शनिवार, 9 सितंबर 2017

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-13

शून्य का संगीत है प्रेमा-भक्ति
दिनांक १३ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

अनिर्वचनीशं प्रेमस्वरूपम्
मूकास्वादमवत्
प्रकाशते क्वापि पात्रे
गुणरहितं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्
तत्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति
भाषयति तदेव चिन्तयति
गौणी त्रिधा गुणभेदादार्तादिभेदाद्वा
उत्तरस्मांदुत्तरस्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति

अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम!
प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है--जो कहा न जा सके--जीया जा सकेभोगा जा सकेअनुभव किया जा सके--पर कहा न जा सके।
लहर सागर में है सागर भी लहर में है। लेकिन लहर पूरी की पूरी सागर में हैपूरा का पूरा सागर लहर में नहीं है।

अनुभव सागर जैस हैअभिव्यक्त्ति लहर जैसी है।...थोड़ी सी खबर लाती हैपर बहुतअनंतगुना पीछे छूट जाता हैजरा सी झलक लाती हैलेकिन बहुत शेष रह जाता है।
शब्द शून्य को बांध नहीं पाते--बांध नहीं सकते। शब्द तो छोटे-छोटे आंगनों जैसे हैं। अनुभव काशून्य काप्रेम कापरमात्मा का आकाश असीम है। यद्यपि आंगन में भी वही आकाश झांकता हैलेकिन आंगन को आकाश मत समझ लेनाअन्यथा कारागृह में पड़ जाओगे। जिसने आंगन को आकाश समझाउसका दुर्भाग्यक्योंकि फिर आंगन में ही जीने लगेगा। आंगन से आकाश बहुत बड़ा है। आंगन से स्वाद ले लेनालेकिन तृप्त मत हो जाना।
शब्द से अनुभव का आकाश बहुत बड़ा है। शब्द से यात्रा शुरू होलेकिन शब्द पर यात्रा पूरी न हो जाए। कहीं शब्द को ही सब मत समझ लेना। शब्द में इंगित हैंइशारे हैंजैसे राह के किनारे मील के पत्थर हैंतीर लगे हैं--आगे की तरफ सूचना है। मील के पत्थर को मंजिल मत समझ लेना। सभी शब्द चाहे वेद के होंचाहे कुरान केचाहे बाइबिल के--शब्द मात्र सीमित हैंऔर प्रेम का अनुभव विराट है।
इसलिए पहला सूत्र है आज काबहुत अनूठा: "अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्'!
"उस प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है!'
उसकी व्याख्या हो सकेअभिव्यक्ति न हा सके। ऐसा नहीं कि जिन्होंने जानानहीं कहा हैखूब कहा हैबार-बार कहा हैहजार बार कहा हैफिर भी अनुभव किया हैजो कहना चाहते थेवही नहीं कहा जा पाया है। जो कहा हैबहुत छोटा हैजो कहना चाहते थेबहुत बड़ा है।
रवींद्रनाथ मरणशैया पर थे। एक मित्र ने कहा, "तुम धन्यभागी होतुम्हें जो गाना था गा लियाकहना था कह लिया। तुमने छह हजार गीत रचे हैं। तुम महाकवि हो! तुम तो शांति सेतृप्ति से मृत्यु में विदा हो सकते हो'! रवींद्रनाथ ने आंख खोली और कहा, "तृप्ति! तृप्ति कैसीजो कहना चाहता थाअभी भी अनकहा रह गया हैजो गाना चाहता था अभी गा कहां पाया! यही परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि यह तूने क्या किया! कैसे असमय में उठा रहा है मुझे! अभी तो वाद्य बिठा पाया थासाज जमा पाया था। अभी तो गीत जो गाना थाअनगाया रह गया है। अभी फूल खिले नहींअभी तो सिर्फ भूमि तैयार हुई थी। बाहर के लोगों ने तो यही समझ लिया कि वाद्य का बिठानातबले की ठोंक-पीटसितार के तारों का जमानायही संगीत है'
अगर कोई कवि कहता हो कि जो गाना था गा लिया है तो समझना कवि छोटा हैगाने को बहुत कुछ होगी ही नइसलिए गा लिया। अगर कोई चित्रकार कहे कि जो चित्रित  करना था कर लिया हैतो समझना कि चित्रित करने को कुछ बहुत ज्यादा न रहा होगाआंगन ही बनाना थाआकाश नहीं।
सिर्फ छोटे क्षुद्र अनुभव की प्रगट होते हैं। जितना विराट अनुभठ होउतना ही अप्रगट रह जाता हैजितना हो विराटउतना ही अनिर्वचनीय हो जाता है। अनिर्वचनीयता विरटता के अनुपात में होती है।
इसलिए बुद्ध ने कहा है कि "तुम सोचते होमैं बोलाबोलने की कोशिश की--बोला कहां'! बुद्ध के भक्त--जापान में कहते हैं झेन फकीर--कि बुद्ध बोले ही नहीं। और बुद्ध बोले ही नहीं। और बुद्ध चालिस साल निरंतर बोले!
यही मैं तुमसे कहता हूं, "रोज तुम मुझे सुनते होमैं बोला नहीं। जो बोलना हैबोला नहीं जा सकता। अनिर्वचतीय है। जो बोल रहा हूंवह वही है जो बोला जा सकता हैवह वही नहीं है जो मैं बोलना चाहता हूं। मेरे बोलने को तुम मेरी आकांक्षाअभीप्सा,अभिलाषा मत समझ लेना। मेरा बोलना शब्द की सीमा में है--होगा हीकोई उपाय नहीं है'
शून्य का संगीत बजाना हो तो वीणा के तार कैसे उठाओगेतार को ध्वनि करेगा। शून्य तो ध्वनि में खो जाएगा। शून्य का संगीत उठाना हो तो वीणा तोड़ देनी पड़ेगी। शून्य का संगीत उठाना हो तो वीणा को अनुपस्थित हो जाना पड़ेगा। वीणा की मौजूदगी भी बाधा होगी। मौन से ही कहा जा सकता है जो कहना है। लेकिन मौन तुम न समझ सकोगे।
प्रेम अनिर्वचनीय है। लेकिन प्रेम को जो समझना चाहते हैंशब्द के अतिरिक्त उनके पास कोई और समझ नहींइसलिए प्रेम पर भी बोलना होता है।
शून्य नहीं होता परिभाषित
रहता मात्र नयन में
मन्वंतर संवत्सर वत्सर
कब बंधते लघु क्षण में?
रहते सभी अनामन कोई
कभी पुकारा जाता
रहा जाती अभिव्यक्ति अधूरी
जीवन-शिशु तुतलाता!
सब बोलना तुतलाने जैसा है। बुद्धों के वचन भी तोतले हैंतुतलाने जैसे हैं। जैसे छोटा बच्चा कुछ कहना चाहता हैबड़े भाव से भरा हैपर शब्द नहीं है। शब्दों की भी कुछ खोज-बीन कर ले थोड़ी-बहुततो बड़े थोड़े से शब्द हैं। कहना चाहता है बड़ी बातें,लेकिन एक ही शब्द जानता है: "मां'! "मां'! उसी से सब कहना है। भूख लगे तो मां-मांप्यास लगे तो मां-मांधूप लगे तो मां-मांशीत लगे तो मां-मां। एक ही शब्द है,  उसी से सब कहना है।
शब्द बड़े थोड़े हैंकहने को बड़ा विराट है। और प्रेम विराट से भी विराटतर है। प्रेम महाशून्य है। प्रेम का अर्थ ही हैजहां तुम मिट जाओजहां तुम्हारी खबर न मिलेऐसी जगह आ जाओ जहां अपने को भी खोजने से खोज न सको।
प्रेम का अर्थ हैजहां तुम मिट जाओ। प्रेम महामृत्यु है। तुम जहां शून्य हो जाते हो वहीं परमात्मा प्रगट होता हैअपने अनंत रूपों में। जहां तुम खो जाते होवहीं उसकी वीणा बज उठती हैअनंत स्वर-संगीत तुम्हें घेर लेते हैं। लेकिन तुम बचते नहीं,कहनेवाला नहीं बचता। पहली बात: भाषा छोटी हैसंकुचित--थोड़े से शब्दबच्चे के तुतलाने जैसे। फिर दूसरी बात: प्रेम को जानने वालाजानने में खो जाता हैपिघल जाता हैबह जाता हैबोलनेवाला बचता नहीं। जब बोलने योग्य कुछ होता है जीवन में तो बोलनेवाला नहीं बचता। जब तक बोलने वाला होता है जीवन में तो कुछ बोलने योग्य नहीं होता।
तुम कितना बोलते हो! कभी सोचासुबह से सांझ तक बोलते ही रहते हो। कभी विचाराबोलने को क्या हैरात नींद में भी बड़बड़ाते होबोले ही चले जाते हो। कभी ठहरो! क्षणभर को ठिठको! कभी रुककर सोचो! लौटकर देखोबोलने को क्या हैबोलने को कुछ भी नहीं। मगर बोल-बोलकर ऐसा आभास कर लेते हो कि जैसे बोलने को बहुत कुछ था। कहानी कह-कहकर आभास कर लेते हो कि कहने का कहानी थी। ऐसे झूठी संपदा का भ्रम पैदा होता है। गा-गाकर समझा लेते हो कि गीत पैदा हुआ थागायक का जन्म हुआ था। बिना जानेस्वरत्ताल का कोई अनुभव नहींलेकिन ठोंकते-पीटते रहते हो वीणा कोशोरगुल होता है। निश्चित हीउसी शोरगुल को संगीत समझ लेते हो। जब संगीत पैदा होता है तो हाथ रुकने लगते हैंवीणा छेड़ने में भी डरते हैं।
जितनी होती है गहरी समझउतना ही मौन प्रगाढ़ होने लगता है। फिर अगर तुम बोलते भी होजानकर बोलते होमजबूरी है;दूसरा समझ न सकेगा मौन कोइसलिए मुखर होते हो। लेकिन एक क्षण को भी यह बात विस्मरण नहीं होती कि जो पाया है वह कहा न जा सकेगा। क्योंकि कहनेवाला भी शेष नहीं रहा उसी पाने मेंउसे भीउसी पाने में उसे दे डाला है। उसे देकर ही पाया है ।
"शून्य नहीं होता परिभाषित!
और प्रेम शून्य हैमहाशून्य है'
दो तरह के शून्य हैं। एक तो गणित का शून्य हैवह किताबों मेंकागजों परस्लेट-पट्टियों पर होता है। आदमी न हो तो गणित का शून्य मिट जाएगाक्योंकि आदमी न हो तो गणित न होगा। गणित का शून्य भी बड़ा बहुमूल्य है। एक के ऊपर रख दोदस बन जाते हैं। दस के ऊपर रख दोसौ बन जाते हैं। उस शून्य से सारा गणित निकलता है। सारा गणित शून्य का ही फैलाव है। लेकिन वह शून्य खो जाएगावह मनुष्य निर्मित शून्य है। गणित का शून्य असली शून्य नहीं हैआदमी न होगाखो जाएगा। लेकिन एक और शून्य भी है--असली शून्य--प्रेम काआदमी हो या न होरहेगा।
जब दो पक्षी भी प्रेम में पड़ते हैंतो उसी शून्य में उतर जाते हैं। जब धरती-आकाश प्रेम में डूबते हैं तो उसी शून्य में उतर जात हैं। जब दो पौधे लहराते हैं प्रेम की तरंगतो उसी शून्य में उतर जाते हैं।
प्रेम का शून्य जीवन का शून्य है। गणित का शून्य तो नकारात्मक भाव रखता है। गणित के शून्य का अर्थ होता हैजहां कुछ भी नहींखालीयद्यपि उस खाली से सारे गणित का खेल चलता है। तुम शून्य को हटा लो गणित सेआंकड़े रह जाएंगे,लेकिन गणित खो जाएगा। सारा विस्तार उसी ना-कुछ का है। लेकिन प्रेम का शून्य तो विधायक शून्य है। जैसे गणित का सारा विस्तार गणित के शून्य का हैऐसे ही जीवन का सारा विस्तार प्रेम के शून्य का है।
तुम पैदा हुए हो--प्रेम की किसी ऊर्जा से। सारे जगत का खेल चलता है--प्रेम की ऊर्जा से। अब तो वैज्ञानिकों को भी शक होने लगा है कि शायद जिसे वे गुरुत्वाकर्षण कहते हैं पृथ्वी कावह पृथ्वी का प्रेम हो! और जिसे वे ऋण और धन विद्युत का आकर्षण कहते हैंवह शायद विद्युतीय प्रेम हो! शायद जिसे वे तारों के बीच का संबंध और जोड़ कहते हैंवह भी चुंबकीय प्रेम हो! शायद अणु-परमाणु जिससे गुंथे हैं--टूटकर छितर नहीं जातेवह भी प्रेम की ही गांठ होवह भी प्रेम का ही गठबंधन हो! होना भी चाहिएक्योंकि आदमी कुछ अलग-थलग तो नहीं। आया है इसी विराट सेजाएगाइसी विराट में। जहां से आदमी आता हैवहीं से पौधे आते हैंवहीं से पत्थर आते हैं। जरूर कोई चीज तो समान होनी ही चाहिए। स्रोत समान है तो कुछ चीज तो समान होनी ही चाहिए। तभी तो तुम पत्थर के पास बैठकर भी अजनबी अनुभव नहीं करते। वृक्ष के पास बैठकर भी अपनापन अनुभव करते हो। सागर भी बुलाता है। हिमालय से भी बात हो जाती है। आकाश को देखते हो तो भी संबंध बनता है,परिवार मालूम होता है।
अस्तित्व परिवार है। और अगर परिवार को तुम समझोतो परिवार को जोड़नेवाला सेतु और धागे का नाम ही प्रेम है।
इसलिए जीसस का वचन अनूठा हैजब जीसस ने कहा: परमात्मा प्रेम है। जीसस ने यह कहा कि परमात्मा को छोड़ दो तो भी चलेगाप्रेम को मत छोड़ देना। परमात्मा को भूल जाओकुछ हर्जा न होगाप्रेम को मत भूल जाना। प्रेम है तो परमात्मा हो ही जाएगा। और अगर प्रेम नहीं है तो परमात्मा पत्थर की तरह मंदिरों में पड़ा रह जाएगामुर्दालाश होगी उसकीउससे जीवन खो जाएगा।
भक्ति का सारा सूत्र प्रेम है। और प्रेम से सब निकला है--पदार्थ ही नहींपरमात्मा भी। परमात्मा प्रेम की आत्यंतिक नियति है--अंतिम खिलावट! आखिरी ऊंचाई! संगीत की आखिरी छलांग! परमात्मा प्रेम का ही सघन रूप है। प्रेम को समझा तो परमात्मा को समझा। प्रेम को न समझ पाए तो परमात्मा से चूक हो जाएगी।
इसलिए भक्ति का शास्त्र बड़ा अनूठा है। भक्ति का शास्त्र संसार के विरोध में नहीं है। भक्त्ति का शास्त्र कहता हैसंसार में प्रेम को खोजनाक्योंकि उन्हीं चरणचिह्नों के सहारे तुम परमात्मा तक पहंच पाओगे।
हांएक दृष्टि का रूपांतरण चाहिए। अपने बेटे को प्रेम करनाअपने बेटे की तरह नहीं। वहीं भूल हो जाती है। अपने बेटे को भी प्रेम करना--परमात्मा के एक रूप की तरह। वहीं भूल मिट जाती है। वहीं उलझन छूट जाती है। प्रेम जिसको भी करनाउसमें परमात्मा देखना। और प्रेम से शुरुआत होती है। प्रेम के अभाव मेंपरमात्मा कोरी लफ्फाजी हैशाब्दिक जाल हैतर्क का ऊहापोह हैवाद-विवाद है--सार कुछ भी नहीं।
इसलिए तुम पाओगे बहुतों कोपंडितों कोपरमात्मा की चर्चा करतेलेकिन अगर उनकी आंख में तुम्हें प्रेम की किरण न मिले तो समझ लेनासब धोखा हैसब पाखंड है। प्रेम की किरण हो आंख में तो चर्चा कोई भी चलती होपरमात्मा की ही चर्चा है। चाहे कोई यह भी कहता हो कि परमात्मा नहीं है--जैसे बुद्ध ने कहा, "कोई परमात्मा नहीं'--लेकिन बुद्ध धोखा थोड़े दे पाएंगे। किसको धोखा देने का सोचा है बुद्ध ने। बुद्ध पड़ जाएं धोखे मेंपड़ जाएंबाकीकोई जाननेवाला क्या धोखे में पड़ेगा! बुद्ध की आंख कहती है जो बुद्ध के वचन इनकार करते हों। और बुद्ध शायद इसीलिए इनकार कर रहे हैं कि मुंह से कहने से क्या होगाअगर आंख में तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता! और आंख में दिखाई पड़ता हो तो मुंह कुछ भी कहता होतुम देख ही लोगे।
वह शायद कसौटी थी। वह शायदजो उनके पास आते थेउनकी परीक्षा थी। जो परीक्षा में पर उतर गएउन्होंने बुद्ध के द्वार से--उस गुरुद्वारे में--सब कुछ पा लिया। स्वभावतः बुद्ध कहते रहे कि भगवान नहीं हैऔर जिन्होंने बुद्ध को जानाउन्होंने कहा, "तुम भगवान हो'! धोखा किसे दे सकते हो?
शून्य नहीं होता परिभाषित
रहता मात्र नयन में मन्वंतर संवत्सरवत्सर
कब बंधते लघु क्षण में?
रहते सभी अनामन कोई
 कभी पुकारा जाता
रह जाती अभिव्यक्ति अधूरी
जीवन-शिशु तुतलाता!
हमारे श्रेष्ठतम व्याख्याकार भी तुतला रहे हैं। हमारे श्रेष्ठतम दार्शनिक और मनीषि भी तुतला रहे हैं। मगर उनकी करुणा है कि उसे कहने की कोशिश करते हैंजो नहीं कहा जा सकता। और तुम्हारी भूल होगी कि उन्होंने जो कहा हैतुम उसे वही समझ लो कि वही सत्य है। उनकी करुणा हैइसलिए कहते हैंतुम्हारा अज्ञान होगा अगर तुम उसे पकड़ लो।
जिन्होंने वेद की ऋचाएं गाईंउनकी महाकरुणा हैवे न गाते तो मनुष्यता वंचित रह जातीवे न गाते तो मनुष्य दरिद्र होतावे न गाते तो मनुष्य की चेतना इतनी समृद्ध न होती जितनी आज है। लेकिन तुम्हारी भूल होगी कि तुम उन ऋचाओं को पकड़कर बैठ जाओ और तुम समझो कि ऋचाओं में सत्य है या कि ऋचाएं सत्य हैं।
इसलिए तो नारद ने कहा: भक्त सर्वथा वेद का त्याग कर देता है। वेद से मतलब सिर्फ चार वेदों से नहीं है। वेद से मतलब उन सभी शास्त्रों का है जिनमें महाकरुणावान पुरुषों ने अपने अनुभव को परिभाषित करने की असफल चेष्टा की है। असफल इसलिए भी हो जाती है चेष्टा कि जब तुम परमात्मा से के पास पहुंचते हो--तुमने जो मांगा था उससे अनंतगुना मिलना शुरू होता है;तुम्हारी झोली छोटी पड़ जाती है।
एक रूप मांगा थातुमने
यह सारा संसार दे दिया!
छोटी-सी पुतली के पट पर
 किस-किस का प्रतिबिंब उतारूं
भीड़ खड़ी है सन्मुख मेरे
किसे छोड़ दूंकिसे पुकारूं
एक कली मांगी थीतुमने
अपना हार उतार दे दिया!
एक राग मांगा थातुमने
अपना उठा सितार दे दिया!
एक रंग मांगा थातुमने
सुरधनु का उपहार दे दिया!
झोली छोटी पड़ जाती है। मांगनेवाले का हृदय छोटा पड़ जाता है। जैसे बूंद में सागर उतर आएतो जो दशा बूंद की हो जाए,वही भक्त की हो जाती है।
"अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्!'
प्रेम का स्वरूप व्याख्या केवर्चन के बाहर है।
"प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है'
अनिर्वचनीयता बहुरंगी हैबहुमुखी हैबहुआयामी है। परमात्मा का जब उदघोष होता है तो तुम सुनते होपरमात्मा बोलता नहीं। तुम भर जाते हो संगीत सेऔर उसकी वीणा मौन रही आती है। रहस्यपूर्ण है अनुभव।
कभी-कभी तुम्हें अनुभव होगा किसी "महानुभावकी छाया में: सदगुरु चुप होगा और अचानक तुम अनुभव करोगे कि तुम भरने लगेउसने कुछ दिया नहीं प्रगटअप्रगट में कुछ उंडल आयाउसने कुछ तुम्हारे हाथों में दिया नहीं--सीधा-साफरूपरेखा में आबद्ध--और तुम्हारे हाथ अचानक भर गए।
परमात्मा प्रसाद देता नहीं--तुम्हें मिलता है। देतो प्रगट करना आसान हो जाए। बिना दिए मिलता है। बोलेसुना होतो दूसरे को भी सुनाना आसान हो जाए।
शून्य से आती है--प्रतीतिअहसासलहर! मस्ती की तरह तुम्हें घेर लेता है! शब्दों की तरह नहींशास्त्रों की तरह नहीं--शराब की तरह तुम्हें भर देता है। तुम तुम नहीं रह जातेसब कुछ बदल जाता है;लेकिन कोई हाथ देते हुए मालूम नहीं पड़तेकोईवीणा बोलती हुई मालूम नहीं पड़ती। सुना जाता हैइलहाम होता हैउदघोषणा होती है। स्रोत का पता नहीं चलता।
तुम चकितअवाकरहस्यपूरित रह जाते हो। उस घड़ी मेंहृदय भी रुक जाता हैमन की तो बात ही न करो। विचार ठिठक जाते हैं। सोच-विचार की सारी क्षमता खो जाती है। तुम पहली दफा निर्बोध शिशु की भांति हो जाते हो! कोरे कागज!
गोशे-मुश्ताक की क्या बात है अल्लाह अल्लाह
सुन रहा हूं में वो नग्मा जो अभी साज में हैं।
उत्कंठित कानों की क्या बात कहें! वह गीत जो अभी गाय नहीं गयाजो फूल अभी फूला नहींजो बीज अभी टूटा नहीं...।
"सुन रहा हूं मैं वो नग्मा जो अभी साज में है'! अभी साज के बाहर नहीं आयाअभी रूप नहीं लिया--अरूपमौन! देख रहा हूं उसे जिसने अभी आकार नहीं लिया! मिलन हो रहा है उससे जो अभी जन्मा नहीं। फिर कैसे अभिव्यक्ति होगीफिर कैसे अभिव्यंजना होगी?
"अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्!'
"गूंगे के स्वाद की तरह!'
 "मूकास्वादमवत्'
नारद के इस सूत्र को फिर भक्त हजारों तरह से गाते रहे हैं। कबीर कहते हैं: गूंगे केरी सरकरा! "गंगे का गुड़तो लोकाक्ति बन गया। मगर जन्म हुआ है इसी सूत्र से।
"मूकास्वादमवत्! गूंगे के स्वाद की तरह'!
गूंगे के स्वाद को समझें।
गूंगे को कोई अड़चन स्वाद लेने में नहीं है--स्वाद की पूछना मत। स्वाद लेने में गूंगा उतना ही समर्थ हैजितना कोई और;क्योंकि स्वाद की इंद्रिय गूंगे के पास उतनी ही है जितनी तुम्हारे पास! इंद्रिय एक ही है स्वाद की और वाणी की--जिह्वा। इसलिए यह सूत्र पैदा हुआ।
जीभ ही स्वाद लेती हैजीभ ही बोलती है। अब सवाल यह है: जब जीभ ही स्वाद लेती है तो बोलने में दिक्कत क्याजीभ ने ही स्वाद लिया हैबोल दे! किसी और ने लिया होता और हम जीभ से पूछते तो अड़चन हो सकती थी। अब जब तुमने ही स्वाद लिया है तो बोल दो। इसलिए यह सूत्र पैदा हुआकि मानाजीभ स्वाद लेती हैलेकिन जीभ के पास दो क्षमताएं अलग-अलग हैं। इसलिए गूंगा बोल तो नहीं सकतास्वाद तो ले सकता है। इसलिए बोलने की क्षमता और स्वाद की क्षमता को एक मत माननावे अलग-अलग हैं। गूंगा बोल नहीं सकतास्वाद ले सकताहै। तुम बोल भी सकते होस्वाद भी ले सकते होएक ही जीभ से दोनों काम होते हैंलेकिन दोनों का कहीं मिलन नहीं होता। नहीं तो गूंगा भी स्वाद न ले सकता। अगर बोलने के कारण गूंगे की जीभ खराब हो गई हैबोल नहीं सकतातो स्वाद कैसे होगापर स्वाद तो बड़े मजे से लेता है। संभावना इस बात की है कि गूंगा तुमसे ज्यादा बेहतर स्वाद लेता होक्योंकि बोलने की भी अड़चन वहां नहीं हैवहां उसकी जीभ पूरी की पूरी मुक्त है।
"गूंगे के स्वाद की भांति'
भक्त अनुभव तो करता हैबोल नहीं पाता। तार्किक पूछते हैंजब तुम्हें ही अनुभव हुआ है तो बोल क्यों नहब देते हो?
पश्चिम के एक वर्तमान विचारक हैं: आर्थर कोएस्लर। सदियों से जो तर्क दोहराया गया हैवही वे आज भी दोहराते हैं। वे यही कहते हैं बार-बार कि जो अनुभव किया जा सकता हैवह बोला क्यों नहीं जा सकताजब तुमने जान लिया तो जना दो! आखिर अड़चन क्या है?
उनका कहने का अर्थ यह हैसमस्त तार्किकों के कहने का अर्थ यह है कि संतों को कुछ हुआ नहींव्यर्थ ही बकवास हैचूंकि हुआ नहीं हैइसलिए कह नहीं सकते। मगर कहतेयह हैं कि हुआ बहुत बड़ा है और कह नहीं पा रहे हैं। हुआ ही नहीं है कुछ।
तार्किक यह कहता है: जो हुआ हैउसे कहोगे क्यों नसिर में दर्द होता हैपता चलता है तो तुम कह देते हो कि कांटे की पीड़ाा है। खुशी होती हैहृदय उत्फुल्ल होता है तो तुम कह देते होप्रसन्न हैंखुश हैंबहुत आनंदित हैं। तुम सभी बातें कह देते हो जो तुम जान पाते होयह परमात्मा की बात के संबंध में गूंगे क्यों हो जाते होकहीं ऐसा तो नहीं कि धोखा दे रहे हो?जब सभी और ज्ञान अभिव्यक्त हो जाते हैंतो यही ज्ञान अनभिव्यक्त क्यों रह जाता हैयह ज्ञान ही न होगाया तो तुम धोखा दे रहे हो या खुद धोखे में पड़े हो।
तार्किक का यह प्रश्न है।
नारद का उत्तर है: मूकास्वादमवत्। वे यह कहते हैंक्या तुम यह कहोगे कि गूंगा बोल नहीं सकताइसलिए मिठाई खाए तो मिठास नहीं जानता। यह तो मानना पड़ेगा कि मिठास तो जानता है। तुम गूंगे के चेहरे को देखकर कह सकते हो जब वह मिठाई खा रहा है। फिर मिर्च खिलाकर देख लो! बिना बोले गालियां देगा। आंख में पढ़ी जा सकेंगी। बड़बड़ाएगाबोल न सकेगा। मगर सब तरह से कह देगा कि दोस्ती खत्म!
बोल तो नहीं सकता गूंगायह साफ हैलेकिन समझ लेता है। मिर्च का धोखा न दे पाओगे। मिठाई दोगे तो मिठास होगीमिर्च दोगे तो तिक्त...उत्तेजना होगीपीड़ा होगी! पर गूंगा बोल नहीं सकता। इशारे करेगा। प्यास लगती है तो गूंगा अंजलि बढ़ा देगा दोनों हाथों की। प्यास का तो अनुभव हो रहा हैलेकिन प्यास को वह कह नहीं पाता है। हाथ बढ़ाता हैअंजलि भरता है। फिर जब तुम पानी दे दोगे तो तुम तृप्ति भी लिखी हुई उसके चेहरे पर देखोगे--धन्यवाद भी!
तो जब गूंगे के जीवन में ऐसा हो जाता हैतो जिस बात की सुविधा तुम गूंगे को देते होकम से कम उतनी सुविधा तो संतों को दे दो--इतनी ही नारद कहते हैं। इतना तो तुम गूंगे को भी क्षमा कर देते होभक्तों को इतनी तो क्षमा कर दो । इतना तो संदेह मत करो कि इनको हुआ ही न होगाइसलिए कह नहीं पाते हैं।
फिर एकाध भक्त की बात होती कि धोखा दे रहा था तो भी ठीक थाअनंत काल में अनंत भक्त हुए हैंसभी धोखा दे रहे थे?तुम्हारी गांलियां खाने कोसूली चढ़ाई जाएजहर पिलाया जाएपत्थर मारे जाएं--इसलिएतुमसे मिला क्या हैधोखा आदमी देता है वहां जहां कुछ  मिलता हो। जीसस सको मिला क्यासूली मिली। सूली पाने को तुम्हें धोखा दे रहे थेसुकरात को मिला क्याजहर मिला। जहर पीने के लिए तुम्हें धोखा दे रहे थेमंसूर को मिला क्याफांसी मिली। फांसी पाने के लिए तुम्हें धोखा दे रहे थेआत्महत्या ही कर ली होतीतुम्हें इतना कष्ट देने की क्या जरूरत थीतुमने दिया क्या है भक्तों को जो तुम्हें धोखा देधोखा तो बाजार में चलता है जहां कुछ मिलने की आशा हो।
परमात्मा...उस परम का गुह्य अनुभव! पीड़ा भला लाता होसंसारी की नजरों में यह खयाल भला लाता हो कि तुम पागल हुए,उन्मत्त हुएतुमने होश गंवायासमझ खोईलोक-लाज खोई--और तो क्या मिलता हैनिंदा मिलती होउपेक्षा मिलती होलोगों की हंसी मिलती होमसखरे मिलते हों--और क्या मिलता हैधोखा किसलिएफिर एकाध कोई धोखा देता...। निरपवाद रूप से असंख्य काल मेंअसंख्य लोगों ने धोखा दिया हैफिर से सोचो। फिर ऐसा करो...कोएस्लर को उसके ही अनुभव से समझाना उचित है।
किसी से प्रेम हो जाता हैतब तुम ठीक-ठीक बता पाओगे किसलिए हो गयाक्या तुम ठीक-ठीक बता पाओगेप्रेम क्या है?छोड़ो परमात्मा कोप्रेम तो सभी को होता है। हर मां को प्रेम होता है अपने बच्चे सेकौन मां अब तक व्याख्या कर सकी कि प्रेम क्या है! पूछो प्रेम की बातगूंगी हो जाती है। इतने प्रेमी हुए--मजनूं हो कि फरिहाद होहीर-रांझा हो--पूछो प्रेमियों से, "क्या है प्रेम?' ठिठककर खड़े रह जाते हैं। किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। कोई उत्तर नहीं आता। पर शायद प्रेमी भी पागल होंगे।
फिर अपने जीवन में कुछ ऐसे अनुभव खोजो जो तुम्हें होते हैं और तुम्हीं नहीं कह पाते। रात पूर्णिमा का चांद निकला हैगद गद अहोभाव से तुमने कहा है, "सुंदर है!और पड़ोसी कहता है, "कहांक्या है सौंदर्यबताओइसमें क्या सुंदर है'? अचानक तुम हारेअसफल हो जाते हो। अचानक लगता हैसीमा आ गई। तर्क से समझा न सकोगे। कैसे सिद्ध करोगे कि चांद सुंदर हैहै तो हैऔर अगर किसी को नहीं है तो नहीं है। अचानक विवश हो गए। अचानक अभिव्यक्ति सार्थक न रही। अब तुम लाख समझाने का उपाय करोतुम जानते हो कि समझा न सकोगे।
सौंदर्य एक प्रतीति है--गूंगे का गुड़ है। हो अनुभव तो ठीकदूसरा राजी हो जाए तो ठीकबिना झंझट किएअगर उसे भी स्वाद आ जाए तो ठीक। अगर वह भी सिर हिला दे गूंगे की तरह कि ठीक! लेकिन अगर खड़ा हो जाए तर्क करने कि क्या सौंदर्यतो तुम सुंदरतम स्त्री में भी सिद्ध न कर सकोगे कि सुंदर है। क्या सिद्ध करोगेनाक की लंबाई से सौंदर्य का कोई लेना-देना है?कैसे सिद्ध करोगेआंखें मछलियों की तरह हैंइससे क्या सिद्ध होता हैहोंगी मछलियों की तरहसौंदर्य का क्या लेना-देना हैकिसने कहा पहले कि मछलियां सुंदर हैंकि होंगे बाल काली घटाओं की तरहपर काली घटाएं सुंदर हैंयह तुमसे किसने कहाजिनको कड़वे अनुभव हुए हैंवे कहेंगे: कभी नागिन की भांति! कहां की काली घटाएंसपनों में खोए हो। जमीन पर आओ! अनुभव की बात करो! ये सब कविताएं हैं।
सिद्ध न कर सकोगे। कोई उपाय नहीं है सिद्ध करने का।
मजनूं को उसके गांव के राजा ने बुला भेजा था और कहा था, "तू पागलपन बंद कर। यह लैलाजिसके पीछे तू दिवाना हैतेरी दीवानगी सुनकर हमको भी खयाल हुआ था कि देख लेंदेखी हमनेकाली-कलूटी साधारण-सी स्त्री। तुझ पर दया आती है--दौड़ता रहता है गांव की सड़कों परलैला-लैला पुकारता रहता है'
दया सभी को आने लगी होगी। सम्राट ने अपने महल से दस-बारह सुंदर स्त्रियां लाकर खड़ी कर दीं कि इनमें से तू चुन ले कोई भी। लेकिन मजनूं ने उस तरफ देखा और कहने लगा, "लेकिन लैला कहां हैइनमें कोई लैला नहीं है'। सम्राट ने कहा, "मैंने लैला देखी है। तू दीवाना हैपागल है'। मजनूं हंसने लगा। उसने कहा कि "मजनूं की आंख के बिना तुम लैला देख कैसे सकोगे?मजनूं की आंख चाहिए लैला देखने को'
भक्त की आंख चाहिए भगवान को देखने को। सिद्ध करने का कोई उपाय नहीं है। भक्त ही नहीं हार जातेमजनूं भी हार जाता है। वह क्या कह रहा हैवह यह कह रहा है कि मेरी आंख से देखोगे तो ही...। वह सौंदर्य कुछ ऐसा है कि उसके लिए खास आंख चाहिए--एक दृष्टि चाहिए!
तुम अपने जीवन में ऐसे अनुभव खोज सकोगे निश्चित ही। कई बार तुम्हें प्रतीति हुई होगी कि दूसरा राजी नहीं हुआ और तुम हार गएकुछ उपाय न रहा कहने काअचानक तुमने बात वापस ले लीविवाद में कोई सार न था। क्या थी अड़चन?...गूंगे का गुड़! तुम्हारा अनुभव थादूसरे का अनुभव नहीं थातालमेल न हो सका।
कोएस्लर को भी ऐसे अनुभव निश्चित हुए होंगेक्योंकि इतना दीन-हीन मनुष्य खोजना मुश्किल है जिसे ऐसा एक भी अनुभव न हुआ होजहां शब्द सार्थक नहीं होते। कोएस्लर तो बड़ा विचारशील व्यक्ति हैबहुत अनुभव हुए होंगे--प्रेम केसौंदर्य केसत्य केशुभ केशिवम के--जहां भाषा एकदम टूट जाती है। और अगर तुम दूसरों को इतनी सुविधा देते हो तो नारद को भी इतनी सुविधा दो।
..."गूंगे के स्वाद की तरह है'
मश्वरे होते हैं शेखों-बिरहमन में "जिगर', 
रिन्द सुन लेते हैं बैठे हुए मैखाने में।
वे जो पंडितों में चर्चाएं चल रही हैंउनके लिए शराबियों को सुनने आने की जरूरत नहीं है। रिन्द सुन लेते हैं बैठे हुए मैखाने में! वे जो परमात्मा के संबंध में मश्वरे हो रहे हैंविवाद हो रहे हैंइस सबको सुनने उनको मंदिरों और मस्जिदों में आने की जरूरत नहीं है--अपनी मस्ती में डूबे हुए वहीं सुन लेते हैं। खुद परमात्मा को ही सुन लेते हैंपंडितों और मौलवियों के मश्वरों की किसको फिक्र।
भक्त यानी रिंद। भक्त यानी पियक्कड़। भक्त यानी जिसे शब्द से लेना-देना नहीं हैजो मधुशाला में बैठा है। भक्त यानी अनुभव की प्याली को जो उतार गयाअनुभव को पी गया।
लागी कैसी लगन
मीरा हो के मगन
गली-गली हरि-गीत गाने लगी
जो भी महलों पली
जोगनी बनीजोगन चली
आज रानी दीवानी कहाने लगी,
...पागल हो गई दूसरों की नजरों में। कुछ पी बैठी! कोई नशा छा गया! कोई मस्ती इतनी बड़ी कि लोक-लाज की चिंता न रही। कुछ ऐसा बड़ा अनुभव कि सारा संसार स्वप्नवत मालूम हुआ।
"प्रकाशते क्वापि पात्रे'
"किसी विरले पात्र में ऐसे प्रेम प्रगट भी होता है'
...अनिर्वचनीय है। कहा नहीं जा सकता। गूंगे के स्वाद की भांति है। फिर भी नारद कहते हैंकिसी विरले पात्र मेंप्रेमी भक्त्त में ऐसा प्रगट भी होता है। अभिव्यक्त तो नहीं होताप्रगट होता है। उसके रोएं-रोएं में पुलक होती है। उसके उठने-बैठने में प्रार्थना होती है। उसकी आंखों की पलकों के झपने मेंउसके होने के ढंग मेंउसके बोलने में या न बोलने मेंउसके चुप रहने में--परमात्मा की भनक आती है।
"प्रकाशते क्वापि पात्रे'
लेकिन कभी-कभी कोई ऐसा महापात्र होता है सौभाग्यशाली कि उसमें परमात्मा प्रकाशित होता है। इस भेद को समझ लेना--अभिव्यक्त नहींप्रकाशित। प्रगट होता है। कोई मीराकोई चैतन्य बह उठते हैंउनके पात्र के ऊपर से बहने लगता परमात्मा।
वही तो हमने नाच की तरह देखा। वही हमने गीत की तरह सुना। लेकिन उसके लिए भी तुम्हारे पास हृदय का खुला हुआ द्वार चाहिएअन्यथा मीरा पागल मालूम हागी। जहां परमात्मा पैदा होता हैअगर तुम्हारे पास देखने की सम्यक दृष्टि न हो तो पागलपन मालूम होगा।
स्वभावतः पागलपन का इतना ही अर्थ होता है कि तुम जिन्हें जीवन के नियम मानते होउसके विपरीत कुछ हो रहा हैतुम जिसे मर्यादा मानते हो उससे अन्यथा कुछ हो रहा हैतुमने जिसे ढांचा बना रखा था अपनी व्यवस्था काउसके पार कोई चला गयासीमा के बाहर जा रहा है। तुम पागल तभी कहते हो किसी को जब तुम्हारी जीवन-व्यवस्था उसकी मौजूदगी से डगमगाने लगती है--या तो वह सही है या तुम सही हो। स्वभावतः तुम्हारी भीड़ है। इसलिए तुम अपने को ही सही मानने के लिए सुविधा जुटा लेते हो। वह अकेला है। मीरा अकेली है। चैतन्य अकेला है। तुम उसे पागल कहोगे तो भी मीरा के पास कोई उपाय नहीं है सिद्ध करने का कि वह पागल नहीं है। लेकिन ध्यान रखनाउसे पागल कहकर तुम चूके जा रहे हो। उसका कुछ बिगड़ता नहीं,तुम चूके जो रहे हो। तुम एक अवसर खोये दे रहे हो।
परमात्मा प्रकाशित हुआ है! आंखों से अपने पक्षपात हटाओ! आंखों से अपनी क्षुद्र विचारधारा को अलग करो! धुंधलके को हटाओ,व्यर्थ काक्योंकि उससे कुछ मिला तो नहींउसे पकड़े क्यों बैठे होतुम्हारा तर्कजालतुम्हारा शब्दजालतुम्हारा विचारजाल--पाया क्या है तुमने उससेहाथ तो कुछीी नहीं आया। एक मछली भी तो फांसी नहीं। कोरे के कोरे रह गए हो। प्यासे के प्यासे रह गए हो। छोड़ो सब उसे!
आंख को पक्षपात-मुक्त करके देखोतो तुम्हें मीरा में या चैतन्य में परमात्मा प्रकाशित दिखाई मालूम पड़ेगा।
अभिव्यक्ति तो संभव नहीं हैलेकिन फिर भी उसकी अभिव्यंजना होती है।
"किसी विरले पात्र मेंप्रेमी-भक्त मेंप्रेम प्रगट भी होता है'
"यह प्रेम गुण-रहित हैकामना-रहित हैप्रतिक्षण बढ़ता हैविच्छेद-रहित हैसूक्ष्म से सूक्ष्म है और अनुभवस्वरूप है'
प्रेम की तैयारी होप्रेम के लिए तुम निरंतर धीरे-धीरे अपने को तैयार करते रहोतो एक न एक दिन परमात्मा से मिलन हो जाएगाक्योंकि प्रेम ही उसकी सीढ़ी है। लेकिन तुम जिस ढंग का जीवन जीते हो वह प्रेम से विपरीत है। उसमें तुम धन तो इकट्ठा करते होप्रेम नहीं। और अगर विकल्प हो कि धन चुनूं कि प्रेमतो तुम प्रेम के मुकाबले धन चुन लेते होतुम प्रेम बेच देते होधन चुन लेते हो। तुम कहते हो, "प्रेम फिर देख लेंगेधन तो अभी ले लें'
तुम्हारे सामने जब भी कोई विकल्प होता हैतुम प्रेम को तो हमेशा बलिदान करते रहते होफिर तुम पूछते हो, "परमात्मा कहां है?' उसकी सीढ़ी को तो तुम काट-काटकर बाजार में बेचते रहते होफिर एक दिन सीढ़ी टूट जाती हैतुम्हारे और आकाश के बीच कोई संबंध नहीं रह जातातब तुम चिल्लाते हो कि परमात्मा कहां है! तब तुम्हें डर लगता है। तब उस भय में तुम यह भी कहते हो कि कोई परमात्मा नहीं हैताकि यह भरोसा आ जाए कि न कोई परमात्मा हैन किसी सीढ़ी की जरूरत हैन मुझे कहीं जाना हैमैं जैसा हूं ठीक हूं। ऐसी सांत्वना खोजने के लिए तुम परमात्मा को इनकार भी करते हो।
फ्रेड्रिक नीत्शे ने घोषणा की है कि परमात्मा मर गया है। किसी ने पूछा, "यह घोषणा क्यों?' तो नीत्शे ने कहा, "अगर वह जीवित है तो चैन से बैठना संभव न होगा'
अगर परमात्मा है तो फिर तुम चैन से कैसे बैठोगेउसे बिना पाए चैन कहां! तो एक ही उपाय हैकह दो कि है ही नहीं । नास्तिक यही उपाय करता हैवह कहता हैपरमात्मा है ही नहीं। वह यह कह रहा है कि कहीं जाने की अब हिम्मत नहीं हैपैर थक गए हैंयात्रा करने का और अब उपाय नहीं हैअगर यह मान लूं कि मंजिल है तो बेचैनी होगीयही उचित हैसमझा लेता हूं अपने को कि मंजिल है ही नहीं।
नास्तिक का एक उपाय है परमात्मा से बचने का। और जिसको तुम आस्तिक कहते होउसका भी एक उपाय है परमात्मा से बचने का--वह कहता है, "तुम होखोजने का सवाल कहांमंदिर में पूजा कर आते हैंमस्जिद में तुम्हारी प्रार्थना कर लेते हैं,अब और क्या चाहिएइतने से राजी हो जाओ। हर रविवार को चर्च में हो आते हैं। इतना उपकार कुछ तुम पर कम हैराजी हो जाओ। फंदा छोड़ो! हमारा गला छोड़ो'!
तो आस्तिक सस्ते उपाय खोजता है--खिलौनेधर्म के नाम पर खिलौने! वह जैसे परमात्मा कोई बच्चा होअसली कार न लाए,खिलौने की कार ले आएउसे कहा, "देखयह कार हैरेलगाड़ी हैहवाई जहाज है'। परमात्मा जैसे कोई बच्चा होतुम अपने मंदिरों-मस्जिदों से उसे भुलाना चाहते हो। तुम कहते हो, "देखोतुम्हारे लिए मंदिर बना दियाअब और क्या चाहते होतुम्हारी सोने की मूर्ति बना दीअब और ज्यादा मांग न करो। अब हमें चैन से जीने दो हम जहां हैं। अब और न पुकारो। अब और न आह्वान दो। अब और चुनौती न भेजो। हम थक गए हैं'
मेरे देखेआस्तिक और नास्तिक में बहुत फर्क नहीं दिखाई पड़ता। आस्तिक की एक तरकीब है उसी परमात्मा से बचने की,नास्तिक की भी उसी परमात्मा से बचने की दूसरी तरकीब है। दोनों बच रहे हैं।
धार्मिक आदमी वह है जो कहता है, "तब तक चैन न लेंगेजब तक तुम्हें पा न लें। अगर तुम्हें बनाने कीतुम्हारी सीढ़ी बनाने को सारा जीवन निछावर करना होगा तो करेंगे। प्रेम के ऊपर सब कुछ गंवा देंगेलेकिन प्रेम को न गंवाएंगे।
"यह प्रेम गुण-रहित हैकामना-रहित हैप्रतिक्षण बढ़ता है'
यह प्रेम की परिभाषा हैलक्षण है। प्रेम गुण-रहित ही होता है। प्रेम न तो राजसिक होता हैन सात्त्वि होता हैन तामसिक होता है। प्रेम गुणातीत है। प्रेम संसार के पार है। प्रेम ऐसे ही संसार के पार है जैसे कमल सागर के पारसरोवर के पार होता हैदूर खड़ा! उठता है सरोवर सेउसी कीचड़ सेफिर भी पार होता है--सरोवर-अतीत। प्रेम ऐसे ही संसार के तीनों गुणों से अतीत है।
...कामना-रहित है। प्रेम की कोई और कामना नहीं है। प्रेम यह नहीं कहता कि मुझे कुछ दो। प्रेम कहता हैबस प्रेम काफी है;इसके पार और कोई मांग नहीं है। प्रेम बस प्रेम से ही तृप्त है। अगर प्रेम ने कुछ और मांगा तो वह प्रेम नहींकुछ और होगा--कामना होगीवासना होगीलोभ-मोह होगा। प्रेम तो बस प्रेम से तृप्त है। प्रेम के पार कोई गंतव्य नहीं है।
...प्रतिक्षण बढ़ता है। जो प्रेम घटने लगे वह काम रहा होगा। काम प्रतिक्षण घटता है। काम का स्वरूप है: जब तब तक तुम्हें अपना काम-पात्र न मिलेबढ़ता हुआ माालूम होता है। तुम एक स्त्री को चाहते होवह न मिले तो कामवासना बढ़ती जाती है,उबलने लगती हैसौ डिग्री पर ज्वर चढ़ जाता हैभाप बनने लगते होसारा जीवन दांव पर लगा मालूम पड़ता हैमिल जाए,उसी दिन से घटना शुरू हो जाती है।
काम का लक्षण यह है: जब तक न मिले तब तक बढ़ता हैमिल जाएघटता है। प्रेम का लक्षण यह है: जब तक न मिले तब तक तुम्हें पता ही नहीं कि बढ़ता क्या हैजब मिलता है तब बढ़ता है। प्रेमी पात्र जैसे ही मिलता है वैसे ही बढ़ता ही जाता है। प्रेम सदा दूज का चांद हैपूर्णिमा का चांद कभी होता ही नहींबढ़ता ही रहता हैऐसी कोई घड़ी नहीं आती जब घटे। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रेम सतत वर्द्धमानसतत विकासमान हैसतत गतिमान हैकहीं ठहरता नहींप्रवाहरूप है।
..."प्रतिक्षण बढ़ता हैविच्छेद-रहित है'। डाइवोर्सविच्छेद कभी होता ही नहीं। मिलन हुआ--सदा को हुआ। मिलन हुआ--शाश्वत हुआ। जब तक मिलन नहीं हुआ तब तक विच्छेद है। मिलन होते से फिर कोई विच्छेद नहीं है।
..."सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है'। प्रेम से ज्यादा सूक्ष्म और कुछ भी नहीं।
वैज्ञानिक कहते हैं: परमाणु परम सूक्ष्म है।
एक बड़ी अनूठी घटना इस सदी में घटीइतिहास में आगे कभी उसका ठीक-ठीक मूल्यांकन होगा। एक जर्मन विचारक था--विल्हेम रेकवैज्ञानिक चिंतकअनूठा चिंतक। जब अणु-ऊर्जा की खोज चल रही थीतभी वह प्रेम-ऊर्जा की खोज में लगा था। उस ऊर्जा को उसने नाम दे रखा था--आर्गनप्रेम-ऊर्जा। उसका कहना था कि अणु-ऊर्जा की खोज से भी ज्यादा महत्वपूर्ण प्रेम की ऊर्जा की खोज हैक्योंकि अणु तो पदार्थ का टुकड़ा हैप्रेम हमारी आत्मा का परम अंश है। स्वभावतः उसने खतरा मोल लिया। जगह-जगह से उसे हटाया गयाजर्मनी से भगाया गया। जिस मुल्क में गया वहीं से हटाया गया। क्योंकि प्रेम के खाजी कहीं भी स्वीकृत नहीं हैं। सारा समाज घृणापर जी रहा हैहिंसा पर जी रहा है। लोगों ने समझापागल है। अंततः उसे पागल करार देकर अमरीका में उसे पागलखाने में बंद भी रखा। वह पागलखाने में ही मरा। यद्यपि अल्बर्ट आइंस्टीन ने उससे मुलाकात की थीऔर जब आइंस्टीन को उसने अपना एक छोटा सा आविष्कार बताया तो आइंस्टीन चकित हो गया था। वह आविष्कार थावह कहता था कि इस तरह के यंत्र बनाए जा सकते हैं जिनमें प्रेम-ऊर्जा संग्रहीत हो सके। और उसका कहना था कि विश्व में अणु की ऊर्जा से इतना विध्वंस होने के करीब है कि अगर हमने इसके समतुल प्रेम की ऊर्जा न बनाई तो पृथ्वी नष्ट हो जाएगी।
तो उसने इस तरह के यंत्र बनाए थे। यंत्र कुछ विशेष न थेकुछ विशिष्ट न थेकुछ विशिष्ट धातुओं से बनाई हुई पेटियां थी। उन पेटियों के भीतर मनुष्य को अंधेरे में बिठा दिया जाता हैसब तरफ से बंद। कोई पंद्रह-बीस मिनट शांत बैठने के बाद अचानक ऊर्जा का प्रवाह शुरू होता हैरोएं-रोएं में एक पुलक छा जाती हैएक लालिमा आ जाती हैबैठा हुआ साधक भीतर अनुभव करता हैकुछ घट रहा हैसारे शरीर में लहरें होने लगती हैंजिसको योगियों ने कुंडलिनी कहा हैजिसको तांत्रिकों ने परम संभोग कहा हैवह घड़ी आ जाती है।
जो उसने यंत्र बनाया है वह बड़ा सीधा-सरल है। उसमें ऐसी धातुओं का उपयोग किया है जिनसे ऊर्जा भीतर की तरफ तो आ जाती हैलेकिन बाहर की तरफ नहीं जा सकती। तो वह पेटी चारों तरफ से ऊर्जा को भीतर खींचती है और भीतर बैठे व्यक्ति के ऊपर बरसाने लगती है।
वस्तुतः तीस-चालीस मिनट तक अंधेरे में बैठना ध्यान का एक प्रयोग है। और ध्यान की अवस्था में पेटी की भी कोई जरूरत नहींसंसार की जीवन-ऊर्जा तुम पर बरसने लगती है। यह तो भक्तों का बहुत प्राचीन अनुभव है। कहीं कोई जरूरत नहीं है। कहीं भी तुम बैठ जाओ शांत होकर। प्रेम के लिए द्वार खुला होप्रतीक्षा हो--तुम अचानक पाओगे थोड़ी देर के बाद: जैसे-जैसे तुम्हारा मन शांत होने लगता हैवैसे ही वैसे तरंगें उठने लगती हैं अलौकिक कीतुम पुलकित होने लगते हो--किसी लहर पर सवार हो गएचले किसी दूर की यात्रा पर! यह तो ध्यान का पुराना प्रयोग है।
लेकिन विल्हेम रेक को पागल करार दे दिया। उसकी पेटियों को जालसाजी करार दे दिया। जालसाजी करार देना आसान हुआ,क्योंकि कोई प्रमाण क्या है कि इनके भीतर ऐसा होता हैयह प्रेम की ऊर्जा को तौलने का थर्मामीटर कहां हैइनके भीतर बैठे हुए व्यक्ति कहते हैंलेकिन क्या पक्का सबूत है कि उन्होंने भ्रम नहीं कर लिया खुद ही खड़ातीस मिनट चुपचाप बैठे रहकर कोई भ्रम बड़ा नहीं कर लियाआत्मसम्मोहन नहीं कर लियाइनकी बात का भरोसा क्या हैवैज्ञानिक बुद्धि तो कहती है,प्रमाण चाहिए ठोस। व्यक्ति क्या कहते हैंयह कोई प्रमाण थोड़े ही है। ठोस प्रमाण चाहिए यंत्र के द्वारा।
अनेक लोगों ने उसकी पेटियों में बैठकर अनुभव कियालेकिन वह प्रमाण नहीं। उसने अनेक बीमारों को ठीक किया उन पेटियों के भीतरक्योंकि वह कहता हैप्रेम की ऊर्जा रोग से मुक्त करवा देती हैस्वास्थ्य लाती है। पर उसकी कोई सुन न सका। वह भक्ति का और प्रेम का बड़ा अनूठा प्रयोग कर रहा था।
भक्त सदा से ही इस प्रयोग को करते रहे हैं। वे कहते हैंतुम्हें चारों तरफ से प्रेम ने घेरा हुआ है। वही परमात्मा है। तुम जरा शांत होकर बैठो। तुम जरा मगन होकर बैठो। तुम जरा चिंता-रहित होकर बैठो। तुम जरा द्वार खोलकरग्राहक होकर बैठो। स्वीकार करने की तैयारी से बैठोऔर वह बरसने लगेगा। इसी ग्राहकता और स्वीकृति का पुराना नाम प्रार्थना है। प्रार्थना का कुछ और अर्थ नहीं होता। उसका यह मतलब नहीं कि तुम बड़ा शोरगुल मचाओचिल्लाओ परमात्मा को। उस सबसे कोई अर्थ नहीं है। हृदय खुला होतुमने पात्र उसके सामने कर दिया हैतुम प्रतीक्षारतधैर्यशांति से बैठे हो--आएगा! इस आस्थाश्रद्धा से उतरेगा। उतरता है। उतरा ही हुआ हैतुम्हारा संबंध भर जोड़ने की बात है।
..."विच्छेद-रहित हैसूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैअनुभवस्वरूप है'
लेकिन जीवन को तुमने जिस ढांचे में ढाला हैवह प्रेम के विपरीत है। और तुम्हारे तथाकथित धार्मिक तुम्हें प्रेम के विपरीत ही शिक्षण देते रहते हैं।
सुनो--
जिन नयनों का प्रेम-निमंत्रण
तुमने था ठुकराया
उन नयनों मेंसजल स्नेहमय
एक नयन था मेरा।
किसी दिन परमात्मा तुमसे कहेगा--
जिन नयनों का प्रेम-निमंत्रण
तुमने था ठुकराया
उन नयनों मेंसजल स्नेहमय
एक नयन था मेरा।
तुम समाधि के भ्रम में खोए
मुडे नहीं पहचाना
यह असंग यदि ताना है तो
संग उसी का बाना
जिन सुमनों में मदिर सुरभिमय
एक सुमन था मेरा।
दिव्य गंध को मात्र वासना
कह कर तुमने टाला
बना सहज को सूली
ऋत का पथ विकृत कर डाला
जिन सपनों का सुरधनु जीवन
तुम्हें लगा छल छाया
उन सपनों में रुचिर रंगमय
एक सपन था मेरा।
तुम अभंग के पीछे भूले
भंगुर की गुरु गरिमा
रटा-रटाया ज्ञान बन गया
चेतन की जड़ सीमा
जिन रत्नों का मंगल कंकण
फेंका कह कर माया
उन रत्नों में ज्योतित चिन्मय
एक रत्न था मेरा।
इस संसार मेंपरमात्मा सभी जगह समाविष्ट है। फूल से भी उसी ने पुकारा हैठुकराकर पीठ फेरकर चले मत जानाअन्यथा किसी दिन पछताओगे। जहां से भी तुम्हें आकर्षण मिला हैउस आकर्षण में उसका ही आकर्षण छिपा है। तुमने व्याख्या गलत कर ली होगी। तुम्हारे पंडितों ने तुम्हें कुछ और समझा दिया होगाभरमा दिया होगा। तुमने मायाछायाछलभ्रम कहकर पीठ फेर ली होगी। लेकिन वही है। माया भी अगर है तो उसी की है और अगर छाया भी है तो उसी की है और अगर भ्रम है तो उसने ही दिया हैस्वीकार योग्य है।
भक्त का अर्थ है: जिसने उसे उसकी सर्वांगीणता में स्वीकार कियाजो कहता है, "हम चुनाव न करेंगे। हम कौनहम कैसे जानेंगे कि तू कौन है और तू कौन नहीं हैहम कहां रेखा खींचें?'
जड़ और चेतन की रेखा सब आदमी की खींची हुई है। ऐसा कोई जड़ नहीं है जिसमें चेतन न छिपा हो और ऐसा कोई चेतन नहीं है जो जड़ में आविष्ठ न होजड़ में जिसने घर न बनाया हो। चट्टान से चट्टान में भी वही सोया है। चैतन्य से चैतन्य में भी वही जागा है।
ऐसा अगर तुम्हारे जीवन का दृष्टिकोण हो तो तुम प्रेम के लिए तैयार बनोगेपात्र बनोगे।
"इस प्रेम को पाकर प्रेमी प्रेमी को ही देखता हैप्रेम को ही सुनता हैप्रेम का ही वर्णन करता हैप्रेम का ही चिंतन करता है,प्रेम ही प्रेमप्रेममय हो जाता है'
फिर वृक्ष नहीं दिखाई पड़ते--वही वृक्षों की हरियाली में दिखाई पड़ता है! फिर पक्षी नहीं गीत गाते--वही गाता हैपक्षियों के कंठ उधार लेता है। उसके पास बहुत गीत हैं--बहुत कंण्ठों की जरूरत है! उसके पास बहुत रंग हैं--इंद्रधनुषों की जरूरत है। उसके पास बहुत रूप हैंबहुत आकृतियां बनती हैंतो भी चुकता नहीं है।
उपनिषद कहते हैंपूर्ण से पूर्ण भी निकाल लो तो पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है। इतना विराट अस्तित्व बनता हैबिखरता है;सृष्टि होती हैप्रलय होती है--लेकिन उसकी क्षमता में कोई कमी नहीं आती।
"इस प्रेम को पाकर प्रेमी प्रेमी को ही देखता हैप्रेम को ही सुनता हैप्रेम का ही वर्णन करता हैप्रेम का ही चिंतन करता है'
सबको हम भूल गए जोशो-जुनूं में लेकिन
इक तिरी याद थी ऐसी जो भुलायी न गई।
प्रेमी पागल हो जाती हैजुनून में आ जाता हैसब भूल जाता है--"इक तेरी याद थी ऐसी जो भुलाई न गई'! बस एक बात नहीं भूलती। स्वयं को भी भूल जाता है। सब एक बात भुलायी नहीं भूलती--उस प्रेमी की याद भुलाए नहीं भूलती।
"भक्ति गुण-भेद से तीन प्रकार की होती हैउनमें उत्तर-उत्तर क्रम से पूर्व-पूर्व क्रम की भक्ति कल्याण्कारिणी होती है'
ऐसे तो भक्ति एक है। भक्ति यानी प्रेमऊर्ध्वमुखी प्रेम। भक्ति यानी दो व्यक्तियों के बीच का प्रेम नहींव्यक्ति और समष्टि के बीच का प्रेम। भक्ति यानी सर्व के साथ में प्रेम में गिर जाना। भक्ति यानी सर्व को आलिगंन करने की चेष्टा। और भक्ति यानी सर्व को आमंत्रणकि मुझे आलिंगन कर ले!
भक्ति तो मूलतः एक हैलेकिन व्यक्तियों के भेद से तीन प्रकार की हो जाती हैउनकी हम आगे के सूत्रों में व्याख्या करेंगे।

आज इतना ही।   

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