गुरुवार, 3 अगस्त 2017

एक ओंकार सतनाम - प्रवचन-3

साचा साहिबु साचु नाइ—(प्रवचन—तीसरा)
पउड़ी: 4

साचा साहिबु साचु नाइ। भाखिया भाउ अपारु।।
आखहि मंगहि देहि देहि। दाति करे दातारू।।
फेरि कि अगै रखीऐ। जितु दिसै दरबारु।।
मुहौ कि बोलणु बोलीऐ। जितु सुणि धरे पिआरु।।
अमृत वेला सचु नाउ। वडिआई वीचारु।।
करमी आवे कपड़ा। नदरी माखु दुआरु।।
'नानकएवै जाणिए। सभु आपे सचिआरु।।

पउड़ी: 5

थापिया न जाई कीता न होई। आपे आप निरंजन सोई।।
जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु। 'नानकगावीऐ गुणीनिधानु।।
गावीऐ सुणीऐ मनि राखीऐ भाउ। दुख परहरि सुखु घर लै जाउ।।
गुरुमुखि नादं गुरुमुखि वेदं। गुरुमुखि रहिआ समाई।।
गुरु ईसरु गुरु गोरखु बरमा। गुरु पारबती माई।।
जे हउ जाणा आखा नाहीं। कहणा कथनु न जाई।।
गुरा एक देहि बुझाई--
सभना जीआ का इकु दाता। सो मैं विसरि न जाई।।



साहब सच्चा हैउसका नाम सच्चा हैउसका गुणगान अशेष भावों में किया जाता है। गुणगान करते हैं लोग। और दो,और दोकरके मांग करते हैंऔर दाता देता ही चला जाता है। फिर उसके आगे क्या रखा जाए कि उसके दरबार का दर्शन हो?और हम कौन-सी बोली बोलें जिसे सुन कर वह प्यार करेअमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो। कर्म से शरीर मिलता है। कृपा-दृष्टि से मोक्ष का द्वार खुलता है। नानक कहते हैंइस प्रकार जानो कि सत्य हीपरमात्मा ही सब कुछ है।
साहबनानक का परमात्मा के लिए दिया गया शब्द है। परमात्मा के साथ हम दो तरह से जुड़ सकते हैं। एक तो दार्शनिकों की परमात्मा के संबंध में चर्चा है। लेकिन उनके शब्द प्रेम से अधूरे हैं। उनके शब्द सूखे हैं। उनके शब्द बौद्धिक हैं,हार्दिक नहीं।
दूसरा भक्त का मार्ग हैउसके शब्दों में रस है। वह परमात्मा को एक सिद्धांत की तरह नहींएक संबंध की तरह देखता है। वह उससे कुछ संबंध जोड़ता है। क्योंकि जब तक संबंध न जुड़ जाए तब तक हृदय प्रभावित नहीं होता। परमात्मा का नाम हम कह सकते हैंसत्य। लेकिन साहब में जो बात है वह सत्य में न होगी। सत्य से हम कैसे जुड़ेंगेहमारा क्या संबंध होगा?हमारे हृदय और सत्य के बीच कौन-सा सेतु बनेगा?
लेकिन साहब प्यार का संबंध है। साहब होते ही परमात्मा प्रियतम हो गया। अब हम जुड़ सकते हैं। अब रास्ता खुला है। अब हम दौड़ सकते हैं। सत्य कितना भी ठीक होफिर भी भक्त के लिए रूखा-सूखा है। भक्त चाहता है कुछजिसके साथ स्पर्श हो सके। भक्त चाहता है कुछजिसके आसपास नाच सकेगा सके। भक्त चाहता है कुछजिसके चरणों में सिर रख सके। साहब प्यारा नाम है। उसका अर्थ है मालिकउसका अर्थ है स्वामी।
फिर संबंध बहुत ढंग के हो सकते हैं। सूफियों ने परमात्मा को प्रेयसी माना हैतो साधक प्रेमी हो जाता है। हिंदुओं ने,यहूदियों नेईसाइयों ने परमात्मा को पिता माना हैतो साधक बेटा हो जाता है। नानक ने परमात्मा को साहब माना हैतो साधक दास हो जाता है।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है। क्योंकि इन सभी संबंधों का मार्ग भिन्न-भिन्न होगा। प्रेमी के साथ हम एक ही तल पर खड़े होते हैं। प्रेमी न तो ऊपर होता है न नीचे। प्रेयसी और प्रेमी एक ही तल पर खड़े होते हैं। कोई ऊपर नहीं और कोई नीचे नहीं। पिता और बेटे के बीच जो संबंध हैवह संस्कारगत है। चूंकि हम किसी पिता के घर पैदा हुए हैंइसलिए एक संबंध है।...
मालिक हम खुद होना चाहते हैं और हमारी चले तो परमात्मा को दास बना लें। तो अहंकार मिटाने के लिए दास की भावना से बड़ी कोई भावना नहीं हो सकती। न तो पिता के संबंध में अहंकार गिरेगान प्रेयसी-प्रेमी के संबंध में अहंकार गिरेगा। अहंकार तो गिर सकता है सिर्फ दास की भावना मेंकि मैं गुलाम हूं और तू मालिक है।
और यह सबसे कठिन है। क्योंकि यही अहंकार के विपरीत स्थिति है। अहंकार मानता हैमैं मालिक हूंसारा अस्तित्व मेरा गुलाम है। भक्त कहेगासारा अस्तित्व मालिक हैमैं गुलाम हूं। यही वास्तविक शीर्षासन है। सिर को जमीन में करके पैर ऊपर करके खड़े हो जाना असली शीर्षासन नहीं है--अहंकार को नीचे करके! क्योंकि वही सिर है। उसको नीचे करके खड़े हो जाना दास की भावना है। इसलिए दास ही ठीक-ठीक शीर्षासन करता है। वह उलटा हो जाता है। और जैसे तुमने दुनिया को अब तक देखा है मालिक होने के ढंग सेतो दुनिया को तुमने कुछ और ही पाया है।
रास्ते से तुम गुजरते होभिखारी तुमसे मांगता है। क्या उसके मांगने से कभी कोई तुम्हारे मन में और उसके बीच कोई संबंध स्थापित होता हैकिसी तरह का लगाव बनता हैउलटी ही हालत होती है। उसके मांगने से तुम खिंच जाते हो। अगर देते भी हो तो बेमन से देते हो। और दुबारा ध्यान रखते हो कि उस रास्ते से संभल कर निकलना है। जब कोई मांगता है तब तुम सिकुड़ते होदेना नहीं चाहते। और जब कोई मांगता नहीं तभी देने का मन होता है।
तुम जरा अपने को ही समझो तो परमात्मा की तरफ जाने के रास्ते साफ हो जाएं। जब कोई तुमसे मांगता है तब तुम देना नहीं चाहतेक्योंकि उसकी मांग छीन-झपट मालूम होती है। वह आक्रमण कर रहा है। सब मांग आक्रमण है। लेकिन जब तुमसे कोई मांगता नहींतब तुम हलके होते होतब तुम सहज दे सकते हो।
बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को कहा है कि जब तुम गांव में भिक्षा के लिए जाओ तो मांगना मत। सिर्फ द्वार पर खड़े हो जाना। अगर कोई प्रति-उत्तर न मिले तो आगे बढ़ जानामांगना मत।
और यही तो भिक्षु और भिखारी में भेद है। भिक्षु को हमने महासम्मान दियाजो हमने सम्राटों को नहीं दिया। और भिखारी को तो हम आखिरी जगह रखे हुए हैं। सम्मान दूरउसे हम अपमान देने के योग्य भी नहीं मानते। उससे हम नजर बचा कर निकलते हैं। बुद्ध के भिक्षुओं ने पूछा कि बिना मांगे कोई कैसे देगाबुद्ध ने कहाबिना मांगे ही दुनिया में चीजें मिलती हैं। मांगे कि मुश्किल में पड़े। क्योंकि जब तुम मांगते नहीं तब तुम दूसरे को आतुर करते हो देने के लिए। जब तुम मांगते हो तब तुम दूसरे में संकोच पैदा करते हो।
तुम अपने जीवन के सभी संबंधों में इस कहानी को छिपा हुआ पाओगे। पत्नी कुछ मांगती हैदेना मुश्किल हो जाता है। लाते भी हो तो बेमन से सिर्फ कलह टालने को। वह प्रेम का संबंध न रहा। वह सिर्फ उपद्रव से बचने की व्यवस्था हुई। पत्नी मांगती ही नहींकभी नहीं मांगतीतब तुम्हारा हृदय प्रफुल्लित होता है। तब तुम कुछ लाना चाहते हो। तब तुम उसे कुछ देना चाहते हो। देना तभी संभव हो पाता है जब कोई न मांगे।
तुम परमात्मा से टूटे हो तुम्हारी मांग के कारण। और तुम्हारी सब प्रार्थनाएं दोऔर दो से भरी हैं। तुम परमात्मा का उपयोग एक सेवक की तरह करना चाहते हो। तुम कहते होमेरे पैर में दर्द हैदूर करो। तुम कहते होआर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हैठीक करो। तुम कहते होपत्नी बीमार हैस्वस्थ करो। नौकरी खो गयी हैनौकरी दो। तुम परमात्मा के द्वार पर सदा भिखमंगे की तरह पहुंचते होमांगते पहुंचते हो। तुम्हारा मांगना ही बताता है कि साहब तुम अपने को समझ रहे हो और परमात्मा को तुम दास समझ रहे हो। वह तुम्हारी जरूरतें पूरी करने के लिए है। और तुम्हारी जरूरतें इतनी महत्वपूर्ण हैं कि तुम परमात्मा को भी सेवा में रत करना चाहते हो।
नहींअगर परमात्मा साहब है और तुम गुलाम होतो मांग क्याऔर मजा यह है कि तुम मांगते हो और वह देता चला जाता है। ऐसा भी नहीं है कि तुम्हारे मांगने से न मिलता होमिलता चला जाता है। लेकिन जितना ही तुम पाते हो उतना ही तुम उससे दूर हटते जाते हो। क्योंकि तुम और मांगोगे। जितना मिलेगा और मांगोगे। जितना तुम मांगोगेदूर हटते जाओगे।
मांग कभी भी प्रार्थना नहीं बन सकती। वासना कभी भी प्रार्थना नहीं बन सकती। चाह कभी भी उपासना नहीं बन सकती। प्रार्थना का तो सूत्र ही यही है कि तुम वहां धन्यवाद देने जाते होमांगने नहीं। उसने पहले ही बहुत दे रखा है। जितनी जरूरत है उससे ज्यादा दे रखा है। जितनी योग्यता है उससे ज्यादा दे रखा है। प्याली पहले से ही भरपूर है और बह रही है।
वास्तविक भक्त उसे धन्यवाद देने जाता है। उसकी प्रार्थना अहोभाव है। वह कहता है कि तूने मुझे बहुत दिया है। मेरी योग्यता क्या थी! और तुम कहते होदेखो मेरी योग्यता कोमेरे साथ अन्याय हो रहा है। मुझे और दो। और यह और कहीं समाप्त न होगा।
नानक कहते हैं, 'लोग मांगते रहते हैं और दाता देता चला जाता हैफिर भी उनकी मांग का कोई अंत नहीं होता।'
आखहि मंगहि देहि देहि। दाति करे दातारू।।
और वह दे रहा है। और मांगने वाले मांगते चले जाते हैं। मांग अनंत है। उसके अंत होने का कोई उपाय नहीं। अगर तुम मांगते ही रहे तो प्रार्थना कब करोगेपूजा कब शुरू होगीक्योंकि मांग का कोई अंत नहीं है। एक मांग पूरी होती हैदस खड़ी हो जाती हैं। एक वासना समाप्त नहीं हुई कि दस को जन्म दे जाती है। तुम मांगते ही रहोगेउपासना कब होगीधन्यवाद कब दोगेकितने जन्मों से तुम मांग रहे होअभी भी तुम भरे नहीं?
तुम कभी भरोगे ही नहीं। क्योंकि भरना मन का स्वभाव नहीं है। मन सदा अतृप्त ही रहेगा। वह उसका स्वभाव है। मन छूट जाए तो तृप्ति होती है। मन रहे तो अतृप्त। मन कभी तृप्त नहीं होता। इसलिए कोई ऐसा आदमी तुम न पा सकोगे जो कहे कि मेरा मन तृप्त हो गया है। और अगर कभी तुम ऐसा आदमी पाओ जो कहे मेरा मन तृप्त हो गयातो तुम गौर से देखनाउसके पास मन होगा ही नहीं।
मन क्या हैमन तुम्हारी सब मांगों का जोड़ है। देहि देहि--दोऔर दोऔर दो--इन सारी मांगों के जोड़ का नाम मन है। मन से बड़ा भिखमंगा इस जगत में कोई भी नहीं है। कितना ही मिलेकोई अंतर नहीं पड़ता। सिकंदर भी मांग रहा है। रास्ते का भिखारी भी मांग रहा है।
मन का स्वभाव समझ लेना जरूरी है। और मन से तो प्रार्थना कैसे होगीप्रार्थना का नाम ही अमनी अवस्था है। प्रार्थना का अर्थ है कि तुम मांगने नहीं गएतुम धन्यवाद देने गए हो। सारी दृष्टि बदल गयी। जैसे ही मन को तुम हटाओगेतुम पाओगे कि इतना मिला हैअब और क्या चाहिए! मन को बीच में लाए कि लगेगा बिलकुल कुछ नहीं मिला हैसब चाहिए। मन देखता है अभाव को। मन के हटते ही दर्शन होता है भाव का।
इसे ऐसा समझोएक आदमी हैउसे तुम गुलाब के फूलों की झाड़ी के पास ले जाओ। उसे सिर्फ कांटे दिखाई पड़ते हैं। वह गिनती करता है कांटों की। उसे फूल दिखता ही नहीं। तुम कितना ही उसे दिखाओवह कहेगाजहां हजार कांटे हैंवहां एक फूल हुआ भी तो क्याऔर जहां हजार कांटे लगे हैंवह आदमी कहेगासंभल कर फूल को पकड़नावह भी कांटों का ही धोखा होगा।
उसका तर्क ठीक भी है। कि जहां कांटे ही कांटे लगे हैंपहले तो वहां फूल लगेगा कैसेकहां कांटेकहां फूल! और जब हजार कांटों में छिद चुका होगा उसका मनतो उसे डर पैदा हो जाएगा। वह फूल पर भी भरोसा न कर सकेगा। आस्था न कर सकेगा। वह कहेगाकोई भ्रम हो रहा हैकोई सपना है। मैं किसी भूल में पड़ा हूं। या कोई मुझे धोखा दे रहा है। या किसी ने फूल को ऊपर से चिपका दिया है। फूल हो कैसे सकता है जहां कांटे ही कांटे हैंअगर कांटों की गिनती करो तो फूल पर भी श्रद्धा चली जाती है।
अगर फूल की गिनती करोअगर फूल में लीन हो जाओअगर फूल की सुगंध लोफूल का स्पर्श तुम्हें पुलकित कर दे,तो दूसरी अवस्था पैदा होती है। तुम कहोगेजहां इतना प्यारा फूल लगा हैवहां कांटे हो कैसे सकते हैंऔर अगर हों भीतो फूल की रक्षा के लिए होंगे। और अगर हों भीतो फूल के सहयोगीसाथी होंगे। और अगर हों भीतो परमात्मा की कोई मर्जी होगी। शायद फूल बिना कांटों के नहीं हो सकताइसलिए कांटे हैं। वे सुरक्षा हैंवे पहरेदार हैं। वे फूल को बचा रहे हैं।
और फूल में तुम्हारा रस बढ़ता जाएबढ़ता जाएतो एक दिन तुम पाओगे कि वही रस फूलों में चल रहा है जो कांटों में बह रहा है। इसलिए उनमें विरोध कैसे हो सकता है?
मन देखता है कांटों कोमन देखता है क्या नहीं है। मन देखता है कहां शिकायत हैमन देखता है कहां भूल है। मन देखता है कहां कमी है। मन देखता है असंतोषअतृप्ति। मांग खड़ी हो जाती है। इसलिए मन से भरा जो जाता है मंदिर मेंवह मांगने जाता है। वह भिखारी है।
अगर तुम मन को थोड़ा अलग कर के देखो तो तुम पाओगे फूलों कोतब तुम पाओगे जीवन की ऊर्जा कोतब तुम पाओगे जीवन के अहोभाव को। इतना मिला हैपहले से ही इतना मिला हैशिकायत का उपाय कहां?
और जिसने इतना दिया हैअगर उसने कुछ बचा रखा हैतो उस बचाने में कुछ राज होगा। अगर उसने कुछ बचा रखा हैतो उस बचाने में कोई कारण होगा। शायद मैं अभी तैयार नहीं। शायद अभी योग्यता चाहिए। शायद अभी मैं पात्र नहीं।
और समय के पहले कुछ ऊपर आ जाए तो सुख नहीं लातादुख लाता है। हर चीज का समय है। हर चीज की परिपक्वता है। जब मैं पकूंगा तब वह देगा। क्योंकि उसके देने का इतना अपरंपार है मार्ग। उसके हाथ हजारों फैले हुए हैं।
हिंदू परमात्मा की हजारों हाथों से कल्पना करते हैं। उस कल्पना में बड़ा प्यार है। वे यह कहते हैं कि वह हजार हाथों से देता हैदो हाथ नहीं हैं उसके। तुम ले न पाओगेतुम्हारे दो हाथ हैं। तुम कितना संभालोगेवह हजार हाथों से दे रहा है। लेकिन ठीक समयसमय की ठीक प्र्रतीक्षाशिकायत का अभाव--और वर्षा होनी शुरू हो जाती है।
नानक कहते हैंगुणगान भी करते हैं लोगतो दो-दो कर मांगते चले जाते हैं। और दाता देता ही चला जाता है। और अंधों को दिखाई ही नहीं पड़ता। वे मांगते ही रहते हैं कि दोऔर दो। चारों तरफ वर्षा हो रही है और लोग चिल्लाते रहते हैं कि हम प्यासे हैं। जैसे शिकायत से मोह बन गया है। जैसे दुख से लगाव बन गया है।
'फिर उसके आगे क्या रखा जाए कि उसके दरबार का दर्शन हो?'
यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है। नानक कह रहे हैं कि उसने इतना दिया हैमांगने को कुछ छोड़ा नहीं। जब शिकायत हट जाती है और अहोभाव पैदा होता है और हम धन्यवाद देने जाते हैंतो क्या रखें उसके चरणों मेंक्या भेंट ले जाएं उसके द्वार पर?
फेरि कि अगै रखीऐ। जितु दिसै दरबारु।।
उसके दरबार में हम क्या रखेंधन्यवाद देने के लिए क्या भेंट ले जाएंक्या चढ़ाएं उसके चरणों मेंकैसे करें पूजा?कैसे करें अर्चनातुम फूल ले जाते हो तोड़ कर--उसके ही फूल। बेहतर थे वृक्ष परजीवित थे। तुमने तोड़ कर मार डाले। उसके ही फूल मार कर तुम उसी के ही चरणों में चढ़ा आते हो। और तुम्हें शर्म भी नहीं आती! तुम उसे दोगे क्यासब उसका ही दिया हुआ है।
तुम धन लगा कर मंदिर खड़ा कर दोनया गुरुद्वारा बना दोमस्जिद निर्मित कर दोपर तुम कर क्या रहे होउसकी ही दी हुई चीजों को उसे वापस लौटा रहे हो। फिर भी तुम अकड़े नहीं समाते हो। तुम कहते होमैंने मंदिर बनाया। मैंने इतने गुरुद्वारे बनाए। मैंने इतना भोजन बांटाइतने वस्त्र बांटे। तुम अकड़ते हो। तुम थोड़ा सा दे क्या देते होतुम्हारे अहंकार का अंत नहीं होता।
इससे क्या खबर मिलती हैइससे खबर मिलती है कि तुम समझ ही न पाए कि जीवन ने जो तुम्हें दिया है उसे वापस लौटाने में तुम्हारा क्या हैतुम यह भेंट उसे देने जा रहे हो और शघमदा भी नहीं हो।
उसके चरणों में क्या रखेंनानक पूछते हैंउसके आगे क्या रखें कि उसके दरबार का दर्शन होकि हम उसके निकट आ जाएंकि हमारी भेंट स्वीकार हो जाए। क्या रखेंकेसर में रंगे हुए चावलखरीदे गए फूलतोड़े हुए पत्तेधनदौलत,क्या रखें?
नहींकुछ भी रखने से न चलेगा। अगर तुम यह समझ जाओ कि सभी उसका हैबस! भेंट स्वीकार हो गयी। जब तक तुम यह समझ रहे हो कि कुछ मेरा हैतभी तुम रखने की बात सोच रहे हो। जब तक तुम समझते हो मैं खुद मालिक हूंचाहूं तो भेंट कर सकता हूंतभी तक तुम भूल से भरे हो। तुम कुछ भी रख दोसारा साम्राज्य रख दो अपनातो भी कुछ तुमने रखा नहीं। क्योंकि सभी उसका था। तुम उसके हो। तुमने जो कमा लियातुमने जो इकट्ठा कर लियावह भी उसी का खेल है।
तो नानक कहते हैंक्या रखें कि तेरे दरबार का दर्शन होकि तेरी प्रतीति मिलेकि तेरा साक्षात होकि तेरी आंख से आंख मिलेक्या लाएं तुझे चढ़ाने को?
अगर तुम्हें यह समझ में आ जाए कि सभी उसका हैकुछ ले जाने की जरूरत न रही। फूल वृक्षों पर ही उसी को चढ़े हुए हैं। सब उसी को चढ़ा हुआ है। चांदत्तारे उसको चढ़े हुए हैं। तुम्हारे घी के दीए क्या करेंगे और अबचांद-सूरज उसको चढ़े हुए हैं। तुम थोड़े से घी के दीए जला कर चढ़ा दोगे तो क्या होगाव्यक्ति अगर ठीक से आंख खोल कर देखे तो सारा अस्तित्व उसकी अर्चना में है। यही तो अर्थ है साहब का। वह सब का मालिक हैसब उसको चढ़ा हुआ है।
इसलिए नानक कहते हैंक्या लाएंयह प्रश्न है नानक काक्या चढ़ाएं?
'मुंह से कौन सी बोली बोलें जिसे सुन कर वह प्यार करे?'
क्या कहें उससेकौन से शब्दों का उपयोग करेंकैसे उसे रिझाएंकैसे उसे राजी करेंकैसे हम करें कुछ कि उसका प्यार बरसे?
उत्तर नानक नहीं देते मालूम पड़ते हैं। प्रश्न उठा कर छोड़ दिए हैं। वही कला है। क्योंकि वे यह कह रहे हैं कि हम कुछ भी बोलेंवही हम से बोल रहा है। उसके ही शब्द उसी को चढ़ाएं इसमें क्या कुशलता हैउसका ही बासा कर के उसी को लौटा देंयह सिर्फ अज्ञानी कर सकता है। ज्ञानी तो पाता है कि चढ़ाने को कुछ भी न बचाक्योंकि मैं खुद भी चढ़ा हुआ हूं। और ज्ञानी पाता है कि कोई शब्द उसकी प्रार्थना न बन सकेंगेक्योंकि सभी शब्द उसके हैं। वही बोल रहा है। वही धड़क रहा है हृदय में। वही श्वासों की श्वास है। तो फिर ज्ञानी क्या करे?
नानक कहते हैं, 'अमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो।'
कुछ करने को नहीं है और। समझदार क्या करे?
'अमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो।'
यह थोड़ा समझ लेना जरूरी है। जिसे हिंदू संध्या कहते हैंउसे नानक ने अमृत वेला कहा है। संध्या से भी कीमती शब्द अमृत वेला है। हिंदू तो हजारों साल से श्रम कर रहे हैं--जीवन के सत्य की खोजचैतन्य की खोजऔर कहां-कहां से मार्ग हो सकते हैं। ऐसा कुछ भी हिंदुओं ने छोड़ा नहीं हैजो छूट गया होजो उनकी जानकारी में न आ गया हो। हजारों साल के बाद हिंदुओं को पता चला धीरे-धीरे--उपनिषद उसकी चर्चा करते हैं--कि चौबीस घंटे में दो संध्या क्षण हैं।
रात जब तुम सोने जाते हो तो सोने और जागने के बीच एक क्षण ऐसा है जब न तो तुम सोए होते होन जागे होते हो। उस समय जैसे तुम्हारी चेतना गेयर बदलती है। अगर तुम कार चलाते हो तो तुम्हें पता है कि एक गेयर से दूसरे गेयर में गाड़ी डालते वक्त बीच को क्षण-भर को गाड़ी न्यूट्रल गेयर से गुजरती है। एक गेयर से दूसरे गेयर में जाते वक्त क्षण भर को गाड़ी किसी गेयर में नहीं होती।
नींद और जागरण दो अवस्थाएं हैंबिलकुल अलगएकदम अलगजागे में तुम कुछ और थे नींद में तुम बिलकुल कुछ और हो जाते हो। जागते तुम दुखी थेरो रहे थेदीन थेदरिद्र थेनींद में तुम सम्राट हो जाते हो। और संदेह भी नहीं आता कि मैं भिखारी कैसे सम्राट होने का सपना देख रहा हूं! तुम बिलकुल दूसरे गेयर में हो। चेतना का बिलकुल दूसरा तल हैजिसका पहले तल से कोई संबंध न रह गया। नहीं तो थोड़ी तो याद आती। थोड़ा तो स्मरण होता कि मैं भिखमंगा और यह क्या देख रहा हूं कि मैं सम्राट हो गयानहींजब तुम सपना देखते होसपने पर पूरा भरोसा आता है। ऐसा लगता है कि बारह घंटे जाग कर तुमने जो जीवन जीया थावह जीवन अलग प्रकोष्ठ है। और रात तुम सो कर जो जीवन देख रहे होवह अलग प्रकोष्ठ है। तुम दूसरी ही दुनिया में चले आए। दिन में तुम साधु थेरात तुम असाधु हो। कि दिन में असाधु थेरात साधु हो गए। संदेह भी पैदा नहीं होता। कभी तुम्हें सपने में संदेह पैदा हुआ हैअगर सपने में संदेह पैदा हो जाए तो सपना उसी वक्त टूट जाएगा। क्योंकि संदेहजागरण चेतना का हिस्सा है। सपने में संदेह भी पैदा नहीं होता। यह भी खयाल नहीं आता कि मैं सपना देख रहा हूं। अगर यह खयाल आ जाए कि यह सपना है तो सपना तत्क्षण टूट जाएगा।
बहुत सी परंपराएं हैं साधकों कीजो साधक को यह सूत्र देती हैं साधना का कि तुम रात जब सोओ तो यह खयाल रखो कि यह सपना है...यह सपना है...यह सपना है। कोई तीन साल लग जाते हैं तब कहीं यह याददाश्त मजबूत होती है। और जिस दिन साधक को पता चल जाता है कि यह सपना हैउसी वक्त सपना टूट जाता है। और न केवल एक सपना टूटता हैउसके बाद सपने आने बंद हो जाते हैं। क्योंकि अब उसके गेयर अलग-अलग नहीं रहे। अब उसके प्रकोष्ठ इकट्ठे हो गए। अब वह सोया हुआ भी जागा हुआ है। यही तो कृष्ण कहते हैं कि योगी उस समय भी जागता है जब तुम सोते हो। उसके जो दो कमरे अलग-अलग थेउसने बीच की दीवाल हटा दी। दोनों कमरे एक हो गए हैं।
रात जब तुम नींद में उतरते होऔर सोने से सुबह फिर तुम जागते हो--ये दो घड़ियां हैं जब तुम्हारी चेतना बदलती है। एक क्षण को मध्य काल होता है। उसको हिंदू संध्या काल कहते हैं। उसी को नानक ने अमृत वेला कहा है। अमृत वेला इसलिए कहा है...संध्या काल तो वैज्ञानिक शब्द है। संध्या का अर्थ है मध्य कान यहां कान वहां कान इसकान उसका। उस संध्या काल में क्षण भर को तुम परमात्मा के निकटतम होते हो। इसलिए हिंदुओं की प्रार्थना संध्या काल का उपयोग करना चाहती है। उसी को नानक अमृत वेला कह रहे हैं। अमृत वेला और भी प्यारा शब्द है। क्योंकि उस क्षण तुम अमृत के करीब होते हो।
शरीर तो मरणधर्मा है। शरीर के ही एक यंत्र से तुम जागते हो और शरीर के ही दूसरे यंत्र से तुम सोते हो। सब सपने शरीर के हैं। सब जागना-सोना शरीर का है। इस शरीर के पीछे तुम छिपे होजो न कभी सोता हैन कभी जागता है। क्योंकि जो सोया ही नहींवह जागेगा कैसेन कभी सपने देखता हैक्योंकि सपने देखने के लिए सोना जरूरी है। इन शरीर की अवस्थाओं के पीछे छिपा है अमृतजो न कभी पैदा होता हैऔर न कभी मरता है।
अगर तुम संध्या काल को पकड़ने में समर्थ हो जाओ तो तुम्हें शरीर के भीतर छिपे हुए अशरीरी का पता चल जाएगा। दास के भीतर छिपे हुए साहब का पता चल जाएगा। तुम दोनों हो। अगर तुम शरीर को ही देखते हो तो दास होअगर शरीर के भीतर छिपे मालिक को देखते हो तो साहब हो।
तो नानक कहते हैं कि बस एक ही काम करने योग्य है। मंदिरों में मांगने से कुछ न होगा। पूजा-अर्चना चढ़ाने से कुछ न होगा। फूल-पत्ते रखने से कुछ न होगा। क्योंकि उसी का उसी को भेंट कर आने में कौन सी कुशलता हैकौन सी बड़ाई हैएक ही करने जैसी प्रार्थना हैएक ही पूजा-अर्चना हैऔर वह है--अमृत वेला में सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो।
अमृत वेला सचु नाउ। वडिआई वीचारु।।
वह जो संध्या काल है...लेकिन एक क्षण का है। और तुम्हारा मन कभी भी वर्तमान में नहीं होता। इसलिए तुम उसे चूक जाते हो। रोज वह आता है। हर बारह घंटे के बाद वह घड़ी आती है जब तुम परमात्मा के निकटतम होते हो। लेकिन तुम उसे चूक जाते हो। चूक जाते होक्योंकि तुम्हारी नजर उतने बारीक क्षण को पकड़ने में अभी कुशल नहीं है। तुम वर्तमान में होते ही नहीं।
तुम यहां बैठे मुझे सुन रहे हो या कि तुम जा चुके दफ्तर और तुमने काम शुरू कर दियाया कि तुम अपनी दूकान पर पहुंच गए और तुमने व्यवसाय शुरू कर दिया हैमैं जो कह रहा हूं वह तुम उसे सुन रहे हो या कि उसके संबंध में विचार कर रहे होअगर तुम उसके संबंध में विचार कर रहे हो तो तुम यहां नहीं हो। वर्तमान क्षण से तुम चूक जाओगे।
इस अमृत वेला को पकड़ना हो तो प्रतिपल सजगता से जीना जरूरी है। तुम भोजन करो तो सिर्फ भोजन करो और कोई विचार मन में न चले। तुम स्नान करो तो सिर्फ स्नान करो और कोई विचार मन में न चले। तुम दूकान जाओ तो दूकान ही रहे और कोई विचार ही न चलेघर भूल जाए। घर आओ तो दूकान भूल जाए। तुम एक-एक क्षण में जब जाओ तो पूरे वहां रहोयहां-वहां नहीं। तब धीरे-धीरे तुम्हारी दृष्टि सूक्ष्म होगी और तुम वर्तमान क्षण कोप्रेजेन्ट मोमेंट को देखने में समर्थ हो पाओगे।
इसके बाद ही अमृत वेला में तुम ध्यान कर सकोगेक्योंकि वह तो बहुत बारीक क्षण है। एक झटके में बीत जाता है। तुम कुछ और सोचते रहते होवह उसी वक्त बीत जाता है।
सोने के पहले पड़े रहो बिस्तर पर। सब तरह से मन को शांत कर लो। विचार यहां-वहां न ले जा रहे हों। नहीं तो जब क्षण आएगातब तुम वहां मौजूद न रहोगे। तुम किसी चिंता-विचार में खोए हो। सब तरह से अपने को शांत कर लो। मन बिलकुल सूना हो जाएवहां कोई विचार न घूमता हो। कोई बादल न घूमता हो। नील गगन जैसा हो जाए मन--खालीसूना--और देखते रहोक्योंकि खाली सूना होने के साथ खतरा है कि तुम सो जाओ। देखते रहो भीतर क्या घट रहा है। बराबर तुम एक खटके की आवाज सुनोगेजैसे गेयर बदल रहा है। पर गेयर बहुत सूक्ष्म हैअगर विचार चल रहे हैं तो तुम सुन ही न पाओगे। बराबर तुम देखोगे कि जैसे रात दिन में बदल रही हैदिन रात में बदल रहा हैसोना नींद बन रहा हैनींद जागना बन रही है;और तुम दोनों से अलग देखने वाले हो। वह देखने वाला ही अमृत है। तुम देखोगे अपने भीतरजागरण गया इस द्वार सेनिद्रा आयी। तुम सुबह पाओगेनींद गयीजागरण आया। और जब तुम नींद और जागरण दोनों को देख सकोगेतुम दोनों से अलग हो गए। तुम द्रष्टा हो गए। यही अमृत क्षण है। इसे नानक कहते हैंअमृत वेला में बस उसकी महिमा का भाव रहे।
महिमा का अर्थ हैसाचा साहबसाचा नाम। बसउसकी महिमा का भाव रहे। शब्द भी नहीं। अगर तुम जपुजी दोहराते रहे तो भी चूक जाओगे। इसे भी खयाल में रख लेना कि महिमा का अर्थ शब्द नहीं है। महिमा एक भावदशा है। तुमने अगर कहा कि तू अपरंपार हैतू महान हैतू ऐसा हैवैसा है--इसी बकवास में तुम चूक जाओगे। वह क्षण बारीक है। पर इसे थोड़ा समझना कठिन है।
तुमने कोई भाव जानातुम कभी किसी के प्रेम में उतरेतो क्या जरूरी है कहना कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूंजब तुम अपने प्रेमी के पास हो तो क्या बार-बार दोहराना जरूरी है कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूंकि तुम बड़े सुंदर होकि तुमसे सुंदर और कोई भी नहींइन शब्दों से तो बातें थोथी और ओछी हो जाती हैं। सच तो यह है कि तुम जब यह कहते होतभी प्रेम की महिमा खो गयी। ये शब्द उस महिमा को नहीं ला सकते।
तुम प्रेमी के पास होते हो तो तुम चुपचाप बैठते हो। लेकिन हृदय में एक भाव गूंजता रहता है प्रेमी की महिमा का। वह भाव हैशब्द नहीं। शब्द तो मस्तिष्क में गूंजते हैंभाव हृदय में गूंजते हैं। तुम पुलकित होते रहते होतुम आनंदित होते हो,तुम अकारण प्रसन्न होते हो। कुछ वजह नहीं होती और तुम पाते हो भरे हुए हो। कुछ खाली नहीं है। तुम परिपूर्ण होते हो। और तुम्हारी यह परिपूर्णतातुम्हारी यह ओवर फ्लोइंगबाढ़ की तरह तुम्हारी बहती हुई यह प्रेम की धारा प्रेमी अनुभव करता है।
प्रेमियों को तुम सदा चुप पाओगे। पति-पत्नियों को तुम सदा बातचीत करते पाओगे। क्योंकि पति-पत्नी डरते हैं चुप होने से। चुप हुए तो सब संबंध टूट जाता है। बातचीत का ही सब संबंध है। अगर पति चुप है तो पत्नी समझती हैक्यों तुम चुप होक्या बात हैअगर पत्नी चुप है तो पति समझता हैकुछ गड़बड़ है। चुप वे होते ही तब हैं जब वे लड़ते हैं। अन्यथा वे बोलते रहते हैं।
इसे थोड़ा सोचना। तुम चुप होते ही तब हो जब तुम्हारा झगड़ा चल रहा है। बातचीत बंद है। लेकिन जब तुम ठीक होते हो तब तुम एकदम बातचीत करते रहते हो। तुम मौन का उपयोग झगड़े के लिए करते हो। और मौन का उपयोग बड़े से बड़े प्रेम के लिए करना है।
जब दो प्रेमी सचमुच प्रेम में होते हैंवे इतने गदगद होते हैं कि बोलने को कुछ बचता नहीं। आंसू बह सकते हैं। उस गदगद भाव में वे हाथ एक दूसरे के हाथ में ले सकते हैं। वे एक दूसरे के आलिंगन में हो सकते हैं। लेकिन वाणी खो जाएगी। प्रेमी गूंगे हो जाते हैं। बोलना ओछा मालूम पड़ता है। बोलना भी विघ्न मालूम पड़ता है। बोले तो यह जो गहन शांति घिर गयी हैयह टूट जाएगी। बोले तो जो यह तार बंध गया है हृदय कायह छिन्न-भिन्न हो जाएगा। बोले कि कंप जाएगी सागर की सतह और लहरें उठ आएंगी। इसलिए प्रेमी चुपचाप हो जाते हैं।
उस क्षण मेंअमृत वेला मेंमहिमा का विचार नहीं करना हैशब्द नहीं बांधने हैंमहिमा का भाव करना है। अहोभाव,मूकभावकि परमात्मा ने सब दिया है। और तुम भरे-पूरे हो। कुछ भी नहीं चाहिए। और तुमसे धन्यवाद बह रहा है।
'हम मुंह से कौन-सी बोली बोलें कि जिसे सुन कर वह प्यार करे।'
कुछ बोलने को नहीं है। उससे हम क्या कहेंगेसब कहना व्यर्थ है।
'सत्य नाम की महिमा का ध्यान करो।'
सत्य नाम से भर जाओ। और तुम पाओगे एक तालमेल हो गया। उस बीच के क्षण मेंजब दिन जा रहा हैरात आ रही हैजागरण जा रहा हैनिद्रा आ रही हैतुम सजग हो गए। तुम चौंक जाओगे। तुम पाओगे तुम प्रकाश की एक लपट हो गए। जिसका न कोई प्रारंभ है न कोई अंत है। जो सदा सच हैजो शाश्वत है। उस लपट में ही जीवन के द्वार खुलते हैं और उस प्रकाश में ही सत्य जो छिपा हैअनावृत होता है।
'कर्म से शरीर मिलता है।'
तब उस घड़ी में तुम जानोगे कि कर्म से शरीर मिलता है।
'और कृपा-दृष्टि से मोक्ष का द्वार खुलता है।'
यह जो शरीर हैयह तुम्हारे किए हुए का फल है। यह तुमने कर-कर के पाया है। यहां कई बातें समझ लेनी जरूरी हैं। पहली बात: कुछ चीजें हैं जो तुम कर के पा सकते होकुछ चीजें हैं तुम कर के कभी नहीं पा सकते हो। क्षुद्र को कर के पाया जा सकता है। विराट को कर के नहीं पाया जा सकता। कबीर ने कहा हैअनकिए सब होय। उस विराट को पाने के लिए तो तुम्हें अनकिए की अवस्था में होना चाहिए। तुम सब पा सकते हो जो क्षुद्र हैकर्तृत्व से। जो विराट है वह अकर्तृत्व से उपलब्ध होता है। दोनों की दिशा अलग है। स्वाभाविक भी हैतर्कयुक्त भी है।
मैं जो भी करूंगा वह मुझसे बड़ा नहीं हो सकता। कैसे होगाकृत्य कभी कर्ता से बड़ा हुआ हैमूर्ति कभी मूर्तिकार से बड़ी हुई हैकविता कभी कवि से बड़ी हुई हैयह असंभव है। जो तुमसे निकलेगा वह तुमसे छोटा हो सकता है। ज्यादा से ज्यादा तुम्हारे बराबर हो सकता है। लेकिन तुमसे बड़ा नहीं हो सकता। तुम परमात्मा को कैसे पाओगेतुम्हारे कर्तृत्व से कुछ भी न होगा। और तुम जितनी पाने की कोशिश करोगेउतने ही तुम भटकोगे।
इसी भटकाव को छिपाने के लिए तो हमने मूर्तियां गढ़ ली हैं मंदिरों में। मूर्ति हम गढ़ सकते हैं। परमात्मा को गढ़ने का तो कोई उपाय नहीं है। परमात्मा हमें गढ़ता हैमूर्ति हम गढ़ते हैं। परमात्मा हमें बनाता हैमंदिर हम बनाते हैं। मंदिर क्षुद्र है। वह तुम्हारे हाथ की कृति है। तुम्हारी कृति में विराट कैसे पाया जा सकेगातुम्हारी कृति तुमसे बड़ी न होगी। तुम्हारी कृति में तुम ही तो रहोगेतुम्हारे ही हाथ की छाप होगीउस पर परमात्मा का हस्ताक्षर नहीं हो सकता।
हांतुम्हारी कृति में भी कभी-कभी परमात्मा का हस्ताक्षर हो सकता है--जब तुम उसके हाथों में अपने को छोड़ दोवह करे और तुम केवल उपकरण हो जाओ।
बिड़ला के मंदिर में तुम उसको न पा सकोगे। वह मंदिर बिड़ला का है। उसका भगवान से क्या लेना-देनाअगर वह भगवान का मंदिर होतातो बिड़ला का कैसे हो सकता थाहिंदू के मंदिर में तुम उसे न पा सकोगेवह हिंदू का मंदिर है। अगर वह परमात्मा का मंदिर होतातो हिंदू का मंदिर उसे क्यों तुम कहतेसिक्ख के गुरुद्वारे में तुम उसे न पा सकोगेवह सिक्ख का गुरुद्वारा है।
परमात्मा के मंदिर का कोई नाम नहीं हो सकता। वह अनाम हैउसका मंदिर भी अनाम होगा। तुम जो भी बनाओगे,कितना ही सुंदर बना लोस्वर्ण मंदिर बना लोलेकिन आदमी के हाथ की छाप वहां होगी। तुम्हारा मंदिर दूसरे मंदिरों से बड़ा होतुमसे बड़ा नहीं हो सकता। तुम्हारे मंदिर में तभी वह प्रगट हो सकता है जब तुम बिलकुल अप्रगट हो जाओ। तुम्हारी छाप ही न मिले।
अभी तक हम जमीन पर ऐसा मंदिर बनाने में समर्थ नहीं हो सके जिसमें आदमी के हाथ की छाप न हो। सब मंदिर किसी के हैं। बनाने वाला बहुत प्रगाढ़ हो कर वहां है। कोई मंदिर उसका नहीं है। सच तो यह है कि उसके मंदिर बनाने की कोई जरूरत नहीं हैक्योंकि यह सारा अस्तित्व उसका मंदिर है। पक्षियों में वह कल-कल कर रहा है। वृक्षों में फूल खिला रहा है। हवाओं में बह रहा है। नदियों में उसी का शोर है। गगन उसी का विस्तार है। तुम उसी में उठी हुई लहरें हो। उसका मंदिर तो बड़ा है। तुम कैसे छोटे मंदिर में उसे समाओगे?
आदमी कर्म से बहुत कुछ कर सकता है। पश्चिम उसका प्रतीक है। उन्होंने कर्म से बहुत कुछ कर लिया है। अच्छे रास्ते बना लिएअच्छे मकान बना लिए। वैज्ञानिक उपकरण खोजे। हाइड्रोजन बम बना लिया। मौत का बड़ा आयोजन कर लियासब कर लिया। लेकिन परमात्मा से बिलकुल वंचित हो गए।
और जितना-जितना उन्होंने कृत्य कियाजो-जो चीजें अकर्ता भाव से पैदा होती हैंवे सब खो गयीं। सबसे पहले पश्चिम से परमात्मा खो गया। तो नीत्से ने सौ साल पहले घोषणा कीगाड इज डेडईश्वर मर चुका। पश्चिम के लिए निश्चित मर गया। क्योंकि जब तुम कर्म से बहुत भर गएतो उससे तुम्हारा सारा संबंध टूट गयामरे के बराबर हो गया। पहले ईश्वर खो गया और जब ईश्वर खो गया तो प्रार्थना थोथी हो गयी। ध्यान ओछा हो गया। कुछ सार न रहा। किसका ध्यानकैसा ध्यान?किसलिएकर्म सब कुछ हो गया। ध्यान तो अक्रिय अवस्था हैजब तुम कुछ भी नहीं करते।
इसलिए पश्चिम में लोग सोचते हैंपूरब के लोग काहिल हैंसुस्त हैं। नानक के पिता भी यही सोचते थे कि नानक काहिल और सुस्त है। बैठा-बैठा क्या कर रहा हैपिता के पास व्यवसायी की बुद्धि थीतो लगता था कि यह लड़का एक उपद्रव है। न कुछ काम करता न कुछ धाम करतान कुछ कमाताइसके भविष्य के संबंध में पिता चिंतित थे। कई बार काम खोजे। सब जगह से बेकाम हो कर लौट आया। कुछ नहीं सूझा। पढ़ा-लिखा नहींक्योंकि पंडित से विवाद हो गया। और पंडित खुद आ कर लड़के को वापस पहुंचा गया कि अपने बस के बाहर है। क्योंकि यह कहता हैआखिरी शब्द हो गया अब और क्या बचाऔर पंडित को भी लगा कि कहता तो ठीक है कि अब इसके पार और क्या पढ़ने को हैऔर नानक ने पूछाऔर पढ़-पढ़ कर क्या होगाऔर पढ़-पढ़ कर क्या उसको पाया जा सकता हैतुमने उसे पा लियापंडित ने कहा कि पढ़-पढ़ कर तो उसे नहीं पाया जा सकता। मैंने भी उसे पाया नहीं। तो नानक ने कहाफिर हम वही रास्ता खोजेंगे जिससे उसे पाया जा सकता है।
कबीर कहते हैं--
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआपंडित हुआ न कोय।
ढाई आखर प्रेम कापढ़ै सो पंडित होय।
तो नानक ने कहा कि हम भी वही ढाई अक्षर पढ़ेंगेजिसको पढ़ कर लोग ज्ञान को उपलब्ध हो जाते हैं। अब हम यह इतना लंबा किसलिए पढ़ें!
इस पढ़ाई का तो प्रयोजन भी दूसरा है।
मैंने सुना हैमुल्ला नसरुद्दीन अपने स्कूल जाता था बच्चों को पढ़ाने। अपने गधे पर बैठ कर जाता था। कई वर्षों से उसी गधे पर आ-जा रहा था। स्कूल की हवा गधे को भी लग गयी। एक दिन रास्ते में गधे ने पूछामुल्ला! स्कूल किसलिए रोज जाते हो?
मुल्ला पहले तो डरा। फिर उसने सोचा कि कई मैंने बोलने वाले गधे देखे हैंतो यह गधा भी बोलने वाला गधा मान लेना चाहिए। घबड़ाने की इतनी कोई जरूरत नहीं है। फिर लगता है इसको स्कूल की हवा लग गयी है। गधा बोलने लगा है। अपनी ही भूल है। रोज स्कूल ले जाते रहेहवा लग गयी।
मुल्ला ने पूछाक्या करेगा जान कर?
उस गधे ने कहामैं जानना चाहता हूं कि रोज स्कूल क्यों जाते होजिज्ञासा उठ गयी है।
मुल्ला ने कहास्कूल पढ़ाने जाता हूं।
गधे ने पूछापढ़ने से क्या होगा?
मुल्ला ने कहाअक्ल आती है पढ़ने से।
गधे ने पूछाअक्ल से क्या होगा?
मुल्ला ने कहाअक्ल से क्या होगाअक्ल से मैं तुझ पर सवार हूं।
तो गधे ने कहाफिर मुल्लामुझे भी पढ़ा दो और अक्ल दे दो।
मुल्ला ने कहाना भाई। क्योंकि फिर तू मुझ पर सवार हो जाएगा। हरगिज नहीं।
इस दुनिया में तो हम जो पढ़ रहे हैंवह एक-दूसरे पर सवारी करने के उपाय हैं। यहां पढ़ना तुम्हारे संघर्ष का आयोजन है। तुम ठीक से लड़ सकोगे अगर तुम्हारे पास डिग्रियां हैं। तुम दूसरों के कंधों पर सवार हो सकोगे अगर तुम्हारे पास डिग्रियां हैं। ये विद्यालय तुम्हारे हिंसा के फैलाव हैं। इनके कारण तुम ज्यादा कुशलता से शोषण कर सकोगे। दूसरों को व्यवस्था से सता सकोगे। कानून से जुर्म कर सकोगे। नियम सेविधि से वह सब कर सकोगे जो कि नहीं करना चाहिए। सारी पढ़ाई-लिखाई बेईमानी का प्रशिक्षण है। तुम लोगों पर सवार हो सकोगे। इससे कभी कोई ज्ञानी तो नहीं हुआ। इससे ही तो लोग अज्ञानी होते चले जाते हैं। हमारे विद्यालय अविद्यालय हैं। वहां ज्ञान तो कभी घटता नहीं।
तो नानक को उनके स्कूल का अध्यापक पंडित छोड़ गया घरकि यह अपने बस के बाहर है।
नानक का जनेऊ हो रहा थातो सारा समारंभ हो गया था। सब लोग आ गए थे। बैंड-बाजे बज चुके थेपंडित सूत्र पढ़ चुका था। फिर वह गले में जनेऊ डालने लगा तो नानक ने कहारुको! इस जनेऊ के डालने से क्या होगाउस पंडित ने कहा कि इस जनेऊ के डालने से तुम द्विज हो जाओगे। नानक ने पूछा कि द्विज का क्या अर्थ हैद्विज का अर्थ है कि दुबारा जन्म। क्या इस सूत के धागे को डाल लेने से मेरा दुबारा जन्म हो जाएगाक्या मैं नया हो जाऊंगाक्या पुराना मर जाएगा और नए का जन्म हो जाएगाअगर यह होता हो तो मैं तैयार हूं।
पंडित भी डरा। क्योंकि माला गले में डाल लेने से जनेऊ की क्या होने को हैफिर नानक ने पूछा कि यह जनेऊ अगर टूट गया तोउसने कहा कि बाजार में और मिलते हैं। इसको फेंक देनादूसरा ले लेना। तो नानक ने कहा कि फिर यह रहने ही दो। जो खुद ही टूट जाता हैजो बाजार में बिकता हैजो दो पैसे में मिल जाता हैउससे उस परमात्मा की क्या खोज होगी?जिसको आदमी बनाता हैउससे परमात्मा की क्या खोज होगी! आदमी का कृत्य छोटा है।
नानक के पिता कालू मेहता को यही लगता थायह लड़का बिगड़ गया है। सब उपाय कर डाले। फिर कुछ रास्ता न बचा तो गांव में आखिरी उपाय रहता है कि इसको घर के गाय-भैंस चराने भेज दो। नानक को भेज दिया गाय-भैंस चराने। वे बड़े खुशी से गएवहां ध्यान लग गयावृक्ष के नीचे महिमा में डूब गए। गाय-भैंस पड़ोसियों के खेत चर गयीं। दूसरे दिन वह भी रोक देना पड़ा। आखिर बाप को पक्का हो गया कि इससे कुछ होना-जाना नहीं है।
यह बड़े मजे की बात है कि इस दुनिया में जो लोग कुछ कर पाते हैं वे उस दुनिया से वंचित रह जाते हैं। और जो उस दुनिया को पाने के हकदार होते हैंकरीब-करीब इस दुनिया में कुछ भी करने में समर्थ नहीं होते। ऐसा नहीं कि उनसे कुछ होता नहींलेकिन उनके होने का ढंग और गुण अलग है। वे उपकरण हो जाते हैं। उनसे बहुत कुछ होता है।
क्या हो जाता अगर नानक ठीक से गाय-भैंस को चरा कर भी लौट आतेबहुत से लोग लौट रहे हैं। क्या हो जाता दुनिया मेंक्या होता कि नानक एक दूकान ठीक से चला लेतेबहुत सी दूकानें ठीक से चल रही हैं। लेकिन कृत्य के जगत से हट कर यह व्यक्ति महिमा के जगत में डूब गया।
महिमा का अर्थ हैकरने वाला तू है। महिमा का अर्थ है कि मैं क्या कर सकूंगा। और जैसे ही तुम्हें यह लग जाता है कि मैं क्या कर सकूंगातुम्हारा अहंकार बूंद-बूंद खोने लगता है। जिस दिन तुम्हें परिपूर्णता से यह प्रतीति हो जाती है कि मैं असमर्थ हूंमेरे किए कुछ भी न होगामैं असहाय हूंउसी क्षण मोक्ष का द्वार खुल जाता है।
नानक कहते हैंकर्म से शरीर मिलता हैसंसार मिलता है। कृपा-दृष्टि से मोक्ष का द्वार प्राप्त होता है। नानक कहते हैं,इस प्रकार जानो कि सत्य हीपरमात्मा ही सब कुछ है।
'परमात्मा न तो स्थापित किया जा सकता है'--इसलिए मंदिर कैसे बनाओगे? 'न निर्मित किया जा सकता है'--इसलिए मूर्तियां कैसे गढ़ोगे? 'वह निरंजन आप में ही सब कुछ है।तुम्हें उसे बनाने की जरूरत नहीं है। तुम नहीं थे तब भी थातुम नहीं होओगे तब भी रहेगा। आदि सचु जुगादि सचु। तुम उसको बनाने की फिक्र छोड़ो। पूजामंदिरमूर्तिइनसे कुछ होने वाला नहीं है। फिर किससे होगा?
'जिन्होंने उसकी सेवा कीआराधना कीवे महिमा को प्राप्त हुए।'
अगर वही सब कुछ है तो सेवा ही प्रार्थना है। अगर वही सब कुछ है तो सेवा ही आराधना है। अगर वही सब कुछ है,उसका ही फैलाव हैतो तुम जितनी सेवा में रत हो जाओतुम उतने ही उसके निकट पहुंच गए। वृक्ष प्यासा हैपानी डाल दो। गाय भूखी हैघास रख दो। तुम उसी के सामने घास रख रहे हो और तुम उसी की जड़ों में पानी डाल रहे हो।
बड़ी संवेदनशीलता चाहिए प्रार्थना करने के लिए। छोटे-मोटे मंदिर से नहीं होगा। वे तो तरकीबें हैं प्रार्थना से बचने की। यह मंदिर बड़ा है और विराट सेवा की भावदशा चाहिए। क्योंकि वही है।
जीसस ने कहा है...जब जीसस को सूली लगने का वक्त आया तो उनके साथियों नेसंगियों ने पूछाअब हम क्या करेंगेजीसस ने कहातुम फिक्र मत करो। अगर तुम भूखे को पानी पिलाओगे तो मेरे कंठ में पानी पहुंचेगा। अगर तुम दीन की सेवा करोगे तो तुम मुझे वहां छिपा पाओगे। और जीसस ने कहा हैअगर तुम नाराज हो और किसी से तुमने अपशब्द कहे हैं और किसी पर तुम क्रोधित हुए होतो मंदिर आने में अभी कोई सार नहीं है। अगर तुम मंदिर में भी आ गए होतुमने घुटने भी टेक दिए और तुम्हें याद आता है कि तुम किसी के प्रति नाराज होतो उठोपहले उससे क्षमा मांग आओ। क्योंकि जब तक उसने क्षमा नहीं कर दिया हैतब तक प्रार्थना कैसे होगी?
चारों तरफ फैला है वही। इसलिए नानक कहते हैं, 'जिन्होंने उसकी सेवा कीआराधना कीवे महिमा को प्राप्त हुए।'
कैसी आराधनासेवा! सेवा शब्द महत्वपूर्ण है। वह जितने गहरे तुम्हारे भीतर उतर जाए उतना अच्छा। लेकिन एक बात ध्यान रखनी जरूरी हैवह फर्क की बात है। तुम जिसकी सेवा कर रहे हो वह परमात्मा हैयह धारणा उसमें महत्वपूर्ण है।
तुम ऐसे भी सेवा कर सकते हो कि दीन हैगरीब हैबेचारे की सेवा कर दो। जब तुम किसी बेचारे की सेवा करते हो तब तुम ऊपर होबिचारा नीचे है। तुम कृपा कर रहे होसेवा नहीं। फिर यह साधारण सामाजिक सेवा है। यह सेवा आराधना नहीं है। तुम एक सोशल वर्कर हो। लायन्स क्लब के मेंबर होकि रोटेरियन होकि वी सर्वसेवा हमारा लक्ष्य है। मगर तुम बड़ी अकड़ में हो। तुम एक छोटा अस्पताल बना देते हो तो तुम भारी प्रोपेगंडा मचाते हो। सामाजिक सेवा आराधना नहीं है। सामाजिक सेवा में तो तुम टुकड़े फेंक रहे हो भूखों के लिए। बड़ी दया कर रहे हो। एहसान कर रहे हो। तुम ऊपर होजिसकी तुमने सेवा की वह नीचे है। और उसे अनुगृहीत होना चाहिए। तब यह आराधना न रही।
सेवा तब आराधना बनती है जब तुम जिसकी सेवा कर रहे होवह परमात्मा है। वह साहब हैतुम दास हो। और अनुगृहीत वह नहीं हैतुम होकि उसने मौका दिया। तुमने एक गरीब को रोटी दी और धन्यवाद भी दो।
पुराना हिंदुओं का नियम है कि जब किसी ब्राह्मण को भिक्षा दोफिर दक्षिणा भी दो। यह दक्षिणा क्या हैउसने भिक्षा ग्रहण कीइसका धन्यवाद है। वह ग्रहण न करता तो तुम क्या करतेतो पहले भिक्षा दोफिर दक्षिणा दो। दक्षिणा का अर्थ है कि तुम्हारी बड़ी कृपा कि तुमने स्वीकार की मेरी सेवा। जिस दिन तुम अनुगृहीत अनुभव करोगे उसकेजिसकी तुमने सेवा की हैतब आराधना बन गयी। तब सेवा सामाजिक बात न रहीएक धार्मिक कृत्य हो गया।
इस फर्क को ठीक से समझ लेना। अगर तुम सेवा से अकड़ गए और सेवक हो गएतो यह नानक की आराधना न हुई। सेवा तुम्हें विनम्र करेगी। सेवा दीन को परमात्मा करेगीतुम्हें दास बनाएगी। जो बिलकुल पीछे खड़ा है वह प्रथम हो जाएगा और तुम पीछे खड़े हो जाओगे। और सेवा का अर्थ है कि जो भी तुम्हें सेवा का मौका देतुम उसके धन्यवादी हो।
'वह निरंजन आप ही सब कुछ है।'
थापिया न जाई कीता न होई। आपे आप निरंजन सोई।।
जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु।
'और जिन्होंने की सेवा उन्हें बड़ा मान मिलाबड़ी महिमा मिली।'
यह मान तुम्हारा अहंकार नहीं है। क्योंकि यह मान तो तभी मिलेगा जब तुम्हारा अहंकार मर जाएगा।
'तब वे बड़े प्रकाशित हुए।'
तब उनमें बुद्धत्व प्रकट हुआ। तब उनके घर का अंधेरा मिट गया और दिया जला।
जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु।
'नानक कहते हैं कि उस गुणनिधान का भजन करो। उसका ही भजन करोश्रवण करोउसका ही भाव मन में रखो। इस प्रकार दुख से छूट कर सुख घर ले जाओगे।'
उस गुणनिधान का भजनश्रवणउसका ही भाव। तुम जो भी करोउसे परमात्मा को समर्पित कर दोतभी यह हो पाएगा। दूकान पर बैठो और ग्राहक आएतो तुम ग्राहक को मत देखोउसको ही देखो। और ग्राहक के साथ वैसा ही व्यवहार करोजैसा परमात्मा आया होता तो तुम उससे व्यवहार करते। क्योंकि चौबीस घंटे अगर उसके भाव में डूबना हैतो इसके सिवाय कोई उपाय नहीं। भोजन करोतो वही भोजन से तुम में प्रवेश कर रहा है। इसलिए हिंदुओं ने कहाअन्नं ब्रह्मअन्न ब्रह्म है। तुम ऐसे ही भोजन मत करो। क्योंकि वही खिला है। वही अनाज बना है। तुम बड़े अनुग्रह भाव से उसे ग्रहण करो। और भोजन कोअन्न को जब तुम ब्रह्म मान लोगे--पानी पीओगे और वही पानी में आया है तुम्हारी प्यास को तृप्त करने को--तभी तो चौबीस घंटे उसका भजन होगा। नहीं तो कैसे होगा?
तुम जा कर गुरुद्वारा मेंमंदिर में घड़ी भर भजन कर आओगे। लेकिन जब तुम भजन कर रहे हो तब भी मन भागा-भागा है। तब भी तुम बीच-बीच में घड़ी देख लेते हो कि समय ज्यादा हुआ जा रहा है। दूकान खोलने का वक्त हुआ जा रहा है। तुम कैसे उसका भजन करोगेखंड-खंड भजन नहीं किया जा सकता कि सुबह कर लियाकि सांझ कर लियाऔर चौबीस घंटे साधारण हो गए।
धार्मिक होना चौबीस घंटे का कृत्य हैभाव है। इसे तुम कभी-कभी नहीं कर सकते। न कोई धार्मिक दिवस है और न कोई धार्मिक घड़ी है। समस्त जीवन उसी का है। सब क्षण उसी के हैं। तो तुम इस ढंग से जीयो--धर्म जीने की एक अलग शैली है--तुम इस ढंग से जीयो कि तुम जो भी करोवह किसी न किसी रूप में परमात्मा से संयुक्त हो जाए।
नानक कहते हैं, 'उस गुणनिधान का भजन करो। उसका ही भजनश्रवण उसका हीभाव उसका ही।'
तुम मुझे यहां सुन रहे हो। तुम ऐसे सुन सकते हो जैसे कोई बोलने वाला बोल रहा हैऔर तुम ऐसे भी सुन सकते हो कि परमात्मा की आवाज आ रही है। और तत्क्षण तुम्हारे जीवन में फर्क शुरू हो जाएगा। उसका ही भाव मन में रखो।
'इस प्रकार दुख से छूट कर सुख घर ले जाओगे।'
और तब चौबीस घंटे के बादमेहनत श्रम के बाद जब तुम घर लौटोगे तो दुख की जगह सुख ले जाओगे। अभी तुम दुख लाते हो। अभी ग्राहक तुम्हें लूट ले गया। किसी ने तुम्हारी जेब काट ली। अभी तुमने जो भी खाया वह ठीक न थाशिकायत रही। तुमने जो भी पहना सुंदर न थामजबूरी रही। अभी तुम दुख इकट्ठा करते हो। अगर तुम्हें परमात्मा सब तरफ दिखाई पड़ने लगे और तुम जो भी करो उस सब में उसकी झलक मिलने लगेतो नानक कहते हैंतुम सुख घर ले जाओगे।
और न केवल इस साधारण घर तुम सुख ले जाओगेमरने के वक्त जब असली घर जाने लगोगेतब तुम सुख ही सुख ले जाओगे। तुम आपूर जाओगे। तुम भरे-पूरे जाओगे। तब तुम रोते-रोते नहींनाचते-नाचते जाओगे।
और मृत्यु अगर नृत्य न बन जाए तो समझ लेना कि जीवन व्यर्थ गया। अगर मृत्यु एक आनंदउत्सव न बन जाए तो समझ लेना कि जीवन व्यर्थ गया। क्योंकि तुम घर लौट रहे हो। और घर जाते वक्त भी हृदय तुम्हारा आनंद से भरा हुआ नहीं हैतुमने जीवन में सिर्फ दुख ही दुख इकट्ठे किए हैं।
नानक गावीऐ गुणीनिधानु।
गावीऐ सुणीऐ मनि राखीऐ भाउ। दुख परहरि सुखु घर लै जाउ।।
'दुख से छूट कर तुम सुख घर ले जाओगे।'
अगर तुम दुखी हो तो सिर्फ इसीलिए कि तुम परमात्मा को छोड़ कर जिंदगी चला रहे हो। उसे तुमने बाद कर रखा है। तुम अपने को ज्यादा होशियार समझ रहे हो। तुम जरूरत से ज्यादा अपने पर भरोसा कर रहे हो। इसलिए दुखी हो। दुख का और कोई कारण नहीं है।
और सुख का भी और कोई कारण नहीं है। जिस दिन तुम अपनी अक्लमंदीअपनी होशियारी छोड़ दोगे और उसे देखने लगोगेऔर ज्यादा उसमें जीयोगे कम अपने मेंऔर धीरे-धीरे पूरे उसमें जीयोगेकम अपने में...।
क्या जरूरत है कि पत्नी में तुम पत्नी देखोक्यों न परमात्मा देखोक्या जरूरत है तुम अपने बेटे मेंबेटे को अपना देखोक्यों न परमात्मा का बेटा देखोजैसे ही दृष्टि बदलती हैवैसे ही सुख आना शुरू हो जाता है। कल अगर तुम्हारा बेटा मर जाएगा तो तुम दुखी होओगे। इसलिए नहीं कि बेटा मर गयाइसलिए कि तुम्हारी दृष्टि भ्रांत थी। तुम सोचते थेमेरा बेटा। अगर तुमने पहले से ही जाना होता कि परमात्मा का बेटातो तुम कहते कि जब उसकी मर्जी थी भेजाजब उसकी मर्जी हुई उठा लिया। उसका हुक्म। और तुम हर हालत में राजी रहोगे। क्योंकि उसका बेटा थाउसने भेजा। जितने दिन भेजाउतनी कृपा। शिकायत किससे करनी हैजब उठा लिया उसकी मर्जी। हमारा कुछ है ही नहीं। सब कुछ उसी का है। फिर तुम कैसे रोओगेकैसे चिंतित होओगेकैसे संताप करोगेदेतो तुम राजी रहोगे। ले लेतो तुम राजी रहोगे। क्योंकि उसके रास्ते अनूठे हैं। कभी वह तुम्हें देता है और देने के द्वारा तुम्हें निर्मित करता है। और कभी ले लेता है और लेने के द्वारा तुम्हारा विकास करता है। कभी जरूरत होती है कि तुम्हें दुख मिलेक्योंकि दुख तुम्हें चेताता हैहोश लाता है। सुख में तो तुम सो जाते होखो जाते हो। दुख में तुम जाग आते हो।
एक सूफी फकीर हुआ। हसन उसका नाम था। उसके शिष्य ने एक दिन पूछा कि सुख हैयह तो समझ में आता है,क्योंकि परमात्मा हैवह पिता हैवह सुख दे रहा है। लेकिन दुख क्योंदुख समझ में नहीं आता। हसन अपनी नाव में बैठा था और दूसरी पार जा रहा था। उसने शिष्य को भी नाव में बिठा लियाकुछ बोला नहीं। और एक ही चप्पू से उसने नाव चलानी शुरू कर दी। वह नाव गोल-गोल घूमने लगी। उस युवक ने कहाआपका दिमाग तो खराब नहीं हो गया हैअगर एक ही चप्पू से नाव चलायी तो हम यहीं भटकते रहेंगे। इसी किनारे पर गोल-गोल घूमते रहेंगे। दूसरा चप्पू खराब हैया आपका हाथ काम नहीं कर रहाया हाथ में दर्द है तो मैं चलाऊं! हसन ने कहातू तो समझदार है। मैं तो समझा कि नासमझ है। अगर सुख ही सुख होगानाव वर्तुल में घूमती रहेगी। कहीं पहुंचेगी नहीं। उसको साधने के लिए विपरीत चाहिए। दो चप्पुओं से नाव चलती है। दो पैर से आदमी चलता है। दो हाथ से जीवन चलता है। रात और दिन चाहिए। सुख और दुख चाहिए। जन्म और मृत्यु चाहिए। अन्यथा नाव घूमती रहेगीभंवर बन जाएगी। तुम कहीं पहुंचोगे ही नहीं।
जब कोई ठीक से देखना शुरू करता है कि सभी में वही हैतब तुम उसके दुख को भी अहोभाव से अंगीकार करते हो। तब तुम उसके सुख को भी अंगीकार करते होउसके दुख को भी। जब तुम दोनों को समान भाव से अंगीकार करते होतब न तो सुख सुख रह जाता हैन दुख दुख रह जाता है। उनकी भेद-रेखा खो जाती है। और जब तुम दोनों को समभाव से देखते हो,तुम्हारा लगाव सुख से ज्यादा और दुख का विरोध टूट जाता हैतुम तत्क्षण अलग हो जाते हो। तुम तीसरे हो जाते हो। तुम साक्षी भाव को उपलब्ध हो जाते हो। दुख से छूट कर तब तुम सुख घर ले जाओगे।
'गुरुवाणी ही नाद है और गुरुवाणी ही वेद है। वह परमात्मा गुरुवाणी में ही समाया हुआ है। गुरु शिवगुरु विष्णुगुरु ही ब्रह्मा है। जो भी मैं जानता हूंयदि मैं उसे पूरा भी जानता तो भी उसका वर्णन नहीं कर सकता हूं। क्योंकि वह कथन द्वारा नहीं कहा जा सकता। लेकिन एक गुर से सारी पहेली हल हो जाती है। और वह गुर है कि सभी प्राणियों का एक ही दाता है। उसे मैं न भूल जाऊं।'
इन्हें थोड़ा समझने की कोशिश करें। नानक ने गुरु को बड़ी महिमा दी है। सारे संतों ने गुरु को बड़ी महिमा दी है। शास्त्रों से ऊपर गुरु को रखा है। अगर गुरु कुछ कहे और वेद में न मिलेतो वेद छोड़ दो। क्योंकि गुरु की वाणी वेद है। अगर गुरु कुछ कहे और शास्त्र-संगत न होतो किसको छोड़ोगेशास्त्र को छोड़ दो। क्योंकि गुरु जीवित शास्त्र है। गुरु का इतना मूल्य संतों ने किसी कारण से दिया है।
कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं। पहली बातवेद भी गुरुओं के वचन हैं। लेकिन वे गुरु अब मौजूद नहीं हैं। और न ही वचन शुद्ध रह गया है। न वचन शुद्ध रह सकता है। क्योंकि संगृहीत करने वाले अपने विचारों को मिलाएंगे ही। वह उनकी मजबूरी है। वे जान कर मिलाते हैंऐसा भी नहीं है। वे मिलाएंगे ही। तुमसे अगर मैं कोई बात कहूं और कहूं कि तुम जा कर पड़ोसी को कह दोबीच में बात से कुछ गिर जाएगाकुछ जुड़ जाएगा। बात का ढंग बदल जाएगा। अगर तुम शब्द भी वही उपयोग करोशत प्रतिशत जो मैंने कहेतो भी टोनकहने का ढंगएम्फेसिस बदल जाएगी। फिर तुम जब बोलोगेतो तुम्हारा अनुभवतुम्हारा ज्ञानतुम्हारी समझ उन शब्दों में भर जाएगी।
मैं तुम्हें फूल दे दूं हाथ मेंतुम उस फूल को अपने हाथ में ले जाओ किसी को देनेलेकिन तुम्हारे शरीर की गंध भी वह फूल पकड़ लेगा। जैसे तुम्हारा हाथ फूल की गंध को पकड़ता हैवैसा फूल तुम्हारे शरीर की गंध को पकड़ेगा। वह फूल वही नहीं रह गया जो मैंने दिया था। और अगर हजारों हाथों से फूल गुजरातो हजार शरीरों की गंध पकड़ जाएगी। और अगर दुबारा वह फूल मेरे पास आए तो मैं भी पहचान न पाऊंगा कि यह वही फूल है जो मैंने दिया था। न तो इसमें अब वह गंध रह गयी होगी जो मैंने दी थी। क्योंकि वह खो गयी हजारों हाथों में लग-लग कर। और यह हजारों हाथों की दुर्गंध इकट्ठी कर लाएगा। न इसकी शक्ल वह रह जाएगी जो मैंने दी थी। वह टूट-फूट जाएगाइसकी पंखुरियां गिर जाएंगी। अधूरा फूल मेरे पास न लाया जाएइसलिए लोग दूसरी पंखुरियां इसमें जोड़ लाएंगेताकि फूल पूरा हो जाए।
वेद गुरु वचन हैं। जिन्होंने जाना उन्होंने कहा। लेकिन फिर हजारों-हजारों साल बीत गए। उसमें बहुत कुछ जुड़ गया,बहुत कुछ हट गया। इसलिए जीवित गुरु को खोज लेना परम सौभाग्य है। किताब तो बासी हो ही जाएगी।
फिर और बड़े मजे की बात है कि किताब को जब तुम पढ़ोगेतो तुम ही तो उसका अर्थ निकालोगे। अर्थ कौन निकालेगातुम ही पढ़ोगेतुम ही अर्थ निकालोगे। अर्थ तुम से तो ज्यादा नहीं हो पाएगा। तुम्हारी समझ से पार नहीं हो पाएगा। तुम अपने ही अर्थ को किताब पर आरोपित कर दोगे।
तो किताब तुम्हारी गुरु नहीं हुईतुम ही गुरु हो गए किताब के। शास्त्र को तुमने नहीं पढ़ातुम शास्त्र को ही पढ़ाने लगे। इसीलिए तो इतनी व्याख्याएं हैं। गीता की हजारों व्याख्याएं हैं। जो पढ़ता हैअपना अर्थ करता है। कृष्ण खड़े नहीं हैं बीच में कि रोकेंकि भाईयह मेरा अर्थ नहीं है। कृष्ण का तो एक ही अर्थ रहा होगा। हजारों अर्थ तो नहीं हो सकते। हजारों अर्थ अगर कृष्ण के थेतो अर्जुन पागल हो जाना चाहिए। कृष्ण का तो एक सुनिश्चित अर्थ रहा होगा। लेकिन कौन कहे वह अर्थ क्या थाअर्जुन भी नहीं कह सकता जिसने सुना था। क्योंकि वह भी जो कहेगावह भी बदल जाएगा।
और फिर यह पूरी की पूरी गीता संजय ने लिखी है। संजय यानी पी.टी.आईरियूटर रिपोर्टर। इसने बड़े दूर बैठ कर कहीं टेलीविजन से खबर पा कर कही है। वह भी अंधे धृतराष्ट्र को कही है--दूरी बढ़ती जाती है। क्या कृष्ण अर्जुन से कहते हैंअर्जुन भी ठीक-ठीक रिपोर्ट नहीं दे सकता। वह अपनी समझ के अनुसार देगा। जो उसे समझ में आया वह कहेगा। वह नहींजो कृष्ण ने कहा है। और यह भी खबर संजय इकट्ठी कर रहा है। संजय रिपोर्टर है। वह भी अंधे धृतराष्ट्र को कह रहा है। बहरे सुन रहे हैंअंधों से कह रहे हैं। फिर हजारों-हजारों साल बीत गए। फिर व्याख्याकार हैंवे व्याख्या कर रहे हैं। फिर एक-एक शब्द के अनेक अर्थ हो जाते हैं। फिर गीता में कोई अर्थ नहीं रह जाता। जो तुम डालो वही अर्थ है। फिर गीता पर तुम अपने को आरोपित करते हो।
इसलिए नानककबीरदादू सभी का आग्रह है--क्योंकि इनके समय तक आते-आते सारे प्राचीन शास्त्र बासे और उधार हो गए--इन सब ने एक बात पर जोर दिया है कि जीवित गुरु को खोज लो। उसकी वाणी ही वेद है। और तुम सामने-आमने बैठ कर सुनोगे तो भी बदलाहट तो हो ही जाएगीलेकिन कम से कम।
'गुरुवाणी ही नाद है। गुरुवाणी ही वेद है। वह परमात्मा गुरुवाणी में समाया हुआ है। गुरु शिवगुरु विष्णुगुरु ही ब्रह्मा,वही पार्वती है।'
गुरुमुखि नादं गुरुमुखि वेदं। गुरुमुखि रहिआ समाई।।
गुरु ईसरु गुरु गोरखु बरमा। गुरु पारबती माई।।
जे हउ जाणा आखा नाहीं। कहणा कथनु न जाई।।
जिन्होंने अपनी आंख से देखा है उस परमात्मा कोवे भी उसे ठीक से नहीं कह पाते। पूरा नहीं कह पाते। और तुम परमात्मा को किताब से खोज रहे होगीताबाइबिलगुरुग्रंथ--तुम परमात्मा को किताब से खोज रहे हो! जीवित गुरु भी उसे पूरा नहीं कह पाता। नानक खुद अपने संबंध में कहते हैं कि जो मैं जानता भी--पूरा-पूरा जानता--तो भी उसका वर्णन नहीं कर सकता। हूं। क्योंकि वह कथन द्वारा नहीं कहा जा सकता है।
जो कथन द्वारा नहीं कहा जा सकताउसे तुम कथा द्वारा समझ रहे हो! जो कथन द्वारा नहीं कहा जा सकताउसे तुम छपे हुए वचनों के द्वारा समझ रहे हो!
नहींउसकी खबर तो जीवित गुरु के पास ही मिलेगी। वह भी नहीं कि गुरु जो कहता है उससे तुम समझोगेबल्कि गुरु जो है उससे तुम समझोगे। गुरु की मौजूदगी समझाएगी। गुरु का होना समझाएगा। उसके साथ होनाउसकी हवाउसकी क्लाइमेट। गुरु के पास होना एक दूसरी हवा में होना है। कम से कम उतनी देर को संसार खो जाता है। कम से कम उतनी देर को तुम दूसरे लोक में होते हो। कम से कम उतनी देर को तुम्हारी चेतना किसी नए ढांचे में हो जाती है। गुरु की खिड़की से थोड़ी देर को तुम झांकने को राजी हो जाओउसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं है।
'जो मैं जानता भीतो उसका वर्णन मैं नहीं कर सकता था। क्योंकि वह कथन के द्वारा नहीं कहा जा सकता है।'
जे हउ जाणा आखा नाहीं। कहणा कथनु न जाई।।
'लेकिन एक गुर से सारी बात हल हो जाती है।'
गुर जो दे वही गुरु है। गुर का अर्थ है टेक्नीकगुर का अर्थ है विधिगुर का अर्थ है मैथड। और वह जिससे मिल जाए,वही गुरु। एक गुर से सारी बात हल हो जाती हैसारी उलझन हल हो जाती है। और वह गुरनानक कहते हैंयह है:
गुरा एक देहि बुझाई--
सभना जीआ का इकु दाता। सो मैं विसरि न जाई।।
सबका वही एक मालिक है। सबका वही एक निर्माता है। सबका वही एक स्रष्टा है। उसे मैं भूल न जाऊं। इस सत्य को मैं स्मरण रख सकूं कि सबमें वही छिपा है। सब हाथों का हाथ वही। सब आंखों की आंख वही। वही धड़कतावही जीवन है। इसे मैं भूल न जाऊं। प्रतिपल यह मुझे याद बनी रहे।
यह गुरयह सीक्रेट पकड़ जाए तो तुम धीरे-धीरे माला के मनकों से हट करमनकों के भीतर जो छिपा धागा हैउसको पकड़ लोगे। वही धागा परमात्मा है। तुम मनके हो। तुम्हारे भीतर जो जीवन की धारा बह रही हैजो जीवन का धागा हैवही परमात्मा है। वह धागा मुझमें भी वही हैतुममें भी वही है। वृक्ष मेंपशु-पक्षी मेंचट्टान-पहाड़ में भी वही है। वही जीता है अनेक रूपों में। वही लहराता है अनेक लहरों में। तो तुम उस धागे को भर न भूलो तो गुर हाथ में आ गया। और सब पहेलियां अपने आप हल हो जाएंगी।
क्या करोगेकैसे इस गुर को संभालोगेचौबीस घंटे संभालना है। बड़ी हिम्मत चाहिए। बड़ी अड़चन भी होगी। अगर अड़चन न होती होतीतो दुनिया कभी की धार्मिक हो गयी होती। अड़चन तो है ही और होनी भी चाहिए। क्योंकि बिना अड़चन कुछ मिल जाए तो व्यर्थ है। बिना यात्रा के तुम मंजिल पर पहुंच जाओतो तुम फिर भटक जाओगे। मुश्किल से जिसे तुम पाओगेउसी को तुम संभालोगे। मुफ्त तुम्हें जो मिल जाएतुम उसे संभाल भी न सकोगे। और फिर इतने विराट सत्य को पाने चले हो तो दांव पर कुछ गंवाना भी होगा।
धर्म एक तरफ से गंवाना है और एक तरफ से पाना है। इसलिए अड़चन है। अगर ग्राहक में तुम परमात्मा को देखोगे तो लूट कैसे सकोगे उसेजरा मुश्किल हो जाएगा। अगर तुम जेब काटते हो और उसमें परमात्मा को देखोगे तो हाथ ठहर जाएंगे। बुरा कैसे कर सकोगेअगर तुम्हें वही दिखाई पड़ने लगा तो कैसे किसी को अभिशाप दे सकोगेकैसे किसी को गाली दे सकोगे,अगर वही दिखने लगाकैसे होओगे नाराजकैसे बांधोगे दुश्मनीकिससे बांधोगे दुश्मनी?
अगर वही हैतो तुम थोड़ी मुश्किल में पड़ोगे। तुम्हारे जीवन का ढांचा जगह-जगह से गिरने लगेगा। तुमने जो मकान बनाया हैवह उसके विपरीत है। तुमने उसको भूल कर मकान बनाया है। तुम उसे याद करोगे तो तुम्हारा यह मकान तो नहीं टिक सकता।
हांएक बात पक्की है कि तुम्हें बहुत बड़ा मकान मिलेगा। लेकिन वह तुम्हें आज दिखाई भी नहीं पड़ सकता। इसीलिए तो जुआरी चाहिएहिम्मत के लोग चाहिएकि हाथ में जो है उसे छोड़ देंउसे पाने को जिसका अभी पक्का भरोसा नहीं है। इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि व्यवसायियों का काम नहीं है धर्मजुआरियों का काम है। जुआरी दांव पर लगा देता है इस आशा में कि दोहरा हो कर मिलेगा। मिलेगा कि नहींकुछ पक्का नहीं है। पासे कैसे पड़ेंगेकोई भी नहीं जानता है। हिम्मत चाहिए जुआरी कीनानक के साथ चलना हो तो।
इसलिए तो सारे धर्म विकृत हो जाते हैं। क्योंकि हमारे पास जुआरी की हिम्मत नहींव्यवसायी का गणित है। और तब इस सूत्र को याद रखना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि यह सूत्र तुम्हारी जिंदगी को आमूल बदल देगा। तुम यही न रह जाओगे। एक छोटा सा सूत्र और तुम्हारी पूरी जिंदगी में आग लग जाएगी। यह जिंदगी न रह जाएगी।
कबीर कहते हैंजो घर बारै आपना चलै हमारे संग। जो तैयार हो अपने घर में आग लगा देने कोवह हमारे साथ चले।
वह कौन सा घर हैवह घर जो तुमने बना रखा है आसपास अपने--झूठ काबेईमानी काक्रोध कावैमनस्य काद्वेष काघृणा का--वह पूरा का पूरा तुम्हारा घर है।
अगर तुम इस एक सूत्र को पकड़ लोनानक कहते हैं:
गुरा एक देहि बुझाई--
सभना जीआ का इकु दाता। सो मैं विसरि न जाई।।
बसउसका विस्मरण न होकि सबके भीतर एकसबका मालिक एकसबका साहब एक। तुम्हारी जिंदगी बदल गयी। कुछ और चाहिए नहीं। न तुम्हें करने की जरूरत है पतंजलि के योगासनन तुम्हें चिंता करने की जरूरत है यहूदियों के टेन कमांडमेंट्सदस आज्ञाएं। न तुम फिक्र करो गीता क्या कहती हैकुरान क्या कहता है। एक छोटा सा गुर। तुम्हारी सारी जिंदगी बदल जाए। इस छोटे से गुर से नानक ने पायातुम भी पा सकते हो।
लेकिन ध्यान रखनाजो घर बारै आपना चलै हमारे संग।

आज इतना ही।

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