शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

अनहद में बिसराम - प्रवचन-01

दिनांक 11नवम्बरसन् 1980


पहला प्रश्न: भगवानविश्राम के लिए अनंत आकाश में उड़ने वाला पक्षी घास का छोटा सा घोंसला बनाता है। और विश्राम के लिए आदमी ने पहले गुफा खोजीऔर फिर झोपड़ा और मकान बनाया। और आप आज अनहद में बिसराम की चर्चा शुरू कर रहे हैं।
भगवानयह अनहद में बिसराम क्या हैयह हमें समझाने की कृपा करें।

 आनंद मैत्रेय!
विश्राम के लिए पक्षी घोंसला बनाएइसमें तो कुछ भी अड़चन नहीं। क्योंकि घोंसले में किया गया विश्रामआकाश में उड़ने की तैयारी का अंग है। आकाश से विरोध नहीं है घोंसले का। घोंसला सहयोगी हैपरिपूरक है। सतत तो कोई आकाश में उड़ता नहीं रह सकता। देह तो थकेगी। देह को विश्राम की जरूरत भी पड़ेगी।
इसलिए घोंसला शुभ हैसुंदर हैसुखद है। इतना ही स्मरण रहे कि घोंसला आकाश नहीं है। सुबह उड़ जाना हैरैन बसेरा है। लक्ष्य तो आकाश ही हैघोंसला पड़ाव है। गंतव्यमंजिलवह तो अनंत आकाश हैवह तो सीमाओं के पार जाना है।

क्योंकि जहां तक सीमा है, वहां तक दुख हैसीमा ही दुख है। सीमा में होना अर्थात कारागृह में होना। जितनी सीमाएं होंगीउतना ही आदमी जंजीरों में होगा। सब सीमाएं टूट जाएंतो सब जंजीरें गिर जाएं। 

कारागृह से इस मुक्ति के उपाय का नाम ही धर्म है।
संसार का अर्थ हैकारागृह से चिपट जानाकारागृह को पकड़ लेनाजंजीरों को आभूषण समझ लेना। तोड़ने की तो बात दूर,कोई तोड़े तो उसे तोड़ने न देना। सपनों को सत्य समझ लेना और रास्ते के पड़ावों को मंजिल मान कर रुक जाना। बससंसार का इतना ही अर्थ है। संसार न तो दुकान में हैन बाजार में हैन परिवार में हैन संबंधों में है। संसार है इस भ्रांति मेंजो पड़ाव को मंजिल मान लेती है। संसार है इस अज्ञान मेंजो क्षण भर के विश्राम को शाश्वत आवास बना लेता है।
घोंसला बनाओजरूर बनाओसुंदर बनाओप्रीतिकर बनाओ। तुम्हारे सृजन की छाप हो उस पर। तुम्हारे व्यक्तित्व के हस्ताक्षर हों उस पर। फिर घोंसला होकि झोपड़ा होकि मकान होकि महल होअपनी सृजनात्मक ऊर्जा उसमें उंडेलो। मगर एक स्मरण कभी न चूकेसतत एक ज्योति बोध की भीतर जलती रहे: यह सराय है। आज नहीं कलकल नहीं परसोंइसे छोड़ कर जाना हैजाना ही पड़ेगा। तो जिसे छोड़ कर जाना हैउसे पकड़ना ही क्योंरह लोजी लोउपयोग कर लो। आग्रह न हो,आसक्ति न हो।
दो तरह के लोग हैं। एक हैंजो संसार में रहते हैं और संसार में गहन आसक्ति निर्मित कर लेते हैं। दूसरे हैंजो संसार से भाग खड़े होते हैं।
जिनको हमने सदियों तक संन्यासी कहा हैथे वे केवल भगोड़े। उन्हें हमने पूजा हैउनकी हमने अर्चना की है। उनके लिए हमने दीए जलाएधूप बारीउनके ऊपर हमने फूल चढ़ाएकेसर छिड़की। क्योंकि हमें लगा कि अपूर्वअद्वितीयअसंभव कार्य उन्होंने कर दिखाया है। हमसे तो छूटता नहींऔर वे छोड़ कर चले गए!
लेकिन उनसे भी छूटा नहीं है। असल में कहीं पकड़ न जाएंइस डर से भाग खड़े हुए हैं। छूटने में और छोड़ने में फर्क है। छूटना तो बोध की प्रक्रिया हैवह तो सम्यक जागरण हैउसकी सहज निष्पत्ति है।
दो फकीर एक जंगल में यात्रा करते थेगुरु और शिष्य। बूढ़ा गुरुयुवा शिष्य। युवा शिष्य बहुत हैरान था! हैरान था इसलिए कि ऐसी बात उसने अपने गुरु में कभी देखी ही न थी। कुछ नई ही बात हो रही थी आज। गुरु बार-बार अपनी झोली में हाथ डाल कर कुछ टटोल लेता था। थोड़ी देर में फिर! थोड़ी देर में फिर! झोली में उसका जी अटका था। शिष्य सोचता था कि क्या झोली में है आज! उसे कभी चिंतित नहीं देखा। उसे कभी झोली में बार-बार झांकते नहीं देखा। आज क्या माजरा है!
फिर सांझ होने लगीसूरज ढलने लगा। वे एक कुएं पर हाथ-मुंह धोनेथोड़ा विश्राम करनेथोड़ा कलेवा कर लेने को रुके। गुरु पानी भरने लगा। झोला उसने अपने शिष्य को दिया और कहाजरा सम्हाल कर रखना!
ऐसा भी उसने कभी कहा न था। झोला यूं ही रख देता था। न मालूम कितने घाटों पर और न मालूम कितने कुओं पर रुकना हुआ था। आज क्या बात है! उत्सुकता जगी। जब गुरु पानी भरने लगातो शिष्य ने झांक कर झोले में देखा। सोने की एक ईंट झोले में थी! सब राज खुल गया। उसने ईंट को तो निकाल कर झोले के बाहर कुएं के पास फेंक दिया एक गङ्ढे में और उसी वजन का एक पत्थर झोले में रख दिया।
गुरु ने जल्दी से हाथ-मुंह धोयानाश्ता किया। बीच-बीच में झोले पर नजर भी रखी। एक-दो बार चेताया भी शिष्य को कि झोले का खयाल रखना। शिष्य हंसाउसने कहापूरा खयाल हैआप बिलकुल निष्फिक्र रहें। चिंता की अब कोई बात ही नहीं!
जैसे ही निपटेचलने को आगे बढ़ेगुरु ने जल्दी से झोला वापस ले लिया। अक्सर तो यूं होता था कि झोला शिष्य को ही ढोना पड़ता था। आज गुरु शिष्य पर झोले का बोझ डालने को राजी न था! जल्दी से झोला अपने कंधे पर ले लिया। बाहर से ही टटोल कर देखा: वजन पूरा हैईंट भीतर है। निश्चिंत हो चलने लगा।
फिर बार-बार कहने लगारात हुई जाती है। दूर किसी गांव का टिमटिमाता दीया भी दिखाई पड़ता नहीं! जंगल है। अंधेरा है। अमावस है। चोरलफंगेलुटेरे--कोई भी दुर्घटना घट सकती है। जब भी गुरु यह कहेशिष्य हंसे।
आखिर गुरु ने दो मील चलने के बाद पूछा कि तू हंसता क्यों है?
शिष्य ने कहामैं इसलिए हंसता हूं कि अब आप बिलकुल निश्चिंत हो जाएं। आपकी चिंता का कारण तो मैं कुएं के पास ही फेंक आया हूं।
तब घबड़ा कर गुरु ने झोले में हाथ डाला। देखा तो पत्थर था! सोने की ईंट तो जा चुकी थी! क्षण भर को तो सदमा लगा। छाती की धक-धक रुक गई होगी। श्वास ठहरी की ठहरी रह गई होगी। लेकिन फिर बोध भी हुआ। बोध यह हुआ कि दो मील तक झोले में तो पत्थर थालेकिन मैं यूं मान कर चलता रहा कि सोने की ईंट हैतो मोह बना रहा। जिंदगी भर भी अगर मैं यह मान कर चलता रहता कि सोने की ईंट हैतो मोह बना रहता। मोह ईंट में नहीं थामेरी भ्रांति में था। मोह ईंट में होतातो इन दो मीलों तक मोह के होने का कोई कारण न थाचिंता की कोई वजह न थी। मेरी आसक्ति मेरे भीतर थीबाहर की ईंट में नहीं। जिंदगी भर भी आसक्त रह सकता थाअगर यह भ्रांति बनी रहती कि ईंट सोने की है। और तत्क्षण भ्रांति टूट गईजैसे ही जाना कि ईंट पत्थर की है।
झोला वहीं गिरा दिया। खिलखिला कर हंसा। वहीं बैठ रहा। कहाअब कहां जाना हैअब गांव वगैरह खोजने की कोई जरूरत नहीं। वैसे ही बहुत थके हैं। अब आज रात इसी वृक्ष के नीचे सो रहेंगे।
शिष्य ने कहाअंधेरा है! अमावस है! चोर हैंलुच्चे हैंलफंगे हैंलुटेरे हैं!
गुरु ने कहारहने दे। अब कुछ भेद नहीं पड़ता। अब अपने पास ईंट ही नहींअपने पास सोना ही नहींतो लूटने वाला भी क्या लूटेगा!
इसे मैं छूटना कहता हूं। छोड़ा नहींछूटा। एक बोध जगा। एक समझ गहरी हुई। एक बात साफ हो गई कि सब उपद्रव भीतर है,बाहर नहीं। बाहर तो सिर्फ बहाने हैंनिमित्तखूंटियांजिन पर हम अपने भीतर के उपद्रव टांग देते हैं। फिर धन होपद हो,प्रतिष्ठा होपरिवार होप्रियजन होंमित्र होंदेह होमन हो--कोई भी बहाना काम दे देगा। लेकिन अगर भीतर टांगने को ही कुछ न बचा होतो फिर सब बहाने रहे आएंक्या फर्क पड़ता है! फिर बाजार में बैठो कि मरघट मेंबराबर है।
वे जो भगोड़े हैंउनसे संसार छूटा नहीं हैउन्होंने छोड़ा है। और दोनों शब्दों में उतना ही भेद हैजितना जमीन और आसमान में। छूटना तो बोध से होता हैछोड़ना भय से होता है। भय और बोध का क्या नाताक्या संबंधवे तो विपरीत हैंउनका तो कभी मिलन होता ही नहीं। बोध और भयभय तो पलता है अंधेरे में। और बोध जगता है उजेले में। बोध है सुबहऔर भय है अमावस की रात। दोनों का कैसा मिलन?
वे जो भाग गए हैं छोड़ करछिप गए हैं जाकर पहाड़ियों मेंगुफाओं मेंवे सिर्फ भयभीत हैंडरे हुए हैं। डर है कि संसार में अगर रहेतो आसक्ति पकड़ लेगी।
मगर संसार ने कभी किसी को पकड़ा हैतुम कल न मरोआज मर जाओतो संसार तुम्हें क्षण भर न रोकेगा--कि न जाओ;कि ठहरोकि कुछ देर तो ठहरो! तुम्हारे बिना कैसे चलूंगा! कि तुम्हारे अभाव मेंतुम्हारे बिना सब अस्तव्यस्त हो जाएगा,अराजकता हो जाएगी। तुम नहींतो फिर जिंदगी कहां! रुक जाओठहर जाओ! थोड़ी देर और। जरा सम्हल लेने दोपरिपूरक खोज लेने दोफिर चले जाना। ऐसी जल्दी क्या है?
कल के मरते आज मर जाओसंसार को क्या पड़ी है! कुछ अंतर ही नहीं पड़ता। कितने लोग आएकितने लोग गए! कितने लोग आते रहेजाते रहे! कितने लोग आते रहेंगेजाते रहेंगे! संसार अपनी जगह है। संसार तुम्हें पकड़ता नहीं। तुम संसार को पकड़े हुए हो।
इसलिए छोड़ कर कहां भाग रहे होअगर पकड़ने की आदत तुम्हारी हैतो तुम्हारे साथ चली जाएगी। उसे कैसे छोड़ोगेवह तो भीतर है। तो हो सकता हैमहल छोड़ दोझोपड़ा पकड़ लोगे। सिंहासन छोड़ दोलंगोटी पकड़ लोगे। तिजोरियां छोड़ दो,भिक्षापात्र पकड़ लोगे। राज्य छोड़ दोकुछ अंतर न पड़ेगाएक वृक्ष के नीचे बैठ रहोगेउस पर कब्जा कर लोगे कि यह मेरा वृक्ष! इसके नीचे कोई और अड्डा न जमाए! किसी और की धूनी न लगे! पकड़ोगे तुम जरूर। क्योंकि पकड़ कहीं यूं जाती है! पकड़ तो केवल समझ से जाती है।
इसलिए मैं अपने संन्यासी को कहता हूंभागना मत। भागना है भय। और भय तो कायरता है। और कायर तो संसार भी नहीं पा सकतासत्य को क्या खाक पाएगा! इसलिए मेरे मन में भगोड़ों के प्रति कोई आदर नहींकोई सम्मान नहीं। वे चाहे कितने ही बड़े भगोड़े रहे होंऔर चाहे उन्होंने कितने ही लोगों को प्रभावित कर दिया हो।
लोग तो अपने से विपरीत व्यक्ति से प्रभावित हो जाते हैं। एक आदमी सिर के बल खड़ा हो जाए और भीड़ लग जाएगी। अब यूं सिर के बल खड़ा होना कोई बड़ी बात नहीं। कोई भी मूढ़ कर सकता है। सच तो यह हैसिवाय मूढ़ के और कौन करेगा!
अगर परमात्मा को तुम्हें सिर के बल ही खड़ा करना थातो उसने सिर में टांगें उगा दी होतीं। परमात्मा शीर्षासन में बहुत उत्सुक नहीं है। अगर परमात्मा को ही तुम्हें कांटों की सेज पर लिटाना होतातो तुम्हारे साथ ही कांटों की सेज भेज दी होती;इंतजाम कर दिया होता। उसने तुम्हारे प्रवास के लिए पूरा इंतजाम करके भेजा है। अगर परमात्मा उत्सुक होता तुम्हारे उपवासों मेंतो उसने तुम्हें भूखा रखने की कला ही सिखा दी होती। अरेजो भूख दे सकावह भूखापन नहीं दे सकता थाअगर परमात्मा उत्सुक होता कि तुम छोड़ दो प्रियजनतुम छोड़ दो मित्रजनतुम छोड़ दो परिवारतुम छोड़ दो लोगतो तुम्हें परिवार में और प्रियजनों मेंमित्रों में पैदा ही क्यों करतायूं ही जैसे आकाश से वर्षा होती हैतुम भी बरस गए होते!
जार्ज गुरजिएफ कहा करता था कि तुम्हारे महात्मातुम्हारे सभी महात्मा परमात्मा के दुश्मन मालूम होते हैं। परमात्मा एक काम करता हैतुम्हारे महात्मा उससे उलटा काम करने को बताते हैं!
लेकिन राज है। राज यह है कि परमात्मा तो तुम्हें सहजस्वाभाविक बनाता हैमहात्मा तुम्हें असहजअस्वाभाविक बनाते हैं। क्योंकि असहजअस्वाभाविक होकर ही तुम आकर्षण के बिंदु बनते हो। लोगों के लिए तुम्हारे प्रति सम्मान तभी पैदा होगाजब तुम कुछ उलटा करो।
अमरीका में एक विचारक हुआराबर्ट रिप्ले। वह प्रसिद्ध होना चाहता था। कौन प्रसिद्ध नहीं होना चाहताचाहता था सारी दुनिया उसे जान ले। गांव में एक बहुत बड़ा सरकस आया हुआ था। सोचा उसने कि सरकस इतना प्रसिद्ध हैजग-जाहिर है;इसके मैनेजर को जरूर कुछ सूत्र पता होंगे प्रसिद्धि के। तो मैनेजर से उसने अलग से मुलाकात ली और कहा कि मुझे भी कुछ राज बताओ! मैं भी प्रसिद्ध होना चाहता हूं!
मैनेजर ने यूं ही मजाक में कहा...। सरकस का ही मैनेजर थाधंधा ही मजाक का थातमाशबीनी का था। उसने कहाइसमें क्या खास बात है! तुम अपने सिर के आधे बाल कटा लोऔर चुपचापबिना कुछ बोलेजमीन पर टकटकी बांधे पूरे न्यूयार्क की सड़कों पर चक्कर काटते रहो। तीन दिन बाद आना।
तीन दिन बाद वह आयातो साथ में अखबारों की बहुत सी कटिंग भी लाया। क्योंकि अखबारों में तस्वीरें ही छप गईं। चर्चा हो गई गांव में घर-घर में कि यह कौन है आदमी! आधे सिर के बाल कटाए हुए! कौन प्रसिद्ध न हो जाएगा?
रिप्ले ने मैनेजर को बहुत धन्यवाद दिया और कहाअब आगे के लिए कुछ और बताएं! न्यूयार्क में तो जलवा हो गयाडुंडी पिट गई। एक बच्चा ऐसा नहीं हैजो न जानता हो। गांव-गांवआस-पास भी खबर फैलने लगी।
मैनेजर ने कहाअब तुम ऐसा करोएक बड़ा आईना खरीदो। उस आईने को अपनी कमर पर बांध लो। आईने में देखोतो पीछे का रास्ता दिखाई पड़ेगा। और बस पीछे की तरफ चलोआगे की तरफ नहीं। और सारे अमरीका का चक्कर लगा डालो।
और रिप्ले ने वही किया। और चक्कर पूरा होते-होते अमरीका में ही नहींसारी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया--यह कौन आदमी है!
और उससे कहातू बिलकुल चुप रहना। बोलना है ही नहीं! जितना चुप रहेगाउतना ही अच्छा। बोलेतो कहीं बात न खुल जाए! बुद्धिमान आदमी का बोलना अच्छाबुद्धू का चुप रहना अच्छा। क्योंकि बुद्धू चुप रहे तो बुद्धिमान मालूम होता है!
सो रिप्ले बिलकुल चुप रहा। लाख लोगों ने पूछा। मुस्कुराए! कुछ कहे ही न। अरेराज की बातें कहीं कही जा सकती हैं! शब्दातीत! कहो भी तो कैसे कहोअनिर्वचनीय! प्रवचन से तो मिलती नहीं। बोलने से तो मिलती नहीं। कहने से तो कही नहीं जाती। हस्तांतरणीय नहीं। कोई जानने वाला ही जान लेतो जान ले।
और मजा तो तब हुआजब रिप्ले ने पाया कि कुछ उसके शागिर्द भी पैदा हो गएउसके पीछे-पीछे चलने लगे। उन्होंने भी छोटी-छोटी व्यवस्थाएं कर लीं। जिससे जैसा दर्पण बन सकाले आया। अकेला नहींअब रिप्ले की एक कतार चलने लगी! और वे भी सब चुप। अरे जब गुरु ही चुप हैतो शिष्य भी चुप!
कुछ भीजो सामान्य नहीं हैअसामान्य हैजो स्वाभाविक नहीं हैअस्वाभाविक हैउससे लोग प्रभावित होते हैं। लोगों को प्रभावित करना अहंकार की बड़ी गहरी अभीप्सा है।
ये जो भगोड़े हैंइनसे लोग प्रभावित हुए। इनसे प्रभावित होने का कुल कारण इतना था कि ये कुछ कर रहे थेजो अस्वाभाविक था। स्वाभाविक आदमी से कौन प्रभावित होगा?
जापान का एक सम्राट सदगुरु की तलाश कर रहा था। बहुत तलाश कीसदगुरु न मिला सो न मिला। जो-जो नाम ज्ञात थे,परिचित थेपहचाने थेवहां-वहां गयालेकिन तृप्ति न हुई। अपने बूढ़े वजीर से पूछा कि मैं तो युवा हूंतुम तो बूढ़े हुए। तुम्हें तो कुछ पता होगा। कोई तो ऐसा आदमी होगा...।
वह बूढ़ा हंसने लगा। उसने कहाआदमी तो हैंलेकिन तुम न पहचान सकोगे। क्योंकि सच्चा सदगुरु बिलकुल सहजस्वाभाविक होगा। उसमें कोई सींग थोड़े ही निकले होते हैंजो तुम पहचान लोगे! तुम तलाश कर रहे हो किसी उलटे-सीधे आदमी की। लोग तो मिलेंगे बहुत उलटे-सीधे। मगर जो अभी खुद ही उलटे-सीधे हैंवे तुम्हें क्या लाख उपाय भी करें तो मार्गदर्शन दे सकेंगे?तुम्हें भी और अस्तव्यस्त कर देंगे। तुम वैसे ही अराजक अवस्था में होवे तुम्हें और अराजक कर देंगे। मैं एक आदमी को जानता हूं...।
सम्राट तो उत्सुक था। वजीर को कहामैं चलने को राजी हूं।
वे दोनों गए मिलने उस फकीर को। वजीर तो चरणों पर गिर पड़ा फकीर केलेकिन सम्राट उस आदमी को देख कर इस योग्य न पाया कि इसके चरणों में गिरे। आदमी बिलकुल साधारण था। और काम भी क्या कर रहा था! लकड़ियां काट रहा था।
अब कहीं सदगुरु लकड़ी काटते हैंकि कहीं महावीर लकड़ी काटते मिले जाएं! कि बुद्ध लकड़ी काटते मिल जाएं! सदगुरु कहीं लकड़ियां काटते हैं?
सम्राट ने अपने वजीर से कहा कि यह आदमी लकड़ियां काट रहा है! इसकी क्या खूबी हैवजीर ने कहाइसकी यही खूबी है। इसी से पूछो कि इसकी साधना क्या है! तो पूछा फकीर से कि तेरी साधना क्या है?
फकीर कोई और न थाझेन सदगुरु थाबोकोजू। उसने कहामेरी कोई साधना नहीं। जब भूख लगती हैतो भोजन कर लेता हूं। और जब नींद आती हैतो सो जाता हूं। मेरी कोई और साधना नहीं है।
सम्राट ने कहालेकिन यह कोई साधना हुईयह भी कोई साधना हुईयह तो हम सभी करते हैं। जब भूख लगती हैभोजन करते हैं। जब नींद आती हैसो जाते हैं।
बोकोजू ने कहा कि नहीं। इतने जल्दी निष्कर्ष न लो। कई बार तुम्हें भूख नहीं लगतीऔर तुम भोजन करते हो। और कई बार तुम्हें भूख लगती हैऔर तुम भोजन नहीं करते। और कई बार तुम्हें नींद आती हैऔर तुम सोते नहीं। और कई बार तुम्हें नींद नहीं आतीऔर तुम सोने की चेष्टा करते हो। इतना ही नहींतुम जब भोजन करते होतब और भी हजार काम करते हो। यंत्रवत भोजन करते रहते होऔर मन न मालूम किन-किन लोकों में भागा रहता है! और जब तुम सोते होतब तुम सिर्फ सोते ही नहीं। कितने-कितने सपने देखते हो! कहां-कहां नहीं जाते! क्या-क्या नहीं करते! मन का व्यापार जारी रहता है। मैं जब भोजन करता हूंतो सिर्फ भोजन ही करता हूं। बसभोजन ही करता हूं। उस वक्त भोजन करने के सिवाय बोकोजू में और कुछ भी नहीं होता। और जब सोता हूंतो सिर्फ सोता हूंउस समय सोने के सिवाय बोकोजू में और कुछ भी नहीं होता। और जब मुझे नींद आती हैतो मैं एक क्षण भी टालता नहींतत्क्षण सो जाता हूं।
बोकोजू के संबंध में कहानियां हैं कि कभी-कभी बीच प्रवचन में देते-देते सो जाता था! नींद आ गईतो बोकोजू क्या करेइतना नैसर्गिक आदमी! और ब्रह्ममुहूर्त में नहीं उठता था। और जब किसी ने पूछा उससे कि फकीर को तो ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए। तुम ब्रह्ममुहूर्त में नहीं उठतेबोकोजू ने कहामैंने परिभाषा बदल ली अनुभव से। फकीर जब उठेतब ब्रह्ममुहूर्त। जब नींद खुलेतो भीतर का ब्रह्म जागना चाहता हैयह ब्रह्ममुहूर्त।
और जब भीतर का ब्रह्म सोना चाहता हैतो तुम अलार्म भर कर और जबरदस्ती उठने की कोशिश कर रहे हो। ठंडा पानी छिड़क रहे हो आंखों पर। राम-राम जप रहे हो। भाग-दौड़ कर रहे होदंड-बैठक लगा रहे हो कि किसी तरह नींद टूट जाए। क्योंकि स्वर्ग जो जाना है! ब्रह्ममुहूर्त में जगे बिना स्वर्ग तो जा न सकोगे!
बोकोजू कहताजब नींद खुल गईतब ब्रह्ममुहूर्त।
तो कभी-कभी दोपहर तक सोया रहता। और कभी-कभी आधी रात तक जागा रहता। जब नींद आएगीतब सोएगा। जब भूख लगीतो भोजन करेगा। कभी-कभी दिनदो दिन बीत जाते और भोजन न करता। वह उपवास न था। और कभी-कभी दिन में दो बार भोजन करता। इतना नैसर्गिक!
मगर ऐसे आदमी से कौन प्रभावित होहम तो उलटे-सीधे लोगों से प्रभावित होते हैं। इसलिए भगोड़ों ने मनुष्य को बहुत ज्यादा प्रभावित किया। वे हमसे उलटे थे। और हमसे उलटे थे इसलिएमैं तुमसे कहता हूंहम से जरा भी भिन्न न थे। हम जैसे ही थे। बसहम पैर के बल खड़े हैंवे सिर के बल खड़े थे। हम सोने के पीछे दीवाने हैंवे डरते थे कि कहीं सोना छू न जाए। हम स्त्रियों के पीछे भागे जा रहे हैंवे स्त्रियों के प्रति पीठ करके भागे जा रहे थे। मगर भाग जारी थी। और दोनों का केंद्र स्त्री थी। एक स्त्री की तरफ भाग रहा हैएक स्त्री से भाग रहा है। मगर दोनों की नजर स्त्री पर अटकी है। एक कहता है कि स्त्री में ही स्वर्ग है। और एक कहता हैस्त्री नर्क का द्वार है। मगर दोनों के लिए स्त्री महत्वपूर्ण है। किसी के लिए स्वर्ग का द्वारकिसी के लिए नर्क का द्वार। मगर द्वार स्त्री ही है।
मगर स्त्री से छुटकारा नहीं है ऐसे। न पुरुष से छुटकारा है। न धन से छुटकारा है।
विश्राम बनाने के लिएविराम में जाने के लिए पक्षी घोंसले बनाते हैंमनुष्य झोपड़े बनाते हैं या महल बनाते हैं। कुछ बुरा नहीं। बसइतनी ही याद रहे कि उन सीमाओं में आबद्ध न हो जाना। वे सीमाएं तुम्हारी सीमाएं नहीं हैं। कोई सीमा तुम्हारी सीमा नहीं है। रहो जरूरमगर अतिथि की तरह रहनाआतिथेय मत हो जाना। मेहमान की तरह रहनामेजबान न हो जाना। तो फिर तुम जहां होवहीं संन्यासी हो।
आनंद मैत्रेय! तुमने पूछा कि "विश्राम के लिए अनंत आकाश में उड़ने वाला पक्षी घास का छोटा सा घोंसला बनाता है...।'
वह उड़ने के लिए जरूरी है। उड़ने के लिए शक्ति संयोजित करनी होगी। जागने के लिए सोना होगा। भागने के लिए बैठना होगा। नहीं तो ऊर्जा विनष्ट हो जाएगी। वह घोंसला आकाश का दुश्मन नहीं हैसंगी-साथी हैआकाश का हिस्सा हैआकाश ही है।
मगर कोई पक्षी घोंसले को पकड़ कर नहीं बैठ जाता। तुमने देखा! अंडे फूटते हैंनए पक्षी पैदा होते हैं। रुकते हैं तब तक घोंसले मेंजब तक उड़ने के योग्य नहीं हो जाते। और जिस दिन उड़े कि उड़े। फिर लौट कर आते ही नहीं। फिर घोंसले बनाएंगेजब उनको खुद अंडे रखने होंगे।
जरूरत हैतो उपयोग करो। संसार का उपयोग करो।
संसार नहीं बांधता है। संसार से भागो मतजागो।
तुम कहते हो, "और विश्राम के लिए आदमी ने पहले गुफा खोजीफिर झोपड़ा और मकान बनाया। और आज आप अनहद में बिसराम की चर्चा शुरू कर रहे हैं...।'
यह अनहद में विश्राम अंतिम विश्राम है। यह आखिरी घोंसला है। फिर उसके पार और मकान नहीं बनाने पड़ते। शाश्वत घर मिल गयाफिर क्या मिट्टी के घरघूले बनाने! क्या फिर रेत के मकान बनाने! जो अभी बनाए और अभी गिरे! फिर क्या क्षणभंगुर में समय को व्यतीत करना है और व्यर्थ करना है! अनहद में बिसरामदरिया की इस अदभुत सूचना का अंग है:
जात  हमारी  ब्रह्म  हैमाता-पिता  है  राम।
गिरह हमारा सुन्न मेंअनहद में बिसराम।।
इस सूत्र को समझ लो। यह सूत्र संन्यास का सार है।
"जात हमारी ब्रह्म है।'
जात का अर्थ होता हैजहां से हम जन्मेजो हमारा वास्तविक जीवन-स्रोत है। इसलिए तुम्हारी जात हिंदू नहीं हैऔर मुसलमान नहीं हैऔर ईसाई नहीं है। क्योंकि बच्चा जब पैदा होता हैउसे पता ही नहीं होता कि हिंदू हैकि ईसाई हैकि मुसलमान है। बच्चा जब पैदा होता हैतो न तो संस्कृत बोलता हैन अरबी बोलता हैन लैटिनन ग्रीक।
मैंने सुना हैएक फ्रेंच दंपतिजिनके बच्चे पैदा नहीं होते थेएक अनाथ आश्रम से एक स्वीडिश बच्चे को गोद ले लिए। जिस दिन उन्होंने स्वीडिश बच्चे को गोद लियाफ्रेंच दंपति नेदोनों ने ही एक स्वीडिश शिक्षिका रख ली और स्वीडिश भाषा सीखने लगे। अचानक! पास-पड़ोस के लोगों ने पूछा कि क्या हुआस्वीडिश भाषा किसलिए सीख रहे होक्या स्वीडन में बस जाने का इरादा हैया कि स्वीडन की लंबी यात्रा पर जा रहे हो?
उन्होंने कहानहीं-नहीं। एक स्वीडिश बच्चे को गोद लिया है। इसके पहले कि वह बड़ा हो और स्वीडिश भाषा में बोलना शुरू करे,हमें कम से कम स्वीडिश तो सीख लेनी चाहिए। नहीं तो हम समझेंगे क्या खाक कि वह क्या बोल रहा है!
बच्चे न तो स्वीडिश बोलते हैंन फ्रेंचन हिंदीन अंग्रेजी। बच्चों की कोई भाषा नहीं होतीशून्य उनकी भाषा होती हैमौन उनकी भाषा होती है। और उनकी कोई जात नहीं होती। हिंदू नहींमुसलमान नहींईसाई नहीं। सब जातें हम थोप देते हैं। और क्या गजब हुआ है! जातों पर जातें थोपे चले जाते हैं। हिंदू होने से ही काम नहीं चलता। फिर उसमें ब्राह्मणफिर उसमें क्षत्रिय;फिर वैश्यफिर शूद्र। इतने से भी काम नहीं चलता। फिर अब ब्राह्मणों में भी कोंकणस्थ और देशस्थ!
विनोबा भावे से किसी ने पूछा कि आप कोंकणस्थ ब्राह्मण हैं या देशस्थविनोबा ने अपनी सूझ-बूझ के हिसाब से ठीक ही उत्तर दियाहालांकि मुझे कुछ बहुत ठीक नहीं लगता। उन्होंने कहान तो मैं कोंकणस्थ ब्राह्मण हूंन देशस्थ। मैं तो स्वस्थ ब्राह्मण हूं।
बात तो ठीक है। लेकिन मेरा इतना ही निवेदन है कि इसमें पुनरुक्ति है। स्वस्थब्राह्मणदोनों का एक ही अर्थ होता है। स्वस्थ का अर्थ होता हैस्वयं में स्थित हो जाना। और ब्राह्मण का अर्थ होता हैस्वयं के ब्रह्म को जान लेना। इसलिए स्वस्थ ब्राह्मणएक ही बात को कहने के लिए दो शब्द उपयोग कर रहे हो। उचित नहीं है। ब्राह्मण होना काफी है। स्वस्थ होना काफी है। स्वस्थ ब्राह्मण होने की कोई जरूरत नहीं है। एक ही बात को कहने के लिए दो शब्द क्यों उपयुक्त करनेक्यों उपयोग करना?
लेकिन यूं उनकी बात ठीक है कि कोंकणस्थ नहींदेशस्थ नहीं। लेकिन खतरा यह है कि कुछ स्वस्थ ब्राह्मण पैदा हो सकते हैं। ऐसे ही तो जातियां पैदा होती हैं। विनोबा के पीछे चलने वाले ब्राह्मण कहने लग सकते हैं कि हम स्वस्थ ब्राह्मण हैं। फिर एक जाति पैदा हो गई।
क्या ब्राह्मण होना पर्याप्त नहीं हैक्या ब्रह्म होना काफी नहीं हैक्या ब्रह्म से और कोई परिष्कार हो सकता हैक्या ब्रह्म को सुंदर बनाया जा सकता हैकुछ और शब्द उस पर आरोपित कर दिए जाएं तो?
दरिया ठीक कहते हैं: "जात हमारी ब्रह्म है।'
तो न तो हम हिंदू हैंन मुसलमानन ईसाईन ब्राह्मणन शूद्रन क्षत्रियन वैश्य। हम ब्रह्म से आए हैं। ब्रह्म का अर्थ है,जीवन का स्रोतइस विराट अस्तित्व का मूल स्रोत। उस ब्रह्म से हमारा आना हुआ हैऔर उसी में हमें लौट जाना है। और जिसने इन दोनों के बीच--आने और जाने के बीचआवागमन के बीच--उसको पहचान लियाफिर उसका आवागमन मिट जाता है। जिसने जन्म और मृत्यु के बीच अपने भीतर के ब्रह्म को पहचान लियाफिर उसे दुबारा आने की कोई जरूरत नहीं रह जाती।
यह जीवन है ही इसलिएपाठशाला हैकि हम अपने भीतर के ब्रह्म के प्रति सजग हो सकेंजाग सकेंपहचान सकें।
पहचान के लिए एक गणित खयाल में रखना। मछली सागर में पैदा होती हैलेकिन जब तक सागर में रहेगीउसे पता ही नहीं चलेगा कि सागर क्या है। खींच लो सागर से! कहो किसी मछुए सेनिकाल ले मछली को सागर के बाहर। छोड़ दो तट परधूप मेंतपी हुई रेत पर। तड़पने दो थोड़ा। और फिर उसे वापस सागर में छोड़ दो। मछली वही हैसागर वही हैलेकिन सब बात बदल गई। अब मछली जानती है कि सागर क्या है। पहले नहीं जानती थी। अब बोध हुआ। अब पता चला कि सागर ही मेरा जीवन हैमेरा आनंद हैमेरा उत्सव है। अब पता चलासागर ही मेरा संगीत हैसागर ही मेरा नृत्य है। सागर से क्षण भर को छूटनाऔर नर्क और पीड़ा और दुर्दिन और दुर्भाग्य की शुरुआत! हम ब्रह्म के सागर से आते हैंमछलियां हैंजो संसार के तट पर फेंक दी गईं। जान-बूझ कर फेंकी गई हैंताकि पाठ सीख लें। पाठ सीखने का एक ही उपाय है कि थोड़ी देर के लिए बिछुड़न हो जाए। अगर मिलन कभी टूटे ही नतो बोध नहीं होता।
एक बहुत बड़े अमीर ने जीवन के अंतिम दिनों में तय किया कि सब मैंने पा लिया--धनपदप्रतिष्ठाहीरों के ढेर लग गए--लेकिन सुख तो मैंने जाना नहींक्षण भर को न जाना। धन को पाने में दुख उठाया। धन पाकर कुछ सुख मिलता नहीं। धन तो हैलेकिन सुख कहां! और जीवन की अंतिम घड़ी पास आने लगी। सूरज ढलने लगा है। अब ढलातब ढला। यह उतरने लगा पश्चिम में सूरज। कभी भी रात आ जाएगी। इसके पहले कि मौत आएसुख को तो जानना ही है।
तो उसने एक बहुत बड़ी झोली में बहुमूल्य हीरे-जवाहरात भरेअपने घोड़े पर सवार हुआ। बहुत फकीरों के पास गया। और फकीरों से कहायह सारा धन देने को तैयार हूं। सुख की एक झलक दिखा दो!
मगर कौन सुख की झलक दिखाएकैसे सुख की झलक दिखाएउत्सुक तो फकीर भी थे उसके धन को लेने में। और जो उसके धन को लेने में उत्सुक थेवे क्या खाक सुख की झलक दिखाएंगे! अभी तो उनको खुद भी झलक नहीं मिली! अभी तो वे भी सोच रहे हैं कि धन मिल जाएतो शायद झलक मिले! और आंख के होते हुए अंधे हैं। इस आदमी को धन मिल गया और धन का झोला लिए घूम रहा है कि मैं देने को तैयार हूं किसी को भी। एक झलकबस एक झलक! एक नजर भर कर देख लूं सुख क्या हैकि सब निछावर कर दूंगा।
फिर एक सूफी फकीर की उसको खबर मिली। लोगों ने कहाहम तो न दे सकेंगे झलक। सच तो यह है कि तुम्हारा धन देख कर हमारे भीतर तुमने लालच जगा दिया। हमारी न मालूम कितने दिनों की तपश्चर्या और साधना डगमगा दी। तुम भागो यहां से! ले जाओ अपना धन! हम पहुंचे ही जा रहे थेपहुंचे ही जा रहे थेकि तुमने चुका दिया। तुम खुद भी चूके और हमको भी चुका दिया। हांएक फकीर हैवह जरा उलटा-सीधा फकीर है। शायद वही तुम्हारे काम आए।
तो गया धनपति। अपने घोड़े को रोका उस फकीर के वृक्ष के नीचे। फकीर को अपनी पूरी कथा सुनाई। फकीर ने गौर से सुनी। धनपति ने अपना झोला भी खोल कर दिखाया। हीरे-जवाहरातों का ढेर था उसमें। अरबों-खरबों के होंगे। फकीर ने कहाझोला बंद कर!
झोला धनपति ने बंद किया। लगा कि फकीर है तो कुछ पहुंचा हुआ। और दूसरे फकीरों को तो झोले में एकदम रस आ गया था। एकदम उनकी आंखों से लार टपकने लगी थी। वे तो भूल ही गए थे इसको सुख देने की बात। वे तो खुद ही के सुख पाने की आकांक्षा में तल्लीन हो गए थे।
इस फकीर ने कहाबंद कर ये कचरे को! झोला बंद कर! फिर कुछ सुख दिखाने की बात बने। धनपति ने झोला बंद किया। यह फकीर जंचा। जिसने जीवन भर धन इकट्ठा किया होउसको ऐसा ही आदमी जंचता है। और जैसे ही उसने झोला बंद करके एक तरफ रखाफकीर उठा और झोला लेकर भाग खड़ा हुआ!
एक क्षण को तो धनपति को कुछ समझ में ही नहीं आया कि क्या हो रहा है! किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया। जब होश आया,तब तक तो फकीर यह गया वह गया! नौ दो ग्यारह हो गया! उसको तो जगह परिचित थी। वह जंगल परिचित थावह पास में ही बसा गांव परिचित था। इस धनपति को तो सब अपरिचित था। भागा एकदम उसके पीछेबेतहाशा भागा। घोड़े को भी छोड़ गया। भूल ही गया घोड़े की बात। चिल्लाता हुआकि लुट गया! बर्बाद हो गया! मेरी जिंदगी भर की मेहनत पर पानी फेर दिया। अरेयह कोई फकीर नहीं हैयह बदमाश हैलुच्चा हैचोर है! चिल्लाता जाएभागता जाए: पकड़ो-पकड़ो!
सारा गांव खड़े होकर देख रहा था। गांव तो फकीर को जानता था। वह कई करतब इस तरह के पहले कर चुका था! उसके कामों से तो लोग परिचित थे कि वह कुछ उलटा-सीधा करता है! कुछ किया होगा। कोई पकड़ने में उत्सुक नहीं दिखाई पड़ रहा था। और धनपति और भी हैरान था। फिर तो वह गालियां पूरे गांव को देने लगा कि पूरा गांव बदमाशों कालुच्चों का है। यह फकीर तुम्हारा नेता है या क्या बात है! पकड़ते क्यों नहीं?
लोग हंस रहे थेखिलखिला रहे थे। मगर उसके प्राणों पर बनी थी। हांफताभागताफकीर का पीछा करता रहा। फकीर वापस पहुंच गया उसी झाड़ के नीचे जहां घोड़ा खड़ा था अब भी। झोले को वहीं रख दिया जहां से उठाया थाझाड़ के पीछे जाकर खड़ा हो गया छिप कर।
थोड़ी ही देर बाद धनपति भी हांफतापसीने से लथपथजिंदगी में कभी ऐसा दौड़ा नहीं था। मौका ही न आया था। झोला देखा,एकदम उठा कर छाती से लगा लिया और कहा कि हे परमात्मा! धन्य है तू। किन शब्दों में तेरा आभार करूं! आत्मा को ऐसी शांति मिल रही हैऐसा सुख मिल रहा हैकभी नहीं मिला!
फकीर बोलामिलाचलो थोड़ा दर्शन तो हुआ। झलक मिली?
यह धनपति को पता नहीं था कि वह झाड़ के पीछे छिपा है। फकीर बाहर आ गयाअपनी जगह बैठ गया। उसने कहादेखतू कहता था झलक दिखा दोदिखा दी। अब अपने घर जा। अब आगे काम तू कर। तब धनपति को बोध आया। चरणों पर गिरा। कहा कि मैं पहचाना नहीं। लुच्चा-लफंगा चिल्लायागालियां दींपूरे गांव को गालियां दीं। अब मैं समझा कि वे गांव के लोग क्यों तुम्हें नहीं पकड़ रहे थे। वे तुम्हें जानते होंगे। मगर तुमने क्या गजब किया!
फकीर ने कहाइसके सिवाय कोई रास्ता नहीं था। यही परमात्मा की विधि हैऔर यही समस्त सदगुरुओं की विधि है। तुमसे जब तक हटा न लिया जाएतब तक तुम्हें पता ही नहीं चलेगा। अचानक तुम्हें सुख मिल गया! यह झोला तो तुम्हारे पास सदा से था। पहले छाती से लगा कर परमात्मा को धन्यवाद नहीं दिया। आज क्यों धन्यवाद दे रहे होथोड़ी देर को मछली सागर से छूट गई।
यह संसार एक शिक्षण की व्यवस्था है। इसलिए जिन्होंने तुमसे कहा है संसार छोड़ दोवे वे ही लोग हैंजो तुम्हारे बच्चों को समझाएं कि स्कूल छोडदोभाग खड़े होओ!
यह स्कूल हैइसे छोड़ना नहीं है। यहां कुछ सीखना है। यहां परमात्मा से विरह हो गया हमारा। वह जो हमारा मूल स्रोत है,उदगम हैब्रह्म हैउससे हमारा नाता टूट गया है। इस विरह को भोगना हैताकि फिर से मिलन की संभावना बन सके। और विरह के बाद जो मिलन हैउसका मजा ही और है।
"जात हमारी ब्रह्म हैमाता-पिता है राम।'
जात भी हमने खो दी। न मालूम क्या-क्या बन कर बैठ गए हैं। जमीन पर कोई तीन सौ धर्म हैं। और तीन सौ धर्मों में कम से कम तीन हजार छोटी-छोटी जातियांउप-जातियांऔर न मालूम क्या-क्या...कितना जाल फैला दिया है! और जिनको हम भले लोग कहेंउनके भीतर भी वही जाल है।
शंकराचार्य जैसे व्यक्ति कोजिनको भारतीय सोचते हैं वेदांत की पराकाष्ठाउनको भी एक शूद्र ने छू दियातो वे नाराज हो गए। शंकराचार्य! पानी फेर दिया सब वेदांत परभूल गए सब बकवास कि जगत माया है और ब्रह्म सत्य है। तत्क्षण पता चला शूद्र सत्य हैब्रह्म वगैरह कोई सत्य नहीं। एक शूद्र ने छू दिया। भूल गए ज्ञानभूल गए चौकड़ी! एकदम क्रुद्ध हो गए और कहा कि मूढ़शूद्र होकर तुझे इतनी समझ नहीं कि ब्राह्मण को छू दियाऔर मैं अभी गंगास्नान करके आ रहा हूं!
स्नान करके वे चढ़ ही रहे थे दशाश्वमेध की सीढ़ियांतभी उस शूद्र ने छू दिया। सुबह-सुबह का अंधेरा। अब मुझे फिर स्नान करना पड़ेगा!
उस शूद्र ने कहास्नान आप जरूर करिए। मगर इसके पहले कि स्नान करेंमेरे कुछ सवालों का जवाब दे दें। एक तो यह कि अगर संसार माया हैतो किसने किसको छुआअगर मैं हूं ही नहींअगर यह देह भ्रम हैतो दो भ्रम एक-दूसरे को छू सकते हैंऔर अगर छू भी ले भ्रम भ्रम कोतो क्या हर्जा हैऔर तुम्हारा भ्रम पवित्रऔर मेरा भ्रम अपवित्रकुछ तो संकोच करो! कुछ तो लाज करो! कुछ तो अपने कहे का खयाल करो! थूके को इतनी आसानी से तो न चाटो! फिर मैं यह भी पूछता हूं कि गंगा में स्नान करने से शरीर पवित्र हुआ कि आत्मा पवित्र हुईपानी शरीर को छुएगा कि आत्मा कोअगर शरीर पवित्र हुआ हैतो शरीर क्या पवित्र हो सकता हैक्योंकि शरीर तो मिट्टी है। और तुम्हीं तो समझाते हो कि शरीर में कुछ भी नहीं है।
ये सारे महात्मागण समझाते हैं। खास कर स्त्रियों के शरीर में। क्योंकि ये सब लिखने वाले पुरुष हैं। यह तो बड़ी कृपा है कि स्त्रियों ने शास्त्र नहीं लिखे। लिखना चाहिए उन्हें। सारे पुरुष हैं लिखने वाले! स्त्रियों को तो पढ़ने भी नहीं देते। उनके लिए तो बना दिया है कुछ अलग ही हिसाब। रामायण पढ़ोसत्यनारायण की कथा पढ़ो--कूड़ा-करकट! उपनिषद नहीं। जो कीमती हैवह नहीं। क्या स्त्री-बुद्धि समझेगी कीमती को! वह तो पुरुषों की बात है। पुरुष पढ़ेंगे उपनिषद। और स्त्रियां बाबा तुलसीदास की चौपाइयां रटेंगी।
और उन्हीं बाबा तुलसीदास कीजो कह गए स्त्रियों को कि ढोल गंवार शूद्र पशु नारीये सब ताड़न के अधिकारी! स्त्रियां इन्हीं को घोट रही हैं। स्त्रियों को वेद पढ़ने की मनाही! और पुरुष स्त्रियों के संबंध में क्या-क्या कहते रहे! कि स्त्री का शरीर है क्या?मांस-मज्जामवादखूनवातपित्तकफ। जैसे पुरुष के शरीर में कोई हीरे-जवाहरातस्वर्ण-भस्मी! यह पुरुष का शरीर आता कहां से हैयह आता है स्त्री के गर्भ से। वही वातपित्तकफ! लेकिन स्त्री का शरीर सिर्फ मल-मूत्तर और पुरुष का शरीर जीवनजल! जी भर कर पीओ!
यह देह तो देह हैयह क्या पवित्र होगी! और आत्मा तो पवित्र है हीउसे कैसे पवित्र करोगे! उस शूद्र ने बड़े बहुमूल्य सवाल उठाएजो बड़े-बड़े वेदांती नहीं उठा सके थे। शंकराचार्य अगर किसी व्यक्ति के सामने हतप्रभ हुएतो वह शूद्र था।
मगर शंकराचार्य को भी खयाल नहीं है कि जगत को ब्रह्म कह रहे हैंतो इसका क्या अर्थ होगा! फिर कैसा ब्राह्मणफिर कैसा शूद्रजातियों पर जातियां बन गई हैं। बड़ी सेवा में रत हैं लोगबड़े धार्मिक कार्यों में लगे हैं। मगर मौलिक भ्रांतियां वही की वही।
मदर टेरेसा को नोबल प्राइज मिलीक्योंकि उन्होंने गरीबों की बड़ी सेवा की। वह सरासर झूठ बात है। वह सिर्फ पाखंड हैऊपरी बकवास है। भीतर बात कुछ और है। अनाथालय खोल रखे हैंविधवा आश्रम खोल रखे हैंवे तरकीबें हैं कि कैसे स्त्रियांकैसे अनाथ बच्चे ईसाई हो जाएं। और ईसाई ही नहींकैथलिक ईसाई होने चाहिए।
अभी एक प्रोटेस्टेंट परिवार ने अमरीका से आकर मदर टेरेसा से प्रार्थना की कि हम एक बच्चे को गोद लेना चाहते हैंहमारा कोई बच्चा नहीं है। तो उन्हें फार्म दिया गया भरने कोजिस फार्म में पहली बात यह थी कि बच्चा तभी गोद मिल सकता है,जब आप कैथलिक ईसाई हों। वह प्रोटेस्टेंट परिवार तो हैरान हुआ। उसने कहाईसाई हम भी हैंईसाई तुम भी हो। थोड़ा सा फर्क है कि हम प्रोटेस्टेंट हैंतुम कैथलिक हो। कोई भारी फर्क नहीं। वही बाइबिल मानते हैं हमवही जीससवही तुम वही हम। थोड़े कुछ दो कौड़ी के भेद हैं। और तुम तो मनुष्य-जाति की सेवा में तत्पर हो। तुम्हें क्या फर्क पड़ता है?
लेकिन नहीं। प्रोटेस्टेंट परिवार को ईसाई होते हुए भी बच्चा गोद लेने का हक नहीं दिया गया।
ये सब जालसाजियां हैं। ऊपर बड़ी ऊंची-ऊंची बातें हैं! ये अनाथालयये विधवा आश्रमयह दीन-दरिद्रों की सेवा और कुछ भी नहीं हैसिवाए कैथलिक ईसाई धर्म का प्रचार। कैसे कैथलिकों की संख्या दुनिया में बढ़ जाए!
पुराने समय में लोग एक-दूसरे से तर्क-वितर्क करके तय करते थे कि कौन सही है। फिर बात और बिगड़ी। तर्क-वितर्क का जमाना गया। क्योंकि तर्क-वितर्क वर्षों लेते हैंऔर फिर भी निर्णायक नहीं होते। कौन निर्णय कर पाया हैकौन आस्तिक किसी नास्तिक को समझा पाया है कि ईश्वर हैऔर कौन नास्तिक किसी आस्तिक को समझा पाया है कि ईश्वर नहीं हैकौन जैन हिंदू को समझा पाया हैकौन हिंदू जैन को समझा पाया हैवह समझाने का मामला बहुत लंबा है।
इसलिए मुसलमानों ने संक्षिप्त मार्ग लियातलवार! कहां की बकवास में पड़े होनिपटारा अभी करोनगद करो। जिसकी लाठी उसकी भैंस! जो जीत जाएवह सत्य। सत्यमेव जयते! कहते ही हैं कि सत्य की सदा विजय होती है। उन्होंने जरा सा भेद कर लिया। उन्होंने कहाजिसकी विजय होती है वही सत्य। थोड़ा सा ही तो भेद हैकुछ ज्यादा भेद नहीं।
मगर तलवार के दिन भी गए। आदमी थोड़ा सभ्य हुआ। उसे यह बात बेहूदी लगी कि जीवन-सिद्धांतों का निर्णय तलवार से हो। तो फिर कैसे निर्णय होतो फिर कुछ ज्यादा होशियारी की ईजादें की गईं: सेवा करो। अस्पताल खोलो। अनाथालय खोलो। विधवा आश्रम बनाओ। वृद्धाश्रम बनाओ। कोढ़ियों के पैर दबाओ। भिखमंगों को भोजन दो। ऐसे रोटी खिला करदवा देकर लोगों का धर्म-परिवर्तन करो।
स्वभावतःइसका परिणाम एक ही होगा। जैसे हिंदुस्तान में है। कोई समृद्ध परिवार भारत का ईसाई नहीं होता। क्यों होगा?जिसके पास अपनी रोटी हैजिसके पास अपना मकान हैजिसके पास अपना धन हैवह क्यों ईसाई होगाभारत में कौन लोग ईसाई हो गए हैंआदिवासीनंगेभिखमंगेभूखेदीन-दरिद्रअनाथअपंगवे सारे के सारे ईसाई हो गए हैं।
जातियों पर जातियां! धर्मों पर धर्म! उनके भीतर छोटे-छोटे टुकड़े!
दरिया कहते हैंएक ही बात याद रखो कि परमात्मा के सिवा न हमारी कोई माता हैन हमारा कोई पिता है। और ब्रह्म के सिवाय हमारी कोई जात नहीं।
ऐसा बोध अगर होतो जीवन में क्रांति हो जाती है। तो ही तुम्हारे जीवन में पहली बार धर्म के सूर्य का उदय होता है।
"गिरह हमारा सुन्न में।'
तब तुम्हें पता चलेगा कि शून्य में हमारा घर है--हमारा असली घर! जिसको बुद्ध ने निर्वाण कहा हैउसी को दरिया शून्य कह रहे हैं। परम शून्य मेंपरम शांति मेंजहां लहर भी नहीं उठतीऐसे शांत सागर में या शांत झील मेंजहां कोई विचार की तरंग नहींवासना की कोई उमंग नहींजहां विचार का कोई उपद्रव नहींजहां शून्य संगीत बजता हैजहां अनाहत नाद गूंज रहा है--वहीं हमारा घर है।
"अनहद में बिसराम।'
और जिसने उस शून्य को पा लियाउसने ही विश्राम पाया। और ऐसा विश्राम जिसकी कोई हद नहीं हैजिसकी कोई सीमा नहीं है।
"अनहद में बिसराम।यही संन्यासी की परिभाषा है। "गिरह हमारा सुन्न मेंअनहद में बिसराम।यह संन्यासी की पूरी परिभाषा आ गई। मगर इसके लिए जरूरी है कि हम जानें: "जात हमारी ब्रह्म हैमाता-पिता है राम।'
मैं अपने संन्यासी को न तो ईसाई मानता हूंन हिंदून मुसलमानन जैनन बौद्ध। मेरा संन्यासी तो सिर्फ शून्य की खोज कर रहा है। सारी दीवारें गिरा रहा है। मेरा संन्यासी तो अनहद की तलाश में लगा हैसीमाओं का अतिक्रमण कर रहा है। घर छोड़ना नहीं है। घर में रहते ही जानना है कि घर मेरी सीमा नहीं है। परिवार छोड़ना नहीं है। परिवार में रहते ही जानना है कि परिवार मेरी सीमा नहीं है। बसयह बोध! इस बोध को ध्यान कहोजागरण कहोविवेक कहोसुरति कहोजो भी शब्द तुम्हें प्रीतिकर होवह कहो। लेकिन इसे लक्ष्य समझो कि पहुंचना है शून्य मेंतभी तुम्हें विश्राम मिलेगा।
नहीं तो जीवन एक संताप हैएक पीड़ा हैएक विरह है। विरह की अग्नि! इसमें हम झुलसे जाते हैंथके जाते हैंटूटे जाते हैं;बिखरे जाते हैंउखड़े जाते हैं। हमारे पत्ते-पत्ते कुम्हला गए हैंफूलों के खिलने की तो बात बहुत दूरहमारी जड़ें सूखी जा रही हैं। और जैसे ही किसी ने शून्य में अपनी जड़ें जमा लींतत्क्षण हरियाली छा जाती हैफूल उमग आते हैंवसंत आ जाता है। बहार आ जाती है। फूलों में गंध आ जाती है। भंवरे गीत गाने लगते हैं। मधुमक्खियां गुंजार करने लगती हैं।
उस उत्सव की घड़ी में ही जानना कि जीवन कृतार्थ हुआ है। उसके पूर्व हम व्यर्थ ही जी रहे हैं। उसके बाद ही जीना जीना है। उसके बाद ही मरना मरना है। उसके बाद जीने में भी मजा है और मरने में भी मजा है। उसके बाद जीवन भी एक धन्यवाद है और मृत्यु उसी धन्यवाद की परम ऊंचाईपरम शिखर।


 दूसरा प्रश्न: भगवानक्या किसी संत के दिए हुए मंत्र को दोहराने से हम मुक्ति नहीं पा सकतेबेशक वह संत जीवित हो या नहीं! अगर मुक्ति नहीं तो कुछ अधिक आध्यात्मिक विकास तो होगा या नहींऔर क्या यह सच है कि कभी कोई मंत्र के शब्दों का मतलब जानने की कोशिश नहीं करनी चाहिएक्योंकि मतलब जानने से तो सिर्फ यही ही होगा कि मन सोच-विचार और कल्पना में भाग लेने लगेगा। मैं इसलिए यह सवाल पूछ रहा हूंक्योंकि मैंने सुना है कि आप मंत्र के बहुत खिलाफ हैं और कहते हैं कि मंत्र जपना सिर्फ बेवकूफों और मूर्खों के लिए है।

 नवलकिशोर डी. डी.!
इस प्रश्न में बहुत से प्रश्न हैंएक-एक को क्रमशः लेना होगा। पहली बातपूछा है तुमने, "क्या किसी संत के दिए हुए मंत्र को दोहराने से हम मुक्ति नहीं पा सकते?'
मुक्ति पाई नहीं जाती है। मुक्ति कोई उपलब्धि नहीं हैअनावरण है। मुक्ति कोई गंतव्य नहीं हैकोई दूर की मंजिल नहीं है,जहां तक चल कर पहुंचना है। मुक्ति हमारा स्वभाव है।
जात  हमारी  ब्रह्म  हैमाता-पिता  है  राम।
गिरह हमारा सुन्न मेंअनहद में बिसराम।।
मुक्ति हमारा स्वभाव है। इसलिए मुक्ति को पाने की भाषा में मत सोचना! पाने की भाषा लोभ की भाषा है। और जहां लोभ है,वहां मुक्ति नहीं। अलोभ मुक्ति की आधारशिला है। अहंकार पाने की भाषा में सोचता है: धन पा लूंपद पा लूं। फिर जब इनसे ऊब जाता है और पाता है कि इन्हें पा लेने पर भी कुछ नहीं मिलतातो सोचने लगता है: परमात्मा को पा लूं। स्वर्ग को पा लूं। मोक्ष को पा लूं। निर्वाण को पा लूं। मुक्ति को पा लूं। सत्य को पा लूं। विषय तो बदल गएधन नहींपद नहीं। धन की जगह ध्यान आ गयापद की जगह परमात्मा आ गया। लेकिन तुम नहीं बदलेविषय बदल गए। वासना तो वही की वही रहीपाने की। क्या पाना चाहते होइससे फर्क नहीं पड़ता। जब तक पाना चाहते होतब तक उलझे रहोगे।
मुक्ति पाने से नहीं मिलती है। पाने की बात ही व्यर्थ हैऐसा जानने से तत्क्षण अनुभव में आ जाती है। तत्क्षण शब्द को स्मरण रखना। कल नहींपरसों नहीं--अभीयहीं।
बुद्ध ने छह वर्ष तक पाने की कोशिश की। स्वाभाविक! आदमी लोभ की दुनिया में जीता है। तो जिस तरह धन और पद को पाते थेसोचाइसी तरह मुक्ति को पा लेंगे! छह वर्ष तक सतत चेष्टा की। सब किया जो लोगों ने कहा कि करोजिनको तुम कह रहे हो संत। किसी ने मंत्र दिएतो मंत्र दोहराए। किसी ने उपवास करवायातो उपवास किया। और किसी ने सिर के बल खड़े होने को कहातो सिर के बल खड़े रहे। तपश्चर्यातो तपश्चर्या! सुंदर देह थीराजकुमार थेसूख कर कांटा हो गए।
एक मूढ़ ने बता दिया कि धीरे-धीरे भोजन को कम करो। इतना कम करो क्रमशः कि बस एक चावल का दाना ही भोजन रह जाए। इस तरह कम करते-करते-करते एक चावल का दाना रह जाए। फिर धीरे-धीरे बढ़ानादो चावल के दानेतीन चावल के दाने...।
जिस दिन एक चावल का दाना रह गयाबुद्ध इतने कमजोर हो गए कि निरंजना नदी को पार करते थेपार न कर सके।
मैं निरंजना को देखने गया थासिर्फ इसीलिए कि कैसी नदी है जिसको बुद्ध पार न कर सके! भवसागर पार कर गए और निरंजना पार न कर सकेदेखा तो बहुत चौंका। नदी नहीं हैनाला है। गर्मी के दिन थेबिलकुल सूखा था! कोई भी पार कर जाए। छोटा बच्चा पार कर जाए। कोई तैरने वगैरह की भी जरूरत नहीं थी। घुटने-घुटने पानी भी नहीं था।
ये बुद्ध क्यों पार नहीं कर सकेकमजोर इतने हो गए थे कि निरंजना के किनारे पर एक वृक्ष की जड़ को पकड़ कर किसी तरह अपने को अटकाए रहे। जब थोड़ी सी ताकत आईतो किसी तरह सरक कर घाट पर चढ़े। उस घड़ी वृक्ष की जड़ को पकड़े हुए उन्हें यह खयाल आया कि यह मैंने क्या किया! देह भी गंवा बैठाआत्मा तो मिली नहीं। और मैंने यह कभी सोचा ही नहीं कि देह को गंवाने से आत्मा के मिलने का तर्क क्या है! निरंजना नदी तो पार नहीं कर सकता हूंयह छोटी सी नदीतो यह जीवन का इतना बड़ा भवसागर कैसे पार करूंगा?
यह घटना बड़ी क्रांतिकारी सिद्ध हुई। उन्होंने उसी क्षणवह जो छह साल व्यर्थ की दौड़-धूप की थीछोड़ दी। धन और पद की दौड़ तो पहले ही छोड़ चुके थेउस संध्या मोक्ष की दौड़ भी छोड़ दी।
नवलकिशोर! यह घटना बहुत विचारणीय है। दौड़ ही न रही। उस सांझ जब वे सोएपूर्णिमा की रात थीऔर चित्त पहली दफा अनहद के विश्राम को उपलब्ध हुआ था। क्योंकि जहां दौड़ नहींवहां विश्राम है। चाहे शरीर से न भी दौड़ोअगर मन से भी दौड़ रहे होतो भी तो थकान होती है। मन भी तो थकता है।
अब कोई दौड़ ही न थीकुछ पाना ही न था। सब व्यर्थ हैकुछ भी पाना नहीं है। जो हैजैसा हैउससे ही राजी हो रहे। इसको बुद्ध ने तथाता कहा है। जो हैजैसा हैठीक है।
उस संध्या तथाता के इस भाव में ही सोए। बाद में कहा कि वह पहली रात थीजब सच में मैं सोया। विश्राम परिपूर्ण थाएक सपना भी न आया। क्योंकि जब चाह ही न रहीतो सपने कहां से आएंसपने तो चाह की ही छाया हैजो नींद में पड़ती है। दिन में जो चाह हैरात वही सपना है।
एक सपना नहीं। और सुबह जब आंख खुलीतो कहा बाद मेंकि ऐसा विश्राम कभी पाया ही न था। ऐसी शांति छाई थी! रोआं-रोआं विराम में थाविश्राम में था। न कुछ करना थान कहीं जाना थान कुछ पाना था। सब मोह छूट गएसंसार के भी और परलोक के भी। और तभी देखा कि रात का आखिरी तारा डूब रहा है। जैसे-जैसे वह तारा डूबावैसे-वैसे ही भीतरअगर कोई कहीं धूमिल सी रेखा भी रह गई होगी लोभ कीवह भी विलुप्त हो गई। आखिरी तारे के डूबने के साथ ही बुद्ध को महापरिनिर्वाण उपलब्ध हुआ। अनहद में विश्राम पाया। गिरह हमारा सुन्न में! शून्य में घर मिल गया।
सवाल उठता है कि बुद्ध ने छह साल की तपश्चर्या के कारण बुद्धत्व पाया या तपश्चर्या को छोड़ने के कारण बुद्धत्व पाया?ढाई हजार वर्षों में बौद्ध विचारक इस पर मंत्रणा करते रहे हैंविचारणा करते रहे हैंविवाद करते रहे हैं। मेरे हिसाब में विवाद व्यर्थ है। दोनों ही बातें उपयोगी हैं। वह छह वर्ष जो तपश्चर्या की थीउसका भी हाथ है। पाने में नहींपाया तो तपश्चर्या को छोड़ कर। लेकिन तपश्चर्या का हाथ है तपश्चर्या को छुड़ाने में!
तपश्चर्या करते-करते एक बात दिखाई पड़ गई कि यह पागलपन हैइसमें कुछ सार नहीं। संसार तो पहले ही छूट चुका थाअब यह मोक्ष भी छूट गया। मोक्ष पाने की आकांक्षा भी छूट गई। लोभ की जो अंतिम रेखा रह गई थीवह भी विलुप्त हो गई। तो तपश्चर्या ने इतना काम किया। जैसे एक कांटा गड़ जाता हैतो हम दूसरे कांटे से उसको निकाल लेते हैं। फिर दोनों कांटों को फेंक देते हैं। ऐसा नहीं है कि पहला कांटा फेंक दिया और दूसरे को सम्हाल कर उसके घाव में रख लिया कि इसकी बड़ी कृपा है! किस शब्दों में इसका आभार करें!
एक कांटे से दूसरा निकल गयाफिर दोनों हम फेंक देते हैं। ऐसे ही तपश्चर्या सेएक व्यर्थ बात मन में अटकी थी कि पाने से मिलेगा परमात्मावह बात निकल गई। परमात्मा तो मिला ही हुआ है। दौड़ खतम हुईचाह मिटीकि पाया। पाया तो सदा से था ही।
तुमने एक क्षण को भी परमात्मा खोया नहीं है नवलकिशोर! इसलिए पहले तो यह भाषा छोड़ दो पाने की। यह लोभ की भाषा है। यह धंधे की भाषा है। यह व्यवसाय की भाषा है।
दूसरी बाततुम कहते हो, "किसी संत के दिए हुए मंत्र को दोहराने से...।'
पहली तो बाततुम कैसे जानोगे कौन संत हैअगर तुम यही पहचान लो कि कौन संत हैतो तुम खुद ही संत हो गए। केवल संत ही संत को पहचान सकता है। तुम कैसे पहचानोगे कौन संत हैजिसको भीड़ संत कहती होगीउसी को तुम संत मान लोगे। और भीड़ को कुछ पता हैभीड़ तो मूढ़ों की जमात है।
एक बात तो पक्की है कि जिसको भीड़ संत कहेजरा सावधान रहना। उस पर तो प्रश्नवाचक चिह्न लगा देना। क्योंकि भीड़ उसको ही संत कहेगीजो भीड़ की अपेक्षाओं के अनुकूल पड़ता होगा।
जैनदिगंबर जैन नंगे आदमी को संत कहेंगे। बौद्ध भिक्षु नहीं कहेंगे उसको संत। जैन तो अगर दिगंबर हैंतो नग्न को संत कहेंगे। और अगर श्वेतांबर हैंतो मुंहपट्टी-धारी को संत कहेंगे। दिगंबर मुंहपट्टी-धारी पर हंसेंगे। क्योंकि यह तो परिग्रही है। मुंह पर पट्टी बांधनायह तो आरोपण है। और श्वेतांबर नग्न जैन मुनि पर हंसेंगेकि यह तो अशोभन हैअशिष्ट हैअभद्र है। सूफी फकीर हिंदू फकीर पर हंसेंगे कि यह भी कोई संतत्व है! और हिंदू फकीर सूफी पर हंसेंगे कि यह भी कोई संतत्व है!
ईसाई तो उसको संत कहेंगेजो दरिद्रों की सेवा कर रहा हो। और भारत में संतों ने कभी किसी की सेवा नहीं कीखयाल रखना। यहां तो संतों की सेवा करनी पड़ती है। यहां तो जैन अपने संत के जब दर्शन को जाते हैंउनसे पूछोकहां जाते होतो वे कहते हैंसंत की सेवा करने जा रहे हैं।
संत और सेवा करेकौन करवाएगा संत से सेवाक्या पाप करवाना है अपने हाथ सेसमझ लो कि महावीर स्वामी मिल जाएं और तुम्हारे पांव दबाने लगें! तुम दबवाओगेतुम एकदम उचक कर भाग खड़े होओगे कि हे प्रभुबचाओ! यह क्या कर रहे हो?आप और पैर दबा रहे होक्या सदा के लिए नर्क में गिरवा दोगेकि बुद्ध मिल जाएं और एकदम तुम्हारी चंपी करने लगें! मुफ्त भी करेंतो तुम कहोगे कि नहीं भैयानहीं करवाना। अरेहम आपकी चंपी करेंगे! आप हमारी चंपी करेंभगवान बुद्ध और चंपी करेंकभी नहीं। होने ही नहीं देंगे।
लेकिन ईसाइयों की परिभाषा संत की वही हैजो तुम्हारे पैर दबाएजो तुम्हारी सेवा करे। ईसाइयों के हिसाब से जीसस संत हैं,क्योंकि उन्होंने मनुष्य के उद्धार के लिए अपना जीवन दे दिया। महावीर क्या खाक संत हैं--ईसाइयों के हिसाब से! किया क्या मनुष्य-जाति के लिएहांध्यान किया। तो वह तो स्वार्थ हैखुद के आनंद के लिए! महास्वार्थी हैं। बुद्ध ने क्या कियाअपनी मुक्ति पा ली। मगर अपनी मुक्ति पानी परार्थ तो नहीं। परार्थ तो किया जीसस नेसूली पर लटक गएअपनी जान गंवा दी मनुष्य के उद्धार के लिए।
यह दूसरी बात है कि उद्धार हुआ कि नहीं। अभी तक हुआ तो नहीं। किसी के सूली पर लटकने से किसी का क्या उद्धार होना है!
महावीर अपने बाल लोंचते थेकेश-लुंच करते थे। और बौद्ध भिक्षु हंसते थे कि यह पागलपन है। और बौद्ध भिक्षुओं की बात में भी अर्थ है। क्योंकि अक्सर स्त्रियां जब पगलाती हैंतो बाल खींचती हैं! तुमने देखा ही होगा कि स्त्री रूठ जाती हैतो एकदम बाल लोंचने लगती है। अगर पागलखाने में जाओतो तुमको कई पागल मिलेंगेजो बाल लोंचते हैं। बाल लोंचना कुछ पागलपन का हिस्सा है।
तो बौद्धों को तो लगा कि यह महावीर का दिमाग कुछ खराब है। बाल लोंचना! लेकिन महावीर को मानने वाला मानता है कि महावीर का त्याग परम है। वे उस्तरे का भी उपयोग नहीं करते। अब यह क्या उस्तरे को रखे फिरना! उस्तरा वैसे भी घातक! कहीं किसी पर गुस्सा आ जाए और गर्दन काट दो! या खुद ही पर निराशा आ जाए और गर्दन काट लो!
फिर दूसरी बात यह कि उस्तरे पर निर्भर होना वस्तु पर निर्भर होना है। महावीर तो वस्तु-मुक्त हैं। वे तो किसी तरह की परनिर्भरता नहीं मानते। अब किसी नाई से जाकर बाल बनवानावह भी जंचता नहीं। उसका मतलब हुआ कि नाई पर निर्भर हो गए। मोक्ष में पता नहीं नाई मिलते हैं कि नहीं मिलते! अपने बाल खुद ही लोंच लिएयह स्वावलंबन है! है तो स्वावलंबनसाफ लगता है।
तुम किसको संत कहते होसंत की तुम्हारी परिभाषा क्या हैपरिभाषा तुमने पाई कहां सेतुम्हारे आस-पास जो भीड़ होगी,वही तुम्हें परिभाषा दे देती है कि इस तरह का आदमी संत होता है। एक बार भोजन करता होतो संत। इस तरह बैठता हो,इस तरह उठता होतो संत। भीड़ की अपेक्षाएं जो पूरी करता हैवह उस भीड़ के लिए संत।
नवलकिशोर! तुम कहते हो, "क्या किसी संत के दिए हुए मंत्र को दोहराने से...।'
और संत और मंत्र देगाअसंभव! क्योंकि मंत्र शब्द बनता है उसी धातु से जिससे मन बनता है। मन तो मंत्र से ही बनता है। मन का काम ही क्या हैतुमने कभी खयाल किया! मन का काम है सलाह देना: ऐसा करोऐसा करोवैसा मत करना। इसलिए तो हम सलाहकार को मंत्री कहते हैं। सलाह देता हैकि यह करोवह करो। मन जो हैवह मंत्री है। वह सलाहकार है। मन और मंत्र संयुक्त हैं। मंत्रयूं समझो कि ईंट हैउसी की ईंटों से बना हुआ मन है।
मन से मुक्त होना है। इसलिए मंत्र के द्वारा तो कोई मन से मुक्त नहीं हो सकता। मंत्र का तो उपयोग मन से ही करना होगा। अगर तुम बैठ कर राम-राम जपोगेतो जपोगे किससेमन से ही जपोगे। और अगर मन का ही अभ्यास कर रहे होमन की ही दंड-बैठक लग रही है। तुम राम-रामराम-राम किए जा रहे होयह मंत्र की ही दंड-बैठक है। इससे तो मन और मजबूत होगा। मंत्र से मन मजबूत होता है। और जितना मन मजबूत होता हैउतना ही तुम्हारे और तुम्हारी आत्मा के बीच बाधा खड़ी होती है।
इसलिए कोई संत मंत्र नहीं देगा। संत तो तुम्हारे मंत्र को ही छीन लेगा और तुम्हारे मन को भी छीन लेगा। संत तो तुम्हें रास्ता बताएगा मन के पार जाने का। हांअगर तुम्हें मन की शक्तियों को बढ़ाना है--आध्यात्मिक शक्तियों का नाम मत लेना--अगर मन की शक्तियों को बढ़ाना हैतो मंत्र उपयोगी है। मंत्र के प्रयोग से मन की शक्तियां बढ़ जाएंगी।
मगर मन की शक्तियों को बढ़ा कर भी क्या करोगेसमझ लो कि पानी पर भी चलने लगेतो फायदा क्या हैवर्षों की मेहनत के बाद अगर पानी पर भी चलने लगे और कांच भी चबाने लगेतो कोई कांच का नाश्ता करना हैऔर पानी पर चलने के लिए नावें हैं। और सरलता से तैरना सीख सकते हो। लकड़ी की जरा सी डोंगी काम दे देती है। उसके लिए वर्षों की मेहनत करना और पानी पर चलना सीखना! और कांच चबाना! चबाना किसलिएक्या फालतू बोतलें वगैरह फेंकने में बहुत दिल दुखता हैकि कैसी बहुमूल्य चीजें फेंकी जा रही हैं! अरेआज अगर मंत्र-सिद्ध होतेचबा लेते। क्या करोगे?
अगर दूसरों के विचार भी पढ़ने लगे! अपने ही विचार पढ़ कर कुछ नहीं मिलादूसरे का विचार पढ़ कर क्या मिलेगा और?कचरा अपना ही काफी हैऔर दूसरे का कचरा और लेकर क्या करोगेदूसरा अपने विचारों से मुक्त होना चाह रहा हैऔर तुम उसके विचार पढ़ने को उत्सुक हो!
मंत्र से मन की शक्तियां जरूर बढ़ सकती हैं। क्योंक्योंकि मंत्र एक खास लक्ष्य के लिए वैज्ञानिक प्रक्रिया है। वह लक्ष्य है तंद्रा। अंग्रेजी में जिसको हिप्नोसिस कहते हैंउसके लिए हमारा पुराना यौगिक शब्द है तंद्रा।
एक तो जागृति हैवह तो मंत्र से आती नहीं। एक निद्रा हैवह बिना ही मंत्र के आ जाती है। दोनों के मध्य की एक स्थिति है तंद्रावह मंत्र के द्वारा लाई गई निद्रा है। हिप्नोसिस का अर्थ तंद्रा होता है।
अगर तुम एक ही शब्द को बहुत बार दोहराओगेतो उससे तंद्रा पैदा होती है। तंद्रा पैदा होने की सीधी प्रक्रिया है। अब तुम बैठे हो। राम-रामराम-रामजपे जा रहे होजपे जा रहे होजपे जा रहे हो! इसके दो परिणाम होते हैंएक तो मन एक ही चीज से ऊब जाता है। ऊब नींद लाती है।
इसलिए धार्मिक सभाओं में लोग सोते हैं। अब वही रामवही सीतावही रावणवही कहानी। कितनी बार तो देख चुके! फिर वही हनुमान जीफिर वही लिए चले आ रहे हैं पहाड़! सब वही का वही। तो अब रामलीला देखोगे कि सोओगे! इससे बेहतर है सो ही जाओ! इस बकवास को देखने में सार क्या है! रामलीला में तो कभी-कभी लोग जागते हैंजब कुछ गड़बड़ हो जाती है।
जैसे ऐसा हुआ एक बार कि जब रामलीला शुरू हुई और सीता का स्वयंवर रचा गयातो कहानी यूं है कि खबर आती है लंका से कि हे रावणतेरी लंका में आग लगी है। तो रावण भागता है। लंका में आग लगी होतो यह कोई विवाह रचाने का अवसर है! बेचारा भागता है अपनी लंका बचाने।
यह तरकीब है। यह ऋषि-मुनियों की जालसाजी है। यह झूठ है। लंका वगैरह में कोई आग नहीं लगी थी। मगर जब तक वह बेचारा लौटेतब तक यहां मामला खतम हो गया। उसको हटाना जरूरी थाक्योंकि वह शिव का भक्त था। और वह शिव का धनुष था। और उसने प्रार्थना की थीशिव से उसे वरदान था कि शिव उसका साथ देंगेसहायता करेंगे। अरेअपने चमचों की कौन सहायता नहीं करताछोटे-मोटे भी करते हैंवे तो शिव जी बेचारे बड़े पहुंचे हुए पुरुष हैं! और यह रावण कितनी सेवा किया उनकी। अपनी गर्दन काट-काट कर रख देता था! अब और क्या चाहिएचमचे से और क्या चाहिए?
तो वह तोड़ देता धनुष-बाण। डर था। रामचंद्र जी उसके सामने छोकरे ही थे। एक-दो धौल जमाता और तोड़त्ताड़ कर अपना लेकर सीता को रवाना हो जाता। तो सब रामायण वहीं खतम कर देता! तो उसको भगाना पड़ा। जब तक वह गयातब तक राम ने धनुष-बाण तोड़ लिया। विवाह हो गया।
अब इसको तोबार-बार होता हैतो लोग जाते ही से अपना इंतजाम करके लेकर जाते हैं। रामलीला लोग देखने जाते हैंतो दरी ले जाते हैंचटाई ले जाते हैं। कंबल तक ले जाते हैं! अपनी दरी-चटाई बिछा करकंबल ओढ़ कर मस्तबच्चों को सुला कर,फिर खुद भी झपकी लेते हैं।
मगर उस दिन कुछ गड़बड़ हो गई। बच्चे तक जग गए। क्योंकि जब रावण को खबर आई कि तेरी लंका में आग लगी है। उसने कहा कि लगी रहने दो। लोग थोड़े चौंके कि यह बात क्या है! जनक महाराज भी थोड़े हैरान हुए कि अब करना क्या हैरामचंद्र जी की तो सटपटी गुम हो गई होगी। लक्ष्मण बोले होंगेभैयाअब क्या करना!
और उसने तोरावण नेआव देखा न ताववह गुस्से में था। असल में मैनेजर ने उसको जितनी मिठाई मिलनी चाहिए थी,उतनी नहीं दी थीकम दी थी। उसने कहादेख लेंगे! सो उसने पहला ही अवसर हाथ आयादिखा दिया। उठा और उसने तोड़ दिया धनुष! और धनुष भी क्या था! कोई शिव जी का धनुष है! यही बास की पोंगरी रखी हुई थी बांध कर। उसने तोड़त्ताड़ कर,कई टुकड़े करके फेंक दिएएक-दो नहीं। और उसने कहानिकाल तेरी सीता कहां हैखतम करो इस बात को एक बार। क्या हर साल लगा रखा है कि वही का वही खेल फिर से होफिर!
सारी जनता जग गई। बच्चे रोने लगे। स्त्रियां चौंक गईं। लोग खड़े हो गएबैठे ही नहींकि यह हो क्या रहा है! न देखा कभी आंखों सेन सुना कभी कानों से! यह नई ही रामलीला हो रही है! वह तो भला हो जनक का। बूढ़े थेसयाने थेपुराने अनुभवी थेघाघ जिसको कहते हैं। कई रामलीलाएं करवा चुके थे। उन्होंने तत्क्षण मामले को सम्हाल लिया। उन्होंने कहाभृत्यो! तुम भूल से मेरे बच्चों के खेलने का धनुष ले आए हो। अरेयह शिव जी का धनुष नहीं है। शिव जी का असली धनुष लाओ!
पर्दा गिराया। धक्का देकर किसी तरह रावण को हटाया। दूसरा धनुष-बाण लाया गया और दूसरे आदमी को रावण बना कर लाया गया। जनता बड़ी चौंकी कि यह रावण तो दूसरे मालूम होते हैं! वह पुराना पहलवान कहां है?
उसको तो चार आदमी पकड़े अंदर बैठे हैं। वह भीतर से चिल्ला रहा है कि छोड़ो जीमैं धनुष-बाण तोडूंगा। आज मामला खतम ही कर देना हैरफा-दफा! किसी तरह उसको मिठाई दीसमझाया-बुझाया कि भैयाधनुष-बाण न तोड़। तू जितनी मिठाई लेना होले ले। और आगे से हम खयाल रखेंगे। जो भूल हुई सो हुई।
कभी-कभी ऐसे मौके आते हैंअन्यथा तो रामलीला में लोग सोएंगे। वही का वही पुनरुक्त हो रहा है।
छोटे-छोटे बच्चों को सुलाने के लिए हम यही उपयोग करते हैं नवलकिशोर। मां बैठ जाती है बगल मेंदबा देती है बच्चे को बिस्तर में। चारों तरफ से कंबल दबा देती है। भाग भी नहीं सकता कहीं। और बैठी है कि राजा बेटा सो जा! मुन्ना बेटा सो जा! राजा बेटा सो जा! मुन्ना बेटा सो जा!
अब क्या खाक करे राजा बेटा और मुन्ना बेटासोए नहींतो क्या करेहालांकि मां यही सोचती है कि मेरे सुरीले राग के कारण सो रहा है।
यह सुरीले राग का सवाल नहीं है। यह ऊब पैदा हो रही हैघबड़ा रहा है वह। यह तो मां अगर बच्चे के बाप के पास भी बैठ कर कहे कि राजा बेटा सो जामुन्ना बेटा सो जातो वे भी सो जाएंगे। अगर नींद न आएगीतो भी कम से कम बहाना करेंगे,घुर्राने लगेंगे कि आ गई बाईनींद आ गई! तू जा! अब हम कभी न उठेंगे। बिलकुल सो गए।
तुम जब जपते हो मंत्रतो तुम केवल तंद्रा पैदा कर रहे हो। निरंतर की पुनरुक्ति से तंद्रा पैदा होती है। इससे कुछ आध्यात्मिक जीवन का संबंध नहीं है।
और तुम पूछते हो कि "क्या इससे कुछ अधिक आध्यात्मिक विकास नहीं होगा?'
अध्यात्म का कोई विकास होता हैअध्यात्म तो तुम्हारे भीतर पूरा का पूरा मौजूद है। सिर्फ भीतर आंख ले जानी है और प्रकट हो जाता है। उसकी अभिव्यक्ति होती हैविकास नहीं। और इसलिए मैंने कहा है कि जो नासमझ हैंवे ही केवल मंत्रों में उलझते हैं। समझदार को तो मन से मुक्त होना है। तब शून्य में विश्राम होगाअनहद में विश्राम होगा।

आज इतना ही।

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