शनिवार, 9 सितंबर 2017

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-06

प्रसादस्वरूपा है भक्ति
दिनांक १६ जनवरी१९७६रजनीश आश्रमपूना

पहला प्रश्न: जब भी किसी को विराट को अनुभव होता हैवह किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त होता ही है। क्या आप बुद्धपुरुषों के देखे ऐसा नहीं है?

*अनुभव तो वह ऐसा है कि छिपाए छिपेगा नहींप्रगट होगा ही। जहां तक अनुभोक्ता का संबंध हैप्रकट होगा ही। लेकिन जहां तक तुम्हारा संबंध हैतुम पर निर्भर है: प्रगट हो या अप्रगट रह जाए।
बुद्ध ने तो कह दिया है जो जानातुमने सुना या नहीं...बुद्ध की तरफ से प्रगट हो गयातुम्हारी तरफ से प्रगट हो भी सकता हैप्रगट न भी हो।
वर्षा तो होती हैझीलसरोवरखाईखड्डे भर जाते हैंपहाड़ खाली के खाली रह जाते हैं।
तुम्हारा घड़ा उलटा रखा होमेघ कितने ही गरजेंकितने ही बरसेंतुम खाली रह जाओगेतुम्हारे लिए वर्षा हुई ही नहीं। नहीं कि वर्षा नहीं हुईवर्षा तो हुईतुम्हारे लिए नहीं हुई। और जब तक तुम्हारे लिए न हो तब तक हुई या न हुईक्या फर्क पड़ता है।
बुद्धपुरुष चुप भी रह जाएं तो उनकी चुप्पी में भी वही प्रगट होता है।
बोलना जरूरी नहीं है--बोलना मजबूरी है। बोला जाता है करुणा के कारणक्योंकि मौन को तो तुम समझ ही न पाओगे। शब्द ही छूट जाते हैं तो मौन तो कैसे पकड़ में आएगाकह-कहकर भीतुम्हारी पकड़ नहीं बैठ पातीअनकहे को तो तुम कैसे पकड़ पाओगे?
बोलना जरूरी नहीं हैमजबूरी है। बुद्धों का बस चले तो चुप रह जाएं। लेकिन तुम्हें देखकरतुम्हारे लड़खड़ाते पैरों को देखकर,अंधेरे में तुम्हें टटोलते देखकरचिल्लाते हैंजितने जोर से बोल सकते हैं उतने जोर से बोलने हैं--फिर भी तुम्हारे बहरेपन में आवाज पहुंचती हैयह संदिग्ध है।
करोड़ों सुनते हैंतो कानों पर तरंगें पैदा होती हैंलेकिन हृदय अछूता रह जाता है। मस्तिष्क के पास तो दो कान हैंआवाज एक से जाती हैदूसरे से निकल जाती है। हृदय के पास एक ही कान हैआवाज जाती है तो फिर निकल नहीं पातीबीज बन जाती हैगर्भस्थ हो जाता है हृदय। और जब तक सुनी हुई वाणी तुम्हारे गर्भ न बन जाएजैसे सीप के भीतर मोती निर्मित होता हैऐसे सुना हुआ शब्द जब तक तुम्हारे भीतर मोती न बनने लगेतब तक तुमने सुनाफिर भी सुना नहींदेखाफिर भी देखा नहीं।
जीसस बार-बार अपने शिष्यों को कहते हैं, "आंखें हों तो देख लो! कान हों तो सुन लो! हृदय हों तो समझो'
ऐसा नहीं कि जीसस बहरे और अंधे लोगों से बोल रहे थेतुम्हारे ही जैसे आंखवाले और कान वाले लोग थे। फिर भी बार-बार जीसस दोहराते हैं। कारण साफ है।
सत्य जब अनुभव में आता है किसी के तो बात कुछ ऐसी है कि छुपाए भी नहीं छुप सकतीबताने की तो बात ही अलग। साधारण प्रेम नहीं छिपता। किसी के जीवन में साधारण प्रेम आ जाए तो चाल बदल जाती हैचाल में एक नृत्य समा जाता है;व्यक्तित्व की गंध बदल जाती हैहजार-हजार कमल खिल जाते हैंबोलता है तो एक माधुर्य आ जाता हैसाधारण वाणी में मधु बरसने लगता है!
प्रेम की आंख देखो--
बिना शराब पीये शराबी हो गया होता है!
एक मस्ती घेर लेती है!
जैसे प्रकृति पर जब वसंत उतरता है,
तो हृदय वसंत से भर जाता है!
सब तरफ फूल खिल जाते हैं!
सब तरफ पक्षियों की चहचहाहट शुरू हो जाती है!
भीतर कोई अवरुद्ध झरने मुक्त हो जाते हैं!
पंख लग जाते हैं--अनंत आकाश में उड़ने के!
साधारण प्रेम में ऐसा हो जाता हैतो जब परमात्मा का प्रेम बरसता है किसी परउस असाधारण प्रेम की घटना घटती हैजब बूंद में सागर उतरता हैआंगन में आकाश आ जात हैकबीर ने कहा हैजब अंधेरे में हजार-हजार सूरज का प्रकाश आता है,हजारों सूर्य भी मात हो जाएंऐसे प्रकाश की वर्षा होती हैमृत्यु में अमृत का आनंद बरसता है--तो कैसे छिपाये छिपेगा?
मुर्दा जिंदा हो जाएछिपाये छिपेगी यह बातमृत्यु में अमृत उतर आएछिपाये छिपेगी यह बातकोई उपाय नहीं है छिपने का। छिपाये तो छिपती ही नहींमगर मजा यह हैदुर्भाग्य यह हैबताए भी प्रगट नहीं हो पाती। छिपाये छिपती नहीं और बताए प्रगट नहीं हो पाती। क्योंकि दो हैं। वसंत आ गयाइतना ही थोड़े काफी हैतुम्हारे भीतर भी तो वसंत हो समझने की कोई समझ होनी चाहिए।
एक बहुत बड़े चित्रकार टरनर के चित्रों की प्रदर्शनी हो रही थी। बड़ा शोरगुल था। सारा नगर इकट्ठा था चित्रों को देखने के लिए। टरनटर द्वार पर ही खड़ा थालोगों की प्रतिक्रियाएं सुन रहा था।
एक महिला ने कहा, "बड़ा शोरगुल मचाया हुआ हैमुझे तो कुछ इसमें दिखाई नहीं पड़ता। कुछ सार नहीं मालूम होता इन चित्रों में। ये चित्र तो ऐसे लगते हैं जैसे बच्चों ने रंग भरे हों। मुझे इनमें कोई बड़ी कुशलता नहीं दिखाई पड़ती। इतना शोरगुल क्यों मचाया हुआ था?'
उसके साथ जो महिला ने टरनर से कहाकि तुम्हारा सूर्योदय का चित्र मुझे बहुत पसंद आया हैलेकिन ऐसा सूर्योदय मैंने कभी देखा नहीं। मतलब यह था कि "ऐसा सूर्योदय होता नहीं जैसा तुमने बनाया है। यह किसी कल्पना की बात है'
टरनर ने कहा, "मानालेकिन क्या तुम न चाहोगी कि मेरी आंखें तुम्हें उपलब्ध हों और ऐसा सूर्योदय तुम्हें दिखाई दे सके?'
सूर्योदय देखना हो तो सूर्योदय देखने वाली आंखें भी तो चाहिए।
कहते हैंअगर कवियों ने प्रेम का कोई गीत न गाए होते तो लोगों को प्रेम का पता ही न चलता। यह बात मुझे कुछ समझ में आती है।
तुम थोड़ा सोचोअगर कभी तुमने प्रेम का कोई गीत न सुना होता और प्रेम की कोई कहानी न सुनी होती तो क्या तुम्हें तुम्हारी जिंदगी से पता चल सकता था कि प्रेम हैशादी पता चलतीविवाह पता चलताबाल-बच्चे पैदा होतेलेकिन प्रेम...?
प्रेम का पता चलने के लिए पारखी की आंख चाहिए।
बड़ी मुश्किल से पैदा होती है चमन में कोई आंखवालाकोई कोई दीदावरकोई द्रष्टा।!
लेकिन कविताएं सुनकर भीप्रेम के गीत और प्रेम की कहानियां सुनकर भीतुम्हें प्रेम का शब्द ही याद हो जाता हैतुम दोहराने लगते होतुम वक्त-बेवक्त उसका उपयोग करने लगते हो। लेकिन क्या शब्द सुनकर ही तुम्हें प्रेम का अनुभव हो सकता हैक्या यह अनुभव ऐसा है कि उधार हो जाए?
नहींउधार नहीं हो सकता।
तो तुम्हारे जीवन में जब तक कोई अनुभव का सूत्र न होतब तक बुद्ध खड़े रहेंतुम्हें दिखाई न पड़ेंगे। तुम्हें वही दिखाई पड़ेगा जो तुम्हें दिखाई पड़ सकता है। मीरा नाचती रहेतुम्हें वही दिखाई पड़ेगा जो तुम्हें दिखाई पड़ सकता है। तुम्हारी आंखें ही तो तुम्हें खबर देंगीऔर तुम्हारे कान ही तो व्याख्या करेंगेऔर तुम्हारी समझ ही तो परिभाषा बनाएगी।
सत्य का अनुभव जब होता है तब तो वाह प्रगट हो ही जात हैलेकिन तुम नहीं बन समझ पाते।
बड़ी प्रसिद्ध पंक्तियां हैं:
"या रब न वह समझे हैं न समझेंगे मेरी बात
दे और दिल उनकोजो न दे मुझको जबां और।'
सभी बुद्धों के मन में ऐसा भाव रहा होगा कि हेभगवान...
"या रब न वह समझे हैं न समझेंगे मेरी बात
दे और दिल उनकोजो न दे मुझको जबां और'
या तो मेरी जबान बदलताकि मैं उन्हें समझा सकूंऔर या उन्हें दिल देताकि वे समझ सकें।
हजार ढंग से बुद्धों ने समझाने की कोशिश की हैलेकिन तुम्हारे पास कोई समानांतर अनुभव चाहिए: न सही सूरज काकिरण का ही सहीमिट्टी के छोटे-से दीये का ही सही--पर कोई समानांतर अनुभव चाहिए।
दीया भी देखा हो तो सूरज का अनुमान किया जा सकता है। दीया भी न देखा हो तो सूरज शब्द कोरा शब्द रह जाता है--चली हुई कारतूस जैसाखाली। उसे तुम याद कर ले सकते होवक्त-बेवक्त उपयोग भी कर सकते होलेकिन उसकी कोई जड़ें तुम्हारे भीतर न होंगी--उखड़ा हुआ पौधा होगासूखा हुआ पौधा होगागुलदस्ते में सजाकर रख सकते होउसमें कभी फूल न आएंगे;तुम धोखे में रह सकते होलेकिन तुम्हारे जीवन में उस धोखे के कारण बाधा ही पड़ेगीक्रांति घटित न होगी।
ठीक पूछा है: जब भी किसी को विराट अनुभव में आता है तो अभिव्यक्ति तो होती ही है।
बहुत बुद्धपुरुष चुप भी रह गए हैंपर उनकी चुप्पी भी बड़ी बोलती हुई थी। वह खामोशी भी गीत गाती हुई थी। जिनको थोड़ी भी समझ थी उन्होंने उन चुप रहनेवाले लोगों को भी खोल लिया है और उनकपदचिह्मों पर यात्रा कर ली है।
कोई नाचा है। किसी ने बांसुरी बजाकर कहा है। कोई बोला है। किसी ने तर्कनिष्ठ भाषा का उपयोग किया है। जीसस और बुद्धों ने छोटी-छोटी कथाएं कही हैं। जो जिससे बन सका...।
सत्य को पाने के पहले जिसकी जैसी तैयारी थीफिर जब सत्य उतरा तो पहले जो-जो तैयारी थी उस सबका उपयोग किया है,हर तरह से उपयोग किया है। लेकिन जरूरी नहीं है कि तुम उन्हें पहचान पाए होओ।
बुद्ध जिन गांव से गुजरे उनमें हजारों-लाखों लोग थेजिन्होंने उन्हें नहीं पहचानाबुद्ध गांव से गुजरेजो उनके दर्शन को भी न गएजो उन्हें सुनने भी न गएजो उन्हें सुनने भी गए तो खाली हाथ ही लौटेसोचते लौटे कि सब बातें हवा की बातें हैं। उनके कहने में भी सचाई है।
जो तुम्हारी पकड़ में न आएवह हवा की बात हैपानी का बबूल है!
सत्य तो सत्य तभी होता है जब तुम्हारे भीतर उसे आधार मिल जाए।
लेकिन बुद्धपुरुष कहते हैंउनकी करुणा से हजारों उपाय खोजते हैं। कहने में उन्हें कुछ रस नहींतुम समझ लो। इसमें जरूर रस रस है। यही तो फर्क है।
एक दार्शनिक भी लिखता हैबोलता हैलेकिन तुमसे उसे प्रयोजन नहीं हैप्रयोजन अपने अहंकार  की सजावट ही है।
कवि भी गाता हैलेकिन गाने में मजा भी अपनी ही आवाज सुनने का है। यही तो कवि और ऋषि गाता है ताकि तुम सुन सको। ऋषि गात है ताकि तुम्हारे हृदय में कुछ हिलोरें पैदा हो सकेताकि तुम्हारा सोया प्राण जग जाए। कवि गाता हैताकि तुम्हारी तालियों की आवाज उसके अहंकार में नयी सजावट बनेनया शृंगार होमगर तुम्हारी तालियों को सुनने के लिए ही गाता है।
संत भी बोलते हैं--इसलिए नहीं कि तुम्हारी तालियां सुनें। तुम्हारी प्रशंसा से कोई भी प्रयोजन नहीं है। वस्तुतः जब भी तुम उनकी प्रशंसा करते हो और ताली बजाते होतब वे थोड़ा चौंकते हैं। क्योंकि यह बात ताली सुनने के लिए या प्रशंसा सुनने के लिए नहीं कही गई थी--यह कही गई थी ताकि तुम बदलोतुम्हारे जीवन में क्रांति का सूत्रपात हो।
"न सताइश की तमन्ना न सिले की पर्वा
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी न सही'
इसकी भी चिंता नहीं है संतों को कि वे जो कह रहे हैंवह सार्थक भी होक्योंकि सार्थक बनने के लिए तो उसे तुम्हारे तल पर उतारना पड़ेगा। और जितना ही सत्य तुम्हारे तल पर उतर जाता है उतना ही मरता जाता हैजब वह ठीक तुम्हारे तल पर आ जाता हैव्यर्थ हो जाता है।
इसलिए अगर किसी को सार्थक वचन ही बोलने की आकांक्षा हो तो सत्य नहीं बोला जा सकता। सत्य तो विरोधाभासी है। सत्य को तो बोलने का एक ही ढंग है कि तुम सार्थक होने की चिंता मत करना।
तर्कातीत है सत्यतो सार्थक कैसे होगा?
विरोधाभासी है सत्यतो सार्थक कैसे होगा?
और जो तुम्हारे लिए सार्थक हो सके वह बिलकुल ही व्यर्थ हो गया। जो तुम्हारी बिलकुल ही समझ में आ जाएवही सार्थक हो सकता है। और जो इतना सार्थक हो जाए कि तुम्हारी समझ में बिलकुल आ जाएवह तुम्हें ऊपर न उठा सकेगा।
तो बुद्धपुरुषों की चेष्टा क्या है?
--कुछ समझ में आएकुछ समझ के पार रह जाए।
जो समझ में आएवह सहारा बने आस्था काताकि जो समझ में नहीं आया हैउसकी तरफ तुम कदम बढ़ाओजरा सा समझ में आए और बहुत सा समझ के पार रह जाएवह जो थोड़ा सा समझ में आता हैधुंधला सा समझ में आता हैवह तुम्हारे लिए मार्ग बन जाएउसके सहारे तुम और यात्रा करने के लिए उत्सुक हो जाओ।
संत तो प्रगट हो जाते हैं--अपनी तरह सेतुम्हारी तरफ से अप्रगट रह जाते हैं--इतने अप्रगट रह जाते हैं कि इतिहास में उनका कोई उल्लेख भी नहीं होता।
जीसस का कोई उल्लेख नहीं हैसिवाय बाइबिल के कहीं और। बाइबिल तो उनके ही शिष्यों की किताब हैइसलिए भरोसे की नहीं है। हजारों लोग हैं जो शक करते हैं कि जीसस कभी हुए भी! कृष्ण कभी हुए--शक की बात है।
इतने विराट पुरुष हुएइतिहास में इनकी कोई छाप नहीं छूट जातीक्योंकि इतिहास तुम लिखते होजब तुम पर ही छाप नहीं छूटती तो तुम्हारे लिखे पर कहां से छाप छूटेगी! तुम्हारे लिखे पर छाप छूटती है चंगेज खां कीतैमूरलंग कीराजनेताओं की,उपद्रवियों कीहत्यारों कीडाकुओं कीइनकी तुम्हारे लिखे पर छाप छुटती है। इन पर कोई शक नहीं करता हक चंगेज खां कभी हुआ या नहींतैमूरलंग कभी हुआ कि नहीं। कोई शक का सवाल ही नहीं है। करोड़ों प्रमाण हैं उनके होने के।
कृष्णक्राइस्ट?...कोई प्रमाण नहीं मालूम पड़तामान लोभरोसे की बात हैन मानो तो कोई मना नहीं सकता।
क्या कारण होगाइतिहास इतना अछूता कैसे रह जाता है?
क्योंकि इतिहास तुम लिखते हो। तुम्हारा हृदय ही अछूता रह जाता है। तुम पर ही निशान नहीं बनते उनकेतो तुम्हारे लिखे पर कैसे बनेंगेव्यर्थ की तो छाप बन जाती हैक्योंकि व्यर्थ तुम्हें सार्थक है। सार्थक की छाप ही नहीं बनतीक्योंकि सार्थक तुम्हें बिलकुल व्यर्थ है।
बुद्ध का क्या करिएगायुद्ध में काम आ नहीं सकते। तलवार बना नहीं सकते उनसे।
बुद्ध की खोजों का क्या करिएगाअणु-बम तो बन नहीं सकता उनसे। तुम्हारे किसी काम की नहीं है। खयाली बातें हैंहवा की हैं।
स्वप्न द्रष्टा है इस तरह का व्यक्ति। तुम उसे माफ कर देते होइतना ही बहुत। तुम अपनी राह चले जाते हो। कभी फुर्सत हुई,उसकी दो बात भी सुन लेते होलेकिन उसकी बातों के कारण तुम अपने को बदलने की तैयारी नहीं करते। सुन लेते हो औपचारिकता सेशिष्टाचार सेलेकिन कहीं भी तुम पर कोई छाप नहीं पड़ती। किसी पर पड़ जाती है तो तुम उसको पागल समझते हो। किसी पर पड़ जाती है तो तुम समझते हो कि गया काम सेयह एक और आदमी खराब हुआ।
जीवन में जो भी महत्वपूर्ण हैवह तुम्हें सार्थक दिखाई ही नहीं पड़ता। तुम कितने ही ऊंचे आकाश में उड़ोतुम्हारी नजर चील की तरह कचरा-घरों पर पड़े मरे चूहों में लगी रहती है। तुम बुद्धों के पास भी बैठो तो भी तुम्हारी नजर बुद्धों पर नहीं होती।
एक सज्जन मेरे पास आए। मिल कर गए। महीने भर बाद वे फिर आए। बड़े प्रसन्न थे। कहने लगे, "आपकी बड़ी कृपा है! चमत्कार हो गया। मुकदमा कई सालों से उलझा थाआपके दर्शन किएजीत गया'
मेरे दर्शन से इनके मुकदमे का क्या संबंधलेकिन जब आए होंगे तो वे इसलिए आए होंगे कि मुकदमा जीतना था।
बुद्धपुरुषों के पास भी तुम जाओ तो तुम्हारी नजर तो मरे चूहों पर ही लगी रहती है। कहीं मुकदमा हार जाते तो फिर कभी दोबारा मेरे पास न आते: "यह आदमी किसी काम का नहींउलटा उपद्रव है'
तो मैंने उनसे कहा, "भूल हो गई। संयोग को चमत्कार मत समझ लेना। और अब दोबारा मुकदमा जीतना हो तो यहां मत आना'
मुकदमे से मेरा क्या संबंध हो सकता हैतुम्हारी पूरी जिंदगी बेकार हैतुम सब मुकदमे हार जाओ तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ता। तुम्हारी जिंदगी पूरी हारी हुई है। तुम जिसे जिंदगी कहते हो वही व्यर्थ है।
सार्थक तुम्हारी समझ के मापदंड पर कसा जाता है।
ध्यान रखना--
"न सताइश की तमन्ना न सिले की पर्वा
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी न सही'
बुद्धपुरुष सार्थक की चिंता करें तो बोल ही नहीं सकतेक्योंकि तब मरे चूहों की चर्चा करनी पड़ेगी। सत्य की परवाह करते हैं,सार्थक की नहीं। और सत्य तुम्हें निरर्थक दिखाई पड़ेगायह पक्का है।
बड़ी हिम्मत चाहिए सत्य की खोज के लिएक्योंकि वह अर्थ के पार जाने की चेष्टा है। जिन-जिन चीजों में तुम्हें उपयोगिता मालूम होती है--धन हैपद हैप्रतिष्ठा है--सत्य न तो पद बनेगा,न प्रतिष्ठान धनसिंहासन तो बन ही नहीं सकतासूली भला बन जाएधन तो बनेगा ही नहींपद तो बनेगा ही नहींविपरीत भला हो जाए। तो सत्य तुम्हें कैसे सार्थक मालूम हो सकता है?
सत्य तो ऐसा हैजैसे वृक्षों पर फूल हैंपक्षियों के गीत हैंझरनों को कलरव है--कोई अर्थ तो नहीं है।
पश्चिम के एक बड़े महत्वपूर्ण कवि कंम्मिग्स से किसी ने पूछा कि तुम्हारी कविताओं का मायना ही क्या हैअर्थ ही क्या है?उसने कहा, "कोई अर्थ नहीं। फूलों से पूछोक्या अर्थ है। पक्षियों से पूछोक्या अर्थ है। आकाश से पूछोक्या अर्थ है उसका। और अगर आकाश व्यर्थ होकर शान से है और फूल व्यर्थ होकर गौरव से खिलते हैंशरमाते नहींछिपते नहींतो मेरी कविताओं का ही अर्थ बताने की क्या जरूरत है?
जितनी सत्य के करीब कोई बात पहुंचने लगेगीउतनी ही तुम्हारी सार्थकता के घेरे के बाहर हो जाएगी। अर्थ है कोईलेकिन उस अर्थ को जानने के लिए तुम्हारी आत्मा को पूरा रूपांतरित होना पड़ेगातुम्हारे अर्थ की परिभाषा की बदलनी पड़ेगी।
बुद्धपुरुष प्रगट होते हैं--तुम्हारे लिए प्रगट नहीं हो पाते।
तुम इसकी चिंता भी मत करो कि वे प्रगट होते हैं या नहीं--तुम इसकी ही चिंता करो कि तुम्हारे लिए प्रगट हो पाते हैं या नहीं!
अपने हृदय को खोलो!
बंद द्वार-दरवाजे ताड़ो!
घबड़ाओ मतखुले में आओ!
छिपो मत अंधकार में!
आदत अंधकार की छोड़ो!
थोड़ी रोशनी में आओ!
आंखें तिलमिलाएं भी प्रारंभ में तो घबड़ाओ मत। पुराने अंधकार की आदत हो गई हैस्वाभाविक है कि थोड़ी तिलमिलाहट होगी,थोड़ी अड़चन होगीथोड़ी कठिनाई होगीथोड़ी तपश्चर्या होगी। मगर यह तपश्चर्या करने जैसी हैक्योंकि जो मिलेगा वह अनंत हैजो मिलेगा वह विराट है। और जब तक वह न मिल जाए तब तक तुम्हारा जीवन एक कोरा शून्य हैएक रिक्तता हैएक खालीपन है।

दूसरा प्रश्न: आये थे दर पर तेरे सिर झुकाने के लिए,
उठता नहीं है सिर अब वापस जाने के लिए,
दर्द दिया है तो दवा भी तू ही दे,
ऐसा न हो कि कहानी बन जाए जमाने के लिए।
*ठीक है। घबड़ाने की कोई बात नहीं है।
दर्द ही दवा बन जाता है!
दर्द ही अधूरे होने में पीड़ा हैपूरे हो जाने में दवा है।।
इसे थोड़ा समझना। । कठिन होगा समझनाक्योंकि हमारे तर्क  की कोई भी कोटियां काम में नहीं आएंगी।
लेकिन आंतरिक जीवन के बहुमूल्य में एक सत्य है कि अगर तुम्हारा प्रश्न पूरा हो जाए तो प्रश्न में ही उत्तर निकल आता है।
 और तुम्हारी प्यास अगर समग्र हो जाए तो प्यास में ही झरने फूट पड़ते हैं और तृप्ति आ जाती है। दर्द पूरा हो जाएदर्द इतना हो जाए कि तुम दर्द के जाननेवाले अलग न रह जाओभेद न बचेदर्द ही बचेतुम न बचो तो दवा हो जाती है। इसी को तपश्चर्या कहते हैं।
तपश्चर्या का अर्थ है: जीवन के खालीपन की पीड़ा को उसकी समग्रता में अनुभव करनाजीवन की अर्थहीनता को उसकी पूरी त्वरा में अनुभव  करना। जीवन की ही यह जिसको भाग-दौड़ हम समझ रहे हैं अभी बड़ी उपयोगी मालूम होती हैएक ख्वाब से ज्यादा न रह जाए तो अचानक हम पाएंगे: हाथ खाली है। घबड़ाहट पकड़ेगी। रोआं-रोआं कंप जाएगा। लगेगा यह जो जीये अब तक नाहक ही जीयेयह जो समय गया व्यर्थ ही गया। पीड़ा उठेगी। गहन पीड़ा उठेगी। इस पीड़ा को झेलने का नाम ही तपश्चर्या है।
और जल्दी दवा मत मांगनाक्योंकि जल्दी दी गई दवाएं शामक होंगीवे तुम्हारी पीड़ा को सुला देंगीतुम फिर वापस दुनिया में लौट जाओगे वैसे के वैसे।
दवा मांगना ही मत। दर्द को भोगने के  लिए तैयार रहना। अगर तुम भोगने की पूरी तत्परता दिखा सको तो दर्द में ही दवा छिपी है।
"इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया
दर्द की दवा पायीदर्द बेदवा पाया'
प्रेम सेभक्ति से--
"तबियत ने जीस्त का मजा पाया...'
पहली दफा जीवन का आनंद आना शुरू हुआ। लेकिन यह आनंद कोरा आनंद नहीं हैइस आनंद की बड़ी गहन पीड़ा भी है। अगर तुमने प्रेम में सिर्फ सुख ही खोजा तो तुम प्रेम से वंचित रह जाओगेक्योंकि प्रेम का दुख भी है।
गुलाब की झाड़ी पर फूल ही नहीं हैंकांटे भी हैं,। फूल ही फूल मांगे तो फिर तुम जाकर फूल बेचने वाले से फूल खरीद लेना,झाड़ी लगाने की झंझट में मत पड़ता। वहां तुम्हें फूल मिल जाएंगे बिना कांटे केमगर वे मरे हुए फूल हैं। जिंदा फूल चाहिए तो कांटे भी होंगे।
और गुलाब का फूल कांटों में ही शोभा देता है।
रात के घने अंधेरे में जब चैतन्य का दीया जलता है तो उसी विपरीतता में उसकी प्रतीति की सघनता है।
"इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया
दर्द की दवा पायी,...'
अब तक जो दर्द थे जिंदगी के--हजार दर्द हैं जिंदगी के वे ही तुम्हें मेरे पास ले आए। हजार-हजार तकलीफें हैंचिंताएं हैंउलझने हैं। हजार दर्द हैं जिंदगी के।
अगर तुम भक्ति और प्रेम के रास्ते पर चले तो दर्द की दवा मिल जाएगी। इन सभी दर्दों की दवा मिल जाएगी। ये सब दर्द खो जाएंगे। "दर्द की दवा पायी'--और तब एक नया दर्द शुरू होगा--"दर्द बेदवा पाया'। और अब एक ऐसा दर्द शुरू होगा जिसकी कोई दवा नहीं है।
इन सभी दर्दों की तो दवा है। अगर चिंता है तो ध्यान से खो जाएगी। तनाव हैध्यान से मिट जाएगा। क्रोध हैलोभ हैमोह है--इन सभी दर्दों की दवा है। सिर्फ एक परमात्मा का दर्द हैजिसकी कोई दवा नहीं । तो तुमसे मैं सारे दर्द छीन लूंगा और एक दर्द दूंगाजिसकी फिर कोई दवा नहीं है। सौदा मंहगा है। मंहगा सौदा । जुआरी चाहिए। दुकानदार इस काम को नहीं कर सकते। वे कहेंगे, "यह क्या हुआछोटे-छोटे दर्द ले लिए और यह बड़ा दर्द दे दिया! छोटे-छोटे ले लिएजिनकी तो दवा थीऔर यह दर्द दे दियाजिसकी कोई दवा नहीं है!'
 लेकिन घबड़ाना मत!
 "इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया
दर्द की दवा पायीदर्द बेदवा पाया'
"इश्रते कतरा है दरिया में फना हो जाना'
बूंद को गौरव यही हैऐश्वर्य यही है कि वह सागर में खो जाएमिट जाए।
"इश्वते कतरा है दरिया में फना हो जाना
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना'
यह जो बेदाव-दर्द हैअगर यह हद से गुजर जाए--हद से गुजर जाने का अर्थ हैतुम इसमें मिट ही जाओतुम ही हद होतुम ही सीमा होऐसा कोई भीतर रह ही ना जाए जिसको दर्द हो रहा हैदर्द ही बस रह जाए--
"दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना'
परमात्मा की पीड़ा ऐसी है कि उसका कोई इलाज नहींपीड़ा में ही इलाज छिपा है। क्योंकि परमात्मा आखिरी पीड़ा हैउसके आगे इलाज हो भी नहीं सकता। वही पीड़ा हैवही इलाज है। वही रोग हैवही औषधि है। क्योंकि उसके पार फिर कोई भी नहीं।
तो घबड़ाओ मत! दर्द की तैयारी चाहिए।
जब परमात्मा के आनंद को मांगने चले हो तो यह सौदा करने जैसा है। जितना दर्द उठाने की तैयारी दिखाओगेउतना ही परमात्मा का आनंद उपलब्ध होगा।
तुम्हारे दर्द को झेल लेने की तैयारीतुम्हारी परीक्षा हैतुम्हारी कसौटी हैऔर तुम्हारी भूमिका भी है।
दर्द निखारता है। दर्द साफ करता है।
दर्द ऐसा है जैसे कि कोई सोने को आग में धरता हैतो जो व्यर्थ है जल जाएगास्वर्ण बचा रहेगा खालिस! दर्द में वही जलेगा जो व्यर्थ हैजो जल ही जाना थाकूड़ा-करकट था। तुम्हारे भीतर जो भी सोना है वह बच जाएगा।
यह अग्नि गुजरने जैसी है।
भक्ति अग्नि है।
यह भीतर की आग है।

तीसरा प्रश्न: आपके प्रवचन सुनते हुए कभी-कभी प्रेम-विभोर होकर मेरी आंखें आंसू बहाने लगती हैं। लेकिन तभी अचेतन में अहंकार को रस भी आता लगता है कि मैं अहोभाव के आंसू बहा रहा हूं। क्या इससे अद्वैत का रूखा-सूखा मार्ग अच्छा नहीं है,जहां अश्रु बहाने वाला बचता ही नहीं?

बारीक है सवालथोड़ा समझना पड़े। नाजुक है।
थोड़ा ध्यान करना: जब भक्ति तक में अहंकार बच जाता है तो अद्वैत में तो मिट ही न सकेगा। जब आंसू भी उसे नहीं बहा सकते तो रूखे-सूखे मार्ग पर तो बड़ा अकड़कर खड़ा हो जाएगा। जब आंसू भी उसे पिघला नहीं सकतेऔर आंसुओं से भी वह अपने को भर लेता हैतो जहां आंसू नहीं हैं वहां तो मिटने का उपाय ही न रह जाएगा।
समझें।
अहंकार का आंसुओं से विरोध है। इसलिए तो हम पुरुष से कहते हैं, "रो मत। क्या स्त्री जैसा व्यवहार कर रहे हो!पुरुष को हम अहंकारी बनाते हैं। छोटा बच्चा भी रोने लगता है तो कहते हैं, "चुप! लड़का है या लड़की?' पुरुषों की दुनिया है। अब तक पुरुष काबू करते रहे हैं दुनिया परतो उन्होंने अपने लिए अहंकार बचा लिया है। पुरुष होने का अर्थ है: "रोना मत'। यह अकड़ है। "स्त्रियां रोती हैं। कमजोर रोते हैंशक्तिशाली कहीं रोते हैं!'
अहंकार का आंसुओं से कुछ विरोध है।
 तुम अगर सिकंदर को रोते देखो तो तुम उसको बहादुर न कह सकोगे। नेपोलियन को अगर तुम रोते देख लो तो तुम कहोगे: "अरेनेपोलियनऔर रो रहे हो! यह तो कायरों की बात हैकमजोरों की बात है। यह तो स्त्रैण चित्त का लक्षण है'
अहंकार का आंसुओं से विरोध है। तो जब आंसू भी अहंकार को नहीं मिटा पाते तो ऐसा मार्ग जहां आंसुओं की कोई जगह नहीं हैवह तो मिटा ही न पाएगा। वहां तो अहंकार और अकड़ जाएगा।
भक्तों में तो कभी-कभी तुम्हें विनम्रता मिल जाएगीअद्वैतवादियों में तुम्हें कभी विनम्रता नहीं मिलेगी। मुश्किल हैबहुत मुश्किल है। बड़ी अकड़ मिलेगी। आंसू ही नहीं हैं।
थोड़ा सोचो: हरा वृक्ष होता है तो झुक सकता हैसूखा वृक्ष होता है तो झुक नहीं सकता। विनम्रता तो झुकने की कला है। अगर आंसुओं ने थोड़ी हरियाली रखी हैतो झुक सकोगे। अगर आंसू बिलकुल सूख गए और सूखे दरख्त हो गए तुमतो झुकना असंभव है। टूट भला जाओझुक न सकोगे।
अहंकारी वही तो कहते हैं कि टूट जाएंगेमगर झुकेंगे नहींमिट जाएंगेमगर अकड़े रहेंगे।
अद्वैत रूखा-सूखा रास्ता है--तर्क काबुद्धि काविचार का। अगर भावप्रेम और भक्ति के रास्ते पर भी तुम पाते हो कि अहंकार इतना कुशल है कि अपने को भर लेता हैतो फिर अद्वैत के रास्ते पर तो बहुत भर लेगा। क्योंकि भक्ति की तो पहली शर्त ही यही है: समर्पण। भक्ति तो पहली ही चोट में अहंकार को मिटाने की चेष्टा करती हैअद्वैत तो अंतिम चोट में मिटाएगा। तुम पूरा रास्ता तय कर सकते हो अद्वैत का अहंकार के साथ। आखिर में अहंकार गिरेगा। भक्ति तो पहले ही चरण पर कहती है: अहंकार छोड़ो तो ही प्रवेश है।
वैष्णव भक्तों की एक कथा है कि एक भक्त वृंदावन की यात्रा को आया--रोतागीत गाताअश्रु-विभोरलेकिन मंदिर पर ही उसे रोक दिया गया। द्वार पर पहरेदार ने कहा, "रुको! अकेले भीतर जा सकते हो। लेकिन यह गठरी जो साथ ले आए होइसे बाहर छोड़ दो।'
उसने चौंककर चारों तरफ देखाकोई गठरी भी उसके पास नहीं है। वह कहने लगा, "कैसी गठरीकौन सी गठरीमैं तो बिलकुल खाली हाथ आया हूं।'
उस द्वारपाल ने कहा, "भीतर देखोबाहर मत। गठरी भीतर हैगांठ भीतर है। जब तक तुम्हें यह खयाल है कि मैं हूंतब तक,तब तक भक्ति के मंदिर में प्रवेश नहीं हो सकता। भक्ति की तो पहली शर्त है: तू हैमैं नहीं हूं। भक्ति का प्रारंभ है: तू हैमैं नहीं। और भक्ति का अंत है कि न मैं हूंन तू है।'
अद्वैत की तो बहुत गहरी खोज यही है कि मैं हूंतू नहींऔर अंतिम अनुभव है: न मैं हूंन तू। इसलिए तो अद्वैत कहता है: अहं बह्मास्मि! अनलहक! मैं हूं। मैं ब्रह्म हूं। मैं सत्य हूं।
अद्वैत के रास्ते पर तो वे ही लोग सफल हो सकते हैंजो अहंकार के प्रति बहुत सजग हो सकें। क्योंकि वहां आंसू भी साथ देने को न होंगेसिर्फ सजगता ही साथ देगी। वहां प्रेम भी झुकाने को न होगावहां तो बोधपूर्वक ही झुकोगे तो ही झुकोगे।
तोअद्वैत तो बहुत ही समझपूर्वक चलने का मार्ग है। सौ चलेंगेएक मुश्किल से पहुंच पाएगा। भक्ति में नासमझ भी चल सकता हैक्योंकि भक्ति कहती हैसिर्फ गठरी छोड़ दो। कोई तर्क का जाल नहीं हैकोई विचार का सवाल नहीं है। प्रेम में डूब जाओ!
अज्ञानी भी चल सकता है भक्ति के मार्ग पर।
तो जिस मित्र ने पूछा है कि "आंसू बहने लगते हैं तो एक अहंकार पकड़ता है भीतर कि अहोधन्यभागकि मैं कैसे भक्ति के रस में डूब रहा हूं!'
ठीक पूछा है। ऐसा होगास्वाभाविक है। उससे घबड़ाओ मत। उस अहोभाव को भी परमात्मा के चरणों पर समर्पित कर दो। तत्क्षण कहो कि खूबफिर उलझायाइसे भी सम्हाल! अहोभाव मेरा क्यातेरा प्रसाद है! अब मुझे और धोखा न दे! अब मुझे और खेल न खिला!
जैसे भी यह अहंकार बनेउसे तत्क्षण जैसे ही याद आ जाएतत्क्षण परमात्मा के चरणों में रख दो। जल्दी ही तुम पाओगे: अगर तुम रखते ही गएअहंकार के बनने का कारण ही खतम हो गया।
अहंकार संगृहीत हो तो ही निर्मित होता है। पल-पल उसे चढ़ाते जाओ परमात्मा के चरणों में। और सब फूल चढ़ाएबेकारधूप-दीप बालीबेकारआरती उतारीव्यर्थ--बस अहंकार प्रतिपल बनता हैउसे तुम चढ़ाते जाओ। वही तुम्हारे भीतर उगनेवाला फूल हैउसे चढ़ाते जाओ। जल्दी ही तुम पाओगेउसका उगना बंद हो गया। क्योंउसका संगृहीत होना जरूरी है।
और आंसू बड़े सहयोगी हैं। होश रखना पड़ेगा। थोड़ा जागरूक रहना पड़ेगा। नहीं तो अहंकार बड़ा सूक्ष्म है और बड़ा कुशल हैबड़ा चालाक है। सावधान रहना पड़ेगा।
सावधानी तो सभी मार्गों पर जरूरी हैभक्ति के मार्ग पर सबसे कम जरूरी हैलेकिन जरूरी तो है ही। अद्वैत के मार्ग पर बहुत ज्यादा जरूरी है। न्यूनतम सावधानी से भी काम चल सकता है भक्ति के मार्ग परलेकिन बिलकुल बिना सावधानी के काम नहीं चल सकता है।
घबड़ाओ मत। जो हो रहा हैबिलकुल स्वाभाविक हैसभी को होता है। यात्रा के प्रारंभ में यह अड़चन सभी को आती है।
अहंकार की आदत है कि जो भी मिल जाए उसी का सहारा खोजकर अपने को भर लेता है। धन कमाओ तो कहता हैदेखो कितना धन कमा लिया! ज्ञान इकट्ठा कर लो तो कहता हैकितना ज्ञान पा लिया! त्याग करो तो कहता हैदेखो कितना त्याग कर दिया! ध्यान करो तो कहता हैदेखो कितना ध्यान कर लिया! मेरे जैसा ध्यानी कोई भी नहीं है! आंसू बहाओ तो गिनती कर लेता हैमैंने कितने आंसू बहाएदूसरों ने कितने बहाए। मेरा नंबर एक हैबाकी नंबर दो हैं!
इस अहंकार की तरकीब के प्रति होश रखना भर जरूरी हैकुछ और करने की जरूरत नहीं है। उसे भी चढ़ा दो परमात्मा को।
भक्त को एक सुविधा हैपरमात्मा भी हैउसके चरणों में तुम चढ़ा सकते हो। भक्त को एक सुविधा है कि अहंकार के विपरीत वह परमात्मा का सहारा ले सकता है। अद्वैतवादी को वह सुविधा भी नहीं है। वह बिलकुल अकेला हैकोई संगी-साथी नहीं है। भक्त अकेला नहीं है।
इसलिए अगर भक्ति के मार्ग पर भी तुम्हें अड़चन आ रही है तो यह मत सोचना कि अद्वैत का मार्ग तुम्हें आसान होगाऔर भी कठिन होगा। इस भूल में मत पड़ना।
अहंकार की एक ही घबड़ाहट हैऔर वह घबड़ाहट यह है कि कहीं मर न जाऊं। अहंकार मरेगा ही। वह कोई शाश्वत सत्य नहीं हैवह क्षणभंगुर है। तुम कभी न मरोगेतुम्हारा अहंकार तो मरेगा ही। जितनी जल्दी तुम यह बात समझ लोउतना ही भला है।
उम्र फानी है तो फिर मौत से डरना कैसा
एक बात तो पक्की है कि मौत निश्चित है और जिंदगी आज है कल नहीं होगी--हवा की लहर हैआई और गईसदा टिकनेवाली नहीं है।
उम्र फानी है तो फिर मौत से डरना कैसा
इक-न-इक रोज यह हंगामा हुआ रखा है
किसी भी दिन यह घटना घटनेवाली है। मौत होगी ही।
इक-न-इक रोज यह हंगामा हुआ रखा है
तो जो होने ही वाला हैउसे स्वीकार कर लो। लड़ो मतबहो। यह लड़ाई छोड़ दो कि मैं बचूं। स्वीकार ही कर लो कि मैं नहीं हूं।
जो मौत करेगीभक्त उसे आज ही कर लेता है। जो मौत में जबर्दस्ती किया जाएगाभक्त उसे स्वेच्छा से कर लेता है। वह कहता है, "जो मिटना ही है वह मिट ही गया। आज मिटाकल मिटा--क्या फर्क पड़ता है! मैं खुद ही उसे छोड़ देता हूं।'
अपनी मौत को स्वीकार कर लो तो तुम अमृत को उपलब्ध हो जाओगे। इधर तुमने मौत को स्वीकार किया कि उधर तुम पाओगेतुम्हारे भीतर कोई छिपा है--तुमसे ज्यादा गहरातुमसे ज्यादा ऊंचातुमसे ज्यादा बड़ा। तुम मिटे कि उस ऊंचाई और गहराई और उस विराट का पता चलना शुरू हो जाता है।
तुमने तिनके का सहारा ले रखा है। तिनके के सहारे के कारण तुम भी छोटे हो गए हो। तुमने गलत संग पकड़ लिया है। गलत से तादात्म्य हो गया है।
मौत को स्वीकार कर लो। मौत को स्वीकार करते ही अहंकार नहीं बचता। जैसे ही तुमने सोचासमझा कि मौत निश्चित है--होगी हीआज होकल होपरसों हो--होगी हीइससे बचने का कोई उपाय नहीं हैकोई कभी बच नहीं पाया। भाग-भागकर कहां जाओगेभाग-भागकर सभी उसी में पहुंच जाते हैंमौत के ही मुंह में पहुंच जाते हैं। अंगीकार कर लो। उस अंगीकार में ही अहंकार मर जाता है।
मुझे अहसास कम था वर्ना दौरे जिंदगानी में
मेरी हर सांस के हमराह मुझमें इंकिलाब आया
मुझे होश कम थामुझे अहसास कम था। होश कम थासावधानी नहीं थीजागरूकता नहीं थी।
...वर्ना दौरे जिंदगानी में!
वर्ना जिंदगी भर,
मेरी हर सांस के हम राह मुझमें इंकिलाब आया
मेरी हर सांस के साथ क्रांति की संभावना आती थी और मैं चूकता गया। हर सांस के साथ क्रांति घट सकती थीअहंकार छूट सकता था और परमात्मा के जगत में प्रवेश हो सकता था--लेकिन होश कम था।
इस होश को थोड़ा जगाओ। वह इंकलाबवह क्रांति तुम्हारी भी हर श्वास के साथ आती हैतुम चूकते चले जाते हो।
अहंकार को जब तक तुम पकड़े होचूकते ही चले जाओगे। जिस दिन छोड़ा अहंकार कोउसी क्षण क्रांति घट जाती है। उसी क्रांति की तलाश है। उस क्रांति के बिना कोई तृप्ति न होगी। उस क्रांति के बिना तुम थरथराते ही रहोगे भय मेंघबड़ाते ही रहोगे चिंताओं मेंडरते ही रहोगे।
मौत जब तक होने वाली हैतब तक कोई निश्चिंत हो भी कैसे सकता है! अगर तुमने स्वीकार कर लिया तो मौत हो ही गई,फिर चिंता का कोई कारण नहीं।
इसे थोड़ा करके देखो। यह बात करने की है। यह बात सोचने भर की नहीं है। इसे करोगे तो ही इसका स्वाद मिलेगा।

चौथा प्रश्न: पृथ्वी पर अभी भी असंख्य मंदिरमस्जिदगिरजे और गुरुद्वारे हैंजहां विधिविहित पूजा-प्रार्थना चलती है। क्या आपके देखेवे सबके सब व्यर्थ ही हैं?
अगर व्यर्थ न होते तो पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आया होता। अगर व्यर्थ न होते--इतनी पूजाइतनी प्रार्थनाइतने मंदिरइतने गिरजेइतने मस्जिद--अगर वे सब सच होतेअगर ये प्रार्थनाएं वास्तविक होतींहृदय से आविर्भूत होतींतो पृथ्वी स्वर्ग बन गई होती। लेकिन पृथ्वी नरक है। जरूर कहीं न कहीं चूक हो रही है।
या तो परमात्मा नहीं हैइसलिए प्रार्थनाएं व्यर्थ जा रही हैंया प्रार्थनाएं ठीक नहीं हो रही हैंऔर परमात्मा से संबंध नहीं जुड़ पा रहा है। बस दो ही विकल्प हैं। अब इसमें तुम चुन लोजो तुम्हें चुनना हो।
एक विकल्प है कि परमात्मा नहीं हैइसलिए प्रार्थनाएं कितनी ही करोक्या होनेवाला है! है ही नहीं कोई वहां सुनने कोआकाश खाली और कोरा है,चिल्लाओ-चीखो-- तुम पागलपन कर रहे हो। यह समय व्यर्थ ही जा रहा हैइसका कुछ उपयोग कर लेते,कुछ काम में आ जाता।
और या फिरपरमात्मा हैप्रार्थना करनेवाला प्रार्थना नहीं कर रहा हैधोखा दे रहा है।
मैं दूसरा ही विकल्प स्वीकार करता हूं। मेरे देखे परमात्मा हैप्रार्थना नहीं है--इसलिए संबंध टूट गए हैंबीच का सेतु गिर गया है।
कुछ लोगों को तो प्रार्थना भी प्राक्सी से करनी शुरू कर दी है।
पुजारी कर देता है। हिंदुओं ने वह तरकीब खोज ली है। वे खुद नहीं जाते। गरीब-गुरबे चले जाएंपर जिनके पास थोड़ी सुविधा हैवे पुजारी रख लेते हैं। मंदिर में एक व्यवसायी पुजारी हैवह पूजा कर देता है। यह प्रार्थना प्राक्सी से है।
यह भी खूब धोखा हुआ! किसको धोखा दे रहे होउस पुजारी को प्रार्थना से कुछ लेना-देना नहीं है। उसको सौ रुपये महीने मिलते हैं तनख्वाहउसको तनख्वाह से मतलब है। वह प्रार्थना करता हैक्योंकि सौ रुपये लेने है। वह व्यवसाय है। अगर उसे कोई डेढ़ सौ रुपये देनेवाला मिल जाए तो इसी भगवान के खिलाफ भी प्रार्थना कर सकता हैकोई अड़चन नहीं है।
 मुल्ला नसरुद्दीन एक सम्राट के घर नौकर थारसोइये का काम करता था। भिंडी बनाई थीं उसने। सम्राट ने बड़ी प्रशंसा की। उसने कहा कि मालिकभिंडी तो सम्राट है। जैसे आप सम्राट हैंशहंशाह हैंऐसे ही भिंडी भी सभी शाक-सब्जियों में सम्राट है।
दूसरे दिन भी भिंडी बनाई। तीसरे दिन भी भिंडी बनाई। चौथे दिन सम्राट ने थाली फेंक दी। उसने कहा कि नालायकरोज भिंडी। तो मुल्ला ने कहा, "मालिक! यह तो जहर है! यह तो गधों को भी खिलाओतो न खाएं'
सम्राट ने कहा कि नसरुद्दीनचार दिन पहले तूने कहा थायह शाक-सब्जियों में सम्राट है। और आज जहर है!
उसने कहा, "मालिक! हम आपके नौकर हैंभिंडी के नहीं। हम तो आपको देखकर कहते हैं। जो आप कहते हैं वही हम कहते हैं। हम आपके नौकर हैं। भिंडी से हमें कुछ लेना-देना नहीं'
तो उस पुजारी से तुम जो चाहो करवा लो। वह तुम्हारा नौकर हैपरमात्मा से कुछ लेना-देना नहीं है।
आदमी बड़ी चालाकियां करता है।
तिब्बती लामा एक चाक बना लिए हैं--प्रेयर-व्हील। उसके आरों परस्पोक्स पर मंत्र लिखे हैं। उसको बैठ-बैठे घुमा देते हैं हाथ से। जैसे चरखे का चाक होता हैहाथ से घुमा दियावह कोई पचास-सौ चक्कर लगाकर रुक जाता है। वे सोचते हैं कि इतने मंत्रों का लाभ हो गयाइतनी बार मंत्र कहने का लाभ हो गया।
एक लामा मुझ से मिलने आया था। मैंने का कि तू बिलकुल पागल है! इसमें प्लग लगा दे और बिजली में जोड़ दे। यह चलता ही रहेगातू सोबैठजो तुझे करना होकर। यह भी झंझट क्यों कि इसको बार-बार हाथ से घुमाना पड़ता हैतू काम दूसरा करता है। फिर घुमायाफिर घुमाया। और जब धोखा ही देना हैतो तूने प्लग लगायाइसलिए तुझी को लाभ मिलेगाजैसे चक्कर लगाने से मिलता है। जो प्लग लगाएगा उसको मिलेगा।
हम किसको धोखा दे रहे हैं?
लोग प्रार्थनाएं कर रहे हैंलेकिन प्रार्थनाओं को कोई संबंध परमात्मा से है?
कोई मांग रहा है कि बेटा नहीं हैमिल जाए। कोई मांग रहा है कि धन नहीं हैमिल जाए। कोई मांग रहा हैअदालत में मुकदमा हैजीत जाऊं।
तुम परमात्मा की सेवा लेने गए होपरमात्मा की सेवा करने नहीं। तुम परमात्मा को भी अपना नौकर-चाकर बना लेना चाहते होतुम्हारा मुकदमा जिताएतुम्हें बच्चा पैदा करेतुम्हारे लड़के की शादी करवाए। लेकिन तुम परमात्मा को धन्यवाद देने नहीं गए हो कि तूने जो दिया है वह अपरंपार है। तुम मांगने गए हो।
जहां मांग है वहां प्रार्थना नहीं है।
इसे तुम कसौटी समझो कि जब भी तुम मांगोगेतब प्रार्थना झूठी हो गई। क्योंकि जब तुम धन मांगते हो तो धन परमात्मा से बड़ा हो गया। तुम परमात्मा का उपयोग भी धन पाने के लिए करना चाहते हो।
विवेकानंद के पिता मरे। शाहीदिल आदमी थे। बड़ा कर्ज छोड़कर गए। घर में तो कुछ भी न थाखाने को भी कुछ छोड़ नहीं गए थे। तो रामकृष्ण ने विवेकानंद को कहा कि तू परेशान मत हो। तू मां से क्यों नहीं कहतामंदिर में जा और कह देवे सब पूरा कर देंगी!
वे द्वार पर बैठ गएविवेकानंद को भीतर भेज दिया। घंटे भर बाद विवेकानंद लौटेआंख से आंसू बह रहे हैंबड़े अहोभाव में! रामकृष्ण ने कहा, "कहा?' विवेकानंद ने कहा, "अरे! वह तो मैं भूल ही गया'
फिर दूसरे दिन भेजा। फिर वही। फिर तीसरे दिन भेजा। विवेकानंद ने कहा, "यह मुझसे न हो सकेगा। मैं जाता हूं और जब खड़ा होता हूं प्रतिमा के समक्षतो मेरे दुख-सुख का कोई सवाल ही नहीं रह जाता। मैं ही नहीं रह जाता तो दुख-सुख का सवाल कहां! पेट होगा भूखालेकिन मेरा शरीर से ही संबंध टूट जाता है। और उस महिमा के सामने क्या छोटी-छोटी बातें करनी हैं! चार दिन की जिंदगी हैभूखे भी गुजार देंगे। यह शिकायत भी कोई परमात्मा से करने की है! आप मुझेपरमहंस देवअब दोबारा न भेजें। क्षमा करेंमैं न जाऊंगा'
रामकृष्ण हंसने लगे। उन्होंने कहा, "यह तेरी परीक्षा थी। मैं देखता था कि तू मांगता है या नहीं। अगर मांगता तो मेरे लिए तू व्यर्थ हो गया था। क्योंकि प्रार्थना फिर हो ही नहीं सकतीजहां मांग है। तूने नहीं मांगाबार-बार मैंने तुझे भेजा और तू हारकर लौट आया--यह खबर है इस बात की कि तेरे भीतर प्रार्थना का खुलेगा आकाश। तेरे भीतर प्रार्थना का बीज टूटेगाप्रार्थना का वृक्ष बनेगा। तेरे नीचे हजारों लोग छाया में बैठेंगे'
मांग रहे हैं लोग--मंदिरों मेंमस्जिदों मेंगुरुद्वारों मेंशिवालयों में--प्रार्थना नहीं हो रही है।
मंदिर-मस्जिद में जाता ही गलत आदमी है। जिसे प्रार्थना करनी हो तो वह कहीं भी कर लेगा। जिसे प्रार्थना करने का ढंग आ गयासलीका आ गयावह जहां है वहीं कर लेगा।
यह सारा ही संसार उसका हैउसका ही मंदिर हैउसकी ही मस्जिद है।
हर चट्टान में उसी का द्वार है!
और हर वृक्ष में उसी की खबर है!
कहां जाना है और?
"तेरे कूचे में रहकर मुझको मर मिटना गवारा है
मगर दैरो-हरम की खाक अब छानी नहीं जाती'
भक्त तो कहता हैअब क्या मंदिर और मस्जिद की खाक छानूंतेरी गली में रहकर मर जाएंगेबस पर्याप्त है।
और सभी तो गलियां उसकी हैं।
मैं यह नहीं कहा रहा हूंमंदिर मत जाना। क्योंकि मंदिर भी उसका हैचले गए तो कुछ हर्ज नहीं। लेकिन विशेष रूप से जाने की कोई जरूरत भी नहीं है। क्योंकि जहां तुम बैठे होवह जगह भी उसी की है। उससे खाली तो कुछ भी नहीं।
यह स्मरण आ जाए तो जब आंख बंद कींतभी मंदिर खुल गया;
जब हाथ जोड़े तभी मंदिर खुल गया;
जहां सिर झुकाया वहीं उसकी प्रतिमा स्थापित हो गई!
झेन फकीर इक्यू एक मंदिर में ठहरा था। रात सर्द थीबड़ी सर्द थी! तो बुद्ध की तीन प्रतिमाएं थीं लकड़ी कीउसने एक उठाकर जला दी। रात में ताप रहा था आंचमंदिर का पुजारी जग गया आवाज सुनकरऔर आग और धुआं देखकर। वह भागा हुआ आया। उसने कहा, "यह क्या किया?' देखा तो मूर्ति जला डाली है। तो वह विश्वास ही न कर सका। यह बौद्ध भिक्षु है और इसी भरोसे इसको ठहर जाने दिया मंदिर में और यह तो बड़ा नासमझ निकलानास्तिक मालूम होता है। तो बहुत गुस्से में आ गया। उसने कहा, "तूने बुद्ध की मूर्ति जला डाली है!भगवान की मूर्ति जला डाली है!'
तो इक्यू बैठा थाराख तो हो गई थीमूर्ति तो अब राख थी। उसने बड़ी एक लकड़ी उठाकर कुरेदना शुरू किया राख को। उस पुजारी ने पूछा, "अब क्या कर रहे हो?' तो उसने कहा कि मैं भगवान की अस्थियां खोजता हूं। वह पुजारी हंसने लगा। उसने कहा, "तुम बिलकुल ही पागल हो--लकड़ी की मूर्ति में कहें अस्थियां हैं'!
तो उसने कहा, "फिर ऐसा करोअभी दो मूर्तियां और हैंले लाओ। रात बहुत बाकी है और रात बड़ी सर्द हैऔर भीतर का भगवान बड़ी सर्दी अनुभव कर रहा है'
पुजारी ने तो उसे निकाल बाहर किया क्योंकि कहीं यह और न जला दे। लेकिन उस सुबह पुजारी ने देखा कि बाहर वह सड़क के किनारे बैठा है और मील का जो पत्थर लगा हैउस पर उसने दो फूल चढ़ा दिए हैं और प्रार्थना में लीन है! तो वह गया और उसने कहा कि पागल हमने बहुत देखे हैंलेकिन तुम भी गजब के पागल हो! रात मूर्ति जला दी भगवान कीअब मील के पत्थर की पूजा कर रहे हो!
उसने कहा, "जहां सिर झुकाया वहीं मूर्ति स्थापित हो जाती है'
मूर्तिमूर्ति में तो नहीं हैतुम्हारे सिर झुकाने में है। और जिस दिन तुम्हें ठीक-ठीक प्रार्थना की कला आ जाएगीउस दिन तुम मंदिर-मस्जिद न खोजोगे--उस दिन तुम जहां होओगेवहीं मंदिर-मस्जिद होगातुम्हारा मंदिरतुम्हारी मस्जिद तुम्हारे चारों तरफ चलेगीवह तुम्हारा प्रभामंडल हो जाएगा।
जहां-जहां भक्त पैर रखता हैवहीं-वहीं एक काबा और निर्मित हो जाता है। जहां भक्त बैठता हैवहां तीर्थ बन जाते हैं। तीर्थों में थोड़े ही भगवान मिलता हैजिसको भगवान मिल गया हैउसके चरण जहां पड़ जाते हैं वहीं तीर्थ बन जाते हैं। ऐसे ही पुराने तीर्थ बने हैं।
काबा के कारण काबा महत्वपूर्ण नहीं हैवह मोहम्मद से सिजदा के कारण महत्वपूर्ण हैअन्यथा पत्थर था। लेकिन किसी को सिर झुकाना आ गयाइस कारण महत्वपूर्ण है।
सारे तीर्थ इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि कभी वहां कोई भक्त हुआकभी कोई वहां मिटाकभी किसी ने अपने बूंद को वहां खोया और सौर को निमंत्रण दिया। वे याददाश्त हैं! वहां जाने से तुम्हें कुछ हो जाएगाऐसा नहीं--लेकिनअगर तुम्हें कुछ हो जाएतो तुम जहां हो वहीं तीर्थ बन जाएगाऐसा जरूर है।

पांचवां प्रश्न:लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं
तेरी शरण में बहुत कुछ पाते हैं
एक हम हैं कि तेरी महफिल में
प्यासे आते हैंप्यासे ही जाते हैं!

फिर प्यास ही न होगी। फिर अभी प्यास खयाल हैवास्तविक नहीं। अन्यथा कौन रोकता है तुम्हें पीने से?
अगर सरोवर के पास से तुम प्यासे ही लौट आओतो प्यास-प्यास ही न होगी।
जब प्यास पकड़ती है किसी को तो गंदे डबरे से भी आदमी पी लेता है। प्यास होनी चाहिए। और जब प्यास नहीं होती है तो स्वच्छ मानसरोवर भी सामने हो तो भी क्या करोगे?
प्यास की तलाश करो। खोजो। प्यास झूठी होगी।
बहुत लोगों को झूठी प्यास लग आती है। प्यास की चर्चा सुन-सुनकर प्यास तो नहीं जगतीप्यास लगनी चाहिएऐसा लोभ भीतर समा जाता है।
तुमने परमात्मा की बहुत बातें सुनी तो लगता हैपरमात्मा मिलना चाहिए। प्यास नहीं है भीतरलोभ पैदा हुआ।
तुम लोभ के कारण आते होओगेतो खाली लौट जाओगेक्योंकि यहां मैं किसी का भी लोभ पूरा करने को नहीं हूं। यहां तो लोभ छोड़ना हैमिटना हैपूरा नहीं करना है।
तुम्हारी परमात्मा की धारणा झूठी और उधार होगी। तुम्हें जीवन की परिपक्वता से परमात्मा की धारणा पैदा न हुई होगी। तुम अभी कच्चे फल हो ।
या तो आओ तो प्यास लेकर आओअन्यथा आओ ही मत। थोड़ी देर और रुको। कहीं ऐसा न हो कि मेरे शब्द तुम्हें और एक नया धोखा दे दें। प्यास का धोखा तो है ही कहीं तृप्ति का धोखा और न पैदा हो जाए। वह बड़ा खतरा है। और जिसको प्यास का धोखा हैवह एक न एक दिन तृप्ति का धोखा भी कर लेता है।
जब तुम झूठी प्यास को मान लेते हो--किसको कहता हूं मैं झूठी प्यास?
मेरे पास लोग आते हैंइतने लोग आते हैंउनमें से सौ में से निन्यानबे झूठी प्यास के होते हैं।
किसी की पत्नी मर गईपरमात्मा की खोज पर निकल जाता हैजैसे पत्नी के मरने से परमात्मा की खोज का कोई संबंध हो! दूसरी पत्नी खोजतासमझ में आती थी बात। लेकिन संस्कारसमाज! दूसरी पत्नी नहीं खोजता। खोज रहा है दूसरी की पत्नी। झुठला रहा है। बिना खोजे नहीं रह सकताएक खोज पैदा हो रही है भीतर। कामवासना प्रगाढ़ हो रही हैजग रही--लेकिन संस्कारसमाजप्रतिष्ठाबच्चेपरिवारनाम...! खोजना तो है पत्नी कोखोजता है परमात्मा को! अब वह कभी भी परमात्मा को तो पा ही ना सकेगा। बुनियाद में खोज ही गलत हो गई।
किसी का दिवाला निकल गयापरमात्मा की खोज पर चले! दिवाले से परमात्मा का क्या लेना-देना हैतुम परमात्मा को सांत्वना समझ रहे होदुख में हो तो परमात्मा को मलहम समझ रहे होतो गलत जा रहे हो।
परमात्मा की खोज तो सच्ची तभी होती है जब जीवन का अनुभव तुम्हें कह दे कि जीवन व्यर्थ है। जब पूरा जीवन व्यर्थ मालूम होजब इस जीवन की सारी सार्थकता खंडित हो जाएतुम अचानक जागो जैसे कोई स्वप्न से जाग गया और पाओ कि अब तक जो किया थावह सब व्यर्थ हुआनये से शुरुआत करनी हैनया जन्म हो--तो प्यास पैदा हो होती है।
ऐसा व्यक्ति जब भी आएगा तो तृप्त होकर जाएगा।
प्यास ही न लाए होओ तो कैसे तृप्त होकर जाओगेतृप्ति की पहली शर्त तो पूरी करो। तुम प्यास पूरी बताओतुम प्यास पूरी जगाओदूसरा काम मैं कर दूंगा। वह करना ही नहीं पड़ताइसलिए तो इतनी सुविधा से जिम्मेदारी ले रहा हूं। तुम बस पहला पूरा कर दोवह दूसरा अपने से पूरा हो जाता हैउसे कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। तुम्हारी प्यास में ही तुम्हारी तृप्ति का सागर छिपा है। इसलिए तो निश्चित भाव से कहता हूं कि दूसरा मैं कर दूंगा। इसकी गारंटी कर देता हूंक्योंकि उसमें कुछ करना ही नहीं है। मैं रहूं न रहूंकोई फर्क नहीं पड़तातुम जब भी प्यासे होओगेतृप्ति हो जाएगी।

आखिरी प्रश्न: "इश्क पर ज़ोर नहीं ये वो आतिश "गालिब'
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे!
फिर देवर्षि नारद ने प्रेम पर यह शास्त्र क्यों लिखा?

निश्चित ही प्रेम ऐसी आग है जो न तो तुम लगा सकते होन तुम बुझा सकते हो। न लगाने का कोई उपाय नहीं है। लग जाए तो बुझाने का कोई उपाय नहीं है।
स्वाभाविक प्रश्न उठता है। अगर प्रेम ऐसी आग हैअगर एक ऐसी घटना है जो अपने से घटती है और तुम्हारे किए कुछ नहीं हो सकता--तो फिर शास्त्र का प्रयोजन क्याफिर भी प्रयोजन है।
ऐसा समझो कि तुम खिड़की-द्वार-दरवाजे बंद करके अपने अंधेरे घर में बैठे होद्वार पर खड़ा है सूरजकिरणें थाप दे रही हैं,लेकिन तुम अपने दरवाजे बंद किए बैठे होतो सूरज भीतर नहीं आ पाएगा। द्वार-दरवाजे खोल दोसूरज अपने से ही भीतर आता हैउसे लाना नहीं पड़ता। तुम कोई पोटलियों में बांधकर सूरज को भीतर नहीं लाओगे। तुम कोई हांक कर सूरज को भीतर नहीं लाओगे। बुलाने की भी जरूरत न पड़ेगीआमंत्रण भी न देना पड़ेगा। इधर तुमने द्वार खोला कि सूरज भीतर आया। और अगर सूरज बाहर न हो तो सिर्फ तुम्हारे द्वार खुलने से भीतर न आ जाएगासूरज होगा तो भीतर आएगा। सूरज न होगा तो तुम कुछ भी न कर सकोगे कि सूरज भीतर आ जाए। तो एक बात तो पक्की है कि सूरज होगा तो ही भीतर आएगान होगा तो तुम द्वार-दरवाजे कितने ही खोलोइससे कुछ न होगा। लेकिन एक बात हैसूरज बाहर खड़ा हो और तुम द्वार न खोलो तो भीतर न आ सकेगा।
शास्त्र का उपयोग है कि तुम्हें द्वार-दरवाजे खोलना सिखा दे।
प्रेम तो जब घटता है घटता हैतुम्हारे घटाए न घटेगा। और तुम्हारे घटाए घट जाए तो वह प्रेम दो कौड़ी का होगावह तुमसे नीचा होगातुमसे छोटा होगा। तुम्हारे ही कृत्य तुम से बड़ा नहीं हो सकता। कोई कृत्य कर्ता से बड़ा नहीं हो सकता। उस प्रेम ही कोई कीमत नहीं है। वह तो अभिनय होगा ज्यादा से ज्यादा । प्रेम तो अपने से घटेगा। वह घटना हैहैपनिंग। लेकिन अगर तुम द्वार-दरवाजे बंद किए बैठे हो तो वह द्वार पर ही खड़ा रहेगाभीतर किरणें न आ सकेंगी।
शास्त्र का उपयोग है कि वह तुम्हें इतना ही बताए कि तुम बाधा न डालो। बाधा हटायी जा सकती हैबस फिर प्रेम तो मौजूद ही है।
भक्ति तो तुम्हें चारों तरफ से घेरे खड़ी है। झरना तो बहने को तत्पर हैएक पत्थर पड़ा है चट्टान की तरफ रुकावट डाल रहा है। चट्टान उठाने से झरना पैदा नहीं होता--झरना होगा तो चट्टान उठाने से वह उठेगाजलधार आ जाएगी। लेकिन झरना भी हो और चट्टान पड़ी होतो जलधार उपलब्ध न होगी।
निषेधात्मक है शास्त्र का उपयोगनिगेटिव है। सभी शास्त्र निषेधात्मक हैं। वे इतना ही बताते हैं कि किस-किस तरह से इंतजाम करोताकि बाधा न पड़े। जो होना हैवह तो अपने से होगा।
इसलिए तो भक्त कहते हैंजब परमात्मा मिलता है तो प्रसाद से  मिलता हैहमारे कि नहीं मिलतालेकिन जब नहीं मिलता तो हमने कुछ किया है जिसके कारण नहीं मिलता।
इसको समझ लेना।
परमात्मा को खोते तुम होजब वह मिलता है तो उसके कारण मिलता है। पाप तुम करते होपुण्य वह करता है। भूल तुमसे होती हैसुधार उससे होता है। गलत तुम जाते होऔर जब तुम ठीक जाने लगते हो तब वह जाता हैतब तुम नहीं जाते।
यही मतलब है--
"इश्क पर ज़ोर नहीं ये वो आतिश "गालिब'
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे!'
इश्क पर कोई जोर नहीं हैलेकिन चट्टानें-पत्थर इकट्ठा करना बड़ा आसान है। तुम अपने चारों तरफ अवरोध खड़े कर सकते हो कि प्रेम आ ही न सके।
यही तुमने किया है। तुमने परमात्मा के लिए रंध्र-रंध्र भी बंद कर दिए हैंकहीं से उसकी एक किरण भी तुम्हारे भीतर प्रविष्ट न हो जाए! तुम सब तरफ से परमात्मा-प्रूफ हो!
उतना ही शास्त्र का प्रयोजन है कि तुम अपने दीवाल-दरवाजे हटा दो।
परमात्मा तुम्हारा जन्म-सिद्ध अधिकार हैस्वरूप-सिद्ध अधिकार है। गंवाया है तो तुमने अपनी होशियारी से--पाओगेइस होशियारी को छोड़ देने से।
इसलिए सारा सूत्र नकारात्मक है।
किसी चिकित्सक से पूछो, "चिकित्सा शास्त्र क्या है?' तो वह कहेगा, "बीमारी का इलाज'। उससे तुम पूछो तो हजारों बीमारियों की व्याख्या कर देगालेकिन अगर स्वास्थ्य की व्याख्या पूछो तो न कर पाएगा।
स्वास्थ्य की कोई व्याख्या ही नहीं है। स्वास्थ्य तो जब होता है तब होता है--अव्याख्य है।
फिर चिकित्सक क्या करता हैवह केवल बीमारी का अवरोध हटाता है।
तुम्हें टी.बी. पकड़ जाए तो चिकित्सक स्वास्थ्य थोड़े ही लाता है--उसकी किसी दवा की गोली में स्वास्थ्य नहीं छिपा है-- सिर्फ टी.बी. को अलग करता है। टी.बी. अलग हो जाए तो स्वास्थ्य तो अपने से घटता है।
स्वास्थ्य तो तुम्हारा स्वभाव है। इसलिए तो उसे "स्वास्थ्यकहते हैं! वह "स्वका भाग है। वह तुम्हारी स्वयं की सत्ता है।
"स्वमें स्थित हो जाना स्वास्थ्य की परिभाषा है।
बीमारी तुम्हें अपने से बाहर खींच रही है कहीं। चिकित्सक तुम्हें बीमारी से छुड़ा देता हैबस। स्वास्थ्य कोई चिकित्सक नहीं दे सकता--स्वास्थ्य तो तुम लेकर ही आए हो।
ठीक शास्त्र का यही उपयोग है कि बीमारी से छुड़ा दे।
प्रेम तो अपने से घटता है।
भक्ति तो अपने से आती है
परमात्मा अपने से उतरता है।
लेकिन कोई अवरोध न रह जाए...।
तुम एक बीज बोते हो बगीचे में...बीज बोओ और उसके ऊपर एक पत्थर रख दोबीज में संभावना थीवह संभावना तुम नहीं ला सकतेवह संभावना थी हीबीज फूटता अपने सेतुम जल दे सकते थेसहारा बन सकते थेतुम पत्थर हटा सकते थे,अवरोध अलग कर सकते थे: बीज वृक्ष बनताफूल आतेफल लगतेछाया होतीसौंदर्य का जन्म होता--वह सब अपने से होता।
तुम कोई बीज से वृक्ष को खींच नहीं सकते। तुम कोई जबरदस्ती फूलों को खिला नहीं सकते। तुम जबरदस्ती वृक्ष से फलों को निकाल नहीं सकते। लेकिन तुम चाहो तो रोक सकते हो।
मनुष्य की सामर्थ्य इतनी ही है कि वह जो हो सकता हैउसे रोक सकता हैजो होना चाहिएउसे कर नहीं सकता।
मनुष्य भटक सकता है--यह उसकी सामर्थ्य है। गलत होने की सामर्थ्य मनुष्य में है। ठीक: बस वह गलत होने की सामर्थ्य को छोड़ दे कि ठीक अपने से हो जाता है।
ठीक होना प्रकृतिदत्त हैस्वाभाविक हैगलत होना चेष्टा से है।
प्रयत्न से हम पाप करते हैंजो निष्प्रयत्न होता हैवह पुण्य है।
प्रयास से हम संसार बनाते हैंजो बिना प्रयास केप्रसाद से मिलता हैवही परमात्मा है।

आज इतना ही।

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