बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-05

अतीत के मरघट से मुक्ति
मेरे प्रिय आत्मन्!
आज ही एक पत्र में मुझे स्वामी आनंद का एक वक्तव्य पढ़ने को मिला। और बहुत आश्चर्य भी हुआबहुत हैरानी भी हुई। स्वामी आनंद से किसी ने पूछा कि मैं जो कुछ गांधीजी के संबंध में कह रहा हूं उसके संबंध में आपके क्या खयाल हैंस्वामी आनंद ने तत्काल कहाउस संबंध में मैं कुछ भी नहीं कहना चाहता हूं। शिष्टाचार वश शायद उनके मुंह से ऐसा निकल गया होगाक्योंकि यह कहने के बाद वे रुके नहीं और जो कहना था वह कहा। ऊपर से ही कह दिया होगा कि कुछ नहीं कहना चाहता हूंलेकिन भीतर आग उबल रही होगी वह पीछे से निकल आईइससे रुकी नहीं। आश्चर्य लगा मुझे कि पहले कहते हैं कि कुछ भी नहीं कहना चाहता हूं और फिर जो कहते हैं! आदमी ऐसा ही झूठा और प्रवंचक है। शब्दों में कुछ हैभीतर कुछ है। कहता कुछ हैकहना कुछ और चाहता है। उन्होंने जो कहा वह और भी हैरानी का है।

स्वामी आनंद तो मुझसे भलीभांति परिचित हैं। लेकिनऐसी जानकारी भी उनकी होगीयह मुझे पता नहीं था। उन्होंने कहा कि नहीं कुछ कहना चाहता हूंऔर फिर कहा कि अगर एक कौआ मस्जिद पर बैठ कर अपने को मुल्ला समझने लगेतो इसमें कुछ कहने की बात नहीं। स्वामी आनंद से मैं परिचित हूं। लेकिन मुझे इसका परिचय नहीं था कि उनका कौओं से परिचय है। कौवे मस्जिद पर बैठ कर क्या सोचते हैं, स्वामी आनंद किसी जन्म में कौआ न रहे हों, तो उन्हें पता लगाना बहुत मुश्किल है, एकदम कठिन है। जरूर किसी जन्म में कौआ रहे होंगे, किसी मस्जिद के ऊपर बैठ कर मुल्ला होने की सोची होगी। अन्यथा कौवे क्या सोचते हैं, कैसे पता लगा सकते हैं? कौआ की बुद्धि मुल्ला होने से ऊपर जा भी नहीं सकती। कौओं को छोड़ कर शायद ही कोई और मुल्ला होना चाहता हो। जो मुल्ले हैं वे भी कौवों की बुद्धि से ज्यादा बुद्धिमान नहीं होते। और फिर मुल्ला होने का शायद स्वामी आनंद को पता नहीं कि मुल्ला होना कब संभव होता है। जब कोई किसी पंथ को मानता हो, संप्रदाय को मानता हो, वाद को मानता हो, किसी गुरु को मानता हो, तो मुल्ला हो सकता है। न तो मैं किसी पंथ को मानता, न किसी वाद को मानता रहा, न किसी गुरु को मानता, न किसी संप्रदाय को मानता। मेरा मुल्ला होना बिलकुल मुश्किल है। लेकिन स्वामी आनंद मुल्ला हैं और कहना चाहिए कठमुल्ला हैं।

गांधीवाद को एक धर्म बनाने की कोशिश की जा रही है। गांधीवाद को एक चर्च बनाने की कोशिश की जा रही है। गांधी स्वयं जिंदगी भर यह चिल्ला कर कहते रहे गए कि मेरी मूर्तियां मत बना देनामेरे मंदिर मत बना देनालेकिन वह साजिश जारी है,उनकी मूर्तियां बनाई जा रही हैंउनके मंदिर बनाए जा रहे हैं। अभी एक सज्जन ने गांधी-पुराण भी लिख डाला है। और उसमें उन्होंने इस भांति व्यवस्था की है कि जैसे और पुराण हैंविष्णु-पुराणवैसा गांधी को अवतार बताने की कोशिश की है। बहुत शीघ्र गांधी के पास एक धर्म खड़ा करने की कोशिश चल रही है। स्मरण रहेजब भी किसी व्यक्ति के पास धर्म खड़ा हो जाता हैतो व्यक्ति तो मर जाता हैमुल्लाओं और पंडितों की बन आती है। जीसस के पास ईसाई पादरी इकट्ठा है और जीसस की आवाज को दुनिया तक नहीं पहुंचने देता। महावीर के पास महावीर के गणधर इकट्ठे हैं और महावीर की आवाजसच्ची आवाज,सत्य की आवाज दुनिया तक नहीं पहुंचने देना चाहते। जैसे ही किसी व्यक्ति के आस-पास संगठन बनता हैसंप्रदाय बनता है,सत्य की हत्या हो जाती है।
मैंने सुना हैएक बार एक आदमी को सत्य मिल गया थातो शैतान के शिष्यों नेवे जो डिसाइपल्स ऑफ डेविल हैंउन्होंने भाग कर शैतान को अपने गुरु को खबर दी कि पता हैतुम आराम से सो रहे होएक आदमी को सत्य मिल गया है और हमारी सल्तनत डगमगाई जा रही है। कुछ करना चाहिए शीघ्रता से। क्योंकि अगर आदमियों को सत्य मिल जाएगा तो शैतान का क्या होगाशैतान ने कहा कि क्या करोगेअब सत्य मिल चुका। तुम पहले कहां थेक्यों मुझे आकर पहले नहीं कहाहम पहले ही सत्य मिलने में बाधा डालते। अब तो एक ही रास्ता है। अब तुम जाओ शीघ्रता से गांव-गांव में और डंडे और घंटी लेकर पीटोगांव-गांव में यह आवाज कि फलां आदमी को सत्य मिल गया है जिनको भी चाहिए हो चलो। शैतान के शिष्यों ने कहा,इससे क्या होगाशैतान ने कहापंडित और मुल्ले सुन लेंगे यह और जहां भी उन्हें पता चला कि किसी आदमी को सत्य मिल गया हैपंडित और मुल्ले वहां जाकर अड्डा जमा लेते हैं और एजेंट बन जाते हैं। जनता और सत्य के बीच में पंडित से बड़ी दीवाल और कोई भी खड़ी नहीं की जा सकती है। तुम जाओ और जल्दी गांव-गांव में खबर कर दो।
और मैंने सुना है कि शैतान के शिष्य गए और उन्होंने गांव-गांव में खबर कर दी। हजारों लोग वहां से चलने लगे। उस सत्य के खोजी के पासउसके आस-पास पंडितों की दीवाल खड़ी हो गई। व्याख्याकारों कीटीकाकारों की। वे कहने लगेक्या चाहते हो,हम बताते हैं। वह आदमी उस भीड़ में दब गया। मंदिर बन गया वहां एक उसकी लाश पर। हजारों लोग पूजा करते हैं उस आदमी की। उसकी किताबें हैं। लेकिन उस आदमी कोजो सत्य मिला थाउसकी कोई किरण किसी तक अभी तक नहीं पहुंच पाई है। दुनिया में सत्य की हत्या का एक ही उपाय हैसत्य की हत्या करना हो तो शीघ्रता से संप्रदाय बना दो। संप्रदाय बना कर सत्य की हत्या हो जाती है। मैं तो मुल्ला नहीं हो सकतामुश्किल हैक्योंकि मैं किसी संप्रदाय को नहीं मानता हूं। लेकिन स्वामी आनंद मुल्ला हो सकते हैं। गांधी का एक संप्रदाय बनाए हुए हैं। अन्यथा मेरी बातों से इतनी पीड़ा और परेशानी की जरूरत न थी। मेरी बातों का उत्तर देंमेरी बातों की चर्चा करें। मैं जो कहता हूं वह गलत हो सकता हैउसे गलत बताएं,समझाएं। लेकिन शांति से इसमें क्रोध की क्या जरूरत हैक्रोध वहां आता है जहां वेस्टेट इंट्रेस्ट होजहां न्यस्त कोई स्वार्थ हो,तब क्रोध आता हैअन्यथा क्रोध की क्या जरूरत हैअन्यथा यह चिल्लाने की क्या जरूरत है कि मेरी किताबों को आग लगा दो। यह कहने की क्या जरूरत है कि मुझे आने मत दोसभा मत होने दो।
ये सारी बातें सुन कर मुझे दादा धर्माधिकारी एक घटना सुनाते थेवह याद आई। वे मुझे कहते थेमैं पंजाब में था और पंजाब में सरदारों की एक सभा में बड़ा शोरगुल होता था। जहां दादा को बोलने बुलाया था। जो अध्यक्ष थे उन्होंने डंडा उठा कर पटका जोर से टेबल पर और कहाचुप होते हो कि नहींडंडे से सिर तोड़ दूंगाचुप हो जाओ। वह सभा एकदम चुप हो गई। फिर डंडा बजा कर उन्होंने कहा कि अब सुनो। अब दादा धर्माधिकारी अहिंसा पर भाषण देंगे। तो दादा मुझसे कहते थेमैंने अपनी खोपड़ी ठोंक ली और मैंने कहाक्या खाक भाषण देंगे अहिंसा पर! डंडा बता कर कहता है वह आदमी कि चुप हो जाओनहीं तो खोपड़ी तोड़ देंगे! और फिर अहिंसा पर भाषण होता है! बड़ा सही अहिंसावादी रहा होगा। गांधी की आलोचना करके अहिंसावादियों की असलियत का मुझे भी पहली दफा पता चलना शुरू हुआ है कि उनकी असलियत क्या है! हाथ में उनके भी डंडे हैं और अगर अहिंसा की बात नहीं मानेंगे आपतो वे डंडे से आपको अहिंसा की बात समझाएंगे।
लेकिनयह देश अब बहुत दिन इस तरह के धोखों में नहीं रखा जा सकता है। बहुत लंबी कथा है इसके धोखों की। बहुत लंबी यात्रा है इसके दुर्भाग्य की। विचार के लिए आज तक इस देश में परिपूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिली। इसलिए हम जगत में पिछड़ गए हैं और पीछे पड़ गए हैं। हिंदुस्तान ने कभी भी तीव्र विचार के लिए निमंत्रण नहीं दिया। कभी भी विचारपूर्ण विद्रोह के लिए साहस नहीं दिखाया। नये विचार से भय दिखायाघबड़ाहट दिखाई। हमेशा उसने यह मानना चाहा कि जो हमारी पुरानी किताब में लिखा होवही सही होना चाहिए। पुराने ने कुछ सही होने का ठेका ले लिया है! पुराना ही सत्य होना चाहिएजैसे कि सत्य को जानने के लिए आगे कोई पैदा ही नहीं होगा। वे सब लोग पीछे पैदा हो चुके जिन्होंने सत्य जाना। अब आगेआगे लोग व्यर्थ पैदा हो रहे हैंउन्हें कोई अनुभव नहीं होगाकोई सत्य नहीं होगा।
यह हमारी प्रवृत्ति कि सब कुछ पीछे हो चुका--सत्य भी हो चुकास्वर्णयुग भी हो चुकासब तीर्थंकरसब महावीरसब पैगंबर,सब पीछे हो चुके। अब आगे कुछ होने को नहीं है। इस विचार ने ही कि सब विचार किया जा चुकाअब आगे कुछ विचार करने को नहीं है--भारत ने विचार की हत्या कर दी।
नहींबहुत विचार करने को शेष हैंबहुत नई खोज होने को शेष हैंबहुत से सत्यों का उदघाटन होगाजो नहीं हुआ। बहुत से पर्दे उठेंगेबहुत से रहस्य उदघाटित होंगे। जीवन समाप्त नहीं हो गया हैजीवन की यात्रा जारी है। लेकिन अगर कोई कौम ऐसा समझ ले कि सब हो चुकाअब उस पर कोई विचार नहीं करनाआगे कुछ नया विचार हो नहीं सकतातो उस कौम की अगर प्रतिभा नष्ट हो जाए तो इसमें आश्चर्य है!
भारत के पास अदभुत प्रतिभा थी। आज भी प्रतिभा है सोई हुई। लेकिन उसका नया अवतरणनया विकासनया ऊर्ध्वगमन उस प्रतिभा का नहीं हो पाता हैक्योंकि हमारी धारणा यह है कि अब नया कुछ होने को नहीं है। जब नया कुछ होने को नहीं हैतो नया नहीं हो सकेगा। क्योंकि हम जो विचार करते हैंजो धारणा बनाते हैं वैसा ही हमारा जीवन हो जाता है। न तो महावीर पर रुक गए हैं हमन कृष्ण पर और न गांधी पर रुकने की कोई जरूरत है। जिंदगी रुकना जानती ही नहीं। लेकिन जहां-जहां गुरुडम खड़ी हो जाती है वहीं जीवन की धारा को बांध बना कर रोकने की कोशिश की जाती है कि बस यहींअब इससे आगे नहीं।
गांधी रुक जाएंगेजीवन तो नहीं रुकेगा। मैं रुक जाऊंगाजीवन तो नहीं रुकेगा। आप रुक जाएंगेजीवन तो नहीं रुकेगा। यह मोह बिलकुल पागल मोह है कि मैं रुकूंउसी के साथ जीवन भी रुक जाए। यह बिलकुल पागल मोह हैयह बिलकुल ही विक्षिप्त मोह है। मैं रुक जाऊंगाठीक हैलेकिन जीवन तो आगे जाएगाजीवन नये किनारे छुएगाजीवन नये मार्ग चुनेगा,जीवन नये अनुभव करेगा। मेरे अनुभवों के साथ जीवन सदा के लिए रुक जाएयह जरूरी हैयह उचित हैयह योग्य हैमैं कोई जीवन हूं पूराव्यक्ति पैदा होते हैं और विलीन हो जाते हैं। समाज सतत चलता रहता है। लेकिन जिन समाजों के मन में यह धारणा बैठ जाती है कि हम रुक जाएं अतीत परवे समाज भविष्य की तरफ गति करना बंद कर देते हैं। उनका जीवन स्टेगनेंटरुका हुआअवरुद्ध हो जाता है। जैसे गंगा रुक जाएरुका हुआ पानी गंदा हो जाता है। यह भारत का समाज इतना गंदा इसीलिए हो गया है। यह समाज रुका हुआ पानी है। रुके हुए समाज का फिर जीवन आगे तो नहीं बढ़ता। धूप पड़ती है,ताप पड़ता हैसड़ांद आती हैगंदगी बढ़ती हैभाप बन कर पानी उड़ता है और कीचड़ पैदा होती है और कुछ भी नहीं होता। कभी आपने किसी तालाब को सागर तक पहुंचते देखा हैसरिताएं पहुंचती हैं सागर तक। सरिताएं जो कि भागती हैं अज्ञात की तरफ--खोज करती हैं अनजान कीअननोन की। डबरा तालाब का अपने में बंद होकर बैठ जाता है कहीं नहीं जातागोल घेरे में घूमता रहता है। अपना वाद का घेरा हैउसी में घूमता रहता है। फिर वह सागर तक भी नहीं पहुंच पाता है। और जो जल सागर तक न पहुंच पाए वह जल कभी भी असीम अनुभव को उपलब्ध नहीं हो पाता।
जीवन भी अनंत तक पहुंचने को है। व्यक्ति आएंगेमहान से महान व्यक्ति आएंगे और विलीन हो जाएंगे और जीवन की धारा आगे बढ़ती रहेगी। कोई महापुरुष अधिकारी नहीं है कि जीवन की धारा को अपने पास रोक ले। लेकिन महापुरुष रोकना भी नहीं चाहते। महापुरुष तो चाहते हैं कि जीवन की धारा आगे बढ़े। लेकिन महापुरुषों के पास जो लघु मानव हैंछोटे-छोटे मानव इकट्ठे हो जाते हैंवे जीवन की धारा को रोकने की कोशिश करते हैं। क्योंकि उनकी कीमत तभी तक है जब तक जीवन उनके महापुरुष के पास रुका रहे। अगर जीवन आगे बढ़ गया और महापुरुष भूल गए तो इन दीन-जनों का क्या होगा जो आस-पास बैठ कर दुकान खोले हुए थेइनका क्या होगाइनकी दुकान तभी तक चलेगीजब जीवन इनके महापुरुष की लाश के पास रुका रहे।
भारत ने यह भूल बहुत कर ली है। आगे यह भूल नहीं की जानी है। भारत का सारा का सारा मस्तिष्क अतीतोन्मुख हैपीछे की तरफ देखता है। आगे की तरफ देखता ही नहीं। रूस के बच्चे चांद पर बस्तियां बसाने का विचार करते हैं और भारत के बच्चे?भारत के बच्चे रामलीला देखते हैं! कब तक हम रामलीला देखते रहेंगेकितनी बार रामलीला देखी जा चुकी हैराम बहुत प्यारे हैंलेकिन कितनी बारक्या हम यही करते रहेंगेक्या हमारी चेतना एक वर्तुल में घूमती रहेगीक्या हम आगे नहीं बढ़ेंगे?कोई नई लीलाएं नहीं होंगी जगत मेंकोई नये राम पैदा नहीं होंगेकोई नया कृष्ण नहीं होगाबसपीछे और पीछेभगवान ने बड़ी भूल की है भारत के साथउसकी बड़ी कृपा होती अगर वह भारतीयों की आंखें खोपड़ी में सामने की तरफ न लगा कर पीछे की तरफ लगाता। उससे हमको बड़ी सुविधा होती। उससे हम निरंतर पीछे की तरफ देखने में समर्थ हो जाते। लेकिन भगवान बड़ा नासमझ है। हम उसकी नासमझी को बर्दाश्त थोड़े ही करते हैंहम अपनी खोपड़ी पीछे की तरफ मोड़ करपीछे की तरफ देखते चले जाते हैंअगर कभी भारत ने अपनी कारें बनाईंअभी तो पश्चिम की नकल करनी पड़ती हैं हर बात मेंतो हम कारों का लाइट पीछे की तरफ लगाएंगेआगे कभी नहीं लगा सकते। क्योंकि आगे की कार तो पश्चिम की कार हैशुद्ध भारतीय कार में पीछे की तरफ लाइट होगा। चलना आगे है वह तो ठीक हैलेकिन देखना तो पीछे है। जहां उड़ती धूल रह जाती हैउसे देखना है। जहां से रथ गुजर गएउनकी उड़ती धूल देख रहे हैं। राम का रथ निकल चुकामहावीर का रथ निकल चुका,गांधी का रथ निकल चुका। कब तक उस धूल को देखते रहेंगेकब तक उस धूल को पूजते रहेंगेआगे नहीं बढ़ना है?
और ध्यान रहेजीवन जाता है सदा आगे की तरफ। जीवन कभी पीछे की तरफ नहीं लौटता हैनहीं लौट सकता है। कोई मार्ग नहीं है पीछेपीछे सिर्फ स्मृति हैकोई मार्ग नहीं। पीछे हम याद कर सकते हैंपीछे जा नहीं सकते। समय में एक क्षण भी तो पीछे नहीं लौटा जा सकता। एक क्षण को भी तो हम पीछे नहीं जा सकते। जो समय का क्षण बीत गयाउसमें अब हम कभी भी नहीं जा सकेंगेसदा को बीत गयाउसमें लौटने का कोई उपाय ही नहीं है। वह सेतु गिर गयावह मार्ग नष्ट हो गया। वहां हम कभी भी नहीं जा सकते। पास्ट मेंअतीत में जाने का कोई द्वार ही नहीं है और जब अतीत में हम जा नहीं सकतेतो हम एक काम कर सकते हैंअतीत की स्मृति कर सकते हैंयाद कर सकते हैं।
लेकिन ध्यान रहेजितनी हमारी ऊर्जा अतीत की स्मृति में और याद में नष्ट होती हैउतनी ही ऊर्जा भविष्य में जाने के लिए कम पड़ जाती है। जितनी हमारी दृष्टि अतीत से बंध जाती हैउतना ही हम आगे की तरफ देखने में असमर्थ हो जाते हैं। और यह भी ध्यान रहेचलना आगे है और देखना अगर पीछे रहातो गङ्ढों में गिरे बिना कोई रास्ता नहीं रहेगा। गङ्ढों में गिरना पड़ेगा। भारत सैकड़ों बार गङ्ढों में गिरता रहा है। हजार बार गङ्ढों में गिरा है। दुर्घटनाओं के सिवाय हमारी लंबी कथा में और क्या हैकितनी गुलामीकितनी दीनताकितनी दरिद्रता! लेकिन हमारी आदत पीछे देखने की कायमबरकरार है। पीछे देखते हैं। आगे चलते हैं। गिरेंगे नहीं तो और क्या होगा?
एक ज्योतिषी यूनान में एथेंस के पास एक गांव से गुजरता था। सांझ थी। चांद उगा होगा आकाश में आज जैसा। वह चांद को देखता थातारों को देखता थाएक गङ्ढे में गिर पड़ा। आकाश की तरफ देख रहा थाजमीन का गङ्ढा नहीं दिखाई पड़ा होगा। एक बूढ़ी औरत ने उसे गङ्ढे से निकाला। उसके दोनों पैर टूट गए थे। उसने उस बूढ़ी औरत को धन्यवाद दिया और कहा कि मांबहुत-बहुत धन्यवाद! मैं तेरी क्या सेवा कर सकता हूंइतना मैं कहता हूंशायद तुझे पता नहीं होगामैं यूनान का सबसे बड़ा ज्योतिषी हूं। अगर तुझे चांदत्तारों के संबंध में कुछ भी जानना हो तो मेरे पास आ जाना।
उस बूढ़ी औरत ने कहापागलमैं तेरे पास चांदत्तारों के संबंध में पूछने आऊंगीजिसे अभी जमीन के गङ्ढे नहीं दिखाई पड़ते,उसके चांदत्तारों के देखने का कोई भरोसा हैउसका कोई विश्वास किया जा सकता हैपहले बेटे जमीन के गङ्ढे देखने सीखो,फिर आकाश के चांदत्तारे देखना। ठीक ही कहा उस बूढ़ी औरत ने। अभी जमीन का गङ्ढा न दिखाई पड़ता हो तो चांदत्तारों के ज्ञान का भरोसा क्या है?
जिन्हें आगे हाथ भर नहीं दिखाई पड़ता वे हजारों मील पीछे की यात्रा की कथाएं दोहरा रहे हैं। इतिहास की धूलबीत गए रथों के चक्कों के चिह्नउन्हीं पर हम रुके हैं। दुर्भाग्य हैइसीलिए दुर्भाग्य हैइसलिए भविष्य में रोज टकरा जाते हैं। इसलिए भविष्य को हम निर्मित नहीं कर पाते। भविष्य का क्षण आ जाता है और हम बिलकुल अनजानबेहोश खड़े रह जाते हैं। जब क्षण आकर पकड़ लेता हैतब हम चौंक कर खड़े हो जाते हैं। हमारी समझ में नहीं आता क्या करेंहमारे खयाल में नहीं आता। जब तक हम सोच पाते हैं समय बीत जाता है। समय किसकी प्रतीक्षा करता हैसमय रुका नहीं रहताजो उसे पहले से तैयारी करते हैंवे उस समय का उपयोग कर पाते हैं। जो उसके सामने बैठे रहते हैंजब समय आ जाता है...हम उस तरह के लोग हैं,घर में आग लग जाती है तब हम कुआं खोदने बैठ जाते हैं। हम कहते हैंआग लग गई हैअब कुआं खोदना चाहिए। जब तक हम कुआं खोद पाते हैंतक तक घर कभी का जल कर राख हो जाता है। घर में आग लगती हो तो कुआं तैयार होना चाहिए,तब आग बुझाई जा सकती है। लेकिन हमें फुर्सत कहां कि हम भविष्य के कुएं निर्मित करेंहमें फुर्सत कहांहमें ध्यान कहां,हमारी कल्पना नहीं जाती वहां। पीछे और पीछे!
गांधी ने पुनः पीछे की दृष्टि हमें फिर से पकड़ा दी। गांधी कहने लगेराम-राज्य चाहिए। बड़ी अजीब बात है। राम बहुत प्यारे हैं,लेकिन राम-राज्यराम-राज्य बिलकुल बात दूसरी है। गांधी को राम से बहुत प्रेम थाउचित ही है। राम जैसे व्यक्ति से प्रेम किया जा सकता है। प्रेम भारी रहा होगा। उनके प्राण मेंरग-रग में राम भर गए थे। गोली लगी गोडसे कीतो न तो मां की याद आईन पिता की याद आईन गांधीवादियों की याद आई। याद आई राम की। राम! प्राणों के प्राण में वह आवाज घुस गई होगीवह प्रेम घुस गया होगा। गोली प्राणों में पहुंची तो वहां राम के सिवाय कुछ भी नहीं पाया उस समय। राम से उनका बहुत प्रेम था और उसी प्रेम के वश वे राम-राज्य की बातें करने लगे। लेकिनराम से प्रेम ठीक हैराम-राज्य से प्रेम खतरनाक बात है।
राम-राज्य पूंजीवाद से भी पिछड़ी हुई व्यवस्था हैफ्यूडेलिज्म हैसामंतवाद है। राम-राज्य भविष्य की समाज-योजना नहीं है। अतीतपिछड़े हुएबीते हुएजा चुके जीवन की व्यवस्था है। राम-राज्य नहीं लाना है हमेंलाना है भविष्य का राज्य। राम-राज्य तो बीत गया। एक तो हम लाना भी चाहें तो नहीं ला सकते। और अगर हम ला भी सकते हों तो हमें कभी लाने का विचार भी नहीं करना चाहिए। क्योंकि राम-राज्य तो पिछड़ा हुआआज से भी बदतर समाज और जीवन-व्यवस्था है। करोड़ों-करोड़ों गुलाम हैं। स्त्रियों की इज्जत कितनी रही होगीवह सीता की इज्जत से पता चल जाता है। एक साधारण से आदमी की आवाज से सीता को उठा कर फेंका जा सकता है जंगलों में। साधारण स्त्री की क्या हैसियत रही होगीस्त्री की यह हैसियत है!
रात बहुत प्यारे हैं। और यह ध्यान रहेकि यह भूल हम हमेशा करते हैं। हम क्या भूल करते हैंवह भूल हमें समझ लेनी चाहिए ताकि आगे हम न कर सकें। दो हजार साल बाद न तो मुझे कोई याद रखेगान आपको कोई याद रखेगालेकिन गांधी याद रह जाएंगे। दो हजार साल बाद लोग सोचेंगेकितना महान व्यक्ति था गांधीइतने ही महान लोग गांधी के समाज के लोग भी रहे होंगे। हम तो भूल जाएंगे। हमारी तो कोई रूपरेखा नहीं छूट जाएगी। हमारे तो कोई पदचिह्न कहीं भी दिखाई नहीं पड़ेंगे। हमारी तो कोई आकृति कहीं नहीं रह जाएगी। कैसे जीते थे हमकिन वासनाओं से भरे हुएकिन क्रोध सेकिन घृणाओं से,किन हत्याओं से भरा हमारा जीवन थावह सब विलीन हो जाएगाहवा में धुआं हो जाएगा। गांधी की प्रतिमा रह जाएगी। दो हजार साल बाद लोग सोचेंगेगांधी का समाज कितना अच्छा रहा होगा। गलती बात सोच लेंगे वे।
गांधी हमारे प्रतिनिधि नहीं थेअपवाद थेएक्सेप्शन थे। हम गांधी जैसे नहीं हैं। हमारा गांधी से कुछ लेना-देना नहीं है। हम गांधी से बिलकुल उलटे हैं। लेकिन दो हजार साल बाद जिससे हम बिलकुल उलटे हैं उसी आदमी से हम जाने जाएंगे। हमारे युग को गांधी-युग कहा जाएगा। हमें कहा जाएगागांधी-युग के लोग कैसे अदभुत रहे होंगे। और गांधी के आधार पर तर्क हमारे बाबत अनुमान करेगावह अनुमान जितना झूठा होगा उतना ही राम-राज्य के बाबत हमारा अनुमान झूठा है। राम बहुत प्यारे हैं,राम का समाज नहीं। बुद्ध बहुत प्यारे हैंबुद्ध का समाज नहीं। क्राइस्ट बहुत प्यारे रहे होंगेक्राइस्ट का समाज नहीं। एक-एक व्यक्तियों के आधार पर पूरे समाज का निर्णय लेने की भूल बहुत हो चुकीआगे यह भूल नहीं होनी चाहिए। और फिर ध्यान रहेहमें यह भी समझ लेना जरूरी हैगांधी इतने बड़े महापुरुष दिखाई पड़ते हैं इसीलिए कि गांधी अकेले हैं। अगर दस-पच्चीस हजार गांधी भारत में होंतो मोहनदास करमचंद्र गांधी कौन हैं--पहचानना आसान होगाराम दिखाई पड़ते हैं हजारों साल के बाद इसीलिए कि राम अकेले रहे होंगे। अगर हजार दो हजार राम जैसे सच्चे और अच्छे आदमी होते तो राम की याद रह जाती?
एक स्कूल में शिक्षक काले बोर्ड परब्लैक-बोर्ड पर सफेद खड़िया से लिखता हैसफेद दीवाल पर क्यों नहीं लिखता हैसफेद दीवाल पर लिखेगा तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता। काले तख्ते पर लिखता है तो खड़िया सफेद उभर कर दिखाई पड़ती है। महापुरुष समाज के ब्लैक-बोर्ड पर उभर कर दिखाई पड़ते हैंअन्यथा दिखाई नहीं पड़ सकते। जिस दिन समाज महान होगा उस दिन महापुरुषों को खोजना बहुत मुश्किल हो जाएगा। समाज क्षुद्र हैनीचा हैइसीलिए महापुरुष दिखाई पड़ते हैं। महापुरुष इतना बड़ा जो दिखाई पड़ता हैवह हमारी क्षुद्रता के अनुपात में दिखाई पड़ता है। जिस दिन महान मनुष्यता पैदा होगीउस दिन महापुरुषों का युग समाप्त समझ लेना चाहिए। मनुष्यता क्षुद्र हैदीन-हीन है इसलिए महापुरुष दिखाई पड़ते हैं। महापुरुष तो हमेशा पैदा होते रहेंगेलेकिन महान मनुष्य के बीच उनका कोई पता लगाना आसान नहीं रह जाएगा।
तो मैं कहता हूं कि राम दिखाई पड़ते हैंक्योंकि समाज राम से विपरीत रहा होगा। बुद्ध दिखाई पड़ते हैंक्योंकि बुद्ध से विपरीत समाज रहा होगा। बुद्ध की सफेद उज्ज्वल रेखा किसी काले समाज के ब्लैक-बोर्ड के सिवाय दिखाई नहीं पड़ सकती थी। फिर यह भी ध्यान रख लेना जरूरी है कि अगर हम बुद्ध कीमहावीर कीराम कीकृष्ण कीलाओत्से कीकनफ्यूशियस की,जरथुस्त्र की शिक्षाओं को देखेंतो उन शिक्षाओं से बहुत-कुछ नतीजे लिए जा सकते हैं।
एक बड़े मजे की बात हैवह हम कभी ध्यान ही नहीं देते। महावीर सुबह से सांझ तक लोगों को समझाते हैं: हिंसा मत करो,हिंसा मत करो। अहिंसा! अहिंसा! इसका क्या मतलब हैइसका मतलब है कि लोग अहिंसक थेलोग अहिंसक थे तो महावीर पागल थे जो उनको समझा रहे थे कि हिंसा मत करो। बुद्ध सुबह से सांझ तक समझा रहे हैं: चोरी मत करोझूठ मत बोलो,बेईमानी मत करोपरस्त्री का गमन मत करो। किसको समझा रहे हैंलोग अगर अच्छे थेसमाज अगर शुभ थातो ये शिक्षाएं किसके लिए हैंये शिक्षाएं बताती हैं कि आदमी कैसे रहे होंगे। जिनको ये शिक्षाएं दी जा रही थीं वे आदमी कैसे रहे होंगेवे ही शिक्षाएं हमें आज देनी भी पड़ रही हैं। जो शिक्षाएं तीन हजार वर्ष पहले लागू थींवे ही आज भी लागू हैं। इससे सिद्ध होता है कि समाज जैसा आज हैतीन हजार वर्ष पहले भी ऐसा ही था। समाज ऊंचा नहीं था। समाज में बुनियादी कोई फर्क नहीं पड़ गया। और ये लेकिन हमारे खयाल में नहीं आ पाता कि शिक्षाएं किन्हें देनी पड़ती हैंकिसको देना पड़ती हैं?
एक चर्च में एक फकीर बोलने गया था। चर्च के लोगों ने कहा था सत्य के संबंध में हमें कुछ समझाओ। उस फकीर ने कहा,सत्य के संबंध मेंलेकिन यह तो चर्च हैयहां सत्य के संबंध में समझाने की जरूरत क्यायहां तो सत्यवादी लोग ही आए होंगेक्योंकि मंदिरों मेंचर्चों में सत्यवादी ही आते हैं। लेकिन लोग नहीं मानेउन्होंने कहा कि नहीं-नहींआप तो सत्य के संबंध में हमें समझाइए। वह फकीर खड़ा हुआ। उसने मंच पर खड़े होकर पूछा कि इसके पहले कि मैं कुछ कहूंमैं थोड़ी जांच-परख कर लेना चाहता हूं। मैं तुमसे यह पूछता हूं कि मित्रोतुम बाइबिल तो सब पढ़ते होउन सबने हाथ हिलाया कि हम बाइबिल पढ़ते हैं। उस फकीर ने पूछा कि तब मैं तुमसे यह पूछता हूंतुमने बाइबिल में ल्यूक का उनहत्तरवां अध्याय पढ़ा हैउन सबने हाथ हिलाएसिर्फ एक आदमी को छोड़ कर जो सामने बैठा था। उन्होंने कहाहांहमने पढ़ा है। वह फकीर हंसने लगाउसने कहा कि अब मैं सत्य के संबंध में बोलूंगाक्योंकि मैं तुम्हें बता दूंल्यूक का उनहत्तरवां अध्याय जैसा कोई अध्याय बाइबिल में है ही नहीं। और तुम सब कहते होहमने पढ़ा है। तब ठीक है। फिर सत्य के संबंध में बोलने में कुछ सार है। लेकिन उस फकीर ने कहायह जो आदमी सामने बैठा हैयह बड़ा अदभुत आदमी मालूम पड़ता है। आश्चर्य! मेरे दोस्त तुम चर्च में आ कैसे गए?क्योंकि चर्च में धार्मिक आदमी शायद ही जाते हों। तुम मंदिर आ कैसे गएमंदिर का धार्मिक लोगों से संबंध ही नहीं रहा है कभीतुम आए कैसेतुम चुप कैसे बैठे होतुमने हाथ क्यों नहीं उठायाउस आदमी ने कहामहाशयजरा जोर से बोलिए,मुझे कम सुनाई पड़ता है। क्या आप कहते हैं उनहत्तरवां अध्याय ल्यूक कारोज पढ़ता हूंपढ़ता नहींरोज पाठ करता हूं। मैं समझा नहींइसलिए मैं चुपचाप रहा कि कोई झंझट में न पड़ जाऊं।
समाज की शिक्षाएं समाज की खबर लाती हैं कि कैसे लोग होंगे। शिक्षाएं उन्हें देनी पड़ती हैं जो शिक्षाओं के प्रतिकूल होते हैं। जिस दिन दुनिया पर धर्म आ जाएगा उस दिन धर्म की शिक्षाओं को देने की आवश्यकता कम हो जाएगी। जिस गांव में मरीज कम हों वहां डाक्टर बसने की कोशिश नहीं करेंगे। जिस गांव में स्वास्थ्य हो उस गांव में चिकित्सक की क्या जरूरत होगीहम बहुत गौरवांवित होते हैं यह बात कह कर कि दुनिया के तीर्थंकरबुद्ध और अवतार हमारे यहां ही पैदा होते हैं। थोड़ा समझ-सोच कर इसमें गौरव अनुभव करना। यह इस बात का सबूत है कि हमारा समाज एक अधार्मिक समाज हैजहां धार्मिक शिक्षक को बार-बार पैदा होने की जरूरत पड़ती है। यह सबूत गौरव का नहीं है। किसी घर में रोज-रोज डाक्टर आता हो तो मोहल्ले में यह नहीं कह सकता कि हमारे घर में बड़े स्वस्थ लोग हैंहमारे यहां डाक्टर रोज आता है। धर्मगुरुओं की इतनी लंबी कतारें इस बात की खबर हैं कि यह समाज अधार्मिक समाज है और अगर हम पीछे लौटने की बात करते हैं तो हम मुल्क को आत्महत्या सिखा रहे हैंस्युसाइड सिखा रहे हैं। मुल्क मर जाएगा पीछे लौटने की बातों में। क्योंकि पीछे तो लौट नहीं सकतालौटने की कोशिश में और नासमझी के प्रयास में वह आगे नहीं जा सकेगा जहां जा सकता था।
नहींराम-राज्य नहींचाहिए भविष्य का समाज। लौटा हुआबीता हुआगया हुआ सामंतवादी समाज नहींचाहिए शोषण से मुक्त वर्ग-विहीन आगे का समाजभविष्य का समाज। लौटना नहीं है पीछेजाना है आगे। लेकिनहमारी सारी प्रवृत्तिहमारा सारा चिंतनहमारी सारी बुद्धिहमारे व्यक्तित्व का सारा निर्माणहमारी सारी कंडीशनिंगहमारे सारे संस्कार पीछे ले जाने वाले हैंआगे ले जाने वाले नहीं हैं। इसीलिए भारत में कोई क्रांति नहीं हो पाती है। क्रांति का मतलब होता है आगे जाना। जो आगे जाना ही नहीं चाहते वे क्रांति कैसे करेंगेइसलिए भारत के पांच हजार वर्षों में क्रांति का कोई भी उल्लेख नहीं है। इतने संतइतने महात्माइतने विचारक! लेकिन विद्रोहविद्रोह बिलकुल भी नहींविद्रोह जरा भी नहींरिबेलियन जैसी चीज ही नहीं। विद्रोह तो वे करते हैंजो आगे जाना चाहते हैं। जो आगे जाना चाहते हैं, उन्हें अतीत को इनकार करना पड़ता है। जो आगे जाना चाहते हैंउन्हें पिछली जड़ों को काटना पड़ता है। जो आगे जाना चाहते हैंउन्हें पीछे का मोह छोड़ना पड़ता हैतब वे आगे जा पाते हैं। लेकिन हमअगर हमारा वश चले तो हम अपनी मां के गर्भ में ही रह जाएंवहां से भी बाहर न निकलें। अगर कोई बच्चा सच्चा भारतीय हो तो उसे इनकार कर देना चाहिए कि मैं मां के गर्भ के बाहर नहीं आता। मां के गर्भ में बड़ी शांति से जी रहा हूंसंतोष से। इतना सुख कहां मिलेगामिलता भी नहीं। कितने ही अच्छे मकान बनाओकितनी ही अच्छी कोच बनाओकितने ही अच्छे गद्दे और तकिए लगाओमां के पेट में जो कम्फर्टजो सुखजो सुविधाजो शांति है वह कहां मिलेगा?
मनोवैज्ञानिक तो कहते हैं कि मां के पेट में बच्चा जो सुख जान लेता हैउसी सुख के कारण वह उसी तरह की चीजें बनाता चला जाता है। ये इतने मकानअच्छे गद्देतकिएकारेंइन सबके भीतर खोज यह चल रही है कि मां के गर्भ में जैसी शांति और सुख मिलता थावैसा मिल जाए। लेकिन बच्चे को मां के पेट के बाहर आना पड़ता है। बड़ी रेवोल्यूशन हो जाती हैबड़ी क्रांति हो जाती हैसारा जीवन अस्तव्यस्त हो जाता होगाक्योंकि न वहां खाने की फिक्र थीन नौकरी कीन इंप्लाइमेंट की,न कोई और झंझट थी। वहां सारा जीवन चुपचाप चलता था और चौबीस घंटे तंद्रा मेंनिद्रा में सोने का आनंद था। वह कोई दुख न थासब सुख था। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि मोक्ष का खयाल गर्भ के अनुभव से ही पैदा हुआ है। वहां सब कुछ थाकुछ कमी न थी। वही मन में कहीं स्मृति में मनुष्य की गहरे में गूंजता रहता है कि कोई एक ऐसी जगह होनी चाहिए जहां सब सुख होगाकोई दुख नहीं होगा। कोई एक ऐसा स्थान होना चाहिए जहां सब शांति होगीकोई अशांति नहीं होगी। कोई एक ऐसा स्थान होना चाहिए जहां कुछ भी नहीं करना पड़ेगा और सब हो जाएगा। वही कहीं बीज में छिपी हुई स्मृति मां के गर्भ की है। लेकिन बच्चा अगर कह दे कि नहीं जाता हूं यात्रा पर जीवन कीतो क्या होगा उसका अर्थमां को उसे छोड़ना पड़ता हैमां से अलग खड़ा होना पड़ता है। थोड़े दिन मां से चिपटा रहता हैफिर अपने पैर से चलने लगता हैफिर धीरे-धीरे मां और उसके बीच फासला पैदा होता चला जाता है। फिर कल एक और स्त्री उसके जीवन में आएगी और शायद मां को वह भूल जाएगा। वह अपनी यात्रा पर जा चुका जहां वह मां से पूरी तरह स्वतंत्र हो गया है। जीवन की यात्रा आगे की तरफ हैआगे की तरफ हैरोज आगे की तरफ है। पिछला छोड़ देना पड़ता हैचाहे कितना ही सुविधापूर्ण रहा हो। आगे की असुविधाएं झेलनी पड़ती हैं ताकि हम और नई सुविधाओं के जीवन को उपलब्ध हो सकें। पिछला कितना ही अच्छा घर रहा होउसे छोड़ देना पड़ता है ताकि अनजान और नये घर हम बना सकें।
जीवन की खोज निरंतर अतीत से मुक्त होने की खोज है। और भारत के लिए चिंता करने जैसी बात है। भारत अतीत से चिपटा हुआ है। उसका मन वहीं रुका रह गया है। उसने जोर से पकड़ लिया अतीत को। वह मां के गर्भ को पकड़े है और कहता है कि नहींहम यहां से आगे नहीं जाएंगे। इस वजह से हम सिकुड़ गए हैंइस वजह से हमारी ऊर्जा क्षीण हुई हैइस वजह से हमारी प्रतिभा नष्ट हुई हैइस वजह से हम बौने हो गए हैंइस वजह से हम सिर उठा कर अज्ञात की यात्रा पर जाने में भयभीत हैं,डर लगता हैअनजानघबड़ाहट लगती है। अपने घर में रहो। यह प्रवृत्ति ने ही भारत को हिंदुस्तान के भीतर कैद कर दिया। भारत नहीं जा सका विस्तार पर। लेकिन अपने को समझाने की हम बहुत होशियारी की बातें खोजते हैं। हम कहते हैंहम आक्रमण नहीं करना चाहते हैंइसलिए हम अपने घर में बैठे रहते हैं। हम अहिंसक हैं इसलिए हम कहीं नहीं जाना चाहते। लेकिन अहिंसक से अहिंसक आदमी को जरा सा उकसा दो और उसके भीतर से खूंखार आदमी खड़ा हो जाता है। अहिंसक आदमी को जरा सा कुछ कह दो और उसके भीतर से क्रोध उबलने लगता है। कैसा अहिंसक आदमी है! कैसी है यह अहिंसा!
चीन का हमला हुआपाकिस्तान का हमला हुआ और अहिंसक आदमी को आप देख लेते कि अहिंसा कहां गई। उखड़ आई सारी की सारी। भीतर तो कुछ भी नहीं है। हिंदुस्तान में कवि कविताएं करने लगे कि सिंहों को छेड़ो मतहम बब्बर शेर हैं। लेकिन घर के बाहर कविता सुना रहे हैं लोगों कोकहीं जा नहीं रहे हैं। सारा हिंदुस्तान कविता कर रहा है जैसे कि कविताओं से कोई युद्ध जीते जा सकते हैं। दुनिया में ऐसा कविताओं का बुखारजुनून कभी भी नहीं आया होगा जैसा हिंदुस्तान में आया। गांव-गांव में कवि पैदा हो गएजैसे बरसात में मेंढक पैदा हो जाते हैं और वे सब कहने लगे कि हम शेर हैंसोते हुए शेर को मत छेड़ो। तुम्हारी कविताओं से तुम शेर सिद्ध हो जाओगेतुम्हारी यह जो बहादुरी तुम कविताओं में बता रहे हो और कवि-सम्मेलन के मंच पर हाथ-पैर फेंक रहे होइससे कुछ हो जाएगानहींहिंसा तो भीतर बहुत हैलेकिन साहस भी नहीं है बाहर जाने का। तो वह हिंसा कहीं कविताओं में निकलती हैकहीं बातचीत में निकलती हैक्षुद्रता में निकलती है। लेकिनबाहर हम नहीं गए इस देश के। उसका कारण यह था कि हम पकड़ते हैंरुकते हैं। गांव का आदमी गांव में रुक जाता हैशहर में नहीं जाना चाहता। डरता हैकहां जाए। जो आदमी एक छोटी दुकान करता है उसी पर रुक जाता है। किसी तरह इसी में गुजरा कर लेंगेकहां जाएंकहां कौन झंझट लेकौन अनजानअपरिचित में उतरे।
सारी दुनिया विकसित हुई हैवह इसलिए कि वह अनजान और अपरिचित में जाने को आतुर हैं। जब भी उन्हें मौका मिल जाए अनजान में जाने कावे जाने-माने को छोड़ कर अनजान में चले जाएंगे। और हम हैंमजबूरी में ही जाना पड़े तो बात दूसरी,जब तक हमारी सामर्थ्य चलेगी हम जाने-माने को पकड़ कर रुके रहेंगे। यह स्थिति शुभ नहीं हैयह मंगलदायी नहीं है। इसी के कारण हम पीछे-पीछे लौट कर पकड़ते हैं। अगर मैं कोई बात कहूं तो आप कहेंगेयह आदमी अनजानापता नहीं यह आदमी कौन हैक्या हैइसकी बात मानना ठीक है क्याअपने कृष्ण की बात ठीक हैतीन हजार साल से सुनते हैंवही ठीक होनी चाहिए। और इसलिए हिंदुस्तान में अगर किसी को नई बात भी कहनी हो तो उसको एक झूठ का आडंबर पहनाना पड़ता है। उसे कहना पड़ता हैजो मैं कह रहा हूं यही गीता में भी कहा हुआ हैतब कहीं वह बात स्वीकृत होगीनहीं तो नहीं। अजीब बेईमानियों करवाना चाहते हैं। जब वह पहले यह सिद्ध करे कि यह गीता में कहा हुआ है तब कोई सुनने को राजी होगा। कि तब ठीक हैतब बोलोतब पुराना परिचित ही बोल रहे होफिर कोई डर नहीं है तुमसे।
इसीलिए हिंदुस्तान में हजारों गीता की टीकाएं हो गईं। गीता की कोई एक टीका की भी जरूरत नहीं है। गीता इतनी साफ किताब हैइतनी स्पष्टकि गीता की किसी टीका की जरूरत नहीं है। टीकाकार और धुआं पैदा कर देगा। गीता को समझाने के लिए टीकाकार की जरूरत हैकृष्ण ने इतनी स्पष्ट बात कही हैइतनी सीधीकि अब यह टीकाकारों की क्या जरूरत हैलेकिन एक हजार टीकाएं हैं और हजार मतलब वाली। इससे क्या सिद्ध होता हैइससे दो ही बातें सिद्ध होती हैं--या तो कृष्ण का दिमाग खराब रहा हो कि एक ही बात में हजार मतलब रहे होंकोई मतलब ही नहीं रहामतलब यह रहा। हजार मतलब जिस बात के हों उसमें कोई मतलब ही न रहा। और या फिरये हजार टीकाकार क्या कह रहे हैंये जो कहना चाहते हैं उसको जबरदस्ती बेचारे कृष्ण के ऊपर थोप रहे हैंइसलिए हजार टीकाएं पैदा हो गईं। नहीं तो हजार टीकाओं की क्या जरूरत हैजो इन्हें कहना हैसीधा नहीं कह सकते। क्योंकि यह मुल्क सुनेगा ही नहींये नये को सुनने को राजी नहीं। उसको गीता में प्रवेश करके और उसको गीता की शकल में लाकर खड़ा करना पड़ेगा। जब वह बिलकुल गीता की बात जंचने लगेगी तब कोई मानेगा। और इसमें गीता के साथ जो हत्या हो रहीजो अत्याचार हो रहावह चलेगा। गीता की जो शुद्धि है वह नष्ट होगी।
अभी मेरे खिलाफ जो लोगों ने इधर लिखाउन्होंने क्या कहाउन्होंने कहा कि गांधीजी विनम्र थे। वे कभी यह नहीं कहते थे कि यह मैं कह रहा हूं। वे कहते थेयह गीता में लिखा हैयह महावीर ने कहा हैयह टालस्टाय कहता हैयह रस्किन कहता हैयह श्रीमद्राजचंद्र कहते हैं। मैं तो वही कह रहा हूं जो सदा कहा हुआ है। यह विनम्रता नहीं हैयह इस मुल्क के बुनियादों रोगों में से एक रोग है। जो मैं कह रहा हूंवह मुझे कहना चाहिए कि मैं कह रहा हूंचाहे वह गलत होचाहे वह सही हो। मैं जो कह रहा हूं उसे कृष्ण के ऊपर थोपना अन्याय है। यह बिलकुल क्राइम है कि मैं कहूं कि वह कृष्ण कर रहे हैं। मुझे क्या पता कि कृष्ण क्या कह रहे हैंकृष्ण के अतिरिक्त और कोई दावा नहीं कर सकता है इस बात के कहने का कि कृष्ण क्या कह रहे हैं! कौन दावा करेगाकृष्ण की चेतना जिसके पास न होवह कैसे जानेगा कि कृष्ण क्या कह रहे हैंक्यों फिजूल कृष्ण के ऊपर सवारी करते होक्यों किसी के कंधे पर सवार होते होअपने दो छोटे पैरों से ही खड़े हो जाओ। यह अहंकार हो गया! अपने पैर पर खड़ा होना अहंकार है और कृष्ण के कंधों पर खड़े हो जाना अहंकार नहीं है। कृष्ण के कंधों पर खड़े होकर आसानी से आप ज्यादा ऊंचे दिखाई पड़ोगेअपने पैरों पर खड़े होकर उतने ही ऊंचे दिखाई पड़ोगे जितने आप हो।
अहंकार किसमें ज्यादा सिद्ध होगापरंपरा का सहारा अहंकार की पुष्टि के लिए लिया जा सकता है। और या फिरलोग इतने नासमझ हैं कि वे सुनने को ही राजी नहीं नये को। इसलिए पुरानी शराब की बोतल में नई शराब भर कर पिलानी पड़ेगी। नहीं,मैं इनकार करता हूं इस बात कोक्योंकि यह पूरे मुल्क की प्रतिभा को नुकसान पहुंचाने की तरकीबें हैं। मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि हमें ईमानदारी सेस्पष्टता से यह कहना चाहिए कि यह मैं सोचता हूं ऐसावह गलत हो सकता हैवह सही हो सकता है। यह मूल्यवान नहीं हैलेकिन मूल्यवान यह है कि हम अपने तईं सोचना शुरू करें। हम कब तक कृष्ण और महावीर और बुद्ध को सताते रहेंगे। अगर वे कहीं मोक्ष में होंगे तो बहुत परेशान हो गए होंगे। रोज उनकी टांग खींचो और उनको जमीन पर लाओ। उनकी हुज्जत हो गई होगीघबड़ा गए होंगे कि कहां के दुष्टों के मुल्क में पैदा हो गए कि सुबह-सांझ परेशान किए रहते हैं। नहीं परेशान हो गए होंगेऔर कितने हैरान होते होंगे कि क्या-क्या शकल बनाई जा रही है उनकी बातों की। जो उन्होंने कभी भी नहीं कहा होगावह हजार दो हजार साल में उनके नाम पर थोप दिया गया। जो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा वह उनकी वाणी का हिस्सा बन गया। क्या-क्या हम थोप सकते हैं जिसका कोई हिसाब नहीं। हमारे मन में जो होगाहमें उनके ऊपर थोपना पड़ेगा।
जैनियों के चौबीस तीर्थंकर हैं। उनमें एक तीर्थंकर मल्लिनाथ हैं। दिगंबर कहते हैं कि वह पुरुष हैं मल्लिनाथ। श्वेतांबर कहते हैं,वह मल्लीबाई हैस्त्री है। बड़ा मजा है! यह भी संदिग्ध हो गया कि कोई आदमी स्त्री था कि पुरुषअजीब इतिहास लिख रहे हैं आप! कि यह भी पक्का नहीं है कि एक तीर्थंकर स्त्री था कि पुरुषनहींयह तो पक्का रहा होगालेकिन दिगंबरों की मान्यता यह है कि स्त्री मोक्ष जा ही नहीं सकतीतो फिर तीर्थंकर स्त्री कैसे हो सकता हैस्त्री रही होगी तो उन्होंने मल्लीबाई को मल्लिनाथ कर डालाक्योंकि वह तो अपनी धारणा के हिसाब से उनको खड़ा होना पड़ेगातीर्थंकर को। महावीर की शादी हुई कि नहींमहावीर को लड़की पैदा हुई कि नहींइसमें भी झगड़े हैं। श्वेतांबर कहते हैंशादी हुईलड़की हुईदामाद था। दिगंबर कहते हैं कि यह कभी हुआ ही नहीं। तीर्थंकर जैसा आदमी और शादी करेगाबाल-ब्रह्मचारी। तो बाल-ब्रह्मचारी की जिसकी धारणा है,तो थोप देगा। मानने को राजी नहीं हैं कि उनकी स्त्री थी या उनकी लड़की हुई। है ही नहींयह सवाल ही नहींयह बात गलत है। अब एक ही महावीर को मानने वाले दो वर्ग अजीब बातें कर रहे हैं। यह क्या है?
हम अपनी ही धारणा थोपते हैं शास्त्रों परसिद्धांतों परमहापुरुषों पर। हम पूजा कर रहे हैं यह या अन्याय कर रहे हैंयह क्रिमिनल एक्ट हैयह बिलकुल अपराधपूर्ण है और मुल्क को सख्ती से मुमानियत होनी चाहिए कि कोई आदमी कृष्ण की तरफ से बोलने का हकदार नहीं हैन महावीर की तरफ से। अपनी बात कहे। अगर महावीर के लिए भी कहना है तो यह कहे कि यह मैं कहता हूं महावीर के संबंध में। महावीर कहते होंगे कि नहीं कहतेमैं मानने कोमुझे कुछ भी पता नहीं है। हम वही समझ सकते हैंजो हमारी स्थिति है।
एक दिनएक रात बुद्ध प्रवचन करते थे। प्रवचन के बाद रोज का उनका नियम था कि वह भिक्षुओं कोश्रोताओं को कहते कि अब जाओ रात्रि का अंतिम कार्य करो। वे भिक्षु दस हजार भिक्षु उनके साथ होते थेरात्रि का अंतिम कार्य ध्यान था। सोने के पहले ध्यान करोफिर सो जाओ। तो रोज-रोज यह कहने की जरूरत न थी कि ध्यान करो। तो वे इतना कह देते थे कि अब जाओरात्रि का अंतिम कार्य करो।
उस दिन एक चोर भी आया था सभा मेंएक वेश्या भी आई थी। चोर ने जैसे ही सुना कि जाओ अब रात्रि का अंतिम कार्य करो। अरेउसने कहा कि बहुत रात हो गईचांद कितना चढ़ गयाजाऊंअपना धंधा करूं। ऐसे रात भर गंवा दूंगा धर्म मेंतो मुश्किल हो जाएगी। धर्म में थोड़ा-बहुत वक्त गंवाया जा सकता हैफिर धंधा करने जाना ही पड़ता हैचाहे चोर होचाहे साहूकार हो। वेश्या ने सुना कि रात्रि हो गई हैअपना काम। वेश्या बोलीअरेग्राहक आ चुके होंगेमैं जाऊं। बुद्ध ने एक ही बात कही थी। भिक्षु ध्यान करने चले गएचोर चोरी करने चला गयावेश्या अपनी दुकान पर चली गई। बुद्ध ने जो कहा था,वह एक थालेकिन व्याख्याएं तीन हो गईं।
जो कहा जाता है वह एक हैजितने लोग सुनते हैं व्याख्याएं उतनी हो जाती हैं। लेकिन कृपा करके अपनी व्याख्या को किसी के ऊपर मत थोपेंइतना ही कहेंऐसा मैं समझता हूं। लेकिन इस मुल्क में थोपा जा रहा हैनिरंतर थोपा जा रहा है। इस मुल्क में कोई गीता की टीका न लिखे तो वह ज्ञानी ही नहीं है। कोई गीता की टीका लिखे तभी ज्ञानी होता है। और अगर कभी भी कहीं कोई अदालत होगीमोक्ष मेंतो ये गीता के टीकाकार एक-एक बंधे हुए नजर आएंगेक्योंकि कृष्ण इन पर मुकदमा चलाएंगेकि सज्जनोंतुम मेरे पीछे क्यों पड़े थेमुझे जो कहना था वह मैंने कह दिया थातुम कृपा करते। मैंने कह दी थी बात पूरी। मेरी बात साफ थी। तुम कैसे अर्थ समझाने गए थे बीच में कि इसका यह अर्थ है।
यह जो प्राचीनवादितायह जो प्राचीन का मोहयह जो अतीत को जकड़ कर पकड़ लेनायह हम कब तोड़ेंगेक्या हमको दिखाई नहीं पड़ता कि सारा जगत आगे बढ़ता चला जा रहा हैभविष्योन्मुख हैहम अतीत के मोह में मर जाएंगेमर ही गए हैंकरीब-करीब मर गए हैं। इकबाल ने गाया है--"कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारीअब इकबाल तो जा चुकेअन्यथा उनसे मिल कर कहता कि महाशयकुछ भी बात नहीं है। बात कुल इतनी है कि हस्ती बहुत पहले मिट चुकीतो अब मिटे भी तो मिटे क्याखाक! मिटने के लिए हस्ती चाहिए न पहलेआदमी जिंदा हो तो मर सकता है और मर ही गया हो तो अब क्या करेगामरने के लिए भी जिंदगी चाहिए। मरा हुआ आदमी फिर नहीं मरता। एक दफा मर गयाफिर तो मरता ही नहीं। यह कौम इसलिए नहीं कि हमारी कोई बड़ी खूबी है जिससे हमारी हस्ती नहीं मिटती। हमारी खूबी यह है कि हस्ती हम खो चुके अतीत के साथ। हमारी कोई मौजूदा हस्ती नहीं हैहमारी कोई वर्तमान प्रतिभा नहीं हैहमारी सारी प्रतिभा अतीत में हो चुकी। आज क्या है हमारे पासअभी क्या हैवर्तमान संपत्ति क्या है हमारे व्यक्तित्व कीवह हमारी खो चुकीइसलिए मिटने को अब कुछ बचा नहीं। लेकिन यह दुखद है और गांधी का चिंतन फिर पुरातन की तरफ ले जाने वाला है। देश को ले जाना है आगेरोज आगे। रोज भूलते जाना है उसकोजो बीत गया है।
एक गांव में एक पुराना चर्च था। वह कहानी कह कर और थोड़ी सी बातें कह कर मैं अपनी बात पूरी करूं।
एक गांव में एक चर्च था। एक बहुत पुराना गांव और बहुत पुराना चर्च। वह चर्च इतना पुराना था कि हवाएं चलती थींउसकी दीवालें हिलती थीं कि कब गिरींकब गिरीं। बादल गरजते थे तो लगता था गया चर्चबिजली चमकती थी तो लगती गिरेगी चर्च पर। ऐसे चर्च में कौन प्रार्थना करने जाएगाकोई प्रार्थना करने नहीं जाता था। प्रार्थना करने वाले जीवन को दांव पर लगा कर तो प्रार्थना करने जाते नहीं। सुविधा होती है तो जाते हैं। जिनको सुविधा होती है वे ज्यादा जाते हैंजिनको कम सुविधा होती है वे कम जाते हैं। लेकिन वहां तो जान का खतरा थावहां कौन प्रार्थना करने जाता। चर्च खाली पड़ा रहता। चर्च की कमेटी,संरक्षकों की कमेटी मिली। उन्होंने कहाबड़ी मुश्किल है। वह कमेटी भी बाहर मिलीवह भी कोई भीतर नहीं मिलीक्योंकि नेता हमेशा अनुयायियों से ज्यादा होशियार होते हैं। जहां अनुयायी नहीं जाता वहां नेता कभी जाता ही नहीं। आप इस खयाल में मत रहना कि नेता अनुयायियों के आगे जाते हैं। यह सिर्फ भ्रम है अखबार में।
नेता हमेशा अनुयायी के पीछे जाते हैंफॉलो करते हैं फॉलोअर को। जब देख लेते हैं कि अनुयायी यहां जा रहा है तब वे उचक कर उसके साथ हो जाते हैं। वे आपको आगे दिखाई पड़ते हैं सिर्फवे होते हमेशा पीछे हैं। पहले पता लगा लेते हैं कि अनुयायी क्या मानता हैक्या विश्वास करता हैवही कहते हैं जो आप मानते हैं। जो आप मानोगे वही बात करते हैंउसी तरह जीते हैं। वे भी बेचारे नेता थेवे काहे के लिए भीतर जातेजब कोई अनुयायी नहीं जाता था। वे भी बाहर मिलेदूर कंपाउंड से कि कहीं कोई दीवाल गिर न जाए। उन्होंने वहां तय किया कि लोग बड़े खराब हो गए हैंकोई मंदिर में आता ही नहींकोई आता ही नहीं मंदिर मेंलोग बिलकुल नास्तिक हो गए हैंलोग बिलकुल अधार्मिक हो गए हैं और सबने सिर हिलाया कि बात सच है। हालांकि उनमें से भी कोई कभी नहीं आता था।
लेकिन एक जवान आदमी पहुंच गया था। उसने कहा कि महाशयोंसिर्फ लोगों को दोष मत दोचर्च इतना पुराना हो गया है कि उसमें जाना खतरनाक है। देखेंहम भी अपनी कमेटी की बैठक बाहर कर रहे हैंचलें हम भीतर। वे लोग बोले कि यह तो बात सच है कि चर्च बहुत पुराना हो गया है। क्या करना चाहिएतो कमेटी ने एक प्रस्ताव पास किया कि अब बहुत हो गई प्रतीक्षा करते हुए पुराने चर्च में कोई नहीं जाएगा। तो हम सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास करते हैं कि पुराना चर्च गिरा दिया जाना चाहिए। उन्होंने दूसरा प्रस्ताव पास किया और पुराने को गिरा कर हमें एक नया चर्च बनाना हैयह भी सर्वसम्मति से। और तीसरा प्रस्ताव पास किया विस्तार से और उसमें लिखा कि हम नया चर्च वैसा ही बनाएंगे जैसा पुराना थाठीक पुराने जैसा। वैसा ही मकानउसी नींव परनींव पुरानी रहेगीचर्च नया रहेगावैसी ही दीवालेंउन दीवालों में पुरानी ईंटें ही लगाई जाएंगीनहीं ईंट नहींपुराने ही द्वार-दरवाजे निकाल कर लगाए जाएंगेनये दरवाजे नहीं। ठीक पुराने चर्च जैसा हीपुरानी जगह पर हीपुरानी दीवालों के अनुकूल दीवालेंपुरानी नींव पर नई दीवालेंऐसा हम चर्च बनाएंगे। इसे भी सर्वसम्मति से स्वीकार किया और फिर चौथा प्रस्ताव स्वीकार किया कि जब तक नया चर्च न बन जाएतब तक पुराना गिराएंगे नहीं।
वह चर्च अभी तक खड़ा हुआ है। वह कब गिरेगावह कभी नहीं गिरेगा। जो पुराने को गिराने की सामर्थ्य नहीं रखते वे नये को निर्माण करने की सामर्थ्य खो देते हैं। जो पुराने को विध्वंस करने की हिम्मत रखते हैं केवल वे ही नये का सृजन कर पाते हैं। जो पुराने की मौत देख सकते हैं वे ही केवल नये को जन्म दे सकते हैं। और हम पुराने की मृत्यु देखने में असमर्थ हो गए हैं। हम पुराने को नष्ट करने में असमर्थ हो गए हैं। हम पुराने को गिराने में असमर्थ हो गए हैंइसलिए नये का कोई जन्म नहीं हो पा रहा है।
लेकिन ध्यान रहेजीवन नये के साथ हैपुराने के साथ मौत है। अगर मर ही जाना हो बिलकुलतो पुराने को कस कर पकड़ लेना चाहिए। घर में मां मर जाती हैपिता मर जाते हैंबहुत प्यारे हैंलेकिन फिर लाश घर में रख कर हम नहीं बैठ जाते हैं। बहुत प्यारे हैंकितना दुखकितनी पीड़ा आदमी झेलता है--मां चल बसी उसकीलेकिन फिर भी मरते ही लाश को घर में नहीं रखते। फिर यह नहीं कहते कि मां बहुत प्यारी थीहम लाश को कैसे घर के बाहर ले जाएंहम कैसे मरघट ले जाएंहम तो इसी से चिपटे हुए बैठे रहेंगे। नहींफिर लाश को ले जाना पड़ता हैदुख मेंपीड़ा में। मरघट पर आग लगानी पड़ती हैजलाना पड़ता है उस मां को जिसे इतना प्रेम किया थाजिससे जन्म पाया थाजो सब कुछ थी। वह भी मर गई तो उसे भी मरघट पर ले जाना पड़ता हैमजबूरी में जलाना पड़ता है। रोते हैंलेकिन जला कर वापस लौट आते हैं।
अगर किसी घर के लोग पागल हो जाएं और जितने बूढ़े लोग मरते जाएं उनकी लाशें इकट्ठी कर लेंतो उस घर की आप समझते हैं क्या हालत हो जाएगीउस घर में नये बच्चे पैदा होने के पहले इनकार कर देंगे कि क्षमा करिएइन लाशों के इस ढेर में हम जन्म नहीं लेना चाहते। और नये बच्चे पैदा भी हो जाएंगे तो पैदा होते से ही पागल हो जाएंगेक्योंकि जिस घर में इतनी लाशें हों वहां नये बच्चे पागल होने के सिवाय और कुछ नहीं हो सकते हैं। लेकिन नहींलाशें हम जला आते हैं। लेकिन इतिहास की लाशें हम संजोते चले जाते हैंमस्तिष्क पर रखते चले जाते हैंरखते चले जाते हैं। इतिहास भी कभी जला देने जैसा हो जाता हैइतिहास भी कभी भूल जाने जैसा हो जाता हैअतीत भी कभी मरघट पर पहुंचाने जैसा हो जाता हैताकि शक्ति और ऊर्जा नये के जन्म की दिशा में अग्रसर हो सके।
नहींधर्म नहीं कहता कि पीछे जाओ। धर्म तो कहता है: आगे और आगे और अंत मेंअननोनअज्ञात परमात्मा हैवहां चलना है। निकलती है गंगा हिमालय सेगंगोत्री से भागती हैगंगोत्री पर रुक नहीं जाती। अनजान पहाड़ियों मेंघाटियों मेंवादियों में भागती हैदौड़ती हैपत्थरों से टकराती है। न मालूम कितने रास्ते हैं। रास्ते में न कोई पुलिस वाला मिलता है जिससे पूछ ले कि सागर कहां हैन कोई पुरोहित मिलता है कि पूछ ले कि सागर कहां हैं। कोई नहीं मिलताकोई गाइड नहींकोई मार्गदर्शक नहींभागती चली जाती है। अपने भागने पर भरोसा हैअपने प्राणों पर भरोसा है। भागती हैअनजानभागती रहती है और एक दिन सागर के पास पहुंच जाती है। गंगोत्री में रुक जाती तो सागर नहीं हो सकती थी। गंगोत्री में नहीं रुकीभागीतो गंगोत्री में छोटी सी धारा थीसागर के पास पहुंच कर विराट धारा हो गई और सागर में गिरते ही तो सागर हो गई। जाना है अनंत तकजाना है आगे और आगे और भविष्य...वहां जहां अनंत का सागर है। जो पीछे रुक गए हैंउन्होंने अपने हाथ से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।
मैं भविष्य कोउस आने वाले सूरज को जो उगेगाउस भवन को जो हम बनाएंगेउसके लिए कामना जगाना चाहता हूंउसके लिए आकांक्षा और अभीप्सा जगाना चाहता हूं। लेकिन हमारे सारे शिक्षक पुराने से बंधे हैंहमारे सारे शिक्षक प्रतिगामी हैंहमारे सारे शिक्षक रिएक्शनरी हैंहमारे सारे शिक्षक कहते हैंवह जो थावही ठीक था। एक बार इस देश को निर्णय करना होगा कि जो था अगर वह ठीक था तो हम गलत क्यों हो गए हैंजो था अगर वह ठीक था तो हम उसी से पैदा हुए हैंहम उसी के तो बाइ-प्रोडक्ट हैं। जो था अगर वह ठीक था तो हम ऐसे क्यों हैंबेटा सबूत है अपने बाप का। अगर बाप ठीक था तो यह बेटा गड़बड़ कैसेफल सबूत हैअपने बीज का। अगर बीज मीठा थातो यह फल कड़वा कैसे है?
फल यह नहीं कह सकता कि बीज तो ठीक थालेकिन हम गड़बड़ हो गए हैं। नहींबीज से ही फल पैदा होते हैं। बीज तो खो गएउनका तो अब कुछ पता नहीं है। अब तो फल सबूत देंगे कि बीज कैसे थे। हम सबूत हैंअपने पूरे अतीत के। हमारे अतिरिक्त और कोई सबूत नहीं है। हम कैसे हैंवह सबूत है हमारे पूरे इतिहास का। क्योंकि उस पूरे इतिहास की यात्रा से हम जन्मे हैंउस यात्रा से हम पैदा हुए हैं। और अगर वह ठीक था तो हम गलत क्यों हैंअगर हम गलते हैं तो हमें जानना पड़ेगा,हालांकि इस बात को जानने में बड़ी पीड़ा होती हैबड़ा दुख होता है कि हम अगर गलत हैं तो हमारे अतीत की प्रक्रिया गलत थी और हमें नई प्रक्रिया और नई जीवन दिशा को चुनना जरूरी हो गया है।

मेरी बातों को इतनी शांति और प्रेम से सुनाउससे बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूंमेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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