मंगलवार, 15 अगस्त 2017

अष्‍टावक्र: महागीता-भाग-2 - प्रवचन--11

दिनांक: 6 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
      पहला प्रश्न :

भारतीय मनीषा ने आत्मज्ञानी को सर्वतंत्र स्वतंत्र कहा है। और आप उस कोटिहीन कोटि में हैं। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि उस परम स्वतंत्रता से इतना सुंदर अनुशासन और गहन दायित्व कैसे फलित होता है!

सा प्रश्न स्वाभाविक है। क्योंकि साधारणत: तो मनुष्य अथक चेष्टा करके भी जीवन में अनुशासन नहीं ला पाता। सतत अभ्यास के बावजूद भी दायित्व आंनदपूर्ण नहीं हो पाता। दायित्व में भीतर कहीं पीड़ा बनी रहती है। जो भी हमें कर्तव्य जैसा मालूम पड़ता हैउसमें ही बंधन दिखाई पड़ता है। और जहां बंधन हैवहां प्रतिरोध है। और जहां बंधन हैवहां से मुक्त होने की आकांक्षा है।

कर्तव्य या दायित्वहमें लगते हैंऊपर से थोपे गए हैं। समाज नेसंस्कृति नेपरिवार नेया स्वयं की सुरक्षा की कामना ने हमें कर्तव्यों से बंध जाने के लिए मजबूर किया है—पर मजबूरी है वहांविवशता हैअसहाय अवस्था है।
और जहां भी मजबूरी है, वहां प्रसन्नता और. प्रफुल्लता नहीं हो सकती। जब भी हमें स्वतंत्र होने का अवसर मिलता है, तो हम तत्‍क्षण स्वच्छंद हो जाते हैं। हम इतनी परतंत्रता में जीए हैं कि हमें अगर स्वतंत्र होने का मौका मिले तो हम सब दायित्व को छोड़ कर, सब कर्तव्य को फेंक कर अराजक स्थिति में पहुंच जाएंगे।
इससे स्वभावत: यह प्रश्न उठता है कि क्या यह संभव है कि सर्वतंत्र स्वतंत्र व्यक्तिजिसके ऊपर न कोई शासन हैन कोई नियम हैं—यही संन्यासी की परिभाषा हैसर्वतंत्र स्वतंत्रजिस पर समाज और संस्कृति का कोई आरोपण नहीं हैजो सब मर्यादाओं के बाहर है—लेकिन वैसा व्यक्ति मर्यादाओं में कैसे जीता होगा?
हम अपनी तरफ से सोचते हैं तो लगता हैयह तो असंभव है। हम तो मर्यादा छोड़ी कि स्वच्छंद हुए। तो संन्यासी सारी मर्यादाओं के पार जा कर भी अनुशासनबद्ध होता हैएक अपूर्व दायित्व— बंधन की भांति नहींसुगंध की भांति—उससे उठता रहता है। उसकी अंतर्ज्योति उसे कहीं भी भटकने नहीं देती। उसकी अंतर्ज्योति उसकी परम मर्यादा बन जाती है। वह सब मर्यादाओं से तो ऊपर उठ जाता हैलेकिन उसका आत्मबोध उसका अनुशासन बन जाता है।
प्रश्न उठना हमें स्वाभाविक है।
मैंने सुना हैमुल्ला नसरुद्दीन ने अपने कुत्ते से एक दिन कहा कि अब ऐसे न चलेगातू कालेज में भरती हो जा। पढ़े —लिखे बिना अब कुछ भी नहीं होता। अगर पढ़ लिख गया तो कुछ बन जाएगा। पढ़ोगे—लिखोगेतो होगे नवाब!
कुत्ते को भी जंचा। नवाब कौन न होना चाहेकुत्ता भी होना चाहता है! जब पढ़—लिख कर कुत्ता वापिस लौटा कालेज से,चार साल बादतो मुल्ला ने पूछाक्या—क्या सीखाउस कुत्ते ने कहा कि सुनोइतिहास में मुझे कोई रुचि नहीं आई। क्योंकि आदमियों के इतिहास में कुत्ते की क्या रुचि हो सकती है। कुत्तों की कोई बात ही नहीं आतीकुत्ते ने कहा। बड़े—बड़े कुत्ते हो चुके हैंजैसे तुम्हारे सिकंदर और हिटलरऐसे हमारे भी बड़े—बड़े कुत्ते हो चुके हैं लेकिन हमारे इतिहास का कोई उल्लेख नहीं। इतिहास में मुझे कुछ रस न आया। जिसमें मेरा और मेरी जाति का उल्लेख न होउसमें मुझे क्या रसभूगोल में मेरी थोड़ी उत्सुकता थी—उतनी ही जितनी कि कुत्तों की होती हैहो सकती है।... पोस्ट आफिस का बबा या बिजली का खंभाक्योंकि वे हमारे शौचालय हैंइससे ज्यादा भूगोल में मुझे कुछ रस नहीं आया।
मुल्ला थोड़ा हैरान होने लगा। उसने कहाऔर गणितकुत्ते ने कहागणित का हम क्या करेंगेगणित का हमें कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि हमें धन—संपत्ति इकट्ठी नहीं करनी है। हम तो क्षण में जीते हैं। हम तो अभी जीते हैंकल की हमें कोई फिक्र नहीं। जो बीता कल हैवह गयाजो आने वाला कल हैआया नहीं—हिसाब करना किसको हैलेना—देना क्या हैकोई खाता—बही रखना हैतो मुल्ला ने कहाचार साल सब फिजूल गएनहींउस कुत्ते ने कहासब फिजूल नहीं गए। मैं एक विदेशी भाषा में पारंगत हो कर लौटा हूं। मुल्ला खुश हुआ। उसने कहाचलो कुछ तो किया! तो चलो विदेश विभाग में नौकरी लगवा देंगे। अगर भाग्य साथ दिया तो राजदूत हो जाओगे। और अगर प्रभु की कृपा रही तो विदेश मंत्री हो जाओगे। कुछ न कुछ हो जाएगा। चलो इतना ही बहुत। मेरे सुख के लिए थोड़ी—सी वह विदेशी भाषा बोलोउदाहरण स्वरूपतो मैं समझूं।
कुत्ते ने आंखें बंद कीअपने को बिलकुल योगी की तरह साधा। बड़े अभ्यास सेबड़ी मुश्किल से एक शब्द उससे निकला।
उसने कहाम्याऊं!
'यह विदेशी भाषा सीख कर लौटे हो?'
लेकिन कुत्ते के लिए यही विदेशी भाषा है!
हर चेतना के तल की अपनी भाषा है और हर चेतना के तल की अपनी समझ है। जहां हम जीते हैंवहां हम सोच भी नहीं सकते कि सर्वतंत्र स्वतंत्र हो कर भी हम शांत होंगेसुनियोजित होंगेसृजनात्मक होंगे—हम सोच भी नहीं सकतेसोचने का उपाय भी नहीं है। हमें समझ में नहीं आ सकताक्योंकि हम कर्तव्य को प्रेम—रहित जाने हैं। हमें पता नहीं कि जब प्रेम से प्राण भरते हैं तो कर्तव्य छाया की तरह चला आता है।
एक संन्यासी हिमालय की यात्रा पर गया था। वह अपना बिस्तर—बोरिया बांधे हुए चढ़ रहा है— पसीने से लथपथदोपहर है घनीचढ़ाव है बड़ा। और तभी उसने पास में एक पहाड़ी लड़की को भी चढ़ते देखाहोगी उम्र कोई दस—बारह साल कीऔर अपने बड़े मोटे —तगड़े भाई को जो होगा कम से कम छह सात साल काउसको वह कंधे पर बिठाए चढ़ रही है—पसीने से लथपथ। उस संन्यासी ने उससे कहाबेटीबड़ा बोझ लगता होगाउस लड़की ने बड़े चौंक कर देखा और संन्यासी को कहा,स्वामी जी! बोझ आप लिए हैंयह मेरा छोटा भाई है!
तराजू पर तो छोटे भाई को भी रखो या बिस्तर को रखोकोई फर्क नहीं पड़ता—तराजू तो दोनों का बोझ बता देगा। लेकिन हृदय के तराजू पर बड़ा फर्क पड़ जाता है। छोटा भाई हैफिर बोझ कहा? फिर बोझ में भी एक रस हैफिर बोझ भी निबोंझ है।
जिस व्यक्ति को आत्म— भाव जगाजिसने स्वयं को जानाउसके लिए सारा अस्तित्व परिवार हो गयाइससे एक नाता जुड़ा। जिस दिन तुम स्वयं को जानोगेउस दिन तुम यह भी जानोगे कि तुम इस विराट से अलग और पृथक नहीं होयह तुम्हारा ही फैलाव हैया तुम इसके फैलाव होमगर दोनों एक हो। उस एकात्म बोध में तुम कैसे किसी की हानि कर सकोगे,तुम कैसे हिंसा कर सकोगेतुम कैसे किसी को दुख पहुंचा सकोगेतुम कैसे बलात्कार कर सकोगे—किसी भी आयाम मेंकिसी के भी साथतुम कैसे जबर्दस्ती कर सकोगेवह तो अपने ही पैर काटना होगा। वह तो अपनी ही आंखें फोड़ना होगा। वह तो अपने ही साथ बलात् होगा।
जिस व्यक्ति को आत्मज्ञान होताउसे यह भी ज्ञान हो जाता कि मैं और तू दो नहीं हैंएक ही हैं। उस ऐक्य बोध में दायित्व फलित होता है। लेकिन वह दायित्व तुम्हारे कर्तव्य जैसा नहीं है। तुम्हें तो करना पड़ता है।
उस सर्वतंत्र स्वतंत्र अवस्था में करने—पड़ने की तो कोई बात ही नहीं रह जाती—होता है।
संन्यासी खींच रहा था बोझ कोपरेशान थासोच रहा होगा हजार बार. 'कहीं सुविधा मिल जाए तो इस बोझ को उतार दूं हटा दूं! किस दुर्भाग्य की घड़ी में इतना बोझ ले कर चल पड़ा! पहले ही सोचा होता कि पहाड़ पर चढ़ाई हैघनी धूप है..। इन्हीं बातों को सोचता हुआ जाता होगाइन्हीं बातों के पर्दे से उसने उस छोटी—सी लड़की को भी देखा। लेकिन लड़की इस तरह का कुछ सोच ही नहीं रही थी। उनकी भाषाएं अलग थीं। उसने कहायह मेरा छोटा भाई है। आप कहते क्या हैं स्वामी जीअपने शब्द वापिस लें! बोझ! यह मेरा छोटा भाई है!
वहां एक संबंध हैएक अंतरसंबंध है। जहां अंतरसंबंध है वहां बोझ कहां! और जिस व्यक्ति का अंतरसंबंध सर्व से हो गया। वह सर्वतंत्र स्वतंत्र हो जाए लेकिन अब सर्व से जुड़ गया। तंत्र से मुक्त हुआ सर्व से जुड़ गया। तो तंत्र में तो एक ऊपरी आरोपण था। कानून कहता हैऐसा करो। नीति—नियम कहते हैंऐसा करो। न करोगे तो अदालत है। अदालत से बच गए तो नर्क है। घबड़ाहट पैदा होती है! इस भय के कारण आदमी मर्यादा में जीता है।
लेकिन जिस व्यक्ति को पता चला कि मैं इस विराट के साथ एक हूं—ये वृक्ष भी मेरे ही फैलाव हैंयह मैं ही इन वृक्षों में भी हरा हुआ हूं—तो वृक्ष की डाल को काटते वक्‍त भी तुम्हारी आंखें गीली हो आएंगीतुम संकोच से भर जाओगेतुम अपने को ही काट रहे होतुम सम्हल—सम्हल कर चलने लगोगेजैसे महावीर चलने लगे सम्हल—सम्हल कर। कहते हैंरात करवट न बदलते थे कि कहीं करवट बदलने में कोई कीड़ा—मकोड़ा पीछे आ गया होदब न जाए। तो एक ही करवट सोते थे। अब किसी ने भी ऐसा उनसे कहा नहीं थाकिसी शास्त्र में लिखा नहीं कि एक ही करवट सोना। किसी नीति—शास्त्र में लिखा नहीं कि करवट बदलने में पाप है। महावीर के पहले भी जो तेईस तीर्थंकर हो गए थे जैनों केउनमें से भी किसी ने कहा नहीं कि रात करवट मत बदलनाकिसी ने सोचा ही नहीं होगा कि करवट बदलने में कोई पाप हो सकता है। तुम्हारी करवट हैमजे से बदलोक्या अड़चन
हैलेकिन महावीर का अंतरबोध कि करवट बदलने में भी उन्हें लगा कि कुछ दब जाएकोई पीड़ा पा जाए! अंधेरे में चलते नहीं थे कि कोई पैर के नीचे दब न जाए। अंधेरे में भोजन न करते थे कि कोई पतंगा गिर न जाए।
जैन भी नहीं करता अंधेरे में भोजन—लेकिन इसलिए नहीं कि पतंगे से कुछ लेना—देना है। जैन का प्रयोजन इतना है कि पतंगा गिर गया और खा लियातो हिंसा हो जाएगीनर्क जाओगे! यह फिक्र अपनी हैयह तंत्र है। महावीर की फिक्र अपनी नहीं है पतंगे की फिक्र है। यह सर्वतंत्र स्वतंत्रता! यह सर्व के साथ एकात्म भाव!
जैन मुनि भी चलता है पिच्छी लेकररास्ता अपना साफ कर लेता है जहां बैठता है। लेकिन उसका प्रयोजन भिन्न हैवह नियम का अनुसरण कर रहा है। अगर कोई देखने वाला नहीं होता तो वह बिना ही साफ किए बैठ जाता है। अगर दस आदमी देखने वाले बैठे हैंश्रावक इकट्ठे हैंतो वह बड़ी कुशलता से प्रदर्शन करता है। यह तो तंत्र है। ये तो एक अनुशासन मान कर चल रहे हैं। इन्होंने कुछ बातें पढ़ी हैंसुनी हैंसमझी हैंपरंपरा से इन्होंने कुछ सूत्र लिए है—उन सूत्रों के पीछे चल रहे हैं। इसलिए तो तुम जैन मुनि को प्रसन्न नहीं देखते। देखो महावीर की प्रसन्नता! प्रसन्नता तो सदा स्वतंत्रता में है। और जीवन का आत्यंतिक अनुशासन भी स्वतंत्रता में है।
पूछा है, ' भारतीय मनीषा ने आत्मज्ञानी को सर्वतंत्र स्वतंत्र कहा। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि उस परम स्वतंत्रता में इतना सुंदर अनुशासन और गहन दायित्व कैसे फलित हो सकता है!'
उसके अतिरिक्त अगर फलित हो तो आश्चर्य करना। परतंत्रता में अगर सुंदर अनुशासन फलित हो जाए तो चमत्कार है। यह हो ही नहीं सकता। यह हुआ नहीं कभी। यह होगा भी नहीं कभी।
मां अपने बेटे से कहती है कि मुझे प्रेम करक्योंकि मैं तेरी मां हूं। प्रेम में भी 'क्योंकिं', 'इसलिए'! जैसे कि प्रेम भी कोई तर्कसरणी हैजैसे यह भी कोई गणित का सवाल है! 'मैं तेरी मां हूं इसलिए मुझे प्रेम कर!'
बेटा भी सोचता है कि मां है तो प्रेम करना चाहिए! प्रेमऔर करना चाहिएतुमने प्रेम को जड़ से ही काटना शुरू कर दिया। तुम उसकी संभावना ही नष्ट किए दे रहे हो। जहां 'करना चाहिएआ गयावहां से प्रेम विदा हो चुका। क्या करोगे तुम प्रेम मेंतुम अभिनय करोगेछोटा बच्चा क्या करेगामां आएगी पास तो मुस्कुराएगाजबर्दस्ती मुंह फैला देगा। भीतर हृदय से कोई मुस्कुराहट उठेगी नहीं। अब मां आ रही है—मां है तो मुस्कुराना चाहिएप्रेम दिखाना चाहिएलेकिन इसके हृदय में कहीं कोई मुस्कुराहट नहीं उठ रहीयह झूठ होना शुरू हुआ। यह पाखंड की यात्रा शुरू हुई। यह प्रेम की यात्रा नहीं हैयह बच्चा मरने लगायह पाखंडी होने लगा। फिर जिंदगी भर यह मुंह को फैला देगा।
मुंह को फैला लेना तो अभ्यास से आ जाता है। मुंह का फैला देना थोड़े ही मुस्कुराहट है! मुस्कुराहट तो वह है जो आए भीतर सेफैल जाए चेहरे पररोएं—रोएं परउठे हृदय से——तो ही मुस्कुराहट है। ऐसे ओंठ को तान लियातो अभिनय हुआ,नाटक —हुआराजनीति हुई!
देखते हो राजनीतिज्ञ कोबस हाथ जोड़े मुस्कुराता ही रहता है!
एक राजनीतिज्ञ को मैं जानता हूं। कहते हैंवे रात में भी जब सोते हैंतो हाथ जोड़े मुस्कुराते
रहते हैं। नींद में भी वोटरों के समक्ष खड़े हैंमुस्कुरा रहे हैं! जीवन सड़ा जा रहा है। प्राण में सिवाय अंधेरे के कुछ भी नहीं है;सिवाय चिंता और विक्षिप्तता के कुछ जाना नहींमगर मुस्कुराए जा रहे हैं! वह मुस्कुराहट थोथी है।
और तुमने अगर प्रेम इसलिए कियाक्योंकि मां हैक्योंकि छोटी बहन हैक्योंकि छोटा भाई है—अगर तुम्हारे प्रेम में'क्योंकिरहातो तुम समझ लेना कि तुम समझ नहीं पाए।
हम सबको तैयार किया गया है पाखंड के लिए। इसलिए तो दुनिया में प्रेम कम है और पाखंड बहुत है। इसलिए तो दुनिया में सत्य कम है और अभिनय बहुत है। इसलिए तो दुनिया में परमात्मा प्रगट नहीं हो पाताक्योंकि माया बहुत है,मायाचारी बहुत हैं।
तुम वही जीनाजो तुम्हारे भीतर से उठता हो। शुरू—शुरू में अड़चन होगीक्योंकि बहुत बार तुम पाओगे. जब हंसना था,तब तुम नहीं हंस पाएजब रोना थातब नहीं रो पाए। शुरू—शुरू में अड़चन होगी। उस अड़चन को ही मैं तपश्चर्या कहता हूं। लेकिन धीरे— धीरे तुम एक अपूर्व आनंद से भरने लगोगे। और तब तुम पाओगे कि जब तुम हंसते हो तो तभी हंसते होजब वस्तुत: हंसी खिल रही होती है। तुम धोखा नहीं देते. धीरे— धीरे तुम्हारा जीवन तंत्र से मुक्त होने लगेगा और स्वभाव के अनुकूल आने लगेगा।
तंत्र है आदत। बचपन से किसी को सिखा दिया कि हिंदू मंदिर के सामने हाथ जोड़नातो वह जोड़ लेता हैवह आदत है। न तो कोई हृदय में श्रद्धा हैन प्राणों में कोई नैवेद्य चढ़ाने की आतुरता हैन भरोसा है। गणित जरूर हैभरोसा नहीं है।
मैं ब्लैस पैसकल का जीवन पढ़ता था। बहुत बड़ा गणितज्ञ और वैज्ञानिक हुआ पैसकल। उसका एक मित्र था. दि मेयर। वह जुआरी था। कहते हैंदुनिया के खास बड़े जुआरिओं में एक था। उसने अपना सब जीवन जुए पर लगा दिया था। जुए में जब कभी कोई बड़ी कठिनाई आ जातीउसे कोई प्रश्न उठतातो वह पैसकल से पूछा करता था कि तुम इतने बड़े गणितज्ञ हो,जरा मेरे जुए में साथ दो। तो पैसकल का मित्र थाइसलिए पैसकल उसकी बात सुनता था। उसकी बात सुनते —सुनते पैसकल को यह समझ में आया.. उसने अपनी आत्मकथा में लिखा हैकि उसकी बातें सुन—सुन कर मैं ईसाई हो गया।
यह बड़े आश्चर्य की बात हैजुआरी की बातें सुन—सुन कर ईसाई! तो पैस्कल कहता हैइस तरह मैं ईसाई हुआ। उसके जुआरी के मनोविज्ञान को समझ कर मुझे समझ में आया कि धार्मिक आदमी का मनोविज्ञान भी जुआरी का है। जुआरी एक रुपया लगाता अगर जीतेगा तो पच्चीस रुपए मिलने वाले हैंअगर हारेगा सिर्फ एक ही रुपया जायेगा। यह उसका मनोविज्ञान है। हारने में कुछ खासखोता नहींअगर मिल गया तो पचीस गुना मिलता है या हजार गुना मिलता है। अगर खोया तो कुछ खास खोता नहीं। मिलता है तो बहुत मिलता है। इन दोनों के बीच जुआरी तौलता है।
तो पैसकल ने लिखा है कि मैंने भी सोचा कि यदि ईश्वर है.। आस्तिक मानता है कि ईश्वर हैअगर मरने के बाद आस्तिक ने पाया कि ईश्वर नहीं हैतो क्या खोयाथोड़ा—सा समय खोया— प्रार्थना—पूजा में लगायाजो सत्संग में गंवाया,बाइबिलकुरान उलटने में जो नष्ट हुआ— थोड़ा—सा समय खोया। अगर ईश्वर नहीं पाया तो आस्तिक इतना ही खोएगा कि थोड़ा सा समय खोया और
जब पूरी ही जिंदगी खो गई तो उस थोड़े समय से भी क्या फर्क पड़ता हैलेकिन अगर ईश्वर हुआतो शाश्वत रूप से स्वर्ग में निवास करेगाभोगेगा आनंद!
नास्तिक कहता हैईश्वर नहीं है। अगर ईश्वर न हुआ तो ठीकनास्तिक ने कुछ भी नहीं खोया। लेकिन अगर ईश्वर हुआतो अनंत काल तक नर्कों के दुख..।
इसलिए पैसकल ने लिखा कि मैं कहता हूं यह सीधा गणित है कि ईश्वर को मानो। इसमें खोने को तो कुछ भी नहीं है,मिलने की संभावना है। न मानने में कुछ मिलेगा नहीं अगर ईश्वर न हुआलेकिन अगर हुआ तो बहुत कुछ खो जाएगा।
पैसकल कहता हैअगर तुम्हें थोड़ी भी सुरक्षा और जुए का थोड़ा भी अनुभव हैतो ईश्वर सौदा करने जैसा है।
अब यह एक सरणी है। इस सरणी में ईश्वर के प्रति कोई प्रेम नहीं है। यह सीधा तर्क है। और अगर पैसकल मुझे कहीं मिल जाएतो उससे मैं कहूंगा. जो आदमी इस तरह सोच कर ईश्वर में भरोसा करता हैवह भरोसा करता ही नहीं। वह जुए में भरोसा करता हैगणित में भरोसा करता हैईश्वर में भरोसा नहीं करता। यह कोई भरोसा हुआयह कोई प्रेम की और श्रद्धा की भाषा हुईयह तो सीधी बाजार की बात हो गईयह तो दूकान की बात हो गई।
या तो ईश्वर है या ईश्वर नहीं है—'यदिका कोई सवाल नहीं। या तो तुम्हारे अनुभव में आ रहा है कि ईश्वर हैया तुम्हारे अनुभव में आ रहा है कि नहीं है। अगर तुम्हारे अनुभव में आ रहा है कि हैतो फिर चाहे लाभ हो कि हानि—ईश्वर है। अगर तुम्हारे अनुभव में आ रहा है कि नहीं हैतो फिर चाहे हानि हो कि लाभ—नहीं है। 'यदिका कहां सवाल है?
लेकिन हम अपने जीवन को 'यदियोंपर खड़ा करते हैं। हमारा सब जीवन जुआरियों जैसा है—गणितहिसाबसौदा!
सुनते होपैसकल क्या कह रहा हैकि थोड़ा—सा समय प्रार्थना में गयावही गंवाया! ऐसा आदमी प्रार्थना कर पाएगा?प्रार्थना पैदा कैसे होगीगणित सेतर्क से कहीं प्रार्थना का कोई संबंध हैप्रार्थना तो ऐसा अहोभाव है कि ईश्वर ही है और कुछ भी नहीं है। और अगर ईश्वर के मानने में सब कुछ भी जाता हो तो भी भक्त ईश्वर को मानने को राजी है। और ईश्वर को छोड़ने में अगर सब कुछ भी बचता होतो भी भक्त कहेगाक्षमा करोयह सब कुछ मुझे नहीं चाहिए।
प्रार्थना एक सत्य मनोदशा होनी चाहिएगणित नहीं। प्रेम भी एक सत्य मनोदशा होनी चाहिएगणित नहीं। और तुम्हारे सभी भाव प्रामाणिक होने चाहिए। तो धीरे— धीरे तुम पाओगेतुम स्वतंत्र भी होते जाते होसर्वतंत्र स्वतंत्र होते जाते हो और एक अपूर्व अनुशासन तुम्हारे जीवन में उतरता आता है! स्वच्छंदता नहीं आएगी तब स्वतंत्रता से। तब स्वतंत्रता से परिपूर्ण दायित्व का जन्म होगा—ऐसे दायित्व काजिसमें कर्तव्य— भाव बिलकुल नहीं हैऐसे दायित्व काजिसमें प्रेम की बहती हुई धारा है! तब तुम उठोगेबैठोगेचलोगेकुछ भी करोगे—सबके पीछे तुम्हारा बोध का दीया बना रहेगा।
भीतर का दीया जलता रहे तो फिर हम जो भी करते हैंउसमें प्रकाश पड़ता है। भीतर का दीया बुझा रहे तो हम जो भी करते हैंउसमें हमारे अंधेरे की छाया पड़ती है। सोया हुआ आदमी पुण्य भी करे तो पाप हो जाता है। जागा हुआ आदमी पाप भी करे तो भी पुण्य ही होगा। क्योंकि जागा हुआ आदमी पाप कर ही नहीं सकता। जागरण और पाप का कोई संबंध नहीं है।
तुमने देखाअंधेरे में आदमी टटोलता है कि दरवाजा कहां हैउजाले में आदमी न टटोलतान पूछता—उठता है और निकल जाता है। उजाले में आदमी सोचता भी नहीं कि दरवाजा कहां हैऐसा प्रश्न भी नहीं उठता। तुम्हें यहां से उठ कर जाना होगा तो तुम सोचोगे थोड़े हीतुम योजना थोड़े ही बनाओगे कि ऐसे चलेंऐसे चलेंफिर यहां दरवाजा खोजें—बसतुम उठोगे और चल पड़ोगे! तुम्हें दिखाई पड़ रहा है।
सर्वतंत्र स्वतंत्र व्यक्ति वही हो सकता हैजिसके भीतर प्रकाश जला है। संन्यासी को हमने सर्वतंत्र स्वतंत्र कहा है। उसे हमने कोटिहीन कोटि माना है। अष्टावक्र उसी की चर्चा कर रहे हैं—उसी परम संन्यास कीपरम दशा की—जहां न भोगीन त्यागीदोनों नियम काम नहीं करते हैंन भोग न त्यागजहां केवल साक्षी— भाव पर्याप्त है। अष्टावक्र कह रहे हैं कि साक्षी— भाव हो तो फिर तू कहीं भी रहकैसे भी रहजैसे हो वैसे रह। साक्षी— भाव है तो सब सध जाएगासब ठीक हो जाएगा। एक बात सम्हल जाए—ध्यान सम्हल जाएसाक्षी— भाव सम्हल जाए—सब अपने—आप सम्हल जाता हैशेष सब अपने— आप सम्हल जाता है। और निश्चित ही तब जो एक अनुशासन होता हैउसके सौंदर्य की महिमा अपूर्व है। तब जो अनुशासन होता है वह प्रसादरूप है। तब उसमें आरोपण जरा भी नहींचेष्टा जरा भी नहीं। तुमकुछ करना चाहिएइसलिए नहीं करते। जो होता है,होता है। जो होता हैसुंदर और शुभ है।
तुमने परिभाषा सुनी होगी। परिभाषाएं कहती हैं. अच्छे काम करने वाला पुरुष संत है। मैं तुमसे कहना चाहता हूं. 'अच्छे काम करने वाला पुरुष संत है'—इसमें तुमने बैलों को गाड़ी के पीछे रख दिया। 'संत से अच्छे काम होते हैं' —तब तुमने बैल को गाड़ी के आगे जोता। अच्छे कामों से कोई संत नहीं होतासंत होने से काम अच्छे होते हैं। ऊपर से आंचरण ठीक कर लेने से कोई भीतर अंतस की क्रांति नहीं होतीलेकिन भीतर अंतस की क्रांति हो जाएतो बाहर का आंचरण देदीप्यमान हो जाता है,दीप्ति से भर जाता हैआभा से आलोकित हो जाता है।
और जमीन— आसमान का फर्क तुम देखोगे महावीर के चलने में और जैन मुनि के चलने मेंबुद्ध के चलने में और बौद्ध भिक्षु के चलने मेंजीसस के उठने —बैठने में और ईसाई के उठने —बैठने में। हो सकता हैदोनों बिलकुल एक—सा कर रहे हों। कभी—कभी तो यह हो सकता हैअनुकरण करने वाला मूल को भी मात कर दे। क्योंकि मूल तो सहज होगास्वस्फूर्त होगा;अनुकरण करने वाला तो यंत्रवत होगा। जो अभिनय कर रहा हैवह तो रिहर्सल करकेखूब अभ्यास करके करता है। लेकिन जो स्वभाव से जी रहा हैवह तो कोई रिहर्सल नहीं करताकोई अभ्यास नहीं करता। जो उसकी अंतश्चेतना में प्रतिफलित होता है,वैसा जीता हैजब जैसा प्रतिफलित होता है वैसा जीता है।
जब जैसा स्वभाव चलाएचलना। जब जैसा स्वभाव कराएकरना! जब जैसा अंतस में उगेउससे अन्यथा न होना। यही संन्यास है। यह घोषणा बड़ी कठिन है। क्योंकि इस घोषणा का परिणाम यह होगा कि तुम्हारे चारों तरफजिनसे तुम जुड़े हो,उनको अड़चन मालूम होगी। वे तुम्हारी स्वतंत्रता नहीं चाहते हैंवे सिर्फ तुम्हारी कुशलता चाहते हैं। वे तुम्हारी आत्मा में उत्सुक नहीं हैतुम्हारी उपयोगिता में उत्सुक हैं। और उपयोगिता यंत्र की ज्यादा होती हैआदमी की कम होती है—यह खयाल रखना। यंत्र की उपयोगिता बहुत ज्यादा हैक्योंकि वह काम ही काम करता हैमांग कुछ भी नहीं करता—न स्वतंत्रता मांगतान हड़ताल करतान झंझट—झगड़े खड़ा करतान कहता हैयह ठीक हैयह ठीक नहीं है—जो आज्ञाजो हुक्म! यंत्र कहता हैबसहम तैयार हैं! दबाओ बटनबिजली जल जाती है। समाज भी चाहता है कि आदमी भी ऐसे ही हों—दबाओ बटनबिजली जल जाए।
स्वस्फूर्त व्यक्ति की बटनें नहीं होतींतुम उसकी बटन नहीं दबा सकते। कोई उपाय नहीं तुम्हेंतुम्हारे हाथ में उसकी बटन दबाने कावह अपना मालिक है। तुम अगर उसे गाली दो तो वह खड़ा हुआ सुन लेगा। तुम गाली दे कर भी उसकी क्रोध की बटन नहीं दबा सकते। तुम गाली देते रहोगेवह खड़ा सुनता रहेगावह मुस्कुरा कर चल देगा। वह कहेगा कि हमारा दिल क्रोध करने का नहीं है। हम तुम्हारे गुलाम नहीं हैं कि तुमने जब चाहा गाली दे दी और हम तुम्हारे पंजे में आ गए। हम अपने मालिक हैं! तुम्हें देना है गाली देते रहोयह तुम्हारा काम है—हम नहीं लेते। देना तुम्हारी स्वतंत्रता हैलें न लेंहमारी मालकियत है। तुमने दी—धन्यवाद! तुमने इतना समय खराब किया हम पर बड़ी कृपा! अब हम जाते अपने घरतुम अपने घर।
जो अपना मालिक हैवही स्वतंत्र है। और मालिक कौन हैजिसने स्वयं को जानावही स्वयं का मालिक हो सकता है। जो स्वयं को ही नहीं जानतावह मालिक तो कैसे होगाउस जानने सेउस बोध से जीवन में सब बदल जाता है। एक निश्चित एक मर्यादा आती है। और उस मर्यादा में जरा भी गंदगी नहीं हैकुरूपता नहीं है। उस मर्यादा से स्वतंत्रता का कोई विरोध नहीं हैवे मर्यादा के कमल स्वतंत्रता की झील में ही लगते हैं।
तुम जरा देखो! तुम जरा प्रेम से जी कर देखोध्यान से जी कर देखो! तुम्हारी पुरानी आदतें बाधा डालेंगीक्योंकि तुमने कर्तव्य के खूब जाल बना रखे हैं। तुम अपनी पत्नी को प्रेम प्रगट किए चले जाते होक्योंकि कहते हो पत्नी हैशास्त्र कहते हैं,जन्म—जन्म का साथ है। लेकिन तुमने एक दिन भी इस पत्नी को प्रेम किया हैइन शास्त्रों ने तुम्हारा जीवन नष्ट कियाऔर यह पत्नी तुमसे तृप्त नहीं हो सकी। क्योंकि प्रेम तो तुमने कभी किया नहींपत्नी को प्रेम करना चाहिएइसलिए एक नियम का अनुसरण कियाप्रेम कभी बहा नहींप्रेम कभी झरा नहींप्रेम कभी नाचा नहींगुनगुनाया नहींप्रेम में कोई गीत नहीं बने—सिर्फ एक नियम कि डाल लिए थे सात फेरेपंडित—पुजारियों ने ज्योतिष से हिसाब बांध दिया था कि यह तुम्हारी पत्नीतुम इसके पतिमां—बाप ने कुल—परिवार खोज लिया थातो अब तो करना ही पड़ेगा! पत्नी है तो प्रेम तो करना ही पड़ेगा! तुमने इस पत्नी का भी जीवन नष्ट कर दियातुमने अपना जीवन भी नष्ट कर लिया।
तुम्हारा प्रेम जब झूठा हो जाता हैतो तुम्हारे परमात्मा से जुड्ने के सब सेतु टूट जाते हैं। तुम पत्नी से न जुड़सके,पति से न जुड़ सकेतुम परमात्मा से क्या खाक जुडोगेतुम प्रेम ही न कर पाएतुम प्रार्थना कैसे करोगेप्रार्थना तो प्रेम का ही नवनीत है। वह तो प्रेम का ही सार भाग है। जीवन को स्वाभाविक रूप से जीना विद्रोह है। इसलिए मैं कहता हूं. धार्मिक जीवन विद्रोही का जीवन है। धार्मिक जीवन तपस्वी का जीवन है। और ध्यान रखनातपश्चर्या से मेरा मतलब नहीं कि तुम धूप में खड़े होशरीर को काला कर रहे हो या काटे बिछा कर लेट गए हो—ये सब मूढ़ताएं हैं। इनका तपश्चर्या से कुछ लेना—देना नहीं है। तपश्चर्या का इससे कोई संबंध नहीं कि तुम उपवास कर
रहे हो कि भूखे मर रहे हो—ये सब मूढ़ताएं हैं। होंगी विक्षिप्तताएं तुम्हारे मन कीलेकिन तपश्चर्या से इनका कोई संबंध नहीं।
तपश्चर्या तो एक ही है कि तुम भीतर से बाहर की तरफ जी रहे होफिर जो परिणाम होतुम बाहर से भीतर की तरफ नहीं जीयोगेफिर जो परिणाम होतुम जो भीतर होगाउसी को बाहर लाओगेतुम अपने बाहर को अपने भीतर के अनुसार बनाओगे।
अब देखना फर्क। साधारणत: तुम्हें धर्मगुरु समझाते हैं कि जो तुम्हारे बाहर हैवही तुम्हारे भीतर होना चाहिए। मैं तुमसे कहता हूं. जो तुम्हारे भीतर हैवही तुम्हारे बाहर होना चाहिए। और तुम यह मत समझना कि हम एक ही बात कह रहे हैं।
धर्मगुरु कहता है : जो तुम्हारे बाहर हैवही भीतर होना चाहिए। वह कहता है. तुम मुस्कुराये तो तुम्हारे हृदय में भी मुस्कुराहट होनी चाहिएअब यह बड़ी अड़चन की बात है। मैं तुमसे कहता हूं जो तुम्हारे भीतर हो वही तुम्हारे ओठों पर होना चाहिए। अगर भीतर मुस्कुराहट है तो फिक्र छोड़ोसमय— असमय की चिंता छोड़ो। अगर भीतर मुस्कुराहट है तो हंसों।
मैं छोटा था। मेरे एक शिक्षक मर गए। उनसे मुझे बड़ा लगांव था। वे बड़े प्यारे आदमी थे। काफी मोटे थे। और जैसे मोटे आदमी आमतौर से भोले— भाले लगते हैंवे भी भोले— भाले लगते थे। उन्हें हम चिढ़ाया भी करते थे—सारे विद्यार्थी उनकी खूब मजाक भी उड़ाते थे। वे बड़ा साफा—वाफा बांध कर आतेएक तो वैसे ही मोटेऔर साफा इत्यादि और डंडा वगैरह—बड़े प्राचीन मालूम होते। और चेहरे पर उनके बच्चों जैसा भोलापन थाजैसा अक्सर मोटे आदमियों के चेहरे पर हो जाता है। उन्हें देख कर ही हंसी आती। उनका नाम ही लोग भूल गए थेउनको हम सब भोलेनाथ। उससे वे चिढ़ते थे। ब्लैक बोर्ड पर उनके आते ही बड़े—बड़े अक्षरों में लिख दिया जाता— भोलेनाथ। और बसवे आते ही से गरमा जाते थे। और उनकी गर्मी देखने लायक थी! और उनकी परेशानी और उनका पीटना टेबल को विद्यार्थी बड़े शांति से आनंद लेते उनका।
वे मर गए तो मैं छोटा ही थागया वहां। वहां बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई थीछोटा गांवसभी लोग एक—दूसरे से जुड़े,सभी लोग इकट्ठे हो गए थे। और गांव— भर उनको प्रेम करता था। उनको मरा हुआ पड़ा देखकर और उनके चेहरे को देख कर मुझे एकदम हंसी आने लगी। मैंने रोकाक्योंकि यह तो अशोभन होगा। लेकिन फिर एक ऐसी घटना घटी कि मैं नहीं रोक पाया। उनकी पत्नी भीतर से आई और एकदम उनकी छाती पर गिर पड़ी और बोली 'हायमेरे भोलेनाथ!'
जिंदगी भर हम उनको भोलेनाथकह कर चिढ़ाते रहे थे। मरते वक्तमरने के बाद और पत्नी के मुंह से! यह बिलकुल कठिन हो गया तो मैं तो खिलखिला कर हंसा। मुझे घर लाया गयाडाटा—डपटा गया और कहाकभी अब किसी की मृत्यु इत्यादि होतुम जाना मत! क्योंकि वहां हंसना नहीं चाहिए था।
मैंने कहाइससे और उचितअनुकूल अवसर कहां मिलेगामेरी बात तो समझो। आदमी बेचारा मर गया और जिंदगी भर परेशान था कि लोग भोलेनाथ कह—कह कर सता रहे थे। बच्चे उनके पीछे चिल्लाते चलते थे कि भोलेनाथ। उनको स्कूल पहुंचने में घंटा भर लग जाता थाक्योंकि इस बच्चे के पीछे दौड़ेउस बच्चे के पीछे दौड़ेकिसी से झगड़ा—झंझट खड़ा हो गया—और मरते वक्त
यह खूब उपसंहार हुआ! यह इति काफी अदभुत हुई कि पत्नी उनकी छाती पर गिर कर कहती है : 'हायमेरे भोलेनाथ!'
जो भीतर हो उसे ही बाहर होने देना।
मुझे डाटा—डपटा गयालेकिन मैं यह बात मानने को राजी नहीं हुआ कि मैंने गलत किया है। और फिर मैंने कहाजीवन और मौत दोनों ही हंसने जैसे हैं। तो मेरे घर के लोगों ने कहा यह फलसफा तुम अपने पास रखो कि मौत और जीवन हंसने जैसे हैं। मगर तुम दुबारा किसी की मौत में अब मत जानाऔर गए तो ठीक नहीं होगा।
व्यक्ति को एक सुनिश्चित निर्णय कर लेना चाहिए कि जो मेरे भीतर होउसे मैं दबाऊं नहीं। और जो मेरे भीतर होवह मेरे बाहर प्रगट हो। जो मेरे भीतर हैउसे मैं प्रगट करूं या न करूंवह है तो। न प्रगट करने से धीरे— धीरे मेरे अपने संबंध मेरी अंतरात्मा से टूट जाएंगे। जब रोने की घड़ी होऔर तुम्हें रोना आता हो तो लाख स्थिति कहे कि 'मत रोओकि मर्द बच्चा होरोते हो 2: यह तो स्त्रियों का काम है! क्या जनानी बात कर रहे होमर्दाने हो! रोओ मत। लेकिन जब रोने की घड़ी हो और तुम्हारा हृदय रुदन से भरा हो तो बहने देना आंसूओ कोमत सुननालाख दुनिया कहे। और जब हंसने की तुम्हारे भीतर फुलझड़ियां फूटती हों तो लाख दुनिया कहेहंसना। इसको मैं तपश्चर्या कहता हूं।
तुम्हें बड़ी कठिनाइयां आएंगी। और इन कठिनाइयों के मुकाबले धूप में खड़ा होना या भूखे मरना या उपवास करना कुछ भी नहीं है—बच्चों के खेल हैंसर्कसी खेल हैं। जीवन में इंच—इंच पर तुम्हें कठिनाई आएगीक्योंकि इंच—इंच पर समाज ने मर्यादाएं बना कर रखी हैंइंच—इंच पर समाज ने व्यवहारलोकोपचारशिष्टाचार बना कर रखा है। और सब लोकोपचार तुम्हें झूठ किए दे रहा है। तुम बिलकुल झूठे हो गए हो। तुम एक महाझूठ हो। तुम्हारे भीतर खोजने से सच का पता ही नहीं चलेगा। तुम खुद भी अगर खोजोगे तो चकित हो जाओगे।
मैं तुमसे यह कहना चहता हूं. एक महीने भर तक इस बात की खोज करो कि तुम कितने—कितने समय पर झूठ होते हो। रास्ते पर कोई मिलतातुम कहते, 'नमस्कारबड़े दिनों में दर्शन हुएबड़ी आंखें तरस गईं। और भीतर तुम कह रहे हो, 'ये दुष्ट सुबह से कहां मिल गयायह सारा दिन खराब न हो जाए! हम किस दुर्भाग्य के क्षण में इस रास्ते से निकल आए!तुम ऊपर से कह रहे हो कि मिल कर बड़ी खुशी हुईऔर भीतर से तुम कह रहे होकैसे छुटकारा हो! तुम जरा जांचना। तुम सिर्फ एक महीना जांच करो। तुम मुस्कुरा रहे होजरा जांचना. ओंठ पर ही है या भीतर से जुड़ी हैतुम आंख में आंसू ले आए हो,जरा जांचना. आंख में आंसू झूठे तो नहीं हैंप्राणों से निकलते हैं?
तुम एक महीना सिर्फ जांच करो और तुम पाओगे तुम्हारी जिंदगी करीब—करीब निन्यानबे प्रतिशत झूठ है—और फिर तुम कहते होपरमात्मा को खोजना है! परमात्मा तो केवल उन्हीं को मिलता है जिनका जीवन सौ प्रतिशत सच है। और सच होना अत्यंत कठिन हैतपश्चर्यापूर्ण हैक्योंकि जगह—जगह अड़चन होगी।
समाज झूठ से जीता है। फ्रेडरिक नीत्से ने लिखा है कि आदमी बना ही कुछ ऐसा है कि बिना झूठ के जी नहीं सकता। सारा व्यवहार झूठ से चलता है। आदमी कों—नीत्से ने लिखा है—कभी भूल कर भी झूठ से मुक्त मत करवा देनाअन्यथा उसका जीना मुश्किल हो जाएगावह जी ही न सकेगा। झूठ जीवन में वैसे ही काम करता हैजैसे इंजन में लुब्रीकेशन काम करता है। अगर तेल न डालोलुब्रीकेशन न डालोतो इंजन चल नहीं पाता। लुब्रीकेशन डाल दोतो चीजें चल पड़ती हैंखटर—पटर कम हो जाती है। तेल की चिकनाहट जैसे इंजन को चलाने में सहयोगी हैवैसे झूठ की चिकनाहट दो आदमियों के बीच खटर—पटर नहीं होने देती।
घर तुम आएपत्नी के लिए आइसक्रीम ले आएफूल खरीद लाए—तुम एक झूठ खरीद लाए। क्योंकि अगर तुम्हारे हृदय में प्रेम है तो आइसक्रीम की कोई भी जरूरत नहीं हैफूल की कोई भी जरूरत नहीं हैप्रेम काफी है। तुम अगर हृदयपूर्वक पत्नी को गले लगा लोगे तो बहुत है। वह तुमने कभी किया नहींउसका भीतर अपराध— भाव अनुभव होता है। जितना अपराध— भाव अनुभव होता हैउस गड्डे को भरने की चेष्टा करते चलोफूल खरीद लाओआइसक्रीम ले आओमिठाई लाओ। जब गड्डा बहुत बड़ा हो जाता हैतो फिर गहना लाओसाड़ी लाओ। जितना बड़ा गड्डा होउतनी महंगी चीज से भरो। प्रेम जहां भर सकता थावहां कोई और चीज न भरेगीतुम कितना ही लाओ। तुम सोचते होमैं इतना कर रहा हूंपत्नी सोचती हैप्रेम नहीं मिल रहा। और तुम सोचते होमैं कर कितना रहा हूंरोज इतना लाता हूं सब तुम्हारे लिए ही तो कर रहा हूं! लेकिन इससे कुछ हल नहीं होता। प्रेम तो सिर्फ प्रेम से भरता है—तुम्हारे झूठों से नहीं।
लेकिन नीत्से भी ठीक कहता है। अगर आदमियों की जिंदगी देखो तो झूठ से भरी हैबिलकुल झूठ से भरी है। वहॉं सच्चाई है ही नहीं। इस झूठी स्थिति में तुम कभी परमात्मा के दर्शन न पा सकोगे। झूठसमाज में जीवन तो सरल बना देता हैलेकिन झूठ परमात्म—जीवन में बाधा बन जाता है।
तो अगर तुम मेरी बात समझो तो मैं तुम्हें समाज छोड़ने को नहीं कहतालेकिन मैं तुमसे उन छो को छोड़ने को जरूर कह देता हूं जिनके कारण तुम समाज के मुर्दा अंग बन गए हो और तुमने जीवन खो दिया है। समाज को छोड़ने से कुछ अर्थ नहीं हैलेकिन सामाजिकता को छोड़ो। रहो समाज मेंलेकिन औपचारिकता को छोड़ोप्रामाणिक बनो! और धीरे— धीरे तुम पाओगे : उतरने लगा प्रभु तुम्हारे भीतर। जैसे —जैसे तुम सत्यतर होते होवैसे —वैसे आंखें तुम्हारी विराट को देखने में सफल होने लगती हैं।
जो इस संसार में सहयोगी हैवही परमात्मा की खोज में बाधा है। और तुम चकित तो तब होओगेजैसे जनक चकित हो गए हैंकहते हैं. 'अहोआश्चर्य ', ऐसे तुम भी चकित होओगे एक दिनजिस दिन तुम पाओगे कि प्रसाद उसका उतरा और तुम सर्वतंत्र स्वतंत्र हो गए होऔर उसका प्रसाद उतर आया और अब फिर तुम्हारे जीवन में एक दायित्व का बोध हैजो बिलकुल नया है। अचानक फिर तुम जीवन की मर्यादाओं को पूरा करने लगे होलेकिन अब किसी बाहरी दबाव के कारण नहीं;किसी बाहरी जबर्दस्ती के कारण नहीं। अब तुम्हारे भीतर से ही रस बह रहा है। अब तुमने देखना शुरू किया कि यहां कोई दूसरा है ही नहीं। अब तुमने जाना कि बाहर है ही नहींबस भीतर ही भीतर हैमैं ही मैं हूं।
इसलिए तो जनक कहते हैंमन होता है अपने को ही नमस्कार कर लूं! अब तो मैं ही मैं हूं। सब मुझमें हैमैं सबमें हूं! उस दिन होता है एक अनुशासन—अति गरिमापूर्णअति सुंदरअपूर्व! होता
है एक दायित्व—किसी का थोपा हुआ नहींतुम्हारी निज—बोध की क्षमता से जन्मास्वस्फूर्त!
स्वस्फूर्त को खोजो—और तुम परमात्मा के निकट पहुंचते चले जाओगे। जबर्दस्ती थोपे हुए के लिए राजी हो जाओ—और तुम गुलाम की तरह जीयोगे और गुलाम की तरह मरोगे।
गुलाम की तरह मत मरनायह बड़ा महंगा सौदा है मालिक की तरह जीयो और मालिक की तरह मरो। और मालकियत का इतना ही अर्थ है कि तुम अपने स्वयं के बोध के मालिक बनोस्वबोध को उपलब्ध होओ।

 दूसरा प्रश्न :

कल आपने वानप्रस्थ की अदभुत परिभाषा कही— अनिर्णय की स्थिति का वह व्यक्ति जो दो कदम जंगल की तरफ चलता है और दो कदम वापिस बाजार की तरफ लौट आता हैऐसी चहलकदमी का नाम वानप्रस्थ है। इस संदर्भ में कृपया समझाएं कि यदि अचुनाव महागीता का संदेश है तो वह व्यक्ति क्या करे—बाजार चुनेया जंगलया दोनों नहींकृपया यह भी समझाएं कि अनिर्णय की दशा में और अचुनाव की दशा में क्या फर्क है?

 हागीता का मौलिक संदेश एक है कि चुनाव संसार है। अगर तुमने संन्यास भी चुना तो वह भी संसार हो गया। जो तुमने चुनावह परमात्मा का नहीं हैजो अपने से घटेवही परमात्मा का है। जो तुमने घटाना चाहावह तुम्हारी योजना हैवह तुम्हारे अहंकार का विस्तार है।
तो महागीता कहती है : तुम चुनो मत—तुम सिर्फ साक्षी बनो। जो होहोने दो। बाजार हो तो बाजारअचानक तुम पाओ कि चल पड़े जंगल की तरफचल पड़े—नहीं चुनाव के कारणसहज स्फुरणा से—तो चले जाओ।
फर्क समझने की कोशिश करो। सहज स्फुरणा से चले जाना जंगल एक बात हैचेष्टा करकेनिर्णय करकेसाधना करके,अभ्यास करके जंगल चला जाना बिलकुल दूसरी बात है।
मेरे एक मित्र जैन साधु हैं। उनके पास से निकलता था जंगल में उनकी कुटी थी और मैं गुजरता था रास्ते सेकिसी गांव जाता थातो मैंने ड्राइवर को कहा कि घड़ी भर उनके पास रुकते चलें। तो हम मुड़े। जब मैं उतर कर उनकी कुटी के पास पहुंचा तो मैंने खिड़की में से देखा. वे नंगेकमरे में टहल रहे हैं। कोई आश्चर्य की बात न थीजंगल में वहां कोई था भी नहीं—किसके लिए कपड़े
पहननाफिर मैं जानता हूं उन्हें कि जैन परंपरा में वे पले हैं और नग्नता का दिगंबर जैन हैं तो नग्नता का बहुमूल्य आदर है उनके मन मेंबड़ा मूल्य है। मैं जब दरवाजे पर दस्तक दियातो मैंने देखा. वे आए तो एक कपड़ा लपेट कर चले आए।
मैंने पूछा कि अभी मैंने खिड़की से देखा आप नग्न थेयह कपड़ा क्यों लपेट लियावे हंसने लगे। वे कहने लगे,अभ्यास कर रहा हूं।
'काहे का अभ्यास?'
उन्होंने कहानग्न होने का अभ्यास कर रहा हूं।
दिगंबर जैनों में पांच सीढ़ियां हैं संन्यासी कीतो धीरे — धीरे पहले ब्रह्मचारी होता है आदमीफिर छुल्लक होताफिर एल्लक होताफिर ऐसे बढ़ता जाताफिर अंतिम घड़ी में मुनि होतामुनि जब होतातब नग्न हो जाता। तो धीरे— धीरे छोड़ता जाता है। पहले दो लंगोटी रखताफिर एक लंगोटी रखताफिर छोड़ देता।
मैंने उनसे पूछा कि महावीर के जीवन में कहीं उल्लेख है कि उन्होंने नग्नता का अभ्यास किया होकहा, 'कोई उल्लेख नहीं। '
मैंने कहामुझे वह बताएंजो उनकी नग्नता के संबंध में कहा है शास्त्रों मेंआप शास्त्र के ज्ञाता!
वे थोड़े हैरान हुएक्योंकि शास्त्र में तो इतना ही कहा है कि महावीर जब घर से चले तो एक चांदर उन्होंने लपेट ली। सब बांट दिया। राह में जब वे जा रहे थेतो सब तो बांट चुके थेपूरा गांवजो भी आए थे सब ले कर गए थे। आखिर में एक भिखमंगा मिला जो अभी भी घिसटता हुआ चला आ रहा थाऔर बोला, 'अरेक्या सब बंट गयाऔर मैं तो अभी आ ही रहा था। तो महावीर ने कहायह तो बड़ा मुश्किल हुआ। उसको आधी चांदर फाड़ कर दे दी। अब और तो कुछ बचा भी नहीं था;अब आधी ही से काम चला लेंगे। जब वे इस आधी चांदर को ले कर जंगल में प्रवेश कर रहे थेतो एक झाड़ी सेहो सकता है गुलाब की झाड़ी रही हो या कोई और झाड़ी रही हो—वह आधी चांदर उलझ गई। वह इस बुरी तरह उलझ गई कि अगर उसे निकालेंतो झाड़ी को चोट पहुंचेगी। तो महावीर ने कहातू भी ले लेअब आधी को भी क्या रखना! वह आधी उस झाड़ी को दे दी। ऐसे वे नग्न हुए। अभ्यास तो इसमेंमैंने कहाकहीं भी नहीं है।
मैंने उनसे कहा कि तुम अभ्यास कर—करके नग्न अगर हो गएतो तुम संन्यासी न बनोगेसर्कसी बन जाओगे। पहले तुम ऐसा कमरे में नंगे घूमोगेफिर धीरे — धीरे बगीचे में घूमने लगनाफिर धीरे— धीरे गांव में जाने लगना—ऐसे कर—करके हिम्मत बढ़ा लोगे —कि लोग हंसते हैंहंसने दोलोग कुछ कहते हैंकहने दोधीरे — धीरेधीरे— धीरे.। मगर धीरे— धीरे जो घटेगा वह तो झूठा हो गया। यह तो तुम चूक ही गएनग्नता की निर्दोषता चूक गए।
अभ्यासजन्य तो सभी चालाकी से भर जाता हैनिर्दोष तो सहज होता है। अगर तुम्हें नग्न होने का भाव आ गया है,चलो यह चांदर मुझे भेंट कर दो—मैंने कहा—खत्म करो इस बात को।
वे कहने लगेनहींअभी नहीं। मैं उनकी चांदर खींचने लगा तो बोले. अरेयह मत करना! मैंने कहामैं तो सहयोगी हो रहा हूं। यह अभी घटवाए देता हूं और गांव के लोगों को बुलाए लेता
हूं। कब तक अभ्यास करोगेयह पांच मिनट का काम है। मैं गांव से लोगों को बुला लेता हूं भीड़— भाड़ इकट्ठी कर देता हूं,चांदर ले लूंगा सबके सामने। खत्म करो! कब तक अभ्यास करोगेउन्होंने कहानहीं—नहींअभी नहींकिसी से कहना भी नहीं। अभी मेरी योग्यता नहीं है।
नग्न होने में भी योग्यता की जरूरत हैसारा जंगलपशु—पक्षी नग्न घूम रहे हैंतुम कहते हो नग्नता में भी योग्यता की जरूरत है! आदमी भी हद चालाक है! इतने सरल में भी योग्यता की जरूरत है!
वे अभी तक नग्न नहीं हुए। यह घटना घटे कोई पंद्रह साल हो गए। वे अभी तक भी चांदर ओढ़े हुए हैं। अभ्यास अब भी जारी होगा।
खयाल करनामहागीता कहती है. चुनो मत! क्योंकि चुनोगे तो अहंकार से ही चुनोगे नचुनोगे तो 'मैंकरने वाला हूं—कर्ता हो जाओगे न। महागीता कहती है. न कर्तान भोक्ता—तुम साक्षी रहो। तुम अगर पाओ कि बाजार में बैठे हैं और सब ठीक है—तो ठीक हैबाजार ठीक है। तुम अगर पाओ कि नहींचल पड़े पैरजंगल बुलाने लगाआ गई पुकार—अब रुकते—रुकते भी रुकने का कोई उपाय नहींअब तुम चल पड़ेअब तुम दौड़ पड़ेजैसे बज गई कृष्ण की बांसुरी और भागने लगीं गोपियां! कोई ने आधा अभी दूध लगाया थाउसने पटकी मटकी वहींवह भागीकोई अभी दीया जला रही थीउसने दीया नहीं जलाया और भागी। बंसी उठी पुकार! अब कैसे कोई रुक सकता है! जिस दिन ऐसा सहज घटता होजिस दिन तुम जवाब न दे सको कि क्यों कियातुम्हारे पास कोई तर्क न हो कि क्यों ऐसा हुआतुम इतना ही कह सको कि बस हुआहम देखने वाले थेहम करने वाले नहीं थे—तो महागीता कहती हैतो अष्टावक्र कहते हैं—तों असली संन्याससहजस्फूर्त! तो पहली तो बात हैपूछा है, 'तो वह व्यक्ति क्या करे—बाजार चुने कि जंगल त्र: '
चुना कि भटका। चुनाव में संसार हैअगर वह जंगल भी चुने तो संसार हैचुनाव में संसार है। और अगर वह बिना चुने बाजार में भी रहे तो संन्यास है। अचुनाव संन्यास हैचुनाव संसार है। इसलिए संन्यास को चुनने का कोई उपाय नहीं है—संन्यास घटता है।
मेरे पास इतने लोग आते हैं। मेरे पास भी दो तरह के संन्यासी हैं—एक जो घटातेऔर एकजिनको घटता है। जो घटाते हैंवे कहते हैंसोच रहे हैंवे कहते हैंसोच रहे हैंबात तो कुछ जँचती हैसोच—विचार कर रहे हैं। लेंगेकभी न कभी लेंगे,मगर अभी नहीं। अभीवे कहते हैंऔर बहुत काम हैंबात तो जँचती है।
मैंने सुना हैमुल्ला नसरुद्दीन मस्जिद में बैठा था और धर्मगुरु ने प्रवचन दिया। और बीच प्रवचन में उसने बड़े नाटकीय ढंग से पूछा कि जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैंउठ कर खड़े हो जाएं। सब लोग उठ कर खड़े हो गएसिर्फ मुल्ला बैठा रहा। उस धर्मगुरु ने पूछा. क्या तुमने सुना नहीं नसरुद्दीनमैं कह रहा हूं जिनको स्वर्ग जाना होवे खड़े हो जाएं।
नसरुद्दीन ने कहा : बिलकुल सुन लियालेकिन अभी मैं जा नहीं सकता।
'बात क्या है?'
उसने कहा कि पत्नी ने कहा है कि मस्जिद से सीधे घर आना। मस्जिद से सीधे घर आनाइधर— उधर जाना ही मत! अब आप और एक लंबी.. स्वर्ग जिनको जाना हैजो जा सकते हों जाएं। जाऊंगा मैं भी कभी। तो पहला तो कारण कि पत्नी ने कहा कि मस्जिद से सीधे घर आना। और दूसरा कारण कि इस कंपनी के साथ स्वर्ग मैं नहीं जाना चाहता। इन्हीं की वजह से तो यह संसार भी नर्क हो गया है और अब स्वर्ग भी खराब करवाओगे? इनके बिना तो मैं नर्क भी जाना पसंद कर लूंगा। इनके साथ।
मेरे पास लोग आते हैंवे कहते हैं. सोच रहेबात जंचतीलेकिन अभी मुश्किल हैपत्नी से पूछना हैबच्चों से पूछना हैअभी तो लड़की की शादी करनी हैअभी लड़के की शादी करनी हैयह करना वह करना दुकान।
मैं उनसे कहता हूं : मैं तुमसे लड़की न छोड़ने को कहता हूं न लड़कान पत्नी न दुकान—मैं तुमसे कुछ छोड़ने को कहता ही नहीं। और मैं तुमसे यह भी नहीं कहता कि तुम संन्यास के संबंध में सोचोतब लेना। सोच कर लियाचूक गए। क्योंकि सोचने में तो तुम्हारा निर्णय हो जाएगा। मैं तो कहता हूं : अहोभाव से लेना। उठ गया हो भाव तो ले लेना। सोचना मत। सोचने की प्रक्रिया मत चलाना। जब घटता हो तो घट जाने देनान घटे तो कोई चिंता की बात नहीं— थोपना मत।
कुछ लोग आते हैंजो इसी सहजता से लेते हैं। कुछ लोग आते हैंउनसे मैं कहता हूं कि क्या इरादे हैं संन्यास केवे कहते हैं. आपकी मर्जी! आप अगर मुझे योग्य समझें तो दे दें।
यह बात और हुई। यह बात ही और हो गई। इसका मूल्य बड़ा अलग हो गया। वे कहते हैंआप अगर योग्य समझें तो मुझे दे दें। संन्यास मैं कैसे लूंगाआप देते हों तो दे दें।
इस व्यक्ति ने ठीक से समझा संन्यास का अर्थ। जो होता होजो घटता होउसे घट जाने देना— बिना ना—नुच केबिना अपनी बाधा डालेबिना अपनी पसंद नापसंद डाले।
तो तुम पूछते हो : बाजार चुनें कि जंगल न:
मैं कहता हूं : चुने कि फंसे! चुने कि बाजार में रहे। जंगल जाओ या कहीं भी जाओचुने कि बाजार में रहे। न चुना और बाजार में भी रहे तो आ गया जंगल।
जहां तुम बाजार देख रहे होवहां कभी जंगल थे और फिर जंगल हो जाएंगे। और जहां तुम जंगल देख रहे होवहां बाजार कई दफे बन चुके हैं और उजड़ चुके हैं। जंगल और बाजार में कोई बड़ा फर्क नहीं है।
इब्राहीम एक मुसलमान सम्राटसंन्यासी हो गया। अचानक निकल गया राजमहल से। द्वारपाल रोकने लगे। उसने कहा,हटो भी! तुम्हें मैंने यहां द्वारों पर खड़ा किया था कि किसी को भीतर मत आने देनामुझे रोकने को नहीं। रास्ता दो।
वे उससे हाथ जोड्ने लगे कि आप यह क्या कर रहे हैंहमें खबर मिली है कि आप संन्यासी हो रहे हैं। आप क्यों यह महल छोड़ रहे हैं?
इब्राहीम ने कहा. छोड़ रहा हूंबात ही गलत है। यहां कुछ छोड़ने योग्य है ही नहींइसलिए जा रहा हूं। न पकड़ने योग्य है न छोड़ने योग्य है।
इब्राहीम चला गया और गांव के बाहर रहने लगा। वह बल्क का राजा था। उसने मरघट के पास एक चौरस्ते पर अपना निवास बना लिया। लोग उस चौरस्ते से आतेराहगीरऔर उससे पूछते कि बस्ती कहां हैतो वह मरघट का रास्ता बता देता। दोनों तरफ रास्ते जाते थे। और उसकी बात मान कर लोग चले जाते। बड़ा शांत फकीर थाशाही आदमी था! उसके चेहरे की ज्ञान और रौनकउसके







व्यक्तित्व की गरिमा और प्रसाद बड़ा आभायुक्त व्यक्ति था! उसकी बात पर सहज भरोसा हो जाता। कोई यह भी नहीं सोचता कि यह आदमी गलत कहेगा। उससे पूछतेबाबा कहा है बस्ती का रास्तातो वह कह देता कि बिलकुल सीधे चले जाओ;इस रास्ते पर मत जानानहीं तो भटक जाओगे। जब वे चार मील चल कर पहुंचतेतो मरघट! बड़े क्रोध में लौट कर आते। वे कहते कि तुम होश में तो हो? मरघट भेज दिया!
उसने कहा. तुमने बस्ती पूछी थी नतो मैंने मरघट में जिनको बसते देखाउनको कभी उजड्ते नहीं देखता—इसलिए उसको मैं बस्ती कहता हूं। और बस्ती तुम जिसको कहते होउसको मैं मरघट कहता हूं क्योंकि वहां सब मरने वाले लोग हैं। आज मरा कोईकल मरा कोईपरसों मरा कोई—वह मरघट है। वहां क्यू लगा हैजिसका नंबर आ गयावह गया। जिसको तुम बस्ती कहते होउसको मैंने बसते कभी देखा नहींउजडूते देखा। उसको बस्ती कहो कैसे भू: बस्ती तो वहजो बसी रहे। मरघट है बस्ती। तुमने बात गलत पूछीमेरी कोई गली नहीं है। तुमने पूछा बस्ती कहां हैमैंने तुम्हें बस्ती बता दी। तुम पूछते मरघट,मैं तुम्हें गांव भेज देता। अब तुम मरघट जाना चाहते होतो तुम इस रास्ते से चले जाओ। लेकिन मैं तुमसे कहे देता हूं मरघट पर कभी तुम बस न पाओगे। जाना तो पड़ेगा—जिसको तुम मरघट कहते हो—वहीं। क्योंकि वहीं अंतिम बसाव हैवहीं आदमी अंततः पहुंच जाता है।
जिसको बस्ती कहोवहां कई दफे मरघट बन चुकाजिसको मरघट कहोवहां कई दफे बस्ती बस चुकी। यहां क्या जंगल हैक्या बाजार है! यहां दोनों ही माया हैंदोनों ही सपने हैं। चुने कि फंसे। महागीता कहती है : चुनना मत। जो हो होने देना। तुम सिर्फ देखते रहना।
यह सबसे कठिन बात है और सबसे सरल भी। क्योंकि करने को कुछ नहींइसलिए बिलकुल सरलऔर चूंकि करने को कुछ भी नहीं हैइसलिए तुम्हें बहुत कठिन है। कुछ करने को हो तो कर लो। इसमें कुछ करने को ही नहीं हैसिर्फ देखते रहने का है।
'कृपया यह भी समझाएं कि अनिर्णय की दशा में और अचुनाव की दशा में क्या फर्क है!'
बहुत फर्क है। दोनों एक—दूसरे के विपरीत हैं। अनिर्णय का अर्थ है : तुम्हारे मन में दो निर्णय एक साथ हैं। जब भी कोई आदमी कहता है कि मैं अनिर्णीत हूं तुम भूल में मत पड़ जाना। वह यह कह रहा है कि दो निर्णय हैं और तय नहीं कर पा रहा हूं कि कौन—सा करूं—जंगल जाऊं कि दुकान पर रहूंएक मन कहता हैदुकान पर रहोएक कहता हैजंगल चले जाओ। एक मन कहता हैशादी कर लोएक कहता हैकुंआरे बने रहो। एक मन कहता हैऐसा करोएक मन कहता हैवैसा करो। दो निर्णय हैं या कई निर्णय हैं। और कई निर्णयों में चुन नहीं पा रहे होक्योंकि सभी करीब—करीब बराबर वजन के मालूम होते हैं—इसलिए अनिर्णय।
अनिर्णय बड़ी भ्रांतमूर्च्छित दशा हैऔर अचुनाव बड़ी जाग्रत दशा है। अचुनाव का मतलब है कि न यह चुनते हैं न यह चुनते हैंचुनते ही नहीं। अनिर्णय में तो चुनने की आकांक्षा बनी हैमगर तय नहीं हो पा रहा : क्या करेंकिसको चुनें?
एक स्त्री है जिसको तुम चाहते हो कि शादी कर लेंलेकिन उसके पास सुंदर शरीर नहीं है और धन बहुत है। और एक स्त्री हैजिसके पास सुंदर शरीर है और धन बिलकुल नहीं है। अब तुम्हारे
मन में डावांडोल चल रहा है. किसको चुन लेंधन वाली कुरूप स्त्री को चुन लें कि निर्धन सुंदर स्त्री को चुन लेंएक मन कहता है, ' धन का क्या करोगेधन को खाओगे कि पीयोगेअरेसौंदर्य के आगे धन क्या है?' एक मन कहता है, 'सौंदर्य का क्या करोगेदो दिन में सब फीका हो जाएगादो दिन में परिचित हो जाओगे। फिर क्या करोगेखाओगे कि पीयोगेधन आखिर में काम आता। धन जिंदगी भर काम आएगा। और आज यह स्त्री सुंदर हैकल चेचक निकल आएफिर क्या करोगे?और आज यह सुंदर दिखाई पड़ रही है दूर से —दूर के ढोल सुहावने होते हैं—पास आ कर कौन—सा जहर निकलेगाक्या पता! फिर आज जवान हैकल की हो जाएगी—फिर क्या करोगेऔर अभी तो अकेले निर्धन होऔर एक गले से बांध ली फांसी—दो हो जाओगेभूखों मरोगे!'
आदमी की भूख पेट में हो तो कहां का प्रेम और कहां का सौंदर्य—भूखे भजन न होय! तो एक मन कहता हैसुंदर को चुन लोएक मन कहता हैधन को चुन लो। और दुविधा है कि तुम दोनों चाहते। तुम चाहते यह थेदोनों हाथ लह होते। तुम चाहते सुंदर स्त्री होती और धन भी होता। वैसे दोनों हाथ लह इस संसार में किसी को नहीं मिलते। अगर किसी को भी मिल जाते इस संसार में दोनों हाथ लहतो उसके लिए धर्म व्यर्थ हो जातालेकिन धर्म किसी को कभी व्यर्थ नहीं हुआक्योंकि दोनों हाथ लह कभी किसी को नहीं मिलते। कुछ न कुछ कमी रह जाती है। किसी की आंख सुंदर हैकिसी के कान सुंदर हैंकिसी की नाक सुंदर है... बड़ी मुश्किल है. किसी के बाल सुंदर हैंकिसी की वाणी मधुर हैकिसी का व्यवहार सुंदर हैकिसी का देह का अनुपात सुंदर है। हजार चीजें हैंसभी पूरी नहीं होतीं। मन की आकांक्षा बड़ी है और चीजें बड़ी छोटी हैं। मन के सपने बड़े सुंदर हैं और सब चीजें फीकी पड़ जाती हैं। दोनों हाथ लह किसी को भी नहीं मिलते। वे तो परमात्मा हुए बिना नहीं मिलते।
तुमने देखा नहिंदुओं की परमात्मा की मूर्तियां हैं—कहीं सहस्रबाहु.. और सब हाथों मेंकिसी में शंखकिसी में लहकिसी में कुछ। आदमी के दो हाथ हैंसंसार बड़ा है—जब तक तुम सहस्रबाहु न हो जाओतब तक कुछ होने वाला नहीं। परमात्मा हुए बिना कोई तृप्त नहीं होताहाथ भर ही नहीं पाते। और दो हाथ भर भी जाएं तो भी क्या होने वाला हैआकांक्षाएं बहुत हैं,उनके लिए हजारों हाथ चाहिएवे भी शायद छोटे पड़ जाते होंगे।
कभी तुम देखना हिंदुओं की पुरानी मूर्तियांतो कई नई चीजें पैदा हो गई हैंजो उन हाथों में नहीं हैं। अब भगवान को नए हाथ उगाने पड़ेनहीं तो वे भी तडूप रहे होंगे। अगर अब हम फिर से बनाएं तो एक हाथ में कार लटकी हैएक हाथ में कुर्सी लटकी हैएक हाथ में फ्रिज रखा है। तुम हंसते हो! क्योंकि तुमने उन दिनों जो चीजें श्रेष्ठतम थीं वे लटका दी थीं। अब तो चीजें बहुत बढ़ गई हैंउतने हाथों से काम न चलेगा। चीजें तो रोज बढ़ती जाती हैंहाथ सदा छोटे पड़ जाते हैं।
तो अनिर्णय की अवस्था तो तब हैजब तुम्हारे मन में बहुत—सी चीजें हैंप्रतियोगी चीजें हैं और तुम तय नहीं कर पाते। तय तुम करना चाहते हो और नहीं कर पाते—तो अनिर्णय। अनिर्णय बड़ी दुविधा की दशा है। अचुनाव—तुम तय करना ही नहीं चाहतेतुमने तय करना ही छोड दिया। तुम कहते होहम तो देखेंगे। हम यह भी देखेंगेहम वह भी देखेंगेहमारा कोई झुकाव नहीं है। हम सिर्फ साक्षी बन कर बैठे हैं।
अचुनाव तो चैतन्य की सबसे ऊंची स्थिति है। अनिर्णयचैतन्य की सबसे नीची स्थिति है। अनिर्णय को अचुनाव मत समझ लेनानहीं तो तुम भ्रांति को सत्य समझ लोगे। तुम यह मत समझ लेना. चूंइक हम निर्णय नहीं कर पातेइसलिए हम अचुनाव की अवस्था को उपलब्ध हो गए हैं। निर्णय न कर पाना एक बात है और निर्णय करना छोड़ देना बिलकुल दूसरी बात है। निर्णय न कर पाना तो एक तरह की असहाय अवस्था हैनिर्णय करना छोड़ देना एक मुक्ति है। इति ज्ञानं! जनक कहते हैं,यही ज्ञान है!

 तीसरा प्रश्न :

जनक अष्टावक्र के समक्ष निस्संकोच भाव से ज्ञान को अभिव्यक्त किए जा रहे हैं। क्या ज्ञान उपलब्धि के बाद गुरु के समक्ष सकुचाहट भी खो जाती हैकृपा करके समझाइए।

कुचाहट या संकोच भी अहंकार का ही अनुषंग है। जिसको तुम संकोच कहते होलज्जा कहते होवह भी अहंकार की ही छाया है।
तुम सकुचाते क्यों हो कहने मेंतुम सोचते होकहीं ऐसा न समझा जाए कि कोई समझे कि अभद्र हैमर्यादा—रहित है। तुम सकुचाते क्यों हो कहने मेंकहीं ऐसा न हो कि भद्द हो जाएजो मैं कहूं वह ठीक न हो। तुम सकुचाते क्यों हो कहने में?क्योंकि तुम डरे हुए हो. दूसरा क्या सोचेगा! लेकिन गुरु और शिष्य का संबंध तो बड़ा अंतरंग संबंध है। वहां दूसरा क्या सोचेगा,यह विचार भी आ जाए तो भेद आ गया। गुरु के सामने कैसा संकोचजो हुआ हैउसे खोल कर रख देना। बुरा हुआ तो बुरा खोल कर रख देनाभला हुआ तो भला खोल कर रख देना। दुख—स्वप्न देखा तो उसे खोल कर रख देना। अंधेरा है तो कह देना अंधेरा हैरोशनी हो गईतब संकोच क्या?
क्या तुम सोचते हो कि जनक को कहना चाहिए कि नहीं—नहींकुछ भी नहीं हुआअरे साहबमुझे कैसे हो सकता है! हो गयाऔर वे कहें संकोचवशशिष्टाचारवशकि नहीं—नहीं! तुमने जनक को क्या कोई लखनवी समझा है?
मैंने सुना है कि एक स्त्री के पेट में दो बच्चे थे। नौ महीने निकल गएदस महीने निकलने लगेग्‍यारह महीनाबारह महीना। स्त्री भी घबड़ा गईडाक्टर भी घबड़ा गए। कई साल निकल गएबामुश्किल आपरेशन करके बच्चे निकाले गए। जब निकाले गए तब तो वे बोलने की उम्र के आ चुके
थे। डाक्टर ने पूछा कि करते क्या रहे इतनी देर तकउन्होंने कहा, 'साहब क्या करते! मैं इनसे कहतापहले आपये कहते,पहले आप!लखनवी थे दोनों। अब पहले कौन निकलेयही अड़चन थी। पुराने दिनों में ऐसा हो जाता था। लखनऊ के स्टेशन पर गाड़ी सीटी बजा रही है। और कोई खड़े हैं अभीचढ़ ही नहीं रहे—वे कहते हैं, 'पहले आप! पहले आप! अरे नहीं आपके सामने मैं कैसे चढ़ सकता हूं!'
संकोचसकुचाहटशिष्टाचार गुरु और शिष्य के बीच अर्थ नहीं रखते। जहां प्रेम प्रगाढ़ हैवहां इन क्षुद्र बातों की कोई भी जरूरत नहीं। ये तो सब प्रेम को छिपाने के उपाय हैं। ये तो जो नहीं है उसको बतलाने के ढंग हैं। जब तुम्हारा प्रेम पूरा होता है,तो तुम कुछ भी नहीं छिपातेतब तो तुम सब खोल कर रख देते हो।
तुमने देखादो आदमी दोस्त होते हैं तो सब शिष्टाचार खो जाता है। लोग तो कहते हैंजब तक दो आदमी एक—दूसरे को गाली—गलौज न देने लगेंतब तक दोस्ती ही नहीं। ठीक ही कहते हैं एक अर्थ मेंक्योंकि जब तक गाली—गलौज की नौबत न आ जाएतब तक कैसी दोस्तीतब तक शिष्टाचार कायम हैआइएबैठिएपधारिए कायम है। जब दो मित्र दोस्त हो जाते हैंजब मित्रता घनी हो जाती है। तो आइएबैठिएपधारिएसब विदा हो जाता है। तब बातें सीधी होने लगती हैं। तब दिल की दिल से बात होती है। ये ऊपर—ऊपर के खेलसमाज के नियमउपचार—इनका कोई मूल्य नहीं रह जाता।
गुरु और शिष्य के बीच तो कोई भी औपचारिकता नहीं है।
लेकिन तुम हैरान होओगे कि अगर तुम गुरु—शिष्य को देखोगे तो तुम चकित होओगे। जनक कह तो रहा है ये सारी बातेंलेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि जनक के मन में गुरु के प्रति कृतशता नहीं हैकि अहोभाव नहीं है।
एक झेन फकीर मंदिर में रात रुका। रात सर्द थी और उसने मंदिर में से बुद्ध की प्रतिमा को उठा लियालकड़ी की प्रतिमा थीजला कर आंच ताप ली। जब मंदिर के पुजारी की नींद खुली आधी रात कोलकड़ी की आवाजजलने की आवाज सुन करतो वह भागा आया। उसने कहा कि यह तू आदमी पागल है क्याहमने तो तुझे साधु समझ कर मंदिर में ठहरा लियायह तूने क्या पाप कियातूने बुद्ध को जला डाला!
तो वह साधु एक लकड़ी को उठा कर बुद्ध की जली हुई मूर्ति मेंराख में टटोलने लगा। उस मंदिर के पुजारी ने पूछा,क्या करते हो अबउसने कहामैं बुद्ध की अस्थियां खोज रहा हूं। वह पुजारी हंसा। उसने कहातुम निश्चित पागल हो। अरे,लकड़ी की मूर्ति में कैसी अस्थियां?
उसने कहाजब अस्थियां ही नहीं हैं तो कैसे बुद्धतुमदो मूर्तियां और रखी हैंउठा लाओरात अभी बहुत बाकी है। और तुम भी आ जाओहम तो ताप ही रहे हैंतुम क्यों ठंड में ठिठुर रहे होताप ही लो!
उसने तो उसे उसी वक्त मंदिर के बाहर निकालाक्योंकि कहीं वह दूसरी मूर्तियां और न जला डाले।
सुबह जब पुजारी उठा तो उसने देखा कि वह साधु राह के किनारे लगे मील के पत्थर पर दो फूल चढ़ा कर हाथ जोड़े बैठा है। उसने कहाहद हो गई! रात बुद्ध को जला बैठाअब मील के पत्थर पर फूल चढ़ा कर बैठा है! उसने जा कर फिर उसे हिलाया और कहातू आदमी कैसा हैअब यह क्या कर रहा है यहां?
उसने कहाभगवान को धन्यवाद दे रहा हूं। यह उनकी ही कृपा है कि उनकी मूर्ति को जलाने की क्षमता आ सकी। और मूर्ति तो मानने की बात है। जहां मान लियावहां बुद्ध। वे तो सभी जगह मौजूद हैंमगर हम सभी जगह देखने में समर्थ नहीं;हम तो एक ही दिशा में ध्यान लगाने में समर्थ हैं। तो अभी जो सामने मिल गयायह पत्थर मिल गयाफूल भी लगे थे किनारेसब साधन—सामग्री उन्हीं ने जुटा दीसोचा कि अब पूजा कर लें। अब धूप भी निकल आईदिन भी ताजा हो गया। फिर रात इन्होंने साथ दिया था। देखा नहींजब सर्दी पड़ी तो इन्हीं को ले कर आंच ली थी। शरीर को भी ये बचा लेते हैं,आत्मा को भी बचा लेते हैं। अब धन्यवाद दे रहे हैं।
शिष्य और गुरु के बीच बड़ा अनूठा संबंध है। वह अपने सत्य को पूरा खोल कर भी रख देता हैलेकिन इसका अर्थ नहीं है कि अवज्ञा कर रहा हैया अभद्रता कर रहा है। यही भद्र संबंध है। और धन्यवाद भी उसका पूरा है।
जनक पैर भी छुएंगे अष्टावक्र केउनको बिठाया है सिंहासन परखुद नीचे बैठे हैं। खुद सम्राट हैंअष्टावक्र तो कुछ भी नहीं हैं। उनको बिठा कर सिंहासन पर कहाप्रभु! मुझे उपदेश दें। मुझे बताएं. क्या है ज्ञानक्या है वैराग्यक्या है मुक्ति त्र:
और तुम यह मत सोचना कि अष्टावक्र नाराज हैं यह ज्ञान की अभिव्यक्ति सुन कर। अगर सकुचाते जनक तो कुछ कमी रह गई। क्योंकि संकोच का मतलब है : अभी भी तुम सोच रहे होमैं हूं। अब कोई संकोच नहीं, 'मैंबिलकुल गया। और अष्टावक्र स्वयं ही कहते हैं. जहां 'मैंनहींवहां मुक्ति हैजहां 'मैंहैवहां बंधन है। तो सब बंधन गिर गया। 'मैंही गिर गया तो कैसा संकोचकैसी सकुचाहट?
लेकिन तुम इससे यह मत समझ लेना कि जनक की कृतज्ञता का भाव गिर गया। वह तो और घना हो गया। इसी गुरु के माध्यम से तोइसी गुरु के इशारे पर तोइसी गुरु की चिनगारी से तो जली यह आग और सब भस्मीभूत हुआ। यह जो घटना घटी है महामुक्ति कीयह जो समाधिस्थ हो गए हैं जनक—यह जिस गुरु की कृपा से हुए हैंजिसके प्रसाद से हुए हैं,उसके सामने कैसा संकोचसच तो यह हैजब गुरु और शिष्य के बीच परम संबंध जुड़ता है तो न शिष्य शिष्य रह जातान गुरु गुरु रह जातातब दोनों एक हो जातेमहामिलन हो जाता!

चौथा प्रश्न :

मैं चाहता हूंतुम कुछ बोलो, तम चाहते होमैं कछ बोल; अँधर कांप के रहजाते है,
विस्मित हूं कैसे मुंह खोलूं!

खोल तो दिया! तो तुम्हारे लिए एक कहानी:
चार आदमियों ने तय किया कि मौन की साधना करेंगे। वे चारों गएएक मंदिर में बैठ गए... चौबीस घंटे मौन से रहेंगे। कोई घड़ी भी नहीं गुजरी थी कि पहला आदमी बोला अरे अरेपता नहीं मैं ताला लगा आया कि नहीं घर का! दूसरा मुस्कुराया,उसने कहा कि तुमने मौन खंडित कर दिया नासमझमूढ़! तूने बोल कर सब मौन खराब कर दिया! तीसरा बोला कि खराब तो तुम्हारा भी हो गया है! तुम क्या खाक उसको समझा रहे होचौथा बोला : हे प्रभु! एक हम ही बचेजिसका मौन अभी तक खराब नहीं हुआ।
बोले बिना रहा नहीं जाता। अगर बिना बोले रह जाओ तो बहुत कुछ हो। अगर मौन रह जाओ तो महान घट सकता है।
शब्द से सत्य के घटने में कोई सहारा नहीं मिलता—शून्य से ही सहारा मिलता है। अगर ऐसा भाव मन में उठ रहा है मौन रह जाने कातो रह ही जाओइतना भी मत कहोइतना कहने से भी खराब हो जाएगा।
मेरी मजबूरी है कि मुझे तुमसे बोलना पड़ रहा हैक्योंकि तुम मेरे शून्य को न सुन सकोगे। काशतुम मेरे शून्य को सुन सकते तो बोलने की कोई जरूरत न रह जाती! तो मैं यहां बैठतातुम यहां बैठते—मंतक—मंतकहृदय से हृदय की हो लेती चर्चाशब्द बीच में न आते।
तुम्हें उसी तरफ तैयार कर रहा हूं। बोल भी इसलिए रहा हूं कि तुम्हें न बोलने की तरफ धीरे — धीरे सरकाया जा सके। तुमसे कह भी रहा हूं कि सुनो—सिर्फ इसीलिए कि अभी तुम सुनने के माध्यम से ही शांत बैठ सकते होअन्यथा तुम शांत न बैठ सकोगे। फिर धीरे — धीरेजब तुम सुनने में परम कुशल हो जाओगेतो तुमसे कहूंगा. अब सुनोऔर अब मैं बोलूंगा नहीं,तुम सिर्फ सुनो। फिर मैं बिना बोले तुम्हारे पास बैठूंगा। फिर भी तुम सुन पाओगे। और जो अभी झलक—झलक आता हैवह बिलकुल साक्षात आएगा। जो अभी शब्द में थोड़ा— थोड़ा आता हैबूंद—बूंद आता हैवह फिर सागर की तरह आएगा। और अभी जो हवा के झोंके की तरह आता है—कभी पता चलता आयाकभी पता चलता नहीं आया—वह एक अंधड़— आधी की तरह आएगा और तुम्हें डुबा देगाऔर तुम्हें मिटा देगाऔर तुम्हें बहा ले जाएगा। वह एक सागर की तूफानी लहर होगाजिसमें तुम विलीन हो जाओगे।
मैं बोल रहा हूं —सिर्फ इसलिए कि तुम्हें शून्य के लिए तैयार कर लूं। अभी मजबूरी है।
तुमने देखाछोटे बच्चों की किताबें होती हैंतो उनमें अक्षर कम होते हैंचित्र खूब होते हैं। अक्षर बड़े—बड़े होते हैंबहुत थोड़े होते हैं—आम.. और बड़ा एक आम लटका होता है। क्योंकि अभी अक्षर तो रसपूर्ण नहीं है बच्चे को। अभी तुम आम कितने ही लिखोउसे कुछ मजा न आएगा। अभी वह देखता है रंगीन आम को। उसे देख कर उसके मुंह में स्वाद आ जाता हैवह कहता हैअरे आम! आम को वह जानता है चित्र से। आम के सहारे वह किनारे पर लिखा हुआ शब्द 'आम', वह भी उसे समझ में आ जाता है कि अच्छा तो यह आम है। जैसे—जैसे बच्चा बड़ा होने लगता हैकिताबों में से चित्र खोने लगते हैं। विश्वविद्यालय तक पहुंचते —पहुंचते किताबों में कोई चित्र नहीं रह जातेसब चित्र खो जाते हैंऔर अक्षर छोटे होने लगते हैं। फिर विश्वविद्यालय के बाद जो असली शिक्षा है वहां तो अक्षर और भी छोटे होते—होते अक्षर भी खो जाते हैं। कोरा कागज! वही मेरी मेहनत चल रही है कि अब अक्षर को छोटा—छोटा करते —करतेकरते—करते एक दिन तुम्हें कोरा कागज दे दूं और तुमसे कहूं पढ़ो! और तुम पढ़ो भीऔर तुम गुनो भीऔर तुम ग्त्रुनगुनाओ और नाचो भीऔर तुम मुझे धन्यवाद दे सको कि कोरा कागज आपने दिया!
ये शब्द तो केवल सेतु हैंशून्य की तरफ इशारे हैं। तुम्हारे मन में अगर चुप होने की बात आती हो तो बिलकुल ही चुप हो जानाइतना भी मत कहना कि चुप होने की बात आ गईउतने में भी मौन टूट जाता है।

 आखिरी प्रश्न :

महागीता पर हुए आपके प्रवचनों से मेरे सारे संशय दूर हो गए और मेरे सारे स्वनिर्मित बंधन क्षण में ढह गए और आज मैं आपकी करुणा से झूठे पाशों से मुक्त हुआ!

हा है 'स्वामी सदाशिव भारतीने।
कुछ घटा हैनिश्चित घटा है। मगर इससे बहुत सावधान रहने की जरूरत भी आ गई है। अब अगर अकड़ गए कि कुछ घटा हैतो खो दोगे। अभी बड़ी नाजुक किरण उतरी हैमुट्ठी में अगर जोर से बांध लियामर जाएगी। अभी कली उमगी है,अभी खिलने देनाफूल बनने देना। नहीं तो कभी—कभी ऐसा होता हैहम किनारे—किनारे पहुंच कर भी गंगा में बिना डूबे वापिस लौट आते हैं। बिलकुल पहुंच गए थेछलांग लगाने के करीब थे—और लौट आते हैं।
कुछ निश्चित हुआ है सदाशिव को। यह कहता हूं—इसलिए कि तुम्हें भरोसा आएमजबूती आए। मगर यह भी सावधानी दे देनी जरूरी है कि इसमें अकड़ मत जाना। इससे अहंकार को घना मत कर लेना कि हो गया। अभी बहुत कुछ होने को है। कुछ हुआ हैबहुत कुछ होने को है।
कुछ हुआ—सौभाग्य! प्रभु—कृपा! अनुकंपा मानना उसेक्योंकि तुम्हारे किए कुछ भी नहीं हुआ
है। तुमने किया ही क्या हैसुनते—सुनतेयहां बैठे—बैठे हो गया है। इसे अनुकंपा माननाइससे अहंकार को मत भर लेना। इससे और भी अनुगृहीत हां जाना कि प्रभु का प्रसाद मिलाऔर मैं तो पात्र भी न था। इससे अहंकार को और विसर्जित होने देनातो और घटेगाऔर घटेगा। तुम्हारा पात्र जितना शून्य —होने लगेगा अहंकार सेउतना ही परमात्मा भरने लगेगा। एक घड़ी ऐसी आती है कि तुम सिर्फ शून्य—मात्र रह जाते हो—महाशून्य! उस महाशून्य में महापूर्ण उतरता है।
पहली किरण आई है अभी ताजी—ताजी सुबह कीअभी सूरज उगने को हैप्राची लाल हुईलाली आ गई है प्राची पर,प्राची लाल हो गई है—तुम कहीं अहंकार में आंख बंद मत कर बैठना। पहले तो यह पहली किरण पानी बहुत मुश्किल हैफिर पा कर खो देनी बहुत आसान है। जिन्हें नहीं मिलीउनका उतना खतरा नहीं है—उनके पास कुछ है ही नहीं। जिन्हें यह किरण मिलती हैउनके पास संपदा हैउन्हें खतरा है। उस खतरे से सावधान रहना। अहंकार निर्मित न हो बस! अनुग्रह का भाव और भी गहन होता जाएतो और भी होगाबहुत कुछ होगा! यह तो अभी शुरुआत है। यह तो अभी श्रीगणेशाय नम:! अभी तो शास्त्र प्रारंभ हुआ।

 हरि ओं तत्सत्!

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