बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-18

प्रेम-विवाह: जातिवाद का अंत

हमारे यहां चूंकि जातिवाद का राजकरण है--जो हिंदू हैवह हिंदू को वोट देता हैजो मुस्लिम है वह मुस्लिम को वोट देता है। हमारे यहां बहुत कौमें हैं। आपके खयाल में इसको मिटाने के लिए क्या करना चाहिए?

दोत्तीन बातें करना चाहूंगा। एक तो जातीय दंगे को साधारण दंगा मानना शुरू करना चाहिए। उसे जातीय दंगा मानना नहीं चाहिएसाधारण दंगा मानना चाहिए। और जो हम साधारण दंगे के साथ व्यवहार करते हैं वही व्यवहार उस दंगे के साथ भी करना चाहिएक्योंकि जातीय दंगा मानने से ही कठिनाइयां शुरू हो जाती हैंइसलिए जातीय दंगा मानने की जरूरत नहीं है। जब एक लड़का एक लड़की को भगा कर ले जाता हैवह मुसलमान हो कि हिंदूकि लड़की हिंदू है कि मुसलमान है--इस लड़के और लड़की के साथ वही व्यवहार किया जाना चाहिएजो कोई लड़का किसी लड़का को भगा कर ले जाएऔर हो। इसको जातीय मानने का कोई कारण नहीं है।

और हमजो इस मुल्क में जातीय दंगों को खतम करना चाहते हैंइतनी ज्यादा जातीयता की बात करते हैं कि हम उसे रिकग्नीशन देना शुरू कर देते हैं। इसलिए पहली तो बात यह है कि जातीयता को राजनीति के द्वारा किसी तरह का रिकग्नीशन नहीं होना चाहिए। राज्य की नजरों में हिंदू या मुसलमान का कोई फर्क नहीं होना चाहिए।
लेकिन हमारा राज्य खुद गलत बातें करता है। हिंदू कोड बिल बनाया हुआ हैजो कि सिर्फ हिंदुओं पर लागू होगामुसलमान पर लागू नहीं होगा! यह क्या बदतमीजी की बातें हैंकोई भी कोड हो तो पूरे नागरिकों पर लागू होना चाहिए। अगर ठीक है तो सब पर लागू होना चाहिएठीक नहीं है तो किसी पर लागू नहीं होना चाहिए। लेकिन जब आपका पूरा का पूरा राज्य भी हिंदुओं को अलग मान कर चलता हैमुसलमान को अलग मान कर चलता हैतो किस तल पर यह बात खतम होगी?
तो पहले तो हिंदुस्तान की सरकार को साफतौर से तय कर लेना चाहिए कि हमारे लिए नागरिक के अतिरिक्त किसी का अस्तित्व नहीं है। और अगर एक मुसलमान गुंडागिरी करता है तो एक नागरिक गुंडागिरी कर रहा है। जो उसके साथ व्यवहार होना चाहिएवह होगा। यह मुसलमान का सवाल नहीं है। राज्य की नजरों से हिंदू और मुसलमान का फासला खतम होना चाहिएपहली बात।
दूसरी बात--कि हिंदू-मुस्लिम के बीच शांति होहिंदू-मुस्लिम का भाई-चारा तय होइस तरह की सब कोशिश बंद करनी चाहिए। यह कोशिश खतरनाक है। इसी कोशिश ने हिंदुस्तान-पाकिस्तान को बंटवाया। क्योंकि जितना हम जोर देते हैं कि हिंदू-मुस्लिम एक होंउतना ही हर बार दिया गया जोर बताता है कि वे एक नहीं हैं। यह हालत वैसी है जैसे कि कोई आदमी किसी को भूलना चाहता होऔर क्योंकि भूलना चाहता है इसलिए भूलने के लिए हर बार याद करता है। और हर बार याद करता है तो उसकी याद मजबूत होती चली जाती है।

लेकिन एकता होगी कैसे?

मेरा मानना यह हैएकता की कोई जरूरत नहीं है। कठिनाई क्या है--एकता होनी ही चाहिएइस भ्रांति से भी हम बड़े परेशान हैं। एकता की कोई जरूरत नहीं है। इसलिए वह कभी नहीं होगीजब तक आप एकता करते रहेंगे। असल में एकता करने की बात नहीं है। एकता का होना न होना एक फैक्ट की बात हैऔर फैक्ट किन्हीं और चीजों पर जीता है।
अब जैसे--यदि हम लड़के और लड़कियों को प्रेम की सुविधा दे देंऔर बिना प्रेम के विवाह बंद कर दें तो आपको एकता-एकता चिल्लानी नहीं पड़ेगीएकता हो जाएगी। कोई आपको समझाना नहीं पड़ेगाक्योंकि प्रेम करते वक्त कोई नहीं देखता कि कौन मुसलमान हैंकौन हिंदू हैविवाह करते वक्त देखता है। कौन मुसलमान हैकौन हिंदू हैकौन गुजरातीकोई नहीं देखता है प्रेम करते वक्त। तो एक तो हमें बिना प्रेम के मुल्क में विवाह को समाप्त कर देना चाहिएअगर भविष्य में हमें कोई भी ऐसी स्थिति चाहिए जहां कि अनेकता न हो। और मेरा जोर भिन्न हैमैं एकता पर जोर देना ही नहीं चाहता। मैं यह चाहता हूं अनेकता के कारण क्या हैंवे नहीं होने चाहिए।
पहला अनेकता का कारण जो मुझे दिखता हैकि इस मुल्क में विवाह की जो व्यवस्था हैवह अनेकता का आधारभूत कारण है। यह मिटा दिया जाना चाहिए।। अगर हिंदुस्तान में हिंदू-मुसलमान के बीच शादी चलती होती तो पाकिस्तान बंट नहीं सकता था और अहमदाबाद में दंगा भी नहीं हो सकता था। अगर हिंदू लड़कियां मुसलमान घरों में होंमुसलमान लड़कियां हिंदू घरों में हों तो कौनकिसको काटने जाएगातब न मुसलमान को अलग करना आसान हैन हिंदू को अलग करना आसान है। इसके बिना पॉलिटिक्स लेवल पर एकता नहीं हो सकती।

तो हिंदू-मुस्लिम के बीच रोटी-बेटी का व्यवहार होना चाहिए?

बिलकुल हीहिंदू-मुस्लिम के बीच नहींसबके बीच होना ही चाहिए। असल में जिनके बीच रोटी-बेटी का व्यवहार नहींउनके बीच एकता हो ही नहीं सकती। रोटी-बेटी का व्यवहार रोकने की जो तरकीब हैवह अनेकता पैदा करने की मूल व्यवस्था है।

यूरोप में बहुत से ऐसे नेशंस हैंजहां रोटी-बेटी का व्यवहार हैलेकिन यूरोप ने जितने युद्ध मानवता पर लादे हैंउतने शायद किसी ने नहीं लादे हैं।

उनके युद्धों के कारण बहुत भिन्न हैं। दंगे और युद्ध में बहुत फर्क है। और जिन मुल्कों में दो जातियां के बीच रोटी-बेटी का व्यवहार चलता हैउन मुल्कों में जातीय दंगा नहीं हो सकता है। जैसे चीन है--चीन में आप जातीय दंगा नहीं करवा सकते। कोई उपाय नहीं है। और कोई दंगे नहीं कर रहा! जातीय दंगे नहीं करवा सकते चीन में। उसका कारण है कि कभी-कभी एक-एक घर में पांच-पांच रिलीजन के लोग हैं। दंगा करवाइएगा किससेभड़काइएगा किसकोबाप कंफ्यूशियस को मानता हैपत्नीउसकी मां जो हैलाओत्से को मानती हैबेटा मोहम्मद को मानता हैकोई बुद्धिस्ट है घर मेंएक लड़की है--बहू जो है वह। तो चीन में एक-एक घर में कभी-कभी पांच-पांच धर्म के आदमी भी हैं। इसकी वजह से कनवर्शन नहीं होता। अगर लड़का हिंदू है और पत्नी मुसलमान हैतो पत्नी मुसलमान होना जारी नहीं रख सकती। मेरा मतलब समझे न आपजब एक घर में पांच धर्मों के लोग होंतो आप अलग करवाइएगा कैसेकिसके साथ दंगा करवाइएगाडिमार्केशन मुश्किल हो जाता है। हिंदुस्तान में डिमार्केशन आसान है--यह हिंदू हैयह मुसलमान हैयह साफ मामला है। मुसलमान अगर मरता है तो मेरी न तो पत्नी मरती हैन मेरी बहन मरती हैकोई नहीं मरतामुसलमान मरता है।

आपने बताया था कि राज्य में धर्म होना चाहिए। तो हमारे मुल्क में अभी की परिस्थिति का ध्यान रख कर कौन सा धर्म होना चाहिए?

जब भी मैं धर्म की बात करता हूं तो मैं अनिवार्य रूप से यह कह रहा हूं कि कौन सा धर्मतो धर्म होता ही नहीं। धार्मिकता मेरे लिए एक भीतरी गुण है। उसका किसी संगठनकिसी संस्थाकिसी संप्रदाय से कोई संबंध नहीं है। धार्मिकता को मैं एक इनर क्वालिटी मानता हूं। और धार्मिक आदमी मुसलमान हो नहीं सकता। और धार्मिक आदमी हिंदू भी नहीं हो सकता है। असल में धार्मिक होने की वजह से अड़चन हो जाएगी हिंदू-मुसलमान में। क्योंकि हिंदू और मुसलमान मनुष्यता को तुड़वाते हैं और धार्मिक आदमी किसी से भी टूटा हुआ अनुभव नहीं करता। तो इसलिए धार्मिकता को मैं एक अलग ही क्वालिटी मातना हूंजिसका हिंदू,मुस्लिम और ईसाई से कोई संबंध नहीं है। तो जब मैं धर्म की बात करता हूं तो मेरा मतलब हमेशा रिलीजस क्वालिटी से है। धर्म से मेरा मतलब प्रचलित धर्मों से नहीं है।

आपने बताया था कि अपने देश में अभी ज्यादातर पूंजी नहीं होती है और जब तक पूंजी पैदा न हो तब तक अच्छा नहीं हो सकता देश। तो क्या आपको लगता है कि ज्यादा पूंजी और जल्दी पूंजी पैदा करने के लिए अपने देश में कोई भी ऐसी पोलिटिकल व्यवस्था होनी चाहिएजिसमें हम सबकी पूंजी हो सके। पासिबल। हमारे देश में अभी जो पोलिटिकल स्थिति है,डेमोक्रेसी कीवह ज्यादा पूंजी पैदा करने में और जल्दी पूंजी करने में अनुकूल है?

बिलकुल अनुकूल बनाई जा सकती है। हम उसका उपयोग नहीं कर रहे हैं। असल में सिस्टम का भी तो उपयोग करना पड़ता है! डेमोक्रेसी तो बहुत कीमती सिस्टम हैलेकिन उसका उपयोग करना पड़ता है। आपके पास लाख रुपये की कार हैलेकिन उसको भी चलाने के लिए चलाना पड़ता है।
दो कठिनाइयां हैं--एक कठिनाई यह है कि हिंदुस्तान के पास डेमोक्रेटिक माइंड नहीं है। असल में डेमोक्रेसी उधार चीज है हमारे मुल्क में। हमारे लिए लोकतंत्र बिलकुल उधार है। हिंदुस्तान का पूरा अतीत का चित्र गैर-लोकतांत्रिक हैनॉन-डेमोक्रेटिक है। यहां राजा भगवान रहा है सदा। यहां प्रजा सदा राजा की भक्त रही है। यहां प्रजा ने कभी राजा को हटाने की और राजा की जगह स्वयं राजा बन जाने की कोई कामना प्रकट नहीं की। डेमोक्रेसी मूलतः वेस्टर्न कांटेक्ट है। तो चूंकि लोकतंत्र की धारणा जड़ों में नहीं हैतो ऊपर तो वह आ गई है। हमने उसको लीप-पोत कर इकट्ठा कर दिया हैलेकिन सिस्टम वर्क कर रही है। हमने फैक्ट्री खड़ी कर ली हैलेकिन वह चलती नहीं है।
तो लोकतंत्र हिंदुस्तान में सक्रिय होयह सवाल है। लोकतंत्र जैसी पोलिटिकल सिस्टम बदलेयह सवाल नहीं हैक्योंकि लोकतंत्र से बेहतर तो अब कोई सिस्टम अब तक विकसित नहीं हो सका है। और अगर हम कोई भी सिस्टम दूसरा लाते हैं तो इससे अविकसित होगा। अब लोकतंत्र की वघकग में कठिनाई पड़ रही हैऔर कुछ और भी धारणाएं नुकसान पहुंचा रही हैं। यह मेरा मानना है। गांधी जी की स्वदेशी की एक धारणा भी उसको नुकसान पहुंचा रही है।
सच्चाई तो यह है कि आज अगर हम इस मुल्क को त्वरित टे्रडली मेकनाइज करना चाहते हैंइंडस्ट्रिलाइज करना चाहते हैंतो हमें सारी दुनिया की पूंजी को आमंत्रित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। सारी दुनिया से पूंजी आमंत्रित होनी चाहिए। लेकिन हम मरे जा रहे हैं। हम कहते हैंकहीं हमारा शोषण न हो जाए।
और मजा यह है कि आज शोषण की इस हमारी धारणा ने हमको बहुत नुकसान दिया है। अगर अमरीकी पूंजी आई तो अमेरिका हमारा शोषण कर लेगा! मेरी समझ यह है कि अमरीकी पूंजी अगर हिंदुस्तान में है या अंग्रेजों की पूंजी आती हैकहीं से भी पूंजी आकर हिंदुस्तान में लगती हैतो स्वभावतः वह पूंजी तुम्हारे लिए कोई खैर-खैरात के लिए नहीं लगने वाली है। वे उस पूंजी से फायदा उठाना चाहेंगे। फायदा उठाने की आशा में ही वे पूंजी लगाएंगे। तो हम उनको फायदा पहुंचा सकेंतभी वे पूंजी लगाने वाले हैं। लेकिन उनके फायदे में हमारा नुकसान नहीं हैहमारा फायदा है। अगर अमरीकन पूंजी हिंदुस्तान में लगती है और एक लाख आदमी जो बेकार थेअगर वे काम में लग जाते हैं तो समझ लेंउनसे वे दस रुपये का काम लेते हैंऔर पांच ही रुपया उनको मिलता है और पांच अमेरिका चला जाता है तो भी हमारा कुछ नहीं खो रहा है क्योंकि हमारे दस ही खो रहे थेजब वे एक लाख आदमी बेकार थे।
तो पहली तो मेरी धारणा यह है कि सारी दुनिया से पूंजी आमंत्रित होनी चाहिए। लेकिन यह तभी आमंत्रित हो सकती हैजब पूंजी सुरक्षित हाथों में हो। आप जब तक सोशलिज्म की बकवास करेंगेतब तक दुनिया की पूंजी हिंदुस्तान में नहीं लगाई जा सकतीक्योंकि खतरा यह है कि हिंदुस्तान में लगी पूंजी दुनिया में चली जाएगीबाहरऔर जा रही है। हिंदुस्तान का पूंजीवादी सारी दुनिया के बैंकों में पैसा जमा कर रहा है। क्योंकि आज नहीं कल उसे यहां खतरा हुआ जा रहा है कि पूंजी छिन जाएगी। बिलकुल ही हमें सारी दुनिया की पूंजी को निमंत्रण देकर मुल्क का तीव्रता से औद्योगीकरण कर लेना चाहिए।
दूसरी बात--कि हमने इतनी रोक-टोक लगाई है बाहर की चीजों परउन बाहर की चीजों पर रोक-टोक के कारण जो ठीकस्वस्थ काम्पिटीशन पैदा होना चाहिएवह नहीं पैदा हो रहा है। इसलिए एंबेसेडर जैसी सड़ी गाड़ियांजिसको बैलगाड़ी कहना चाहिएवह बीस और बाईस हजार में बिक रही है। अगर आज सारी दुनिया के लिए बाजार खुला हो तो एंबेसेडर को पांच हजार से ज्यादा में कोई भी खरीदने को राजी नहीं होगा। अब चूंकि वह बाईस हजार में बिक रही हैबीस हजार में बिक रही है तो कोई वजह नहीं है कि उसमें किसी तरह का सुधार हो। कोई सुधार की जरूरत नहीं हैवह पैसा दे रही है। तीनों गाड़ियां हिंदुस्तान कीचाहे एंबेसेडर होचाहे फियट होस्टैंडर्ड हो कोई भी पांच हजार से ज्यादा में नहीं बिक सकती है। अब मेरा मानना यह है कि जब वह पांच हजार में बिकने की हालत में आ जाएंगीतब काम्पिटीशन शुरू होगातब हमें उनमें विकास करना ही होगा।
दूसरी बात यह है कि कुछ संबंधों मेंअगर हम बाहर की पूंजी हिंदुस्तान में बुला लें तो ऐसा नहीं कि हमको लाभ होगाबाहर वालों को भी बहुत लाभ होगा। अब जैसे कि मुझे दिखाई पड़ रहा है कि हमारी सारी की सारी स्मगलिंग हम ही पैदा करवा रहे हैं। पाकिस्तान में सोने के दाम अगर सौ रुपये कम हैं और हमारे यहां सौ रुपये ज्यादा हैं तो स्मगलिंग नहीं होगी तो और क्या होगायह स्वाभाविक है। ब्लैक मार्केटिंग हम करवा रहे हैं। सब चीजों के दाम ज्यादा हो जाएंगेक्योंकि चीजें कम पड़ती हैं। और मुल्क को न तो सस्ते में चीजें मिलती हैंन मुल्क को श्रम करने का मौका मिलता हैन संपत्ति पैदा करने का मौका मिलता है।
आज दुनिया में कोई भी मुल्क अगर त्वरित रूप से विकसित होना चाहे तो उसके बाजार दुनिया भर के लिए खुले होने चाहिए और उन्हें सीधे स्वस्थ काम्पिटीशन में पड़ना चाहिए। मुसीबत पड़ेगी उसमेंलेकिन मुसीबत से विकास हैसारा प्रसार है।

लेकिन उसकी तकलीफ यह रहेगी कि अगर हम कैप्टेलाइज्ड हो जाएंगे तो हमारे देश की सब इकोनॉमिकल पावर चंद पूंजीपतियों के हाथ में रहेगीतो वे लोग गवर्नमेंट पर दबाव ऐसा डालेंगे कि हमारे यहां पर जैसा आप कहते थे कि राज्य के हाथ में सत्ता रहेगीतो इसके बदले में पूंजीपतियों के हाथ में सत्ता रहेगी?
तो कठिनाई क्या हैसत्ता तो सदा ही चंद आदमियों के हाथों में रहेगी ही। इसका कोई उपाय नहीं है। इसलिए चुनाव यह नहीं है कि चंद आदमियों के हाथ में रहेगी। इसका कोई उपाय ही नहीं है। यह तथ्य हैइसमें कोई उपाय नहीं है। इसलिए चुनाव यह नहीं है। जो आल्टरनेटिव हैवह यह है कि सत्ता किन चंद आदमियों के हाथ में रहेसत्ता चंद  आदमियों के हाथ में रहेगीयह हमें समझ लेना चाहिए।
अब सवाल यह है कि इस सत्ता को किन चंद आदमियों के हाथ में देना हैक्या उन्हीं चंद आदमियों के हाथ में देना हैजिन चंद आदमियों के हाथ में राज्य की भी सत्ता हैक्या ये दोनों सत्ताएं एक ही चंद आदमियों के ग्रुप के हाथ में दे देनी है या विभिन्न। एक।
दूसरा--कि यह जो चंद आदमियों के हाथ में सत्ता हैयह परमानेंट रहेगी या एक लिक्विडिटी की हालत में होगीबदलती हुई हालत में होगी ये दो सवाल हैं।
मेरा मानना है कि पूंजीवाद या पूंजीपति बदलती हुई व्यवस्था है। अगर आज हम गौर से देखें तो आज से तीस साल पहले अमेरिका में जो बड़े पूंजीपति थेआज वे ही परिवार बड़े पूंजीपति नहीं है। दूसरे परिवार भी उसी जगह आ गए हैं।

हमारे यहां तो टाटा और बिड़ला बने हुए हैं।

उसका कारण है। उसका कारण यह है कि पूंजीवाद को हम विकसित नहीं होने दे रहे हैं। विकसित होने देंतो यह रोज बदलता रहेगा। इसमें बदलाहट रोज हो जाएगी।

अमेरिका का एग्जांपल आप क्यों ले रहे हैं?

अमरीकन पूंजीवाद अकेला पूंजीवाद का सबूत है। हम कोई पूंजीवादी मुल्क नहीं हैं। इसलिए उदाहरण अमेरिका का इसलिए ले रहा हूं कि उसने पूंजीवाद को एक तरह से विकसित किया है। बीस साल पहले जो आदमी थाबीस साल बाद आपको पता नहीं चलेगा कि कहां गया। नये लोग आ गए हैं। असल में पूंजीवाद एक लिक्विड सिस्टम है वहां?

लेकिन रॉकफेलर अभी तक है।

ठीक हैइसके कारण हैं। आज रॉकफेलर रहेगालेकिन रॉकफेलर उसी हालत में नहीं हैजैसा अनचैलेंज्ड आज से बीस साल पहले था। आज रॉकफेलर अनचैलेंज्ड नहीं है। रॉकफेलर अकेला रॉकफेलर हैऐसा नहीं है। आज पच्चीस रॉकफेलर खड़े हो गए हैं। अब हमको जो नाम याद रहते हैंवे पच्चीस साल पहले के हैं। स्वभावतः क्योंकि यह खयाल तो बनता है वह पच्चीस साल,तीस साल पुराना होता है। आज कौन आदमी अमेरिका में सबसे बड़ा ताकतवर हैपच्चीस साल लग जाएंगे दुनिया भर में उसके नाम को पहुंचने मेंतब तक वह ताकतवर नहीं रह जाएगा।
पूंजीवाद जो हैवह लिक्विड सिस्टम है। उसमें पूरे वक्त उतार-चढ़ाव हो रहे हैंक्योंकि उसमें एक नेचुरली काम्पिटीशन हैजो चल रहा है। फिर जब हम आज रॉकफेलर कहते हैं या मार्टिन कहते हैंया फोर्ड कहते हैंतो ये सिर्फ नाम रह गए हैं। इनकी सारी संपत्ति शेयर होल्डर्स की है। अगर हम बहुत गौर से देखें तो ये सिर्फ नाम हैंजिनकी क्रेडिट है। यह भी हो सकता है कि फोर्ड की कंपनी में फोर्ड के शेयर ज्यादा हैंलेकिन सारे मुल्क के शेयर हैं। तो धीरे-धीरे अमेरिका में जो हैअपने आप एक ग्रेटर शेयरिंग होता जा रहा हैजिसमें नाम प्रतीक भर रह गए हैंऔर उनका कोई मतलब नहीं रह गया। फोर्ड के नाम का मूल्य है। आज नई कार चलाइए तो उसका उतना मूल्य नहीं होगाउसको काम्पिटीशन में खड़ा होना पड़ेगा। फोर्ड के नाम की इज्जत है,कार फोर्ड के नाम से चलेगी। फोर्ड की कंपनी को भी मेनेज करने वाले लोग रोज बदलते जा रहे हैं और फोर्ड की कंपनी के डायरेक्टर्स भी रोज बदलते जा रहे हैं। मालकियत रोज घूम रही है हाथों मेंलेकिन वहां मालकियत स्थिर नहीं है। हिंदुस्तान में स्थिर हैक्योंकि काम्पिटीशन नहीं है। और हिंदुस्तान के टाटाबिड़ला और डालमियासाहू या कोई और स्थिर हैं।

अमेरिका के आयुध के कंट्रेक्टरों ने और आयुध कंपनी के मालिकों ने सेकेंड वर्ल्ड-वॉर करवाई है?

यह जो हमारा खयाल हैयह बहुत जटिल मामला है। यह इतना आसान नहीं है कि हम एक कॉज को पकड़ कर उनको बता दें। यह बहुत जटिल मामला है और एक नहीं हजार कारण हैं। और मजा तो यह है कि जैसा आदमी है अभीअगर कोई भी कारण न हो--तो इसलिए लड़ना शुरू होता गया कि अब कोई भी कारण नहीं है। आदमी की जो स्थिति हैवह स्थिति लड़ने के लिए बहुत ही पुनरुक्त है। और हजार कारण हैंकोई एक कारण नहीं है उसमें। उसमें पूंजीपति का हाथ हैउसमें मजदूर का हाथ है,उसमें राजनीतिज्ञ का हाथ हैउसमें महात्मा का हाथ हैउसमें फोर्ड का हाथ हैउसमें हम सबके हाथ हैं। असल में मेरे हिसाब से वॉर जो हैवह मनुष्य के टोटल-माइंड से पैदा होती है। वह कोई एक कारण से नहीं है।

आप जो कंपेरिजन दे रहे हैंखास करके आप सोशलिज्म वर्ड भी इस्तेमाल कर रहे हैंलेकिन मेरे खयाल से जो आप उदाहरण दे रहे हैंवह जो भारतीय करते हैंवह कम्युनिस्ट सोसाइटी के लिए ठीक होता?

बड़े मजे की बात यह है। असल में सोशलिज्मकम्युनिस्ट शब्द धीरे-धीरे बदनाम हो गया। और कम्युनिस्ट शब्द ने धीरे-धीरे एक तरह का कनोटेशन ले लिया हैइसलिए कम्युनिज्म भी सोशलिज्म की भाषा बोल रहा है। वह सिर्फ डाइल्यूट कम्युनिज्म है,और कुछ भी नहीं है। अगर इसको बहुत गौर से देखें तो मजा यह है--अब जैसे कि यू.एस.आर. हैवे भी सोशलिस्ट शब्द का उपयोग कर रहे हैं अपने मुल्क के लिए और मैं समझता हूं कि कम्युनिस्ट शब्द उपयोग नहीं कर रहे हैं--यूनियन ऑफ सोशलिस्टिक रिपब्लिकंस। वह भी कम्युनिज्म का उपयोग नहीं कर रहे हैंवह भी सोशलिस्ट हैं! हिटलर थावह भी नेशनलिस्ट,सोशलिस्ट-पार्टी थी। वह भी सोशलिस्ट है। इंग्लैंड की लेबर पार्टी भी सोशलिस्ट हैस्कैंडेनेवियन भी सोशलिस्ट हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि जब एक शब्द बहुत कीमत का मालूम पड़ने लगता है तो हजार लोग उसका उपयोग करने लगते हैं और हजार फेड हो जाते हैं।
लेकिन इंग्लैंड सोशलिस्ट नहीं था लेबर पार्टी के नीचे। वह मिक्स्ड इकोनॉमी है। न स्कैंडेनेविया सोशलिस्ट हैवह भी मिक्स्ड इकोनॉमी है। आज अमेरिका सोशलिस्ट शब्द का उपयोग करने लगे तो बस एकदम शब्द ठीक हो जाएगा। लेकिन अमेरिका भी मिक्स्ड इकोनॉमी है। असल में कैपिटलिज्म शब्द का उपयोग करना भी ठीक नहीं है बहुत। क्योंकि जितनी कैपिटलिस्ट कंट्रीज हैंवे सब मिक्स्ड इकोनॉमी हैं। मिक्स्ड इकोनॉमी जहां भी हैउसको मैं कैपिटलिस्ट कहता हूं। और जहां अनमिक्स्ड इकोनॉमी हैऔर बेसिकली उन्होंने जहां पर पूंजीपति को खतम किया हैउनको मैं सोशलिस्ट कह रहा हूं। और जब कोई बात करनी हो तो पच्चीस शेप की अगर हम बात करें तो बात करनी बेमानी हो जाती है।
तो मेरे लिए डिमार्केशन साफ है। कैपिटलिस्ट कंट्री मैं उसको कह रहा हूं कि जिस समाज या शासन व्यवस्था में शासन ने सारी ओनरशिप नहीं ले ली हैने लेने की इच्छा रखता है और जहां व्यक्तिगत पूंजी के लिए स्वतंत्रता हैउसके फैलाव का उपाय है। जहां राज्य मालिक नहीं बन गया हैइंडिविजुअल ओनर्स हैं। राज्य ओनर नहीं है। और सोशलिस्ट शब्द मैं उसके लिए कह रहा हूं जहां स्टेट ने ओनरशिप ले ली हैलेने की कोशिश में हैया लेने की योजना बना रखी हैवह सारी ओनरशिप ले लेगी। शेप तो पच्चीस हैंलेकिन पच्चीस शेप सिर्फ कंफ्यूज करते हैं और कुछ भी नहीं करते। और जब हमें कोई बात साफ हो तो हमें दो सेट साफ बांट लेने चाहिए। ब्लैक-व्हाइट को सीधा हम बांट लें तो ही चर्चा हो सकती है। अगर हम एक ही बात करें तो चर्चा मुश्किल हो जाती है। कैपिटलिज्म के भी सेट्स हैं।

क्या आप ऐसा नहीं समझते कि, "स्टेट मस्ट बी डिजाल्व अवे'?

स्टेट जो हैवह मैं आशा करता हूं कि एक वक्त आना चाहिए जो धीरे-धीरे क्षीण होती जाए। लेकिन ऐसा मैं नहीं सोच पाता कि कभी ऐसा वक्त आएगा कि स्टेट विदर अवे हो जाएगी। स्टेट के फंक्शंस बदलते जाएंगेलेकिन स्टेट रहेगी। क्योंकि स्टेट जो है,उसके कुछ बुनियादी फंक्शंस हैंजो कभी भी समाप्त नहीं किए जा सकते। स्टेट विदर अवे हो सकती है एक ही अर्थ में--वह यहइस अर्थ में कि अगर तीसरा महायुद्ध हो जाए और हमारे जीवन की सारी कांप्लेक्सिटी खतम हो जाएं और हम आदिवासी की हालत में आ जाएं तो स्टेट विदर अवे हो सकती हैक्योंकि तब स्टेट का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। स्टेट को एक कांप्लेक्स सोसाइटी की जरूरत है। अब जब पचास करोड़ आदमी एक मुल्क में रह रहे हैं तो बिना स्टेट के काम नहीं चल सकता। लेकिन मेरी अपनी समझ यह है कि एज़ ए पॉलिटिकल बॉडीवह धीरे-धीरे कमजोर होती जानी चाहिए। एज़ ए फंक्शनल बॉडीवह धीरे-धीरे मजबूत होती जानी चाहिए।
अब जैसे रेलवे है या पोस्ट ऑफिस हैअब ये स्टेट के फंक्शंस रहेंगे। या पुलिस हैस्टेट का फंक्शन रहेगा। किसी दिन मिलिटरी भी खतम हो सकती हैअगर नेशंस खतम हो जाएं। लेकिन पुलिस खतम नहीं हो सकती है। पुलिस को तो स्टेट को रखना ही पड़ेगा और वह भी इंटर-इंडिविजुअल रिलेशनशिप का मामला है। कोई आदमी किसी औरत को लेकर भागता ही रहेगा। मैं नहीं सोचता कि ऐसा कोई वक्त आ जाएगा कि पड़ोसी की औरत पसंद नहीं पड़ेगी। आशा हम कर सकते हैं। आशा हम कर सकते हैं कि स्टेट का फंक्शन धीरे-धीरे क्षीण होता जाएबट इन ए एब्सल्यूट सेंसस्टेट कैन नाट बी आउट ऑफ एक्झिस्टेंस। एज़ ए लेसर इवललेस एंड लेस फंक्शनल इतना ही होगा और यह होना चाहिए।

आपने ध्यान के लिए साधकों को जो कुछ सूचनाएं दी थीं बदन को थका देने की। कुछ लोग ध्यान की ऐसी शिक्षा देते हैं कि वहां बदन को थकान नहीं आती है। और विचार के मूल में जाएंगे तो अपने ध्यान में आ जाएंगे। क्या यह काम जरूरी है?

बिलकुल ही जरूरी है। उसके कारण हैं। यानी जैसे आप हैंतो आपकी जो मौजूदा मन की स्थिति में ध्यान के विपरीत बहुत से एलिमेंटस मौजूद हैं। जैसे एंजायटी मौजूद हैटेंशंस मौजूद हैंसप्रेशंस मौजूद हैंइन्हीबीशंस मौजूद रहती है। इनकी मौजूदगी आपको विचार के मूल बिंदु तक नहीं जाने देगी। इनकी मौजूदगी परे वक्त इनर डिस्टर्बेंस पैदा करती रहेगी। आप सब कोशिश करेंगेलेकिन बीच-बीच में कि हम नहीं करेंगेऔर इसलिए यह वर्षों और जीवन की लंबी यात्रा होगीजिसमें कि आप आशा नहीं रख सकते कि इसी जन्म में ध्यान हो जाएगा। मैं जो कर रहा हूं उसमें दोहरी प्रोसेस है। पहली प्रोसेस कैथार्सिस की है। पहली प्रोसेस जो तीस मिनट की हैउसमें आपमें जो भी इनर हिंड्रेंसेज संभव हैंउसको अलग करने की कोशिश करें। ध्यान की अभी हम फिक्र ही नहीं कर रहे हैं। यानी मामला ऐसा है कि घास उगी हैमैंने जाकर बीज फेंक दिया। एक तो यह स्थिति है और बहुत संभावना है कि घास बीज को पचा जाए। और दूसरी स्थिति है कि पहले हम घास साफ करते हैंजमीन साफ करते हैंफिर जड़ें उखाड़ कर फेंक देते हैंजमीन तैयार कर देते हैंबीज डाल देते हैं।
तो मेरा मानना है कि जैसी मौजूदा आपकी हालत है। बिलकुल ऐसी ही जमीन की हैजिसमें घास हजारों साल से चल रहा है। इसमें बीज फेंकना बेमानी है और सिर्फ नासमझ माली होने की खबर देता है। इसकी सफाई बहुत जरूरी है। इसीलिए मैं सीधा शुरू करना पसंद नहीं करता। पहली प्रोसेस रेचन की हैकैथार्सिस की है। उसमें तीन चरणों में आपको सब तरह से हलकेशांत होकर हिंडें्रसेज को तोड़ डालना है। और जब एक दफा आप हलके और शांत हो गए तो आप तत्काल पाते हैं कि आपका प्रवेश हो गया। उसे करना नहीं पड़ता। और दूसरी जितनी प्रक्रियाएं हैंउनमें आपको प्रवेश करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में प्रवेश होगा। चौथी जो स्टेज हैदिस इज़ नॉट ए स्टेपदिस इज़ ए हैपनिंग। तीन काम आपको करना होगाचौथा होगा।
और मैं मानता हूंजो ध्यान आप करेंगेवह आपसे ज्यादा कीमती नहीं हो सकता है। जो ध्यान आप लाएंगेवह आप ही लाएंगे नआपका माइंडआपकी कंडीशनिंगआपआपकी सब बीमारियांरोगचिंताएंवेग। जिस मेडिटेशन को आप लाएंगेवह बहुत कीमती नहीं हो सकतावह आपकी ही बाइ-प्रॉडक्ट होगा। तो मैं उस मेडिटेशन की कीमत मानता हूं जो आता है आपके ऊपर। आप तो सिर्फ ओपनिंग में होते हैं। आपका कोई एफर्ट नहीं है।
जो तीन एफर्ट हैंवे सिर्फ सफाई के हैंनिगेटिव हैं। पाजिटिव एफर्ट आपको करना नहीं है। वह होगा। और इसलिए बेसिकली फर्क है उनमें। और उस प्रोसेस में तो कई जन्म लग जाएंफिर भी पक्का नहीं है। बड़ी कठिनाई यही है। अब जैसे महेश जी का जो मामला हैजिसे वे ध्यान कह रहे हैंवह ध्यान नहीं है। वह सिर्फ जप है। तो उसका परिणाम जो हैवह ज्यादा से ज्यादा तंद्रा का हैवह ऑटो हिप्नोसिस हैउससे ज्यादा नहीं है। अगर आप एक शब्द को बोलना शुरू करते हैं रिपीटेटिवलीतो वह आपके भीतर एक तरह की हिप्नोसिस पैदा करता है। वह ट्रांजिटरी नीड है। मेरा जो प्रयोग है इसमेंऔर उनके प्रयोग में अगर हम फर्क करें तो उनका प्रयोग जस्ट लाइक ए ट्रेंक्वेलाइजरऔर मैं जिसे कह रहा हूंजस्ट लाइक एन एक्टिवाइजर हैक्योंकि मेरे प्रयोग में तो आप हिप्नोसिस में तो जा नहीं सकतेक्योंकि इतनी एक्टिव प्रोसेस है कि बेहोश तो हो नहीं सकतेनींद आ नहीं सकती। इतनी गहरी श्वास ली हैइतना शरीर नाचा और कूदा है और इतने जोर से आपने "मैं कौन हूंपूछा हैयह इतनी एक्टिव प्रोसेस है कि इसमें तंद्रा नहीं आ सकती।
बड़े मजे की बात है यह जो थकान है नटेंशन की थकान है। और जब आप पूरे टेंस हो जाते हैं--पूरे टेंस हो जाते हैं और पूरे टेंशन से वापस रिलैग्जेशन में लौटते हैंवह तो लौटेंगे ही। तो यह जो वापस लौटती हैइतनी फ्रेशनेस से भरी होती हैजिसका कोई हिसाब लगाना मुश्किल है। क्योंकि इसके पहले पूरी एक्टिविटी है। जैसे आप बहुत खेल कर थक तो जरूर जाते हैंलेकिन फ्रेश हो जाते हैं।

यह ध्यान की स्थिति हिप्नोसिस से आगे की है कि पीछे की?

बहुत आगे की है।

आपने कहा कि जो लोग सोशलिज्म की बात कर रहे हैंवे लोग अपने देशवासियों को एक आधार दे रहे हैं कि कुछ होगाकुछ होगा। अपना मतलब निकाल लेते हैंमगर व्यावहारिक भूमिका पर देखें तो नेशनलाइजेशन और जो भी हमारा ट्रेड और कामर्स गवर्नमेंट ले लेती हैंउसके बारे में रिजल्ट से फायदा होता है।

मेरी समझ में ऐसा नहीं होता है। मेरी समझ में ऐसा है कि राज्य के हाथ में व्यापार-वाणिज्य आ जाए तो राज्य के हाथ में दोहरी शक्तियां हो जाती हैं और राज्य के डेमोक्रेसी से हट कर डिक्टेटोरियल हो जाने की संभावना बन जाती है। क्योंकि राज्य के हाथ में सब है--राज्य की ताकत तो है हीधन की भी है और दो ही ताकतें हैं। अगर राज्य के हाथ में सेंट्रलाइजेशन हो जाए,देश की सभी ताकतें हों तो अपने आप तानाशाही बैठने लगती है। और जितनी बड़ी मात्रा में तानाशाही बैठती हैउतनी बड़ी मात्रा में व्यक्तिगत स्वतंत्रता चिंतन कीविचार कीअभिव्यक्ति की वह सब कम होने लगती है। तानाशाही पहले तो भली मालूम पड़ेगी। जिसको बैंक से लोन नहीं मिलता--लेकिन यह तो बिना राज्य के लिए भी हो सकता है। यह तो राज्य नियमन कर सकता हैकि बैंक जनता को इस भांति लोन दे। इसके लिए नेशनलाइजेशन जरूरी नहीं है। यह जनता के लिए अधिक सुविधाएं मिलेंइंडस्ट्रीज को ज्यादा सुविधाएं मिलेंमजदूर को ज्यादा वेलफेयर मिले यह तो राज्य नियमन कर सकता है और इस नियम को लागू किया जा रहा है या नहीं किया जा रहा हैइसकी चिंता कर सकता है। लेकिन इसके लिए स्वयं राज्य को सारी सत्ता हाथ में देने की कोई जरूरत नहीं है।
टे्रफिक पर एक आदमी खड़ा किया हुआ है रास्ते पर। वह इसलिए खड़ा किया हुआ हैवह देखे कि कारें बाएं से गुजरती हैं कि नहीं गुजरती हैं। इसलिए टे्रफिक के आदमी को सब कारों की मालकियत देने की जरूरत नहीं है। और उसे देखना चाहिए कि कौन आदमी गुजर रहा है ठीक सेकौन नहीं गुजर रहा हैलेकिन फिर भी वह इन सारे लोगों की सुविधा के लिए वहां है। वह इनका मालिक होने के लिए वहां नहीं है कि कल वह धीरे-धीरे कहने लगे कि चूंकि गड़बड़ होती है बहुतइसलिए सब कारों की मालकियत मैं लिए लेता हूंसब आदमियों की मालकियत मैं ले लेता हूं। अब कोई गड़बड़ न होगीक्योंकि मालिक भी मैं हूं,टे्रफिक का आदमी भी मैं हूं।
राज्य का फंक्शन ही यह है कि राज्य का प्रत्येक व्यक्ति जो कर रहा हैवहां उसे स्वतंत्रता से कर सकेलेकिन वह किसी को नुकसान न पहुंचा सकेइसके लिए राज्य का निर्माण है। लेकिन धीरे-धीरे राज्य सब एब्जार्ब करना चाहता है और वह कहता है कि नहीं तुम जो करते होवह भी हम करेंगेतुम जो कमाते होवह हम कमाएंगे। बीच का जो मध्यस्थ हैउसको अलग करके हम ही सीधी ओनरशिप ले लेते हैं।
इसलिए सोशलिज्म का गहरा मतलब तो स्टेट कैपिटलिज्म ही होता है कोई और मतलब होता नहीं। सोशलिज्म का मतलब यह नहीं होता कि सोसाइटी की संपत्ति होगी। सोशलिज्म का मतलब होगास्टेट की संपत्ति होगी। सोसाइटी है कहांसोसाइटी ने नाम पर स्टेट मालकियत ले लेती है। तो एक दफा अर्थ का तंत्र राज्य के हाथ में चला जाए तो देश की सारी संभावनाएं स्वतंत्रता कीलोकतंत्र कीलोकतंत्र की सब समाप्त होती हैं। फिर राज्य जिनके हाथ में हैउनको हटाने का उपाय कठिन हो जाता है।
दूसरे मजे की बात है किजैसे ही व्यक्तिगत संपत्ति छिन जाएवैसे हीउसी दिन आपके भीतर से कोई निन्यानबे प्रतिशत शक्ति छिन जाती है। और आपके भीतर से व्यक्तित्व भी छिनता है। धीरे-धीरे मुल्क एक आटोमेटाएक यंत्रों का समूह रह जाता है। उसको खाना भी मिलता हैकपड़े भी मिलते हैंकाम भी मिलता हैलेकिन उसकी आत्माउसका व्यक्तित्ववह सब का सब छिन जाता है। तो मैं मानता हूं कि अंततः तो नुकसान है। तो नुकसान जब पहुंचाना होगा तो थोड़े बहुत फायदे भी पहुंचाने पड़ते हैं। एकदम से आप नुकसान नहीं पहुंचा सकते। क्योंकि मछली को अगर कांटे में फंसाना हो तो आटा लगाना ही पड़ता है। कांटे का यही फायदा है।

मैं सवाल यह कर रहा था कि नेशनलाइजेशन के बारे मेंकि अभी अपने देश में बड़ी संख्या में गरीब लोग हैं। क्या उनको तात्कालिक कोई भी राहत नहीं दे सकते हैं हमयदि दे सकते हैं तो किस तरह दे सकते हैं?

तात्कालिक राहत दी जा सकती है। दो-चार बातों का खयाल करना पड़े--एक तोजनसंख्या कुछ सख्ती से रोक देना पड़ेबढ़ती जनसंख्या को। नहीं तो हम कोई भी सहायता पहुंचेगी नहीं। और हम कितना ही इंतजाम करेंहम जितना करेंगेलोग उससे सदा ज्यादा हो जाएंगे और तकलीफ वही रहेगी बढ़ती जाएगी। तो एक तो जनसंख्या इस समय सबसे बड़ा सवाल है। और इन जनसंख्या को जितनी ताकत से हम रोक सकेंउसको रोकना चाहिए। सब तरफ से हमले करने चाहिए।
जैसे मेरा मानना है कि इसको स्वेच्छा पर नहीं छोड़ना उपाय है। स्वेच्छा से नहीं छोड़ा जा सकता है। यह कंपलसरी होना चाहिए। यह वैसे की कंपलसरी होना चाहिएजैसे चोरी न करने को हम कंपलसरी रोकते हैं। डाका न डालने को कंपलसरी रोकते हैं। सारा उपयोग करना पड़ेगा हमेंहमें सारा उपयोग करना पड़े। यह तो अनिवार्य हो जाना चाहिए। दूसराजो लोग भी दंडित होते हैंजिनको इस किसी तरह का दंड देते हैंउनके दंड के साथ यह अनिवार्य रूप से होना चाहिए। एक आदमी को हम छह महीने की सजा देते हैंतो अनिवार्य रूप से उसका पालन होना चाहिए। हमारे जेल से तो एक आदमी बाहर नहीं आना चाहिए।
यह एक तो पहला प्रिवेंशन हो कि हम जनसंख्या को रोकने की कोशिश करें। दूसरी बात है कि मुल्क के पास बहुत से साधन हैं जो अभी अनएक्सप्लाइटिड हैं। मिसाल के तौर पर समुद्र है। समुद्र से बहुत सा भोजन निकाला जा सकता है। तो अब जमीन की ही फिक्र करते हैं तो हम भूल में पड़ेंगे और हम जमीन को ही खाद डालते हैं तो कुछ होने वाला नहीं है। असल में जमीन की ताकत चुक गई है। हिंदुस्तान ने जमीन को वापस कुछ नहीं दिया है हजारों साल तकइसलिए जमीन की ताकत चुक गई है। जमीन पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। हमें समुद्र से फिक्र करनी पड़ेहमें हवा से फिक्र करनी पड़ेहमें सूरज की किरणों से फिक्र करनी पड़े और हमें सिंथेटिक फूड की फिक्र करनी पड़ेजो सबसे बड़ी जरूरत है। जब तक हम सिंथेटिक फूड की फिक्र करनी पड़ेजो सबसे बड़ी जरूरत है। जब तक हम सिंथेटिक फूड की फिक्र न करेंतब तक हम शायद कोई मामला हल न कर पाएं। बजाय इसके कि हम रोटी देने की फिक्र करेंहमें गोली देने की फिक्र न करेंतब तक हम शायद कोई मामला हल न कर पाएं। बजाय इसके कि हम रोटी देने की फिक्र करेंहमें गोली देने की फिक्र करनी पड़े। और गोली ही अब इस मुल्क को बचा सकती है। भोजन नहीं बचा सकता है। तो हमें भोजन की आदतें छोड़नी पड़ेंतो हमें गोली की आदत पर निर्भर होना पड़े।

आप समुद्र से जो भोजन की व्यवस्था की बात कर रहे हैंतो जैन धर्म हैवैष्णव धर्म है और बुद्ध धर्म हैवे लोग तो मांस के विरुद्ध हैं?

नहीं-नहींमैं मांस की बात नहीं कर रहा हूं। असल में समुद्र के पानी में बहुत तत्व हैंजो भोजन बनाए जा सकते हैंजिन पर काफी काम चल रहा है।

बड़ा महंगा होगा?

इतना महंगा नहीं है कि जितना महंगा इतने लोगों का भूखों मरना है। और इतना महंगा भी नहींजितना हम जमीन पर ही कोशिश करके कर रहे हैं। असल में मेरा कहना यह है कि हमारा माइंड डायवर्ट होना चाहिएहम सिर्फ भोजन की ही फिक्र में लगे रहें कि उत्पादन बढ़ाएंट्रेक्टर लाएंफर्टिलाइजर डालेंइससे अब कोई बहुत हल होने वाला नहीं है। जमीन बड़ी चुकी हुई और चूसी हुई है हमारी।

हमारी सरकार ने समुद्र से भोजन निकालने के लिए नॉन-वेजिटेरिअन फूड तो सबके लिए निकाले हैं।

मैं तो उसके भी पक्ष में हूंवह तो निकालें ही। मैं उनके विपक्ष में नहीं हूंक्योंकि मेरे सामने सवाल ये नहीं हैं। मेरे सामने सवाल यह है कि मछली बचे कि आदमी बचे। बड़ा सवाल यह है नहीं कि हिंसा और अहिंसा--बड़ा सवाल यह है कि कम हिंसा या ज्यादा हिंसा। जिंदगी में जो सवाल हैंवह रिलेटिव हैं। एब्सल्यूट सवाल होते ही नहीं। इसलिए जो जैन मुनि यह कह रहा है कि मछली को मत मारोवह कह रहा है कि आदमी को मारो। और मेरे सामने सवाल अगर मछली और आदमी बचाने का है,अगर गेहूं मिलते हों तो मैं मछली बचाने को राजी हूं। लेकिन अगर आल्टरनेटिव मछली और आदमी में बचाने का है तो मैं मछली को मारूंगा। तो मैं तो कहता हूंमछली खाएंमांस खाएं। मैं यह कह रहा हूंआदमी मरेगा अगर नहीं खाते हैं। और जो कह रहा है कि मत खाओवह आदमी को मारने के लिए जिम्मेदार होगा वह बड़ी हिंसा कर रहा है। इसलिए इस वक्त जैन साधु या बौद्ध भिक्षु जो समझाते होंया गांधीजी के अनुयायी अगर समझाते हों कि मांसाहार मत करो तो वह आदमी को मारने की तैयारी करवा रहे हैंतो हमें दिखाई नहीं पड़ रहा है। मछली बच जाएगीआदमी मर जाएगा। और तब हिंसा बड़ी होगी या छोटी होगीयह हमें सोच लेना चाहिए।
तो मेरे लिए जिंदगी में सवाल हमेशा रिलेटिव है। सवाल यह नहीं है कि हिंसा और अहिंसासवाल यह है कि कम हिंसा या ज्यादा हिंसा। हमेशा ऐसा ही सवाल है। तो मैं सदा कम हिंसा के लिए राजी हूं और आदमी को बचाना ही कम हिंसा है। मछली को बचाना ज्यादा हिंसा है। इसलिए यह जो चुनाव है मेरे लिए रिलेटिव है और मैं इसके लिए तैयार हूं कि मछलियां पैदा करें बड़े पैमाने परखाएं भी बड़े पैमाने पर। हांजरूर हम बात की प्रतीक्षा करें कि हम एक नेसेसरी ईविल कर रहे हैं--मछली को तो भी मार रहे हैं--तो कल हम एक इंतजाम कर लेंजिसमें मछली को मारना जरूरी न रह जाए। लेकिन जब तक वह इंतजाम न होगातब तक आदमी को तो बचा लें अंत में इंतजाम तो यही हो कि मछलियां न मारी जा सकें।
बहुत से अनएक्सप्लाइटिड सोर्सेस की हमें फिक्र लेनी चाहिए। और दूसरी सिंथेटिक फूड की हमें सबसे ज्यादा चिंता लेनी चाहिए।

और इकोनॉमी इकोनॉमिक सिस्टम के बारे में क्या करें?

इकोनॉमिक सिस्टम मेरे लिए कैपिटलिज्म ही उचित मालूम पड़ता है अभी। तो सौ वर्ष इस मुल्क को ठीक ढंग से कैपिटलिज्म की तरफ ले जाने की फिक्र करनी चाहिएऔर वह फिक्र हो सकती है। असल में लोग अभी भी सामंतवादी हैं। अभी भी सामंतवादी राजा नहीं हैलेकिन सामंतवादी स्ट्रक्चर है मुल्क का आज। आज भी गांव का आदमी उसी ढंग से जी रहा हैजो हजार साल पहले जीता था। वह सिर्फ स्ट्रक्चर सामंतवादी का था। सामंतवादी स्ट्रक्चर जीता है कृषि परपूंजीवादी जीता है उद्योग पर। और हमें कृषि से शिफ्ट करना पड़े उद्योग की तरफ। और हमें कृषि का भी औद्योगीकरण करना पड़े। इसलिए मैं सिंथेटिक फूड की बात कर रहा हूं। मैं कह रहा हूंहम उसे खेत में न पैदा करेंफैक्टरी में पैदा करें। उसको हम जितने जल्दी ला सकेंले आएं।
चौथी बात समझने जैसी हैवह यह है कि हम लंबी योजनाएं बना रहे हैंवे लंबी योजनाएं जो पांच या दस-बीस साल में सक्रिय होंशायद दस-बीस साल में मुल्क इतने प्रॉब्लम बना लेगा कि वह कभी सक्रिय नहीं हो पाएंगी या सक्रिय भी होंगी तो मुल्क इतनी बड़ी जनसंख्या पैदा कर लेगा कि मामला वहीं  का वहीं रह जाएगाउससे कुछ हल नहीं होगा। तो इस वक्त मुल्क को बड़ी योजनाओं मेंआगे कीभविष्य की योजनाओं में सक्रिय करने की बजाय इमिजिएट योजनाओं में सक्रियता लाने की फिक्र करनी चाहिए। पांच साल की नहींपंद्रह दिन वाली योजना में सक्रियता लाने की फिक्र करनी चाहिए। चार-पांच साल में हमें पचास योजनाएं बनानी पड़ेंगी। और पंद्रह दिन वाली योजना में सक्रियता लाने की फिक्र करनी चाहिए। चार-पांच साल में हमें पचास योजनाएं बनानी पड़ेंगी। और पंद्रह दिन की योजना ही इस मुल्क को इनसेंटिव दे सकती है। क्योंकि इस मुल्क की लिथार्जी इतनी गहरी है कि पांच साल तक की हम सोच ही नहीं पाते।

अब जैसे--गांव में अगर हम कोई काम पांच साल या पच्चीस साल आगे की योजना के खयाल से कर रहे हैं। पच्चीस साल बाद फायदा होगानिश्चित फायदा होगा। लेकिन गांव को जरूरत आज है। तो बजाय इसके कि आप पच्चीस साल बाद जो फैक्ट्री काम करेगीउसको बनाएंपंद्रह दिन बाद जो फैक्ट्री काम कर सकेगीउसको बनाने की फिक्र करें और लांग टर्म योजनाएं जो हैंउनको सेकेंड्री इंपोर्टेंस दें। शार्ट टर्म योजनाओं को प्राइमरी इंपोर्टेंस दें।

इसीलिए गांधीजी ने कहा था कि तुम तकली चलाओ और कल की रोटी कल पैदा कर लो।

गांधीजी की तकली चलाने का जो मामला है नतकली चलाने के साथ मजा यह है कि जितनी देर में तकली चलाई जाती है,उतनी देर में शॉर्ट टर्म योजना बहुत रुपया पैदा कर सकती है। गांधीजी तो यंत्र विरोधी व्यक्ति हैं। मैं नहीं कहता कि तकली मत चलाओमैं नहीं कहता। कुछ भी कहीं कर सकते हो तो तकली चलाओ। यह मैं कभी नहीं कहता कि तकली मत चलाओ। लेकिन तकली चलाने को जिंदगी का सेंट्रल फोर्स अगर बनाने की कोशिश की जाएऔर गांधीजी वही कोशिश कर रहे हैं। उनका सारा अर्थशास्त्र तकली के आस-पास केंद्रित है। उसके मैं खिलाफ हूं। मैं कहता हूं आदमी फुर्सत में बैठा हैताश खेलने की बजाय तकली चलाए तो बेहतर है। लेकिन आप एक आदमी के तकली चलाने को उसकी इकोनॉमी का केंद्र बना रहे हों तो आप खतरनाक बातें कर रहे हैं। आप उस आदमी को मार डालेंगेगरीबी में डाल देंगे।
हमें छोटे यंत्र विकसित करने चाहिए। हम छोटे यंत्र विकसित कर सकते हैं। अब कोई जरूरत नहीं कि आदमी तकली हाथ से चलाए। छोटा करघा हो सकता है जो बिजली से चले। आदमी देख-रेख करे और जितने दिन में तकली चला कर अपने लिए पैदा करता हैउतने दिन में पांच हजार के लिए पैदा करे। इस मुल्क के लिए जापान और इजरायल की तरह ध्यान देना चाहिए। जो यंत्र विरोधी नहीं हैंलेकिन छोटे यंत्रों में बड़ी गति कर रहे हैं। इस मुल्क को अमेरिका की तरफ ध्यान देने से थोड़ा सावधान रहना चाहिएयंत्रों का जहां तक संबंध है। पचास साल बाद हम अमेरिका के यंत्रों का ठीक से उपयोग कर सकेंगे। आज हमें फिक्र करनी चाहिए उन मुल्कों की जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं हैलेकिन फिर भी जो यंत्र पक्षपाती हैं और वे यंत्रों के प्रयोग सेछोटे यंत्रों के प्रयोग से आगे बढ़ रहे हैं। जैसे कि इजरायल है। इजरायल ने इधर जो बीस साल में काम कियावह आंखें खोल देने जैसा है। उस काम को हम कर सकते हैं। हमारे पास ज्यादा सुविधा हैइतनी सुविधा उनके पास नहीं है। लेकिन हमारे पास समझ कम है।

तो क्या आपका खयाल है कि जो बड़ी इंडस्ट्री डाली गई हैंवह अपने हित में नहीं हुई हैं?

नहीं-नहींमैं यह नहीं कहता कि हित में नहीं रही। मेरा कहना यह है कि बड़ी इंडस्ट्री जरूर डालेंलेकिन वह सेकेंड्री इंपोर्टेंस हों,क्योंकि मुल्क के प्रॉब्लम इमिजिएट हैं। इंडस्ट्री डालनी तो पड़ेगीनहीं तो बीस-पच्चीस साल बाद हम और दिक्कत में पड़ जाएंगे। बड़ी इंडस्ट्री हमें डालनी ही पड़ेगी। लेकिन सबसे ज्यादा इंपोर्टेंस--क्योंकि जो इंडस्ट्री बड़ी हैवह पांच साल बाद काम करेगी और आदमी आज भूखा मर रहा है। यह तो आज मरते भूखे आदमी के लिए हमें कुछ फिक्र करनी ही पड़ेगीजो आज की तात्कालिक काम करती हो। फर्स्ट इंपोर्टेंस इसको होइसकी ताकत से जो हमको ताकत मिलेवह सेकेंड्री इंपोर्टेंस में हमें वह सारी की सारी व्यवस्था करनी पड़े। और नहीं तो क्या होगाहम बड़ी इंडस्ट्री जिस दिन खड़ी कर पाएंगेउस दिन तक हम पाएंगे कि प्रॉब्लम्स तो बहुत आगे जा चुके हैंहम वहीं हैं।

आज इतना ही।

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