बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-17

असली अपराधी: राजनीतिज्ञ

आज तक आपने जो किया हैउसका मिशन क्या-क्या है--आपका उद्देश्य क्या हैमहाबलेश्वर शिविर में मैं आ चुका हूं।

दोत्तीन बातें हैं। हमारे समाज की और हमारे देश की एक जड़ मनोदशा हैजहां चीजें ठहर गई हैं,बहुत समय से ठहर गई हैं। उनमें कोई गति नहीं रह गई। कोई दो ढाई हजार वर्ष से हम सिर्फ पुनरुक्ति कर रहे हैं। दो ढाई हजार वर्ष से हमने नये का स्वागत बंद कर दिया हैपुराने की ही पुनरुक्ति कर रहे हैं। तो मेरे काम का पहला हिस्सा पुराने की पुनरुक्ति को तोड़ता है। और पुराने की पुनरुक्ति का हमारा मन टूटेतो ही हम नये के स्वागत के लिए तैयार हो सकते हैंवह दूसरा हिस्सा है। तो पहला तो पुराने को पकड़ने की हमारी जो आकांक्षा हैऔर जो नये का भय हैये दो हिस्से हैं। पुराने को तोड़ देने का और नये के स्वागत के लिए मार्ग खोलने का।

पुराने की पकड़ के कारण ही हम विज्ञान को जन्म न दे पाए। यद्यपि पृथ्वी पर सबसे पहले हम ही थेजिन्होंने विज्ञान की शुरुआत की थीलेकिन हम वह नहीं हैं जो कि उसको अंत तक ले जा सके। हम बहुत शुरू किए और रुक गए। जगत में जितनी भी खोजे हैंउन सबके बीज हमने शुरू किएलेकिन फल कोई काट रहा है। तो कहीं कुछ भूल हो रही है और दृष्टि में जो भूल हो रही हैवह यह हो रही है कि वैज्ञानिक अनुसंधान निरंतर पुराने को इनकार करने और नये की खोज करने से विकसित होता है। अगर एक बार हम पुराने को पूरी तरह स्वीकार कर लेंतो नये के खुलने के लिए अवकाश नहीं रह जाता है। तो वैज्ञानिक हम न हो पाएइस वजह से।
दूसरीइसी तरह वजह से--शायद हमारी धरती पृथ्वी पर सबसे ज्यादा साधन संपन्न हैलेकिन हम दरिद्र रह गएक्योंकि टेक्नालॉजी तो सदा नई है और हमारे पास चित्त जो है पुराने को दोहराने वाला है। तो जो टेक्नालॉजी को पैदा कर सकेवह संपत्ति को पैदा कर पाए। हम बुरी तरह पिछड़ गए।
तीसरी बातजो पुराने की ही पकड़ के कारण पैदा हो गईयह है कि जो हमें उपलब्ध हो गया थाउसे हम संतोष बना लिया,स्वभावतः। अगर हम असंतोष रखें उसके साथ तो हमें रोज नये को खोजना पड़े। तो हमने एक गरीब संतोष की स्थिति बना ली। संतोष अगर बहुत गहरा हो जाएतो मौत का पर्यायवाची हो जाता है। क्योंकि जीवन की ऊर्जा तो असंतोष से गति करती है। तो यह जो हमने स्टेटिक सोसाइटी बनाई हैमेरा मिशन आप कह सकते हैं कि एस्केपिज्म का यहअवरोध का यहगति के रुक जाने का जहां-जहां मुझे जो-जो कारण दिखाई पड़ता हैवहां-वहां चोट करूंगा। यह विध्वंसात्मक हिस्सा हुआ। यह विध्वंस का हिस्सा हुआयह एक पहलू है।

जैसे ही यह पकड़ ढीली हो जाती हैवैसे ही नये आयामनये डायमेंशनकहां-कहां विकसित होंकैसे विकसित हों उसकी चिंता,उसका विचारउसका तर्कउसकी खोज शुरू होती है। अब जैसेमुझे दिखाई देता है कि पुराने का मोह जो हैवह समाज को विश्वासी बनाता हैबिलीवर बनाता है। बिलीफ जो हैवह स्टेटिक सोसाइटी पैदा करता है। और डाउट जो हैवह डायनामिक सोसाइटी पैदा करता है। अगर हम शक कर सकेंसंदेह कर सकेंतो अनिवार्य रूप से डायनामिक सोसाइटी होपर कारण है संदेह के साथ जीना मुश्किल हैसमाधान चाहिए ही। तो जैसे ही संदेह करते हैंहमें वही स्थिति पैदा करनी पड़ती है जो समाधानकारी हो। तो संदेह रोज नई स्थिति पैदा करने को मजबूर करता है। अगर हम फिर नई स्थिति को पैदा करके विश्वासी हो जाएंतो फिर नई स्थितिफिर कल पुरानी हो जाती है और पकड़ लेती है। इसलिए सतत संदेह में जीना और सतत पुराने को नष्ट करना और नये को जन्म देनातो विश्वास को तोड़ना पहला हिस्सा होगाऔर संदेह दूसरा सृजनात्मक हिस्सा होगा कि उसे हम पैदा करें।
अब जैसे कि दो तरह की शिक्षा हो सकती है--एक शिक्षा जो विश्वास पैदा करवाती हो। एक शिक्षा जिसका आधार संदेह पर खड़ा होजो संदेह पैदा करवाती हो। शिक्षक भी सहयोगी होता होबाप भी सहयोगी होता होपरिवार भी सहयोगी होता कि हम बच्चे के संदेह को कितना मुक्त करे सकें। जितना हम संदेह को मुक्त कर सकेंउतनी बड़ी प्रतिभा पैदा होती है। क्योंकि संदेह के साथ रुका नहीं जा सकता हैआगे बढ़ना पड़ेगा। और तत्काल किसी ऊंचे तल पर फिर से विश्वास को पैदा करना पड़ेगा,हालांकि पैदा करते ही विश्वास छोड़ने योग्य हो जाता है।
तो विश्वास की एक कीमत है कि वह पुराने संदेह को एक टघनग पॉइंटएक पैसेज है। विश्वास जो हैवह ठहरने की जगह नहीं हैमुकाम नहीं हैयात्रा पथ है। तो हमने विश्वास को मुकाम बना रखा है। इसलिए हम ठहर गए हैं। संदेह जो हैवह सतत सहयोगी है। और रोज हमें पैर उठाना पड़ेगा संदेह का और रोज नये विश्वास पैदा करने पड़ेंगे और रोज उन्हें डिस्कार्ड भी करना पड़ेगा।
तो एक तो मन के तल पर समस्त दिशाओं में--चाहे वह धन की होचाहे धर्म कीचाहे विज्ञान कीचाहे राजनीति कीजहां-जहां विश्वास हैवहां-वहां चोट करने की मेरी आकांक्षा है। और जहां-जहां विश्वास हैवहां-वहां संदेह को जन्म देने की भी आकांक्षा है। स्वभावतःक्योंकि हम विश्वासी हैं और बहुत गहरे विश्वासी हैंइसलिए हमें यह पूरी प्रक्रिया विध्वंसात्मक और डिस्ट्रक्टिव मालूम होती है। क्योंकि हम एक पुरानी चीज में इस बुरी तरह पकड़ गए हैं कि आज कोई भी नई चीज बनाने का संदेह भी हमें तत्काल ऐसा लगता है कि पुराने को छोड़ना पड़ेगा। और वह हमें विध्वंसक मालूम होता है। लेकिन मेरी अपनी समझ है कि सृजन के दो कदम हैं--विध्वंस पहला कदम है और सृजन दूसरा कदम है।

और तीसरा पालन का?

पालन जो हैवह तो सृजन का हिस्सा है। लेकिन हम किसी भी चीज को दो तरह से पाल सकते हैं। विश्वास की तरह से और संदेह की तरह से। और इन दोनों के फर्क को समझ लेना जरूरी है। विज्ञान भी पालन करता हैलेकिन निरंतर अपने संदेह को जीवित रखते हुए।
एक वैज्ञानिक हैवह यह नहीं कहेगा...अभी आइंस्टीन के मरने भर पहले किसी ने पूछा था कि आप एक वैज्ञानिक में और एक धार्मिक में क्या फर्क करते हैंतो आइंस्टीन ने कहा कि मैं यह फर्क करता हूं कि धार्मिक से सौ सवाल आप पूछें तो वह एक सौ एक जवाब को सदा तैयार है। और वैज्ञानिक से आप सौ सवाल पूछें तो निन्यानबे को तो वे इनकार कर देंगे कि हमें मालूम नहीं है। एक का हम जवाब देंगेवह भी इस भरोसे से देंगे कि अब तक इतना मालूम है। कल ज्यादा हो सकता हैइसलिए हम अपने संदेह को किसी भी स्थिति में समाप्त नहीं कर देते। हमारा विश्वास भी संदेहपूर्ण है।
इसको जो हैपालन तो करना ही पड़ेक्योंकि जिंदगी अगर जीनी हैतो निपट अविश्वास में नहीं जी जा सकती है। उसे तो विश्वास में ही जीना पड़ेगा। लेकिन विश्वास में जीते हुए निरंतर संदेह को जागरूक रखा जा सकता है। तब हम किसी भी बिलीफ को एब्सल्यूट नहीं बनाते। तब सब बिलीफ रिलेटिव हो जाते हैं। यानी हम कहते हैं कि इसे मानता हूंलेकिन यह मेरा मानना जो हैरिलेटिव है और अब तक जो मैं जानता हूंउसके हिसाब से ठीक है। कल जो मैं जानूंगा उसके हिसाब से गलत भी हो सकता है। इसलिए फ्यूचर हमेशा ओपंड हैक्लोज्ड नहीं है।
तो ऐसा विश्वास चाहिए जो संदेह कर सकता हो। और मेरी अपनी समझ है कि ऐसा विश्वास ही शक्तिशाली विश्वास हैजो संदेह भी कर सकता है। जो विश्वास संदेह करने से डरता हैउसे मैं इंपोटेंट कहता हूंवह नपुंसक है। वह खुद ही डरा हुआ है कि संदेह करेंगेतो मर जाएंगे। तो जो विश्वास संदेह भी कर सकता है--संदेह को मैं विश्वास की विरोधी प्रक्रिया नहीं कहता संदेह को मैं विश्वास की श्वास कहता हूं। उससे उलटी नहीं है वह।

संदेह और संशय में क्या फर्क है?

संशय बहुत और बात है। डाउट और संशय में फर्क है। संशय का मतलब हैऐसा आदमी जो अनिश्चय में है। जो निश्चय कर ही नहीं पाता। तो जो निश्चय कर ही नहीं पाता। तो जो निश्चय नहीं कर पातावह तो नष्ट हो जाएगा। लेकिन जो इतना निश्चय कर लेता है कि कभी संदेह नहीं कर पाता हैवह भी नष्ट हो गया है।
जिसका निश्चय ऐसा निश्चय हो जाता है कि अब वह इस ट्रुथ पर आंख उठा कर नहीं देखेगा। चाहे दुनिया बदल जाएचाहे सत्य की सब स्थिति बदल जाएलेकिन वह आंख बंद करके चला ही जाएगा कि मैंने पक्का किया थावही पक्का है। और अब आंख खोलने से भी डरेगा कि कहीं कच्चा न हो जाए। ऐसा आदमी नष्ट हो जाता है। ऐसा आदमी नष्ट हो जाएगा तो मैं कहता हूं संशय जिसके मन में है वह भी नष्ट हो जाता है। और संदेहहीन विश्वास जिसके मन में हैवह भी नष्ट हो जाता है। जीता तो वह है जो संदेहपूर्ण विश्वास कर पाता है। और संदेहपूर्ण विश्वास जो हैवही डायनामिक प्रक्रिया है। और उसमें दोनों तत्व इकट्ठे हैं।
तो इस मुल्क को कैसे संशयपूर्ण विश्वास दिया जा सकेया विश्रामपूर्ण संशय दिया जा सकेयह मेरा बुनियादी तथ्य हैजिस पर मैं जोर डालना चाहता हूं।

आप जो पुराने को तोड़ने को कहते हैं तो क्या नये का स्वरूप आपके हृदय में हैऔर है तो वह क्या है?

जरूर हैअन्यथा पुराना...। बहुत सी बातों का खयाल लेना पड़ेगा। असल में पुराने को तोड़ने का कोई प्रयोजन ही नहीं हैजब तक कि नया जन्म लेने के लिए तैयार न हो गया हो। असल में नया विज़न में होतभी यह पुराना मालूम पड़ता हैनहीं तो पुराना मालूम नहीं पड़ता है। पुराना जो हैवह कम्पैरेटिव टर्म है। असल में जब आपको नया विज़न में आ जाएतभी आप कह पाते हैं कि यह पुराना हो गया है। अन्यथा आप इसको पुराना नहीं कह सकते।
इस देश में क्या हुआ हैकि विज़न देखनाहमने तोड़ दिया है। इस देश में क्या हुआ हैइस डर से कि कहीं पुराना न हो जाए,हमने विज़न देखने की जो क्षमता हैवह तोड़ दी है। अब विज़न की जो क्षमता है वहअनिवार्य रूप से कुछ तत्व हैं उसमें। जैसेरहेंगे तो हम इसमेंलेकिन सोचेंगे उसकी जो अभी नहीं है। रहेंगे तो ज्ञात मेंसोचेंगे अज्ञात में। रहेंगे तो अतीत में,कामना करेंगे भविष्य कीतभी विज़न होगा।
यह मुल्क क्या हैरहता भी अतीत में हैसोचता भी अतीत की है! तो विज़न पैदा नहीं होता। पर हमने क्या तरकीब लगाई है कि हम सोचेंगे भी अतीत कीरहेंगे भी अतीत में! न केवल हम राम के जमाने में रहेंगेबल्कि राम-राज्य लाने की भी सोचते रहेंगे! जब राम-राज्य लाने की सोचेंगे तो विज़न का कोई उपाय न रहेगा। तब रिपीटीशन रहेगा कि राम-राज्य कैसा थातो उसको हम फिर से सोचते रहेंगे। इस देश ने दोहरा काम किया हैनया पैदा ही न हो सकेइसलिए पुराने में हम जीते हैं।
जीना तो स्वाभाविक है। जीना सदा पुराने में होगा। असल में जो भी बन जाएगावह बनते ही पुराना हो जाएगा। रहेंगे तो हम पुराने में ही इसलिए इसमें कोई उपाय नहीं है। लेकिन सोचना सदा भविष्य में होगा। होना चाहिए भी। पैर तो हमारे जमीन पर होंलेकिन सिर हमारा आकाश में होना चाहिए। और अगर पैर हमारे जहां खड़े हैंअगर आंखें भी वहीं हैंतो हम गङ्ढे में गिरेंगे। आंखें वहां होनी चाहिएजहां पैर कभी होंगे। अभी नहीं हैं जहां।
हमने क्या कर लिया हैहमने एक ऐसा मानस तैयार किया हैजो पीछे की तरफ जीता हैपीछे की तरफ देखता है। और अगर भविष्य की कभी कोई कल्पना भी करता हैतो वह सदा अतीत के अनुरूप करता है। वह उसकी पुनरुक्ति ही होती है। अगर हम भविष्य का यूटोपिया भी बनाएं तो भी नाम हम राम-राज्य ही देना पसंद करेंगे।
इधर जो मेरा कहना है कि यह जो हमारी पकड़ है अतीत के संबंध मेंयह पकड़ टूटनी चाहिए। अतीत को तोड़ने का कोई सवाल नहीं है। अतीत की पकड़ तोड़ने कावह जो क्लिंगिंग है हमारीवह हमें तोड़नी चाहिए। अब जैसे कि एक बाप अपने बेटे को चलना सिखा रहा हैनिश्चित ही बाप ही बेटे को चलना सिखाएगा। बाप अतीत है।

अतीत का महत्व है न?

उसके महत्व का तो कोई इनकारसवाल ही नहीं है लेकिन उसका इतना महत्व नहीं हैजितना भविष्य का है। जो मेरी एम्फेसिस है। अतीत का बहुत महत्व हैलेकिन इतना महत्व नहीं हैजितना भविष्य का हैक्योंकि अतीत वह है जो जीया जा चुका। भविष्य वह हैजिसे जीना है। तो वह जो जीया जा चुकावह हमेशा भूमिका ही बनेगा और जो जीना हैवह हमारा सपना होगा। उसमें हमारे हाथ फैलेंगे और जो जीया जा चुका है उसे सदा ट्रांसेंड करना होगाउसे पार करना होगा। तभी हम उसे जी सकेंगेजो अभी नहीं जीया जा सका है। इसलिए अतीत का महत्व हैलेकिन भविष्य से ज्यादा नहीं।
इस मुल्क के मन में अतीत का महत्व इतना ज्यादा है कि भविष्य का कोई महत्व ही नहीं है। अगर हम बहुत गौर से देखेंतो हमने भविष्य के लिए जगह ही नहीं रखी हैबल्कि हमने भविष्य को हमेशा ही अंधकारपूर्ण भाषा में सोचा है। हमारा सतयुग पहले होगाहमारा स्वर्ण युगगोल्डन एज पहले हो जाएगा। फिर भविष्य सदा कलियुग में। और गिरा-गिरा-गिराअंत में बिलकुल ही नष्ट हो जाएगा। भविष्य जो हैवहां महाप्रलय है। प्रलय जो हैवहां सब स्वर्ण युग बीत गया है। तो भविष्य में हम रोज गिर रहे हैं।
डार्विन ने पश्चिम में एवोल्यूशन का खयाल दियाअगर हम अपनी फिलासफी को कहेंतो हम उसे एवोल्यूशनरी नहीं कह सकते हैं। वह विकासात्मक नहीं हैवह पतनात्मक है। क्योंकि उसमें जो श्रेष्ठ हैवह पहले हो चुकाऔर जो निकृष्ट हैवह आने को है। तो जिस देश के दिमाग में निकृष्ट आने को हैऔर श्रेष्ठ हो चुकास्वभावतः उसके लिए सबसे ज्यादा मूल्यवान अतीत होगा। और भविष्य तो एक दुख हैजिसे झेलना है। जब भविष्य एक दुख होगापीड़ा होगीअंधेरा होगातो फिर भविष्य को सृजन करने का मन न रह जाएगा। ऐसा भविष्य का क्या सृजन करना हैभविष्य के संबंध में अगर कोई स्वर्ण की कल्पना न होविकासात्मक नहीं होगा समाज।
इस मुल्क का अति मोह है अतीत के प्रति। अति मोह तोड़ना है। अतीत का अपना मूल्य है। लेकिन उसका मूल्य वैसा ही है कि जिस सीढ़ी को हम छोड़ते हैंउस पर पैर तो रखना होता है। लेकिन पैर इसलिए रखना होता है कि अगली सीढ़ी पर हम पैर रख सकें और पिछली सीढ़ी को हम छोड़ सकें। अतीत सदा ही ट्रांसेंड करने के लिए हैवह पार जाना हैनिरंतर पार जाना है। जिसके पार जाना हैउसको पकड़ने को भाव नहीं होना चाहिए। और जिसे पाना है कलउसे पकड़ने का निरंतर भाव होना चाहिए। तो फ्यूचर जो हैभविष्य जो हैअधिक मूल्यवान है--यह मुल्क के चित्त में बैठना चाहिए। अतीत जो हैवह कम मूल्यवान है। और भविष्य जो हैवह अतीत से श्रेष्ठतर होने वाला है।
क्योंकि मन के कुछ नियम हैं। अगर मन एक बात स्वीकार कर लेतो वे घट जाते हैं। अगर हम यह मान लें कि कल दुखद ही होने वाला हैइसमें कोई उपाय नहीं है। यह कल की व्यवस्था है। कल दुखद होगा हीतो पहली तो बात यह है कि कल को सुखद बनाने का उपाय छोड़ दूंगा। और कल आसमान से नहीं आतामुझसे ही आता हैफिर कल का जन्म मुझसे ही होता है। तो जिसने स्वीकार कर लिया कि कल दुखद होने वाला हैपीड़ापूर्ण होने वाला हैउसने सुख बनाना तो बंद कर दियाऔर वह दुख की प्रतीक्षा करने लगा। और दुख की प्रोजेक्ट भी करेगाऔर कल अपनी भविष्यवाणी को पूरा करने के लिए वह कहेगा कि देखोइतना-इतना दुख आ गया। तो वह जो सुखद आएगाउसको देखेगा नहीं और जो दुखद आएगाउसको बड़ा करके देखेगा। और भविष्यवाणी में तृप्त हो जाएगा और राजी हो जाएगा कि हमारे ऋषि-मुनि जो कह गए थेवह सही है।
तो भारत की जो काल की व्यवस्था हैउसको मैं गलत मानता हूं। हमारी गोल्डन एज हमें भविष्य में ही रखना चाहिए और गोल्डन एज ऐसा है जो कभी आता नहींसिर्फ आता हुआ मालूम होता है। तभी हम गतिमान होते हैं। अगर कभी आ जाए तो फिर खतरा हो जाएगा। वह कभी आता नहीं। वह आता ही रहता हैऔर हम कभी उस हालत में नहीं होते कि हम कह दें कि आ गया। ऐसी हालत कभी नहीं होती कि हम कह दें कि पा लियाक्योंकि पा लिया तो फिर पास्ट हो जाएगा। वह इंटरनल लांगिंग है। तो भारत के मन में ऐसी लांगिंग नहीं है। इससे भारत का पतन बहुत स्वाभाविक हुआ।
हमारे सब ऋषि-मुनियों की भविष्यवाणी हमको पूरी ही करनी हैतो हमें पतन करना पड़ा। अपने पतन के लिए तैयार होना पड़ा। अभी भी हम तैयार हैं। अभी भी अगरकल चीन आ जाएअभी पृथ्वीराज जी से बात हो रही थी--अगर कल कोई दुश्मन हम पर हमला कर दे और कल हम और बर्बाद हो जाएंकल और गरीबी आएहमें भीख मांगनी पड़ेकल उन्नीस सौ अस्सी में महाअकाल पड़ जाए और हमारे बीस करोड़ आदमियों को मरना पड़ेतो हम इसको भी एक बहुत भीतर खुशी से स्वीकार करेंगे। हम कहेंगे कि यह होने ही वाला थायह कहा हुआ है कि कलियुग में यह सब होने वाला है। इसको भी हम हमारी जो भविष्यवाणी हैहम उसकी पूर्ति होने देंगे। यह होने वाला है।
अभी मेरे पास लोग आते हैंवे कहते हैं कि कलियुग में लोग व्यभिचारी होंगे। वह तो कलियुग में यह होने वाला है। सब आदमी सब नीति-नियम छोड़ देंगे। बड़ी खतरनाक भविष्यवाणियां हैं हमारीयह हमें तोड़नी पड़ेंगी और इनको अगर तोड़ना है तो हमें थोड़ा महावीर पर संदेह करने पड़ेंगे। पच्चीस सौ साल का मामला टूट नहीं सकता। और हमें तोड़ना है तो कहना पड़ेगा कि ऋषि कोई भविष्यवक्ता नहीं हैऔर ऋषि ने अगर ऐसा कहा है तो गलत कहा है। अब यह हमें चोटपूर्ण लगेगी।

गलत कहा हैअगर वह स्थिति लोग देख रहे हैं तो उसका क्या?

जो हम देख रहे हैं वह स्थिति हमने बनाई हैइस भविष्यवाणी का परिणाम है वह। अभी पीछे एक मजेदार घटना घटी है। कोई पांच साल पहले बंबई से किसी मित्र ने मुझे एक पत्र लिखा। एक सज्जन रास्ते से गुजरते होंगेऔर एक जैन साधु रास्ते पर अनायास उनको रोक करउनको कह दिया कि तुम्हारी उम्र तीन महीने और है--अनायासकोई परिचय नहींबिना पूछेसिर्फ रास्ते गुजरते वक्त। उनको कहा कि तुम्हारी उम्र तीन महीने से ज्यादा नहीं है! वह कुछ मुख मुद्रा शास्त्र अध्ययन कर रहे होंगे और इस आदमी को उन्हें दिखाई पड़ा कि इसकी तीन महीने की उम्र हैउसके पूरे लक्षण दिखे। वह किताब पढ़ रहे होंगेइनमें पूरे लक्षण उनको दिखाई पड़े। उन्होंने किसी बुरे भाव से इस आदमी को यह बात नहीं कही। उसने पहले तो इनकार किया कि भईऐसे कैसे मर जाऊंगा। एक-दो दिन उसने छिपाया। लेकिन ऐसी बात छिपाई नहीं जा सकती। उसने अपनी पत्नी को कहा कि मुझे अचानक साधु ने--अचानकमैं पूछने नहीं गयामैं परिचित नहीं हूंमैं जैन नहीं हूं। उस आदमी को कोई प्रयोजन तो है नहीं और उसे कुछ दिखाई पड़ा और उसने मुझे कहा कि तुम तीन महीने से ज्यादा नहीं बचोगे। उसकी पत्नी का सुनना था कि उसने छाती पीटनी शुरू कर दी और उसने कहा कि मुझे तो बचपन में कहा था कि बत्तीस साल में मैं विधवा हो जाऊंगी और बत्तीस साल चल रहा है। तो अब तो बात बिलकुल पक्की हो गई। अब इसमें तो कोई उपाय नहीं रहा। वह खाट से लग गया। मेहमान देखने आने लगे।
तो मेरे एक मित्र परिचित उसको देखने गए। तो उन्होंने मुझे पत्र लिखा कि यह आदमी मरने की हालत में हो गया हैआप क्या कर सकते हैं। तो मैंने उसे एक पत्र लिखा कि तीन महीने तुम नहीं मरोगेइसका पक्का मैं लेता हूंऔर मैं बंबई आता हूं। तुम उस साधु को पकड़ने की कोशिश करोउस पर मुकदमा चलाएंगे। तुम उसका पता लगाने की कोशिश करो कि वह कौन आदमी है। क्योंकि उस आदमी ने ठीक मर्डर का काम किया है--तुम मार डाले जाओगे। मैंने कहायह मैं वचन लेता हूं--और मुझे कुछ पक्का पता नहीं है कि यह आदमी बचेगा कि मरेगामुझे कुछ पता नहींमुझे मालूम भी नहीं--पत्र में लिखा कि मैं यह वचन देता हूं कि तीन महीन में तुम नहीं मरोगे। और कभी भी मर जाओनहीं मरोगे ऐसा तो मैं नहीं कहतालेकिन तीन महीने में तुम नहीं मरोगेऔर मैं आ रहा हूंऔर तुम उस आदमी की फिक्र करो।
जैसे ही मेरा पत्र उसे मिला वह खाट से उठाऔर उसने कहा कि मैं जाकर पता लगाता हूं कि वह कौन आदमी था। मन में तो उसको पकड़ ही रही थी यह बात कि इस आदमी ने मेरे साथ बुरा कियालेकिन अकारण थाइसलिए बुरा क्यों करेगाउसने बामुश्किल खोजबीन करके उसका पता लगाया। और जब उसने पता लगाया और मेरा पत्र उन्हें जाकर दिखाया तो साधु भी घबड़ा गयाक्योंकि मैंने उसमें लिखा था कि साधु पर हत्या का मुकदमा चलाएंगे और तुम उसको पकड़ कर पुलिस थाने में रिपोर्ट करो। वह साधु घबड़ा गया। उसने कहामुझे कुछ ज्यादा नहीं मालूम। मैं तो एक शास्त्र पढ़ रहा हूं। उसमें यह-यह लक्षण है कि ऐसा हाथऐसी चेहरे पर ऐसी स्थिति हो तो आदमी का जो भरोसा उसमें पैदा हो गया थावह भी कम हो गया। उसने कहा,यह तो खुद ही डरा हुआ हैइसे भी कुछ पक्का मालूम नहीं है। मैं जब आयातो उसने मुझसे कहा। मैंने कहातुम नहीं मरते हो! अभी तक वह आदमी जिंदा रहा। कोई ढाई साल बाद मरा।
यह जो आदमी हैयह मर सकता था तीन महीने में। इसमें कोई कठिनाई न थी। और ढाई साल में मरातो भी मेरी समझ है कि इस आदमी का हाथ फिर भी इसके मारने में है। इसकी जीवेषणा तो क्षीण हो ही गई। इसका एक दफा बल जीने से तो चला ही गयाइसके पैर तो एक दफा उखड़ ही गए। जैसे किसी पौधे को एक दफा तो हमने जमीन से निकाल ही लिया। फिर से लगा दियावह रह गया दो साललेकिन उसके भीतर कुछ चीज टूट गई। जीने की जो तीव्रता थीवह क्षीण हो गई। मरने का जो भाव थावह प्रगाढ़ हो गया।
हिंदुस्तान के साथपूरे मन के साथ ऐसा हुआ है। वह जो हमारी भविष्यवाणी हैवह जो हमारी कल्पनाएं और योजनाएं दिमाग में रही हैंउन्होंने हमें पक्का कर दिया है। फिर जो भी घटता हैहम उसको स्वीकार कर लेते हैं। हम मान लेते हैं कि ऐसा होगा। हमने एक हजार साल की गुलामी इसीलिए स्वीकार की। हम सब तरह का भ्रष्टाचारसब तरह की अनीति स्वीकार करेंगे। क्योंकि यह हम मानते हैं कि यह होने वाला हैयह होना ही चाहिए। यह न हो तो हम चकित होंगे। तो हमको लगेगा कि क्या गड़बड़ हो गईअगर सतयुग आ जाए तो हम भरोसा न कर पाएंगेक्योंकि हमको हमारे ऋषियों पर संदेह करना पड़ेगा। और अगर हम संदेह कर सकें इससे उलटा तो हम सतयुग भी ला सकते हैं। क्योंकि जो भी आ रहा हैवह हमारे मन से आ रहा है। हम स्रष्टा हैं। और समय में जो घटनाएं घट रही हैंवह हमारे द्वारा घट रही हैं। और हमने क्या मान रखा हैउस पर सब कुछ निर्भर है। एक बार अगर पूरे मुल्क का मन इसके लिए तैयार हो जाए कि स्वर्ग अभी लाना हैतो बहुत कठिनाई न हो,लेकिन पूरे मुल्क का मन अगर मान ले कि नरक आना हैतो नरक को लाना नहीं पड़तावह अपने से आ जाता है। क्योंकि उसके लिए कुछ नहीं करना पड़ता है। सिर्फ हम बैठे रहेंसिर्फ देखते रहेंतो भी आ जाएगा। स्वर्ग के लिए तो कुछ करना पड़ेगासिर्फ देखने से नहीं आ जाएगा।
स्वर्ग हमारा सृजन है और नरक है हमारे आलस्य की अपने आप आ गई व्यवस्था।
तो वह आ रहा है। इसलिए मैं तो...अतीत के साथ हमारे जो बहुत आग्रहपूर्ण संबंध हैं--अति आग्रहपूर्ण करने चाहिएआब्सेशन बन गया हैएक रुग्णभाव बन गया है। ऐसी हालत हो गई हैजैसे किसी आदमी के पैर में चोट लग जाती हैतो दिन भर उसी में चोट लगती रहती है। चोट उसी में नहीं लगतीचोट तो रोज उस जगह लगती थीलेकिन पता नहीं चलता था। अब घाव की वजह से बार-बार पता चलता है।
तो हमारा अतीत एक घाव की तरह हमारी छाती पर बैठा है। वह हमारी पृष्ठभूमि नहीं हैजिस पर खड़े होकर हम आगे भविष्य में छलांग लगाते हैं। वह एक घाव की तरह हैजिसकी हमें सेवा-शुश्रूषा करके बचाना पड़ता है और उससे घाव मिटता नहीं,उससे घाव बड़ा हो रहा है। और घाव के धीरे-धीरे बड़ा होते-होतेहम सब घावग्रस्त हो गए हैं। और उस घाव के कई मुद्दे हैं। सब तरफ से उसने हमें पकड़ लिया है। जैसेअतीत की इस घोषणा नेअतीत की इस मान्यता नेअतीत के इस विश्वास ने,भाग्यवादी हम बना दिया हैक्योंकि हमने समय की एक निर्धारित व्यवस्था स्वीकार कर ली है--एक डिटर्मिनेशन। और इसलिए मेरी अपनी समझ यह है कि हिंदुस्तान में अगर कम्युनिज्म किसी रास्ते से आएगातो हिंदुस्तान के डिटर्मिनेशन के रास्ते से आएगाक्योंकि माक्र्स दुनिया में यह सबसे बड़ा डिटर्मिनेशन है।
हिंदुस्तान पर उसकी अपील किसी दिन भी बढ़ेगीक्योंकि हिंदुस्तान तो डिटर्मिनिस्ट माइंड है। क्योंकि हम तो सदा से यह मानते हैं कि चीजें तय हैं। अगर माक्र्स हिंदुस्तान में पैदा होतातो हमने उसको ठीक बड़े ऋषियों में जगह दी होती। क्योंकि वह आदमी ऐतिहासिक रूप से भाग्यवादी है। वह यह कह रहा है कि कम्युनिज्म आने ही वाला है। यह किसी के लाने की बात नहीं है। यह आपके वश की बात नहीं है इसे रोकनायह आने ही वाला है। यह इनएवायडेबल है। यह तो नियति का हिस्सा है,डेस्टिनी हैकि पूंजीवाद के बाद कम्युनिज्म आएगा ही। अगर हिंदुस्तान के मन में कभी भी कम्युनिज्म गहरे जाएगातो वह हिंदुस्तान की भाग्यवादिता से जाएगाकि जाएगा ही।
हम सदा से यह मानते रहे हैं कि ऐसा आएगा। हमें कुछ करना नहीं है। हम स्रष्टा की तरह नहीं हैं। हम राहगीर दर्शक हैं। हम देख रहे हैं। जो आता हैउसको हम देख रहे हैं। इसलिए राहगीर का कोई मतलब नहीं है। जो आता हैउसे स्वीकार कर लेते हैं। यदि भारत को अपने भविष्य के बाबत कुछ भी निर्माण करना हैतो उसे बहुत सी अतीत की धारणाओं का विध्वंस करना पड़ेगाउसे भाग्यवाद को तोड़ देना पड़ेगा। और एक बार हमें यह पक्का खयाल लाना पड़ेगा कि जो भी कल होगावह अभी तक तय नहीं हैवह अभी तय हो रहा हैवह तय होने की प्रक्रिया में हैऔर हम उसके तय करने वाले लोग हैं। अगर वह तय हो चुका हैसिर्फ अनफोल्ड हो रहा है तो फिर ठीक हैहम राहगीरदर्शक हो जाते हैं।
हमने यह धारणा व्यक्तिगत रूप से स्वीकार की थी। उसके कारण थे कि हमारे पास समाज की कोई धारणा ही नहीं थी। असल में यह भी सोचने जैसा है कि भारत के पास कोई सोसाइटी का कांसेप्ट नहीं है। उसके पास जो कांसेप्ट हैवह व्यक्ति-व्यक्ति का है। इसलिए हमारा चिंतन जो हैवह व्यक्तिवादी है। आप अपने भाग्य से तय हो रहे हैंमैं अपने भाग्य से तय हो रहा हूं। हम दोनों का कोई सामूहिक भाग्य नहीं है। आपका अपना भाग्य हैमेरा अपना भाग्य है। आपका अपना भाग्य हैउनका अपना भाग्य है। हम सब अपने भाग्य को पार कर रहे हैं और इस वजह से कोई सामूहिक भाग्यकोई राष्ट्र का भाग्यकोई देश का भाग्यकोई कलेक्टिव भाग्य--ऐसी हमारे पास कोई धारणा नहीं है कि हम सबका इकट्ठा भी कुछ है।

धर्म और संप्रदाय की वजह से जो संगठन थोड़ा कुछ रहता थावह तो व्यक्तिवाद तो नहीं है?

संगठन पर अलग से थोड़ी बात करनी पड़ेगी। असल में संगठन बहुत तरह के हो सकते हैं। संगठन ऐसे हो सकते हैं जो आत्मघाती सिद्ध हों। अगर हम यहां इस कमरे में पच्चीस लोग हैं और इस कमरे के भीतर हम पांच संगठन बना लेंजो स्वविरोधी होंएक-दूसरे को कंट्राडिक्ट करते होंतो इससे तो अच्छा था कि पच्चीस ही असंगठित होतेतो खतरा इतना नहीं है। लेकिन अगर पांच संगठन हों और आत्मविरोधी हों और एक-दूसरे की दुश्मनी में खड़े होंतो यह कमरा मरेगा। हम एक-दूसरे को काटते रहेंगेऔर हो सकता है कि पांचों एक-दूसरे को इस बुरी तरह काट दें कि कमरा बिलकुल इंपोटेंट हो जाएटोटली।
तो हिंदुस्तान इंपोटेंट हुआहिंदुस्तान की अनेकता के कारण नहींहिंदुस्तान की टूटी एकता के कारण। मैं नहीं मानता कि हिंदुस्तान बर्बाद हुआ हैइसकी डिस्यूनिटी के कारण। हिंदुस्तान बर्बाद हुआमल्टी-यूनिटी के कारण। हमारे पास बहुत तरह के यूनिट हैं--हिंदू का अलग हैमुसलमान का अलग है। हिंदू के भीतर भीब्राह्मण का अलग हैशूद्र का अलग है। ब्राह्मण के भीतर भी एक ब्राह्मण का अलग हैदूसरे ब्राह्मण का अलग है। हिंदुस्तान को जो लोग कहते हैंहम अनेकता की वजह से मरे हैंवे लोग गलत कहते हैं। हिंदुस्तान अगर अनेक भी होता तो इतना खतरा नहीं था। क्योंकि अगर हिंदुस्तान अनेक हो तो मेरे और आपके किसी भी दिन एक हो जाने में बाधा नहीं थी। किसी भी दिन जरूरत होती इमरजेंसीतो हम इकट्ठे हो जाते।
लेकिन हम एक थे। मैं और आप तो एक हो सकते थेलेकिन मैं हिंदू थाआप मुसलमान थे। अगर मैं भी आदमी होता और आप भी आदमी होतेतो हमारे बीच कोई संगठन न होता। तो कल अगर पूरे मुल्क में मुसीबत होती और मैं और आप इकट्ठे हो जाते तो हम दोनों की सामूहिक मौत थी। लेकिन मुसलमान पर खतरा आया तो हिंदू ने सोचा कि बहुत अच्छा हुआ। यह तो आ ही जाना चाहिए था पहले ही और जब हिंदू का आयातो हमने सोचा कि ठीक हैआ ही गयातो बहुत अच्छा हुआ।
हिंदुस्तान अनेकता की वजह से नहीं मरान एकता की कमी की वजह से मराहिंदुस्तान मरा बहु-एकता की इकाइयों की वजह से। और वे सब इकाइयां अपने आप में राष्ट्र बन गईं। हिंदुस्तान मल्टी-नेशनल हो गयाहिंदुस्तान एक राष्ट्र नहीं रह सका राष्ट्रीयताओं में विभाजित हो गया। यहां एक के भीतर दोदो के भीतर तीन--यहां इतनी एकताएं हो गईं कि उन एकताओं का इकट्ठा टोटल परिणाम जीरो हो गया। इसलिए मेरी अपनी समझ यह है कि हिंदुस्तान को एक नहीं करनाबल्कि उसकी मल्टी-यूनिटी को तोड़ डालना है। यह उसका डिस्ट्रक्टिव कदम होगा।
और एकता ऐसी चीज है कि वह रोज की जरूरत नहीं है। मेरी अपनी समझ यह है। एकता रोज की जरूरत नहीं हैवह इमरजेंसी की बात है। और अब भी इमरजेंसी होती हैतो आदमी एक हो पाता है। नहीं तो नहीं हो पाता तो कारण भी नहीं है। लेकिन अगर इमरजेंसी के वक्त में पहले से किए गए कमिटमेंट बाधा बन जाएतो फिर एक नहीं हो पाते। तो हिंदुस्तान में हम जितनी कोशिश करते हैं कि सारा देश इकट्ठा हो जाएतो वह सब असफल होने वाली है। क्योंकि हमारी कोशिश भी अंततः एक और नये यूनिट को खड़ा कर जाती है। बस ज्यादा से ज्यादा जहां दस यूनिट थेवहां हमारा एक ग्यारहवां यूनिट खड़ा हो जाता,तो कहतासबको एक करना है। तो जो लोग उससे राजी हो जाते हैंवे ग्यारहवीं यूनिट हो जाते हैं। तो वह उतने ही दूर के दुश्मन हो जाते हैंजितने बाकी दूर आपस में थे।
हिंदुस्तान में हमें एक दफा सब तरह की यूनिटी तोड़ डालनी है। वह जो छोटे-छोटे यूनिट हैं उनको मिटाने की फिक्र करनी चाहिए। जैसे गांधीजी ने कोशिश की कि हिंदू-मुसलमान एक हो जाएंयह सफल नहीं हुआ मामला। अगर कोशिश होती कि हिंदू का यूनिट टूट जाएमुसलमान का यूनिट टूट जाएतो सफलता बहुत व्यापक हो सकती थी। मैं यह कह रहा हूं जब हम कहते हैं कि हिंदू-मुसलमान एक हो जाएं तो हम दोनों की यूनिट को रिकग्नीशन दे देते हैंपहली बात। तरीके की बात है तो भी गलत है। टेक्निकली भी गलत है।
हिंदुस्तान को बंटवाने में गांधीजी की कोशिश का जितना हाथ हैउतना हाथ किसी दूसरे आदमी की कोशिश का नहीं है। हालांकि गांधीजी ने जितनी फिक्र की एक रखने की उतनी किस ने नहीं की है। अब ये बातें कंट्राडिक्ट्री मालूम पड़ती हैंलेकिन मुझे कंट्राडिक्ट्री नहीं दिखाई पड़ती हैं। मेरी अपनी समझ यह है कि जितना हमने जोर दिया कि हिंदू-मुस्लिम भाई-भाईउतना हमने साफ किया कि ये दोनों अलग-अलग हैं। असल में जब हम भाई-भाई कहते हैंतभी कहना शुरू करते हैंजब दुश्मनी की हालत खड़ी हो जाती है। उसके पहले हम कभी कहते नहीं।
हम कभी नहीं कहते कि हिंदी-बर्मी भाई-भाईहिंदी-चीनी भाई-भाई कह रहे हैं। वह भय हमें पक्का था कि आज नहीं कल अगर दुश्मनी होनी है तो वह चीन से होनी है। बर्मा से नहीं होनी हैलंका से नहीं होनी है। हमने कभी नहीं कहा कि हिंदू-जैन भाई-भाई। हिंदू-सिक्ख भाई-भाईवह हमने नहीं कहा। जो डर थावह डर था मुसलमान कातो हमने कहा हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई। वह हमारे भय का सबूत है। वह जितना हमने दोहराया उतना यह साफ हुआ कि उन दोनों के बीच कोई गहरी दुश्मनी है,जिसको भाई-भाई कह कर हम पूरा करना चाहते हैं। एक।
और दूसरागांधीजी और उनके दूसरे साथियों ने जितना जोर दिया कि हिंदू-मुस्लिम भाई-भाईउससे वह भाई-भाई तो न हुए,लेकिन बड़ा अजीब परिणाम आया और वह यह कि अगर दो भाई एक न हो सकेंतो पार्टीशन हो जाना चाहिए। जो उसका बेसिक लॉजिकल कनक्लूजन है। अगर हमने भाई-भाई पर जोर न दिया होता तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान कभी पार्टीशन नहीं हुए होते। क्योंकि पार्टीशन दो भाइयों के बीच होता है। पार्टीशन का खयाल ही नहीं आता। खयाल ही इसलिए आया कि दो भाई एक नहीं होते तो ठीक हैजैसा बाप की जायदाद बंट जाती है वैसा हिंदुस्तान की जायदाद बंट जानी चाहिए। जब हमने जोर दिया भाई-भाई परतो हमको राजी होना पड़ा पार्टीशन के लिएक्योंकि वह उसका कनक्लूजन था। फिर आप मना नहीं कर सकते।
जब भाई-भाई हैं तो पार्टीशन ठीक है। अब राजी नहीं होते तो अलग-अलग हो जाएं। अब राह देखने में उलटा लगता है। गांधीजी ने पूरी जिंदगी कोशिश की कि पार्टीशन बच जाएलेकिन वे ही इसके जन्मदाता हैं। साइकोलाजिकली वह जो व्यवस्था कर रहे थेवह व्यवस्था जिम्मेदार है। उन्होंने कोशिश की हिंदू-मुस्लिम एक हो जाएंउनके एक होने का अति आग्रह हैइम्फैटिकली,हिंदू-मुस्लिम को अलग करता गया। यह जो कठिनाई हैयह अब भी आज भी मौजूद है। आज भी हम वही चिल्ल-पों मजा रहे हैं। गुजराती-महाराष्ट्रियन भाई-भाईहिंदी गैर-हिंदी भाई-भाई। वह हम सब बकवास लगाए हुए हैं। टैक्टिक्स हमारी सब पुरानी है जो हजार दफे असफल हो चुकी है। यानी बड़ा मजा यह है कि जो चीजें हजार दफा असफल हो चुकी हैं उनको भी हम कभी छोड़ते नहींफिर उनका दुबारा वही उपयोग करने लगते हैं।
मेरा मानना हैयह गलत है। यूनिट तोड़ने चाहिए। गुजराती और मराठी एक न होंगेगुजरात और महाराष्ट्र के यूनिट जाने चाहिए। हिंदी और गैर-हिंदी एक न होंगे--हिंदी और गैर-हिंदी का यूनिट हटना चाहिए। मजा यह है कि एक तरफ हम यूनिट बचाते हैं। कहीं की लिंग्विस्टिक प्रॉब्लम है तो एक तरफ यूनिट बचाएंगेयूनिट को बसाएंगेयूनिट बनाएंगेउसको डिफाइन कर देंगेऔर इसके बाद हम कहेंगे कि अब सब एकता होनी चाहिए। यानी हम कुछ ऐसी एब्सर्ड कौम हैं कि जिसके दिमाग में तर्क जैसी चीज भी नहीं है कि हम कर क्या रहे हैंअंग्रेज इस मुल्क को जिस बुरी तरह से विभाजित नहीं कर पायाहम उतना विभाजित किए दे रहे हैं बीस साल में।
मेरा कहना यह हैजैसे इस मामले में हमें यूनिट्स तोड़ने चाहिए। जहां हमें यूनिट दिखाई पड़ेयूनिट को तोड़ना चाहिए।

जैसे हिंदू-मुस्लिम को रिकग्नाइज करते हैंतब तो वह ये दोनों कौमें अलग हो गईं।

मैं जो कह रहा हूं--जैसेहिंदुस्तान को एक फेडरल गवर्नमेंट की जरूरत है। इसको स्टेट गवर्नमेंट की जरूरत बिलकुल नहीं है। रिकग्नाइज नहीं कर रहेबीमारी है और वह बीमारी को रिकग्नीशन दे रहे हैंआप कभी लैंग्वेज के नाम पर कभी प्राविंस के नाम पर और कभी किसी दूसरी बात के नाम पर। और सबके पीछे कुल कारण इतना है कि हिंदुस्तान के अधिकतम पोलिटीशियन की आकांक्षा कैसे तृप्त हो--तो जितना मुल्क टुकड़े में होउतनी तृप्त हो सकती है। उतने मिनिस्टर्स होंगेउतनी कैपिटल्स होंगीउतने गवर्नर होंगे।
असली बुनियादीकुल जमा उतनी ही हिंदुस्तान में कैसे पांच हजार आदमी मिनिस्ट्री में बैठे रहेंकैसे पचास गवर्नर हों और इसलिए रोज हर प्रांत के दो टुकड़े करने पड़ेंगे आपकोक्योंकि उस प्रांत के दुगुने राजनीतिज्ञ तृप्त हो जाएंगे। अगर सौराष्ट्र अलग हो जाए और गुजरात अलग हो जाएअगर बरार अलग हो जाए और महाराष्ट्र अलग हो जाएतो दुगुने राजनीतिज्ञों की तृप्ति होगी। वह जो बरार की राजनीतिज्ञ बंबई में नहीं बैठ पाता है मिनिस्ट्री मेंवह कल अगर अमरावती राजधानी होगी या नागपुर राजधानी होगीतो वह इस मिनिस्ट्री में होगा।
मेरा कहना यह है कि जब हिंदुस्तान यूनिट को स्वीकृति देता चला जाता हैतब तक यूनिट और छोटे बनाने पड़ेंगे। पचास साल में आपका एक-एक जिला एक-एक स्टेट होगीइससे कम में कोई उपाय नहीं है। क्योंकि आपकी जो प्रोसेस हैउसका लॉजिकल मतलब हैवह आज देख लेना चाहिए। हिंदुस्तान को फेडरल गवर्नमेंट की जरूरत है। यहां एक गवर्नमेंट काफी है। एक गवर्नमेंट हो तो मुल्क एक होता हैनहीं तो मुल्क एक नहीं होगा। दिल्ली में एक गवर्नमेंट पर्याप्त है। बाकी ये सारी स्टेट्स तोड़ देनी है। मैं जो कह रहा हूं...रिकग्नीशन का मेरा मतलब यह है कि हमें बीमारी को तो पहचानना पड़ेगा।
अब जैसे मेरी समझ है कि अगर हिंदू और मुसलमान की बात तो तोड़ना था तो हमें हिंदू और मुसलमान की बात नहीं उठानी है। बात नहीं उठाने का मतलब यह था कि यह प्रश्न आजादी का थायह प्रश्न हिंदू-मुसलमान का था ही नहीं। इस मामले को उठाने की जरूरत नहीं। हम सबको उठाने में गांधीजी ने खिलाफत के दिनों से उपद्रव शुरू किया। वह पूरे वक्त पहले तो मुसलमान की खुशामद करते रहेऐसी खुशामद जो कि बिलकुल गैर-जरूरी है। वह इसी डर से कि मुसलमान साथ हो। अब खिलाफत से गांधीजी का कोई मतलब न था।
टर्की में खलीफा रहता है या नहीं रहताइससे गांधीजी को लेना-देना नहीं था। हिंदुस्तान में बहुत से लोग खिलाफद शब्द से गलती में पड़े। वह समझे कि खिलाफत का मतलब विरोधकि आंदोलन है। वहां खलीफा टर्की में रहता है कि नहीं रहता है,इसका कोई सेंस नहीं था। जिन्ना के टूटने का कारण यह बना कि जिन्ना गांधी से ज्यादा नॉन-सेक्टिरियन आदमी था। जिन्ना ज्यादा सेक्युलर आदमी था। जिन्ना रिलिजियस आदमी नहीं था। और जिन्ना के टूटने का कारण यह था कि जिन्ना को हैरानी हुई कि यह खिलाफत में गांधीजी किसलिए अली बंधुओं के साथ घूम रहे हैं।
मुसलमान के मसले को गांधीजी क्यों ले रहे हैं हाथ में। गांधीजी हाथ में ले रहे हैंक्योंकि वह मुसलमान को फुसलाना चाहते हैं,उनको इकट्ठा करना चाहते हैं। जिन्ना भयभीत हो गयाभयभीत हो जाना स्वाभाविक था। खतरनाक पॉलिटिक्स हो सकती है। हिंदू क्यों उत्सुकता लेइससे कोई मतलब न था। हिंदुस्तान की राजनीति को अगर नॉन-रिलीजस बेसिस मिली होतीजो कि गांधीजी की वजह से नहीं मिल सकीक्योंकि गांधीजी बहुत गहरे रूप से हिंदू थे। सारा ढंगजीनाव्यवस्थासब हिंदू की थी। सारा महात्मापन जो थावह सब हिंदू का था। गांधीजी का सारा व्यक्तित्व हिंदू का प्रतीक था और गांधीजी कहते भी थे कि मैं बुनियादी रूप से हिंदू हूं।
यह सारी का सारी बात ने एक स्थिति खड़ी कर दी जिसमें कि मुसलमान को भाई बनाना पड़े और कुरान को पढ़ना पड़ेगीता को पढ़ना पड़े। गीता की भी जरूरत न थीकुरान की भी जरूरत न थीगांधीजी के सामने। मैं जो कह रहा हूंवह यह कह रहा हूं कि रिलीजस फैक्ट को हिंदुस्तान की राजनीति में जगह देने की कोई जरूरत ही न थी। एक दफा जरूरत बनाई आपनेतो फिर रोज-रोज एक-एक कदम आगे बढ़ना पड़ा और उसके लॉजिकल परिणाम यह कभी भी कहे जा सकते थे कि हिंदुस्तान बंटेगा। और अभी भी वही हो रहा है।
अब आपने लैंग्वेज को प्रॉब्लम बना लिया। अब मैं कह सकता हूं कि हिंदुस्तान बंटेगा। यह देर लग सकती हैदस-बीसपचास साल कीलेकिन हिंदुस्तान बंटेगा। दक्षिण हिंदुस्तानउत्तर हिंदुस्तान किसी भी दिन टूट सकता है क्योंकि आपने अब दूसरा उपद्रव बना लियालैंग्वेज का। रिलीजन झंझट खतम हुईतो आपने लैंग्वेज की झंझट खड़ी कर ली। और जिन्होंने रिलीजन की झंझट खड़ी कीवे भी बड़े अच्छे लोग थे और जिन्होंने लैंग्वेज की झंझट खड़ी कीवे भी कम अच्छे लोग नहीं थे। और जब कोई हम मामला उठाते हैं तो बड़ा अच्छा मालूम पड़ता है।
बड़ा अच्छा मालूम पड़ता है कि प्रत्येक लैंग्वेज को उसका अलग प्रांत होना चाहिए और एकदम अच्छी बात मालूम पड़ती है। लेकिन इसके अल्टीमेट कनक्लूजंस क्या होंगेवह हमारे खयाल में नहीं है। हिंदुस्तान हमेशा अच्छे आदमी की दलील से परेशान है। बुरा आदमी जो दलील देता हैउसकी कोई सुनता नहीं हैक्योंकि वह बुरा आदमी है। अच्छा आदमी जो दलील देता हैवह सुन ली जाती है। और अच्छे आदमी के वहम में वह दलील भी स्वीकार हो जाती हैऔर बड़े खतरे होते हैं।
अब जैसे हिंदुस्तानलैंग्वेज से बंटवाई गई--उसका बंटवारा पक्का है। अभी भी हम उसको रिकग्नाइज करते जा रहे हैं! और रोज हमारा आपसे कोई लेना-देना नहीं है। हमारा देश अलग हैहमारा सारा जीवन अलग है। मुसलमान और हिंदू में इतना फर्क नहीं हैजितना कि भारतीय और नागा में। तो रेशियल फर्क हैं। मुसलमान और हिंदू तो एक ही खून के हैंइसलिए इनमें कोई रेशियल फर्क नहीं है। इनका तो जो फर्क है वह रिलीजसलैंग्वेज का फर्क है। बाकी बस्तर का आदमी है वह। उसको आप कब तक रोकेंगेवह आदमी बिलकुल अलग है। हिंदुस्तान एक बड़ा कांटीनेंट है। उसमें जैसे आप स्वीकार करते जाएंगेआप मुश्किल में पड़ते चले जाएंगे। तो मेरा कहना यह है कि हमें बुनियाद से रिकग्नीशन लेना बंद करना है।
अभी मैं अहमदाबाद था पीछे। वहां के हरिजन मंडल के मित्र मेरे पास आए। और उन्होंने कहा कि गांधीजी आते थेहरिजन के घर में ठहरते थे। आप क्यों नहीं ठहरते हैंतो मैंने उनसे कहा कि अगर तुम अपने घर में मुझे बुलाओतो मैं आने को राजी हूंलेकिन हरिजन के घर में नहीं जाऊंगा। क्योंकि हरिजन को इतनी भी रिकग्नीशन देना मैं पसंद न करूंगा कि वह हरिजन है और उसके घर में ठहरता हूं। यह बड़ा अच्छा रिकग्नीशन हैलेकिन हरिजन फिर हरिजन ही बना रहताऔर अब और खतरा हो जाताक्योंकि बीमारी अब आदर योग्य मालूम पड़ती है।
अछूत होना बेहतर है थाक्योंकि वह शब्द गंदा था और किसी को पकड़ने में सुखद नहीं मालूम पड़ता था। हरिजन बड़ा अच्छा शब्द है। जैसे टी.बी. को हम अच्छा नाम दे दें और ऐसा दिल से लगाए रखें। अभी हरिजन शब्द खतरनाक है। यह बड़ा प्यारा मालूम पड़ता है और हरिजन भी गौरव अनुभव करता है कि मैं हरिजन हूं और आप मेरे घर ठहरे हैं आकर। मगर रिकग्नीशन जारी है और उसको हम फिर बांटे चले जा रहे हैं! यह हमें सारी बांटने की प्रक्रिया तोड़नी चाहिए। और जहां-जहां यह मुल्क टुकड़ों में बंटा हैवहां टुकड़े कैसे तोड़े जाएंउसका सारा इंतजाम करना चाहिए। इस मुल्क को एक बनाने की जरूरत नहीं है,इस मुल्क की भीतरी एकताओं को तोड़ने की जरूरत है। मैं तो बेसिकली बात करना चाहता हूं--और एकताएकता इसका सहज परिणाम होगी। उसको लाने की जरूरत ही नहीं है।

वह फेडरल गवर्नमेंट के माने में...?

नहींबिलकुल डेमोक्रेटिक होलेकिन स्टेट को अलग तोड़ने की जरूरत नहीं है। यह एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लाक होने चाहिएइसको तोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। हिंदुस्तान की पॉलिटिक्स इतनी गंदी न होअगर हम इतने डबरे न बनाएंलेकिन इतने डबरे बनाने पड़ते हैं क्योंकि इतने मेंढक-मछलियां हैं।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

 वह सारे के सारे मामले यह हैं कि पाकिस्तान के मामले हिंदुस्तान से भिन्न नहीं हैं। हिंदुस्तान और पाकिस्तान एक ही माइंड के दो टुकड़े हैं। इनके मामले कभी भिन्न होने वाले नहीं हैं। जो मामला यहां हैवह मामला वहां है। वह तो यह भ्रांति थी हमको कि हिंदू-मुसलमान का मामला हैदिमाग का मामला है।
अब हुआ क्या हैजैसे बंगाल में हैअब जो पाकिस्तान का बंगाली हिस्सा हैवह जो बंगाली पाकिस्तानी हैवह पश्चिमी पाकिस्तानी के खिलाफ हैक्योंकि पंजाब से जो मुसलमान गया है या सिंध से जो मुसलमान गया है ढाकावह उसका उतना ही दुश्मन हैजितना कि कलकत्ते का आदमी मारवाड़ी का और गुजराती का दुश्मन है। ये सब फारेनर्स हैं। कलकत्ते में फारेनर है मारवाड़ीढाका में फारेनर है लाहौर का आदमी। इसमें कोई फर्क का मामला नहीं है।
असल में हमारा माइंड जो हैवह लड़ने की प्रवृत्ति वाला है। वह बहुत तरह की वृत्तियां उसमें लड़ने की हैं। एक मुद्दा खतम होता हैहम दूसरा मुद्दा फौरन लड़ने को लिए ईजाद कर देते हैं। और मैं मानता हूं कि अगर ऐसा ही होतो पुराने मुद्दे पर ही लड़ना बेहतर होता हैकम से कम नये मुद्दे तो नहीं है। अगर हिंदू-मुसलमान इकट्ठे रहतेतो गुजराती-मराठी का झगड़ा कभी नहीं होता। हिंदुस्तान-पाकिस्तान अगर इकट्ठे होते तो गुजराती-मराठी का झगड़ा कभी नहीं होने वाला था। क्योंकि एक बड़ा झगड़ा हमको काफी तृप्ति दे रहा था। अब वह झगड़ा खतम हो गया।
हमारा दिमाग लड़ने वाला है। अब वह कहता हैनये झगड़ा कैसे खोजनाअब वह गुजराती-मराठी लड़ रहा है। आप गुजराती-मराठी का लड़ना छोड़ना बंद कर देंगुजरात को पूरा यूनिट बना देंतो सौराष्ट्री और गुजराती लड़ेगा। वह बच नहीं सकता। वह माइंड वही है। वह तत्काल नये डिवीजन खड़े करके नई यूनिट बना कर लड़ाई शुरू कर देता है। इस माइंड को तोड़ना पड़े। माइंड को तोड़ने के सारे उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन हम क्या करते हैंहम इस माइंड को तोड़ना नहीं चाहते। इस माइंड के रहते यूनिटी चाहते हैं।
हम कहते हैंआप मुसलमान हैंमुसलमान धर्म बहुत अच्छी बात है। आप हिंदू हैंहिंदू धर्म का तो कहना ही क्याबहुत महान धर्म है। अब आप दोनों एक हो जाते हैं। आपकी दोनों नासमझियों की पहले हम तारीफ कर दिएउनको हम पुख्ता कर दिए और अब दोनों से कहा कि दोनों इकट्ठे हो जाओ। अजीब पागलपन है। कहना पड़ेगा कि तुम्हारा मुसलमान धर्म भी पागलपन हैजो आदमी को कटवा देतुम्हारा हिंदू धर्म भी पागलपन है जो आदमी को कटवा दे। इतनी हिम्मत जब तक न जुटा पाएं। जब तक हम दोनों को कहते रहेंतुम भी ठीकतुम भी ठीक। और दोनों ठीकऔर अल्ला-ईश्वर तेरे नाम! तुम दोनों आ जाओ और गले-गले मिल जाओ।
यह होने वाला नहीं है। हमको कहना पड़े कि उसका नाम अल्लाह भी नहीं है और उसका नाम ईश्वर भी नहीं है। उसका कोई नाम नहीं है और जब तक तुम नाम ले रहे होतुम बिलकुल बेसमझ हो। हमें इस तरफ से चोट करनी पड़े तोतो हम यूनिट तोड़ सकेंऔर एक बार यूनिट टूट जाएतो इस मुल्क में एकता लानी कठिन नहीं है। और एकता हमेशा इमरजेंसी की जरूरत हैरोज की जरूरत हैयह भी एक पागलपन है। हम चिल्लाते हैं कि एकताएकता--हमारे लिए रोज की जरूरत बन गई। क्योंकि ये छोटे-छोटे टुकड़े रोज जान ले रहे हैंनहीं तो एकता इमरजेंसी की बात है।
जब मुल्क पर कभी हमला हो कोई मुल्क पर दुश्मन आ जाएतो मुल्क इकट्ठा हो पाता है। इसमें कोई कठिनाई नहीं है। अभी भी चीन का हमला हुआ थातो आप इकट्ठे हो गए। इसलिए एकता कोई रोज की जरूरत नहीं है। क्योंकि बीमारी जब आएगी,तब दवा का इलाज कर लेंगे। इसकी कोई जरूरत ही नहीं है। हमको जरूरत पड़ गई हैक्योंकि हम रोज उपद्रव में पड़े हुए हैं।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

उसके कारण हैं पॉलीटिशियन। असल में इतने पॉलीटिशियंस हैं मुल्क में कि उनकी तृप्ति कैसे हो।

यह ह्यूमन नेचर है?

यह ह्यूमन नेचर नहीं है। असल में यह बड़े मजे का सवाल आपने पूछा। ह्यूमन नेचर जैसी कोई चीज नहीं है। यानी इसका मतलब यह है कि आप ह्यूमन नेचर को जैसा बनाना चाहेंवह बन जाता है। ऐसी कोई फिक्स्ड चीज नहीं है। इसलिए अगर किसी देश में स्त्रियां महत्वपूर्ण हैं और पुरुष कम महत्वपूर्ण हैंतो वहां ऐसा लगता है कि ह्यूमन नेचर है कि स्त्री महत्वपूर्ण है कि पुरुष महत्वपूर्ण है।
अब जैसे कुछ इलाकों में जहां कि स्त्री महत्वपूर्ण हैवहां स्त्री खड़े होकर पेशाब करेगीपुरुष बैठ कर पेशाब करेगा। इम्पार्टेंस जिसकी है वह खड़े होकर पेशाब करेगा। यह इसकी उपाय नहीं है कि बेचारे को बैठ कर करना पड़े। उस इलाके का आदमी सदा से ऐसा सोचता था कि स्त्री खड़े होकर पेशाब करती हैपुरुष बैठ कर पेशाब करता है। जब पहली दफे उसने पुरुष को खड़े होकर करते देखा और स्त्री को बैठ कर तो उनको पता चला कि यह ह्यूमन नेचर नहीं है। ह्यूमन नेचर जैसी कोई फिक्स्ड चीज नहीं है। ह्यूमन नेचर बहुत फ्लेक्सिबल चीज है। इसलिए हजार तरह का ह्यूमन नेचर हो सकता है। आप कैसा विकसित करते हैं। तो यह जो इंडियन माइंड हैउसने एक कंडीशनिंग विकसित की है। अब जैसेकुछ बातें हम विकसित करते हैं परंपरा में। लंबे अर्से में वह फिक्स्ड हो जाती हैं। एक दफा फिक्स्ड हो जाएं तो नेचर बन जाती हैं। आदत ही होती है लेकिन वह नेचर बन जाती है। अब जैसे कि यह जो लड़ने की वृत्ति है--लड़ने की वृत्ति के हजार रूप होते हैं। लड़ने की वृत्ति बड़ी फ्लेक्सिबल चीज है। वृत्ति है। हमने क्या किया हैपहले तो हम जो बुनियादी चीजें हैंउनको स्वीकार नहीं करते हैं। फिर वे कनिंग रास्ते खोज कर निकलती हैं। जैसे लड़ने की वृत्ति।
इस हमें स्वीकार करना चाहिएयह है। लेकिन हम कहेंगेनहीं है। मनुष्य का धर्म नहीं है लड़ना। हम क्या करेंगेपहले तो इसको इनकार कर देंगेमनुष्य का धर्म ही नहीं है लड़नायह तो पशु का धर्म है। इसको पशु का धर्म तय कर देंगे और मनुष्य भी लड़ने की वृत्ति से भरा हुआ हैजो स्वाभाविक है। इसके लिए हम और कुछ न करेंगे और मनुष्य को समझाएंगे कि मनुष्य कभी लड़ता नहीं। मनुष्य तो महान है। अब यह उस बेचारे के भीतर जो वृत्ति हैवह क्या करेअब वह कोई तरकीबें निकाल लेती है--मस्जिद के पीछे से लड़ेगामंदिर के पीछे से लड़ेगाभाषा के पीछे से लड़ेगा।
अगर हम सीधा-सीधा स्वीकार कर लें कि लड़ने की वृत्ति मनुष्य का हिस्सा हैतो हम उसके लिए आउट-लेट खोज सकते हैं,ज्यादा उचित है। जैसेखेल मेंअगर हम अपने मुल्क के लड़कों को तीन घंटे ग्राउंड पर खेल खिला सकेंतो हम मुल्क के नब्बे परसेंट उपद्रव को बंद कर दें। अब एक उम्र हैजब एक बच्चा दो घंटे तक गेंद फेंकता हैवह उसको नहीं मिलता है फेंकने को,वह पत्थर फेंकता है। वह पत्थर बस पर फेंकेगाकांच पर फेंकेगा। आप उसको तीन घंटे ग्राउंड पर गेंद फिंकवाते हैंस्टिक लड़वा देंलकड़ियां तुड़वा देंतो वह तीन घंटे बाद तृप्त होकर घर लौट आएगा।
यह बड़े मजे की बात है कि आमतौर से शिकारी तरह के लोग बहुत भले लोग होते हैं। उनकी हिंसा वहां निकल जाती है। और जिनको आप बहुत भले आदमी कहेंवह अक्सर बहुत बुरे आदमी होते हैं। हिटलर सिगरेट भी नहीं पीता हैशराब भी नहीं पीता हैमांस भी नहीं खाता हैनौ बजे रात सो जाता है। पक्का महात्मा है। और मनोवैज्ञानिक अब कह रहे हैं कि अगर हिटलर सिगरेट पीता होताजुआ खेलता होतावेश्या के घर हो आया होताशराब पी लेतातो दुनिया युद्ध में न जाती। इस आदमी का कुछ तो निकल जाता।

तो क्या संयम से कुछ नहीं होता है?

उसके वैज्ञानिक रास्ते खोजने चाहिए। उससे ही संयम पैदा होता है। संयम जो हैवह सप्रेशन नहीं है। संयम जो हैवह समझ है। अगर एक युवक एक उम्र में जब वह लड़ना चाहता हैऔर मैं समझता हूं कि लड़ने की बात युवा होने का लक्षण है। और जिस दिन नहीं होगी दुनिया मेंउस दिन दुनिया बड़ी फीकी हो जाएगी। अब रहा लड़ने का जो क्षण हैउस लड़ने के क्षण को हम गौरवपूर्ण बना पाते हैं कि अगौरवपूर्ण बना पाते हैं। यह हमारी सामाजिक व्यवस्था और चित्त को सोचने की बात होगी।
अब जब युवक लड़ना चाहते हैं तब वे इस ढंग से लड़ें कि लड़ना खेल हो जाए और गंभीरता न बन जाए। लड़ेंगे तो वह पक्का। और आपने खेल न बनाया तो तो वे हिंदू-मुसलमान के नाम से लड़ लेंगे। लड़ेंगे तो पक्का हीलड़ने से नहीं रुक सकते।
तो जो सोसायटी निकास दे देती हैउस सोसायटी में उपद्रव दिशा ले लेगी। फिर उन उपद्रवों को हम क्रिएटिव भी बना सकते हैं। अब जैसे कि खतरे की एक वृत्ति है युवक के पास। एक उम्र तक वह खतरा लेना चाहता है--चाहें तो आप हिमालय पर चढ़वा लें,समुद्र पार करवा लेंवृक्षों पर चढ़वा लेंआकाश में हवाई जहाज उड़वा लें।
अगर आप यह न करवा पाएतो भी खतरे तो लेगा। तो पड़ोस की स्त्री को धक्का मार देगामगर तब वह बेहूदा हो जाएगा और बेमानी हो जाएगा। और वह भी उतना नुकसान उठाएगा और जिसके साथ वह बदल लेगावह भी नुकसान उठाएगा और पूरी सोसायटी करप्ट होगी। मेरी अपनी समझ यह है कि अगर हम मनुष्य की सारी वृत्तियों को सहज स्वीकार कर लें और फिर उनके निकास की वैज्ञानिक और क्रिएटिव--सृजनात्मक दिशा खोजें। जैसे कि हम मान कर चलते हैंहम चाहते हैं कि लड़कों में पच्चीस साल तक सेक्स ही न हो। अब यह यहूदी की बातें मान कर हम चलते हैं! इसको हम मान तो लेते हैं और ब्रह्मचर्य ही जीवन हैऐसी तख्ती भी लगा देते हैं कभी-कभी। लेकिन इसका कोई परिणाम तो होने वाला नहीं है। हांइसका एक ही परिणाम होता है कि सेक्स को जो हम क्रिएटिव मार्ग दे सकते थेवह हम नहीं दे पा रहे हैं। और तब सेक्स परवर्ट होता है और हजार तरह के उलटे रास्ते खोजता है।

क्रिएटिव मार्ग क्या है?

क्रिएटिव मार्ग का मेरी अपनी समझ यह है कि सेक्स के बहुत से डायमेंशन हैं। अगर लड़के और लड़कियों को बचपन से साथ बड़ा किया जाएतो एक डायमेंशन उनका तृप्त हो जाता हैजो कि बहुत बड़ा डायमेंशन है। लड़के लड़कियों को जानना चाहते हैंलड़कियां लड़कों को जानना चाहती हैं। क्युरासिटी है। यह क्युरासिटी गलत हो सकती है। यह क्युरासिटी गलत हो गई है। जब आप किसी के की-होल में से झांक कर देखते हैंतब यह जरा अशोभन हो गई। या किसी की दीवाल के बगल में कान लगा कर किसी के घर की बातें सुनते हैं तब यह अशोभन हो गई।
यही क्युरासिटी विज्ञान बन जाती है। तब भी आप कान लगा कर सुन रहे हैंलेकिन तब आप एटम की आवाज सुनने की कोशिश कर रहे हैं कि एटम क्या कर रहा हैयही क्युरासिटीइसमें कोई फर्क नहीं है मानने में। और जब आप एक एटम के पास घंटों बैठ कर उधेड़बुन कर रहे हैंतब भी वही क्युरासिटी है। लेकिन हमारे मुल्क की क्युरासिटी सेक्स के आस-पास घूमती है और नष्ट होती है। साइंटिफिक नहीं हो पाती। जिस मुल्क में सेक्स फ्रीडम होगीउस मुल्क में साइंस का जन्म तत्काल शुरू हो जाता है।
यूरोप में पिछले तीन सौ वर्षों में जिस मात्रा में सेक्स की फ्रीडम बढ़ीउसी मात्रा में साइंटिफिक इनवेंशन बढ़ा। इसके भीतर पैरेलल संबंध है। असल में जब सेक्स की क्युरासिटी खतम हो जाती हैतो क्युरासिटी कहां जाएएक स्त्री को आपने नग्न देख लियाअब आप क्या करिएगाअब स्त्री को नग्न देखने की बात तो खतम हो गई। अब आप कोई और गहरे तल पर किसी और चीज को नग्न करेंगेअनकवर करेंगे। अब आप प्रकृति को नग्न करने चले जाएंगे। अब आप एवरेस्ट पर चढ़ेंगे या हिमालय के गौरीशंकर को उघाड़ेंगेया कुछ और करेंगे।
मैं नहीं कहता कि जो पश्चिम हो गयावह बिलकुल ठीक हो गया। कहता मैं यह हूं कि उससे हमें बहुत कुछ सीखने योग्य है। उसमें बहुत कुछ समझने योग्य है। जो भी सेक्स सप्रेसिव समाज हैवह साइंटिफिक नहीं हो पाता है। उसकी क्युरासिटी सेक्स के आस-पास रह जाती है। और मेरा मानना है कि लड़के और लड़कियों को साथ बड़ा करना चाहिए। उन्हें साथ दौड़ने दोखेलने दो,तैरने दो। उनके बीच भी यह हिंदू-मुसलमान से भी बड़ा खतरा खड़ा किए हुए हैं--लड़की अलग और लड़का अलग!

वह जो नेचरल इंस्टिंक्ट हैवह कुछ न करने का कर बैठती हैतो उसके लिए क्या उपाय है?

वह जो भय है आपकाउस भय की वजह से वह नहीं रुकती। उस भय की वजह से वह दुगुना कर बैठती है। और उलटे रास्तों से करती हैजो कि बीमार और रुग्ण हो जाते हैंएबनार्मल  हो जाते हैं। जो नार्मल हैकरने योग्य हैउसको रोकने की वृत्ति भी आपकी गलत है। मेरा मतलब समझेजो नार्मल और करने योग्य हैजैसे चौदह साल का लड़का और लड़की हो गए हैंवे प्रेम करेंगे। अगर इनके प्रेम को हम सहज व्यवस्था दे सकेंऔर इनको सेक्स की पूरी शिक्षा दे सकेंइनको करीब आने का पूर मौका दे सकेंतो ये खुद भी इतने रिस्पांसीबल हो जाएंगे कि सौ में से दस मौके ही उस खतरे के हैंजो आप कह रहे हैं। और आप जो करवा रह हैंउसमें नब्बे मौके हैं और इस मौके बचने के हैं। जो बचेंगे वे होमोसेक्सुअल हो जाएंगेवे और दूसरे उपद्रव कर लेंगेजिनकी वजह से जिंदगी भी खतरे में पड़ जाएगी। और मेरी अपनी समझ यह है--हॉस्टल्स और यूनिवर्सिटी में बहुत दिन रहने के बादा--बहुत मुश्किल से ऐसे लड़के मिलेंगेजो मास्टर्बेशन नहीं कर रहे होंहोमोसेक्सुअल नहीं हैं। बहुत मुश्किल से लड़कियां मिलेंगीजो होमोसेक्सुअल नहीं हैं। आउट-लेट वे खोजेंगी। आपने एक आउट-लेट बंद कियाजो कि नैसर्गिक था। वे आउट-लेट खोज रहे हैं।

यह जो परवर्शंस का भय हो जाता हैवह क्या है?

यह तो होगा नक्योंकि जितनी भी अप्राकृतिक व्यवस्था होगीउतनी ही स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाली होगी। स्त्री और पुरुष का संबंध स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं है। लेकिन अगर परवर्शन पैदा हो जाए तो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने वाला है। अप्राकृतिक है वह। और दूसरी बातएक दफाअप्राकृतिक मार्ग बन जाए आपके दिमाग कातो उसे प्राकृतिक मार्ग पर लौटाना असंभव हो जाता है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

यह बात तभी तक रोक सकते हैंजब तक आपके पास किताबें हों। अगर आपके पास बिलकुल किताबें होंतो स्वामी जी भाड़ में जाएंगेआप किताब चुरा ले जाएंगे। विवेक जो हैवह भी आसमान से नहीं उतरता। वह भी व्यवस्था से आता है। असल में अगर एक लड़का और लड़कियों के साथ बड़ा हुआ हैउसने सब तरह की लड?कियों के साथ खेला और कूदा हैतो पहली तो बात यह है कि लड़की में जो एक पागल आकर्षण मालूम होता हैवह बहुत गुणा क्षीण हो जाता है। तो आपकी पत्नी को वह रास्ते पर धक्का इतनी आसानी से नहीं मार सकता। उसके भीतर भी आकर्षण में बुनियादी फर्क पड़ता है।
दूसरी बातजैसे-जैसे वह परिचित होता हैऔर अगर हमारी कोई रुकावटें न हों। अब जैसे समझ लेंएक आदमी जिसे घर में खाना ठीक से मिलता हैउसको बहुत कम संभावना है कि अगर एक रात उसे खाना न मिलेतो वह दूसरे के घर में चोरी करने चला जाए। एक रात में यह संभव नहीं है। लेकिन एक आदमी को खाना ही न मिला हो और आपके सामने किचन में ही उसको बिठा कर रखा गया हो और किचन तक हाथ भी न बढ़ाने दिया जाता हो और उसको अगर आज रात मौका मिल जाए और वह भूखा होतो संभावना बहुत कम है कि विवेक काम कर पाए। विवेक के काम करने की भी सिचुएशन चाहिए। हम विवेक की तो बात करते हैंलेकिन सिचुएशन बिलकुल अविवेकपूर्ण है।
मेरा दोनों बात पर जोर है। मेरा कहना है पहले तो सिचुएशन ऐसी बनाएं जिसमें विवेक काम कर सके। दूसरा विवेक पैदा करने का आपका क्या उपाय हैबाप कभी बात नहीं करता है बेटे से सेक्स कीमां कभी बात नहीं करती। शिक्षक कभी बात नहीं करता। विवेक आसमान से आ जाने वाला हैउसके भीतर जो नेचरल इंस्टिंक्ट आएगीवह बिलकुल एनिमल होगी और कोई दुनिया में उसको बताने वाला नहीं कि क्या हो रहा है उसके भीतर। वह तो यही समझेगामैं ही कोई एक पापी हूंदुनिया में यह हो ही नहीं रहा है। बाप जो हैउसको यह हो नहीं रहा है।
अभी कल मुझे एक लड़के का पत्र आया है। उसने लिखा है कि मैं तो सदा ही समझता था कि मेरे बाप को सेक्स जैसी कोई चीज ही नहीं हैलेकिन मैंने जब उन्हें मां के साथ संभोग करते देखातो मैं हैरान हो गया कि मुझे ब्रह्मचर्य का उपदेश दिया जा रहा है। और उस दिन से मैं बाम का दुश्मन हो गया हूं। और उसने जो पत्र लिखा हैवह बहुत हैरानी का है कि बाप का मैं दुश्मन हो गया हूं तो मैं अपने बाप के प्रति श्रद्धा कैसे पैदा करूंयह मुझे लिखिए। और मेरे भीतर एक अजीब चीज चल रही हैजो मैं किसी को नहीं कह सकता। मैं भी अपनी मां के साथ संभोग करना चाहता हूंजब बाप करता है। यह परवर्शन हो गया।
लेकिन यह इतना खतरनाक है कि लड़का अगर किसी लड़की से संभोग करना चाहेतो नेचुरल हैलेकिन अगर यह मां से करना चाहे तो यह परवर्शन है। और यह परवर्शन इसके मां-बाप दोनों ने मिल कर पैदा किया हैक्योंकि दोनों इसको यह दिखा रहे हैं कि इस तरह की बात ही नहीं है कोई। इसको एकदम अंधेरे में रखा जा रहा है। और इसको उपदेश पिलाए जा रहे हैं। उपदेश भी ऐसे हैंजो उनके व्यक्तित्व के बिलकुल विपरीत हैं। इस बात को स्वीकार करना चाहिएकि सेक्स जीवन की सहज स्थिति है। मां को स्वीकार करना चाहिए कि सेक्स भी जीवन की सहज स्थिति है।
इस बच्चे को नार्मल बनाने के लिए जरूरी है कि जो इसके भीतर उठ रहा हैवह सहज इसको बताया जाए कि सहज से घबड़ाने की कोई बात नहीं है। यह कोई बीमारी पैदा नहीं हो ही है तुम्हारे भीतर। इसको अकेले कैदखाने में डाल देने की जरूरत नहीं है कि अपनी बीमारी को खुद ही सोचे। इसकी साथी मिल जाएंगेजो इतने ही अनजान और अशिक्षित हैं। इसको लोग मिल जाएंगे,जो इसको गलत रास्तों पर डाल देंगे। सेक्स की पूर्ण शिक्षा विवेक लाने में बड़ी सहयोगी है।
एक--सेक्स के संबंध में कंडेमनेशन का भाव हट जाए तो विवेक आने में बड़ा सहयोग मिलेगा। सेक्स कोई पाप नहीं हैपरमात्मा की तख्ती उस पर भी है। ऐसी दिव्यता की धारणा अगर पैदा की जाएतो सेक्स का दुरुपयोग करना फिर मुश्किल हो जाए।

तो साधु-संत जो ब्रह्मचर्य का पालन सिखाते हैंवह गलत है?

यह बिलकुल ही अवैज्ञानिक बकवास है। और जो भी इन बातों को कर रहा है...क्योंकि मैं मानता हूं कि इस मुल्क का साधु धोखे की बातें कर रहा है और गलत बातें कह रहा है। और वह बातें इसलिए कर रहा हैमैं तो इतना हैरान हूं कि साधारण गृहस्थ अगर मेरे पास आता है मिलने तो उसके हजार प्रॉब्लम होते हैंउनमें एक प्रॉब्लम सेक्स होता है। लेकिन साधु मुझसे मिलने आता है तो उसके हजार प्रॉब्लम में हजार प्रॉब्लम सेक्स के होते हैं। वह दिन-रात ब्रह्मचर्य समझा रहा है और जब मुझसे प्राइवेट में मिलता हैतो उसका प्रॉब्लम क्या है?
अस्सी साल का हो गया हैसत्तर साल का हो गया हैतो भी! बढ़ जाता है ज्यादा। क्योंकि जितना सप्रेस किया थालोलुपता भारी हो जाती है। और जब शक्ति कम हो जाती हैतो लोलुपता और भी उस पर हमला करती है कि अभी समय भी चुका जा रहा है। मैं यह मानता हूं कि ब्रह्मचर्य जैसी संभावना हैलेकिन ब्रह्मचर्य सेक्स के विपरीत लड़ कर कभी संभावना नहीं है। सेक्स को समझ कर जरूर संभव है। लेकिन सेक्स की निंदा अगर आप करते हैंतब तो बिलकुल संभव नहीं हैक्योंकि फाइट शुरू हो गई और इसलिए नहीं संभव हो पाया। आप ऋषि-मुनियों की अगर कहानियां पढ़ेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि ब्रह्मचर्य के नाम पर जो-जो आपके ऋषि-मुनियों का जीवन हैवह बताता है।

यह तो यूरोप में भी है।

कहीं भीआपके ऋषि-मुनि ही नहींसप्रेशन सब जगह था। आप जैसा सप्रेशन सारी दुनिया में था। सारी दुनिया का जो पिछला दिमाग थाउसमें एक सा सप्रेशन है। सारी दुनिया में धर्म ने वही सिखाया है। लेकिन उसके परिणाम आप जानते हैं कि क्या-क्या हुएपूरा भ्रष्टाचार है। अगर आप अपने ऋषियोंदेवताओं की कहानियां पढ़ें तो वे सारी कहानियां भ्रष्टाचार की हैं। और मजा यह है कि उनको हम पूजे चले जा रहे हैं और ब्रह्मचर्य की बकवास किए जा रहे हैं! सब उपद्रवी हैं। यह जो मामला है,हम यह नहीं देखते कि सब ऋषि-मुनियों का हो गया है।

विश्वामित्र और मेनका की जो बातें हैं द्रष्टा के लिएतो उसमें क्या हैं?

यही है--असल में जहां भी ऋषि जो हैउसका स्खलन सदा आसान है। साधारण आदमी के बजाय। स्खलन तब आसान हैजब कि सप्रेशन बहुत तीव्र हो। और मेनका को लाने की जरूरत नहीं है। साधारण सी स्त्री मेनका जैसी दिखाई पड़ेगीअगर आपका दिमाग सप्रेशन में है। कोई अप्सराएं उधर से उतर कर यहां ऋषियों को भ्रष्ट करने आएंऐसा कोई इंतजाम परमात्मा का दिखाई नहीं पड़ताऔर अगर ऐसा कोई भी इंतजाम हैतो परमात्मा भी हद्द कनिंग है।
एकदम बेमानी बात है कि एक आदमीऋषि बेचारा साधना कर रहा है और ऊपर से अप्सराएं भेजी जा रही हैंउसको भ्रष्ट करने के लिए! यह परमात्मा की उत्सुकता बहुत सेक्सुअल है। और परमात्मा किसी का तपोभंग करने को उत्सुक है कि तप बढ़ाने को उत्सुक हैयह सारी व्यवस्था हुई न। असल में कोई अप्सरा नहीं आ रही है। लेकिन साधारण सी स्त्री बहुत सप्रेशन से अप्सरा दिखाई पड़ती है। और स्त्री न होतो भी दिखाई पड़ सकती है। बहुत सप्रेसिव दिमाग होतो प्रोजेक्शन शुरू हो जाता है। आंखें बंद कीं और स्त्री ही दिखाई पड़ेगीऔर कुछ ध्यान में आने वाला नहीं है। तो यह सारी की सारी अवैज्ञानिक अव्यवस्था थी।

यह सेक्स के बारे में बहुतआपके विचारों के बारे में बहुत कुछ बातें होती हैं। उसका आपकी ओर से कुछ खुलासा करेंगे?

बिलकुल खुलासा करूंगा। मेरी अपनी दृष्टि ऐसी है कि एक तो जीवन में जो भी हैउसको मैं निंदा के भाव से नहीं देखता। जीवन के प्रति मेरे मन में निंदा का भाव ही नहीं है। समग्र जीवन का बाबत। अगर आपके भीतर क्रोध हैतो उसे भी मैं निंदा से नहीं देखूंगा। मैं मानता हूंक्रोध भी बहुत बड़ी शक्ति हैऔर उसके दोनों रूप हो सकते हैंरचनात्मक भीविध्वंसात्मक भी।
इसी तरह काम हैलोभ है--सब एनर्जीज हैं। इसलिए जीवन की समस्त एनर्जीज को मैं स्वीकार करता हूं। और इनकी स्वीकृति के बाद ही मैं मानता हूं कि इनकी समग्र स्वीकृति में इनके परिष्कार का पहला कदम हैक्योंकि जिस शक्ति को हम स्वीकार नहीं करतेउस शक्ति से हम लड़ना शुरू कर देते हैं। और जिस शक्ति से हम लड़ते हैं तो हमारे भीतर हम खंड-खंड करते हैं--अपने से ही लड़ना है वह। अगर मैं अपने बाएं हाथ की निंदा करूं और दाएं हाथ को लड़ाऊंतो उसमें कुछ हारने-जीतने वाला होने वाला नहीं है। दोनों हाथ मेरे हैं। कोई जीतेगा नहींकोई हारेगा नहींसिर्फ लड़ाई चलेगी।
हांएक हार जाएगामैं हार जाऊंगा आखिर में लड़ते-लड़ते। हाथ मेरे लड़ेंगे। तो मेरी सारी शक्तियां हैंवे इंटिग्रेटेड होनी चाहिए। और अगर मैंने अपनी एक भी शक्ति से लड़ना शुरू कियातो मैं डिसइंटिग्रेटेड हुआ और टुकड़ों में टूटा हुआ आदमी स्किजोफ्रेनिक हो जाता है। इसलिए भारतीय संस्कृति को मैं स्किजोफ्रेनिक कहता हूं। यह हमारा पूरा का पूरा दिमाग खंड-खंड है,टुकड़ों में बंटा है और आपस में लड़ रहे हैं अपने भीतर। यह लड़ाई मैं पसंद नहीं करता।
मैं मानता हूंजो मेरे भीतर हैजो मिला है प्रकृति से या परमात्मा सेइस सबको मैं कैसे सृजनात्मक मार्ग पर ले जा सकूंयह कैसे मेरे लिए अधिकतम सुख का कारण बन सकेयह कैसे मेरे लिए अधिकतम तृप्ति ला सकेयह कैसे मेरे लिए वह जगह ला सकेजो मैं कह सकूं कि जीवन धन्य हुआ। इस दिशा में मैं इन सारी शक्तियों को कैसे ले जाऊंइनमें से किसी शक्ति को काटना नहींनष्ट नहीं करना हैइसलिए सेक्स पर भी मेरी पूरी स्वीकृति है। अब यह जो स्वीकृति हैइससे भ्रांति पैदा होती है। लोगों का चूंकि सप्रेसिव माइंड हैइसलिए उनके लिए स्वीकार का मतलब सिर्फ होता है एकदम से।
जिस आदमी ने उपवास किया हैउसे भोजन का मतलब सदा ही ज्यादा खा जाना होता है। सदा ही। उसके लिए जो मतलब होता है दिमाग सेक्योंकि उसके लिए वह सोच ही नहीं सकता कि भोजन मिले और ज्यादा न खाया जाए। पंद्रह दिन से जो उपवास कर रहा है वह भोजन का मतलब ज्यादा खा जाना। तो वह दो ही काम कर सकता हैया तो वह भोजन बिलकुल रोके रहेतब चल सकता है। अगर वह थोड़ा सा शुरू करेतो सब खा जाएज्यादा खा जाएइसका डर उसको सदा है। तो वह कहेगाभोजन को स्वीकार की मत करो। स्वीकार किया कि मुश्किल में पड़े।
यह जो हजारों साल का हमारा दमित चित्त हैयह दमित चित्त हमें इतना डराता है कि हमने जड़ से स्वीकार किया है। सभी धर्म दमित हैं न। असल में सभी धर्म जो हैंवह विज्ञान के जन्म के पहले के हैं। और विज्ञान की नवीनतम मनस खोजों ने हमें बताया है कि दमन जो हैवह विकृत करता हैस्वीकृत नहीं करता है। असल में सभी धर्म फ्रायड के पहले के हैंऔर फ्रायड के बाद अभी कोई धर्म पैदा नहीं हुआजब कि अब धर्म फ्रायड के बाद जो पैदा होगावह बड़ा भिन्न होगा।
इसलिए जो मैं कह रहा हूंवह उस धर्म की पहली स्वीकृति होगी। मेरे हिसाब में प्रि-फ्रायडियन धर्म और पोस्ट-फ्रायडियन धर्म अलग हो गए। लेकिन अभी फ्रायड के बाद कोई धर्म पैदा नहीं हो पाया है। सब धर्म जो हैंप्रि-फ्रायडियन हैं। कोई दो हजार साल पहले का हैकोई हजार साल पहले का है। ये सारे के सारे धर्मोंने दमन कोसताने कोकष्ट देने कोअपने को दबाने को स्वीकार किया था। यह बिलकुल ही स्वाभाविक था।
मनुष्य के मन के संबंध में हमारी जानकारी बहुत कम है। अब मनुष्य के संबंध में हमारी जो जानकारी हैवह कहती हैयह गलत रहा। और इस गलत के कोई फायदे कहीं हुएधर्म की इतनी चर्चा हुईउन्होंने कितने धार्मिक आदमी पैदा कर लिए?
और अगर कभी करोड़ दो करोड़ आदमी में एक आदमी बुद्ध हो जाएतो यह ऐसे ही हैजैसे दो करोड़ पौधे हम लगाएं और एक पौधे में फल आ जाएतो माली का प्रशंसा करनी पड़े! यह नासमझी की बात हैइसमें कोई प्रशंसा की बात नहीं है। दो करोड़ पौधों में एक पौधे पर फल आ गया है तो यह माली निंदा योग्य है। और मानना चाहिए कि यह फल माली के कारण नहीं आयामाली से बच कर आ गया है किसी तरह से। माली का सबूत तो दो करोड़ पौधे पर है। तो हमारा जो धर्म थाउसने कितने धार्मिक आदमी पैदा किएअगर कुछ दस-पांच आदमी धार्मिक पैदा हो गएजो अंगुलियों पर गिने जा सकें और करोड़ों,अरबों लोग क्रिपिल्डपरेशान और चिंता में जीएंतो यह हमें मानना चाहिए कि इंस्पाइट ऑफ स्वास्थ्य ये कुछ लोग पैदा हो गए हैं। यह कोई दिमाग गौरव नहीं है। यह किसी तरह बच निकले।
अमेरिका में विचारक हुआ थोरो। थोरो जब पढ़-लिख कर अपने गांव आयायूनिवर्सिटी से लौटाउसके गांव में उसका स्वागत हुआ और एक बूढ़े ने एक बहुत कीमती बात कही। और उस बूढ़े न कहामैं थोरो का स्वागत करता हूं कि यह लड़का अपने को यूनिवर्सिटी से बचा कर लौट आया है। यह जैसा गया थावैसे ही लौट आया हैइसलिए मैं इसका स्वागत कर रहा हूं। इसने अपने को कैसे बचा लियायह आश्चर्य है।
मेरी समझ में बुद्ध और महावीरकृष्ण और क्राइस्टशंकर और नागार्जुनये थोड़े से लोग हमारे हुए हैंये लोग कैसे हमारी संस्कृति से बच कर हो गएयह आश्चर्य हमें करना चाहिए। हमारी संस्कृति के सबूत नहीं हैं। ये हमारी संस्कृति से बच कर इनमें फल आ गए। आने वाले भविष्य में मैं समझता हूं कि यहां करोड़ दो करोड़ में एकाध दो आदमी न हो पाए धार्मिकतो हम समझेंगे कि चलेगा। तोतो क्षम्य है। लेकिन अब ऐसा नहीं चल सकता है कि एक आदमी धार्मिक हो और दो करोड़ आदमी अधार्मिक होंतो हमें समझना पड़ेगा कि धर्म का विज्ञान कहीं भ्रांत है। तो मैं मानता हूं कि भ्रांत है और उसकी सबकी सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि वह मनुष्य की शक्तियों का आरोहण नहीं सिखाता हैदमन सिखाता है। तो सेक्स के बाबत हमारी सबसे ज्यादा कठिनाई हैकि उसको हमने ज्यादा दबाया है। और उसके दबाने के कुछ कारण थे।
बड़े मजे की बात यह है कि पक्की समझ वाला कोई आदमी है ही नहीं इस दुनिया में। मुश्किल से दस-पांच हैं। वह जो बूढ़ा है,वह उससे भी ज्यादा कच्चा हैजितना कि जवान है। सिर्फ उम्र ज्यादा हो गई हैतो वह समझ रहा है कि पक्की समझ है! पक्की समझ सप्रेसिव माइंड में कभी पैदा नहीं होती।

आपका जो प्रवचन हैवह कच्चे मानस पर...।

उसी के लिए तो है नमेरा तो। उसी पर असर करना है। वह जिसको आप पक्की समझ कह रहे हैंवह तो उस जगह पहुंच गया है कि वह पॉइंट ऑफ नो रिटर्न पर है वह। उसको तो लाना भी नहीं है। मैं मानता हूं कि अगर आदमी ईमानदारी से नास्तिक हो सकेतो बेईमानी से आस्तिक होने से सदा बेहतर है। और जो आदमी नास्तिक भी नहीं हो सकतावह आस्तिक होगा कभीयह मैं शक करता हूं। नास्तिक होना पहली सीढ़ी हैआस्तिक होना अंतिम फल है।
नास्तिकता मार्ग हैआस्तिकता उपलब्धि है।
तो मैं इनको भी विरोध में नहीं मानता। जैसे विश्वास और संदेह के लिए मैंने आपको कहावैसे मैं मानता हूं कि नास्तिक होना अनिवार्य हिस्सा है। एक उम्र हैजब आदमी को इनकार करना सीखना चाहिए। और एक उम्र है कि जब उसको जल्दी हां नहीं भरनी चाहिएक्योंकि वह कमजोरी का सबूत है। हां मजबूरी में नहीं भरनी चाहिएहां किसी अनुभूति से भरनी चाहिए। तो मैं तो मानता हूंयुवकों को एक वक्त नास्तिकता से गुजरना ही चाहिएऔर अगर वे नास्तिकता से गुजर सकेंतो ही किसी दिन सिंसिअरली आस्तिक हो कसेंगे।
और हमारे मुल्क का जो आस्तिक हैवह बेईमान इसीलिए है। वह कभी नास्तिक तक होने की ईमानदारी उसने नहीं दिखाई है। उसने ईश्वर तक के लिए झूठी हां भरी हैऔर उसकी हां तो ठीक ही है--उसका ईश्वरउसका परमात्माउसका मोक्ष सब झूठा हां भर रहा है। उसको कुछ भी पता नहीं और वह हां भर रहा है! तो मैं नहीं मानता कि नास्तिकता बुरी बात है। मैं तो मानता हूंअनिवार्य मैच्योरिटी मेंजिसको आप पक्की समझ कह रहे हैंउसकी सीढ़ी का हिस्सा है।
आपकी बात तो कच्ची समझ वाले पांच-दस हजार साल से सुन रहे हैं और पक्की समझ वाले नहीं हो पाए! एक पचास साल का मौका मुझे भी चाहिएमैं जो कह रहा हूं। आपकी तो पचास हजार साल से सुन रहे हैंअभी तक पक्की समझ वाला कोई हो नहीं पाया। उसी बात को आप फिर भी कहे चले जाना चाहते हैं! मैं मानता हूं कि मेरे साथ रिस्क है। आप जो कमजोर सिद्ध हो चुके हैंआपका तो कोई सवाल ही नहीं है। आप तो विकल्प हैं ही नहीं। मेरे साथ रिस्क हैवह ठीक भी हो सकता हैगलत भी हो सकता है। उसमें एक संभावना ठीक होने की हैएक गलत होने की है। आप तो सौ प्रतिशत गलत हो चुके हैं। आप तो कोई विकल्प ही नहीं हैं। मैं मानता हूंखतरा है हीलेकिन हर नई चीज में खतरा हैऔर खतरा होना चाहिए।
नीत्शे अपनी टेबल पर एक छोटा सा वचन--आपको पसंद पड़ेगा--लिखे रहता था--"लिव डेंजरसली'। और जब किसी ने उसको पूछा कि तुम क्यों लिखे हुए होतो उसने कहाऔर तो लिविंग को कोई मतलब ही नहीं होताजीने का कोई मतलब ही नहीं होता है। जीना है तो खतरे में ही जीना पड़ेगा। नहीं जीना हैतो मरना बहुत सिक्योरिटी की बात है। मर गएफिर कोई खतरा नहीं है। मरा हुआ आदमी फिर मर भी नहीं सकताबीमार भी नहीं पड़ सकताभूल भी नहीं कर सकतापाप भी नहीं कर सकता।

आप अपने को धर्मगुरु मानते हैं या नेता मातने हैं या क्या मानते हैं?

न मैं नेता हूंन मैं धर्मगुरु हूं।

तो फिर जो आपका चोला हैवह धर्मगुरु का है?

वह चोला मुझे पसंद है। वह मेरी स्वतंत्र पसंदगी है। जो मैं कपड़ा पसंद करूंवह तो मुझे पसंद करना चाहिए कि मैं कैसा कपड़ा पहनूं।

लेकिन भ्रांति हो जाती है लोगों में?

वह भ्रांति तो मैं तोड़ रहा हूं चारों तरफ से। वह नहीं टिकने दूंगा। मेरे कपड़ों से भ्रांति नहीं टिकने दूंगा। मैं भी तो मौजूद हूं कपड़े के भीतर। मैं नहीं टिकने दूंगा।

आप माक्र्स और फ्रायड का कुछ मिक्सचर हैंऐसा भ्रम होता है?

यह किसी को लग सकता है। लेकिन माक्र्सवादी से पूछेंगे तो नहीं कहेगा ऐसा। फ्रायडियन से पूछेंगे तो ऐसा नहीं होगा। क्योंकि जब मैं फ्रायड पर पूरी बात करता हूं तो मैं मानता हूं कि फ्रायड बहुत प्राथमिक है और बचकाना है। और माक्र्स बिलकुल आउट ऑफ डेट है। माक्र्स का कोई भविष्य नहीं है। यह तो जो मैं कह रहा था माक्र्स डिटर्मिनिस्ट है तो मैं यह कह रहा था कि भारत के मन में चूंकि डिटर्मिनिस्ट की जगह हैइसलिए माक्र्स को भी जगह मिल सकती है। लेकिन डिटर्मिनिज्म ही गलत है। कम्युनिज्म भी आएगा नहीं। कोई लाएतो ला सकता हैन लाए तो रोका जा सकता है। कोई कम्युनिज्म इनएविटेबिलिटी नहीं है। अभी मैंने "समाजवाद से सावधानलेक्चर दिए। पूरी किताब आपको भिजवा देता हूं। तो मैं तो सख्त खिलाफ हूं।

लोग तो आपमें शक कर रह हैं कि आप कम्युनिस्ट विचार के हैं?

स्वाभाविक हैमैं जो सारी चीजों में शक पैदा करवाऊंतो मेरे बाबत भी शक पैदा होयह बिलकुल स्वाभाविक है। इसमें वक्त लगेगाक्योंकि मैं इतनी बातें कर रहा हूं और इतने विभिन्न कोणों से कहता हूं और हमारा मन ऐसा है न कि तत्काल लेबल लगाने को उत्सुक होता है। अगर मेरी एक बात सुनीतो एक आदमी एक लेबल लगा देगा। मेरी दूसरी बात सुनी तोतो वह तत्काल लेबल बदलने की दिक्कत शुरू हो जाती है। अब मेरी कठिनाई यह है कि जिंदगी जो हैवह बहुत ही मल्टी डायमेंशनल हैऔर बड़ी जटिल है। उस पूरी जटिलता को जब आप पूरी तरह समझ पाएंतो आप कभी भी लेबल न लगाना चाहेंगे।

आप धर्मगुरु हैं या नेता हैंकम्युनिस्ट हैंक्या हैंआपका कोई स्वरूप पकड़ में नहीं आता है?

क्योंकि नहीं है कोई स्वरूप। हमारी कठिनाई क्या हैअभी एक घटना से आपको समझाऊं। मैं इधर पीछे एक दफा ट्रेन में बढ़ा बंबई से। यहां सब मित्र छोड़ने गए थे। तो मेरे कंपार्टमेंट में एक सज्जन और थे। उन्होंने देखाबहुत से लोग छोड़ने आए। किसी ने पैर छुआकिसी ने माला पहनाईस्वभावतः उन्होंने मेरे कपड़े वगैरह देखे तो समझा कि कोई महात्मा हैं।
गाड़ी चली तो उन्होंने साष्टांगबिलकुल सिर रख कर पैर पर मुझे नमस्कार कियाऔर कहा कि तुम्हें पक्का पता लगा लेना चाहिए कि मैं महात्मा हूं या नहीं हूं। तुमने तो पैर पहले ही पकड़ लिए। अब अगर मैं महात्मा न निकला तो तुम वापस कैसे लोगे और मुझ पर एक नाहक का ऋण हो जाएगा और मैं इसको लौटाऊंगा कैसेउन्होंने कहानहींआप भी क्या मजाक करते हैं। मैंने कहामैं मजाक नहीं कर रहा। मैं महात्मा नहीं हूं। मेरा शौक है ये कपड़े पहनने का। उन्होंने कहानहीं-नहींआप मजाक कर रहे हैं। अब वह आदमी डर गयाकहानहीं आप मजाक कर रहे हैं। मैंने कहामैं मजाक नहीं कर रहा हूंमैं कोई महात्मा नहीं हूं। तो उसने कहाकम से कम आप हिंदू तो हैं! जाने दो महात्मा को। अगर हिंदू भी हों तो चलो झंझट खतम हुई। मैंने कहाहिंदू तो मैं बिलकुल ही नहीं हूं। एक दफा महात्मा होने की भूल कर भी जाऊंहिंदू होने की भूल बिलकुल नहीं कर सकता। हिंदू बिलकुल नहीं हूं। उसने कहाअरेआप क्या मजाक किए दे रहे हैंक्या गजब किए दे रहे हैंवह इतना घबड़ा गया--पढ़ा-लिखा आदमी है वहएयर कंडीशंड में है वहपैसे वाला आदमी है! आप यह क्या कर रहे हैंहिंदू नहीं हैं आपतो आप कौन हैं। तो मैंने कहाक्या मुझे हिंदू या मुसलमान या ईसाई होना ही पड़ेगामैं निपट आदमी नहीं हो सकतामेरे निकट आदमी होने में कोई आपको आपेक्ष हैकि मुझे कोई लेबल होना पड़ेगा। कहानहीं-नहींमुझे कोई आक्षेप नहीं है। लेकिन उस आदमी ने क्या कियावह इतना उसको कठिन पड़ामेरे साथ बैठना कि वह कंडक्टर को बुला कर बगल के कंपार्टमेंट में चला गया। मैं बाथरूम गयातो मैंने देखाउसका सामान गया। तो मैंने उसका जाकर सुबह दरवाजा खटखटाया। मैंने कहा,सत्संग का आपने मौका छोड़ दियामैं जो मजाक कर रहा था। उसने फिर भी पैर पकड़े। उसने कहामैं तो पहले ही कह रहा था कि आप महात्मा हैं। आपने रात भर मुझे निकलवा दिया। यह जो मैं आपसे कह रहा हूं।
जो आप पूछते हैं कि मैं नेता हूं कि धर्मगुरु हूं। न मैं नेता हूंन मैं धर्मगुरु हूं। मैं एक निपट अकेला आदमी की हैसियत से खड़ा हूं जिसके साथ कोई लेबलिंग नहीं है। न मेरा कोई अनुयायी है।

फिर आपका उद्देश्य?

उद्देश्य जो मुझे ठीक लग रहा हैजो मुझे आनंदपूर्ण लग रहा हैवह आपसे कह देता हूं। फिर आपसे मेरा कोई संबंध नहीं है। आपने सुन लियाइतना काफी है।

इसका परिणाम होगा?

बिलकुल फिक्र नहींक्योंकि परिणाम की फिक्र नहीं है--बिलकुल नहीं है। आंदोलन इस पर हो जाएयह दूसरी बात है। मेरा आंदोलन नहीं है। नहीं होगातो मैं इसमें कोई इनकार करता नहीं।

क्या यह निरपेक्ष भाव आपको बराबर लगता है?

बराबर का प्रश्न नहीं हैवह हैएक बात। वह मेरे लिए आनंदपूर्ण है। और मैं मानता हूं कि ऐसे ही आनंदपूर्ण निर्लेप भाव से अगर कुछ होतो वह शुभ है। अगर हमारे करने की कोशिश से कुछ होतो उसमें कुछ न कुछ हिंसा हो जाती है। गुरु हिंसा कर ही देता है। नेता भी हिंसा कर देता है और पक्ष भी पैदा कर देता है। वह मुक्त नहीं कर पाता हैबांध ही देता है। तो मैं तो आपसे बात कह देता हूंफिर खतम हो गई बात। आपको अच्छी लगीबुरी लगीवह आप जानें। मुझसे आपका इससे कोई संबंध पैदा नहीं होता। ज्यादा से ज्यादा मित्रता के। और आपका मेरा संबंध कभी नहीं बन पाता। और उसमें मेरी आप बात मानते हैं कि नहीं मानते हैंवह आपका जानना है। मेरा कोई लेना-देना नहीं है। और मुझे आप न मानेंयह मेरी चेष्टा होती है। अगर मानें बात कोतो मुझसे कोई संबंध न रखेंगे। क्योंकि व्यक्ति आड़े आकर नुकसान ही पहुंचाते हैं सत्य को। वह धर्मगुरु की तरह पहुंचाएंनेता की तरह पहुंचाएंकोई फर्क नहीं पड़ता। एक हमने बात कीएक डायलाग पूरा हो गया। एक बात मैंने आपसे कीआपने मुझसे की। मैंने आपसे कुछ सीखाआपने मुझसे कुछ सीखाबात खतम हो गई। इसमें मैं सिखाने वाला,आप सीखने वालेऐसा भी पक्का रिश्ता नहीं है। इसमें हम दोनों बात करते वक्त सीख रहे हैं।
इस प्रक्रिया में इसलिए कौन शिष्य हैकौन गुरु हैकौन क्या हैये बेमानी बातें हैं और बचकानी हैं। अगर कहें तो चाइल्डिश हैं। असल में यह गुरु और नेतायह हमारे भीतर जो बहुत चाइल्डिश माइंड हैउसकी वजह से पैदा होता है। नहीं तो इनकी कोई जरूरत नहीं है। हमने तो यह बात कह दीआपने सुन ली। ठीक लगीठीक लगीगलत लगीगलत लगीखतम हो गई। इतना तय है कि अगर उस में कुछ भी दम थातो चाहे आप उसे सही मानें चाहे गलतआप वही नहीं होंगेजो बात सुनने के पहले थे। वह नहीं हो सकते--चाहे गलत मानें चाहे सही। एक आंदोलन शुरू हो गया। यह आंदोलन कोई परिणाम लाएतो फिर हम दुकानदार हो जाते हैं। दुकानदारी से ज्यादा नहीं रह जाती बात। यहां कोई दुकान नहीं हैजिस पर कि कुछ बेचना है। यहां तो मामला कुछ ऐसा है कि जो ग्राहक आएगाउसका कुछ छिन ही जाएगा। यहां से तो कुछ लेकर जाने की कम ही उम्मीद है।
अभी कल दोत्तीन महिलाएं आईं। कृष्णमूर्ति उनके घर ठहरते हैं। वे बड़ी घबड़ाई हुई आईं। उन्होंने कहाहमने आपको दो साल पहले सुना थातो हम बड़े प्रसन्न हुए और हमको लगा कि आप तो बिलकुल कृष्णमूर्ति की बात कह रहे हैं। तो हमने कृष्णमूर्ति को जाकर कहा। वे बड़े खुश हुए कि मुझे इसी वक्त मिलवाओ। अभी आपकी हमने कुछ बातें सुनीं तो हमें ऐसा लगा कि आप तो कृष्णमूर्ति के खिलाफ बोल रहे हैं तो हमें बड़ा सदमा पहुंचा। मैंने उनसे कहा कि तुम्हें अच्छा लगे या बुरा लगे! तुम्हें अच्छा लगना ही चाहिएजिस दिन मैं ऐसा सोचूंगाउस दिन तुम्हें क्या अच्छा लगता हैवही करने लगूंगा।
स्वभावतः नेता कभी वह नहीं कर सकता जो अनुयायी को बुरा लगे। नेता का नेता होनाअनुयायी के अच्छे लगने पर निर्भर है। गुरु कभी वह नहीं कह सकताजिससे शिष्य भाग जाएं। क्योंकि गुरु का गुरु होना शिष्य के रुके रहने पर निर्भर है। तो नेता और गुरु कभी भी ठीक-ठीक नग्न सत्य को नहीं कह पातेनहीं कह सकते हैं। उसको उन्हें आवरण देने पड़ते हैं। असत्य इकट्ठा करना पड़ता है। तो दुनिया में जितने कम गुरु होंजितने कम नेता होंउतने सत्य की संभावना है। मैं उन महिलाओं को कहना चाहता था कि अब तू फिर जाकर कृष्णमूर्ति को कहना कि वह तो बिलकुल खिलाफ कह रहे हैं और अगर वह अब भी खुश हों तो समझनाआदमी किसी काम के हैंऔर अगर दुखी हो जाएंतो दुकानदारी शुरू हो गई। तो मैं तो ऐसा मान कर चलता हूं।

आप कभी कृष्ण की प्रशंसा करते हैंकभी कृष्ण की निंदा करते हैं। कभी क्राइस्ट और महावीर की प्रशंसा करते हैं कभी निंदा करते हैं?

क्योंकि मेरे लिए कृष्ण साधारण व्यक्ति नहींबड़े असाधारण हैं। और कृष्ण मेरे लिए मल्टी-डायमेंशनल हैं। कृष्ण के कोई एक आयाम नहीं हैं। कृष्ण के अनंत आयाम हैं। किसी आयाम पर मैं उनसे राजी होता हूंतो कहता हूंठीक है। और तब अपनी प्रशंसा में कंजूसी नहीं करता। और किसी आयाम पर अगर मैं राजी नहीं होता तो कहता हूंगलत हैऔर तब गलत कहने में भी कंजूसी नहीं करता। और इसमें मैं कृष्ण के साथ अन्याय नहीं करता हूंइसमें मैं अपने साथ ही न्याय करता हूं। कृष्ण से कुछ लेना-देना नहीं है।
अगर महावीर की कोई बात मुझे ठीक लगती हैतो मैं उसके पूरे रास्ते साथ जाने को तैयार हूं। और कोई चीज मुझे गलत लगती है तो इसलिएकोई चीज में हां न भरूंगा कि कोई और बात मुझे ठीक लगी। और यही मेरा अपने मित्रों से भी कहना है कि मेरी अगर एक बात ठीक लगेतो इसका यह मतलब नहीं कि मेरी दूसरी बात भी ठीक लगे। एक-एक बात यूनीक हैएक-एक बात एटामिक है। अगर ठीक से समझें तो कृष्ण के चरित्र में भी हजार एटम उठे हैं। और मुझे हो सकता है कि कृष्ण के सिर पर लगी हुई मोरपंख बहुत अच्छी लगती है और मैं कहूं कि मोरपंख बड़ी सुंदर हैलेकिन कृष्ण की शक्ल मुझे अच्छी नहीं लगती। और मैं कहूंयह शक्ल मुझे बिलकुल नहीं जंचती और इस पर मोरपंख तो और खराब हो जाते हैं। इसमें कठिनाई क्या हैहमारा मन क्या कहता है?
हमारा मन चूंकि डॉगमेटिक हैवह कहता हैएक लेबल लगा दो। तो या तो कह दोकृष्ण भगवान हैंया कह दो शैतान हैं तो हम निपट जाएं! मतलब साफ हो जाए कि क्या हैंऔर मैं मानता हूं कि कोई आदमी इतना अच्छा नहीं है कि उसमें बुरा न हो और कोई आदमी इतना बुरा नहीं है कि उसमें अच्छा न हो। और आदमी इतनी बड़ी घटना है कि रावण में भी कुछ है जो राम से बेहतर हैऔर राम में भी कुछ हैजो रावण से बदतर है। लेकिन हम पूरे कोइकट्ठे को स्वीकार लेंयह सुविधापूर्ण है असल में। कन्वीनिएंस है यह कि राम भगवान और रावण शैतान।
मैं...मुझे उसके लिए ठीक नहीं लगताइसलिए मेरे साथ दिक्कत तो हो जाती हैक्योंकि कृष्ण का भक्त एक दिन सुन लेता है कि मैंने कहाकि कृष्ण बहुत अदभुत हैंवह इसी प्रशंसा में चला आ रहा है। दूसरे दिन वह सुनता है कि नहीं गड़बड़ है। तब वह बड़ी मुश्किल में पड़ जाता है। उसका कारण है कि वह मुझको भी पूरा मानना चाहता है। मैं कब कहता हूंउसको समझना चाहिए कि जब मैं कृष्ण में भाग करता हूंतो वह मुझमें भी भाग कर ले। मेरी वह बात ठीक लगी थीवह ठीक नहीं लग रही हैबात खतम हो गई। मैं कहां कहता हूं कि मेरी पूरी बात ठीक लगनी ही चाहिए। लेकिन गुरु बनना होतो पूरी ही लगनी चाहिए।

लोग ऐसा भी करते हैं कि कभी गांधी को बुरा इसलिए कहते हैं कि वे लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करेंयह एक खतरनाक प्रवृत्ति है।

हो सकता है। उनको ऐसा लगता हो। यह बिलकुल लग सकता है और इसको जितना ही वे समझेंगे...तो अभी तो मैं दूसरों का खंडन कर रहा हूंजैसे ही मुझे लगेगा कि मेरे पीछे लोग इकट्ठे हो गए तो मैं अपना भी खंडन करूंगा। और वह भी चल रहा है। अगर मैंने दो साल पहले कोई बात कही थी और वह मुझे आज अच्छी नहीं लगती हैउसका मैं खंडन करता हूं। तब उनको पता चलेगा कि मैं अपने को भी खंडन कर सकता हूं। तभी मेरे बाबत साफ होंगे वे कि इस आदमी के बाबत निश्चय कभी भी नहीं हो सकेगा। और निश्चय होना भी नहीं चाहिए।
आज तो जो मुझे ठीक लगता हैवह मैं आज कहूंगा न--आज जीऊंगा न! कल का तो पता नहीं है। आज जो मुझे ठीक लगता हैवह कहूंगा। कल जो मुझे ठीक लगेगाकल कहूंगा। और अगर आपकी बात मानूं तो आज भी नहीं कह सकताकल भी नहीं कह सकताक्योंकि परसों भी है। तब तो कभी नहीं कह सकता। एक बहुत मजेदार घटना कहूंफिर हम उठें।
टालस्टाय के जीवन में एक संस्मरण है। टालस्टायचेखव और गोर्की तीनों एक बगीचे में बैठे हुए हैं। वहां कुछ बात चलती है और गोर्की ने यह सवाल उठाया। टालस्टाय से कहा कि स्त्री के संबंध में आपका क्या खयाल हैतो टालस्टाय ने कहा कि मैं तब तक न बोल सकूंगाजब तक मेरा एक पैर कब्र में न हो। एक मेरा जब कब्र में चला जाए और एक बाहर रह जाएतब तुम एकदम से पूछ कर मुझे ढक्कन में बंद कर देना। तुम ढक्कन बंद कर देना। तो चेखव ने कहाआप यह कैसी बात कहते हैं! तो टालस्टाय ने कहा कि अभी तकमैंने निरंतररोज-रोज जो तय कियावह दूसरे दिन पाया कि बदलना पड़ा। क्योंकि एक स्त्री में भी एक स्त्री नहीं है। उसमें भी हजार स्त्रियां हैं। और हजार तो हजार होती ही हैं। और आज एक पहलू दिखता हैकल सुबह दूसरा पहलू दिखता हैसांझ दूसरा पहलू दिखता है। लेकिन टालस्टाय कुछ भी नहीं कह पायाक्योंकि पैरदोनों पैर एक साथ चलते हैं कब्र मेंएक नहीं जाता है। मैं यह कहना चाहता हूंमुझे तो मिला नहीं टालस्टायनहीं तो उससे मैं कहता कि कब्र में जब जाते होतब दोनों पैर एक साथ जाते हैं। कब्र में एक पैर नहीं जाता है कि तुम एक पैर बाहर रख कर कुछ कह सको। कहना है तो दोनों पैर बाहर रहेंगेतभी कहना पड़ेगा। और इसलिए सब कहना रिलेटिव हैइसलिए कोई कहना एब्सोल्यूट नहीं है। इसलिए कोई भी दावेदार सर्वज्ञता का दावा करे तो गलत है।
कोई कहे कि मैं सर्वज्ञ हूं और जो कहता हूं वह अंतिम और आखिरी सत्य है। इसलिए कोई भी दावेदार सर्वज्ञता का दावा करे तो गलत है।
कोई कहे कि मैं सर्वज्ञ हूं और जो कहता हूं वह अंतिम और आखिरी सत्य हैऐसा आदमी एकदम ही गलत बात कह रहा है। और ऐसा ही आदमी गुरु बन सकता है। और ऐसे आदमी को अनुयायी मिल सकते हैं। क्योंकि मुझे कैसे अनुयायी मिलेंगे,क्योंकि अनुयायी ही निश्चित नहीं हो सकता कि यह आदमी कल क्या कहेगापरसों क्या कहेगातो मैं तो एक प्रोसेस हूं और मेरा मानना है कि सभी जीवंत व्यक्तियों को एक प्रक्रिया होना चाहिएएक ठहराव नहीं। तो जो हमें ठीक लगेउसे हमें ईमानदारी से कहने का साहस होना चाहिए। जो मुझे आज ठीक लगता हैआज कहूंगा। कल जो मुझे ठीक गलता हैकल कहूंगा। जरूरी नहीं है कि जो मैं कल कहूंवह आज के विपरीत होक्योंकि कहने वाला मैं ही रहूंगा।
बहुत संभावना यही है कि वह आज का ही अगला कदम हो। और आज भी मैं ईमानदार और कल भी मैं ईमानदार तो रहूंगा। जो कह रहा हूंतो मेरी ईमानदारी ने जो आज जाना था और जो कल मेरी ईमानदारी जानेगीउसका ही पर्सपैक्टिव आगे का होगा। उसमें कोई बहुत गहरे कंट्राडिक्शन नहीं हो सकतेअगर ईमानदार हूं। अगर मैं आज ही बेईमान हूं तो फिर खतरा है। जो आज तो मुझे वही कहने दोजो मुझे ठीक लगता है। ताकि मैं कल भी वही कह सकूंजो मुझे ठीक लगे। और तब अगर पूरी जिंदगी के बाद जब मैं मर जाऊं और पैर कब्र में हों तब तो मेरे बाबत कोई निर्णय ले सके कि यह आदमी क्या कह रहा था,क्योंकि प्रोसेस पूरी हो गई।
असल में हम किसी भी जीवंत व्यक्ति के बाबत उसके मरने के पहले कभी निर्णय नहीं ले सकते और हमें लेबल तब तक नहीं लगाना चाहिए। लेबल सब कब्र पर लगाना चाहिएउसके पहले नहीं लगाना चाहिए। क्योंकि उसके पहले जिस पर लगा दियाया तो वह आदमी अपनी तरफ से मर गयाया आपने उसको मरा हुआ मान लिया। और आपने मान लियाअब लेबल लगा सकते हैं और आगे कोई उपाय नहीं हैअब तुम ठहर गए हो जहां के तहां। तो मैं नहीं मानताकिसी के लिए नहीं मानता।

पृथक्करण तो हम करते हैं?

करना चाहिएपृथक्करण लोग करेंविचार लोग करेंलेबलिंग न करें। लेबलिंग की जल्दी हो जाती है। उससे खतरे होते हैं। वह चिंतन की कमी है। हम चाहते हैंजल्दी से लेबल लगा दें। एक संन्यासी मेरे पास आए। वह मुझसे कहने लगेआप मुझे यह बता देंआप किस शास्त्र को मानते हैंमैंने कहाक्योंवह कहता कि मुझे बात ही करने की कोई जरूरत न रहीआप  अगर गीता को मानते हैंतो मैं समझ जाऊंक्योंकि गीता को मैं जानता हूं। असल में मुझे समझना न पड़ेइसलिए बहुत आसान यह है कि मैं कह दूं कि मैं सांख्य को मानता हूंकि वेदांत को मानता हूंकि जैन को। जैन के बाबत वह जो समझा-बूझा है,वह मेरे बाबत लागू कर लेगाबात खतम हो जाए।
हम यही कर रहे हैंज्यादा से ज्यादा यह हिंदू है। हम पूछ लेते हैंहिंदू हैतो ठीक है। हिंदू के संबंध में मेरी एक धारणा है। खतम हो गया। सैयदशहजादा के बाबत अलग से सोचने की अब जरूरत न रही। यह मैंने इनको निबटा दिया। इंडिविजुअल हमेशा डिस्टघबग है। तो मैं नहीं करने देता कोई भी। मैं आपको अपने बाबत तय नहीं होने देता। क्योंकि मैं ही तय नहीं हूं,कल मैं बदलूंगापरसों बदलूंगा। जब तक जिंदा हूंबदलता रहूंगा।

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