बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-08

विध्वंस: सृजन का प्रारंभ
यह सवाल नहीं है। पहली बात तो यह कि मैं निपट एक व्यक्ति की भांतिजो मुझे ठीक लगता है वह में कहूं। न तो मेरी कोई संस्था हैन कोई संगठन। हांकोई संगठन बना कर मेरी बात उसे ठीक लगती है और लोगों तक पहुंचाएतो वैसा संगठन जीवन जागृति केंद्र है। वह उसका संगठन हैजिन्हें मेरी बात ठीक लगती है और वे लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन मैं उस संगठन का हिस्सा नहीं हूं और उस संगठन का मेरे ऊपर कोई बंधन नहीं हैइसलिए वह संगठन रोज मुश्किल में है। क्योंकि कल मैंने कुछ कहा थावह संगठन के लोगों को ठीक लगता था। आज कुछ कहता हूंनहीं ठीक लगता है। वे मुश्किल में पड़ जाते हैं। मेरी तो उनसे कोई शर्त नहीं हैउनसे मैं बंधा हुआ नहीं हूंइसलिए जितनी प्रवृत्तियां चलती हैंजिन्हें मेरी बात ठीक लगती हैउनके द्वारा चलती हैं।

मेरे द्वारा तो सिर्फ एक ही प्रवृत्ति चलती है कि जो मुझे ठीक लगता हैवह मैं कहता रहता हूं। उससे ज्यादा मेरी कोई प्रवृत्ति नहीं है और जो मुझे ठीक लगता हैइसलिए निरंतर निवेदन करता रहता हूं कि जो मुझे ठीक लगता हैवह आपको ठीक लगेयह जरूरी नहीं है। बहुत ज्यादा संभावना तो यही है कि वह न लगे। क्योंकि दो व्यक्तियों को एक सी बात ठीक लगेयह जरा असंभावना है। असल में दो व्यक्ति इतने भिन्न-भिन्न हैं कि एक ही बात पर राजी नहीं होते। तो पूछा जा सकता है कि फिर मैं क्यों कहता हूंअगर दूसरे को मुझे राजी नहीं करना हैप्रभावित नहीं करना हैदूसरे को अपने साथ बांधना नहीं है,संगठन नहींअनुयायी नहींशिष्य नहींतो फिर मैं क्यों कहता हूं?

असल में आज तक निरंतर तभी कोई बोला हैजब उसे संगठन बनाना हो। तभी कोई बोला हैजब उसे किसी को प्रभावित ही करना होतभी तक बोला हैउसे पंथ और संप्रदाय ही बांधना हो। इसलिए यह सवाल उठता है। इसलिए बोलना सहज बात नहीं रह गई। मैं बोलने को अत्यंत सहज बात मानता हूं। मुझे तो ठीक लगता हैउसे कहने में मुझे आनंद आता है,इसलिए कहता हूं। आपको प्रभावित करने के लिए नहीं। एक फूल खिलता है और उस फूल से सुगंध गिरती है। यह रास्ते से चलने वाले लोगों को प्रभावित करने के लिए नहीं। फूल को आनंद हैवह खिला हैउसकी सुगंध मिलती है।
मैं जब आपसे बोल रहा हूं तो मैं आपको प्रभावित करने के लिए नहींजो मुझे आनंदपूर्ण लगता है बोलनावह बोल रहा हूं। और मेरी अपनी समझ यह है कि जो आपको प्रभावित करने के लिए बोल रहा हैवह आपको दुश्मन हैक्योंकि किसी भी तरह की प्रभावित करने की चेष्टाबहुत गहरे मेंदूसरे व्यक्ति को गुलाम बनाने की चेष्टा है।
सब प्रभाव बहुत आध्यात्मिक गुलामी हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि लोग प्रभावित करने के डर की वजह से,बोलेंगे नहींकहेंगे नहीं।
एक चित्रकार एक पेंटिंग बना रहा है। हो सकता हैवह सिर्फ प्रभावित करने के लिए बना रहा हो। यह भी हो सकता है कि दूसरों से कोई प्रयोजन की न हो। बनाना उसका आनंद हो और वह जब दूसरों को दिखा रहा हैतब भी सिर्फ अपने आनंद की अभिव्यक्ति की भांति। शब्द भी चित्र की भांति या रंगों की भांति अभिव्यक्ति हैं। आपको प्रभावित करने को नहींमुझे व्यक्त करने को। और इसलिए निरंतर आपसे निवेदन करता रहता हूं कि भूल से मुझसे प्रभावित न हों।
लेकिन ध्यान रहेप्रभावित होने के दो ढंग हैं। मेरे पक्ष में प्रभावित होना हैमेरे विपक्ष में भी प्रभावित होना प्रभावित होना है। इसलिए इस खयाल में मत रहना कि जो मेरे पक्ष में हैंवे मुझसे प्रभावित हो गए हैं वे प्रभावित नहीं हुए हैं। वे विपक्ष में हैंवे भी मुझसे प्रभावित हैं। प्रभाव से बचना हो तो पक्ष-विपक्ष से बचना पड़ता हैनहीं तो प्रभाव पड़ ही जाता है। जो आदमी वेश्या के घर की तरफ जा रहा हैवह भी प्रभावित हैतो वेश्या के घर से बच कर दूसरे रास्ते से गुजर रहा हैवह भी प्रभावित है। असल में प्रभाव के दो ढंग हैं। अक्सर हमें लगता है कि पक्ष वाला प्रभावित हैविपक्ष वाला प्रभावित नहीं है। विपक्ष वाला भी उतना ही प्रभावित है।
माक्र्स मरा तो उसकी कब्र पर बहुत लोग नहीं थे। जो उसे विदा करने गए थेदस-बीस लोग थे। फिर भी एंजिल्स ने,जो उसकी कब्र पर दो बातें कहीं हैंउनमें से एक बात बड़ी कीमती थी। बीस-पच्चीस आदमीजिसको विदा करने आए हों,उसकी कब्र पर बोलते हुए एंजिल्स ने कहा कि माक्र्स दुनिया का बहुत बड़ा आदमी है। तो एक आदमी ने पूछा कि जिसको विदा करने बीस-पच्चीस लोग आएउसको आप बहुत बड़ा आदमी कहते हैंतो एंजिल्स ने कहा कि मैं इसलिए बहुत बड़ा आदमी कर रहा हूं कि माक्र्स की कोई बात सुने तो प्रभावित हुए बिना नहीं बच सकता। उस आदमी ने कहाबहुत से लोग माक्र्स के दुश्मन हैं। एंजिल्स ने कहामैं यही कह रहा हूंया तो पक्ष या विपक्ष। माक्र्स के संबंध में कोई निर्णय लेना ही पड़ेगा। यही प्रभाव है।
लेकिन मैं कोई बड़ा आदमी नहीं हूं और मैं मानता हूं कि सब बड़े आदमियों ने दुनिया को नुकसान पहुंचाया हैक्योंकि दूसरों को छोटा बनाए बिनाबड़ा होना असंभव है। तो दूसरों को छोटा बनाना ही पड़ेगाबड़े होने के लिए। मैं कोई बड़ा आदमी नहीं हूं और मैं मानता हूं कि बड़े आदमी होने की जो आकांक्षा हैवही दूसरे को प्रभावित करने का रूप लेती है और बड़े आदमी होने की जो आकांक्षा हैवही दूसरे को प्रभावित करने का रूप लेती है और बड़े आदमी की जो आकांक्षा हैवह बहुत गहरे में किसी इंफिरिआरिटी कांप्लेक्स सेकिसी हीनता की ग्रंथि से पैदा होती है। इसलिए सब बड़े आदमीबहुत भीतरहीन-ग्रंथि से पीड़ित होते हैं। वे दूसरे को प्रभावित करकेअंततः अपने को प्रभावित करना चाहते हैं कि मैं बड़ा आदमी हूं। इतने लोग मुझसे प्रभावित हैंतो मैं बड़ा आदमी होना ही चाहिए। यह बहुत वाया मीडियादूसरों के जरिएवे अपने को विश्वास दिलाना चाहते हैं।
मैं राजी हूंउससे राजी हूं। आपको प्रभावित करकेमैं अपने को कोई विश्वास नहीं दिलाना चाहता कि मैं कौन हूंमैं जो हूंउससे मैं राजी हूं और छोटे और बड़े दोनों की परिभाषा के बाहर खड़ा हूंक्योंकि छोटे और बड़े की परिभाषादूसरों से तुलना करने से पैदा होती हैकंपेरिजन करने से पैदा होती है  और मेरी ऐसी समझ है कि एक-एक आदमी इतना अपने जैसा है कि कंपेरिजन असंभव है। तुलना हो नहीं सकती। आप मुझसे बड़े हैं या छोटेयह सवाल असंगत हैक्योंकि मैं मैं हूंआप आप हैं। इसमें कोई तुलना का उपाय नहीं है।
मैं मानता हूंएक-एक मनुष्य अतुलनीय हैइनकंप्रेबल है। इसलिए छोटे-बड़े की सब बातें मुझे बकवास मालूम पड़ती हैं। इसलिए प्रभावित करने का तो कोई सवाल नहीं है। लेकिन अपनी बात कहना जरूर चाहता हूं और अपनी बात मेंआपको सुनने के लिए साझीदार भी बनाना चाहता हूं। जो मुझे दिखाई पड़ता हैवह मैं आपसे निवेदन कर देना चाहता हूं। वह निवेदन हैवह आग्रह नहीं हैं। मानने न मानने की आपके लिए छूट है।
मेरा तो निवेदन यह है कि आप न मानने की फिक्र करनान न मानने की। आप सुन लेना। वह आपको एक विचार कि प्रक्रिया में ले जा सकेतो काफी है। वह विचार प्रक्रियाअंततः मेरी नहीं रह जाएगीआपकी ही हो जाएगी। लेकिन मेरे मित्र हैं,मेरे शत्रु हैं। मेरी तरफ से कोई मेरा मित्र नहीं हैमेरी तरफ से मेरा कोई शत्रु नहीं है। उनकी ही तरफ से वह हैक्योंकि मैं कोई कारण नहीं देखतामित्रता और शत्रुता की जो पोलेरिटी हैउसको बनाने का--कोई कारण नहीं देखता। हम सब साझीदार हैंएक जगत में। लेकिन मेरे मित्र कुछ करेंगेमेरे शत्रु भी कुछ करेंगे।
नानू भाई ने बड़ा अच्छा सवाल पूछा। उन्होंने एक किताब छापी है "आचार्य रजनीश काय मार्गेउसमें भी मेरी फोटो छापी है और मैं समझता हूं कि मेरे मित्रों ने जितनी अच्छी फोटो छापी हैउन सबसे अच्छी फोटो छापी है। हालांकि किताब मेरी आलोचना है। मुझसे तो पूछा नहीं थाफोटो छापते वक्त। मेरे मित्रों ने भी नहीं पूछा। उनको प्रीतिकर लगता है कि मेरी शक्ल वे लोगों तक पहुंचा देंवे पहुंचा देते हैं।
अब रह गई बात यह कि मैं रोकता क्यों नहींपाजिटिवलीमैं कह सकता हूं कि मत छापो फोटो। मैं कह सकता हूंमत छुओ मेरे पैर कभी मैंने किसी से कहा नहीं कि मेरे पैर छुओ। निश्चित ही मुझे दूसरी बात नानू भाई ने ठीक पूछी है कि आप पाजिटिवली कहते क्यों नहीं कि मत छुओ मेरे पैर। लेकिन मेरी समझ है कि जो आदमी कहता हैछुओ मेरे पैरवह भी अहंकारीजो कहता हैमत छुओ मेरे पैरवह भी अहंकारी है। असल में मैं कौन हूंजो आपको आज्ञा दूं कि आप क्या करो,छुओ। मैं कौन हूंमैं आपसे नहीं जाऊंगा कहने कि मेरे पैर छुओ। अगर कहने जाऊं तो मैं खतरनाक आदमी हूं। लेकिन दूसरे छोर पर भी खतरा है।
पंडित नेहरू इलाहबाद की एक सड़क से गुजर रहे थे। वे बड़े सख्त थे। मत छुओ मेरे पैर। मैं पैर न छुआऊंगा। एक अस्सी साल की बूढ़ी औरत ने पैर छुएतो उन्होंने लात मार दी। वह औरत गिर पड़ी। मैं समझता हूंयह दूसरी छोर पर अन्याय शुरू होगा। मुझे कोई हक नहीं है कि मैं कहूं कि मेरे पैर छुओ। यह हक मुझे कहां है कि मत छुओ। मैं दूसरे की स्वतंत्रता में इतनी भी बाधा नहीं डालना चाहता हूं। यह उसकी मौज है।
और अभी एक गांव में ऐसा हुआजो नानू भाई को जानना अच्छा होगा कि एक आदमी ने पैर न छुएमेरा सिर छुआ। दो आदमी साथ खड़े थे मेरे। उन्होंने कहायह क्या करते हैंमैंने कहाउस करने दो। उसको फिर छूने की मौज आई हैउसे करने दो। और इसलिए मैं आपसे निवेदन करता हूं कि किसी को अपना पैर भी मेरे सिर को छुपाने की मौज आ जाएतो मैं मना न करूंगा। अगर मना करूं तो आप मुझसे पूछ लेना कि यह बात क्या हैपैर छूते वक्त मना नहीं किया और आपके सिर पर छुआ रहे हैंतो आप मना क्यों कर रहे हैंनहीं करूंगा।
नहींमेरी समझ यह है कि सब तरह से पाजिटिव असर्शनसभी तरह के विधायक वक्तव्यश्रद्धा पैदा करवाते हैं और आपको जान कर यह मजा होगा कि दुनिया में उन लोगों के पैर सर्वाधिक छुए गए हैंजिन्होंने कहामत छुओमत छुओमत छुओ। लोगों ने कहाअदभुत आदमी हैइसके तो छूने ही पड़ेंगे।
बुद्ध कहते हैंमत छुओ मेरे पैर। लेकिन "बुद्ध शरणं गच्छामिजितना बुद्ध के सामने कहा गया है उतना किसी के सामने नहीं कहा गया है। बुद्ध कहते हैंमत बनाओ मेरी प्रतिमाएं। जितनी प्रतिमाएं बुद्ध की हैं उतनी किसी आदमी की नहीं हैं। आश्चर्यजनक हैआदमी का मन बहुत आश्चर्यजनक है। निषेध भीनिमंत्रण भी।
यहां दरवाजे पर लिख दें कि यहां झांकना मना हैफिर सूरत में इतना हिम्मतवर आदमी बहुत मुश्किल से होगाजो बिना झांके निकल जाए। होगानहीं होगाऔर अगर कोई सज्जन किसी वक्त संयम साध कर निकल गएतो फिर कोई बहाना खोज कर भीइस गली से उनको लौटना पड़ेगा और अगर दिन में हिम्मत करके न लौट पाएंतो रात सपने में जरूर लौटेंगे। वहां है क्यामेरे पैर में कुछ भी नहीं है। इतना भी नहीं है कि मैं आपसे कहूं कि मत छुओ इतना भी नहीं है कि मैं निषेध करूं। निषेध ही निमंत्रण है।
इसलिए मैं आपको कोई आज्ञा नहीं देना चाहता। आज्ञा में ही गुरु बनना शुरू हो जाता है। आज्ञा पूरी होती हैयह सवाल नहीं है। पैर छूने की है कि नहीं छूने की है। यह सवाल नहीं है--आज्ञा। जो आपसे पाजिटिवली कहता हैयह करोयह मत करो,वह गुरु बनना शुरू हो जाता है। मैं किसी का गुरु नहीं हूं।
ठीक उन्होंने पूछा है कि आप शिष्य जाने बनाते हैं या अनजाने। नहींन जान कर बनाता हूंन अनजान करलेकिन कोई बन जाए तो मेरे पास कोई उपाय नहीं हैउसे रोकने का। मुझे पता भी नहीं चलता। पता चलता हैतब तो मैं लड़ता हूं। कोई मुझसे आकर कहता है कि मैं आपका शिष्य हूंतब तो मैं लड़ता हूंलेकिन कोई आए ही नमुझे पता ही न चलेतब बड़ी कठिनाई हो जाती है। और जब कोई मुझसे कहने भी आता है कि मैं आपका शिष्य हूंतब भी मैं यह नहीं कहता कि तुम मेरे शिष्य नहीं होक्योंकि यह हक मुझे नहीं है। इतना ही मैं कहता हूं कि मैं तुम्हारा गुरु नहीं हूंक्योंकि दूसरे कोमैं कैसे किसी को रोक सकता हूंइतना ही मैं कह सकता हूं कि मैं तुम्हारा गुरु नहीं हूं। न जानेन अनजानेमैंने किसी का गुरु होने का भार नहीं लिया है। क्योंकि मैं मानता हूंसभी गुरु पंगु करने वाले सिद्ध होते गए हैं।
असल में गुरु बनने का मतलब यह है कि तुम्हारा बोझ में लेता हूं।
मैं किसी का बोझ नहीं लेता। अपना ही बोझ जिंदगी में काफी है। किसी दूसरे का बोझ लेने का सवाल नहीं है और अगर मुझे कोई बात ठीक लगती है तो आपसे कह देता हूंलेकिन इससे मेरा आपका कोई लेन-देन का संबंध नहीं बनता है। बल्कि में अनुगृहीत हूं कि आपने सुन लिया। आपकी तरफ से अनुग्रह नहीं मानताक्योंकि लेन-देन के बड़े सूक्ष्म नियम हैं। कहीं पैसे लिए जाते हैंकहीं श्रद्धा ली जाती हैकहीं अनुग्रह लिया जाता हैलेकिन सब बड़े सूक्ष्म नियम हैं।
आपसे मैं कुछ नहीं लेताधन्यवाद देता हूं आपको कि आपने मेरी बात सुन लीयह भी क्या कम हैकिसके पास समय हैकिसके पास सुविधा हैबात खतम हो गई। इसके आगे मुझे प्रयोजन नहीं है। लौट कर हिसाब नहीं रखूंगा कि आपने माना कि नहीं माना।
लेकिन यह जो हमारा देश हैयह हजारों साल से गुरुओं के नीचे जी रहा है। यह बिना संबंध बनाए नहीं रहता। यह संबंध बनाने की चेष्टा करता है। आदेश मानता हैचाहे विपरीत आदेश ही क्यों न हों। आदेश मानता है। यह कहता हैकुछ हमें आदेश दे दोजो हम मान कर चलें। मैं कोई आदेश नहीं देता। मेरा जो भी हैवह निवेदन है और जैसा नानू भाई ने कहा कि अब धीरे-धीरे व्यवस्थित हो रहा हैढांचा बन रहा है। मेरी तरफ से नहींबल्कि जो बना रहे हैंवह मेरी तरफ से रोज मुश्किल में हैं। असल में मेरे आस-पास ढांचा बनाना मुश्किल ही हैक्योंकि मैं कोई ढांचे का आदमी नहीं हूं।
नारगोल में जमीन मिलती थीमेरे मित्रों ने सब विधान बनाया था। कैबिनेट तक बात हो गई थी। मंत्री राजी थेछह सौ एकड़ जमीन देने को। वह दो-चार दिन में तय हो जाने वाला था। गांधीजी के संबंध मेंएक वक्तव्य मैंने दिया। मित्रों ने आकर कहा कि इस वक्तव्य को अभी बाहर प्रकट न किया जाए। पहले वह जमीन मिल जाएफिर हम वक्तव्य प्रकट करेंगे। मैंने कहाजमीन के लिए अगर वक्तव्य रुकेगातब तो अंततः मैं ही रुक जाऊंगा।
जमीन जाने सेमित्र बहुत दुखी हुएमुझे छोड़ कर ही चले गएदुश्मन ही हो गए। क्योंकि मित्र जब दुखी होते हैंतो दुश्मनी से कम पर नहीं रुकते हैं। इसलिए मित्र बनाना खतरनाक है। इसलिए मैंने कहान हम मित्र बनाते हैंक्योंकि मित्र बनाने का मतलब हैपोटेंशियल शत्रु बनानाआज नहीं कलबिलकुल बन सकता है। मित्र के सिवाय शत्रु कोई नहीं बनतातो मित्र भी नहीं बनाता। निपट अकेला आदमी हूंऐसा घूमता रहता हूं। अब आपको अच्छी लगती है मेरी बातआप चार मित्र मिल कर कुछ करते हैंमैं आपको रोक नहीं सकतान रोकता हूंलेकिन आप मुझे नहीं बांध सकेंगेकिसी ढांचे मेंकिसी व्यवस्था में। आपका ढांचा जब तक बनेगातब तक...।
अभी कार में आ रहा था तो एक बहन ने कहा कि अगर मैं छह महीने तुम्हारे पार रह जाऊं तो डुप्लीकेट बन जाऊं,तुम्हारी सारी बातों की। मैंने कहावह तो हो जाएगालेकिन तब तक ओरिजिनल बदल जाएगा। तुम तो पक्की बन जाओगी,लेकिन मैं नहीं रुका रहूंगा। मेरी कोई निष्ठा नहीं हैमेरी कोई श्रद्धा नहीं हैइसलिए मेरे साथ ढांचा बनाना मुश्किल हैक्योंकि ढांचा बनता है श्रद्धा परनिष्ठा पर और ढांचा बनता हैउन लोगों के साथजिनमें एक तरह की कंसिस्टेंसी होगीजो-जो आज कहेंगेकल भी कहेंगेपरसों भी कहेंगेतब आप ढांचा बना सकते हैं। लेकिन अगर आप ढांचा बनाएंकल मैं कुछ कहूंपरसों कुछ कहूं तो ढांचा बन न पाए और कुछ गड़बड़ कर दूं।
मेरे जैसे लोगों के पास ढांचा कभी नहीं बनताइसलिए ढांचा तभी बनता हैजब मैं मरने की तैयारी करूं कि आज मैं फाइनली मर जाता हूं। अब मैं कल से वही कहूंगाजो मैंने आज कहा। अब मेरे कलआज की पुनरुक्ति होंगेअब मेरा कोई कल नया नहीं होगा। अब हर आने वाला कल मेरी आज की ही रिपीटीशन होगातब ढांचा बनता है। मेरे जैसे आदमी के पास कुछ ढांचा बनता नहीं।
अभी कुछ मित्र उत्सुक हैंथोड़े दिन में थक जाएंगे तो समझ जाएंगे कि आदमी गड़बड़ हैइसके पास ढांचे नहीं बन सकते। मगर वक्त लगेगा। वक्त लगेगादो-चार मित्र फ्रस्ट्रेट होते चले जाते हैंदूसरे दस-पांच आ जाते हैं। वह अपना शुरू कर देते हैंफिर वे चले जाते हैं। अभी इधर तीन साल के मेरे मित्रों के नाम का आप पता लगाएंगेतो आपको पता चल जाएगा कि जो मित्र छह महीने पहले थेछह महीने बाद मुझे नहीं मिलते। उसमें उनका कसूर नहीं हैकसूर जो हैवह मेरा है। क्योंकि वह चाहता था कंसिस्टेंसी। वह चाहता था कि जो आपने कहा थाउसको अब इधर-उधर मत करना और मैं कहता हूं जिंदगी बहुत इनकंसिस्टेंसी है।
सिर्फ मौत कंसिस्टेंसी है। जिंदगी का भरोसा नहीं कि हम हर सुबह सूरज से कहें कि तुम कल जैसे निकले थेवही रूप रंग में निकलोक्योंकि कल मैंने तुमसे कहा था कि भगवानहम तुम्हारी पूजा करेंगे और आज तुम बदल गए और कल बदलियां और रंग थींआज और रंग हो गईं। सूरज कहेगा तुम पूजा मत करोलेकिन कोई और उपाय नहीं है।
यह जो नानू भाई ने सवाल उठाया हैसभी सवाल उचित हैंमुल्क में बहुत मित्रों के मन में उठते हैंलेकिन गहरे अर्थों में असंगत हैं। मुझसे उनका कोई वास्ता नहीं हैमुझसे उनका कोई भी संबंध नहीं है। मैं निपट अकेला आदमी हूंजो घूमता-फिरताजो उसे ठीक लगता हैकहता रहता है। किसी को ठीक लगता हैमान लेता है। नहीं ठीक लगता हैनहीं मानता है। कोई मित्र बनता हैकोई शत्रु बनता है। वह सब आपकी तरफ से है वह मेरा काम नहीं है। उसके लिए मुझे कभी भी जिम्मेदार न ठहरा सकेंगे। उसकी मेरी कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं है। मेरा काम इतना ही था कि मैंने कह दिया और कल अगर लौट कर भी आपने कहा कि आपने कल यह कहा थातो मैं कहूंगा कि कल का वह आदमी मर चुकाअब दूसरा आदमी हूंवह आदमी हूं नहीं। तो इसलिए इन प्रश्नों की कोई संगति मुझसे नहीं है। फिर और कोई सवाल हो तो उठा लेंउनकी बात करें।
पहली बात तो यह है कि मेरे लिए कोई मामूलीसामान्य आदमी नहीं है। जिसको सामान्य आदमी कहते हैंमेरे लिए कोई भी नहीं है। और जिसको असामान्य आदमी कहते हैंवह भी मेरे लिए कोई नहीं है। मैंने कहा कि तुलना में बड़ी हिंसा है। इस मुल्क में जगह-जगह घूमता हूं। सामान्य आदमी की बहुत तलाश कीमिला नहीं। जो भी मिला उसने कहाये सामान्य आदमी जो हैंये न समझ सकेंगे। एक भी आदमी ने न कहा कि मैं सामान्य आदमी हूंमैं नहीं समझ सकूंगा। प्रत्येक आदमी अपने तईं विशेष है और प्रत्येक आदमी की अपनी विशेषता हैउससे हिंसा करवाती है कि दूसरा सामान्य है। कोई भी सामान्य नहीं है। सामान्य आदमी पैदा ही नहीं होता।
एक अरबी कहावत मैंने सुनी है कि भगवान जब आदमी को बना कर भेजता हैतो जिस आदमी को भी बनाता हैउसके कान में कह देता है कि तुमसे बढ़िया आदमी मैंने कभी बनाया नहीं। सभी से कह देता हैतो हरेक यह खयाल लेकर आता है कि मैं विशेष और दूसरे सामान्य। कोई सामान्य नहीं है और कोई विशेष नहीं है। या तो सभी सामान्य हैं या सभी विशेष हैं और कोई सोचता हो कि मैं ऐसा वर्गीकरण करूंऐसी क्लास बनाऊं कि विशेष लोगों के लिए कुछ और हो और सामान्य लोगों के लिए कुछ और होतो यह मेरे वश के बाहर है। मेरे लिए ऐसा कोई वर्ग नहीं है और मेरे पास कहने को दो बातें भी नहीं हैं। जो है यही हैमैं वही कह सकता हूं। अगर आप भी चले जाएं और दीवाल के सामने भी मुझे कहना पड़ेतो भी मैं वही कह सकता हूं जो आपसे कह रहा थाऔर कोई उपाय नहीं है।
दूसरी बातआपने कहा कि यहां कोई मंडन मिश्र या शंकर नहीं बैठे हुए हैं। अच्छा ही है कि नहीं बैठे हुए हैंक्योंकि मंडन मिश्र अब दुबारा होंगे तो कार्बन कापी ही हो सकते हैं। हर आदमी एक ही बार होता है। मंडन मिश्र भी एक ही बार होते हैं और आप भी एक बार होते हैं। यूनीकनेस इतनी गहरी है कि एक आदमी दुबारा पुनरुक्त नहीं होता है। इसीलिए एक-एक व्यक्ति की महिमा अनंत है। वह जैसा हैवह वैसा ही है। अगर बुद्ध अपने जैसे हैं तो जिसे हम सामान्य कहते हैं वह भी अपने जैसा है। कौन बुद्ध उसका मुकाबला कर सकता हैअगर वह बुद्ध का मुकाबला नहीं कर सकता हैतो कौन बुद्ध उसका मुकाबला कर सकते हैं?
लेकिन मनुष्य की चिंतना चूंकि अहंकार केंद्रित रहीसदा उसने वर्गीकरण किएविभाजन किएशूद्र बनाएब्राह्मण बनाएमहान पुरुष बनाएसामान्य जन बनाएज्ञानी बनाएअज्ञानी बनाए। इस जगत में वर्ग नहीं हैंव्यक्ति हैं और एक व्यक्ति बिलकुल अकेला हैदूसरा भी नहीं है कि उसका वर्ग बनाया जा सके। वर्ग बनने के लिए कम से कम दो चाहिए। तो मैं कोई मंडन मिश्र की ज्यादा इज्जत नहीं करता आपसे और न मंडन मिश्र से कम इज्जत करता हूं आपकी। मंडन मिश्रमंडन मिश्र हैंआपआप हैं। दोनों अपनी जगह अदभुत हैंइसलिए मुझे जो निवेदन करना हैवह मंडन मिश्र होते तो भी यही करता और आप हैं तो भी यही करूंगा। कोई उपाय नहीं है इसमें।
एक फूल खिला हैजैसा मैंने कहाऔर रास्ते से मंडन मिश्र निकलेंतो वह फूल कोई दूसरी सुगंध नहीं फेंकता है और गांव का चमार निकला तो कहताचमार निकला--जरा सामान्य आदमी निकलातो अपनी सुगंध सिकोड़ लूं। नहींफूल अपनी सुगंध फेंकता रहता है। हांऐसे फूल हो सकते हैंप्लास्टिक के बनाए हुए और यांत्रिक कि जो आदमी देख कर सुगंध दें। पर तब प्रभावित करना लक्ष्य होगा। तो उन्होंने कहा कि सामान्य आदमी पर गौर करिए आपक्योंकि सामान्य आदमी को प्रभावित न कर सकेंगे। मैं प्रभावित करना नहीं चाहताइसलिए उस भाषा में मत पूछें।
और आप कहते हैंतत्व-दर्शन की भाषा मत बोलिए। बड़ी मुश्किल बात है। बड़ी मुश्किल बात हैएक संगीतज्ञ से कहिए कि संगीत की भाषा में नहींजरा किसी और भाषा में संगीत सुनाइए और एक चित्रकार से कहिए कि रंगों की भाषा में नहीं,जरा किसी और भाषा में चित्र बनाइएतब हम समझ सकेंगेएब्सर्ड है।
मैं जो हूंवही निवेदन कर सकता हूंसंगीतज्ञ हूं तो वीणा बजाऊंगाचित्रकार हूं तो रंग पोतूंगा। जो मैं कर सकता हूं,वही कर सकता हूं और मेरे भीतर कोईकई तरह के आदमी नहीं हैं। मल्टी-साइकिक नहीं हूं ,बहुत के आदमी नहीं हूंएक ही तरह का आदमी हूं। इसलिए बहुत तरह के चेहरे बनाना भी बहुत मुश्किल हैमेरे लिए। एक ही चेहरा है मेरे पास। सामान्य आदमी के सामने खड़ा होता हूंतब भी वहीऔर जिसको आप असामान्य कहते हैंउसके सामने खड़ा होता हूंतब भी वही।
एक आदमी हिंदुस्तान से कोई चौदह वर्ष पहले चीन गयाबोधिधर्म। जब वह चीन पहुंचा तो वहां के लोग बहुत परेशान हुएक्योंकि वह दीवाल की तरफ मुंह करके बैठता थालोगों की तरफ पीठ कर लेता था। जब चीन का सम्राट मिलने आया तो फकीरों ने--दूसरे फकीरों ने कहा कि आप जरा कृपा करेंयह आदत छोड़ें। सम्राट मिलने आ रहे हैंवह बहुत नाराज हो जाएगा। आप उसकी तरह पीठ करके बैठेंगे। आज दीवाल की तरफ मुंह न चलेगासामान्य आदमियों के साथ चल गयावह बात दूसरी हैसम्राट आ रहा है।
तो बोधिधर्म हंसने लगा। उसने कहा कि मेरे लिए सामान्य आदमी और सम्राट होतातब तो तुम जो कहते होवह ठीक कहते हो। मेरे लिए तो कोई भी आएमैं दीवाल की तरफ ही मुंह करूंगा। समझाया कि ऐसा क्यों पागलपन पकड़ लिया है कि दीवाल की तरफ मुंह कर रहे हो। तो उसने कहा कि दीवाल की तरह मुंह रखने का कुल कारण इतना ही है कि लोगों की तरफ मैंने बहुत बार मुंह करके देखावहां भी दीवाल पाई तो मैंने सोचा कि नाहक क्यों परेशानी करनी हैतो दीवाल की तरफ मुंह फेर लिया।
नहींमेरे लिए फर्क नहीं है। और उन्होंने कहा कि बुद्ध भी आएऔर विनोबा भी आए। मुझे ज्यादा पता नहीं हैलेकिन मैं मानता हूं कि विनोबा आग्रही थेप्रचारक थेप्रोपेगेंडिस्ट थे और अगर आज नहीं हैं तो फस्ट्रेशन के कारण। आग्रह था उनका कि ऐसी शक्ल दे देंगेसमाज को हम ऐसा बना देंगे। सत्याग्रह कहीं होगा आग्रहआग्रह था। माक्र्स आग्रही हैंगांधी आग्रही हैं,विनोबा आग्रही हैं। वे एक शक्ल देना चाहते थेवे व्यक्ति को एक ढांचा देना चाहते थे कि ऐसा व्यक्ति होना चाहिएएक नैतिकता देना चाहते थेएक धर्म देना चाहते थेएक आदत देना चाहते थे।
मैं  आग्रही नहीं हूं। मैं कोई ढांचा आपको देना नहीं चाहता। मैं नहीं कहताऐसा आदमी अच्छा आदमी होगा और मैं नहीं कहता कि ऐसा आदमी होना चाहिएक्योंकि मैं मानता हूं कि दो आदमी एक जैसे हो नहीं सकते। इसलिए ढांचे की बात करने वाले लोग गलती ही कर रहे हैं। आदमी मशीन नहीं है। मैं तो अच्छे आदमी का भी ढांचा नहीं देना चाहताक्योंकि जब मैं देखता हूं तो मुझे लगता है कि अकेला राम रह जाएतो दुनिया बहुत बेरौनक हो जाएगीरावण के बिना बहुत बुरी हो जाएगी। मुझे तो लगता है कि रावण उतना ही जरूरी है जितना राम हैऔर मुझे लगता हैरामलीला कोई करके देखे रावण के बिना,तो पता चलेगा कि सब गड़बड़ हो गयारामलीला होती नहींआगे नहीं बढ़ती। रामलीला में रावण जरूरी है।
जिसको हम बुरा कहते हैंमेरे मन में उसकी भी स्वीकृति है। जिसको हम हिंसक कहते हैंमेरे मन में उसकी भी स्वीकृति हैजिसको हम पापी कहते हैंमेरे मन में उसकी भी स्वीकृति है। असल में मेरे मन में किसी की अस्वीकृति नहीं है,क्योंकि अस्वीकृति हुई कि प्रभावित करने की चेष्टा शुरू हुई। जैसे ही मुझे लगा कि आप गलत हैंआपका कुर्ता ऐसा होना चाहिए और आपके बाल ऐसे कटने चाहिए और आपको इस ढंग से बैठना चाहिएमैंने आपको जैसे अस्वीकार किया कि मैं आपके साथ दर्ुव्यवहार शुरू किया।
दर्ुव्यवहार के बहुत ढंग हैं और गुरु जितना दर्ुव्यवहार करता हैउतना कोई भी नहीं करता हैक्योंकि वह आपको काटता है। वह कहता है कि ढांचे में आओब्रह्मचर्य साधोअहिंसा साधोसत्य साधोयह साधोयह साधो। थोपता चला जाता है। वह आपको काट-पीट कर जैसे पत्थर काटता हो कोईऐसा काटता है। महावीर को भी आग्रह हैकाटने को लोगों का। बुद्ध को आग्रह हैगांधी को भीविनोबा को भी। इसलिए आप मुझे मत गिनें। उन आग्रही लोगों से मेरा कोई लेना-देना नहीं। वे आदमी को एक शक्ल देना चाहते हैं।
मैं मानता हूं कि किसी आदमी को किसी दूसरे आदमी की शक्ल देने का हक नहीं हैयही हिंसा हैयही वायलेंस है। जैसे ही कोई पति कहता है कि पत्नी ऐसी होनी चाहिएहिंसा शुरू हो गई। बाप कहता है कि बेटा ऐसा होना चाहिए हिंसा शुरू हो गई। जब भी कोई किसी दूसरे से कहता है ऐसे बनोतब भीतर से हिटलर बोलने लगा। वह चाहे खद्दर के वस्त्र पहने होउससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
नहींयह जो आदमी हैयह आदमी टार्चर करने के बहुत कुशल रास्ते खोजता है। जो बहुत नासमझ हैंवे छुरी छाती पर रख देते हैंटार्चर करने के लिए। जो ज्यादा समझदार हैंवे अपनी छाती पर छुरे रख लेते हैं और कहते हैं हम अनशन करके भूखे मर जाएंगेलेकिन तुम्हें ऐसा होना चाहिए। यह सब छुरेबाजी है। दूसरे की छाती पर रखते हो तो हिंसाअपनी छाती पर रखते हो तो अहिंसा हो गई। नहींअसल में जैसे ही मैं दूसरे आदमी को इनकार करता हूंहिंसा शुरू हो गई। जैसे ही मैं कहता हूं कि दूसरा आदमी ऐसा नहींतो मैंने अपने को थोपना शुरू कर दिया।
नहींमेरा कोई आग्रह नहीं है। मैं मानता हूं रावण अपनी जगह है और बड़ा जरूरी है और बड़ा प्यारा हैऔर राम अपनी जगह हैं। और अगर मैं पूजा करने जाऊंगा तो दोनों की करूंगा या दोनों की नहीं करूंगा। लेकिन हम चुनाव करना पसंद करते हैं। हम कहते हैंस्पष्ट कहिएराम के पक्ष में हैं कि रावण के। मैं आदमी के पक्ष में हूं। रावण के भी नहीं और राम के भी नहीं। और आदमी एक अनंत घटना हैउसमें अनंत रूट हैं। मुझे गुलाब का फूल भी पसंद है और चमेली का और चंपा का भी और धतूरे का भी। मुझे कैक्टस भी पसंद हैकांटों वाला और मुलायम फूलों वाले पेड़ भी पसंद हैंलेकिन मैं नहीं कहता कि कैक्टस को कांटे झड़ा देना चाहिए।
मैं परमात्मा का यह जगत जो जैसा हैइसको समग्रता से स्वीकार कर रहा हूंन बुद्ध स्वीकार करते हैंन महावीर स्वीकार करते हैंन गांधी स्वीकार करते हैंन विनोबा स्वीकार करते हैं। यह जो अस्वीकृति हैवह प्रभावित करने की,इनफ्लुएंस करने कीप्रापेगेट करने की चिंता आ जाती है उसमें कि आदमी को बदलोसंगठन बनाओपंथ बनाओसमूह बनाओघेरा बनाओबदलो आदमी को। आदमी को ऐसा बदलोजैसा हम चाहते हैं। लेकिन आप कौन हैंआपको किसने कहा कि आदमी बदलोआप हैं कौन?
आप भी एक आदमी हैंथोड़ा बोल लेते हैं ढंग से या थोड़े कपड़े छोड़ कर नंगे खड़े हो जाते हैं या थोड़ा आपको कोई फेड पकड़ गया है कि चरखा चलाते हैंकि बीड़ी नहीं पीते कि पान नहीं खातेआपकी मौज है। लेकिन जब वह दूसरा आदमी बीड़ी पी रहा हैजब नहीं बीड़ी पीने वाला उसको पुलिस की आंखों से देखता हैतब हिंसा शुरू हो जाती है। कौन हकदार हैकोई हकदार नहीं है किसी पर थोपने का अपने को। तो इसलिए मुझे मत गिनें।
मुझे न प्रचार करना हैन कोई सर्वोदय लाना हैऔर न कोई समाज का आदर्श बदलना हैन एक व्यक्ति कोई ऐसा बनाना हैवैसा बनाना हैऐसा नहीं। तो जब मैं कुछ कह रहा हूंतो वह कहना मेरा आनंद होता है। उससे ज्यादा नहींउससे ज्यादा कोई प्रयोजन नहीं। हांअगर मुझे लगता है कि बीड़ी पीने में मैंने बहुत दुख पायातो मैं निवेदन कर दूंगा कि बीड़ी पीकर मैंने बहुत दुख पायालेकिन तब भी मैं आपको कंडेमनेशन से नहीं देख सकता कि आप बीड़ी पी रहे हैंक्योंकि कोई आदमी बीड़ी पीकर सुख पा रहा होइसकी पूरी संभावना है। मैंने दुख पायावह मैं कह देता हूं। लेकिन मेरा दुख सबका दुख नहीं है और मेरा सुख सबका सुख नहीं है।
एक आदमी का नरकदूसरे का स्वर्ग हो सकता है। एक आदमी का स्वर्गदूसरे के लिए नरक हो सकता है। यह भिन्नता की मेरे मन में स्वीकृति है। इसलिए अभी मैं ट्रेन में सवार हुआ। जिस कंपार्टमेंट में मैं था--मैं था और एक मित्र और सवार थे। वह मुझे देख कर एकदम घबड़ा गएजैसा कि महात्माओं को देख कर घबड़ा जाना चाहिए। एकदम उन्होंने नमस्कार किया और कहामहात्मा जी! लेकिन मुझे ऐसा लगा कि मेरा आना उन्हें अच्छा नहीं लगा। असल में महात्मा का आनाकिसी को भीजिंदगी में अच्छा नहीं लगताक्योंकि महात्मा बिना गड़बड़ किए नहीं रह सकतानहीं तो उसका महात्मापन खो जाए। मैंने उनके कहाऐसा लगता हैमेरे आने से आप सुखी नहीं हुए। मैं दूसरे कंपार्टमेंट में चला जाऊं?
उन्होंने कहानहीं-नहींबड़ा आनंद हुआ आपके आने पर। मैंने कहाआप जो कह रहे हैंवह कुछ और कह रहा है,आपका चेहरा जो कह रहा हैवह कुछ और है। उन्होंने कहा कि क्या आप मेरे भीतर की बात पकड़ते हैंमैंने कहाभीतर की बात नहीं पकड़ता। आपका चेहरा इनकार कर रहा है। तो उन्होंने कहाआपने बात ही उठा दीतो मैं आपसे कह ही दूं कि मैं सफर मैं चलता हूंतो मुझे शराब पीने की आदत है। मैंने शराब के लिए आर्डर दे रखा है। सोडा आ गया हैशराब आ रही है और आपको देख कर मैं डर गया और मैंने कहा अब मुश्किल हो गई। अब न शराब पी सकता हूंन आमलेट खा सकता हूंअब बड़ी मुश्किल हो गई है।
मैंने कहालेकिन क्या आप मुझे शराब पिलाएंगेउन्होंने कहानहीं-नहींमैं क्यों पिलाऊंगामैंने कहाआप पीएंगे तो मैं क्यों रोकूंगाअगर आप मेरे ऊपर होकर जबरदस्ती शराब पिलाएंजितनी हिंसा यह होगीउससे कम हिंसा यह न होगी कि मैं आपको शराब न पीने दूं। ये दोनों बराबर हिंसाएं हैं। आप मजे से पीएं। नहींउन्होंने कहा कि संत के रहते हुए मैं कैसे पीऊंगा। मैंने कहाकैसे पागल हो गए हैं। शराब पीनी है कि एक संत को पीना हैमैं दुष्ट आदमी नहीं हूं। अगर आपको फिर भी तकलीफ हो तो मैं चला जाऊं। दूसरी जगह खोज लूं।
उन्होंने कहानहीं-नहींआप बैठिए। वे डरते-डरते शराब पीए और बाद में उन्होंने मुझसे एक बात कहीजो हिंदुस्तान भर के सब संतों कोजिंदा मुर्दों कोसबको बता देनी है। उन्होंने मुझसे कहा कि आप संत जैसे दिखाई पड़ने वाले पहले आदमी हैं,जो मुझे भला आदमी मालूम पड़ा।
असल में संत भले आदमी हो ही नहीं सकते हैं।
अधिकतर संत सैडिस्ट होते हैं या मैसोचिस्ट होते हैं। या तो वे दूसरे को सताते हैं या खुद को सताते हैं और जो खुद को सताने में कुशल होते हैंवे दूसरे को सताने का अधिकार पा जाते हैं। नहींमेरा उनसे कुछ लेना-देना नहीं है। विनोबा वगैरह को मत लाएं। मेरे हिसाब से इन सबकी तो बेचारों की मानसिक चिकित्सा होनी चाहिए। मेरे हिसाब से ये कहीं जाते नहीं। ये बहुत अजीब तरह की विकृतियों में घिरे रहते हैं लेकिन यह मैं कह रहा हूं। ऐसे विनोबा हैंऐसा आपको मानने को नहीं कह रहा हूं। ऐसा मुझे दिखाई पड़ता है। मेरा दिखाई पड़ना गलत हो सकता है।
मेरे हिसाब से मनुष्य-जाति कोजिन लोगों ने अब तक ढालने की कोशिश की हैउन ढालने वाले लोगों मेंनब्बे प्रतिशत लोग मानसिक रूप से रुग्ण थेइसलिए यह मनुष्यता पैदा हुईजो मानसिक रूप से रुग्ण है। और यह मनुष्यता तो आई हैपैदा की गई है। इसमें महावीर का हाथ हैबुद्ध का हाथ हैकृष्ण का हाथ हैक्राइस्ट का हाथ हैमुहम्मद का हाथ है। इन सारे लोगों नेइन सारे शिक्षकों ने मनुष्यता को ढालने की कोशिश की और यह मनुष्यता पैदा हुई है। यह मनुष्यता बिलकुल पागल मालूम पड़ती है। इस पागल मनुष्यता में बुद्ध को बचाया नहीं जा सकतामहावीर को हटाया नहीं जा सकता। उनका हाथ जरूरी है और जब तक हम सीधे सत्यों को देखने की हिम्मत न जुटाएंबड़ी मुश्किल होती है।
असल में अच्छे आदमीअनेक लोगों को बुरा बनाने का कारण बनते हैं।
अच्छे बाप के घर मेंअच्छा बेटा पैदा होना बहुत मुश्किल हो जाता है। गांधी के बेटों से पूछोहरिदास से पूछोमहात्मा गांधी के बेटे हरिदास से पूछो कि तुझे क्या हो गया हैपागलइतना अच्छा बाप मिला और तुझे क्या हो गया कि तू मांस खाए कि तू शराब पीए कि तू मुसलमान हो जाएतुझे क्या हो गयाइसमें गांधी का हाथ था। इसमें गांधी का जो अति टार्चर करने वाला व्यक्तित्व हैजो कहता है कि नहींयह मत खाना। इसकी अंतिम परिणति यही होने वाली है कि जो नहीं खाना है,वह खाना है। यह मत पीनावह अंतिम परिणति वही होने वाली है।
अगर कभी भी दुनिया में कहीं लेखा-जोखा होता होगातो हरिदास के चक्कर में गांधी फंसेंगे--अगर कहीं लेखा-जोखा होता है तो। जब बाप थोपता है अपने कोतो बेटे को बगावत के लिए तैयार करता है और जब संत थोपते हैं अपने को समाज के ऊपरतो समाज को विकृत करते हैं। नहींमैं थोपने वाले लोगों के पक्ष में नहीं हूं। कम से कम मैं किसी तरह के थोपने के सहयोग में खड़ा नहीं हो सकता। मैं इन क्रिमिनल्स के साथ खड़ा होने को राजी नहीं हूं। मेरे लिए जो अपराधी हैवे हैं।
आपसे नहीं कहता कि आप अपराधी मान लेना। फिर थोपना हो जाएगा। मैं सिर्फ निवेदन करता हूं कि मुझे ऐसा लगता है। अब मजबूरी है। मेरी आंखें खराब हो सकती हैं तो मुझे ऐसा दिखाई पड़ सकता हैलेकिन जैसा दिखाई  पड़ता हैवही मैं कह सकता हूं। नहींकोई योजना नहीं है मेरे पास। किसी आदमी को ढालने के लिएकोई ढांचा नहीं है मेरे पास।
मेरी तो समझ यह है कि जब हम सब सांचे तोड़ देंगेतब ठीक-ठीक मनुष्यता विकसित हो सकेगी। तब एक-एक आदमी वही हो सकेगाजो होने को पैदा हुआ है। अभी हर आदमी इधर-उधर डैविएट कर जाता है। जब कि वह होने को पैदा ही नहीं हुआ। हम सब मिल कर उसकोवह होने में लगा देते हैंजो आदमी जो होने को नहीं पैदा हुआ है।
एक मित्र कहते हैं कि आप दूसरे की निंदा न करेंऔर कोई बात करें।
मैं किसी की निंदा कर ही नहीं रहा। अपनी बात कह रहा हूं। उस अपनी ही बात मेंवे भी आ जाते हैं। उसमें मेरा कसूर नहीं है और हम निंदा और प्रशंसा के सिवाय कुछ और सोच ही नहीं सकते। सत्य की बात सोच ही नहीं सकते। मैं सिर्फ तथ्य,जो मुझे दिखाई पड़ रहा हैउसे कहता हूं। आप उसे निंदा समझ लेते हैंवह आपकी व्याख्या हैमेरी नहीं है। मैं कहता हूं कि गांधी रुग्ण व्यक्तित्व हैंमेरे लिए एक फैक्ट हैवह मैं कह रहा हूं आप कहते हैं कि निंदा हो गईक्योंकि मन में कोई प्रशंसा बैठी होगी कि महात्मा हैंरुग्ण व्यक्तित्व कैसे हो सकते हैं! निंदा हो गई। यह आपकी व्याख्या हुई। यह आपकी तकलीफ है। इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं हैइससे मेरा कोई संबंध नहीं है। मुझे दिखता हैवह मैं कहता हूं। आपके मूल्यों में भेद पड़ेगा,तकलीफ होगीबेचैनी होगीजिसको महात्मा कहावह बीमार कैसे हैं?
हमको खयाल है कि महात्मा बीमार होते ही नहींइसलिए हम खुद तकलीफ में पड़ जाते हैं। मैं किसी की निंदा नहीं करतान किसी की प्रशंसा करतान निंदा से कोई फायदा हैन प्रशंसा से। जो जैसा मुझे दिखाई पड़ता हैवैसा मैं कहता हूं। वह वैसा है हीयह भी नहीं कहता। मुझे दिखाई पड़ता हैवह मैं कहता हूं।
एक मित्र ने कहा है कि आप जो बातें कहते हैंउससे युवा पीढ़ी पर उलटा प्रभाव पड़ेगा।
जब मैं सीधे ही प्रभाव की फिक्र नहीं करता तो उलटे प्रभाव की मैं कैसे फिक्र करूंगामैं प्रभाव की ही फिक्र नहीं करता। और उलटा क्या हैसीधा क्या हैपुरानी पीढ़ी जिसे मानती हैवह सीधा है और नई पीढ़ी जिसे वह मानती हैवह उलटा है?अगर आप शीर्षासन के बल खड़े हो जाएं तो जितने लोग सीधे खड़े हैंसब उलटे खड़े हैंउलटा कौन हैऔर युवा पीढ़ी आपको सीधा करने की कोशिश से ही तो उलटी नहीं हुई जा रही हैयह कभी सोचा है आपनेआपके सीधे करने की कोशिश इतनी खतरनाक है कि कोई भी उलटा हो जाएगा। पहले नहीं होता थाइसका कारण थाक्योंकि जाल आपका बहुत सख्त थाबहुत मजबूत था। गुलामी बहुत गहरी थी और जंजीरें आपके पास बहुत ताकतवर थीं। और हर बच्चे को आप युवा होने से ही रोक देते थे। बाल-विवाह बुनियादी तरकीब थी। उसकी वजह से कोई युवा नहीं हो पाता था। आठ साल या दस साल के लड़के की शादी कर दीवह युवा कब हो पाएगायुवा होने के पहले वह बाप हो जाएगा। बाप कभी युवा नहीं होता। बूढ़ा हो गया है।
पुरानी दुनिया में युवा थे ही नहीं। वे सौ वर्ष में पैदा हुए हैंइसलिए आपकी पुरानी व्यवस्था में युवक था ही नहीं और युवक बिगड़ जाएगायह डर बाप को रहता है और उसके बाप को भी उसके संबंध में यही डर था। यह जो युवक हैजिसको आप सोच रहे हैं कि बिगड़ जाएगाअपने बेटे के संबंध मेंइसी डर में जीएगा। यह डर सनातन है। मैंने दुनिया की पुरानी से पुरानी किताब खोजने की कोशिश की। मुझे ऐसी किताब नहीं मिल सकीजो यह कहती हो कि आज के लोग अच्छे हैं। सब किताबें कहती हैंपहले के लोग अच्छे थे। छह हजार साल पुरानी किताब कहती है चीन में। वह कहती हैपहले के लोग बहुत अच्छे थे। आजकल की पीढ़ी बिलकुल बिगड़ गई है।
इजिप्त में पत्थर मिला हैबेबीलोन में पत्थर मिला है। वे सब कहते हैं कि पहले के लोग अच्छे थेआज की पीढ़ीनई पीढ़ी बिलकुल बिगड़ गई है। ये पहले के लोग अच्छे कब थेये कभी थेये कभी भी नहीं थे। कभी भी पहुंच जाओनई पीढ़ी बिगड़ी हुई मालूम पड़ेगी। उसकी वजह है। बाप बूढ़ा हो गया है और लड़का जवान है। दोनों एक साथ बूढ़े नहीं हो सकतेउपाय ही नहीं है। अगर कोई उपाय होता कि बाप और बेटे एक साथ बूढ़े हो जाते तो सब ठीक हो जाता।
और ध्यान रहेनई पीढ़ी बिगड़ती नहीं है। नई पीढ़ी के पास जो जीवन की धारा है। बाप के पास जीवन की धारा सूख गई है। और जब जीवन की धारा सूखती है तो क्रोध पैदा होती है और जब क्रोध पैदा होता है तो निंदा पैदा होती हैदुश्मनी पैदा होती हैलड़ाई पैदा होती है। बेटा वही कर रहा हैजो बाप आज भी करना चाहेगालेकिन नहीं कर पा रहा हैतो वह एक रस ले रहा है। रस ले रहा है कि सब बिगड़ गयासब उलटा हो गयासब खराब हो गया और मजा यह है कि सब यहीवह भी करता रहा था और उसके बाप भी यही कर रहे थे।
नहींकहीं कुछ नहीं बिगड़ गया है। आज जो हमें यह सवाल इतना तीव्र मालूम पड़ता है। किन-किन बातों में आप कहते हैं कि नई पीढ़ी बिगड़ गई हैपुरानी पीढ़ी वियतनाम में बम गिरा रही है और नई पीढ़ी वियतनाम में बम न गिरेइसलिए लड़ रही है। उलटा कौन हैपुरानी पीढ़ी का द्रोण एकलव्य का अंगूठा काट रहा हैनई पीढ़ी का एकलव्य इनकार कर रहा है कि गुरुजीबहुत हो चुका हैअब अंगूठे न काटने देंगे। उलटा कौन हैकभी सोचा है कि सारा का सारा पूरा हमारा अतीतइसमें उलटा है कौनलेकिन अपने को सीधा मान लेने की प्रवृत्ति सेदूसरे को उलटा मान लेना बहुत आसान है। नई पीढ़ी बहुत कमजोर होगीआपके नीचे होगी। इस वक्त ताकतवर हो गई हैइसके पहले कभी ताकतवर न थीक्योंकि एक गांव में बेटा अकेला था और बाप सदा इकट्ठे थे। तो सब बाप मिल कर बेटे की निंदा करेंतो वह खड़ा न हो सकता था। और बेटे इकट्ठे मिल कर बाप को कहीं फंसा नहीं पाते थेक्योंकि बेटे इकट्ठे होने का कोई उपाय न था। एक-एक बेटा अपने बाप से सदा कमजोर था।
अब हालत बदल गई है। एक-एक यूनिवर्सिटी में बीस-बीस हजार विद्यार्थी इकट्ठे हो गए हैं। बेटे इकट्ठे हो गए हैंबाप अलग-अलग पड़ गए हैं। बीस हजार बाप कहीं भी इकट्ठे नहीं हैंइसलिए दबाना मुश्किल पड़ रहा है। और कोई मामला नहीं है। बीस हजार बेटे बदला ले रहे हैं। दस-पच्चीस हजार साल का बदला हैस्वाभाविक है। काफी सताया है उनकोवे बदला ले रहे हैं। इसमें उलटा वगैरह कुछ भी नहीं हो गया है।
मैं न तो सीधे प्रभाव को उत्सुक हूं और न तो उलटे प्रभाव को उत्सुक हूं। और उलटे प्रभाव को कैसे रोकिएगागांधीजी ने आत्मकथा लिखीतो कई लोगों ने पत्र लिखा कि आपकी आत्मकथा पढ़ कर हममें कामोत्तेजना पैदा हो गई है। गांधीजी की आत्मकथा ने आग लगाई--कई लोगों में कामोत्तेजना पैदा हो गईअसल में जिसमें कामोत्तेजना हैवह किसी भी वजह से पैदा होगी और उभरेगी। असल में गांधीजी की आत्मकथा न मिलेगी तो भी कोई दूसरा बहाना खोजेगी। कोई कामोत्तेजना गांधीजी की आत्मकथा के लिए ठहरी नहीं थीपहले दुनिया में। पहले भी उठती थी।
अभी हम लड़कों को कह रहे हैं कि सिनेमा देख कर बिगड़े जा रहे हो। तो पहले के लड़के क्या देख कर बिगड़े थे?सिनेमा देख कर बिगड़े थेसिनेमा ने बिगाड़ दियातो खजुराहो किसने बनायाआज के लड़कों नेतो सिनेमा की नंगी तस्वीरें बिगाड़ रही हैंतो कालिदास के ग्रंथ देखें। जितना नंगा वर्णन उनमें हैउतना आज की फिल्मों में कहीं भी नहीं है। कालिदास जंगल में जाएंतो फल नहीं दिखाई पड़ते हैंस्त्रियों के स्तन ही लटके हुई दिखाई पड़ते हैं। अभी तो मैंने कोई फिल्म नहीं देखीजिसमें ऐसा हो कि फलों की जगह स्त्रियों के स्तन लटके हुए हों। तो कालिदास नई पीढ़ी के आदमी हैंआदमी कौन उलटा है?
लेकिन हम जीवन की सहजताओं को दबाने के लिए आतुर हैं कि जीवन की जो सहजता हैस्वाभाविकता हैउसको दबा दोसप्रेस कर दो। उसको मार डालो बिलकुलगर्दन घोंट दोतो बगावत होगी। यह जो सारी दुनिया में बगावत हो रही है। बूढ़ी पीढ़ी सेक्स सप्रेशन कर रही थीनई पीढ़ी नहीं दबा रही हैकाम को। और आपको पता नहींपहली दफे स्टार्वेशन पैदा हुआ,पहले न था। लड़के मेंलड़की में सेक्स मैच्योरिटी आतीउसके पहले हम विवाह कर देते थे। भूख लगतीथाली लगा देते थे।
अब पंद्रह साल में सेक्स मैच्योरिटी आ जाती हैबल्कि और जल्दी। क्योंकि जितनी संपन्नता बढ़ रही हैमैच्योरिटी जल्दी आ रही है। हिंदुस्तान में चौदह साल की लड़कियां होती हैं मैच्योर। और अमेरिका मैं तेरह साल में होती थींअब बारह साल में हो रही हैंदस साल में हो रही हैं। वैज्ञानिक कहते हैं नौ साल में अमेरिका की लड़की मैच्योर हो जाएगीक्योंकि इतना पौष्टिक भोजन मिल रहा है कि मैच्योरिटी जल्दी आ जाएगी। अब नौ साल या दस साल की लड़की मैच्योर हो जाएगी और पच्चीस साल तक आप उसको स्टार्व करेंगेरोकेंगे। लड़का मैच्योर हो जाएगा चौदह साल में और उसको चौबीस-पच्चीस साल रोकेंगे कि पढ़ोइंजीनियर बनोडाक्टर बनोअभी स्त्री से बचना। और ये दस साल सबसे ज्यादा पोटेंशियल है। वीर्य की जितनी शक्ति अभी हैइसके बाद फिर कभी न होगी। अब उसको आप मुसीबत में डाल दिए हैं। उसकी प्रकृति इनकार कर रही है,उसकी बायोलाजी इनकार कर रही है और आप कह रहे हैं कि बेटेबसब्रह्मचर्य ही परम-जीवन हैयह तख्ती लगा कर घर में बैठो और आंखें बंद रखो और स्त्री वगैरह को मत देखना। लेकिन स्त्री को देखने से कहां बचोगेकैसे बचोगे और आंख बंद करने से स्त्री जितनी सुंदर दिखाई पड़ती है खुली आंख से कभी दिखाई नहीं पड़ती है।
जीवन के तथ्यों को उघाड़ कर रखने से ज्यादा मेरा कोई काम नहीं है। मुझे कोई प्रयोजन नहीं है क्या आदर्श हैकौन बनेगाकौन बिगड़ेगामैं यह मानता हूं कि अगर सत्य बिगाड़ता होगातो मेरी बातें भी बिगाड़ देंगी और अगर सत्य बिगाड़ता होतो मेरी समझ है कि सत्य को साथ बिगड़ना अच्छा हैअसत्य के साथ सुधरने से। अगर सत्य बिगाड़ता है तो बिगाड़ देगा। और आपने असत्य पांच-दस हजार साल से थोप रखा है। सुधारा नहीं उसनेकुछ आपको। तब एक सत्य को मौका दें कि जिंदगी के सब सत्य सीधे और साफ हो जाएं और उनको प्रकट होने देंउनको छिपाएं मत। देखेंअसत्य को बहुत मौका दिया है। अब सत्य को मौका देकर देख लें कि क्या सत्य कर सकता है। मुझे नहीं लगता है कि सत्य बिगाड़ेगा और अगर सत्य भी बिगाड़ता हो दुनिया मेंतब फिर मानना चाहिएसुधरने का कोई उपाय नहीं है। फिर बिगड़ना होना ही हमारा अस्तित्व है।
एक अंतिम बात और फिर मैं अपनी बात पूरी करूं। एक मित्र ने पूछा है कि चरित्र और नैतिकता नई पीढ़ी मेंइस संबंध में कुछ कहें।
जो मैंने अभी कहावह आप खयाल में लिए होंगे। चरित्र पुरानी दुनिया में था ही नहींनैतिकता थीचरित्र नहीं था। नैतिकता का मतलबसमाज ने जो नियम तय किए थेआदमी उनमें बंध कर जीने की कोशिश कर रहा था। चरित्र का मतलब बहुत दूसरा होता है। चरित्र का और कलेक्टर का मतलब होता है समाज नहींनिर्णायक मैं हूं। और जो आदमी अपना निर्णायक नहीं होकभी करेक्टर का आदमी नहीं हो सकता। समाज तय करता था कि ऐसा करोयह है नीतिइसके अनुसार चलो,अन्यथा नरक है। नहीं तो स्वर्ग का प्रलोभन था। नरक का डर था कि ऐसा करो।
तो नीति समाज थोपता है और चरित्र व्यक्तिगत उपलब्धि है।
और चरित्र से बड़ी कोई नैतिकता नहीं। लेकिन हमने व्यक्ति को कभी स्वीकार नहीं किया। हम व्यक्ति को इनकार करते हैं। हम सिद्धांत को स्वीकार करते हैं। हम कहते हैं सिद्धांत सदा ठीकऔर गड़बड़ होती होतो व्यक्ति गलतसिद्धांत ठीक। मैं आपसे कहता हूं चरित्रवान समाजचरित्रवान युग कहेगाव्यक्ति सदा ठीक और अगर सिद्धांत से गड़बड़ी पैदा होती है तो सिद्धांत में कोई भूल है।
एक छोटी सी कहानी आपको कहूं। सुना है मैंने गर्मी का दिन है और कोई राजा अपनी कोठी में बैठा हैआराम से। नीचे आवाज सुनाई पड़ती है। कोई पंखे बेचता है और चिल्ला रहा है कि अनूठे पंखे हैंसौ रुपये दाम में। राजा ने कहापंखा और सौ रुपये दाम। उसने खिड़की से झांक कर देखातो बहुत हैरान हुआ। पंखे बिलकुल साधारण थेजैसे दो पैसे में मिलते हैं। पंखे वाले को बुलायाकि या तो पागल है या हद्द चालबाज है। पंखे वाला ऊपर आया है और उससे पूछो कि ये पंखे और सौ रुपये?क्या खूबीउसने कहा कि सौ साल की गारंटी हैसौ साल तक पंखा बिगड़ेगा नहीं।
राजा ने कहासौ साल इस पंखे की गारंटी है! यह सात दिन जाए तो बहुत है। उसने कहामहाराजप्रयोग करिए और देखिए। मैं भागा नहीं जा रहा हूं। रोज इसी रास्ते से गुजरता हूं। यह रहा पंखाआप रखिए। सौ रुपये दे दिए गए। पंखा तो दूसरे ही दिन टूट गया। राजा ने सोचाअब वह लौटेगा नहीं। लेकिन दूसरे दिन ठीक खिड़की के नीचे आवाज लगाई। कहा कि पंखे खरीदने हैं?
राजा ने उसे ऊपर बुलाया और कहाकि अनूठा पंखा टूट गया। उसने एक दफा पंखे को देखा और फिर राजा को गौर से देखा और राजा से कहा कि मालूम होता हैआपको पंखा झलना नहीं आता। राजा ने कहापंखा झलना नहीं आताक्या मजाक कर रहे होउसने कहाकैसे झला थाजरा बताइए भीराजा ने पंखा झल कर बताया। उसने कहाबिलकुल गलतबिलकुल गलत। यह कोई ढंग हैपंखा टूटेगा नहीं तो क्या होगायह तो आप बच गएयही बहुत हैनहीं तो आप भी टूट जाते। गलत है यह ढंग। राजा ने कहाठीक ढंग सुनेंपंखाउसने कहाहाथ में ठीक से पकड़िएसम्हाल कर और सिर को हिलाइए। पंखा--सौ साल के लिए गारंटी है।
सिद्धांत तुम्हारे पक्के हैं। हम कहते हैंसिद्धांत कभी गलत नहीं हैंगलत है तो आदमी है। अगर ठीक होना है तो आदमी ठीक हो। सिद्धांत गारंटी हैसनातन है। सौ साल नहींसनातन है। हमारे सब सिद्धांत बुनियादी रूप से गलत हैं। जिसको हम नैतिकता कहते हैंवह बुनियादी रूप से गलत है और पाखंड के अतिरिक्त कुछ भी पैदा नहीं करतीकरेगी। क्योंकि वह तथ्यों पर आधारित नहीं है। उस तथ्यों पर खड़ा करना पड़ेगा और जब तथ्यों पर खड़ी होती है तो हमारे प्राण निकलते हैं,क्योंकि हम तकलीफ मालूम होती हैक्योंकि हमारा सारा का सारा ढांचा गिरता है।
जैसेउदाहरण के लिए एक-दो बात मैं आपसे कहूं। अधिकतम नीतिनब्बे प्रतिशत नीति सेक्स-सेंटर्ड है। एक तो पहली गलती यही है। बुनियादी रूप से गलती हैक्योंकि जो नीति नब्बे प्रतिशत यौन-केंद्रित होवह उस कौम ने बनाई होगीजो यौन से आकर्षित है और विक्षिप्त है। अगर हम किसी आदमी को कहें कि वह चरित्रवान हैतो जो पहला खयाल आता हैवह खयाल आता है कि किसी स्त्री से वह बंधा हुआ न हो। यह खयाल नहीं कि वह आदमी वचन का पक्का नहीं है। यह खयाल नहीं आता कि वह आदमी टैक्स ठीक से नहीं चुकाता। यह खयाल नहीं आता है कि वह आदमी जेब काटता है। खयाल आता है चरित्रहीन,किसी स्त्री से बंधा हुआ है।
जिस मुल्क की दरिद्रता और जिस मुल्क की नैतिकताकेवल स्त्री-पुरुषों के यौन संबंधों पर केंद्रित हैवह सेक्स आब्सेस्ड हैवह कौम यौन विक्षिप्त है। उसकी सारी नीति वहीं खड़ी हैबस उतनी बात और सब तुल जाता है। सारा मामला इतना है,उससे ज्यादा कोई मामला नहीं है। इसलिए हम दूसरी दिशाओं में चरित्रहीन होने में सुविधा पा जाते हैंबस एक मामले में पक्के रहोपक्का पत्नीव्रती रहेकोई पति। पक्की पत्नीपतिव्रता रहेबाकी सब चलेगा। इतना काफी है। बाकी जिंदगी जैसे इतने पर पूरी हो गई।
और सच्चाई यह है कि यौन संबंध दो व्यक्तियों के बीच निजी संबंध है। सामाजिक नैतिकता का उससे कोई संबंध नहीं है। असल में समाज की यह ज्यादती है कि दो व्यक्तियों के निजी संबंधों में दखल-अंदाजी करेबीच-बीच में बार-बार झांक कर देखे। हम सब जगह की-होल से झांक रहे हैं! हमारा पूरा समाज हरेक के बाथरूम में छेद करके देखना चाहता है कि भीतर क्या हो रहा है! हम सब एक-दूसरे के भीतर पता लगा लेना चाहते हैं कि कहां क्या हो रहा हैकौन-कौन चरित्रहीन है।
यह चरित्रहीनता हैयह पता लगाना कि चरित्र नहीं है यह चरित्र की बात नहीं है। लेकिन तथ्य आधारित न होने से कठिनाई हो गई है। तथ्य आधारित नहीं है बिलकुल।
भौतिकवाद की निपट हमने निंदा की है और हमारी नीति हमने ऐसी बनाई है कि उसमें भौतिकता के विकास के लिए गुंजाइश नहीं है। और जिंदगी भौतिकता है। जिंदगी तो नब्बे प्रतिशतनिन्यानबे प्रतिशत भौतिकता हैजिंदगी तो धन हैमकान हैरोटी हैकपड़ा है। और हमारी नीति इनकी बात नहीं करती! क्योंकि यह तो मैटीरियलिस्टिक कंसीडरेशन है! मोक्षआत्मा,ब्रह्मइनकी हम कंसीडरेशन करते हैंजो कहीं नहीं हैं! जहां हमें जीना है चौबीस घंटेउसका कोई कंसीडरेशन नहीं है। जहां हमें होना हैकभी पता नहींहो पाए या न। तो उसका पूरा कंसीडरेशन है। तो ऐसा मामला हो गया है कि सोचते हैं आकाश की,चलते हैं पृथ्वी पर। रोज टकरा जाते हैं। मुश्किल खड़ी हो जाती है। और इसलिए हम सारी दुनिया को गाली देते रहते हैं कि सब भौतिकवादी हैं और हम जैसा भौतिकवादी खोजना बहुत मुश्किल है। बहुत मुश्किल हैहमारी जैसी पकड़ भौतिकता की और किसी की नहीं है। लेकिन हमें सुविधा हैक्योंकि हम मंदिर में घंटा हिला आते हैंहम आध्यात्मिक हैंगीता पढ़ लेते हैंजनेऊ बांधे हुए हैं।
जब जनेऊ भी भौतिक हैघंटा भी भौतिक हैऔर गीता भी भौतिक हैऔर मंदिर भी भौतिक है। इसमें कुछ अध्यात्म नहीं है। जिस कौम ने अध्यात्म पर नीति को खड़ा करने की कोशिश की उसने सारे जीवन को अनैतिक बना दियाक्योंकि जीवन के तथ्य हम न खोज पाए। वह तथ्य हमें पता ही नहीं हैं। हम खोजने से भी डरने लगे। धन की भी जरूरत है। अगर हम धन की जरूरत सीधी-सीधी स्वीकार कर लेते तो मुल्क कम चोर होता। जिन मुल्कों ने धन की जरूरत सीधी-सीधी स्वीकार की हैवहां आदमी कम चोर हैं। हमने कहाधनसब माया है। और वह महात्मा कह रहा है।
अभी मैं एक महात्मा के पास गया। वह समझा रहा है लोगों को कि धन इत्यादि सब माया है। स्वर्ण से बचोकामिनी से बचो और लोग पैसे चढ़ा रहे हैं! वह बीच में भाषण बंद करकेपैसे सब नीचे सरका लेता है! फिर वह कहता हैसब माया है! कामिनी-कांचन इनसे बचो! फिर कोई उसको रुपया चढ़ाता हैवह जल्दी से उसको नीचे सरका देता हैफिर बैठ जाता है! सारे महात्मा यही कर रहे हैंकरेंगे। मैं नहीं कहता कि पैसा सरकाना गलत है। बिलकुल ठीक सरका रहे हैंलेकिन वे जो कह रहे हैं,वह गलत है। वह मत कहिए। पैसा मजे से सरकाइएकौन नहीं कहता हैपैसा जरूरत है। मैं नहीं कहता कि साधु भी बिना पैसे के जी सकता है।
जब मैं बंबई थास्वामी नारायण संप्रदाय के दो साधु मुझसे मिलने आएध्यान के संबंध में समझने आए। तो मैंने कहा,संन्यासी कैसे हो गएजब ध्यान को समझा ही नहींउन्होंने कहासंन्यासी तो हो गए। मैंने कहासंन्यासी हो कैसे सकते हो,बिना ध्यान में गएउन्होंने कहानहींअब जानना चाहते हैं। मैंने कहापहले कपड़े उतार कर आओ। झूठे हैं कपड़े। कल सुबह ध्यान में हम बैठेंगेउसमें आ जाओ।
उन्होंने कहाबड?ी मुश्किल होगी। क्या मुश्किल होगीउन्होंने कहाएक तीसरा आदमी बाहर बिठा रखा है। उसको अंदर लाए और कहा कि हम एक दिक्कत है कि पैसा हम अपने पास नहीं रख सकते हैं। यह जो तीसरा आदमी हैपैसा रखता है। यह टैक्सी में हमारे साथ आएपैसा चुकाएतब हम आ सकते हैं। अगर इसको समय हो कलतो ही हम आ सकते हैंनहीं तो आना बहुत मुश्किल हैं। मैंने कहाघबड़ाओ मत। दो के आने से काम चल जाएगा,जहां तीन आ रहे हैं। और पैसा तुम अपने खीसे में क्यों नहीं रखतेउन्होंने कहाहम तो रख ही नहीं सकते। मैंने कहाऔर दूसरे के खीसे के पैसे का उपयोग कर सकते होतो तुम स्वर्ग जाओगे और यह बिचारा नरक जाएगाक्योंकि तुमको ध्यान सिखलाने टैक्सी में बिठा कर इसने पहुंचाया। यह खीसे में पैसा रखे हुए तो तुम्हारे पैसे रखे हुए है?
बेईमान हो गया है मुल्कक्योंकि हमने जीवन के तथ्य को स्वीकार नहीं किया। धन की जरूरत है। धन समाज का खून है। अगर इनकार करेंगे तो बच न पाएंगे। इनकार करेंगे तो हम पाखंडी हो जाएंगेतब हमको पीछे से दरवाजे खोलने पड़ेंगे। उनको स्वीकार करने की जरूरत है। हम इतने बेईमान न होतेअगर हम धन को स्वीकार कर लेते। और इतने गरीब भी न होते अगर हम धन को स्वीकार कर लेतेलेकिन हमने स्वीकार नहीं किया। अगर हम स्त्री को स्वीकार कर लेते तो इतना व्यभिचार न होता। वह हमने स्वीकार न किया। अगर हम मनुष्य के मन को समझ लेते और स्वीकार कर लेते तो इतनी परेशानी न होती। हम आदमी परबिलकुल ही अनैसर्गिक चीजें थोपते हैं। अब एक आदमी ने एक स्त्री से शादी कर ली और वह स्त्री चाहती है कि वह आदमी किसी सुंदर स्त्री को कभी गौर से न देखे। अस्वाभाविक हैअसल में सौंदर्य गौर से देखने को ही बना है।

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