बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-01

एक मृत महापुरुष का जन्म
मेरे प्रिय आत्मन्!
वेटिकन पोप अमेरिका गया हुआ था। हवाई जहाज से उतरने के पहले उसके मित्रों ने उससे कहा,एक बात ध्यान रखनाउतरते ही हवाई अड्डे पर पत्रकार कुछ पूछें तो थोड़ा सोच-समझ कर उत्तर देना। और "हांऔर "नमें तो उत्तर देना ही नहीं। जहां तक बन सकेउत्तर देने से बचने की कोशिश करनाअन्यथा अमेरिका में आते ही परेशानी शुरू हो जाएगी।
पोप जैसे ही हवाई अड्डे पर उतरावैसे ही पत्रकारों ने उसे घेर लिया और एक पत्रकार ने उससे पूछावुड यू लाइक टु विजिट एनी न्युडिस्ट कैंपवाइल इन न्यूयार्कक्या तुम कोई दिगंबर क्लबकोई न्युडिस्ट क्लबकोई नग्न रहने वाले लोगों के क्लब मेंन्यूयार्क में रहते समय जाना पसंद करोगे?

पोप ने सोचाहां और न में उत्तर देना खतरनाक हो सकता है। "हांकहने का मतलब होगा कि मैं जाना चाहता हूं देखने। "न'कहने का मतलब होगा कि जाने से डरता हूं। उत्तर देने से बचने के लिए उसने उलटा प्रश्न पूछा। उसने पूछाइज़ देयर एनी न्युडिस्ट क्लब इन न्यूयार्ककोई न्यूयार्क में नंगे लोगों का क्लब हैफिर बात दूसरी चल पड़ी। उसने सोचा कि छुटकारा हुआ।
लेकिन दूसरे दिन सुबह अखबारों में पहले ही पृष्ठ पर बड़े-बड़े अक्षरों में खबर छपी थी। खबर थी कि महामहिम परम पूज्य पोप ने हवाई अड्डे पर उतरते ही पत्रकारों से पहली बात यह पूछीइज़ देयर एनी न्युडिस्ट क्लब इन न्यूयार्ककोई नंगे लोगों का क्लब है न्यूयार्क मेंयह उतरते ही पहली बात पत्रकारों से महामहिम पोप ने पूछी।

कुछ ऐसा ही मामला मेरे और पत्रकारों के बीच भी हो गया। लेकिन मेरे संबंध में और पत्रकारों के बीच में और पोप और पत्रकारों के बीच हुई बात में थोड़ा फर्क है। एक तो फर्क यह है कि मैंने "हांऔर "नमें उत्तर दिए। मैं कोई राजनीतिज्ञ नहीं हूं कि उत्तरों से बचने की कोशिश करूं। घुमाव-फिराव से मुझे कोई नाता और संबंध नहीं है। जो बात मुझे ठीक लगे और जैसी लगे वैसा ही कह देने को मैं कर्तव्य समझता हूं। मेरे उत्तरों तक तो ठीक थालेकिन उन उत्तरों को इस तरह बिगाड़ करविकृत करके अधूरे प्रसंग के बाहर उपस्थित किया गया।
मैं तो यहां नहीं थापंजाब था। लौटा तो यहां देख कर बहुत हैरानी मालूम पड़ी और आश्चर्य मालूम पड़ा कि चीजें इस रंग में भी पेश की जा सकती हैं। लेकिन मित्र तो घबड़ाए हुए थे। मैं खुश हुआ। मैंने कहाइससे घबड़ाने की बात नहीं। एक लिहाज से पत्रकारों ने बड़ी कृपा की है और भविष्य में भी ऐसी ही कृपा करते रहेंगे तो अच्छा होगा। बहुत लोगों तक खबर पहुंच गईबात पहुंच गई। कोई फिक्र नहीं कि गलत ढंग से पहुंची। लेकिन वे मुझे सुनने आ सकेंगे तो उन्हें ठीक बात का बोध हो सकेगा।
कई बार कुछ लोग जिन बातों को सोचते हैं कि अभिशाप बन जाएंगीवे ही बातें वरदान भी बन सकती हैं।
मैं राजकोट गयावहीं से लौटा आज। वहां मित्र बहुत घबड़ाए हुए थे। लेकिन परिणाम यह हुआ कि जहां दस हजार लोग मुझे सुनते थेवहां बीस हजार लोगों ने मुझे सुना। वे समझ कर गए और आश्चर्य करते गए कि चीजों को यह रंग और रूप भी दिया जा सकता है। जो मैंने बात की थीइन तीन दिनों में उसी संबंध में पूरी बात मुझे करनी है।
मेरी दृष्टि में भारत के दुर्भाग्यों में से एक दुर्भाग्य यह रहा है कि हम अपने महापुरुषों की आलोचना करने में आज तक भी समर्थ नहीं हो पाए। और जो कौम अपने महापुरुषों की आलोचना करने में समर्थ नहीं हो पातीउस कौम के संबंध में दो ही बातें कही जा सकती हैं। एक तो यह कि वह अपने महापुरुषों को इस योग्य नहीं समझती कि उनकी आलोचना की जा सके या अपने महापुरुषों को इतना कमजोर और साधारण समझती है कि आलोचना में वे टिक नहीं सकेंगे।
मैं गांधी के संबंध में ये दोनों ही बातें मानने को तैयार नहीं हूं। मेरी समझ में गांधी कोई कागजी महापुरुष नहीं हैं कि आलोचना की वर्षा आएगी और उनका रंग-रोगन बह जाएगा। कुछ कागजी महापुरुष होते हैं उन्हें आलोचना से बचाया जाना चाहिएक्योंकि वे आलोचना में खड़े नहीं रह सकते हैं। लेकिन गांधी को मैं कागजी महापुरुष नहीं मानतावे कोई कागज की प्रतिमा नहीं हैं कच्चे रंग में रंगी हुई कि वर्षा आएगी आलोचना की और सब नष्ट हो जाएगा।
गांधी को मैं दुनिया के उन थोड़े से महापुरुषों में से एक मानता हूंजो पत्थर की प्रतिमाओं की तरह हैंजिन पर वर्षा होती है तो धूल बह जाती हैप्रतिमा और निखर कर प्रकट होती है।
गांधी कोई कच्चे महापुरुष नहीं हैं। लेकिन गांधी के पीछे जो अनुयायियों का वर्ग हैवह शायद स्वयं कच्चा हैइसलिए गांधी को भी कच्चा मान लेता है। खुद के भय ही हम अपने महापुरुषों पर भी आरोपित कर देते हैं। हमारी अपनी ही हालतें हम अपने महापुरुषों पर भी थोप देते हैं। गांधी की आलोचना निश्चित की जानी चाहिए। क्योंकि गांधी की आलोचना से गांधी का तो कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं हैहमारा जरूर कुछ हित हो सकता है।
यह बात अत्यंत अप्रौढ़ और इम्मैच्योर मालूम होती है कि हम अपने महापुरुषों की सिर्फ पूजा करें और कभी कोई सृजनात्मक आलोचनाक्रिएटिव क्रिटिसिज्म करें। यह भी कुछ भय मालूम होता है पीछे कि कहीं हमारे महापुरुष की कोई भूल न खयाल में आ जाए।
ध्यान रखना चाहिए कि पृथ्वी पर ऐसा कोई मनुष्य कभी नहीं हुआ है जिससे भूलें न होती हों। एक बात का फर्क होता है--छोटे लोग छोटी भूलें करते हैंमहापुरुष बड़ी भूलें करते हैं। महापुरुष छोटी भूलें नहीं करते हैं।
लेकिन पृथ्वी पर कोई मनुष्य कभी नहीं होता जिससे भूल न होती हो। जिससे भूल नहीं होती है वह मोक्ष चला जाता है। उसे पृथ्वी पर आने की कोई जरूरत ही नहीं होती है।
लेकिन हमारे मन में यह घबड़ाहट रहती है कि हमारे महापुरुष की कोई भूलकोई गलती खयाल में न आ जाए। इसलिए पूजा करोप्रार्थना करोउपासना करोलेकिन विचार कभी मत करना।
क्योंकि ध्यान रहेजैसे ही विचार शुरू होगाआलोचना प्रारंभ होती है। बिना आलोचना के विचार कभी होता ही नहीं है। पूजा हो सकती हैस्तुति हो सकती हैप्रशंसा हो सकती है। लेकिन वह विचार नहीं है। और जो कौम अपने महापुरुषों पर विचार नहीं करतीउसके महापुरुषों का जीवन व्यर्थ हो जाता हैवह उसके कौम के काम में ही नहीं आ पाता है।
हम तीन-चार हजार वर्षों से यही कर रहे हैं! महावीर हैंबुद्ध हैंकृष्ण हैंराम हैं। हमें उनकी पूजा करनी हैविचार उन पर कभी नहीं करना हैध्यान रहेजिन पर हम विचार नहीं करते हैंउनका हमारे जीवन पर कोई संस्पर्शहमारे जीवन को परिवर्तन करने वाला कोई भी प्रभाव कभी नहीं पड़ता है।
पूजा से हम रूपांतरित नहीं होते हैंविचार से हम रूपांतरित होते हैं। और पूजा हो सकता है सिर्फ हमारी तरकीब हो महापुरुर्षों से बच जाने की।
और मुझे तो ऐसा ही लगता है कि जिससे हम बचना चाहते हैंउसी को भगवान बना कर मंदिर में बिठा देते हैं। फिर हमारी झंझट समाप्त हो जाती है। कभी दो फूल चढ़ा आते हैंकभी माला पहना आते हैंकभी स्तुति कर लेते हैंकभी जन्म-दिन मना लेते हैं और हमसे उसका फिर कोई संबंध नहीं रह जाता!
जिस महापुरुष को हमें व्यर्थ करना होउसकी हमने तरकीब निकाल ली है कि हम उसकी पूजा करेंगेस्तुति करेंगेलेकिन उस पर विचार नहीं करेंगे। क्योंकि विचार करने का परिणाम एक ही हो सकता है कि विचार करने से वह हमें इस योग्य मालूम पड़े कि हम अपने जीवन को बदलें।
लेकिन हम बहुत होशियार हैंयह देश बहुत होशियार हैअपने-आपको धोखा देने में। यह देश सोचता है कि हम महावीर की पूजा करते हैं तो हम बड़ा भारी काम कर रहे हैंकि हम बुद्ध की पूजा करते हैं तो शायद बुद्ध पर कोई उपकार कर रहे हैंया गांधी की पूजा शुरू की है तो गांधी पर हमारा कोई अनुग्रह हो रहा है। इस भ्रांति में रहने की जरूरत नहीं है। महापुरुष पूजा के लिए न पैदा होते हैंन उनकी पूजा की कोई लालसा है। और जिसके मन में पूजा की लालसा होवह और कुछ भी होमहापुरुष नहीं हो सकता है।
महापुरुष का उपयोग यह है कि वह हमारे जीवन मेंहमारे खून मेंहमारे विचार मेंहमारी प्रतिभा में प्रविष्ट हो सके।
और हमारी प्रतिभा में किसी को द्वार तभी मिलता हैजब हम विचार करते हैंआलोचना करते हैंखोजबीन करते हैंअन्वेषण करते हैंतब प्रवेश मिलता है हमारी प्रतिभा के भीतर।
हमारे सारे महापुरुष भारत की प्रतिभा के बाहर खड़े हुए हैंमंदिरों में बंद। भारत के प्राणों में उनका कोई प्रवेश नहीं हो सका है।
मैं नहीं चाहता हूं कि पुराने महापुरुषों की तरह गांधी जैसा अदभुत व्यक्ति भी व्यर्थ हो जाए। इसलिए मैं चाहता हूं कि गांधी पर जितनी सतेज आलोचना और विचार हो सके उतना ही सौभाग्य मानना चाहिए। लेकिन वह जो गांधी के पीछे चलने वाले गांधीवादियों का तपका हैवह इस बात से बहुत घबड़ाता है। वह क्यों घबड़ाता हैवह इसलिए घबड़ाता है कि उसे डर है कि गांधी की आलोचना अंततः गांधीवादी की आलोचना बन सकती है। उसका भय। उसका भय यह नहीं है कि गांधी की आलोचना से उसको कोई परेशानी होने वाली है। उसका भय यह है कि गांधी की आड़ में वह खुद छिपा हुआ है और गांधी की आलोचना कहीं उसकी आलोचना न बन जाए। इसलिए वह गांधी की आलोचना और विचार करने से बचना चाहता है। वह कहता है पूजा के थाल चलाओ और गांधी को भगवान बना लो। मैं भगवान से एक ही प्रार्थना करता हूं कि कृपा करनागांधी को भगवान मत बनने देना। क्योंकि जितने लोग हमारे पहले भगवान बन गए हैंवे भगवान बनते ही व्यर्थ हो गए। समाज और देश के लिए उनका कोई उपयोग नहीं रह गया।
गांधी एक अदभुत व्यक्ति हैं। शायद पृथ्वी पर दो-चार लोग ही उस कोटि के पैदा हुए हैं। लेकिन पीछे चलने वाले लोग हमेशा महापुरुष की हत्या करने की कोशिश करते हैं। वह हत्या उनको भगवान बना कर की जाती है।
जिस आदमी को भी भगवान बना दियाउसकी आदमी की तरह हत्या हो गई। भगवान की तरह स्थापना हो गईआदमी की तरह हत्या हो गई।
और हम आदमियों से ही प्रभावित हो सकते हैं और आदमियों के साथ ही हम जी सकते हैं और आगे चल सकते हैं। गांधी के साथ फिर वही शरारत शुरू हो गई जो हमने रामकृष्णबुद्ध और महावीर के साथ की थी। लेकिन हम अतीत की भूलों से कुछ सीखते भी मालूम नहीं पड़ते हैं।
मैं चाहता हूं कि गांधी को हम मनुष्य ही बनाए रखेंताकि वे हमारी मनुष्यता के काम आ सकें। हम उन पर निरंतर विचार कर सकेंसोच सकें और आगे बढ़ सकें। इस खयाल से मैंने उनकी कुछ आलोचना की थी।
मुझे अनेक पत्र पहुंचे कि जो व्यक्ति मर चुका है उसकी आलोचना हमें नहीं करनी चाहिए। मैंने उन पत्रों के उत्तर में लिखा कि शायद तुम्हें पता नहीं है कि गांधी उन लोगों में से नहीं हैं जो इतनी आसानी से मर जाएं। गोडसे ने जो भूल की थी वही गांधीवादी भी भूल करते हैं। गोडसे ने भूल की थी कि गोली मार देंगेइस आदमी का शरीर मर जाएगातो यह गांधी मर जाएगा। गांधीवादी भी समझते हैं कि शरीर गिर गया गांधी का तो गांधी मर गए। अब उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए।
यह बात ठीक है छोटे-मोटे लोगों के बाबत कि वे मर जाएं तो हमें उनकी प्रशंसा ही करनी चाहिएक्योंकि मरे हुए आदमी की क्या आलोचना करनी है! एक बुरा आदमी भी गांव में मर जाता है तो भी उसकी कब्र पर लोग कहते हैं कि बड़ा अच्छा आदमी था। छोटे आदमियों के साथ यह ठीक है कि उन बेचारों के पास क्या है जो उनके मरने के बाद बच रहेगा!
लेकिन गांधी जैसे महापुरुषों के साथ यह अन्याय है कि हम समझें कि वे मर गए। मैं गांधी कोउनके प्रभाव को अभी जिंदा मानता हूं और उनके साथ एक जिंदा आदमी का व्यवहार करना चाहता हूंएक मरे आदमी का नहीं। लेकिन गांधीवादी कहते हैं कि वे मर गएअब उनकी बात नहीं करनी चाहिए।
शायद आपने सुना होकि सुकरात की जिस दिन मौत हुईउसे जहर दिया गया। जहर देने के पहले उसके मित्र उसके पास गए और उसके एक शिष्य क्रेटो ने उससे पूछा कि सांझ आपको जहर दे दिया जाएगा तो आप हमें बता दें कि हम दफनाएंगे किस तरह आपकोकिस विधि सेकिस मार्ग सेगड़ाएंजलाएंक्या करेंआप रास्ता बता देंवैसा हम करें।
पता हैसुकरात हंसने लगा और उसने क्रेटो से कहापागलजो मेरे दुश्मन समझते हैं कि मुझे जहर देकर मार डालेंगे वही तुम समझते हो कि शरीर के मरने से मैं मर जाऊंगा और तुम मेरे दफनाने का विचार करने लगे हो!
मैं तुम्हें कहता हूं क्रेटोकि तुम सब मर जाओगेतुम सब दफना दिए जाओगेतब भी मैं जिंदा रहूंगा!
आज ढाई हजार साल हो गएसुकरात अभी जिंदा है। क्रेटो का नाम सिर्फ हमें इसीलिए याद है कि सुकरात ने वह नाम लिया था। क्रेटो कभी का मर चुका। वे साथी मर चुकेजिन्होंने सोचा होगा हम सुकरात को दफना रहे हैंलेकिन सुकरात जिंदा है।
महान व्यक्ति का एक ही अर्थ होता है कि वह शरीर के पार उठ गया। अब शरीर के मिटने से उसके मिटने की कोई संभावना नहीं है।
मैं गांधी को एक जिंदा आदमी मान कर व्यवहार करना चाहता हूं। और मुझे लगता है कि अभी गांधी को गांधीवादी दफनाने की बात न करें तो बहुत अच्छा है। इतने जल्दी मरा हुआ मानने की जरूरत नहीं है। लेकिन वे भयभीत हैं कि कोई आलोचना न की जाए। और मैंने आलोचना क्या की हैमेरी आलोचना गांधी के विरोध में नहीं हैलेकिन गांधीवाद के विरोध में है। और मेरी दृष्टि है कि सच बात तो यह है कि गांधीवाद जैसी कोई चीज गांधी की कल्पना में थी ही नहीं। गांधी नहीं मानते थे कि उनका कोई वाद है। मानते थे कि जो उनकी अंतर्दृष्टि को ठीक मालूम पड़ता हैवह प्रयोग करते चले जाते हैं। उनका कोई सिस्टम,कोई रेखाबद्ध वाद नहीं हैलेकिन गांधी के पीछे जो गिरोह इकट्ठा हुआउसने गांधीवाद खड़ा कर रखा है।
दुनिया में हमेशा अनुयायी--पंथसंप्रदाय और वाद खड़े करते हैं और जितने पंथसंप्रदाय और वाद मजबूत हो जाते हैंउतना ही हम और हमारे महापुरुषों के बीच एक पत्थर की दीवाल खड़ी हो जाती हैजिसको पार करना मुश्किल हो जाता है।
गांधी का कोई वाद नहीं है इन अर्थों मेंलेकिन गांधी ने जीवन भर जो किया हैजो सोचा हैजो विचारा हैवह हैऔर उस पर हमें बहुत स्पष्ट निर्णय लेना जरूरी हैक्योंकि उसी निर्णय के आधार पर इस देश के भविष्य को बनाने का हम विचार करेंगे।
गांधीवादी कहते हैं कि उस पर विचार नहीं करना है। जो उन्होंने कहा है उसे वैसा ही मान लेना है। यह बात इतनी अंधी और खतरनाक है कि अगर इन सारी बातों को इसी तरह मान लिया गया तो गांधी की आत्मा भी आकाश में कहीं होगी तो रोएगी,क्योंकि गांधी खुद अपनी जिंदगी में हर वर्ष अपनी पिछली भूलों को स्वीकार करते रहे और मानते रहे कि जो भूलें हो गई हैं उन्हें छोड़ देना है। अगर गांधी जिंदा होते तो इन बीस वर्षों में उन्होंने बहुत सी भूलें स्वीकार की होतीं। लेकिन गांधीवादी कहता है कि अब हमें कोई भूल पर ध्यान नहीं देना है। जो कहा गया है उसे चुपचाप मान लेना है।
यह अंधापन बहुत महंगा साबित होगा। बुद्ध और महावीर को अंधेपन से मान लेने से उतना नुकसान नहीं हो सकताक्योंकि बुद्ध और महावीर ने व्यक्तिगत मनुष्य की आत्मोत्कर्ष की बात की है। हिंदुस्तान में एक पहले धार्मिक व्यक्ति थे गांधी जिन्होंने सामाजिक-उत्कर्ष का भी विचार किया है। बुद्ध और महावीर को माने लेने से एक-एक व्यक्ति भटक सकता हैगांधी को अंधेपन से मान लेने से पूरे समाज का भविष्य भटक सकता हैपूरा देश भटक सकता है। इसलिए गांधी पर विचार कर लेना बहुत जरूरी है।
गांधी एक अर्थों में अनूठे हैं भारत के इतिहास में। भारत के धार्मिक व्यक्ति ने कभी भी समाजराजनीति और जीवन के संबंध में सीधी कोई रुचि नहीं ली है। भारत का महापुरुष सदा से पलायनवादी रहा हैउसने पीठ कर ली है समाज की तरफ। उसने मोक्ष की खोज की हैसमाधि की खोज की हैसत्य की खोज की है--लेकिन समाज और इस जीवन का भी कोई मूल्य है यह उसने कभी स्वीकार नहीं किया।
गांधी पहले हिम्मतवर आदमी थे जिन्होंने धार्मिक होते हुए समाज की तरफ से मुंह नहीं मोड़ा। वे समाज के बीच में खड़े रहे और जिंदगी के साथ और जिंदगी को उठाने की उन्होंने कोशिश की। यह पहला धार्मिक आदमी था जो जीवन-विरोधी नहीं था,जिसका जीवन के प्रति स्वीकार का भाव था। स्वाभाविक पहले आदमी से बड़ी भूलें होनी संभव है। पायोनियर हमेशा भूलें करता है। वह पहले आदमी थेएक नई दिशा में प्रयोग कर रहे थे और अगर हम उनको अंधे होकर माने लेंगे तो हम बहुत खतरनाक रास्तों पर जा सकते हैं।
जो बातें मैंने आलोचना की हैं उनमें से कुछ एक-दो सूत्रों पर आज और फिर आने वाले दिनों में बात करूंगा।
मेरी दृष्टि में भारत की बहुत प्राचीन समय से कुछ बुनियादी भूलों में एक भूल यह रही है कि हमने दरिद्रता को एक तरह की महिमाएक तरह का गौरवएक तरह का ग्लोरीफिकेशन किया है। हम दरिद्रता को एक तरह का सम्मान देते रहे हैं। हमने एक फिलासफी विकसित की है जिसको फिलासफी ऑफ पावर्टी कहा जा सकता हैदरिद्रता का एक दर्शन विकसित किया है। हमने यह स्वीकार कर रखा है पांच हजार वर्षों से कि दरिद्र होना भी कोई बड़े गौरव की बात है। और उसके साथ ही धन-संपदा,समृद्धि इनकी एक निंदाइनका एक बहिष्कार भी हमारे मन में रहा है। परिग्रह का एक विरोधअपरिग्रह की एक स्थापना। समृद्धि-विस्तार इसका विरोधसंकोच-दरिद्रता इसकी स्वीकृति हमारे खून में प्रविष्ट हो गई है।
मैं कहना चाहता हूं कि यह इस विचार का परिणाम है कि भारत पांच हजार वर्षों की लंबी सभ्यता के बाद भी दरिद्र है और समृद्ध नहीं हो पाया है। इस विचार का यह अंतिम परिणाम है।
गांधी ने जाने-अनजाने पुनः इसी दरिद्रता के दर्शन को फिर से सहारा दे दिया है। गांधी ने फिर दरिद्र को दरिद्रनारायण कह दिया है। दरिद्र नारायण नहीं हैदरिद्रता पाप हैदरिद्रता रोग है। उससे घृणा करनी हैउसे नष्ट करना है। दरिद्र को अगर हम पवित्र और भगवान और इस तरह की बातें करेंगे और दरिद्रता को महिमावंत करेंगे तो हम दरिद्रता को नष्ट नहीं कर सकते हैंहम दरिद्रता को बनाए ही रखेंगे। हम दरिद्रता पर दया कर सकेंगेसेवा कर सकेंगे दरिद्र कीलेकिन दरिद्र को मिटा नहीं सकेंगे। दरिद्र की सेवा की जरूरत नहीं हैदरिद्र के गुणगान की जरूरत नहीं हैदरिद्र को दया की जरूरत नहीं हैदरिद्र को पृथ्वी से समाप्त करना हैदरिद्र को नष्ट करना हैदरिद्र को नहीं बचने देना है। दरिद्रता के साथ एक महामारी का व्यवहार करना है। प्लेग और हैजा और मलेरिया के साथ हम जो व्यवहार करते हैं वह दरिद्रता के साथ व्यवहार करना है। लेकिन हिंदुस्तान की जो परंपरा है दरिद्रता की और त्याग कीगांधी के मन पर उसका प्रभाव हैसारे मुल्क के मन पर उसका प्रभाव है। हमने जाने-अनजाने हमारे अचेतन मेंअनकांशस तक यह बात प्रविष्ट हो गई है कि दरिद्रता को कुछ गौरव है।
यह बहुत ही खतरनाक दृष्टि हैयह बहुत ही आत्मघाती दृष्टि हैक्योंकि जब हम दरिद्रता को इस भांति स्वीकार करते हैं,सम्मान देते हैं और दरिद्रता में संतोष कर लेने को एक धार्मिक गुण मानते हैंतो फिर समाज समृद्ध कैसे होगासमाज संपत्ति पैदा कैसे करेगा?
हम भी इसी पृथ्वी पर हैंदूसरे देश भी इसी पृथ्वी पर हैं। हम पीछे इतिहास में उनसे कहीं ज्यादा समृद्ध थे जो आज हमें भीख दे रहे हैं। हम कहीं ज्यादा खुशहाल थेआज हमें भीख मांगनी पड़ रही है। और शायद आगे भी हमें भीख ही मांगती रहनी पड़ेगी। अगर हमने अपने आज तक के जीवन को जीने की फिलासफी और व्यवस्था को रूपांतरित नहीं किया तो हम आगे भी यही करते चले जाएंगेजो हमने पीछे किया है।
संपत्ति आसमान से पैदा नहीं होती हैसंपत्ति श्रम से पैदा होती है। श्रम आकस्मिक नहीं होताश्रम विचार से जन्म लेता है और अगर हमारे विचार में संपदा का विरोध है तो हम न श्रम करेंगेन हम संपदा पैदा करेंगे।
यह जो भारत एकदम श्रम-शून्य मालूम पड़ता है--सुस्तकाहिलअलाल मालूम पड़ता हैलेजी मालूम पड़ता हैयह लेजीनेस,यह सुस्तीयह काम न करने की प्रवृत्तियह प्रवृत्ति उस विचार से पैदा होती है जो दरिद्रता में संतोष मानने की शिक्षा देता है। और यह भी ध्यान रहे कि बुद्ध और महावीर जैसे लोग राजघरों को छोड़ कर दरिद्र हो गए।
हिंदुस्तान में जैनियों के चौबीस तीर्थंकर राजाओं के लड़के थे। बुद्ध राजा के लड़के थेराम और कृष्ण राजाओं के लड़के थे। हिंदुस्तान के ये सारे तीर्थंकर और अवतार राजपुत्र थे। ये सारे तीर्थंकर और बुद्ध राजमहलों को छोड़ कर दरिद्र हो गए और इनके दरिद्र होने से हमारी दरिद्रता के दर्शन को और सहारा मिला। लेकिन एक बात ध्यान रहेअमीर आदमी का दरिद्र होना एक बात ही दूसरी है और दरिद्र का दरिद्रता में संतुष्ट हो जाना बात दूसरी है। इन दोनों बातों में बुनियादी फर्क है।
अमीर आदमी जब दरिद्र होता है तब वह अमीरी को जान कर दरिद्र होता है। अमीरी व्यर्थ हो गईइसलिए दरिद्र होता है। उसकी दरिद्रता और उस आदमी की दरिद्रता जिसने कभी अमीरी नहीं जानीभरपेट भोजन नहीं जानाकपड़े नहीं जानेइन दोनों की दरिद्रता में कोई भी संबंध नहीं है।
सच बात तो यह है कि अमीर जब दरिद्र होता है तो दरिद्रता भी एक आनंद मालूम होती हैक्योंकि दरिद्रता भी एक स्वतंत्रता मालूम होती है। गरीब आदमी जब दरिद्रता में संतोष कर लेता है तो वह संतोष सिर्फ दुख को छिपाने का और सांत्वना का एक उपाय होता है।
हिंदुस्तान के सारे बड़े शिक्षक राजघरानों से आए। वे राजघरानों से ऊब गए थे। वे संपत्ति से ऊब गए थेपरेशान हो गए थे। संपत्ति की अपनी परेशानियां हैंदरिद्रता की अपनी परेशानी हैभिखमंगे की अपनी परेशानी हैराजघर की अपनी परेशानी है।
वे अपनी परेशानियों से पीड़ित हो गए थेवे धन से घिरे हुए परेशान हो गए थेवे स्त्रियां और सुख के बीच ऊब गए थेउन्हें बदलाहट चाहिए थी। उन्होंने वह सब छोड़ कर सड़क पर नग्न खड़े हो गए। उन्हें उस नग्नता में बहुत स्वतंत्रता मालूम हुई होगीउन्हें उस नग्नता में एक अदभुत मुक्ति मालूम हुई होगी।
वह मालूम हो सकती हैलेकिन वह हमेशा तभी मालूम होती हैजब कोई समृद्धि को लात मार कर दरिद्र बनता है। वह दरिद्रता समृद्धि के आगे का कदम हैसमृद्धि के पहले का कदम नहीं है। वह दरिद्रता भी एक अर्थ में समृद्धि की लक्ज़री है,वह दरिद्रता भी समृद्धि का अंतिम विलास है। वह उसको भी लात मारने का मजा है। वह सुख गरीब आदमी नहीं उठा सकता।
लेकिन हिंदुस्तान के बड़े शिक्षक जब दरिद्र हुएउन्होंने धन छोड़ातो दरिद्र को लगा कि जिस चीज को छोड़ ही देना पड़ता है उसे पाने की जरूरत क्या है। और उसे पता नहीं कि वह दरिद्र महावीर की दरिद्रता का मजा नहीं लूट पाएगा। महावीर की दरिद्रता बुनियादी रूप से क्वालिटेटिवलीगुणात्मक रूप से भिन्न है।
मैं अमृतसर था। एक संन्यासी मित्र एक घटना सुना रहे थेवे घटना सुना रहे थे कि अमृतसर से एक ट्रेन जा रही थी हरिद्वार की तरफ। मेला है हरिद्वार में। हजारों लोग ट्रेन में भर रहे हैं। हरेक आदमी अमृतसर की स्टेशन पर यही चिल्ला रहा है कि चलो गाड़ी के अंदर भीतर बैठोजल्दी भीतर चले जाओसामान रखो।
एक आदमी के पास भीड़ इकट्ठी है और वह यह कह रहा है कि मैं गाड़ी में बैठूं तो जरूरलेकिन अमृतसर पर बैठता हूं,हरिद्वार में उतरना पड़ेगा नजब उतरना ही पड़ेगा तो गाड़ी में बैठने की जरूरत क्या हैवह आदमी यह दलील दे रहा है कि जब उतरना ही पड़ेगा गाड़ी सेतो फिर गाड़ी में बैठे ही क्योंजब उतरना ही है तो उतरे ही रहें।
मित्रों ने जबरदस्ती धक्के दिए और कहायह तर्क समझाने का समय नहीं है। अंदर बैठ जाओफिर तुम्हें समझाएंगे। गाड़ी जाने के करीब है। जबरदस्ती उस आदमी को भीतर ले गएलेकिन वह आदमी यही चिल्लाता रहा कि जब उतरना ही है तो बैठने की जरूरत क्या हैफिर हरिद्वार आ गयाफिर सारी गाड़ी में दूसरी आवाज आने लगी कि उतरोसामान उतारोनीचे उतरोजल्दी उतरोकहीं गाड़ी न छूट जाए। वह मित्र उसको फिर समझा रहे हैं कि नीचे उतरो। वह कहता है कि जब चढ़ ही गए तो अब उतरना क्यापहले ही मैंने कहा था कि चढ़ाओ मत अगर उतरना हो। अब जब चढ़ ही गए तो चढ़ ही गएअब उतरना क्याउसे जबरदस्ती नीचे उतारा वह व्यक्ति तर्क तो ठीक दे रहा हैयह बात सच है कि अमृतसर से जाना है हरिद्वार,तो गाड़ी पर चढ़ना भी होगा और उतरना भी होगा। और जो सोचता है कि जब उतरना ही है कभी जाकर तो चढ़ना ही क्यातो वह फिर अमृतसर पर ही रह जाएगा हरिद्वार नहीं पहुंच सकता। और अगर हरिद्वार पर पहुंच कर उसने यह जिद्द की कि जब चढ़ ही गए तो अब उतरना ही क्यातब भी वह हरिद्वार नहीं पहुंच पाएगा। दोनों हालत में हरिद्वार चूक जाएगा।
मेरी अपनी दृष्टि यह है कि समृद्धि की एक यात्रा है जीवन में। निश्चित ही एक दिन समृद्धि छोड़ देने जैसी हो जाती है,लेकिन वह समृद्धि की यात्रा से ही होती है। और दरिद्र आदमी अगर यह सोचे कि जब महावीर और बुद्ध जैसे लोग छोड़ कर आ रहे हैं तो फिर मुझे परेशान होने की क्या जरूरत है। तो वह ध्यान रखेउसकी दरिद्रता अमृतसर की दरिद्रता होगीहरिद्वार की नहीं।
हिंदुस्तान के इन धनी शिक्षकों के कारण यह बात बड़ी अजीब और पैराडाक्सिकल। धनी शिक्षकों के कारण हिंदुस्तान दरिद्रता के दर्शन को विकसित कर लिया और दरिद्र ने अपनी दरिद्रता स्वीकार कर ली। जब उसने देखा कि राजमहलों को लोग छोड़ कर आ रहे हैंतो फिर ठीक हैमुझे और राजमहलों की तरफ जाने का सवाल क्या है। और जब एक बार दरिद्रता स्वीकृत हो जाती है तो संपत्ति को उत्पादन करने का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। यह देश इसलिए गरीब है।
काउंट केसरलिंग हिंदुस्तान से लौटातो उसने अपनी डायरी में एक वाक्य लिखा। मैं पढ़ रहा था तो बहुत हैरान हुआ। मुझे लगा कि कोई छापेखाने की भूल होनी चाहिए। उसने एक वाक्य लिखा कि मैं हिंदुस्तान गयावहां से लौटा हूंतो एक अजीब नतीजा लेकर आया हूंवह नतीजा यह कि इंडिया इज़ ए रिच लैंडव्हेयर पुअर पिपुल लिव। कि हिंदुस्तान एक धनी देश हैजहां गरीब लोग रहते हैं।
मैं बहुत हैरान हुआ कि यह वाक्य कैसा हुआअगर धनी देश है तो गरीब लोग कैसे रहते होंगेऔर गरीब लोग रहते हैं तो धनी देश कैसे हैकोई छापे की भूल है शायदलेकिन आगे पढ़ने पर मुझे पता चला कि वह मजाक कर रहा है। वह यह कह रहा है कि देश तो बहुत धनी हैलेकिन रहने वाले मूढ़ हैंवे गरीब बने हुए हैं। देश तो बहुत धन पैदा कर सकता हैलेकिन रहने वालों की जीवन-दृष्टि दरिद्र रहने की हैइसलिए वे संपत्ति पैदा नहीं कर पाते।
हिंदुस्तान की दरिद्रता नहीं मिटेगीजब तक हम संपत्ति के प्रति भी एक स्वस्थ रुख लेने को राजी न हों। हमारा संपत्ति के प्रति अत्यंत अस्वस्थरुग्णअनहेल्दी रुख है। तो एक तरफ तो यह है कि हम संपत्ति का विरोध करते हैं और दूसरी तरफ भीतर संपत्ति की लालसा भी करते हैंक्योंकि दरिद्रता के भीतर यह असंभव है कि आप सच में संतुष्ट हो जाएं। कैसे संतुष्ट हो सकते हैंजबरदस्ती थोप कर अपने ऊपर संतोष के कपड़े पहन लेंगेलेकिन संतुष्ट हो कैसे सकते हैंभीतर असंतोष की आग जलती ही रहेगी। इसलिए ऊपर से कहेंगेकुछ मतलब नहीं है हमेंहम तो संतुष्ट हैं और भीतर लालसा,र् ईष्या और लोभ वह सब काम करते रहेंगे।
मैं एक फकीर के पासएक संन्यासी के पास यहीं बंबई में कोई पांच-सात साल पहले मिलने गया था। एक मुनि हैं। बहुत उनके शिष्य हैं। बहुत लोग वहां इकट्ठे हो गएमैं मिलने आया हूंकुछ बात होगी। उन मुनि ने मुझे एक गीत सुनाया। गुजराती में वह गीत उन्होंने बनाया था। उसका अर्थ मुझे समझाया। सुनने वाले बैठ कर सिर हिलाने लगे और कहने लगेवाहवाह! में बहुत हैरान हुआ। क्योंकि उस गीत का मतलब यह था कि वह संन्यासी उस गीत में यह कहते हैं कि तुम अपने राजमहल में खुश होरहोहम अपनी धूल में भी आनंद में हैं। तुम स्वर्ण के सिंहासन पर बैठे होबैठोहमें तुम्हारे स्वर्ण के सिंहासन से कोई भी मतलब नहींहम लात मारते हैं स्वर्ण के सिंहासन परहम तो अपनी धूल में ही मस्त हैंहम तो फकीर हैं। इस तरह का भाव था।
पूरा गीत कह कर वे मुझसे पूछने लगेकैसा लगा?
मैंने कहा कि मैं बहुत हैरान हुआ। मैं इसलिए हैरान हुआ कि अगर आपको राजमहलों से कोई मतलब नहींअगर आपको स्वर्ण-सिंहासनों से कोई मतलब नहींतो उनकी याद क्यों आती हैंउनके गीत क्यों लिखते हैंमैंने किसी सम्राट को कभी ऐसा गीत लिखते नहीं देखानहीं सुना कि उसने कहा हो कि हम अपने स्वर्ण-सिंहासन पर ही ठीक हैंहमें तुम्हारी धूल से कुछ भी नहीं लेनातुम रहो मजे मेंहम उपेक्षा करते हैंहमें कोई फिक्र नहीं। कोई सम्राट ऐसा नहीं कहतालेकिन ये फकीर निरंतर यह बात कहते हैं कि हमें स्वर्ण-सिंहासन से कोई मतलब नहीं।
मतलब नहीं है तो यह गीत क्या बताते हैंये मतलब बताते हैंमतलब बहुत गहरा है और भीतरी है। स्वर्ण-सिंहासन मन को खींचता है। संतोष से मन को रोका हुआ है। संतोष से जो मन को रोकता है और स्वर्ण-सिंहासन की भीतर लालसा हैवह स्वर्ण-सिंहासन को गाली देना शुरू कर देगाताकि संतोष करने में सुविधा मिले।
हिंदुस्तानपूरा का पूरा हिंदुस्तान भौतिकवाद को गालियां देता है। वह आदमी भौतिकवादी हैपश्चिम मैटीरियलिस्ट है। जितना तुम भौतिकवाद को गालियां देते होउतना तुम खबर लाते हो कि तुम्हारे प्राणों में भौतिकवाद की आकांक्षा है।
मन के नियम बहुत अजीब हैं।
एक आदमी अगर अपनी स्त्री को छोड़ कर जंगल में भाग जाए और संन्यासी हो जाएऔर उसका मन स्त्री से मुक्त न हुआ हो तो वह घूम-फिर कर यही कहता रहेगा: कामिनी-कांचन से सावधानस्त्री से बचनास्त्री नरक का द्वार है! वह किसी और से नहीं कह रहा हैजोर-जोर से अपने से कह रहा है। वह भीतर स्त्री खींच रही हैनिमंत्रण दे रही हैवह कह रहीआओ। स्त्री भीतर रूप बन रही हैस्त्री भीतर प्राणों को कस रही हैवह उससे बचने के लिए कह रहा हैकामिनी-कांचन पाप हैस्त्री नरक का द्वार हैस्त्री से सावधान! दूसरों को समझा रहा है। दूसरों के बहाने अपनी ही वाणी को जोर से सुनने की कोशिश कर रहा हैताकि भीतर हिम्मत बनी रहे कि स्त्री नरक का द्वार हैबचोसावधान रहो!
जो आदमी वासना से मुक्त हो जाएगा उसे स्त्री नरक का द्वार कैसे दिखाई पड़ेगीजिस आदमी का मन सेक्स से मुक्त हो गया होउस आदमी को स्त्री और पुरुष में भेद दिखाई पड़ेगा?
बुद्ध एक जंगल में बैठे थे एक पहाड़ के पास। कुछ लोग शहर से आए थे युवक एक वेश्या को लेकर जंगल में पिकनिक के लिएआमोद-प्रमोद के लिए। वे तो सब नशे में चूर हो गएवेश्या ने देखा कि वे बेहोश हो गए हैं नशे मेंवह भाग खड़ी हुई। उसके सारे वस्त्र उन्होंने छीन रखे थे। वह नग्न थी। जब वह भाग गई उन्हें कुछ होश आयातो उन्होंने कहावह वेश्या भाग गईतो उसे खोजने जंगल में निकले।
रास्ते पर बुद्ध को बैठे देखा तो उनके पास जाकर कहा कि भंतेयही एक रास्ता हैजरूर यहां से एक स्त्री को आपने भागते देखा होगा। स्त्री नग्न थीवेश्या थीआपको खयाल है वह कहां गईयहीं से रास्ते बंट जाते हैं। हम उसे खोजने कहां जाएं?
बुद्ध ने कहाकोई निकला जरूर थालेकिन वह स्त्री थी या पुरुषयह पहचानना बहुत मुश्किल हैकोई निकला जरूर था,लेकिन वह स्त्री थी या पुरुषयह मुझे याद नहीं। क्योंकि जब से मेरे भीतर से वासना उठ गईतब से मेरे भीतर का पुरुष मर गयाजब से मेरा पुरुष मर गयातब से बाहर की स्त्री उस तरह नहीं दिखाई पड़तीजैसे पहले दिखाई पड़ती थी।
यह बुद्ध जैसा आदमी स्त्री को नरक का द्वार कैसे कहेगानहींजो स्त्री को नरक का द्वार कह रहा हैउसके भीतर स्त्री का आकर्षण शेष है। जो संपत्ति को गाली दे रहा हैउसके भीतर संपत्ति का आकर्षण शेष है। जो कह रहा है कि सोना मिट्टी हैवह अपने को समझा रहा हैसोना अभी पूरी तरह सोना है और प्राणों को खींच रहा है।
भारत ने एक तरफ दरिद्रता की बातें सीख लीं और दूसरी तरफ लोभऔर दूसरी तरफर् ईष्याऔर दूसरी तरफ धन की वासना तीव्र से तीव्र होती चली गई। यह एक अदभुत घटना घट गई। ऊपर से हम दरिद्र हैं। दरिद्रता में संतोष की बात भी करते हैं,और भीतर हमसे ज्यादा ग्रीडीहमसे ज्यादा लोभी जमीन पर आदमी खोजने मुश्किल हैं।
मैं घर में ठहरता था। उस घर के ऊपर कुछ पश्चिम के लोग--दो परिवार रहते थे। उस घर में जब भी मैं ठहरा तो उस घर के लोगों ने मुझे कहा कि ये पश्चिम के लोग बड़े भौतिकवादी हैं। सिवाय खाने-पीने केसिवाय नाच-गाने के इन्हें कुछ भी मतलब नहींएकदम भौतिकवादी हैं। जब भी मैं गयामुझे वे यही कहते थे। रात बारह बजे तक नाचते रहते हैं। बसखाना और पीना और नाचना--यही जिंदगी है। फिर एक बार उनके घर में ठहरा। ऊपर शांति थीतो मैंने पूछा कि क्या वे लोग चले गएघर की गृहिणी ने कहाहांवे चले गए। पर बड़े अजीब लोग थे। अपना सारा सामान बांट गए। जो नौकरानी बर्तन मलती थीस्टील के बर्तन थे सब--वह स्त्री मुझसे कहने लगी--असली स्टील के बर्तन थेवह सब नौकरानी को ही दे गए। रेडियो थारेडियोग्राम था,वह सब बांट गए। बड़े अजीब लोग थे।
मैंने उस स्त्री को पूछा कि तू तो निरंतर कहती थी कि ये बड़े भौतिकवादी लोग हैंनाचने हैंगाते हैंखाते हैंपीते हैं और कुछ नहीं करते हैंबहुत मैटीरियलिस्ट हैं। लेकिन ये सारी चीजें बांट कर चले गए! तू भी इस तरह सारी चीजें बांट सकती है?
उसने कहामैंकैसे बांट सकती हूं! मेरे मन में तो यही लगा रहा कि कुछ हमें भी दे जाएं तो अच्छा है।
मैंने पूछावे तुझे कुछ दे गए?
उसने कहा कि मुझे दे नहीं गए क्योंकि उन लोगों ने सोचा होगाइनके पास तो सब हैशायद ये लेने से इंकार कर दें।
तो तेरे पास कोई निशानी नहीं?
तो उसने कहाएक निशानी हैवे एक रस्सी बंधी हुई छोड़ गए थेवह मैं खोल लाई हूं। कपड़े टांगने की रस्सी थीलेकिन रस्सी प्लास्टिक की है और बहुत अच्छी हैवह भर मैं खोल लाई हूंवह भर निशानी रह गई है। वे चले गए तो मैं रस्सी खोल लाई।
यह स्त्री रोज मंदिर जाती हैयह रोज सुबह से उठ कर भक्तांबर पढ़ती हैयह बड़ी धार्मिक हैयह उपवास भी करती है और यह सोचती है कि मैं भौतिकवादी नहीं हूं और वे लोग जो नाचते थे और गीत गाते थेवे इसे भौतिकवादी मालूम पड़ते थे।
वे इसे भौतिकवादी क्यों मालूम पड़ते थे?
इसके भीतर भी नाचनागीत गाना और संपत्ति का मोह है। वह इसे खींचता है कि काशयह सब उसके पास भी होतायह सब वह भी करती। लेकिन नहीं-नहींसंतोष रखना है। इन सब बातों में नहीं पड़ना हैये बातें बहुत बुरी हैं। इसलिए गाली देती है,निंदा करती हैकंडेम करती हैअपने मन को समझा लेती है और पीछे से एक रस्सी भी खोल कर ले आती है। अध्यात्मवादी हैं हम!
एक अमरीकन यात्री की मैं किताब पढ़ता था। वह दिल्ली के स्टेशन पर उतरा। स्टेशन पर उतरा है और एक सरदार ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा है कि मैं आपका भविष्य बताऊंगा।
उसने कहालेकिन मुझे भविष्य पूछना नहीं है। हम अपना भविष्य खुद बनाते हैं। भविष्य कहीं है यह हम मानते नहीं।
पर सरदार जी ने तो बताना ही शुरू कर दिया। वह तो हाथ जोर से पकड़े हुए है। और वह आदमी बेचारा शिष्टाचार में सिर्फ हाथ पकड़ाए हुए है। छोड़ नहीं रहाठीक है। वह कह रहा है कि मुझे पूछना नहीं हैमुझे कुछ जानना नहीं हैलेकिन सरदार जी तो बताना शुरू कर दिए हैं कि यह होगायह होगायह होगा भविष्य में।
फिर उस आदमी ने कहामुझे जाने दीजिए।
तो सरदार जी ने कहामेरी फीसमेरे दो रुपये फीस के हो गए।
उस आदमी ने कहाठीक है। हालांकि मैं मना कर रहा था और आपने जबरदस्ती बताया हैलेकिन फिर भी आपने इतना श्रम कियाये दो रुपये आप ले लें। लेकिन दो रुपये लेकर सरदार जी ने हाथ छोड़ा नहीं। वह और बताने लगे हैं। उसने कहा कि देखिएअब हाथ छोड़ दीजिएक्योंकि फिर आपकी फीस हो जाएगी। लेकिन सरदार जी बताए चले जा रहे हैं। उसने कहा कि मुझे जाना है। जबरदस्ती हाथ छुड़ायातो सरदार जी ने कहा कि दो रुपये मेरी फीस और हो गईउस आदमी ने कहा कि अब मैं दो रुपये आपको नहीं दूंगा। यह तो जबरदस्ती की बात है। तो सरदार जी ने क्या कहासरदार जी ने कहायू मैटीरियलिस्ट--दो रुपये के लिए मरे जाते होभौतिकवादी होदो रुपये में जान निकली जाती है!
उस आदमी ने अपने संस्मरण में लिखा है कि मैं तो दंग रह गया। भौतिकवादी कौन थामैं था भौतिकवादी?
सारी पृथ्वी पर हमसे ज्यादा भौतिकवादी लोग खोजने मुश्किल हैंक्योंकि दरिद्र आदमी कभी भी भौतिकवाद से ऊपर नहीं उठ सकता है। दरिद्र आदमी कभी भी भौतिकवाद से ऊपर नहीं उठ सकता हैसमृद्ध आदमी ही भौतिकवाद से उठ सकता है ऊपर,क्योंकि समृद्धि को पाकर उसे पता चलता है कुछ भी नहीं है समृद्धि में। धन पाकर दिखाई पड़ता है धन में कुछ भी नहीं है। और जिस दिन धन निसार दिखाई पड़ता हैअसार दिखाई पड़ता हैउस दिन भौतिकवाद के आदमी ऊपर उठता है।
संपत्ति का एक ही बड़े से बड़ा मूल्य है कि संपत्ति से आदमी संपत्ति से मुक्त हो जाता है। धन का एक ही आध्यात्मिक मूल्य है कि धन के उपलब्ध होने से आदमी धन से मुक्त हो सकता है। निर्धन आदमी धन से कभी मुक्त नहीं हो पाता है। धनी आदमी धन से मुक्त हो सकता है। यह देश दरिद्रता को स्वीकार करने के कारण धनी नहीं हो पाया। धनी नहीं हो पाने के कारण धन से मुक्त नहीं हो पायालेकिन हम थोथी बातें अपने ऊपर थोपे चले जाते हैं और बिलकुल ही जीवन और मन के विपरीत काम किए चले जाते हैं। ऊपर से कुछभीतर से कुछ हुए चले जाते हैं। सारा व्यक्तित्व पाखंड हो गया हैसारा व्यक्तित्व धोखा हो गया है। और मैंने इसलिए कहा कि गांधी की दरिद्रता की शिक्षा फिर खतरनाक हैफिर वह हमारी पुरानी शिक्षा का ही फल है। फिर वह पुरानी शिक्षा का फिर से पुनरुक्तिकरण है।
नहींगांधी बहुत प्यारे आदमी हैंगांधी बहुत अदभुत आदमी हैंलेकिन उनके दरिद्रता के दर्शन को अगर भारत ने स्वीकार किया तो भारत कभी समृद्ध नहीं हो सकेगा और समृद्ध नहीं हो सकेगा तो भारत कभी धार्मिक भी नहीं हो सकता है।
मेरी दृष्टि में धार्मिक होने के लिए देश का समृद्ध होना अत्यंत आवश्यक है। दरिद्र आदमी कैसे धार्मिक हो सकता हैजिसकी रोटी की जरूरतें पूरी नहीं होतीं वह परमात्मा की जरूरत पैदा ही कैसे कर सकता हैपरमात्मा मनुष्य की अंतिम जरूरत है,लास्ट नेसेसिटी है। जब जीवन की सारी प्राथमिक जरूरतें पूरी हो जाती हैंतो अंतिम जरूरत का खयाल आता है और हम इस देश में गरीब आदमी को परमात्मा की शिक्षाएं दिए चले जाते हैं। गरीब आदमी को परमात्मा की शिक्षा देना अन्याय है और गरीब आदमी अगर परमात्मा की बातें सुनने भी आता है और परमात्मा के मंदिर में प्रार्थना भी करने जाता हैतो आप यह मत सोचना कि वह परमात्मा के पास जा रहा है। जब वह परमात्मा के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा होता हैतब भी उसके मन में यही प्रार्थना होती है कि कल मुझे रोटी मिल सकेगी नमेरा बच्चा बीमार हैवह ठीक हो सकेगा नमेरा काम छूट गया है,मुझे काम मिल सकेगा नवह परमात्मा के पास भी रोटी-रोजी के लिए ही पहुंचता हैपरमात्मा के लिए नहीं पहुंच सकता है। वह परमात्मा के पास भी जाता है तो बुनियादी कारण उसका भौतिक होता हैआध्यात्मिक नहीं हो सकता है। आध्यात्मिक जीवन की जरूरतजीवन की सामान्य स्थितिसुविधा उपलब्ध होने पर ही पैदा होती है।
जब भारत थोड़ा समृद्ध था तो भारत धार्मिक था। इधर दो हजार वर्षों से वह निरंतर दरिद्र से दरिद्र होता चला गया है। आज वह दरिद्रता के गङ्ढे में खड़ा है। वह धार्मिक नहीं हो सकता है। उसके धार्मिक होने का कोई उपाय नहीं है। इस बात की संभावना है कि आने वाले पचास वर्षों में अमेरिका धार्मिक हो सकेरूस धार्मिक हो सकेभारत के धार्मिक होने की कोई संभावना नहीं। अमेरिका को धार्मिक होना पड़ेगारूस को धार्मिक होना पड़ेगाक्योंकि जैसे ही जिंदगी की सामान्य जरूरतें पूरी हो जाती हैंजैसे ही शरीर की जरूरतें पूरी हो जाती हैंपहली बार आदमी की आंखें उस तरफ उठती हैं जो शरीर के ऊपर है। शरीर की झंझटजैसे ही छुट्टी हो जाती है शरीर से आदमी कीआदमी आत्मा की तरफ उन्मुख होता है।
शायद आपने कभी खयाल भी न किया हो। पैर में एक छोटा सा कांटा गड़ जाएतो सारे प्राण उसी कांटे के आस-पास घूमने लगते हैं। सिर में थोड़ा सा दर्द होतो आत्मा वगैरह सब भूल जाती हैबस सिर का दर्द ही रह जाता है। जहां पीड़ा होती है,प्राण वहीं अटक जाते हैं। भूखे पेट के प्राण पेट के आस-पास ही अटके रहते हैंउससे ऊपर नहीं उठ सकते। लेकिन हम एक बहुत मूढ़तापूर्णबहुत एब्सर्ड जीवन-दर्शन को पकड़े हुए बैठे हैं। मैं मानता हूं कि समृद्ध आदमी किसी दिन दरिद्र हो सकता है,स्वेच्छा सेवालंटरीलीलेकिन स्वेच्छा से दरिद्रता बात ही और है। वह बात वैसी ही है--
मैं एक आश्रम में गया। उस आश्रम में उपवास करवाते हैं वे महीने-महीनेदो-दो महीनेतीनत्तीन महीने के और एक-एक महीने के उपवास करने के पांच-पांच सौ रुपये महीने का खर्च पड़ जाता है। पांच सौ रुपये महीने का खर्च एक महीने उपवास करने का! मैंने कहाउपवास बड़ा महंगा है। इससे तो पेट भरना भी सस्ता पड़ता है। फिर वहां जो लोग उपवास करने वाले थेवे बड़े ही आनंद से कहते थे कि बीस दिन कर लिएपच्चीस दिन कर लिएतीस दिन हो गएमेरे चालीस दिन हो गए। मैं तो बहुत हैरान हुआ। मैं बिहार भी गया। वहां अकाल में भूखे मरते हुए लोग थेकिसी को चार दिन से रोटी नहीं मिली थी। उसका चेहरा भी मैंने देखा और चालीस दिन इसने उपवास किया था इसका चेहरा भी मैंने देखा। इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क मालूम पड़ा। वह चार दिन भूखा रहा थावह इतना दीन-हीन मालूम हो रहा था! यह जो जिसने चालीस दिन उपवास किया थायह एक ऐसी आध्यात्मिक गरिमा से भरा हुआ था। बड़ी अजीब बात है। फर्क क्या हुआयह उपवास हैवह भूख है। यह उपवास वे लोगे करते हैं जो ज्यादा खा गए हैं और ज्यादा खा रहे हैं। भूखा आदमीभूखे आदमी को कभी खाने को नहीं मिला। भूख और उपवास में फर्क है।
महावीर की दरिद्रता में और सड़क पर भीख मांगने वाले की दरिद्रता में भी उतना ही फर्क है। ज्यादा खाने वाले के लिए उपवास भी एक आनंद हो सकता हैभूख से मरने वाले के लिए उपवास कैसे आनंद हो सकता हैक्वालिटेटिव फर्क हैगुणात्मक फर्क है। और हिंदुस्तान पांच हजार वर्ष से इस गलत जीवन-दृष्टिकोण के नीचे जी रहा है कि हमें दरिद्रता में संतोष कर लेना है।
गांधी भी फिर पुनः उसी बात को दोहराते हैं और उसी बात को दोहराने के कारण उन्होंने जो उपकरण बताए हैं--चरखातकली,वे उपकरण भारत को दरिद्र रखने के उपकरण सिद्ध होंगे। वे भारत को समृद्ध नहीं बना सकते हैं। समृद्धि पैदा होती है टेक्नालॉजी सेसमृद्धि पैदा होती है विज्ञान सेतकनीक से। समृद्धि पैदा होती है यंत्र से।
चरखा और तकली से समृद्धि कैसे पैदा हो सकती है?
चरखा और तकली कोई दस हजार पुराने वर्ष के साधन हैंदस हजार वर्ष पहले के साधन हैं। अगर दुनिया को दस हजार वर्ष पुरानी दरिद्रता में ले जाना हैदुख में ले जाना है तो चरखेत्तकली को प्रतीक बनाओअन्यथा चरखेत्तकली से मुक्त होने की जरूरत है।
मैं यह नहीं कहता कि गांव में जिन्हें कुछ भी काम नहीं मिल रहा हैवे चरखा न कातें। मैं यह भी नहीं कहता कि जिन्हें खादी पहनने का शौक है वे खादी न पहनें।
मैं कहता यह हूं कि यह भारत के विकास के प्रतीक न बन जाएंये हमारे जीवन के देखने केदृष्टिकोण के सिंबल्स न हों। गांधी ने उन्हें सिंबल बना दिया है। हमें ऐसा लगने लगा है कि नहीं बड़े टेक्नीक की कोई जरूरत नहीं हैबड़ी टेक्नालॉजी की कोई जरूरत नहीं हैबड़े यंत्रों की कोई जरूरत नहीं हैसेंट्रेलाइजेशन कीकेंद्रीकरण की कोई जरूरत नहीं हैऔद्योगीकरण की,इंडस्ट्रीलाइजेशन की कोई जरूरत नहीं है। हमें ऐसा लगने लगा कि एक-एक आदमी अपना साबुन बना लेअपना कपड़ा बना ले,अपनी खेती में काम कर लेस्वावलंबी हो जाए--बस इसकी जरूरत है।
ये खतरनाक बातें हैं। अगर आदमी को हमने इस ढांचे पर ले जाने की कोशिश की है तो आदमी का जीवन-स्तर पशु के स्तर पर गिर जाने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं होगा। आदमी का जो इतना जीवन-स्तर ऊपर उठा हैवह तकनीक का परिणाम है। और जिस दिन सारी मनुष्य-जाति का जीवन-स्तर इतना ऊंचा उठ जाएगा जितना जीवन-स्तर बुद्ध और महावीर का ऊंचा रहा होगातो मैं आपसे कहता हूंपृथ्वी पर करोड़ों बुद्ध और महावीर एक साथ पैदा हो सकते हैं!
यह आकस्मिक नहीं है कि राजघरानों से इतने बड़े संन्यासी पैदा हुए। इतने बड़े संन्यासी राजघरानों से ही पैदा हो सकते हैं,क्योंकि राजघराने में ही संपत्ति की और शरीर की व्यर्थता का पहला अनुभव होता है और आंखें उस तरफ उठती हैं जहां जीवन की और गहरी सच्चाइयां हैंजहां और बियांड और दूर और अतीत और ऊपर के शिखर हैं उन तक आंख तभी उठती हैजब जीवन की नीचे से पृथ्वी शांतसुविधापूर्ण हो जाती है।
तो मैं मानता हूं कि चरखा और तकली को अगर हम प्रतीक मान लेते हैं और अपनी आर्थिक जीवन-व्यवस्था का केंद्र बना लेते हैं और अगर हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि विकेंद्रीकरण करना हैबड़े उद्योग से बचना हैबड़ी टेक्नालॉजी और बड़ी साइंस को नहीं आने देना है तो हम बहुत घातक स्थिति में पहुंच जा सकते हैं।
हम दरिद्र हैं हमेशा सेहम और भी दरिद्र हो सकते हैं। सारी दुनिया समृद्ध होती चली जाएगीउसके किनारे हम एक दरिद्रता का हिस्सा बन जाएंगे।
आज भी हमारी हालत वैसी ही है जैसे किसी करोड़पति के भवन के सामने कोई भिखमंगा खड़ा हो। आज भी हमारी हालत दुनिया के राष्ट्रों के मुकाबले एक भिखमंगे राष्ट्र की हालत है। यह हालत रोज बदतर होती चली जाएगी। एक तरफ टेक्नीक का उपयोग मत करनाकेंद्रीकरण की भावना को रोकनातोड़नादूसरी तरफ बिलकुल हाथ से चलने वाले साधन जो आदिम हैं उनका उपयोग करना और तीसरी तरफ बच्चों को पैदा करते चले जाना! बीस-पच्चीस वर्ष में यह मुल्क अपने हाथ से अपनी स्युसाइड कर लेगाआत्महत्या कर लेगा।
गांधीजी कहते हैं कि संतति-नियमन के पक्ष में भी वे नहीं हैं। वे कहते हैं कि बर्थ-कंट्रोल के पक्ष में भी वे नहीं हैं। वे कहते हैं बह्मचर्य से नियमन होना चाहिए।
ब्रह्मचर्य से कितने लोगों ने कब नियमन किया हैकितने लोग नियमन कर सकते हैंकितने लोग करेंगेऔर हम प्रतीक्षा कब तक करेंगे?
लेकिन गांधी कहते हैं कि नहींकृत्रिम उपाय का हमको उपयोग नहीं करना है। बर्थ-कंट्रोल के साधन कृत्रिम हैंआर्टीफिशियल हैं,उनका उपयोग नहीं करना है। गांधी की ये बातें अवैज्ञानिक हैं।
गांधी भले आदमी हैंइसका यह मतलब नहीं होता कि गांधी जो भी कहेंगे वह वैज्ञानिक होगा। कई बार बड़े गलत आदमी बड़ी ठीक बातें कहते हैंकई बार बड़े ठीक आदमी बड़ी गलत बातें कहते हैं और सच तो यह है कि गलत बातें हम तभी स्वीकार कर पाते हैं जब बहुत भले आदमी उनको कहते हैं। अगर चरखे और खादी की बात किसी और ने कही होती गांधी के अलावातो हिंदुस्तान कभी मानने की फिक्र नहीं करता। वह गांधी इतने अदभुत आदमी हैं कि वह कुछ भी कहेंगे तो हमें लगता है कि इतना बड़ा व्यक्तिइतना महिमावान व्यक्तिइतना ओजस्वीवह जो भी कहता हैठीक कहता होगा।
अगर हम माक्र्स की व्यक्तिगत जिंदगी को देखेंतो माक्र्स की व्यक्तिगत जिंदगी में कुछ भी नहीं है जिसको उद्दात कहा जा सकेऊंचा कहा जा सके। सुबह से सांझ तक सिगरेट पी रहा हैशराब पी रहा है। जिंदगी में कुछ ऐसी ऊंची बात नहीं है। जिंदगी में कोई ऐसा बड़ा भारी प्रभाव नहीं है। नौकरानी से गलत संबंध हैनाजायज लड़का पैदा हो गया माक्र्स कोमाक्र्स की जिंदगी में कुछ भी नहीं है। छोटी सी बात में क्रोध से भर जाता है। बहुत ईगोइस्ट हैबहुतर् ईष्यालु है। लेकिन माक्र्स ने समाज के लिए जो विश्लेषण दिया है वह सत्य है। गांधी बहुत अच्छे आदमी हैंन सिगरेट पीते हैंन किसी नौकरानी से कोई गलत संबंध हैन कोई नाजायज बच्चा पैदा हुआ है। जीवन एकदम पवित्र कथा है। जीवन एक शुभ्र कथा हैलेकिन गांधी ने जो विश्लेषण किया है समाज का वह अवैज्ञानिक है और गलत है। गांधी जैसे आदमी चाहिए पृथ्वी परलेकिन समाज माक्र्स जैसा चाहिए। गांधी का समाज का विश्लेषण अवैज्ञानिक है।
लेकिन गांधीवादी कहते हैं मैं इस पर बात ही न करूं। वे कहते हैंइस पर बात ही मत करिए। इस पर बात नहीं करने का मतलबइस पर बात नहीं करने का मतलब है कि देश में आग लग रही होहम बैठ कर देखते रहें। गांधीवादी मुझे कहते हैं कि आप तो धार्मिक आदमी हैंआप क्यों इन बातों में पड़ते हैंएक धार्मिक आदमी निकलता है और एक मकान में आग लगी हो और चिल्ला कर कह दे कि मकान में आग लगी हैपानी ले आओतो उससे आप कहेंगे कि आप तो धार्मिक आदमी हैंआप इस झंझट में कहां पड़ते हैं। लगने दो आग। आप अपना भजन-कीर्तन करो।
मोरारजी भाई ने मेरे संबंध में बात करते हुए राजकोट में परसों कहा कि पहले तो राजनीतिज्ञ और आर्थिक लोग गांधीजी की आलोचना करते थे। अब आध्यात्मिक लोग भी उनकी आलोचना करने लगे। जैसे कि आध्यात्मिक आदमी का गांधीजी की आलोचना करना अनिवार्यरूपेण कोई अपराध हो।
मैं मोरारजी भाई को कहना चाहता हूंगांधीजी को राजनीतिज्ञ और आर्थिक लोग तो समझ ही नहीं सकतेआलोचना क्या करेंगे। गांधी को तो आध्यात्मिक लोग ही समझ सकते हैं और विचार कर सकते हैंक्योंकि गांधी मूलतः राजनीतिज्ञ नहीं हैंन आर्थिक विचारक हैंगांधी मूलतः एक आध्यात्मिक संत हैं। गांधी के आस-पास जो राजनीतिज्ञ इकट्ठे हो गए हैंउन्होंने ही गांधी को बर्बाद किया है। और गांधी के पास जो राजनीति का जाल खड़ा हो गयाउस जाल ने ही गांधी की प्रतिमा को वह जितनी सुंदर हो सकती थीजितनी पवित्र हो सकती थीउसकी पवित्रता और सुंदरता में भी कमी की।
गांधी मूलतः एक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं। राजनीति से उनका कोई बुनियादी संबंध नहीं है। राजनीति एक आपद-धर्म थीएक मजबूरी थी। मुल्क में एक आग थीगुलामी थी। उसे दूर करने को उन्हें कूद पड़ना पड़ा। लेकिन मूलतः वे परमात्मा की खोज में जाने वाले एक साधक हैं। और उन पर आध्यात्मिक लोग विचार न करें ऐसा अगर मोरारजी भाई सोचते हों तो बहुत गलत सोचते हैं।
गांधी पर हिंदुस्तान के आध्यात्मिक चिंतकों को बार-बार विचार करना पड़ेगाक्योंकि गांधी ने आध्यात्मिक जीवन और सामान्य जीवन के बीच एक सेतु निर्मित किया है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गांधी आध्यात्मिक व्यक्ति हैं इसलिए जो भी कहेंगे वह सत्य होगा। हमारी पुरानी धारणा यह हैहम समझते हैं कि महावीर को चूंकि आत्मज्ञान मिलापरमात्मा का अनुभव हुआइसलिए महावीर जो भी कहेंगे वह सच होगायह गलत है बात। महावीर का सब कहा हुआ सच नहीं हो सकता। बुद्ध का सब कहा हुआ सच नहीं हो सकता। गांधी का सब कहा हुआ भी सच नहीं हो सकताबल्कि यह भी हो सकता है कि गांधी से बहुत कम हैसियत का कोई विचारक किसी दिशा में जो बात कहेचाहे उसके पास व्यक्तित्व हो चाहे न होवह भी सच हो सकता है। यही मैंने कहा कि माक्र्स गांधी के मुकाबले कोई भी व्यक्तित्व नहीं है माक्र्स का। लेकिन माक्र्स के समाज का जो विश्लेषण है वह गांधी से श्रेष्ठ हैसही हैसच्चा हैवैज्ञानिक है। इसलिए मैं मानता हूं कि गांधी जैसे पृथ्वी पर जितने लोग बढ़ जाएंगेपृथ्वी उतनी अच्छी होगी,लेकिन गांधी की जो जीवन-रचना की कल्पना हैवह कल्पना अवैज्ञानिक हैआदिम हैप्रिमिटिव हैपिछड़ी हुई हैऔर उसके आधार पर चल कर इस देश के सौभाग्य का उदय नहीं हो सकता है।
मैं मानता हूं कि यह आलोचना और विचार किया जाना जरूरी है। नहींमैं यह नहीं कहता हूं कि मैं जो कहता हूं वह सही होना ही चाहिए। वह मैं कभी भी नहीं कहता हूं। यह मैं नहीं कहता हूं कि मैंने जो कहा वह सत्य है ही। वह मैं कभी नहीं कहता हूं। यह भी मैं नहीं कहता कि मेरी बात आपको मान लेनी चाहिए। मैं इतना ही कहता हूं कि मैं जो कहता हूं वह विचारणीय हैउस पर विचार किया जाना जरूरी है। हो सकता है मेरी बातें गलत हों। तब विचार करके उनको फेंक देना चाहिए। हो सकता है उसमें कोई बात आपके विवेक को सच मालूम पड़ेतब वह मेरी नहीं रह जातीवह आपकी अपनी हो जाती है। लेकिन जो पंथवादी होते हैंवे कहते हैंविचार ही नहीं करना है। विचार की हत्या करना चाहते हैं।
मैं गुजरात गया तो वहां मुझे लोगों ने कहा कि इंदुलाल याज्ञनिक ने कहा कि मेरा बहिष्कार करेंगेगुजरात में नहीं आने देंगे। मैंने कहाअगर गुजरात पागल होगा तो इंदुलाल की बात मानेगा। गुजरात पागल नहीं है। बहिष्कार करेंगे मेराअगर मैं गांधी के ऊपर कुछ विचार करूंगा तो बहिष्कार किया जाएगा। गांधी की आत्मा कहीं भी होगी तो इंदुलाल याज्ञनिक को देख कर रो रही होगी कि ये मेरे गांधीवादी हैं! इन्हीं लोगों के लिए मैंने लड़ाई लड़ीइन्हीं के लिए जीवन कुर्बान कियाइन्हीं के लिए बर्बाद हुआ।
गांधीवादी को अगर थोड़ी भी समझ हो तो मुझे तो उसे गांव-गांव बुला कर ले जाना चाहिए कि मैं गांधी के बाबत बात करूं और गांधी के बाबत विचार को पैदा करूं।
लेकिन वह कहता है कि नहींअखबार में मेरी खबर नहीं छपनी चाहिए। मेरी सभा नहीं होनी चाहिए। राजकोट में जितने मैदान गांधीवादियों के हाथ में थे उन्होंने कहा कि नहींयहां हम सभा नहीं होने देंगे। स्कूल उनके हाथ में हैंसभा नहीं होने देंगे। उनके हाथ में तो सभी कुछ हैं। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता हैइससे क्या सभा नहीं होगीलेकिन इस भांति रोक कर वे क्या बताते हैंवे बताते हैं कि कितना समझे गांधी की अहिंसा कोकितना समझे गांधी के अध्यात्म कोकितना समझे गांधी के विचार कोयही समझे?
दिल्ली में बोला। दूसरे दिन ही मुझे एक पत्र आया। किसी गांधीवादी ने पत्र लिखा और मुझे लिखा कि महाशय आपको फौरन सेंट्रल जेल भेज दिया जाना चाहिए। मैंने आंख बंद करके गांधी को धन्यवाद दियामैंने कहा कि मेरी उम्र कम थीइसलिए आपके सत्संग का मौका नहीं मिलानहीं तो आपके सत्संग में जेल जाना ही पड़ता। लेकिन आश्चर्यआप मर गएफिर भी प्रभाव आपका काफी है। जरा आपसे दोस्ती दिखाईआपकी बात की कि जेल जाने की बात होने लगी। गांधी अगर जिंदा होते तो इस बात के सौ में से सौ मौके हैं कि गांधीवादियों के जेल में उनको सड़ना पड़ता। ये गांधीवादी उनको जेल में जरूर भेजते।
गांधी बुनियादी रूप से एक विद्रोही क्रांतिकारी थे। वे मुल्क को नरक में ले जाते हुए अपने शिष्यों को नहीं देख सकते थे। वे यह नहीं सोचते कि ये शिष्य मेरे हैंइसलिए इनसे बगावत कैसे करूं। बगावत की कहानी शुरू हो गई थी। गांधी के हाथ से जैसे ही सत्ता उनके अनुयायियों को मिल गईवैसे ही गांधी को लगने लगा कि मैं खोटा सिक्का हो गया हूं। मेरा कोई चलन नहीं रहा। मेरी कोई सुनता नहीं। गांधी के शिष्यों को भी लगता था इस बुङ्ढे से अब छुटकारा हो जाए तो अच्छा। क्योंकि यह झंझटें खड़ी करेगा। और गोडसे ने मालूम होता है गांधी के अनुयायियों की प्रार्थना सुन ली और गांधी की हत्या कर दी। गांधी से छुटकारा हो गया। अब मजे से उनकी पूजा करोप्रार्थना करोयश-गान करोअब गांधी कोई गड़बड़ नहीं कर सकते। लेकिन इस भ्रम में मत रहनाकि जो देश गांधी पैदा कर सकता है--वह पचास गांधी पैदा कर सकता है।
गांधी पर विचार किया जाना जरूरी हैउनके एक-एक पहलू पर विचार किया जाना जरूरी है। जरूरी नहीं कि जो मैं कहूं वही सच है। नहींउतनी कोई भी जरूरत नहीं। मेरा निवेदन इतना ही है कि उस पर सोचने के लिए मुक्त मन का आमंत्रण होना चाहिए। वही आमंत्रण में देता हूं।
यह तो प्रारंभिक बात थी आजआने वाले तीन दिनों में गांधी के अनेक पहलुओं पर मैं आपसे बात करना चाहूंगा।
सुबह आपके प्रश्नों के उत्तर दूंगा।
परमात्मा करे गांधी की कामनाएं सफल हो कि इस देश का भविष्य स्वर्णिम बने। परमात्मा करे कि गांधी जैसी इस देश की मुक्त आत्मा को विचारशील आत्मा को पैदा करना चाहते थेवह आत्मा पैदा हो सके।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुनाउससे बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूंमेरे प्रणाम स्वीकार करें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें