बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-13

पूंजीवाद का विकास

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मेरे खयाल में तो अगर कोई बात सत्य हैउपयोगी हैतो सत्य अपना माध्यम खोज ही लेता है। नहीं अखबार थे तब की दुनिया मेंसत्य मरा नहीं। बुद्ध के लिए कोई अखबार नहीं थामहावीर के लिए कोई अखबार नहीं थाक्राइस्ट के लिए कोई अखबार नहीं था। तो भी क्राइस्ट मर नहीं गए। अगर बात में कुछ सच्चाई हैतो सत्य अपना माध्यम खोज लेगा। अखबार भी उसका माध्यम बन सकता है। लेकिन अखबार की वजह से कोई सत्य बचेगाऐसा नहीं है। या अखबार की वजह से कोई असत्य बहुत दिन तक रह सकता हैऐसा भी नहीं है। माध्यम की वजह से कोई चीज नहीं बचती हैकोई चीज बचने योग्य होतो माध्यम मिल जाता है। अखबार भी मिल ही जाएगा। नहीं मिलेतो भी इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। हम जो कह रहे हैंवह सत्य हैइसकी चिंता करनी चाहिए। अगर वह सत्य है तो माध्यम मिलेगा। और नहीं मिला तो भी क्या हर्ज है, तो भी कोई हर्ज नहीं है।

लेकिन इस युग में फर्क पड़ा हैऔर वह फर्क यह है कि थोड़ी-बहुत देर तक प्रचार के द्वारा असत्य को भी चलाया जा सकता है। प्रोपेगेंडाअसत्य को भी थोड़ी देर तक तो चला ही सकता है। सत्य जैसा दिखा ही सकता है। और थोड़ी देर तक प्रोपेगेंडा सत्य को भी प्रचारित होने से रोक ही सकता है। लेकिन यह चरम बात नहीं हैयह थोड़ी देर के लिए बात है।


(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

एक तो यह बिलकुल स्वाभाविक है। यह बिलकुल स्वाभाविक है क्योंकि जो मैं कह रहा हूंवह बहुत से न्यस्त-स्वार्थों के विपरीत कह रहा हूं। जो मैं कह रहा हूंवह बहुत सी दुकानोंबहुत से पुरोहितोंबहुत से वादों के विपरीत कह रहा हूं। जो मैं कह रहा हूं,वह जो पुराना हैउसके विपरीत है। तो पुराना अपनी रक्षा के उपाय करेगा। लेकिन मेरी समझ यह है कि जब भी कोई विचार रक्षा कीडिफेंस की हालत में आ जाता हैतो उसकी मौत करीब है। जब भी कोई विचार डिफेंसिव हो जाता है और रक्षा करने लगता है अपनी तब उसकी मौत करीब आ जाती है। और जब विचार जीवंत होता हैतब वह आक्रामक होता है और जब मरने लगता हैतब वह रक्षात्मक हो जाता है। इसलिए मेरे लिहाज से वह शुभ लक्षण है। और अगर एक आदमी को न्यूट्रलाइज करने के लिए दो साल मेहनत करनी पड़ी होतो ये बड़े शुभ लक्षण हैं। और एक आदमी को अगर मुल्क भर में सारे लोगों को एक आदमी से लड़ना पड़ता हो...और मैं एक दिन के लिए आऊं और उनको फिर साल भर लड़ाई चलानी पड़ती होतो ये बड़े शुभ लक्षण हैं। साधारण लक्षण नहीं हैं। ये बड़े शुभ लक्षण हैं। इसका मतलब यह है कि वह एक बात उनकी समझ में आ गई है कि वे डिफेंस में हैं।
दूसरी बात यह है कि जो मैं कह रहा हूंऔर जो वे कह रहे हैंहम दोनों के बल अलग हैं। अलग का मेरा मतलब यह है कि मेरा बल भविष्य में हैआने वाली पीढ़ी में हैउनका बल अतीत में हैजाने वाली पीढ़ी में है। उनका जो बल हैवह जाने वाली पीढ़ी में है और अतीत में है। उनका बल डूबते हुए सूरज में है। मेरा बल उगते हुए सूरज में है।
इसलिए मुझे उनकी कोई बहुत चिंता लेने जैसी बात नहीं है। अगर बीस साल हम इसी तरह भी लड़ते रहेतो भी आप देखेंगे कि उनका सूरज डूबता है। क्योंकि जिन पर उनका बल हैवे बीस साल में विदा हो जाएंगेजिन पर मेरा बल हैवे बीस साल में शक्तिशाली हो जाएंगे। इसलिए लड़ाई आज भला ऐसी लग सकती है कि मैं कुछ कह कर जाता हूंफिर साल-छह महीने में उसको लीप-पोत दिया जाता हैलेकिन ऐसा बीस साल पहले नहीं कहा जा सकता है। और एक बड़े मजे की बात यह है कि जब मुझे गलत सिद्ध करने में या मैं जो कह गया हूंउसे लीप-पोंछ डालने में उनको सारी ताकत लगानी पड़ रही हैतो वे कुछ दे नहीं पाएंगे और बीस साल में उनका काम सिर्फ इतना ही रह जाएगाजैसा कि घर में सुबह नौकर घर को साफ करता हो,कचरा साफ करता होउससे ज्यादा उनका मूल्य नहीं रह जाएगा। वे क्रिएटिव देने की हालत में कुछ भी नहीं हैं।
मैं उनकी चिंता नहीं लेता। मुझे जो कहना हैवह मैं कहे चला जाऊंगा। मुझे जो ठीक लगता हैवह मैं दोहराए चला जाऊंगा। मुझे जो अच्छा लगता हैउसे मैं बनाए चला जाऊंगा। मेरा भरोसा क्रिएटिविटी में है। मेरा भरोसा इसमें नहीं है कि वे क्या कर रहे हैंमैं उनसे जूझने जाऊंक्योंकि मैं मानता हूं कि वे हारी हुई बाजी लड़ रहे हैं। इसलिए उनकी चिंता लेने की जरूरत नहीं है।
और फिर एक बात है कि कुछ चीजें हैंजो मर चुकी हैं--सिर्फ कुछ स्वार्थ उनको जिंदा रखे हुए हैंलाशें हो चुकीं हैं। मकान गिर चुका हैलेकिन कुछ लोग बल्लियां लगाए हुए सम्हाले खड़े हैं। क्योंकि उनका सारा स्वार्थ उसमें है। और हम इतने बड़े संक्रमण के समय में हैंइतना बड़ा ट्रांस्फार्मेशन करीब हैइतने जोर से सारी दुनिया बदल रही है कि बल्लियां बहुत ज्यादा देर नहीं रोकी जा सकती हैं। और न बहुत ज्यादा देर मुर्दे को अब जिंदा रखा जा सकता है। वह तो गिरेगा।
तो मेरा काम इतना ही है कि मैं यह बता जाऊं कि यह जो लाश पड़ी हैयह जिंदा नहीं है। और मैं मानता हूं कि अगर एक दफा आपको दिखाई पड़ जाए कि लाश है और जिंदा नहीं हैतो फिर पचास गुरु भी आपको समझा कर नहीं बता सकते हैं कि यह जिंदा है। एक दफा दिखाई पड़ जाना चाहिए फिर बहुत मुश्किल है। और फिर...
अब जैसे राजकोट जैसी जगह हैअगर दो लाख आदमी रहते हैं। दो लाख लोग तो मुझे नहीं सुनते हैं। थोड़े से लोग मुझे सुनते हैं। जरूरी नहीं है कि वे ही लोग उनको सुनते होंजो मेरा विरोध कर जाते हैं। लेकिन एक मेरी समझ है और मेरी समझ यह है कि मुझे सुनने में रोज-रोजनये से नया युवक उत्सुक हो रहा है। उस पर मेरी यात्रा है। और अगर कोई वृद्ध भी मेरी इन बातों में उत्सुक हो रहा हैतो मैं मानता हूं कि किसी गहरे अर्थ में वह वृद्ध नहीं हैक्योंकि मेरे साथ वृद्ध खड़ा ही नहीं रह सकता। अगर कोई बूढ़ा आदमी भी मेरे पास आ रहा हैतो किसी न किसी अर्थ में उसकी आत्मा जवान हैतो ही मेरे पास आ रहा है,नहीं तो नहीं आ रहा।
और वे जो मेरे विरोध में काम कर रहे हैंउनके पास अगर आप देखेंगेतो वहां आपको बिलकुल कब्र में जिनका एक पैर चला गया हैवे लोग आपको दिखाई पड़ेंगे। मंदिर मेंमस्जिद मेंपुरोहित के पासगुरु के पास मरा हुआ आदमी दिखाई पड़ेगा। उससे आशा नहीं बांधी जा सकती है। और यह भी मेरी समझ है कि दुनिया में जब भी कोई क्रांतियां होती हैं तो कोई सारा मुल्क क्रांति नहीं करता। एक चुना हुआ वर्गएक सोच-विचारशील वर्गएक इंटेलिजेंसियायह जो बहुत छोटा सा हिस्सा होता हैवह क्रांति करता है। यह मेरी समझ है कि वह जो इंटेलिजेंसिया हैवह जो सोच-विचारशील वाला वर्ग हैवह पुराने गुरुओं के पास नहीं हैन हो सकता हैउससे उसकी टूट हो गई हैवह उससे चला गया हैवह उसके पास नहीं है। चित्रकार होमूर्तिकार होकवि होलेखक होविचारक होदार्शनिक होचिंतक होवह वहां नहीं हैजो मेरे विरोध में लगे हुए हैं। लेकिन वह धीरे-धीरे मेरी बातों में उत्सुक हो रहा है।
तो मेरी अपनी समझ यह है कि देश की जो इंटेलिजेंसिया हैवह जो देश का सोचने वाला वर्ग हैजरूरी नहीं है कि सोचने वाला वर्ग धनी हो। अक्सर ऐसा नहीं होता है। अक्सर सोचने वाला वर्ग धनी नहीं होता। सोचने वाला वर्ग अक्सर मध्य वर्ग से आता है। सारी दुनिया की जो क्रांति हैसब मध्यम वर्ग से आती है। तो मेरी नजर में वह खयाल में है कि वह वर्ग मुझमें उत्सुक हो रहा हैऔर यह भी बड़े मजे की बात है कि वह वर्ग मुझमें ही उत्सुक हो सकता हैवह उनमें उत्सुक नहीं हो सकता है। उसके और उनके बीच के सेतु टूट गए हैं। इसलिए मुझे चिंता नहीं है।
मैं अपनी बात कहे चला जाता हूंऔर फिर मुझे इसका भी फर्क नहीं पड़ता कि क्या परिणाम होगाइतनी बड़ी जिंदगी में हमें परिणाम की चिंता में नहीं पड़ना चाहिए। मैं जो कर रहा हूं वह ठीक होना चाहिएइतना मुझे भरोसा होना चाहिएपरिणाम क्या होगा इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। वह कोई हिसाब-किताब भी नहीं किया जा सकता। मुझे ठीक लग रहा हैउसे कहने में मैं आनंदित हूंबात खतम हो गई। अगर वह कुछ उपयोग का होगातो लोग उसका उपयोग कर लेंगेनहीं उपयोग का होगा तो लोग उसे भूल जाएंगे।
ऐसा भी मेरा आग्रह नहीं है कि जो मैं कह रहा हूंउसे लोगों को मानना ही चाहिए। ऐसा भी मेरा आग्रह नहीं है कि मेरी बात मान कर ही सब कुछ हो जाना चाहिए। अगर वह ठीक होगी तो वह मान लेंगेअगर ठीक नहीं होगी तो अच्छा ही है कि न मानें। संघर्ष तो चलेगाऔर इसलिए मैं मानता हूं कि जो आदमी आकर कहता है कि मैं गलत कह रहा हूंवह भी मेरे काम में सहयोगी है। क्योंकि हो सकता हैमैं गलत ही कह रहा हूं। तब देश के हित में ही है कि कोई पूछेगा कि मैं गलत हूं। और हो सकता है मैं सही कह रहा हूंतो उसके गलत कहने से बहुत देर तक यह बात चलने वाली नहीं है। लोग भी सोचेंगेसमझेंगे। जो ठीक होगा उन्हें दिखाई पड़ेगा। इसलिए मैं आग्रहशील नहीं हूं।
इसलिए जैसा आप कहते हैं कि आपके मिशन का क्या होगाएक अर्थ में मेरा कोई मिशन नहीं हैक्योंकि मिशन का मतलब आग्रह होता है। यानी मैंने कोई ठेका ले रखा हो कि नहीं ऐसा ही हो जाना चाहिए दुनिया मेंऐसा मेरे मन में कोई भाव नहीं है,मिशनरी में नहीं हूं। मुझे जो ठीक लग रहा हैवह मैं आपसे कह देता हूं। इतना मैं अपना दायित्व समझता हूं कि मुझे ठीक लग रहा हो और मैं आपसे न कहूंतो थोड़ी मनुष्यता की मुझमें कमी है।
जो ठीक लग रहा था वह मैंने आपसे कह दिया हैमेरा काम पूरा हो गया है। आप रास्ते से जा रहे हैं। मैंने देखापास में गङ्ढा है जिसमें मैं गिर सकता हूं। और मैंने आपसे कहा कि गङ्ढा है और बात खतम हो गई। फिर भी आप गिरते हैंवह आपकी मौज रहीउसका मुझ पर कोई जिम्मा न रहा। लेकिन में बैठा हूंआप गङ्ढे में जा रहे हैं। मैं बैठा देखता हूं। आप गङ्ढे में गिर जाएं और मैं देखता रहूंतो आपके गङ्ढे में गिरने मेंमैं भी जिम्मेवार था। इसका दायित्व मुझ पर भी हो जाएगा। तो मेरा इतना है कि मैं चिल्ला कर आपको कह दूं कि ऐसा हो रहा है। फिर आपकी मर्जी।
और हर आदमी को हक है कि अपनी मर्जी से तय करे और इसलिए हजारों करेंट चलते हैं जिंदगी मेंकोई एक करेंट निर्धारित हो ही नहीं सकता। इन सबके चिंतन का इकट्ठा परिणाम अंत में निर्धारित होता है। अगर हम बीस लोग यहां बैठ कर बात करें,तो न तो मैं सत्य का निर्धारक हो सकता हूंन आप। लेकिन अगर हम सत्य के खोजी हैं और बीस लोग विवाद करेंवाद करें,संवाद करेंचर्चा करेंतो अंत में जो सत्य बीस लोगों की चर्चा से निकलेगान तो मेरा होगान वह आपका होगा। लेकिन अगर इन बीस लोगों ने ईमानदारी से सत्य की खोज की हैतो मैं जिसको सत्य कहता थाउससे भी ज्यादा सत्यतर होगाआप जिसे सत्य कहते थेउससे ज्यादा सत्यतर होगा।
तो जिंदगी तो एक बड़ा डायलाग है। उसमें जो गलत कह रहा हैसही कह रहा हैवह सबका उपयोग है। और मुल्क एक स्थिति में हैजहां हमें कुछ निर्णय लेने हैंजो हमने हजारों साल तक पोस्टपोन किए थे। तो उन निर्णय लेने की स्थितियों में मेरे विचार मुझे सामने रख देने हैं। आपको अपने रख देने हैंकिसी को अपने रख देने हैं। एक डायलाग होगापूरा मुल्क सोचेगा,समझेगाउससे कुछ निकलेगा। वह निकला हुआ न मेरा होगान आपका होगान किसी को होगा। वह हम सबका सम्मिलित फल होगा। और उस सम्मिलित फल के लिए मेरी चिंता है। इसलिए मेरा कोई मिशन नहीं है। अगर मिशन की भाषा में कहें तो मेरा यही मिशन है कि मुल्क में एक संवाद चल पड़े। एक बात चल पड़ेएक चर्चा होने लगेलोग सोचने लगेंलोग चेतने लगें,लोग बात करने लगेंलोग तय न रह जाएंलोगों के पुराने कंक्लूजन न रह जाएं। वह मेरा काम मैं पूरा कर रहा हूं और वह जो मेरे विरोध में बोल रहे हैं वे भी मेरे काम में सहयोगी हो रहे हैं।
मैं चाहता हूंमुल्क ऐसी स्थिति में आ जाएनो कंक्लूजन मेंजिसके पास निष्कर्ष नहीं हैक्योंकि जिस कौम के पास निष्कर्ष पक्के हो जाते हैंवह कौम सोचना बंद कर देती है। फिर सोचने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। हमेशा हमारा कंक्लूजन पहले से तय होता हैसोचने की कोई जरूरत नहीं हैहमने कोई दोत्तीन हजार साल से सोचा नहीं है। इसलिए मैं मानता हूं कि मुल्क अगर संदिग्ध हो जाएइतना काम मैं करूंगा। इतना मैं हर मुद्दे पर कर दूंगाइतना काम हो जाएगा। इसमें कोई शक ही नहीं है। मैं संदेह में डाल दूंगा। जो मेरे विरोध में आएंगेवे भी मेरा काम कर जाएंगेक्योंकि वे मेरे साथ भी आपको निस्संदिग्ध न होने देंगेमेरे साथ भी संदिग्ध कर देंगे।
मुल्क संदेह की स्थिति में आ जाए--ए मूड ऑफ डाउट पैदा हो जाए तो काम पूरा हो जाएगा। उस संदेह से बहुत कुछ पैदा हो सकता है। बहुत सृजनात्मक विचार का जन्म हो सकता है।
और दुनिया में जो भी ऐसे हुए हैंजिन्होंने दान किया हैवे संदेह के युग हैं। जैसे बुद्ध और महावीर के वक्तआज से पच्चीस सौ वर्ष पहले बिहार ने कुछ दान दिया। वह बड़े संदेह का युग थाबिहार के लिए। बिहार में कोई आठ तीर्थंकर थे और वे आठों अपनी बात कह रहे थेऔर आठों बाकी सात के विरोध में थे। तो बिहार ने दान दिया था। एथेंस में साक्रेटीज और प्लेटो और अरस्तू के जमाने में संदेह का युग था। पच्चीसों विचारक थेजो अपनी बात कह रहे थे। एथेंस जो उस समय दे गयाफिर नहीं दे सका कभी भी।
आज मैं मानता हूं कि उस तरह का संदेह जहां भी हैजिस देश में है। जैसे रूस में नहीं हैपिछले पच्चीस साल में रूस की बुद्धिमत्ता ने कोई बहुमूल्य चीजें नहीं दीं। आश्चर्यजनक है कि उन्नीस सौ सत्रह के पहले रूस एक संदेह का युग थातो दोस्तोवस्की पैदा हुआउसी से लेनिन पैदा हुआ। रूस में बहुत अदभुत लोग पैदा हुए। उन्नीस सौ सत्रह के पहले रूस में कोई बीस ऐसे अदभुत आदमी हुएजो कि किसी भी कौम को हजारों साल के लिए गौरव दे दें। लेकिन उसके बाद नहीं हो सके। उसके बाद जड़ हो गएक्योंकि रूस के पास कंक्लूजन हो गयाउसके पास पक्का कंक्लूजन हो गया। उसको अब कोई सोचने की जरूरत न रही।
तो मैं यह कहता हूंयह जो मुल्क हैकोई दोत्तीन हजार साल से अंधेरे में जी रहा है। एथेंसया उन्नीस सौ सत्रह के पहले का रूस या बुद्ध के जमाने का बिहारऐसा इस मुल्क में नहीं हो पा रहा है। इतना काम भी पूरा हो जाए तो मेरा काम पूरा हो जाए।

आज के भारत में जो क्लाइमेक्स आ गई है--अगर यही स्थिति है और पंद्रह-बीस सात तक और चली गई तो ऐसा नहीं है कि...।

हांहो सकता हैइसलिए जल्दी करने की जरूरत है। इसलिए मुल्क जल्दी चिंतन करेइसकी चिंता करने की जरूरत है। और जो आप कहते हैंक्लाइमेक्स तक पहुंच गए हैंवह मैं मानता। क्योंकि क्लाइमेक्स पर पहुंच कर सदा क्रांति हो जाती है। हम क्लाइमेक्स पर नहीं पहुंच रहे हैं। बल्कि हम इतनी कमजोर कौम हैं कि छोटी सी गड़बड़ होती हैउसको हम क्लाइमेक्स नहीं हो गया हैक्लाइमेक्स तक पहुंच जाए तो सौभाग्य है हमारा। क्लाइमेक्स के बाद परिवर्तन है। सौ डिग्री पर पानी उबलने लगे तो भाप बनेगी हीलेकिन भाप बनती नहीं है और हम कहते हैं क्लाइमेक्स पर पहुंच गए हैं!

अभी आपने फरमाया कि उन्नीस सौ सत्रह तक रूस में संदेह का युग था और उसे कंक्लूजन मिल गयानिष्कर्ष पर आ गई वह कौमवह मुल्कतो अब उसे जड़ता आ गई विचारों में। तो आप यह कह सकेंगे कि रूस का जो निष्कर्ष है वह किसी स्वरूप में भारत के लिए लाभप्रद बन सकता है?

एक ही अर्थ में लाभप्रद बन सकता हैएक ही अर्थ में। और वह यह कि भारत में जो संदेह की हवा चाहिएउसमें वह सहयोगी हो सकता है। लेकिन कंक्लूजन की तरह लाफप्रद नहीं हो सकता। अगर भारत सोचता हो कि कम्युनिज्म हमारा निष्कर्ष बन जाए तो मूढ़ता होगी। एक ही अर्थ में उपयोगी हो सकता है कि हमारी जो चिंतन की हवा पैदा हो रही हैउसमें वह चिंतन का एक मुद्दा हो। हम उस पर भी सोचेंउसको भी हम कंक्लूजन की तरह पकड़ लें और ऐसा मुझे डर लग रहा है कि हम पकड़े ले रहे हैं। हम पकड़े ले रहे हैं।
एक तो चिंतन से पकड़ी गई बातें होती हैंजो चिंतन से निष्कर्ष की तरह निकलती हैं। और एक घबड़ाहट में पकड़ी गई बातें होती हैंजो कि कोई सहारा न मिलने से हम उसको पकड़ लेते हैं। भारत के साथ जो डर है वह यह है कि यह सदा का विश्वासी मुल्क है। यह बड़ा खतरा है। यह इतना बड़ा खतरा है कि अविश्वास तक में विश्वास कर सकता है। यह इतना विश्वासी मुल्क है कि अगर यह महावीर कोकृष्ण को छोड़ेगा तो माक्र्स कोस्टैलिन कोमाओ को पकड़ सकता हैउतने ही पागलपन से। इसका जो पकड़ने का ढंग है वह अंधा है। चिंतन का इसके पास ढंग नहीं है।
तो मैं मानता हूं कि कम्युनिज्म पर भी चिंतन होना चाहिए--चिंतनीय है। और इस समय सबसे ज्यादा चिंतनीय है। लेकिन मुझे डर ऐसा लग रहा है कि धीरे-धीरे हमारे मन में वह स्वीकृत होता जा रहा है। चिंतनीय हो रहा है। समाजवाद की जो हम बातें कर रहे हैंसाम्यवाद की जो हम बातें कर रहे हैंउसको हम इस तरह मान रहे हैं जैसे कि कोई तैयार कंक्लूजन हैजो कि हमने स्वीकार कर लिया तो सब हल हो जाएगा।
कोई चीज तैयार नहीं है। किसी एक मुल्क का अनुभव किसी दूसरे मुल्क के लिए रेडीमेड नहीं होता हैन हो सकता है। क्योंकि हर मुल्क में हालतें इतनी भिन्न हैंचित्त-दशा इतनी भिन्न हैंसोचने के ढंग इतने भिन्न हैं कि जो उसके लिए संभव थावह हमारे लिए संभव नहीं हो सकता है। जो रूस के लिए संभव थावह हमारे लिए संभव नहीं हो सकतातो चीन के लिए संभव है,वह हमारे लिए संभव नहीं हो सकतालेकिन विचारणीय है। तो हम चीन पर भी सोचेंहम रूस पर भी सोचें। न तो हम स्टैलिन पैदा कर सकते हैंन हम माओ पैदा कर सकते हैं। हम पैदा नहीं कर सकते। आखिर पैदा करने के लिए हमारी भूमि में वह क्षमता चाहिएजो हमारे पास नहीं है। हम और तरह के लोग पैदा कर सकते हैं। हम महावीर पैदा कर सकते हैंहम बुद्ध पैदा कर सकते हैं। वह हमें आसान है पैदा करना। लेकिन सारे जगत में जो हो रहा हैवह हमें सोचने जैसा है।
मेरी अपनी समझ यह है कि हमें सिर्फ कम्युनिज्म ही सोचने जैसा नहीं है। एक चीज जिसको हम बिलकुल नहीं सोच रहे हैं,हमें कैपिटलिज्म भी सोचने जैसा है। यानी हमारे लिए मास्को ही सोचने जैसा नहीं हैवाशिंगटन भी हमारे लिए बहुत सोचने जैसा है। जिसको हम सोच ही नहीं रहे और हमने एक भ्रांति समझ रखी है कि हम यह बात मान कर बैठ गए हैं कि हम पूंजीवादी हैंहम पूंजीवादी भी नहीं हैं अभी। समाजवादी होना तो बहुत दूर की बात हैहम अभी पूंजीवादी भी नहीं हैं।
अभी हम करीब-करीब सामंतवादी हैं। पूंजीवादी भी आज पूरे मुल्क को नहीं नहीं हो गया है संभव। न कोई नेशनेलाइजेशन हुआ हैन औद्योगीकरण हुआ हैन मुल्क के पास पूंजी हैन हमारे पास इतनी संपत्ति हैजिसको हम बांट सकें। क्योंकि हम बड़े चक्कर में पड़ सकते हैं। चक्कर में इसलिए पड़ सकते हैं कि हमारी हालत ऐसी है कि अगर आज हम इस भाषा में सोचने लगें कि साम्यवादसमाजवाद कैसे आए तो हम गलती में भी पड़ सकते हैं।
क्योंकि साम्यवाद या समाजवाद पूंजीवाद की एक क्लाइमेक्स के बाद की स्थिति है। पूंजीवाद जब परिपूर्ण हो जाएया पूंजीवाद इतनी पूंजी पैदा कर ले की बांटी जा सकेतब तो बंटवारे की बात अर्थ रखती है। अभी भारत की हालत ऐसी है कि अब हम बांटेंगे तो सिर्फ गरीबी बांटेंगे। अमीरी तो हमारे पास है ही नहींजिसको कि हम बांट लें। तो मेरी अपनी समझ यह है कि भारत न केवल मास्को को सोचेबल्कि वाशिंगटन को और भी ज्यादा सोचे।
और बड़े मजे की बात है कि मास्को आज निरंतर वाशिंगटन के करीब सरक रहा है। क्योंकि मास्को के पचास साल का अनुभव यह है कि रूस गरीब है। रूस अमीर नहीं हो सका। पचास साल की निरंतर मेहनत के बाद भी रूस अमीर मुल्क नहीं है। रूस आज भी गरीब हैऔर उसको यह भी समझ में आ रहा है कि अमेरिका ने पचास वर्ष में इतनी संपत्ति पैदा कर ली कि विचारणीय है कि मामला क्या हैरूस में रोज इंसेंटिव नीचे गिरा हैलोगों के प्रेरणा कम हुई हैकाम करने की।
ख्रुश्चेव ने सत्ता से जाने से पहले जो सबसे बड़ी चिंता प्रकट की थीवह यह थी कि उसका कोई युवक काम करने के लिए उत्सुक नहीं है। रूस में रोज उत्पादन नीचे गिर रहा है। अब यह हैरानी की बात है कि रूस पचास साल की समाजवादी व्यवस्था के बाद भी अपना गेहूं पैदा करने में समर्थ नहीं है। उसे पूंजीवादी मुल्कों से आज भी लेना पड़ रहा है।
तो रूस तो चिंतन कर रहा है रोज कि कुछ न कुछ गड़बड़ हो गई हैहमारा उत्पादन नीचे गिर रहा है और अमेरिका का उत्पादन रोज बढ़ रहा है कि वह आज सारी दुनिया के भूखे लोगों को खाना दे पा रहा है। संपत्ति भी रोज बढ़ती जा रही है। और बड़े मजे की बात यह है कि जिसको अमेरिका में गरीब कहते हैंवह जो आदमी अमेरिका में गरीब हैवह आदमी रूस में अमीर है। उसके पास कार है। यानी रूस के अमीर के पास कार नहीं है और अमेरिका के गरीब के पास भी कार है। यह हमें सोचना है सारी बातेंक्योंकि जब किसी मुल्क को निर्णय लेना हो तो उसे जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
मेरी अपनी समझ तो यह है कि हिंदुस्तान को पचास साल सुनियोजित पूंजीवाद की जरूरत हैप्लैंड कैपिटलिज्म की जरूरत है। हिंदुस्तान पचास साल में इतनी संपत्ति पैदा करने में संलग्न हो कि बांट सके। हिंदुस्तान के लिए समाजवाद की बात पचास साल बाद अर्थ की होगीऔर अभी आत्मघाती हैस्युसाइडल है। अभी हमने बात की कि हम मरे। और अगर हमने अभी समाजवाद पकड़ लियाजैसा कि हमें डर लग रहा है कि एक पकड़ लेंगेक्योंकि नीचे गरीब जनता का जो दबाव हैवह दबाव हमें समाजवाद पकड़वाने के लिए राजी कर रहा है।
समाजवाद पकड़ने के लिए हमारा चिंतन हमें राजी नहीं कर रहा हैनीचे की गरीब जनता का दबाव हमें राजी कर रहा है। यानी गरीब जनता की नीचे कीर् ईष्या हमसे कह रही है कि बांट डालोपूंजी को। नहीं बांटोगे तो हम तुम्हें हटाते हैं सत्ता से। तो सत्ता में जो बैठा हैवह गरीब क्या मांग कर रहा हैवह पूरा करने को उत्सुक है। उसको यह कोई खयाल नहीं है कि मुल्क की अर्थ व्यवस्था...यह संभव हो सकता है कि नहीं हो सकता है। यह आज संभव भी नहीं हो सकता। हिंदुस्तान में मुश्किल से बीस हजार परिवार हैं जिनको समृद्ध कहा जा सके। साठ करोड़ के मुल्क में बीस हजार परिवार समृद्ध हों तोबीस हजार परिवार और गरीब होंगेऔर कुछ भी होने वाला नहीं है। कोई अंतर ही नहीं पड़ने वाला है। अभी हिंदुस्तान ने पूंजी ही पैदा नहीं की।
इसलिए मेरी अपनी समझ यह है कि हिंदुस्तान को तो अभी मास्को पर भी सोचना चाहिएजो वहां हुआ हैपचास सालों में। जो दस सालों में चीन में हुआ हैउसे भी सोचना चाहिएऔर जो पचास सालों में वाशिंगटन में हुआ हैअमेरिका में हुआ है,उसे भी बहुत गौर से सोच लेना चाहिए। और इस सबको सोच कर निर्णय लेना चाहिए। निर्णय नीचे के दबाव से नहीं लेने चाहिएनिर्णय भविष्य की दिशा से लेने चाहिए। यानी यह हो सकता है कि एक भूखा आदमी आज ज्यादा खा जाए और निर्णय ले ले कि चूंकि मैं भूखा हूंइसलिए ज्यादा खाने का हकदार हूं। लेकिन ज्यादा खाने से मर जाए और भूख से चाहे न मरता।
मुझे कोई बता रहे थे कि अभी कोई संत आए और उन्होंने कहा कि गायों को लड्डू खिला दें। डोगरे महाराज ने कहा कि गायों को लड्डू खिला दो और बड़ी प्रशंसा पा रहे हैं। और उन लड्डुओं से गायों को क्या मतलब हैहांमहाराज लोग लड्डू खाते हैं,तो वह सोचेंउनकी गाय को खिला देने चाहिए। और चूंकि गायजो अकाल पीड़ित जगह से आई हैवह ज्यादा खा जाएगी। और उसे कुछ पता नहीं है। वह मर जाएगी खाकरभूखी दो-चार दिन जिंदा भी रह जाती। लेकिन ज्यादा खाकर मर जाएगी। गाय के संबंध में समझदारी बरतने की जरूरत है।
भूखे आदमी को कैसा देनाइसकी फिक्र करनी चाहिए। भूखे का खयाल नहीं करना चाहिए कि भूखा क्या मांगता है! इस समय सबसे बड़ा सवाल है मुल्क का कि नीचे गरीब क्या मांगता है! ऊपर की लीडरशिप उसको पूरा करने को उतारू है। क्योंक्योंकि नहीं तो नीचे का आदमी कहता है कि लीडरशिप से नीचे उतरोनेतृत्व से नीचे हटो। हम उसको नेता बनाएंगे जो हमारी बात पूरी करता है।
इसलिए नेता इस वक्त अनुयायियों का अनुयायी हो गया है। वह नीचे का आदमी जो कह रहा हैउसको पूरा करने को हर हालत में तैयार है। अब उसको कोई फिक्र नहीं कि इसका फल क्या होगापरिणाम क्या होगा! मेरी अपनी समझ यह है कि अगर हिंदुस्तान समाजवाद का कदम उठाता हैतो हिंदुस्तान अपने इतिहास का सबसे दुभार्ग्यपूर्ण कदम उठाएगा अभी। पचास साल बाद यह सार्थक बात हो सकती है। पचास साल हम पहले नेशनेलाइज कर दें मुल्क कोऔद्योगीकृत कर लेंसारे मुल्क को कृषि व्यवस्था से मुक्त करके उद्योग व्यवस्था पर ले जाएं। संपत्ति इतनी पैदा हो जाए कि बांटी जा सकेतब तो समाजवाद अर्थ रखता हैनहीं तो अर्थ नहीं रखता है। इसलिए मैंने कहना शुरू किया है सोशलिज्मवाया वाशिंगटन।
मैं मानता हूं कि हिंदुस्तान में समाजवाद आएगाआना चाहिएलेकिन वह आएगा वाया वाशिंगटन। वह वाया मास्को नहीं आ सकता।

क्या आप इस बात से सहमत होंगे कि सक्रिय राजनीति में आपका प्रयोग देश के लिए लाभप्रद साबित हो सकता है।

नहींअभी नहीं हो सकता है। क्योंकि मेरी समझ यह है कि सक्रिय राजनीति में प्रवेश की जो शर्तें हैं--सक्रिय राजनीति में प्रवेश की जो शर्तें हैंअगर मुझे सक्रिय राजनीति में प्रवेश होना हैतो मुझे भी नीचे के आदमी की बात की फिक्र ज्यादा करनी पड़ेगी,बजाय बाद की फिक्र करने की। हांक्योंकि सक्रिय राजनीति की तो शर्तें हैं न! इसलिए मुझे तो निष्क्रिय राजनीति में ही रहना होगाताकि मैं वह कह सकूं जो मुझे कहना हैमुझ पर कोई दबाव न होमुझ पर किसी पद काकोई सत्ता काकुछ भी दबाव न हो। मैं अकेला आदमी रहूं तो भी कह सकूंपचास करोड़ मेरे खिलाफ हों तो भी कह सकूं।
तो मुझे अगर वही कहना हैजो मुझे ठीक लगता हैतो मुझे सारी तरह की सक्रियता से बाहर रहना पड़ेगा। मेरा मतलब आप समझ रहे हैं नहांलेकिन जो लोग सक्रिय हैंवे मेरी बात सुन सकते हैं और मेरी बात के ढंग से सक्रिय हो सकते हैं। जो लोग निष्क्रिय हैंवे मेरी बात सुन सकते हैं और मेरे ढंग से सक्रिय हो सकते हैं।
लेकिन मेरा काम तो इस वक्त तो उस आदमी की तरह हैकि मकान में आग लग गई हैतो बजाय इसके कि वह जाकर कुएं से एक बाल्टी भर कर लाएक्योंकि एक बाल्टी से कुछ होने वाला नहीं हैज्यादा बेहतर है कि वह गांव में चिल्ला कर पूरे गांव को जगा दे। और उनसे कहे कि तुम कुएं से बाल्टी भर कर पानी से मकान को बुझा दो। हालांकि हो सकता हैजिसको मैं लगाना चाहूंवह मुझसे कहे कि आप क्यों नहीं पानी भर कर कुएं सेमकान को बुझातेमैं कहूंगामैं जा सकता हूंकिंतु एक बालटी ले जा सकूंगा। मुझे तो यह ज्यादा उपयोगी लग रहा है कि मैं पूरे गांव को जगा दूं। अभी बालटी ले जाने की उत्सुकता मेरी नहीं हैक्योंकि वह काम कोई और भी कर लेगा। गांव को जगाने का खयाल मेरे खयाल में है।
तो इसलिए मैं किसी सक्रिय राजनीति में उपयोगी नहीं हो सकता हूं। उसमें न कोई मेरा अर्थ है। मेरा अर्थ हो सकता है इस देश को एक चिंतना देने काऔर जिसको भी चिंतना देनी होउसे सक्रियता के बाहर होना चाहिएक्योंकि सक्रियता की अपनी शर्तें हैंजो चिंतन में बाधा डालती हैं। तो मेरी समझ यह है कि मुल्क के पास एक पोलिटिकल फिलासफी भी हो। मुल्क के पास अभी कोई राजनीति दर्शन भी नहीं है।
आप ध्यान रखेंकि माक्र्स नेजिसने कि कम्युनिज्म दियावह बिलकुल ही निष्क्रिय व्यक्ति है। जिसने कम्युनिज्म दिया सारी दुनिया को और आधी दुनिया आज कम्युनिस्ट हैऔर पूरी दुनिया भी हो जाएगी और हो सकता हैवह आदमी एक लाइब्रेरी में बैठ कर ही काम करता रहा। उसने और कोई काम नहीं किया। वह इलेक्शन भी लड़ सकता थावह कम्युनिज्म लाने की कोशिश भी कर सकता थालेकिन बहुत बड़ा नुकसान होता दुनिया का। दुनिया को कम्युनिज्म कभी मिलता ही नहीं। वह आदमी तो दस-दसबारह-बारहअट्ठारह-अट्ठारह घंटे ब्रिटिश म्यूजियम की लाइब्रेरी में बैठ कर ही काम करता रहा। वह तो एक विचार दे गया। उस विचार की सक्रियता फैलती चली गई।
तो मेरा काम एक विचार की भूमिका खड़ी कर देने का है। उससे ज्यादा मेरी उत्सुकता नहीं है। मैं मानता हूं उससे जो उत्सुक होंगेजो सक्रिय हो सकेंगे वे हो जाएंगे। लेकिन उसका भी मुझे कोई हिसाब नहीं है कि कोई सक्रिय होन हो। इतना मेरे खयाल में है कि मुल्क अगर गङ्ढे में गिरे तो जानते हुए गिरे कि गङ्ढे में गिर रहा है। और गङ्ढे में गिरे तो उसे अनुभव हो कि बात कही गई थी और गङ्ढे में हम गिर गए। यानी ऐसा न हो कि कल यह कहने को हो कि कोई कहने वाला भी नहीं था कि गङ्ढे में हम गिर रहे थे और किसी ने कहा भी नहीं और आवाज भी नहीं दी कि गङ्ढे में गिर रहे हो। वह काम मुझे करने जैसे लगता हैवह मैं कर रहा हूं। सक्रिय राजनीति में मेरा कोई उपयोग नहीं हो सकता।

आज की फिलासफी में छोटे से छोटे आदमी का भी महत्व हैक्योंकि वह अज्ञान में है। तो पचास करोड़ आदमियों को एजुकेट करने का काम तो बहुत महत्वपूर्ण है। इसके लिए तो काम करना ही पड़ेगा। एक आदमी कैसे कर सकता है?

एजुकेट करने का काम बहुत कठिन हैलेकिन मिस-एजुकेट करने से कम कठिन है। तो जब मिस-एजुकेट कर सकते हैं लोग तो एजुकेट भी किया जा सकता है। इसलिए मेरा कहना यह है कि गाइड करना बहुत कठिन है। लेकिन मिस-गाइड करना जब आसान पड़ रहा हैतो गाइड भी किया जा सकता है। और अभी भी मेरी समझ है कि आज मुल्क को कोई भी आदमी गाइड कर रहा हैवह कहीं भी ले जा रहा हैकहीं भी मुल्क जा रहा है। बल्कि अब पक्का ही नहीं है कि कोई गाइड कर रहा है कि नहीं कर रहा है। यह भी पक्का नहीं है कि वह जो आगे दिखाई पड़ रहा हैवह आगे किस वजह से है। मैं एक कहानी कहता रहता हूं।
एक स्कूल में बच्चों का एक्जीबीशन हो रहा हैबच्चों का एक प्रदर्शन हो रहा है। बच्चों ने जो परेड की हैवह ऊंचाई के हिसाब से बच्चे खड़े किए गए हैं। छोटा बच्चा आगे हैउससे बड़ा पीछे हैउससे बड़ा पीछे है। ऐसी दस कतारें हैंलेकिन एक कतार में बड़ा बच्चा आगे हैउसके बाद छोटा बच्चा और फिर बड़े। तो ऐसा लगता है कि कुछ भूल हो गई है। तो प्रिंसिपल से एक आदमी पूछता हैजो देखने आया है कि महानुभावयह क्या मामला हैयह लड़का आगे क्यों हैक्या यह सबका नेता है?उसने कहायह बात नहीं है। इसको आगे रखना पड़ता हैक्योंकि इसको किसी के पीछे नहीं रखा जा सकता है। बात क्या है?पीछे से च्यूंटी निकालना है किसी की भी। इसको पीछे रखा ही नहीं जा सकता। आगे रखना पड़ता है। तो इसको आगे इतना रखा हुआ है कि इसके आगे कोई न हो। यह कोई लीडर नहीं हैमगर इसका कोई उपाय नहीं है। इसको आगे ही रखना पड़ता है, इसको पीछे रखने में तकलीफ देता हैकिसी को भी तकलीफ देता है।
मुल्क में हालत करीब-करीब ऐसी हो गई है कि जो लीडरशिप हैवह करीब-करीब उस तरह के लोगों की है जो पीछे रहेंगे तो तकलीफ देंगे। इसलिए उनको आगे रखना जरूरी है। उनको आगे कर दोलेकिन नुकसान हो रहा हैनुकसान होगा हीक्योंकि जिसको नेतृत्व कहेंवह नहीं है। और इतना बड़ा मुल्क है और इस बड़े मुल्क में आपका कहना ठीक है कि एक आदमी कैसे एजुकेट करेयह बात बिलकुल ही ठीक है कि एक आदमी कैसे एजुकेट करेगामगर एक आदमी यह कर सकता है।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

पता चला कर भी क्या हो गया है तुम्हेंयानी मजा यह है कि पता चला कर क्या हो गया हैसबको पता है कि क्या बुरा है और क्या अच्छा हैहो क्या गया है इससेबुरा मिट गया हैअच्छा आ गया हैकुछ भी तो नहीं हो गया है। पता चला कर हो गया होतातो मेरे पास आने की जरूरत नहीं थी। हम थोपे हुए हैंहम थोपे हुए हैं।

एक आदमी की पत्नी है और वह यदि दूसरे की पत्नी की ओर जाता है तो यह तो व्यभिचार हो गया?

क्यों हो गया व्यभिचारएक औरत के सात चक्कर तुमने लगवा लिए तो व्यभिचार नहीं हुआ। जिसके नहीं लगाए सात चक्कर,उससे व्यभिचार हो गया। तो व्यभिचार का मतलब इतना ही हुआ कि जिसके साथ सात चक्कर लगाया हो उसके साथ व्यभिचार नहीं होताजिसके साथ सात चक्कर न लगाए होंउसके साथ व्यभिचार हो जाएगा। तो व्यभिचार बड़ा बचकाना हो गया। तुम्हारी तकलीफ जो है नतुम्हारी तथ्य को जानने की तकलीफ नहीं है। तुम्हारी तकलीफ आदर्श को पाने की हैव्यभिचार से कैसे बचेंमैं यह कह रहा हूंव्यभिचार को जानोगे भी कि कहां हैनहींव्यभिचार दूसरे की पत्नी को प्रेम करने में उतना नहीं हैजितना अपनी पत्नी को प्रेम न कर पाने में है। व्यभिचारअगर खोजोगे तो यह मिलेगा। मैं अपनी पत्नी को प्रेम नहीं करताऐसे भी कोई अपनी पत्नी को प्रेम नहीं करता। वह तो सेकेंडरी है सदा। लेकिन हमारा समाज अदभुत है। वह कहता है,दूसरे की पत्नी की तरफ देखना व्यभिचार हैऔर अपनी पत्नी की तरफ बिलकुल मत देखोयह व्यभिचार नहीं है। वह कहता हैदूसरे की पत्नी की तरफ देखना व्यभिचार हैऔर अपनी पत्नी की तरफ बिलकुल मत देखोयह व्यभिचार नहीं है। लेकिन यही मूलतः व्यभिचार हैवह दूसरा इसके बाद पैदा होगा।
अगर मैं अपनी पत्नी की तरफ न देख पाऊंतो फिर दूसरे की पत्नी की तरफ देखना ही पड़ेगा। आखिर पुरुष तो पत्नी की तरफस्त्री की तरफ देखेगा। तो वह जो देख रहा हैवह आएगा। अच्छामगर समाज कहेगादूसरे की तरफ देखना व्यभिचार है। पत्नी की तरफ बिलकुल मत देखोतीस साल बैठे रहोपीठ किए उसकी तरफचालीस सालवह व्यभिचार नहीं है। अगर कुछ भी व्यभिचार हैतो यह प्रेम की कमी व्यभिचार है। अगर कुछ भी व्यभिचार है। जिस स्त्री को तुमने प्रेम नहीं किया है,उसके साथ तुम सो रहे होतो मैं नहीं समझता कि व्यभिचार कैसे नहीं है।
व्यभिचार को तुम्हें खोजने जाना पड़ेगा। मैं यह कह रहा हूंतुम इसको मन मत लेना। यह तो मैं तुमसे इसलिए कह रहा हूं कि तुम्हें खोजना पड़ेगा कि व्यभिचार क्या है। मैं नहीं कह रहा कि ऐसा मान लेनामैं तो सिर्फ खोज के लिए धक्के देने की कोशिश करता हूं कि थोड़ा धक्का तुमको दे दूंतो शायद तुम अपनी जगह से हिल जाओ और थोड़े यहां से चल कर देख लो। हम पहले से इसे मान कर बैठे हुए हैं। अब हम कितने ही व्यभिचार कर रहे होंदिखाई नहीं पड़ते। क्योंकि जिस समाज ने हमको बताया है कि व्यभिचार क्या है। एक स्त्री से कभी तुमने प्रेम नहीं किया थाउससे तुमने विवाह कर लियायह व्यभिचार नहीं हैजिस स्त्री को तुमने कभी प्रेम नहीं कियाउससे विवाह व्यभिचार नहीं है?
जिस स्त्री को तुमने कभी देखा नहीं थादो पंडितों ने मिल कर जन्मपत्री मिला दी थीउससे तुम्हारा विवाह हो गया और तुम चालीस साल उसके साथ रहोगेयह व्यभिचार नहीं हैइसमें पंडित भी भागीदारतुम्हारे बाप भी भागीदारतुम्हारी मां भी,तुम्हारी पूरी सोसायटी भी। जिस स्त्री को प्रेम नहीं कियाउस स्त्री के साथ तुम्हारा संबंध वेश्या से ज्यादा कैसे हो सकता है?चाहे तुम उसको पत्नी कहो। इतना ही हुआ हैसर्टिफाइड वेश्या हुई। सोसायटी ने मान रखा हैइसको स्थायी। एक वेश्या के पास तुम रात में जाते होचार रुपये फेंक कर आ जाते हो। इस स्त्री के सामने तुमने जिंदगी भर का खानाकपड़ारोटी फेंक दिया हैयह जिंदगी भर की स्थायी वेश्या हैपरमानेंट वेश्या हैऔर क्या होगा इससे ज्यादा मतलबहांफर्क इतना ही है,सोसाइटी ने बैंडबाजा बजा करमंत्र इत्यादि फूंक कर कह दिया कि यह सर्टिफाइड हैयह पवित्र वेश्या है। इसको हमने सबने मान लिया है कि इसमें कोई पाप नहीं है।
व्यभिचार क्या हैअब इस व्यभिचार से हजार व्यभिचार पैदा होंगेक्योंकि मौलिक व्यभिचार हो गया। मेरी दृष्टि में जिस विवाह में प्रेम नहीं हैवह मौलिक व्यभिचार है। इसलिए जिस समाज में बिना प्रेम के विवाह हो रहा हैवह समाज व्यभिचार होगा। वह बच नहीं सकता। वह इधर वेश्या भी खड़ी करेगाइधर दूसरे की पत्नी से भी प्रेम करेगाउधर वह करेगायह सब फैलेगा। और फिर वह समाज इस सबको कहेगा कि यह व्यभिचार हैऔर इसका जो ओरिजिनल सोर्स है तो उसको वह कहेगा,वह तो विवाह है। विवाह तो भगवान की साक्षी में हुआ हैबड़ा पवित्र है।
मैं नहीं कहता कि मैं जैसा कहता हूंवैसा मान लेना। मैं सिर्फ इसलिए कह रहा हूं कि ऐसा खोजने जाओजल्दी में तय मत कर लो कि क्या व्यभिचार है। खोजने जाओउस खोज से तुम्हें जिस दिन तथ्यों का दर्शन होगाउस दिन बदलाहट होगी। न होगी बदलाहट तो समझना कि दर्शन न हुआ। न हो दर्शन तो समझना कि तुम दर्शन की शर्तें पूरी नहीं कर रहे हो। और पहली शर्त हैतटस्थता। पहली शर्त है कि पहले से तय मत कर लेना कि यह बुरा हैयह अच्छा है। तुमने पहले ही तय कर लिया तो अब क्या खोजना होगाअब खोजने को क्या बचता हैअब खोजने को कुछ भी नहीं बचता।
मेरे पास तुम आए और तुम तय करके आए कि यह आदमी संत हैअब मुझसे समझने को क्या बचता हैतुम तय करके आए कि यह आदमी शैतान हैअब दूसरा समझने को क्या बचता हैतुम तो समझ कर ही आए होऔर तुम जो समझ कर आए होतुम उसमें थोड़ा सा और एडीशन करके लौट जाओगे। अगर तुम संत मान कर आए हो तो और थोड़ा सा जोड़ कर लो उसमें कि हां भाईहै संत जरूर। क्योंकि तुम वही देख लोगेजो संत की मान्यता वाला देख सकता है। उसमें मेरा कोई कसूर नहीं है। तुम और मुझे बड़ा संत मान कर लौट जाओगे। अगर शैतान समझ कर आए हो तुमतो मुझे और थोड़ा शैतान बना कर लौट जाओगे। और हो सकता हैदो आदमी साथ ही मेरे पास आएं और मैं एक के लिए बड़ा संत होकर लौटूंऔर एक के लिए बड़ा शैतान बन जाऊं। वह अपनी बात नहीं है। और मेरा कुछ लेना-देना नहीं हैक्योंकि मैं जो हूंहूं। उसमें संत और शैतान का हिसाब तुम्हारा है। अब वह तुम अपना हिसाब लगा रहे हो। तुम पहले से तय करके चले आ रहे हो।
नहींएक ओपन माइंड चाहिएजिंदगी को समझने के लिएजहां हमने कुछ भी तय नहीं किया। और अगर आज तुम मेरे पास आओ तो निश्चित हीअगर घंटे भर मेरे पास रहोगे तो कुछ न कुछ तय करोगे। लेकिन थोड़ा सोचना कि एक आदमी को सत्तर साल जीना हैउसकी जिंदगी में हमने एक घंटे झांकाएक घंटा झांक कर क्या हम तय कर सकते हैंयह ऐसा ही है जैसे हजार पृष्ठ की एक किताब है और हमने आधा पन्ना फाड़ कर पढ़ लियाऔर हमने पूरी किताब के बाबत तय कर लिया। पता नहींसब गड़बड़ हो जाए। इस आधे पन्ने में जो हैउससे कुछ पक्का नहीं होता कि आगे-पीछे क्या होगाकुछ भी पक्का नहीं होता है। हम किसी आदमी को कभी पूरा नहीं जानते हैंकिसी तथ्य को कभी पूरा नहीं जानते हैं।

आपने अपने लेक्चर में पहले बताया है कि गांधी कहते हैं कि आत्मा कुछ नहीं करती। जो करता हैवह कोई और करता है। और जैसा अच्छा और बुराकुछ भी कर्म करते हैंउसकी वजह से उनको भला या बुरा नतीजा कुछ मिलता है।
यह सब मैंने नहीं कहाकब सुन लेते होपता नहीं!

यह जो भाव...गलत था उसका कहनाउसका कहना गलत हैतो आज आप कहते हैंआत्मा अकर्म है?

हांबिलकुल कहता हूं--बिलकुल कहता हूं।

तो कंफ्यूजन हो गया है।

हांकंफ्यूजन तो करता हूंपूरी तरह। वही हमारा काम है। असल कठिनाई क्या होती है कि हमारी सोचने की जो आदतें हैंवह जिंदगी के साथ बहुत दर्ुव्यवहार करने की हैं। दर्ुव्यवहार करने का मतलब यह है कि हम जिंदगी के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं कि जैसे जिंदगी कोई बंधी हुई पटरियों पर चलती है। तो हम कहते हैंयह आपने कहा गलत और यह आपने कहा सही। मैं यह कह रहा हूंएक स्थिति में वह बात गलत हो सकती हैएक स्थिति में सही। स्थिति को बिना देखे जल्दी से निर्णय मत लेना।
समझ लेंअगर मेरे पास एक पापी आएतो मैं तो उससे कहूंगा कि हांआत्मा पाप करती हैक्योंकि पापी के पास पाप से ऊपर कोई आत्मा ही नहीं होती है। पापी के पास पाप के अतिरिक्त कोई आत्मा ही नहीं होतीउसको और कुछ पता नहीं होता है--पाप ही उसकी आत्मा है। उससे तो में कहूंगाआत्मा पाप करती है। अगर पापी से मैंने यह कहा कि आत्मा तो कुछ करती ही नहींआत्मा तो शुद्ध-बुद्ध हैतो पापी बड़ा प्रसन्न होगा। वह कहेगाफिर हमने कभी कुछ नहीं किया। तो फिर जो हम कर रहे हैंवह जारी रह सकता हैक्योंकि हमने तो कभी किया ही नहीं। उससे हमारा कोई संबंध ही नहीं। नहींपापी से मैं यह नहीं कहूंगा। पापी से मैं यह नहीं कहूंगा--पापी से तो मैं यही कहूंगा कि यह तुम कर रहे हो।
और मजे की बात यह है कि जब पापी यह समझेगा कि यह मैं कर रहा हूं और इसका दंशपाप काउसके पूरे प्राणों को घेर लेगासब तरफ से छिद जाएंगेसुई की तरह उसके पाप उसकोऔर मुश्किल हो जाएगा करनाऔर न करने की वजह से सारा पाप गिर जाएगा। उस दिन वह जान पाएगाआत्मा क्या हैउस आत्मा को जो कभी कुछ नहीं करतीउसी दिन जान पाएगा।
तो मैं किससे कह रहा हूंयह सदा ध्यान में रखने की बात हैकब कह रहा हूंयह भी ध्यान में रखने की बात है। अकर्म जो हैवह अंतिम बात है। अकर्म जो हैवह अंतिम अनुभूति है। यह पहले में तुमसे कहूंगा कि तुम हिंसा कर रहो हो। न केवल यह कहूंगा कि हिंसा कर रहे होबल्कि कहूंगा तुम हिंसा हो। मैं तुमसे नहीं कहूंगा कि तुम ब्रह्म हो। यह जानते हुए कि तुम ब्रह्म होमैं तुमसे नहीं कहूंगा कि तुम ब्रह्म हो। मैं तो तुमसे कहूंगा कि तुम हिंसा हो। इसलिए कहूंगा कि अगर यह तथ्य तुम्हें पूरी तरह दिखाई पड़ जाएतो छलांग लग जाए। तुम हिंसा के बाहर हो जाओगेउससे तुम जान लोगे कि तुम ब्रह्म हो। मैं तो तुमसे कहूंगा कि तुम हिंसा हो। इसलिए कहूंगा कि अगर यह तथ्य तुम्हें पूरी तरह दिखाई पड़ जाएतो छलांग लग जाए। तुम हिंसा के बाहर हो जाओगेउससे तुम जान लोगे कि तुम ब्रह्म हो। यानी मेरा कहना यह है कि आदमी का ब्रह्म होना या शूद्र होनाया सत्य होनाउसके मानने की बात नहीं है। उसके मानने की बात नहीं है। इस छलांग के बाद का अनुभव है। इस अनुभव को अगर तुमने नीचे दोहरायाउस तल पर जहां सारा वर्ग इकट्ठा हुआ हैवे वहां बड़े मजे से जी रहे हैं।
हिंदुस्तान मेंन केवल हिंदुस्तान में वरन सारी पृथ्वी पर हम सबसे ज्यादा अनैतिक हैं। कोई पूछता नहीं कि इसके बुनियादी कारण क्या हैंइसके इतने अनैतिक होने के! जहां इतने हजारों साल से धर्म की चर्चा होती होजहां ब्रह्म-ज्ञान के नीचे बात न उतरती होजहां नीति पर इतना मंथन हुआ होवहां अनैतिकता इतने बड़े विस्फोट की तरह क्यों प्रकट होती हैउसका कारण है कि हिंदुस्तान दो तल पर जी रहा है।
हिंदुस्तान ने एक तल पर परम बातें कह दींऔर परम बातों की वजह से नीचे का तल बिलकुल व्यर्थ हो गया। उस व्यर्थ के तल पर उसको कोई चिंता ही नहीं। यानी जब उसे आत्मा की बात करनी हैतब वह कहता हैआत्मा शुद्ध-बुद्ध हैअजर-अमरउस पर कभी कर्म का लेप नहीं चढ़ता है। उस पर कर्म कभी लगता ही नहींउसको कर्म कभी छूता ही नहीं। इधर वह यह बात कर लेगा। और तब वह मुक्त हो गया हैवह नीचे कुछ भी करे--चोरी करेव्यभिचार करेभ्रष्टाचार करेरिश्वत लेदे--यह सब नाटक हैयह सब लीला है! वह कहेगा यह खेल चल रहा हैइसमें कुछ मामला नहीं है। असली बात तो वहां हैवहां तो कुछ होता ही नहीं कभी।
हमने इस तरह का एक अदभुत समझौता किया है। पहली दफा जब उपनिषदों का अनुवाद हुआ जर्मनी मेंतो जर्मनी में अनुवाद के बाद जो सबसे बड़ा सवाल उठावह यह उठा कि इन उपनिषदों में नीति की कोई चर्चा नहीं है। तुम ब्रह्म होतुम यह हो,तुम वह होऔर तो कोई बात नहीं है! वह परम निष्पत्तियां हैं। उनको हैरानी हुई कि ऐसी किताब को मानने वाली कौम अनैतिक हो सकती है। चूंकि यह किताब जो हैयह परम अनुभव की तो बात कहती हैलेकिन परम अनुभव तो उसका हैजिसको हुआ है। और सुनने वाले का तो नहीं है। उसका तो कोई अनुभव नहीं है। यह ऐसा ही हैजैसे कि एक बीमार आदमी हमारे पास आए और हम उससे कहें कि आत्मा तो सदा स्वस्थ है। सब बीमारों को हम समझा दें कि आत्मा सदा स्वस्थ है। अस्पताल बंद कर दिए जाएंक्योंकि आत्मा सदा स्वस्थ है। और यह बात सच है कि आत्मा कभी बीमार नहीं पड़ती। लेकिन आत्मा के लिए अस्पताल भी कौन बना रहा हैअस्पताल तो हम शरीर के लिए बना रहे हैंजो बीमार पड़ता है। समझे न!
तो जो हमारी नैतिकता का चिंतन हैवह मन के लिए हो रहा हैऔर बड़े मजे की बात है कि वह जो स्वस्थ आत्मा हैउसे भी बीमार शरीर वाला नहीं जान सकता है। क्योंकि बीमार शरीर वाला बीमारी में इतना उलझ जाता है कि नजर की उसके पीछे नहीं जाती। स्वस्थ शरीर जरूरी हैताकि तुम भीतर जा सको। बीमार आदमी बाहर अटक जाता है। अगर तुम्हारे पैर में एक कांटा गड़ा है तो तुम्हें ब्रह्मआत्मा की किसी की याद न आएगीकांटे की याद आती रहेगी। छोटा सा कांटाब्रह्म वगैरह को नदारद कर देगा एकदम। एक छोटा सा कांटा पैदा में गड़ा हैफिर न उपनिषद बचान ब्रह्म बचान कुछ बचान वेदांत रहाकांटा रह गया। अब तुमको कांटा चुभ रहा है।
जीसस के जीवन में एक उल्लेख है कि जिस दिन जीसस को सूली हुईउस रात एक आदमी का दांत दुखता रहा। तो रात उसकी पत्नी उसे दो-चार बार कहती है आज नींद नहीं आ रहीकल सुबह जीसस को सूली लग जाएगी। वह कहता हैनींद तो मुझे भी नहीं आ रही हैमेरे दांत में बहुत दर्द है। बार-बार यह बात चलती हैलेकिन वह कभी जीसस का नाम नहीं लेता है,वह कहता हैबहुत तकलीफ है मेरे दांत में। करवट बदलता हैदवा लगाता हैलेकिन दांत का दर्द नहीं जाता। सुबह से लोग आते हैंवे बाहर से निकलते हैं और कहते हैंसुना तुमनेजीसस को सूली होने वाली है। वह कहता हैरात भर नींद नहीं आई,दांत में बहुत दर्द हैबहुत! फिर जीसस को सूली हुईजीसस का जुलूस भी निकल जाता हैफिर भी वह अपने दांत के दर्द की बातें करते चला जाता है।
जिसके दांत में दर्द होउसको जीसस की सूली कैसे याद आएदांत की तकलीफ इतनी बड़ी है कि कहां जीसस और कहां क्या?अभी कांटा गड़ जाए तो आत्मा एकदम तिरोहित हो जाती है। कठिनाई जो हैअगर कोई कौम यह समझ ले कि आत्मा सदा स्वस्थ है। और एक आत्मा बीमार भी कैसे पड़े। बीमार भी पड़ना चाहेतो बीमार कैसे पड़े। आत्मा सदा स्वस्थ है। फिर वह कौम मेडिसिन विकसित नहीं कर पाएगीक्योंकि मेडिसिन विकसित तो तभी की जाती है जब हम स्वीकार कर लें कि बीमारी है। तब तो विकसित करते। नहीं तो नहीं करते।
यह जो कठिनाई है--हमारी कठिनाई यह है कि जो परम निष्पत्तियां हैंजो कंक्लूजंस हैंजो अनुभूति के आखिरी छोर हैंउनको हमने शिक्षा का पहला कदम बनाया हुआ है। वह सब गड़बड़ हो जाएगा। कंफ्यूजन तुम्हें ही नहीं हैकंफ्यूजन तो सारे मुल्क में है। और कंफ्यूजन इतना स्थायी हो गया है कि अब किसी को चाहिए कि इसको उखाड़ने के लिएसब को कंफ्यूज्ड कर देएक दफा पूरी तरह सेनहीं तो यह कंफ्यूजन टूटने वाला नहीं है। नहीं तो यह टूटने वाला नहीं हैक्योंकि यह बिलकुल मजबूत हो गया है।
हम पूरे वक्त दो तल पर जी रहे हैंऔर वह जो तलजिसकी हम बातें कर रहे हैंवह हमने कभी जाना नहीं हैऔर जिसको हमने जाना हैउसको इनकार किए चले जा रहे हैं। इनकार करने की वजह सेउसको सुधार भी नहीं पाते हैं।
जिस बोकोजू की मैं बात किया हूंउसका गुरु मर गया। गुरु से भी ज्यादा प्रसिद्ध थाउसका यह शिष्य बोकोजू। लाखों लोग आए इसकी वजह से इसकी प्रसिद्धि थी। लाखों लोग आए और बोकोजू दरवाजे के सामने छाती पीट कर रो रहा है। तो लोगों ने उसको कहाजो निकट के डिसाइपल्स थेउनको बड़ी फिक्र होती है। उनको भारी फिक्र होती है कि कहीं गुरु की बदनामी न हो जाएकि यह न हो जाएकि वह न हो जाए। वे गुरु की रक्षा करते रहते हैं। वे सब इकट्ठे हुए हैं। उन्होंने कहारोओ मत तुम,अभी लाखों लोग आ रहे हैं। अगर उन्होंने देख लिया कि बोकोजू रोता हैतो वे कहेंगे कि कैसा ब्रह्म-ज्ञानी हैतो उसने कहा,ऐसे ब्रह्म-ज्ञानी को मैं लात मारता हूंजिसमें रो भी न सकूं। ऐसे ब्रह्म-ज्ञान से मुझे क्षमा कर दो। अब मुझे रोना आ रहा है तो मैं तो रोऊंगा।
उन्होंने कहालेकिन यह तो बड़ा मुश्किल हो जाएगा। लोग तो आपको समझते हैं कि यह परम-ज्ञान को उपलब्ध हो गया है। लोग क्या कहेंगेउसने कहालोग क्या कहेंगे अगर इसकी भी फिक्र परम-ज्ञानी को हैतो अज्ञानी कौन हैलोग क्या कहेंगे,इसकी फिक्र में करूंलोग जो कहेंगेसो कहेंगे। इससे मुझे क्या लेना-देना हैउन्होंने कहातुम जल्दी चुप हो जाओ। तुम तो कहते थेआत्मा अमर हैतुम रो रहे होउसने कहामैं आत्मा के लिए रो कहां रहा हूंजो अमर हैउसके लिए रोने से फायदा क्या हैलेकिन वह शरीर भी बहुत प्यारा था और वह शरीर अब इस जगत में दुबारा नहीं आ सकता। मैं उसी के लिए रो रहा हूं।
तो उन्होंने कहाशरीर के लिएमगर हम तो समझते हैं कि तुम आत्मवादी हो। उसने कहामैं आत्मवादी हूंइसीलिए तो शरीर के लिए भी रो सकता हूं। क्योंकि मैं समझता हूं कि शरीर सीढ़ी बनाता हैशरीर मंदिर बनाता हैउसमें निवास हुआ थाउसमें यह आत्मा इतने दिन तक रही थीऔर यह अदभुत आत्मा जिस शरीर में रही थीअभी हम उसको मिट्टी में मिलाएंगेफिर आग में जलाएंगे। एक मंदिर गिरने के करीब हैजिसमें एक अदभुत आदमी पचास सालसाठ-सत्तर साल तक रहा था। तो मैं तो रोऊंगा।
अब यह जो आदमी हैतुम कहोगे कि यह आदमी बड़ा कंट्राडिक्ट्री है। यह कहता हैआत्मा अमर हैऔर रोता है। कुछ कंट्राडिक्शन नहीं है। कंट्राडिक्शन इसीलिए है कि तुम समझ नहीं पा रहे हो। जिंदगी बहुत अदभुत है और बहुत रहस्यपूर्ण है। उसमें आत्मा को अमर मानने वाला भी रो सकता है। बल्कि मेरी अपनी समझ यह है कि यह आदमी अदभुत ही था।
अब तिलक जैसे आदमी थे--तिलक की पत्नी मर गई। खबर आई दफ्तर में कि पत्नी मर गई है। उन्होंने घड़ी देखीउन्होंने कहा कि पांच के पहले मैं दफ्तर से कैसे जा सकता हूं! तो तिलक पर लिखने वाले लोगों ने कहा कि यह स्थितप्रज्ञ है। इस आदमी को कोई मतलब ही नहीं है कि कौन मरता हैकौन जीता है! यह तो पार हो गया है! अगर मुझे चुनना होतो मैं बोकोजू को चुनूंगा कि यह आदमी अदभुत है। और अगर तुमने तिलक को चुनातो दुनिया को तुम उदास का डालोगे। अगर तुमने तिलक को चुनातो मार डालोगे दुनिया को। क्योंकि मेरी नजर में इसका मूल्य नहीं है--मेरी नजर में कुछ भी मूल्य नहीं है। और यहां बहुत बातें हो सकती हैं। यह तिलक का दिमाग बिलकुल दुकानदार का दिमाग है। कहता हैपांच बजे दफ्तर बंद करेंगे! और हो सकता हैइसने अपनी पत्नी को कभी प्रेम न किया होऔर हो सकता है ये पक्का सिद्धांत बांध कर बैठे हुए हैं कि सिद्धांत का पालन करना पड़ेगातो पांच बजे उठ कर जाएंगे! इसलिए मैं नहीं मानता। अगर धर्म इतना अमानवीय बनाता हो तो मनुष्य होना बेहतर हैधार्मिक होना बेहतर नहीं है।
और धर्म ने बहुत तरह की अमानवीयताएं पैदा की हैं। लेकिन उनका ऐसा गार्बेज हैऐसा उनका शब्दजाल हैकि उस सबके पीछेवह बिलकुल ठीक है। वह बिलकुल ठीक है--अगर धर्म प्रेम और करुणा और आनंद और दुख और पीड़ाइन सबसे ही आदमी को निकाल देता हो और पथरीला कर देता होपत्थर बना देता होतो ऐसे धर्म की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा धर्म चाहिए जो सब तलों पर क्रांति कर देता होसब तलों पर।
अब तुम रुकोउनके सवाल हो जाने दोनहीं तो रह जाएंगे।

परसों मैंने अखबार में पढ़ाजिसमें आपने सोशलिज्म के बारे में कहाकि भारत में सोशलिज्म की आवश्यकता नहीं है--ऐसा अखबार में पढ़ा और मुझे मालूम नहीं है कि आपने क्या कहा। आपने प्लैंड कैपिटलिज्म की बात कही--तो यह को कोई रहस्यवाद की बात नहीं हैप्लैंड कैपिटलिज्म कहीं है नहीं--चूंकि कैपिटलिज्म का बुनियादी स्वभाव जो हैवह अनार्किक है। तो फिर हिंदुस्तान में अगर कैपिटलिज्म चलता हैतो इससे हिंदुस्तान में बुरा न होगापचास वर्ष तक चलाने की बात आप कह रहे हैं और सोशलिज्म लाने की बात कह रहे हैंतो मेरी समझ में नहीं आता है कि आप यह क्या कह रहे हैं।

असल मेंजिसको हम सोशलिज्म कहते हैंजिसको कम्युनिज्म कहते हैंवह सब प्लैंड कैपिटलिज्म है--चाहे रूस में होचाहे चीन में होचाहे और कहीं हो। सोशलिज्म तो दुनिया में कहीं भी नहीं है। जो भी हैंवे दो तरह के कैपिटलिज्म हैं। एक कैपिटलिज्म हैजो अनप्लैंड हैजैसा अमेरिका में है। वह पूरा अनप्लैंड नहीं हैउसमें भी प्लानिंग प्रवेश कर रही है। और एक तरह का रूस में हैजो प्लैंड है। प्लैंड कैपिटलिज्म का मतलब है स्टेट कैपिटलिज्म। पहली बात तो यह समझ लें।
असल मेंसमाजवाद तो कहीं भी नहीं है और संभावना भी नहीं दिखती कि जिसको हम समाजवाद कहें वह कभी हो सकेवह बहुत युरोपियन है। हो सिर्फ यह सकता है कि व्यक्तियों के हाथ में से संपत्ति का अधिकार राज्य के हाथ में चला जाएतो राज्य-पूंजीवाद हीसमाजवाद हमको दिखाई पड़ने लगता हैतब हम शोरगुल मचाते हैं कि समाजवाद हैलेकिन होता राज्य-पूंजीवाद है। पूंजिपतियों की व्यक्तिगत जो सामर्थ्य है या व्यक्तिगत जो उत्पादन के साधनों की जो उनकी मालकियत हैवह राज्य के हाथ में चली जाती है। राज्य दोनों हो जाता हैसत्ताधिकारी भी और पूंजीवादी भी। दोनों काम राज्य करने लगता है। स्टेट कैपिटलिज्म है सब जगह जिनको हम सोशलिस्ट कंट्रीज कहते हैं--एक।
दूसरी बातजब मैं कहता हूं कि प्लैंड कैपिटलिज्मतो मेरा मतलब यह है कि समाजवाद जो है वह पूंजीवाद है। ऐसा समाजवाद जिसको कि राज्य-पूंजीवाद कहेंऐसा समाजवाद भी पूंजीवाद के एक विकसित अवस्था के बाद ही संभव है। इसलिए संभव है कि राज्य पूंजी अपने स्वामित्व में लेया पूरे मुल्क को स्वामित्व का अधिकार दे--इसके पहले पूंजी होनी जरूरी है। जिस देश के पास पूंजी न होजैसे भारत जैसा देश--भारत जैसा देश अभी भी नब्बे परसेंट सामंतवादी है। अभी भी वह दस परसेंट ही पूंजीवादी है। अभी भी हम यह नहीं कह सकते कि वह पूंजीवादी है। क्योंकि जिसको औद्योगिक क्रांति कहेंऐसी कोई चीज से हम गुजर नहीं गए। बंबई देखने से भ्रम पैदा हो जाता हैलेकिन इस बड़े मुल्क को देखने से पता चलता है कि पूंजीवादी कहां?हमारा गांव तो हजार साल पहले जहां थावहीं जी रहा हैवहीं खड़ा हुआ है।
हिंदुस्तान अभीपूंजीवादी भी नहीं है। यानी यह ऐसा ही हैजैसे कोई बच्चा अभी जवान भी नहीं हुआ है और बूढ़ा होने की बातचीत हमने शुरू कर दी कि इसको बूढ़ा कैसे करें। रूस में जो हुआवह भी प्रि-मैच्योर हुआ। रूस में भी माक्र्स की कल्पना के बाहर था कि रूस मेंऔर समाजवाद आ जाएगा। और अगर कोई माक्र्स को कहता है कि रूस में समाजवाद आ जाएगातो वह भी थोड़ी हैरानी से देखता है कि रूस में कैसे आ जाएगा। क्योंकि उन्नीस सत्रह में दुनिया के अविकसित देशों में एक था। वहां समाजवाद की माक्र्स के हिसाब से भी संभावना कम दिखती है। हांरेवोल्यूशन हुआइसलिए प्रि-मैच्योर हैजैसे कि पांच महीने के बच्चे के साथ ब्लीडिंग होवह रूस में हुई अच्छी तरह। कोई एक करोड़ आदमियों की हत्या हुई पूरी क्रांति में। और इसके बाद भी रूस समृद्ध न हो सकाआज भी रूस गरीब ही है।
और इतने पचास साल की क्रांति के बाद भीआज भी रूस अपने भोजन के लिए पूंजीवादी मुल्कों पर निर्भर है! और पचास साल के निरंतर प्रयोग के बाद ख्रुश्चेव ने जाने के पहले यह कहा है कि हमारे अभी भी सवाल यही है कि हम इंसेंटिव पैदा नहीं कर पाते कि लोग काम कैसे करेंऔर रोज इंसेंटिव कम हुआ है। काम करने की वृत्ति कम हुई है। या तो काम जबरदस्ती लेना पड़ता हैकोड़े के बल पर या बंदूक के बल परया साइबेरिया के डर से काम लेना पड़ा। स्टैलिन ने काम उसी तरह लिया। और या फिर इंसेंटिव खो जाता है।
आज भी रूस पूंजी पैदा नहीं कर पाया है। और उसका कारण हैउसमें रूस की गलती नहीं है। रूस की गलती यही है कि जैसे पांच महीने का बच्चा पैदा कर लिया और उसको किसी तरह पाल-पोस कर जिंदा भी रख रहे हैंलेकिन फिर भी वह पिछड़ गया हैबुरी तरह से। पचास साल में अमेरिका ने जितनी पूंजी पैदा की हैपचास साल में रूस उतनी पूंजी पैदा नहीं कर पाया। वह उससे बहुत पीछे छूट गया हैपूंजी पैदा करने के मामले में। और बड़े मजे की बात है कि अमेरिका में जिसको गरीब कहते हैं हमवह आदमी रूस में आज अमीर मालूम पड़ता है। अमेरिका का गरीब भी रूस में आज अमीर मालूम पड़ सकता हैहालतें ऐसी हैं।
तो मेरी अपनी समझ यह है कि समाजवाद तो अनिवार्य है। अनिवार्य इन अर्थों में है कि जैसे जवानी के बाद बुढ़ापा अनिवार्य है। पूंजीवाद विकसित हो जाए तो समाजवाद में अपने आप परिवर्तित है। मैं जो कह रहा हूंवह यह कह रहा हूं कि पूंजीवाद का ठीक विकास अनिवार्य रूपेण समाजवाद में ले जाता है। तो समाजवाद और पूंजीवाद में विरोध नहीं है। पूंजीवाद की अग्रिम अवस्था है समाजवादअनिवार्य अवस्था हैजिसको उसको जाना पड़ेगाबच नहीं सकता। लेकिन हम चाहें तो जोर से जबरदस्ती सेजल्दी भी ले जा सकते हैं।
नौ महीने में बच्चा पैदा होयह तो ठीक हैलेकिन जोर जबरदस्ती और आपरेशन करके हम पांच महीने में बच्चे को निकाल ले सकते हैं। गर्भपात करवाया जा सकता है। कोई बहुत अड़चन नहीं है। यह जो इसमें कोई ऐसी अड़चन नहीं है गर्भपात हैइसके मैं पक्ष में नहीं हूं। मैं मानता हूं कि भारत में अभी जो होगा समाजवादवह गर्भपात होगा। क्योंकि भारत पूंजीवाद मुल्क ही नहीं है।
दूसरी बात यह हैरूस का जो अनुभव हैरूस के अनुभव का हम पूरा उपयोग करेंन करें तो नासमझ हैं। रूस ने एक बड़ा प्रयोग किया है और उस बड़े प्रयोग से सारी दुनिया को अनुभव लेना जरूरी है। चीन भी एक बड़ा प्रयोग कर रहा हैउसका भी अनुभव लेना जरूरी है। अगर हम वह अनुभव करेंतो रूस में पिछले दस वर्षों से निरंतर व्यक्तिगत संपत्ति की तरफ ढलाव आ रहा है। निरंतर व्यक्तिगत संपत्ति की तरफ ढलाव आ रहा है। निरंतर व्यक्तिगत संपत्ति को धीरे-धीरे छूट देने की बात आ रही है। चीन और रूस के बीच आज झगड़ा ही वही है। माओ को लगता ही यह है कि रूस जो हैवह किसी तरह से पूंजीवादी कैंप में सम्मिलित होता जा रहा है। और रूस पचास वर्ष के अनुभव से यह कह रहा है। क्योंकि पचास वर्ष के अनुभव ने यह बताया है कि मनुष्य और व्यक्ति कोव्यक्तिगत संपत्ति कुछ ऐसी अनिवार्य बात है कि अगर वह उससे छूट जाती हैतो व्यक्तिगत किसी अर्थ में फीका और खाली और एंप्टी हो जाता है। और काम करने की जो प्रवृत्ति है और श्रम करने का जो आग्रह है और पैदा करने का जो नशा हैवह सब खो जाता है। वह आदमी खड़ा सा रह जाता हैसब खो जाता है। यानी व्यक्तिगत में,व्यक्तिगत संपत्ति का कोई अनिवार्य रोल हैयह रूस को इधर पचास वर्ष में खयाल आया है। अभी उन्होंने इधर पांच-सात वर्षों में व्यक्तिगत कार रखने की छूट दे दी है।
मैं यह कह रहा हूं कि पचास वर्ष के रूस के अनुभव यह बताते हैं कि अब किसी मुल्क को समाजवादी सोच-समझ कर होना चाहिएक्योंकि पचास साल के बाद यह तो परिणाम हुआ है--यह चीन में भी होगा। अभी माओ उसी नशे में हैजैसे रूस में स्टैलिन आज से पचास साल पहले था। नशा वही है भूल वही होने वाली हैक्योंकि वहां वही सब होने वाला है। मेरी समझ में जो हैवह यह है कि यह तो सौ वर्ष में तय होगी बात। मेरी समझ यह है कि सिर्फ अमेरिका आज इस हालत में आता जा रहा है कि समाजवादी हो सके--सिर्फ अमेरिका। और अमेरिका जिस दिन समाजवादी होगाजो समाजवाद की गरिमा ही और होगी। वह बहुत ही ठीकपीसफुल सोशलिज्म होगा। और कब आ गया चुपचापउसके पदचिह्न भी सुनाई नहीं पड़ेंगे।
मैं इसलिए कह रहा हूं--इसलिए मेरी नजर में जो मैंने कहा हैउसमें मैंने यही कहा है कि मैं मानता हूं कि हिंदुस्तान में समाजवाद जो आएगावह वाया वाशिंगटन ही आएगा। वाया वाशिंगटन से मेरा मतलब है कि हिंदुस्तान को पूंजीवाद विकसित करना पड़ेगा। वाशिंगटन--वह वाया वाशिंगटन ही आने वाला हैवाया मास्को को अब कोई रास्ता नहीं है। तो पचास वर्ष हमें पूरी मेहनत करनी चाहिएपूंजीवाद को विकसित करने की। तो स्टेट-कैपिटलिज्म के लिए नहीं कह रहा हूं। मैं तो व्यक्तिगत पूंजीवाद के लिए कह रहा हूं। बिलकुल ही पचास वर्ष हमें व्यक्तिगत पूंजीवाद को देने हैं।
और जब मैं प्लैंड कह रहा हूंतो प्लैंड से मेरा मतलब यह है कि हम पूंजीवाद को एक मजबूरी की तरह नहीं ढोते हैंपचास सालहम जान कर ढोते हैंएक अनिवार्य प्रक्रिया की तरह ढोते हैं। हम क्रोध और गुस्से में नहीं ढोते हैंहम जान कर ढोते हैं। और इस तरह मेरी दृष्टि यह है कि सीलिंग अगर प्लैंड कैपिटलिज्म की कल्पना होतो सीलिंग ऊपर की तरह नहीं होगीनीचे की तरफ होगी। ऐसी सीलिंग करना खतरनाक हैजिसमें हम तय करें कि एक लाख रुपये से ज्यादा किसी के पास नहीं होंगे। मेरी दृष्टि में सीलिंग ऐसी होगी कि सौ रुपये से कम हम किसी आदमी के पास नहीं होने देंगे। सीलिंग नीचे की तरफ--प्लैंड कैपिटलिज्म की तरफ मेरी जो नजर होगी।
और कैपिटलिज्म को कैसे विकसित किया जाए?
अमेरिका में कैपिटलिज्म भी धीरे-धीरे विकसित हुआ है। अमेरिका में कोई प्लैंड कैपिटलिज्म विकसित नहीं हुआधीरे-धीरे विकसित हुआ है। लेकिन हिंदुस्तान जैसे मुल्क को जिसे दुनिया के साथ आने वाले पचास वर्षों में कदम मिलाना होवह अगर उतने धीरे-धीरे का इंतजाम करेतो तीन सौ साल उसको लगेंऔर तीन सौ साल में अमेरिका किन्हीं चांदत्तारों पर होतब फिर हमारा हिसाब कभी मिलने वाला नहीं है। हमें तो पचास साल में तीव्र गति करनी पड़ेगी। जब वह इंटेंसिटी और प्लानिंग किस तरह की हो। वह सोशलिज्म के लिए हो सीधीमैं मानता हूं गलत होगीवह कैपिटलिज्म के लिए ही होवह उद्योग को मौका देउद्योग को बढ़ने का मौका देउसको फलने-फूलने का मौका देसारी दुनिया की पूंजी को निमंत्रित करे।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मैं कुछ और कहा। मैं कुछ और कहावह समझे नहीं। मैं कहा यहजैसे कि माओ को पैदा करने की बात हो। नहीं हो सकता। नहीं हो सकतावही मैं कहा कि यह संभव नहीं है। और इसलिए जो प्रयोग हमें करना हैवह एक अर्थ में नया ही प्रयोग होगा। सदा नया ही प्रयोग होता है वह। हम दूसरे के प्रयोग से थोड़ा-बहुत लाभ ले सकते हैंकिसी प्रयोग को पुनरुक्त नहीं कर सकते। पुनरुक्त करना असंभव भी हैक्योंकि सब बदल चुका होता है सब बदला होता है। लेकिन होती क्या है कठिनाईजब जैसे यह सब क्लाइमेट और हवायह उन्होंने जोड़ लियायह मैंने कोई बात नहीं की। कैनेडा का मैंने नाम ही नहीं लियावह कैनेडा भी उनकी जोड़ है। वह खयाल में आ जाता हैजुड़ जाता है। वे बेचारेसमझ में जो आता हैवे लिखते हैं।

माक्र्स के बारे में आपने कहा कि वह निष्क्रिय राजनीति में रहा। तो क्या निष्क्रिय पोलिटीशियन माक्र्स हैऐसा आप कहते हैं?

मैं जिस अर्थ में कहा हूंवह इस अर्थ में कहा हूं कि माक्र्स की जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा तो ब्रिटिश म्यूजियम की लाइब्रेरी में बैठ कर गुजरा--बड़ा हिस्सा। बीस साल तो उसका कैपिटल लिखने में गुजरा। माक्र्स का जो दान है--छोटी-मोटी पॉलिटिक्स में भाग ले रहा था वह। पूरे यूरोप की रेवोल्यूशन के बीच संबंधित थाविवाद चल रहे थेकांफ्लिक्ट थीसब थावह सब चल रहा था। लेकिन माक्र्स का जो कंट्रीब्यूशन है--माक्र्स का सारा कंट्रीब्यूशन एक थ्योरीटिशियन था। मैं जो कह रहा हूंवह यह कह रहा हूं कि माक्र्स जो हैवह कम्यूनिज्म की एक फिलासफी का जन्मदाता है। और स्वाभाविक है कि जब भी फिलासफी पैदा होती है,कोई तत्व-दर्शन पैदा होता हैऔर जब एक आदमी अपनी छोटी सी जिंदगी मेंइतने बड़े विचार को जन्म देता हैतो बहुत स्वाभाविक है कि उसकी अधिकतम जिंदगी निष्क्रिय हो। निष्क्रिय इन अर्थों में नहींवह विचार में सक्रिय तो है ही। हांजो मैंने कहावह मैंने यही कहा कि जरूरत होती है ऐसे लोगों की भीजो सक्रिय राजनीति के बाहर खड़े होकर विचार को जन्मा पाएं। और विचार जन्म जाएतो विचार की अपनी सक्रियता है।
जैसे मानता हूंहिंदुस्तान में पोलिटिकल फिलासफी जैसी चीज पैदा नहीं हो पा रही है। उसका एक बड़ा कारण यह है कि हिंदुस्तान के पासजिसको कहें थ्योरीटिशयनवह नहीं पैदा हो पा रहा है।
हिंदुस्तान के पास जितनी पॉलिटिक्स हैऔर जितने पोलिटिशियंस हैंवे डे टू डे पॉलिटिक्स मेंइस भांति उलझे हुए हैं कि उनको न कोई मौका हैन कोई फुर्सत है। चौबीस घंटे इलेक्शन में खड़ा हुआ हैकुर्सी पर पहुंच गया हैतो कुर्सी बचाने में लगा हुआ है। अब मैं हिंदुस्तान के राजनीतिज्ञों के पास कभी ठहरता हूंतो मैं हैरान हो जाता हूं। वे न कुछ पढ़ पाते हैंन सोच पाते हैंउसकी गुंजाइश नहीं हैउसके पास।
मैं समझ गया आपकी बात--मूवमेंट का तो मामला ऐसा है। मैं जब एक्टिव पॉलिटिक्स की बात कर रहा हूंतो मैं एक्टिव मूवमेंट में नहीं थाऐसा भी नहीं कर रहा हूं। मेरा कहना यह है कि ऐसे तो अगर में भी तीस-चालीस साल घूमता रहूंगा,चिल्लाता रहूंगा तो एक मूवमेंट खड़ा कर दूंगा। और एक्टिव मूवमेंट में हूं चौबीस घंटे--मैं किसी लाइब्रेरी में नहीं लिख पा रहा--आप से लड़ ही रहा हूंकिसी से लड़ रहा हूंवह चल रहा है। एक्टिव हूं पूरे वक्त। लेकिन जब मैं कहता हूं एक्चुअल पॉलिटिक्सतो मेरा मतलब कुल इतना था कि कोई सरकार का इलेक्शन लड़ रहा होकिसी की हुकूमत को चला रहा होकिसी हुकूमत पर बैठ गया होयह सब सवाल नहीं थाबड़ा सवाल माक्र्स के लिए यह था कि एक विचार-दृष्टि जन्म जाए।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मैं आपकी बात समझा। पहली तो बात यह है कि जो मैं कहूंअगर वह उपनिषद से मेल खाएइसलिए उपनिषद की ईको नहीं हो जाता। वह मेरा भी अनुभव हो सकता है। उपनिषद की ईको होना जरूरी नहीं है और इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है कि जो मेरा अनुभव हैवह उपनिषद में भी है। उपनिषद के लेखक को भी नहीं पकड़ा जा सकता कि उसका कोई कसूर है। तो एक तो यह है कि वैसा मेरा अनुभव हैऔर जो अनुभव हैवही रियलिटी है। आप कहते हैं कि वह अनरियल हो जाता हैअनरियल नहीं हो जाता। क्योंकि अनुभव ही रियल है। अगर मेरा ऐसा अनुभव है कि मैं यह नहीं हूंया मेरा ऐसा अनुभव है कि मैं ब्रह्म हूंतो अनरियल कैसे हो जाएगाक्योंकि अनुभव ही रियलिटी हैऔर अनुभव के अतिरिक्त रियलिटी का कोई और मापदंड भी नहीं है।
हम इतना ही कह सकते हैं कि ऐसी रियलिटीज भी हैंजो हम सबके अनुभव में नहीं आती। इतना ही हम कह सकते हैं यानी अगर मुझसे आप आकर कहें कि मैं ब्रह्म हूंतो मैं इतना ही कह सकता हूं कि इस रियलिटी को मैंने नहीं जाना। मैं यह नहीं कह सकता कि अनरियलिटी हैऔर अनरियलिटी कहूंतो भी इतना ही मतलब होता है मेरे लिए अनरियल है। लेकिन अनरियलिटी कहना जरा ज्यादा नतीजा ले लेना है। इतना ही हम कह सकते हैं कि यह मेरा अनुभव नहीं हैमेरे लिए अभी यह यथार्थ नहीं है। यह आपके लिए हो सकता है। तो मैं तो रियलिटी की ही बात कह रहा हूं।
अब यह जो मामला है--यह जो मामला हैयह साबित करना मुश्किल है। यह जो कहना है आपका...साबित करना तो यह भी मुश्किल है कि आपके सिर में दर्द है। नहींवह फिजिकल नहीं हो सकता है। अभी यह अनुभव करना मुश्किल हो सकता है कि आपके हृदय में प्रेम है। इसका कोई उपाय नहीं हैसाबित करने का। डिस्कशन नहीं कर रहा हूंमैं जो कह रहा हूंवह यह कह रहा हूंकि दे आर दि रियलिटीज बट कैन नाट बी प्रूव्डपर हैं। अगर मेरे हृदय में किसी के लिए प्रेम हैतो ऐसा हो सकता है कि मैं अपनी जान गंवा दूं। आप अगर मेरी सारी जांच-पड़ताल करने बैठें और मुझे सिद्ध करना पड़े तो मैं कुछ भी सिद्ध न कर पाऊंगा। मगर इससे फिर भी नाराज न होऊंगा कि प्रेम जो था अनरियल था कि नहीं था। मैं किसी भ्रम में पड़ा हुआ था या मेरे भीतर प्रेम जैसी कोई घटना नहीं घट रही थी। वह घट रही थी।

जिंदगी में अनुभव हैंजिन अनुभवों को पकड़ना जरूरी नहीं है कि प्रूफ में संभव हो जाए। और मजा यह है कि जो अनुभव प्रूफ में नहीं आतावह डिसप्रूफ में भी नहीं आता।

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