बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-10

मेरी दृष्टि में रचनात्मक क्या है?
मेरे प्रिय आत्मन्!

बहुत से प्रश्न पूछे गए हैं। एक मित्र ने पूछा है कि मैं बोलता ही रहूंगाकोई सेवा कार्य नहीं करूंगाकोई रचनात्मक काम नहीं करूंगाक्या मेरी दृष्टि में सिर्फ बोलते ही जाना पर्याप्त है?

इस बात को थोड़ा समझ लेना उपयोगी है। पहली बात तो यह कि जो लोग सेवा को सचेत रूप से करते हैंकांशसलीउन लोगों को मैं समाज के लिए अहितकर और खतरनाक मानता हूं। सेवा जीवन का सहज अंग हो छाया की तरहवह हमारे प्रेम से सहज निकलती होतब तो ठीकअन्यथा समाज-सेवक जितना समाज का अहित और नुकसान करते हैंउतना कोई भी नहीं करता है।
समाज-सेवा भी अहंकारियों के लिए एक व्यवसाय है। दिखाई ऐसा पड़ता है कि समाज-सेवक विनम्र हैसबकी सेवा करता है;लेकिन सेवक के अहंकार को कोई देखेगा तो पता चलेगा कि सेवक भी सेवा करके मालिक बनने की पूरी चेष्टा में संलग्न होता है।



मेरी दृष्टि में जीवन में शांति होअंतस्तल पर प्रेम का उदघाटन होतो आदमी जो भी करता हैवह सेवा है। और बुहारी लगाना ही रास्ते पर रचनात्मक नहीं हैआपकी खोपड़ी में बुहारी लगाना ज्यादा रचनात्मक है। मैं सिर्फ बोल नहीं रहा हूं। विचार से बड़ी और कोई रचना जगत में नहीं है। विचार से महीनविचार से ज्यादा अदभुतविचार से ज्यादा शक्तिशाली कोई क्रांति नहीं है। क्योंकि मूलतः विचार के बीज ही हृदय में जाकर अंततः आचरण कोजीवन कोसमाज कोरूपांतरित करते हैं। लेकिन अगर गांधीजी और विनोबाजी के कारण एक ऐसी बात फैल गई है कि कोई सड़क पर बुहारी लगाए या कोई जाकर किसी बीमार आदमी का हाथ-पैर धो देया कोढ़ी के पैर दबा देतो वह विचार देने से भी बड़ी सेवा कर रहा हैयह बात निहायत नासमझी से भरी हुई है।
इस जगत में जो कुछ भी फलित हुआ हैइस जगत में जो भी श्रेष्ठ हैइस जगत में जो भी सुंदर हैमनुष्य के जीवन ने जो भी ऊंचाइयां छुई हैंवे ऊंचाइयां अंततः विचार की ऊंचाइयां हैं। और ये जो सेवा में रत लोग हैंये भी सेवा के किसी बहुत विचार-बीज के कारण अनुप्राणित हैं। इसलिए मुझे यह समझ में नहीं पड़तामैं इसको नितांत मूढ़ता की बात समझूंगा कि मैं बैठ कर किसी गांव की बुहारी लगाऊं और मैं जाकर किसी झोपड़े की सेवा करूं। जो मैं कर सकता हूंउसके मुकाबले वह करना देश के लिए नुकसान पहुंचाना होगा।
मेरी दृष्टि में तो भारत के विचार की शक्ति खो गई हैभारत के पास विचार की ऊर्जा नष्ट हो गई है। भारत ने हजारों साल से सोचना बंद कर दिया है। भारत सोचता ही नहीं है। यह इतना बड़ा पत्थर भारत के प्राणों पर है कि अगर कुछ हजार लोग अपने सारे जीवन को लगा कर इस पत्थर को हटा देंतो भारत का जितना हित हो सकता हैउतना ये तथाकथित रचनात्मक कहे जाने वाले कामों से नहीं। और जो लोग इन रचनात्मक कामों के लिए अति बात करते हुए प्रतीत होते हैंउनको भी समझ लेना जरूरी है।
समाज को बदले बिना सारे रचनात्मक काम पुराने समाज को बचाने वालेटिकाने वाले सिद्ध होते हैं। समाज की जीवन-व्यवस्था में आमूल रूपांतरण न होतो समाज में चलने वाली सेवासमाज में चलने वाला रचनात्मक आंदोलन पुराने समाज के मकान में ही पलस्तर बदलनेरंग-रोगन करनेखिड़की-दरवाजों को पोतने वाला सिद्ध होता है। नहींआज समाज को रचनात्मक काम की नहींविध्वंसात्मक काम की जरूरत हैआज समाज को कंस्ट्रक्शन की नहींएक बहुत बड़े डिस्ट्रक्शन की जरूरत है। आज समाज के पास इतना कचराइतना कूड़ा है हजारों साल का कि उसमें आग देने की जरूरत है। इस वक्त जो लोग हिम्मत करके विध्वंस करने को राजी हैंवे ही लोग एकमात्र रचनात्मक काम कर रहे हैं। यह समाज जाएयह सड़ा-गला समाज नष्ट होइसके लिए सब कुछ किया जाना आज जरूरी है।
तो मुझे दिखाई पड़ता है कि ये जो रचनात्मक काम करने वाली बातें हैंये पुराने दकियानूस समाज को किसी तरह बचाए रखने की चेष्टाओं से ज्यादा नहीं हैं। सब सुधारवाद अंततः सड़ गए। जाते हुएबिदा होते समाज को बचाने की अंतिम चेष्टा का फल होता है। और जो लोग सेवा के लिए उत्सुक होते हैंजैसा कि विनोबा कहते हैंसेवा धर्म हैयह बात निहायत गलत है।
धर्म सेवा हो सकता हैलेकिन सेवा कभी भी धर्म नहीं हो सकती।
इस फर्क को समझ लेना जरूरी है। सेवा करने से कोई धार्मिक नहीं हो सकता। हांधार्मिक व्यक्ति सेवा करता है। असल में तो यह है कि धार्मिक व्यक्ति जो भी करता हैवह सेवा है। धर्म से तो सेवा पैदा होती हैलेकिन सेवा से कोई धर्म पैदा नहीं होता। और हम देख रहे हैं कि दुनिया में दोत्तीन हजार वर्षों से जिन लोगों ने भी सेवा को धर्म करने की बात बताई हैउन्होंने धर्म को भी नष्ट किया है और सेवा को भी विकृत किया है।
मैंने एक छोटी सी घटना सुनी है। मैंने सुना हैएक चर्च में मोहल्ले-पड़ोस के बच्चे रविवार की सुबह इकट्ठे होते थे। चर्च के पादरी ने उन बच्चों को कहा कि एक सेवा का कार्य जरूर रोज करना चाहिएक्योंकि यही परमात्मा की सच्ची प्रार्थना है। उन बच्चों ने पूछाकैसा सेवा का कार्यउस पादरी ने कहा कि जैसे कोई नदी में डूबता हो तो उसको बचाना चाहिएकोई बीमार हो तो उसके लिए दवा ला देनी चाहिएकोई बूढ़ा आदमी रास्ता पार न कर पाता हो तो उसको सहारा देकर रास्ता पार करवा देना चाहिए। और अगले रविवार को जब तुम आओतब एक सेवा का कार्य जरूर करके आना। मैं पूछूंगा।
अगले रविवार को बच्चे इकट्ठे हुए। उस चर्च के पादरी ने पूछातुममें से किसी ने सेवा का कार्य कियाउन तीस-पैंतीस बच्चों में से तीन बच्चों ने हाथ उठाए कि हमने सेवा का कार्य किया है। उस पादरी ने कहाबहुत अच्छा! कम से कम तीन ने किया,यह भी अच्छा है। सेवा ही प्रार्थना है। सेवा ही परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग है। जो सेवा करेंगेवे ही असली धन कोआत्मिक धन को उपलब्ध होते हैं।
तुमनेबेटे कौन सी सेवा की?
पहले लड़के ने खड़े होकर कहा कि मैंने एक बूढ़ी औरत को रास्ता पार करवाया।
उसने कहाबहुत अच्छा किया। बूढ़े आदमियों को रास्ता पार करवाना चाहिए।
दूसरे से पूछा कि बेटेतुमने क्या किया?
उसने कहामैंने भी एक बूढ़ी औरत को रास्ता पार करवाया।
वह पादरी थोड़ा हैरान हुआ! उसने कहा कि दोनों को बूढ़ी औरतें रास्तों पर मिल गईंलेकिन कोई आश्चर्य नहींबहुत बुढ़िया हैं,मिल सकती हैं।
तीसरे से पूछाबेटेतुमने क्या किया?
उसने कहामैंने भी एक बूढ़ी औरत को रास्ता पार करवाया।
उसने कहाबड़ी हैरानी की बात है! तुमको तीन बुढ़िया मिल गईं?
उन तीनों ने कहातीन नहींबूढ़ी एक ही थी। हम तीनों ने उसी को पार करवाया।
पर उसने कहाक्या बूढ़ी इतनी बूढ़ी थी कि तीन आदमियों की जरूरत पड़ी तुम्हें पार करवाने के लिए?
उन तीनों ने कहापार नहीं होना चाहती थीजबरदस्ती पार करवाया है। वह तो भागती थी इस तरफ कि हमें वहां जाना नहीं है। लेकिन आपसे कहा था कि बिना सेवा किए परमात्मा नहीं मिल सकता। तो हमने उसे जबरदस्ती पार करवा दिया। वह बहुत चिल्लाती थी कि मुझे उस तरफ नहीं जाना है।
यह जो सेवा को पकड़े हुए प्रोफेशनल सेवकये जो धंधा बनाए हुए हैं सेवा काइनको तो बुढ़ियों को रास्ता पार करवाना है,इनको तो कुछ भी करवाना है--डूबतों को बचाना है--यहां तक भीअगर डूबते न मिलें तो किसी को डूबा कर भी बचाने का इंतजाम किया जा सकता है। नहींऐसी सेवा वगैरह के समर्थन में मेरे मन में कोई भी बात नहीं है। इन तथाकथित सेवकों को मैं मिस्चीफ मांगर्स कहता हूंये समाज में सबसे ज्यादा मिस्चीवियस एलिमेंट हैंये समाज में सबसे ज्यादा उपद्रवकारी तत्व हैं। इसको सेवा करनी है। इसको सेवा करनी ही हैचाहे कुछ भी हो जाए।
इस तरह की सेवा से हित नहीं हुआ है। मैं नहीं कहता हूं कि सेवा धर्म है। मैं जरूर कहता हूं कि धर्म सेवा है। अगर कोई व्यक्ति धर्म को उपलब्ध होतो उसके जीवन में जो भी हैवह सब सेवा बन जाता है। लेकिन तब वह कांशस नहीं होतातब वह सुबह से निकलता नहीं है खोज करने कि किसकी सेवा करें। तब वह जीवन में जीता हैऔर उसके जीने सेजितना भी उसका जीना हैउसकी चर्या हैउसकी श्वास भी लेनी हैवह सब अनजाने हीबिना पता चलेसेवा बन जाती है। जहां हृदय में प्रेम हैवहां व्यक्ति में सेवा है। फिर वह सेवा दिखाई पड़ेअखबारों में उसकी खबर छपेफोटो निकाला जाएफोटोग्राफर तैयार रहे जब सेवक सेवा करता हो। क्योंकि आजकल कोई सेवक बिना फोटोग्राफर के सेवा नहीं करतायह आपको मालूम है। फोटोग्राफर को पहले खबर कर आता है कि आज हम सेवा करने जा रहे हैं। फिर इसी तरह के धोखेबाज सेवकों की जमात नेता हमेशा बन जाती है। हम तो देख रहे हैंहिंदुस्तान में यह हो गया। जिनको हम उन्नीस सौ सैंतालीस के पहले सेवक की तरह जानते थेउन्नीस सौ सैंतालीस के बाद एक आधी रात के परिवर्तन मेंपंद्रह अगस्त के बाद वे सब एकदम मालिक हो गए। और तब उनका असली रूप हमें दिखाई पड़ा कि ये जो सेवक मालूम पड़ते थेये सुबह बैठ कर चरखा चलाते थेहरिजन कालोनी की सफाई करते थेये आदमी बिलकुल दूसरे सिद्ध हुए। जब इनके हाथ में ताकत आईतो ये आदमी बिलकुल और हो गए। इनको पहचानना मुश्किल हो गया कि वे वही लोग हैं! यह कैसा चमत्कार हो गया! यह पंद्रह अगस्त की रात बड़ी मिरेकल्सबड़ी चमत्कारी मालूम पड़ती है। और अंग्रेज बड़े जादूगर थेमालूम होता है। जरा सी तरकीब और हिंदुस्तान के सारे सेवक क्या से क्या हो गए!
नहींयह आकस्मिक नहीं है। लेकिन न गांधीजी इस बात को पहचान पाए और न भारत अभी इस बात को पहचान पाया है कि सेवा करना भी प्रिस्टीजइज्जत पाने की तरकीब है। और अगर दूसरी तरकीब मिल जाए इज्जत पाने की तो सेवक फौरन सेवा छोड़ कर मंच पर आसीन हो जाएगाकुर्सियों पर बैठ जाएगा।
वह सेवा भी अहंकार की तृप्ति का मार्ग है। इसलिए दो सेवकों से अगर आप कह दो कि फलां सेवक आपसे बड़ा सेवक हैतो उसे दुख हो जाता हैकि यह कैसे हो सकता है कि मुझसे बड़ा कोई सेवक हो। सेवक भी मानता है कि मुझसे बड़ा कोई भी नहीं है। यह सब अहंकार की चेष्टा है। अहंकार से जब सेवा पैदा होती हैतो सेवा सिर्फ बहाना है। अंततः भीतर गहरे में यशाकांक्षा,पद-प्रतिष्ठाअस्मिताअहंकार की ही यात्रा चलती है।
नहींऐसी किसी सेवा के मैं पक्ष में नहीं हूं।
मैं जरूर उस सेवा के पक्ष में हूं जो व्यक्ति के आत्मिक रूपांतरण से उपलब्ध होती हैजो सहज हो जाती है। उसे पता भी नहीं चलता। उसे पता भी नहीं चलता कि वह सेवा कर रहा है। अगर आप उससे कहने जाएं कि आप सेवा कर रहे हैं तो वह हैरान होगा। वह कहेगाकैसी सेवामैंने तो कुछ भी नहीं किया। मैं जो कर सकता थावह हुआ है।
मैंने सुनाएक संन्यासी भारत आया। वह अफ्रीका में था। वह हिमालय की यात्राबद्री-केदार की यात्रा को गया। जब वह पहाड़ चढ़ रहा थातेज धूप थीआकाश से आग बरसती थीपहाड़ की चढ़ाई थीहांफ रहा थापसीना बह रहा था। तभी उसे एक पहाड़ी लड़की भी दिखाई पड़ीजो पहाड़ चढ़ रही है। वह लड़की की उम्र ज्यादा नहीं हैतेरह-चौदह साल की होगी। बहुत नाजुक,उसके चेहरे पर आग झलक रही हैपसीना बह रहा हैवह थक गई हैवह हांफ रही है और कंधे पर अपने भाई को बिठाए हुए है। वह भी तगड़ा हैछोटा है लेकिन मजबूत और वजनी। संन्यासी उसके पास पहुंचातो सिर्फ दयावश उसने कहा कि बेटी,बहुत बोझ लग रहा होगा तुझेउस लड़की ने बहुत चौंक कर संन्यासी को देखा और कहास्वामी जीबोझ आप लिए हुए हैं;यह तो मेरा छोटा भाई है। बोझ आप लिए हुए हैं। संन्यासी अपना बिस्तर-विस्तर बांधे हुए है। यह मेरा छोटा भाई हैबोझ नहीं!
संन्यासी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मेरी जिंदगी में मुझे इतना अमृत-वचन पहले कभी सुनने को नहीं मिला था। बहुत शास्त्र मैंने पढ़े थेलेकिन यह अदभुत! पहली दफे मुझे पता चलाउस पहाड़ी लड़की ने कहायह भाई है मेरा छोटायह बोझ नहीं है!
छोटा भाई बोझ नहीं होता। तो इस कंधे पर छोटे भाई को ले जाना सेवा भी नहीं हो सकती। यह सिर्फ प्रेम का कृत्य है। इसमें कहीं कोई सेवा नहीं है। इस छोटी लड़की को पता भी नहीं है कि वह सेवा कर रही है। जिस दिन सेवा इतनी अनकांशसइतनी सहजबिना जानेबिना पता चले जब सेवा होती है तो वैसी सेवा धर्म है।
लेकिन वैसी सेवा तभी होती है जब भीतर धर्म का उदय हो। भीतर धर्म का जागरण हो तो जीवन सेवा बन जाता है।
लेकिन इधर उलटा चल रहा है। इधर समझाया जा रहा है कि तुम बाहर जीवन को सेवा का बना लो तो भीतर धर्म का जन्म हो जाएगा। यह सरासर व्यर्थ और गलत बात है। ऐसा कभी नहीं हो सकता। आप लाख सेवा करोमन धार्मिक नहीं हो जाएगा।
जीवन में जो क्रांतियां हैंवे बाहर से भीतर की तरफ नहीं होती हैं। जीवन की सारी क्रांतियां भीतर से बाहर की तरफ होती हैं। अगर हम यहां एक दीया जलाएं इस भवन मेंतो अंधेरा बाहर निकल जाएगायह सच है। लेकिन अगर कोई यह कहे कि तुम अंधेरा बाहर निकाल दोतो दीया जल जाएगातो वह बिलकुल ही फिजूल बातें कह रहा है। न तो आप अंधेरे को बाहर निकाल सकते हैंऔर अंधेरे को आप कितना ही बाहर निकालने की कोशिश करेंअंधेरा बाहर नहीं निकलेगा। और निकल भी जाए तो भी दीया नहीं जल जाएगादीया जल जाए तो अंधेरा बाहर निकल जाता है। लेकिन अंधेरा बाहर निकलने से कोई दीया नहीं जलता है।
भीतर प्रकाश जले धर्म का तो उसकी किरणें जीवन कोआचरण को सेवा बना देती हैं। लेकिन इस भूल में आप मत रहना कि हम जीवन को सेवा बना लेंगे और भीतर की आत्मा रूपांतरित हो जाएगी। लेकिन यह बहुत बुनियादी भूल है। और यह बुनियादी भूल इस देश के चरित्र को हजारों साल से विकृत कर रही है। इसको थोड़ा समझ लेना और भी उपयोगी होगाक्योंकि इस संबंध में दो प्रश्न और हैं। वे भी इस संदर्भ में समझ में आ सकेंगे।
महावीर को हमने देखामहावीर का आचरण हमें दिखाई पड़ा। आत्मा तो किसी की दिखाई नहीं पड़ती हैआचरण ही दिखाई पड़ता है। आचरण बाहर होता हैआत्मा तो भीतर होती है। सिर्फ व्यक्ति को दिखाई पड़ती हैबाहर से नहीं दिखाई पड़ सकती। मैं भीतर क्या हूंवह तो नहीं दिखाई पड़ सकतामेरे बाहर मैं क्या करता हूंवही दिखाई पड़ सकता है। लेकिन जो भी मैं करता हूंवह मेरे होने से आता है। मेरे करने से मेरा होना नहीं निर्मित होतामेरे होने सेमेरे बीइंग से मेरी डूइंग निकलती है। मैं जो हूंवह मेरे करने में आता है। लेकिन मेरे करने से मेरा बीइंगमेरी आत्मा निर्मित नहीं होती।
महावीर को हमने देखा उदाहरण के लिएउनकी जिंदगी में दिखाई पड़ी अहिंसा। वे पांव भी फूंक-फूंक कर रखते हैं कि कोई कीड़ी न दब जाए। वे पलक भी खयाल से झपते हैं कि कोई कीटाणु न मर जाए। वे रात करवट भी नहीं बदलते सोने में कि कहीं करवट बदलने में कोई कीड़ा-मकोड़ा आ गया हो और दब न जाए। वे अंधेरे में चलते नहीं कि कहीं किसी के जीवन को चोट न पहुंच जाए। उनके जीवन में हमें दिखी अहिंसा कि वे फूंक-फूंक कर जी रहे हैं। हमको आचरण दिखाई पड़ गयामहावीर की आत्मा तो दिखाई नहीं पड़ी। आप महावीर को देखे कि यह आदमी फूंक-फूंक कर चलता हैपानी छान कर पीता हैरात करवट नहीं बदलता। आपने तय किया कि हम भी अहिंसक होंगेरात करवट नहीं बदलेंगेपांव फूंक-फूंक कर रखेंगेपानी छान कर पीएंगे।
आप पीओ पानी छान कर जिंदगी भरसारे समुद्र छान डालो और आप पांव फूंक-फूंक कर रखोऔर चाहो तो पांव रखो ही मत,और करवट मत बदलोऔर चाहो तो करवट लो ही मतलेटो ही मतलेकिन महावीर की आत्मा पैदा नहीं हो जाएगी। लेकिन हजारों संन्यासी महावीर के पीछे इसी नासमझी को दोहराए चले जा रहे हैं। महावीर पांव फूंक-फूंक रखने के कारण आत्मा का जन्म नहीं हो गया है। आचरण से आत्मा निर्मित नहीं होतीआत्मा से आचरण प्रवाहित होता है।
महावीर भीतर आत्मा को जाने हैंइसलिए यह आचरण पैदा हुआ है। और हमहम आचरण करेंगे और आत्मा को जानना चाहेंगेजो कि उलटा हो गया। उलटा नहीं हो सकता है। तो हजारों साल से महावीर के पीछे अहिंसक खड़े हो रहे हैंलेकिन महावीर की सुगंध किसी को भी उपलब्ध नहीं हुई। ठीक महावीर जैसे नंगे खड़े हो जाते हैंनंगे खड़े होने से कोई महावीर बन जाएगामहावीर जैसा बाल-वाल घुटा कर खड़े हो जाते हैंमहावीर जैसा चलते हैंमहावीर जैसा बैठते हैं। यह सब एक्टिंग है,अभिनय है। इससे कोई महावीर पैदा नहीं हो सकता। यह आचरण का आरोपण है। इसको थोपते चले जाओइससे कुछ भी नहीं होगा। महावीर की ऊर्जा इससे पैदा नहीं होगी। इसलिए हजारों संन्यासी हैं महावीर के। लेकिन कहां महावीर की सुगंधकहां वह ज्योतिकहां वह जीवनकहां वह संगीतउसकी कोई खबर नहीं मिलती। नहीं मिल सकती है।
ठीक ऐसा सारे तत्वों के संबंध में होता है। हम देखते हैं आचरणऔर वैसा आचरण करने लगते हैं। गांधी चरखा चलाते हैं,नकलचोर पीछे बैठ कर चरखा चलाने लगेंगे और सोचेंगे बन गए गांधी! इतना सस्ता और आसान नुस्खा होता तो दुनिया में सब कभी का ठीक हो गया होता। हांयह आदमी धोखे में पड़ गयायह आदमी बिलकुल धोखे में पड़ गया है। यह बिलकुल खड़ा हो जाएगा। अभी विनोबा के पास जाएंतो उनके आस-पास दो-चार विनोबा की शकल-सूरत के आदमी मिल जाते हैं। ठीक वैसा ही दाढ़ी-वाढ़ी बनाए हैंकपड़ा-वपड़ा लपेट कर वैसे ही खड़े हो गए हैं। इन नासमझों के कारण जिंदगी को फायदा नहीं होता,नुकसान होता है।
नहींबाहर की नकल से कभी भी कोई भीतर का असल पैदा नहीं होता है। भीतर का असल कैसे पैदा होता हैवह सवाल है। आचरण से नहींभीतर का असली तत्व पैदा होता है समाधि सेध्यान से। वह कल रात मैं आपसे बात करूंगा कि वह ध्यान कैसे पैदा हो सकता है। अभी इतना ही कहना चाहता हूं कि सेवा नहीं है महत्वपूर्णमहत्वपूर्ण है वह हृदय जहां से सेवा प्रवाहित होती है। और अगर वह हृदय न होतो आप सेवा कर सकते हैंलेकिन आपकी सेवा हितकर नहीं होगीअमंगल सिद्ध होगी,अहितकर सिद्ध होगी। और दुनिया में जितने सेवक कम हों इस तरह केउतनी दुनिया शांति से जी सकती है। दुनिया को शांति से नहीं जीने देतेउन्हें सेवा करनी है।
मैं कोई सेवक नहीं हूं और मुझे किसी की कोई सेवा नहीं करनी है। अपनी ही कर लूं तो पर्याप्त है। लेकिन अगर आप अपनी ही सेवा कर रहे हैं तो आपकी जिंदगी में वह सुगंध पैदा होगी कि उससे बहुतों की सेवा हो जाएगी। लेकिन उसका कभी आपको पता भी नहीं चलेगा।
तो सचेतन रूप से सेवा करने वालों के पक्ष में मैं नहीं हूं।

और आप पूछते हैं कि रचनात्मक कार्य क्या करूंगा?

किस बात को रचनात्मक कार्य कहते हैं आपकिस बात को रचनात्मक कार्य कहते हैंजो गोरख-धंधा रचनात्मक कार्यों के नाम से चलता हैइसको रचनात्मक कार्य कहते हैंयह रचनात्मक कार्य है?
रचनात्मक कार्य एक ही है मनुष्य की चेतना मेंवह ध्यान में रख कर और वह यह कि मनुष्य की चेतना का आविर्भाव कैसे होमनुष्य कैसे स्वतंत्र होमनुष्य की आत्मा सोई हुई कैसे जागेमनुष्य के भीतर जो छिपा हुआ हैवह कैसे प्रकट हो। उसके अतिरिक्त कोई रचनात्मक कार्य नहीं है। और वह प्रकट हो जाए तो हजार-हजार रचनात्मक कार्य उस जागी हुई चेतना के आस-पास संगठित होने शुरू होते हैंप्रकट होने शुरू होते हैं।
लेकिन हमारी पकड़ में क्षुद्र चीजें एकदम आती हैं। हम इतने मैटीरियलिस्ट हैंहम इतने पदार्थवादी हैं कि हमको यही समझ में आता है। हमको समझ में नहीं आएगा कि श्री अरविंद भी कोई सेवा कर रहे हैं पांडिचेरी में बैठ कर। हम कहेंगेक्या सेवा कर रहा है यह आदमीयह आदमी सेवा नहीं कर रहा हैबैठा है पांडिचेरी के भवन में बंद होकरयह क्या सेवा कर रहा हैसेवा विनोबाजी कर रहे हैं जो कि पैदल-पैदल चल रहे हैंगांव-गांव घूम रहे हैं। यह आदमी क्या सेवा कर रहा हैश्री अरविंदअपनी अंधेरी कोठरी में बैठ कर यह क्या कर सकता है?
लेकिन आपको पता नहीं कि अरविंद जितनी सेवा कर रहा है उतना आपके सेवकों में से कोई भी सेवा नहीं कर रहा है। लेकिन वह जरा फिर खोज की बात है कि अरविंद क्या कर रहा है वहां बैठ कर?
क्या आपको पता है कि विचार की क्रांतिक्या आपको पता है कि विचार की तरंगें सारे जगत को आंदोलित और प्रभावित करती हैंक्या आपको पता है कि मैं अपने मौन में बैठ कर भी आपके प्राणों को प्रवाहित कर सकता हूं?
अभी रूस में एक वैज्ञानिक प्रयोग हुआ। क्योंकि अरविंद की बात को पचाना मुश्किल होगालेकिन रूस के वैज्ञानिक प्रयोग को समझना आसान हो जाएगा। फ्यादोर नाम के एक वैज्ञानिक ने एक बहुत अदभुत प्रयोग किया। और रूस में हुआइसलिए और भी महत्वपूर्ण हैक्योंकि रूस तो इस तरह की बातों को मानने को एकदम राजी नहीं होता। फ्यादोर ने यह प्रयोग किया कि दूर,कितनी ही दूर व्यक्ति होंविचार की तीव्र तरंगों से उन व्यक्तियों को प्रभावित किया जा सकता है।
मास्को में बैठ कर तिफलिस मेंएक हजार मील दूरमास्को में फ्यादोर बैठा हुआ है अपनी प्रयोगशाला में और तिफलिस में विचार की तरंगें भेज रहा है। सिर्फ विचार से। तिफलिस के बगीचे में एक दस नंबर की सीट पर...आस-पास लोग छिपे बैठे हैं देखने को कि क्या परिणाम होता हैएक अजनबी आदमी आकर दस नंबर की सीट पर बैठा है। फोन से खबर की गई फ्यादोर को कि दस नंबर की सीट पर एक आदमी बैठा हैतुम उसे वहां से विचार के द्वारा सो जाने की सलाह दो। फ्यादोर ने एक हजार मील दूर आंख बंद करके उस दस नंबर की सीट पर बैठे आदमी को आंतरिक सुझाव दिया कि तू सो जा! तीन मिनट के भीतर वह आदमी सो गया! लेकिन यह भी डर है कि संयोग की बात हो कि वह थका-मांदा यात्री सो गया हो। तो वहां जो लोग छिपे बैठेउन्होंने फोन से खबर की कि आदमी सो गया है। लेकिन तुम ठीक पंद्रह मिनट बाद उसे उठा दोतब हम समझेंगे कि तुम्हारे विचार से कुछ हो रहा है। फ्यादोर ने ठीक पंद्रह मिनटघड़ी परउस आदमी को एक हजार मील दूरउठा दिया कि उठ जाओ। वह आदमी चौंक कर उठा। मित्र हैरान हो गए! ठीक पंद्रह मिनट में वह उठा था। उस आदमी से जाकर पूछा कि आपको कुछ लगाउसने कहामैं बड़ा हैरान हुआ। जब मैं आया था तो मुझे ऐसा लगा कि कोई मुझसे कह रहा है सो जाओ,बहुत थके हुए हो। मैंने समझा कि मैं ही कह रहा हूं। लेकिन अभी अचानक मुझे नींद में आवाज सुनाई पड़ी कि उठ जाओइसी वक्त उठ जाओ। तो मैं उठ आया हूं।
अमेरिका की एक प्रयोगशाला में एक छोटा सा प्रयोग चलता था। डिलाबार लेबोरेटरी में उन्होंने एक अदभुत प्रयोग किया। एक आदमी को बहुत ही संवेदनशील कैमरे के सामने बिठाया गया और उससे कहा गया कि तुम बहुत केंद्रित रूप से मन में कोई विचार करो--किसी एक चीज का। उस आदमी ने आंखें बंद करके छुरी का विचार किया। वह पांच मिनट तक छुरी का चित्र मन में सोचता रहा। उस सामने के फोटो प्लेट परनिकलने पर छुरी का चित्र अंकित हो गया।
डिलाबार लेबोरेटरी में हुए प्रयोग ने सारी दुनिया को चकित कर दिया कि क्या मन के भीतर सोचे गए विचार का भी प्रतिबिंब फोटो कैमरे में पकड़ा जा सकता हैफ्यादोर के प्रयोग ने सारे रूस में हवा पैदा कर दी कि यह क्या हुआकि क्या एक हजार मील दूर बैठा हुआ आदमी भी विचार की तरंगों से किसी को प्रभावित कर सकता है?
मैं आपसे कहता हूंअरविंद यह प्रयोग कर रहे थे। और हिंदुस्तान की चेतना को उन्होंने जितना प्रभावित किया हैन गांधी ने और न किसी ने प्रभावित किया है। लेकिन वह जरा एसोटेरीकवह कंस्ट्रक्टिव काम जरा और तरह का है। तो जो लोग बुहारी लगाने को कंस्ट्रक्टिव काम समझते हैंवे अरविंद के काम को कंस्ट्रक्टिव नहीं समझेंगे। लेकिन कितनी ही बुहारी लगाओक्या होता है?
मनुष्य की चेतना पर असली काम किया जाना जरूरी है। बुद्ध और महावीर रचनात्मक कार्यकर्ता नहीं थे। तो अगर कभी रचनात्मकवादियों ने कभी कोई इतिहास लिखातो बुद्धमहावीर और जीसस के नाम उनमें नहीं लिखे जाएंगे। ये सब फिजूल के लोग थे। इन्होंने कोई रचनात्मक कार्य नहीं किया। न तो किसी कोढ़ी के पैर दाबे और न कोई अस्पताल बनाया और न सड़कें साफ कीं और न भंगी कालोनी में निवास कियाये सारे लोग रचनात्मक नहीं थे। ये सब फिजूल के लोग थे। इन्होंने समय खराब किया और लोगों का समय खराब किया।
नहीं साहबये रचनात्मक काम करने वाले लोग उस अर्थ में दो कौड़ी के भी नहीं हैंजिन अर्थों में बुद्धजीससशंकर और महावीर का काम है। लेकिन उस काम को देखने के लिए भी समझ चाहिएआंखें चाहिए। उसको पहचानने के लिए भी थोड़ी प्रबुद्ध प्रज्ञा चाहिए।
मैं कोई रचनात्मक कार्य में नहीं लगा हुआ हूंन लगूंगा।
मेरी दृष्टि में विचार की क्रांति इस देश को इस समय एकमात्र जरूरत है। तो सारी चेष्टाओं से कोशिश करूंगा कि सोया हुआ विचार जग जाए। सब तरह के शॉकस दूंगासब तरह के धक्के पहुंचाऊंगासब तरफ से आपको हिलाऊंगा कि नींद टूट जाए। आप नाराज भी होंगे। क्योंकि नींद किसी की भी तोड़ो तो वह नाराज होता है। आप क्रोध से भी भर जाएंगे। आप मुझ पर पत्थर भी फेंक सकते हैंमुझे गालियां भी दे सकते हैं कि हम सो रहे हैं आराम सेसपना देख रहे हैं सुखद और यह आदमी आकर जगाए चला जा रहा है।
नहींलेकिन इस समय देश को तीव्रता से जगाने वाले कुछ लोगों की जरूरत है। इस नींद से भरे देश में अभी किसी रचनात्मक काम से कुछ भी न होगा। अभी एक ही काम की जरूरत है कि देश की चेतना जागे। और दूसरे काम की जरूरत है कि देश के पास जो लाखों वर्षों की जंजीरें इकट्ठी हो गई हैं अतीत कीउनको नष्ट करने का कोई तीव्र आंदोलन हो कि उन सब जंजीरों को तोड़ कर मुल्क की चेतना को हम नये जगत के साथ खड़ा कर दें। लेकिन नहींहमारे नेताहमारे धर्मगुरुहमारे समाज-सुधारकवे सब पीछे की कड़ियों से बांधने की कोशिश करते हैं। वे मुक्त नहीं होने देते वहां से।
क्या आपको पता है कि रूस ने पचास वर्षों में जो काम कियावह हम एक हजार वर्षों में भी नहीं कर सकते। लेकिन क्यों किया यह कामक्या आपको पता है कि अमेरिका ने तीन सौ वर्षों में जो काम कियावह तीन हजार वर्ष में भी कोई कौम नहीं कर सकती। क्या कारण है लेकिनएक कारण हैजो खयाल में नहीं आता। और जिस दिन इस देश के खयाल में आ जाएगाहम भी उतना ही विकास करने में तत्काल समर्थ हो जाएंगे। और वह कारण यह है कि रूस ने उन्नीस सौ सत्रह की क्रांति के बाद अपने अतीत से सारे संबंध विच्छिन्न कर लिएएकदम से संबंध विच्छिन्न कर लिए। अतीत जैसे खत्म हो गया;भविष्य रह गयावर्तमान रह गयाअतीत जैसे नहीं रहा। उन्नीस सौ सत्रह के बाद एक अंतराल पैदा हो गयानहीं है कोई अतीतबस है भविष्यबस है वर्तमान। और अमेरिका के पास तो कोई अतीत है ही नहीं। उनकी तो कौम की उम्र ही तीन सौ वर्ष है। उनके पास अतीत नहीं हैअतीत का बोझ नहीं है। इसलिए अमेरिका की सबसे नई कौम सबसे ज्यादा समृद्धसबसे ज्यादा विकासशीलसबसे ज्यादा जवान हो गई। उसका और कोई राज नहीं है--उसके पीछे मुर्दों का बोझ नहीं हैहजारों वर्ष की लाशें नहीं हैंकब्रिस्तानों की लंबी कथा नहीं है। उसमें अटकाव नहीं हैभविष्य है सिर्फ। और भविष्य की तरफ चेतना को विकास का मौका है।
भारत के सामने एक ही रचनात्मक काम है कि अतीत से कैसे संबंध भारत का क्षीण होकैसे भविष्य की तरफ भारत की आंखें उन्मुख हों।
लेकिन हमारे समझदार लोग समझाते हैं कि हमारा अतीत तो सतयुग थास्वर्णयुग था--राम हुएबुद्ध हुएकृष्ण हुए। हमारे सब तीर्थंकरसब अवतार हो चुके। हमारी सब श्रेष्ठ रचनाएं हो चुकींगीता लिखी जा चुकीबुद्ध-वचन कहे जा चुकेरामायण हो गईमहाभारत हो गया। सब हो चुका हमारा। हमारा भविष्यभविष्य हमारा कुछ भी नहीं है। सब अतीत है।
क्या आपको पता हैबूढ़ा आदमी हमेशा अतीत की तरफ देखता हैक्योंकि भविष्य में मौत होती हैऔर कुछ भी नहीं होता। बच्चे हमेशा भविष्य की तरफ देखते हैंक्योंकि पीछे कुछ भी अतीत नहीं होता। बच्चे की जो चेतना हैवह हमेशा भविष्योन्मुखी होती है। बूढ़े की जो चेतना हैवह हमेशा अतीतोन्मुखी होती है। बूढ़ा हमेशा पीछे की तरफ देखता है। वह हमेशा पीछे जो हो चुका--जवानी के गीतजवानी के प्रेमबचपन की स्मृतियांवह उनका ही गुणगान करता रहता हैवह उन्हीं की स्मृति में खोया रहता हैआगे कुछ भी नहीं है।
ध्यान रहेजो कौम आगे देखना बंद कर देती हैउस कौम की आत्मा भी बूढ़ी हो जाती है। बूढ़े होने का लक्षण यह है--पीछे देखना। युवा होने काविकासमान होने का लक्षण यह है--आगे देखना। लेकिन हमारी गर्दन तो पीछे मुड़ी हैऔर इतने दिनों से मुड़ी है कि हमारी हड्डियां मजबूत होकर जु॰गई हैंपैरालाइज्ड हो गई हैं। अब आगे की तरफ हम देख नहीं सकतेपीछे मुड़े हुए हैं। जैसे किसी कार में पीछे की तरफ लाइट लगा हो और आगे चल रही हो गाड़ीवैसी हमारी स्थिति हो गई है। वह तो भगवान बहुत नासमझ है हिंदुस्तान के लिए। अगर उसमें थोड़ी भी अक्ल होतो हमारी आंखें खोपड़ी पर लगानी चाहिएआगे लगाने की कोई जरूरत नहीं है। आगे आंखों की कोई आवश्यकता ही नहीं हैंआंखें पीछे होनी चाहिए। उस रास्ते को हमें देखने में बड़ा मजा आता है जो रास्ता गुजर चुका और जिस रास्ते पर अब कभी भी गुजरना नहीं हो सकता है। उड़ती हुई धूल को देखते रहते हैं पीछे। आपको पता हैपीछे लौटना असंभव है। लेकिन गांधीजी कहते हैंराम-राज्य चाहिए। पीछे लौटना इम्पॉसिबिलिटी है। कोई कभी पीछे नहीं लौट सकता। समय बचता ही नहीं पीछे जाने कोएक क्षण पीछे नहीं लौटा जा सकता। हमेशा आगे ही जाना होता है। जाने का अर्थ है: आगे। लेकिन पीछे की याद की जा सकती है। और जितनी ज्यादा आप याद करेंगे पीछे कीउतना आगे चलने वाले कदमों में बाधा पड़ेगी। क्योंकि पीछे की याद करने वाला मन आगे चलने वाले कदमों से टूट जाता हैउसमें विसंगति पैदा हो जाती है। उसमें जोड़ नहीं रह जाता है। आगे चलने वाला मन भी चाहिए आगे चलने वाले पैरों के लिए। पैर आगे चल रहे हैं हिंदुस्तान केमन पीछे चल रहा है। यह विसंगति हिंदुस्तान के प्राणों को जड़ किए दे रही है,नष्ट किए दे रही है।
नहींचित्त को ले जाना है आगे।
एक विध्वंस की जरूरत है। यह शब्द बहुत कठोर मालूम पड़ेगा। लेकिन हमें पता ही नहीं है कि जो विध्वंस की क्षमता खो देते हैंवे सृजन की क्षमता भी खो देते हैं। विध्वंस का मतलब सिर्फ विध्वंस नहीं होता। विध्वंस का मतलब होता है कि तोड़ना,ताकि बनाया जा सके। लेकिन तोड़ने की हिम्मत खो दी हैइसलिए हमें बड़ा अच्छा लगता हैजब कोई कहता हैरचनात्मक कार्यक्रम। तो हम बड़े प्रसन्न होते हैं। लेकिन कभी आपने कोई देखा कि किसी ने कहा हो विध्वंसात्मक कार्यक्रम। हमें रचनात्मक कार्यक्रम बड़ा अच्छा लगता है।
लेकिन रचना कौन कर सकते हैंवे जो तोड़ सकते हैं।
मैंने सुना हैएक गांव में एक बहुत पुराना चर्च था। वह इतना पुराना था कि उस चर्च के भीतर कोई भी जाने में डरता था। वह कभी भी गिर सकता था। हवाएं चलती थींतो चर्च कंपता था। आकाश में बादल गरजते थेतो चर्च कंपता था। जोर का तूफान आता थातो लगता थाअब गिराअब गिरा। अंधेरी रात में जरा आवाज होती थीतो गांव के लोग बाहर निकल कर देखते थे कि चर्च गिर तो नहीं गया! अब ऐसे चर्च में कौन प्रार्थना करने जाए। प्रार्थना करने वाले लोगों ने जाना बंद कर दिया। फिर चर्च की कमेटी ने बहुत विचार किया कि क्या करें। फिर चर्च की कमेटी बुलाई गई। पादरी और कमेटी और ट्रस्टी सब इकट्ठे हुए। वे भी चर्च के भीतर इकट्ठे नहीं हुए। वह भी चर्च के बाहर ही उन्होंने बैठक रखीक्योंकि वहां भीतर कौन जाताऔर नेता तो हमेशा अनुयायियों से ज्यादा होशियार होते हैं। जब अनुयायी तक नहीं जा रहे हैंतो नेता कैसे जा सकता है?
और यह तो आपको पता है कि नेता हमेशा अनुयायी के पीछे चलते हैं। दिखाई आगे पड़ते हैंचलते हमेशा पीछे हैं। क्योंकि कोई नेता इतना हिम्मतवर नहीं होता कि अनुयायी के आगे चले। क्योंकि नेता की जान अनुयायी के वोट और हाथ पर निर्भर रहती है। अगर अनुयायी पीछे से खिसक जाए तो नेता की जान निकल गई। नेता की अपनी कोई जान होती हैअनुयायियों को देख कर चलना पड़ता है। जब अनुयायी तक भीतर नहीं आते तो नेता कैसे भीतर आ सकते हैंहालांकि नेता गांव में लोगों को जाकर समझाते थे कि चर्च में जरूर आना चाहिए। और गांव के लोग मन ही मन में हंसते थे कि बड़ी अदभुत बात हैनेता खुद कभी नहीं जातेलेकिन हमको समझाते हैं। जैसा हिंदुस्तान में होता है सब जगह। नेता समझाते हैंयह करना चाहिए। और जनता सुनती है और ताली पीटती है और समझती है कि नेता भी नहीं करते हैं यह और हमसे कहते हैं कि करना चाहिए। लेकिन जनता समझती है कि ठीक हैकभी हम भी नेता हो जाएंगे तो हम भी मंच पर चढ़ कर यही कहेंगे कि यह करना चाहिए। करना-वरना तो किसी को है नहीं। एक पाखंडएक धोखा चल रहा है पूरे देश में। वह उस गांव में भी चलता होगा।
कमेटी बाहर बैठीऔर कमेटी सोचने लगीक्या किया जाएकोई प्रार्थना करने नहीं आता। बड़े दुख से उन्होंने एक प्रस्ताव पास किया कि पुराने चर्च को गिराना चाहिए। सर्वसम्मति से यह तय किया। लेकिन पुराने को गिराने में बड़ा दुख होता है। मुर्दा लोग पुराने को गिरा ही नहीं सकते। मरे-मराए लोग इतना डरते हैं पुराने को गिराने से! लेकिन डरते क्यों हैं?
डरते इसलिए हैं कि नये को बनाने की क्षमता नहीं है। अगर पुराना गिर गया तो फिर क्या होगाडरते हैं इसलिए। जिनको नये को बनाने की क्षमता हैवे पुराने को गिराने से कभी भी नहीं डरते। बल्कि वे आतुर होते हैं कि जल्दी पुराना गिरे तो नये का निर्माण किया जा सके। बहुत डरे थेबहुत दुखी थे। फिर दूसरा प्रस्ताव किया कि नया चर्च बनाना जरूरी है। सर्वसम्मति से उसे भी स्वीकार किया। फिर तीसरा प्रस्ताव जल्दी से स्वीकार किया कि नया चर्च ठीक पुराने जैसा बनाएंगे। नक्शा वही रहेगाजरा भी फर्क नहीं करेंगे। नींव पुरानी रहेगीनींव नई नहीं डालेंगे। नींव तो पुरानी ही रखेंगेक्योंकि अपने बापदादों ने जो नींव डाली थीउसको हम कैसे बदल सकते हैंवह बाप-दादे तय कर गए हमेशा के लिए नींवअब कोई नहीं बदल सकता उसको। बाप-दादे भविष्य को भी तय कर गएअपने वक्त को तय करते तो ठीक थालेकिन आने वाले लोगों की आत्मा को भी कैद कर गए। नींव डाल गए हैं वेअब उसी नींव पर मकान बनेगा। उन्होंने कहाहम तो पुरानी नींव पर ही बनाएंगे। और ध्यान रहे,पुराने दरवाजेपुरानी ईंटेंपुराना कूड़ा-कबाड़ सबका उपयोग करेंगे। क्योंकि वह साधारण कूड़ा-कचरा नहींवह सैक्रेड हैपवित्र है। पुरखों के द्वारा लगाई गई ईंटें हैं। साधारण ईंटें नहीं हैं। हम सब मकान का सामान वही लगाएंगे।
उसी जगह मकान बनाएंगेउसी नींव पर बनाएंगे। सर्वसम्मति सेबड़ी खुशी से यह भी उन्होंने स्वीकार किया।
और फिर चौथा प्रस्ताव स्वीकार कियावह भी सर्वसम्मति सेकि जब तक नया न बन जाएतब तक पुराने को गिराएंगे नहीं।
बसवह पुराना खड़ा हुआ है चर्च वहीं का वहीं। अभी भी हवाएं आती हैंअभी भी प्राण कंपते हैं। वह नया कभी नहीं बनेगा। वह नया कैसे बन सकता हैकहीं पुराने के आधार पर दुनिया में नया बना हैयह ऐसे ही है कि जैसे एक आदमी बूढ़ा होकर मर जाए और भगवान उसमें नई आत्मा डाल दे। नहींपुराने शरीर में नई आत्मा नहीं डाली जा सकती। नई आत्मा फिर नया शरीर ग्रहण करती है। फिर नया बच्चाफिर नई आत्मा। पुराने शरीर को दफना देना पड़ता है। पुराने में पुराने के आधार पर नया निर्मित नहीं होता। बल्कि पुराने के आधार पर नया निर्माण करने का वह जो पागल मोह हैउसकी वजह से नया कभी निर्मित नहीं हो पाता है।
नहीं बना वह नया चर्चनहीं बनेगा। ऐसा ही भारत में हो रहा है। हजारों साल से पुराना इकट्ठा होता चला जाता है। वह इतना भारी हो गया हैआज की भारत की आत्मा एकदम बोझिल हो गई हैउठ भी नहीं सकती। जैसे एक-एक आदमी के ऊपर हजारों मुर्दे बैठे होंउसकी खोपड़ी पर मुर्दों का अंबार लगा होउसके कारण हमने नये के निर्माण की क्षमता खो दी है।
दूसरा महायुद्ध हुआजर्मनी तहस-नहस हो गया। रूस के नगर बर्बाद हो गए। जापान मिट्टी में मिल गया। लेकिन जाकर देखो अब। पता भी नहीं चलेगा कि दूसरा महायुद्ध कभी हुआ था। सब निर्मित हो गया। वे जो बर्बाद हो गए थेफिर आबाद हो गए--और पहले से ज्यादा अच्छे।
मेरे एक मित्र ने जापान से मुझे लिखा कि नागासाकी और हिरोशिमा जो बिलकुल मिट्टी हो गए थेबर्बाद हो गए थे। जहां आज से बीस साल पहले देख कर कोई कहता कि अब कभी यहां पौधे में अंकुर नहीं निकलेगाअब कभी कोई फूल नहीं खिलेगाअब कभी कोई प्राण यहां आबाद नहीं हो सकेगाअब कभी यहां कोई बस्ती नहीं बसेगीसब जल कर राख हो गया था। वह बस्तियां आबाद हो गईं। और उन बस्तियों में रहने वाले लोग खुशी से यह कहते हैं कि बड़ा अच्छा हुआ कि एटम गिर गयापुराना सब समाप्त हो गयासब नया हो गया। नये रास्ते हैंनये मकान हैंनये स्कूल हैं। पुराना कचड़ा-कबाड़ एकदम नष्ट हो गया,जिसको नष्ट करना बहुत मुश्किल था। सारा सब नया हो गया। अदभुत लोग हैं। जवान मालूम होते हैं।
और हम बूढ़े हैंहमारी बड़ी अदभुत हालत है। महाभारत के बाद कोई युद्ध ही नहीं हुआ बड़ा हमारे यहां। लेकिन अभी भी उसका जो नुकसान हुआ हैवह जारी है। वह बदलता नहीं। महाभारत के युद्ध में जो मकान गिर गया होगाखोज करनावह अभी भी वहीं गिरा हुआ पड़ा होगा। उसमें कोई फर्क नहीं हुआ होगा। क्योंकि महाभारत में युद्ध हो गया नउसका हम दुख अभी तक झेल रहे हैं। अब उस युद्ध से कभी छुटकारा होने वाला नहीं है। अब हम हमेशा के लिए बर्बाद ही रहेंगे। महाभारत में युद्ध हुआ न। उसकी वजह से सब तकलीफ चल रही है। वह कब हुआ था युद्ध?
पुराने का मोह नये के निर्माण की क्षमता का विनाश बनता है। नये का आग्रह और नये का मोह चाहिए। नये का आमंत्रण चाहिए। नये की खोज चाहिए।
लेकिन नहींअगर कोई मुसीबत आ जाए तो खोलो गीता और निकालो उत्तर! अजीब बात है। कोई हमने पागल होने का ठेका ले रखा हैजिंदगी में समस्या आज खड़ी है। बेचारे कृष्ण को क्यों परेशान करनाहमारे पास कोई बुद्धि नहीं हैहम फेस नहीं कर सकते किसी समस्या कागीता-माता में खोजने जाते हैं सब कुछ। कृष्ण भी होंगे कहीं तो सिर ठोंकते होंगे आकाश में कि कहां के मूढ़ों के बीच मैंने उपदेश दियाअभी तक पीछा पकड़े हुए हैं। कृष्ण को एक जिंदगी में एक समस्या खड़ी थी अर्जुन के सामनेदिया उत्तर। लेकिन उत्तर सबके लिए बांधने वाला नहीं है। लेकिन हम उत्तरों से बंध गए हैं।
और जब भी मुसीबत आएमुसीबत हमेशा नई होती है। परिस्थितियां हमेशा नई होती हैं। वे हमेशा नया जवाब मांगती हैं और हमारे पास जवाब रेडीमेडपुराने हैं। नई परिस्थितिपुराना जवाबकोई तालमेल नहीं बैठता। हम हारते चले जाते हैं।
मैंने सुना हैजापान के एक गांव में दो मंदिर थे। एक दक्षिण का मंदिर कहलाता थाएक उत्तर का मंदिर कहलाता था। दोनों मंदिरों में झगड़ा थाजैसा कि मंदिरों में होता है। मंदिरों में दोस्ती तो कभी होती नहींझगड़े ही होते हैं। वे अड्डे ही झगड़े के हैं। और जब तक रहेंगे जमीन परतब तक झगड़े जारी रहेंगे। बड़ा झगड़ा था उत्तर केदक्षिण के मंदिरों में। इतना झगड़ा था कि पुरोहित एक-दूसरे को देखते भी नहीं थे। रास्तों पर से भी नहीं गुजरते थे कि एक-दूसरे का मुकाबला न हो जाए।
दोनों पुरोहितों के पास दो छोटे बच्चे थेसेवा-टहल के लिएकाम-धाम के लिए। दोनों ने समझा रखा था कि कभी भी भूल कर दूसरे मंदिर के बच्चे से बात मत करना। वे हमारे दुश्मन हैं। लेकिन बच्चे तो बच्चे होते हैंबूढ़े बिगाड़ने की कोशिश भी करते हैं तो एकदम से तो नहीं बिगाड़ पाते हैं। थोड़ा वक्त लग जाता है। बच्चे कहीं एकदम बूढ़ों की मानते हैंऔर बच्चे अगर बूढ़ों की मान लेंतो समझना कि बच्चे से वे बूढ़े हो गएअब बच्चे नहीं रहे। वे बच्चे भी नहीं मानते थे। कभी-कभी मौके-बेमौके अकेले में मिल जाते थे तो बात कर लेते थे। बच्चों को भी पुरानी दुश्मनी देने मेंट्रांसफर करने में थोड़ा समय लगता है बूढ़ों को--समझाने में कि तुम हिंदू होतुम मुसलमान होतुम इस मंदिर के होतुम उस मंदिर के हो। बच्चों को कुछ पता नहीं होता। भगवान इस तरह की बातें सिखा कर भेजता नहीं है। उन बच्चों को नहीं लगता था कि झगड़ा क्या है मंदिरों में?
एक दिन उत्तर के मंदिर का बच्चा जा रहा था रास्ते सेदक्षिण के मंदिर का बच्चा वहां से निकला और उसने पूछा कि दोस्त,कहां जा रहे होदक्षिण का पुजारी छत पर से देख रहा था कि दोनों बात कर रहे हैं। उसको आग लग गई। हिंदू-मुसलमान बात करें तो पुजारी को बड़ी आग लग जाती हैपता है आपकोपुरोहित को बड़ी आग लग जाती हैधर्मगुरु के प्राण जलने लगते हैं,क्योंकि उसका धंधा टूटा। अगर हिंदू-मुस्लिम में बात हुई तो उसका धंधा गया। उनमें झगड़ा रहे तो धंधा चलता हैनहीं तो धंधा नहीं चलता है। यह धंधा धर्म का पूरा का पूरा झगड़े पर खड़ा हैनहीं तो यह चल नहीं सकता। पुजारी नीचे आयाउस लड़के को बुलाया कि तुमने क्या बात कीउस लड़ने ने कहा कि आज तो मैंने बात कीऔर मैं हार भी गया। तो मुझे बड़ा दुख है। मैंने उस लड़के को पूछा कि दोस्तकहां जा रहे होउसने कहाजहां हवाएं ले जाएं। फिर मेरी समझ में नहीं आया कि अब में और क्या बातचीत आगे चलाऊं।
उस पुजारी ने कहा कि हमारे मंदिर का कोई आदमी कभी उस मंदिर से नहीं हारा। यह इतिहास में पहली घटना घटी है कि तू हार कर आयायह बहुत बुरी बात है। उसको उत्तर देना जरूरी हैउसको हराना पड़ेगा। यह हमारी इज्जत का सवाल हैयह हमारी पुरखों की इज्जत का सवाल है। एक हजार साल पुराना झगड़ा है। कल तू फिर जाना और उससे पूछना कि कहां जा रहा है और जब वह कहे कि जहां हवाएं ले जाएंतो कहना कि अगर हवाएं बंद हों दोस्ततो कहीं जाओगे कि नहींतब वह भी ठप्प रह जाएगा। वह भी समझ नहीं पाएगा।
दूसरे दिन लड़का उत्तर तैयार करके गया। और आप पक्का समझ लेनाजो उत्तर तैयार करके जाते हैं उनके पास बुद्धि कभी नहीं होती है। क्योंकि तैयार उतर हमेशा मिडियाकर माइंड का लक्षण हैक्षीण बुद्धि आदमी का लक्षण है। बुद्धिमान आदमी को सवाल सामने खड़ा होता हैउत्तर आता है। आना चाहिए। उत्तर तैयार का क्या मतलब होता हैजब अभी सवाल ही नहीं उठा तो उत्तर तैयार कैसे हो सकता हैलेकिन हम सभी उत्तर तैयार करने वाले लोग हैं। वह लड़का भी उत्तर कंठस्थ करके बिलकुल चला गया कि पूछूंगा आज यह। खड़ा रहा रास्ते परनिकला वह लड़का। पूछाकहो दोस्त कहां जा रहे होलेकिन वह लड़का बड़ा बेईमान था। उसने कहा कि जहां पैर ले जाएं। अब बड़ी मुश्किल हो गई। बंधा हुआ उत्तरवह गीता-माता का उत्तर। अब क्या होगाअब वह फिर खड़ा रह गया। गुरु ऊपर से देखता था कि वह फिर हार गया। लौट कर आयापूछा क्या हुआउसने कहा,वह लड़का तो बहुत बेईमान मालूम होता है। बदल गया वह तो। उस पुजारी ने कहाउस मंदिर के लोग सदा से बेईमान रहे हैं। उनका कोई भरोसा नहीं है। सुबह कुछ कहेंगेसांझ कुछ कहने लगते हैं। लेकिन उसे हराना जरूरी है। उसने क्या कहाउसने कहावह लड़का तो कहने लगाजहां पैर ले जाएं। अब मैं क्या कहताउतर तो तैयार था। उस उत्तर की कोई संगति न थी। उसने कहाकल फिर तू पूछना। जब वह लड़का कहे कि जहां पैर ले जाएंतो कहनाभगवान न करे कि लंगड़े न हो जाओ। अगर लंगड़े हो गए तो कहीं जाओगे कि नहींवह लड़का खुश हुआलेकिन फिर भी उसे पता नहीं कि फिर वही भूल कर रहा है कल वाली। फिर तैयार उत्तर! दूसरे दिन वह फिर खड़ा हो गया रास्ते पर जाकर। उत्तर तैयार हैघोख रहा है मन में। आया है लड़का दूसरे मंदिर कापूछा--कहां जा रहे होउसने कहासब्जी लेने बाजार जा रहा हूं। वे सब उत्तर फिजूल हो गए।
तैयार उत्तर हमेशा फिजूल हो जाते हैं। और जिन कौमों के पास उत्तर तैयार हैंवे सारी कौमें नपुंसक हो जाती हैं। जिंदगी मांगती है सीधा एनकाउंटरजिंदगी मांगती है मुकाबला। जिंदगी कहती है आओनई हैं परिस्थितियांखड़ी करो अपनी चेतना कोनई परिस्थितियों का उत्तर दो। और नई परिस्थितियों का उत्तर तभी दिया जा सकता हैजब पुराने उत्तर मन पर बोझिल न हों।
लेकिन यहां सारा चित्त मुल्क का बोझिल है। महात्मासाधुसंन्यासीतीर्थंकरअवतार इतने हो चुके हैं हमारेऔर वे सब उत्तर दे गए हैंऔर सबके उत्तर हमारे सिर पर बैठे हुए हैं। हमारा अपना कोई उत्तर नहीं है। हमारा अपना कोई प्रेजेंटहमारा कोई वर्तमान व्यक्तित्व नहीं है। हमारी कौम की आज कोई वर्तमान आत्मा नहीं है। और यह सारी आत्मा सिर्फ रटे हुए उत्तर दोहरा रही है। इसलिए हम दुनिया में पिछड़ते चले जाते हैंरोज पिछड़ते चले जाते हैं। और जब पिछड़ जाते हैंतब भी हम अपनी किताब में खोजते हैं कि जरूर हमने कुछ गलती याद कर लिया होगा। किताब तो गलत हो नहीं सकती। फिर हम अपनी किताब में खोज कर नई व्याख्या निकालते हैं कि नहींयह मतलब रहा होगाइसलिए हार गए।
और जिंदगी रोज बदलती जाती हैजिंदगी बड़ी बेईमान है। जिंदगी रुकी नहीं हैजिंदगी ठहरी नहीं हैजिंदगी भागती चली जाती है। जैसे गंगा रोज बदल रही है। जो पानी कल था गंगा मेंवह आज नहीं है। जो अभी थावह अभी नहीं है। वह हेराक्लतु ने कहा है कि एक ही नदी में दुबारा उतर नहीं सकते--यू कैन नाट स्टेप ट्वाइस इन दि सेम रिवर। वह ठीक कहा हैजिंदगी की नदी में भी दुबारा नहीं उतर सकते हो। जो हो चुकावह हो चुका। जो नहीं हुआ हैवह होगा। इसलिए जो हो चुके उत्तरवह जो नहीं हुआ है उसके लिए कारगर नहीं होंगे।
इसलिए भारत पुराना पड़ता जाता हैउत्तर पुराने हैं उसके पास।

कब छुटकारा होगा हमारा शास्त्रों सेकब छुटकारा होगा अतीत सेकब मुक्त होंगे हम पीछे सेऔर कब हम जागेंगे और देखेंगे भविष्य को?

इसका मतलब यह नहीं है कि मैं यह कहता हूं कि गीता मत पढ़ना। इसका यह मतलब नहीं है कि मैं कहता हूं कि रामायण मत पढ़ना। इसका यह मतलब नहीं है कि मैं कहता हूं कि गांधी को मत समझना। इसका यह मतलब है कि समझनालेकिन उत्तर किसी के कंठस्थ मत करना। उत्तर अपने आने देना और जैसा युगजैसा समय और जैसी परिस्थितिउसके अनुकूल अपने चित्त को दर्पण बनाना कि वह हर तरह उत्तर ला सके। बैलगाड़ियों के जमाने में दिए गए उत्तर अंतरिक्षयान के जमाने में सही साबित नहीं हो सकते। लेकिन जो जिद्द करेंगे कि हमनेबैलगाड़ियों के जमाने में जिन पुरखों ने बैलगाड़ियों में बैठ कर उत्तर दिए थेहम तो कसम खा लिए हैं कि हम पुरखों के आगे नहीं जाएंगे। हमने तो लक्ष्मण-रेखा खींच दी है उसके आगेसीता अब मत निकलना। सारे मुल्क को सीता बनाए हुए हैं ये पुरखे और लक्ष्मण-रेखा खींचे हुए हैं कि आगे मत जाना। इससे आगे जाओगे तो बड़ा खतरा हो जाएगा। और देखोसीता गई थी तो कितने खतरे में पड़ गई। इसलिए जाना मत आगे रेखा के।
और सारी दुनिया सब रेखाएं छोड़ कर अंतरिक्ष की यात्राओं पर निकल जाएगी और तुम पिछड़ जाना इस जमीन पर। तुम इसी गंदी जमीन पर रह जाना। और सारी दुनिया अंतरिक्ष के दूर-दूर के लोगों को खोजेगीसत्यों के न मालूम कितने अनजान पर्तें उठाएगीन मालूम सत्य की कितनी प्रतिमाओं को उघाड़ेगीन मालूम कितने दुस्साहस के काम करेगीन मालूम कितने एडवेंचर करेंगे दूसरे मुल्कों के बच्चेऔर हमारे बच्चेहमारे बच्चे क्या कर सकते हैंहनुमानजी के मंदिर पर नारियल फोड़ेंगे! क्या करेंगेजब तुम चांदत्तारों पर चले जाना दूसरे मुल्कों के लोगोतब भी हमारे बच्चे हनुमानजी के मंदिर पर नारियल फोड़ते रहेंगे और किसी सड़क के किनारे बैठे बेवकूफ से हाथ की रेखाएं दिखलाते रहेंगे और ताबीज बांधते रहेंगे! हमारे बच्चे यही करते रहेंगे?
यह बहुत हो चुका। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह नहीं होना चाहिए। यह नहीं होने दिया जा सकता है। लेकिन कौन रोकेगा इसे?कौन इस धारा को तोड़ेगाकौन इस बंधे प्रवाह को मिटाएगाकौन इन जंजीरों को तोड़ेगामन बहुत शंकित हो उठता है। कौन करेगा यह?
लेकिन एक आशा बंधती हैएक आशा बंधती है कि शायद वक्त आ गया है कि हमारी चेतना इसके लिए तैयार हो। और वक्त शायद इसलिए आ गया है कि या तो हमें तैयार होना होगा या हमें मिट जाना होगा। दो के अतिरिक्त तीसरा कोई उपाय नहीं रहा है। शायद इतने दबाव मेंइतने प्रेशर मेंमिटने की स्थिति में शायद हमें होश आ जाएशायद हम जाग जाएंशायद हम आंख खोल कर देखें कि दुनिया कहां चली गई है! इतिहास कहां चला गया है!
हम कंटेंप्रेरी नहीं हैंइस भूल में मत रहना कि हम बीसवीं सदी में रह रहे हैं। हम बीसवीं सदी में नहीं रह रहे हैं। हम कोई दस सदियों पीछे हैं। हम दसवीं सदी में होंगे। और हमारे बीच भी जो दसवीं सदी में होंगेवे बड़े प्रोग्रेसिव मालूम पड़ेंगेक्योंकि हमारे बीच पांचवीं सदी के और पहली सदी के लोग भी हैं। हम इस जगत केआज के काल में कंटेंप्रेरी नहीं हैं और इसलिए हमें जितनी पिछड़ी बात हो उतनी ज्यादा अपील करती हैजिसका कोई हिसाब नहीं। क्योंकि हमारा चित्त पिछड़ा हुआ है।
अगर विनोबा पैदल चलते हैं तो हमारा हृदय गदगद हो जाता है कि धन्यभागकितना अच्छा किया जा रहा है। वे अंतरिक्षयानों पर यात्रा करेंगे और तुम पैदल चलने वाले महात्मा की इसलिए प्रशंसा करोगे कि वह पैदल चलता है। पिछड़ जाओगेमर जाओगेबच नहीं सकोगे। भविष्य तुम्हारे साथ खड़ा नहीं होगा। कोई पैदल चलेउसकी खुशी हैमजे की बात हैफायदे की बात है विनोबा के लिए पैदल चलनास्वास्थ्यपूर्ण हैलेकिन पैदल चलने का आदर दुर्भाग्यपूर्ण है। वह आदर गलत हैवह पिछड़ेपन का आदर है। वह जिंदगी को नये-नये रास्तों पर ले जाने का द्वार उससे नहीं खुलता।

यह हमारी कठिनाई कब छुटेगीयह कैसे छुटेगी?

एक ही रास्ता दिखता है कि लोगों के मन को झकझोरा जाएलोगों को हिलाया जाएउनकी नींद तोड़ी जाएउनको चोट की जाए कि शायद चोट से वे तिलमिला उठें। लेकिन कुछ तो लोग इतने मर गए हैं कि चोट ही नहीं लगतीतिलमिलाते भी नहीं। वे गुस्से में भी नहीं भरतेऐसी कुछ मौत आ गई है। गुस्से में भी भर जाएं तो भी कुछ हो जाए। इसकी जरूरत है। वह मैं कर रहा हूं। जो मुझे रचनात्मक मालूम पड़ता हैवह मैं कर रहा हूं। जो मुझे सेवा मालूम पड़ती हैवह मैं कर रहा हूं।
लेकिन सेवा के नाम से और रचना के नाम से जो सब चल रहा हैवह मैं नहीं कह रहा हूं। नहीं कर रहा हूं इसलिए कि उसे न मैं सेवा मानता हूं और न रचना मानता हूं।
विचार इस देश में जग जाएइसके लिए जो भी किया जा सकता हैवह सब किया जाना जरूरी और अत्यंत आवश्यक है।
ये थोड़ी सी बातें मैंने कहीं।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुनाइससे बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूंमेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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