले कर गयाएक छोटे —से झोपड़े के सामने गाड़ी रोकी और उसने कहा कि पांच मिनट के बाद तुम भीतर आ जाना। वह जब पाच मिनट बाद भीतर गया तो वह जो टैक्सी—ड्राइवर थावहां बैठा था और दस—पंद्रह शिष्य बैठे थे। उसने कहा कि आप ही गुरु हैं क्याउसने कहा कि मैं ही हूं और इसलिए टैक्सी—ड्राइविंग का काम करता हूं कि कभी —कभी खोजी आ जाते हैं तो उनको सीधा वहीं से पकड़ लेता हूं।
कहां खोजोगे तुमतुम खोजोगे कैसेसूफियों का तो पता भी न चलेगाक्योंकि जीवन को बड़ी सहजता से।
ये जो वक्तव्य हैंसूफियों के वक्तव्य हैं। ये जो जनक ने कहेयह सूफी मत का सार है।
'मुझ अंतहीन महासमुद्र में निश्चित ही संसार कल्पना—मात्र है। मैं अत्यंत शांत हूं निराकार हूं और इसी के आश्रय हूं। '
मम्पनंतमहाम्भोधौ विश्व नाम विकल्पना!
यह विश्व तो नाममात्र को हैकल्पना—मात्र है। यह वस्तुत: है नहीं— भासता है। यह तो हमारी धारणा है। यह तो हमारी नींद में चल रहा सपना है। हम जागे हुए नहीं हैंइसलिए जगत है। हम जाग गए तो फिर जगत नहीं।
तुम थोड़ा सोचो! जगत कैसा होगा अगर तुम्हारे भीतर कोई वासना न बचेतुम्हारे भीतर कुछ पाने की आकांक्षा न बचे। कुछ होने का पागलपन न बचेतो क्या तुम इसी जगत में रहोगे फिरतुम अचानक पाओगे कि तुम्हारा जगत तो पूरा रूपांतरित हो गया। क्योंकि जो आदमी जो खोजता है उसी के आधार पर जगत बन जाता है। ऐसा हो सकता है कि तुम जिस रास्ते से रोज गुजरते होरास्ते के किनारे ही बंबा लगा है पोस्ट ऑफिस कालेटर—बॉक्स लगा हैलाल रंग के हनुमान जी खड़े हैंमगर तुम्हारी नजर शायद कभी न पड़ेलेकिन जिस दिन तुम्हें पत्र डालना हैउस दिन अचानक तुम्हारी नजर पड़ जाएगी। उसी रास्ते से तुम रोज गुजरते थेलेकिन पत्र डालना नहीं थातो पोस्ट ऑफिस के लेटर—बॉक्स को कौन देखता हैतुम्हारी आंखें उस पर न टिकती रही होंगी। वह आंख से ओझल होता रहा होगा। था वहींलेकिन तुम्हें तब तक नहीं दिखा थाजब तक तुम्हारे भीतर कोई आकांक्षा न थीजो संबंध बना दे। आज तुम्हें चिट्ठी डालनी थीअचानक..।
उपवास करके देखो और फिर जाओ एम जी रोड पर। फिर तुम्हें कुछ और न दिखाई पड़ेगा। फिर रैस्तराहोटलकॉफी—हाउसबस इसी तरह की चीजें दिखाई पड़ेगी। और अचानक तुम्हारी नाक ऐसी प्रगाढ़ हो जाएगी कि हर तरह की सुगंधें आने लगेंगीहर तरह के आकर्षण बुलावे देने लगेंगे। तुम्हारे उपवास से तुम किसी और ही रास्ते से गुजरते हो जिससे तुम कभी नहीं गुजरे थे। कहने मात्र को एम जी. रोड है। जब तुम भरे पेट से गुजरते होतब बात और है। जब तुम कपड़े खरीदने गुजरते हो,तब बात और है।
जो पुरुष अपनी पत्नी से तृप्त है वह भी गुजरता हैतो बात और। जो अपनी पत्नी से तृप्त नहीं हैवह भी उसी रास्ते से गुजरता हैलेकिन तब रास्ता और। क्योंकि दोनों के देखने का ढंग औरदोनों की आकांक्षा और।
तुम जो चाहते होउससे तुम्हारा जगत निर्मित होता है। हम सब एक ही जगत में नहीं रहते। हम सब अपने —अपने जगत में रहते हैं। यहां जितने मनुष्य हैंजितने मन हैंउतने जगत हैं। उसी जगत की बात हो रही हैतुम खयाल रखना। नहीं तो अक्सर भ्रांति होती है। पूरब के इन मनीषियों के वचन से बड़ी भांति होती हैलोग सोचते हैं : 'जगत—कल्पना ? तो अगर हम शांत हो गए तो यह मकान समाप्त हो जाएगा 1ये वृक्ष खो जाएंगे?' तो तुम समझे नहीं। जगत का अर्थ होता है: तुम्हारे मन से जो कल्पित हैउतना खो जाएगा। जो हैवह तो रहेगा। सच तो यह है कि जो है वह पहली दफे दिखाई पड़ेगा। तुम्हारे मन के कारण वह तो दिखाई ही नहीं पड़ता था। तुम तो कुछ का कुछ देख लेते थे। तुम जो देखने के लिए आतुर थे वही तुम्हें दिखाई पड़ जाता था। तुम्हारी आतुरता बड़ी सृजनात्मक है। उसी सृजनात्मकता से सपना पैदा होताकल्पना पैदा होती।
मम्पनन्तमहाम्भोधौ विश्व नाम विकल्पना!
तुम्हारा विश्व तुम्हारी कल्पना है। तुम्हारे पड़ोसी का विश्व जरूरी नहीं कि तुम्हारा ही विश्व हो। दो व्यक्ति एक ही जगह बैठ सकते हैं—और दो अलग दुनियाओं में।
एक सिनेमाघर में मुल्ला नसरुद्दीन और उसकी पत्नी लगभग आधा समय तक आपस में ही बातें करते रहे। उनके पास बैठे दर्शकों को यह बड़ा बुरा लग रहा था। एक दर्शक नें—मुल्ला नसरुद्दीन के पीछे जो बैठा था—कहा, 'क्या तोते की तरह टायं—टायं लगा रखी हैकभी चुप ही नहीं होते। इस पर मुल्ला बिगड़ गया। उसने कहाक्या आप हमारे बारे में कह रहे हैंउस दर्शक ने कहाजी नहीं आपको कहां २ फिल्म वालों को कह रहा हूं। शुरू से ही बकवास किए जा रहे हैंआपकी दिलकश बातों का एक शब्द भी नहीं सुनने दिया।
अब यह हो सकता है दो आदमी पीछे बैठे हों फिल्म—गृह मेंऔर पति—पत्नी आपस में बातें कर रहे हों तो एक हो सकता है परेशान हो कि फिल्म चल रही है वह सुनाई नहीं पड़ रही इनकी बकवास सेऔर दूसरा हो सकता है परेशान हो कि बड़ी गजब की बातें हो रही हैं इन दोनों कीयह फिल्म बंद हो जाए तो जरा सुन लें क्या हो रहा हैदोनों पास बैठे हो सकते हैं और दोनों के देखने के ढंग अलग हो सकते हैं।
हमारा देखने का ढंग हमारी दृष्टि हैहमारी सृष्टि है। दृष्टि से सृष्टि बनती है। जब तुम्हारी कोई दृष्टि नहीं रह जाती,जब तुम्हारे भीतर जैसा है वैसे को ही देखने की सरलता रह जातीअन्यथा कुछ आरोपण करने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती,तुम्हारे भीतर का प्रोजेक्टरप्रक्षेपन—यंत्र जब बंद हो जाता हैतब तुम अचानक पाते हो. पर्दा खाली है। वह पर्दा सच है। पर्दे पर चलने वाली जो धूप—छाव से बने जो चित्र हैंवे सब तुम्हारे प्रोजेक्टरतुम्हारे प्रक्षेपन से निकलते हैं।
तो जब भी शास्त्रों में तुम कहीं यह वचन पाओ कि यह सब संसार कल्पना—मात्र हैतो तुम इस भ्रांति में मत पड़ना कि शास्त्र यह कह रहे हैं कि अगर तुम्हारा जागरण होगासमाधि लगेगी तो सारा संसार तत्‍क्षण स्‍वप्‍नवत खो जाएगा। इतना ही कह रहे हैं तुम्हारा संसार तत्‍क्षण खो जाएगा।
यह संसार तुम्हारा नहीं। यह तो तुम आए उसके पहले भी थातुम चले जाओगे उसके बाद भी रहेगा। ये वृक्षये पक्षी,यह आकाश.। तुम्हारा नहीं है इनसे कुछ लेना—देना। तुम सोओ तो हैतुम जागो तो है। तुम ध्यानस्थ हो जाओतो हैतुम वासनाग्रस्त रहोतो है। यह तो नहीं मिटेगा। लेकिन इस संसार को पर्दा मान कर तुमने एक कल्पनाओं का जाल बुन रखा है। तुम जरा इस जाल को पहचानने की कोशिश करनातुम किस भांति रोज इस जाल को बुने जाते हो! और यह जाल तुम्हें परिचित नहीं होने देता उससेजो है।
'मुझ अंतहीन महासमुद्र में निश्चित ही संसार कल्पना—मात्र है। मैं अत्यंत शांत हूं निराकार हूं और इसी के आश्रय हूं। '
अतिशातो निराकार एतदेवाहमास्थित:।
यह समझ कर कि ये सारी कल्पनाएं हैं—मुझमें ही उठती हैं और लीन हो जाती हैंये सब मेरी ही तरंगें हैं—मैं बिलकुल शांत हो गया हूं, मैं निराकार हो गया हूं। और अब तो यही मेरा एकमात्र आश्रय है। अब छोड़ने को कुछ बचा नहीं हैसिर्फ मैं ही बचा हूं।
'आत्मा विषयों में नहीं है और विषय उस अनंत निरंजन आत्मा में नहीं हैं। इस प्रकार मैं अनासक्त हूं स्पृहा—मुक्त हूं और इसी के आश्रय हूं। '
नात्मा भावेगु नो भावस्तत्रानन्ते निरंजने।
न तो विषय मुझमें हैं और न मैं विषयों में हूं। सब सतह पर उठी तरंगों का खेल है। सागर की गहराई उन तरंगों को छूती ही नहीं।
तुम सागर के ऊपर कितनी तरंगें देखते हो! जरा गोताखोरों से पूछो कि भीतर तुम जाते होवहां तरंगें मिलतीं कि नहीं?सागर की अतल गहराई में कहं। तरंगेंसिर्फ सतह पर तरंगें हैं। उस अतल गहराई में तो सब अनासक्तशांतनिराकार है,स्पृहा—मुक्त! और वही मेरा आश्रय है। वही मेरा निजस्वरूप है। कैसा छोड़नाकैसा त्यागनाकिसको जाननाइति ज्ञानं! ऐसा जो मुझे बोध हुआ हैयही ज्ञान है।
'अहोमैं चैतन्य—मात्र हूं। संसार इंद्रजाल की भांति है। इसलिए हेय और उपादेय की कल्पना किसमें हो?'
किसे छोडूंकिसे पकडूंहेय और उपादेयलाभ और हानिअच्छा और बुराशुभ और अशुभ—अब ये सब कल्पनाएं व्यर्थ हैं। जो हो रहा हैस्वभाव से हो रहा है। जो हो रहा हैसभी
ठीक है। इसमें न कुछ चुनने को हैन कुछ छोड़ने को है।
कृष्णमूर्ति जिसे बार—बार च्चायसलेस अवेयरनेस कहते हैंजनक उसी सत्य की घोषणा कर रहे हैं चुनावरहित बोध!
अहो अहम् चिन्मात्रम्!
बस केवल चैतन्य हूं मैं! बस केवल साक्षी हूं!
जगत इंद्रजालोपमम्!
और जगत तो ऐसा है जैसा जादू का खेल हैइंद्रजाल। सब ऊपर—ऊपर भासताऔर है नहींप्रतीत होताऔर है नहीं।
अत: मन हेयोपादेय कल्पना कथम् च कुत्र
तो मैं कैसे कल्पना करूं कि कौन ठीककौन गलत?
अब यह सब कल्पना ही छोड़ दी। इति ज्ञानं! यही ज्ञान है। यही जागरण है। यही बोध है।
भोग एक तरह की कल्पना हैत्याग दूसरे तरह की कल्पना है। भोग से बचे तो त्याग में गिरे—तो ऐसे ही जैसे कोई चलता खाई और कुएं के बीचकुएं से बचे तो खाई में गिरे। बीच में है मार्ग। न तो त्यागी बनना हैन भोगी बनना है। अगर तुम त्याग और भोग से बच सकोअगर तुम दोनों के पार हो सकोअगर तुम दोनों के साक्षी बन सकोतो संन्यस्ततो संन्यास का जन्म हुआ।
संसारी संन्यासी नहीं हैत्यागी भी सन्यासी नहीं है। दोनों ने चुनाव किया है। भोगी ने चुनाव किया है कि भोगेंगेऔर— और भोगेंगेऔर भोग चाहिएतो ही सुख होगा। त्यागी ने चुनाव किया है कि त्यागेंगेखूब त्यागेंगेतो सुख होगा। संन्यासी वही हैजो कहता है. सुख है। इति सुखम्! होगा नहीं। न कुछ पकड़ना है न कुछ छोड़ना है—अपने में हो जाना है। वहीं अपने में होने में सुख और ज्ञान है।
अन्यथातुम पीड़ाएं बदल ले सकते हो। तुम एक कंधे का बोझ दूसरे कंधे पर रख ले सकते हो। तुम एक नरक से दूसरे नरक में प्रवेश कर सकते होलेकिन अंतर न पड़ेगा।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी मुल्ला से कह रही थी. हमने फरीदा के लिए जो लड़का पसंद किया हैवह वैसे तो बहुत ठीक हैदो ही बातों  की भूल—चूक है। एक तो यह उसकी दूसरी शादी हैपहली पत्नी तो मर गई है। विधुर है। मगर यह कोई बड़ी बात नहींपत्नी ने कहा। अभी जवान है। मगर जो बात अखरती हैवह यह है कि सब ठीक है—खिलता हुआ रंगऊंचा कदतंदरुस्तनाक—नक्‍शा भी अच्छा—पर एक ऐब खटकता है।
मुल्ला ने पूछावह क्या?
पत्नी ने कहालगता है तुमने ध्यान नहीं दिया। जब वह हंसता है तो उसके लंबे—लंबे दांत बाहर आ जाते हैं और वह कुरूप लगने लगता है।
मुल्ला ने कहाअजी छोड़ो भी! फरीदा से विवाह तो होने दोफिर उसे हंसने का मौका ही कहां मिलेगा?
अभी एक पत्नी मरी है उनकीअब वे फरीदा के चक्कर में पड़ रहे हैं।
हम ज्यादा देर बिना उलझनों के नहीं रह सकते। एक उलझन छूट जाती है तो लगता है खाली—खाली हो गए। जल्दी हम दूसरी उलझन निर्मित करते हैं। आदमी उलझनों में व्यस्त रहता है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैंगैर—शादीशुदा लोग ज्यादा पागल होते हैंबजाए शादीशुदा लोगों के। यह बड़ी हैरानी की बात है। जब मैंने पहली दफा पढ़ा तो मैं भी सोचने लगा कि मामला क्या है! होना तो उल्टा चाहिए कि शादीशुदा लोग पागल होंयह समझ में आ सकता हैज्यादा पागल होंयह भी समझ में आ सकता है। सारी दुनिया से आंकड़े इकट्ठे किए गए हैंउनसे पता चलता है कि गैर— शादीशुदा लोग ज्यादा आत्महत्या करते हैंबजाए शादीशुदा लोगों के। यह तो जरा कुछ भरोसे योग्य नहीं मालूम होता। लेकिन फिर खोजबीन करने से मनोवैज्ञानिकों को पता चला कि कारण यह है कि गैर—शादीशुदा आदमी को उलझनें नहीं होतीं। पागल न हो तो करे क्याफुर्सत ही फुर्सत! शादीशुदा आदमी को फुर्सत कहां पागल होने की! इतनी व्यस्तता है!
एक मनोवैज्ञानिक खोजबीन कर रहा था कि किस तरह के लोग सर्वाधिक सुखी होते हैं। और वह बड़े अजीब निष्कर्ष पर पहुंचा। वे ही लोग सर्वाधिक सुखी मालूम होते हैं जिनको इतनी भी फुर्सत नहीं कि सोच सकें कि हम सुखी हैं कि दुखी। इतनी फुर्सत मिली कि दुख शुरू हुआ।
तुम राजनीतिज्ञों को बड़ा सुखी पाओगेबड़े प्रफुल्लता से भरे हुएगजरे इत्यादि पहने हुएभागे चले जा रहे हैं। और कारण कुल इतना ही है कि उनको इतना भी समय नहीं है कि वे बैठ कर एक दफा सोच लेंपुनर्विचार करें कि हम सुखी हैं कि दुखीइतना समय कहां! बंधे कोल्ह के बैलों की तरहभागे चले जाते हैं दिल्ली चलो! फुर्सत कहां है कि इधर—उधर देखें! और धक्कम— धुक्कीं इतनी है कि कोई टल खींच रहाकोई आगे खींच रहाकोई पीछे खींच रहाकोई एक हाथ पकड़ेकोई दूसरा,कुछ समझ में नहीं आता है कि हो क्या रहा है! लेकिन भागे चले जाते हैं। आपाधापी में फुरसत नहीं मिलती।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जो लोग व्यस्त रहते हैं सदावे कम पागल होते हैंकम आत्महत्या करते हैं। उन्हें याद ही नहीं रह जाती कि वे हैं भी। उन्हें पता ही भूल जाता है अपना—सारा जीवनसारी ऊर्जा व्यर्थ कामों में इतनी संलग्न हो जाती है।
इसीलिए कभी—कभी थोड़े —बहुत दिनों के लिए चुप हो कर स्वात में बैठ जाना शुभ है। वहां तुम्हें पता चलेगा कि अव्यस्त होने में तुम कितने बेचैन होने लगते हो! खालीपन कैसा काटता है!
लोग मुझसे पूछते हैं कि लोग दुख को क्यों पसंद करते हैंक्यों चुनते हैंलोग दुख को पसंद कर लेते हैं खालीपन के चुनाव में। खालीपन से तो लोग सोचते हैं दुख ही बेहंतर है। कम से कम सिरदर्द तो हैसिर में कुछ तो है। उलझनें हैं तो कुछ तो उपाय हैकुछ करने की सुविधा तो है। लेकिन कुछ भी नहीं है तो।
और जो आदमी खाली होने को राजी नहींवह कभी स्वयं तक पहुंच नहीं पाता। क्योंकि स्वयं तक पहुंचने का रास्ता खाली होने से जाता हैरिक्तशून्यता से जाता है। वही तो ध्यान है। या कोई और नाम दो। वही समाधि है।
जब तुम थोड़ी देर के लिए सब व्यस्तता छोड़ कर बैठ जाते होकिनारे परनदी की धार से हट करनदी बहतीतुम देखतेतुम कुछ भी करते नहीं—उन्हीं क्षणों में धीरे — धीरे साक्षी जागेगा। लेकिन साक्षी के जागने से पहले शून्य के रेगिस्तान से गुजरना पड़ेगा। वह मूल्य हैजिसने चुकाने की हिम्मत न कीवह कभी साक्षी न हो पाएगा।
थोड़ा दूर होना जरूरी है। हम चीजों में इतने ज्यादा खड़े हैं कि हमें दिखाई ही नहीं पड़ता कि हम चीजों से अलग हैं। थोड़ा—सा फासलाथोड़ा स्थानथोड़ा अवकाश कि हम देख सकें कि हम कौन हैंजगत क्या हैक्या हो रहा है हमारे जीवन काथोड़े— थोड़े खाली अंतराल तुम्हें आत्मबोध के लिए कारण बन सकते हैं। उन्हीं—उन्हीं अंतरालों में तुम्हें थोड़ी— थोड़ी झलक मिलेगी : 'अहोमैं चैतन्य—मात्र हूं!व्यस्तता में तो तुम्हें कभी पता न चलेगा। व्यस्तता का तो मतलब है. वस्तुओं से उलझे,और से उलझेअन्य से उलझे। जब तुम अव्यस्त होते होअनआकुपाइडजब तुम किसी से भी नहीं उलझे—तब तुम्हें अपनी याद आनी शुरू होती हैस्वयं का स्मरण होता है।
'अहोमैं चैतन्य—मात्र हूं। संसार इंद्रजाल की भांति है। '
और तब तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारी सारी व्यस्तता बचपनाखेल है। धन कमा रहे होधन के ढेर लगा रहे हों—क्या मिलेगाबड़े से बड़े पद पर पहुंच जाओगे—क्या पाओगेसफल आदमियों से असफल आदमी तुम कहीं और खोज सकते होजो सफल हुआ वह मुश्किल में पड़ा। सफल हो कर पता चलता है. अरेयह तो जीवन हाथ से गयाऔर हाथ तो कुछ भी न लगा।
कहते हैं सिकंदर जब भारत आया और पोरस पर उसने विजय पा लीतो एक कमरे में चला गयाएक तंबू में चला गयाऔर रोने लगा। उसके सिपहसालारउसके सैनानी बड़े चिंतित हो गए। उन्होंने कभी सिकंदर को रोते नहीं देखा था। उसे कैसे व्यवधान देंकैसे बाधा डालें—यह भी समझ में नहीं आता था। फिर किसी एक को हिम्मत करके भेजा। उसने भीतर जा कर सिकंदर को पूछा आप रो क्यों रहे हैंऔर विजय के क्षण में! अगर हार गए होते तो समझ में आता था कि आप रो रहे हैं। विजय के क्षण में रो रहे हैंमामला क्या हैपोरस रोएसमझ में आता है। सिकंदर रोएयह तो घड़ी उत्सव की है। '
सिकंदर ने कहाइसीलिए तो रो रहा हूं। अब दुनिया में मुझे जीतने को कुछ भी न बचा। अब दुनिया में मुझे जीतने को कुछ भी न बचाअब मैं क्या करूंगा?
शायद पोरस न भी रोया होकोई कहानी नहीं पोरस के रोने की। क्योंकि पोरस को तो अभी बहुत कुछ बचा हैकम से कम सिकंदर को हराना तो बचा हैअभी इसके तो उसको दात खट्टे करने हैं। मगर सिकंदर के लिए कुछ भी नहीं बचा है। वह थर्रा गया। सारी व्यस्तता एकदम समाप्त हो गई। आ गया शिखर पर! अब कहांअब इस शिखर से ऊपर जाने की कोई भी सीढ़ी नहीं है। अब क्या होगायह घबड़ाहट सभी सफल आदमियों को होती है। धन कमा लियापद पा लियाप्रतिष्ठा मिल गईलेकिन इतना करते —करते सारा जीवन हाथ से बह गया। एक दिन अचानक सफल तो हो गएऔर एक साथ ही उसी क्षण मेंपूरी तरह विफल भी हो गए। अब क्या होराख लगती है हाथ। व्यस्त आदमी आखिर में राख का ढेर रह जाताअंगार तो बिलकुल ढक जाती या बुझ जाती है।
थोड़े— थोड़े अव्यस्त क्षण खोजते रहना। कभी—कभी थोड़ा समय निकाल लेना अपने में डूबने का। भूल जाना संसार को। भूल जाना संसार की तरंगों को। थोडे गहरे में अपनी प्रशांति मेंअपनी गहराई में थोड़ी डुबकी लेना। तो तुम्हें भी समझ में आएगा—तभी समझ में आएगा—किस बात को जनक कहते हैं : इति ज्ञान! यही ज्ञान है।
'अहोमैं चैतन्य—मात्र हूं! संसार इंद्रजाल की भांति है। इसलिए हेय और उपादेय की कल्पना किसमें हो?'
अब मुझे न तो कुछ हेय हैन कुछ उपादेय है। न तो कुछ हानिन कुछ लाभ। न तो कुछ पाने —योग्यन कुछ डर कि कुछ छूट जाएगा। मैं तो सिर्फ चैतन्यमात्र हूं। अहो!
यही तो मुक्ति है।
जब तक तुम कर्मों में उलझे हो तब तक तुममें भेद है। जैसे ही तुम साक्षी बनेसब भेद मिटे। अपने— अपने कर्मों का फल
भोग रहा है हर कोई
सूरज तो इक—सा ही चमके
नाथों और अनाथों पर।
अपने— अपने कर्मों का फल
भोग रहा है हर कोई।
तुम अपने कर्मों से बंधे हो और फल भोग रहे हो।
सूरज तो इक—सा ही चमके
नाथों और अनाथों पर।
सूरज तो सब पर एक—सा चमक रहा है। परमात्मा तो सब पर एक—सा बरस रहा है। लेकिन तुमने अपने— अपने कर्मों के पात्र बना रखे हैं। कोई का छोटा पात्रकिसी का बड़ा पात्र। किसी का गंदा पात्रकिसी का सुंदर पात्र। परमात्मा एक—सा बरस रहा है। किसी का पाप से भरा पात्रकिसी का पुण्य से भरा पात्रलेकिन सभी पात्र सीमित होते हैं—पापी का भीपुण्यात्मा का भी। तुम जरा पात्र को हटाओकर्म को भूलोकर्ता को विस्मरण करो—साक्षी को देखो! साक्षी को देखते ही तुम पाओगे. तुम अनंत सागर होपरमात्मा अनंत रूप से तुममें बरस रहा है।
अहो अहम् चिन्मात्रम्!
तुम तब पाओगेजैसा कि जनक ने बार—बार पीछे कहा कि ऐसा मन होता है कि अपने ही चरण छू लूं। ऐसा धन्यभाग,ऐसा प्रसाद कि अपने को ही नमस्कार करने का मन होता है!
दामने—दिल पे नहीं बारिशे—इल्हाम अभी
इश्क नापुख्ता अभी जच्चे दरूखाम अभी।
दिलरूपी दामन पर अगर दैवी वर्षा नहीं हो रही है तो इतना ही समझना कि प्रेम अभी कच्चा और भीतर की भावना अपरिपक्य।
दामने —दिल पे नहीं बारिशे—इल्हाम अभी!
अगर प्रभु का प्रसाद नहीं बरस रहा है तो यह मत समझना कि प्रभु का प्रसाद नहीं बरस रहा हैइतना ही समझना. इश्क नापुख्ता अभी! अभी तुम्हारा प्रेम कच्चा। जज्वे—दरूखाम अभी। और अभी तुम्हारी भीतर की चैतन्य की दशा परिपक्व नहीं। अन्यथा परमात्मा तो बरस ही रहा है—पात्र परअपात्र परपुण्यात्मा परपापी पर।
सूरज तो इक—सा ही चमके
नाथों और अनाथों पर।
अब दो विधियां हैं इस परम अवस्था को खोजने की। एक तो है कि कर्मों को बदलोबुरे कर्मों को अच्छा करोअशुभ को शुभ से बदलोपाप को हटाओपुण्य को लाओ—वह बड़ी लंबी विधि हैऔर शायद कभी सफल नहीं हो सकती। क्योंकि वे तो इतने अनंत जन्मों के कर्म हैंउनको तुम बदल भी न पाओगे। वह तो धोखा है। वह तो पोस्टपोन करने की तरकीब है। वह तो मिथ्या है। फिर दूसरी विधि है—या कहना चाहिए वस्तुत: तो एक ही विधि है—यह दूसरी विधि कि तुम सारे कर्मों के पीछे खड़े हो कर साक्षी हो जाओ। तो तुम अभी हो सकते हो। इसी क्षण हो सकते हो।
अष्टावक्र की महागीता का मौलिक सार इतना ही है कि तुम यदि चाहो तो अभी किनारे पर निकल जाओ और बैठ जाओ। अभी साक्षी हो जाओ! और जब तक तुमने कर्मों को बदलने की कोशिश कीतब तक तो तुम नई—नई उलझनें खड़ी करते रहोगे। क्योंकि हर पाप के साथ थोड़ा पुण्य हैहर पुण्य के साथ थोड़ा पाप है। तुम ऐसा कोई पुण्य कर ही नहीं सकते जिसमें पाप न जुड़ा हो। सोचोकौन—सा पुण्य करोगे जिसमें पाप न जुड़ा होअगर धन दान दोगे तो धन कमाओगे तो! दान दोगे कहां सेपहले कमाने में पाप कर लोगेतो दान दोगे। यह तो बात बेमानी हो गई। मंदिर बनाओगे तो किन्हीं झोपड़ों को मिटाओगे तभी मंदिर बना पाओगे। किसी को चूसोगेतभी मंदिर खड़ा हो सकेगा। यह तो बात व्यर्थ हो गई। यह तो पुण्य के साथ पाप चल जाएगा। तुम अच्छा कुछ भी करोगे तो थोड़ा न बहुत बुरा साथ में होता ही रहेगा। बुरा भी जब तुम करते होकुछ न कुछ अच्छा होताहै। तभी तो बुरा आदमी करता हैनहीं तो वह भी क्यों करेगा?
एक चोर हैवह चोरी कर लाता हैक्योंकि वह कहता है कि उसका बच्चा बीमार है और दवा चाहिए। बच्चे को दवा तो मिलनी चाहिए। चोरी से मिलती है तो चोरी सेलेकिन बच्चे को दवा तो देनी ही पड़ेगी। जीवन मूल्यवान है। तुम्हारे धन—संपत्ति के नियम इतने मूल्यवान नहीं हैं।
परम रासायनिक नागार्जुन के जीवन में उल्लेख है। वह दार्शनिक भी थाविचारक भी था। अपूर्व दार्शनिक था! शायद भारत में वैसा कोई दूसरा दार्शनिक नहीं हुआ। शंकराचार्य भी नंबर दो मालूम पड़ते हैं नागार्जुन से। और ऐसा लगता है शंकर ने जो भी कहाउसमें नागार्जुन की छाप है। नागार्जुन ने बड़ी अनूठी बातें कहीं हैं। और वह रसायनविद था। उसे दो सहयोगियों की जरूरत थीजो रसायन की प्रक्रिया में उसका साथ दे सकें। तो उसने बड़ी खोज की। दो रसायनविद आए। वह उनकी परीक्षा लेना चाहता था। तो उसने कुछ रासायनिक द्रव्य दिए दोनों को और कहा कि कल तुम इसका मिश्रण बना कर ले आना। अगर तुम सफल हो गए मिश्रण बनाने मेंतो जो भी सफल हो जाएगा वह चुन लिया जाएगा।
वे दोनों चले गए। दूसरे दिन एक तो मिश्रण बना कर आ गया और दूसरा रासायनिक द्रव्य वैसे के वैसे ले कर आ गया। नागार्जुन ने उस दूसरे से पूछा कि तुमने बनाया नहींउसने कहा कि मैं गयारास्ते पर एक भिखारी मर रहा थामैं उसकी सेवा में लग गया। चौबीस घंटे उसको बचाने में लग गएमुझे समय ही नहीं मिला। और यह जो प्रक्रिया है इसमें कम से कम चौबीस घंटे चाहिए। इसलिए मुझे क्षमा करें। मैं जानता हूं कि मैं अस्वीकृत हो गयालेकिन कुछ और उपाय न था। भिखारी मर रहा थामुझे चौबीस घंटे उसकी सेवा करनी पड़ी। वह बच गयामैं खुश हूं। मुझे जो आपकी सेवा का मौका मिलता थावह नहीं मिलेगालेकिन मैं प्रसन्न हूं। मेरी कोई शिकायत नहीं।
और नागार्जुन ने इसी आदमी को चुन लिया। और नागार्जुन के और दूसरे सहयोगी थेवे कहने लगे कि यह आप क्या कर रहे हैंजो आदमी रसायन बना कर ले आया हैउसको नहीं चुन रहेनागार्जुन ने कहाजीवन का मूल्य रसायन से ज्यादा है। यह रसायन—वसायन तो ठीक है मगर जीवन का मूल्य...। इस आदमी के पास पकड़ है। यह जानता है कि कौन—सी चीज ज्यादा मूल्यवान है—बसयही तो रहस्य है। सार और असार में इसे भेद है।
अब एक आदमी का बच्चा मर रहा हैवह तुम्हारी फिक्र करे कि चोरी नहीं करनी चाहिएवह चिंता करे इस बात की?व्यक्तिगत संपत्ति को समादर देवह फिक्र नहीं करता। वह कहता हैचोरी हो जाएचाहे मैं जेल चला जाऊंबच्चे को बचाना है।
तो पाप में भी कहीं तो थोड़ा पुण्य है। दो आदमी अगर साथ—साथ चोरी भी करते हैं तो कम से कम एक—दूसरे को तो दगा नहीं देते। उतनी तो ईमानदारी है। वे भी मानते हैंआनेस्टी इज द बेस्ट पालिसी। आपस में तो कम से कम। किसी और के साथ न मानते होंलेकिन ईमानदारी एक—दूसरे के साथ बरतते हैं। उतना तो पुण्य है।
तुम ऐसा कोई पाप का कृत्य नहीं खोज सकते जिसमें पुण्य न हो।
एक चोर पकड़ा गयातो मैजिस्ट्रेट बड़ा हैरान था। उसने कहा कि हमने सुना कि तुम नौ दफे रात में इस दुकान में घुसे!
उसने कहाऔर क्या करूं हुजूरअकेला आदमीपूरी दुकान ढोनी थी!
तो मैजिस्ट्रेट ने कहा कि तो कोई संगी—साथी नहींउसने कहा कि जमाना बड़ा खराब है। संगी—साथी किसको बनाओ?जिसको बनाओ वही धोखा दे जाता है।
चोर भी कहता है कि जमाना खराब है और आप तो जानते ही हैं। संगी—साथी किसको बनाओचोरी भी करनी हो तो भी जमाना अच्छा होना चाहिए। किसी को धोखा देना हो तो भी। उस आदमी में इतनीजिसको तुम्हें धोखा देना हैइतनी भलमनसाहंत तो होनी चाहिए कि भरोसा करे। पाप और पुण्य गुंथे पड़े हैं। साथ—साथ जुड़े हैं। न तो तुम पुण्य कर सकते हो बिना पाप किएन तुम पाप कर सकते हो बिना पुण्य किए।
सुख न सहचरीलुटेरा भी हुआ करता है,
खुशी में गम का बसेरा भी हुआ करता है।
अपनी किस्मत की स्याही को कोसने वालो,
चांद के साथ अंधेरा भी हुआ करता है।
वे सब जुड़े हैं। इसलिए अगर तुम एक से बचना चाहोगे तो तुम ज्यादा से ज्यादा दूसरे को छिपा सकते होलेकिन दूसरे से भाग नहीं सकते।
पाप—पुण्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सिक्का जाएगा तो पूरा जाएगाआधा नहीं बचाया जा सकता। एक पहलू नहीं बचाया जा सकता।
इसलिए अष्टावक्र और जनक के संवाद के बीच जो क्रांतिकारी सूत्र घटित हो रहा हैवह साक्षी का है। तुम्हें न तो पाप छोड़ना हैन पुण्य छोड़ना है। न तुम्हें पाप पकड़ना हैन पुण्य पकड़ना है।








तुम्हें पकड़ना—छोड़ना छोड़ना है। न पकड़ो न छोड़ो। तुम दोनों से दूर हट कर खड़े हो जाओदेखने वाले बनोद्रष्टा बनो,साक्षी बनो!
अहो अहम् चिन्मात्रम् जगत इंद्रजालोपमम्।
अत: मन हेयोपादेय कल्पना कथम् च कुत्र
इसलिए जनक ने कहामुझे तो कल्पना भी नहीं उठती कि कौन ठीककौन गलत। अब तो सब ठीक या सब गलत। मैं जाल के बाहर खड़ाचिन्मात्र! चिन्मयरूप! केवल चैतन्य! केवल साक्षी! आप किससे कह रहे हैं त्याग की बातवे कहने लगे। आप किससे कह रहे हैं कि मैं ज्ञान को उपलब्ध होऊंइति ज्ञानं!

हरि ओंम तत्सत्!

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