बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-28

अनिवार्य संतति-नियमन

प्रश्न: आप तीसरी बार यहां आए हैं। आपकी दो बातों का हम पर असर रहा--एक तो आप बुद्धिनिष्ठा की हिमायत करते हैं और दूसरी विचारनिष्ठा की बात करते हैं आप। गुरु को मानने के लिए आप मना करते हैं।

मैं तो इतना कह रहा हूं कि जो खबरें मेरे बाबत पहुंचाई जाती हैंवे इतनी तोड़ते-मरोड़ते हैंइतनी बिगड़ कर पहुंचाई जाती हैं--जब आप मुझे कहते हैं तो मुझे हैरानी हो जाती है। वह जो पत्रकारों से नारगोल में बात हुई थीउनसे सिर्फ मजाक में मैंने कहाउनसे सिर्फ मजाक में मैंने यह कहा कि जिसको तुम लोकतंत्र कह रहे होइस लोकतंत्र से तो बेहतर हो कि पचास साल के लिए कोई तानाशाह बैठ जाए। यह सिर्फ मजाक में कहा। और उनकी बेवकूफी की सीमा नहीं हैजिसको उन्होंने कहा कि मैं पचास साल के लिए देश में तानाशाही चाहता हूं। मैं जो कह रहा हूंउनमें से ही किसी ने कहा कि आज जो बातें कहते हैंइससे तो आपको कोई गोली मार दे तो क्या हो?मैंने तो सिर्फ मजाक में कहा कि बहुत अच्छा हो जाएगाफिर गांधी से मेरा मुकाबला हो जाए। उन सबने छाप दिया कि मैं गांधी से मुकाबला करना चाहता हूं।



तो इन सबके लिए क्या किया जाएह्यूमर को समझने की क्षमता भी हमारी खोती चली जा रही है। मजाक भी नहीं है। मजाक भी नहीं समझ सकते! और फिर आप सब लोग हैंजो उनकी खबर पर खंडन-मंडन भी शुरू कर देते हैं! मेरा कहना यह है कि जो लोकतंत्र आर्थिक रूप से समानता नहीं लातावह सिर्फ धोखे का लोकतंत्र हैवह लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र सिर्फ राजनीतिक समानता की बात करे तो वह लोकतंत्र धोखे का है। क्योंकि राजनीतिक समानता अंततः आर्थिक समानता पर निर्भर होती है। और अगर आर्थिक असमानता है तो राजनीतिक समानता का कोई मतलब नहीं होता है। वह जिनके पास अर्थ हैउन्हीं के लिए मतलब होता है। बाकी कोई अर्थ नहीं होता।
वहां तो मैं यह कहा था कि अगर सच्चा लोकतंत्र लाना है देश में--अगर सच में ही डेमोक्रेसी पैदा करनी है तो यह जो थोथी डेमोक्रेसी जिसको तुम समझे जा रहे हो डेमोक्रेसीयह डेमोक्रेसी काम नहीं करेगी। आर्थिक समानता लाए बिना कोई डेमोक्रेसी खड़ी नहीं हो सकती। और आर्थिक समानता लाने के लिए अगर तुम सिर्फ डेमोक्रेटिक बातें करते चले जाते हो तो ये डेमोक्रेसी की बातें आर्थिक समानता लाने में बाधा बनती मालूम पड़ती हैं। वहां जो मैंने कहाकुल इतना कहा कि यह जो सारी दुनिया में डेमोक्रेसी की जितनी बात चलती है--डेमोक्रेसी सोशलिस्टिक भी हो सकती है और कैपिटलिस्टिक भी हो सकती है।

प्रश्न: आपका जो स्टेटमेंट हैवह आप डिनाई नहीं करेंगे?

नहीं-नहींडिनाई का तो कोई सवाल ही नहीं है।

प्रश्न: कम्युनिज्म है तो...?

नहींयह जरूरी नहीं है क्योंकि कम्युनिज्म की क्या परिभाषा करूंगायह मुझ पर निर्भर है। कोई महापुरुष ठेका नहीं ले लिया है कम्युनिज्म की परिभाषा का। यह तो सवाल ही नहीं है कि कम्युनिज्म मैंने कह दिया तो कोई ठेका है माक्र्स का। यह सवाल नहीं है।

संतति नियमन को आप कंपल्सरी मानते हैं?

बिलकुल कंपल्सरी मानता हूं। मेरी बात समझ लें थोड़ा सा--मैं कंपल्सरी मानता हूंइसका मतलब यह नहीं है कि मैं कंपल्सरी कर दूंगा। कंपल्सरी का मतलब कुल इतना है कि मैं आपके विचार को अपील करता हूं कि कंपल्सरी हो जाने जैसी चीज है। और अगर मुल्क की मेजारिटी तय करती है तो कंपल्सरी होगा। कंपल्सरी का मतलब कोई माइनारिटी थोड़े ही मुल्क के ऊपर तय कर देगी! लेकिन मेरा कहना यह है कि अगर एक आदमी भी इनकार करता है मुल्क मेंतो भी कंपल्सरी है वह। अगर हिंदुस्तान के चालीस करोड़ लोगों में से एक आदमी भी कहता है कि मैं संतति नियमन मानने को तैयार नहीं हूं और चालीस करोड़ लोग कहते हैं कि मानना पड़ेगा तो भी कंपल्सरी है।
आप अभी कंपल्सरी एजुकेशन दे रहे हैं बच्चों कोऔर यह नहीं कहते कि यह तानाशाही हो गईकि हम कहते हैं कि हर बच्चे को शिक्षा लेनी पड़ेगीहम किसी बच्चे को अशिक्षित नहीं छोड़ेंगे। और मान लेंदस बच्चे के मां-बाप यह कहते हैं कि हम अपने बच्चे को अशिक्षित रखना चाहते हैंतो यह तो डेमोक्रेसी की हत्या हो गई। क्योंकि हम अपने बच्चे को शिक्षा नहीं देना चाहते और आप डेमोक्रेसी की बात करते हैंआप कहते हैं कंपल्सरी एजुकेशन! अगर कंपल्सरी एजुकेशन हो सकता है और डेमोक्रेसी में कोई हर्जा नहीं होता तो कंपल्सरी बर्थ-कंट्रोल क्यों नहीं हो सकता हैसवाल लोकमानस को तैयार करने का है।
मैं यह नहीं कहता हूं कि मैं कह रहा हूं इसलिए कंपल्सरी हो जाए। मैं यह कहता हूंमुझे यह बात कंपल्सरी होने जैसी लगती है। जैसी कि कंपल्सरी एजुकेशनमुझे लगती है कि कंपल्सरी एजुकेशन होनी चाहिए। किसी बाप को यह हक नहीं हो सकता कि किसी बच्चे को अशिक्षित रखने का दावा करे। और करेगा तो मुल्क इसकी फिकर कि यह नहीं चलेगा।
आप मेरी बात नहीं समझ पा रहे हैं--अगर एक आदमी इस गांव में हैजा के कीटाणु फैलाए और हम कहें कि कंपल्सरी रुकावट रहेगी इस बात की कि कोई आदमी बीमारी के कीटाणु नहीं फैला सकतातो आप कहेंगे कि डेमोक्रेसी की हत्या हो गई! एक आदमी कहे कि हम चोरी करेंगे--कंपल्सरी चोरी बंद है मुल्क में। हत्या करना कंपल्सरी बंद है। हत्या करना कोई आपकी इच्छा पर निर्भर नहीं है कि आपका जब दिल होगा तो हत्या करेंगेनहीं होगा तो नहीं करेंगे। तो अगर मैं यह कहूं कि हत्या करना कंपल्सरी बंद होना चाहिए...।

डेमोक्रेटिक तरीके से ही ऐसा होना चाहिए।

मेरा तो सारा डेमोक्रेटिक तरीका है। मेरे पास तो बंदूक तलवार नहीं हैआपको समझा सकता हूंइसके अलावा क्या कर सकता हूं! मजा यह है कि शब्दों के साथ हमारे प्राण इस तरह जुड़े हुए हैं कि शब्द से कि बेनीवलेंट डिक्टेटरशिप कहने का मतलब होता है कि डिक्टेटरशिप गई! और कम्युनिज्म के साथ गांठ जोड़ने का मतलब होता है कि कम्युनिज्म गया! आप इसको थोड़ा समझने की कोशिश करें। आपकी कोई भी हुकूमतकिसी भी तरह की हुकूमत अंततः डिक्टेटरशिप है। क्योंकि अंततः वह कंपल्सरी हैनिश्चित है। हांस्टेट है जहां तकवहां तक डिक्टेटरशिप है। उसमें कोई एक्शन रहेगा। स्टेट एज सच डिक्टेटर है। स्टेट तो किसी भी तरह की हो वह डिक्टेटर है। अब सवाल यह है इस जगह कि बेनीवलेंट होइतना हम कर सकते हैं स्टेट के होते हुए। नहीं तो पूरी स्टेट जानी चाहिए। ठीक डेमोक्रेसी का मतलब हो होगा नो-स्टेट। और इसलिए जब तक स्टेट हैतब तक स्टेट बेनीवलेंट डिक्टेटरशिप है। वह किस मात्रा में बेनीवलेंट हैयह सवाल है। यानी इसमें मात्रा में भेद होंगे कि एक बिलकुल डिक्टोरियल हैकोई बेनीवलेंट नहीं है वहां। एक बहुत बेनीवलेंट हैडिक्टेटोरियल नहीं है वहां।

प्रश्न: परिभाषा बदल जाती हैआप वही बातें करते हैं?

मैं नहीं बदलता।

प्रश्न: कम्युनिज्म का तो मैं अपनी दृष्टि से अर्थ करता हूंजैसा आप करते हैंलेकिन लोग तो माक्र्सवाद जो है उसे ही मानते हैं?

थोड़ा समझिएलोगों की समझ...कम्युनिज्म के पच्चीस रूप हैं कम से कम। साइमन का भी कम्युनिज्म हैपूरिए का भी है,लेनिन का भी हैमाक्र्स का भी हैबर्नार्ड शा का भी है। सारी दुनिया में पच्चीस रूप हैं। और मेरा भी कम्युनिज्म हो सकता है और आपका भी हो सकता है। कम्युनिज्म को कोई ठेका नहीं है किसी का। मैं चाहता हूंस्पष्ट करना होक्वेश्चनिंग पैदा हो,एंक्वायरी होमुझसे जवाब मांगे जाएंमैं जवाब देने को तैयार हूं। मैं तोमेरा पूरा काम है कि पहले प्रश्न पैदा कर जाता हूं,फिर जवाब देने आना पड़ता है।

प्रश्न: तो गांधी और विनोबा जो कहते हैंउसको आप पूंजीवाद क्यों कहते हैं?

मैं उसको पूंजीवाद कहूंगाक्योंकि मैं जिसे कम्युनिज्म कहता हूंअगर वह उसके विपरीत पड़ता है तो उसको पूंजीवाद कहूंगा। वह गांधी विनोबा का कम्युनिज्म होगाइससे मुझे क्या लेना-देना! मेरा कम्युनिज्म आपको पूंजीवाद मालूम पड़ सकता हैइसमें क्या फिकर की बात है! यह तो हमारे विचार करने की बात हुई। मैं क्या कह रहा हूंवह उसको क्या नाम देते हैंइससे बहुत फर्क नहीं पड़ता। नाम देने से कुछ फर्क नहीं पड़ता।

प्रश्न: आप अपना नाम लेते हैंइससे फर्क पैदा होता है। आप का यह खयाल है कि समाज कैसा होना चाहिए। और कम्युनिज्म का एक खयाल आया है चलता हुआ--माक्र्स से लेकर स्टैलिन तक आया हैमाओ तक आया है। तो अभी जब हम यही शब्द इस्तेमाल करते हैं तो...।

शब्द का तो भोगीलाल भाई ऐसा मामला है कि शब्द हम हमेशा बासे उपयोग करते हैं। ईश्वर शब्द का भी उपयोग करिए तो हजार लोग उपयोग कर चुके हैं। हजार तरह से उपयोग कर सकते हैं। और हजार तरह से उपयोग किया गया है। और आज जब आप उसका उपयोग करिएगातो उसके पीछे हजारों डेफिनिशंस खड़ी होंगी। आप एक भी शब्द का ऐसा उपयोग नहीं कर सकते जो कि हजार तरह से उपयोग नहीं किया जा चुका है।

प्रश्न: आप जब कोई दूसरी चीज आगे रखना चाहते हैं तो आपको यह स्पष्ट करना चाहिए कि दूसरे लोगों के दिमाग में पहले यह तय हो जाए कि यह जो पुरानी चीज हैयह बासी नहीं है।

मैं वही कर रहा हूं। मेरे साथ कठिनाई तो यह है नकि मेरे पास न तो कोई स्टाफ है कि जो सारा हिसाब-किताब रखता हो फिलहालअभी मैं जो बोलता हूं उसे। अकेला आदमी हूंजो बोलता हूं उस पर क्वेश्चनिंग खड़ी होती हैतो डिफाइन करता हूं। डेफिनिशन पर क्वेश्चनिंग खड़ी होती है तो उस पर डिफाइन करता हूं। चलेगादो-चारदस साल बातचीत करने के बाद साफ हो सकेगा आपको कि मैं क्या कह रहा हूं।

प्रश्न: मैं पहले भी एकाध दफे सुना आपको। आज और कल भी मैंने सुना। मुझे यह खयाल आया कि आप जो अनिष्ट है समाज मेंजो ढोंग चल रहा हैजो ऊपर-ऊपर चल रहा हैउस पर आप आग्रह करते हैंयह ठीक है। फिर भी क्या होता है कि आप जब एक ही चीज रखते हैं--जैसे आप आज आखिर में कहे कि कल मैं दूसरी बात बताऊंगा। लेकिन कल तो आप क्या बताएंगे,यह मैं नहीं जानता। लेकिन कल और आज आपको सुना तो मेरे मन में जो सवाल पैदा हुआ वह यह हुआ कि आप एक बात करें कि सत्य हैप्रेम हैब्रह्मचर्य हैउनका बहुत रूप हो सकता है। एक ब्रह्म का भी हो सकता है। एक सत्य का भी हो सकता है। लेकिन आपका तो बोलने का तरीका है और सुनने जो आ जाते हैं और ताली बजाते हैंवे तो बिलकुल ताली बजाते हैं। वे यह नहीं पकड़ते कि आप क्या चाहते हैं। आप जब प्रकाश डालते हैं तो वे खुश हो जाते हैं और जो व्याख्या आपकी चलती है,वह करीब-करीब इस तरीके से होती है जैसे कि आप पूरे-पूरे सत्य कोअहिंसा कोब्रह्मचर्य को आप इनकार कर रहे हैं। और आखिर में लोगों को यह लगता है कि यह तो बड़ा क्रांतिकारी आया है। इस तरह के एक इंप्रेशन पैदा होता है।

आप अपनी बात करिए। कौन सोच कर आता हैनहीं आता हैयह आप हिसाब मत लगाइए। कौन झूठी ताली बजा रहा है,कौन खुश होकर बजा रहा है यह आप हिसाब मत लगाइए। यह हिसाब लगाना मुश्किल है। वह तो बिलकुल मुश्किल है कि कौन आदमी क्या कर रहा है।

प्रश्न: कल जो आपने कहा कि बाहर का जो रहता हैवह हम बताने के लिए करते हैं। और जो अंदर की बात हैअंदर क्या है,वह छिपा कर मत रखोजिसकी आप बात कर रहे हैं। तो जो भक्त हो गए हैंजो ऋषि हो गएधर्मात्मा हो गए हैं। सब एक समान नहीं होंगे। कोई क्रोधी होगाऔर कोई नहीं भी क्रोधी होगा। और कोई ऐसे होंगेजो सचमुच अपने जीवन को परिवर्तन करने के लिए कोशिश कर रहे हैं। तो यह दोनों की जो शुभ-अशुभ दृष्टि हैइसको हम कहें कि आसुरी और दैवीय चलती है तो प्रकृतिवह दोनों चलती है। आज आप देखते हैं और मैं देखता हूं और बहुत लोग देखते हैं कि आसुरी ज्यादाअशुभ ज्यादा है। प्रहार करते हैंलेकिन दूसरी चीज जो हैवह सच है।

यह हमेशा से ज्यादा हैआज ज्यादा नहीं हो गई है। और आज शायद कम है। सतयुग-वतयुग कभी रहा नहीं है। और जिन ऋषियों-मुनियों की आप बहुत बातें करते हैंउनमें सौ में निन्यानबे प्रतिशत सरासर धोखा है। मेरा मतलब यह है कि ऋषि-मुनि का भी ढांचा तैयार हैऔर ढांचे में जो फिट हो जाता हैवह ऋषि-मुनि हो जाता है। और कोई ऋषि जैन के ढांचे में ऋषि मालूम पड़ेगा। और वही हिंदू के ढांचे का ऋषि जैन के ढांचे में ऋषि नहीं मालूम नहीं पड़ेगा। कृष्ण को जैन नरक भेज देते हैं कि यह आदमी हिंसा करवाता हैमहायुद्ध करवाता हैमहाभारत करवाता है। और हिंदू उसको भगवानपरम अवतार मानते हैं। मेरा मतलब समझ रहे हैं आपमेरा कहने का मतलब यह है कि किसको आप ऋषि कहते हैंकिसको आप मुनि कहते हैंयह आपकी परिभाषा की बातें हैं। इनमें कोई बहुत सार नहीं है। इनमें कोई बहुत अर्थ नहीं है।
मेरा जोर इस बात पर है कि अब तक ऋषि-मुनि को भी तौलने का आपका ढंग बाहर से है। और सच तो यह है कि भीतर से तो तौला नहीं जा सकता। इसलिए मेरी दृष्टि यह है कि जो ऋषि-मुनि तुल जाते हैं आपकी परिभाषाओं मेंवे अक्सर इसलिए तुल जाते हैं कि वे नहीं हैं। अगर आज वे हों तो आपकी तौल में आना बहुत मुश्किल है। मेरा कहता यह है कि हमारी जो सोसाइटी हैजो पूरी की पूरी धारा है हमारी तौलने कीहमारे तो क्राइटेरियन बंधे हुए हैं और क्राइटेरियन में जो बैठ जाता हैसो ऋषि हो जाता है हमारे लिए।
और मेरी समझ अपनी यह है कि जो भी क्राइटेरियन में आपके बैठने को राजी होता है। आपके क्राइटेरियन में बैठने के लिए जो राजी होता है या आपके क्राइटेरियन में बैठने की चेष्टा करता हैउस आदमी के पास आथेंटिक व्यक्तित्व ही नहीं है। नहीं तो आपके क्राइटेरियन में बैठेगा नहीं वह। और अगर बैठेगा भी तो मरने के बाद हजार दो हजार साल लग जाएंगेतब आपके क्राइटेरियन में बैठेगाजब तक कि आप उसके योग्य क्राइटेरियन खड़ा न कर लेंगे। जीसस अगर जिंदा है तो ऋषि मालूम नहीं पड़ेगाआवारा मालूम पड़ेगा जिंदा में तो। सुकरात जिंदा में आवारा और अपराधी मालूम पड़ेगा और लगेगा कि चरित्र बिगाड़ रहा हैलोगों को खराब कर रहा है। मरने के बाद ऋषि-मुनि बन पाएगा।

प्रश्न: मरने के बाद समझ में आया।

समझ में नहीं आया। समझ में आ जाता तो दुनिया आज तक सुकरात हो गई होती। समझ में नहीं आया। समझ में कुछ नहीं आया। मरे हुए आदमी पर ढांचा बिठालने में आपको सुविधा है। क्या समझ गए आप सुकरात कोसमाज क्या समझ गयामैं तो यह कह रहा हूं कि सुकरात अभी भी पैदा हो तो वही अड़चन आप खड़ी करेंगे जो उस दिन खड़ी की थी। जरा भी फर्क नहीं पड़ेगा। मैं आपसे यह पूछता हूं कि सुकरात--समझ लीजिए आपउदाहरण के लिए कहता हूं--सुकरात अभी खड़ा हो जाए तो सोसाइटी एग्जेक्ट वही अड़चन खड़ी करेगीजो उस दिन खड़ी की थी। इसमें जरा भी फर्क नहीं पड़ेगा।
इसको जरा समझिए। दंभी होता तो आपको सूली लगाने की जरूरत न पड़ती। आप तो ऋषि-मुनि मान कर पूजा शुरू कर देते दंभी होता तो। जिस दिन से आपने पूजा शुरू की हैउस दिन से जीसस की आपने दूसरी शक्ल बना लीजो कभी थी नहीं। उस शक्ल को तो आप सूली ही लगाते हैं। जिस शक्ल को आप पूज रहे हैंवह बिलकुल झूठी है और आपकी खड़ी की हुई है। मेरा मतलब आप समझे न! मैं यह कह रहा हूं कि जीसस जैसा आदमी थाउसकी तो कभी आपने पूजा की नहीं। और जीसस अभी खड़ा हो जाए तो वह जीसस का तो तगमा लगाए घूम रहा हैवह भी उसकी पूजा करने अभी भी राजी नहीं है।
सारा का सारा एस्टेब्लिशमेंट पाजिटिव के केंद्र पर खड़ा होता है। सारा इंस्टीट्यूशनआर्गनाइजेशनसंस्थासंप्रदाय पाजिटिव पर खड़ा होता है। मेरी अपनी दृष्टि यह है कि आदमी में जो क्रांति आती हैवह पाजिटिव से कभी नहीं आतीवह हमेशा वाया निगेटिव से आती है। पाजिटिव शेष रह जाता हैपाजिटिव में परिवर्तन नहीं होता है। वह तो जो गलत हैउसको हम काट डालते हैं। जो नहीं कट सकता हैवह शेष रह जाता है। जैसे हमने सोने को डाल दिया आग में तो जो कचरा है वह जल जाता हैजो नहीं जलता है वह सोना हैवह बच जाता है।
मेरी बातचीत में क्या तकलीफ होती है कि जब भी मैं खंडन कर रहा हूं तो आखिर शब्दों का ही उपयोग तो करूंगा! और हम सबके माइंड पाजिटिव के साथ इस बुरी तरह से बंधे हैं कि फौरन पाजिटिव को निकाल लेते हैंनिगेटिव की फिकर छोड़ देते हैं। पाजिटिव को फौरन निकाल लेते हैं। एकदम हमारा माइंड जो है नमाइंड की आम वघकग जो हैवह पाजिटिव के लिए है और मेरा कहना यह है कि वही माइंड ऊपर जाता हैजिसकी वघकग निगेटिव हो जाती है। पाजिटिव जो हैवह तो जो रिमेनिंग है,वह पाजिटिव है। आपको जो जरूरत हैवह जरूरत है कि आप कितने माइंड को निगेटिव बना सकते हैं। माइंड का कितना निगेशन आप कर सकते हैं ताकि वही रह जाएदैट कैन नाट बी निगेटिवदैट इज़ पाजिटिव। दैट विच कैन नाट बी निगेटिव।
और फर्क क्या हैहम समझते हैं पाजिटिव निगेटिव का विपरीत है। निगेटिव पाजिटिव नहीं है। पाजिटिव जो हैवह निगेशन का विपरीत नहीं हैनाट निगेशन ऑफ द निगेटिव। पाजिटिव का वह मतलब नहीं होता है। पाजिटिव का मतलब हैदैट व्हिच रिमेन आफटर द निगेटिव। वह विपरीत नहीं है। मेरा मतलब समझे न! लेकिन जो निगेटिव हो जाएगा तो जो शेष रह जाएगा वह पाजिटिव है। इसलिए दो रास्ते हैं। उस शेष का अंदाजा बिलकुल मिलता है--अंदाजा बिलकुल मिलता है। वह पाजिटिव इशारा नहीं कर सकते। नानावह सब निगेटिव इशारा करेंगे। वह कहेंगे, "नाट दिसनाट दैटऔर तब तो शेष रह जाएगाउस इशारे में आप चलेंगे न साथ। तो शेष रह जाएगा कुछ। उस शेष की तरफ आपको ही इशारा होगा। वह इशारा कोई नहीं करेगा। क्योंकि जैसे हमने इशारा कियावह फाल्स हुआ। हमारा मन कहता है कि इशारा कोई जल्दी से शुरू कर दे। निगेटिव बात मत करो।

प्रश्न: दो एक्सट्रीम हैं--एक स्कूल में रीडिंग करते हैं एजुकेशन में। एक-एक चीज बताते हैं बच्चे को कि यह करो यह न करो। और दूसरी एक्सट्रीम यह रहती है कि बच्चे को छोड़ देते हैं कि उसको कुछ करना हैकुछ ऊपर लाना हैकुछ सिखाना हैवह मां-बाप नहीं करते। दो एक्सट्रीम रहते हैं। आप तीसरी एक्सट्रीम पर पहुंच गए।

नहींमैं एक्सट्रीम की बातें नहीं कर रहा हूं। मैं तो यह कह रहा हूं...मैं एक्सट्रीम की बात नहीं कर रहा। मैं यह नहीं कह रहा कि मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। मैं तो बहुत कर रहा हूं। लेकिन जो भी कर रहा हूंवह समझने की बात है। मैं आपकी बात नहीं कर रहा। मैं यह कह रहा हूं कि सत्य की तरफउसकी तरफ जितने भी इशारे निगेटिव हैंइशारे कभी पाजिटिव नहीं हो सकते हैं। वह कभी हो ही नहीं सकते पाजिटिव।
आज तक जगत में जिसने भी उस तरफ कोई भी श्रम किया हैवे सब निगेटिव हैं--चाहे उपनिषद का होचाहे बुद्ध का हो,चाहे लाओत्से का होचाहे झेन फकीरों का होशून्य से आगे नहीं जातावह जा ही नहीं सकता। वह आपको नथिंगनेस तक ले जाकर छोड़ा जा सकता है। उसके बादउस तक आपको यात्रा करनी पड़ेगी। वह एक्झिस्टेंस से आती होगीइससे मुझे मतलब नहीं है। वहां नहीं आएगीअगर नागार्जुन के साथ चलने की हिम्मत है तो नहीं आएगी। नागार्जुन के साथ चलने की तो बड़ी हिम्मत चाहिएक्योंकि वह तो खंडन ही खंडन करता चला जाएगा। यानी आखिर में आप उससे पूछोगेआप खंडन तो कर रहे होतो वह कहेगा कि मैं खंडन ही नहीं कर रहा हूं। वह एक आखिरी खंडन यह करेगामैं हूं भी नहीं। आप उससे कहोआपसे इतना तो कहा कि शून्य हैवह कहेगा मैं नहीं कहता। मैंने यह भी नहीं कहा।
लाओत्से से जिंदगी भर कुछ भी नहीं लिखा। फिर बूढ़ा हो गया अस्सी साल का तो चीन छोड़ कर भाग रहा था। उसको पकड़ लिया एक पोस्ट पर। और चीन के राजा ने खबर भेजी कि लाओत्से जा रहा है चीन छोड़ करतो वह हमारा सब ज्ञान लिए जा रहा हैजो उसने पाया है। उसे वापस रखवा लो। तो लाओत्से ने किताब लिखी। इस किताब की भूमिका में जो शब्द लिखे हैंवे बहुत ही अदभुत हैं। दुनिया की किसी भूमिका में नहीं है। लाओत्से ने लिखा है कि मैं मजबूरी में लिख रहा हूं और यह पहले कह देना चाहता हूं कि जो भी कहा जा सकता हैवह सत्य नहीं हो सकता। जो भी लिखा जा सकता हैवह सत्य नहीं हो सकता। तुमने लिखा की असत्य हुआतुमने कहा कि असत्य हुआ। अब तुम मुझे मजबूर कर रहे होअब मैं लिखता हूं। लेकिन इसको समझ कर किताब को पढ़ता। जो भी कहा जा सकता हैवह सत्य नहीं हो सकता। वह कह रहा हैअब जो तुम पढ़ो इस समझ कर पढ़ना।

प्रश्न: यह तो यूक्युलिट की व्याख्या हैं?

यूक्युलिट की व्याख्या का सवाल नहीं है यहां। यूक्युलिट का मामला नहीं है यह बिलकुल। बिलकुल उलटा मामला है। यूक्युलिट तो परिभाषाएं कर रहा है उनकीजिनकी परिभाषाएं नहीं हो सकती हैं। और यहां तो मामला यह है कि उनकी बात की जा रही हैजिनकी परिभाषा कभी हुई नहीं और कभी हो भी नहीं सकती। और उनकी बात करना जरूरी हैजिनकी बात नहीं नहीं की जा सकती। तो फिर रास्ता क्या हैतो रास्ता तो सिर्फ यह है कि जिनकी बात की जा सकती हैउनको कहा जाए कि यह नहीं हैयह नहीं है। और अल्टीमेटली उसे जगह ले जाया जाएजहां माइंड की सारी क्लिंगिंग छूट जाती हैक्योंकि एक-एक चीज हम छीनते चले जाते हैं वहांकि यह भी नहीं है। छीनते चले जाते हैं। आखिर छीनना उस जगह पहुंच जाता है कि हाथ में कुछ भी नहीं बच जाता। फिर छोड़ देते हैं उस आदमी को कि यह है। और अब अगर यह आदमी इतने निगेशन में चलने की हिम्मत रखता हो तो जरूर वहां पहुंच जाता हैजहां है। नहीं तो नहीं पहुंच पाता।
और हमारी जो सारी ट्रेनिंग हैइफिकल माइंडपाजिटिववह कहता है कि ब्रह्मचर्य की साधना बताइए। मैं कहता हूं सेक्स नहीं हैवहां ब्रह्मचर्य है। लेकिन ब्रह्मचर्य की कोई सीधी परिभाषा आपने बताई कि आदमी उसे साधना शुरू करता है। और साधना का कुल परिणाम होता है कि वह सेक्स को दबाना शुरू करता है। सेक्स को समझिए और सेक्स को निगेट करने की स्थिति तक माइंड को ले जाइए। और जहां सेक्स निगेट हो जाएगावहां जो शेष रह जाएगावह ब्रह्मचर्य है। और उसकी कोई बात नहीं की जा सकती। मैं निरंतर सारी चेष्टा कर रहा हूंकिसी कैंप में आप थोड़ा वक्त निकालिए।

प्रश्न: गांधी के अंदर जो सत्व हैउनके अंदर जो सत्य हैवह जो चीज है वह तो रहती है?

इसको आप पूरा सुन लें। मैंने यह नहीं कहा कि ब्रह्मचर्य नहीं साधा जा सकता। मैंने कहा ब्रह्मचर्य साधा जा सकता है। लेकिन ब्रह्मचर्य की साधना करने वाले अगर संतति-नियमन के विरोध की बातें करते हैंतो नासमझी की बात करते हैं। मैंने जो कहा,उसको आपने समझ लिया न पूराअगर मैं यह कहूं कि अंतदृष्टि साधी जा सकती हैतो अंतदृष्टि साध लीफिर संतति-नियमन की कोई जरूरत नहीं। तो फिर मैं झंझट की बातें कर रहा हूं। फिर मुझसे पूछा जा सकता है कि कितने लोग अंतदृष्टि साध कर ब्रह्मचर्य को उपलब्ध होंगेऔर ये बच्चे पैदा होते जाएंगेइनका जिम्मा कौन लेगालेकिन मैं यह कह नहीं रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि जिनको अंतदृष्टि साधनी होवे साधेंसाधी जा सकती है। जिनको ब्रह्मचर्य साधना हैसाधेंवह भी साधा जा सकता हैवह भी सत्य है। लेकिन मैं कह रहा हूं कि इसके इंप्लीकेशन में आप संतति-नियमन के रोक की बातें मत करिएयह बिलकुल ही एब्सर्ड बात है। इसका इंप्लीकेशन भी नहीं हो सकता। संतति-नियमन का अलग प्रयोजन और अर्थ है और बृहत्तर समूह के लिए वही सार्थक और अर्थपूर्ण है। और गांधीजी की बातचीत या इस तरह की ब्रह्मचर्य की कोई बातचीत वहां लागू करना समाज को गङ्ढे में ले जाना और खतरे में ले जाना है। कोई मना नहीं करताब्रह्मचर्य आप साधिए। यह सवाल नहीं है। जो मैं कह रहा हूंवह यह नहीं कह रहा कि ब्रह्मचर्य नहीं साधा जा सकताऔर यह मैं नहीं कह रहा कि हजारों साल में किसी ने भी ब्रह्मचर्य नहीं साधा। मैं कह यह रहा हूं कि यह ब्रह्मचर्य की साधना संतति को रोकने के लिए सार्थक अभी पांच हजार साल में नहीं हो सकीपचास हजार साल में भी नहीं हो सकती। संतति रोकनी हो तो संतति-नियमन का ही उपयोग करना पड़ेगा। ब्रह्मचर्य से यह होने वाला नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि ब्रह्मचर्य नहीं साधा जा सकतालेकिन मेरा कहना यह है कि ब्रह्मचर्य की साधना के आधार पर संतति-नियमन की बातें हल नहीं हो सकतीं।

प्रश्न: उनको जो सच्चा लगता है और उनके अंदर का जो सत्य हैवह तो ठीक है ही।

वह हो तभी न!

प्रश्न: आप अपनी मान्यता कह रहे हैं।

मैं अपनी ही मान्यता कहूंगाउनकी मान्यता तो नहीं बोलूंगा। मैं तो अपनी ही मान्यता बोलूंगा। जहां हैसत्य है,। जहां है,उसकी तो मैं बात ही कर रहा हूं। और जहां वह नहीं दिखाई पड़ रहा हैवहां भी इसलिए बात कर रहा हूं कि वहां आपको दिखाई पड़ जाए कि वहां नहीं हैतो आप खोज सकेंजहां वह है।

प्रश्न: हमारे मन में इतने प्रश्न नहीं उठते।

आपको प्रश्न उठ रहे हैं मेरी बात के कारण ही या आप कुछ बात पकड़े बैठी हैंउसके कारणमेरे पास ही थोड़े आती हैंमेरे पास दूसरे लोग भी आते हैंजिनके मन में यह प्रश्न नहीं उठता। तो मैं जानता हूं। एक जगह मैं बोलता हूं तो आप ही नहीं आई हैं मुझसे मिलनेबच्चू भाई भी मिलने बैठे हुए हैंडाक्टर भी मिलने बैठे हुए हैंलेकिन आप जो प्रश्न लेकर आई हैंवह डाक्टर प्रश्न लेकर नहीं आते। उसका मतलब हैप्रश्न मेरे बोलने से नहीं उठता हैआपकी पकड़ से उठता है। डाक्टर का दूसरा उठता हैआपका तीसरा उठता है। मैं तो एक ही बात बोलता हूंलेकिन तीन आदमी तीन प्रश्न लेकर आए हैं। वह आपकी पकड़ से आते हैं। उलझन जो आती हैवह आपकी पकड़ से आ रही है। और आपकी कोई पकड़ न हो तो कोई उलझन नहीं है। और आपकी कोई पकड़ न हो तो समझना एकदम आसान और सीधा है। हो सकता है मेरी बात गलत हो तो वह भी समझना आसान पड़ेगा। उलझन नहीं पैदा होगी। अगर मेरी बात गलत है और आपकी कोई पकड़ नहीं है तो आपको इतना साफ दिखाई पड़ जाएगा कि यह बात गलत है! उलझन फिर पैदा नहीं होगीबात खतम हो जाएगी।

प्रश्न: जो कुछ भी पढ़ा हैसोचा है दिमाग से उसका पिंड है। वह पिंड अगल-अलग हैइसलिए अगल-अलग रिएक्शन करता है। लेकिन उस पिंड से जांचा जाता है कि यह ठीक है कि नहीं।

उस पिंड से अगर आप जांचते हैं तो आप कभी नहीं जांच पाते हैं। इसको थोड़ा समझ लीजिए। पिंड है। समझने के दो रास्ते हैं। एक तो वाया पिंड। पिंड का क्या मतलब होता हैसामाजिक नहींआपके ऊपर जितने भी संस्कार हैंआपके माइंड पर जितने भी संस्कार हैंसब कंडीशनिंग हैं। यह जो आविर्भाव हैइससे आविर्भाव नहीं होता हैइससे आविर्भाव ढंकता है। यह तो सारा झगड़ा है। इसको थोड़ा समझ लें कि वह जो हमारी कंडीशनिंग हैवह हमने सुना हैपढ़ा हैसोचा हैसमझा हैवह हमारे दिमाग की कंडीशनिंग है। अब अगर मेरी बात आप सुन रहे हैं तो दो तरह से सुन सकते हैं। वैक्यूम तो आप नहीं होते हैंमैं जानता हूं। वह तो अल्टीमेट बात है कि वैक्यूम हो जाएं तो मुझे सुनने आने की जरूरत नहीं है।

प्रश्न: और आपको कहने की भी जरूरत नहीं है।

नहींमुझे कहने की जरूरत हो सकती है। वह दूसरी बात है। मुझे कहने की जरूरत हो सकती हैनहीं तो बुद्ध कोमहावीर को,किसी को कहने की कोई जरूरत नहीं है। अभी वैक्यूम को समझ लीजिए थोड़ा। यह जो कंडीशनिंग हैइसको दो तरह से आप सुन सकते हैं। एक तो रास्ता यह है कि कंडीशनिंग मेरे बोलते वक्तआपके सुनते वक्तबीच में होकंडीशनिंग एक कोने में,मेमोरी में पड़ी हो और आप स्ट्रेट और इमीजिएटसीधा कांटेक्ट कर रहे हो तो समझना आसान होगा। वैक्यूम का अभी तो इतना ही मतलब हो सकता है अभीकि कंडीशनिंग जो हैवह बीच में बैरियर की तरह खड़ी हैलेकिन वह खड़ी होती है आमतौर से। बहुत कठिन है उसको भी एक तरह हटानाक्योंकि अगर मैंने गांधीजी के लिए कुछ भी कहा तो आप उसको ऐसा नहीं सुन रहे हैंजैसा मैं क्राइस्ट के संबंध में कुछ कहूंगा तो सुनेंगे।
अगर मैं महावीर के संबंध में कुछ कह रहा हूं तो जैन वैसे नहीं सुनता हैजैसा कि अजैन सुन लेता है। अजैन के लिए कोई कंडीशन नहीं है। वह चुपचाप देखता है कि ठीक है महावीर के लिए कुछ कहते हैंसुनता है वह। यह उसकी डायरेक्ट लिसनिंग हो जाती है। जैन तो बेचैन हो गया है कि महावीर के लिएमेरे भगवान के लिए! अब यह मामला महावीर का नहीं रहायह इसका भी हो गया। अब यह बीच में खड़ा हो गया। यह जो बीच में खड़ा हो जाना हैयह तो नब्बे प्रतिशत कंफ्यूजन तो यह पैदा करता है। फिर हम कुछ जो नहीं कहा गया हैवह भी सुन लेते हैं। कुछ जो नहीं कहा गया हैवह अर्थ भी निकाल लेते हैं और वह हमें इतना सही मालूम पड़ता है कि हमने सुना। और हमें कल्पना में भी नहीं हो सकता कि यह नहीं कहा गया है और यह नहीं सुना गया। कुछ छूट जाता हैकुछ जुड़ जाता हैयह सब पैदा होता है। इस माइंड को मैं कहता हूं कि यह माइंड लिसनिंग नहीं करता है। यह नुकसान पहुंचाता है और इससे नुकसान की सारी ताकत पैदा होती है। यह तो मेमोरी है हमारीवह मेमोरी में होनी चाहिए। वह रहेगीवह जाएगी नहीं। लेकिन जब मैं सुन रहा हूंजब भी मैं सुन रहा हूंतब वह बीच-बीच में खड़ी नहीं हो जानी चाहिए--एक बात। और वह जो आप कहते हैं नवैक्यूम जो हैएक घटना आपको कहूंउससे खयाल में आ जाए।
फकीर था मुसलमान फरीद। वह गया यात्रा पर। कबीर के एक गांव के पास से निकला मगहर से। तो फरीद के साथ कोई सौ लोग थे। उन्होंने कहा कि कबीर का आश्रम आता हैअगर यहां रुक जाएं और कबीर से थोड़ी आपकी बातचीत होगी तो हमें बड़ा आनंद होगा कि क्या बात होती है। फरीद ने कहा कि रुक तो जरूर जाएंगेलेकिन बात होनी मुश्किल है। उधर कबीर के भी मित्रों को भी पता चला आश्रम के कि फरीद गुजरने वाला है। तो आप रोक लें फरीद को। फरीद को साथ बड़ा आनंद आ जाएगा,दो दिन चर्चा हो जाएगी। कबीर ने कहाचर्चा होनी मुश्किल है। रोक लोतो जरूर रोक लो। बैठेंगेहंसेंगेचर्चा बहुत मुश्किल है। चर्चा क्यों होगी मुझसेउन्होंने कहा कि वह तो फरीद आएगा तो समझ में आ जाएगा।
फरीद आयाकबीर लेने गएगले मिले वे आकर बैठे वहांवे गले मिलेदो दिन रहे साथ। चलते वक्त आंसू बह गए दोनों के,लेकिन बात नहीं हुई। शिष्य सब घबड़ा गए। दो दिन में बोर्डम हो गईयह क्या पागलपन हो गया। बैठे हैं बैठेऔर उन दोनों की वजह से दूसरे भी न बोल पाए कि वे क्या सोचेंगे।
जैसी ही छूटे तो फरीद से मित्रों ने पूछा कि क्या पागलपन किया कि तुम चुप ही रह गएबोले नहींफरीद ने कहा जो बोलता,वह नासमझ सिद्ध हो जाता। मैं बोलता तो मैं बुद्धू हो जाता। क्योंकि वह आदमी शून्य हो गया है। तो कबीर क्यों नहीं बोला?तो फरीद ने कहा कि कबीर जानता है कि मैं शून्य हो गया हूं। दो शून्य क्या बोल सकते हैं! बोलने को कुछ भी नहीं बचता। और फरीद से मित्र पूछने लगे कि हमसे तो आप बोलते हैं। हमसे तो आप बोलते हैं! फरीद ने कहाजरूर बोलता हूंक्योंकि तुम शून्य नहीं हो। और तुम तभी तक सुन रहे होजब तक तुम शून्य नहीं हो। जिस दिन तुम शून्य हो जाओगेन तुम सुनोगे।
तो शून्य खड़े हों तो बोलनासुनना बंद हो जाएगालेकिन एक शून्य का बोलना चल सकता है। एक शून्य का बोलना चल सकता है। वह एक अंतर्व्यथा है उसकी। जो उसे दिखाई पड़ गया हैजो उसने जान लिया हैजो उसे हो गया हैउसकी सारी तड़प है कि वह कैसे हो जाए किसी को। उसकी सारी तड़प में वह कई दफा आपको बहुत ज्यादा बुजदिल मालूम पड़ेगा। उसकी सारी तड़प में कई दफा ऐसा लगेगा कि हमारी बहुत मान्यताओं को तोड़ दिया हैहमारे दिल को दुख पहुंचा दिया हैहमें चोट कर दी है। पर उसकी पीड़ा को तुम नहीं समझ सकते हो कि वह जान ही रहा है कि जितनी तुम्हारी पकड़ टूट जाएजितना तुम खाली हाथ हो जाओ उतनी ही वह घटना घट जाएवह हैपनिंग हो जाएजिसकी कि चिंता है।
यह बिलकुल ठीक है कि हम एकदम शून्य होकर नहीं सुन सकते हैंलेकिन हम करीब-करीब शून्य होकर सुन सकते हैं। और करीब-करीब शून्य होने का मतलब यह है कि कोई बीच में नहीं होना चाहिए। वह जो आप कहती हैंबिलकुल ठीक कहती हैं। मेरी बात से बहुत सी चिंताबहुत सा विचारबहुत से प्रश्न खड़े हो जाते हैं। जरूर मेरी बात कुछ ऐसी हैजिससे ऐसा होगा। लेकिन वह उतना ही नहीं है कारणउससे भी ज्यादा कारण यह है कि हमारी सबके मन की अपनी पकड़ पर कहीं भी भेद पड़ता हैचोट पड़ती है तो स्वाभाविक है कि खड़ा हो जाए। और मैं चाहता हूं कि खड़ा हो जाए। मैं चाहता भी हूं कि खड़ा हो जाए,क्योंकि खड़ा हो जाए तो डायलाग शुरू होता है। तो हम सोचते हैंविचार करते हैंबात करते हैं। आज नहींकल लड़ेंगेझगड़ेंगे,कुछ होगालेकिन उससे कुछ रास्ता बनेगा। अगर कुछ रास्ता उससे बनता है। और अगर लड़ने-झगड़नेसोचने-विचारने के बाद अगर हम थोड़ी भी ज्यादा अंडरस्टैंडिंग में छूटते हैं--जरूरी नहीं है कि मेरी बात सही हो जाएलेकिन मेरा मानना यह है कि प्रोसेस से गुजरने पर अंडरस्टैंडिंग बढ़ती है। चाहे मेरी बात गलत सिद्ध होचाहे सही सिद्ध होइससे फर्क नहीं पड़ता है। हरिवल्लभ और मैं दो घंटे बातचीत करूं और लड़ भी लें बातचीत मेंतो हम दो आदमी दो घंटे के बाद ज्यादा समझदार लौटते हैं। मेरा मतलब यह है कि अगर उस प्रोसेस से गुजरने की थोड़ी भी इच्छा हो तो हम उससे समझदार लौटते हैं।
और ऐसा हो गया है कि हिंदुस्तान में भोगीलाल जीकि डायलाग जैसी चीज ही नहीं रह गई। इसलिए ऐसी हैरानी मालूम पड़ती है कि डायलाग तो नहीं हैज्यादा से ज्यादा गाली-गलौज फौरन हो जाएगी। डायलाग वगैरह नहीं हो पाता। यानी ऐसा संभव ही नहीं रह गया है कि हम बैठेंहम चर्चा करेंमुल्क में हवा चले बात करने कीगांव-गांव में अड्डे होंजहां लोग जिंदगी के बड़े मसलों पर कुछ बात करते होंलड़ते-झगड़ते होंपक्ष-विपक्ष करते होंवह सब खतम हो गया। और ऐसी पिटी-पिटाई हालत हो गई कि जो हमने पकड़ लिया वह दोहराए चले जाते हैंरोज-रोज उसको! न उसको कोई इनकार करता है। यानी मुझे तो कई दफे ऐसा लगता है कि आप बिलकुल ठीक कह रहे हैंलेकिन मुझे लगता है कि यह ठीक कहा हुआ कहीं सिर्फ पकड़े हुए तो नहीं हैंअगर पकड़ा हुआ है तो बकवास में गिर जाएगा और नहीं पकड़ा हुआ है तो टिक जाएगाहर्जा क्या हैमुझे तो लगता यह है कि इस वक्त एक-एक चीज पर हमला कर देने जैसी हालत है।

प्रश्न: आप जिस तरह से अपनी बात रखते हैंउसमें ओवरफ्लो पड़ते हैं। जो चीज इतनी कांप्लीकेटेड है उसकोजो कथानक,एनक्डोट होते हैंवह इतना देते हैंऔर इस तरह से देते हैं कि उसका एक दूसरा ही रूप प्रकट होता है और जो सीमित चीज है,उसे समझने के लिए लोगों को अंतर ढूंढना पड़ेगा।

आप ऐसा सोचते हैं भोगीलाल जीलेकिन मेरी समझ यह है कि जो एनक्डोट मैं कहता हूंउसको आप सिंपल भी समझ सकते हैं और बहुत कांप्लेक्स भी। जो भी एनक्डोट या जो भी छोटी कहानी कहता हूंवह तो आएंगे। एनक्डोट जो हैवह इतना कहता है--एक-दो मिनट का एनक्डोटजितनी दो घंटे की बात नहीं कहती हैऔर दो घंटे कोई फिलासफी की ट्रिटाइज नहीं कह सकती। और यह भी आपका खयाल ठीक नहीं है कि उसकी गंभीरता कम करता है। वह तो आदमी गंभीर है तो उसकी गंभीरता बढ़ाता है और आदमी गंभीर नहीं है तो उसकी गंभीरता कम करता है। यानी मेरा कहना यह है कि वह तो अगर आदमी गंभीर है तो एक एनक्डोट पर सोचने के लिए घंटों लगा दे। और अगर आदमी गंभीर नहीं है तो आप उसको गीता के वचन सुनाइए तो वह समझेगा फिल्मी गाने गा रहा है। यह सवाल नहीं है। वह तो आदमी के ऊपर निर्भर है। मैं तो कहता हूं कि सत्य इतना कठिन है कि...इसलिए किस तरह अधिकतम लोगों के लिए सोचना संभव हो जाएवह मेरी दृष्टि है। और मेरी दृष्टि यह भी रहती है कि जो अंतिम है वहांउसके लिए खयाल में आ सकेजो प्रथम है उसके लिए नहीं। वह जो पच्चीस लोग बैठे हैंउसमें जो अंतिम हैउसके भी खयाल में आ सके। वह भी बिलकुल खाली हाथ वहां से नहीं जाना चाहिए। फिर तो प्रथम के खयाल के लिए तो बहुत किताबें हैंआप उनको पढ़िए। और मेरी यह दृष्टि है कि दुनिया में अब तक जितनी भी कठिन से कठिन बात कही गई हैवह सरल से सरल कहानियों में कही गई है। चाहे जीसस नेचाहे बुद्ध नेचाहे कृष्ण ने कही हो।

प्रश्न: आपके कहने की जो पद्धति हैजो कथा हैउस पद्धति का यह दोष मालूम होता है। उसमें गंभीरता नहीं रहती हैमैं यह कह रहा हूं।

मैं तो गंभीरता चाहता नहीं। गंभीरता की मुझे इच्छा भी नहीं है। गंभीरता मैं चाहता नहीं। गंभीरता मैं रोग मानता हूंवह रोते हुए आदमियों का लक्षण है। वह चाहता भी नहीं। मेरी तो समझ यह है कि कितना सरल और कितना सहज आदमी के हृदय में प्रवेश करता है किसी द्वार से...।

प्रश्न: क्या गांधीजी को आप पूंजीवाद मानते हैं?

नहींगांधी को मैं पूंजीवादी नहीं मानतालेकिन गांधीजी की पूरी चिंतना की विधि पूंजीवाद की समर्थक है। गांधी को पूंजीवादी नहीं मानता। और गांधी पूंजीवादी चित्त से हैं भी नहीं। उनका भाव भी नहीं है पूंजीवादी होने का। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। गांधी के जीवन की विधिगांधी के सोचने का ढंग पूंजीवादी हैबुर्जुवा है।

प्रश्न: तो फर्क क्या है?

फर्क बहुत है। गांधीजी कांशस नहीं हैं इस बात के लिएइसलिए गांधी की नीयत को मैं कभी दोष नहीं देता। मैं एक बात कह सकता हूंजिसमें मेरी कोई नियत किसी को नुकसान पहुंचाने की नहींऔर नुकसान पहुंच सकता है। आपको नुकसान पहुंचाने की मेरी कोई नीयत नहीं हैआपको फायदा ही पहुंचाने की मेरी नीयत हैऔर नुकसान आपको पहुंच सकता है। मेरा कहना है कि गांधी की नीयत के बाबत कोई शक करने का सवाल नहीं उठता। लेकिन गांधी को ठीक नीयत भी जो कर रही हैवह पूंजीवाद की समर्थक है।

प्रश्न: तीस साल पहले जो कम्युनिस्ट कह रहे थेवह आप कह रहे हैं?

मुझे पता नहीं कम्युनिस्ट क्या कहते थे कबकब नहीं कहते थेमुझे पता नहीं। वह तो आप बदल गए होंगे तो दुनिया बदल गई लगती होगी।

प्रश्न: सुबह आपने कहा था कि गांधी पूंजीवादी थे। वह तीस करोड़ से एक सौ तीस करोड़ वाली बात आपने कही थी...।

मैंने यह नहीं कहामैंने यह कहा कि गांधी के सत्संग से फायदा मिला उसको। गांधी को फायदा नहीं मिल गया। वह तो कठिनाई नहीं है। वह तो दूसरे वक्तव्य ऐसे रखे जा सकते हैंजैसा आप रख रहे हैं। उत्तरप्रदेश के जमींदारों की कमेटी उनसे मिली और उन्होंने उनसे कहा कि तुम्हारे ऊपर अन्याय होगाअगर जमींदारी छीन ली तुमसे। मैं लडूंगा तुम्हारे लिए। गांधी की जिंदगी में तो इतने कंट्राडिक्ट्री। वक्तव्य हैं कि कुछ भी सिद्ध कर सकते हैंइसलिए किताब नहीं लाना चाहिएउनमें कोई मतलब नहीं है। यह झगड़ा नहीं है मेराक्योंकि आपको पक्का होगा कि आप सही ढंग से समझ गए हैं तो बात अलग है। यह झगड़ा नहीं है मेरा।

प्रश्न: वह जो गांधी नहीं थेवह आप बता रहे थे?

मैं तो अभी भी वही कह रहा हूंबता नहीं रहा था। लेकिन गांधी का व्यक्तित्वगांधी की चर्यागांधी का पूरा चालीस साल का जो कुछ हिसाब हैगांधी का आंदोलनवह सब पूंजीवाद के समर्थन में गया है। यह दूसरी बात है। यह आप नतीजा निकाल रहे हैंयह मैं नहीं कहता। आप उनकी नीयत पर भी शक कर रहे हैं। आप नीयत पर भी शक कर रहे हैंमैं नीयत पर शक नहीं कर रहा हूं। यह आपका नतीजा हैमेरा नहीं। यह भोगीलाल भाई नहीं निकाल रहे हैंयह आप निकाल रहे हैं। ये दोनों बातें एक नहीं हैं। यही कठिनाई हो रही है। लोग समझते हैं कि मैं कुछ गांधी को कह दिया हूं। मैं क्यों कहूंगा?

प्रश्न: गांधी को तोड़ने के लिए कुछ बोलते थे?

मैं तो सभी को तोड़ने के लिए कहता हूं।
मगर यह कौन तय करेगा कि गांधी क्या कहते हैं। आप तय करेंगी कि मैं तय करूंगायह तो बच्चों जैसी बातें कर रही हैं आप। यह इसलिए बच्चों जैसी बात कर रही हैं--भोगीलाल भाई बैठे हैंउसको समझ सकते हैंयह कौन तय करेगा कि गांधी क्या कहते थे! यह आप तय करेंगी कि मैं तय करूंगामेरे लिए मैं ही तय करूंगा।
हां तर्क रहेगाभोगीलाल भाईऔर इसमें विवाद रहेगा। इसमें कोई तय नहीं कर सकता। आज भी मजा यह है कि बुद्ध क्या कहते थे यह बुद्ध के छह संप्रदाय उन्हें तय करते हैं।
ये दलीलें इतनी नासमझी की भरी हुई हैं। एक और एक अनिवार्य रूप से दो नहीं होते। यह आपको पता नहीं गणित। कितने लोगों को पता नहीं! एक और एक अनिवार्य रूप से दो नहीं होते। और एक और एक सिर्फ इसलिए दो होते हैं कि उन्होंने दो के डिजिट बना रखे हैं। दस डिजिट बना लेंनहीं होंगेपांच डिजिट बना लेंनहीं होंगे। उसी तरह सारी बातें हैं। एक चीज ऐसी नहीं होती है।

प्रश्न: आप कह रहे हैं कि आप नहीं पकड़ेंगेक्योंकि आपने कुछ पकड़ा हुआ है।

वही कोशिश चलती है। कोई छोड़ता भी हैकोई नहीं छोड़ता है। कोई जल्दी छोड़ता हैकोई लंबे छोड़ता है। अब उसका हिसाब भी नहीं रखना पड़ता है कि कौन छोड़ता हैकौन नहीं छोड़ता है।

प्रश्न: सब लोग पंडित हैंऐसा आप मानते हैं। फिर डायलाग कैसे होगा?

पंडित हैं ही। मामला क्या हैबहुत मुश्किल से हम कोशिश में होते हैं कि दूसरा क्या हैइसे समझें। अंदरूनी कोशिश यह होती है कि क्या हम हैंयह दूसरे को समझाएं। डायलाग तो हमेशा ही चल सकता है और चलता हैलेकिन वह हमारी कोशिश होती है बहुत दूसरी। वह अगर समझने की होतब तो बहुत आसान हो जाए। समझाने की होतब बहुत मुश्किल हो जाती है।

प्रश्न: गांधीजी ने कहा था कि मैं जमींदारों की तरफ से लडूंगा और सत्याग्रह करूंगा। उसी गांधी ने सन पैंतालीस में आगाखां पैलेस से निकलने के बाद यह कहा कि मैं मानता हूं कि अब जमींदारों को कंपंशेसन न दिया जाएऔर जमींदारी खतम की जाए!

इसमें उनके विचारों का विकास हुआ है?
ऐसा मामला है कि गांधी को अगर हम पूरा उठा कर देखने चलें तो ऐसा मुझे मालूम पड़ता है कि गांधी में कोई गहरा व्यक्तित्व विकसित हो रहा हैयह भी मुझे नहीं दिखाई पड़ता। गांधी में मुझे बहुत व्यक्तित्व दिखाई पड़ते हैं। गांधी में मुझे एक व्यक्तित्व दिखाई नहीं पड़ता। मुझे मल्टी साइकिक मालूम पड़ते हैं और कई धाराएं उनमें विकसित हो रही हैंऔर कई मामलों में वे पीछे भी गिरते हैंआगे भी बढ़ते हैं। बहुत सा मामला है। यह जो बहुत सा मामला हैइसको जितनी समझदारी से हम समझने की कोशिश करेंउस कोशिश में गांधी की पूजा और निंदा का कोई सवाल नहीं है। सवाल कुल इतना है कि गांधी के व्यक्तित्व का अगर हम आधार बना कर समझने की कोशिश करेंतो मुल्क को आने वाले व्यक्तित्व को बनाने के लिए कुछ रास्ते निकल सकते हैं।
लेकिन दो तरह की बातें हैं। या तो कोई आदमी गांधी को गाली देने की दृष्टि में पड़ जाता हैतब बहुत मुश्किल हो जाता है। और या तो फिर पूजा करने कीतब भी बहुत मुश्किल हो जाता है। और अगर कोई आदमी दोनों के बीच मेंजिसको कहें क्रिटिकल थिंकिंग कर रहा होतो दोनों तरह के आदमी उसको धक्के देकर कहते हैं कि तुम किसी कोने पर खड़े हो जाओ। जैसा कि आप कहते हैं मुझसे कि या तो आप यह भी कहो कि गांधी की नीयत गलत हैतो हमें समझ में आती है बात। वह दूसरा जो आदमी आता हैवह मुझसे कहता है कि तुम अगर कहते हो कि उनकी नीयत गलत हैतो हमें समझ में आती है बात। वह दूसरा जो आदमी आता हैवह मुझसे कहता है कि तुम अगर कहते हो कि उनकी नीयत ठीक हैतो यह भी कहो कि उनका विचार भी ठीक है!
मेरी तकलीफ यह है कि न मैं पक्ष में हूं किसी के और न किसी विपक्ष में हूं। मुझे पक्ष-विपक्ष का अर्थ ही मालूम नहीं पड़ता। मुझे तो मालूम पड़ता है कि गांधी जैसा महत्वपूर्ण आदमीउसको सोचा जाना चाहिए। कंपलैक्स हैं बहुत और इसलिए बहुत पहलू हैं और बहुत पहलुओं पर सोचने की जरूरत हैकोई जिद्द की जरूरत नहीं है। यह जितना हम समझें--लेकिन समझने में क्या तकलीफ होती हैपक्ष वाला चाहता है कि समझो तो पूजा की बात करो। विपक्ष वाला आदमी चाहता है कि समझो तो विरोध की बात करो। मैं दोनों बात नहीं करना चाहताइसलिए मैं दोनों के साथ दिक्कत में हूं।
इधर मेरी जो कठिनाई हो गई है--नास्तिक मेरे पास आता है तो वह समझता हैयह आदमी आस्तिक है। आस्तिक आता है तो वह समझता है कि यह आदमी नास्तिकता की बातें करता है। और मुझे न कोई आस्तिक से प्रयोजन है और न कोई नास्तिक से कोई प्रयोजन है। कम्युनिस्ट मेरे पास आता है तो वह समझता है कि एंटी कम्युनिस्ट बातें करता हूं। गांधीवादी आता है तो वह समझता है कि मैं एंटी गांधीवादी बातें करता हूं। और मेरी हालत यह हो गई है कि चूंकि मैं प्रत्येक पर विचार करने का आग्रह करना चाहता हूं। और विचार का मतलब यह होता है कि वहां आलोचना शुरू होती है। अगर आप गांधीवादी होकर मेरे पास आए हैं तो मुझसे आपकी जो बात होगीउसमें गांधी की आलोचना शुरू हो जाएगी। अगर आप माक्र्सवादी होकर आए हैं तो माक्र्स की आलोचना हो जाएगी। वह माक्र्सवादी यह खयाल लेकर जाएगा कि मैं माक्र्स का दुश्मन हूं। वह गांधीवादी यह खयाल लेकर जाएगा कि मैं गांधी का दुश्मन हूं मुझे किसी की दुश्मनी से कुछ लेना-देना नहीं है। तो मेरी जो पोजीशन है उसको तो वक्त लग जाएगा कि मैं उसको साफ कर सकूं। क्योंकि वह पोजीशन वैसी जगह पर आ जाए तो साफ होने में थोड़ा समय लग जाएगा।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

उन्होंने मुझसे पूछा। किसी ने प्रेस कांफ्रेंस मेंराजकोट या सुरेंद्रनगर मेंक्या आप ऐसा मानते हैंसाम्यवादधनईश्वर ऐसी आपकी मान्यता हैमैंने कहाइसमें मैं हां भर सकता हूं। मेरी दृष्टि यह है कि साम्यवादी समाज की व्यवस्था ने एक अंतर्दृष्टि दी है। लेकिन वह अंतर्दृष्टि अधूरी है। क्योंकि वह मनुष्य का जो आंतरिक हैउसको कहीं भी स्पर्श नहीं करती। या मनुष्य के जो अतीत हैउसको भी कहीं स्पर्श नहीं करती। अत्यंत आंशिक है। और आंशिक बात को पूर्ण सत्य कहना बड़ा ही खतरनाक हो जाता है। यानी वह असत्य से भी ज्यादा खतरनाक होता है। क्योंकि उसमें अंश सत्य तो होते ही हैं इसलिए ऐसा भी लगता है कि सत्य हैऔर फिर मन होता है कि इसको पूरा सत्य कह दें।
साम्यवाद पूरा सत्य नहीं है। वह मनुष्य के जीवन के अत्यंत बाहरी तल कोअत्यंत पदार्थ के तल को छूता है। और यही उसकी कमी है और यही उसका बल भी है। उसका बल भी यही हैक्योंकि वह जिस बात को छूता हैउसे पूरी तरह छूता है और पूरी गणित की तरह छूता है और पूरे विज्ञान की तरह छूता है। यह उसका बल भी हैक्योंकि उसने जिस बात को भी छुआ हैपूरी पहुंच है उसकी और यही उसकी कमजोरी भी हैक्योंकि बहुत बड़ा अछूता रह गया। और उस अछूते को बिलकुल इनकार करता है।
वह जो मैंने हां भर दिया हैतो वह जो गॉड है मेरे लिएवह जो सब शेष रह गया है कम्युनिज्म मेंउस सबका इकट्ठा मतलब है गॉड से मेरा। वह आदमी का आंतरिक और आदमी के अतीत जो भी हैवह जो भी छूट जाता हैउसको मैं गॉड कह रहा हूं। मेरे लिए गॉड को जो मतलब है तो उसको हम जोड़ देंतो वह जो अगर जुड़ जाएतो कम्युनिज्म की जो अधूरी दृष्टि हैवह अत्यंत पूरी हो जाती है। लेकिन उस पूरे में वह जो कम्युनिज्म है माक्र्स का वह विलीन हो जाता है। क्योंकि यह इतना बड़ा हमला है गॉड का कि इस हमले में वह जो टुच्चापन हैवह गया। वह सारी वायलेंस गई। इसलिए मैंने कहावह तो गॉड को जोड़नापूरे कम्युनिज्म कोपूरा का पूरायहां से वहां बदल देना है। कम्युनिज्म पूरा बदल जाएगा गॉड के जोड़ने से। और यह भी ध्यान रहेगॉड भी बदल जाएगा कम्युनिज्म के जुड़ने से वह गॉड नहीं रह जाएगा जो हिंदू का हैईसाई का है,मुसलमान का है। यह गॉड की अब स्थिति बहुत और हो जाएगीक्योंकि जो-जो गॉड था अब तकवह एक अर्थ में बुर्जुवा गॉड हैवह एक समाजवादी दृष्टि की उसमें कोई पहुंच नहीं है। इसलिए मेरी अपनी दृष्टि है कि साम्यवाद भी बदलता है ईश्वर के जुड़ने सेईश्वर भी बदलता है साम्यवाद के जुड़ने से। और जो एक नई स्थिति बनती हैवह बहुत मूल्यवान है। इसलिए मैंने हां भर दी।

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