शनिवार, 9 सितंबर 2017

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-04

सहजस्फूर्त अनुशासन है भक्ति
दिनांक १४ जनवरी१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

पहला प्रश्न: जीवन की व्यर्थता का बोध ही क्या जीवन में अर्थवत्ता का प्रारंभ-बिंदु बन जाता है?
बन सकता हैन भी बने। संभावना खुलती हैअनिवार्यता नहीं है। जीवन की व्यर्थता दिखायी पड़े तो परमात्मा की खोज शुरू हो सकती है--शुरू होगी हीऐसा जरूरी नहीं है।

जीवन की व्यर्थता पता चले तो आदमी निराश भी हो सकता हैआशा ही छोड़ देव्यर्थता में ही जीने लगेव्यर्थता को स्वीकार कर लेखोज के लिए कदम न उठाये--तो जीवन तो दूभर हो जाएगाबोझ हो जाएगापरमात्मा की यात्रा न होगी।
इतना तो सच है कि जिसने जीवन की व्यर्थता नहीं जानी,वह परमात्मा की खोज पर नहीं जाएगाजाने की कोई जरूरत नहीं है।: अभी जीवन में ही रस आता हो तो किसी और रस की तरफ आंख उठाने का कारण नहीं है।
फिर जीवन की व्यर्थता समझ में आये तो दो संभावनाएं हैं: या तो तुम उसी व्यर्थता में रुककर बैठ जाओ और या उस व्यर्थता के पार सार्थकता की खोज करो--तुम पर निर्भर है।
नास्तिक और आस्तिक का यही फर्क हैयही फर्क की रेखा है।
नास्तिक वह है जिसे जीवन की व्यर्थता तो दिखायी पड़ीलेकिन आगे जाने कीऊपर उठने कीखोज करने की सामर्थ्य नहीं है,रुक गयानहीं में रुक गया, "हांकी तरफ न उठ सकानिषेध को ही धर्म मान लियाविधेय की बात ही भूल गया।
आस्तिक नास्तिक से आगे जाता है।
आस्तिक नास्तिक का विरोध नहीं हैअतिक्रमण है। आस्तिक के जीवन में नास्तिकता का पड़ाव आता हैलेकिन उस पर वह रुक नहीं जाता। वह उसे पड़ाव ही मानता है और उससे मुक्त होने की चेष्टा में संलग्न हो जाता है। क्योंकि जहां "नहींहैवहां "हांभी होगा। और जिस जीवन में हमने व्यर्थता पहचान ली हैउस जीवन के किसी तल की गहराई पर सार्थकता भी छिपी होगीअन्यथा व्यर्थता का भी क्या अर्थ होता है?
जिसने दुख जाना वह सुख को जानने में समर्थ हैअन्यथा दुख को भी न जान सकता। जिसने अंधकार को पहचाना उसके पास आंखें हैं जो प्रकाश को भी पहचानने में समर्थ हैं।
अंधों को अंधेरा नहीं दिखायी पड़ता। साधारणतः हम सोचते हैं कि अंधे अंधेरे में जीते होंगे--गलत है खयाल। अंधेरे को देखने के लिए भी आंख चाहिए। अंधेरा भी आंख की ही प्रतीति है। तुम्हें अंधेरा दिखायी पड़ता है आंख बंद कर लेने परक्योंकि अंधेरे को तुमने देखा है। जन्म से अंधेजन्मांध व्यक्ति को अंधेरा भी दिखायी नहीं पड़ता। देखा ही नहीं है कुछअंधेरा कैसे दिखायी पड़ेगा?
तो जिसको अंधेरा दिखायी पड़ता हैउसके पास आंख हैअंधेरे में ही रुक जाने का कोई कारण नहीं है। और जब अंधेरा अंधेरे की तरह मालूम पड़ता है तो साफ है कि तुम्हारे भीतर छिपा हुआ प्रकाश का भी कोई स्रोत हैअन्यथा अंधेरे को अंधेरा कैसे कहतेकोई कसौटी है तुम्हारे भीतरकहीं गहरे में छिपा मापदंड है।
अंधेरे पर कोई रुक जाए तो नास्तिकअंधेरे को पहचान कर प्रकाश की खोज में निकल जाए तो आस्तिक। अंधेरे को देखकर कहने लगे कि अंधेरा ही सब कुछ है तो नास्तिकअंधेरे को जानकर अभियान पर निकल जाएखोजने निकल जाएकि प्रकाश भी कहीं होगाजब अंधेरा है तो प्रकाश भी होगा। क्योंकि विपरीत सदा साथ मौजूद होते हैं।
जहां जन्म है वहां मृत्यु होगी। जहां अंधेरा है वहां प्रकाश होगा। जहां दुख है वहां सुख होगा। जहां नरक अनुभव किया है तो खोजने की ही बात हैस्वर्ग भी ज्यादा दूर नहीं हो सकता।
स्वर्ग और नरक पड़ोस-पड़ोस में हैंएक-दूसरे से जुड़े हैं।
अगर तुमने जीवन में क्रोध का अनुभव कर लिया तो समझ लेना कि करुणा भी कहीं छिपी है--खोजने की बात है। तुमने पहली परत छू ली करुणा की! क्रोध पहली परत है करुणा की। अगर तुमने घृणा को पहचान लिया तो प्रेम को पहचानने में देर भला लगेलेकिन असंभावना नहीं है।
प्रश्न महत्वपूर्ण है।
जीवन की व्यर्थता तो अनिवार्य हैलेकिन पर्याप्त नहीं है। उतना जरूरी है। उतना तो चाहिए ही। पर उस पर तुम रुक भी सकते हो।
पश्चिम में बड़ा विचारक है: ज्यां पाल सार्त्र। वह कहता हैअंधेरा ही सब कुछ है। दुख ही सब कुछ है। दुख के पार कुछ भी नहीं है। दुख के पार तो सिर्फ मनुष्यों की कल्पनाओं का जाल है। विषाद सब कुछ है। संताप सब कुछ है। संत्रास सब कुछ है। बस नरक ही हैस्वर्ग नहीं है।'
बुद्ध ने भी एक दिन जाना था: दुख है। सार्त्र ने भी जाना कि दुख है। यहां तक दोनों साथ-साथ हैंफिर राहें अलग हो जाती हैं। फिर बुद्ध ने खोजा कि दुख क्यों हैं। और दुख है तो दुख के विपरीत दुख का निरोध भी होगा। तो वे खोज पर गये। दुख का कारण खोजा। दुख मिटाने की विधियां खोजींऔर एक दिन उस स्थिति को उपलब्ध हो गयेजो दुख-निरोध की हैआनंद की है।
सार्त्र पहले कदम पर रुक गया। बुद्ध के साथ थोड़ी दूर तक चलता हैफिर ठहर जाता है। वह कहता है, "आगे कोई मार्ग नहीं हैबस यहीं सब समाप्त हो जाता है।'
तो सार्त्र अंधकार को ही स्वीकार करके जीने लगाऐसे ही तुम भी जी सकते हो। तब तुम्हारा जीवन एक बड़ी उदासी हो जाएगी। तब तुम्हारे जीवन से सारा रस सूख जाएगा। तब तुम्हारे जीवन में कोई फूल न खिलेंगेकांटे-ही-कांटे रह जाएंगे। अगर कोई फूल खिलेगा भी तो तुम कहोगे कि कल्पना हैतुम उसे स्वीकार न करोगे। अगर किसी और के जीवन में फूल खिलेगा तो तुम इनकार करोगे कि झूठ होगाआत्मवंचना होगीधोखा होगाबेईमानी होगीफूल होते ही नहीं। तो तुमने अपने ही हाथ कारागृह में बंद कर लिया। फिर तुम तड़पोगे। कोई दूसरा तुम्हें इस कारागृह के बाहर नहीं ले जा सकता। अगर तुम्हारी ही तड़फ तुम्हें बाहर उठने की सामर्थ्य नहीं देती और तुम्हारी ही पीड़ा तुम्हें नयी खोज का संबल नहीं बनतीतो कौन तुम्हें उठायेगालेकिन एक-न-एक दिन उठोगेक्योंकि पीड़ा को कोई शाश्वत रूप से स्वीकार नहीं कर सकता। एक जन्म में कोई सार्त्र हो सकता है,सदा-सदा के लिए कोई सार्त्र नहीं हो सकताआज सार्त्र हो सकता हैसदा-सदा के लिए सार्त्र नहीं हो सकताक्योंकि दुख का स्वभाव ऐसा है कि उसे स्वीकार करना असंभव है।
दुख का अर्थ ही होता है कि जिसे हम स्वीकार न कर सकेंगे। घड़ी-भर को समझा लेंबुझा लें कि ठीक हैयही सब कुछ है,इससे आगे कुछ भी नहीं हैलेकिन फिर-फिर मन आगे जाने लगेगा। क्योंकि मन जानता है गहरे मेंसुख है। उसी आधार पर तो हम पहचानते हैं दुख को। हमने जाना हैशायद गहरी नींद में सुख का थोड़ा-सा स्वाद मिला है।
पतंजलि ने योग-सूत्र में समाधि की व्याख्या सुषुप्ति से की है कि वह प्रगाढ़ निद्रा है। जैसा सुषुप्ति में सुख मिलता है सुबह उठकररात गहरी नींद सोयेकुछ याद नहीं पड़तालेकिन एक भीनी-सी सुगंध सुबह तक भी तुम्हें घेरे रहती है। कुछ याद नहीं पड़ता कहां गयेक्या हुआलेकिन गये कहीं और आनंद से सराबोर होकर लौटे!
कहीं डुबकी लगायी!
अपने में ही कोई गहरा तल छुआ!
कहीं विश्राम मिला!
कोई छाया के तले ठहरे!
वहां धूप न थी!
वहां गहरी शांति थी!
वहां कोई विचारों की तरंगें भी न पहुंचती थीं!
कोई स्वप्न के जाल भी न थे!
अपने में ही कोई ऐसी गहरी शरणकोई ऐसा गहरा शरण-स्थल पा लिया।
सुबह उसकी सिर्फ हलकी खबर रह जाती है। दूर सुने गीत की गुन-गुन रह जाती है!
रात गहरी निद्रा सोये तो सुबह तुम कहते होबड़ी गहरी नींद आयीबड़े आनंदित उठे!'
शायद गहरी निद्रा में तुम वहीं जाते हो जहां योगी समाधि में जाता है। गहरी निद्रा में तुम वहीं जाते हो जहां भक्ति भाव की अवस्था में पहुंचाती है। गहरी निद्रा में तुम उसी तल्लीनता को छूते हो जिसको भक्त भगवान में डूबकर पाता है। थोड़ा फर्क है। तुम बेहोशी में पाते होवह होश में पाता है। वही फर्क बड़ा फर्क है।
इसलिए सुबह तुम इतना ही कह सकते हो, "सुखद है! अच्छी रही रात।लेकिन भक्त नाचता हैक्योंकि यह कोई बेहोशी में नहीं पाया अनुभवहोश में पाया।
तो कभी नींद के किन्हीं क्षणों में तुमने भी जाना हैतभी तो तुम दुख को पहचानते होनहीं तो पहचानोगे कैसेशायद बचपन के क्षणों में जब मन भोला-भाला था और संसार ने मन विकृत न किया थावासनाएं अभी जगी न थींकामनाओं ने अभी खेल शुरू न किया थाअभी तुम ताजेत्ताजे परमात्मा के घर से आये थे--तब शायद सुबह की धूप में बैठे हुएफूलों को बगीचे में चुनते हुएया तितलियों के पीछे दौड़ते हुएतुमने कुछ सुख जाना है जो विचार के अतीत हैतुमने कोई तल्लीनता जानी है जहां तुम खो गये थेकोई विराट सागर रह गया थाबूंद ने अपनी सीमा छोड़ दी थी! फिर अब भूली-सी बात हो गयीभूली-बिसरी बात हो गयी। अब याद भी नहीं आता।
बस इतना ही लोग कहे चले जाते हैं कि बचपन बड़ा स्वर्ग जैसा था। कोई जोर डाले तुम पर तो तुम सिद्ध न कर पाओगे कि क्या स्वर्ग था! अगर कोई तर्कयुक्त व्यक्ति मिल जाए,कहे कि सिद्ध करो, "क्या था बचपन में स्वर्ग?', तो तुम सिद्ध न कर पाओगे। वह भी गहरी नींद का अनुभव हो गया अब। अब याद रह गयी है। खुद भी तुम्हें पक्का भरोसा नहीं है कि ऐसा हुआ थाभूल ही गया है। क्योंकि जिसकी तुम्हारे जीवन से संगति नहीं बैठतीवह धीरे-धीरे विस्मरण हो जाता है। धीरे-धीरे तुम उसी को याद रख पाते होजिसका तुम्हारे मन के ढांचे से मेल बैठता हैबेमेल बातों को हम छोड़ देते हैं। बेमेल बातों को याद रखना मुश्किल हो जाता है।
तो कहीं-न-कहीं कोई अनुभव तुम्हारे भीतर है। कभी प्रेम के गहरे क्षण मेंकिसी से प्रेम हुआ होमन ठिठक गया होसौंदर्य के साक्षात्कार मेंया कभी चांदनी रात में आकाश को देखते हुएमन मौन हो गया होतो तुमने सुख की झलक जानी। एक किरण तुम्हारे जीवन में कभी-न-कभी उतरी है। उसी से तो तुम पहचानते हो कि यह अंधेरा है। किरण न जानी हो तो अंधेरे को अंधेरा कैसे कहोगे?अंधेरे की प्रत्यभिज्ञा कैसे होगीपहचान कैसे होगीपहचान तो विपरीत से होती है।
तो जो रुक जाए जीवन की व्यर्थता परवह नास्तिक। इसलिए नास्तिक को मैं आस्तिक जितना साहसी नहीं कहता। जल्दी रुक गया। पड़ाव को मुकाम समझ लिया! आगे जाना है। और आगे जाना है!
एक बड़ी पुरानी सूफी कथा है कि एक फकीर जंगल में बैठा था। वह रोज एक लकड़हारे को लकड़ियां काटते हुएले जाते जाते देखता था। उसकी दीनताउसके फटे कपड़ेउसकी हड्डियों से भरी देह! उसे दया आ गयी! वह लकड़हारा जब भी निकलता था तो उसके चरण छू जाता था। एक दिन उसने कहा कि कल जब तू लकड़ी काटने जाएतब आगे जाऔर आगे जा! लकड़हारा कुछ समझा नहींलेकिन फकीर ने कहा है तो कुछ मतलब होगा। ऐसे कभी यह फकीर बोलता न थापहली दफा बोला है: आगे जाऔर आगे जा!'
तो जहां वह लकड़ियां काटता थाजंगल में थोड़ा आगे गयाचकित हुआ: सुगंध से उसके नासापुट भर गये! चंदन के वृक्ष थे। वहां तक यह कभी गया ही न था। उसने चंदन की लकड़ियां काटीं। चंदन को बेचा तो उस रात खुशी में रोयादुख में भी खुशी में भीकि अगर यही लकड़ियां अब तक काटकर बेची होतीं तो करोड़पति हो गया होता। पर अब गरीबी मिट गयी।
दूसरे दिन जब  चंदन की लकड़ी फिर काट रहा था तो उसे खयाल आया कि फकीर ने यह नहीं कहा था कि चंदन की लकड़ी तक जाउसने कहा था, "और आगेऔर आगे!तो उसने चंदन की लकड़ियां न काटींऔर आगे गयातो देखा कि चांदी की एक खदान है। फिर तो उसके हाथ में एक सूत्र लग गया। फिर और आगे गया तो सोने की खदान! फिर और आगे गया तो हीरों की खदान पर पहुंच गया।
और आगेजब तक कि हीरों की खदान न आ जाए! उसको ही हम परमात्मा कहते हैं।
तुम लकड़हारों की तरह लकड़ियां ही बेच रहे होथोड़ी ही दूर आगे चंदन के वन हैं। तुम विचारों में ही उलझे हो जहां लकड़ियां ही लकड़ियां हैं। बड़ी सस्ती उनकी कीमत है।
थोड़े निर्विचार में चलो: चंदन के वन हैं।
बड़ी सुगंध है वहां!
और थोड़े गहरे चलो तो समाधि ही खदानें हैं!
और गहरे चलो तो निर्बीज समाधिनिर्विकल्प समाधि की खदानें हैं!
और गहरे चलो तो स्वयं परमात्मा है!
योगी कदम-कदम जाता हैरुक-रुककर जाता हैकई पड़ाव बनाता है। भक्त सीधा जाता हैनाचता हुआ जाता हैरुकता नहीं,पड़ाव भी नहीं बनाता। वह सीधा तल्लीनता में डूब जाता है।
योगी से भी ज्यादा हिम्मत भक्त की है। नास्तिक से ज्यादा हिम्मत आस्तिक की है। योगी से भी ज्यादा हिम्मत भक्त की है। क्योंकि भक्त सीढ़ियां भी नहीं बनाताएक गहरी छलांग लेता है। जिसमें अपने को डुबा देता हैमिटा देता है।
इस अनुभव पर आना अत्यंत जरूरी है कि जीवन व्यर्थ है।
"अंधेरी रात तूफाने तलातुम नाखुदा गाफिल
यह आलम है तो फिर किश्तीसरे मौजेरवां कब तक?'
"अंधेरी रात!सब तरफ अंधेरा है। कुछ सूझता नहीं है। हाथ को हाथ नहीं सूझता।तूफाने तलातुम'! बड़ी आंधियां हैंबड़े तूफान हैंसब उखड़ा जाता हैकुछ ठहरा नहीं मालूम पड़ताबड़ी अराजकता है। "नाखुदा गाफिल'! और जिसके हाथ में कश्ती हैवह जो मांझी हैवह सोया हुआ हैबेहोश है।' "यह आलम है', ऐसी हालत हैतो फिर किश्ती सरे मौजेरवां कब तक?' तो इस किश्ती का भविष्य क्या हैयह नाव अब डूबी तब डूबी! इस नाव में आशा बांधनी उचित नहीं। इस नाव के साथ बंधे रहना उचित नहीं।
लेकिन जाओगे कहांभागोगे कहांयही कश्ती तो जीवन है। तुम सोये हो मूर्च्छिततूफान भयंकर हैअंधेरी रात हैडूबने के सिवाय कोई जगह दिखायी नहीं पड़ती।
लेकिन डूबना दो ढंग का हो सकता है। एक: कश्ती डुबाये तब तुम डुबो और एककि कश्ती में बैठे-बैठे तुम डूबने के लिए कोई सागर खोज लो। उस सागर को ही हम परमात्मा कहते हैं।
"अच्छा यकीं नहीं है तो कश्ती डुबो के देख
एक तू ही नाखुदा नहींजालिम! खुदा भी है।'
तो फिर हिम्मत आ जाती हैफिर आदमी कहता है कि ठीक है। तो अगर मांझी! तू चाहता ही है कि कश्ती डुबानी है तो डुबाकर देख! एक तू ही नाखुदा नहीं जालिम! खुदा भी है!तू ही अकेला नहीं हैमांझी! तुझसे ऊपर खुदा भी है।
फिर अंधेरी राततूफानकश्ती का अब डुबा तब डुबा होनासब दूर की बातें हो जाती हैं। तुम भीतर कहीं एक ऐसी जगह लंगर डाल देते होजहां तूफान छूते ही नहींजहां रात का अंधेरा प्रवेश ही नहीं करता। और जहां किसी नाखुदा कीकिसी मांझी की जरूरत नहीं हैक्योंकि वहां परमात्मा ही मांझी है।
जरूरी है कि जीवन की व्यर्थता दिखायी पड़ जाए। बहुत हैं जो जीवन की व्यर्थता बिना देखे आस्तिकता में अपने को डुबाने की चेष्टा करते हैंवे कभी न डूब पाएंगे। वे चुल्लूभर पानी में डूबने की चेष्टा कर रहे हैं। वे अपने को धोखा दे रहे हैं।
जब तक तुम्हारे जीवन की जड़ें उखड़ न गयी होंजब तक तुमने गहन झंझावात नास्तिकता के न झेले होंजब तक तुम्हारा रोआं-रोआं कंप न गया हो जीवन के अंधकार सेजब तक तुम्हारी छाती भयभीत न हो गयी हो--तब तक तुम जिस आस्तिकता की बातें करते होवह सांत्वना होगी,सत्य नहींतब तक तुम जिन मंदिरों और मस्जिदों में पूजा-उपासना करते होवह पूजा-उपासना धोखा-धड़ी है। वह तुम्हारा औपचारिक व्यवहार है। वह संस्कारवशात है। उससे तुम्हारे जीवन का सीधा कोई संबंध नहीं है। उसे तो तुम्हें अपने को चुकाकर हीअपने को दान में देकर हीअपना सर्वस्व लुटाकर ही पाना होगा। वह तो तुम जब तक सूली पर न लटक जाओतब तक उस सिंहासन तक न पहुंच पाओगे।
तो पहली तो स्मरण रखने की बात यह है कि कहीं जल्दी में आस्तिक मत हो जाना। यह कोई जल्दी का काम नहीं है। बड़ी गहन प्रतीक्षा चाहिए। और यह कोई सांत्वना नहीं है कि तुम ओढ़ लोसंक्रांति है। सांत्वना नहीं है परमात्मासंक्रांति है,महाक्रांति है। तुम जो होमिटोगेऔर तुम जो होने चाहिए वह प्रगट होगा।
तो सस्ती आस्तिकता कहीं नहीं ले जाती। सस्ती आस्तिकता से तो असली नास्तिकता बेहतर हैकम-से-कम उस परिधि पर तो खड़ा कर देती हैजहां से कदम चाहो तो उठा सकते हो।
झूठी आस्तिकता से तो कोई कभी नहीं गया हैजा ही नहीं सकता। झूठी प्रार्थना कभी नहीं सुनी गयी है। तुम कितने ही जोर से चिल्लाओतुम्हारी आवाज के जोर से प्रार्थना का कोई संबंध नहीं हैतुम्हारे हृदय की सच्चाई सेतुम्हारी विनम्रता सेतुम्हारे निरहंकार-भाव सेतुम्हारे असहाय-भाव सेजब तुम्हारी प्रार्थना उठेगी तो पहुंच जाती हैतो जर्रा-जर्राकण-कण अस्तित्व का तुम्हारा सहयोगी हो जाता है।
तो पहले तो झूठी आस्तिकता से बचनाफिर नास्तिकता में मत उलझ जाना। नास्तिक होना जरूरी हैबने रहना जरूरी नहीं है। एक ऐसी घड़ी आएगी जब अंधेरा ही अंधेरा दिखायी पड़ेगातूफान ही तूफान होंगेकहीं कोई सहारा न मिलेगासब सहारे झूठ मालूम होंगेराह भटक जाएगीतुम बिलकुल अजनबी की तरह खड़े रह जाओगेजिसका कोई सहारा नहींजो एकाकी है--तब घबड़ा कर बैठ मत जानायहीं से शुरुआत होती है। यहीं से अगर तुमने आगे कदम उठायातो उपासनाभक्ति! यहीं से आगे कदम उठाया तो संसार के पार परमात्मा की शुरुआत होती है।
झूठी नास्तिकता से बचना हैझूठी आस्तिकता से बचना है। नास्तिकता सच्ची हो तो भी उसको घर नहीं बना लेना है। असली नास्तिकता के दुख को झेलना है ताकि उस पीड़ा के बाहर असली आस्तिकता का जन्म हो सके।

दूसरा प्रश्न: इस विराट अस्तित्व में मैं नाकुछ हूंयह अप्रिय तथ्य स्वीकारने में बहुत भय पकड़ता है। इस भय से कैसे ऊपर उठा जाए?

"अप्रियकहोगे तो शुरू से ही व्याख्या गलत हो गयीफिर भय पकड़ेगा।अप्रियकहना ही गलत है।
फिर से सोचो: नाकुछ होने में अप्रिय क्या हैवस्तुतः कुछ होने में अप्रिय है। क्योंकि जीवन के सारे दुख तुम्हारे "कुछ होनेके कारण पैदा होते हैं।
अहंकार घाव की तरह है। और जब तुम्हारे भीतर घाव होता है--और अहंकार से बड़ा कोई घाव नहींनासूर है--तो हर चीज की चोट लगती हैहर चीज से चोट लगती हैहर चीज से पीड़ा आती हैजरा कोई टकरा जाता है और पीड़ा आती हैहवा का झोंका भी लग जाता है तो पीड़ा आती हैअपना ही हाथ छू जाता है तो पीड़ा आती है।
अहंकार का अर्थ है: मैं कुछ हूं।
अगर तुम जीवन की सारी पीड़ाओं की फेहरिश्त बनाओ तो तुम पाओगे कि वे सब अहंकार से ही पैदा होती हैं। लेकिन तुमने कभी गौर से इसे देखा नहीं। तुम तो सोचते हो कि पीड़ा तुम्हें दूसरे लोग देते हैं।
किसी ने तुम्हें गाली दीतो तुम सोचते होयह आदमी गाली देकर मुझे पीड़ा दे रहा है। व्याख्या की भूल है। विश्लेषण की चूक है। दृष्टि का अभाव है। आंख खोलकर फिर से देखो। इस आदमी की गाली में अगर कोई भी पीड़ा है तो इसीलिए है कि तुम्हारे भीतर अहंकार उस गाली से छूकर दुखी होता है। अगर तुम्हारे भीतर अहंकार न हो तो इस आदमी की गाली तुम्हारा कुछ भी न बिगाड़ पाएगी।तुम उस आदमी की गाली को सुन लोगे और अपने मार्ग पर चल पड़ोगे। हो सकता हैइस आदमी की गाली तुम्हारे मन में करुणा को भी जगाये कि बेचारा नाहक ही व्यर्थ की बातों में पड़ा है। लेकिन गाली उसकी तुम्हें पीड़ा दे जाती है,क्योंकि तुम्हारे पास एक बड़ा मार्मिक स्थल हैजो तैयार ही है पीड़ा पकड़ने को। बड़ा संवेदनशील है! बड़ा नाजुक है! और हर घड़ी तैयार है कि कहीं से पीड़ा आये तो...वह पीड़ा पर ही जीता है।
तो जरूरी नहीं कि कोई गाली देराह पर कोई बिना नमस्कार किये निकल जाए तो भी पीड़ा आ जाती है। कोई तुम्हें देखे और अनदेखा कर दे तो भी पीड़ा आ जाती है। राह पर दो आदमी हंस रह हों तो भी पीड़ा आ जाती है कि शायद मुझ पर ही हंस रहे हैं। दो आदमी एक-दूसरे के कान में खुसरफुसर कर रहे हों तो पीड़ा आ जाती है कि शायद मेरे लिए ही...।
यह जो "मैंहैबड़ा रुग्ण है! इसको लेकर तुम कभी भी स्वस्थ और सुखी न हो पाओगे।
और यही अहंकार तुमसे कहता है, "डरोप्रेम से डरोक्योंकि प्रेम में इसे छोड़ना पड़ेगा। भक्ति से डरोक्योंकि भक्ति में तो यह बिलकुल ही डूब जाएगाप्रेम में क्षणभर को डूबेगाभक्ति में शाश्वतसदा के लिए डूब जाएगा। बचो!'
यह अहंकार कहता है, "ऐसी जगह जाओ ही मत जहां डूबने का डर हो। बचकर चलो! संभलकर चलो।'
और यही अहंकार तुम्हारी पीड़ा का कारण है!
ऐसा समझो कि नासूर लिये चलते हो और चिकित्सक से बचते हो।
"इस विराट अस्तित्व में मैं नाकुछ हूंयह अप्रिय तथ्य स्वीकारने में बहुत भय पकड़ता है।'
यह भय तुम्हें नहीं पकड़ रहा हैयह भय उसी अहंकार को पकड़ रहा है जो कि डूबने सेतल्लीन होने से भयभीत है। क्योंकि तल्लीनता का अर्थ मौत है--अहंकार की मौततुम्हारी नहीं! तुम्हारे लिए तो जीवन का नया द्वार खुलेगा। उसी मृत्यु से तुम पहली बार अमृत का दर्शन करोगे। लेकिन तुम्हारे लिएअहंकार के लिए नहीं!
यह जो तुम्हारे भीतर "मैंकी गांठ हैयह गांठ दुख दे रही है। इस अप्रिय "मैंको पहचानोतो तुम पाओगे कि निरहंकारिता से ज्यादा प्रीतिकर और कुछ भी नहीं।
और जिसे निरहंकारिता आ गयीसब आ गया! फिर उसे किसी मंदिर में जाने की जरूरत नहीं। निरहंकारिता का मंदिर जिसे मिल गयावह पत्थरों के मंदिरों में जाए भी क्यों!
निरहंकारिता का मंदिर जिसे मिल गयाउसके तो अपने ही भीतर के मंदिर के द्वार खुल गये!
"अदब-आमोज है मैखाने का जरा-जर्रा
सैकड़ों तरफ से आ जाता है सिजदा करना।
इश्क पाबंदेवफा हैन पाबंदे-रसूम
सर झुकाने को नहीं कहते हैं सिजदा करना।'
"अदब-आमोज है मैखाने का ज़र्रा-ज़र्रा!'
अगर तुम गौर से देखो तो अस्तित्व का कण-कण विनम्रता सिखा रहा है। पूछो वृक्षों सेपूछो पर्वतों सेपहाड़ों सेपूछो झरनों सेपक्षियों सेपशुओं से: कहीं अहंकार नहीं हैं!
"अदब-आमोज है मैखाने का ज़र्रा-ज़र्रा।'
एक-एक कण पूरा अस्तित्व एक ही बात सिखा रहा है: नाकुछ हो जाओ!
"सैकड़ों तरह से आ जाता है सिजदा करना!
और अगर तुम इन बातों को सुनो जो अस्तित्व में गूंज रही हैं सब तरफ सेसब दिशाओं सेतो सैकड़ों रास्ते हैं जिनसे उपासना का सूत्र तुम्हारे हाथ में आ जाएगासिजदा करना आ जाएगाझुकने की कला आ जायेगी।
जरूरी नहीं है कि तुम शास्त्र ही पढ़ोअस्तित्व के शास्त्र से बड़ा कोई और शास्त्र नहीं है। जरूरी नहीं है कि तुम ज्ञानियों से ही सीखोतुम अगर आंख खोलकर देखो तो सारा अस्तित्व तुम्हें सिखाने को तत्पर है।
यहां आदमी के सिवाय कोई अहंकार से पीड़ित नहीं है और इसलिए सिवाय आदमी के यहां कोई भी पीड़ित नहीं है। आदमी ही परेशान है। वृक्ष परेशान नहींसिजदा में खड़े हैं। सतत चल रही है पूजा!
आदमी की पूजा घड़ी दो घड़ी की होती हैअस्तित्व की पूजा सतत है। तुम कभी आरती उतारते होतारेचांदसूरज उतारते ही रहते हैं आरती! चौबीस घंटे! सतत!
तुम कभी एक फूल चढ़ा आते होवृक्ष रोज ही चढ़ाते रहते हैं फूल। तुम कभी जाकर मंदिर में एक गीत गुनगुना आते होपक्षी सुबह से सांझ तक गुनगुना रहे हैं। अगर गौर से देखो तो तुम सारे अस्तित्व को सिजदा करता हुआ पाओगे। सारा अस्तित्व झुका हैघुटनों पर हाथ जुड़े हैंआंखों से आंसुओं की धार बह रही हैहृदय से सुगंध उठ रही है!
फिर से देखो! देखा तो तुमने भी है इसेठीक से आंख से नहीं देखा। फिर से देखो: तुम हर वृक्ष को झुका हुआ पाओगे प्रार्थना मेंहर झरने को उसी का गीत गाता हुआ पाओगे।
"अदब-आमोज है मैखाने का ज़र्रा-ज़र्रा
सैकड़ों तरह से आ जाता है सिजदा करना।'
"इश्क पाबंदेवफा है...।'
प्रेम आस्था की बात हैश्रद्धा की बात हैभरोसे की बात है।
"इश्क पाबंदेवफा हैन कि पाबंदे-रसूम!'
वह कोई नीति-नियम की बात नहीं हैकोई रसूम की बात नहीं हैकोई नियम के आचरण कीविधि-अनुशासन की बात नहीं है--सिर्फ आस्था की बात है। कोई मुसलमान होना जरूरी नहीं हैकोई हिंदू होना जरूरी नहीं हैकोई ईसाई होना जरूरी नहीं है--क्योंकि ये सब तो रीति-नियम की बातें हैंधार्मिक होने के लिए इनकी कोई भी जरूरत नहीं है,सिर्फ आस्था काफी है। आस्था न हिंदू है न मुसलमानआस्था न जैन है न बौद्ध--आस्था विशेषण-रहित हैउतना ही विशेषण-रहित है जितना कि परमात्मा।
"इश्क पाबंदेवफा हैन कि पाबंदे-रसूम।'
तो तुम कोई रीति-नियम से प्रार्थना मत करने बैठ जाना। सीख मत लेना प्रार्थना करनाक्योंकि वही अड़चन हो जाएगी असली प्रार्थना के जन्म होने में।
प्रार्थना सहजस्फूर्त हो!
सूर्य के सामने सुबह बैठ जानाजो तुम्हारे हृदय में आ जाएकह देनान कुछ आयेचुपचाप रह जाना। सूरज कुछ कहेसुन लेनान कहे तो उसके मौन में आनंदित हो लेना।
बंधी हुई प्रार्थनाएं मत दोहरानाक्योंकि बंधी हुई प्रार्थनाएं कंठों में हैंउससे नीचे नहीं जातींबस कंठों तक जाती हैंकंठों से आती हैं।
इसलिए अक्सर तुम पाओगे कि जिनको प्रार्थनाएं याद हो गयी हैंवे प्रार्थनाएं से वंचित हो गये हैं। वे प्रार्थना करते रहते हैं,उनके ओंठ दोहराते रहते हैं मंत्रों को और उनके भीतर विचारों का जाल चलता रहता है। फिर धीरे-धीरे तो यह इतनी आदत हो जाती है दोहराने की कि उससे कोई बाधा ही नहीं पड़तीभीतर दुकान चलती रहती हैओंठों पर मंदिर चलता रहता है।
"इश्क पाबंदेवफा हैन कि पाबंदे-रसूम!'
प्रेम जानता ही नहीं रीति-रिवाजक्योंकि प्रेम आखिरी नियम है। किसी और व्यवस्था की जरूरत नहीं हैप्रेम पर्याप्त है। प्रेम की अराजकता में भी एक अनुशासन है। वह अनुशासन सहजस्फूर्त है।
"सर झुकाने को नहीं कहते हैं सिजदा करना!'
और सिर्फ सिर झुकाने का नाम प्रार्थना नहीं हैखुद के झुक जाने का नाम प्रार्थना है। सिर झुकाना तो बड़ा आसान है।
मेरे पास लोग बच्चों को लेकर आ जाते हैं। वे खेद सिर झुकाते हैंबच्चे खड़े रह जाते हैंतो मां उसका सिर पकड़कर चरणों में झुका देती है। मैं उनको कहता हूं, "यह तुम क्या ज्यादती कर रहे हो?' वह बच्चा अकड़ रहा हैवह खड़ा हैउसके सिर नहीं झुकाना हैकोई कारण नहीं है सिर झुकाने काउससे मेरा कुछ लेना-देना नहीं हैमां उसका सिर झुका रही हैरसूम सिखाया जा रहा हैनियम सिखाया जा रहा है। वह धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाएगा। बड़ा होते-होते किसी को झुकाने की जरूरत न रह जाएगीखुद ही झुकने लगेगालेकिन हर झुकने में वह मां का हाथ इसकी गर्दन पर रहेगा। यह बुढ़ापे तक जब भी झुकेगातब इसे कोई झुका रहा है वस्तुतःयह खुद नहीं झुक रहा है।
तुमने कभी खयाल कियातुम मंदिर में जाकर झुकते होयह सिर्फ एक आदत है या आस्था हैक्योंकि बचपन से मां-बाप इस मंदिर में ले गये थेझुकाया थाएक दिन तुम्हारी गर्दन को...तुम्हें सभी को याद होगा कि किसी न किसी दिन मां-बाप ने तुम्हारी गर्दन को झुकाया था किसी पत्थर की मूर्ति के सामनेकिसी मंदिर मेंकिसी शास्त्र के सामनेकिसी गुरु के सामने। याद करो उस दिन को। फिर धीरे-धीरे तुम अभ्यस्त हो गये। फिर तुम भी संसार के रीति-नियम समझने लगे। फिर तुमने भी औपचारिकता सीख ली। वह बच्चा ज्यादा शुद्ध है जो सीधा खड़ा है। उसे झुकना नहींबात खत्म हो गयी। झुकने का उसे कोई कारण समझ में नहीं आताबात खत्म हो गयी। मां उसे एक झूठ सिखा रही है।
समाज सभी को झूठ सिखा रहा हैऔपचारिक आचरण सिखा रहा है। फिर धीरे-धीरेधीरे-धीरे परम पर परत जमते-जमते ऐसी घड़ी आ जाती है कि तुम बड़ी सरलता से झुकते होऔर बिना जाने कि यह भी तुम्हारा झुकना नहीं है। यह सरलता भी झूठी है। इस सरलता में भी समाज के हाथ तुम्हारी गर्दन को दबा रहे हैं। इस सरलता में भी तुम्हारी गुलामी है।
और प्रेमगुलामी से कहीं पैदा हुआपरतंत्रता से कहीं पैदा हुआ?
भक्ति तो परम स्वतंत्रता है। इसलिए छोड़ दो वह सब जो तुम्हें सिखाया गया होताकि "अन-सीखेका जन्म हो सके। हटा दो वह सब जो दूसरों ने जबरदस्ती से तुम्हारे ऊपर लादा हो! निर्बोझ हो जाओ!
फिर से सीखना पड़ेगा पाठ।
तुम्हारी स्लेट पर बहुत कुछ दूसरों ने लिख दिया है। खाली करो उसे! धो डालो! ताकि फिर से तुम अपने स्वभाव के अनुकूल कुछ लिख सको।
"इश्क पाबंदेवफा हैन कि पाबंदे-रसूम
सर झुकाने का नहीं कहते हैं सिजदा सिजदा करना।'
प्रार्थना बड़ी अभूतपूर्व घटना है।
झुकना! उसके आगे तो फिर कुछ और नहीं वह तो आखिरी बात है। क्योंकि जो झुक गयाउसने पा लिया! जो झुक गया वह भर गया! वह भर दिया गया!
तुम तो रोज झुकते होकुछ भरता नहीं। तुम तो रोज झुकते होखाली हाथ आ जाते हो। धीरे;धीरे तुम्हें ऐसा लगने लगता है कि जिसके सामने झुक रहे हैं वह परमात्मा झूठ हैक्योंकि इतनी बार झुकेकुछ हाथ नहीं आता। मैं तुमसे कहता हूंवह परमात्मा तो सच हैतुम्हारा झुकना झूठा है। तुम कभी झुके ही नहीं।
दुनिया में नास्तिकता बढ़ती जाती हैक्योंकि झूठी आस्तिकता कब तक साथ दे! जबरदस्ती झुकाई गयी गर्दनें कभी न कभी अकड़कर खड़ी हो जायेगी। और इतने बार झुकने के बाद जब कुछ भी न मिलेगातो स्वाभाविक है कि आदमी कहे, "क्या सार हैक्यों झुके?' और स्वाभाविक है कि आदमी कहे, "इतनी बार झुककर कुछ न मिलाकोई परमात्मा नहीं है!'
यह तुम्हारी झूठी आस्तिकता का परिणाम है।
सच्ची आस्तिकता आस्था से पैदा होती है।
आस्था का अर्थ है...जैसा तुम समझते हो वैसा नहीं। तुम समझते होआस्था का अर्थ है: विश्वास।
नहींआस्था का अर्थ विश्वास नहीं है। आस्था का अर्थ है: अनुभव। विश्वास तो दूसरे देते हैंआस्था वह है जो तुम्हारे भीतर तुम्हारी स्वाभाविकता से पैदा होती है।
प्रेम सीखो!
नियम भूलो!
प्रेम पर दांव लगाओ,जोखिम है! नियम में कभी कोई जोखिम नहींइसलिए तो लोग नियम में जीते हैं। लेकिन जिसने जोखिम न उठायीउसने कुछ पाया ही नहीं। इसलिए तो लोग बिना पाये रह जाते हैं।
पूछा है: "इस विराट अस्तित्व में मैं नाकुछ हूंयह अप्रिय तथ्य स्वीकार करने में भय पकड़ता है।पकड़ने दो भय! भय की मौजूदगी रहने दो। भय से कहो, "तू रहलेकिन हम झुकते हैं'
तुम भय को एक किनारे रखो!
मैं जानता हूं कि भय को एक दम मिटा न सकोगेलेकिन एक किनारे रख सकते हो। भय के रहते हुए भी तुम झुक सकते हो। भय की सुनना जरूरी नहीं है। तुम सुनते होस्वीकार करते होमान लेते होइसलिए भय मालिक हो जाता है।
भय से कहो, "ठीकतेरी बात सुन लीफिर भी झुककर देखना है:। तू कहता हैजोखिम है! होगी। लेकिन जोखिम उठाकर देखनी है। तू कहता हैमिट जाओगे!... सही। रहकर देख लियाअब मिटकर देखना है। रह-रहकर कुछ न पायाजब यह आयाम भी खोज में मिटने का!'
कोई भय को दबाने की जरूरत नहीं हैध्यान रखना। दबाया हुआ भय तो फिर-फिर उभरेगा। नभय को पूरा स्वीकार कर लो कि ठीक हो। मानातुम्हारी बात में भी बल है। तुम्हारे तर्क से कोई इनकार नहीं। लेकिन तुम्हारे साथ रहकर इतने दिन देख लिया और जीवन का कोई अनुभव न हुआअब कुछ और भी कर लेने दो।
तर्क उठेंगे मन में। उनसे कहोठीक है। तुम्हारी बात जंचती थीइसलिए तो इतने दिन तक तुम्हारा संग-साथ रहा। इतने दिन तक तुम्हें ओढ़ालेकिन कुछ पाया नहींहृदय कोरा हैआत्मा रिक्त हैअब बहुत हुआअब तुमसे विपरीत दिशा में भी थोड़ा जाकर देख लेने दो।
डर तो लगेगाक्योंकि जिस दिशा में कभी न गयेउस दिशा में जाते मन घबड़ाता हैपैर कंपते हैं। मन चाहता है: "जाने-माने रास्ते पर चलो। कहां जंगल में जा रहे हो बियाबान मेंभटक जाओगे। भीड़ जहां चलती है वहीं चलो! कम से कम संगी-साथी तो हैं! भीड़ हैतो राहत हैअकेले नहीं हैं।'
पर एक न एक दिन भीड़ के रास्तों को छोड़कर पगडंडी की राह लेनी पड़ती है।
परमात्मा तक कोई राजपथ नहीं जाताबस पगडंडी जाती हैं। कोई राजपथ परमात्मा तक नहीं जाताअन्यथा समाज परमात्मा तक पहुंच जाए। व्यक्ति ही पहुंचते हैंसमाज कभी नहीं।
पगडंडियां! पगडंडियां भी ऐसी कि तुम चलो तो बनती हैंकोई तैयार नहीं हैं पहले सेकि किसी ने तुम्हारे लिए बनाकर रखी हों। तुम्हारे चलने से ही बनती हैं। जितना तुम चलते हो उतनी ही निर्मित होती हैं।
यह राह ऐसी है कि तैयार नहीं हैचलने से तैयार होती है। और बड़ा सुंदर है यह तथ्य। नहीं तो आदमी एक परतंत्रता हो जाए;राह तैयार हैउस पर तुम्हें चले जाना है! तब तो तुम रेलगाड़ियों के डब्बों जैसे हो जाओ। लोहे की पटरियों पर दौड़ते रहो। फिर तुम्हारे जीवन में गंगा की स्वतंत्रता न हो। फिर वह मौज न रह जाएजो अपनी ही खोज से आती है।
गंगा सागर पहुंचती है--लोहे की पटरियों पर नहींचलती हैचल-चलकर अपनी राह बनाती हैमार्ग बनाती है: अनजान की खोज पर! सागर है भी आगेइसका भी क्या पक्का पता है!
तो भय स्वाभाविक है। लेकिन भय के साथ रहकर हम बहुत दिन देख लिये। अब भय को कहोरहने दो भय को एक किनारे--तुम चलो!
कंपते हुए पैरों से सहीपगडंडी पर उतरो!
डरते हुएधड़कते हुए हृदय से सहीभीड़ को छोड़ो!
घबड़ाहट होगीलौट-लौट जाने का मन होगा--कोई चिंता नहीं।
कभी लौट जाने का मन होकभी घबड़ाहट हो तो इतना ही याद रखना कि भय की और मन की मानकर बहुत दिन चले थे,कहीं पहुंचे न थे।
नये को एक अवसर दो!
जिस दिन तुम नये को अवसर देते हो उसी दिन तुम परमात्मा को अवसर देते हो। जब तक तुम पुराने को दोहराते होलीक को पीटते होलकीर के फकीर होतब तक तुम समाज के हिस्से होते होभीड़ के हिस्से होते हो।
व्यक्ति बनो!
अकेले का साहस जुटाओ!
और सबसे बड़ा साहस यही है: इस तथ्य को स्वीकार कर लेना कि मैं इस विराट का अंश हूंअलग-थलग नहीं हूंद्वीप नहीं हूं,इस पूरे विराट का एक अंश हूं। मैं नहीं हूंअस्तित्व है!
यही तो भक्ति की सारी की सारी व्यवस्था है कि भक्त खो जाए भगवान मेंकि भगवान खो जाए भक्त मेंकि एक ही बचेदो न रह जाएं।
तीसरा प्रश्न: आपसे मिलकर भी यदि हमारा उद्धार न हुआतब तो शायद असंभव ही है कम से कम मुझ निरीह पर तो रहम खाइए। न तो मुझसे ध्यान सधता है न भक्ति। भक्ति की लहरियां आती हैं अवश्यपर बहुत झीनीऔर वह भी कभी-कभी,और संसार का भयंकर तूफान तो सदा हावी है।

ध्यान साधना होता हैभक्ति साधनी नहीं होती।
भक्ति की जो छोटी-छोटी लहरियां आ रही हैं उनमें डूबोउनमें रस लो। तुम्हारे डूबने से लहरें बड़ी लगेंगी। दूर किनारे पर मत बैठे रहोअन्यथा लहरें आएंगी और खो जाएंगी और तुम अछूते रह जाओगे। उतरो! लहरों को तुम्हारे तन-प्राण पर फैलने दो। अगर छोटी-छोटी लहरें आ रही हैं तो भरोसा रखोलहरों में सागर ही आया है। छोटी से छोटी लहर में विराट से विराट सागर छिपा है!
ध्यान साधना पड़ता है। ध्यान साधना है। भक्ति! भक्ति साधना नहीं हैउपासना है।
भेद समझ लो।
साधना का अर्थ है: तुम्हें कुछ करना है। उपासना का अर्थ है: तुम्हें सिर्फ परमात्मा को मौका देना है। साधना में तुम्हें चेष्टा करनी पड़ती हैउपासना में तुम बेसहारा होकर अपने को परमात्मा पर छोड़ देते हो--तुम कहते हो, "अब जो तेरी मर्जी! अब तू जैसे रखे! अब तू जो करवाये! डुबाये तो वही किनारा! अब मैं नहीं हूं।'
भक्ति साधनी पड़ती। साधने में तो तुम बने रहते हो। उपासना में तुम खो जाते होतुम जैसे-जैसे पास आते हो।
उपासना शब्द का अर्थ है: परमात्मा के पास आना। उप-आसन--"उसकेपास बैठना। बस बैठना ही काफी है। तुम "उसेमौका दो। तुम बैठ जाओ--"उसकेपास! "उसपर छोड़कर! और "उसेमौका दो।
बिलकुल ठीक हो रहा है: "भक्ति की लहरियां आती हैं अवश्यपर बहुत झीनीऔर वह भी कभी-कभी।'
इसे भी सौभाग्य समझो कि आती हैं। बस उन लहरों को ही पकड़ोउनमें डूबो! एक धागा भी हाथ में आ जाए तो बस काफी है। इसलिए तो भक्ति के इस शास्त्र को भक्ति-सूत्र कहा हैयोग के शास्त्र को योग-सूत्र कहा है--धागा! सूत्र यानी धागा। यह पूरा शास्त्र नहीं हैबस सूत्र है। पर सूत्र हाथ में पकड़ आ गयातो बात खत्म। उसी सूत्र के सहारे चलते-चलते तो...!
एक किरण पकड़ लो सूरज की तो सूरज तक पहुंचने के लिए सहारा मिल गया। उसी किरण के सहारे चलते जानातो उसके स्रोत तक पहुंच जाओगेजहां से किरण आती है।
मगर हमारा मन बड़ा लोभी है। वह कहता है "कभी-कभी आती हैं यह भी कोई कम सौभाग्य हैएक बार भी जीवन में लहर आ जाए और तुम अगर होशियार होतुम अगर जरा समझदार हो तो तुम उस एक ही लहर के सहारे उसके सागर को पा लोगे।
"कभी-कभी आती हैं!'--जरूरत से ज्यादा आ रही हैं।
तुम्हारी पात्रता क्या हैयोग्यता क्या हैकमाई क्या हैकुछ भी नहीं है। उसकी अनुकंपा से आती होंगी। प्रसाद स्वरूप आती होंगी।
धन्यवाद दोशिकायत मत करो! शिकायत करोगे तो जो लहरें आती हैं वे भी धीरे-धीरे खो जाएंगी। क्योंकि शिकायती चित्त के पास उपासना असंभव है। जितनी ज्यादा तुम्हारी शिकायत होगी उतना ही परमात्मा से फासला हो जाएगा। बिना शिकायत उसके पास बैठ रहो। धन्यवाद दो!
मैंने सुना हैमुसलमान बादशाह हुआ: महमूद। उसका एक नौकर था। बड़ा प्यारा था। इतना उसे प्रेम था उस नौकर से और उस नौकर की भक्ति-भाव सेउसके अनन्य समर्पण से कि महमूद उसे अपने कमरे में ही सुलाता था। उस पर ही एक भरोसा था उसको।
दोनों एक दिन शिकार करके लौटते थेराह भटक गयेभूख लगी। एक वृक्ष के नीचे दोनों खड़े थे। एक फल लगा था--अपरिचितअनजान। महमूद ने तोड़ा। जैसी उसकी आदत थीचाकू निकालकर उसने एक टुकड़ा काटकर अपने नौकर को दिया,जो वह हमेशा देता थापहले उसे देता था फिर खुद खाता था। नौकर ने खाया। बड़े अहोभाव से कहा कि "एक कली और...! एक कली और दे दीउसने फिर कहा, "एक कली और...!तो तीन हिस्से वह ले चुकाएक हिस्सा ही बचा। महमूद ने कहा, "अब एक मेरे लिए छोड़।पर उसने कहा कि नहीं मालिकयह फल तो पूरा ही मैं खाऊंगा। महमूद को भी जिज्ञासा बढ़ी कि इतना मधुर फल हैऐसा इसने कभी आग्रह नहीं किया! तो छीना-झपटी होने लगी। लेकिन नौकर ने छीन ही लिया उसके हाथ से।
उसने कहा, "रुक! अब यह जरूरत से ज्यादा हो गयी बात। तीन हिस्से तू खा चुका। एक ही फल है वृक्ष पर। मैं भी भूखा हूं। और मेरे मन में भी जिज्ञासा उठती है कि इतनी तो तूने कभी किसी चीज के लिए मांग नहीं की। यह मुझे दे दे वापस।
नौकर ने कहा "मालिकमत लेंमुझे खा लेने दें।'
पर महमूद ने न माना तो उसे देना पड़ा। उसने चखा तो वह तो जहर था। ऐसी कड़वी चीज उसने अपने जीवन में कभी चखी ही न थी। उसने कहा, "पागल! यह तो जहर हैतूने कहा क्यों नहीं।'
तो उसने कहा कि जिन हाथों से इतने स्वादिष्ट फल मिलेउन हाथों से एक कड़वे फल की क्या शिकायत!
शिकायत दूर ले जाएगीधन्यवाद पास लाएगा।
थोड़ा सोचो: उस दिन वह नौकर महमूद के हृदय के जितने करीब आ गया...। महमूद रोने लगा। वह तो बिलकुल जहर था फल। वह तो मुंह में ले जाने योग्य न था। और उसने इतने अहोभाव सेइतनी प्रसन्नता से उसे स्वीकार कियाछीना-झपटी की! वह नहीं चाहता था कि महमूद चखे। क्योंकि चखेगा तो महमूद को पता चल जाएगा कि फल कड़वा था। यह तो कहने का ही एक ढंग हो जाएगा कि फल कड़वा है--न कहा लेकिन कह दिया। यह तो शिकायत हो जाएगी। इसलिए छीन-झपटी की। जिन हाथों से इतने मधुर फल मिलेउस हाथ से एक कड़वे फल की क्या चर्चा करनी! यह बात ही उठाने की नहीं है।
परमात्मा ने इतना दिया है कि जो शिकायत करता है वह अंधा है।
थोड़ी लहरें आती हैंउन लहरों में डूबो! और लहरें आएगी।
धन्यवादअनुग्रह का भाव: बड़ी लहरें आएगी। एक दिन सागर का सागर तुम में उतर आएगा। एक दिन तुम्हें बहाकर ले जाएगा। सब कूल-किनारे टूट जाएंगे।
लेकिन सूत्र यही है कि तुम उसके प्रसाद को पहचानो और अनुग्रह के भाव को बढ़ाते चले जाओ। होता अक्सर ऐसा है कि जो तुम्हें मिलता है तुम उसके प्रति अंधे हो जाते होतुम उसे स्वीकार ही कर लेते हो ठीक हैयह तो मिलता ही हैऔर चाहिए!
अक्सर ऐसा होता है जितना ज्यादा तुम्हें मिल जाता हैउतने ही तुम दरिद्र हो जाते हो। क्योंकि उसको तो तुम स्वीकार ही कर लेते होउसकी तो तुम बात ही भूल जाते हो जो मिल गया।
एक मनोविज्ञानशाला में बंदरों पर कुछ प्रयोग किया जा रहा था। तो एक कटघरे में दस बंदर रखे गये थे जिनका रोज नहलाना-धुलाना होता था। ठीक भोजन मिलता था। बड़ी उस कटघरे में सफाई रखी गयी थीएक मक्खी न थी।
दूसरे कटघरे में दस उन्हीं के साथी बंदर थे। उनको नहलाया-धुलाया न जाता था। उन पर गंदगी इकट्ठी हो गयी थीजूं पड़ गये थेमक्खियां भनभनाती रहती थीं। सफाई का कोई इंतजाम नहीं किया गया था। यह तो प्रयोग था एक।
तीन महीने में मनोवैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष निकाला था वह था कि वे जो गंदे बंदर थेजिन पर मक्खियां झूमती रहती थीं और जिनके शरीर में जूं पड़ गयी थींऔर जिनको नहलाया-धुलाया न गया था--वे ज्यादा शांत और ज्यादा प्रसन्न! और जिनको नहलाया-धुलाया जाता थाठीक भोजन दिया जाता थावक्त पर दिया जाता थाऔर सब तरह की साज-संभाल रखी गयी थी,एक मक्खी नहीं जाने दी गयी थी--वे बड़े परेशान!
फिर यही प्रयोग कुत्तों पर भी दोहराया गया और यही परिणाम पाया गया।
तो मनोवैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि जब तुम्हारी जिंदगी में बहुत परेशानी होती हैतब तुम ज्यादा शांत होते हो। तुम परेशानी में उलझे होते होअशांत होने की भी तुम्हें सुविधा नहीं होती। जैसे-जैसे तुम्हारे पास सुविधा होती जाती हैवैसे-वैसे तुम अशांत होते जाते होक्योंकि सुविधा होती हैव्यस्तता नहीं होतीउलझाव नहीं होता--करो भी तो करो क्या! तो तुम शिकायतों में पड़ जाते हो!
यह मेरा अनुभव है कि जिनके जीवन में भी ध्यान की थोड़ी-सी झलक मिलती हैवे और लोभ से भर जाते हैं। जिनको नहीं मिली हैवे उतने लोभ में भरे नहीं हैंवे ज्यादा प्रसन्न मालूम पड़ते हैं। जिंदगी का उलझाव काफी है। उन्हें स्वाद ही नहीं मिला तो लोभ कहां से लगे?
तुम गौर करोगरीब आदमी को तुम ज्यादा शांत पाओगे अमीर आदमी की बजाय! कारण साफ है: वही जो बंदरों के कटघरे में हुआ। अमीर को सब मिल रहा हैअब वह करे क्या! शिकायत ही करता है।
जो बाहर की अमीरी-गरीबी के संबंध में सच हैवही भीतर की अमीरी-गरीबी के संबंध में भी सच है।
अगर तुम्हें झलकें  मिल रही हैं थोड़ी झीनी सही...झीनी भी तुम कहते होवह भी तुम्हारा शिकायती चित्त हैजो उन्हें झीनी बता रहा है।कभी-कभी मिलती हैं, "चलो कभी-कभी सही। कभी-कभी भी तुम कहते होवह भी तुम्हारा शिकायती चित्त है। उसमें भी लोभ है। जो मिलता है वह तो स्वीकार कर लिया। वह तो जैसे तुम मालिक थेमिलना ही चाहिए थातुम अधिकारी थे उसके! बाकी जो नहीं मिल रहा है उसकी शिकायत है। तो तुमने भक्ति का राज नहीं समझातुम्हें उपासना की कला न आयी।
जो नहीं मिलता उसकी बात ही मत उठाओ। वह बात उठानी अशिष्ट है। उससे असंस्कार पता चलता है। जो मिलता है उसकी बात करोउसका गुणगान करोउसकी महिमा गाओउसके गीत गुनगुनाओ। और तुम जल्दी ही पाओगे: और द्वार खुलने लगे। तुम जल्दी ही पाओगे: और नयी हवाएं आने लगींऔर नयी झलकें मिलने लगीं।
जैसे-जैसे आदमी को मिलना शुरू होता है कुछवैसे-वैसे उसके पैर शिथिल होने लगते हैं। यह भी मन की प्रकृति समझ लेनी जरूरी है।
तुमने कभी खयाल किया। अगर तुम कहीं यात्रा पर गये होपदयात्रा परकिसी तीर्थयात्रा परजैसे-जैसे मंदिर करीब आने लगता हैवैसे-वैसे पैर शिथिल होने लगते हैंअक्सर ऐसा हैअक्सर तुमने देखा होगा या अनुभव किया होगा कि ठेठ मंदिर के सामने जाकर यात्री सीढ़ियों पर बैठ जाता है। अब ज्यादा दूर नहीं है मामला। अब पांच सीढ़ियांदस सीढ़ियां चढ़नी हैंऔर मंदिर...! दस मील चल आयापहाड़ चढ़ आयाकभी बैठा नहीं बीच में कहींठीक मंदिर के सामने आकर बैठ जाता है। लगता है: आ ही गये!
लेकिन तुम मंदिर की सीढ़ियों पर बैठो या हजार मील की दूर मंदिर से बैठोफर्क क्या हैसीढ़ियों पर जो है वह भी मंदिर के बाहर है। हजार मील दूर जो हैवह भी मंदिर के बाहर है।
और परमात्मा का मंदिर कुछ ऐसा है कि तुम बैठे कि चूके। यह कोई जड़-पत्थर का मंदिर नहीं है कि तुम सीढ़ियों पर बैठे रहे तो मंदिर भी वहां रुका रहेगायह तो चैतन्य मंदिर हैतुम बैठे कि चूके! तुम बैठे कि मंदिर दूर गया! तुम रुके कि खोया!
"सामने मंजिल है और आहिस्ता उठते हैं कदम
पास आकर दूर हो रहे हैं मंजिल से हम।'
सावधान रहना!
जब ध्यान की लहरें उठने लगेंभक्ति की उमंग आने लगेथोड़ी रसधार बहेथोड़ी मस्ती छायेतो दो खतरे हैं। एक खतरा यह हैतो इस प्रश्न करनेवाले ने पूछा हैवह खतरा यह है कि तुम कहो कि यह तो कुछ भी नहीं हैऔर चाहिए! तो भी तुम दूर हो जाओगे! दूसरा खतरा यह है कि तुम कहोबस हो गया! पहुंच गये।और बैठ जाओतो भी तुम खो गये!
फिर करना क्या है?
चलते जाना है और शिकायत नहीं करनी है!
चलते जाना है और अहोभाव से भरे रहना है!
चलते जाना है और धन्यवाद देते जाना है!
ओंठ पर गीत रहे धन्यवाद काऔर पैरपैर रुकें न! धन्यवाद तुम्हारा रुकावट न बन जाए। अक्सर ऐसा होता है कि शिकायती चलते हैं और धन्यवादी बैठ जाते हैं। दोनों खतरे हैं। पहुंचता वही है जिसने उस गहरे संयोग को साध लियाधन्यवादी हैऔर चलता है। बड़ा गहरा संतुलन हैलेकिन अगर होश रखो तो सध जाता है।

चौथा प्रश्न: कल के सूत्र में कहा गया है कि लौकिक और वैदिक कर्मों के त्याग को निरोध कहते हैं और निरोध भक्ति का स्वभाव है। और फिर यह भी कहा गया कि भक्त को शास्त्रोक्त कर्म विधिपूर्वक करते रहना चाहिए। कृपया इस विरोध को स्पष्ट करें।

विरोध नहीं हैदिखायी पड़ता है। जो भी पढ़ेगातत्क्षण दिखायी पड़ेगा कि पहले तो कहा लौकिक और वैदिक कर्मसबका त्याग हो जाता हैनिरोध हो जाता हैछूट जाते हैंऔर फिर कहाकरते रहना चाहिए।
विरोध दिखायी पड़ता हैविरोध है नहीं। जानकर ही दूसरा सूत्र रखा गया है कि जब तुम्हारे जीवन से लौकिक और वैदिकइस लोक के और परलोक केसारी आकांक्षाएं और सारे कर्म छूट जाते हैंतो कहीं ऐसा न हो कि तुम कर्म को छोड़ ही दो। कर्म तो छूट जाते हैंलेकिन तुम करते रहना। इसका अर्थ हुआ कि अब तक तुमने कर्ता की तरह किया थाअब अभिनेता की तरह करता। फिर तत्क्षण विरोध खो जाता है। अब तक तुमने किया था कि मैं कर्ता हूंअब तुम अभिनेता की तरह करना। क्योंकि जिस विराट समूह के तुम हिस्से होवह मानता है कि कर्म उचित हैं। इनका अभिनय करना है। तुम्हारे लिए इनका कोई मूल्य नहीं है।
ऐसा ही समझोजब शहर में आते हो तो बाएं चलने लगते होजंगल में जाकर फिर बाएं-दाएं का हिसाब रखने की कोई जरूरत नहीं। जंगल में तुम अकेले हो: बाएं चलोदाएं चलोबीच में चलोजैसा चलना हो चलोक्योंकि वहां कोई पुलिसवाला नहीं खड़ा हैरास्ते पर कोई तख्तियां नहीं लगी हैं। वहां कोई और है ही नहीं तुम्हारे सिवाय।
अगर जंगल में भी जाकर तुम बाएं-ही-बाएं चलो तो तुम पागल होफिर तुम्हारा दिमाग खराब है। क्योंकि बाएं चलने का कोई संबंध चलने से नहीं हैबाएं चलने का संबंध भीड़ में चलने से है। जब अकेले हो तब मुक्त हो।
तोजो व्यक्ति भक्त की दशा को उपलब्ध हुआअपने भीतर अपने एकांत मेंतो सभी नियमों के बाहर हो जाता है। वहां न तो कोई शास्त्र हैन कोई नियम हैन कोई रीति हैन कुछ पाना हैन कहीं जाना है। वह तो अपने भीतर परम अवस्था को उपलब्ध हो गया है। वह तो परमात्मा के साथ एकरस हो गया! भीतरजहां सब एकांत हैवहां तो अद्वैत हो गयावहां तो अनन्यता सध गयी!
लेकिन बाहरजब वह राह पर जाएगातबतब बाएं चलेगा। कहीं ऐसा न हो कि जो तुमने भीतर अनुभव किया हैतुम उसे बाहर भी थोपने की चेष्टा में न पड़ जाओइसीलिए स्पष्ट सूत्र पीछे दिया है: करने चाहिए! उस व्यक्ति को शास्त्रोक्त कर्म विधिपूर्वक करने चाहिए।जानकरहोश सेउन नियमों का पालन करना चाहिए। वे अभिनय होंगे अब। उनकी कोई अर्थवत्ता नहीं है।
लेकिन अगर तुम अंधों के भी रहते हो तो अंधों के नियम मानो। अगर तुम अज्ञानियों के बीच रहते हो तो अज्ञानियों के नियम मानो।
इसे थोड़ा समझने जैसा है।
भारत में एक बड़ी प्राचीन धारणा है कि जब व्यक्ति ज्ञान को उपलब्ध हो जाए तो वह चेष्टापूर्वक नियमों को वैसा ही मानता रहे जैसा पहले मानता था जब ज्ञान को उपलब्ध न हुआ था। शायद यही कारण है कि भारत में महावीरबुद्धपतंजलिनारद,कबीर किसी को भी जीसस जैसी सूली नहीं लगानी पड़ीसूली पर नहीं लटकाना पड़ाऔर न सुकरात जैसा जहर पिलाकर मारना पड़ा।
इसके पीछे बहुत-से कारणों में एक बुनियादी कारण यह भी है कि बुद्ध ने जो भीतर पायाउसे जबरदस्ती उन लोगों पर नहीं थोपा जो अभी उसको समझ भी न सकते थे। भीड़ से अकारण संघर्ष न लिया। भीड़ को फुसलायासमझायाजगाने की चेष्टा कीऊपर उठाने के उपाय कियेलेकिन अकारण संघर्ष न लिया।
जीसस सीधे संघर्ष में आ गये। शायद जीसस के मुल्क मेंयहूदियों के समाज मेंऐसा कोई सूत्र नहीं था।ऐसे किसी सूत्र को मैं अब तक नहीं देख पाया हूं यहूदियों के किसी भी शास्त्र मेंजिसमें यह कहा गया हो कि परम ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति समाज कि नियमों को मानकर चले। टकराहट स्वाभाविक हो गयी।
और जब टकराहट होगी तो एक बात पक्की है कि ज्ञानी तो एक हैअज्ञानी करोड़ हैं। भीड़ उनकी है। वे ज्ञानी को मार डालेंगे। ज्ञानी अज्ञानियों को तो न उठा पाएगाअज्ञानी को मिटा देंगे।
तोभीड़ को मानकर चलना सिर्फ अपनी सुरक्षा ही नहीं है--क्योंकि ज्ञानी को अपनी सुरक्षा की क्या चिंता! भीड़ की मानकर चलनाभीड़ पर करुणा है। अन्यथा भीड़ तुम्हारे विपरीत हो जाएगीतुम उसे फुसला भी न सकोगेराजी भी न कर सकोगेतुम उसे दिशा भी न दे सकोगे।
ऐसा समझो कि तुम मेरे साथ हो,तुम्हारी निन्यानबे बातें मैं मान लेता हूं तो तुम भी मेरी एक बात मानने को तैयार हो सकते होहालांकि मेरी एक तुम्हें बिलकुल बर्बाद कर देगीतुम जहां हो वहां से उखाड़ देगी। और तुम्हारी निन्यानबे मेरा कुछ बिगाड़नेवाली नहीं है। तुम्हारी निन्यानबे मेरे लिए अभिनय होंगी। मेरी एक तुम्हारे लिए जीवन-क्रांति हो जाएगी।
आखिरी प्रश्न: जिसे भक्ति में अनन्यता कहा हैक्या वही दर्शन का अद्वैत नहीं है?
अर्थ तो वही हैलेकिन स्वाद में बड़ा भेद है।
अनन्यता में रस है। अद्वैत बड़ा रूखा-सूखा शब्द है। अद्वैत तर्क का शब्द हैअनन्यता प्रेम का। अद्वैत कहता है: दो न रहे।
बात तो वे एक ही कहते हैं। लेकिन "दो न रहेइसमें बड़ा तर्क है। अद्वैत यह भी नहीं कहता कि "एकहो गयेक्योंकि "एक'कहने से "दोका खयाल आ सकता है। "एकमें "दोका खयाल रहेइसलिए अद्वैत। क्या हुआइसके संबंध में बात नहीं कही जा रही है।
"अनन्यताबड़ा प्यारा शब्द है। दूसरा दूसरा न रहा: अनन्य का अर्थ है। अन्य अन्य न रहाअनन्य हो गया! दूसरा दूसरा न रहाएक हो गये! अद्वैत से ज्यादा है यह बात। इसमें थोड़ा रस है जो अद्वैत में नहीं है।
"अद्वैतगणित और तर्क का शब्द है; "अनन्यताप्रेम और काव्य का। अद्वैत पर किताब लिखनी हो तो रूखी-सूखी होगी। अनन्यता पर किताब लिखनी हो तो काव्य होगातो गीत होगा।
अनन्यता प्रगट करनी हो तो नाचकर प्रगट हो सकती हैजैसे नर्तक नृत्य से एक हो जाता हैऐसा अनन्य। अनन्यता प्रगट करनी हो तो मस्ती से प्रगट होगी। अद्वैत प्रगट करना हो तो मस्ती की कोई जरूरत नहींनृत्य को बीच में लाने में बाधा पड़ेगीसीधे तर्क के नियम काफी हैं।
इसलिए वेदांत के शास्त्र बड़े रूखे-सूखे हैंमरुस्थल जैसे हैं! वे भी परमात्मा के ही शास्त्र हैंक्योंकि मरुस्थल भी परमात्मा के ही हैं। लेकिन वहां हरियाली नहीं उगती। वहां फूल नहीं लगते और पक्षियों का कोई कलरव नहीं होता। झरनों का कलकल नाद वहां नहीं है। राह से गुजरोगे तो मरुस्थल में भी खजूर के पेड़ मिल जाते हैंवे भी वेदांत में न मिलेंगे।
इसलिए वेदांत ने एक बड़ा रूखा-सूखा शास्त्र दिया है। इसलिए वेदांती तर्क करते रहेखंडन-मंडन करते रहेशास्त्रार्थ करते रहे। भक्त नाचा! उतना समय उसने इसमें न गंवाया।
चैतन्य नाचे! ले लिया तंबूरागांव-गांव नाचे! नहीं किया कोई विवाद।
मीरा नाची!
पग घुंघरू बांध नाची!
कोई विवाद नहीं किया!
विवाद में कहां वह स्वाद जो पग-घुंघरुओं में है!
विवाद में कहां वह स्वाद जो वीणा की झंकार में है!
और जब इतने मधुर उपाय उपलब्ध हों तो क्या तर्क जैसा रूखा-सूखा उपाय खोजना!
मीरा बरसी!
जिसने देखा वह डूबा!
जो पास आयाभूला!
विस्मृत किया अपने को!
एक डुबकी लगायी!
कुछ लेकर गया!
चैतन्य के जीवन में तो दोनों घटनाएं हैंक्योंकि पहले वे बड़े तर्कशास्त्री थेन्यायविद थे। और एक ही काम था उनके जीवन में: विवाद। उन जैसा विवादी नहीं था। बंगाल में उनकी बड़ी ख्याति थी। बड़े-बड़े पंडितों को उन्होंने हराया। लेकिन धीरे-धीरे एक बात समझ में आयीपंडित हार जाते हैंवे जीत जात हैं--लेकिन भीतर कोई रसधार नहीं बह रहीइस जीत को भी इकट्ठा करके भी क्या करेंगे! ऐसे जीवन बीता जाता है। यह प्रमाण-पत्र इकट्ठे करके क्या होगा कि कितने लोगों को जीत लिया और कितने लोगों को तर्क में पराजित किया! यह तर्क के जाल से क्या होगा!
एक दिन होश आया कि यह तो समय को गंवाना है। फिर उन्होंने सब तर्क छोड़ दिया। शास्त्र नदी में डुबा दिया। ले लिया मंजीरानाचने लगे! तब उन्होंने किसी और ढंग से लोगों को जीता। तर्क से नहीं जीताप्रेम से जीता! तब उनके चारों तरफ एक,एक अलग ही माहौल चलने लगा। उनकी हवा में एक और गंध आ गयी! जहां उनके पैर पड़ेवहीं विजय-यात्रा हुई। जिसने उन्हें देखावही हारा। लेकिन इस हार में कोई हराया न गया। इस हार में कोई अहंकार न था जीतनेवाले का। इस हार में हारने वाले को पीड़ा न हुई। यह प्रेम की हार थी जो कि जीतने का एक ढंग है।
प्रेम की हार में कोई हारता नहींदोनों जीतते हैं।
प्रेम में जीते तो जीतहारे तो हार। वहां हार-जीत में भेद नहीं है।
अनन्यता बड़ा मधुर शब्द हैअद्वैत बिलकुल रूखा;सूखा!
अनन्यता ऐसा है कि जैसा हरा फलरस-भरा!
अद्वैत ऐसा है जैसे सूखा फलझुर्रियां पड़ासब रस खो गया!
गुठली ही गुठली है अद्वैत!
पर अद्वैत की भाषा अहंकार को जमती हैक्योंकि अहंकार को गंवाने की शर्त नहीं है वहां। इसलिए तुम देखोगे: अद्वैतवादी संन्यासी हैं भारत मेंउनको तुम बड़ा अहम्मन्य पाओगेबड़े भक्ति की लोचभक्त का सौंदर्यवहां उसका अभाव होगा!
भारत ने अद्वैत के नाम पर बहुत खोया। भारत अकड़ा अद्वैत के कारणअहंकारी हुआदंभ बढ़ाशास्त्र बढ़ेतर्कजाल फैला। लेकिन भारत का हृदय धीरे-धीरे रस से शून्य होता चला गया। तो ऐसा कुछ हो गया जैसे कि उत्तम गर्मी  के दिन आते हैं,सूरज तपता है और पृथ्वी सूख जाती है और दरारें पड़ जाती हैं!
भक्ति की वर्षा चाहिए
ताकि फिर दरारें खो जाएं!
धरती का कंठ फिर भीगे!
धरती के प्राण तृप्त हों!
तृषा मिटे!
और धरती धन्यवाद में आकाश को हजारों-हजारों वृक्षों के फूल भेंट करे!
भक्ति वर्षा है! अद्वैत उत्तप्त सूर्य है!
पर अपनी-अपनी मौज! अद्वैत से भी कोई पहुंचना चाहे तो पहुंच जाता है। लेकिन तब बड़ा ध्यान रखना जरूरी है कि कहीं यह तर्कजाल अहंकार को मजबूत न करे।
भक्ति सुगम है। और भक्ति में भटकना कम संभव है। क्योंकि भक्ति की पहली ही शर्त है अहंकार को छोड़ना।
भक्ति  का सारा जोर "उसपर है।
अद्वैत कहता है: "अहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं!ठीक है बिलकुल बात। अगर जोर ब्रह्म पर हो तो ठीक हैकहीं जोर "मैंपर हुआ तो बिलकुल गलत है। कौन तय करेगाकिस पर जोर हैअहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं!जब मैं यह कहूं कि मैं ब्रह्म हूं तो तुम कैसे तय करोगे कि मेरा जोर कहां है: "मैंपर या ब्रह्म परअगर ब्रह्म पर हुआ तो सब ठीकअगर मैं पर हुआ तो सब गलत। वाक्य वही है।
लेकिन भक्ति "मैंपर बात ही नहीं उठाती। भक्ति कहती है: "उसकेअनन्य प्रेम में डूब जाना "उसकेपरम प्रेम में डूब जाना भक्ति है। "उसके'!

आज इतना ही।

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