शनिवार, 9 सितंबर 2017

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-20

अहोभावआनंदउत्सव है भक्ति
दिनांक २२ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

पहला प्रश्न: परम विरहासक्ति पर कुछ कहने की कृपा करें।

उस प्यारे की मौजूदगी प्यारी हैतो गैर-माजूदगी भी प्यारी होगी। जिसने उसे चाहा हैअनुपस्थिति में उसकी चाह और बढ़ेगी,घटेगी नहीं। चाह की कसौटी यही है। लेकिन चाह तो तुमने जानी नहींकामना जानी है। कामना की खूबी यह है: मिल जाए,जिसे तुमने मांगा हैतो मांग टूट जाती हैसमाप्त हो जाती है। धन मिल जाएधन व्यर्थ हो जाता है। प्रेमी मिल जाएप्रेमी व्यर्थ हो जाता है। कामना पा भी लेतो भी खाली रह जाती है। प्रार्थना न भी पाएतो भी भरी है।
विरहासक्ति का अर्थ है कि भक्त भगवान को तो प्रेम करता ही हैउसकी गैर-मौजूदगी को भी प्रेम करने लगता है। उसकी गैर-मौजूदगी भी उसकी ही गैर-मौजूदगी है। उसका न दिखाई पड़ना भी उसका ही न दिखाई पड़ना है। पूर्ण है वहशून्य भी उसका ही है। सब भाव उसका हैअभाव भी उसका ही है। फिर जो वह देउसी में भक्त राजी है।
भक्त का भाव यही है कि तू जो कराएरुलाएदूर रखेहंसाए कि पास रखेतृप्त करे कि अतृप्ति की आग जलाएवर्षा बनकर आए कि प्यास बनकर उठे--तेरी मर्जी पर मेरा होना है! तो भक्त यह नहीं कहता कि मेरी मर्जी मान और प्रगट हो। वह कहता हैतेरा अप्रगट होना भी प्यारा हैहम इसे ही प्यार कर लेंगे। हम तेरी अनुपस्थिति में भी नाचेंगे और गुनगुनाएंगे!
और जब तक तुम उसकी अनुपस्थिति को प्रेम न कर पाओगेतब तक वह उपस्थित न हो सकेगा। यही भक्त की कसौटी है। इसलिए विरहासक्ति...।
विरह से भी आसक्ति हो जाती है। आंसुओं से भी प्रेम हो जाता है। तुमने भक्त को रोते देखा होवह दुख में नहीं रो रहा है। उसके आंसू खुशी के आंसू हैं। उसके आंसू फलों जैसे हैंचांदत्तारों जैसे हैं। उसके आंसुओं में फिर से झांको। उसकी आंखों में कोई शिकायत नहीं हैअनुग्रह का भाव है: "तूने रुलायायह भी क्य कुछ कम है! क्योंकि बहुत आंखें हैंबिना रोये ही रह जाती हैं। बहुत आंखें हैं जिन्हें आंसुओं का सौभाग्य ही नहीं मिलता। तूने दूर रखातड़फायाइसी तड़फ से तो भक्त्ति का जन्म हुआ। इसी से तो तेरे पास आने की महत आकांक्षा जगीअभीप्सा पैदा हुई। तो दूर रखने में भी तेरा कोई राज होगा। तेरी मर्जी पूरी हो'!
जीवन को देखने के दो ढंग हैं। एक धार्मिक व्यक्ति का ढंग हैवह कांटों में भी फूल खोज लेता है। और एक अधार्मिक व्यक्ति का ढंग हैवह फूलों में भी कांटे खोज लेता है। देखने पर सब कुछ निर्भर है।
सुकून क़ल्ब को हलकी सी भी उम्मीद काफी है
कि नूरे सुबह की पहली किरण बारीक होती है
हृदय में चैन होहृदय में शांति होधैर्य होतो छोटी-सी उम्मीद भी बहुत है। स्वभावतः सुबह की पहली किरण बहुत बारीक होती है। उतनी बारीक किरण भी सूरज की खबर है। वह दिखाई भी नहीं पड़तीभासमान होती है--पर सूरज की खबर है।
भक्त को परमात्मा की अनुपस्थिति भी परमात्मा की ही खबर है।
सुकून क़ल्ब को हलकी सी भी उम्मीद काफी है
कि नूरे सुबह की पहली किरण बारीक होती है
जो गम हद से ज्यादा हो खुशी नज़दीक होती है
चमकते हैं सितारे रात जब तारीक होती है।
और जब रात बहुत घनी अंधेरी होती है तो तारे खूब चमककर प्रगट होते हैं। परमात्मा की अनुपस्थिति की जब भाव-दशा पकड़ लेती है तो उसकी उपस्थिति इतनी प्रगाढ़ होकर मालूम होती है जितनी कभी भी नहीं मालूम हुई। विरह में भी मिलन है। अंधेरी रात में भी उसके तारे चमकते हैं। जब सब खोया हुआ लगता है तब भी वह पाया हुआ ही मालूम होता है।
लेकिन हमारे जीवन का दृष्टिकोणहमारे देखने का ढंग अति सांसारिक है। और वहां हमने जो पाठ सीखा है वह पाठ बड़ा खतरनाक है। ठीक इससे उलटी दशा धर्म की यात्रा की है।
संसार में जब तक कोई चीज मिलती नहीं है तब तक तो तुम बहुत उसके लिए तड़फते हो--पाने के लिए तड़फते होकिसी तरह अभाव मिट जाए! धन नहीं है तो तुम धन के लिए तड़फते होक्योंकि निर्धन्नता को मिटाना है। निर्धनता से तुम राजी नहीं होतेनिर्धनता से तुम लड़ते होताकि धन पैदा कर सको। पर देखा तुमनेजब धन हाथ में आ जाता है तो पता लगता है: राख लगीकोई हीरे-जवाहरात न लगेधूल लगी। जब नहीं था धन तब निर्धनता से लड़ते रहे। जब धन मिलता है तो धन व्यर्थ हो जाता है।
यह तुम्हारा सामान्य जीवन का अनुभव है। इससे ठीक उलटा अनुभव धार्मिक का है। धार्मिक परमात्मा की अनुपस्थिति से लड़ता नहीं हैवह कहता हैयह अनुपस्थिति भी उसकी ही हैलड़ना कैसालड़ना किससेयह भी वरदान उसी का हैयह आशीष उसी की है।
अनुपस्थिति में विरोध नहीं है--अनुपस्थिति में उसे खोजना हैछिपा होगा कहींकिरण बहुत बारीक होगीहोगा तो ही...। ऐसा तो कोई स्थान नहीं हो सकता जहां वह न हो। अपनी आंखें कमजोर होंगी। अपने देखने में बल न होगा। अपनी आंख पर परदे होंगे। अपनी समझ धुंधली होगी। अपना बोध का दीया थिर न होगीकंपित होती होगी भीतर की चित्त-दशाप्रज्ञा ठहरी न होगी। लेकिन भगवान तो अपनी अनुपस्थिति में भी मौजूद होगाक्योंकि ऐसी तो कोई जगह नहीं है जो उससे खाली हो। वह पास से भी पासदूर से भी दूरमिला हुआ भी हैखोया हुआ लगता है।
तो भक्त अनुपस्थिति से लड़ता नहींवह अपने आंसुओं में भी नाचता है। उसके आंसू भी गुनगुनाते हुए हैं। उसके आंसुओं में दुख मत देख लेनाअन्यथा तुम उसके आंसुओं को न समझ पाओगे। उसके आंसुओं में इस बात की खबर है कि तू कितना ही छिपाएअपने को छिपा न सकेगातू कितना ही परदे डालेधोखा न दे सकेगा। हम तेरी अनुपस्थिति में भी तुझे खोज लेते हैं,तो तेरी उपस्थिति की तो बात ही क्या करनी!
अनुपस्थिति परमात्मा के विपरीत नहीं हैजैसा धन निर्धनता के विपरीत है। और इसलिए जब भक्त परमात्मा को उपलब्ध होता है तो वैसी हालत नहीं आती जैसे धन को उपलब्ध होकर आती है। धन व्यर्थ हो जाता है मिलते ही। धन का सारा मजा उसके न मिलने में हैंजब तक नहीं मिलता तभी तक महिमापूर्ण मालूम होता हैजैसे मिलाकचरा हो जाता है!
परमात्मा के न मिलने में भी अहोभाग्य हैमिल जाने का तो फिर कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता। भक्त कहता हैतू जिस हाल रखेहम उस हाल में राजी हैं। भक्त कहता हैहमारी गुनगुनाहट को तू छीन न सकेगा।
होंगी इसी तरह से तै मंजिलें ओज की तमाम
हां यूं ही मुस्कुराए जोहां यूं ही गुनगुनाए जा!
सारे पड़ाव पार कर लिए जाएंगेसारी मंजिलें पार कर ली जाएंगी।
होंगी इसी तरह से तै मंजिलें ओज की तमाम
हां यूं ही मुस्कुराए जाहां यूं ही गुनगुनाए जा!
भक्त का आनंद सतत है। उसमें विच्छेद नहीं है। अंधेरा हो तोरोशनी हो तोसुबह हो तोसांझ हो तोबहार आए तोपतझड़ आए तो--भक्त के लिए भेद नहीं पड़ताक्योंकि वह हर चेहरे में उसको पहचान लेता है--जीवन आए तोमौत आए तो! भक्त का अर्थ ही यही है: जिसे अब भगवान धोखा न दे सकेगा।
साधक और भक्त में यही भेद है। साधक अपने संकल्प से जीता हैभक्तसमर्पण से। साधक कहता हैपाकर रहेंगे। साधक की भाषा में संसार छिपा है। जैसे वह धन को पाता थावैसे ही धर्म को भी पाकर रहेगा। जैसे वह यशपदप्रतिष्ठा खोजता था,ऐसे ही प्रभु को भी खोजेगा। लेकिन उसकी खोज का सूत्र पुराना है: "मैं पाकर रहूंगा! तेरे बिना किए क्या होगामैं करूंगा तो होगा'
भक्त तो सारा हिसाब बदल देता है। भक्त कहता है: समर्पण! मेरे किए कुछ न हुआ। देखा बहुत कर-करकेहाथ कुछ भी न आयाजैसे रेत से तेल निचोड़ते रहेसमय व्यर्थ हुआशक्त्ति का अपव्यय हुआकहीं पहुंचे न। अब तुझ पर छोड़ देते हैं। अब हम नाचेंगे! अब हमने पाने की भी फिक्र छोड़ी! अब हम न पाएं तुझे तो भी कोई फर्क न पड़ेगातू हमें मिला!
साधक की भाषा है--
अपने ऊपर कर भरोसाजज्बे दिल से काम ले
यूं न साकी आएगाउठ बढ़ के मीना थाम ले।
साधक की भाषा है: अपने ऊपर भरोसा करहिम्मत से काम लेसंकल्प को जगाऐसे बैठे-बैठे कुछ न होगा।
यूं न साकी आएगाबढ़ के मीना थाम ले।
छीना-झपटी करनी होगी। यह मधु-पात्र ऐसे अपने-आप तेरे सामने न आएगा। उठ! संकल्प कर! छीन ले! संघर्ष कर!
यह साधक की भाषा है। भक्त को इस भाषा में ही संसार मालूम होता है: "परमात्मा से भी छीनना होगायह साकी ऐसा साकी तो नहीं जिससे छिनना पड़े। भक्त कहता है, "यह तो बात की लज्जत ही न रही। परमात्मा से छीनना पड़ातो मिला-न-मिला बराबर हो गया। छीन-झपट से जो मिले उसका तो सौंदर्य ही चला गया। उसका प्रसाद हो! मांगना भी न पड़े। मांग भी यही कहती है कि छीन-झपट किसी-न-किसी तल पर जारी है। कहना भी न पड़ेइशारा भी न करना पड़े। वह देअपने से देमनाकर दे!'
भक्त की भाषा है--
सामने तेरे भी इक दिन दौरे महबा आएगा
तू अभी समझा नहीं साकी का ईमांसब्र कर।
अभी तू उसके प्रेम कोउसके नियम को समझा नहींथोड़ा धीरज रख!
सामने तेरे भी इक दिन दौरे महबा आएगा--वह मधु-पात्र सामने तेरे अपने-आप आ जाएगातू थोड़ा धीरज रख। तू जरा उसके नियम की तरफ देख।
सब्र ही भक्ति की पात्रता हैअनंत धैर्य! तुम अगर एक क्षण को भी उसके अनंत धैर्य से भर जाओतो उसी क्षण उपलब्धि हो जाएगी। उपलब्धि में परमात्मा बाधा नहीं हैतुम्हारा धैर्य बाधा है। इसलिए विरह से भी आसक्ति हो जाती है। भक्त विरह के गीत गाता है। वह विरह के आसपास भी सजावट कर लेता है। वह अपने रोने को भी सम्हालकर रखता है। वह अपने रुदन को भीअपनी आहों को भी प्रार्थना बना लेता है। वह अपने रुदन केअपने आंसुओं के ईंटों से ही अपने मंदिर को बना लेता है। वह उससे भी राजी है। वह यह नहीं कहता कि देखोमैं कितना रो रहा हूं। वह यह कहता है कि और रुलाओ मुझे। देखोकितना हलका हो गया हूं रो-रोकर! कितना रूपांतरित हुआ हूं! तुम जल्दी मत करना। कोई जल्दी नहीं है। तुम मुझे पूरा बदलकर ही आना!
वह आने की बात ही परमात्मा पर छोड़ देता हैअपने हृदय को खोल देता हैप्रतीक्षा करता है।
भक्त्ति प्रतीक्षा हैप्रयास नहीं। भक्त्ति समर्पण हैसंकल्प नहीं। और भक्ति से बड़ी कोई कीमिया नहीं हैक्योंकि भक्ति का मूल आधार हीसांसारिक मन का आत्मघात हो जाता है। सांसारिक मन कहता हैकरने से कुछ होगा। भक्त्ति कहती हैकरने से कुछ भी नहीं हुआ। सांसारिक मन कहता है: अहंकार! नये-नये नाम रखता हैकभी कहता हैसंकल्प की शक्तिकभी कहता है,हिम्मतसाहसव्यक्तित्वआत्मा--हजार नाम रखता हैलेकिन सबके भीतर तुम अहंकार को छिपा हुआ पाओगेसबके भीतर "मैंमाजूद है, "मैंकी कम-ज्यादा मात्रा मौजूद है। और वही बाधा है।
भक्त कहता है, "मैंनहींतू। जब मैं ही नहीं हूं तो क्या विरह और क्या मिलन?' मिलन हो गया! जहां "मैंमिटा वही मिलन हो गया। और जिसे विरह में परमात्मा दिखाई पड़ गयाउसके मिलन की तो बात ही न पूछो! वह बात तो बात करने की न रही। उसके संबंध में कुछ भी न कहा जा सकेगा।
मीरा के सारे गीत विरह के गीत हैं--इतने मधुरइतने गरिमापूर्ण! सब विरह के गीत हैं। चैतन्य का नृत्य विरह का नृत्य है। मिलन के बाद तो कोई नाच ही नहीं सका। नाच भी मुश्किल हो जाता है। विरह में नाच लो थोड़ा-बहुत। विरह में बोल लो थोड़ा-बहुतमिलन पर तो बोज बंद हो जाते हैंमिलन तो अबोल कर जाता हैमिलन में तो सब शून्य हो जाता है। बूंद जब सागर में खो गईखो गई! अब कहां नाचेगीअब कहां कूदेगीअब कहां वीणा बजेगीअब कहां नृत्य होगाकहां गीत सजेंगेमीरा जब खो गई सागर में तो खो गई! वे जो मीरा के गीत हैंसब विरह से उत्पन्न हुए हैंस्वभावतः विरह से भी आसक्ति हो जाएगी। इतना प्यारा था उसका न मिलना भी।
जिसने उस प्यारे की तरफ थोड़े कदम बढ़ाएउसे उसके न मिलने में भी आनंद हो जाता है।

दूसरा प्रश्न: आपके सान्निध्य में ध्यान की गहराई का कुछ अनुभव होता हैलेकिन वह अवस्था स्थायी नहीं रहती। उसे स्थायी करने की दिशा में कृपया हमारा मार्गदर्शन करें!

स्थायी करना ही क्यों चाहते होस्थायी की भाषा ही सांसारिक है। क्षणभर को रहती हैउतनी देर अहोभाव से नाचेंउतनी देर कृतज्ञता से नाचें। उस क्षण में यह नया उपद्रव क्यों भीतर ले आते हैं कि स्थायी करना हैजो मिला है उसकी भी पात्रता नहीं है! अहोभाग्य कि पात्र न थाक्षणभर को उसके दर्शन हुए। नाचें! गुनगुनाएं! आनंदित हों! दूसरा क्षण इसी क्षण में निकलेगा,आएगा कहां सेकल आज से ही पैदा होगा। अगर आज गीत से भरा थातो कल इन्हीं गीतों से जन्मेगा। अगर आज तुम्हारे पैर में थिरक थी और घूंघर बंधे थेतो कल पर भी उनकी छाया पड़ेगी। स्वभावतः कल तुम्हारे घूंघर की आवाज और सुदृढ़ हो जाएगीबांसुरी और भी गहरी बजेगीमस्ती और भी गहरी उतरेगी!
कल आएगा कहां सेइसलिए तुम कल की चिंता ही छोड़ दो। सभी की यही तकलीफ हैक्योंकि संसार का यह गणित है: जो न हो उसकी चिंता करोजो मिल जाए उसकी चिंता करो कि कहीं खो न जाए! गरीब परेशान है कि धन मिल जाएधनी परेशान है कि कहीं खो न जाए! दोनों परेशान हैं। परेशानी जैसे हमारी आदत है। जैसे हम कुछ भी करेंपरेशानी से हम न बचेंगेपरेशानी तो हम घूम-फिरकर पैदा कर ही लेंगे।
रोज कोई-न-कोई मेरे पास आकर कहता है कि "ध्यान में बड़ा आनंद आ रहा हैलेकिन यह टिकेगा?' क्यों आनंद को खराब कर रहे होकल जब आएगा तब कल को देख लेंगे'। और आज अगर तुम आनंदित हो सकते होकल भी तुम ही तो रहोगे न?और आज अगर तुम आनंदित हो सकते होतो कल की ईंटें आज के ऊपर ही रखी जाएंगीकल का भवन आज के ऊपर ही खड़ा होगा। तुम कृपा करके कल को भूलो!
कलमन का उपद्रव है। कल तुम्हारा आज को खराब कर देगा। यह क्षण अगर शांति का था तो तुम डूबोडुबकी लोतुम रस-विभोर हो जाओतुम भूल ही जाओ समय को। इसी से आने वाला क्षण उभरेगा--और भी गहराऔर भी ताजाऔर भी मदहोश! और एक बार तुम्हें यह समझ में आ जाए तो भविष्य की चिंता छूट ही जाती है।
स्थायी करने का मोह भविष्य की चिंता है। क्षण काफी है। एक क्षण से ज्यादा किसको कब कितने क्षण मिलते हैंएक बार एक ही क्षण तो मिलता है तुम्हें। अगर एक क्षण में तुम्हें आनंदित होने की कला आ गईतो सारा जीवन आनंदित हो जाएगा। जिसको एक बूंद रंगने की कला आ गईवह सारे सागर को रंग लेगा। एक-एक बूंद ही तो हाथ में पड़ती हैउसको रंगते जाना। दो बूंद इकट्ठी भी तो नहीं मिलतीं कि अड़चन आए कि हम तो केवल एक बूंद को ही रंगना जानते हैंदो बूंदें एक साथ आ गईं तो हम क्या करेंगे!
एक क्षण आता है एक बारजब चला जाता है हाथ से तब दूसरा क्षण उतरता है। बड़ी संकीर्ण धारा है समय की! दो क्षण भी तो साथ नहीं आते।
एक क्षण को शांत होना आ गया--हो गई स्थायी शांति! हो गई शाश्वत! अब इसे कोई भी तुमसे छीन न सकेगा। हांतुम ही छीन सकते हो। अगर तुम इस क्षण में आनेवाले क्षण की चिंता से भर जाओचिंतातुर हो जाओतो तुमने यहीं खराब कर ली--फिर इस खराब किए हुए क्षण से अगला क्षण पैदा होगावह और भी खराब होगा।
तो पहली बात: पूछो मतस्थायी कैसे करना! इतना ही पूछो कि इसी क्षण में कैसे डूबें! डुबकी में ही स्थायित्व है।
और दूसरी बात: "आपके सान्निध्य में ध्यान की गहराई का कुछ अनुभव होता है...।जो मेरे सान्निध्य में होता हैवह मेरे कारण नहीं होताहोता तो तुम्हारे ही कारण है। जो तुम्हारे भीतर नहीं हो सकतावह किसी के भी सान्निध्य में नहीं हो सकता। हांमेरे सान्निध्य में सुविधा मिल जाती होगी--स्वयं से थोड़ा छूटने कीस्वयं के बंधन थोड़े ढीले करने की। मेरे सान्निध्य में थोड़ा-सा तुम अपनी पुरानी आदतों को किनारे हटा देते होओगेबस! होता तो तुम्हारे ही भीतर है।
इसलिए जो मेरे सान्निध्य में होता हैअब यह एक नया उपद्रव खड़ा मत कर लेना कि घर जाकर न होगा। मन तरकीबें खोजता है। मन कहता है, "वहां हो गया थाउनके कारण हो गया था'। पाप मुझे लगेगा ऐसे। तुम अगर नरक गए तो मैं जिम्मेदार होऊंगा।
यहां तुम्हें जो थोड़ा-सी झलक मिल जाती हैउसमें मेरा कुछ हाथ नहीं हैसिर्फ तुम मेरी थोड़ी सुन लेते होइतनी ही तुम घर पर भी सुननाबात हो जाएगी। इतना तुम थोड़ा-सा मुझे द्वार-दरवाजा देते होथोड़ा अपने को किनारे कर लेते होथोड़ा अपने को बीच से हटा लेते हो--कुछ होता है। घर पर भी इतना ही हटा लेना। यह तुम्हारे ही किए हो रहा है।
छोटे बच्चे का कोई हाथ पकड़ लेता है और चला देता है--चलता तो बच्चा ही है भीतर। दूसरे के हाथ से थोड़ा सहारा मिल जाता हैहिम्मत बढ़ जाती हैअनुभठ आ जाता है। मगर ये हाथ जिंदगीभर पकड़ लेने को नहीं है। नहीं तो इससे घसिटना ही बेहतर थाकम-से-कम खुद तो घसिटते थेअब यह एक और उपद्रव साथ लगाएक दूसरे के हाथअब यह और मजबूरी हुईऔर परंतत्रता हुई।
नहींऐसे किसी पर निर्भर मत हो जाना।
मेरा तो सारा आयोजन यहां यही है कि तुम परम मुक्त हो सकोउसमें तुझसे भी मुक्त होना सम्मिलित है। अगर मुझसे बंध जाओ तो तुम तो और लंगड़े हो जाओगेतुम वैसे ही लंगड़ा रहे होतुम वैसे ही पंगु होयह तो और पक्षाघात हो जाएगा।
यहां थोड़ी-सी झलक लोउसे झलक ही मानताफिर उसे अपने एकांत में गहरानाताकि तुम्हें यह भी अनुभव आ सके कि वह झलक तुम्हारे भीतर से ही आई थी। किसी के हाथ का सहारा मिला था--धन्यवाद! लेकिन इससे ज्यादा निर्भरता न हो। ऐसे ही है जैसे कि कोई बच्चे को तैराक पानी में डाल देता हैहाथ-पैर तड़फड़ाता है बच्चा--हाथ-पैर तड़फड़ाना ही तैरने की शुरुआत है। अकेला शायद उतर भी न पाता पानी मेंडरताघबड़ातापर कोई तैरनेवाला पास में खड़ा हैहिम्मत...हिम्मत साथ दे गई। जो हुआ है वह तो भीतर हो रहा है। दो-चार बार पानी में तैराक डालेगाबच्चे के हाथ-पैर सुघड़ हो जाएंगेफिर कोई जरूरत न रह जाएगीफिर उसे खुद ही हिम्मत आ जाएगी। फिर तो वह दूर सागर भी पार कर ले सकता है।
 मैंने सुना हैएक गांव में एक ग्रामीण किसान बैल को जोतकर अपने हल को चला रहा था। वह कोड़ा भी फटकारता जाता बैल पर और कभी कहता, "हीरा! जोर से', कभी कहता, "मोती! जोर से', कभी कहता, "चंदा! जोर से', कभी कहता, "सरज! जोर से'। एक आदमी खड़ा देख रहा था। उसने कहा, "इस बैल के कितने नाम हैं?' उस किसान ने कहा, "नाम तो इसका एक ही है--हीरा।'
"तो बाकी इतने नाम किसलिए लेते हो?'
तो उसने कहा, "इसकी हिम्मत बढ़ाने को। इसकी आंखें तो बंधी हैंयह समझता है और भी बैल लगे हैं। यह हिम्मत से चला जाता है'
बस इतना ही मेरा काम है--"हीरा! जोर सेमोती! जोर से।लगेतुम अकेले नहीं हो। एक बार हिम्मत आ जाए तो तुम्हारी आंख की पट्टी खोल देंगेकहेंगे, "तुम ही चल रहे थे'
तीसरी बात: जल्दी मत करा। धैर्य बड़ी से बड़ी शिक्षा है धर्म के मार्ग पर। क्योंकि जिसको हम खोजने चले हैंवह इतना विराट है कि तुमने अगर जल्दी मांग कीतो तुम्हारी मांग के कारण ही न मिल पाएगा। मौसमी फूल हम बो देते हैंदो-चार-छह सप्ताह में फूल आ जाते हैं। लेकिन अगर चिनार के वृक्ष लगाने होंदेवदार के वृक्ष लगाने होंतो वर्षों लगते हैं। आकाश को छूनेवाले वृक्ष लगाने हों तो उनकी जड़ें भी पाताल तक पंहुचनी चाहिए।
परमात्मा आखिरी मंजिल हैउसके पार फिर कुछ भी नहीं। इतनी विराट मंजिल को पाने चले होऔर इतने कृपण हो धैर्य के संबंध मेंइतनी जल्दबाजी करते हो!
तुमने देखा भक्तों कोघर-घर में मंदिर बनाकर बैठे हैंजल्दी से घंटी बजा लेते हैंफूल चढ़ा देते हैं। उनके हाथ-पैर देखोइतनी जल्दी में हैं वे कि उनके ये कृत्य देखकर ही भगवान उनसे न मिलेगा! बुलाने में भी तो थोड़ा सलीका हो। उसे पुकारोथोड़ा सोचो भी कि किसे पुकारा है! थोड़ा सौजन्य तो सीखो! इतना बड़ा निमंत्रण भेज रहे होजरा सोच-समझकर पाती लिखो!
लेकिन बड़ा अधैर्य है! तुम अगर अपने अधैर्य पर विचार करोगे तो तुम्हें अपना सारा कृत्य बचकाना मालूम पड़ेगा। कोई रोज गीता पढ़ लेता हैकोई पूजा कर लेता हैकोई फूल चढ़ा देता हैकोई मंदिर में सिर झुका आता है--लेकिन क्या कर रहे हो तुमऔर फिर इससे तुम आशा बांधने लगते हो कि अभी तक मिला नहींअभी तक स्थायी आनंद नहीं मिलाअभी तक परमात्मा का कोई दर्शन नहीं हुआ! नहींयह भक्त का ढंग नहीं।
हम भी तस्लीम की खू डालेंगे
बेनियाजी तेरी आदत ही सही।
देर लगाना तेरी आदत होकोई हर्जा नहींहम भी सब्र की आदत डाल लेंगेऔर क्या! अगर तू देर करता हैठीक। जितनी देर तू कर सकता हैउससे ज्यादा देर धैर्य रखने की हम आदत डाल लेंगे।
हम भी तस्लीम की खू डालेंगे
बेनियाली तेरी आदत ही सही
जल्दी में मत पड़ना। जल्दी ही तनाव पैदा कर देती है। जल्दी के कारण ही मन बेचैनी पैदा हो जाती है। धीरज से चलो! अनंत-अनंत काल मौजूद है। मन में बेचैनी पैदा हो जाती है। धीरज से चलो! अनंत-अनंत काल मौजूद है। कहीं कोई जल्दी नहीं है। समय की अनंत धारा मौजूद हैन कोई छोर है न कोई ओर हैन कोई प्रारंभ है न कोई अंत है। इस शाश्वत में तुम व्यर्थ ही परेशान हुए जा रहे हो। तुम दौड़-धूप किसलिए कर रहे होतुम्हारी दौड़-धूप से कुछ जल्दी न हो जाएगा। जल्दी की जरूरत नहीं।
जरा वृक्षों को देखोकैसे अलसाए हुए हैं! चांदत्तारों को देखोकैसे चुपचाप गतिमान हैं! कहीं पहुंचने की कोई जल्दी तुम्हें अस्तित्व में दिखाई पड़ती हैअस्तित्व ऐसा शांत है जैसे पहुंच ही हुआ होपहुंचने की जल्दी मालूम ही नहीं होती।
ऐसा ही भक्त भी हैउसने अस्तित्व की भाषा समझ ली है। वह कोई जल्दी में नहीं है। वह कोई प्रार्थना इसलिए नहीं करता कि भगवान प्रार्थना करने से मिलेगा--प्रार्थना उसका आनंद है। वह पूजा इसलिए नहीं करता कि ठीक हैपूजा करने से मिलता है तो चलो पूजा किए लेते हैं। यह कोई साधन नहीं है पूजायह साध्य है। वह अहोभाव से भरा हैआनंद से भरा हैकैसे अपने आनंद को प्रगट करेंकिस भाषा में परमात्मा से कहें कि तेरे अनंत आशीषों की वर्षा मेरे ऊपर है! तुतलाकर--पूजा की भाषा में,भजन कीकीर्तन की भाषा में कह देता है कि तेरी अनंत अनुकंपा मेरे ऊपर है! प्रार्थना से वह कुछ पाना नहीं चाहता।
और मजा यही है कि जिसने प्रार्थना से कुछ पाना न चाहाउसे सब मिला। और जिसने प्रार्थना में भी पाने का जहर डाल दिया,उसकी प्रार्थना भी मर गईऔर कुछ मिलने की तो बात ही न रही।
प्रार्थना में जहां मांग आईजहर आया। प्रार्थना में जहां कामना प्रविष्ट हुईप्रार्थना तिरोहित हुई।
तो प्रार्थना प्रार्थना के आनंद के लिए है। फिर इसी क्षण में तुम खूब सुखी हो उठोगे। दूसरा क्षण इसी से आएगाआता रहेगा,आता ही रहा है।

तीसरा प्रश्न: भक्त अंतिम अवस्था तक आराध्या को नहीं भुला पाता हैक्या मुक्ति के लिए अंततः आराध्य की छवि का विसर्जन भी अनिवार्य है?

प्रश्न भक्त का नहीं है। भक्त तो चाहता ही नहीं मुक्ति को। भक्त तो कहता है, "ऐसा मत करना कि मुक्ति हो जाए! ये बंधन बड़े प्यारे हैं'!
भक्त कहता है, "मुक्ति को छोड़ने को तैयार हैंभगवानतुझे छोड़ने को तैयार नहीं। तू मुक्ति अपनी सम्हाल। किसी और को दे देनाऔर बहुत भिखारी  हैं! हमें तो तू ही काफी है। तू हमें हजार-हजार बंधनों में बांध! तू प्रेम के न मालूम कितने डोले सजा! तू हमें प्रेम की यात्रा पर ले चल!'
"मुक्तिभाषा ही भक्त की नहीं है। तुम्हारी अड़चन मैं समझता हूंबहुत सी भाषाएं गड्डमगड हो गई हैं। तुम पूछते हो, "मुक्त्ति के लिए भगवान बाधा है?' पर भक्त मुक्ति मांगता नहीं--और भक्त मुक्त हो जाता हैमांगता नहीं। भक्त की मुक्ति निश्चित है,लेकिन भक्त्त के बिना मांगे घटती है।
अब इसको भी थोड़ा समझना।
भक्त के अतिरिक्त जितने मार्ग हैं वे मुक्त्ति मांगते हैं। भगवान को वे उपयोग करते हैं साधन की तरहमाध्यम की तरह। योग में पतंजलि भगवान को भी एक साधन मान लेते हैं: "ईश्वर के प्रति समर्पणयह और विधियों में एक विधि हैइस भांति व्यक्ति परम मोक्ष को उपलब्ध हो जाता है'। भगवान के ऊपर है मोक्ष! और भगवान एक विधी है और विधियोंमें! अनिवार्य विधि भी नहीं हैक्योंकि बुद्ध बिना भगवान को माने भी मुक्ति की राह बता देते हैंमहावीर बिना भगवान को माने भी मुक्ति की राह बता देते हैं।
तो पहली तो बात: और विधियों में एक विधी है। दूसरी बात: विधि भी अनिवार्य नहीं हैछोड़ी जा सकती है।
भक्त के अतिरिक्त जो मार्ग है--ज्ञान केयोग केहठ केक्रिया के--उन सब में मुक्ति परम है। भगवान को अगर किसी ने जगह दी भी हैतो एक साधन की तरह। भक्त के लिए भगवान परम है।
मुक्ति क्या है भक्त के लिएभक्त के अतिरिक्त जो साधक हैंउनके लिए--ऐसी घड़ी का आ जाना जहां वे भगवान से भी मुक्त हो जाएंमुक्त्ति हैजहां दूसरा न रह जाएस्वयं का होना ही आत्यंतिक हो जाएआखिरी हो जाएकोई दूसरा न हो। इसलिए महावीर ने उस परम अवस्था को "कैवल्यकहा--एकमात्र तुम्हारी चेतना बचे! या आत्मा कहापरमात्मा कहा। महावीर का "परमात्माशब्द भगवान का पर्यायवाची नहीं है--परमात्मा का अर्थ है: आत्मा की परम स्थितिआखिरी ऊंचाईतुम इस ऊंचाई पर आ गएजिससे और ऊपर कोई ऊंचाई नहीं।
भक्त के लिए मुक्ति क्या है?
भक्त कहता है, "ऐसी घड़ी आ जाए कि तू ही तू रह जाएमैं न रहूं।'
भक्त के अतिरिक्त लोग हैंवे कहते हैं, "ऐसी घड़ी आ जाएमैं ही मैं रहूंतू न रहे'
भक्त कहता है, "मैं! मैं ही तो उपद्रव हूंमैं मिट जाऊंबस तू ही तू रह जाए!'
भक्त कहता है, "बांधनेवाला तेरा बंधन तो रहेबंधनेवाला मैं न रह जाऊं! तेरा बंधन तो मुझे हजार-हजार रंग-रूपों में बांध ले,लेकिन मैं तुझ में लीन हो जाऊं'
भक्त अपने को मिटाना चाहता है भगवान में। भक्त के अतिरिक्त जो हैं वे भगवान को मिटा लेना चाहते हैं अपने में। भक्त की भी मुक्ति फलित होती हैपर बड़ी अनूठी है उसकी मुक्ति! उसमें भक्त खो जाता हैभगवान बचता है। इसलिए भगवान को खोकर तो भक्त मुक्ति मांग ही नहीं सकतावह तो असंभव है।
पूछा है: "भक्त अंतिम अवस्था तक आराध्य को नहीं भुला पाता है...'
भुलाना चाहता नहीं। तुम उसे भुलाने के रास्ते बताओवह भाग खड़ा होगा कि यह क्या रास्ता बता रहे हो! वह कहेगा, "दूर ही रखो अपने सिद्धांत! बामुश्किल तो किसी तरह उसका सहारा पकड़ पाए हैं और तुम भुलाने का उपाय बताते हो!भक्त तुमसे पूछेगा, "ऐसा कुछ बताओ कि वह ही वह रह जाए और मैं भूल जाऊं!'
भक्त भगवान से ही पूछ लेता है अंतिम क्षणों मेंऔर किसी से पूछने की उसे जरूरत भी नहीं है। जैसे-जैसे राग बंध जाता है,जैसे-जैसे भीतर का तार उसी के तारों के साथ नाचने लगता हैजैसे-जैसे संगीत लयबद्ध होता है--वह उसी से पूछने लगता है। वह कहता है, "अब तू ही बता दे!'
भक्त औरों को तो पागल मालूम पड़ेगाक्योंकि उसकी भाषा प्रेम की है।
इक बात भला पूछेंतुम कैसे मनाओगे?
जैसे कोई रूठा हो और तुमको मनाना हो
वह भगवान से ही पूछ लेता है कि सुनो--
इक बात भला पूछेंतुम कैसे मनाओगे?
जैसे कोई रूठा हो और तुमको मनाना हो
वह बात करने लगता है सीधी! भक्ति संवाद है! वह किसी और से पूछता नहींवह भगवान से ही पूछता है। जिसके तार उससे ही जुड़ गएअब किसी और से पूछने की जरूरत भी न रही।
तेरा गमराज़ मेराखामोशी मेरीसुखन मेरा
यही है रूह मेरीहुस्न मेरापैरहन मेरा।
वह कहता है, "तेरे मिलने की तो बात दूरतुझे न मिलने का जो दुख हैवह भी इतना प्यारा है। यही मेरा रहस्य हैतुझे न पाने की पीड़ाराज़ मेराखामोशी मेरी--तू मिलकर तो क्या करेगापता नहींतेरी अनुपस्थिति के बोध ने भी मुझे खामोशी कर दियामौन कर दिया। सुखन मेरा! तेरे न मिलने से भी मेरे भीतर अनाहत-वाणी का नाद शुरू हुआ हैमिलने से क्या होगा पता नहीं! यही है रूह मेरी! और अब तो तेरी गैर-मौजूदगी की पीड़ा ही मेरी आत्मा है। हुस्न मेरा! यही है सौंदर्य मेरा! पैरहन मेरा! यही मेरे वस्त्र हैं! यही मेरी आत्मा है। यही मेरी देह है! यही मेरी वाणी हैयही मेरा मौन है--तेरे न मिलने का गम...!
परमात्मा के मिलने पर भक्त उसी पूछ लेता है कि अब तू ही बता देकैसे अपने को पूरा-पूरा खो दूं। धीरे-धीरे खोता ही चला जाता है। एक-एक कदम मिटता ही चला जाता है।
यह प्रश्न हमारे मन में उठता हैक्योंकि हमने बुद्धि से सोचा है। हमने बुद्धि से शास्त्र पढ़े हैं। शास्त्रों में लिखा हैजब तक दो रहेंगेद्वैत रहेगातब तक तो संसार रहेगाअद्वैत चाहिए। मानानिश्चित ही अद्वैत चाहिए। लेकिन अद्वैत दो ढंग का हो सकता है: या तो भगवान मिटे या भक्त मिटे।
तुम जरा अपने से पूछनातुम्हारा मन कहेगा: "भगवान ही मिटे। मैं और मिटूं! यह बात जंचती नहीं'। तुम भगवान को ही अपने लिए मिटा लेना चाहते होइसलिए मुक्त्ति का सवाल उठता है। पर यह तो बड़े अहंकार की भाव-दशा हुई। तुमने शब्द अच्छे खोजे--"अद्वैत'...लेकिन छिपा ले गए नास्तिकता को। बातें तुमने बड़ी धार्मिक कींलेकिन आखिर में अपने को बचा लिया।
जो धर्म तुम्हें मिटाये वह धर्म ही नहीं। धर्म तो आत्मविसर्जन हैस्वयं को पिघलानाबहा देना है। तुम्हारी अकड़ पिघल जाए;बर्फ की तरह जमी तुम्हारी छाती पिघल जाएतुम बह जाओ सब दिशाओं मेंतुम उसके अस्तित्व के साथ एक हो जाओ!
मुक्ति की बातें ही क्या हैंअपने से मुक्त होना हैअस्तित्व से थोड़े ही मुक्त होना है! भगवान यानी अस्तित्व। नामों पर मत जाना। भगवान कहोसत्य कहोनिर्वाण कहोमोक्ष कहो--जो तुम्हारी मर्जी हो। लेकिन अस्तित्व और तुम...तुम बड़े छोटे हो। एक छोटी-सी बूंद महासागर के सामनेयह आकांक्षा कर रही है कि किसी तरह महासागर मिट जाए! वह आकांक्षा ही भ्रांत है।
मुक्ति यानी अपने से मुक्ति। और भगवान में मिटने के लिए भक्त्ति से और ज्यादा सुगम कोई उपाय नहीं है। इसलिए नारद ने कहाभक्ति सभी साधनों में श्रेष्ठ है। क्योंकि पहले चरण से ही तुम्हारे मिटने की यात्रा शुरू हो जाती है। सुगम हैनारद ने कहा। और मार्गों पर पीछे अड़चन आती हैक्योंकि पहले तो तुम मजबूत होते चले जाते होफिर एक घड़ी आती हैतब मजबूत हो गए अहंकार को छोड़ना पड़ता है। भक्ति पहले ही कदम से तुम्हें बिखेरने लगती है।
इसलिए दुनिया में बहुत कम भक्त हुए हैंयोगी बहुत हुए। तुम्हारा समझना शायद उलटा हो। तुम शायद सोचते हो भक्त तो बहुत हुए हैं। भक्त न के बराबर हुए हैंक्योंकि भक्त होना दुस्साहस है। योगी होने में दुस्साहस नहीं है। तुम अपने मालिक हो--सिर के बल खड़े रहो कि आसन लगाओ कि सांस रोको कि जो तुम्हें करना हो करोलेकिन तुम अपने मालिक हो। संकल्प मजबूत होता चला जाता हैअहंकार तीखा होता चला जाता हैधार पैनी होती चली जाती है। इसलिए योगियों के अहंकार की धार को देखोतलवार की तरह चमकती है!
भक्त झुकता है। भक्त अपने को बिखेरता है। भक्त बड़ा कमनीय हो जाता हैकोमल हो जाता हैनाजुक हो जाता है। योगी पथरीला हो जाता हैजिद्दी हो जाता हैअकड़ जाता हैकुछ करने का खयाल आ जाता है। योगी सिद्धि की तलाश में है,शक्ति मिल जाए। भक्त सिर्फ अपने को खोने चला है।
"अंततः क्या मुक्त्ति के लिए आराध्य की छवि का विसर्जन भी अनिवार्य है?'
तुम ही खो जाते हो। आराधक खो जाता है। स्वभावतः जब आराधक खो जाता हैआराध्य भी खो जाता हैक्योंकि आराध्य बचेगा कहां जब आराधक न बचाजब भक्त न बचा तो भगवान कहां बचेगामगर खोने की शुरुआत होती है भक्त से: इधर भक्त खोयाउधर भगवान गयाएक ही बचा। अब उसे तुम जो चाहे कहो--भक्त कहोभगवान कहोसब एक ही ह।
लेकिन प्रश्न पूछा गया है साधक के दृष्टिकोण सेभक्त के दृष्टिकोण से नहीं--"आराध्य को खोना है! उसकी छवि खो जाती है!'देखनेवाला खो जाता हैस्वभावतः दृश्य भी खो जाता है। एक ही ऊर्जा बचती है। न दृश्य होता है न द्रष्टा होताएक ही ऊर्जा बचती है। कहो उसे दर्शन की ऊर्जा...। मगर भक्ति की भाषा में उचित होगाकहो--प्रेम की ऊर्जा। न प्रेमी बचता है न प्यारा बचता है--प्रेम ही लहरें लेने लगता है।
लामकाने-कोकबेत्तकदीरे-आदम इश्क है
पासबाने-अजमतेत्तामीरे-आदम इश्क है
ख्वाबे-आदम इश्क हैताबीरे-आदम इश्क है
इश्क हैहां इश्क है मेमारे-कसरे-दो जहां।
मनुष्य के भाग्य-नक्षत्र को चमकानेवाला ईश्वर प्रेम है। मानव-निर्माण की प्रतिष्ठा का रक्षक प्रेम है। मनुष्य का स्वरूप प्रेम है। स्वप्न प्रेम है। लोक-परलोक दोनों दुनियाओं का निर्माता प्रेम है।
प्रेम ही बचता है।
ऐसा समझो कि गंगा बहती हैदो किनारों से बीच। दो किनारे--एक भक्तएक भगवानबीच में जो बह रही है धारा प्रेम की,भक्ति कीअसली गंगा तो वही है। लेकिन साधक भगवान को खोना चाहता हैभक्त अपने को खोना चाहता हैयद्यपि दोनों दिशाओं से दोनों खो जाते हैंअंततः बीच की धारा ही रह जाती हैगंगा ही बचती है प्रेम की।

चौथा प्रश्न: कल संध्या दर्शन के समय दो विकल्प थे। मैंने चरणस्पर्श करने का निर्णय इसलिए लिया कि बहुत समय बाद क्षणभर को अपने प्रीतम को निकट से देखूंगालेकिन वह क्षण आया तो ऊपर आपकी ओर देखा ही न गया। और अब रोता हूं,रोता हूं। ऐसा क्यों हो जाता है आपके निकट?

देखने के लिए सिर उठाना जरूरी थोड़े ही है--सिर झुकाकर भी देखा जाता है। असली देखना तो सिर झुकाकर ही देखना है। नाहक रोओ मत। और जिसने सिर झुकाकर देख लियाफिर सिर उठाकर देखने का कोई सवाल ही नहीं। इसलिए न उठा होगा सिर।
आंखों से थोड़े ही देखना होता हैअन्यथा देखना बड़ा आसान हो जाता। आंखें तो सभी की खुली हैंअंधा कौन हैआंखों से ही देखना होता तो सभी कुछ हो जाता। देखना कुछ आंखों से ज्यादा गहरी बात है--हृदय की है। और हृदय तभी देख पाता है जब झुकता है। फिर उठने की खबर किसको रह जाती है!
नहींकुछ भूल हो गई है। तुम अपने रोने को नहीं समझ पा रहे हो। तुमने व्यर्थ का एक बौद्धिक उलझाव और समस्या खड़ी कर ली है। तुम्हारी व्याख्या में कहीं भूल हो गई हैंअन्यथा तुम खुश होतेअन्यथा तुम्हारा रोना आनंद का रोना हो जाता। फिर से देखना।
यह घटना बहुत बार घटेगीइसलिए समझ लेना जरूरी है। बहुत बार ऐसा होता हैजब हृदय से कुछ घटता है तो भी बुद्धि पीछे से आकर व्याख्या करती है। हृदय तो व्याख्या करता नहींअव्याख्य हैघटता है कुछभोगता हैलेकिन काट-पीटकर विश्लेषण नहीं करता। हृदय के पास विश्लेषण है ही नहीं। हृदय तो जोड़ना जानता हैतोड़ना नहीं। हृदय तो अनुभव कर लेता है,लेकिन फिर अनुभव के पीछे खड़े होकर उसका बौद्धिक विश्लेषण नहीं करना जानता। तो जैसे ही अनुभठ हो गयाबुद्धि झपट्टा मारती हैजैसे कहीं लाश पड़ी हो तो चीलें झपट्टा मारती हैंगिद्ध झपट्टा मारते हैंहृदय ने जो अनुभव कियाजैसे ही अनुभव हो गयाअतीत में चला गयाअनुभव मर चुकावैसे ही बुद्धि झपट्टा मारती हैबुद्धि की चील झपट्टा मारती है,पकड़कर मुर्दा चील की चीर-फाड़ करती हैं--पोस्टमार्टम! उसमें हिसाब लगाती हैक्या हुआ! और सब गड़बड़ हो जाता है। क्योंकि बुद्धि को तो अनुभव हुआ न थाजिसको अनुभव हुआ था उसने व्याख्या न की और जिसको अनुभव नहीं हुआ वह व्याख्या करता है।
पूछा है: "कल संध्या दर्शन के समय दो विकल्प थे। मैंने चरण-स्पर्श करने का निर्णय इसलिए लिया कि बहुत समय बाद क्षणभर को अपने प्रीतम को निकट से देखूंगालेकिन वह क्षण आया तो ऊपर की ओर देखा ही न गया'
जरूरत ही न थी। भीतर देखने की जरूरत है। प्रीतम बाहर नहीं है। आंख खोलने की कमआंख बंद करने की जरूरत है। प्रीतम बाहर नहीं है। जिस दिन तुम मुझे अपने भीतर देखोगेउसी दिन मुझे देखाउसके पहले तो देखने की तैयारी हैउसके पहले तो देखने की बारहखड़ी है।
फिर पीछे सोचा होगा।
"और अब रोता हूंरोता हूं'। अब बुद्धि ने कहा होगा, "यह तुमने क्या किया?' बुद्धि पीछे से आ जाती है परेशान करने को। अगर तुम हृदय से इस बात को समझोतो जिस क्षण झुकेउस क्षण कुछ ऐसा हुआ--
बेखुदी कहां ले गई हमको
देर से इंतजार है अपना!
झुके जब तुमखो गए एक क्षण कोएक क्षण को तुम न रहे--उस झुकने में विसर्जित हो गए। इसलिए लौटकर देखने का खयाल न आ सका। कोई था ही नहीं जो देखता। एक क्षण को सब शांत हो गयाकोई लहर न उठी। एक अनूठा क्षण आया! एक झरोखा खुला! लेकिन झरोखा तभी खुलता है जब तुम नहीं होते। फिर पीछे से तुम लौट आए। तब तक झरोखा बंद हो गया। अब तुम पछताते हो। अब तुम रोते हो। दुबारा ऐसी भूल मत करना।
बुद्धि को हृदय का विश्लेषण करने की आज्ञा मत दो। बुद्धि को विश्लेषण अटकाते हैंभटकाते हैंजो जैसा है उसे वैसा ही नहीं देखने देते। बुद्धि की धारणाएं आकर बड़ा धुआं खड़ा कर देती हैं।
स्मरण रखो--
जो राह अहले-खिरद के लिए है ला-महदूद
जुनुने-इश्क को वह चंदगाम होती है।
बुद्धि के लिए जो रास्ता बहुत ही लंबा हैप्रेम के लिए दो-चार कदम का भी नहीं।
जो राह अहले-खिरद के लिए है ला-महदूद--जिसका अंत ही नहीं आताबुद्धि के लिए जो चलता ही जाता है रास्ता...जुनूने-इश्क को वह चंदगाम होती है--लेकिन जो प्रेम में मतवाला हैप्रेम में पागल हैउसके लिए कुछ कदम ही काफी हैं। अगर प्रेम का मतवालापन पूरा-पूरा होउसकी त्वरा पूरी होतो एक ही कदम काफी है। एक कदम से हजारों मील की यात्रा पूरी हो जाती है। लेकिन वह कदम हृदय सक उठना चाहिएबुद्धि और विचार से नहीं।
अब दुबारा जब झुको तो बुद्धि को मौका मत देना व्यर्थ बीच में आकर उपद्रव करने का। जब झुको तो हृदयपूर्वक उस क्षण को अनुभव करने की कोशिश करना: "क्या हुआ!हृदय से ही! सोच-विचार की कोई जरूरत नहीं है--सिर्फ जागने कीजागरूकता की,होश की जरूरत है। थोड़ा जागकर उस क्षण में देखनातुम अपने को न पाओगे। और जहां तुमने अपने को न पायावहीं द्वार खुला हैक्योंकि तुम ही दरवाजातुम ही दीवाल हो। तुम अगर हो तो दीवालतुम अगर नहीं हो तो दरवाजा।
अब उठा ही चाहता है होश के रुख से नकाब
भर चुकी है अक्ल का बहुरूप नादानी बहुत।
अब बहुत हो चुका। और नासमझी ने बुद्धिमानी के बहुत रूप रख लिए और बहुत दिन धोखा दिया।
भर चुकी है अक्ल का बहुरूप नादानी बहुत--जिसको तुम बुद्धिमानी कहते हो वह सिर्फ नादानी है। नादानी ने बुद्धिमानी के बहुत रूप रखे हैंबहुत-बहुत तरह से तुम्हें बुद्धिमान बनने का धोखा दिया है। छोड़ो अब उसे।
अब उठा ही चाहता है होश के रुख से नकाब--घड़ी पास आती हैजब अगर तुम थोड़े सम्हलेझुके और उठे नझुके और सोचा नबाहर देखने की चिंता न कीक्योंकि प्रीतम भीतर हैझुके तो झुके रह गएतो गएलौटे नबुद्धि को मौका न दियाहृदय के ही पूरे हो रहे--तो ज्यादा दूर नहीं है। अब उठा ही चाहता है होश के रुख से नकाब--तो तुम्हारे भीतर जो होश दबा पड़ा है उसका घूंघट उठ जाएगा। और बुद्धिमानी के नाम पर नादानी बहुत धोखा दे चुकीअब जाग जाने का समय है!

पांचवां प्रश्न: आपको रोज-रोज सुनते हैंरोज-रोज देखते हैंफिर भी जी क्यों नहीं भरताऔर कहीं बाहर भी चले जाते हैं तो भी जी यही लगा रहता है। कृपा कर समझाइये!

जी की बातें समझायी नहीं जाती। और समझना हो तो अपने जी से ही पूछना चाहिए। बात समझने-समझाने की नहीं है।
समझ तो तुम गए होलेकिन जो मैंने अभी-अभी कहा कि बुद्धि लौट-लौटकर हृदय पर कब्जा करती हैबुद्धि हृदय को मुक्त भाव से जीने नहीं देतीबुद्धि हृदय को सहज भाव से प्रवाहित नहीं होने देती--वह लौट-लौटकर आ जाती है। अब अगर तुम्हारा मन लग गया हैअगर तुम्हारे हृदय के तार मेरे हृदय के तारों से कहीं जुड़ गए हैं तो बात सीधी-साफ हैसमझना-समझाना कया! जाहिर है कि प्रेम में पड़ गए होपागल हो गए हो! नहीं तो कोई रोज-रोज सुनने आता है?
मकतबे-इश्क का दुनिया में है निराला उसूल
उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ।
साधारण दुनिया में और पाठशालाएं हैंवहां जिसको सबक यादा हो जाता है उसको छुट्टी मिल जाती हैबात खत्म हुई! लेकिन प्रेम की पाठशाला का बड़ा उलटा ढंग है।
मकतबे-इश्क का दुनिया में है निराला उसूल
उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ।
तुम्हें सबक याद हो गेया है। अब जी कहीं लगेगा न। और यह सबक ऐसा है कुछ कि सीख गए तो सीख गएफिर भूलने का उपाय नहीं। इसलिए तो लोग सीखने में बड़ी आनाकानी करते हैं। सीखते ही नहीं। ठीक ही कहते हैं एक हिसाब सेसीख गए तो फिर भूल नहीं सकते। तो जितनी देर करनी होसीखने के पहले ही कर लेना। अंगुली तुमने मेरे हाथ में दी तो पहुंचा बहुत दूर नहीं है।

अंतिम दो प्रश्न: भक्त्ति-सूत्र के रचनाकार नारद बहुआयामी व्यक्तित्व के मालूम पड़ते हैं। झगड़ा लगाने में उन्हें विशेष रस मिलता है। वृद्धावस्था में भी कामिनी-कांचन के प्रति उनका मोह कायम रहता है। ढाई घड़ी से अधिक एक जगह टिकते नहीं। कृपापूर्वक इस रहस्य-भरे व्यक्तित्व पर थोड़ा प्रकाश डालें।

रहस्य कुछ भी नहींसीधी-सीधी बातें हैं। लेकिन हम इतने उलटे हो गए हैं। रहस्य हम में हैनारद में नहीं। ऐसा कुछ है कि सारी दुनिया शीर्षासन कर रही है और एक आदती सीधा खड़ा हैतो उलटा मालूम होता है।
सीधे-से सूत्र हैं। झगड़ा लगाने में उन्हें विशेष रस लगता है। झगड़ा मिटाने का एक ही उपाय है: उसे पूरा-पूरा लगा देनाअन्यथा झगड़ा मिटता ही नहीं। जो चीज पूरी हो जाती हैमिट जाती है। इतनी-सी सार की बात है नारद के सारे झगड़े में। बड़ा सूत्रात्मक है।
जिस चीज को भी तुमने दबाया उसी में उलझ जाओगे। झगड़े को पूरा हो ही लेने देना। अगर तुम्हारे भीतर बुद्धि में और हृदय में झगड़ा है तो उसे पूरा हो लेने दोउसे पहुंच जाने दो अंतिम सीमा तकउसे उठने दोउसको सौ डिग्री तक बढ़ने दो। इससे बीच में अगर जल्दी की और कच्चे-कच्चे तुमने उसको रोक लियातो उलझे रह जाओगेखंडित रहा जओगे। अगर तुम्हारी प्रार्थना और कामना में झगड़ा है तो झगड़े को दबाना मतउभारना। अगर तुम्हारे क्रोध में और प्रेम में झगड़ा है तो उसको उभारनादबाना मत। उभारने का अर्थ है: रेचनकेथारसिस। उसे पूरा का पूरा ले आना।
बाकी कथाएं तो प्रतीक हैं। जहां कहीं झगड़ा होनारद संलग्न हो जाते हैं। झगड़े का पूरा उभार ले आनाउसको पूरा रूप दे देना--उसकी मृत्यु है। कुछ चीजें हैं जो पूरी होकर मर जाती हैं और बिना पूरे हुए कभी नहीं मरतीं। जैसे सूखे पत्ते वृक्ष से अपने-आप गिर जाते हैंपके फल वृक्ष से अपने-आप टपक जाते हैंकच्चे फलों को तोड़ना पड़ता है।
नारद का झगड़ा और झगड़े में रस फलों को पकाने की प्रक्रिया है। इसके पीछे बड़ी सार्थक बातें जुड़ी हैं। लेकिन नारद की इस तरह से कभी कोई व्याख्या नहीं हुईइसलिए कठिनाई हो गई। और नारद जैसा अनूठा व्यक्तित्व हंसी-मजाक का कारण हो गया।
"वृद्धावस्था में भी कामिनी-कांचन के प्रति उनका मोह कायम रहता है।इसका कुल अर्थ इतना है कि वृद्धावस्था में भी उनकी युवावस्था नहीं खोती। बुढ़ापा भी उन्हें बूढ़ा नहीं कर पाता--इतना-सा मतलब है। मौत उन्हें मार न पाएगी। जिसको बुढ़ापे ने बूढ़ा कर दिया उसको मौत मार डालेगी। ये तो प्रतीक हैं। इतनी सी खबर है इस बात में कि नारद ताजे बने रहते हैंयुवा बने रहते हैं--अंतिम क्षणों तक!
नारद बूढ़े नहीं होतेचादर जवान रहती हैताजी रहती हैज्यों की त्यों रहती हैएक रेखा नहीं पड़ती। लेकिन "कामिनी-कंचन'शब्द आते से ही घबड़ाहट हो जाती है। फिर हम भूल जाते हैं प्रतीक की भाषा को। यही कबीर ने कहा हैलेकिन उनकी बात को किसी ने उलटा नहीं समझा क्योंकि भाषा उन्होंने तुम्हारी समझ में आ सकेऐसी उपयोग की है। कबीर ने कहा है: "ज्यों की त्यों धरि दीन्ही चदरिया! खूब जतन से ओढ़ी चदरियाज्यों की त्यों धरि दीन्ही चदरिया'। यह भी वही बात हैप्रतीक अलग है।
नारद बूढ़े नहीं होतेचादर जवान रहती हैताजी रहती हैज्यों की त्यों रहती हैएक रेखा नहीं पड़ती। लेकिन "कामिनी-कंचन'साधुओं ने दोनों शब्दों को बड़ा खराब कर दिया हैगालियां हैं। किसी को यह कह दिया कि कामिनी-कंचन में रस हैबस नरक का द्वार उसके लिए खोल दिया।
भक्त के लिए कामिनी और कंचन में भी परमात्मा ही है। भक्त की भाषा दमन की नहीं हैऊर्ध्व-आरोहण की है। भक्त यह कहता हैजहां भी सौंदर्य है उसी का है: कहीं कामिनी में प्रगट हैकहीं फूल प्रगट हैकहीं चांदत्तारों में प्रगट है! रूप उसने कुछ भी रखे होंरूपायित वही हुआ है। मिट्टी भी उसी की हैसोना भी उसी का है। मिट्टी की भी अपनी सुगंध हैसोने का अपना सौंदर्य है। भक्त न तो मिट्टी के पक्ष में हैन सोने के विपरीत है। भक्त विभाजन नहीं करता। भक्त ने अविभाज्य रूप से परमात्मा को अंगीकर किया हैबाहर भी विभाजन नहीं करताअपने भीतर भी विभाजन नहीं करताभीतर भी अपने को स्वीकार करता है--जैसा उसने बनाया हैवैसा ही स्वीकार करता है। भक्त के मन में त्याज्य कुछ भी नहीं हैभोग भी नहीं है,क्योंकि भोग भी "उसकाही प्रसाद है।
भक्त को समझना बड़ा कठिन है। योगीत्तपस्वियों को हम समझते हैंक्योंकि वेहम से विपरीत हैंसमझना आसान है। हम धन के पीछे दौड़ रहे हैंवे धन छोड़कर भाग रहे हैं--दोनों भाग रहे हैंदोनों धन से जुड़े हैं: एक धन के लिए भाग रहा हैएक धन से दूर भाग रहा है। भाषा में कठिनाई नहीं है। हमारी पीठ एक-दूसरे की तरफ होगीलेकिन बंधे हम एक ही चीज से हैं--धन! हम स्त्री के पीछे दिवाने हैंवह स्त्री से बचने के पीछे दीवाना है--बाकी दोनों की नजर स्त्री पर लगी है। दोनों स्त्री से गुंथे हैं।
भक्त भाग ही नहीं रहा। नारद तो अपना एकतारा बजा रहे हैंवे भागते-करते नहीं। उन्हें सब स्वीकार है। उन्होंने दोनों लोक को स्वीकार किया है। यही उनकी कथाओं का अर्थ है कि वे पृथ्वी से वैकुंठ दिन-रात यात्रा कर रहे हैं। उनका आवागमन अनवरुद्ध  हैउन्हें कहीं कोई रोकने वाला नहीं है। इस लोक से उस लोक जाने में कोई सीमा नहीं। मतलब इतना है। इस लोक और उस लोक के बीच में कोई सेतु नहीं बनाना पड़ रहा है उन्हेंदोनों जुड़े हैंअखंड हैं। कहना ही मुश्किल है कि कहां यह लोक समाप्त होता है और कहां वह लोक शुरू हाता है। कहीं कोई चुंगी-नाका नहीं है। निर्बाध नारद यहां से वहां एक ही संगीत की लय पर,एक ही एकतारे को बजाते हुए वैकुठ को पृथ्वी से जोड़ते रहे हैं। उनका एकतारा दो लोकों को एक कर रहा है। उनकी यात्रा अनूठी है।
नारद के व्यक्तित्व को फिर से पूरा का पूरा समझने की जरूरत है। क्योंकि नारद का व्यक्तित्व अगर ठीक से समझा जा सके तो दुनिया में एक नए धर्म का आविर्भाव हो सकता है--एक ऐसे धर्म का जो संसार और परमात्मा को शत्रु न समझेमित्र समझेएक ऐसे धर्म का जो जीवन-विरोधी न होजीवन-निषेधक न होजो जीवन को अहोभावआनंद से स्वीकार कर सके;एक ऐसे धर्म का जिसका मंदिर जीवन के विपरीत न होजीवन की गहनता में हो!
"ढाई घड़ी से अधिक एक जगह नहीं टिकते'!
 क्या टिकता हैढाई घड़ी बहुत बड़ा समय है। कुछ भी टिकता नहीं है। डबरे टिकते हैंनदियां तो बही चली जाती हैं। नारद धारा की तरह हैं! बहाव है उनमें! प्रवाह है! प्रक्रिया है! गति है! गत्यात्मकता है! डबरे तो सड़ते हैं। एक ही जगह पड़े रहते हैं मानामगर सिवाय कीचड़-कबाड़ के कुछ पैदा नहीं होता। स्वच्छता के लिए प्रवाह चाहिए।
लेकिन तुम सभी डरे हुए हो प्रवाह से। तुम सभी डरे हुए हो परिवर्तन सेक्योंकि परिर्वतन के पीछे मौत छिपी मालूम होती है। अगर परिर्वतन होगा तो मौत आएगी। तुम सब यह चाहोगे कि अगर कोई चमत्कार कर सके और तुम जैसे हो जहां होवहीं डबरे की तरह ठहर जाओमूर्तियों की भांतिपत्थर! एक चमत्कार ईश्वर करे और अब अपनी-अपनी जगह जैसे हैंवैसे ठहर जाएंतो तुम बड़े खुश होओगेहालांकि मर जाओगेमगर तुम बड़े प्रसन्न होओगे कि चलोअब मौत नहीं आएगी। मगर मौत आ ही गई!
जरा जीवन को देखो चारों तरफ: कितनी गति है! कहीं कुछ ठहरा हुआ हैसिवाय तुम्हारे भय कीमन की आकांक्षाओं के,ठहरने का कहीं कोई स्थान हैसब बदल रहा है। सब रूपांतरित हो रहा है। लहरें आती हैंजाती हैं सागर की! सृष्टि और प्रलय! दिन और रात! सब बदल रहा है!
ढाई घड़ी! तुम ज्यादा न डर जाओइसलिए ढाई घड़ी कहा होगा कथाओं में। ढाई पल भी कहां कोई चीज ठहरी है। त्वरित जीवन रूपांतरित हो रहा है। जीवन का अर्थ ही रूपांतरण है। जो ठहर जाए वह मौत। जो बढ़ता चले वही जीवन।
बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को कहा: ठहरना मत। समझे नहीं वे। वे समझे कि बुद्ध यह कह रहे हैं कि एक गांव में ज्यादा देर मत ठहरना। बुद्ध ने कहा: "चरैवेति! चरैवेति! चलते जाना! चलते जाना! उन्होंने समझा कि ठीक हैपरिव्राजक बना रहे हैं बुद्ध। तो एक गांव में तीन दिन से ज्यादा नहीं ठहरतेदूसरे गांव में चले जाते हैं। बुद्ध ने कुछ और ही कहा था। बुद्ध ने कहा था: ठहरना जीवन के विपरीत है। ठहरने की आकांक्षा ही आत्महत्या है। बढ़ते ही जाना! यहां कुछ ऐसा नहीं है कि मंजिल है कोई,जहां पहुंचकर ठहरे सो ठहरेतो तुम जड़ हो जाओगे। यहां यात्रा ही मंजिल है। चलते जाना!
यही अर्थ है नारद का।

और अंतिम सवाल: पुराण में कथा है कि बालक ध्रुव नारद के भक्त थेनारद नारायण के भक्त थे। बालक धु्रव की भक्ति से मात्र छह महीने में ही नारायण प्रसन्न हो गए और उपलब्ध हो गए। और इसकी स्मृति में आकाश से एक तारा उगा--ध्रुव तारा। इससे अन्य ऋषि-मुनि ध्रुव के प्रतिर् ईष्या से और नारायण के प्रति शिकायत से भर गएक्योंकि वे सब कठोर तपश्चर्या करके भी कुछ न पा सके थे। जब वे ऋषि-मुनि इकट्ठे होकर विचार करते थेतब एक मछुआ आया और उसने उन सबको नदी की सैर का निमंत्रण दिया। वे सब गए और उन्होंने जगह-जगह सफेद चिह्म देखे। ऋषि-मुनियों के पूछने पर मछुए ने कहाइन सभी स्थलों पर ध्रुव ने पिछले जन्मों में तपश्चर्या की थी।
कृपा करके इस पुराण की कथा का हमें सार कहिए!

कथाएं इतिहास नहीं हैं। कथाएं पुराण हैं। इतिहास और पुराण का भेद समझ लेना चाहिए। इतिहास तो वह है जो कभी घटा,हुआ। पुराण वह है जो सदा होता है। इतिहास समय में घटता हैपुराण शाश्वत है। तो पुराण को सिद्ध करने की कोशिश मत करना कि वह हुआ कि नहींवह तो भूल ही हो गई फिर। फिर तो तुम कविता को समझे ही नहींकाव्य को पहचाने ही नहीं। फिर तो तुम गलत रास्ते पर चल पड़े। ऐसा चल रहा है पूरे मुल्क मेंहजारों साल से चल रहा हैअभी भी चलता है।
अभी कुछ दिन पहले लुधियाना में पुरि के शंकराचार्य ने चुनौती दी कि कोई भी अगर सिद्ध कर दे कि रामायण झूठ है तो मैं शास्त्रार्थ के लिए तैयार हूं। कुछ हैं तो सिद्ध करना चाहते हैं कि रामायण झूठ है। कुछ हैं जो सिद्ध करना चाहते हैं कि रामायण सच है। और दोनों एक ही नाव में सवार हैं।
न रामायण झूठ हैन रामायण सच है--रामायण पुराण है। रामायण का समय से कोई संबंध नहींइतिहास से कोई संबंध नहीं। ऐसा कभी हुआ हैऐसा सवाल ही नहीं है। ऐसा नहीं हुआ हैयह तो सवाल उठता ही नहीं है। ऐसा होता रहा है। ऐसा आज भी हो रहा हैअभी भी घट रहा है।
पुराण का अर्थ है: जीवन का सार-निचोड़ थोड़ी-सी कहानियों में रख दिया है। कहानियों पर जिद्द मत करनासार-निचोड़ को पकड़ना।
"बालक ध्रुव नारद के भक्त थे;नारद नारायण के भक्त थे'। इसका अर्थ हुआ कि भगवान तक सीधे पहुंचना कठिन होगासदगुरु चाहिए। इसका अर्थ हुआ कि भगवन से सीधा-सीधा मिलना कठिन होगामध्यस्थ चाहिए। इसका अर्थ हुआ कि कोई बीच में चाहिए जो तुम जैसा भी हो और भगवान जैसा भी होतो सेतु बन सकेगा। कोई ऐसा चाहिए जिसका एक हाथ तुम्हें पकड़े हो और एक हाथ जिसका परमात्मा पकड़े हो। एक हाथ तुम्हारे जैसा और एक हाथ परमात्मा जैसा! जो परमात्मा और मनुष्य के बीच में कहीं हो--संक्रमण होद्वार हो।
परमात्मा बहुत बड़ा है। आदमी बहुत छोटा है। दोनों में तालमेल कैसे बैठेकोई चाहिए जो परमात्मा जैसा बड़ा होआदमी जैसा छोटा भी हो।
गुरु इस दुनिया में सबसे बड़ा विरोधाभास हैसबसे बड़ा पैराडाक्स। अगर तुम गुरु को एक तरफ से देखोअपनी तरफ सेतो तुम्हारे जैसा है। अगर तुम दूसरी तरफ से देखो तो परमात्मा जैसा है। इसलिए तो कोई भी अपने गुरु के लिए तर्क नहीं कर सकतान प्रमाण जुटा सकता है। क्योंकि तुम्हारे तर्क और प्रमाण कुछ भी सिद्ध न कर सकेंगे उसके लिएजिसको दूसरी तरफ से देखने की क्षमता न हो। वह कहेगाहमारे जैसा ही तुम्हारा गुरु हैजैसी हमें भूख लगती है उसे लगती हैधूप आए तो हमें पसीना आता हैउसे आता है।
इन बातों से बचेन के लिए फिर कपोल-कल्पनाएं शुरू होती हैं। जैन कहते हैंमहावीर को पसीना नहीं आता। पागल हैं। बिलकुल पागलपन की बात है। जैन कहते हैंमहावीर को चोट करो तो खून नहीं निकलतादूध निकलता है।
ये क्यों कहानियां गढ़ी गई हैंये भक्त यह कह रहे हैं कि हमारा भगवान आदमियों जैसा नहीं है। मगर तुम्हें यह सिद्ध करना पड़ रहा है कि पसीना नहीं आताउससे साफ है कि पसीना आता होगा। तो काहे के लिए चिंता करतेदूसरे सिद्ध करते हैं कि पसीना आता हैखून ही निकलता हैदूध कहीं निकला है!
भक्तों ने अपने गुरुओं को अलौकिक सिद्ध करने की बड़ी चेष्टाएं की हैं। उनकी चेष्टा को समझो सहानुभूति से तो सार्थक मालूम होती है। उनकी चेष्टा ही यही हैवे यह कह रहे हैं कि तुम हमारे गुरु को साधारण मनुष्य मत समझो। ठीक ही कह रहे हैंलेकिन जिस भाषा में कह रहे हैं वह बिलकुल गलत है। और उनकी भाषा के कारण दूसरों के सामने महावीर काया उनके गुरु का परमात्म-रूप तो प्रगट नहीं होताउनका ऐतिहासिक रूप तक संदिग्ध हो जाता है।
गुरु बड़ी भारी विरोधाभासी अवस्था हैअगर बुद्धि से देखा तो आदमी जैसाअगर हृदय से देखा तो परमात्मा जैसा। इसलिए श्रद्धा की आंख हो जो गुरु परमात्मा से जोड़ने का कारण हो जाता है।
"पुराण की कथा हैबालक धु्रव नारद के भक्त थेऔर नारद नारायण के'। सेतु बन गया। राह खुल गई। धु्रव की भक्ति से मात्र छह महीने में नारायण प्रसन्न हो गए। छह महीने भी लगेयह आश्चर्य की बात है। जरूर सरकारी कामकाजदफ्तर...! छह महीने! धु्रव जैसा सरल हृदय प्रार्थना करे और छह महीने लगें! पुराण ने मजाक की है! सरकारी काम-काजरेड टेप! फाइलें सरकने में वक्त लग जाता है। तुम चकित होते हो कि छह महीनेइतने जल्दी हो गयामैं चकित हो रहा हूं कि छह महीने लगेइतनी देर लगी! बाल-हृदय से प्रार्थना उठेतत्क्षण पूरी हो जाती है। इतने निर्दोष हृदय से उठी प्रार्थना में कमी क्या हो सकती है कि छह महीने लगेंहांपुराण लिखनेवालों को शायद छह महीने बाद पता चला होगा। लेकिन प्रार्थना होनिर्दोष हो,तो क्षण का भी फासला नहीं हैप्रार्थना तत्क्षण पूरी हो जाती है। यही तो प्रार्थना का चमत्कार है। उसमें देर लग जाएयह संभव नहींक्योंकि प्रार्थना समय के बाहर हैसमयतीत है।
आकाश में धु्रव तारा तो अभी भी हैधु्रव की कथा बनीउसके पहले भी था। लेकिन धु्रव की घटना इतनी महत्वपूर्ण है और उसकी स्थिर भक्ति इतनी स्थिर थीउसकी प्रज्ञा ऐसी थिर थी कि सारे अस्तित्व में धु्रव से ज्यादाध्रुव तारे से ज्यादा थिरता का और कोई प्रतीक नहीं मिला। वह अकेला तारा है जो ठहरा हुआ हैअपनी जगह परकोई उसे हिलाता नहींअकंप! इसलिए धु्रव तारे से धु्रव का नाम जुड़ गया।
"इससे अन्य ऋषि-मुनि धु्रव के प्रतिर् ईष्या और नारायण के प्रति शिकायत से भर गए'। ...ऋषि-मुनि न रहे होंगे। क्योंकि जहां तकर् ईष्या है वहां तक कैसा ऋषिकैसा मुनि! मगर इसी तरह से ऋषि-मुनियों से हम परिचित हैं: ईष्यों हैदौड़ हैमहत्वकांक्षा हैजलन हैशिकायत है! और उनकी शिकायत तर्कयुक्त भी मालूम होती हैवर्षों से तपश्चर्या कर रहे थेउनको तो न मिला और छोटे बालक को मिल गयाजिसका कुछ अर्जन नहीं!
इसे ध्यान रखो: सांसारिक मन कहता हैभगवान को भी अर्जित करना होगाजैसे वह भी कोई संपदा हैबैंक-बैलेंस हैं। भगवान मिला ही हुआ हैसिर्फ स्मरण करना हैअर्जन नहीं। सरल हृदय उसका स्मरण करता हैप्रत्यभिज्ञा हो जाती है। गणितवाला हृदयगणितवाली बुद्धि अर्जन करती है--कमाओ! उपवास करोव्रत करोत्याग करोयह करोवह करो--कमाओ! दावेदार बनो! स्वभावतः जब तुम कमाते हो तो भीतर से यह भी उठता हैबड़ी देर लग रही हैइतना कमा लिया--अभी तक नहींअभी तक नहीं! और अगर एएसे कमानेवालो लोगों के बीच में किसी को अचानक मिल जाए जिसने कुछ भी न कियाछोटा बच्चाजिसके पास समय ही न था करने को कुछ--तो स्वभावतःर् ईष्या जगेगी कि यह तो फिर अन्याय हो गया। यह तो इनका बस चले तो ये ऋषि-मुनि परमात्मा को अदालत में ले जाएं कि "यह अन्याय हो रहा है। कहावत तो सुनी थी कि देर है अंधेर नहींलेकिन अब तो अंधेर भी हो रहा है। देर तो हो ही गई है कि जिंदगीभर तपश्चर्या कीव्रत-उपवास किएसब फेहरिश्त तैयार रख हैं...।'फाइलें ऋषि-मुनियों की तैयार हैंउन्होंने क्या-क्या किया हैउसमें खूब बढ़ा-चढ़ाकर लिखा हुआ है। और इस दो दिन के बालक कोजिसने कुछ भी न किया थाजो अभी ठीक से तुतलाता भी नहींयह क्या तो प्रार्थना करेगाकहां से संस्कृत का शुद्ध उच्चार लाएगावेद-मंत्र कहां जानता है--इसको मिल गया! बुद्धि का चिंतित होना स्वाभाविक हैक्योंकि बुद्धि गणित है।
यही समझ लेना चाहिएप्रार्थना को न तो भाषा की जरूरत हैन शास्त्रों की जरूरत हैसिर्फ प्रेम की जरूरत है। छोटे बालक जैसा प्रेम पर्याप्त हैउससे ज्यादा की कोई जरूरत नहीं है। तुम अगर फिर से अपने छोटे बालक जैसे प्रेम को पुनः पा लो तो सब शास्त्र दो कौड़ी के हैं। तो कोई व्रत-उपवास जरूरी नहीं है। उतनी सरल हृदय से तुम्हारी प्रार्थना उठ आएपूरी हो जाएगी।
लेकिन ऋषि-मुनि एक तरफर् ईष्या से भरे हैंएक तरफ शिकायत से भी भरे हैं! अन्याय हो गया था!
ध्यान रखनाधर्म के मार्ग पर अर्जन की भाषा छोड़ोअन्यथा तुम संसार को ही खींचे लिए जा रहे हो। छोड़ो ये बातें। परमात्मा,तुम क्या करते होइससे नहीं मिलतातुम क्या होइससे मिलता है। तुम्हारा होना शुद्ध होतुम्हारा होना निष्कलुष हो;तुम्हारा होना कुंआरा होछोटे बच्चे जैसा हो!
जीसस न कहा है: जो छोटे बच्चों की तरफ होंगेवे ही मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश करेंगे।
"ऋषि-मुनि इकट्ठे हो गएविचार करने लगे। एक मछुए ने उनको अपनी नाव में बिठा लिया। वहां जगह-जगह सफेद चिह्म दिखाई पड़े। पूछने पर मछुए ने कहाये वे स्थान हैंजहां ध्रुव ने पिछले जन्मों में तपश्चर्या की थी।इससे ऋषि-मुनि राजी हो गए होंगे। यह बात फिर उनकी समझ में आ गई होगीफिर गणित में बैठ गई। यह तो बहुत कठिन होता अगर मछुआ कहता कि बस धु्रव ने मांगा और भगवान मिल गएकोई तपश्चर्या पीछे नहीं हैकोई यात्रा पीछे नहीं है। कहानी सरल हो गई। ऋषि-मुनियों की शिकायत कम हो गई होगी।
मेरे देखे कर्म का सिद्धांत तुम्हारे सांसारिक गणित का फैलाव है। तुम कहते होफलां आदमी आंनद भोग रहा हैपिछले जन्मों में पुण्य किए होंगेक्योंकि यह तो तुम बरदाश्त कर ही नहीं सकते कि इसी जन्म में और आनंद भोग रहा हो! दूसरा आदमी मजे कर रहा हैसफलता पा रहा हैतुम कहते हो, "ठहरो! वक्त आएगा जब भोगोगे! अगले जन्म में देखनासड़ोगेनरक में पड़ोगे! यह चार दिन की चांदनी हैफिर अंधेरी रात!ऐसे तुम अपनेमन को समझा लेते हो।
कर्म का सिद्धांत साधारणतः तुम्हारे मानसिक गणित का ही फैलाव है। उससे तुम हल कर लेते होमामला साफ हो जाता है,झंझट खत्म हो गई। फिर तुम्हें अड़चन नहीं होती। अगर मैं कहूं कि बसबिना कुछ किए परमात्मा मिल गयातुम कहोगे, "यह बात जरा संदिग्ध हैहम इतना कर रहे हैं और न मिला!अगर मैं कहूंजन्मों-जन्मों में मेहनत कीतब तुम कहोगे, "ठीक है,दया आती हैमिलना ही चाहिए।गणित में बात बैठ गई।
मछुए की बात सुनकर ऋषि-मुनि शांत हो गए होंगे। मछुआ बड़ा होशियार रहा होगा। मछलियां पकड़ते-पकड़ते आदमियों को पकड़ना जान गया होगा। धु्रव से उनकी नाराजगी चली गई होगीपरमात्मा से शिकायत भी चली गई--बात सब गणित में आ गई!
और मैं तुमसे कहता हूंप्रेम गणित में नहीं आता। और मैं तुमसे कहता हूंप्रार्थना गणित में नहीं आती। और मैं तुमसे पुनः पुनः कहता हूं: तुम क्या करते होइससे परमात्मा के मिलने का कोई भी संबंध नहीं--तुम क्या होतुम्हारा होना ही एकमात्र पाने का उपाय है।

आज इतना ही।

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