बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-11

गांधीवाद ही नहींवाद मात्र के विरोध में हूं

आपके प्रवचनों से जो सारा ही गुजरात में एक हलचल मच गई है। तो इसमें आप खुलासा कर सकते हैं?

किस संबंध मेंकुछ एक-एक बात...

अगर गांधीजी के बारे में बोलेंगे और किसी व्यक्ति के बारे में बोलेंगेतो आपको बोला हैइस गैर-संदिग्ध होगी यह। आज तो हमने सुनातो उसमें कोई गैर-संदिग्ध नहीं होती है। न आपने गांधीजी की निंदा की हैन ही क्राइस्ट की। मगर यह गैर-संदिग्ध हो गई है सारे गुजरात में कि आपने गांधीजी की निंदा की या नेहरू जी की निंदा कीतो इसमें आप कुछ खुलासा कर सकते हैं?

किसी व्यक्ति की निंदा करने का मेरे मन में कोई सवाल ही नहीं है। और व्यक्ति की निंदा का कोई प्रयोजन भी नहीं है। वाद की जरूर मेरे मन में बहुत निंदा है। वादसंप्रदाय--चाहे वह राजनैतिक होचाहे धार्मिक होसब तरह के बाड़े टूटने चाहिएऔर मनुष्य का मन सोचने-समझने के लिए मुक्त होना चाहिए।

रूस मैं जाऊंगा तो माक्र्सवाद का विरोध करूंगाहिंदुस्तान में गांधीवाद का विरोध करूंगा। गांधीवाद से भी विरोध नहीं हैवाद से ही मेरा विरोध है।
अब तक दुनिया में जैसा भी हुआ हैचाहे क्रांतियां हुई हैंसब क्रांतियां वाद-आधारित थीं। इसलिए सारी क्रांतियां असफल हो गईंकोई क्रांति सफल नहीं हो सकी। और प्रत्येक वाद मनुष्य के मन को मुक्त करने में सहयोगी नहीं हुआबांधने का कारण बना। और जरूरत इस बात की है कि मनुष्य की समझ इतनी मुक्त होसमझ विकसित होनी चाहिएऔर इतनी विकसित होनी चाहिए कि हम प्रत्येक समस्या का सीधा साक्षात्कार कर सकें।
गांधी का उपयोग मेरे लिए यह समझ में आता है कि गांधी को हम समझ कर इस योग्य बनें कि देश के सामने जो समस्या आएउसका हम साक्षात कर सकें। लेकिन हमेशा यह होता है कि वाद से घिरा हुआ जो मन हैवह समस्या का सीधा साक्षात्कार कभी नहीं भी करताउसका वाद ने उत्तर पहले दे रखा है। समस्या नई हैउत्तर पुराना है। उस उत्तरपुराने उत्तर को थोपने की कोशिश करता है समस्या के ऊपर। उससे समस्या तो हल नहीं होतीऔर उलझती चली जाती है।
प्रत्येक महापुरुष अपनी समस्या का साक्षात्कार करने की कोशिश करता हैलेकिन न तो वह समय रह जाता है पीछेन वह समस्या रह जाती है। अनुयायी उस समस्या और समाधान को लेकर पीछे की परिस्थितियों में जो उपद्रव खड़ा करते हैं उससे नुकसान पहुंचाता है। गांधी ने अपनी समझअपनी सूझ के अनुसार किन्हीं स्थितियों में कुछ प्रयोग किएजैसे कि चरखे का प्रयोग था। गांधी की समझ के लिए जो भी उपयोगी मालूम पड़ाउन्होंने किया। शायद उस स्थिति में कुछ और किया जाना कठिन भी था। लेकिन अब पीछे खादी और चरखा सिद्धांत की तरह हमारे पीछे पड़ गया। और अब आने वाले समय में हम उसका उपयोग आर्थिक सिद्धांत की तरह करना चाहेंगे तो हम नुकसान पहुंचाते हैं मुल्क को।
इसीलिए मैंने कहा कि अगर हम वाद को पकड़ कर चलते हैं तो हम देश की हत्या कर देते हैं। और लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि मैंने कह दिया कि गांधीजी देश के हत्यारे हैं। मैंने कहा कि अगर गांधी के वाद को हम आगे भी मानते हैं तो देश की हत्या हो जाएगी।
और यह सवाल गांधी के वाद का नहींकिसी भी वाद को...वह अपनी समय की और परिस्थिति का उत्तर होता है। समय और परिस्थिति रोज बदल जाती है और वाद कभी बदलता नहीं है। वाद जिद्द करता है कि हम वही रहेंगेजैसे हम थे। और हर नई परिस्थिति में हर पुराना वाद उपद्रव का कारण होता है। इसलिए जिस देश को जितनी तीव्रता से विकसित होना होउसको वाद से उतना मुक्त होना चाहिए। समझ विकसित होनी चाहिए। और हम नई परिस्थिति का सामना कर सकेंउसके योग्य हमें बनना चाहिए। तो जैसे मेरा कहना है कि आने वाले भविष्य में भारत में टेक्नालॉजी का जितना विकास हो उतना हितकर है। और अगर हम चरखा और खादी जैसी बातों पर अटकते हैं तो वे टेक्नालॉजी के विरोध की बातें हैंउनसे टेक्नालॉजी विकसित नहीं होतीटेक्नालॉजी को नुकसान पहुंचेगा।
यानी संक्षिप्त में यह कि हर महापुरुष परिस्थिति का उत्तर होता है। परिस्थिति बदल जाती हैमहापुरुष मर जाता हैलेकिन उत्तर पकड़ जाता है। और फिर हम उत्तर को थोपते चले जाते हैं। और अगर उत्तर का कोई विरोध करे तो हम समझते हैं कि वह उस महापुरुष का विरोध हो गया। यह इतनी नासमझी की बात हैजिसका कोई हिसाब नहीं हैजिसका कोई हिसाब नहीं है।

आज की जो परिस्थिति हैइसमें आप क्या मार्ग बताते हैंजो आपके बीच में रुकावट हो गई यह। और न लोगों की समस्या का उत्तर होता है। सब आदमी समस्या के...क्या करनाक्या नहीं करना सोच सकता ही नहीं है। तो आपने बताया कि हमको सोच कर समस्या का हल करना चाहिए। एक-दो रास्ता बताया है। और कुछ रास्ता है?

(देश में जो प्रगति अवरुद्ध हो गई है और अनेक समस्याएं खड़ी हो गई हैंउसके लिए क्या करना चाहिएऔर आपने बताया कि मन से सोच कर समस्या का हल करना चाहिएएक रास्ता आपने बताया। क्या और कोई रास्ते हैं?)

हांअसल बात जो हैएक-एक परिस्थिति का सवाल नहीं हैपरिस्थिति का सामना करने की वृत्ति का सवाल है। वह मुल्क के पास नहीं है। मुल्क के पास समस्याएं हैंपरिस्थितियां हैंलेकिन कैसा व्यक्तित्व इन परिस्थितियों का मुकाबला कर सकता है,वह व्यक्तित्व नहीं है मुल्क के पास। और उस व्यक्तित्व को बनाने की न हम कोई चेष्टा कर रहे हैं और न ही हमने तीन हजार वर्षों में वह व्यक्तित्व बने इसके आधार रखे हैं। बल्कि वह व्यक्तित्व न बनेइसकी हमने सारी कोशिश की है। और अब हम क्या करते हैं कि हम एक-एक परिस्थिति का मुकाबला करने की कोशिश करते हैंजो कि गलत है। इससे...वह जो आप कहते हैंउलझन पैदा हो गई है।
यानी मामला ऐसा है--जैसे एक बच्चे के सामने गणित के पचास प्रश्न रख दिए। वह एक प्रश्न को हल करने की कोशिश करता है और पूछता हैइसको हल कैसे करूंइसको हल कर लेता है तो दूसरा उसके सामने रख देते हैंवह उसके सामने सवाल उठता है कैसे हल करूंसवाल असल में एक सवाल हल करने का नहीं हैसवाल गणित को हल करने की बुद्धि पैदा करने का है। तो एक-एक पर्टीकुलर सवाल नहीं है महत्वपूर्णमहत्वपूर्ण मुल्क के व्यक्तित्व में सवालों को हल करने की क्षमता का है। राजनीतिज्ञ को सवाल होता है एक-एक सामने उसका कि आज यह भाषा का सवाल आ गयाइसको हल कैसे करेंकल प्रांत का सवाल आ गयाइसको कैसे हल करेंपरसों यह सवाल आ गया...ये सवाल रोज आते रहेंगे। अगर आप हल भी कर लेंगे तो पच्चीस दूसरे सवाल आ जाएंगे।
असली सवाल यह है कि मुल्क के पास सवालों का साक्षात्कार करने कीहल करने की प्रतिभा नहीं है। और प्रतिभा को विकसित करने के जो उपाय हैंउनका हम कोई उपयोग नहीं कर रहे हैं। अब जैसे मेरा खयालमेरा कहना यह है कि प्रतिभा को विकसित करने का पहला तो उपाय यह है कि भारत के मन को सब तरह के अंधविश्वास से मुक्त करना चाहिए। क्योंकि अंधविश्वास सोचने नहीं देता।
वैज्ञानिक दृष्टि पैदा की जानी चाहिए। भारत के पास कोई वैज्ञानिक दृष्टि नहीं है। तो किसी भी सवाल से हम जूझते हैंहमारी दृष्टि बिलकुल अवैज्ञानिक होती है। जैसे उदाहरण के लिएजिनकी वजह से विवाद सारे खड़े हो गए हैंजैसे मेरा कहना है कि भारत के सामने पिछले पचास वर्षों में एक सवाल था हिंदू-मुसलमान का। हमने उस सवाल के साथ जो भी व्यवहार किया,बिलकुल अवैज्ञानिक था। उसके परिणाम में हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटा। और वह सवाल खत्म भी नहीं हुआ। वह सवाल अपनी जगह खड़ा है। और पूरा मुल्क बंट गयावह एक अलग बेवकूफी हो गई। और वह पूरा मुल्क बंट कर हमेशा के लिए सवाल खड़ा कर गया जो कि अब चलेगाजिसका कि अंत नहीं सूझता अब क्या होगा। तो हमने उस सवाल के साथ जो भी कियावह अवैज्ञानिक था। जैसे मेरा कहना है कि...और यही सारी की सारी बातें लोगों को लगती हैं कि मैंने गांधीजी के खिलाफ कह दिया। गांधीजी से मुझे कुछ लेना-देना नहीं है।
लेकिन हमने पचास साल में क्या कियावह हमें सोचना पड़ेगा। मेरा कहना है कि हिंदू-मुस्लिम एकता की बात उठा कर हमने मुल्क को नुकसान पहुंचाया। सवाल था भारतीय एकता कासवाल हिंदू-मुस्लिम एकता का था ही नहीं कभी। लेकिन जैसे ही हमने कहा कि हिंदू-मुस्लिम यूनिटीवैसे ही हमने हिंदू और मुसलमान को बहुत महत्व दे दियाजो महत्व अतिशय हो गया। और जितना हम यह कहते चले गए: हिंदू-मुस्लिम एकताउतना मुसलमान को भी दिखाई पड़ने लगा कि मेरी एकता के बिना कुछ होता नहीं हैमैं महत्वपूर्ण हूं। हमने एक सिग्नीफिकेंस दिया मुसलमान को और हिंदू कोऔर दोनों को हमने उपद्रव बना लिया। जरूरत इस बात की थी कि हम कहते--भारतीय एकतान हिंदू का सवाल हैन मुसलमान का। और हम इस बात पर जोर देते कि जो आदमी हिंदू होने का दावा करता है और मुसलमान होने का दावा करता हैवह भारतीय एकता को तोड़ता है। तो हमने उलटा किया।
हमने कहा: हिंदू-मुस्लिम दोनों भाई-भाई हैंअल्ला-ईश्वर तेरे नाम हैं। और हमने जो-जो प्रक्रिया की उसमें हमने हिंदू-मुस्लिम को मिटाने की कोशिश नहीं कीहिंदू-मुस्लिम को स्वीकार कर लियाउनको स्वीकृति दे दी। फिर उनको स्वीकार करके मिलाने की कोशिश की। और मेरा कहना यह है कि यह स्वीकृति खतरनाक हो गईयह महंगी पड़ गई। और गांधी जैसे भले आदमी भी इस भूल को नहीं पकड़ पाए और अपने को हिंदू कहते रहे निरंतर कि मैं हिंदू हूं। अगर गांधी ने भी हिम्मत कर ली होती यह कहने की कि मैं सिर्फ आदमी हूं और मैं भारतीय हूंमैं हिंदू-विंदू नहीं हूंतो हिंदुस्तान का इतिहास दूसरा होता। लेकिन वह नहीं हो सका। और जो हमने कोशिश कीवह कोशिश तोड़ने वाली सिद्ध हुईवह कोशिश बनाने वाली सिद्ध नहीं हुई।
अब भी वही हाल है। अब भी हम वही सब कहे चले जाते हैं। और दूसरी समस्याएं खड़ी होती हैं तो उनके सामने भी हम वही पुराने हल मौजूद करते हैं।
यह जो...और कोई दोत्तीन हजार साल से...भारत की कुछ दृष्टियां हैं जो उसको सवाल हल नहीं करने देती। जैसे भारत मानता है कि जो भी हो रहा हैवह भाग्य से हो रहा है। और जो कौम भी मानती है कि भाग्य से हो रहा हैवह परिस्थितियों का मुकाबला करने में असमर्थ हो जाती है। वह कैसे समर्थ होगीपरिस्थिति सामने आ जाती है और वह भाग्य को मानने वाली कौम है! जब तक हिंदुस्तान के दिमाग से भाग्य की धारणा नहीं मिटतीतब तक पुरुषार्थ की संभावना पैदा नहीं होगी। यानी यह मेरा कहना है कि ये बेसिक सवाल हैं। ये कोई आज की राजनीति के सवाल नहीं हैंकल की राजनीति के सवाल नहीं हैं। भारत की प्रतिभा को भाग्यवादी होने से बचाने की जरूरत है। लेकिन स्कूल में बच्चों को हम आज भी भाग्यवाद के खिलाफ कुछ भी नहीं समझा रहे हैं। और हम चाहते हैं कि समस्याएं हल हो जाएं।
अगर बीस साल आने वाली पीढ़ी को हम भाग्यवाद के खिलाफ समझा सकें और पुरुषार्थ के लिए तैयार कर सकें और आने वाली पीढ़ी के दिमाग में यह बात बिठाई जा सके कि जो भी हो रहा है वह अन्यथा हो सकता हैबदला जा सकता हैवह हमारे हाथ में हैऔर कोई भगवान तय नहीं कर रहा हैकोई भाग्य तय नहीं कर रहा हैतो बीस साल के भीतर भारत की प्रतिभा में खूबी आ जाएगी कि वह समस्याओं का सामना कर सके। पश्चिम में समस्या खड़ी होती है तो वे उसको हल करने की कोशिश करते हैं। हमारे सामने समस्या खड़ी होती है तो हम उसके कारण खोज लेते हैं और खत्म हो जाती है बात कि वह समस्या क्यों है। यानी वह कैसे बदलेगीयह सवाल नहीं है।
अगर भारत गुलाम हो गयातो हम कहते हैंफूट थीइसलिए गुलाम हो गया। बस जैसे कि एक्सप्लेनेशन मिल गयाकारण मिल गया और बात खत्म हो गई। और एक हजार साल तक हम गुलाम नहीं रहते कभी भीवह हमारा भाग्यवादी दृष्टिकोण थाजिसने हमको गुलाम रखा। फूट-वूट का कारण नहीं है। मेरी अपनी समझ यह हैक्योंकि जितनी फूट हममें हैदुनिया की सब कौमों में है। ऐसा कोई फूट हममें ही हैऐसा नहीं है। वह प्रोटेस्टेंट और कैथेलिक उतना ही लड़ता है जितना हिंदू-मुसलमान लड़ते हैं। यह सारी दुनिया लड़ती है। फूट-वूट हममें ही नहीं है कोई। हममें और उनमें एक ही फर्क है कि वे चीजों को बदलने का विश्वास रखते हैं कि हमारे हाथ में हैऔर हम मानते हैं कि चीजें हो रही हैंहमारे हाथ में कुछ भी नहीं है।
और आज भी साधु-संन्यासी समझाए चला जा रहा हैये ही बातें समझा रहा है गांव-गांव में वह। अब मेरा कहना यह है कि पचास साल के लिए हिंदुस्तान को साधु-संतों से बचाने की कोशिश करनी चाहिएनहीं तो हिंदुस्तान मर जाएगा। मगर अब यह खतरे की बात हैयह झगड़े की बात है। मेरा कहना यह है कि साधुजिसको संन्यास लेना है वह छोड़ कर चला जाएजंगल में बैठेजिसको जाना हो वह वहां जाएलेकिन अब गांवों में साधु-संन्यासी को शिक्षा देने का उपाय बंद किया जाना चाहिए। जिसकी मर्जी होसंन्यास लेना हो वह जंगल में जाएउनके पास बैठेसीखेकोई मनाही नहीं है। लेकिन अब भारत की जो पिटी-पिटाई परंपरा हैउसको यहां सिखाने के स्रोत बंद होने चाहिए। और नहीं तो वे फिर नई पीढ़ी को बिगाड़ जाते हैं।
अब एक स्कूल का लड़का हैवह भी जाकर ज्योतिषी को चार आना देकर हाथ दिखलाता है। तो भारत का भविष्य अच्छा नहीं है। यह स्कूल का बच्चायूनिवर्सिटी में पढ़ने वाला लड़का हैएम.एससी. पढ़ता हैलेकिन परीक्षा के वक्त हनुमानजी पर जाकर नारियल चढ़ाता है। इससे भारत की प्रतिभा विकसित नहीं हो पाएगी। इससे भारत की प्रतिभा को नुकसान पहुंच रहा है।
इसलिए मेरे सामने इमिजिएट सवाल नहीं है कि यह सवाल कैसे हल हो। मेरे सामने सवाल यह है कि हमारा माइंड किसी भी सवाल को हल क्यों नहीं कर पाता हैऔर फिर हम उसमें उलझ जाते हैं। हल होता नहीं हैसवाल खड़ा रहता हैहम उलझते चले जाते हैं। और यह जो एक साइंटिफिक आउटलुक कैसे पैदा होसारे मुल्क के विचारशील लोगों को इस दिशा में लग जाना चाहिए कि वह साइंटिफिक आउटलुक कैसे पैदा हो।
अब अभी मैं कलकत्ते में था। एक मित्र डाक्टर के घर ठहरा। निकलने लगाडाक्टर एफ.आर.सी.एस. हैंपढ़ा-लिखा आदमी है,यूरोप से लौटा हुआ है। उसकी लड़की को छींक आ गई और उसने मुझे कहा कि दो मिनट रुक जाइए।
तो मैंने उसको कहा कि तुम डाक्टर होतुम्हें समझना चाहिए कि छींक क्यों आती हैतुम भी नहीं समझते?
उसने कहावह सब मैं समझता हूंलेकिन हर्जा क्या हैदो मिनट रुक गए तो हर्ज क्या है?
अब यह जो माइंड हैयह मुल्क की समस्याएं हल नहीं होने देगायह नहीं होने देगा। क्योंकि समस्या के लिए संघर्ष करने वाला मन चाहिएजो चीजों को बदलने की सोचेतोड़ने की सोचेनया करने की सोचे। वह हमारे पास नहीं है।

बंबई में आपने बताया था कि विचार की प्रतिभा शुरू होने की जरूरत है। और उसके लिए समाज को एक शॉक दिया जाए। गांधीजी और सेक्स के विचार...अनुसंधान जाग जाए। और बाद में जो हलचल मची थीइसके पश्चात्त तो ऐसा नहीं लगता कि समाज का विचार तैयार नहीं हुआ। क्या आप तीन दिनों से इंतजार कर रहे हैंवह अभिव्यक्तियां हैं!

यह तो ठीक कहते हैं न। समाज तो तैयार है ही नहीं। यानी मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ है जो हलचल मची उससे। वह तो मैं जानता था कि वह मचेगी। आश्चर्य मुझे इससे नहीं हुआ कि हलचल मचीआश्चर्य मुझे इससे हुआ कि जो लोग मेरे पक्ष में हैं,उनकी हिम्मत मुझे बिलकुल नहीं मालूम पड़ी। मेरे विपक्ष में जिन्होंने कहाउन्होंने तो हिम्मत से कहाउन्होंने हलचल भी मचाई। लेकिन जो मेरे पक्ष में हैंवे प्राइवेट में तो मुझसे कहते कि हम आपके पक्ष में हैं। मुझे पत्र लिखते हैंलेकिन खुले में वे कहने की तैयारी में नहीं हैं। आश्चर्य मुझे इससे नहीं हुआ कि हलचल मची। मैं तो चाहता हूं कि हलचल मच जाए। उसमें क्या हर्जा होने वाला हैमुझे दस-पच्चीस गाली पड़ती हैंइससे क्या बनता-बिगड़ता हैइस मुल्क में कुछ लोगों को गाली खाने के लिए तैयार रहना चाहिएनहीं तो हलचल होगी ही नहीं। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
आश्चर्य मुझे इससे हुआ कि जिन लोगों से हम आशा कर सकते हैं--जो सोचते हैंविचारते हैंइंटेलेक्चुअलस हैंवे भी हिम्मत करके बाहर पक्ष में खड़े हो सकते हैंवह मुझे नहीं दिखाई पड़ी। वह जो प्रतिक्रियावादी वर्ग थावह तो शोरगुल मचाएगा जोर सेइसमें कोई शक-शुबहा नहीं है। वह तो मचाना चाहिए उसकोन मचाता तो आश्चर्य होता। वह तो बिलकुल ही ठीक हुआ,उसमें तो कुछ अड़चन नहीं हुई। और वह चीजों को तोड़-मरोड़ कर भी जाएगाक्योंकि उसके सिवाय मचा नहीं सकता। क्योंकि जो मैं कह रहा हूं सीधे-सीधे उसका विरोध नहीं किया जा सकता। उसका तो उपाय एक ही है कि प्रसंग के बाहर मेरी बातों को निकाल कर और उसको नये अर्थ देकर उसका विरोध किया जाए। वह मेरी समझ में आता है कि हमेशा का रास्ता वह है। उससे कोई हैरानी नहीं हुई। हैरानी मुझे इससे हुई कि यह जो विरोध में इतना शोरगुल मचाइसके विरोध में जो एक इंटेलेक्चुअल,सोच-विचारशील लोगों का मुझे साथ मिलना चाहिएवह हिम्मत से पब्लिक में साथ देने को तैयार नहीं हैं। उससे मुझे आश्चर्य हुआ।
लेकिन उसकी भी चिंता नहीं हैक्योंकि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे साथ कोई है कि नहीं। इससे मुझे कोई भी फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि न तो मुझे किसी की पूजा चाहिएन कोई संप्रदाय बनाना हैन कोई आर्गनाइजेशन बनाना है। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। न मेरा कोई स्वार्थ है जो कि नुकसान होगा या फायदा होगा। वह कुछ भी नहीं है। इसलिए कितने लोग मुझे गाली देते हैंकितने लोग स्वीकार करते हैंइससे भी फर्क नहीं पड़ता। एक ही मुझे फर्क सा मालूम पड़ता है कि विचार की प्रक्रिया अगर पैदा होतो वह हमेशा शॉक से पैदा होती हैऔर कभी पैदा नहीं होती।

लेकिन मेरी समझ यह है कि आप कब से इंतजार कर रहे थेकब वह समय आएगा तब करेंगे। आप इन्हीं बातों को आप पहले कह सकते थे--दो साल पहले।

मेरा जो कहना है कुल जमामैं समय का इंतजार नहीं कर रहा। दो साल में क्या फर्क पड़ने वाला हैबीस साल में इस मुल्क में फर्क नहीं पड़ने वाला है। इस मुल्क में दो हजार साल में फर्क नहीं पड़ता तो दो साल में क्या फर्क पड़ना हैयानी हमारी चिंतन की प्रक्रिया भी इतनी अवरुद्ध हो गई कि दो हजार साल में भी हम में कोई खास फर्क नहीं पड़ता। तो वैसे ही चलता है। वह सवाल नहीं था। मैं तो केवल प्रतीक्षा कर रहा था इसका कि मुझे सुनने वाला वर्ग तो हो जिससे मैं कह सकूंतो मैं एक दफा मैं घूम लूंलोग मुझे सुन लें। आखिर...नहीं तो इतना शोरगुल भी नहीं मच सकता था। इतना शोरगुल मचावह भी इसलिए मच सका कि मुझे सुनने वाला एक वर्ग पैदा हुआ है और स्वार्थी तत्व को घबड़ाहट पैदा हुई कि मुझे सुनने वाला वर्ग मुझे सुनेगा तो खतरा है। सुनने वाला वर्ग ही न हो तो मेरी बात को कहने की क्या जरूरत हैमैं कह भी दूं तो कौन उसे सुनने की फिक्र करता हैजो मैं कह रहा हूंहिंदुस्तान में हजारों लोग कहते हैं। आपमें से कई लोग कहते होंगेवह शोरगुल नहीं मचता है। शोरगुल मचने का कारण तब होता हैजब कि मुझसे कोई खतरा पैदा हो। नहीं तो नहीं होता।
शोरगुल मचता हैवह एक लिहाज से अच्छा लक्षण है। उसको मैंने अच्छा लक्षण माना। मैंने समझा कि वे मुझे खतरनाक मानते हैं। यह अच्छा है। यानी वे इतना मानते हैं कि मेरी लोगों तक कोई पहुंच हो सकती हैलोग मेरी बात सुन सकते हैं। और उनको डर पैदा हुआ कि मेरी बात न पहुंचे। तो में समझता हूं कि यह अच्छा हुआयह शुभ लक्षण है।
अब सवाल यह है कि इसका कैसा उपयोग किया जा सके?
अब मैं देख कर हैरान हुआबंबई के पत्रकार जिन्होंने इंटरव्यू लिया मुझसेवे एक-एक मुझसे कह कर गए कि आपकी बात हमें बहुत पसंद है। पीछे भी हमसे कहे कि हमें बहुत दुख है कि जो निकलावह हम नहीं चाहते थे। आखिर बड़े मजे की बात है,यह बड़े मजे की बात है। फिर तो बड़ी कठिन बात हो गई न। फिर तो बड़ी कठिन बात हो गई। चंद्रकांत वोहरा मुझे कह कर गए पीछे कि यह हमें बहुत दुख है कि हम जो चाहते थेवह नहीं हुआकुछ और हुआ। अब यह जो है न...लेकिन यह अच्छा है एक लिहाज सेएक लिहाज से अच्छा है। इसमें मुझे कोई दुख का कारण नहीं दिखाई पड़ता है। मैं तो चाहता ही यह हूं कि वह जो हलचल मची हैवह बंद न हो जाए। उसको जारी रखिए। कुछ फिक्र नहीं कि मेरे विरोध में भी चले तो कोई हर्जा नहीं है,वह जारी रहे। वह जारी रहे तो मैं निबटारा कर लूंगा। वह तो आखिर अगर कोई पत्र मेरे संबंध में गलत भी लिख कर भी प्रचार करे तो कितनी देर चल सकता हैआखिर मैं जनता को जाकर मैं सीधी भी तो बात कर लूंगाउससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
तो मैं तोमेरे खिलाफ अभी एक किताब लिखी सूरत। उनको मैंने चिट्ठी लिखाउन्होंने मुझे जवाब भी नहीं दिया। उनको मैंने चिट्ठी लिखा कि बहुत मैं धन्यवाद करता हूं तुम्हाराइसको गांव-गांव पहुंचाओताकि जगह-जगह लोग प्रश्न पूछने लगेंगेतो मैं उत्तर दे सकूं। वे पूछें तो मुझसे। वे जिस संबंध में भी पूछना चाहें तो मैं उत्तर देने को तैयार हूं। तो वह जो हलचल चली है,उसको जारी रखिए।
और यह मैं चाहता हूं कि शॉक जोर से लगे। वह सिर्फ गुजरात में ही हुआमैं चाहता हूं कि पूरे मुल्क में हो। वह अभी सिर्फ गुजरात में हुआमैं चाहता हूं कि पूरे मूल्क में होना चाहिए। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह शॉक लगने में मैं बिलकुल खत्म हो जाऊं। तो भी हर्जा नहीं है। अगर इतना भी काम हो जाए कि लोग सोचने लगें कुछ मुद्दों परतो भी काम पूरा हो जाता है। तो भी काम पूरा हो जाता है। कुछ लोगों को तो कुर्बानी देनी पड़ेगीसिर्फ इसलिए कि लोग सोचने लगें। वह मैं जो चाहता हूंवह सोचेंगेतो बहुत दूर की बात हैलेकिन वे सोचें तो भी काफी है।
क्योंकि मेरी अपनी समझ यह है कि एक बार आदमी सोचना शुरू कर दे तो गलत चीज के साथ बहुत देर तक राजी नहीं रह सकता है। उसमें टूट शुरू हो जाएगी।
और यह आप खयाल कर लें कि हिंदुस्तान में शॉक देने की व्यवस्था ही नहीं है। यहां प्रशंसा की इतनी लंबी परंपरा है हमारी कि वह शिष्टाचार का हिस्सा हो गया है। कि अगर मुझे कोई बोलता है कि गांधीजी के संबंध में बोलूंतो यह शिष्टाचार का हिस्सा है कि मैं उनकी प्रशंसा करूं। अगर मेरे संबंध में आपको बोलने के लिए लाया जाए तो आप शिष्टाचार मान कर मेरी प्रशंसा करेंगे। यह बड़ी झूठ बात हो गई है। इससे चिंतन पैदा नहीं होता है। तो मैं तो चाहता हूं कि कुछ लोग शॉक देंकुछ लोग चीजों को तोड़ेंकुछ जो बहुत दिन से कहा चला जा रहा है उसके खिलाफ कुछ कहें। यह भी हो सकता है कि शॉक देने में उनको थोड़ी अतिशयोक्ति भी करनी पड़े। यह भी हो सकता है। मैं उसके लिए भी राजी हूं। एक दफा शॉक लगेचिंतन शुरू होतो अतिशयोक्ति तो मिट जाएगी। उसमें कितनी देर लगती हैवह जो डायलाग पैदा हो जाएगामिट जाएगी। लेकिन यह जो रटी-रटाई परंपरा चल रही है प्रशंसा करने कीप्रसंशा करने कीयह बहुत खतरनाक और महंगी पड़ गई है। बहुत महंगी पड़ गई है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

अब मजा यह है कि आखिरी उपाय वही रह जाता है। मैं जो कह रहा हूंअगर उसका कोई उत्तर देने का उपाय न रह जाएजो मैं कह रहा हूंउसको खंडन करने का कोई मार्ग न होया सीधा मुझसे बात करने का कोई उपाय न रह जाएतो फिर एक ही उपाय रह जाता है कि मेरे चरित्र को कुछ कहना शुरू किया जाए। और मेरे चरित्र को बहुत-कुछ कहा जा सकता है। क्योंकि मैं चरित्र के मामले में बंधा हुआ आदमी नहीं हूं। क्योंकि मैं तो किसी मामले में बंधा हुआ आदमी नहीं हूं।
तो वहां जो घटना हुईमनु भाई को मैंने वहीं कहा था कि यह घटना हो गई तो मैं इसकी कल सुबह पब्लिक मीटिंग में बात कर लूं। आप भी यहां मौजूद हैंवह बहन भी यहां मौजूद हैवे सारे लोग भी मौजूद हैं जिनके सामने घटना हुई। तो अभी यह बात करना बहुत साफ होगा। पीछे तो महीनेचार महीने बाद आप बात शुरू करेंगेयह मैं जानता हूंफिर साफ करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि वे सारे लोग नहीं होंगेमैं नहीं होऊंगावह बहन नहीं होगी।
घटना कुल इतनी हुई कि एक बनारस यूनिवर्सिटी की प्रोफेसरऔर वह कोई--जैसा उन्होंने लिखा है कि जवान स्त्री--जवान-अवान नहींवह कोई पैंतालीस साल की। पच्चीस साल का तो उसका जवान लड़का है। पैंतालीस साल की महिलाऔर कोई साधारण शिक्षित नहींहिस्ट्री की प्रोफेसर बनारस यूनिवर्सिटी में। वह मेरे साथ आई हुई थी। जैसे हिम्मत भाई मेरे साथ आए हुए हैंतो वह मेरे साथ आई हुई थी। तो वह मेरे साथ रुकी। एक दिन कोई बात नहीं हुई। वह मेरे साथ रुकी थीजहां मैं रुका हुआ था वहां उसे रोका हुआ था। एक दिन कोई बात नहीं हुई।
दूसरे दिन दोपहर को प्रेस कांफ्रेंस हुईऔर उसमें गांधीजी के संबंध में कुछ प्रश्न पूछे गएऔर मैंने उत्तर दिया। तो वह जो संस्था हैवह तो गांधीवादियों की संस्था है। लाला लाजपतराय भवन में मैं रुका था। और वह सर्वेंटस ऑफ पिपुल सोसाइटी है,जिसके मनु भाई भी सदस्य हैं। और वे सारे लोग वहां थे। वे सारे लोग जिन्होंने आयोजन किया था--क्योंकि मुझे तो एक कठिनाई पड़ गई--मेरे सारे आयोजक नब्बे प्रतिशत तो गांधीवादी थे--सारे मुल्क में। क्योंकि आजकल आयोजक भी वे हैंनेता भी वे हैंसब कुछ वे हैं। जो भी करना हैवे ही करते हैं। तो वे आयोजक दिल्ली की मीटिंग के सारे गांधीवादी थेमनु भाई भी एक आयोजक थे उसमें। वह जो प्रेस कांफ्रेंस में मैं सारी बातें कहाउससे उनको बेचैनी हुई। उस रात...
अब मुझे पता नहीं उन्होंने सबने सोच कर निकालादूसरे दिन शाम को मैं मीटिंग से लौटातो उन्होंने उस स्त्री का सामान और बिस्तर सब बाहर निकाल दिया। वह खड़ी दरवाजे पर रो रही। मैं आयातो मैं हैरान हुआ। और दस-पच्चीस लोग मेरे साथ आए थेउन्होंने सबने पूछा कि क्या हुआतो उस स्त्री ने कहा कि कुछ हुआ नहींमुझे कुछ कहना नहींआपके पैर छूने के लिए मैं रुकी हूंमैं पैर छू लूं और जाऊंमैं जा रही हूं। तो मैंने कहाअभी तो तेरे जाने की बात नहीं थीदो दिन और रुकने का थाहुआ क्याउसने कुछ कहना पसंद नहीं कियाक्योंकि एक भद्र और शिष्ट महिला है। उसने कहा कि मुझे कुछ भी नहीं कहना हैअब इस बात को खत्म कर देना है। लेकिन यह मुझे अच्छा नहीं मालूम हुआ कि वह बिना कुछ पता चले वह चली जाए। तो मैंने पूछने की कोशिश कीतो उसने मुझे अंततः बताया कि मेरा सामान बाहर निकाल दिया है और मेरे साथ अभद्र व्यवहार कियाऔर मुझसे कहा कि आप हमारी संस्था से बिना पूछे उनके साथ कैसे रुकीं?
तो यह तो पहले दिन जब वह मेरे साथ आई थी तब बात उठानी थी उठानी थी तो। और अगर कुछ भी कहना था तो मुझसे कहना था। क्योंकि मैं उनका मेहमान थावह मेरे साथ थी। तो आप उनके साथ क्यों रुकीं यहांऔर यह अनुचित है उनके साथ यहां रुकनाऔर इसलिए हम आपको दूसरे कमरे में ले जाते हैं। यहां से आपको ले जाएंगे। तो उसका जबरदस्ती सामान निकाला तो वह हैरान हो गई। और वह एक भद्र महिला को अजीब-सा मालूम पड़ा। मैंने कहा भी आकर कि यह तो मुझे कहना था आकर। और यह भी डेढ़ दिन बाद आप कह रहे हैंजैसा अभी दो महीने बाद वक्तव्य दिया। ऐसा डेढ़ दिन बाद वह काम किया। फिर भी मैंने कहाकोई हर्ज नहीं है।
तो मैंने उसको समझाने की कोशिश की कि अभी फिलहाल...लेकिन वह महिला भी जिद्द पकड़ गई कि मेरा अपमान हुआ है,अब मैं रुकूंगी तो यहीं रुकूंगीमैं दूसरे मकान में जाने को राजी नहीं हूंक्योंकि मैंने न कोई पाप किया हैऔर न कोई बुराई की है। क्षमा इन्हें मांगनी चाहिए कि मेरा सामान बाहर निकाला। वह यह जिद्द पकड़ गई। और ये सारे लोग यह जिद्द पकड़ गए कि इसको इस कमरे में रुकने नहीं देंगे। मेरी समझ के बाहर हो गया। मैंने कहा कि इसमें कुछ भी निबटारा होना चाहिए। और मैंने इनसे कहा कि इसमें मनु भाई भूल मैं आपकी समझता हूं। क्योंकि यह बात मुझसे कहनी थी--पहली बातडेढ़ दिन पहले कहनी थी। और अभी भी कहनी थी तो मुझसे कहनी थी आकरतो इसका कोई भी रास्ता हो सकता था। उससे सीधा आपको बात नहीं करनी थी। और यह अशोभन बात हुई है। और इसलिए मैं उसके पक्ष में हूंमैं उसके पक्ष में हूं कि वह ठीक कह रही है। उसे जिद्द करनी चाहिए। और मैंने कहा कि उसको आज रात रुकने देंकल सुबह मैं उससे कहूंगा कि तू दूसरे कमरे में चली जा। वह मेरी समझ की बात होगीलेकिन अब यह गड़बड़ मत करें। पर ये सारे लोग जिद्द पकड़ लिए। वह तो पूरा का पूराजैसे एक एक कांस्प्रेसी होजिद्द पकड़ लिए कि नहींइसको हम यहां रुकने नहीं देंगे।
तो फिर मैंने कहाफिर इसका एक ही रास्ता है कि मैं भी आपकी संस्था छोड़ कर चला जाऊंऔर मैं प्रोटेस्ट में आपकी संस्था छोड़ कर जाता हूं। क्योंकि यह अभद्र व्यवहार आपने किया है। रह गई मेरी बाततो मैंने उनसे कहा कि मुझे कोई कठिनाई नहीं हैमेरे कमरे में कौन आकर रुक जाए। मैंने कहाआप भी आकर रुक जाएंबहुत तकलीफ हो कि यह महिला यहां सो रही है। तो रात में आपको इसकी बहुत चिंता हो तो आप भी इसी कमरे में आकर रुक जाएंयह मेरी समझ में आता है। कि और दो जन भी इसी कमरे में आकर रुक जाएंताकि आपको चिंता न रहेपरेशानी न रहे।
फिर मैंने कहा कि दूसरे दिन कल सुबह मैं पब्लिक मीटिंग में इसकी बात कर लूंगाताकि यह बात जाहिर हो जाएक्योंकि यह बात तो चलेगीक्योंकि चलने के लिए आयोजन किया गया हैऐसा मुझे मालूम पड़ता है। तो मुझे रोका कि नहींइसकी बात मत करिएयह संस्था का अपमान होगाऐसा होगावैसा होगा। माफ करिएजो हो गया वह हो गया।
दूसरे दिन जो सब्जेक्ट थावह था "सेक्स एंड लाइफ'। तो उस सब्जेक्ट को बदल दिया। कहा कि इस सब्जेक्ट को ही बदल दें। क्योंकि वह डर हुआ कहीं मैं इसके सिलसिले में वह बात न कर लूं। उसको भी बदल दीजिएधर्म पर ही बोलिए। यह सारा हुआ। तीसरे दिन सांझ को चलते वक्त ये सारे लोग मुझसे क्षमा मांगने आए हैं कि माफ करिएवह जो हो गयागलती हो गई,यह हो गयावह हो गया। मैंने कहा कि उसकी मुझे चिंता नहींजो हो गया है। अब पीछे इसकी क्या चर्चा चलाइएगावह थोड़ा सोचने का है। क्योंकि चर्चा तो यह चलेगीयह तो रुकने वाली नहीं है। और आपने मुझे चलाने नहीं दी। मैं चला देता तो वह अच्छा होता।
दो महीने वे चुप रहे। अब वे प्रेस कांफ्रेंस बुला कर वह सारी बात कहते हैं। और पीछे जो हिस्सा उन्होंने जोड़ दियामैं नहीं सोचता था कि मनु भाई को वैसी शिष्टता करनी चाहिए।
मुझसे तीसरे दिन सांझ को बैठक में यह बात हुई कि अगर कोई स्त्री आपका आलिंगन करे तो आपको एतराज हैमैंने कहा कि मुझे कोई स्त्रीभूत-प्रेत कोई भी आकर आलिंगन करे तो मुझे कोई एतराज नहीं है। मैं किसी का आलिंगन करने नहीं जाता हूं। मेरा कोई आलिंगन करे तो मुझे कोई एतराज नहीं है। तो फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि आप क्या मानते हैं कि आलिंगन सेक्सुअल नहीं हैमैंने कहाआलिंगन सेक्सुअल हो भी सकता हैनहीं भी हो सकता हैयह करने वालों पर निर्भर है। एक मां अपने बेटे का आलिंगन कर सकती हैएक बहन अपने भाई का कर सकती हैएक पत्नी अपने पति का कर सकती है। यह तो इस पर निर्भर है कि करने वाले क्या कर रहे हैं। वह सेक्सुअल हो भी सकता हैऔर स्प्रिचुअल भी हो सकता है। यह कोई जरूरी नहीं है कि वह कैसा हैयह करने वालों पर निर्भर है।
और मैंने कहा कि तीसरा आदमी कभी तय नहीं कर सकता कि दो करने वालों का आलिंगन कामुक थाकि नहीं था। और मैंने कहातीसरा आदमी अगर तय करने जाता है तो वह तो सेक्सुअल हैयह पक्का है। उसको तो नहीं कम से कम तय करने जाना चाहिए। यानी अगर मनु भाई से कोई आलिंगन कर रहा है तो मैं कैसे तय करूं कि वह आलिंगन सेक्सुअल है कि नहीं। और मैं करूं भी क्यों। और अगर मैं करता हूं तो मैं सेक्सुअल हूंइतना तो पक्का हो जाता हैऔर उनका आलिंगन हो या न होयह मुझे कुछ पता नहीं।
वह सारा का सारा उसके पीछे जोड़ दिया कि मैं आलिंगन कोचुंबन कोकामुक नहीं मानता हूं। बच्चों जैसी बात हैलेकिन कोई बहुत समझदारी की बात नहीं है। समझदारी की बात नहीं मालूम पड़ी मुझे थोड़ी कि यह कोई बहुत समझदारी की बात। और फिर मेरे जैसे आदमी के लिए जो कि पब्लिक में सारी बातें करने को हमेशा राजी हैउसके लिए फिर ऐसा दो महीने छिपा कर फिर अहमदाबाद मेंजहां मैं मौजूद नहीं हूंवहां वक्तव्य देना। लेकिन चलेगायह सब चलेगा।

तो आप...सुना रिफ्यूज्ड करते हैं।

रिफ्यूज्ड क्याबात तो ठीक ही है वह। बात तो ठीकजो मैंने कहा नरिफ्यूज्ड क्या करता हूंरिफ्यूज्ड का क्या मतलब है?घटना तो बिलकुल ठीक है कि वह महिला मेरे साथ रुकी थी। इसमें कोई झूठ बात नहीं है। मैंने कहा कि उसको रुकना चाहिए,इसमें भी झूठ बात नहीं है। उसके प्रोटेस्ट में मैं महिला को लेकर दूसरे घर में चला गयावह भी बात सच है। इसमें कुछ बात झूठ नहीं है। इंटरप्रिटेशन को रिफ्यूज करता हूं। बात झूठ नहीं हैबात तो बिलकुल ही सच हैलेकिन व्याख्या उसकी...जो अब वह जैसे कि नारगोल के चित्र को छाप दिया। अब वह तो हजार लोगों के सामने वह महिला आकर मेरे से गले मिल गई। उसका फोटो निकाल लियाफिर उस फोटो को छाप दिया। सैकड़ों लोगों का मन हो सकता है गले मिलने का। और मैं नहीं मानता कि गले मिल लेने में कोई पाप हो गया।
लेकिन हमारा जो दिमाग हैसोचने का जो ढंग हैवह तो ठीक हैवे जिस ढंग से सोचते हैं वे हमकोखयाल में आ गई बात कि यह बहुत पाप हो गयाबहुत गलत हो गया। और मैं तो...चूंकि सेक्स के संबंध में भी मेरी दृष्टि बहुत और तरह की है। और जो सप्रेसिव माइंड है उसके मैं बिलकुल विरोध में हूं। तो मैं इस पक्ष में भी नहीं हूं कि आदमी और स्त्री के बीच इतना फासला होजितना फासला हमने बना कर रखा है। क्योंकि मेरा मानना हैयह फासला आदमी को कामुक बनाने का कारण बनता है। स्त्री और पुरुष जितने नजदीक होंगेजितने निकट होंगेस्त्री और पुरुष के बीच जितना फासला कम होऔर स्त्री-पुरुष स्त्री-पुरुष होने के लिए जितने कम कांशस रह जाएं...। बच्चे और बच्चियां इस तरह पाले जाएं कि उन्हें पता ही न चले कि वे लड़के हैं या लड़कियां हैं। इतने निकट खेलें और कूदेंसाथ तैरें और दौड़ें कि उनके बीच में एक दीवाल खड़ी न हो जाए। उतना ही अच्छा और कम सेक्सुअल समाज हम निर्मित कर सकेंगे। जितना फासला होगाजितनी दीवाल होगीजितनी हम दूरी को बनाए रखने की कोशिश करेंगेउतनी सेक्सुअलिटी समाज में पैदा होती है।
यह जो हमारा समाज हैमेरी दृष्टि मेंपश्चिम से भी ज्यादा सेक्सुअल भारत का समाज है। हालांकि पश्चिम में हमें दिखाई पड़ता है कि लोग साथ नाच रहे हैं और नंगे घूम रहे हैं और तालाबा पर तैर रहे हैंलेकिन उनसे ज्यादा कामुक हमारी दृष्टि है। हम ऊपर से तो दूर-दूर दिखाई पड़ते हैं और चित्त भीतर से निरंतर यही सोचता है।
और यही मैंने मनु भाई और वहां उन मित्रों को कहा था कि मैं वहां सोया हूं उस कमरे मेंचिंता मुझे होनी चाहिएया चिंता उस महिला को होनी चाहिए। लेकिन मनु भाई अपने कमरे में सो रहे हैं और रात भर नहीं सो पाए और चिंतित हों तो बड़ी तकलीफ की बात है। या तुम यहीं आ जाओतुम भी यहीं सो जाओयह भी समझ में आता है। लेकिन तुम अपने कमरे में क्यों परेशान होऔर दो महीने तक परेशान रहोऔर दो महीने तक तुम्हें नींद न आए और चलता रहे दिमाग मेंतो यह सेक्सुअल माइंड का लक्षण हुआ। यह कोई बहुत स्वस्थयह कोई अच्छे चित्त का लक्षण नहीं है।

अपने से तो पश्चिम का समाज अच्छा है न?

इतना एकदम नहीं कह देता हूंक्योंकि पूरे समाज की बाबत नहीं कह रहा हूं। यानी इतना हां और न में जवाब नहीं दे सकता हूं कि हमसे अच्छा है या बुरा है। कुछ मामलों में हमसे अच्छा हैकुछ मामलों में हमसे बहुत बुरा है।

सेक्स के बाबत में तो...

हांहमसे अच्छा हैहमसे अच्छा है। लेकिन जैसा होना चाहिएवैसा नहीं है। यानी मैं जो कह रहा हूंहमसे अच्छा हैलेकिन जैसा होना चाहिएवैसा नहीं है। क्योंकि हमसे अच्छा जो है वह सिर्फ इसी कारण है कि सप्रेशन उठ गया है। लेकिन सप्रेशन इतना पुराना था कि इतनी तेजी से उठ गया है कि दूसरी अति पर डोलने की स्थिति पैदा हो गई है। वैसे जैसे एक आदमी बीस दिन उपवास कर ले और फिर एकदम से उसको भोजनालय में छोड़ दिया जाए लाकर तो वह एकदम से पागल की तरह खाने लगे और बीमार पड़ जाए। फिर भी मैं कहूंगा कि भूखे मरने की बजाय ज्यादा खाकर मर जाना अच्छा है। फिर भी मैं यह कहूंगा। भूखे मरने की बजाय ज्यादा खाकर मर जाना अच्छा है। यह मैं कहूंगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं ज्यादा खाने वाले की तारीफ कर रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि खाना सम्यक होना चाहिएलेकिन अगर बहुत दिन तक समाज को भूखा रखा जाए तो लोग ज्यादा खाकर मरने की हालात में पैदा हो जाते हैं।
हिंदुस्तान का समाज उतना सप्रेसिव नहीं थाजितना ईसाइयत सप्रेसिव रही पश्चिम में। उस सप्रेशन की वजह सेजब सप्रेशन टूटा तो लोग पागल की तरह सेक्स की तरफ दौड़ पड़े। लेकिन वह सम्यक हो जाएगा। कितनी देर तक दौड़ेंगेवह एक आने वाले बीस-पच्चीस वर्षों में पश्चिम की हालत सम हो जाएगी। लेकिन हमारी हालत सम कभी नहीं हो सकती। वह हमारा रिप्रेशन जारी हैजारी है। हम सिखाए चले जा रहे हैं वही। हमारा बूढ़ा आदमी भी सेक्स से मुक्त नहीं हो पाता है। वह अस्सी साल का भी हो जाए तो भी मुक्त नहीं हो पाता है। उसका माइंड वही काम करता है। वह जिंदगी भर का दबाया हुआ हिस्सा पीछा करता है।
तो मेरी दृष्टि यह है कि चित्त की जो सरलता और सहजता हैउसकी स्वीकृति होनी चाहिए। उसको ऊंचाई की तरफ रूपांतरण करने की चेष्टा होनी चाहिए। लेकिन दमन के मैं पक्ष में नहीं हूं। और उसी को लेकर भी काफी आपके गुजरात मेंउसको लेकर भी काफी चला है कि मैंने कहा कि बच्चे और बच्चियों को बहुत देर तकजहां तक हमसे बन सकेउन पर वस्त्र पहनने का आग्रह नहीं लगाना चाहिए। मेरा कहना यह कि जब छोटे बच्चेसात-आठ साल के बच्चे तो घर में हों तब तक तो हमें बिलकुल आग्रह नहीं लगाना चाहिए--कि वे नंगे घर में घूम सकेंखेल सकें। तेरह-चौदह साल के भी बच्चे हो जाएं और घर के बाथरूम में वे नंगे नहाना चाहें तो उनको नहाने देना चाहिए। अगर तेरह-चौदह साल तक के बच्चेलड़के और लड़कियां एक-दूसरे के शरीर से परिचित हों तो शरीर के प्रति जो जुगुप्सा पैदा होती हैबाद में वह विलीन हो जाएगी। नहीं तो आज बहुत जुगुप्सा हैबहुत तीव्र इच्छा है एक-दूसरे को देखने की। बूढ़े से बूढ़ा आदमी भी स्त्री को देखेगा तो उसकी आंखें उसके कपड़ों में घुस जाएंगी। वह उसकी बचपन से अटकी रह गई इंक्वायरीवह पकड़ी है उसके दिमाग मेंवह उसको खाए जा रही है।
आदिवासी के पास जाकर देखेंतो उसको कोई फिक्र नहीं है।
यानी हालत यह थी कि मेरे एक मित्र कोई तीस वर्ष तक आदिवासियों के बीच रहे। उन्होंने कहाजब शुरू-शुरू में मैं गयाआप आदिवासी स्त्री के स्तन पर हाथ रख कर पूछो कि यह क्या हैतो वह कहेगीयह बच्चे को दूध पिलाते हैं। बस वह इतना कहेगीवह एक इंक्वायरी की बात है। हमने पूछा कि यह क्या हैतो वह कहेगी कि हम इससे बच्चे को दूध पिलाते हैंथन है। अब यह स्वस्थतालेकिन यह हमारे मन में कैसे हो सकती हैयह हमारी कल्पना के बाहर है। और होना यही चाहिए कि शरीर के बाबत यह दृष्टि हो कि वह काम का एक उपकरण है।
फिर एक तरफ हम दमन करते हैं और दूसरी तरफ नंगी तस्वीरें बनाते हैंनंगी फिल्में बनाते हैंनंगे पोस्टर बनाते हैंनंगी किताबें छापते हैं। फिर उनमें हम तृप्ति करते हैं देख-देख कर। अब मेरा कहना यह है कि अगर नंगा ही देखने की इच्छा है तो नंगा आदमी ही देख लोवह अच्छा हैस्वस्थ है बजाय नंगी तस्वीर के। क्योंकि यह मेरी समझ है कि नंगा आदमी देख कर आप नंगा देखने की इच्छा से मुक्त हो जाओगेनंगी तस्वीर देख कर आप कभी मुक्त नहीं हो सकते। क्योंकि तस्वीर बहुत तरकीब से नंगी बनाई गई है। उससे आप मुक्त कभी नहीं हो सकते। वह आपको और पकड़ेगीऔर खींचती चली जाएगी।
तो उसको भी शोरगुल मचाया। उसको यह कि मैं यह कहता हूं कि तेरह-चौदह साल के बच्चों को नंगा घुमाया जाना चाहिए। यह तो मैंने कभी नहीं कहा कि नंगा घुमाया जाना चाहिए। मेरा कहना यह है कि वस्त्रों पर रोक-टोक कम होनी चाहिए और कम से कम घर में भाई-बहिन तो नंगे बाथरूम में नहा सकेंइकट्ठे कुएं पर नहा सकें घर के। घर में तो इतनी बाधा न हो कि घर में बहन या भाई कपड़ा बदलें तो बहुत डरें और दीवाल के पीछे जाएं। अगर बच्चे देख लें मां-बाप को नंगाबच्चे एक-दूसरे को नंगा देख लेंतो वह नंगा देखने की जो तीव्र आकांक्षा हैवह क्षीण हो जाती है। और वह क्षीण हो जाए तो नंगा पोस्टर विलीन हो जाएगा अपने आपनंगी फिल्म विलीन हो जाएगी।
अब एक तरफ हमारे साधु-संत कहते हैं कि नंगा पोस्टर नहीं होना चाहिएएक तरफ कहते हैं कि नंगी फिल्म नहीं बनना चाहिएनंगी किताब नहीं लिखी जानी चाहिएऔर दूसरी तरफ आदमी को ढांकते चले जाते हैं। और इन दोनों बातों में विरोध है। वह इसी नंगे आदमी को देखने की इच्छा वहां पूरी की जा रही है। तो यह जो...पर इनको बिगाड़ कर तो रखा ही जा सकता हैइन सबको तो बिगाड़ कर रखा ही जा सकता है।
अभी कल मुझे किसी ने बंबई में एक कार्टून दिखायाकिसी गुजरात के अखबार में निकला होगा। गांधीजी का एक चित्र है और एक बूढ़ी चरखा कात रही है उसकादर्शनीय लिखा हुआ है। और मेरा एक चित्र है और दो नंगे लड़के और लड़कियां खड़े हुए हैं;दार्शनिक। मैं यह चाहता हूं कि आदमी नंगे खड़े हो जाएं। अब मजा यह है कि मैं यह चाहता हूं कि आदमी का नंगापन मिट जाए।
और नंगापन पैदा किया है हमारे छिपाने ने। जितना हमने छिपायाआदमी उतना नंगा हो गया। और कपड़ेहम सोचते हैं कि छिपाने के लिए हैं तो आप बिलकुल गलती में हैं। अब कपड़े हजारों साल से उघाड़ने के काम में आ रहे हैं। एक नंगी औरत इतनी खूबसूरत कभी नहीं होतीजितनी कपड़ों में बांध करखड़ी होकर दिखाई पड़ती है। नंगी औरत से आप घबड़ा जाएंगेथोड़ी देर में कहेंगेदेवीकपड़ा पहनो। लेकिन वह जो कपड़े में छिपी औरत हैवह आपकी जिज्ञासा को जगाती चली जाती हैजगाती चली जाती है। कपड़े औरत को पचास परसेंट सौंदर्य तो कपड़े देते हैं। और जितनी समझ बढ़ती जा रही है कपड़े के बाबत,उतनी औरत सुंदर होती चली जा रही है। औरत इतनी सुंदर-वुंदर नहीं हैशरीर में क्या सुंदर जैसा होने वाला बहुत-कुछ है?कपड़े उघाड़ रहे हैं शरीर कोछिपा नहीं रहे हैं। और कपड़े उघाड़-उघाड़ कर शरीर को बता रहे हैं।
और सारी कपड़ों को टेक्नीक अब जो हैवह यह है कि कपड़ा शरीर को कितना नंगा कर दे। इसकी तरकीब है पूरे कपड़े से साथ। नंगा शरीर इतना नंगा कभी भी नहीं होताजितना कपड़ों में तरकीब से दिखाया गया शरीर नंगा होता है। क्योंकि कुछ मामले हैंआदमी की क्यूरिआसिटी जगाने के लिए कुछ रास्ते हैं। कुछ दिखाओ और कुछ छिपा लो तो आदमी की क्यूरिआसिटी बढ़ जाती है। पूरा दिखा दो तो क्यूरिआसिटी खत्म हो जाती है। तो शरीर की अब जो तरकीब चली रही है सारी दुनिया मेंवह यह है कि उसको कुछ छिपाओकुछ दिखाओ। वह जो कुछ दिखाओउससे जो छिपा हैउसको देखने की प्रवृत्ति और बढ़ती है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

हां-हांवह सब निकलेगावह सब निकलेगा। वह निकलेगा ही। क्योंकि शरीर को हम देखना भी चाहते हैं नंगा और दिखाना भी चाहते हैं। ये दोनों बातें खयाल रख लेना। वह हमारे स्वभाव का हिस्सा है। हम देखना भी चाहते हैं और दिखाना भी चाहते हैं। और इन दोनों स्वाभाविक इच्छाओं को दबाए हुए हैंतो फिर हम तरकीब निकालेंगे। अब झूठे स्तन बाजार में बिकते हैंजिनको स्त्री लगा ले और दिखाई पड़े वे। आप हैरान होंगे कि यूनान में झूठी पुरुष की जननेंद्रियां भी बिकती हैंजो वह फुलपैंट के अंदर लगा ले और फुलपैंट के ऊपर उसको दिखाई पड़े कि उसकी जो जननेंद्रिय है वह बहुत बड़ी है।
अब यह इसको मैं नंगापन कहता हूं। यह हद्द पागलपन हो गया है कि आप यह सब-कुछ करें। बजाय इसके...यानी यह तो एकदम पागलपन की बात हो गई। ये जो कपड़े चुस्त होते जा रहे हैंवह शरीर को दिखाने के लिए हैंकि शरीर दिखना चाहिए भीतर से कि शरीर कैसा है। और कपड़े चुस्त से चुस्त होते चले जा रहे हैं। और उन चुस्त कपड़ों में नंगे शरीर को दिखाने की आकांक्षा तीव्र होती चली जा रही है। देखने की भी इच्छा हैदिखाने की भी आकांक्षा है। और इस सबको जाल में छिपाते हैं और सीधी-साफ बात करना नहीं चाहते हैं। जो कि सीधी और साफ बातउसको करने में बहुत घबड़ाते हैं।
तो वह कठिनाई तो हैजो मैं कह रहा हूं वह कठिनाई तो है। उसको बिगाड़ कर भी रखा जा सकता हैउसके खिलाफ भी चलाएंगे। लेकिन मेरी इच्छा है उसको मैं कहूंगाजो मुझे ठीक लगता है वह कहना चाहिए। और कुछ लोगों को हिम्मत करनी चाहिए कि वे कहें। शायद समाज धीरे-धीरे सोचने-विचारने को राजी होकुछ तो समझ बढ़े।

अभी जो धर्म के अंदर...हिंदू धर्म हैईसाई धर्म हैतो एक-दूसरे पर जो अग्रेसन करते हैंउसके विषय में आपका क्या खयाल है?

वे तो करेंगे ही। जब तक वाद चलेगातब तक वाद अग्रेसिव होगा। क्योंकि वाद के लिए संस्था चाहिएअनुयायी चाहिए। और वह बाजार है अनुयायियों का। अगर आप दस अनुयायी हैं और तीन संस्था वाले हैं तो तीनों कोशिश करेंगे कि ये ग्राहक किसको मिल जाएं। और ग्राहक के लिए चेष्टा में आक्रमण होगा। दुनिया में जब तक वाद हैंतब तक आक्रमण जारी रहेगा। अगर वाद ही मिट जाएं तो आक्रमण मिट सकता है। और वाद मिट सकते हैं।
अगर हम एक-एक व्यक्ति को यह समझाने की कोशिश करें कि तुम वाद में मत बंधना तो वाद मिट सकते हैं। हिंदू रहेगा तो मुसलमान पर आक्रमण जारी रहेगा। मुसलमान रहेगा तो हिंदू पर आक्रमण जारी रहेगा। क्योंकि दोनों दुकानदार एक ही बाजार में हैं और ग्राहक सीमित हैं। और उन्हीं को लाना हैले जाना है। वह जारी रहेगा। अच्छी दुनिया पैदा करनी होतो वादधर्म,संप्रदायसब जाने चाहिए।
और कुछ कठिनाई नहीं है। अगर बीस साल के लिए मुल्क तय कर लेऔर स्कूल और कालेज में बच्चों के दिमाग से हिंदू-मुसलमान और ईसाई और जैन होने का भाव मिटा देतो बीस साल में खतम हो जाए दो हजार साल का पागलपन। उसमें कोई ज्यादा दिक्कत की बात नहीं है। लेकिन वह नहीं होगावह तो उधर भी धर्म-शिक्षा देने की चेष्टा चलती है। वहां भी उनको पकड़े रहो अपने जाल मेंनिकल न जाएंइसकी कोशिश चलती है। वे तो अग्रेसिव हैं।

आपका...मिला हुआ कि जो चरखा और ग्रामोद्योग वाली बात हैउनके विपक्ष में बोलते हैं। तो व्यक्ति की जो आज माली हालत हैसमाज में जो गरीबी हैबेकारी हैउस हालत में आप क्या उसका विकल्प सोच सकते हैं?

नहींमैं उसका विकल्प नहीं कहता हूंऔर न मैं उसके खिलाफ हूं। मेरा कहना है कि अगर ग्रामोद्योन और चरखा चले तो वह हमारी मजबूरी होसिद्धांत नहीं। आप मेरी बात समझ रहे हैं नवह मजबूरी है हमारी। यानी अगर गांव में कोई दवा उपलब्ध नहीं है और आप होमियोपैथी की गोली खाते हैंतो मैं कहता हूंयह मजबूरी है आपकी। लेकिन वह एलोपैथी का सब्स्टीटयूट नहीं है। मेरा मतलब आप समझे नकोशिश तो हमारी एलोपैथी पैदा करने की होनी चाहिए। नहीं मिलती है तो हम राख भी खा लेते हैं जाकर किसी गुरु की। ठीक हैनहीं मिलने की हालत में ठीक है। भारत की मजबूरी हो अगर चरखातो मैं समझता हूं ठीक है। लेकिन सिद्धांत नहीं है वह कि हमको उसके आधार पर इकोनॉमी खड़ी करनी है। वह हमें जानना चाहिए कि इकोनॉमी तो हमें इंडस्ट्री को ही खड़ी करनी है और आज नहीं कल चरखा चला जाएइसकी कोशिश करनी है। चरखा रह न जाए। यानी हमारी चेष्टा तो यह रहेगी कि चरखा विलीन होता चला जाए। चेष्टा हमारी यह रहेगी कि ग्रामोद्योग न रहे। उद्योग इतना केंद्रित होइतना विकसित होइतना आटोमैटिक होइतना टेक्नालॉजिकल हो कि छोटे-छोटे उद्योग न रह जाएं। चेष्टा हमारी यह होनी चाहिए। मेरा मतलब आप समझे न?
लेकिन मेरी बात को गलत समझा जाता है। मैं यह नहीं कहता कि आप चरखे को आग लगा दो अभी। चरखे कुछ काम कर रहे हैंउनको करने दो। लेकिन चरखा मजबूरी हैजैसे बैलगाड़ी मजबूरी है। चेष्टा तो हमारी यह होगी कि बैलगाड़ी नहीं बचने देंगे मुल्क में। हमारा लक्ष्य तो यह होना चाहिए कि बैलगाड़ी नहीं बचने देंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि आज बैलगाड़ी जो भी कर रही है उसको हम आग लगा दें। लेकिन ध्यान में रहे कि हमको बैलगाड़ी हटा देनी है। उसकी जगह नये वाहन ले आने हैं।
लेकिन विनोबा और गांधी का मामला मजबूरी का नहीं है। विनोबा और गांधी को तो बड़ी इंडस्ट्री मजबूरी है। वह मिट जाए,इसकी चेष्टा...। आप मेरा फर्क समझ रहे हैं नविनोबा और गांधी के लिए जो बड़ी इंडस्ट्री हैवह मजबूरी है। छोटी इंडस्ट्री ही होनी चाहिए।
और धीरे-धीरे बड़ी इंडस्ट्री विकृत हो जाएटूट जाएबिखर जाएविकेंद्रित हो जाए और छोटी इंडस्ट्री आ जाएअवैज्ञानिक मानता हूं। पांच सौ परिवारों के लिए पांच चौके काफी हो सकते हैं। और पांच केंद्रित चौके कम खर्च के होंगेज्यादा सुविधा के होंगे। ज्यादा वैज्ञानिक हुआ जा सकता है। एक डायटीशियन रखा जा सकता है जो सारी जानकारी रखता हो खाने के बाबत। कम श्रम लगेगाकम औरतें उलझेंगी वहां। और औरतों को दूसरे काम में लगाया जा सकता है। सारी चीजें जितनी केंद्रित होंगी,उतना कम श्रम लेती हैंज्यादा सुविधा लाती हैंज्यादा वैज्ञानिक हो जाती हैं। अब हिंदुस्तान भर में कारें बनेंयह बिलकुल फिजूल बात है। एक नगर को कार बनानी चाहिएपूरे मुल्क के लिए कार का काम पूरा हो जाता है। उस गांव का शिल्प भी विकसित होगा जब वहां कार बनेगी दस-पांच पीढ़ियों तकतो वहां के लोग पैदाइश से कार बनाने के शिल्प को लेकर पैदा होंगे। दृष्टि होगीखोज होगीबीन होगी। सारे मुल्क में पचास कारखाने खड़े करने की जरूरत नहीं है।
जगत का जो विकास हैवह केंद्रीकरण की तरफ है। और जितनी केंद्रित व्यवस्था होगी उतनी धन उत्पन्न करने वाली व्यवस्था होती है। हिंदुस्तान हमेशा से विकेंद्रित हैइसलिए दरिद्र है। और अगर आगे भी विकेंद्रित रहेगा तो दरिद्र ही रहेगा। क्योंकि धन पैदा होता है केंद्रित टेक्नालॉजी से।
चरखे से धन पैदा नहीं होतासिर्फ किसी तरह कपड़ा पैदा हो सकता है। किसी तरह से तन ढंक सकते हैं आप। लेकिन चरखा धन पैदा नहीं कर सकता हैयह ध्यान रहे। और तन भी बहुत महंगा ढंकता है। क्योंकि अगर एक आदमी अपने लायक कपड़ा पैदा करना चाहे तो कम से कम चार घंटे रोज उसको चरखा चलाना चाहिएतब वह अपने लायक कोटकमीजपायजामा,चादरसाल भर की पैदा कर पाएगा। चार घंटे आदमी की जिंदगी के सिर्फ कपड़े पहनने के लिए खर्च हो जाएंयह बहुत महंगा हो गया। आदमी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ हो गया। मेरा मतलब आप समझे नतो मेरा कहना...

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

पूरा कपड़े का मतलब फिर जरा दूसरा हो जाएगा। फिर गांधी जैसा कपड़ा पहनना पड़ेगा। मेरा आप मतलब समझे नफिर पूरे कपड़े का मतलब होगा गांधी जैसा कपड़ा। मेरा आप मतलब समझे नमैं समझ गया आपकाआधा घंटा क्या आदमी बिलकुल चरखा न चलाएमहावीर जैसा कपड़ा पहन सकता हैकि नंगा खड़ा रहे। महावीर जैसा कपड़ा...। यह तो हमारे सिकोड़ने का सवाल है।
अगर आदमी को सिकोड़ना है...मैं सिकोड़ने के पक्ष में भी नहीं हूं। मेरा कहना हैआदमी का स्वभाव विस्तार का है और आदमी प्रफुल्ल होता है विस्तार से। सिकोड़ने से कभी प्रफुल्ल नहीं होता। इसलिए साधु-संन्यासी आपको कभी प्रफुल्ल नहीं मालूम पड़ेंगे। हमेशा उदास और रोते हुए मालूम पड़ेंगे। जितना चित्त को आप सिकोड़िएगाउतने आप उदास होते चले जाएंगे। मैं इसमें गांधीजी से सहमत नहीं हूंरवींद्रनाथ से सहमत हूं। मैं रवींद्रनाथ से सहमत हूं। रवींद्रनाथ का कहना है कि कपड़ा उतना पहनो जिससे ज्यादा पहना न जाए। तो कोट पहनेंगे वह तो जमीन छूना चाहिए। रवींद्रनाथऔर मुझे लगता है कि बात ठीक है।
आदमी को विस्तार का मौका देना चाहिए। बड़ा मकान होना चाहिए। छोटा मकान आदमी के दिमाग को भी छोटा करता है। कपड़े भी ढीले और बड़े होने चाहिए। बंधे हुए और छोटे कपड़े आदमी को सिकोड़ते हैं। एफ्लुएंस होना चाहिए आदमी के चारों तरफउसे लगे कि सब है। लेकिन भारत की अब तक की दृष्टि जो हैवह है अपरिग्रह की--कम से कमकम से कमकम से कम। कम से कम दृष्टि मुल्क को दरिद्र बनाती है। मैं उसके पक्ष में नहीं हूं। मेरा कहना है कि ज्यादा से ज्यादा की दृष्टि मुल्क को समृद्ध बनाती है। क्योंकि जो दृष्टि होगीवही हम करेंगे। अगर ज्यादा लाना है मुल्क में तो हम ज्यादा की चेष्टा करेंगे। अगर लाना ही नहीं है तो चेष्टा किसलिए करेंगे?
तो मैं गांधीजी और विनोबाजी की सिकोड़ने की बात के विरोध में हूं। मैं सिकोड़ने के पक्ष में नहीं हूं। मेरा कहना हैमुल्क फैलना चाहिए। यह मैं जानता हूं कि मुल्क गरीब है। और हमारे कहने से नहीं फैल जाएगायह भी मैं जानता हूं। यह भी मैं जानता हूं कि मजबूरी में हमें चरखे उन साधनों का भी उपयोग करना पड़ेगा दस-बीस वर्ष। लेकिन ध्यान रहे कि वह हमारी मजबूरी है और उनको मिटा देना है। उनको बचने नहीं देना है। यानी एक मुल्क हमें पैदा करना है जिसमें चरखे की जरूरत नहीं होगीजिसमें बैलगाड़ी की जरूरत नहीं होगी। यह मेरी दृष्टि हैजो मैं कह रहा हूं।
सिद्धांततः मैं पक्ष में नहीं हूं उनके। मजबूरी की तरह उनको स्वीकार करता हूंइनकार नहीं करता हूं। और यही फर्क है विनोबा और मेरी दृष्टि में। विनोबा के लिए वह सिद्धांत है। और ऐसा होना चाहिए सारी दुनिया मेंयह खयाल है। और यह भी खयाल है कि ऐसा होगा तो दुनिया में शांति होगीयह मेरा खयाल नहीं है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

कोई यंत्र न तो मारक होता हैन तारक होता है। आदमी को हाथ में तय होता है कि क्या होगा। अभी यह पेंसिल से मैं मारक बना सकता हूंआपकी आंख फोड़ सकता हूं। यह पेंसिल अभी मारक हो जाएगी। मेरा आप मतलब समझे नकोई यंत्र न तो मारक होता है और न तारक होता है। आदमी की बुद्धि यंत्र का उपयोग करती है। और आदमी मारक हो तो कोई भी यंत्र मारक है--कोई भी यंत्र। आप यह फोन उठा कर किसी की जान ले सकते हैंखोपड़ी फोड़ सकते हैं। यह सवाल नहीं है। ये सब जो तरकीबें हैं नये यंत्रों से बचाव के लिए सब हिसाब बांधते हैं वे कि इतने यंत्रों से बचोइतने यंत्रों से बचो। एटम बम भी मारक नहीं है। वह किनके हाथ में हैयह सवाल है।
और मेरी अपनी दृष्टि यह है कि कोई यंत्र मारक नहीं हो सकता। यंत्र कैसे मारक हो सकता हैजब तक आप नहीं मारोगेसारे यंत्र साधन हैं। आदमी को हमें बनाने की जरूरत हैआदमी को विकसित करने की जरूरत है। उसकी शांति और प्रेम को बढ़ाने की जरूरत हैकि वह यंत्रों का मारक उपयोग न करे। और नहीं तो संन्यासी भी जो डंडा लेकर चलता हैउससे आपकी खोपड़ी फोड़ सकता है। यह सवाल नहीं है। यह जो विनोबाजी कहते हैं कि मारकत्तारक वगैरह यह सब कुछ मतलब की बातें नहीं हैं बहुत। कुछ कोई मारक-वारक नहीं है।

यंत्रों में शोषण की शक्ति है।

यंत्र में क्याशोषण की शक्ति आदमी में हैयंत्र में नहीं है। यंत्र में नहीं है शोषण की शक्ति। यह भी विनोबा और गांधी गलत बातें कहते हैं। किसी यंत्र में शोषण की शक्ति नहीं है। शोषण की शक्ति आदमी मैं है। वह यंत्र अगर समाजवादी समाज हो तो शोषक नहीं होगाऔर पूंजीवादी समाज है तो शोषक होगा। तो पूंजीवादी समाज को मिटाना नहीं चाहते हैंयंत्र को मिटाना चाहते हैंयह फिर बेईमानी की बातें हैं। अगर यंत्र शोषक है तो उसका मतलब है कि वह शोषकों के हाथ में है। तो शोषकों के हाथ से तो छीनना नहीं हैउनको तो ट्रस्टी बनाना है और यंत्र को मिटाना है। बड़ी अजीब बातें कर रहे हैं आप! यंत्र रूस में शोषक नहीं हैहिंदुस्तान में शोषक हैतो हिंदुस्तान में यंत्र कोई खास ढंग की चीज हैयंत्र शोषक रहेगाअगर शोषकों के हाथ में है। तो यंत्र शोषकों के हाथ में नहीं रहना चाहिएसमाज के हाथ में रहना चाहिए। मगर गांधी और विनोबा इसके लिए भी राजी होते कि यंत्र समाज के हाथ में आए। वे इसके लिए राजी हैं कि यंत्र ही न रह जाए। यह बड़ी अजीब बात है! यह बड़ी अजीब बात है!

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मेरी आप बात समझे कि नहींमेरा कहना यह है कि आदमी के पास जिंदगी बहुत छोटी है और बेवकूफी में गंवाने के लिए नहीं है। मेरी आप बात समझे नकि वह अपनी साबुन भी बनाएवह अपना जूता भी बनाएवह अपना कपड़ा भी बनाएये पागलपन की बातें हैं। आदमी के पास जिंदगी इतनी थोड़ी हैउस थोड़ी जिंदगी को हमें लंबा करना चाहिए। अगर एक आदमी पचास-साठ साल जीता है तो बीस साल तो सोने में निकल जाते हैं। बीस साल उसके दाढ़ी बनाना और कपड़ा धोना और जूता साफ करना और बाजार जाना इसमें निकल जाते हैं। बीस साल बचते हैं उसमें वह दफ्तर में नौकरी करता हैपत्नी से लड़ता है,मित्रों के साथ ताश खेलता हैइसमें गंवाता है। आदमी के पास वक्त नहीं बचता है कि ऊंची उड़ान ले सके।
आपको पता है कि दुनिया में जो भी समृद्ध घर हैंया समृद्ध परिवार हैंया समृद्ध समाज हैउन्होंने ऊंची उड़ान ली है। बुद्ध कोई भिखमंगे के घर में पैदा नहीं होते हैं। और न महावीर भिखमंगे के घर में पैदा होते हैं। ये सारे के सारे करोड़पतियों के घर में पैदा होते हैंजहां लक्जूरी की पूरी व्यवस्था है। तो मन को उड़ने का मौका है। आप पक्का समझ लीजिए कि अमेरिका में वैज्ञानिक पैदा होगा। विचारक पैदा होगावह रूस में पैदा होगा। यहां कहां से पैदा होगायहां रोटी खाने की तकलीफ है। समाज एफ्लुएंट होता है तो माइंड ऊपर जाता है। और गांधी-विनोबा की बात आप मान लो तो आदमी जूते की कीलें ठोंकतासाबुन बनाता और चरखा चलाता रह जाएगा। इससे ऊपर नहीं जा सकता।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मेरी आप बात समझ रहे हैं नमेरा कहना यह है कि समाज का जितना उत्पादन हैवह सारा का सारा उत्पादन धीरे-धीरे आटोमैटिक टेक्नालॉजी के हाथ में चला जाना चाहिए।

जितना जागृतिकरण बढ़ेगाइतनी बेकारीबेरोजगारी बढ़ेगी।

बेकारी बढ़ेगीअगर पूंजीवादी समाज रहेगा। मेरी आप बात समझे नअगर समाज पूंजीवादी है तो यंत्र के बढ़ने से बेकारी बढ़ेगी। अगर समाज समाजवादी है तो यंत्र के बढ़ने से आदमी को समय की सुविधा बढ़ेगीबेकारी नहीं बढ़ेगी। जो आदमी आठ घंटे काम करता थावह छह घंटे करेगाचार घंटे करेगातीन घंटे करेगा। लेकिन अगर पूंजीवादी समाज हैतो यंत्र काम कर देगातो दस आदमियों को बेकार कर देंगेवह अब एक ही आदमी से काम चल जाएगा। अगर समाजवादी समाज है तो जितना काम दस आदमी करते थेवही दस आदमी अब काम करेंगेलेकिन कल आठ-आठ घंटे करते थेअब दो-दो घंटे करेंगे। तो समाज बदलना चाहिएयंत्र नहीं। यंत्र तो समाज के लिए बड़ा हितकारी हैबड़ा हितकारी है। हमें जो तकलीफ हो रही--जैसे आपका अभी यहां गुजरात में उपद्रव चलता है कि कोई मील में अगर लाना है कंप्यूटर और लगाना हैफलां करना हैया इंसोरेंस वाले लाना चाहते हैंतो हमको तकलीफ होती है। वह तकलीफ पूंजीवाद समाज की है। कंप्यूटर की नहीं है वह तकलीफ। कंप्यूटर आएगा तो तब काम हलका हो जाएगाकम हो जाएगा और आदमी के पास सुविधा बचेगी कि कुछ ज्ञान सीखेकुछ खोजेकुछ ध्यान करेकुछ और करेकुछ उसको सुविधा हो संगीत ही सीखे।
आप एक बात ध्यान में रखिए कि आदमी जो काम भी रोटी कमाने के लिए करता हैवह काम कभी आनंदपूर्ण नहीं हो सकता। चाहे कोई विनोबा समझाएंदुनिया में कोई भी समझाएंरोटी कमाने वाला काम कभी भी आनंदपूर्ण नहीं हो सकता। जो काम आदमी हॉबी की तरहसुख की तरह करता हैवह आनंदपूर्ण हो सकता है। एक आदमी सितार बजाए खुशी से तो एक बात है,और आप दो घंटे की नौकरी देकर सितार बजवाएंबिलकुल बात दूसरी हो गईबिलकुल बात दूसरी हो गई। आदमी की जिंदगी में उतना ही आनंद बढ़ता है जितना वह अपनी मौज से कुछ कर सके। और मौज से कर सके इसके लिए जरूरी है कि दुनिया में यांत्रिकता का अधिकतम विस्तार हो।
लेकिन यांत्रिकता खतरनाक सिद्ध होगी पूंजीवाद के लिए। पूंजीवाद में यांत्रिकता बढ़ेगी तो बेकारी बढ़ेगी। बेकारी बढ़ेगी तो क्रांति की संभावना बढ़ती है। और इसीलिए मैं कहता हूंगांधी-विनोबा की बात पूंजीवाद को बचाने के लिए सबसे कारगर तरकीब है। अगर समाज को पुराने यंत्रों पर ले जाया जा सके तो समाज पूंजीवाद के पीछे लौट जाएगा।
समाजवाद पूंजीवाद के आगे की मंजिल है। पीछे की मंजिल नहीं है वह। जब तक केंद्रित उद्योग न होपूंजीवाद पैदा नहीं होता है। और पूंजीवाद पैदा न हो तो समाजवाद भी नहीं आता। अगर चरखा और यह सब मान लिया जाएहालांकि कोई मानेगा नहीं,न कोई मानता हैअगर यह मान लिया जाए तो समाज की स्थिति पूंजीवाद से पिछड़ी स्थिति हो जाएगी।
और अगर एक-एक आदमी चरखा कातने लगे तो जो प्रोलिटेरियट कामजदूर का वर्ग हैवह खतम हो जाएगा। वह तो इसलिए पैदा हुआ है कि एक केंद्रित उद्योग पैदा हुआ है। एक इंडस्ट्री हैतो वहां दस हजार मजदूर इकट्ठे हैं। वह दस हजार मजदूर की ताकत हो गई है इकट्ठी। अगर घर-घर में चरखा हो जाएतो मजदूर की ताकत खतम हो जाएगी फौरनउसका इकट्ठा होना खतम हो जाएगा। वह कहीं रह नहीं जाएगा। और अगर हम इस तरह सारे उद्योग को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ दें तो पूंजीवाद की जो व्यवस्था है वह पीछे लौट जाती हैसामंतवाद हो जाती है। उस सामंतवादी व्यवस्था से समाजवाद कभी नहीं आ सकता।
तो एक लिहाज से विनोबा से भी ज्यादा बिड़ला समाजवाद के लाने में सहयोगी हैं। अगर समझा जाए ठीक से तो। विनोबा और गांधी से ज्यादा बिड़ला और डालमिया और साहू सहयोगी हैं समाजवाद के लाने में। क्योंकि जितना पूंजीवाद तीव्र होता है,जितना यंत्र बढ़ता हैबेकारी बढ़ती हैनीचे का मजदूर बढ़ता हैउतनी क्रांति होने की संभावना बढ़ती है। और वह क्रांति आएगी ही। क्योंकि या तो यंत्र कम करने पड़ेंगे और या क्रांति लानी पड़ेगी। क्योंकि बढ़ते हुए यंत्र समाज को बदलने के लिए मजबूर कर देते हैं। और आपको एक व्यवस्था लानी पड़ेगीजिसमें कि यंत्र आदमी को बेकार न कर सकेबल्कि आदमी को समय दे।
तो वह आप ठीक कहते हैं। अभी तो बेकारी बढ़ती हैअभी तो बढ़ती है। लेकिन हमको समाज बदलना चाहिएयंत्र नहीं रोकना चाहिए। समाज बदलना चाहिए। बीमार को नहीं मार डालना चाहिएबीमारी बदलनी चाहिए। यह तो बात ठीक है कि बीमार मर जाए तो बीमारी अपने आप खतम हो जाती है। यह बात बिलकुल ठीक है। लेकिन इससे बीमार को मार डालने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। यंत्र को नहीं मार डालना है। यंत्र के कारण जो बीमारी पैदा हो रही हैवह यंत्र के कारण नहीं हो रहीवह पूंजीवाद की वजह से पैदा हो रही है। यानी संक्षिप्त मैं यह कहना चाहता हूं कि यंत्र न तो खराब हैन मारक हैन विध्वंसक है। यंत्र का हम कैसा उपयोग करें और कैसा समाज होइस पर निर्भर करेगा सब कुछ। यंत्र तो बढ़ते जाना चाहिएसमाज को बदलना चाहिए। समाज को बदलने से जो डरते हैंवे कहेंगे कि यंत्र को ही मत लाओ बीच में। क्योंकि वह आएगा तो बदलाहट आनी जरूरी हो जाएगी।

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