मंगलवार, 15 अगस्त 2017

अष्‍टावक्र: महागीता-भाग-2 - प्रवचन--14

दिनांक: 9 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
अष्टावक्र उवाच।

            विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम्।
धर्ममष्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ।। 91।।
स्वप्तेन्द्रजालवत् पश्य दिनानि त्रीणि पैल वा।
मित्रक्षेत्रधना गारदारदायादिसम्पद ।।92 ।।
यत्र यत्र भवेतृष्णा संसार विद्धि तत्र वै।
प्रौढ़वैराग्यमाश्रित्य वीततृष्ण: सुखी भव ।। 93।।
तृष्णमात्रात्मको बंधस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्प्रर्मुहु ।। 94।।
त्वमेकश्चेतन: शद्धो जडं विश्वमसत्तथा।
अविद्यापि किंचित्सा का बुभुत्मा तथापि ते।। 95।।
राज्यं सता कलत्राणि शरीराणि सखानि च।
संसक्तस्यायि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि।। 96।।
अलमर्थेन कामेन सुकृतेनायि कर्मणा।
एभ्य: संसारकांतारे न विश्रांतमभून्मन: ।। 97।।
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।
दुखमायासदं कर्म तदताध्युपरम्यताम्!। 98।।



ष्टावक्र ने कहा
'वैरी-रूप काम को और अनर्थ से भरे अर्थ को त्याग कर और उन दोनों के कारण-रूप धर्म को भी छोड़ कर तू सबकी उपेक्षा कर।'



साधारणत: अर्थ और काम को छोड़ने को सभी ने कहा है। अष्टावक्र कहते हैं. 'धर्म को भी छोड़ कर। इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है।
धर्म की आत्यंतिक क्राति धर्म को भी छोड़ने पर ही घटित होती है। धर्म का आत्यंतिक लक्ष्य धर्म से भी मुक्त हो जाना है। अधर्म से अर्थ है. जो बुरा हैअकर्तव्य है। धर्म से अर्थ है. जो शुभ हैकर्तव्य है। अधर्म से अर्थ है : पाप। धर्म से अर्थ है : पुण्य। पाप से तो छूटना ही हैअष्टावक्र कहते हैंपुण्य से भी छूट जाना है। क्योंकि मूलत: पाप और पुण्य अलग- अलग नहीं हैंएक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और जो व्यक्ति पुण्य से बंधा हैवह पाप से भी बंधा रहेगा। पुण्य करने के लिए भी पाप करने होंगे। बिना पाप किए पुण्य नहीं किए जा सकते हैं।
तुम्हें दान देना होतो धन तो इकट्ठा करोगे न! धन इकट्ठा करने में पाप होगादान देने में पुण्य होगा। लेकिन धन इकट्ठा किए बिना कैसे दान करोगे?
ऐसा उल्लेख है कि लाओत्सु का एक शिष्य न्यायाधीश हो गया था। मुकदमा चलाएक आदमी चोरी में पकड़ा गया। गांव के सबसे बड़े नगरसेठ के घर में उसने डाका डाला थासेंध लगाई थी। पकड़ा गया था रंगे हाथोंइसलिए कुछ उलझन भी न थी। लाओत्सु के शिष्य न्यायाधीश ने छह महीने की सजा चोर को दी और बारह महीने की सजा नगरसेठ को दी। नगरसेठ तो हंसने लगा। उसने कहा ऐसा न्याय कभी सुना हैयह क्या पागलपन है?
सम्राट के पास बात गई कि यह तो हद हो गईमेरी चोरी हो और फिर मुझे दंड दिया जाए! लेकिन उस न्यायाधीश ने सम्राट को कहा. न यह इतना इकट्ठा करतान चोरी होती। चोरी नंबर दो हैइकट्ठा करना नंबर एक है। इसलिए छह महीने की सजा देता हूं चोर कोसाल की सजा देता हूं इस आदमी को
बात तो सम्राट को भी जंचीलेकिन नियम ऐसे नहीं चल सकते। सम्राट ने कहा बात में तो
बल हैलेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं। और इस आधार पर तोमैं भी अपराधी हो जाऊंगा। तुम नौकरी से इस्तीफा दे दो। तुम्हारी बात कितनी ही ठीक होव्यावहारिक नहीं है।
व्यवहार के नाम पर आदमी बहुत—सी बातें छिपाए चला जाता है। सत्य प्रगट नहीं हो पाताक्योंकि हम व्यवहार की आडू में छिपा लेते हैं।
मनुष्य—जाति के इतिहास में यह एक ही घटना हैजबकि चोर को भी दंड दिया गयाऔर जिसके घर चोरी हुई थी उसको भी दंड दिया गया। और इस घटना में बड़ा राज है। चोरी हो ही तब सकती है जब कोई धन को इकट्ठा कर ले।
तो धन को इकट्ठा करना तो पुण्य के लिए भी जरूरी होगा। तभी तो त्याग करोगे।
तुम देखते होअगर कोई गरीब आदमीकोई भिखमंगा घोषणा कर दे कि मैं सब त्याग करता हूं तो लोग हंसेंगे। लोग कहेंगेतुम्हारे पास है क्यात्याग तुम किस बात का करते हो?
कोई महावीरकोई बुद्ध जब त्याग करता हैतो उसकी घोषणा सदियों तक होती है। जैनों के शास्त्रों मेंमहावीर ने कितना त्याग कियाउसके बड़े बढ़ा—चढ़ा कर वर्णन हैं। कितने हाथीकितने घोडेकितने रथकितना स्वर्णकितनी अशर्फिया—वह बढा—चढ़ाया हुआ वर्णन है। उतना हो नहीं सकता था। क्योंकि महावीर एक बहुत छोटे—मोटे राजा के लड़के थे। उस राजा की हैसियत राजा जैसी नहीं थीएक बड़े मालगुजार जैसी थी। आज की भाषा में अगर कहेंतो एक तहसील से बड़ा वह राज्य न थातहसीलदार की हैसियत थी। इतना धन महावीर के घर में हो नहीं सकताजितना शास्त्रों में लिखा है। लेकिन क्यों शास्त्रों में बढ़ा—चढ़ा कर लिखा होगाक्योंकि शास्त्रकार महावीर को महात्यागी बताना चाहते थे। और त्याग को मापने का एक ही उपाय है. धन।
अब यह बडी हैरानी की बात है. यहां भोग भी धन से नापा जातायहां त्याग भी धन से नापा जाता! यहां अगर तुम किसी को प्रतिष्ठा देते हो तो भी धन के कारण। और अगर तुम कभी त्यागी को भी प्रतिष्ठा देते हो तो वह भी धन के कारण। धन की प्रतिष्ठा दिखाई पड़ती हैअंतिम है। उसके अतिरिक्त हमारे पास कोई मापदंड नहीं है। भिखमंगा छोड़े तो क्या छोड़ा?
इसलिए शायद जैनों के चौबीस तीर्थंकर ही राजपुत्र हैं। ऐसा तो नहीं है कि इन राजपुत्रों के काल में किसी गरीब ने त्याग न किया होगा। चौबीस ही राजपुत्र हैं. तीर्थंकर। बुद्ध भी राजा हैंकृष्णरामहिंदुओं के अवतार भी राजा हैं। थोड़ा सोचने जैसा है। धन की प्रतिष्ठा इतनी है कि अगर हम त्याग को भी मापेंगे तो वही तो एक मापदंड है। ये राजा रहे होंगेतब सम्मानित थे। फिर उन्होंने जब राज त्याग दियातब और भी सम्मानित हो गए।
लेकिन क्या यह त्याग का सम्मान हुआयह तो धन का ही सम्मान हुआ। भिखमंगा छोड़ कर खड़ा हो जाए तो तुम हसोगे। तुम कहोगे. था क्या तुम्हारे पासजो तुमने छोड़ दियालंगोटी भी नहीं थीनंगे तुम थे हीअब दिगंबर होने की घोषणा क्या करते हो?
तो त्याग के लिए भी धन होना चाहिए। और पुण्य के लिए भी पाप करना होगा। इसलिए जो लोग जीवन की व्यवस्था को समझते हैंवे कहेंगे. धर्म भी छोड़ देना होगापुण्य भी छोड़ देना होगा। ये दोनों बातें एक साथ छोड़ देनी होंगी।
इस सूत्र को समझने की कोशिश करें :

विहाय वैरिण काममर्थं चानर्थसंकुलम्।
धर्ममप्येतयोहेंतुं सर्वत्रानादरं कुरु।।
शत्रु है काम। क्यों समस्त शास्त्र सारी दुनिया केकाम को शत्रु कहते हैंक्या कारण होगा कहने काएक मत से शत्रु कहते हैं। हिंदू होंजैन होंबौद्ध होंईसाई हों—स्व मत से कहते हैं कि काम शत्रु है। क्या कारण होगा काम को शत्रु कहने का?उसे हम समझने की कोशिश करें।
काम का बल हीकाम—ऊर्जा की शक्ति इतनी विराट हैकि उसके पाश के बाहर होना सर्वाधिक कठिन हैकरीब—करीब असंभव जैसा है। मनोवैज्ञानिक तो मानते हैंउसके पार हुआ ही नहीं जा सकता। और मनोवैज्ञानिकों की बात भी समझ लेने जैसी है। क्योंकि काम में ही हुआ है हमारा जन्म। जो पहली स्फुरणा तुम्हारे जीवन की थीवह तुम्हारे मां और पिता की कामवासना ही थी। उसी तरंग से तुम आए होउसी तरंग से निर्मित हुए हो। तुम्हारा रोआ—रोआ काम से भरा है। तुम्हारा पहला अणु दो काम— अणुओं का जोड़ था। उससे तुम निर्मित हुए। फिर उन्हीं काम— अणुओं का फैलाव होता चला गया है। अब तुम्हारे पास करोड़ों सेल हैं शरीर मेंलेकिन प्रत्येक सेल काम—कोष्ठ है।
और तुम ऐसा मत सोचना कि स्त्री तुम्हारे बाहर ही है। क्योंकि जब तुम्हारा जन्म हुआ तो आधा अंग तो मां से मिला,आधा पुरुष से मिलापिता से मिला। तो तुम्हारे भीतर स्त्री—पुरुष दोनों मौजूद हैं। मात्रा का भेद हैपर दोनों मौजूद हैं।
हिंदुओं की धारणा हैअर्धनारीश्वर की। शंकर की तुमने प्रतिमाएं देखी होंगीजिनमें आधे वे पुरुष हैंआधे स्त्री। वह धारणा बड़ी बहुमूल्य है। तुम भी अर्धनारीश्वर होप्रत्येक व्यक्ति अर्धनारीश्वर हैअन्यथा होने का उपाय ही नहीं है। क्योंकि आधी तुम्हारी मां हैआधे तुम्हारे पिता हैंदोनों के मिलन से तुम निर्मित हुए हो। पुरुष में पिता की मात्रा ज्यादा हैस्त्री में मां की मात्रा ज्यादा हैपर यह मात्रा का भेद है। इसीलिए तो कभी घटना घटती है कि किसी व्यक्ति का काम बदल जाता हैलिंग बदल जाता है।
अभी दक्षिण भारत में एक युवती युवक हो गई। कोई बीस—बाईस साल तक युवती थीअचानक युवक हो गई। पश्चिम में बहुत घटनाएं घटी हैं। और अब तो शरीर—शास्त्री कहते हैं कि यह हमारे हाथ की बात हो जाएगी। लोग अगर अपना लिंग—परिवर्तन करना चाहें तो कर सकेंगे। कोई व्यक्ति ऊब गया पुरुष होने से तो स्त्री हो सकता है। कोई स्त्री ऊब गई स्त्री होने से तो पुरुष हो सकती है। यह तो सिर्फ थोड़े—से हारमोन बदल देने की बात हैमात्रा बदल देने की बात है।
तुम्हारे भीतरऐसा समझो कि अगर तुम पुरुष होतो साठ प्रतिशत पुरुष के जीवाणु हैंचालीस प्रतिशत स्त्री के जीवाणु हैं। बसइस अनुपात को बदल दिया जाएतो तुम स्त्री हो जाओगे।
काम से हुआ है जन्मदो विपरीत कामों के मिलन पर तुम्हारा जीवन खड़ा है। इसलिए यह करीब—करीब असंभव है—मनोवैज्ञानिक के हिसाब से तो बिलकुल असंभव है कि व्यक्ति कामवासना के पार हो जाए! धर्मशास्त्र भी यही कहते हैं। आत्मपुराण में बड़ा अदभुत वचन है.
कामेन विजितो ब्रह्माकामेन विजितो हर:।
कामेन विजितो विष्णु: शक्र: कामेन निर्जित।।
काम ने जीता ब्रह्मा कोकाम ने हराया शंकर कोकाम ने हराया विष्णु को—काम से कौन कब जीता! काम से सब हारे हैं।
काम का बल तो प्रबल है। और जिसका जितना ज्यादा बल प्रबल हैउसके पार होने में उतना ही संघर्षण होगा। इसलिए कहते हैं. वैरी—रूप काम। इस जगत में अगर टक्कर ही लेनी हो किसी सेअगर हिम्मत ही हो टक्कर लेने कीअगर संघर्ष करने का और युद्ध करने कायोद्धा बनने का रस हो—तो छोटे—मोटे दुश्मन मत चुनना। खयाल रखनाजितना बड़ा दुश्मन चुनोगे उतनी ही बड़ी तुम्हारी विजय होगी। छोटे —मोटे को हरा भी दिया तो क्या सार है?
कहते हैं जंगल में—ईसप की कथा है—एक गधे ने सिंह को चुनौती दे दी और कहा : अगर हो हिम्मत तो आ मैदान में और हो जाए सीधा युद्ध। लेकिन सिंह चुपचाप चला गया। सियार यह सुन रहा था। उसने थोड़ा आगे बढ़ कर सिंह को पूछा कि सम्राटबात क्या हैएक गधे की चुनौती को भी तुम स्वीकार नहीं किए!
उसने कहा पागल हुआ हैअगर उसकी चुनौती मैं स्वीकार करूंतो पहले तो अफवाह उड़ जाएगी कि सिंह गधे से लड़ा। यह बदनामी होगी। ऐसा कभी हुआ नहीं। यह हमारे कुलवंशपरंपरा में नहीं हुआ कि गधे से लड़े। लड़ना है गधे से. गधे को समाप्त कर दे सकते हैंलड़ना क्या हैअगर गधा हारा तो उसका कोई अपमान नहीं है। हम जीते भी तो कोई सम्मान नहीं। लोग कहेंगेक्या जीतेगधे से जीते! और कहीं भूल—चूक से जीत गया गधा—गधे हैं इनका भरोसा क्या—तों हम सदा के लिए मारे गए। इसलिए मैं चुपचाप चला आया हूं। गधे से झंझट में पड़ना ठीक नहीं है।
छोटे से अगर तुम उलझोगेजीते भी तो छोटे से जीते। और काश अगर हार गएतो छोटे से हारे! दुश्मन जरा सोच कर चुनना। मित्र तो कोई भी चल जाएगाशत्रु जरा सोच कर चुनना। शत्रु जरा बड़ा चुनना। क्योंकि चुनौतीसंघर्षण तुम्हें अवसर देगातुम्हारे अपने आत्म—विकास का।
तो जो बाहर की चीजों से लड़ते रहते हैंवे अगर जीत भी जाएं तो चीजों से ही जीतते हैं। सिकंदर हो कि तैमूरलंग हो,कि नादिरशाह हो कि नेपोलियन होफैला लें विस्तार सारे जगत पर अपनातो भी वस्तुओं पर ही विस्तार फैलता है।
इसलिए इस देश में हमने उनको सम्मान दिया जिन्होंने अपने को जीता। सबको भी जिन्होंने जीताउन्हें भी हमने वैसा आदर नहीं दियाहमने आदर उन्हें दियाजिन्होंने स्वयं को जीता। क्योंकि स्वयं को जीतने का एक ही उपाय है और वह है—काम—ऊर्जा से अतिक्रमण हो जानाकाम—ऊर्जा के पार हो जाना। काम—ऊर्जा के पार होने का अर्थ है : अपने जन्म से मुक्त हो जानाअपने जीवन से मुक्त हो जानाअपनी मृत्यु से मुक्त हो जाना।
काम—ऊर्जा ने तुम्हें जन्म दियाऔर काम—उर्जा की उत्कुल्लता ही तुम्हारी जवानी हैतुम्हारा जीवन है। और जब काम की ऊर्जा थक जाएगीऔर विसर्जित होने लगेगी—वही तुम्हारी मृत्यु होगी। तो तुम्हारे जीवन की सारी कथाप्रथम से ले कर अंत तक काम की कथा है। अगर तुम इस काम के अंतर्गत ही बने रहेतो तुम कभी मालिक की तरह न जीएएक गुलाम की तरह जीए।
स्वयं का मालिक बनना हो और अगर चुनौती ही स्वीकार करनी हो किसी कीतो स्वयं में छिपी इस चुनौती को ही स्वीकार कर लेना उचित है। इसलिए धर्म—शास्त्र काम को वैरी—रूप कहते हैं। यह सिर्फ निंदा नहीं हैइसमें सम्मान भी छिपा है। वे यह कहते हैं कि अगर शत्रुता ही करनी हो तो काम से करना। क्योंकि कामेन विजितो ब्रह्मा! काम ने ब्रह्मा को भी हराया। कामेन विजितो हर:। काम ने महादेव को भी हराया।
तो अब अगर लड़ने योग्य कोई है तो काम ही है। जिससे देवता भी हार गए होंउसको ही जीतने में मनुष्य के भीतर छिपा हुआ फूल खिलेगा। जिससे सब हार गए होंउसको ही जीतने में तुम्हारे भीतर पहली दफे प्रभु का साम्राज्य निर्मित होगा।
भारत अकेला देश हैजहां हमने बुद्धपुरुषों के चरणों में देवताओं को झुकाया है। जब सिद्धार्थ गौतम बुद्धत्व को उपलब्ध हुएतो कथा है कि ब्रह्माविष्णुमहेशतीनों उनके चरणों में अपना नैवेद्यअपनी पूजा चढ़ाने आए। जब महावीर परम ज्ञान को उपलब्ध हुएतो देवताओं ने फूल बरसाए। लेकिन देवता क्यों बरसाते होंगे फूल एक मनुष्य के चरणों मेंइसलिए कि यह मनुष्य उस सीमा के भी पार जा चुकाजिस सीमा के पार अभी देवता भी नहीं गए। अभी इंद्र भी अप्सराओं में उलझा है। अभी स्वर्ग में भी वही काम—व्यापार चल रहा हैजो पृथ्वी पर चल रहा है। थोड़ा व्यवस्थित चल रहा हैथोड़ा ढंग से चल रहा हैज्यादा सुंदर स्त्रियां हैंज्यादा सुंदर देह हैज्यादा लंबी आयु हैभोग की सब सुविधाएंसामग्रियां हैं।
जो हमने स्वर्ग में देवताओं के लिए व्यवस्था की हैवही व्यवस्था विज्ञान आदमी के लिए पृथ्वी पर कर देने की कोशिश कर रहा है।
मैंने तो सुना हैएक आदमी मरा और स्वर्ग पहुंचा। तो वह बड़ा हैरान हुआ। वहां उसने देखा कि कुछ लोग जंजीरों से बंधे हैं। स्वर्ग में जंजीरों से बंधे हैं! उसने द्वारपाल से पूछा कि यह तो मुझे घबड़ाहट का कारण मालूम होता है। नरक में बंधे होंयह समझ में आता है। यह स्वर्ग में भी अगर बंधन हैं और लोग जंजीरों से बंधे हैं—यह किस तरह का स्वर्ग है 1:
वह द्वारपाल हंसने लगा। उसने कहाये अमरीकी हैं। ये जब से आए हैंतब से यह धुन लगाए हैं कि हमें अमरीका वापिस जाना हैयहां से तो वहीं बेहतर था।
विज्ञान कोशिश कर रहा है कि स्वर्ग को जमीन पर घसीट लाएलेकिन जमीन पर विज्ञान स्वर्ग ले आएतो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम्हारी कामवासना को कितनी ही तृप्ति की सुविधा जुटा दी जाएतृप्ति नहीं होगी। क्योंकि कामवासना का स्वभाव अतृप्ति है। जो मिल जाता हैउससे ही अतृप्ति हो जाती है। जो नहीं मिलाउसी में रस होता है। काम के इस स्वभाव को समझो—यही उसका बंधन हैयही उसका वैरी—रूप है।
जो मिल जाता हैवही व्यर्थ हो जाता है। जिस स्त्री को तुम चाहते थेमिल गईजिस पुरुष को तुमने चाहामिल गया—बसतत्‍क्षण तुम किसी और की चाह में लग गए।
बायरनअंग्रेजी का कवि हुआ। उसका अनेक स्त्रियों से संबंध था। सुंदर पुरुष थाप्रतिभाशाली पुरुष थाऔर महीने —दों—महीने से ज्यादा उसका संबंध नहीं चलता था। लेकिन एक स्त्री ने उसे बिलकुल मजबूर कर दिया विवाह करने को। उसने कहा,विवाह नहीं किया तो हाथ भी नहीं छुऊंगी। और वह दीवाना हो गया उसे अपने करीब लेने को। आखिर विवाह के लिए राजी होना पड़ा। जब वह विवाह हो गया और चर्च से बायरन उतरता था अपनी नई विवाहित पत्नी का हाथ पकड़े हुएसीढ़ियां पार कर रहा थाठिठक कर खड़ा हो गया। उसने अपनी पत्नी से कहाआश्चर्य! मैं तेरे लिए दीवाना थामहीनों सोया नहींऔर अभी क्षण भर के लिए तेरा हाथ मेरे हाथ में हैलेकिन तेरी मुझे सुधि भूल गई। राह से वह जो स्त्री जा रही हैमेरा मन उसके पीछे चला गया।
अभी विवाह नहीं हुआऔर तलाक शुरू हो गया!
जो मिल जाता हैउसमें हमारा रस खो जाता है। तुम एक मकान बनाना चाहते थे बहुत दिन सेबना लियाजब तक नहीं बना थातब तक खूब सपने देखेखूब सोचाखूब विचारावही—वही धुन थीफिर मकान बन गया। एक दिन अचानक तुम थके—मांदे खड़े हो—कुछ भी तो नहीं मिला! अब तुम और दूसरा मकान बनाने की सोचने लगे।
काम की लक्षणा यही है कि वह तुम्हें कभी तृप्त न होने देगातृप्ति का वहां कोई उपाय नहीं। अतृप्ति की जलती हुई आग ही काम का स्वरूप है।
'वैरी—रूप काम कोऔर अनर्थ से भरे अर्थ को त्याग कर..। '
हिंदुओं ने चार पुरुषार्थ कहे हैं : अर्थकामधर्ममोक्ष। काम है साधारण आदमी की वासनाऔर अर्थ है उसे भरने का उपाय। धन की हम आकांक्षा इसलिए करते हैं कि हमारी कोई कामनाएं हैंजिन्हें पूरा बिना धन के न किया जा सकेगा। अगर धन हैतो सुंदर स्त्री उपलब्ध हो सकती है। निर्धन को तो बचा—खुचाजो शेष रह जाता हैवही उपलब्ध होता है। अगर धन है तो तुम जो चाहते होवह तुम्हारे हाथ में हो सकता है। अगर निर्धन हो तो चाहते रहोचाहने से कुछ भी नहीं होता। धन चाह को यथार्थ बनने में सहयोगी होता है।
इसलिए एक बहुत मजे की बात हैतुम धनी से ज्यादा अतृप्त आदमी कहीं भी न पाओगे। निर्धन को तो आशा रहती है,धनी की आशा भी मर जाती है। निर्धन को आशा रहती है—आज नहीं कल धन हाथ में होगातो कर लेंगे जो भी करना है—धन के पीछे दौड़ता रहता है। धनी के पास धन है जो करना हैकरने की सुविधा है। लेकिन करने में कुछ अर्थ नहीं मालूम होता। इसलिए धनी व्यक्ति अनिवार्यरूपेण अशांतअतृप्त हो जाता है।
तुम गरीब आदमी को पागल होते न देखोगेअमीर आदमी को 'पागल होते देखोगे। अमीर मुल्कों में ज्यादा पागलपन घटता है। गरीब मुल्कों में मनोवैज्ञानिक अभी है ही नहींअभी मनोविश्लेषक है ही नहीं। बंबई में शायद एकाध कोई या पूना में एकाध कोई मनोविश्लेषक हो। लेकिन इस साठ करोड़ के मुल्क में तुम कहीं मनोविश्लेषक को न पाओगेउसकी कोई जरूरत भी नहीं है। लेकिन न्यूयार्क में वह फैलता जा रहा है। उसकी संख्या उतनी ही होती जा रही हैजितनी कि शरीर के चिकित्सकों की है। संभावना तो यह है कि इस सदी के पूरे होते —होतेमन के चिकित्सकों की संख्या ज्यादा होगी शरीर के चिकित्सकों से। क्योंकि शरीर के लिए तो सारी सुविधाएं पश्चिम में मिलती जा रही हैं। और जितनी शरीर की सुविधाएं मिलती हैंउतना मन पागल होता जा रहा है।
मेरे देखेअगर गरीब आदमी धार्मिक हो तो यह चमत्कार है। और अगर आदमी अमीर हो और धार्मिक न होतो यह भी चमत्कार है। गरीब आदमी धार्मिक हो तो अपवाद—स्वरूप है। क्योंकि गरीब आदमी को अभी मन से मुक्त होने का मौका कहां मिलाअभी तो मन की पीड़ा भी उसने नहीं जानी। अभी तो आशा टूटी नहीं है। इसलिए गरीब आदमी जब कभी धार्मिक हो जाएतो अपवाद—स्वरूप है। धार्मिक आदमी अगर अमीर है तो बिलकुल स्वाभाविक हैऐसा होना ही चाहिए था। अमीर आदमी को धार्मिक होना ही चाहिएक्योंकि अब इस जगत में कुछ हैइसकी आशा समाप्त हो गई। उसके पास सब है। कोई एंड्रू कारनेगीकोई रॉकफेलरसब है उनके पास। जो खरीदना होसब खरीदा जा सकता है। जितनी मात्रा में खरीदना होखरीदा जा सकता है। जो खरीदा जा सकता हैखरीदने की क्षमता उससे ज्यादा है उनके पास। अब क्या करें?
तो अगर धार्मिक आदमी अमीर होतो साधारण बात हैहोना ही चाहिएगरीब होतो असाधारण घटना है। और अगर अमीर धार्मिक आदमी न होतो बड़ी असाधारण घटना हैऐसा होना नहीं चाहिए। इसके दो ही अर्थ हो सकते हैं. या तो वह बुद्ध हैमूढ़ हैऔर या फिर अभी ठीक से धनी नहीं हुआ। ठीक से धनी हो और बुद्धि पास होतो धार्मिक होने के सिवाय कोई उपाय नहीं। गरीब आदमी को धार्मिक होना हो तो बड़ी प्रखर प्रतिभा चाहिए। अमीर आदमी को अगर धार्मिक होने से बचना हो तो बड़ी प्रखर मूढ़ता चाहिए।
भारत जब धनी था तो धार्मिक था। स्वर्ण —युग था भारत का बुद्ध—महावीर के समय में। शिखर पर था भारत दुनिया मेंसोने की चिड़िया था! सारी दुनिया भारत की तरफ देखती थीसारा धन जैसे यहां इकट्ठा था। उन घड़ियों में हमने जो शिखर छुए धर्म केफिर नहीं छू सके हमफिर सपना हो गया सब।
गरीब आदमी धार्मिक दिखाई भला पड़ेहो नहीं सकता। क्योंकि गरीब आदमी का अभी भी भरोसा अर्थ में है। अभी तो कामना ही पकड़े हुए है। अभी तो जीवन की छोटी—मोटी जरूरतें पूरी नहीं हुईंधर्म तो जीवन की बड़ी आखिरी जरूरत है। कहते हैं, ' भूखे भजन न होय गोपाला!वह जो भूखा आदमी हैकैसे भजन करेउसके भजन में भी भूख की छाया होगी। उसके भजन में भी भूख होगी। वह भजन भी करेगा तो रोटी ही मांगेगा। उसके भजन में परमात्मा की मांग नहीं हो सकती। जब जीवन की छोटी जरूरतें पूरी हो जाती हैंशरीरमन की दौड़ के लिए सब उपाय हो जाते हैंतब अचानक पता चलता है कि यहां तो पाने योग्य कुछ भी नहीं है। तो कहीं और है पाने योग्यउसकी खोज शुरू होती है।
धर्म की यात्रा तभी शुरू होती हैजब अर्थ और काम की यात्रा व्यर्थ हो जाती है।
तो दो यात्राएं हैं इस जगत मेंएक है—अर्थकाम। अर्थ है साधनकाम है साध्य। फिर दूसरी यात्रा है—धर्ममोक्ष। धर्म है साधनमोक्ष है साध्य। तो साधारणत:ऐसा समझा गया है कि जिस आदमी को मोक्ष पाना होउसे धर्म कमाना चाहिए। जैसे,जिस व्यक्ति को कामना तृप्त करनी होउसे धन कमाना चाहिए। क्योंकि धन के बिना कैसे तुम कामना तृप्त करोगेजिसको काम का जगत पकड़े होउसे अर्थ कमाना चाहिए। और जिस व्यक्ति को यह बात व्यर्थ हो गईअब उसे मुक्त होना हैपरम मुक्ति का स्वाद लेना है—उसे धर्म कमाना चाहिए। यह साधारण धर्म की व्यवस्था है।
अष्टावक्र बड़ी क्रांतिकारी बात कह रहे हैं। वे कह रहे हैं : जिस व्यक्ति को वस्तुत: मोक्ष पाना होउसे धर्म से भी मुक्त हो जाना चाहिए। क्योंक्योंकि मोक्ष को कामना नहीं बनाया जा सकता। मोक्ष का स्वभाव ऐसा है कि तुम उसकी चाह नहीं कर सकते। जिसकी भी तुमने चाह कीवह मोक्ष नहीं रह गया। तुम्हारी चाह अगर पीछे खड़ी हैतो तुम जो भी चाहोगेवह संसार हो गया। मोक्ष का कोई साधन नहीं है। धर्म भी मोक्ष का साधन नहीं है।
यह तो हमारी गणित की दुनिया है। हम कहते हैंयहां कामवासना पूरी करनी है तो धन कमाओ और अगर मोक्ष पाना है तो धर्म कमाओ। लोग धर्म भी कमाते हैंजैसा धन कमाते हैं। लोग पुण्य को भी तिजोरी में भरते चले जाते हैंजैसे सिक्कों को भरते हैं। जैसे खाते—बही बनाते हैंऔर बैंक—बैलेंस रखते हैंवैसा ही पुण्य का भी हिसाब रखते हैं। परमात्मा के सामने खोल कर रख देंगे अपनी किताब कि ये—येइतने—इतने पुण्य किए थेइनका बदला चाहिए।
साधारण आदमी का तर्क यही है कि जीवन में सब कुछ सौदा हैव्यवसाय है।
अष्टावक्र कहते हैं. मोक्ष कोई सौदा नहींकोई व्यवसाय नहींतुम्हारे कुछ करने से न मिलेगा। प्रसादरूप है यह। तुम्हारी चाह से नहीं फिलेगा। तुम्हारी चाह के कारण ही तुम चूक रहे हो। मोक्ष तो मिला ही हुआ है—तुम्हारी चाह के कारण तुम नहीं देख पा रहेचाह ने तुम्हें अंधा किया है। तुम चाहत छोड़ोतुम चाह छोड़ो। तुम बिना चाह के थोड़ी देर रह कर देखो—अचानक पाओगेमोक्ष की किरणें तुम्हारे भीतर उतरने लगीं!
तो मोक्ष कोई साध्य नहीं हैजिसका साधन हो सके—मोक्ष स्वभाव है। मोक्ष है हीहम मोक्ष में ही जी रहे हैं।
मैंने सुना हैएक मछली बचपन से ही सुनती रही थी सागर कीमहासागर की बातें। शास्त्रों में भी मछलियों के महासागर की बातें लिखी हैं। बड़े ज्ञानी थे जो मछलियों मेंवे भी महासागर की बातें करते थे। वह मछली बड़ी होने लगीबड़ी चिंता और विचार में पड़ने लगी कि महासागर है कहांअब जब मछली सागर में ही पैदा हुई हो तो सागर का पता नहीं चल सकता। सागर में ही बड़ी हुई तो सागर का पता नहीं चल सकता। वह पूछने लगी कि यह महासागर कहां हैलोगों ने कहा,हमने सुनी हैं ज्ञानियों से बातेंसुनी है वार्तादेखा तो किसी ने भी नहीं। कुछ धन्यभागी मछलियांकोई बुद्ध—महावीरकोई कृष्ण—राम जान लेते होंगेबाकी साधारण मछलियांहम तो सिर्फ सुन कर मानते हैं कि है महासागर कहीं।
वह बड़ी चिंता में रहने लगी। उसका जीवन बड़ा विक्षुब्ध हो गया। वह बड़ी विचारशील मछली थी। वह भूखी—प्यासी भी पड़ी रहती और सोचती रहती कि कैसे महासागर पहुंचेवह अद्वितीय घटना कैसे घटेगीमहासागर का लोभ उसके मन में समाने लगा। वह सूखने लगीवह दुर्बल होने लगी। फिर कोई एक अतिथि मछली पड़ोस की नदी से आई थी। उसने उसकी यह हालत देखी। उसने कहापागल! जिसे तू खोजती हैवह चारों तरफ मौजूद हैहम उसी के भीतर हैं। न तो भूखे मरने की जरूरत हैन ध्यान करने की जरूरत हैन जप करने की जरूरत है—महासागर है ही। महासागर के बिना हम हो ही नहीं सकते।
जैसा उस मछली को बोध दिया गयाअष्टावक्र जैसे सदगुरु हमें भी यही कह रहे हैं कि हम मोक्ष में हैं हीपरमात्मा हमें चारों तरफ से घेरे हुए है! उसी में हमारा जन्म हैउसी में जीवन हैउसी में हमारा विसर्जन है। लेकिन इतना निकट है परमात्माइसलिए दिखाई नहीं पड़ता। दूर होता तो हम देख लेते। आंखें हमारी दूर को देखने में समर्थ हैं। जो निकट हैवही चूक जाता है। जो बहुत पास हैवह भूल जाता है। और परमात्मा से ज्यादा निकट कोई भी नहीं। मछली के लिए तो उपाय भी है कि कोई उसे उठाकर रेत के किनारे पर डाल दे तो तड़प ले और पता चल जाए उसे कि सागर का छूट जाना कैसा होता है। हमारे लिए तो वह भी उपाय नहीं हैपरमात्मा के बाहर हम जा ही नहीं सकते।
अष्टावक्र की उदघोषणा यही है कि तुम धर्म की चिंता में मत पड़ना। परमात्मा को पाने के लिए कुछ भी करना जरूरी नहीं हैवह मिला ही हुआ है। मोक्ष कहीं भविष्य में नहीं है—मोक्ष अभी और यहीं है। मोक्षतुम्हारी चाह से शून्य अवस्था का नाम है।
वैरिण कामम्.......।
काम है शत्रु क्योंकि वह तृप्त न होने देगा। शत्रु तो वही न जो तृप्त न होने दे! यह शत्रु का अर्थ समझो। मित्र तो वही न जो तृप्ति देविश्रांति देजिसके पास बैठकर आराम मिले! जिसके पास बैठकर सुख हो—मित्र वही। जिसके साथ रहकर दुख ही दुख होजिसकी दोस्ती में सिवाय कीटों के कभी कुछ और न मिलेजो फूलों का भरोसा देलेकिन परिणाम में हमेशा काटे हाथ आएं—शत्रु। वैरिण कामम् अनर्थसंकुलम् अर्थम्!
और अष्टावक्र कहते हैं : जिसको तुम अर्थ कहते होवह अनर्थ है। जिसको तुम धन कहते होअर्थअर्थशास्त्र,इक्यामिक्सवह अनर्थ का शास्त्र है। दुनिया में जितना अनर्थ हो रहा हैवह धन के कारण होता है। इसलिए कुछ दुनिया के विचारक तो इस सीमा तक पहुंच गए कि उन्होंने कहा. जब तक दुनिया में धन हैतब तक शांति नहीं हो सकती।
तुमने निन्यानबे के चक्कर की कहानी पढ़ी है नवह अनर्थ की घटना है। कहानी सीधी—साफ हैसरल हैमनुष्य को ठीक से प्रगट करती है।
एक सम्राट का एक नौकर थानाई था उसका। वह उसकी मालिश करताहजामत बनाता। सम्राट बड़ा हैरान होता था कि वह हमेशा प्रसन्नबड़ा आनंदितबड़ा मस्त! उसको एक रुपया रोज मिलता था। बसएक रुपया रोज में वह खूब खाता—पीता,मित्रों को भी खिलाता—पिलाता। सस्ते जमाने की बात होगी। रात जब सोता तो उसके पास एक पैसा न होतावह निश्चित सोता। सुबह एक रुपया फिर उसे मिल जाता मालिश करके। वह बड़ा खुश था! इतना खुश था कि सम्राट को उससे ईर्ष्या होने लगी। सम्राट भी इतना खुश नहीं था। खुशी कहां! उदासी और चिंताओं के बोझ और पहाड़ उसके सिर पर थे। उसने पूछा नाई से कि तेरी प्रसन्नता का राज क्या हैउसने कहामैं तो कुछ जानता नहींमैं कोई बड़ा बुद्धिमान नहीं। लेकिनजैसे आप मुझे प्रसन्न देख कर चकित होते हैंमैं आपको देख कर चकित होता हूं कि आपके दुखी होने का कारण क्या है पुन मेरे पास तो कुछ भी नहीं है और मैं सुखी हूंआपके पास सब हैऔर आप सुखी नहीं! आप मुझे ज्यादा हैरानी में डाल देते हैं। मैं तो प्रसन्न हूं क्योंकि प्रसन्न होना स्वाभाविक हैऔर होने को है ही क्या?
वजीर से पूछा सम्राट ने एक दिन कि इसका राज खोजना पड़ेगा। यह नाई इतना प्रसन्न है कि मेरे मन में ईर्ष्या की आग जलती है कि इससे तो बेहतर नाई ही होते। यह सम्राट हो कर क्यों फंस गएन रात नींद आतीन दिन चैन हैऔर रोज चिंताएं बढ़ती ही चली जाती हैं। घटना तो दूरएक समस्या हल करोदस खड़ी हो जाती हैं। तो नाई ही हो जाते।
वजीर ने कहाआप घबडाएं मत। मैं उस नाई को दुरुस्त किए देता हूं।
वजीर तो गणित में कुशल था। सम्राट ने कहाक्या करोगेउसने कहाकुछ नहीं। आप एक—दो —चार दिन में देखेंगे। वह एक निन्यानबे रुपये एक थैली में रख कर रात नाई के घर में फेंक
आया। जब सुबह नाई उठातो उसने निन्यानबे गिनेबस वह चिंतित हो गया। उसने कहाबस एक रुपया आज मिल जाएतो आज उपवास ही रखेंगेसौ पूरे कर लेंगे!
बसउपद्रव शुरू हो गया। कभी उसने इकट्ठा करने का सोचा न थाइकट्ठा करने की सुविधा भी न थी। एक रुपया मिलता थावह पर्याप्त था जरूरतों के लिए। कल की उसने कभी चिंता ही न की थी। 'कलउसके मन में कभी छाया ही न डालता थावह आज में ही जीया था। आज पहली दफा 'कलउठा। निन्यानबे पास में थेसौ करने में देर ही क्या थी! सिर्फ एक दिन तकलीफ उठानी थी कि सौ हो जाएंगे। उसने दूसरे दिन उपवास कर दिया। लेकिनजब दूसरे दिन वह आया सम्राट के पैर दबानेतो वह मस्ती न थीउदास थाचिंता में पड़ा थाकोई गणित चल रहा था। सम्राट ने पूछाआज बड़े चिंतित मालूम होते होमामला क्या है?
उसने कहा : नहीं हजूरकुछ भी नहींकुछ नहीं सब ठीक है।
मगर आज बात में वह सुगंध न थी जो सदा होती थी। 'सब ठीक है'—ऐसे कह रहा था जैसे सभी कहते हैंसब ठीक है। जब पहले कहता था तो सब ठीक था ही। आज औपचारिक कह रहा था। सम्राट ने कहानहीं मैं न मानूंगा। तुम उदास दिखते होतुम्हारी आंख में रौनक नहीं। तुम रात सोए ठीक से त्र:
उसने कहाअब आप पूछते हैं तो आपसे झूठ कैसे बोलूं! रात नहीं सो पाया। लेकिन सब ठीक हो जाएगाएक दिन की बात है। आप घबडाएं मत।
लेकिन वह चिंता उसेकी रोज बढ़ती गई। सौ पूरे हो गएतो वह सोचने लगा कि अब सौ तो हो ही गएअब धीरे — धीरे इकट्ठा कर लेंतो कभी दो सौ हो जाएंगे। अब एक—एक कदम उठने लगा। वह पंद्रह दिन में बिलकुल ही ढीला—ढाला हो गया,उसकी सब खुशी चली गई। सम्राट ने कहाअब तू बता ही दे सच—सचमामला क्या हैमेरे वजीर ने कुछ किया?
तब वह चौंका। नाई बोलाक्या मतलबआपका वजीर.अच्छातो अब मैं समझा। अचानक मेरे घर में एक थैली पड़ी मिली मुझे—निन्यानबे रुपए। बसउसी दिन से मैं मुश्किल में पड़ गया हूं। निन्यानबे का फेर!
सारे अनर्थ की जड़ में कहीं अर्थ है। दुनिया में आज पर्याप्त संपत्ति है कि सभी लोग सुखी हो सकें। लेकिन कब्जा करने वालों की दौड़ इतनी हैमालकियत का नशा इतना है कि यह असंभव हैयह हो नहीं सकता। दुनिया आज इतनी संपन्न हो सकती है कि कोई आदमी दुखी न होकिसी को रोटीरोजीकपड़े की कोई तकलीफ न होदवाछप्पर का कोई अभाव न हो—लेकिन यह हो नहीं सकता। क्योंकि कुछ लोग बिलकुल दीवाने हैं और पागल हैं। उनका एक ही रस है जीवन में—ढेर लगाना धन का। यह आब्सेशन हैयह एक विक्षिप्त चित्त की दशा है। कितनी हत्याएंकितने युद्ध—वें सभी अर्थ के कारण हैं! कितनी राजनीति—वह सब अर्थ के कारण है।
टालस्टॉय ने लिखा है कि दुनिया में शांति न होगीजब तक सिक्के चलते रहेंगे। शायददुनिया में ऐसा तो कभी नहीं होगा कि सिक्के न चलें। क्योंकि वह भी अड़चन का कारण होगाबहुत अड़चन हो जाएगी खडी। आज तो हम सोच ही नहीं सकते कि आदमी बिना सिक्के के रह सकता है। इसलिए टालस्टॉय जैसे अराजकवादियों की बात कभी सुनी जाएगीयह तो ठीक नहीं है। और मैं मानता भी नहीं कि सुनी जानी चाहिए। लेकिन सिक्कों के पागलपन से आदमी का छुटकारा हो सकता है।
खयाल करेंजिस आदमी को धन के पीछे तुम दौड़ते पाओगेउस आदमी को अगर गौर से देखो तो एक बात तुम्हें पक्की मिलेगीउस आदमी के जीवन में प्रेम न मिलेगा। कृपण प्रेमी नहीं होता—हो ही नहीं सकता! और प्रेमी कभी कृपण नहीं होता। तो ऐसा लगता हैजितना जीवन में प्रेम होता हैधन का पागलपन उतना 'ही कम होता है। और जितना जीवन में प्रेम कम होता हैधन का पागलपन उतना ही ज्यादा होता है। धन प्रेम की परिपूर्ति है। हृदय प्रेम से खाली रह गया है तो किसी चीज से भरना होगा। वह जो भीतर की रिक्तता हैघबडाती हैडर पैदा होता है कि मैं भीतर खाली—खालीभर लूं किसी चीज से!
मनस्विद कहते हैं कि बच्चा जब पहली दफे पैदा होता हैतो उसके जीवन में जो पहली महत्वपूर्ण घटना घटती हैवह है मां का स्तन। और मां के स्तन से दो चीजें साथ—साथ बहती हैं उस बच्चे में—प्रेम और दूध। अगर मां बच्चे को प्रेम करती है तो बच्चा कभी बहुत फिक्र नहीं करता कि ज्यादा दूध पी ले। सच तो यह है कि मां बच्चे को प्रेम करती है तो बच्चे को बहुत फुसलाना पड़ता हैसमझाना पड़ता हैतब वह दूध पीता है। वह फिक्र ही नहीं करता दूध वगैरह पीने की। वह इतना भरा रहता है प्रेम से कि दूध से भरने की इच्छा पैदा नहीं होती। अगर बच्चे को शक हो जाए कि मां प्रेम नहीं करतीया सौतेली मां हैया नर्स हैया मां की उपेक्षा हैचाहती नहीं थीबच्चा जबर्दस्ती पैदा हो गया हैबर्थ—कंट्रोल की टिकिया शायद काम नहीं कर सकीइसलिए पैदा हो गया हैएक तिरस्कार है—तो बच्चा जल्दी ही समझ जाता हैफिर वह बहुत दूध पीने लगता है। क्योंकि घड़ी भर बाद दूध मिलेगा या नहींइसका भरोसा नहीं। कल की चिंता पकड़ लेती है। तो वह मां के स्तन से लगा ही रहता है। और जितना वह ज्यादा पीता हैउतना मां हटाती है उसको कि हो गया बहुत। जितना मां कहती हैहो गया बहुतहटो—उतना ही उसको घबड़ाहट पैदा होती है भविष्य की. इकट्ठा कर लूं दूध को इकट्ठा कर लूंजितना हो सके इकट्ठा कर लूं!
तुमने देखागरीब बच्चों के पेट बड़े मिलेंगेअमीर घर के बच्चों के पेट बड़े नहीं मिलेंगे। गरीब बच्चों के शरीर तो दुबले हो जाएंगेपेट खूब बड़ा हो जाएगा। यह सबूत है कि बच्चा डरा हैकल रोटी मिलेगी या नहींइसका कुछ पक्का नहीं है। फिर यही भय पूरे जीवन पर फैल जाता है।
धन यानी रोटी। धन यानी दूध। धन यानी कल का भरोसा। धन यानी कल की सुरक्षा।
आदमी बैंक में बैलेंस रखता हैइंश्योरेंस करवाता है—वह कल का इंतजाम कर रहा है। वह यह कह रहा हैकल की फिक्र नहीं रहेगी। कल बूढ़े हो जाएंबीमार हो जाएं—कोई फिक्र नहींपैसा पास में है तो सब सुरक्षा है। वह कहता हैप्रेम न भी हो तो चलेगापैसा तो होना ही चाहिए। प्रेम को क्या खाओगेपीयोगे—क्या करोगेफिर वह कहता है कि पैसा होगा तो प्रेम तो बहुत मिल जाएगा। जिसको पैसे का पागलपन होता हैवह सोचता है हर चीज पैसे से खरीदी जा सकती है। नहींजीवन में कुछ महत्वपूर्ण चीजें हैंजो पैसे से नहीं खरीदी जा सकतीं। सच तो यह हैजो भी महत्वपूर्ण है वह पैसे से नहीं खरीदा जा सकता—न प्रेमन प्रार्थनान परमात्मा। जीवन में जो क्षुद्र है और व्यर्थ हैवही पैसे से खरीदा जा सकता है। पैसा स्वयं क्षुद्र है। क्षुद्र से क्षुद्र ही मिल सकता है। तो आदमी इकट्ठा करता जाता है। वह कहता है : प्रेम कल कर लेंगेआज तो पैसा इकट्ठा कर
लूं। कल निश्चित हो जाएंगेफिर प्रेम कर लेंगेफिर गीत गा लेंगेफिर वीणा बजा लेंगेफिर विश्राम करेंगे—आज तो कमा लूं! कल को हम कहते हैंछोड़ोआज कमा कर कल का इंतजाम कर लें। कल भी आज की तरह आएगा। फिर भी तुम यही करते रहोगे कि कल के लिंए कमा लेंकल के लिए कमा लें। एक दिन मौत आ जाती है और कल कभी नहीं आता। धन का ढेर बाहर लग जाता हैऔर तुम नंगे भिखारी हो जाते हो। धन का ढेर लग जाता हैभीतर निर्धनता गहरी हो जाती हैभीतर घाव ही घाव हो जाते हैं। धीरे— धीरे तुम प्रेम करना भूल ही जाते हो।
धनअर्थ अनर्थ है। इसे पहचानना। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि धन को छोड़ कर भाग जाओ। मैं तुमसे सिर्फ इतना कह रहा हूं कि जाग जाओ। धन का उपयोग है। मैं कोई अराजकवादी नहीं हूं और न धन—विरोधी हूं। धन का उपयोग है। धन की बाह्य उपयोगिता है। लेकिन धन से अपने को भरने की चेष्टा मत करनावह नहीं हो सकतावह असंभव है। असंभव को करोगे तो जीवन नष्ट हो जाएगाअनर्थ हो जाएगा।
धन से कुछ चीजें मिलती हैंजरूर मिलती हैं—और उन चीजों का मूल्य भी हैलेकिन उन चीजों से कोई तृप्ति नहीं मिलती।
जीसस का वचन है : मैन कैन नॉट लिव बाइ बेड अलोन। आदमी अकेली रोटी से नहीं जी सकता। दूसरा वचन भी जोड़ा जा सकता है कि आदमी बिना रोटी के भी नहीं जी सकतावह भी सच है। रोटी चाहिएलेकिन रोटी पर्याप्त नहीं हैरोटी से कुछ ज्यादा चाहिए। जिस दिन तुमने समझा कि धन पर्याप्त हैउस दिन अनर्थ हुआ। जब तक तुमने समझा कि धन की उपयोगिता है एक सीमा तक और तुम सीमा के भीतर सजग रहे—फिर कोई हर्ज नहीं है। तो तुमने धन का उपयोग किया और धन ने तुम्हारा उपयोग नहीं किया। तुम मालिक रहे और धन मालिक न हुआ। संक्षिप्त में कहें तो ऐसा कह सकते हैं. जब अर्थ तुम्हारा मालिक हो जाए तो अनर्थ हो गया। जब अर्थ के तुम मालिक होते हो—तब अंर्थअन्यथा अनर्थ।
वैरिणम् कामम् अनर्थसंकुलम् अर्थम् एतयो:
हेतुम् वर्मन् अपि विहाय सर्वत्र अनादरम् कुरु।
और इन सबके भीतर—यह सूत्र बड़ा क्रांतिकारी है—और इन सबके भीतरसबका मूलरूप कारणसारे अनर्थकाम और धन की दौड़ के पीछे जो मूल कारण हैवह धर्म है। यह तुम चौकोगे सुन कर। क्योंकि तुमने सदा यही सुना है कि धर्म तो त्राण हैकि धर्म तो नाव है जिसमें बैठ कर हम उस पार उतर जाएंगे। और अष्टावक्र कहते हैंइन दोनों का कारण—रूप धर्म है। इस सारे उपद्रव का कारण धर्म है। क्यों?
धर्म का अर्थ है कि मोक्ष पाना है। धर्म का अर्थ है कि मोक्ष पाने के लिए कुछ करना है। यह मूल कारण है उपद्रव का। तृप्ति के लिए कुछ करना है—फिर उसी से अर्थ भी पैदा होता हैउसी से काम भी पैदा होता है। मोक्ष की उदघोषणा यह है कि कुछ करना नहीं हैतुम मुक्त पैदा हुए हो। इस क्षण अभी और यहीं मोक्ष तुम्हारा स्वभाव है। तुम्हारी उदघोषणा की भर बात है। तुम जब चाहो घोषणा कर दो—और उसी क्षण से आनंद की वर्षा हो जाएगी। समझने की कोशिश करो।
साधारणत: हम चीजों को हमेशा दो में बांट देते हैं—साधन और साध्य। साध्य होता है भविष्य
मेंसाधन होता है अभी। मोक्ष के संबंध में या परमात्मा के संबंध में बात उल्टी है। मोक्ष अभी है यहीं है। किसी साधन की कोई जरूरत नहीं है—सिर्फ जागना है। सिर्फ आंख खोल कर देखना है—सूरज निकला हुआ है। रात कहीं भी नहींतुम पलक बंद करके बैठे होइसलिए अंधेरा मालूम हो रहा है।
किसी साधन की कोई भी जरूरत नहीं हैक्योंकि साधन का तो मतलब यह होगा कि आज तैयारी करेंगेतब कल मिलेगा। यह तो फिर वही दौड़ शुरू हो गई। आज धन कमाएंगे तो कल धनी होंगे। आज स्त्री खोजेंगेतो कल मिलेगी। यह तो फिर परमात्मा के नाम पर भी वही दौड़ शुरू हो गई। नहींपरमात्मा आज है! संसार कल है और परमात्मा आज है संसार में —सदा दौड है और परमात्मा सदा मंजिल है। संसार मार्ग है और परमात्मा लक्ष्य है। वह लक्ष्य मौजूद ही हैतुम्हें कहीं जाना भी नहीं। तुम उसी में घिरे बैठे हो। वही तुम्हारे भीतर है और वही तुम्हारे बाहर है।
'तू सबकी उपेक्षा करअनादर कर। सर्वत्र! अर्थकाम और धर्मइन तीनों का तू अनादर कर। तेरे मन से साधन—मात्र अनादृत हो जाएं। '
ये तीनों साधन हैं। इन तीनों का अनादर हो जाएतो जो शेष रह जाएगा वही मोक्ष है।
'मित्रखेतधनमकानस्त्रीभाई आदि संपदा को तूर स्वप्न और इंद्रजाल के समान देखजो तीन या पांच दिन ही टिकते हैं। '
इस जगत में जो भी हम पकड़ लेते हैं और जिसको भी हम सोचते हैं कि इससे हमें सुख मिलेगा—अष्टावक्र कहते है—वह द्रष्ट—नष्ट हैदेखते—देखते ही नष्ट हो जाता हैस्वप्न जैसा है! जब होता है तो सच लगता हैजब खो जाता है तब बड़ी हैरानी होती है।
तुमने देखास्वप्न का यह स्वभाव देखा! रोज रात देखते होरोज सुबह जाग कर पाते हो झूठा था। और फिर जब रात सोते हो दूसरे दिनतो फिर उस झूठ में पड़ जाते हो। फिर रात वही सपना फिर ठीक मालूम होने लगता है। सपने में तुम्हें कभी संदेह उठता ही नहीं। सपने में मैंने नास्तिक देखा ही नहींसपने में सभी आस्तिक हैं। सपने में संदेह उठता ही नहींभ्रम उठता ही नहींशक उठता ही नहीं। सपने में तो बिलकुल श्रद्धा रहती है। बड़े आश्चर्यजनक लोग हैं!
अगर तुम सपने में देख रहे हो कि अचानक एक घोड़ा चला आ रहा हैपास आ कर अचानक तुम्हारी पत्नी बन गया है या पति बन गया हैतो भी तुम्हारा मन यह नहीं कहता कि यह कैसे हो सकता है! तुम स्वीकार करते हो। जरा भीरंचमात्र भी संदेह नहीं उठता। कुछ भी घटना घट सकती है। तुम सपने में आकाश में उड़ते होतुम शक भी नहीं करते कि मैं आकाश में कैसे उड़ सकता हूं! यह कैसे संभव है! तुम विराट हो जाते हो सपने मेंसारा आकाश भर देते होकि बड़े छोटे हो जाते होकि चींटी से भी छोटे हो जाते हो कि दिखाई भी नहीं पड़तेतो भी तुम्हें शक नहीं होता। सुबह जाग कर तुम हंसते हो कि क्या—क्या पागलपन देखा! सपने में सपना सच हो जाता है।
'मित्रखेतधनमकानस्त्रीभाई आदि संपदा को तू स्वप्न और इंद्रजाल के समान देखजो तीन या पांच दिन हो टिकते हैं। '
भारत में सत्य की एक परिभाषा है और वह परिभाषा है : जो तीनों काल में टिकेत्रिकाल— अबाधितकभी भी जिसका खंडन न होजो पहले भी थाअभी भी है और फिर भी होगाजो शाश्वत
है—वही सत्य है। जो कल नहीं थाआज हैऔर कल फिर नहीं हो जाएगा—उसे भारत असत्य कहता है।
भारत की इस परिभाषा को ठीक खयाल में लेना। यहां सत्य की परिभाषा ही यही है कि जो अबाधित रूप से रहेजैसा था वैसा ही रहे। क्योंजो कल नहीं थाआज हैऔर कल फिर नहीं हो जाएगा—इसका तो अर्थ हुआ कि दो 'नहींके बीच में होना घट सकता है। एक दिन था तुम नहीं थेजन्म नहीं हुआ थाएक दिन आएगा कि तुम मर जाओगेमौत हो जाएगी। दो'नहींऔर उन दोनों के बीच में जिसको तुम जीवन कहते हो यह है। यह तो स्‍वप्‍नवत है—चाहे सत्तर साल देखोचाहे सात सौ साल देखोइससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लंबाई से कुछ भेद नहीं पड़ता। जो सदा है.।
त्रिकालाबाध्यत्वे सत्यत्वम्।
'जो तीनों काल में अबाधित रहेवही सत्य है।'
भारतीय मनोविज्ञान मनुष्य की चेतनो की चार अवस्थाएं कहता है। तीन तो अवस्थाएं हैंचौथा स्वभाव है। जाग्रत,स्वप्नसुषुप्ति—तीन तो अवस्थाएं हैंऔर साक्षीतुरीयचतुर्थ स्वभाव है। जागते में तुम एक दुनिया देखते हो। जब तुम सो जाते हो और सपने में पड़ते हो तो जागने की दुनिया झूठ हो जाती है। तुम ठीक अपनी पत्नी के पास सो रहे हो बिस्तर पर,लेकिन पत्नी झूठ हो गई जब तुम सो गए। तुम्हें सोने में पत्नी की कभी याद नहीं आती। तुम यह सोचते ही नहीं इस भाषा में कि वह मेरी पत्नी है। जब तुम सो गए तो बच्चेतुम्हारा मकानतुम गरीब हो कि अमीरप्रतिष्ठित हो कि अप्रतिष्ठितसाधु हो कि संतकि असाधु कि असंतसब खो गया। जागना एक सपना था। जब दूसरा सपना शुरू हुआजागने का सपना खो गया।
फिर सुबह जब सपना टूटता है फिर दूसरा सपना शुरू हुआ। सपने में जो देखा थावह अब खो गया। जब रात में गहरी नींद लगती है और सपना भी खो जाता है—तब जाग्रत में जो जानावह भी समाप्त हो गयासपने में जो जानावह भी समाप्त हो गया। सुषुप्ति में दोनों ही खंडित हो गए। और जो लोग चौथी अवस्था को उपलब्ध होते हैं—चौथीजो कि तुम्हारा निज—स्वरूप हैकहो बुद्धत्वसाक्षी— भावजिनत्वजो भी नाम देना हो—जो उस चौथी शुद्ध अवस्था को उपलब्ध होते हैंजहां परम जागरण रह जाता हैउनको पता चलता है कि वे तीनों अवस्थाएं खंडित हो गईं। स्वप्नसुषुप्तिजागृति—सब खंडित हो गए;कुछ और ही अनुभव में आता है। ब्रह्म ही ब्रह्म अनुभव में आता है। कहीं कोई संसार नहीं दिखाई पड़ताकहीं कोई द्या नहीं दिखाई पड़ता। अपना ही फैलाव मालूम होता है। न कोई मैं बचतान कोई तू बचता।
तो भारत कहता है. साक्षी— भाव में जो जाना जाता हैवही केवल सत्य हैउसका फिर कभी खंडन नहीं होता। यह जगत जिसको हम सत्य मान बैठे हैं— भारतीय मनीषा कहती है—इस जगत की परिभाषा. गच्छतीति जगत! जो जा रहा है—जगत। जो गया—गया है—जगत। जो जा ही चुका हैजो जाने के किनारे खड़ा है—जगत। जगत का अर्थ है. जो अथिर हैजो थिर नहींजो नदी की धार की तरह बहा जा रहा हैजहां सब परिवर्तन ही परिवर्तन है और कुछ भी शाश्वत नहीं। जहां परिवर्तन हैवहां असत्य। और जहां अपरिवर्तित के दर्शन होते हैंशाश्वत की प्रतीति होती है—वही सत्य। गच्छतीति जगत—जो भागा जा रहा है! जैसे आकाश में धुएं के बादल बनते हैं और मिटते हैं और रूप खड़े होते हैं और बिखरते हैंक्षण भर भी कुछ ठहरा हुआ नहीं है—वैसा जगत! कोई गिर रहाकोई उठ रहाकोई जीत रहाकोई हार रहा! जो हार रहा हैवह कल जीत सकता है। जो अभी जीत रहा हैवह कल हार सकता है। यहां कुछ भी पक्का नहीं हैयहां सब चीजें बदली जा रही हैं। समुद्र की लहरें हैं! इसमें जिसने सत्य को खोजना चाहावह खाली हाथों मरता है।
इस सारी बदलाहट के बीचक्या तुम्हें कभी भी थोड़ा स्मरण आता है कि कोई ऐसी चीज है जो बिना बदली हैउस बिना बदले को ही हम आत्मा कहते हैं। दिन में तुम जागते हो—संसार—एक बात। यह जो भीतर तुम्हारे बैठा देखता है संसार को—यह दूसरी बात है। रात तुम सपने में सो जाते होसपना देखते होतब भी दो चीजें रहती हैं—सपना और तुम। फिर तुम गहरी नींद में पड़ जाते होतब भी दो चीजें रहती हैं—तुम और गहरी नींद। गहरी नींद कभी सपना बन जाती हैसपना कभी गहरी नींद बन जाता है। सपने से कभी जाग आते होदुनिया आ जाती हैफिर दुनिया खो जाती हैलेकिन एक चीज शाश्वत बनी रहती है—तुम्हारा साक्षी— भावतुम्हारा द्रष्टा— भावतुम्हारी अंतर्दृष्टि। तुमने देखागहरी नींद से भी उठ कर आदमी कहता है,रात बड़ी गहरी नींद आईबड़ी आंनदपूर्ण नींद आई! पूछो उससेअगर नींद पूरी लग गई थी तो यह पता किसको चलायह किसने जानायह कौन खबर दे रहा हैजरूर तुम्हारे भीतर कोई था जो देखता रहा कि गहरी नींद लगीबड़ी आंनदपूर्ण नींद लगी! किसी ने इसका प्रत्यक्ष किया है—वही तुम हो। और सब तो बदलता हैसिर्फ साक्षी नहीं बदलता।
तुम छोटे बच्चे थेफिर तुम जवान हो गएफिर तुम बूढ़े हो गएकभी स्वस्थ थेअब जीर्ण—जर्जर हो गएखंडहर हो गए—लेकिन एक तुम्हारे भीतर अखंडअबाध वैसा का वैसा बना है—वह द्रष्टासाक्षी। एक दिन उसने देखा बच्चे जैसी देह हैएक दिन उसने देखा जवान हो गएएक दिन उसने देखाके होने लगेएक दिन उसने देखाजीर्ण—जर्जर हो गए।
अगर तुम खयाल कर पाओ कि तुम्हारे भीतर यह साक्षी का जो अनस्थूत धागा हैइस पर हजारों घटनाएं घटी हैंमगर यह वैसा का वैसा बना रहा है। सब इसके सामने आया और गया है। सब खेल इसके सामने चला है। यह सबसे पारदूर अछूता,निष्कलुष मौजूद रहा है। यह मौजूदगी ही एकमात्र सत्य है।
'जहां—जहां तृष्णा होवहां—वहां ही संसार जान। प्रौढ़ वैराग्य को आश्रय करके वीततृष्णा हो।
'यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसार विद्धि तत्र वै।
प्रौढ़वैराग्यमाश्रित्य वीततृष्ण सुखी भव ।।
प्रौढ़ वैराग्य! कच्चा वैराग्य खतरनाक है। पका वैराग्य! क्या फर्क है कच्चे और पके वैराग्य में न: एक तो वैराग्य है जो तुम किसी की बातें सुन कर ले लो। किसी साधु —सत्संग में वैराग्य की चर्चा चलती होवैराग्य के अनूठे अनुभवों की बात होती हो—तुम्हारा लोभ जग जाए। वैराग्य के आनंद की प्रशस्ति गायी जा रही होकोई समाधि के सुख का वर्णन कर रहा हो—और तुम्हारे भीतर वासना जग जाए कि ऐसा आनंद हमें भी मिलेऐसा सुख हम भी पाएंऐसी परम रसपूर्ण अवस्था हमारी भी हो! और इस कारण तुम वैराग्य ले लोतो कच्चा वैराग्य। यह टिकेगा नहींयह तुम्हें बड़े खतरे में डालेगा। तुम अभी पके न थे,कच्चे तोड़ लिए गए। कच्चा फल टूट जाए तो वृक्ष को भी पीड़ा होती
हैफल को भी पीड़ा होती है।
और कच्चा फल कच्चा हैइसलिए कुछ अनुभव घटेगा नहीं। जो पके फल को घटा हैवह कच्चे को घट नहीं सकता,क्योंकि वह पकने में ही घटता है। जब पका फल वृक्ष से गिरता है तो कभी किसी को पता भी नहीं चलता कब गिर गया,चुपचाप! न वृक्ष पर घाव छूटतान पके फल को कोई पीड़ा होती—चुपचाप सरक जाता है। हवा का झोंका भी न आया हो और चुपचाप सरक जाता है।
पका वैराग्यप्रौढ़ वैराग्य—यह शब्द बहुत बहुमूल्य है —प्रौढ़ वैराग्य का अर्थ है. जीवन की असारता को अनुभव करके जो वैराग्य जन्मे। वैराग्य का गीत सुन करवैराग्य की प्रशस्ति सुन करजो लोभ के कारण वैराग्य आ जाएतो वह कच्चा संन्यास है —उससे बचनाउसका कोई भी मूल्य नहींवह बड़े खतरे में डाल देगा। वह तुम्हें संसार का अनुभव भी न करने देगा और समाधि तक भी न जाने देगातुम बीच में अटक जाओगे त्रिशंकु की भांति। प्रौढ़ वैराग्य—संसार का ठीक—ठीक अनुभव करके,अपने ही अनुभव से जान कर।
बुद्ध तो कहते हैं : संसार दुख है। और अष्टावक्र कहते हैं कि काम शत्रु है। और महावीर कहते हैं. अर्थ में सिर्फ अनर्थ है। मगर यह वे कहते हैंयह तुमने नहीं जाना। इनकी सुन कर एकदम चल मत पड़नाअनुयायी मत बन जानानहीं तो खतरा होगा। तुम्हारे पास अपनी आंखें नहीं हैं—तुम कहीं न कहीं खाईखड्डे में गिरोगे। इनको बात समझना और जीवन की कसौटी पर कसना। अनुयायी मत बननाअनुभव से सीखना। ये कहते हैंतो ठीक ही कहते होंगेइस पर विश्वास कर लेने की कोई जरूरत नहीं है। ये कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे इस पर अविश्वास करने की भी कोई जरूरत नहीं हैलेकिन इस पर प्रयोग करने की जरूरत है। ये जो कहते हैंउसे जीवन में उतारनादेखना। देखना अपनी वासना को। अगर तुम्हारा भी यही निष्कर्ष होतुम्हारा अवलोकन भी यही कहे कि बुद्ध ठीक कहते हैंअष्टावक्र ठीक कहते हैं. लेकिन निर्णायक तुम्हारा अनुभव होबुद्ध का कहना नहीं। बुद्ध गवाह हों। मौलिक निष्पत्ति तुम्हारी अपनी हो। फिर तुम्हारे जीवन में जो वैराग्य होगावह प्रौढ़ वैराग्य है।
'जहां—जहां तृष्णा होवहां —वहां संसार जान।
अगर मोक्ष की भी तृष्णा होतो वह भी संसार है। इसलिए धर्म को भी कहात्याग कर देना।
'प्रौढ़ वैराग्य को आश्रय करके वीततृष्णा हो।'
प्रौढ़वैराग्यमाश्रित्य वीततृष्ण सुखी भव।
अभी हो जा सुख को उपलब्ध! लेकिन पहले वैराग्य को प्रौढ़ हो जाने दे।
यत्र यत्र तृष्णा भवेत तत्र संसारम् विधि वै।
जहां —जहां है वासनावहां—वहां संसार। समझना। वासना संसार हैइसलिए संसार को छोड़ने से कुछ भी न होगा। वासना छोड़ने से सब कुछ होगा। संसार तो वासना के कारण निर्मित होता है। तुम संसार से भाग गए तो कुछ लाभ नहीं। वासना साथ रही तो नया संसार निर्मित हो जाएगा। जहां तुम होओगेवहीं ब्दप्रिंट तुम्हारे पास हैफिर तुम खड़ा कर लोगे। उससे तुम बच न पाओगे। उसका बीज तुम्हारे भीतर है।
वासना बीज हैसंसार वृक्ष है। बीज को दग्ध करोवृक्ष से मत लड़ने में लग जाना।
…..तत्र संसारम् विद्धि वै।
प्रौढ़ वैराग्यम् आश्रित्य वीततृष्ण सुखी भव।।
और प्रौढ़ता को उपलब्ध हो!
इसलिए कच्चे —कच्चे भागो मत। गैर अनुभव में भागो मत। भगोड़े मत बनो। पलायनवादी मत बनो। जीवन की गहराई मेंसघन में खड़े हो करजीवन को सब तरह जान कर..। कामवासना में उतर कर ही तुम कामवासना से मुक्त हो सकोगे। कामवासना की गहराइयों में उतर कर ही तुम जान पाओगे व्यर्थता। धन की दौड़ में दौड़ कर ही तुम पाओगे. मिलता कुछ भी नहीं। महत्वाकांक्षा में जी कर ही तुम्हें पता चलेगा कि सिर्फ दग्ध करती है महत्वाकाक्षाजलाती हैज्वर हैसन्निपात है। राजनीति में पड़ कर ही तुम जानोगे कि राजनीति रोग हैविक्षिप्तता हैपागलपन है।
जीवन को अनुभव से पकने दो। और जब जीवन का अनुभव तुम्हारा कह देतो फिर वैराग्य सहज घट जाएगाजैसे पका फल गिर जाता है।
'मात्र तृष्णा ही बंध है और उसका नाश मोक्ष कहा जाता है। और संसार—मात्र में असंग होने से निरंतर आत्मा की प्राप्ति और तुष्टि होती है।'
तृष्णामात्रात्मको बंधस्तन्नाशो मोक्ष उच्चते।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहु:।।
यह सूत्र बड़ा विचारणीय है।
'मात्र तृष्णा बंध है!'
जब तक तुम कुछ भी चाहते होतब तक जानना बंधे रहोगे। ईश्वर को भी चाहा तो बंधे रहोगे। कल ही 'गुणाने एक प्रश्न लिख कर मुझे भेजा है कि मैं तो आपको कभी नहीं छोड़ सकती और आप कोशिश भी मत करना मुझे छुड़ा देने की। मेरे लिए तो आप सब कुछ होमुझे कोई ईश्वर नहीं चाहिएकोई मोक्ष नहीं चाहिए।
तुम्हें न चाहिए हो और तुम अपनी चाहत में कुछ गलत की माया भी करोतो भी मैं गलत का सहयोगी नहीं हो सकता हूं। कितनी ही कठोरता मालूम पड़ेमैं पूरी चेष्टा करूंगा कि तुम मुझसे मुक्त हो जाओ। अन्यथामैं तुम्हारा शत्रु हो गया। यह तो फिर चाहत ने नया रूप लिया। यह तो फिर तृष्णा बनी। पति से छूटेपत्नी से छूटेतो गुरु से बंध गएमगर यह तो फिर नया जंजाल हुआफिर नई जंजीर बनी।
गुरु तो वहीजो तुम्हें आत्यंतिक जंजीर से मुक्त करवा देजो तुम्हें स्वयं से भी मुक्त करवा दे। कठिन लगता है,क्योंकि एक प्रेम जगता है। कठोर लगती है बातलेकिन तुम्हारी मान कर मैं चलूं तब तो तुम कभी भी कहीं न पहुंच पाओगे। फिर तो मैं तुम्हारा अनुयायी हुआ। तुम्हें कठोर भी लगे तो भी मैं वही किए चला जाऊंगा जो मुझे करना है। अगर मैं तुमसे कहूं भी कि घबड़ाओ मतकभी नहीं छुडाऊंगातो भी तुम मेरा भरोसा मत करना। वह भी सिर्फ इसलिए कह रहा हूं कि कहीं छुड़ाने के पहले ही भाग मत खड़े होना। तो रोके रहूंगासमझाता रहूंगा कि नहींकोई हर्जा नहींकहा छुड़ाना हैकिसको छुड़ाना है?सदा—सदा तुम्हारे साथ रहूंगा! मगर नीचे से जड़ें काटता रहूंगा। एक दिन अचानक तुम पाओगे कि छुटकारा हो गया। मुझसे भी छुटकारा तो चाहिए ही!








सदगुरु वही हैजो तुम्हें स्वयं से भी मुक्त कर दे। नहीं तो संसार की सारी वासनाएं धीरे— धीरे गुरु पर लग जाती हैं;तुम्हारा मोह गुरु से बन जाता है। फिर तुम उसकी फिक्र में लग जाते हो। फिर मोह कैसे अंधेपन में ले जाता हैकहना कठिन है।
मैं पंजाब जाता थाएक घर में ठहरता था। एक दिन सुबह उठ कर निकला तो देखा गुरु—ग्रंथ साहब—किताब! —को सजा कर रखा हुआ है। सामने दतौन रखी है और एक लोटा पानी भरा रखा है। मैंने पूछामामला क्या हैकहते हैंगुरु—ग्रंथ साहब के लिए दतौन!
अब पागलपन की कोई सीमा होती है! नानक के लिए दी थी दतौन—ठीकसमझ में आतातुम गुरु—ग्रंथ को दतौन लगा रहे?
लेकिन भक्त यही कर रहे हैं। मूर्ति को सजाते हैंभोग लगाते हैंउठाते—बिठातेनहलाते— सुलातेन मालूम क्या—क्या करते रहते हैं!
खेल—खिलौनों से कब छूटोगेछोटे बच्चों जैसी बात हो गईबचकानी हो गई। छोटे बच्चे अपनी ग्प्रा—ग्प्री को सम्हाले फिरते हैंस्नान करवाते हैंकपड़े बदलाते हैंभोजन भी करवाते हैंसुलाते भी हैं—तुम उनको कहते हो बचकाने! और तुम रामचंद्र जी के साथ यही कर रहे हो। मगर मोह है। भक्त को लगता है यह तो भक्ति हैयह तो प्रेम हैयह तो बड़ी ऊंची बात है! यह कितनी ही ऊंची होयह तुम्हें कभी भी मुक्त न होने देगीतुम बंधे ही रह जाओगे।
संसार से छूटना कठिन हैफिर धर्म से छूटना और भी कठिन हो जाता है। सांसारिक संबंधों से छूटना कठिन हैफिर धार्मिक संबंधों से छूटना और भी कठिन हो जाता है। क्योंकि धार्मिक संबंध इतने प्रीतिकर हैं!
अब गुरु और शिष्य का संबंध ऐसा प्रीतिकर हैउसमें कड़वाहट तो है ही नहींरस ही रस है। पति—पत्नी तो एक—दूसरे से ऊब भी जाते हैंबाप—बेटा तो एक—दूसरे से कलह भी कर लेते हैंझंझट भी हो जाती है—लेकिन गुरु—शिष्य का संबंध तो बड़ा ही मधुर है। वहां न कोई झंझट हैन कोई झगड़ा हैन कोई कलह हैन कोई काटे हैं। वहां तो रस ही रस है। वहां तो शिष्य भी अपनी ऊंचाई में मिलता है। और गुरु तो अपनी ऊंचाई पर है। तुम जब गुरु के पास आते होतब तुम्हारे भीतर जो श्रेष्ठतम हैवह प्रगट होने लगता है। इसलिए मिलन श्रेष्ठ का श्रेष्ठ से होता है। तुम गुरु के पास अपनी गंदी शक्ल ले कर थोड़े ही आते हो। स्थान करकेताजे हो करशुभ मुहूर्त मेंपूजा—प्रार्थना के भाव से भरेतुम गुरु की सन्निधि में आते होतुम्हारा शुद्धतम रूप तुम लाते हो। गुरु के श्रेष्ठतम से मिलना है तो जो भी तुम्हारे पास श्रेष्ठतम हैउसे ले कर आते हो। इन दो के बीच जो मिलन होता हैवह तो अति मधुर है। फिर उसमें बंधन पैदा होता है। फिर लगता है : बसऐसा ही बना रहेऐसा ही चलता रहेसदा—सदायह सपना कभी टूटे न!
लेकिन यह सपना भी टूटना ही चाहिए। शिष्य न तोड़ना चाहे तो भी गुरु को तोड़ना पड़ेगा। शिष्य यह नासमझी कर सकता हैयह कामना कर सकता है—गुरु तो इस कामना को बल नहीं दे सकता। 'मात्र तृष्णा ही बंध है और उसका नाश मोक्ष कहा जाता है। '
तृष्णामात्रात्मक बंध: तन्नाश मोक्ष: उच्यते।
'और जहां तृष्णा गिर गईवहीं मोक्ष।'
और संसार—मात्र में असंग होने से निरंतर आत्मा की प्राप्ति और तुष्टि होती है।
भवासंसक्तिमात्रेण मुह मुह प्राप्तितुष्टि:।
और जैसे —जैसे वासना के गिरने की झलकें आती हैं.. जैसे वासना गिरी कि तत्‍क्षण मोक्ष झलका! ऐसा बार—बार होगा। मुहु: मुहु:! प्राप्ति होगीतुष्टि होगी! पहले—पहले तो कभी—कभी क्षण भर को वासना सरकेगीलेकिन उतनी ही देर में आकाश खुल जाएगा और सूरज प्रगट हो जाएगा। जैसे किसी ने मूंदे—मूंदे आंख जरा—सी खोलीफिर बंद कर लीपुरानी आदतवश आंख फिर बंद हो गईफिर जरा—सी खोलीफिर बंद कर लीफिर धीरे— धीरे खोलने के लिए अभ्यस्त हुआफिर पूरी आंख खोली—और फिर कभी बंद न की। तो पहले तो बार—बार ऐसा होगा।
'संसार—मात्र में असंग होने से बार—बार आत्मा की प्राप्ति और तुष्टि होती है।'
बार—बारफिर—फिरपुन: —पुन:! और रस बार—बार बढ़ता जाता हैक्योंकि आंख बार—बार और भी खुलती जाती है।
जैसे—जैसे सत्य दिखाई पड़ना शुरू होता हैवैसे—वैसे असत्य से सारे संबंध टूटने लगते हैं। जैसे ही दिखाई पड़ गया कि असार असार हैवैसे ही हाथ से मुट्ठी खुल जाती है। जैसे ही दिखा सार सार हैवैसे ही सार को हृदय में संजो लेने कीहृदय को मंजूषा बना लेने की सहज प्रवृत्ति हो जाती है। 'तू एक शुद्ध चैतन्य हैसंसार जड़ और अस्त हैवह अविद्या भी असत है—इस पर भी तू क्या जानने की इच्छा करता है?'
अष्टावक्र कहते हैं. यहां जानने को और कुछ भी नहीं। यहां तीन चीजें हैं. आत्मा हैजगत है और आत्मा और जगत के बीच एक भ्रांत संबंध हैजिसको हम अविद्या कहेंमाया कहेंअज्ञान कहें। यहां तीन चीजें हैं. आत्माजगत— भीतर है कुछ हमारेचैतन्य—मात्रऔर बाहर है जड़ता का फैलाव—और दोनों के बीच में एक सेतु है। वह सेतु अगर अविद्या का हैतो हम उलझे हैं। वह सेतु अगर तृष्णा का हैतो हम बंधन में पड़े हैं। वह सेतु अगर मांग का हैयाचना का हैतो हम भिखारी बने हैं। और हमें अपनी संपदा का कभी पता न चलेगा। अगर दिखाई पड़ गया कि वह अविद्याऔर मायाऔर सपनाऔर मूर्च्छा व्यर्थ है और हम जागने लगेतो बीच से सेतु टूट जाता है. वहां जड़ संसार रह जाता हैयहां चैतन्य आत्मा रह जाती है। जानने को फिर कुछ और नहीं है।
'तू एक शुद्ध चैतन्य है।'
त्वमेकश्चेतन शुद्धो जड विश्वमसत्तथा।
अविद्यापि न किचित्सा का बुभुत्सा तथापि ते।।
त्वम् एक: —तू एकशुद्ध: —शुद्धचेतन: —चैतन्यविश्व जड़ च असत्—और विश्व है जड़स्‍वप्‍नवत। तथा सा अविद्या अपि न किचित—और जैसा यह जड़ जगत असत हैस्वन्नवत है—इससे जो हमने संबंध बनाए हैंस्वभावत: वे संबंध सत्य नहीं हो सकते।
असत्य से कैसे सत्य के संबंध हो सकते हैंरात तुमने एक सपना देखा कि कोहिनूर तुम्हारे सामने रखा है—लड़ते रहें पाकिस्तानहिंदुस्तान और सबलेकिन कोहिनूर तुम्हारे सपने में सामने रखा है। कोहिनूर देखते ही तुम्हारा मन हुआ. उठा लूं रख लूं अपना बना लूं छिपा लूं! कोहिनूर देखा—वह तो झूठा हैसपने का है! अब तुम्हारे मन में यह जो भाव उठा—उठा लूं संभाल लूं रख लूं कोई देख न लेकिसी को पता न चल जाए—यह जो भाव उठायह कैसे सच हो सकता हैजिसके प्रति उठा है वही असत हैतो जो भाव उठा है वह सत नहीं हो सकता है।
अष्टावक्र कहते हैं अविद्या अपि न किचित—और ये जो अविद्या के संबंध हैंये भी असार हैं। तथा अपि ते का बुभुत्सा—फिर तू और अब क्या जानना चाहता हैबसजानना पूरा हो गया। इतना ही जानना है। इति ज्ञान!
संसार है भागता हुआ! गच्छतीति जगत! परिवर्तनतरंगों से भरा हुआ! और आत्मा है शाश्वतनिस्तरंगअसंग। और दोनों के बीच में जो संबंध हैंवे संबंध सब झूठे हैंअज्ञान के हैंअविद्या के हैं। कोई कहता हैमेरा बेटाकोई कहता हैमेरी पत्नीकोई कहतामेरा मकान!
मैंने सुना हैएक धनपति के मकान में आग लग गई। धू— धू करके मकान जल रहा हैवह छाती पीट कर रो रहा है। बड़ी भीड़ लग गई है। एक आदमी ने आ कर कहा, 'तुम नाहक रो रहे हो। मुझे पक्का पता हैतुम्हारे बेटे ने कल ही शाम यह मकान बेच दिया है। ऐसा सुनते ही धनपति एकदम प्रसन्न हो गया और उसने कहा. सच! मुझे तो पता ही नहीं। बेटे ने कुछ खबर न दीबेटा दूसरे गांव गया है।
मगर अब अब भी मकान जल रहा हैधू— धू करके जल रहा हैऔर लपटें बड़ी हो गई हैंलेकिन अब आंसू सूख गए,वह बड़ा प्रसन्न है। तभी बेटा वापिस आया भागा हुआ और उसने कहा कि 'क्या खड़े होबात उठी थी बेचने कीलेकिन सौदा अभी हुआ नहीं था। फिर रोने लगाफिर छाती पीटने लगा। अब फिर अपना मकान! मकान अभी वही का वही हैअब भी जल रहा है। लेकिन बीच में थोड़ी देर को 'मेरेका संबंध नहीं रहा। थोड़ी देर को भी 'मेरेका संबंध छूट गया। सभी स्थिति वही की वही थीकुछ फर्क न पड़ा था। यह आदमी वैसा का वैसायह मकान वैसा का वैसा। यह आदमी कोई बुद्ध नहीं हो गया था। यह बिलकुल वैसे का वैसा ही आदमी हैमकान भी जल रहा थासिर्फ एक संबंध बीच से खो गया था—'मेरा'। बसउस संबंध के खो जाने से दुख खो गया। फिर संबंध लौट आयाफिर दुख हो गया।
तुम जरा गौर करना। तुम्हारा दुखअसत के साथ तुम्हारे बनाए हुए संबंधों से पैदा होता है। तुम्हारा सुखअसत के साथ तुम्हारे संबंध छूट जाए_, उनसे घटित होता है।
'तेरे राज्यपुत्र—पुत्रियांशरीर और सुख जन्म—जन्म में नष्ट हुए हैंयद्यपि तू उनसे आसक्त था। अष्टावक्र कहते हैं. लौट कर पीछे देख। जो तेरे पास आज हैऐसा कई बार तेरे पास था। ऐसे राज्य कई बार हुए। ऐसी पत्नियांऐसे पुत्र कई बार हुए। बहुत—बहुत धन कई बार तेरे पास था। और हर बार तू आसक्त था। लेकिन तेरी आसक्ति से कुछ रुका नहीं—आया और गया। आसक्तियो से कहीं सपने ठहरते हैं?
राज्यं सता: कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि।।
कितने जन्मों से जनक तू ऐसी ही चीजों के बीच में रहा है! हर बार तूने आसक्ति की! हर बार तूने चीजों से 'मेरासंबंध बनाया—मेरी हैं—फिर छूट—छूट गईं। मौत आई और सब संबंध तोड़ गईसब विच्छिन्न कर गई।
'अर्थकाम और सुकृत कर्म बहुत हो चुके। इनसे भी संसार रूपी जंगल में मन विश्रांति को नहीं प्राप्त हुआ। '
सुनो अर्थकामसुकृत कर्म बहुत हो चुके! तू सब कर चुकाधन भी खूब कमा चुकाभोग भी खूब कर चुका।
ययाति की कथा है उपनिषदों मेंकि जब वह मरने को हुआसौ साल का हो करमौत आई तो वह घबड़ा गया। उसने कहायह तो जल्दी आ गई। अभी तो मैं सौ ही साल का हूं। अभी तो मैं भोग भी नहीं पाया।
उसके सौ बेटे थेसैकड़ों रानियां थीं। उसने अपने बेटों से कहा कि ऐसा करोमुझ के बाप के लिए इतना तो करोतुममें से कोई मर जाए!
पुराने दिनों की कहानियां हैं। उन दिनों नियम इतने सख्त न रहे होंगे। परमात्मा सदय था। मौत ने भी कहा कि ठीक है,का आदमी हैछोड़ देते हैंलेकिन किसी को तो मुझे ले जाना ही होगाकोई भी राजी हो जाए। मौत ने सोचाकौन राजी होगा! बड़े बेटे तो राजी न हुए। कोई सत्तर साल के थेकोई तो अस्सी साल के हो रहे थे। वे भी जीवन देख चुके थेअनुभव कर चुके थेमगरफिर भी रस छूटा न था। छोटा बेटा खड़ा हो गया। उसने कहा कि मुझे ले चलो। वह तो अभी पंद्रह सोलह साल का ही था। मौत ने कहानासमझतेरे और निन्यानबे भाई हैंवे तुझसे उम्र में बड़े हैं। उनमें से कोई जाता तो समझ में आता। अस्सी साल के हैं—वे खुद भी तेरे बाप जितने बूढ़े हो रहे हैंवे नहीं जाते। तेरा बाप खुद सौ साल का हैउसे खुद जाना चाहिए! वह किसी को भेजने को राजी हैकोई बेटा चला जाए तो तैयार है। तू क्यों मरता है?
उस बेटे ने कहायही देख कर कि सौ साल के हो कर भी पिता को कुछ न मिलातो सौ साल अगर मैं जी भी लिया तो क्या पाऊंगायही देख कर कि अस्सी सालसत्तरसाठ साल के मेरे भाई हैंइनको अभी तक कुछ नहीं मिलातो रह कर भी क्या सार हैमैं तैयार हूं।
बड़ा अभूतपूर्व व्यक्ति रहा होगा वह बेटा। मौत उसे ले गई। राजा सौ साल जीया। उस बेटे की उम्र उसे लग गई।
ऐसा कहते हैं कई बार हुआ—दस बार हुआ! हर बार मौत आई और हर बार ययाति ने कहा : अभी. अभी तो मैं भोग ही नहीं पाया। फिर किसी बेटे को भेजाफिर किसी बेटे को भेजा। जब वह हजार साल का हो गयामौत फिर आई। फिर ययाति को भी शर्म लगी। उसने कहा कि क्षमा करोअब तो एक बात समझ में आ गई कि एक हजार साल क्या एक करोड़ साल भी जीऊंतो भी कुछ नहीं होगा। कुछ यहां होता ही नहीं। समय का कोई सवाल नहीं है। वासना भरती ही नहींदुमूर है। अष्टावक्र कहते हैं जनक को. अर्थकामसब तू कर चुका और ऐसा ही नहींसुकृत कर्म भी बहुत हो चुकेशुभ कर्म भी तू बहुत कर चुकापुण्य भी खूब कर चुका है—उनसे भी कुछ भी नहीं हुआ।
'इनसे भी संसार—रूपी जंगल में मन विश्रांति को प्राप्त नहीं हुआ। '
न तो बुरे कर्म से विश्रांति मिलतीन अच्छे कर्म से विश्रांति मिलती। कर्म से विश्रांति मिलती ही नहीं—अकर्म से मिलती है। क्योंकि कर्म का तो अर्थ ही है : अभी गति जारी हैभाग—दौड़ जारी है,आपाधापी जारी है।
अकर्म का अर्थ है : बैठ गएशांत हो गएविराम में आ गएपूर्ण विराम लगा दिया! अब सिर्फ साक्षी रहेकर्ता न रहे।
अर्थेन कामेन सुकृतेन कर्मणा अपि अलम्!
बहुत हो चुका! सब तू कर चुका!
तथा अपि संसार कातारे मन: न विश्रांतम् अभूत।
फिर भी इस जंगल मेंइस उपद्रव मेंइस उत्पात—रूपी संसार में मन को जरा भी विश्रांति का कोई क्षण नहीं मिला। तो अब जाग—अब करने से जाग!
'कितने जन्मों तक तूने क्या शरीरमन और वाणी से दुखपूर्ण और श्रमपूर्ण कर्म नहीं किए हैंअब तो उपराम कर। '
अब विश्रांति कर! जिसको झेन फकीर झाझेन कहते हैं। झाझेन का अर्थ होता हैबस बैठे रहना और देखते रहनाउपशम! यह ध्यान की परम परिभाषा है।
ध्यान कोई कृत्य नहीं है। ध्यान का तुम्हारे करने से कुछ संबंध नहीं है। ध्यान का अर्थ है : साक्षी— भाव। जो हो रहा है उसे चुपचाप देखना! बिना किसी लगांव केबिना किसी विरोध केबिना किसी पक्षपात के—न इस तरफन उस तरफनिष्पक्ष;उदासीन—बस चुपचाप देखना!
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।
दुखमायासद कर्म तदद्यान्दुपरम्यताम्।।
तत अद्यापि उपरम्यताम्।
अब तो उपशम कर! अब तो बैठ!
लोग अधर्म में उलझे हैं। किसी तरह अधर्म से छूटते हैं तो धर्म में उलझ जाते हैं—मगर उलझन नहीं जाती। लोग पाप कर रहे हैंकिसी तरह पाप से छूटतेतो पुण्य में उलझ जाते हैं—लेकिन उलझन नहीं जाती। कुछ तो करेंगे ही। अगर गाली बक रहे हैंकिसी तरह उनको समझा—बुझा कर राजी करोमत बकोतो वे कहते हैं : अब हम जाप करेंगेभजन करेंगेमगर उपद्रव तो जारी रखेंगे!
तुमने देखालोग लाऊडस्पीकर लगा कर अखंड कीर्तन करने लगते हैं। कीरतन को कीर्तन कहते हैं! अब अखंड कीर्तन तुम कर रहे होपूर मोहल्ले को सोने नहीं देते! बच्चों की परीक्षा हैउनकी परीक्षा की क्या गति होगी—तुम्हें मतलब नहीं। तुम धार्मिक कार्य कर रहे हो! ये किस तरह के धार्मिक लोग हैंये किसी से पूछने भी नहीं जाते। इन पर कोई रोक भी नहीं लगा सकताक्योंकि यह धार्मिक काम कर रहे हैं। अगर कोई आदमी माइक लगा कर रात भर अनर्गल बकेतो पुलिस पकड़ ले जाए;लेकिन वह कीर्तन कर रहा है या सत्यनारायण की कथा कर रहा हैतो कोई पुलिस भी पकड़ कर नहीं ले जा सकती। धार्मिक होने की तो स्वतंत्रता है और धार्मिक कृत्य की स्वतंत्रता है। मगर यह आदमी वही का वही है। यह चिल्ल—पों में इसका भरोसा है।
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं कि आप कहते हैं : बसशांत बैठ कर ध्यान कर लें। मगर कुछ तो सहारा चाहिए,कुछ आलंबन दे देंराम—राम बता देंकोई भी मंत्र दे देंकान फूंक देंकुछ तो दे दें—तो हम कुछ करें! अब उनको अगर राम—राम दे दोतो वे राम—राम करने को तैयार
हैं—मगर बकवास जारी रही! पहले कुछ और बक रहे थे भीतरहजार चीजें बक रहे थेअब सब बकवास उन्होंने एक तरफ लगा दीअब राम—राम बकने लगे। मगर चुप होने को राजी नहींसिर्फ देखने को राजी नहीं! देखना बड़ा कठिन हैसाक्षी होना बड़ा कठिन!
साक्षी ही ध्यान है। बैठ जाओमन चलेचलने दो। तुम हो कौन बाधा डालने वालेतुमसे पूछा किसनेतुमसे पूछ कर तो मन शुरू नहीं हुआतुमसे पूछ कर बंद भी होने की कोई जरूरत नहीं है। तुम हो कौनजैसे राह पर कारें चल रही हैंरिक्यो दौड़ रहेभोंपू बज रहेआकाश में हवाई जहाज उड़ रहेपक्षी गुनगुना रहेबच्चे रो रहेकुत्ते भौंक रहे—ऐसे तुम्हारे भीतर मन का भी ट्रैफिक है. चल रहाचलने दो'! तुम बैठे रहो! उदासीन का यही अर्थ है।
'उदासीनठीक—ठीक झाझेन जैसा अर्थ रखता है : बसबैठ गए! जमा ली आसन भीतरहो गए आसीन भीतरबैठ गए,देखने लगे! जो चलता हैचलने दो। बुरा विचार आए तो बुरा मत कहोक्योंकि बुरा कहा कि तुम डावांडोल हो गए। बुरा कहा,कि तुम्हारा मन हुआ कि न आता तो अच्छा था। आ गयातुम विचलित हो गए। अच्छा विचार आ जाएतो भी पीठ मत थपथपाने लगना कि गजबबड़ा अच्छा विचार आया। इतना तुमने कहा कि आसीन न रहे तुमउखड़ गया आसनतुम डावांडोल हो गएतुम्हारी थिरता खो गई। कुंडलिनी जगने लगेतो परेशान मत होना कि उठने लगी कुंडलिनीअब बस सिद्धपुरुष होने में ज्यादा देर नहीं है। प्रकाश दिखाई पड़ने लगे तो विचलित मत हो जाना। ये सब मन के ही खेल हैं। बड़े—बड़े खेल मन खेलता है! बड़े दूर के दृश्य दिखाई देने लगेंगे। एक महिलाकोई अस्सी वर्ष की महिलामेरे पास आई। वह कहने लगी कि बड़ा गजब अनुभव हो रहा है।
'क्या अनुभव हो रहा है?'
कि जब मैं बैठती हूं, तो ऐसे—ऐसे जंगल दिखाई पड़ते हैं जिनको कभी नहीं देखा।
'मगर इनको देख कर भी क्या करोगेजंगल ही दिखाई पड़ रहे हैं न?'
वह मुझसे बड़ी नाराज हो गई। उसने कहा कि आप कैसे हैंमैं तो जब भी किसी साधु—संत के पास जाती हूं, तो वे कहते हैं. बहुत अच्छा हो रहा है! बड़ा अनुभव हो रहा है!
अध्यात्म अनुभव नहीं है। और जब तक अनुभव होता रहेतब तक अध्यात्म नहीं है। अनुभव का तो अर्थ ही हैतुम अभी भी अनुभोक्ता बने होअभी भी भोगी हो! बाहर का नहीं भोग रहेभीतर का भोग रहे होलेकिन भोग जारी है। किसी की कुंडलिनी उठ रहीकिसी को पीठ में सुरसुरी मालूम होने लगी। और वह भी सुन लिया हैपढ़ लिया है शास्त्रों में कि ऐसा होगा। तो बैठे हैंबैठे—बैठे बस खोज रहे हैं कि हो सुरसुरी। अब तुम खोजते रहोगे तो हो जाएगी। तुम कल्पित कर लोगेतुम मान लोगे—हों जाएगी। और जब हो जाएगीतो तुम बड़े प्रफुल्लित होने लगोगे। तुम प्रफुल्लित होने लगे कि गए चूक गएफिर ध्यान चूका!
कुछ भी होतुम सिर्फ देखना! तुम द्रष्टा से जरा भी डिगना मत। तुम सिर्फ साक्षी बने रहना। तुम कहना. ठीकगलत,जो भी होहम देखते रहेंगे। हम अपनी तरफ से कोई निर्णय न देंगेकोई चुनाव न करेंगे। हम अच्छे—बुरे का विभाजन न करेंगे।
शुरू—शुरू में बड़ा कठिन होगाक्योंकि आदत जन्मों —जन्मों की है निर्णय देने की।
जीसस का बड़ा प्रसिद्ध वचन है. जज ई नॉटनिर्णय मत करोन्यायाधीश मत बनो! न कहो अच्छान कहो बुरा—बस देखते रहो। और तुम चकित हो जाओगेअगर तुम देखते रहेतो धीरे — धीरे भीड़ छंटने लगेगी। कम विचार आएंगेकम अनुभव गुजरेंगे। कभी—कभी ऐसा होगारास्ता मन का खाली पड़ा रह जाएगाएक विचार गुजर गयादूसरा आया नहींबीच में एक खाली जगह अंतराल—उसी अंतराल मेंजिसको अष्टावक्र कहते हैं. भवासंसक्तिमात्रेण मुहुः मुहु: प्राप्ति तुष्टि! वही पुन: —पुन: तुष्टि और प्राप्ति होने लगेगी। मिलेगा प्रभु और परम तुष्टि मिलेगी! वह तुष्टि अनुभव की नहीं है कि कोई बड़ा अनुभव हुआ हैइसलिए अहंकार को मजा आया। नहींवह तुष्टि तो शून्य की है। वह तुष्टि तो समाधि की हैअनुभव की नहीं हैवह तुष्टि तो अनुभवातीत है। वह तुष्टि तो तुरीय अवस्था की है। वह तुष्टि तो परम उपशमविश्रांति की है।
'अब तो उपशम कर!'
तत अद्यापि उपरम्यताम्!
यही मैं तुमसे भी कहता. अब तो उपशम करो! अब तो विश्राम करो! अब तो बैठो और देखो। अब तो साक्षी बनो! कर्ता बने बहुतभोक्ता बने बहुतअच्छे भी किए कर्मबुरे भी किए—हो चुका बहुत! अब जरा साक्षी बनो! और जो तुम्हें न कर्ता बन कर मिलान भोक्ता बन कर मिला—वही बरस उठेगा प्रसाद की भांति साक्षी में। साक्षी में मिलता है परमात्मा। साक्षी में मिलता है सत्य। क्योंकि साक्षी सत्य है!

 हरि ओं तत्सत्!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें