बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-03

एक और असहमति
मेरे प्रिय आत्मन्!

मैं कोई राजनीतिज्ञ नहीं हूं और न ही मैंने अपने किसी पिछले जन्म में ऐसे कोई पाप किए हैं कि मुझे राजनीतिज्ञ होना पड़े। इसलिए राजनीतिज्ञ मुझसे परेशान न हों और चिंतित न हों। उन्हें घबड़ाने की और भयभीत होने की कोई भी जरूरत नहीं है। मैं उनका प्रतियोगी नहीं हूंइसलिए अकारण मुझ पर रोष भी प्रकट करने में शक्ति जाया न करें। लेकिन एक बात जरूर कह देना चाहता हूंहजारों वर्ष तक भारत के धार्मिक व्यक्ति ने जीवन के प्रति एक उपेक्षा का भाव ग्रहण किया था।
गांधी ने भारत की धार्मिक परंपरा में उस उपेक्षा के भाव को आमूल तोड़ दिया है। गांधी के बाद भारत का धार्मिक व्यक्ति जीवन के और पहलुओं के प्रति उपेक्षा नहीं कर सकता है। गांधी के पहले तो यह कल्पनातीत था कि कोई धार्मिक व्यक्ति जीवन के मसलों पर चाहे वह राजनीति होचाहे अर्थ होचाहे परिवार होचाहे सेक्स हो--इन सारी चीजों पर कोई स्पष्ट दृष्टिकोण दे। धार्मिक आदमी का काम था सदा से जीवन जीना सिखाना नहींजीवन से मुक्त होने का रास्ता बताना। धार्मिक आदमी का स्पष्ट कार्य था लोगों को मोक्ष की दिशा में गतिमान करना।
लोग किस भांति आवागमन से मुक्त हो सकें, यही धार्मिक दृष्टि की उपदेशना थी। इस उपदेश का घातक परिणाम भारत को झेलना पड़ा। मोक्ष हैइस जीवन के बाद और जीवन भी हैंलेकिन यह जीवन भी है और यह जीवन आने वाले जीवनों से जुड़ी हुई अनिवार्य कड़ी है। जो इस जीवन की अपेक्षा करता है, वह आने वाले जीवन के लिए नींव नहीं रखता। वह आने वाले जीवन को भी नष्ट करने का प्रारंभ करता है। इस जीवन के प्रति उपेक्षा नहीं चाहिए। धर्म अब तक उपेक्षा किया था। अब धर्म अपेक्षा नहीं कर सकता हैक्योंकि धर्म की उपेक्षाइनडिफरेंस का यह परिणाम हुआ कि सारी पृथ्वी अधार्मिक हो गई। यह सारी पृथ्वी के अधार्मिक हो जाने में अधार्मिक लोगों का हाथ नहीं हैइसमें उन धार्मिक लोगों की अपेक्षा है जो जीवन के प्रति पीठ करके खड़े हो गए। अब आने वाले भविष्य में धार्मिक व्यक्ति अगर जीवन के प्रति पीठ करता हैतो उस व्यक्ति को हम पूरे अर्थों में धार्मिक नहीं कह पाएंगे। 
गांधी के बाद भारत में एक नया युग प्रारंभ होता है और वह नया युग यह है कि धर्म जीवन के प्रति भी रस लेगाजीवन के समस्त पहलुओं पर धर्म भी अपना निर्णय देगा। इसका यह अर्थ नहीं है कि धार्मिक व्यक्ति दिल्ली की यात्रा करेइसका यह अर्थ भी नहीं है कि धार्मिक व्यक्ति सक्रिय राजनीति में खड़े हो जाएं। लेकिन इसका मतलब यह जरूर है कि धार्मिक व्यक्ति राजनीति के प्रति उपेक्षा ग्रहण नहीं कर सकतेक्योंकि राजनीति पूरे जीवन को प्रभावित करती है।
मैं कोई राजनीतिज्ञ नहीं हूं लेकिन आंखें रहते देश को रोज अंधकार में जाते हुए देखना भी असंभव है। उतनी कठोरताउतनी धार्मिक आदमी की कठोरता और पथरीलापन मैं नहीं जुटा पाता हूं। देश रोज-रोज प्रतिदिन नीचे उतर रहा है। उसकी सारी नैतिकता खो रही हैउसके जीवन में जो भी श्रेष्ठ हैजो भी सुंदर हैजो भी सत्य हैवह सभी कलुषित हुआ जा रहा है। इसके पीछे जानना और समझना जरूरी है कि कौन सी घटना काम कर रही है। और चूंकि मैंने कहा कि गांधी के बाद एक नया युग प्रारंभ होता हैइसलिए गांधी से ही विचार करना जरूरी है।
गांधी एक धार्मिक व्यक्ति थेलेकिन गांधी के आस-पास जो लोग इकट्ठे हुएवे धार्मिक नहीं थे। और इससे हिंदुस्तान के भाग्य के लिए एक खतरा पैदा हो गया। गांधी राजनीतिज्ञ नहीं थे। गांधी के लिए राजनीति आपद-धर्म थीइमरजेंसी थी। गांधी का मूल व्यक्तित्व धार्मिक था। मजबूरी थी कि वे राजनीति में खड़े थेलेकिन उस राजनीति में भी उनके प्राणों को वह राजनीति कहीं भी छू नहीं सकी थी। उससे वैसे ही दूर थे जैसा कमल पानी में दूर होता होगा।
लेकिन उनके आस-पास जो लोग इकट्ठे थेवे राजनीतिज्ञ थेवे धार्मिक लोग नहीं थे। राजनीति उनका प्राण थी। गांधी के साथ रहने की वजह से धर्म और नीति उनका आपद-धर्म बन गई थी। उनके लिए नैतिकता मजबूरी थी। गांधी के साथ चलना हो तो नैतिकता की मजबूरी उन्हें ढोनी पड़ी। गांधी के लिए राजनीति मजबूरी थीउनके आस-पास अनुयायियों के लिएगांधीवादियों के लिए नैतिकता मजबूरी थी। गांधी के लिए राजनीति बाहर-बाहर थीभीतर नीति थी। उनके अनुयायियों के लिए राजनीति भीतर थीनीति बाहर-बाहर थी।
फिर जैसे ही सत्ता आईएक क्रांतिकारी उलट-फेर हो गया। सत्ता आते ही गांधी का जो आपद-धर्म था--राजनीति--वह विलीन हो गयाखगांधी शुद्ध नैतिक व्यक्ति रह गए और उनके अनुयायियों का जो आपद-धर्म था--नीति--वह विलीन हो गईवे शुद्ध राजनीतिज्ञ रह गए। सत्ता के आते ही गांधी शुद्ध नैतिक व्यक्ति रह गए और उनके अनुयायी शुद्ध राजनीतिक व्यक्ति हो गए और उन दोनों के बीच जमीन-आसमान का फासला हो गया। एक इतनी बड़ी खाई हो गई जो आजादी के पहले कभी भी नहीं थी। आजादी के पहले गांधी और गांधी के अनुयायी के बीच खाई बहुत कम थी। झूठी ही सहीलेकिन नैतिकता की एक पर्त थी। और झूठी ही सहीगांधी के आस-पास राजनीति का एक आवरण था। इन दोनों के कारण बीच में एक सेतु थाएक संबंध था। सत्ता आने पर यह सेतु टूट गया और यह सेतु का टूट जाना गांधी को भी दिखाई पड़ गया। और गांधी ने कहाअब कांग्रेस की कोई भी जरूरत नहींउसे लोक-सेवक दल में परिवर्तित हो जाना चाहिए। क्योंकि गांधी की पैनी आंखों को यह दिखाई पड़ना कठिन नहीं हुआ कि अब यह जो राजनीतिक संस्थान खड़ा रह जाएगायह मुल्क को नरक की यात्रा करा देगा।
बीस साल में उसने नरक की यात्रा करा दी है। और गांधी को यह भी दिखाई पड़ गया कि मैं एक खोटा सिक्का हो गया हूंमेरी कोई बात अब सुनता नहीं है। गांधीजिसकी आवाज हम चालीस वर्षों से सुनते थेअचानक सत्ता रूपांतरित हो जाने परसत्ता हस्तांतरित हो जाने पर अनुभव करने लगामेरी कोई आवाज नहीं सुनता है। मैं एक खोटा सिक्का हो गया हूंमेरा अब चलन नहीं रहा। गांधी ने यह कहा कि पहले मैं एक सौ पच्चीस वर्ष जीना चाहता थालेकिन अब मेरी जीने की इच्छा भी नहीं रह गई। यह थोड़ा विचारणीय है।
यह गांधीवादी के ऊपर इससे बड़ा और कोई इल्जाम नहीं हो सकताऔर कोई बड़ा अपराध नहीं हो सकता है।
गोडसे के ऊपर गांधी को मारने का अपराध छोटा हैइस अपराध के मुकाबले। कि गांधी जिनके साथ लड़े और जिनके लिए लड़े,जीत हो जाने पर गांधी को यह कहना पड़े कि मैं खोटा सिक्का हो गया हूंमेरी अब कोई सुनता नहींअब मुझे ज्यादा जीने की इच्छा नहीं होती। गोडसे ने जो गोली मारी वह तो परमात्मा की इच्छा के बिना गोडसे नहीं मार सकता था। शायद और गांधी को इससे सुंदर मृत्यु मिल भी नहीं सकती थी। लेकिन गांधी के पीछे चलने वाले लोगों ने गांधी को जिस बुरी तरह से निराश और हताश कियावह आश्चर्यजनक है। और वे ही सारे लोग गांधी के मर जाने के बाद बीस वर्षों से गांधी का जय-जय गान और गांधी का गुणगान कर रहे हैं। वे कहते हैंगांधी पर विचार नहीं करनासिर्फ प्रशंसा करनी है।
वे ऐसा क्यों कहते हैं?
वे भलीभांति जानते हैं कि गांधी की आलोचना शीघ्र ही गांधीवादियों की आलोचना बन जाएगी। इसलिए गांधी की आलोचना मत करोताकि पीछे छिपे हुए गांधीवादी की आलोचना संभव न हो सके। गांधी की आड़ में एक खेल चल रहा है। इस खेल को गांधी पर आलोचना और विचार किए बिना नहीं तोड़ा जा सकता। और इसलिए गांधीवादी एकदम भयभीत हो उठा। मैंने थोड़ी सी बातें कहीं और महीने भर से मैं इधर लौटा हूंतो मुझे पता चला कि महीने भर से सिवाय इसके कोई और बात नहीं है--पत्रों में,चर्चाओं मेंघर मेंगांवों मेंएक ही बात है।
इतनी आतुरता से उसने उत्सुकता क्यों ली हैवह इतनी तीव्रता से मेरे ऊपर क्यों टूट पड़ा?
उसका कारण है। स्पष्ट कारण है। गांधी पर आलोचना अंततः गांधीवादी की आलोचना बन जाएगी। और गांधी तो आलोचना के बाद और निखर कर निकल आएंगेजैसे सोना आग से निकल आता है। लेकिन गांधीवादी के प्राण निकल जाने वाले हैं। वह नहीं बच सकता है। उसके प्राण को खतरा हैगांधी को कोई खतरा नहीं है। गांधी को क्या खतरा हो सकता है?
गांधी जैसे सच्चे आदमी को खतरे का कोई सवाल नहीं। खतरा आलोचना से सदा झूठे आदमियों को होता है और उन झूठे आदमियों की कतार गांधी के नाम पर खड़ी हो गई है। हमेशा जहां सत्ता होती हैजहां सत्ता होती हैजहां पद होता है वहां बेईमान और चोरों की कतार इकट्ठी हो जाती है। यह हो ही जाएगी।
गांधी के साथ जो लोग थे आजादी की लड़ाई मेंवे धीरे-धीरे बिखर कर अलग होते चले गए। नई शकलें पीछे से आनी शुरू हो गईं। ये जो नये लोग आए थे इन नये लोगों को सत्ता से प्रेम था। वे सत्ता के लिए आए थे। और आज देश में राजनीति के नाम पर सिवाय सत्ता की होड़ के और कुछ भी नहीं हो रहा है। उनमें से किसी को इस बात की फिक्र नहीं है कि देश कहां जा रहा है और कहां जाएगा। उनको एक ही बात की फिक्र है कि उनकी सत्ताउनका पदउनका सम्मानउनकी शक्ति किस तरह बनी रहे। वे इसी विचार में चिंतितलीन और परेशान हैं। सारे देश का क्या हो रहा है इससे कोई सवाल नहीं है बड़ाबड़ा सवाल अपने-अपने पद को बचा रखने का है।
गांधी ने कभी कल्पना भी न की होगी कि जिस सेना को उसने खड़ा किया था वह इस तरह की धोखेबाज साबित हो सकती है। लेकिन वह धोखेबाज साबित हो गई।
और उसमें भूलएक भूल गांधी की भी थीऔर वह भूल समझ लेना जरूरी हैअन्यथा हम उस भूल को आगे भी दोहरा सकते हैं। वह भूल यह थी कि गांधी न कभी इस बात की फिक्र न की कि ये जो लोग उनके आस-पास इकट्ठे हैंइनके जीवन में कोई धार्मिक किरण उतरी हैइनके जीवन में कोई परमात्मा का स्पर्श हैइनके जीवन में सत्य की भी कोई गहरी आकांक्षा पैदा हुई हैइनके जीवन में कोई ध्यान हैकोई समाधि हैइनके जीवन में आत्मा से जुड़ने का कोई मार्गकोई द्वार खुल गया है?नहींइसकी उन्होंने फिक्र नहीं की। वे केवल सत्य और अहिंसा की वैचारिक बातें करते रहे। उनके आस-पास का आदमी सत्य और अहिंसा को विचारपूर्वक स्वीकार करता रहालेकिन जो विचारपूर्वक स्वीकार होता हैवह जरूरी रूप से आत्मा में प्रविष्ट नहीं हो जाता है। विचार बाहर ही रह जाते हैंभीतर नहीं जाते। भीतर तो निर्विचार जाता है। विचार भीतर नहीं जाता। विचार तो बाहर रह जाता है। गांधी समझाने की कोशिश करते रहे--सत्य अच्छा हैअहिंसा अच्छी हैअपरिग्रह अच्छा हैवह सब समझाते रहे। जो उन्हें अच्छा दिखाई पड़ता थाउन्होंने लोगों को समझाया और जिन्होंने समझा उन्होंने सुनाठीक समझ में आया और उन्होंने थोड़ा-बहुत उस तरह का आचरण करने का प्रयास भी किया।
लेकिन ध्यान रहेएक आचरण आत्मा से पैदा होता हैएक आचरण बाहर से थोपा जाता है। जो आचरण बाहर से थोपा जाता हैवह आचरण जब तक हाथ में शक्ति न हो तब तक टिक सकता हैशक्ति के आते ही नष्ट हो जाता है। जो आचरण हम ऊपर से थोपते हैंइम्पोज्ड जो होता है व्यक्तित्वअभिनय जो होता हैऊपर से थोपा हुआ जो होता हैवह प्राणों तक गहरा तो नहीं होताकपड़ों की तरह बाहर होता है। यह तभी तक हमारे साथ रह सकता हैजब तक इसको टूटने का प्रतिकूल अवसर न मिल जाए। और जैसे ही प्रतिकूल अवसर मिलेगायह कचरा बह जाएगाये कपड़े बह जाएंगे और भीतर का नंगा आदमी साफ हो जाएगा।
नैतिक आदमीजो धार्मिक नहीं है सिर्फ नैतिक हैउसके हाथ में सत्ता जाना हमेशा खतरनाक है। सत्ता में जाते ही नीति बह जाएगी और नंगा आदमी प्रकट हो जाएगा। लेकिन गांधी तो धार्मिक व्यक्ति थेअपने आस-पास विचारपूर्वक जो नैतिक हो गए थेउन्होंने उन पर ही सारा विश्वास कर लिया। और उस विश्वास के कारण इस देश के साथ एक अनिवार्यरूपेण विश्वासघात हो गया है। आगे भी हम यह भूल कर सकते हैं। यह हमेशा भूल संभव है। क्योंकि धार्मिक और नैतिक आदमी एक जैसे मालूम पड़ते हैं। एक व्यक्ति जिसके प्राणों से अहिंसा उठती होऔर एक व्यक्ति जिसने यह किताबों में पढ़ करसदगुरुओं से सुन कर सोच लिया हो कि अहिंसा अच्छी चीज हैमुझे अहिंसा का पालन करना चाहिए। इन दोनों में बुनियादी फर्क होता है। जो आदमी अहिंसा का पालन करता हैउसके भीतर तो हिंसा मौजूद रहती हैनहीं तो पालन करने की कोई जरूरत न हो। पालन हमें उसे ही करना पड़ता है जिसके विपरीत हमारे भीतर मौजूद होता है।
जिस आदमी को ब्रह्मचर्य पालन करना पड़ता हैउसके भीतर कामवासना मौजूद होगीअन्यथा पालन किस चीज का करेगा?
जिस आदमी को सत्य का पालन करना पड़ता हैउसके भीतर झूठ की लहरें उठती रहती हैं।
संयमी आदमी जिसे हम कहते हैंनैतिक आदमीवह ऊपर कुछ होता हैभीतर ठीक उलटा होता है। और अगर प्रतिकूल स्थिति आ जाए तो जो भीतर है वही सच्चा साबित होगाजो बाहर है वह सच्चा साबित होने वाला नहीं है। बाहर बहुत कमजोर चीजें हैंभीतर असली प्राण हैं।
धार्मिक मनुष्य भीतर से रूपांतरित होता हैनैतिक मनुष्य बाहर से।
इसलिए नैतिक मनुष्य के हाथ में सत्ता पहुंच जाना हमेशा खतरनाक बात होती है।
गांधी एक धार्मिक व्यक्ति थेगांधीवादी एक नैतिक व्यक्ति हैं। और इस भेद को नहीं समझ पाने के कारण मुल्क एक अनिवार्यरूपेण एक ऐसी गलती में पड़ गयाजिससे छुटकारा होने में बहुत समय लग सकता है।
इस देश कोइस देश के प्राणों को आगे विकसित करने के लिए नीति और धर्म का बुनियादी फासला हमें समझ लेना चाहिए,अन्यथा कल हम जिन्हें फिर शक्ति देंगेफिर सत्ता देंगेफिर हम नैतिक आदमियों को सत्ता दे सकते हैं। सत्ता में पहुंचते से हर तरह का नैतिक आदमी चाहे वह किसी पार्टी का होइसी तरह का साबित होगा जिस तरह क्रांग्रेस का आदमी साबित हुआ। इसमें फर्क नहीं पड़ेगा। चाहे वह समाजवादी होचाहे वह साम्यवादी हो। अगर उसका सारा आचरण ऊपर से थोपा हुआ है और उसके प्राणों से कोई सच्चाई नहीं उठी हैतो वह जाकर सत्ता में पहुंच कर एकदम रूपांतरित हो जाएगा। महल के बाहर वह आदमी बहुत सेवक मालूम होता थामहल के भीतर जाकर बहुत शासक हो जाएगा। महल के बाहर वह कहता थामैं विनम्र हूं,आपके चरणों का दास हूं। महल के भीतर पहुंच कर वह आपको पहचान नहीं सकेगा कि आप कौन हैं और भीतर कैसे आ गए। यह होगा।
अगर भारत को सच में ही सत्य कासमता कास्वतंत्रता का एक समाज और एक देश निर्मित करना है तो हमें यह जान लेना जरूरी है कि हिंदुस्तान में जिनके हाथ में सत्ता जानी हो उन लोगों के आमूल व्यक्तित्व के रूपांतरण की दिशा में कुछ काम होना जरूरी है।
गांधी वह काम कर सकते थे। शायद गांधी को खयाल नहीं आ सका। उन्होंने केवल नैतिक शिक्षा दी। साथ में अगर उन्होंने योग की शिक्षा पर भी चिंता की होतीसमाधि और ध्यान की भी चिंता की होतीअगर उन्होंने सिर्फ रामधुन न करवाई होतीसाथ में समाधि और ध्यान के भी गहरे प्रयोग चालीस वर्ष किए होतेतो इस भारत का भाग्य एक स्वर्णभाग्य बन सकता था। लेकिन वह नहीं हो सका। और आज भी वह नहीं हो रहा है।
मैं कल्पना करता हूं इस देश को एक ऐसी पार्टी की जरूरत हैएक ऐसे व्यक्तियों की जरूरत हैएक ऐसे बड़े आंदोलन की जरूरत हैजो आंदोलन ध्यान और समाधि के मार्ग से सत्ता के द्वार तक पहुंचता हो। तो हम इस देश को सुंदर बना सकेंगे,नहीं तो नहीं सुंदर बना सकते।
भारत की कल्पना बहुत पुरानी हैऐसे यह है। बहुत बार यूनान में भी प्लेटो ने यह कल्पना की थी कि कब ऐसा समय होगा कि दार्शनिक राज्य कर सकेंगे। गांधी के साथ आशा बंधी थी कि शायद दुनिया में पहली बार दार्शनिकों का राज्य भारत में आ जाएगा। लेकिन गांधी के पीछे आने वाले लोगों ने सारी आशा पर पानी फेर दिया। नहींदार्शनिकों का राज्य नहीं बन सका। न बनने का कारण यह है कि हम दार्शनिक ही बनाने में समर्थ न हो पाए--ऐसे लोग जिनके पास अंतर्दृष्टि हो।
अब फिर सत्ता की होड़ चल रही है और सत्ता के बाजार में जितने लोग हैंउनके पासकिसी के पास कोई अंतर्दृष्टि नहीं है। उनके पास कोई प्रभु के तरफ जाने वाला मार्ग नहीं है। उनके पास कोई प्रकाश की भीतर किरण नहीं है। बस वह सोच-विचार और सत्ता की होड़ में लगे हैं। और तब आप हैरान हो जाएंगे यह बात जान कर कि आप एक को बदलेंगे दूसरे से और आप बदल भी नहीं पाएंगे और दूसरा भी पहले जैसा सिद्ध होगातीसरा भी पहले जैसा सिद्ध होगा।
मैं सुनता थाकोई मुझे कहता था कि अमेरिका में कुछ मनोवैज्ञानिकों ने एक अध्ययन किया। उन्होंने यह अध्ययन किया कि जो लोग एक पति अपने जीवन में अगर आठ स्त्रियों को तलाक दे देता है या एक पत्नी अपने जीवन में आठ पतियों को तलाक देकर बदलती हैतो हर बार उसे पहले से बेहतर पति या पत्नी मिलती है या नहीं?
और अध्ययन से वे अजीब नतीजे पर पहुंचे। वे इस नतीजे पर पहुंचे कि जो पति पहली पत्नी को खोज कर लाता हैदो साल बाद उसे तलाक देता हैदूसरी स्त्री को खोज कर लाता हैमहीने दो महीने में पाता है कि उसने फिर पहली जैसी स्त्री ही वापस खोज ली। पत्नी बदलती है पति को जिंदगी में आठ बारलेकिन हर बार यह अनुभव होता है कि हर आदमी पुराना जैसा ही पति सिद्ध होता है। थोड़े दिन तक नई रौनक रहती हैफिर पुराना आदमी उसके भीतर से प्रकट हो जाता है।
तो मनोवैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि यह सवाल व्यक्तियों के बदलने का नहीं है। जब तक एक पत्नी अपने मन को नहीं बदल लेतीतो जिस मन से उसने पहले पति को चुना था उसी मन से वह दूसरे पति को चुनेगी और इस बात की संभावना है कि दूसरा पति भी उन्नीस-बीस पहले पति जैसा ही सिद्ध होगाक्योंकि चुनाव करने वाला मन वही का वही है। वह आठ पति चुन लेतो हर बार वह करीब-करीब उन्नीस-बीस एक जैसे पति चुन लेगी। पति तो बदल जाएंगेलेकिन चुनाव करने वाला मन,चुनाव करने वाला माइंड तो वही है।
अगर हिंदुस्तान के समाज को नई दृष्टि और नया मार्ग देना होतो हिंदुस्तान में जो लोग सत्ताधिकारियों को चुनते हैंउनके मन का बदल जाना जरूरी हैअन्यथा हम रोज पुराने जैसे लोग चुन लेंगे। हम फिरनये कपड़े होंगेनई शक्लें होंगीनया झंडा होगानये नारे होंगेलेकिन हम फिर वही आदमी चुन लेंगे जैसे हमने पहले चुने थे। और जैसे ही सत्ता में वे लोग जाएंगेवे फिर पुराने आदमी साबित होंगे। उनमें कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
दो बातें ध्यान रखनी जरूरी हैं। गांधी का नैतिक आंदोलन सफल नहीं हो सका। आजादी मिलीलेकिन आजादी जिस कामना से मांगी गई थी वह कामना असफल हो गई है। स्वतंत्रता मिलीउपलब्ध हुईलेकिन स्वतंत्रता से हमने जो चाहा थाजो सपना देखा थावह सपना पूरा नहीं हो पाया।
हांकुछ लोगों का सपना पूरा हुआ। वृहत्तर भारत का सपना पूरा नहीं हुआ। अंग्रेज पूंजीपति के हाथ से सत्ता भारतीय पूंजीपति के हाथ में चली गई। भारतीय पूंजीपति का सपना जरूर पूरा हुआ। लेकिन भारतीय पूंजीपति भारत नहीं है। गांधी के एक शिष्य पूंजीपति नेऔर अब दूसरे पूंजीपति पछताते होंगे कि जब गांधी जिंदा थे तो हमने भी सेवा क्यों न कर ली?
उनके एक शिष्य पूंजीपति नेभारत जब आजाद हुआ तो मैंने सुनाउनके पास संपत्ति तीस करोड़ की थी। बीस साल आजादी के बाद उनके पास संपत्ति तीन सौ तीस करोड़ की है। बीस वर्षों में तीन सौ करोड़! शास्त्रों में लिखा है: सत्संग का फल होता है। इससे सिद्ध होता है कि सत्संग का फल होता है।
मुझे पहले शक होता था कि सत्संग से फल होता है कि नहीं। अब शक नहीं होता। तीस करोड़ रुपये से तीन सौ तीस करोड़! बीस वर्ष में! संभवतः दुनिया के इतिहास में किसी एक परिवार ने इतने थोड़े समय में इतना धन संग्रह नहीं किया है। प्रत्येक वर्ष पंद्रह करोड़ रुपया! प्रत्येक महीने सवा करोड़ रुपया! प्रत्येक दिन चार और पांच लाख रुपया! पूरे बीस वर्ष से!
लेकिन वृहत्तर भारत गरीब से गरीब होता चला गया। एक तरफ संपत्ति इकट्ठी होती चली गई हैदूसरी तरफ दीनता और हीनता बढ़ती चली गई है। हिंदुस्तान के गांव के गरीब से पूछोवह कहता हैकुछ फर्क नहीं पड़ाइससे तो ब्रिटिश राज्य अच्छा था। कोई नहीं कहना चाहता यह कि गुलामी अच्छी थीलेकिन जब कोई गरीब कहता है कि इससे तो गुलामी अच्छी थीतो उसकी पीड़ा हम समझ सकते हैं। गरीब भी स्वतंत्र होना चाहता है। लेकिन स्वतंत्रता उसके लिए कुछ भी नहीं लाई। उसने भी सपने बांधे थेउसने भी कल्पनाएं की थींउसने भी गोली खाई थीवह भी जेल गया थालेकिन उसे पता नहीं था कि यह स्वतंत्रता एक तरह के पूंजीपति के हाथ से दूसरी तरह के पूंजीपति के हाथ में रूपांतरित हो जाएगी।
गांधी को भी यह कल्पना नहीं थी। गांधी भी सोचते थे कि पूंजीपति का हृदय-परिवर्तन हो जाएगा। अच्छे आदमी हमेशा अच्छी बातें सोचते हैंलेकिन सभी अच्छी बातें सही सिद्ध नहीं होती हैं। गांधी भले आदमी थे। भले आदमी को कोई बुरा आदमी नहीं दिखाई पड़ता है।
लेकिन ध्यान रहेबुरे आदमी को कोई भला आदमी नहीं दिखाई पड़ता है। बुरे आदमी को सब बुरे आदमी दिखाई पड़ते हैंभले आदमी को सब भले आदमी दिखाई पड़ते हैं। लेकिन दोनों की दृष्टियां अधूरी हैं और गलत हैं। दोनों सब्जेक्टिव दृष्टियां हैं,आब्जेक्टिव नहीं हैं। जो है उसको नहीं देखतींजो हम देख सकते हैं उसको देखती हैं। गांधी को खयाल था कि हृदय-परिवर्तन हो जाएगा। और गांधीवादी अभी भी कहे चले जाते हैं कि हृदय-परिवर्तन हो जाएगा। लेकिन जरा देखें तोचालीस वर्ष की मेहनत के बाद गांधी एक पूंजीपति का हृदय-परिवर्तन कर पाएऔर अगर खुद गांधी एक पूंजीपति का हृदय-परिवर्तन नहीं कर पाए तो गांधीवादी कितने हजार वर्षों में कर पाएंगेइसका सोच सकते हैंविचार कर सकते हैं। गांधी नहीं कर पाएगांधी जैसा महिमावान व्यक्ति पूंजीपति का हृदय-परिवर्तन नहीं कर पायाबल्कि पूंजीपति ने उसकी आड़ से भी फायदा उठाने की कोशिश की। तो यह गांधीवादी कैसे हृदय परिवर्तन कर पाएंगे?
नहींयह हृदय-परिवर्तन की बात के पीछे शोषण के तंत्र को चलाए रखने का आयोजन चल रहा है। हृदय-परिवर्तन नहीं होगा। फिर हम चोरों का हृदय-परिवर्तन करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं करते। हम नहीं कहते कि पुलिस नहीं रखेंगेचोर के लिए दंड नहीं देंगे। हम चोर का हृदय-परिवर्तन करेंगे। नहींचोर के हृदय-परिवर्तन की हम फिक्र नहीं करते। हम कहते हैंकोई चोरी करेगा तो दंड पाएगालेकिन शोषक का हम हृदय-परिवर्तन की फिक्र करते हैं। हम कहते हैंशोषक को दंड नहीं देना हैउसका हृदय-परिवर्तन करना है। और बड़े मजे की बात यह है कि चोर बहुत छोटा चोर हैशोषक बहुत बड़ा चोर है।
मैंने सुना है कि चीन में लाओत्से एक अदभुत विचारक हुआ। और लाओत्से एक बार एक राज्य का कानून-मंत्री हो गया था। कानून-मंत्री होते ही पहले दिन अदालत में बैठा तो एक चोर का मुकदमा आया। एक आदमी ने चोरी की थी। चोरी पकड़ गई,सामान पकड़ गया। उस आदमी ने स्वीकार कर लिया कि मैंने चोरी की है। साहूकार भी खड़ा था और कहता था इसे दंड दो,इसने चोरी की है। लाओत्से ने कहादंड जरूर दूंगा और उसने फैसला लिखाउसने कहा कि छह महीने चोर को सजा और छह महीने साहूकार को भी सजा। साहूकार ने कहातुम पागल हो गए हो! दुनिया में कभी साहूकारों को सजा हुई हैजिनकी चोरी हुई उनको सजा दोगेयह कौन सा कानून हैयह कहां का न्याय हैलाओत्से ने कहाजब तक सिर्फ चोरों को सजा मिलती रहेगीतक तक दुनिया से चोरी बंद नहीं हो सकतीक्योंकि तुमने गांव की सारी संपत्ति एक कोने में इकट्ठी कर ली है। अब गांव में चोरी नहीं होगी तो और क्या होगा। एक आदमी के पास गांव की सारी संपत्ति इकट्ठी हो जाए तो गांव में आदमी कितने दिन तक धर्मात्मा रह सकेंगेचोरी होगी। चोरी उनकी मजबूरी हो जाएगी। लाओत्से ने कहा है कि मैं तो छह महीने की सजा चोर को भी दूंगा और छह महीने की सजा तुम्हें भी। क्योंकि चोर पीछे पैदा हुआ हैशोषण पहले है। शोषण पहले हैतब पीछे चोरी है। पूरा हिंदुस्तान चोर होता चला जा रहा है और सारे नेता चिल्लाते हैं कि चोरी नहीं होनी चाहिएबेईमानी नहीं होनी चाहिएभ्रष्टाचार नहीं होना चाहिए। भ्रष्टाचार होगाचोरी होगीबेईमानी होगीबढ़ेगीक्योंकि सबसे चोरी बड़ी चोरी और बेईमानी शोषण की जारी है और देश गरीब होता चला जा रहा है। नहींगरीब देश चोरी से नहीं बच सकताबेईमानी से नहीं बच सकताभ्रष्टाचार से नहीं बच सकतारिश्वत से नहीं बच सकता।
जब संपत्ति एक तरफ इकट्ठी होती चली जाती हो तो संपत्तिहीन कितने दिन नैतिक हो सकता हैकितने दिन तक धार्मिक हो सकता है। प्राण बचाने को भी उसे अनैतिक होना पड़ता है। और नेता भी भली-भांति जानते हैं कि न चोरी रुकेगीन बेईमानी रुकेगी। बीस वर्षों में वह रोज बढ़ती चली गई है। बीस वर्षों में हमारा प्रत्येक व्यक्तित्व का सारा महत्वपूर्ण हिस्सा नीचे गिरता चला गया है और हमारा नंगापन प्रकट होता चला गया है। लेकिन वह कहे चला जाता है कि नीति की शिक्षा दो स्कूलों में और कालेजों मेंधर्म की शिक्षा दोगीता पढ़ाओराम-नाम जपाओ। लेकिन सब बेईमानी की बातें हैं। गीता पढ़ाने सेराम-नाम जपाने से कोई चोरी बंद नहीं होगीभ्रष्टाचार बंद नहीं होगाअनीति बंद नहीं होगी। इस देश में अनीति उस दिन बंद होगी,जिस दिन इस देश में शोषण का तंत्र टूटेगा। उसके पहले अनीति बंद नहीं हो सकती है।
लेकिन शोषण के तंत्र को तोड़ने की बात करें तो वह गांधीजी की दुहाई देते हैं। वे कहते हैंगांधीजी कहते थेहृदय-परिवर्तन करना होगा। वे कहते हैं कि हम गांधीजी के प्रतिकूल नहीं जा सकते। गांधीजी कहते हैंहृदय-परिवर्तन करना होगा। गांधीजी भले आदमी थे। वे सोचते थे कि हृदय-परिवर्तन हो जाना चाहिए। वे सोचते थेजैसा उनका हृदय थावे सोचते थेसबका हृदय होगा। ऐसा सबका हृदय नहीं है। हृदय-परिवर्तन नहीं होगा। हृदय-परिवर्तन करना पड़ेगाहोगा नहीं। और करना पड़ने का मतलब यह है कि देश के तंत्र कोदेश की व्यवस्था को यह निर्णय लेना होगा कि शोषण हमें समाप्त करना हैकिसी भी मूल्य पर समाप्त करना है। जैसे हम चोरी समाप्त करते हैंबेईमानी को तोड़ने की कोशिश करते हैंहत्याओं की कोशिश करते हैं रोकने कीउसी तरह हमें शोषण को भी रोकना पड़ेगा। तो यह बंद होगा।
कल ही मैं किसी से यह बात कर रहा था तो उन्होंने कहा कि आपके भी बहुत से पूंजीपति मित्र हैंउनमें से आपने किसी को बदला अब तक कि नहींमैंने उनसे कहामैं तो मानता नहीं कि बदला जा सकता है। इसलिए बदलने का सवाल नहीं। फिर मैं यह भी नहीं मानता कि पूंजीपति को बदलना है। पूंजीपति को नहीं बदलनापूंजीवाद को बदलना है। पूंजीपति को बदलने से क्या होगापूंजीपति के बदलने से कुछ भी नहीं हो सकता। बड़ा तंत्र है पूंजीवाद कापूंजीपतिकसूर भी नहीं है उसका कोई। मजदूर भी शिकार है इस तंत्र कापूंजीपति भी शिकार है इस तंत्र का। वे दोनों ही इसके शिकार हैंइस बड़े तंत्र के जो पूंजीवाद है। इस बड़े तंत्र केपूंजीवाद के तंत्र का पूंजीपति भी उतना ही परेशान और पीड़ित हिस्सा हैजितना कि मजदूर और दलित पीड़ित हिस्सा है। एक दलित और पीड़ित है संपत्ति के न होने सेएक पीड़ित और परेशान है संपत्ति के होने से और चारों तरफ निर्धन की कतार जुड़ी होने से। एक आदमी अगर एक गांव में स्वस्थ हो और सारा गांव बीमार हो तो सारा गांव बीमारी से परेशान रहेगा और वह आदमी जो अकेला स्वस्थ रह गया हैस्वास्थ्य से परेशान रहेगा कि कब बीमार न पड़ जाऊं। अब बीमार न पड़ जाऊं। चारों तरफ बीमारी ही बीमारी है और ये बीमार सब मिल कर कहीं मुझे बीमार न कर दें। वह स्वास्थ्य का सुख नहीं ले पाएगाजहां चारों तरफ टी.बी. और कैंसर और घाव भरे लोग घूम रहे हों।
एक गांव में सारे लोग सड़क पर सो रहे हों और एक आदमी महल बना ले तो महल में आराम से सो सकेगाकैसे सो सकेगा?द्वार पर पहरेदार रखना पड़ेगा। पहरेदार के ऊपर दूसरा पहरेदार रखना पड़ेगाक्योंकि पहरेदार भी रात को घुस सकता है महल में और छुरा भोंक सकता है। कैसे सो सकेगा आराम सेऔर इतनी दीनतादरिद्रता उसके आस-पास फैल जाए तो उसके चित्त पर कोई परिणाम होगा कि नहींवह आदमी है या पत्थरउसके चित्त में शांति कैसे हो सकेगीमैं बड़े से बड़े धनपतियों को जानता हूंवे भी मेरे पास आते हैं और कहते हैं मन को शांत करने का कोई उपाय बताएंमन बड़ा अशांत रहता है। मन अशांत नहीं रहेगा तो क्या होगा। जहां हमारे चारों तरफ इतना दुख होगाइतना दारिद्रय होगाइतनी दीनता होगीहम कब तक अपने महल में यह विश्वास रख सकेंगे कि सब ठीक चल रहा हैयह कैसे हो सकेगाऔर वह नीचे जो बढ़ती हुई दीनता और दरिद्रता हैउसकी लहरेंउसकी आहेंउसका रुदनउसका उपद्रव रोज महलों से टकराएगा। रोज महलों की दीवालें घबड़ाएंगी कि कब गिर जाएंकब गिर जाएं। उनको बचाने में उसके प्राण लग जाते हैं। जिसको हम पूंजीपति कहते हैं वह भी पीड़ित हैवह भी शिकार है।
पूंजीवाद के दो शिकार हैं। एक वे जिनके पास पूंजी नहीं है और एक वे जिनके पास पूंजी है। जिस दिन पूंजीवाद जाएगा उस दिन गरीब गरीबी से मुक्त होगा और अमीरी अमीरी से मुक्त होगा। और ये दोनों रोग हैंये दोनों ही रोग हैं। इसलिए पूंजीवाद के जाने का मतलब पूंजीपति का अहित नहीं है। पूंजीवाद के जाने पर ही वह जो पूंजीवाद से पीड़ित व्यक्तित्व है वह भी मुक्त होकर मनुष्य का व्यक्तित्व बन सकेगा। जब तक कोई पूंजीपति हैतब तक मनुष्य नहीं हो पाता। तब तक आदमी नहीं हो पाता। तब तक वह खुल नहीं पातातब तक वह सहज नहीं हो पातातब तक इतने ज्यादा गलत समाज में इतने गलत ढंग से उसे जीना पड़ता है कि वह इतने टेंशन मेंइतने तनाव मेंइतनी अशांति में जीता है कि वह कैसे सहज हो सकता हैवह सहज नहीं हो पाता।
मैं एक घर में कलकत्ते में ठहरा हुआ था। उस घर में पति और पत्नी के अतिरिक्त कोई भी न था। बस वे दो ही प्राणी थे। बड़ा था महल। सब थी सुविधा। सब कुछ था उनके पास। रात बारह बजे जब मैं थक गया दिन भर के बाद और सोने जाने लगा तो उस घर के गृहपति ने कहाक्या आप अब सो जाएंगेमैंने कहा कि अब बारह बज गएक्या अब भी मैं जागता रहूंउन्होंने कहाठीक है आप सो जाइएलेकिन मैं सोचता था थोड़ी देर और बात करते। मैंने कहाप्रयोजनकि मुझे रात भर नींद नहीं आती। क्या हो गया तुम्हेंनींद क्यों नहीं आतीइतनी अच्छी गद्दियां तुम्हारे पास हैं। इन पर तो किसी को नींद न भी आ रही होजागते आदमी को बिठाल दोतो नींद आ जाए। इतना अच्छा भोजन तुम्हारे पास हैइतना बड़ा बगीचा तुम्हारे पास है,इतनी ताजी और ठंडी हवा तुम्हारे पास हैतुम्हारी खिड़कियों से आकाश के तारे दिखाई पड़ते हैंचांद झांकता हैतुम्हें नींद नहीं आतीहुआ क्या हैवे कहने लगेनींदनींद मुझे बहुत वर्षों से नहीं आती है। बस दिन-रात चिंता ही चिंता। आज इस फैक्टरी में गड़बड़ हैकल उस फैक्टरी में गड़बड़ है। वहां कम्युनिस्ट उपद्रव कर रहे हैं। वहां सोशलिस्ट उपद्रव कर रहे हैंवहां ऊपर सरकार गड़बड़ किए चली जाती हैयहां नीचे...सब गड़बड़ ही गड़बड़ हैइस गड़बड़ में कैसे नींद आए?
इसको आप समझ रहे हैं यह आदमी बहुत सुख में हैयह पूंजीपति बहुत सुख में हैतो आप भूल में हैंबिलकुल भूल में हैं। संपत्ति सुख ला सकती थीलेकिन पूंजीवाद के कारण संपत्ति सुख नहीं ला पाती है। संपत्ति उस दिन सुख बनेगी जिस दिन संपत्ति वितरित होगीसमान होगी। संपत्ति उस दिन सुख बन जाएगी। अभी संपत्ति भी दुख है। संपत्तिहीनता तो दुख है हीसंपत्ति भी अभी दुख है। संपत्ति जिस दिन वितरित होगी और समाज में जब दीन-हीनरुग्ण और अपाहिज का वर्ग विलीन होगा और जब मनुष्य मनुष्य की भांति एक समानता के तल पर खड़ा होगातो समाज से बेईमानी मिटेगीचोरी मिटेगीगुंडागर्दी मिटेगीनहीं तो नहीं मिट सकती है। यह सारी की सारी जो व्यवस्था हमें दिखाई पड़ती हैंबाइ-प्रोडक्ट हैशोषण कीएक्सप्लायटेशन की। और ऊपर के नेता चिल्लाए चले जाते हैं कि नीति समझाओ बच्चों को। बच्चे कैसे नीति समझेंगेनहीं समझ सकते हैं। लेकिन वे दलील देते हैं कि गांधीजी कहते थे हृदय परिवर्तन करना हैइसलिए कोई जोर जबरदस्ती नहीं करनी है। लेकिन तुम हैदराबाद में पुलिस एक्शन ले सकते होतुम रजवाड़ों को मिटाने के लिए जोर जबरदस्ती कर सकते हो। तब तुम्हें खयाल नहीं आया कि राजाओं का हृदय परिवर्तन करना चाहिए। लेकिन शोषण के मामले में एकदम हृदय परिवर्तन और अहिंसा की ऊंची-ऊंची बातें याद आने लगती हैं।
इसका मतलब है कुछ जरूर। इसका मतलब हैतुम बोलते जरूर होवाणी तुम्हारी नहीं हैवाणी शोषक की है जो तुम्हारी पीठ के पीछे खड़ा है और बोल रहा है। यह वाणी तुम्हारी नहीं है गांधीवादियों! यह तुम नहीं बोल रहो होतुम्हारी जबान बिकी हुई है,तुम्हारी बुद्धि बिकी हुई है। तुम्हारे पीछे जो खड़ा है वह बोल रहा है और कह रहा है कि अगर यह वाणी नहीं बोले तो अगले इलेक्शन में मुश्किल में पड़ जाओगे। यह दान-धन फिर हमने नहीं मिलने वाला है। ये पैसे फिर हमसे नहीं मिलेंगे। वह वाणी सत्ता से जो बोल रही है वह संपदाशाली की वाणी है। सत्ता से बोलने वाले के पास अपनी अब कोई जबान नहीं है। और वह अपनी इस झूठी जबान को गांधीवाद का नाम देकर सुंदरसत्य दिखलाना चाहता है। नहींचाहे गांधीजी ने कहा होचाहे किसी ने भी कहा हो कि हृदय-परिवर्तन से कुछ होगावह नहीं हो सकता है। गांधीजी के चालीस साल का अनुभव यह कहता है कि वह नहीं हो सकता है और अब तो गांधी जैसा व्यक्ति भी हमारे पास नहीं है जो हृदय-परिवर्तन के लिए जोर डाल सके। अब कौन डालेगाकौन बदलेगाहृदय-परिवर्तन कैसे बदलेगा?
विनोबा ने इधर कोशिश की थी एक। गांधी के पीछे गांधी से मिलता-जुलता कोई आदमी थातो वही है। उन्होंने कोशिश की थी। बहुत श्रम कियालेकिन कोई परिणाम न निकला। कोई परिणाम न निकला। जमीन मिलीदान मिला। इस देश में दान तो हजारों वर्षों से मिलता है। दान कोई नई बात नहीं है। दान भी मिलाजमीन भी मिलीगरीब को थोड़ी-बहुत राहत भी मिली होगीलेकिन शोषण का तंत्र इस तरह थोड़े ही टूटता हैजिस आदमी ने दान दिया एक तरफ जमीन कावह जाकर घर फिर योजना बना रहा है कि जितनी जमीन हाथ से निकल गई हैवह जल्दी से कैसे वापस कितनी कमाई कर लूं। इससे शोषण का तंत्र थोड़े ही बदलेगा कि एक आदमी ने दान दिया यहां दस लाख का और जाकर उसने घर योजना बनाई कि अगले वर्ष दस लाख कैसे वापस कमा लूं! उसका हृदय थोड़े ही बदल गया है। रुपये देने से थोड़े ही यह समाज बदलेगा। यह समाज तो बदलेगा इसके तंत्र के बदलने से। इसकी सिस्टमइसकी व्यवस्था बदलने से।
तो विनोबा ने दस-पंद्रह साल दौड़-धूप करके बेचारे ने पैदल भाग-भाग कर गांव-गांव अपना जीवन नष्ट किया। कोई परिणाम नहीं हुआ। हांजमीन मिलीऔर वह सर्वोदयवादी कहते हैं कि वही परिणाम है। देखोइतनी लाख एकड़ जमीन मिल गई। जमीन के मिलने से कुछ भी होने का नहीं है। इस पूंजीवाद के तंत्र कोशोषण के तंत्र को जमीन के बंट जाने सेकुछ थोड़ी सी जमीन गरीब को मिल जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। बल्कि पूंजीपतिपूंजीशाही और गांधीवादी इससे खुश हैं कि विनोबा ने थोड़ी-बहुत जमीन बांटी। थोड़ा-बहुत दान दिलवाया। उससे गरीबी को थोड़ी राहत मिली। राहत मिलने से हिंदुस्तान में आने वाली समाजवादी क्रांति में रुकावट पड़ती है। जितनी राहत मिलती हैउतनी क्रांति में रुकावट पड़ती है। जितना गरीब को ऐसा लगता है कि बहुत अच्छा हैसब ठीक हैकिसी तरह चल रहा हैचल जाएगाथोड़ी जमीन भी मिल गई एक-दो एकड़अब कुछ हो जाएगाअब कुछ हो जाएगा। उतना ही वह जो सर्वहारा हैवह जिसके पास कुछ भी नहींवह क्रांति करने के लिए तत्पर नहीं हो पाता है। विनोबा ने भला काम कियालेकिन उन्हें पता नहींवे हिंदुस्तान की शोषण की व्यवस्था के हाथ में खेल गए। इसीलिए दिल्ली के सत्ताधीशकरोड़पतिउनके चरणों में जाकर बैठते हैं और नमस्कार कर आते हैं। वह नमस्कार विनोबा को नहीं हैवह नमस्कार क्रांति में पड़ती हुई रुकावट को है।
बीस साल के भूदान-आंदोलन ने भारत की क्रांति में बाधा पहुंचाईसमय को लंबा किया है। शोषण का तंत्र नहीं टूटालेकिन शोषण का तंत्र सहने योग्य बन जाएइसकी थोड़ी सी कोशिश भर हो पाई है और कुछ भी नहीं हो सका है। नहींइस तरह के कामों से कुछ भी नहीं हो सकता है। हिंदुस्तान को अपनी पूरी समाजी-व्यवस्था को अनिवार्यरूपेण बदल लेना जरूरी है। और न हृदय परिवर्तन के लिए प्रतीक्षा करने की जरूरत हैन किसी और बात की प्रतीक्षा करने की जरूरत है। लेकिन सत्ताधिकारी जो सत्ता में है उसके पास अपनी वाणी नहीं है। जब तक इस देश का लोकमतजब तक इस देश की लोकात्माजब तक इस देश के पूरे प्राण इस बात को नहीं समझेंगे कि हम सब चाहे गरीबचाहे अमीरएक ही शोषणत्तंत्र के परेशान पीड़ित अंग हैं और इस शोषण के तंत्र को हटा देना है तभी कुछ हो सकेगा। सर्वोदय से समाजवाद नहीं आएगालेकिन समाजवाद से सर्वोदय आ सकता है। समाजवाद के बाद ही सर्वोदय आ सकता हैक्योंकि सर्वोदय का अर्थ है सबका उदयसबका हित। सबका हित तभी हो सकता है जब सबका हित समान हो।
अभी गरीब और अमीर का हित समान नहीं है। इसलिए सर्वोदय नहीं हो सकता है। उनके हित प्रतिकूल हैंविरोधी हैंशत्रु के हित हैं। उनके हित में समानता नहीं हैइसलिए अभी समान हित का उदय नहीं हो सकता। अभी सर्वमंगल नहीं हो सकता है। सर्वोदय से समाजवाद नहीं आएगा। सर्वोदय की जितनी बातें चलेंगीसमाजवाद के आने में उतनी देर होगी। उतना समय जाया होगा। लेकिन समाजवाद आए तो सर्वोदय निश्चित आ जाएगा। सर्वोदय समाजवाद की छाया है। जैसे ही शोषण का तंत्र टूटता है,तब सबका समान हित रह जाता है। तब वर्गीय हित नहीं रह जाते। तब श्रेणीगत हित नहीं रह जाते। तब क्लास इंट्रेस्ट नहीं रह जाता। तब हम सब समान हो जाते हैं और तब इस देश का उदय हो सकता है। इस देश का श्रम भी तभी जागेगाउत्साह भी तभी जागेगाप्राण श्रम करने के लिएसृजन करने के लिए तभी आतुर होंगे जब प्रत्येक को ऐसा मालूम पड़ेगा यह देश हमारा है। अभी प्रत्येक को ऐसा नहीं मालूम पड़ता।
और यह जान कर आप हैरान होंगे कि जब तक प्रत्येक को यह अनुभव न हो जाए कि यह देश हमारा हैदीनतम को यह अनुभव न हो जाए कि देश मेरा है--यह उसे कब अनुभव होगायह उसे तभी अनुभव होगा कि देश की जो संपदा है--वह मेरी है। देश की संपदा कुछ लोगों की और देश मेरायह बात बड़ी गड़बड़ है। यह नहीं हो सकता। संपदा किन्हीं कुछ लोगों की और देश मेरा! देश का मतलब क्या हैदेश का मतलब हैदेश की संपदादेश का मतलब हैदेश का सब कुछ। भूमि और आकाश,और हवासंपत्ति और मनुष्य की शक्ति और सब कुछ। मेरा है यह देश तभी कह सकता हूं बल सेजब इस देश की सारी संपत्ति में भागीदार हूंसमान भागीदार हूं। लेकिन जब मैं समान भागीदार नहीं हूं तो यह देश मेरा कैसा है। यह दस-पांच लोगों का होगा देश। यह सत्ताधारियों का होगा देश। यह दीन कादरिद्र का देश कैसा हैऔर इसलिए इस देश में एक देश का भाव पैदा नहीं हो पा रहा हैएक समाज का भाव पैदा नहीं हो पा रहा है। इस देश में एक अटूट एकता पैदा नहीं हो पा रही है। वह नहीं होगी। यह इंटिग्रेशन की सारी बातचीत चलेगी और कुछ भी नहीं होगा। इंटिग्रेशनएकताइस देश में समाजवाद का परिणाम होगी। उसके पहले नहीं हो सकती।
ये बातें मैं कहता हूं तो वे कहते हैं कि मैं गांधीजी का दुश्मन हूं। गांधीजी का मैं दुश्मन हूं या दोस्तअगर गांधीजी की कहीं भी आत्मा होगी तो यह सोचती होगी कि जब आप ताली बजाएं समाजवाद के लिए तो आकाश में अगर वे कहीं भी होंगे तो उन्होंने भी ताली बजाई होगी! आपकी ताली के साथ उनकी ताली रही होगी। और अगर मेरी आवाज उन तक पहुंचती होगीउन्हें लगता होगा कि मैं कहा रहा हूं कि यह देश तब होगा खुशहालजब प्रत्येक व्यक्ति इस देश की संपत्ति का समान मालिक होगा। तो गांधी खुश होंगे या दुखी होंगेतो मैं गांधी के पक्ष में बोल रहा हूं या विपक्ष में बोल रहा हूंयह मैं आप पर छोड़ देता हूं। मैं गांधीवादी के विरोध में बोल रहा हूंगांधी के विरोध में नहीं बोल रहा हूं।
एक बार कराची में एक बड़ी कांफ्रेंस मेंकांग्रेस के कुछ लोगों ने गांधी का विरोध किया और काले झंडे दिखाए और उन्होंने काले झंडे दिखा कर नारा लगाया--गांधीवाद मुर्दाबाद। गांधी मंच पर थेमाइक पर थे। उन्होंने उत्तर में कहा कि ध्यान रहेगांधी मर जाएगालेकिन गांधीवाद अमर रहेगा। मैं उनसे कहना चाहता हूंगलती बात कह दी उन्होंने। मेरा वश होतालेकिन अब तो कोई उपाय नहीं उनसे शब्द बदलवाने कालेकिन फिर भी निवेदन तो कर देना चाहिए। मेरा वश होता तो उनसे मैं कहता,लेकिन आज तो कह देना चाहिए। मैं कहना चाहता हूंगांधी अमर रहेंगेगांधीवाद नहीं। गांधी अमर रहेंगेगांधीवादी नहीं। गांधी की प्रतिभागांधी का व्यक्तित्वगांधी की करुणागांधी का प्रेमगांधी की अहिंसागांधी का वह महिमामंडित स्वरूप अमर रहेगागांधीवाद नहीं। क्योंकि गांधीवाद के अमर रहने का मतलब गांधीवादी का अमर रहना है। गांधीवादी के अमर रहने का मतलब गांधीवादी का अमर रहना है। गांधीवादी की जय नहींलेकिन गांधी की जय जरूर। मैं गांधी का शत्रु नहीं हूंलेकिन गांधीवादी देश को गङ्ढे में ले जा रहा है। और गांधीवाद से मुक्त हो जाना अत्यंत आवश्यक है। जितने शीघ्र हम मुक्त हो सकें और जितने शीघ्र हम एक वर्ग-विहीन और शोषण-मुक्त समाज को जन्म दे सकेंउतना हितकर हैउतना उचित है। करोड़ों-करोड़ों वर्ष के भारत का स्वप्न पूरा हो सकेगा।
भारत के ऋषियों नेभारत के संतों नेसपना ही यह देखा है कि एक पृथ्वी ऐसी हो जहां सब बंधु होंलेकिन शोषण से भरी पृथ्वी बंधुओं की पृथ्वी कैसे हो सकती हैएक सपना देखा है कि प्रत्येक आदमी की आत्मा समान हैबराबर हैलेकिन आत्मा समान और बराबर होगीजब तक शरीर को समान अवसर और सुविधा नहीं मिलतीतब तक आत्मा की समानता का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं है। आत्मा तभी प्रकट होती है जब शरीर हो। और आत्मा की समानता भी उसी दिन प्रकट होगी जिस दिन शरीर के जगत में समानता की व्यवस्था होअन्यथा आत्मा की समानता भी कैसे प्रकट हो सकती हैकरोड़ों-करोड़ों वर्ष से जिसने जीवन को सोचा हैजाना हैउसके प्राणों में एक ही प्रार्थना रही है कि सारे लोगों को समान शांतिसमान आनंद उपलब्ध हो। लेकिन वह कैसे उपलब्ध होगाअभी तो जीवन की समान जरूरतें भी उपलब्ध नहीं हैंजीवन को विकसित करने का समान अवसर भी उपलब्ध नहीं है। कितने गांधी झोपड़ों में मर जाते होंगे और पैदा नहीं हो पाते होंगे। कितने बुद्ध और महावीर शूद्रों के घर में जन्मते होंगे और क ख ग भी नहीं सीख पाते होंगे। कितने ऋषि और मुनि पैदा नहीं हो सकेक्योंकि जहां वे पैदा हुए वहां ज्ञान की कोई खबरकोई हवा नहीं पहुंच सकी। हजारों वर्ष से भारत में शूद्र हैं। एक शूद्र बुद्ध की हैसियत को उपलब्ध हुआएक शूद्र राम बनाएक शूद्र कृष्ण बनाएक शूद्र पतंजलि बनानहीं बन सका। क्या शूद्र के घर आत्माएं पैदा नहीं होतींप्रतिभाएं पैदा नहीं होतीं?
अंग्रेजों की कृपा थी कि एक डाक्टर अंबेदकर पहली बार पैदा हुआ एक कीमत का आदमी शूद्रों में। एक आदमी पूरे इतिहास में। यह भी पैदा नहीं होता। इसे मौका मिला इसलिए पैदा हुआ। कितनी आत्माओं को मौके नहीं मिलेजो पैदा हो सकती थीं। कितना अनंत उपकार हुआ है जगत का। कुछ थोड़े से लोग अवसर पाते हैं। उन थोड़े से लोगों के थोड़े से बच्चे आगे बढ़ पाते हैं। शेष बड़ा समाज जीता हैसड़ता हैमर जाता है। उसके जीवन में न कोई ऊंचाई पैदा होतीन कोई शिखर छूतान कोई संगीत बजतान कोई प्रभु के मंदिर की घंटी सुनाई पड़ती। यह कब तक चलेगा?
लोग समझते हैं कि समाजवाद धर्म का विरोधी है। गलत है यह बात। समाजवाद से ज्यादा धार्मिक और कोई आंदोलन जगत में नहीं है। लोग समझते हैं कि समाजवाद ईश्वर का विरोधी है। गलत है यह बात। जब जमीन पर पूरी तरह समाजवाद होगा तभी हम पहली दफा ईश्वर की तरफ उठ सकेंगेईश्वर की तरफ आंख उठा सकेंगे। समाजवाद के बाद ही धार्मिक जीवन का ठीक-ठीक समुचित विकास हो सकता है। लेकिन गांधीजी के सामने स्वतंत्रता का सवाल बड़ा था। आजादी का सवाल बड़ा था। समाजवाद का सवाल बड़ा नहीं था। स्वभावतः परिस्थिति नहीं थी। गांधीजी के सामने सवाल था कि यह देश परदेशी गुलामी से कैसे मुक्त हो जाए। अगर वे जिंदा रहते तो शायद वे आर्थिक गुलामी सेदेशी गुलामी से भी मुक्त करने के लिए कोई प्रयास करते। लेकिन वे जिंदा नहीं रहे। आजादी जरूरी थी उस वक्त। इसलिए उन्होंने जो भी चिंतन और विचार विकसित कियावह मूलतः स्वतंत्रता को ध्यान में रख कर था। उनका चिंतन समानता को ध्यान में रख कर समुचित रूप से विकसित नहीं हो सका। लेकिन उन पर ही हम रुक जाएंगे या आगे बढ़ेंगे?
स्वतंत्रता आ गई। जैसी भी समझिएक्लीवइंपोटेंटअधूरीजैसी भी आ गई। अब इस स्वतंत्रता के अवसर का उपयोग क्या हो सकता हैएक ही उपयोग हो सकता है कि समानता भी आए। और ध्यान रहेजब तक समानता पूरी तरह न आए तब तक स्वतंत्रता सिर्फ धोखा होती हैकामचलाऊ होती हैनाममात्र होती है। क्योंकि जिनके पास पेट में रोटी भी नहीं हैउनके लिए स्वतंत्रता का क्या अर्थ हैक्या उपयोग हैक्या प्रयोजन हैजिनके पास वस्त्र भी नहीं हैं उनके लिए स्वतंत्रता शब्द सुनाई तो पड़ता हैलेकिन उसका कुछ अर्थ प्रकट नहीं होता कि स्वतंत्रता यानी क्या है। जब तक आर्थिक समानता न हो तब तक राजनैतिक स्वतंत्रता आत्मवंचना हैसेल्फ डिसेप्शन है। लेकिन गांधी के सामने वह सवाल न था। हमारे सामने वह सवाल है और हमें गांधी के आगे सोचना होगाआगे विचार को ले जाना होगा। देश ने एक आजादी की लड़ाई लड़ी थी। अब देश को फिर एक लड़ाई लड़नी है समानता की। नहीं किसी और से लड़नी हैलड़नी है अपने ही तंत्र सेअपने ही शोषण की व्यवस्था से। नहीं किसी व्यक्ति सेसमाज की व्यवस्था से।
और यह व्यवस्था बदलेतो ही गांधी की आत्मा प्रसन्न हो सकती है। लेकिन गांधीवादियों ने गांधी को कहां-कहां बिठा रखा है,पता हैपुलिसथाने मेंहेड कांस्टेबल के पीछे गांधी की तस्वीर लगी है। पुलिसथाने में बैठा है हेड कांस्टेबलमां-बहन की गालियां दे रहा है और पीछे राष्ट्रपिता की तस्वीर लगी है। अदालत में जहां सब तरह की बेईमानियां चल रही हैंरिश्वतखोरियां चल रही हैं वहां गांधी की तस्वीर लगी है। तुमने गांधी को कोई पंचम जार्ज समझ रखा हैतुम गांधी के साथ अच्छा सलूक कर रहे होतुम गांधी को कहां बिठा दिए होलेकिन तुम्हें गांधी से कोई मतलब नहीं। तुम्हें स्वयं से मतलब है। तुम गांधी की तस्वीर खड़ी करके अपने को छिपाने की कोशिश कर रहे हो। लेकिन कितनी देर तक इस देश की जनता को धोखा दिया जा सकेगातुम तो नहीं छिप सकोगे। खतरा यह है कि कहीं गांधी का सम्मान समाप्त न हो जाए। तुम नहीं छिप सकोगेलेकिन कहीं गांधी का सम्मान समाप्त न हो जाए। गांधीवादियों से गांधी को बचा लेना बहुत जरूरी हैअन्यथा गोडसे उनको नहीं मार पायागांधीवादी उनको मार डाल सकते हैं।

ये थोड़ी सी बातें मैंने कहींइस संबंध में जो प्रश्न होंगेवह कल सुबह आपसे बात करूंगा।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुनाउससे अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं,मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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