बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-04

लकीरों से हट कर
मित्रों ने बहुत से प्रश्न पूछे हैं। एक मित्र ने पूछा है कि गांधीजी ने दरिद्रों को दरिद्रनारायण कहा,इससे उन्होंने दरिद्रता को कोई गौरव-मंडित नहीं किया हैकोई ग्लोरीफाई नहीं किया है।

शायद आपको पता न होदरिद्रनारायण शब्द गांधीजी की ईजाद है। हिंदुस्तान में एक शब्द चलता थावह था लक्ष्मीनारायण। दरिद्रनारायण शब्द कभी नहीं चलता थाचलता था लक्ष्मीनारायण। मान्यता यह थी कि लक्ष्मी के पति ही नारायण हैं। ईश्वर को भी हम ईश्वर कहते हैंऐश्वर्य के कारण। वह शब्द भी ऐश्वर्य से बनता है। लक्ष्मी के पति जो हैं वह नारायण हैं। समृद्धनारायणऐसी हमारी धारणा थी। हजारों साल से वही धारणा थी। धारणा यह थी कि जिनके पास धन है उनके पास धन पुण्य के कारण हैपरमात्मा की कृपा के कारण है। धन का एक महिमावान रूप थाधन गौरव-मंडित थाधन की ग्लोरी थी हजारों वर्षों से। दरिद्र दरिद्र था पाप के कारण,अपने पिछले जन्मों के पापों के कारण दरिद्र था। धनी धनी था अपने पिछले जन्मों के पुण्यों के कारण। धन प्रतीक था उसके पुण्यवान होने कादरिद्रता प्रतीक थी उसके पापी होने का। यह हमारी धारणा थी।



इस धारणा में गांधी ने जरूर क्रांति की और बहुमूल्य काम किया कि उन्होंने लक्ष्मीनारायण शब्द के सामने दरिद्रनारायण शब्द गढ़ा और उन्होंने कहा कि नहीं दरिद्र भी नारायण है। लेकिन जैसा अक्सर होता हैजब भी किसी शब्दकिसी विचारकिसी धारणा की प्रतिक्रिया मेंरिएक्शन में कोई धारणा गढ़ी जाती है तो जो भूल इस तरफ होती थी अतिशय में वही भूल दूसरी तरफ हो जाती है। दरिद्र नारायण हैएक समय था समृद्धनारायण से। नारायण तो सभी हैं। न समृद्धनारायण हैन दरिद्रनारायण है। नारायण तो सभी हैं। एक अतिएक एक्सियन यह बात थी कि समृद्ध नारायण हैसमृद्धि को ग्लोरीफाई किया गया था। उसकी प्रतिक्रिया में दूसरी अति यह हो गई कि दरिद्र नारायण हैअब दरिद्र को ग्लोरीफाई किया गया। वह जो ग्लोरीवह जो महिमा समृद्ध के साथ जुड़ी थीवही महिमा समृद्ध से छीन कर दरिद्र से जोड़ देनी पड़ी।
रवींद्रनाथ ने एक गीत लिखा हैरवींद्रनाथ ने गीत लिखा है: कहां खोजते हो प्रभु कोकहां खोजते हो भगवान कोकहां खोजते हो परमात्मा कोमंदिरों मेंनहीं है मंदिरों में। मूर्तियों मेंनहीं है मूर्तियों में। आकाश मेंचांदत्तारों मेंनहीं हैनहीं है। भगवान वहां है जहां राह के किनारे मजदूर पत्थर तोड़ता है। यह दूसरी अति हो गई। चांदत्तारों में भी परमात्मा हैफूलों में भी,सब जगहमंदिरों में भीजो भी है वही परमात्मा है। लेकिन कल तक एक अति थी कि इस दीन और दरिद्र में परमात्मा को नहीं देखा जा रहा थाआज उसकी प्रतिक्रिया मेंरिएक्शन में दूसरी अति हो गई कि नहीं है वहां। यहां हैजहां मजदूर पत्थर तोड़ता है। यह दूसरी अति है। महिमा बदल दी गई।
गांधीजी ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया दरिद्र को नारायण कह करलेकिन जैसा कि सदा होता हैएक अति से दूसरी अति पर व्यक्ति चला जाता हैएक अति से दूसरी अति पर विचार चला जाता है। जब किसी नेगांधी इंग्लैंड गए और गांधी के सेक्रेटरी बर्नार्डशा को मिले और बर्नार्डशा को गांधी के सेक्रेटरी ने कहा कि आपकी गांधी के संबंध में क्या धारणा हैबर्नार्डशा ने कहा,और सब तो ठीक हैलेकिन दरिद्रनारायण शब्द मेरे बर्दाश्त के बाहर है। दरिद्र को तो मिटाना हैउससे तो घृणा करनी हैउसे तो समाप्त कर देना हैदरिद्र को बचने नहीं देना है। और सब तो ठीक हैयह दरिद्रनारायण शब्द मेरी समझ के बाहर है।
नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा कि गांधी की बहुत सी बातें मेरी समझ में नहीं आती हैं। यह दरिद्रनारायण शब्द मेरी समझ में नहीं आ सका है। यह शब्द ठीक नहीं है। दरिद्र को तो मिटाना हैदरिद्र को तो समाप्त करना हैदरिद्र को तो बचने नहीं देना है। और उसे जब हम नारायण जैसे महत्वपूर्ण महिमा से मंडित करेंगे तो जाने-अनजाने जिसे हम महिमा देना शुरू करते हैं उसे हम मिटाना बंद कर देते हैं। वह मनोवैज्ञानिक घटना हैजिसे हम महिमा देते हैं उसे नष्ट करने का विचार छूटना शुरू हो जाता है। अगर दरिद्र को महारोग कहें तो मिटाने का खयाल आएगादरिद्र को नारायण कहें तो पूजा का खयाल आएगा। यह तो मनोवैज्ञानिक प्रतिफलन होगा उसका।
सवाल यह नहीं है कि गांधी महिमामंडित करते हैं या नहीं। दरिद्रनारायण कहने से दरिद्रता महिमामंडित होती है और दरिद्रनारायण कहने से ऐसा नहीं लगता कि इसको मिटाना है। दरिद्रनारायण कहने से ऐसा लगता है कि पूजा करनी है। नारायण की हम सदा से पूजा करते रहे हैंलेकिन हम कहेंगे कि दरिद्र महारोग है तो सीधा खयाल उठता है कि मिटाना हैनष्ट करना हैसमाप्त कर देना है। यह प्रश्न तो हमारी मनोवैज्ञानिक प्रतिफलन का है कि हमारे मन पर क्या प्रतिफलन होता है। छोटे-छोटे शब्द भी हमारे मानस को गतिमान करते हैं और हमारे मानस मेंहमारे कलेक्टिव मानस मेंहमारे अचेतन मेंहमारे समूह मन में शब्दों की करोड़ों वर्ष की परंपरा है और स्थान है। नारायण को मिटाने की हमने कभी कल्पना ही नहीं की है मनुष्य-जाति के इतिहास में। नारायण को सदा हमने पूजा हैउसे मंदिर में उसके चरणों पर सिर रखा है। नारायण को सदा हमने हाथ जोड़े हैं। नारायण को मिटाने की कल्पना ही असंभव है हमारे चित्त को। जब भी हम किसी के साथ नारायण जोड़ देंगे तो स्वभावतः वह जो हमारा हजारों वर्षों का बना हुआ मन है वह नारायण को मिटाने को आतुर नहीं रह जाएगा।
दरिद्रनारायण शब्द दुर्भाग्यपूर्ण है। उससे समृद्धनारायण को उत्तर तो मिल गयालेकिन घड़ी का पेंडुलम एक कोने से दूसरे कोने पर पहुंच गया। एक बीमारी से दूसरी बीमारी पर पहुंच गया। न तो समृद्ध नारायण है और न दरिद्र नारायण है। नारायण तो सभी हैंइसलिए किसी को विशेष रूप से नारायण कहना खतरनाक है। एकदम खतरनाक है। लेकिन प्रतिक्रिया में ऐसा होता है। अब तक ब्राह्मण प्रभु के लोग थेपरमात्मा के लोग थेगॉड चूजन थेईश्वर के चुने हुए लोग थे। गांधीजी ने उसकी प्रतिक्रिया में हरिजन शब्द चुनाशूद्रों के लिए। जो कि कभी भी प्रभु के कृपापात्र नहीं रहेजिनको प्रभु की कृपापात्र होने का कोई सवाल न था। कृपापात्र थे स्वर्णकृपापात्र थे ब्राह्मणक्षत्रिय। शूद्रशूद्र तो बाहर था जीवन के। उस पर कृपा की कोई किरण परमात्मा की कभी नहीं पड़ी थी। ठीक किया गांधी ने। हिम्मत की कि उसको कहा हरिजनलेकिन हरिजन कहने से वही भूल फिर दोहरा दी गई। हरिजन थे ब्राह्मण अब तकपरमात्मा के लोग वे थे। उनसे छीन कर महिमा हमने शूद्र को दे दी। लेकिन जरूरत इस बात की है कि महिमा किसी के पास बंधी न रह जाए। महिमा वितरित हो जाए और सबकी हो जाए। हरिजन हैं सब। जब तक ब्राह्मण हरिजन थे तब तक शूद्र हरिजन न था। और अगर हम शूद्र को हरिजन कहते हैं तो हम दूसरी भूल करते हैं। ब्राह्मण के प्रति एक विरोध और वैमनस्य पैदा होगा। वह जो दक्षिण भारत में ब्राह्मण के प्रति वैमनस्य और विरोध पैदा हो रहा है वह दूसरी प्रतिक्रिया हैवह दूसरी प्रतिक्रिया है कि अब नीचे जो शूद्र है वह हो गया हरिजन। अब वह चूजन पिपुल अब वे हो गए। तो अब ब्राह्मण को नीचेअपदस्थ करना है।
यह खेल कब तक चलेगाइस खेल को हम समझेंगेइसके राज कोइसके राज को हम समझेंगे तो यह समझना जरूरी है कि प्रत्येक मनुष्य परमात्मा है। चाहे वह दरिद्र होचाहे समृद्ध होचाहे बीमार होचाहे स्वस्थ होचाहे काला होचाहे गोरा हो,चाहे स्त्री होचाहे पुरुष हो--प्रत्येक व्यक्ति परमात्मा है। इसे किसी भी वर्ग विशेष को परमात्मा का नाम देना उसे महिमामंडित करना है। मैं जानता हूं कि गांधी की मजबूरी थी। वह एक प्रतिक्रिया मेंएक विरोध के लिए उन्होंने एक बात चुनी होगी। लेकिन अब चालीस-पचास साल के बाद उस शब्द को एकदम तत्काल छोड़ देना जरूरी है। अब उस शब्द को पकड़ लिए जाना ठीक नहीं है। और यह भी ध्यान रहे कि दरिद्र को न तो महिमा देनी है और न दरिद्र के साथ सहानुभूति प्रकट करनी हैयह भी ध्यान रहे। दरिद्र के साथ सहानुभूतिदया खतरनाक बातें हैं। दरिद्र के साथ दया नहीं करनी हैदरिद्रता को मिटाना है ताकि दरिद्र न रह जाए। दरिद्र के साथ दया करने से दरिद्रता मिटती नहीं है। दरिद्र के साथ दया करने से दरिद्रता चलती हैपोषित होती है। भिखमंगे को हम रोटी दे देते हैंइससे भिखमंगापन नहीं मिटता। भिखमंगे को दी गई रोटी भिखमंगेपन को दी गई रोटी सिद्ध होती है। वह रोटी भिखमंगे के पेट में ही नहीं पहुंचतीभिखारीपन के पेट में पहुंच जाती है। और भिखारीपन जीता है और मजबूत होता है। भिखारी को मिटाना है। दया पर्याप्त नहीं हैदया बहुत तरकीब की बात है।
शोषक समाज ने हजारों वर्षों में दया का आविष्कार ईजाद किया हैदान और दया का। ये तरकीबें हैं। जिससे नीचे के पीड़ित वर्ग को राहत देने का उपाय किया जाता है। अन्यथा बगावत हो सकती हैक्रांति हो सकती है। इसलिए दया और दानथोड़ी सी व्यवस्था बनाए रखनी पड़ती हैताकि वह जो नीचे पीड़ित है उसको ऐसा न लगे कि मुझे बिलकुल छोड़ दिया गया। उसे लगे कि नहीं दया की जाती हैदान किया जाता हैधर्म किया जाता है। यह दयादान और धर्म गरीब का अपमान है। और जिस समाज में दानदयाधर्म की जरूरत पड़ती हैवह समाज स्वस्थसुंदर समाज नहीं हैवह समाज रुग्ण है। और जब तक दुनिया में दयादान और सहानुभूति की जरूरत हम पैदा करते रहेंगेतब तक हम अच्छे मनुष्य को पैदा नहीं कर सकेंगे।
एक ऐसा समाज चाहिए जहां कोई दया मांगने के लिए तैयार न हो। एक ऐसा समाज चाहिए जो ऐसे लोगों को पैदा न कर देता होजिनको आपकी सहानुभूति की जरूरत पड़े। कभी आपने खयाल किया कि जिस पर आप दया करते हैं वह दया आपके अहंकार को मजबूत कर जाती हैवह दया आपको मजबूत कर जाती है कि मैं कुछ हूंमैंने कुछ किया। और जिस पर आप दया करते हैं उसके मन को पश्चात्तापग्लानि और चोट से भर जाती है कि मेरा अपमान किया गया है। आप ध्यान रखनाजिस पर भी आपने दया की उसको आपने बहुत गहरे में अपना शत्रु बना लिया हैमित्र नहीं। वह आपसे बदला लेगा। क्योंकि कोई भी आदमी अपमानित होता है जब उसे दया मांगनी पड़ती है। पीड़ित होता हैऊपर से मुस्कुराकर कहता है कि भगवान तुम्हें सुखी रखेलेकिन वह जानता हैवह भलीभांति जानता है कि उसे इस हालत में कौन ले आया हैकैसे वह इस हालत में आ गया हैऊपर से धन्यवाद देता है। लेकिन भीतरभीतर उसके भीर् ईष्या पलती है और अपमान पलता है।
नहींदया के आधार पर दो व्यक्तियों के बीच मैत्री कभी पैदा नहीं होती। इसलिए अक्सर लोग कहते सुने जाते हैं कि मैंने उस आदमी के साथ भला किया और वह मेरे साथ बुरा कर रहा है। नेकी का फल बदी से मिल रहा है। हमेशा मिलेगा। क्योंकि नेकी अपमान करती है किसी काऔर नेकी तुम्हारे अहंकार को मजबूत करती है और दूसरे मनुष्य को पीड़ित करती है। नहींअब हम दया और धर्म पर नहीं जी सकते हैं और न जीने की जरूरत है। अब तो हमें समझना होगा कि दरिद्र क्यों पैदा होता है?दरिद्रता कहां से जन्म लेती हैउस जड़ को काट देना होगा। एक तरफ जड़ को मजबूत किए चले जाते हैं और शाखाओं और पत्तों को काटते हैं। यह कैसा पागलपन है! एक आदमी रोज पानी देता हो एक वृक्ष मेंऔर फिर पत्तों को काटता होऔर रोज पानी देता हो वृक्ष में। हम जो कर रहे हैं सब मिल कर उससे दरिद्र पैदा हो रहा है। फिर एक-एक दरिद्र को हम भिक्षा देते हैं,धर्मशाला बनाते हैंऔषधालय खोलते हैं।
इधर ऊपर से हम यह व्यवस्था करते हैं और जो हम कर रहे हैं सारा समाज मिल कर उससे दरिद्र पैदा हो रहा है। यह बड़ी अजीब बात है कि सारा समाज मिल कर रोग पैदा करे और फिर रोग के इलाज के लिए अस्पताल खोले। यह कुछ समझ में आने जैसी बात नहीं है। लेकिन अब तक हमें समझ में आती थीक्योंकि हमने व्यक्तिगत संपत्ति को प्रत्येक व्यक्ति के अपने कर्मों का फल समझा हुआ था। वह बात गलत है। कर्मों के फल हैंजन्म हैंपुनर्जन्म हैंलेकिन संपत्ति कर्मों के फल से उपलब्ध नहींसंपत्ति समाज के वितरण की व्यवस्था पर निर्भर है।
लेकिन अब तक हमारी धारणा यही थी कि गरीब गरीब है अपने कर्मों के कारणअमीर अमीर है अपने कर्मों के कारण। इस दृष्टिकोण नेइस कंसेप्ट नेइस सिद्धांत ने हिंदुस्तान की गरीबी को तोड़ने के सब उपाय मुश्किल कर दिए थे। और आज भी हिंदुस्तान में गरीबी नहीं टूट रही। तो उसके पीछे हमारी फिलासफी हैहमारा दृष्टिकोण है। वह हमारा दृष्टिकोण यह है कि गरीब समझता है कि मैं गरीब हूं अपने फलों के कारणअमीर अमीर है अपने फलों के कारण। हमारे दोनों के बीच कोई संबंध नहीं हैअपने-अपने फलों से संबंध है। यह तरकीब बहुत होशियारी की साबित हुई। यह तरकीब बहुत होशियारी की साबित हुई। इससे मेरे पिछले जन्मों को मुझसे जोड़ दिया गयालेकिन समाज से मुझे तोड़ दिया गया। समाज के ऊपर मेरी गरीबी-अमीरी का कोई सवाल न रहाकोई प्रश्न न रहा।
यह धर्म की धारणा ने निश्चित ही व्यक्तिगत संपत्ति को बचाने का अदभुत उपाय किया है। इसीलिए सारे धर्मशास्त्र दुनिया के कहते हैंचोरी पाप हैलेकिन दुनिया का एक भी धर्मशास्त्र नहीं कहता कि शोषण पाप है। दुनिया का कोई धर्मशास्त्र कैसे कह सकता है कि शोषण पाप हैवे कहते हैंचोरी पाप है। कभी आपने सोचा कि इसके इंप्लीकेशंस क्या हैंइसके मतलब क्या हैं?इसका मतलब यह है कि चोरी हमेशा गरीब का कृत्य है अमीर के खिलाफचोरी हमेशा उनका कृत्य है जिनके पास संपत्ति नहीं,उनके खिलाफ जिनके पास संपत्ति है। धर्म संपत्तिशाली की रक्षा कर रहा है। वह कहता हैचोरी पाप है। लेकिन वह यह नहीं कहता कि शोषण पाप है। शोषण अमीर का कृत्य है दरिद्र के खिलाफ। धर्मग्रंथ कोई भी नहीं कहता कि शोषण पाप है। एक अर्थों में माक्र्स की किताब दुनिया का एक नया धर्मग्रंथ हैजो शोषण को पाप कहता है। और अगर माक्र्स हिंदुस्तान में पैदा हुआ होतातो हमने अपने अवतारों में उसकी गिनती की होती। हम निश्चित उसको अपने अवतारों में गिनते। क्योंकि उसने धर्म और जीवन के संबंध में एक नये सूत्र को स्थापित किया है और वह यह कि शोषण पाप है। और जब तक शोषण का पाप जारी है तब तक चोरी जैसे छोटे पाप पैदा होते रहेंगे। वह उसकी बाइ-प्रोडक्ट है। वह उससे आएंगे और मिट नहीं सकेंगे। मैं यह नहीं कहता हूं कि शोषक पापी हैमैं कहता हूंशोषण पाप है।

एक मित्र ने पूछा है कि मैं पूंजीपति में और पूंजीवाद में क्या फर्क करता हूंक्या मैं कहना चाहता हूं कि पूंजीवाद जिम्मेवार है,पूंजीपति जिम्मेवार नहीं है?

हांमैं फर्क करता हूं और कहना चाहता हूं कि पूंजीपति और पूंजीहीनशोषक और शोषितदोनों शोषण के यंत्र के परिणाम हैं। शोषण का यंत्र जारी है। उस शोषण के यंत्र में सारे लोग श्रम कर रहे हैं। वह जिसके पास धन नहीं हैआप सोचते हैंवह धन पाने के लिए श्रम नहीं कर रहेवह धन पाने के लिए श्रम कर रहेनहीं कर पा रहे यह दूसरी बात है। जो गरीब है वह अमीर होने की कोशिश नहीं कर रहानहीं हो पा रहा यह दूसरी बात है। जो धनहीन हैवह भी धनाकांक्षी है। जो धनवान हैवह गरीब होने से बचने की कोशिश नहीं रह रहावह धनवान है लेकिन गरीब न हो जाएइसकी पूरी कोशिश में लगा हुआ है। जो गरीब है वह अमीर कैसे हो जाएइसकी पूरी कोशिश में लगा हुआ है। कुछ लोग सफल हो गए हैंकुछ लोग असफल हो गए हैं,यह दूसरी बात है। हम सारे लोग इस कमरे में दौड़ने की कोशिश करें और हमारे इस भवन का यह नियम हो कि जो प्रथम आ जाएगा वह सर्वश्रेष्ठ होगा। हम सारे लोग दौड़ेंगेलेकिन प्रथम तो एक ही आ सकता है। जो आ जाएगा वह जिम्मेवार है प्रथम आने के लिए या कि वह व्यवस्था जो कहती है कि प्रथम आना श्रेयस्कर हैवह व्यवस्था जिम्मेवार हैजो नहीं आ सके उनका कोई बड़ा पुण्य कर्म है कि वे नहीं आ सकेउन्होंने भी दौड़ने की पूरी कोशिश की है जी जान से। वे नहीं आ सके यह दूसरी बात है। जिनके पास धन नहीं है उन दोनों की दौड़ समान है। दोनों धनाकांक्षी हैं--धनाढय भीधनहीन भी--दोनों धनाकांक्षी हैं।
धनाकांक्षा का यह जो समाज है वह जिम्मेवार है। धनपति जिम्मेवार नहीं है पूंजीवाद के लिएपूंजीवाद जिम्मेवार है धनपति को पैदा करने के लिए। हमारी जो चिंतना है पूंजी को संगृहीत करने कीहमारा जो विचार है कि पूंजी को उपलब्ध कर लेनापूंजी का मालिक हो जानापूंजी पर कब्जा कर लेनाश्रेयस्कर है जीवन में। यह जो हमारी पूरी व्यवस्था है...फिर जो आदमी पूंजी को उपलब्ध कर लेता हैउसे हम देते हैं सम्मान। बड़े मजे की बात हैदरिद्र भी उसे सम्मान देता है जो पूंजी उपलब्ध कर लेता है। दरिद्र भी हाथ बंटा रहा है पूंजी के सम्मान में। दरिद्र पूरा आदर देता है उसे जो जीत जाता है। दरिद्र खुद उसे अपमानित करता है जो उससे दरिद्र है। वह उसको स्वीकार नहीं करता। सम्राट सम्राटों से मिलते हैंपूंजीपति पूंजीपतियों से मिलते हैंचमार चमारों से मिलते हैं। चमार भी भंगी से मिलना पसंद नहीं करते। वह नीचे उनका और भी ज्यादा दरिद्र है। उससे मिलने को वह भी राजी नहीं है। वे उसके साथ भी चाहते हैं कि रास्ते पर नमस्कार वह उन्हें करे।
पूरे समाज की मनोवृत्ति धनाकांक्षी हैपूरे समाज का चित्त पूंजीवादी है। गरीब का भीभिखमंगे का भीसम्राट का भीधनपति का भीइसमें धनपति को जिम्मा देने की जरूरत नहीं है। हम सब जिम्मेवार हैंहम इकट्ठे जिम्मेवार हैं। निकृष्टतमदरिद्रतम और श्रेष्ठतम और धनवानहम सब इकट्ठे जिम्मेवार हैं इस समाज को निर्मित करने में। और इसलिए यह बात गलत है कि कोई कहे कि पूंजीपति जिम्मेवार है। पूंजीपति भी उसी व्यवस्था का पैदावार हैजिस व्यवस्था की पैदावार गरीब है। वे दोनों एक ही व्यवस्था से उत्पन्न हुए। और गरीब भी पूंजीवाद को जमाए रखने में उतना ही सहयोगी है जितना अमीर।
पूंजीवाद जिस दिन जाएगा उस दिन अमीरी ही नहीं जाएगीगरीबी भी चली जाएगी। पूंजीवाद के जाने के साथ ही गरीब-अमीर दोनों चले जाएंगे। वे दोनों पूंजीवाद के हिस्से हैं। उसमें गरीब उतना ही जिम्मेवार है। यह हमें कभी-कभी दिखाई नहीं पड़ता है। हमें यह दिखाई पड़ता है कि एक ताकतवर आदमी ने एक कमजोर आदमी की छाती पर पैर रख कर खड़ा हो गया हैतो हम कहते हैंयह ताकतवर आदमी बुराई कर रहा है। लेकिन हम नहीं जानते कि कमजोर आदमी बुराई क्यों करने दे रहा हैदोनों जिम्मेवार हैं। वह कमजोर हैऔर वह सहने को राजी है किसी को छाती पर। तो छाती पर पैर रखने वाला जितना जिम्मेवार है इस कृत्य मेंछाती पर जिसने पैर रखने दिया हैवह भी उतना ही जिम्मेवार है। कमजोर हमेशा से उतने ही जिम्मेवार हैं जितने ताकतवर। कायर हमेशा से उतने ही जिम्मेवार हैं जितने बहादुर। हम कहते हैं कि हमारे ऊपर मुसलमान आए और उन्होंने हमें गुलाम बना लियामुसलमान जिम्मेवार है। और आप जिम्मेवार नहीं हैं जो गुलाम बनेगुलाम उतना ही जिम्मेवार है जितना गुलाम बनाने वाला। और जब तक गुलाम ऐसा सोचता है कि गुलाम बनाने वाले जिम्मेवार हैंतब तक वह बिलकुल गलत बात सोचता है। गुलामी दोनों के हाथ के जोड़ का परिणाम है। गुलाम बनाने वाले का और गुलाम बनने वाले का। और जब तक दुनिया में गुलाम बनने को लोग मौजूद हैं तब तक गुलाम बनाने वाले लोग भी हमेशा मौजूद रहेंगे। यह जिम्मेदारी दोनों तरफ है।
स्त्रियां कहती हैं कि पुरुषों ने हमें दबा लिया हैलेकिन स्त्रियों को जानना चाहिए कि वे दबने को तैयार हैं और इसलिए पुरुषों ने दबा लिया हैअन्यथा कौन किसको दबा सकता है। कोई किसी को नहीं दबा सकता। लेकिन हम हमेशा यह देखते हैं कि दूसरा जिम्मेवार है। अंग्रेज जिम्मेवार हैहमको गुलाम बना लिया। और तुम चालीस करोड़ नपुंसक क्या करते थे कि अंग्रेज तुम्हें गुलाम बना सकेहम कम से कम मर तो सकते थे--अगर और कुछ नहीं कर सकते थे। मुर्दों को तो गुलाम नहीं बनाया जा सकता थाकम से कम आखिरी रूप में एक ताकत तो आदमी के हाथ में है कि वह मर सकता हैएक च्वाइस तो कम से कम हाथ में है हर आदमी के कि वह आत्महत्या कर सकता है।
मैंने सुना है कि जर्मनी ने हालैंड पर हमला करने का विचार किया। हालैंड तो बहुत समृद्ध मुल्क नहीं है और हालैंड के पास बहुत सुसज्जित सेनाएं भी नहीं हैं। हालैंड के पास बड़ी शक्ति भी नहीं हैं। जर्मनी से जीतने का तो कोई उपाय भी नहीं है उसके पास। लेकिन हालैंड ने तय किया कि चाहे हम मर जाएंगेलेकिन हम गुलाम नहीं बनेंगे। पर लोगों ने पूछा कि हम करेंगे क्या?कैसे गुलाम नहीं बनेंगेतो हालैंड का आपको पता होगाउसकी जमीन नीची है समुद्र की सतह से। समुद्र के चारों तरफ दीवालें और परकोटे उठा कर उसको अपनी जमीन को बचाना पड़ता है। तो हालैंड के एक-एक कम्यून नेएक-एक गांव की कौंसिल ने यह तय किया कि जिस गांव पर हिटलर का कब्जा हो जाए वह गांव अपनी दीवालें तोड़ दे और समुद्र को गांव के ऊपर आ जाने दे। पूरा गांव डूब जाएगाहिटलर की फौजें भी डूब जाएंगी। हालैंड को हम पूरा डुबा देंगे समुद्र के नीचेलेकिन इतिहास यह नहीं कह सकेगा कि हालैंड गुलाम हुआ।
ऐसी कौम को गुलाम बनाना मुश्किल है। क्या करिएगाआखिर गुलाम बनाने के लिए आदमी का जिंदा रहना तो जरूरी है?कमजोर आदमी को भी मरने का हक तो है। कमजोर आदमी भी मरना नहीं चाहताइसलिए गुलाम बनने को राजी होता है और गुलामी में उसका हाथ है। कोई अपने को बचा नहीं सकता। यह जो पूंजी की व्यवस्था हैयह जो शोषण की व्यवस्था हैइसमें गरीब आदमी का हाथ उतना ही है जितना अमीर आदमी का हाथ है। इसमें भिखमंगों का हाथ उतना ही है जितना शहनशाहों का हाथ। यह तो दोनों के जोड़ का फल है।
इसलिए मैं नहीं कहता कि पूंजीपति का हाथ हैमैं कहता हूंहम सबका हाथ है। और जब तक हम यह न समझेंगे कि हम सबका हाथ हैतब तक हम इस शोषण की व्यवस्था को नहीं बदल सकेंगे। अगर पूंजीपति का हाथ है तो किसी पूंजीपति को गोली मार दोतो कोई फर्क पड़ेगादूसरा पूंजीपति पैदा हो जाएगाक्योंकि व्यवस्था काम कर रही है। किसी पूंजीपति को समझा-बुझा कर उसकी संपत्ति बंटवा दोतो कोई फर्क पड़ेगासंपत्ति बंट जाएगीदूसरा पूंजीपति खड़ा हो जाएगाक्योंकि व्यवस्था काम कर रही है। व्यवस्था काम कर रही हैसिस्टम काम कर रही हैउस सिस्टम से सारी चीजें पैदा हो रही हैंउस व्यवस्था से पैदा हो रही हैं।
इसलिए जो समाजवादी पूंजीपतियों के प्रति घृणा फैलाते हैंवे गलत काम करते हैं। वह काम ठीक नहीं है। समाजवाद पूंजीपति के प्रति घृणा नहीं हैसमाजवाद पूंजीपतिदरिद्रधनवान सबको मिटाने का उपाय है। समाजवाद पूंजीवाद के विरोध में है,पूंजीपति के विरोध में नहीं है। पूंजीपति के विरोध से कुछ प्रयोजन नहीं है। प्रयोजन है पूंजीवाद सेवह जो कैपिटलिज्म हैवह जो हमारी पूंजी के प्रति निष्ठा हैवह जो हम पूंजी को मनुष्य से ज्यादा मूल्य देते हैंवह जो हम पूंजी को जीवन का परमात्मा बनाए हुए हैंवह जो हम पूंजी के लिए ही जीते और मरते हैं--गरीब भीअमीर भीयह जो पूंजी का सारा का सारा इंतजाम है--इस पूंजी के केंद्र को तोड़ देना समाजवाद है।
समाजवाद गरीब की लड़ाई नहीं है पूंजीपति के खिलाफ। समाजवाद पूंजीपति कीगरीब कीसबकी लड़ाई है पूंजी के खिलाफ;यह समझ लेना जरूरी है और जिस दिन हम यह समझ सकेंगे की पूंजीवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई हैपूंजीपति के खिलाफ नहींतो पूंजीपति भी इस लड़ाई में साथी और सहयोगी होगा। समाजवादियों की इस गलत धारणा ने कि हम पूंजीपति के खिलाफ लड़ रहे हैंसमाज को अजीब हालत में डाल दिया है। उन्होंने एक ऐसी हालत पैदा कर दी कि लड़ाई पूंजीपति के खिलाफ है। तो पूंजीपति समाजवाद का नाम सुन कर ही भयभीत होता है। वह सुनता है कि समाजवादयानी मेरी दुश्मनी। समाजवाद पूंजीपति की दुश्मन नहीं है। समाजवाद गरीब से गरीबी  छीन लेगाअमीर से अमीरी छीन लेगा। और गरीब भी ठीक अर्थों में नारायण नहीं हो पाताअमीर भी ठीक अर्थों में नारायण नहीं हो पाता। अमीर-नारायण भी तकलीफ में रहता है पूंजी कीगरीब-नारायण तकलीफ में रहता है गरीबी की। जिस दिन हम गरीब की गरीबी छीन लेंगेअमीर की अमीरी छीन लेंगेउस दिन हम प्रत्येक मनुष्य को मनुष्य होने का पूरा हक देंगेउस दिन मनुष्य-नारायण का जन्म होगा। न तो समृद्धनारायण की पूजा जरूरत हैन दरिद्रनारायण की पूजा की जरूरत है। पूजा की जरूरत है नारायण की। और नारायण प्रकट नहीं हो पा रहा है,क्योंकि पूजा पूंजी की चल रही हैनारायण की पूजा कैसे हो सकती हैइसलिए मैंने कहा कि मैं उस शब्द को पसंद नहीं करता हूं।

कुछ मित्रों ने यह पूछा है कि समाजवाद कीसमानता की मैं जो बात करता हूंक्या उसका यह अर्थ है कि सबकी संपत्ति बिलकुल समान कर दी जाएक्या उसका अर्थ है कि सबको तनख्वाहें बिलकुल बराबर दे दी जाएंक्या उसका अर्थ है कि प्रत्येक आदमी को एक सा मकान दे दिया जाए?

नहींउसका यह अर्थ नहीं है। उसका यह अर्थ है कि प्रत्येक आदमी को जीवन में विकास का समान अवसर दे दिया जाए। अभी हम पूंजी के इतने प्रभाव में हैं कि जब भी हम समानता की बात सोचते हैंतो तत्काल हमारे सामने जो पहला सवाल उठता है वह यह है कि बराबर नौकरीबराबर तनख्वाहबराबर मकान। यह पूंजी का प्रभाव है कि तत्काल हमें पूंजी को समान करने का ध्यान आता हैक्योंकि हम पूंजी से प्रभावित हैंहम पूंजी के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकते। हमें मनुष्य का सवाल ही नहीं हैसवाल पूंजी का है। हजारों साल से पूंजी की धारणा के नीचे जीने सेजब भी समाजवाद की दृष्टि उठती हैतो हम समझते हैं पूंजी।
नहींसवाल मूलतः यह नहीं है कि सब आदमियों को बराबर-बराबर तनख्वाह मिल जाए। तनख्वाह का मूल्य नहीं हैमूल्य इस बात का है कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन का समान अवसर मिल जाए। अब एक घर में एक आदमी मोटा है और एक आदमी दुबला हैतो समान रोटी खिलाने से बड़ी झंझट पैदा हो जाएगी। कि समाजवाद का मतलब यह नहीं है कि सब लोगों को बराबर रोटी खानी पड़ेगी। अब एक मोटा आदमी हैउसकी कम रोटी में जान निकल जाएगी और पतले आदमी को ज्यादा रोटी खिलाने से जान निकल जाएगी। यह मतलब नहीं है। लेकिन प्रत्येक आदमी को जीवन का समान अवसर उपलब्ध हो सकेजीवन के विकास कापरमात्मा तक पहुंचने कासंगीत तकसत्य तकधर्म तकजीवन की सुविधा का समान अवसर मिल सके। और जितने दूर तक यह संभव हो सकेजितने दूर तक यह उचित हो सकेउतने दूर तक वर्गों का फासला निरंतर कम से कम होता चला जाए।
अब हिंदुस्तान में एक आदमी एक रुपया कमा नहीं पा रहा है रोज और दूसरा आदमी रोज पांच लाख रुपये कमा रहा हो। यह फासलायह घबड़ाने वाला फासला है। यह अमानवीय हैइनह्यूमन है। और हम कहते हैं कि हम धार्मिक लोग हैं! धार्मिक लोग हम होतेतो इतने अमानवीयइतने अधार्मिक फासले सह सकते थेलेकिन हमारा धर्म इसमें है कि हम माला फेरते हैंवह हमारा धर्म है।
अभी एक बहन ने मुझे आकर कहाकि किसी धार्मिक को वह साथ में लाई होंगीउन्होंने कहाअरेयह तो ब्रह्म की कोई बात ही नहीं कर रहे हैंयह तो सब संसार की ही बातें कर रहे हैं।
ब्रह्म की बातों को लोग समझते हैं धार्मिक हो गए। ब्रह्म की बात कर ली तो धार्मिक हो गए। धार्मिक ब्रह्म की बात करने से कोई नहीं होताधार्मिक होता है इस जगत में ब्रह्म को उतारने की संभावना बढ़ाने से। इस जगत में ब्रह्म अवतरित हो। ब्रह्म की बकवास तो ग्रंथों में बहुत लिखी हैपरिभाषा बहुत लिखी है और कोई भी मूढ़जन याद कर सकता है कि ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है। इसको याद करने में कोई बहुत बुद्धिमानी की जरूरत नहीं है। लेकिन ब्रह्म सत्य हो कहां पाया है। जगत ही सत्य बना हुआ है। ब्रह्म तो बिलकुल असत्य है। ब्रह्म सत्य हो सकता हैजब हम इस जगत में ब्रह्म के विकास की अधिकतम सुविधा और समान सुविधा जुटा सकेंगे तो ब्रह्म प्रकट हो सकता है। तो ब्रह्म सत्य होगा और जगत मिथ्या होगा। बुद्ध के लिएमहावीर के लिए ब्रह्म सत्य हो गयाजगत मिथ्या हो गया। लेकिन हमारे लिएहमारे लिए रोटी सत्य है और ब्रह्म मिथ्या है। हमारे लिए शरीर सत्य है और आत्मा मिथ्या है।
सूत्र रटने से कुछ भी नहीं होगाबल्कि हम सूत्र रटते ही इसलिए हैं। जिस आदमी को यह पता चल चुका हो कि ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या हैवह रोज सुबह बैठ करआंख बंद करके यह कहेगा कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्याब्रह्म सत्य जगत मिथ्यापता चल गया होतो पागल हो गयाउसको कहने की जरूरतएक पुरुष एक कोने में बैठ कर कहे कि मैं पुरुष हूंमैं पुरुष हूंतो सबको शक हो जाएगा कि यह आदमी पुरुष नहीं है। क्या बात का सबूत है! तुम पुरुष हो यह तुम्हें पता हैबात खत्म हो गई। अब इसको रोज-रोज दोहराने की और सत्संग करने की जरूरत नहीं रही समझने जाने के लिए कि मैं पुरुष हूं या नहीं। जब तक संदेह है तब तक इस तरह की बातों की पुनरुक्ति है। जो लोग सुबह बैठ कर दोहराते हैं ब्रह्म सत्य जगत मिथ्याउनको जगत सत्य दिखाई पड़ता हैब्रह्म मिथ्या दिखाई पड़ता है। इस स्थिति को उलटाने के लिए बेचारे जोर-जोर से रट रहे हैं कि नहीं-नहीं जगत असत्य हैब्रह्म सत्य है। जो उन्हें दिखाई पड़ रहा है उसको मिटा डालने के लिएपोंछ डालने के लिएउलटा कर लेने के लिए ये सारी बातें कर रहे हैं। इन बातों से ब्रह्मज्ञान का कोई संबंध नहीं है।
ब्रह्मज्ञान का संबंध ब्रह्म की चर्चा से नहींइस जगत में ब्रह्म की कैसे अवतारणा होकैसे डिसेंड हो सके वह जो डिवाइन है,वह जो दिव्य हैवह कैसे इस पृथ्वी पर आ सकेअधिकतम प्राणों में कैसे आकर वह स्पर्श कर सकेअधिकतम प्राणों में कैसे उसका संगीत गूंज सके। लेकिन जिन प्राणों को शरीर से ही मुक्त होने का उपाय न मिलता होउन प्राणों में ब्रह्म के अवतरण की संभावना कहां?
इसलिए मैं कहता हूं कि समाजवाद आने पर जगत में ब्रह्मवाद आने के द्वार खुल जाएंगे। अब तक दुनिया में व्यक्ति हो सके हैं ब्रह्मवादीसमाज नहीं हो सका। अरबों-खरबों व्यक्तियों में अगर एकाध व्यक्ति ब्रह्मवादी हो जाता हैइसका मूल्य कितना हो सकता हैअगर हम इतिहास उठा कर देखें दस हजार वर्ष कातो हम दस-पच्चीस नाम गिना सकेंगे मुश्किल से कि ये ब्रह्मवादी हैं। कितने अरबों लोग पैदा हुएकितने अरबों लोग मरेकितने अरबों लोग जीएकितने अरबों लोग समाप्त हुएवे सब कहां गएवे ब्रह्मवादी नहीं हो पाएदस-पांच लोग ब्रह्मवादी हुए! यह सफलता की बात है?
एक माली एक करोड़ पौधे लगाए और एक पौधे में फूल आ जाएतो हम माली की प्रशंसा करेंगेहम कहेंगे कि धन्य हो माली,बड़े कुशल होबहुत कारीगर होबड़े महान हो। माली के कारण नहीं आएइंस्पाइट ऑफउसके बावजूद आ गए होंगे।
करोड़-करोड़ लोग पैदा हों और एक आदमी शंकर हो जाएकरोड़-करोड़ लोग पैदा हों और एक आदमी जीसस हो जाएयह कथा कोई सौभाग्यपूर्ण हैनहींहोना उलटा चाहिए। करोड़-करोड़ लोग पैदा होंकभी एकाध आदमी अधार्मिक हो पाएतो हम समझेंगे कि पृथ्वी ब्रह्म की तरफ जा रही है। लेकिन हम अपने देश में यह भ्रम लिए हुए बैठे हैं कि हम सब धार्मिक लोग हैं। धार्मिक लोग हैं और इतने फासले हैं जीवन में! नहीं मैं यह कहता हूं कि सारे फासले आज टूट सकते हैं। लेकिनलंबे अर्थों मेंआदर्श की भांति एक दिन सारे फासले भी टूट सकते हैं। लेकिन आज फासले हम जितने कम कर सकेंसुविधा और अवसर को जितना बांट सकें उतना मनुष्यता का पुनरुत्थान होगाउतनी मनुष्यता परमात्मा की और उठ सकती है।
इसलिए जो बातें मैं कर रहा हूंकोई भूल कर यह न समझे कि मैं संसार की बातें कर रहा हूं। संसार की बात करने की मुझे सुविधा नहीं हैफुर्सत नहीं है। मैं जो बात कर रहा हूं वह धर्म की ही बात कर रहा हूंमैं जो बात कर रहा हूं वह ब्रह्मज्ञान की ही बात कर रहा हूंकोई संसार की बात मुझे करने की रुचि नहीं है। और जो संसार है ही नहीं उसकी बात की भी कैसे जा सकती हैब्रह्म ही हैउसी की बात की जा सकती है। और ब्रह्म बड़ी मुश्किल में पड़ा है और पूंजीवाद ने ब्रह्म को बहुत झंझट में डाला हुआ है। इस पूंजीवाद से ब्रह्म का छुटकारा होना जरूरी है।
यह जो हमारी दृष्टि अगर रहे कि नहीं-नहींसंसार असार हैउसकी बात नहीं करनी है। यह बात पूंजीवाद के बहुत पक्ष में है। पूंजीवाद चाहता है कि साधु-संत यही समझाते रहे कि संसार असार हैसंसार असार हैइसमें कुछ भी मतलब नहीं है। गरीबी?अरे सह लोइसमें कुछ सार नहीं हैगरीबी-अमीरी सब बराबर है। भूख सह लोअकाल सह लोदरिद्रता सह लोसंतोष रखो,सांत्वना रखोयह सब सपना है। पूंजीवाद पसंद करता है कि यह बातेंयह जहरयह पायज़न लोगों के दिमाग में डाला जाता रहे कि यह सब तो असार हैइसकी फिक्र ही मत करो।
एक आदमी आपको लूट रहा है और एक ज्ञानी आपको समझा रहा है कि घबड़ाओ मतलूटते रहोयह सब असार है। लेकिन वह लूटने वाला बिलकुल नहीं सुनतावह लूटता चला जाता हैउसे असार से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह लूटने वाला सुन लेता है कि असार है और खड़ा रह जाता है। यह लूटता है। वह लूटने वाला प्रसन्न होता है। लूट में से थोड़ा हिस्सा वह ज्ञानी को भी देता है। क्योंकि वह जानता है। यह आपको पता हैवह लूट में से थोड़ा हिस्सा उसको देता है।
सारे पंडितसारे ज्ञानीसारे साधु-संन्यासी उस लूट में हिस्सेदार होते हैं और उस हिस्से में होने की वजह से वे बेचारे निरंतर यह कहते रहते हैं--सब असार हैसब असार हैकोई सार नहीं हैयह सब माया हैयह सब सपना हैयह सब सपना है। यह सपना है जो चारों तरफ चल रहा हैऔर अगर यह सपना हैतो ज्ञानी छोड़ कर क्या भागता हैअगर पत्नी सपना हैतो पत्नी से भागने की जरूरतऔर धन अगर सपना हैतो धन से भागने की जरूरतऔर अगर जीवन सपना हैतो त्याग किसका करते होसपनों के त्याग किए जा सकते हैंनहींलेकिन छोड़ने और भागने के लिए ज्ञानी मानता है कि सपना नहीं है।
लेकिन यह जो चल रही है समाज की व्यवस्थायह जो समाज की सनातन व्यवस्था चल रही है यह न बदल जाएइसके बदलने की बात करोवह कहेगाकहां संसार की और माया की बात करते हैं। उसे पता नहीं कि माया और संसार को उसकी बातें सुरक्षा दे रही हैं। इस माया और संसार को तोड़ा जा सकता हैइस पृथ्वी को परमात्मा की खोज का एक अपूर्व अवसर बनाया जा सकता है। लेकिन आज तक मनुष्य ने जो समाज निर्मित किया है उस समाज में अधिकतम लोगों की जीवन-ऊर्जा रोटी जुटाने मेंशरीर की व्यवस्था करने में ही नष्ट हो जाती हैवह कभी भी इसके ऊपर नहीं उठ पाती हैइसके बियांडइसके अतीत नहीं जा पाती।
एक ऐसा समाज चाहिए संपत्तिशालीएक ऐसा समाज चाहिए समृद्धिशालीएक ऐसा समाज चाहिए समान अवसर वालाएक ऐसा समाज चाहिए जहां पूंजी केंद्र न होपरमात्मा केंद्र होजहां हम जीवन को जीएं सिर्फ इसलिए कि जीवन और ऊपर जा सके। एक वैसा समाज जिस दिन दुनिया में होगाउस दिन धर्म का जन्म होगाउस दिन ब्रह्म हमारे निकट आ सकेगा। अभी शरीर के अतिरिक्तपदार्थ के अतिरिक्त हमारे निकट कुछ भी नहीं है।
एक अंतिम प्रश्नफिर मैं अपनी बात पूरी करूं।

एक बहन ने पूछा है: बहुत ही मजेदार बात पूछी हैउन्होंने पूछा है कि शिविरों मेंअभी अखबारों ने कुछ फोटो छाप दिएएक बहन मेरे गले से आकर लगी हुई हैअखबारों ने फोटो छाप दिया। उन्होंने वह फोटो देख लिया होगा। तो उन्होंने मुझसे पूछा है कि शिविर में आप स्त्रियों के साथ बड़ा दर्ुव्यवहार करते हैं। गांधीजी ने तो ऐसा दर्ुव्यवहार कभी भी नहीं किया।

अगर स्त्रियों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करना दर्ुव्यवहार हैतो मैं जरूर दर्ुव्यवहार करता हूं। अब तक साधु-संत स्त्रियों के साथ घृणा का व्यवहार करते रहे हैंइसलिए वही सदव्यवहार हमें मालूम होने लगा है। साधु-संतों ने आज तक स्त्री को मनुष्य होने की हैसियत नहीं दी है। साधु-संतों ने उसे नरक का द्वार समझा हैसाधु-संतों ने उसे कीड़े-मकोड़ों से बदतर बताया है। साधु-संतों ने उसे सांप-बिच्छुओं से खतरनाक समझाया है। साधु-संतों का अगर वह पैर भी छू लेतो साधु-संत अपवित्र हो जाते हैं और उन्हें उपवास करके पश्चात्ताप करना पड़ता है। और ये साधु-संत स्त्री से ही पैदा होते हैं। इनकी सारी देह स्त्री से ही निर्मित होती है। इनका खून स्त्री काइनकी हड्डी स्त्री कीइनके जीवन की सारी ऊर्जा स्त्री से आती है और वही स्त्री नरक का द्वार हो जाती है!
मनुष्य-जाति जब तक स्त्रियों के साथ ऐसा असम्मानपूर्ण और ऐसा मूढ़तापूर्ण व्यवहार करेगीतब तक मनुष्य-जाति के जीवन में कोई ऊर्ध्वगमन नहीं हो सकता है। स्त्री के साथ दर्ुव्यवहार अब तक रहा है और उस दर्ुव्यवहार का कारणउस दर्ुव्यवहार का कारण स्त्री की कोई खराबी नहीं है। क्योंकि जिन बातों के कारण स्त्री को आप दोष देते हैंआप उन बातों में स्त्री के सहयोगी नहीं हैंयह बड़े मजे की बात है! पुरुष नरक का द्वार नहीं हैस्त्री अकेली दुनिया में कामवासना ले आती है,पुरुष नहींसच्चाई उलटी है। स्त्री इतनी कामुक कभी भी नहीं हैजितने पुरुष कामुक हैं। और स्त्री की कामवासना को अगर न जगाया जाएतो स्त्री कामवासना के लिए बहुत आतुर भी नहीं होती। और सारी स्त्रियां जानती हैं कि कामवासना में कौन उन्हें रोज घसीटता है--उनका पति या वे स्वयं! कौन उन्हें घसीटता हैपुरुष चौबीस घंटे सेक्सुअल है। प्रतिदिन सेक्सुअल हैलेकिन दोष है स्त्री का। वह उन्हें नरक ले जाती है।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि स्त्री तो पुरुष पर कोई बलात्कार नहीं कर सकती हैस्त्री तो पैसिव हैस्त्री तो निष्क्रिय है,वह कोई हमला तो कर नहीं सकती पुरुष पर। पुरुष हमला कर सकता है। जो निष्क्रिय है उसको नरक का द्वार कहता है और जो सक्रिय है वासना मेंअपने को शायद स्वर्ग का द्वार समझता होगा। स्त्री को दी गईं ये गालियांये अपमानये अशोभन शब्द अब तक सदव्यवहार समझे गए हैं। और स्त्रियां इतनी मूढ़ हैं कि पुरुष की इन मूर्खतापूर्ण बातों में सहयोगी रहीं और उन्होंने साथ दिया है। उन्होंने कोई इनकार नहीं कियाउन्होंने कोई बगावत नहीं कीउन्होंने कोई विद्रोह नहीं किया। उन्होंने नहीं कहा कि यह तुम क्या कह रहे हो। उसे सह लिया उन्होंने चुपचाप। उसको उन्होंने मान लिया है चुपचाप। क्योंकि उनका न कोई अपना गुरु है,  न उनका अपना कोई शास्त्र हैन उनका अपना कोई धर्म है। वे सब पुरुषों के निर्मित हैंवे पुरुषों के पक्ष में लिखे गए हैं। वे पुरुषों ने लिखे हैंअपने पक्ष में लिखे हैं। पुरुषों ने अपने ग्रंथों में लिख लिया है कि अगर पति मर जाए तो स्त्री को सती होना चाहिएलेकिन किसी पति को भी कभी सती होना चाहिएयह बात उन्होंने नहीं लिखी। स्वभावतः वर्गीय दृष्टिकोण हैवह पुरुष का अपना दृष्टिकोण है। वैसा उसने लिख लिया है।
साधु और संन्यासी स्त्री के प्रति क्यों इतना दर्ुव्यवहारपूर्ण रहा हैउसका एकमात्र मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि साधु और संन्यासी कोभीतर उसकी कामना की स्त्री बहुत पीड़ित और परेशान करती है। उसके भीतर स्त्री घूमती है। वह बेचारा परमात्मा को बुलाना चाहता है। जब भी परमात्मा को बुलाता है तभी पत्नी आ जाती है। वह जब भी राम-राम-राम-राम जपता है तभी भीतर काम-कामकामवासना-कामवासना चलती है। वह घबड़ाया हुआ है भीतर की स्त्री से। वह उस भीतर की स्त्री से परेशान है,उसके बदले में वह स्त्री को गाली देता हैउसके बदले में बाहर की स्त्री से भयभीत होता है कि बाहर की स्त्री ने अगर हाथ छू दियातो मरेजान निकल गईक्योंकि भीतर जो स्त्री बैठी है वह जग जाएगीवह खड़ी हो जाएगी।
बाहर की स्त्री के हाथ में ऐसा क्या है जिसे छू देने से किसी संन्यासी में कुछ अपवित्र हो जाएगाऔर संन्यासी के शरीर में ऐसा कुछ क्या है जो स्त्री के शरीर से ज्यादा पवित्र है और छूने से अपवित्र हो सकता हैशरीर में क्या हैइतना भय क्या है?इतना भय स्त्री का भय नहींअपने भीतर छिपी हुई सेक्सुअलिटी काकामवासना का भय है।
इसलिए संन्यासी भागता रहा हैघबड़ाता रहा हैदूर-दूर भागता रहा है। स्त्री छू ले तो पापस्त्री छू ले तो अपवित्रता। और इसको बाकी पुरुष बहुत आदर देते रहे हैं क्योंकि बाकी पुरुषों का मन स्त्री को छूने के लिए लालायित है। वे देखते हैं कि एक आदमी स्त्री को नहीं छूता हैदूर-दूर भागता हैवे कहते हैं: है महापुरुषहै तपस्वीक्योंकि हमारा तो मन नहीं मानता बिना छुए हुए। हमारा मन होता है कि छुएं-छुएं-छुएं। किसी तरह रोकते हैंसंस्कारशिष्टाचारसब तरह से अपने को सम्हालते हैं,लेकिन मौका मिल जाएभीड़ मिल जाएमंदिर होमस्जिद होगिरजा होतो थोड़ा-बहुत धक्का दे ही देते हैंवह दूसरी बात है। लेकिन सामने शिष्टाचार रखते हैंदूर-दूर बच कर चलते हैं।
इतना बच कर चलना सबूत किस बात का हैइतना बच कर चलना छूने की इच्छा का सबूत है और किसी बात का सबूत नहीं है। इतनी घबड़ाहट सबूत किस बात का हैतो बाकी पुरुष देखता है कि यह है संन्यासीयह महाराज। ये स्त्री को छूने नहीं देते,दूर से ही चिल्लाते हैंदूर-दूरदूर-दूरदस कदम दूर रहना।
अभी मैंने सुना कि एक महाराज को यहां बंबई में किसी स्त्री ने छू दियातो उन्होंने तीन दिन का उपवास किया। और उससे उनकी इज्जत बहुत बढ़ी। क्योंकि कामवासना से भरे हुए समाज में ऐसे ही लोगों की इज्जत हो सकती है। कामवासना से भरे हुए समाज में ऐसे ही लोगों की इज्जत हो सकती है। क्योंकि हम कामवासना से भरे हैंहमें लगता है कितना महान त्याग किया कि एक स्त्री ने छुआ और उन्होंने इनकार कर दिया कि नहीं छूने देंगे। यह हमारी सेक्सुअल मेंटेलिटी का सबूत है। और इसको अगर सदव्यवहार समझते हैंतो मैं स्त्रियों के साथ ऐसा सदव्यवहार करने से इनकार करता हूं। लेकिन बड़े मजे की बात हैबड़ी आश्चर्य की कि एक बहन ने पूछा हैकिसी पुरुष ने पूछा होता तो मेरी समझ में आ सकता था। यह बहन बड़ी मर्दानी होगी। इसकी बुद्धि पुरुषों से निर्मित होगी।
वह कैंप में जो बहन मेरे आकर हृदय से लग गईउस क्षण में उसकी प्रार्थनाउसका प्रेमउसका आनंदउसकी पवित्रता अदभुत थीअन्यथा हजार लोगों के सामने वह मेरे हृदय से आकर जुड़ जाने की हिम्मत भी नहीं कर सकती थी। उसका पति बगल में खड़ा थावह घबड़ाता रहा। अभी उनके पति मुझे मिले और कहने लगेमैंने इससे पूछा कि पागल तूने यह क्या कियाउसने कहा कि मुझे तो पता ही नहीं था। यह तो जब मैं अलग हट गई तब मुझे खयाल आया कि लोग क्या सोचेंगेलेकिन उस क्षण में मुझे सोच-विचार भी न था। उस क्षण मुझे लगा कि कोई दूर की पुकार मुझे खींच रही है और मैं पास चली गई। उसी स्त्री को मैं धक्का दे दूं इस खयाल से कि कोई अखबार का रिपोर्टर फोटो नहीं उतार ले। उसे कह दूं कि नहीं दूर। उसे दूर कह कर मैं सिर्फ इतना सिद्ध करूंगा कि मेरे भीतर भी वासना उद्दाम वेग से खड़ी हैअन्यथा भय क्या हैअन्यथा डर क्या है?अन्यथा चिंता क्या हैवह स्त्री कहीं कोई एकांत अंधेरे कोने में मुझसे गले आकर नहीं मिली थी। हजार लोग चारों तरफ खड़े थेवहां फोटो उतारी जा रही थी। मुझमें भी थोड़ी बुद्धि तो है। लेकिन इस निर्बुद्धि समाज के सामने ऐसा लगता है कि चाहे कुछ भी सहना पड़ेजो ठीक हैजो सही है--चाहे अनादर सहना पड़ेचाहे अपमान सहना पड़े--जो ठीक हैसही है वही करना है,वही किए चले जाना है। मुझे नहीं लगता कि कोई पुरुष मेरे पास प्रेम से आकर जब गले मिलता है तो उसे मैं नहीं रोकतातो एक स्त्री को मैं कैसे रोक सकता हूं। जब कोई पुरुष को मैं नहीं रोकता तो स्त्री को कैसे रोक सकता हूं। और स्त्री और पुरुष के बीच इतना फासला करने की जरूरत क्या हैप्रयोजन क्या हैक्या हमें शरीर के अतिरिक्त कभी कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता?वह जिस फोटोग्राफर ने चित्र उतारा होगा और जिस संपादक ने छापा होगावह फोटो मेरे और उस स्त्री के बाबत कमउस फोटोग्राफर और संपादक के संबंध में ज्यादा बताते हैं। उसकी बुद्धि वहीं अटक रहीउस घंटे भर के ध्यान के बाद उसे यही दिखाई पड़ाइतना ही दिखाई पड़ा!
उन बहन ने यह भी पूछा है कि गांधीजी तो ऐसा दर्ुव्यवहार कभी स्त्रियों के साथ नहीं करते थे। तो शायद बहन को गांधीजी का कुछ पता नहीं। गांधीजी इस दर्ुव्यवहार को शुरू करने वाले महापुरुष हैं। हिंदुस्तान में गांधी ने पहली बार स्त्री को सम्मान दिया है। हिंदुस्तान के महापुरुषों में स्त्री को सम्मान देने वाले गांधी के मुकाबले सिवाय महावीर को और कृष्ण को छोड़ कर और कोई भी नहीं है। बुद्ध भी नहीं। बुद्ध तक भयभीत हो गए इस बात से जब स्त्रियों ने आकर कहा कि हमें भिक्षुणी बना लोतो बुद्ध ने कहा कि नहीं-नहींयह नहीं हो सकता। बुद्ध भयभीत हो गए इस बात से कि स्त्रियां अगर भिक्षुणी बनेंगी और भिक्षुओं के साथ रहेंगीतो खतरा है।
महावीर ने जरूर कोई चिंता नहीं कीबात ही नहीं कीस्त्रियों को भिक्षुणी बनाया। और हैरान होंगे जान कर आप कि महावीर के भिक्षु थे केवल बारह हजार और भिक्षुणियां थीं चालीस हजार। न मालूम कितने लोगों ने महावीर पर एतराज किया होगा कि चालीस हजार स्त्रियों से घिरा हुआ है यह आदमी। जरूर एतराज किया होगाक्योंकि आदमी सदा आप ही जैसे हमेशा से थे। आपसे बदतर।
क्राइस्ट पर लोगों ने शक किया कि मैरी मैग्दलिन नाम की वेश्या इसके चरणों में आकर चरण छूती है। लोगों ने कहा कि नहीं इस स्त्री को चरण मत छूने दो। क्राइस्ट ने कहालेकिन स्त्री का पाप क्या है कि चरण न छुएलोगों ने कहास्त्री थी तो भी ठीकयह वेश्या है। क्राइस्ट ने कहावेश्या मेरे पास नहीं आएगी तो कहां जाएगीऔर अगर मैं वेश्या को इनकार कर दूंगातो फिर वेश्या के लिए उपाय क्या हैमार्ग क्या है?
विवेकानंद हिंदुस्तान लौटेनिवेदिता साथ आ गईऔर बस हिंदुस्तान का दिमाग फिर गया। और सारे बंगाल में बदनामी फैल गई कि यह स्वामी और संन्यासी और यह निवेदिता कैसे साथनिवेदिता की पवित्रता कोनिवेदिता के प्रेम को किसी ने भी नहीं देखा! आज जो सारी दुनिया में विवेकानंद का काम फैला हुआ दिखाई पड़ता हैउसमें विवेकानंद का हाथ कम निवेदिता का हाथ ज्यादा है। निवेदिता भी दंग रह गई होगी। कैसे ओछे लोग थे! कैसी छोटी बुद्धि थी! इतना ही उन्हें दिखाई पड़ा! विवेकानंद को इतना ही समझ पाए वे सिर्फ!
गांधी ने तो बहुत हिम्मत की। स्त्रियों को गांधी हिंदुस्तान के घरों से पहली दफे बाहर लाए। स्त्रियों को पुरुषों के साथ खड़ा किया। आपको शायद पता नहीं होगावह मेरी ही फोटो छप गईऐसा नहींमैंने सुना है कि गांधी की एक फोटो यूरोप और अमेरिका में खूब प्रचारित की गई थी। एक फोटो तो उनकी वह प्रचारित की गईजिसमें वे अपने ही घर की बच्चियों कीजो उनकी नातनी-पोतनियां होंगीउनके कंधों पर हाथ रखे हुए दिखाए गए हैं। वह फोटो प्रचारित की गई कि यह गांधी बुढ़ापे में भी छोकरियों के साथ रास-रंग करता है। शायद उन बहन को पता नहीं होगा कि वह फोटो जिसमें वे लड़कियों के कंघे पर हाथ रख कर घूमने जाते हैं या प्रार्थना में जाते हैं। तो यह बताया गया है कि यह बुङ्ढा हो गयाअभी लेकिन इसका लड़कियों में रस है,लड़कियों के कंधों पर हाथ रख कर चलता है। और पूछने वाला पूछ सकता है कि लड़कियों के कंधे पर क्यों लड़कों के कंधों पर क्यों नहींबिलकुल ठीक! लेकिन उसे पता नहीं कि गांधी को लड़के और लड़कियों में कोई भी फर्क नहीं भी हो सकता है।
यह मत सोचना कि वह फोटो मेरा ही छाप दियावह फोटो हमेशा से छापने वाले लोग रहे हैं और रहेंगे। अपनी बुद्धि के अनुकूल ही वे कुछ कर सकते हैंउससे ज्यादा करने का उपाय भी तो नहीं है। उन पर नाराज होने का कोई कारण भी तो नहीं है। और शायद उन बहन को पता नहीं होगा कि गांधी अपनी अंतिम उम्र मेंबुढ़ापे मेंएक बीस वर्ष की नग्न युवती को लेकर छह महीने तक बिस्तर पर सोते रहे। तब उनको पता चलेगा। इतना दर्ुव्यवहार अभी मैंने किसी तरह से नहीं किया है। छह महीने तक एक नग्न युवती के साथ गांधी बिस्तर पर सोते रहे। किसलिएइस बात की जांच के लिए कि क्या मन के किसी कोने-कातर मेंमन के किसी भी अंधकारपूर्ण कोने में स्त्री की कोई वासना तो शेष नहीं रह गईजो रात में नग्न स्त्री को अकेले मेंएकांत में पाकरबिस्तर पर साथ पाकर जाग आएतो मैं परीक्षा कर लूं उससेउससे मुक्त होने का कोई उपाय कर लूं। और उस स्त्री की पवित्रता की कल्पना करते हैं जो छह महीने तक गांधी के साथ नग्न सो सकी। और उसने पीछे कहा कि गांधी के साथ सो कर मुझे छह महीने में ऐसा लगा--गांधी जैसे मेरी मां हैं।
जल्दी नतीजे लेना ठीक नहीं है। जिंदगी बहुत गहरी है और बहुत समझने को है। जहां हम खड़े हैं जिंदगी वहीं नहीं हैजिंदगी और आगे है। हम मिट्टी के दीये हैंजिंदगी की ज्योति मिटी के दीये से बहुत ऊपर जाती है। जिनको ऊपर की ज्योति नहीं दिखाई पड़ती उन्हें सिर्फ मिट्टी के दीये दिखाई पड़ते हैं।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुनाउसके लिए बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूंमेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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