बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-30

देख कबीरा रोया

एक आदमी को परमात्मा का वरदान था कि जब भी वह चलेउसकी छाया न बनेउसकी छाप न पड़े। वह सूरज की रोशनी में चलता तो उसकी छाया नहीं बनती थी। जिस गांव में वह थालोगों ने उसका साथ छोड़ दिया। उसके परिवार के लोगों ने उसको घर से बाहर कर दिया। उसके मित्र और प्रियजन उसको देख कर डरने और भयभीत होने लगे। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बन गई कि उसे गांव के बाहर जाने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा। वह बहुत हैरान हुआतो उसने परमात्मा से प्रार्थना की कि मैंने केवल छाया खो दी हैऔर लोग मुझसे इतने भयभीत हो गए हैंलेकिन लोग तो आत्मा भी खो देते हैंऔर तब भी उनसे कोई भयभीत नहीं होता है।



पता नहींयह कहां तक सच है कि किसी आदमी ने अपनी छाया खो दी हो। यह बात बड़ी काल्पनिक मालूम होती हैलेकिन दूसरी बात सत्य है। बहुत कम लोग हैं पृथ्वी परजो अपनी आत्मा ने खो देते हों। अधिकतम लोग आत्मा खो देते हैं और छाया को बचा लेते हैं। सिर्फ छाया बच जाती है और भीतर जो भी महत्वपूर्ण हैवह सब खो जाता है। हमारे देश में यह दुर्भाग्य और भी बहुत घना होकर प्रकट हुआ है। यद्यपिहम आत्मा की बातें करते रहे हैं हजारों वर्षों सेलेकिन वे बातें केवल बातें ही हैं और हमारे देश ने बहुत बातें करते हैंताकि आत्मा खो दी है। शायद हम इसीलिए आत्मा और परमात्मा की बहुत बातें करते हैं,ताकि आत्मा के खो जाने के तथ्य को भूले रहें।
इधर हजारों वर्षों से हम भ्रम में रहे हैं कि हम जगत गुरु हैं। यह बात सरासर झूठी है। हम इस भ्रम में भी रहे हैं कि हम बहुत धार्मिक हैंयह बात भी सरासर झूठी है। हमसे ज्यादा अधार्मिक जाति जमीन पर खोजनी आज कठिन है। लेकिन अपने अधर्म कोअपनी अनीति कोअपनी जीवन की व्यर्थता और गलत ढंग को हम बहुत अच्छी बातों में छिपाने में कुशल हो गए हैं। हमारे पास सिवाय सिवाय बातों के और कुछ भी नहीं रह गया हैऔर सिवाय शास्त्रों और ग्रंथों के कुछ भी नहीं रह गया है। हमारा आदमी बहुत पहले खो चुका है और मर गया है। क्या हम इन झूठी बातों को दोहराते रहेंगेया कि हजारों वर्षों से जो सपना हमने अपने मुल्क में पैदा किया था कि हम मनुष्य को उसके शरीर के ऊपर उठाएंगेऔर हम मनुष्य के जीवन को परम जीवन से जोड़ेंगेऔर मनुष्य के जीवन को हम इस शांति से भर देंगेजो इस पृथ्वी पर दुर्लभ हैऔर हम मनुष्य के जीवन को एक आनंद और अमृत का स्रोत बना देंगेक्या हम इस सपने को पूरा करेंगे या केवल बातें ही करते रहेंगे?
ये बातें कितनी ही दुखद मालूम होती होंलेकिन दुनिया के सामने इन बातों की व्यर्थता रोज-रोज स्पष्ट होती चली जाती है। हमने ने केवल आत्मा खो दी हैंबल्कि आत्मा की बातों में हमने संसार को भी खो दिया है और आज हम उन कौमों के सामने भीख मांगने को खड़े हैंजिनकी उम्र हमारे सामने न कुछ है। अमेरिका की सभ्यता की कुल उम्र सौ वर्ष है। रूस की सभ्यता की कुल उम्रजैसा रूस आज हैपचास वर्ष से ज्यादा नहीं है। और हम पांच हजार वर्ष पुरानी कौम और पांच हजार वर्ष पुराना देश,आज बच्चों के सामने भीख मांगने को मजबूर हो गए हैं। हमने आत्मा भी खो दी है और हम शरीर खोने की तैयारी पर भी पहुंच गए हैं!
क्या हम उसको चुपचाप देखते रहेंक्या इस आते हुए आसन्न संकट को हम चुपचाप सहते रहेंऔर क्या उन राजनीतिज्ञों के हाथ में सारी बात छोड़ देंजो कि हमारी बीमारी के लिए उतने ही अग्रणी हैंजितनी हमारी राजनीति के। हमारी रुग्णता और हमारे पागलपन और हमारी बीमारी के जो नेता हैंहम उन पर ही छोड़ देंक्या उन पर छोड़ देने से इस मुल्क के भविष्य का कोई भी प्रकाशपूर्ण पक्ष प्रकट होता है?
इधर बीस वर्षों में हिंदुस्तान की गति और नीचे गिरी है--हमारी नैतिकता नीचे गई हैहमारा चरित्र नीचे गया है। यह हो सकता है कि हमने कुछ मकान बना लिए हैंयह भी हो सकता है कि हमने कुछ कारखाने खोल लिए हैंयह हो भी सकता है कि हमने कुछ रास्ते सुधार लिए हैं। लेकिन रास्तों का क्या होगा और कारखानों का क्या होगा और मकानों का क्या होगाजब हमने आदमी को ही खो दिया हो!
और आदमी को हम रोज खोते जा रहे हैं। यह बहुत महंगा सौदा है और मुल्क में जो केवल बहुत अंधे हैंजो केवल बहुत बहरे हैंकेवल वे ही इसको बर्दाश्त कर सकते हैं और देखते रह सकते हैं। जिनके मन में थोड़ी भी करुणा है  और जिनके मन में थोड़ा भी प्रेम है और जिनके हृदय में थोड़ी भी जीवन को बदलने की प्यास और अकुलाहट हैउन्हें कुछ करना है। यह चुनौती इतनी स्पष्ट है कि केवल मुर्दे ही इस चुनौती को बिना लिए रह जाएंगे। जिनके भीतर जीवन हैयह चुनौती स्वीकार करनी ही होगी।
एक छोटी सी घटना मुझे याद आती है। एक बहुत बड़े महल में आग लग गई थी। और उस महल के सामने बहुत लोग इकट्ठे थे। महल का मालिक रोता हुआआंसू बहाता हुआ बाहर खड़ा था। उसने सारा होश खो दिया था। उसकी कुछ समझ में न आ रहा था कि क्या हो गया है। नौकर और पड़ोस के लोग भीतर से सामानतिजोरियां और बहुमूल्य चीजें निकाल कर ला रहे थे। फिर आखिरी क्षण आ गया मकान के जलने का और लोगों ने उस मकान मालिक को पूछा कि कुछ और भीतर तो नहीं रह गया हैउस मकान मालिक ने कहामुझे कुछ भी याद नहीं हैमेरी कुछ समझ में नहीं पड़ता है। तुम एक बार भीतर जाकर और देख लो। वे भीतर गए और वहां से छाती पीटते और रोते हुए वापस लौटे। मकान मालिक का इकलौता लड़का भीतर ही जल गया था! वे मकान बचाने में लग गए थे और मकान का असली मालिक जल कर समाप्त हो गया था!
मैंने जब यह बात सुनी थीतो मैंने कहा कि किसी महल में यह घटना घटी हो या न घटी होलेकिन हमारा जो देश का महल है वहां यह घटना रोज घट रही है। हम सामान बचाने में लगे हैं और सामान का मालिक रोज मरता जा रहा है। और आने वाले बच्चों के लिए हम जो भविष्य खड़ा कर रहे हैंवह इतना दुखद है कि बच्चेआने वाली पीढ़ियां हमें सदा-सदा कि लिए कोसेंगी,हमें सदा के लिए दोषी ठहराएंगी। हम सदा के लिए आने वाले इतिहास की अदालत में बहुत मुजरिम की तरहबहुत अपराधी की तरह खड़े होने को हैंयह हमें पता होना चाहिए। मुझे यह दिखाई पड़ता है कि जो लोग अपराध में भाग न भी लेते हों,लेकिन चुपचाप अपराध को होते हुए देखते होंवह भी अपराधी ही होते हैंयह भी हमें समझ लेना चाहिए। और हम सारे लोग इस बड़े अपराध में सम्मिलित हैंजो मुल्क के साथ हो रहा है।
क्या कुछ नहीं किया जा सकता हैक्या हताशा और निराशा इतनी है कि कुछ भी नहीं हो सकता हैमुझे ऐसा मानने का कोई भी कारण दिखाई नहीं पड़ता है। मैं आशा से भरा हुआ हूं और मुझे लगता है कि रास्ते खोजे जा सकते हैं। आदमी के मन को बदलने कोआदमी के चरित्र को बदलने कोउसको प्राण देने कोउसको आत्मा देने को मार्ग खोजे जा सकते हैं। इन मार्गों की खोज मेंइन मार्गों की चर्चाओं में दस वर्षों से मैं मुल्क के लाखों लोगों के पास गया हूं और मेरी आशा रोज-रोज घनीभूत होती हुई दिखाई मालूम पड़ी। और मुझे यह भी मालूम पड़ा है कि अगर मुल्क के जो सामान्य जन हैंअगर मुल्क के नेता उन्हें गलत रास्तों पर न ले जाएं तो मुल्क के सामान्य जन के बदलाहट की बहुत आसान स्थिति हैकोई कठिनाई नहीं पैदा हो गई है। लेकिन राजनीति ने इतने जोर से हमारे ऊपर हमला बोला है कि जीवन के सारे अंग उसके नीचे दब गए हैं। जैसे राजनीतिज्ञ ही सब कुछ है और शेष कुछ भी नहीं है। लेकिन स्मरण रहेराजनीति ने तो किसी मुल्क के चरित्र को बनाती हैराजनीति ने किसी मुल्क को आत्मा देती है! राजनीति न किसी मुल्क को शांति देती है और न आनंद देती हैऔर न जीवन को अर्थ और मीनिंग देती है। राजनीति केवल द्वंद्व देती हैसंघर्ष देती है और महत्वाकांक्षा देती है। और महत्वाकांक्षाएंबीशनजितनी बढ़ती चली जाती हैउतनी मन को वायलेंस,  हिंसा और एक-दूसरे के प्रति शत्रु के भाव से भरती चली जाती है।
यह जो दशा हैयह बदली जा सकती है! हमें जीवन के सारे सूत्रों को एक बार फिर से पुनर्विचार कर लेना जरूरी होगा और मनुष्य के विज्ञान को निर्मित करना जरूरी होगा। और मनुष्य के विज्ञान का एक ही सूत्र अंत में मैं आपसे कह देना चाहता हूं। लंबी बात करनी तो कठिन नहीं हैलेकिन सबसे पहले एक सूत्र बहुत जरूरी हैऔर वह यह हैइसके पहले कि हम कुछ भी कर सकेंयह समझ लेना बहुत जरूरी है कि हम क्या हो गए हैं।
मैंने सुना हैएक छोटे से स्कूल में एक इंस्पेक्टर परीक्षा के लिए आया थानिरीक्षण के लिए। उस स्कूल की बड़ी कक्षा में जाकर उसने बच्चों से कहा कि  तुम्हारी कक्षा में तीन विद्यार्थी सबसे श्रेष्ठ होंनंबर एकनंबर दोनंबर तीनवे खड़े हो जाएं। और पहले नंबर एक का विद्यार्थी आए और बोर्ड पर आकर सवाल हल करे।
पहले नंबर का विद्यार्थी आयाउसने बोर्ड पर सवाल हल कर दिया और अपनी जगह वापस बैठ गया। फिर नंबर दो का विद्यार्थी आयाउसने भी सवाल हल किया और वह भी अपनी जगह आकर बैठ गया। फिर नंबर तीन का विद्यार्थी आया। लेकिन नंबर तीन का विद्यार्थी बहुत डरता हुआ आया और घबड़ाया आया। बहुत भयभीत आयाऔर बोर्ड पर वह सवाल करने को था कि इंस्पेक्टर ने उसे गौर से देखा और वह पहचान गया कि यह लड़का धोखा दे रहा है। वह जो नंबर एक आया थावह लड़का यही था और दुबारा आ गया था।
इंस्पेक्टर ने उसे पकड़ा और कहातुम धोखा दे रहे हो! तुम एक दफा आकर सवाल हल कर गए। उस लड़के ने कहाधोखा मैं नहीं दे रहा हूं। हमारा जो नंबर तीन का विद्यार्थी हैवह क्रिकेट का मैच देखने चला गया है और वह मुझसे कह गया है कि उसकी जगह कोई काम पड़ जाए तो मैं कर दूं। मैं उसकी जगह आया हुआ हूं। उस इंस्पेक्टर ने कहापागलतुझे पता नहीं है कि परीक्षा दूसरों की जगह नहीं दी जा सकतीलेकिन उस लड़के ने कहा कि हमारे मुल्क में तो हर चीज दूसरों की जगह की जा सकती है। इंस्पेक्टर ने उसे बहुत डांटाउसे अपनी जगह भेजा।
और फिर वह शिक्षक की तरफ मुड़ाजो चुपचाप बोर्ड के पास खड़ा था। उसने उस शिक्षक को कहा कि मेरे मित्रविद्यार्थी धोखा देता थायह तो ठीक हैलेकिन तुम खड़े क्या देखते थेतुम क्यों चुप रहेक्या तुम भी इस धोखे में सम्मिलित हो?उस शिक्षक ने कहामाफ करेंमैं इस क्लास का शिक्षक नहींमैं विद्यार्थियों को पहचानता नहीं। मैं पड़ोस की क्लास का शिक्षक हूं। इस क्लास का शिक्षक क्रिकेट का मैच देखने चला गया है। वह मुझसे कह गया है कि कोई जरूरत पड़ जाए तो मैं उसकी जगह आकर खड़ा हो जाऊं।
फिर तो इंस्पेक्टर के लिए नाराज होने को काफी मौका थावह बहुत चिल्लाया। उसने बहुत उपदेश दिएजैसे कि हमारे मुल्क में उपदेश देने की एक बहुत बीमारी है। जिसको भी मौका मिल जाएवह उपदेश दिए बिना नहीं रहता है। उसने बहुत उपदेश दिए। इंस्पेक्टर बहुत नाराज हुआ और कहा कि तुम्हारी नौकरी छूट सकती हैइस बेईमानी के लिए। शिक्षक घबड़ायागरीब शिक्षकउसकी आंखों में आंसू आ गए। वह माफी मांगने लगा। इंस्पेक्टर को दया आ गईउसने कहा घबड़ाओ मत। यह तुम्हारा भाग्य है कि मैं असली इंस्पेक्टर नहीं हूं। असली इंस्पेक्टर क्रिकेट का खेल देखने चला गया है। मैं उसका मित्र हूंवह मुझसे कह गया है कि जरा मैं आज निरीक्षण कर दूं!
हम सब एक नाव पर सवार हैं--धोखे काबेईमानी काचरित्रहीनता की। पहली तो बात यह जान लेनी जरूरी है कि हम सब इस पर सवार हैं। इसमें कोई एक आदमी जिम्मेवार नहीं हैहम सब जिम्मेवार हैं--चाहे शिक्षक होचाहे संन्यासी होचाहे साधु हो,चाहे राजनीतिज्ञ होचाहे पत्रकार होचाहे कोई भी होहम सब सम्मिलित हैं। इस मुल्क के दुर्भाग्य में हम सबका हाथ है। एक तो मैं सारे मुल्क में जाकर लोगों को यह समझा देना चाहता हूंक्योंकि इसके बिना कोई परिवर्तन की संभावना पैदा नहीं हो सकती है।
और फिर हम क्या करेंअगर यह ज्ञात भी हो जाए कि हम सब सम्मिलित हैं तो दूसरी बात यह समझा देना चाहता हूं कि कम से कम हम अपना हाथ तो खींच लें इस दुर्भाग्य से। इस मुल्क की दुर्घटना में कम से कम मैं सहयोगी तो न रह जाऊं। कम से कम मैं तो अपने को अलग कर लूं। और अगर एक-एक व्यक्ति भी अलग करने का साहस प्रकट करे--और यही धार्मिक मनुष्य का लक्षण है कि वह अपने को अलग करने का साहस प्रकट करता है। वह इतना करेज जाहिर करता है कि अगर सारा मुल्क भी एक बेईमानी में सम्मिलित हैतो वह अपना हाथ दूर करने की कोशिश करता है। और जो आदमीथोड़े से लोग भी अगर मुल्क में अपने हाथ दुर्भाग्य से दूर कर लें तो देश की किस्मत को बदल देना बहुत कठिन नहीं है।
अंधकार कितना ही ज्यादा होएक छोटा सा मिट्टी का दीया जल जाएतो अंधकार दूर हो जाता है। अगर एक-एक गांव में एक-एक आदमी का जीवन भी जलता हुआ दीया होतो हम एक-एक गांव के अंधकार को दूर कर सकते हैं।
ज्यादा बात मुझे आपसे नहीं कहनी हैलेकिनमनुष्य के भीतर का दीया कैसे जल सकता हैउसके लिए एक पूरा विश्वविद्यालयएक पूरा विद्यापीठ बनाने की योजना हैताकि हम आने वाले बच्चों के मन में ज्योति का कोई दीया उनको दान में दे जाएं। हो सकता हैमुल्क को गरीब छोड़ जाएंहो सकता हैबहुत बड़े कारखाने न दे जाएंहो सकता है बहुत बड़े रास्ते और बड़े मकान न दे जाएंहो सकता है पूरे मुल्क को हम बंबई न बना पाएंलेकिन वे बच्चे हमारे अनुगृहीत रहेंगेअगर उनके भीतर प्रेम काशांति का एक छोटा सा दीया जलाने में समर्थ हो जाते हैं।
ये थोड़ी सी बातें मैंने आपसे कहीं। इनको इतने प्रेम से सुनाउसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं।

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