शनिवार, 9 सितंबर 2017

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-10

परम मुक्ति है भक्ति
दिनांक २० जनवरी१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

पहला प्रश्न: मुझे कभी लगता है कि मैंने आपसे बहुत-बहुत पाया और कभी यह भी कि मैं आपसे बहुत चूक रहा हूं। ऐसा क्यों है?

जितना ज्यादा पाओगे उतना ही लगेगा कि चूक रहे हो। जितनी होगी तृप्तिउतनी ही और बड़ी तृप्ति की आकांक्षा जगेगी।
प्यासे को जब पहली घूंट जल कीगले से उतरती है तो पहली दफ प्यास का पूरा-पूरा पता चलता है। प्यास का पता चलने के लिए भी जल की थोड़ी जरूरत है।
और परमात्मा की खोज तो ऐसी है कि शुरू होती हैपूरी नहीं होती। पूरी हो जाए तपो परमात्मा सीमित हो गयाअसीम न रहा। पूरी हो जाए तो परमात्मा का भी अंत आ गयापरिधि आ गईसीमांत आ गया।
इसीलिए तो परमात्मा निराकार हैतुम उसे चुका न पाओगे। तुम चूक जाओगेपरमात्मा न चुकेगा। उतरोगे सागर में जरूर,दूसरा किनारा कभी न आएगा। दूसरा किनारा है ही नहीं। यही तो अर्थ है विराट का। अगर तुम दूसरा किनारा भी छू लोफिर विराट कैसा विराट रहा! जो तुम्हारी मुट्ठी में आ जाए वह तो तुमसे भी छोटा हो जाएगा। जो तुम्हारे गले में तृप्ति बन जाए,उसकी सामर्थ्य तुम्हारे गले की सामर्थ्य से त्यादा न रह जाएगी।
तो ये दोनों घटनाएं साथ-साथ घटेंगी। तृप्ति भी मालूम होगीगहन तृप्ति मालूम होगी और अतृप्ति मिटेगी नहीं। यही तो खोजी की व्याकुजता है: सरोवर के तट पर खड़ा हैडुबकियां लेता हैजलधार बरसती हैप्यास बुझती भी लगती हैबुझती भी नहीं;प्यास बुझती भी है और बढ़ती भी है। साथ-साथ ऐसा विरोधाभास घटता है।
तुम्हारी अड़चन मैं समझता हूं। अगर प्यासे ही रहे और तुम्हें मुझसे कुछ भी न मिले तो भी तर्क को समझ में आ जाएबात खत्म हो गई। यह मंदिर तुम्हारे लिए नहीं फिरकहीं और खोजना होगा। यह द्वार तुम्हारे लिए नहीं फिरकहीं और खोजना होगा। यह सरोवर तुम्हारे कंठ से मेल नहीं खाताकहीं और खोजना होगा। तो बात साफ हो जाती है।
यातृप्ति हो जाएप्यास बिलकुल खो जाएतो भी हल हो जाता है। हल इतना आसान नहीं है। और हल हो तो दुर्भाग्य है,सौभाग्य नहीं है। क्योंकि अगर तुम्हारी प्यास बिलकुल ही मिट जाए तो तुम्हारे जीवन का अर्थ भी खो गया। फिर जीवन में सार क्या होगाफिर जीवन में गीत के अंकुरण कैसे होंगेफिर नाचोगे कैसे?
ध्यान रखनान तो अतृप्त नाच सकता हैक्योंकि नाचने का कोई कारण नहीं। अतृप्त रो सकता हैशिकायत कर सकता है;नाचेगा कैसेतृप्त भी नहीं नाच सकताक्योंकि फिर नाचने का कोई कारण न रहा। अतृप्ति और तृप्ति के बीच में एक पड़ाव हैवहां नृत्य हैवहां आनंद का आविर्भाव है।
और जब तुम समझोगे धीरे-धीरेतो तुम जल के लिए ही परमात्मा को धन्यवाद न दोगेप्यास के लिए भी धन्यवाद दोगे। तब तुम प्रार्थना करोगे कि जल भी बरसाते जाना और प्यास भी बढ़ाते जाना।
इन दोनों के मध्य में जीवन है। इन दोनों के मध्य में जीवन का संतुलन हैजीवन की ऊंचाइयां हैंगहराइयां हैं।
अगर जीवन में विरोधाभास न हो तो जीवन मुर्दा हो जाता है--इस किनारे या उस किनारे। धार तो जीवन की मध्य में है--न इस किनारे न उस किनारे।  तो इस किनारे से तो तुम्हारी नाव छुड़ा लूंगा। इसलिए थोड़ी तृप्ति होती मालूम पड़ेगी। अतृप्ति का किनारा दूर हटता जाएगा और तृप्ति का किनारा पास नहीं आएगा। मंझधार में पड़ जाओगे। और जिसने मंझधार में जीना सीखाउसी ने परमात्मा में जीने की कला जानी।
किनारे का मोह भय के कारण है। तृप्ति की आकांक्षा भी मुर्दादिली का हस्सा है। वह कोई जिंदादिलों की बात नहीं है। जिंदादिल आग चाहते हैंवर्षा भी चाहते हैं--वर्षा ऐसी चाहते हैं कि कैसी भी आग हो तो मिट जाएऔर आग ऐसी चाहते हैं कि कैसी भी वर्षा हो तो न बुझ पाए। इन दोनों के बीच में जिसने जीना सीखाउसी ने जीना जाना।
ठीक पूछते हो। कभी लगेगाबहुत कुछ पाया और कभी लगेगासब चूके जा रहे हो। और इन दोनों में विरोध मत देखना। ये दोनों बातें मैं एक साथ ही कर रहा हूं। ये दोनों बातें एक साथ ही होनी चाहिए।
तुम्हारी अड़चन भी मैं समझता हूंक्योंकि तुम चाहते हो: निपटारा होइस पार कि उस पार। या तो सिद्ध हो जाए कि तृप्ति होती ही नहींअतृप्ति ही भाग्य हैअतृप्ति ही नियत्ति है तो ठीक हैउससे ही राजी हो जाएंसांत्वना कर लेंअपने घर बैठ जाएंफिर किसी यात्रा पर जाना नहींजड़ हो जाएंऔर या फिर पक्का हो जाए कि तृप्ति पूरी हो जाती--तो या तो अतृप्ति पर ठहर जाएं या तृप्ति पर ठहर जाएं!
ठहर जाने का तुम्हारा मन है। और परमात्मा चाहता है: तुम चलते ही रहोचलते ही रहोक्योंकि चलना जीवन है!
कब तुम्हें दिखाई पड़ेगा चलने का सौंदर्य--चलते जाने का सौंदर्य?
रोज नये-नये अभियान उठें!
रोज नये शिखरों का दर्शन हो!
हांपैर में बल मिलता जाए!
यात्रा से थकान न मिले!
पैर में बल मिलता जाए और नये शिखर उभरते चले आएं!
जिन्होंने भी परमात्मा को जानावे मुर्दा नहीं हो गए हैं। उनके जीवन में पहली दफा वास्तविक जीवन की ऊर्जा का आविर्भाव हुआ है।
पर तुम इसे न समझ पाओगेक्योंकि तुम्हारे गणित में बड़ी छोटी-छोटी बातें हैं। तुम्हारा गणित ही बड़ा छोटा है। तुम हिसाब ही कौड़ियों का कर रहे हो और यहां हीरे बरस रहे हैं। तुम हिसाब कौड़ियों का कर रहे हो और तुम्हें कौड़ियां दिखाई नहीं पड़तींतुम बड़ी मुश्किल में पड़ जाते हो।
परमात्मा को क्या लेना-देना कौड़ियों से?
सिक्के मत मांगो--तृप्ति के या अतृप्ति के!
जीवन की क्रांति मांगो!
जीवन की चुनौती मांगो!
जीवन का अभियान मांगो!
हांशक्ति दे और नये शिखर दे!
पैरों में बल दे और कभी ऐसी घड़ी न आए कि चलने को कोई स्थान न रह जाए!
नये तल चैतन्य के छूते चलो!
आगे ही आगे जाना है!
तुम कहोगेहम तो यही सोचते थे कि जल्दी ही पड़ावआ जाएगाकहीं रुक जाएंगे।
तुम्हारी रुकने की इतनी आकांक्षा क्यों है?
तुम्हारी रुकने की आकांक्षा में ही ईश्वर का विरोध छिपा है!
ईश्वर अब तक नहीं रुकातुम रुकना चाहते हो!
ईश्वर अभी भी बीज में अंकुर तोड़ेगावृक्ष में फूल लगाएगा।
अभी भी तारे बनाए चला जाता है नये!
अभी भी झरने बहाए चला जाता है!
अभी भी मेघ बनेंगे और बरसेंगे!
ईश्वर थका नहींचलता चला जाता है!
जो सदा चलता चला जाता है--सदासदैव--उसी को तो हम ईश्वर कहते हैं। जो थक जाता हैचुक जाता हैजिसकी सीमा आ जाती है--वही तो मन हैजो जल्दी ही बैठ जाना चाहता हैजो कहता है: बसबहुत हो गया...!
इस सीमा को तोड़ो!
परमात्मा के साथ चलना हो तो अनंत की यात्रा है। और जिस दिन तुम्हें यह समझ में आएगाउस दिन तुम पाओगे: मंजिल नहीं हैयात्रा ही मंजिल हैहर कदम मंजिल है। तब तुम आनंद से नाचोगे भीअहोभाव से गीत भी गाओगेलेकिन बैठकर मुर्दा चट्टान की तरह न हो जाओगेचलते ही रहोगे।
और-और नये फूल लगने हैं तुम में अभी!
तुम्हें अपनी ही सम्भावनाओं का कुछ पता नहीं। तुम्हें अपने ही होने का कुछ पता नहीं कि तुम कितने हो सकते हो!
"एक मौज मचल जाए तो तूफां बन जाए!'
एक छोटी-सी लहर भीअगर मचल जए...
"एक छोटी-सी लहर भीअगर मचल जाए'...क्योंकि छोटी-सी लहर में सागर भी छिपा है।
"एक फूल अगर चाहे गुलिस्तां बन जाए!'
 एक छोटा-सा फूल सारी पृथ्वी को फूलों से भर सकता है।
एक बीज सारी पृथ्वी को हरा कर सकता हैफैलता चला जाए...एक बीज में करोड़ बीज लगते हैंकरोड़ों बीजों में और करोड़ों बीज लगेंगे!
एक बीज मिल जाए पृथ्वी को तो सारी पृथ्वी हरी हो सकती है।
"एक मौज मचल जाए तो तूफां बन जाए
एक फूल अगर चाहे तो गुलिस्तां बन जाए।
एक खून के कतरे में है तासीर इतनी
एक कौम की तारीख का उनमां बन जाए'!
एक छोटे से खून के कतरे में इतना छिपा है कि एक पूरी जाति के जीवन का शीर्षक बन जाएइतिहास का शीर्षक बन जाए।
तुम्हें अपने होने का पता नहींतुम कौन हो! तुमने जहां अपने को पाया हैवह तुम्हारे भवन की सीढ़ियां हैंतुम अपने भवन में अभी प्रविष्ट भी नहीं हुए। तुम जहां ठहर गए होवहां तो द्वार भी नहीं हैसीढ़ियां ही हैंतुमने भवन में प्रवेश भी नहीं किया।
तुम इस किनारे पर बैठ गए होजिसको तुम संसार कहते हो। और अगर कभी तुम्हें कोई जगा देता है इस किनारे से--ऐसे तो तुम जागते नहीं आसानी सेऐसे तो तुम बड़ी बाधाएं डालते होऐसे तो तुम चेष्टा करते होहर उपाय करते हो कि तुम्हारी नींद न टूट जाए--जो तुम्हारी नींद तोड़ता है वह दुश्मन जैसा मालूम पड़ता है।
लेकिन बुद्ध और क्राइस्ट और कृष्ण जैसे लोग तुम्हारे पीदे पड़े ही रहेंतो तुम आंख खोलते हो। तो तत्क्षण तुम पूछते हो कि दूसरा किनारा कितनी दूर हैताकि तुम उस किनारे सो जाओ। यहां से तुम हटाए जाओ तो जल्दी ही तुम दूसरे किनारे को यही किनारा बना लेना चाहते हो। जड़ होने की तुम्हारी आदत बड़ी गहरी है।
जड़ता का मोह मंजिल की तलाश है।
चैतन्य तो प्रवाह हैयात्रा है। चैतन्य की कोई मंजिल नहीं।
पत्थर ठहर जाता है;
फूल कैसे ठहरे!
फूल को तो जाना हैऔर होना है!
फूल को तो करोड़ फूल होना हैअरब फूल होना है!
एक फूल को तो सारे विश्व पर फैल जाना है!
फूल रुके कैसे!
फूल एक यात्रा हैमंजिल नहीं।
पत्थर पड़ा है!
फूल खिलते हैंमुरझा जाते हैं;
आते हैंजाते हैं;
रुकते हैं क्षण-भर पत्थर के पासफिर यात्रा पर निकल जाते हैं!
पत्थर अपनी जगह पड़ा है!
यह जड़ता ही सांसारिक मन है।
तुमसे इस किनारे को छुड़ाने का सवाल नहीं हैतुमसे किनारा ही छुड़ाने का सवाल है।
इसे मुझे दोहराने दो।
इस किनारे को छुड़ाने का सवाल नहीं है। तुमसे दुकान नहीं छुड़ानी हैक्योंकि तुम मकान छोड़ दोगे तो मंदिर पकड़ लोगे। तुम खाता-बही छोड़ दोगे तो तुम वेद-कुरान-गीता पकड़ लोगे। तुमसे यह नहीं छुड़ाना हैनहीं तो तुम वह पकड़ लोगे। तुमसे पकड़ छुड़ानी है। तुमसे किनारा नहीं छुड़ाना हैतुम्हारी जड़ता छुड़ानी है यह बैठ जाने का ढंग छुड़ाना है--
ताकि तुम्हें प्रवाह होना आ जाए!
ताकि तुम गत्यात्मक हो जाओ!
ताकि बहने में ही तुम्हारी मंजिल हो!
रुकना तुम भूल जाओ!
तुम चलते ही रहो!
धीरे-धीरे अगर तुम ठीक से चलने की कला सीख जाओ तो तुम मिट जाओगेचलना ही रह जाएगा। तुम भी इसीलिए हो,क्योंकि तुम बैठ जाते हो।
इसे कभी तुमने खयाल कियातुम कभी तेजी से दौड़ेअगर तुम तेजी से दौड़ो तो तुम मिट जाते होदौड़ना रह जाता है।
तुम कभी परिपूर्ण रूप से नाचेअगर तुम समग्रता से नाच उठो तो तुम मिट जाते होनाच रह जाता है।
जब भी तुम गत्यात्मक होते हो, "डायनेमिकहोते होतब तुम्हारा अहंकार मिट जाता है।
जहां तुम बैठे कि अहंकार आया।
जहां तुम रुके कि अहंकार आया।
जहां तुमने किनारा पकड़ा कि अहंकार आया।
जहां तुमने कहा कि बस आ गएकि अहंकार आया।
जीवन अगर तुम्हारा पूरा गत्यात्मक हो और तुम बैठने की आदत छोड़ जाओ...अगर तुम कभी बैठो भी इसीलिए कि चलने की तैयारी करते हो।
कभी-कभी बीज भी विश्राम करता हैबसंत की प्रतीक्षा करता हैमहीनों पड़ा रहता है। जब बीज विश्राम करता है तो कंकड़-पत्थर में और बीज में फर्क करना मुश्किल होगा--लेकिन फर्क तो है।
कंकड़-पत्थर विश्राम ही करते हैंकहीं जाते नहीं। बीज कहीं जाने के लिए तैयारी कर रहा हैसाज-सामान जुटा रहा हैठीक समय और अनुकूल अवसर की बाट जोह रहा हैजाने को तत्पर है।
जैसे कभी दौड़ की प्रतियोगिता में तुमने देखा होदौड़नेवाले लोग खड़े हाते हैं लकीर परलेकिन खड़े नहीं हातेभागे-खड़े हाते हैं। घण्टी बजेगी या विसिल बजेगीऔर वे दौड़ पड़ेंगे। बिलकुल तत्पर होते हैं! अगर तुम उन्हें देखो तो तुम यह न कह सकोगे कि वे खड़े हैं। तुम कहोगेवे अब गएअब गए! वे प्रतीक्षा में हैंरोआं-रोआं तैयार हैक्योंकि एक क्षण भी चूकना खतरनाक है।
फूल और कंकड़ जब पास रखे हों तब भी फूल का जो बीज है वह ऐसे ही खड़ा है जैसे दौड़ाकया तैराक तैरने के लिए तत्पर होंसिर्फ प्रतीक्षा है ठीक मुहूर्त कीऔर दौड़ जाएंगे। कंकड़ वहीं पड़ा रह जाएगाबीज यात्रा पर निकल जाएगा।
तुम अगर कभी रुको भी तो सिर्फ थकान मिटा लेने को। कोई पड़ाव तुम्हारी मंजिल न बने! रातभर रुके और सुबह चल पड़े। यह जीवंत धारा ही परमात्मा का अनुभव है।
तो अगर तुम्हें मुझे ठीक-ठीक समझना हो तो तुम तृप्ति और अतृप्ति के संयम में और संयोग में और संगीत में ही समझ पाओगे। मैं तुम्हें तृप्ति भी दूंगा...तुम्हारे पुराने दुख छिनेंगेतुम्हें नये दुख भी दूंगा। तुम्हारी पूरी पुरानी पीड़ाएं गिर जाएंगी। तुम्हें नये दर्द भी दूंगाताकि तुम उन नये दर्दों को मिटाने में और नये-नये कदम उठाओ।
परमात्मा प्राप्ति नहीं अकेलीपीड़ा भी है। जिसने ऐसा जानाउसके लिए हर कदम मंजिल हो जाता है।
और तुम अगर गौर से देखोगे तो तुम परमात्मा को हर जगह गत्यात्मक पाओगे। लेकिन तुमने झूठे परमात्मा खड़े किए हैं। मंदिरों में पत्थरों की मूर्तियां बना ली हैंवे ठहरी हैं वहीं की वहीं। उनसे तो तुम्हीं थोड़े ज्यादा परमात्मा हो। चलते तो होउठते-डोलते तो होतुम्हारे जीवन में कुछ गीत तो है--सुबह कहींसांझ कहीं! मंदिर का तुम्हारा भगवान तो वहीं का वहीं पड़ा है।
अच्छा हो कि तुम फूलों को पूजो! लेकिन तुम उलटे आदमी हो। तुम जिंदा  फूलों को तोड़कर मुर्दा परमात्माओं के चरणों में रख आते हो। इससे तो अच्छा होता कि अपने मुर्दा परमात्मा को उठा कर फूलों के चरणों में रख देते।
गति को पूजोअगति को नहीं!
अगति जड़ता है।
प्रवाह को पूजोपत्थरों को नहीं!
लेकिन पत्थर से तुम्हारा रास बैठ जाता हैक्योंकि तुम जड़ हो। तुमने अकारण ही पत्थर के भगवान नहीं बना लिए हैंवे तुम्हारी जड़ता के सूचक हैंसबूत हैं। तुमने अपनी ही छवि में उनको ढाल लिया है। तुमने अपनी ही प्रतिमाएं गढ़ जी हैं--तुमसे भी ज्यादा मुर्दा!
थोड़ा पहचानो! थोड़ा जागो!
गत्यात्मक को पूजो!
देखो! चांद चलता हैसूरज चलता हैतारे चलते हैं। कुछ ठहरा हुआ नहीं है!
इस जीवन को अगर तुम गौर से देखोगे तो कुछ ठहरी हुई कोई भी चीज न पाओगे। यहां सब चल रहा है।
तुम इतनी जल्दी में क्यों हो ठहर जाने की?
यह ठहर जाने की आकांक्षा आत्मघाती हैसुसाइडज है। तुम मरना चाहते हो।
जियो! हिम्मत करो जीने की! और जितनी तुम्हारी हिम्मत बढ़ेगी जीने की उतना बड़ा जीवन तुम्हें उपलब्ध होगा--उसका अर्थ है,उतनी बड़ी चुनौती आएगीउतनी पीड़ा उतरेगीउतने बड़े पहाड़ों को चढ़ने का अवसर मिलेगा।
और यह अवसर कभी समाप्त नहीं होता। यह समाप्त हो जाता तो दुर्भाग्य था। क्योंकि अगर ऐसी घड़ी आ जाए जहां तुम उस किनारे को पा लो तो फिर क्या करोगे?
बर्ट्रेंड रसेल ने मजाक में ही कहीं कहा है कि मैं हिंदुओ के मोक्ष से डरता हूं: "सब पा लिया!फिरफिर क्या करोगे?
रसेल गत्यात्मक व्यक्ति थामुर्दा परमात्मा सेमुर्दा मोक्ष से डरेस्वाभाविक है।
मोक्ष लेकिन मुर्दा नहीं है। जिन्होंने मोक्ष को मुर्दा बना लिया वे खुद मुर्दा होंगेतो उन्होंने अपनी प्रतिछवि आरोपित कर ली है।
सागर की लहरें टकराती ही रहती हैं--अनंत काल सेअनंत काल तक। ऐसे ही चैतन्य का सागर लहराता ही रहता है।
बुद्ध ने तो कहा, "हैशब्द झूठा है। तुम कहते होनदी है। बुद्ध कहते हैंनदी हो रही हैबह रही हैहै नहीं। "हैशब्द झूठा है। तुम कहते होवृक्ष है। जब तुमने कहावृक्ष हैतभी वृक्ष में कुछ नयी कोंपलें आ गईंकुछ पुराने पत्ते झड़ गए। तुम्हारे कहते-कहते ही तुम्हारा वक्तव्य झूठा हो गयावृक्ष थोड़ा ऊपर छलांग लगा गयानयी जड़ें फूट आईं।
"हैकी अवस्था में ही तो कुछ भी नहीं है। ठहरा हुआ तो कुछ भी नहीं है।
तुम घड़ीभर मुझे सुनोगेघड़ीभर बूढ़े हो गए। आए थेतुम वैसे ही वापस न जाओगे। चाहे तुम न समझ पाओलेकिन गंगा बहुत बह गई! सब बदल गया! तुम ही नहीं बदल रहे होसारा संसार बदल रहा है।
गति जीवन है। और परमात्मा महाजीवन है तो महागति है ।
तो मैं तुम्हें भी तृप्ति दूंगाइसीलिए ताकि तुम्हें और अतृप्ति दे सकूं। मैं तुमसे क्षुद्र की तृप्ति छीन लूंगा और विराट की अतृप्ति दूंगा। मैं तुमसे व्यर्थ की तृप्ति और व्यर्थ की अतृप्ति छीन लूंगाऔर सार्थक की तृप्ति और सार्थक की अतृप्ति दूंगा। संसार के दुख तुमसे छीन लिए जाएंगेतुम्हें परमात्मा की पीड़ा दूंगा।
पीड़ा भी ठीक और गलत होती है।
एक आदमी रो रहा हैउसका एक रुपया खो गया हैयह क्षुद्र की पीड़ा है। यह हो तो भी ठीक नहीं। इसका रुपया भी मिल जाए तो भी क्या तृप्ति मिलनेवाली है! क्षुद्र की ही पीड़ा थीक्षुद्र की ही तृप्ति होगी। यह अभागा आदमी है। रुपया खो गया है,इसलिए रो रहा है। फिर किसी को समझ में आई कि मैं खुद ही खो गया हूंमेरा ही कुछ पता नहीं चलताकहां हूं। "कहां हूं'--अपने को खोजने लगा। बड़ी पीड़ा उठेगी। रुपये की पीड़ा बहुत बड़ी न थीकोई भी हल कर देताराह चलता कोई भी राहगीर एक रुपया दया करके दे देता। अब एक ऐसी पीड़ा उठी तुम्हजो कोई भी हल न कर पाएगा। अब एक ऐसी पीड़ा उठी जो तुम्हें ही हल करनी पड़ेगी। संसार का कोई सिक्का इसे हल न कर पाएगा। फिर किसी दिन इसकी भी झलक मिलनी शुरू हो जाती है कि मैं कौन हूं। तब एक और नयी पीड़ा उठती है कि यह विराट क्या है! अपने को जान लियाइतने से क्या होगा--यह बड़ा सागर क्या है! बूंद की पहचान से क्या होगा! अभी बूंद को जान भी न पाए थे कि सागर की जिज्ञासा उठने लगी। अभी बूंद को पहचान भी न पाए थे कि सागर ने द्वार पर दस्तक दी कि बैठ मत जाना।
और मैं तुमसे कहता हूं: और भी बड़े सागर हैं। एक को चुकाओगेदूसरा द्वार खुलेगा। एक द्वार निपटता नहीं कि नए द्वार खुल जाते हैं।
तो मेरे साथ तो केवल वे ही चल सकते हैंतो तृप्ति और अतृप्ति दोनों को साथ-साथ लेने को तैयार हैंजो मंझधार में जीने को तैयार है। और इसे ही मैं परमात्मा-जीवन कहता हूं। ऐसे जीवन के धारक को ही मैं संन्यस्त कहता हूं। तुम उसे तृप्ति पाओगेऔर जहां तक उसे आत्यंतिक कीअंतिम की पुकार हैतुम उसे बड़ा अतृप्त पाओगे। एक दिव्य असंतोष उसमें तुम जलता हुआ पाओगे। संसार की तरफ से तुम उसमें पाओगे: बड़ी तृप्तिसब मिला हुआ है! और परमात्मा की तरफ से पाओगे: बड़ी अतृप्तिकुछ भी मिला हुआ नहीं है!
इसलिए तुम्हें दोनों बातें लगेंगी। कभी लगेगाबहुत-बहुत पाया मेरे पासऔर कभी लगेगाबहुत-बहुत चूके। दोनों ही ठीक है। और तुम दोनों के साथ ही राजी रहनातो ही मेरे साथमेरे हाथ में हाथ डालकर चल सकोगे।

दूसरा प्रश्न: आपने कहा...तब पाओगे कि भक्त ही भगवान है। प्रश्न उठता है कि एक भक्त भगवान होना पसंद करे और दूसरा सिर्फ भक्त रहना चाहेतो दोनों में श्रेष्ठ कौन है?

जो भगवान होना चाहेख वह तो हो न पाएगा। और जो भक्त ही रहना चाहे वह भगवान हो जाएगा। श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ का सवाल नहीं उठताक्योंकि एक ही हो पाएगा। जो नहीं होना चाहता वही हो पाएगा। जो होना चाहता हैवह तो वंचित रह जाएगा। वह तो चाह भी अहंकार की ही है।
लेकिन मामला थोड़ा नाजुक है।
कभी-कभी ऐसा होता है कि विनम्रता भी अहंकार की ही होती है। कहीं तुम्हारी विनम्र्रता भी अहंकार की ही न हो। कहीं तुम इसलिए ही न कर रहे होओ कि मैं नहीं होना चाहताक्योंकि तुम जानते हो कि जो इनकार करते हैं वही हो पाते हैं। तो तुम चालाक हो। तो तुम्हारी विनम्रता व्यभिचारी है। तो तुम्हारी विनम्रता शुद्ध नहींपवित्र नहींकुंआरी नहींवेश्या जैसी है।
जो भगवान होना चाहता हैजिसका यह अहंकार है कि मुझे भगवान होना हैवह तो पा नहीं सकेगा। लेकिन जो इसलिए विनम्र हो जाता है कि यही तरकीब है भगवान होने हीवह भी न पा सकेगा।
और तब एक और जाल की बात हैवही भी समझ लेनी चाहिए। यह भी हो सकता हैजैसे कि विनम्र छिपाए हुए अहंकार हो सकता है। अहंकारी के भीतर छिपी हुई विनम्रता भी हो सकती है। कोई बड़ी सहजता से भी कह सकता है कि मैं भगवान होना चाहता हूंइसमें "मैंकी कोई बात ही न हो। यह जरा कठिन है समझना। इसमें "मैंका कोई भाव ही न होइसमें शुद्ध पुकार हो अस्तित्व कीयह सीधी-सीधी बात होइसमें कहीं "मैंका कोई सवाल ही न होइसमें ऐसे ही हो कि मैं चाहता हूं कि मुझमें भगवान होयह इतना ही हो कि मैं इससे कम पर राजी नहीं हो सकता, "सब डुबाने को तैयार हूंसब गंवाने को तैयार हूं,लेकिन जब तक भगवान की मेरे हृदय में वास न करेजब तक वही मुझे भर न देतब तक चैन नहीं'
यह बड़ी गहरी प्यास हो सकती हैयह अहंकार हो ही न...।
मैं तुमसे यह कह रहा हूं कि अहंकार न हो तो ही भक्त भगवान हो पाता है। प्रगट-अप्रगट का सवाल नहीं है--वास्तविक विनम्रता हो।
कभी-कभी ऊपर से शब्द तो अहंकार के दिखाई पड़ते हैंभीतर बड़ी विनम्रता होती है। और कभी-कभी ऊपर से शब्द तो बड़ी विनम्रता के होते हैंभीतर बड़ा अहंकार होता है।
इसे तुम भलीभांति खोज ले सकते हो अपने भीतर। दूसरे का कोई प्रयोजन भी नहीं है। अपने भीतर तो तुम जान सकते हो कि तुम्हारी विनम्रता अहंकार का ही आभूषण तो नहीं हैया तुम्हारा अहंकार केवल वक्तव्य की ही बात हो!
कृष्ण ने अर्जुन से कहा, "मामेकं शरणं व्रज! तू मेरी शरण आ'। उस क्षण मेंकृष्ण में "मैंजैसा कुछ भी नहीं था--"मैंथा ही नहीं। यह केवल वक्तव्य की बात थीभाषा की बात थी। कृष्ण के भीतर से परमात्मा बोला, "मैंकुछ भी न था वहां।
कभी तुम कहते हो, "मैं तो कुछ भी नहींआपके पैरों की धूल हूं'। लेकिन जरा गौर करना। जिससे तुम कह रहे होवह अगर मान ले कि बिलकुल ठीक कह रहे हैं आपयह तो मैं पहले ही से जानता हूं कि आप कुछ भी नहींपैरों की धूल हैंतब एक धक्का लगेगा छाती में कि अरे! चाट लगेगी। अहंकार पीड़ित हो उठेगाफुफकार उठेगा। तुम इस आदमी को कभी माफ नहीं कर पाओगे। क्योंकि यह जो कह रहा थावह इसका प्रयोजन न था। यह तो असल में यह कह रहा था कि तुम कहो कि "अरे आप,और पैर की धूल! आप तो सिर के ताज हैं!यह कहलवाने के लिए कह रहा था। यह चालाक है। यह होशियार है। यह गणित समझता है।
तो तुम अपने भीतर जानना। दूसरे से कोई प्रयोजन भी नहीं है। दूसरे को ठीक-ठीक समझ भी न पाओगेक्योंकि दूसरे के शब्द ही सुनाई पड़ेंगे। उसके भीतर क्या घट रहा हैतुम कैसे जानोगेलेकिन तुम अपने भीतर तो जांच कर ही ले सकते हो।
अगर तुम्हारी विनम्रता वास्तविक हैतो "मैंकी उदघोषणा भी उसे मिटा न सकेगी। और अगर तुम्हारा अहंकार प्रगाढ़ है तो "मैं आपके पैरों की धूल हूं', इस तरह का वक्तव्य उसे नष्ट न कर सकेगा।
लेकिन भगवान वही हो पाते हैं जो "नहींहो जाते हैं।
और दोनों में कौन श्रेष्ठ हैयह तो पूछना ही मत। क्योंकि दोनों कभी पहुंच ही नहीं पाते। एक ही पहुंचता है। वही पहुंचता है जिसकी विनम्रता प्रामाणिक है। और प्रामाणिक विनम्रता का भाषा से कोई संबंध नहीं। प्रामाणिक विनम्रता का हृदय से संबंध है,तुम्हारी अंतरानुभूति से संबंध है,
"सूरते-नक्शे-रहगुज़र आजिजी इख्तियार कर
अर्श की रफअतों पै गर तुझको मुकाम चाहिए'
अगर आकाश की ऊंचाइयों पर अपना मुकाम बनाना हो तो पदचिह्मों की भांति विनम्र हो जा। लेकिन ध्यान रखनाइसीलिए मत पदचिह्मों की भांति विनम्र हो जाना कि आकाश पर मुकाम चाहिएनहीं तो चूक जाओगे। आकाश पर मुकाम चाहने की तो बात ही न हो। पृथ्वी पर पदचिह्मों की भांति हो जानाआकाश पर मुकाम अपने से हो जाता है।
जो मिट जाते हैंवे हो जाते हैं। जो अपने को छोड़ देते हैंवे बच जाते हैं। मृत्यु यहां जीवन का सूत्र है और मिट जाना पा लेने की कला है।

तीसरा प्रश्न: "भक्त्या अनुवृत्याऐसा कहा हैतो भक्ति साकार ही होनी चाहिए। सूर्य सूर्यलोक में साकार ही हैवैसे ही भगवान भी साकार क्यों नहीं?

किसने कहाभगवान साकार नहीं है?
सभी आकार उसी के हैं। भगवान का कोई आकार नहीं है। तुम भगवान का आकार खोज रहे होइसलिए सवाल उठता है कि भगवान साकार क्यों नहीं।
वृक्ष में भगवान वृक्ष हैपक्षी में पक्षी हैझरने में झरना हैआदमी में इादमी हैपत्थर में पत्थर हैफूल में फूल है। तुम भगवान का आकार खोज रहे होतो चूकते चले जाओगे।
सभी आकार जिसके हैंउसका अपना कोई आकार नहीं हो सकता। अब यह बड़े मजे की बात है। इसका अर्थ हुआ कि सभी आकार जिसके हैंवह स्वयं निराकार ही हो सकता है। यह जरा उलटी लगती है बातसभी आकार जिसके हैं वह निराकार!
सभी नाम जिसके हैं उसका अपना नाम कैसे होगाजिसका अपना नाम है उसके सभी नाम नहीं हो सकते। सभी रूपों से जो झलका है उसका अपना रूप नहीं हो सकता। जो सब जगह है उसे एक जगह खोजने की कोशिश करोगे तो चूक जाओगे। सब जगह होने का एक ही ढंग है कि वह कहीं भी न हो। अगर कहीं होगा तो सब जगह न हो सकेगा। कहीं होने का अर्थ है: सीमा होगी। सब जगह होने का अर्थ है: कोई सीमा न होगी।
तो परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है। परमात्मा सभी के भीतर बहती जीवन की धार है। वृक्ष में हरे रंग की धार है जीवन की! वृक्ष आकाश की तरफ उठ रहा है--वह उठान परमात्मा है। वृक्ष छिपे हुए बीज से प्रगट हो रहा है--वह प्रगट होना परमात्मा है।
परमात्मा अस्तित्व का नाम है।
परमात्मा ऐसा नहीं है जैसे पत्थर है। परमात्मा ऐसे नहीं है जैसे तुम हो। परमात्मा ऐसा नहीं जैसे कि चांदत्तारे हैं। परमात्मा किसी जैसा नहींक्योंकि फिर सीमा हो जाएगी।
अगर परमात्मा तुम जैसा होपुरुष जैसा होतो फिर स्त्री में कौन होगास्त्री जैसा हो तो पुरुष वंचित रहा जाएगा। मनुष्य जैसा हो तो पशुओं में कौन होगाऔर पशुओं जैसा हो तो पौधों में कौन होगा?
इसे समझने की कोशिश करो।
परमात्मा जीवन का विशाल सागर है। हम सब उसके रूप हैंतरगें हैं। हमारे हजार ढंग हैं। हमारे हजारों ढंगों में वह मौजूद है। और ध्यान रहे कि हमारे ढंग पर ही वह समाप्त नहीं हैवह और ढंग ले सकता है। वह कभी भी ढंगों पर समाप्त नहीं होगा। उसकी संभावना अनंत है। तुम ऐसी कोई स्थिति की कल्पना नहीं कर सकतेजहां परमात्मा पूरा-पूरा प्रगट हो गया हो। कितना ही प्रगट होता चला जाएअनंत रूप से प्रगट होने को शेष है।
इसलिए तो उपनिषद कहते हैंउस पूर्ण से हम पूर्ण का भी निकल लें तो भी पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है। हम कितना ही निकलते चले जाएंहमारे निकालने से कुछ कमी नहीं पड़ती। हमारे निकलने से वह कुछ छोटा नहीं होता जाता--पूर्ण का पूर्ण ही शेष रहता है।
पूछा है, "भक्ति साकार ही होनी चाहिए'
भक्ति तो साकार हैलेकिन भगवान साकार नहीं है। क्योंकि भक्ति का संबंध भक्त से हैभगवान से नहीं है। भक्त साकार है,तो भक्ति साकार है। लेकिन भक्ति अंतिम परिणाम भगवान है। प्रथम तो यात्रा शुरू होती है भक्त सेअंतिम उपलब्धि होती है भगवान पर। शुरू तो भक्त करता हैपूर्णता भगवान करता है। प्रयत्न तो भक्त करता हैप्रसाद भगवान देता है।
तुम शुरू करनेवाले होपूरे करनेवाले तुम नहीं हो--पूरा परमात्मा करेगा।
तोभक्ति के दो अर्थ हो जाएंगे: जब भक्त शुरू करता है तो वह साकार होती हैफिर जैसे-जैसे भगवान भक्त में उतरने लगता हैनिराकार होने लगती है। जब भक्त पूरा मिट जाता हैभक्ति शून्य हो जाती हैनिराकार हो जाती है। फिर तुम भक्त को बैठकर मंदिर में घंटी बजाते न देखोगे। फिर अहर्निश उसके प्राणों की धक-धक ही उसकी घंटी है। फिर तुम भक्त को राम-राम चिल्लाते न देखोगेक्योंकि अब भक्त जो भी सोचेवही राम-राम है। अब तुम भक्त को तिलक-टीका लगाते न देखोगेअब तो भक्त ही स्वयं तिलक-टीका हो गयावह स्वयं लग गया। अब अपना कुछ बचा नहीं। अब तुम भक्त को मंदिर जाते न देखोगे। हांअगर तुम्हारे पास आंखें हों तो मंदिर को भक्त के पास आते देखोगे। अब तुम भक्त को भगवान को पुकारते न देखोगे;अगर तुम्हारे पास सुननेवाले कान हों तो तुम भगवान को देखोगे कि पुकार रहा है भक्त को।
भक्त ने शुरू की थी यात्राभगवाान ने पूरी की। तुम एक हाथ बढ़ाओदूसरा हाथ उस तरफ से आता है। इस तरह का हाथ साकार हैउस तरह का हाथ निराकार है। इसलिए तुम जिद्द मत करना कि उस तरफ का हाथ भी साकार होअन्यथा झूठा हाथ तुम्हारे हाथ में पड़ जाएगा। फिर तुम्हारे ही दोनों हाथ होंगे। इधर से भी तुम्हाराउधर से भी तुम्हारा।
उधर से आनेवाला हाथ तो निराकार हैनिर्गुण है। निर्गुण का यह मतलब नहीं है कि परमात्मा में कोई गुण नहीं है। निर्गुण का इतना ही मतलब है कि सभी गुण उसके हैं। इसलिए कोई विशेष गुण उसका नहीं हो सकता।
निराकार का यह अर्थ नहीं कि उसका कोई आकार नहीं है;सभी आकार जो कभी हुएजो हैंऔर जो कभी होंगेउसी के हैं। तरज हैं! सभी आकारों में ढल जाता है। किसी आकार में कोई अड़चन नहीं पाता।
भक्त की तरफ से तो भक्ति साकार होगीलेकिन जैसे-जैसे भक्त परमात्मा के करीब पहुंचेगा वैसे-वैसे निराकार होने लगेगी। और एक पड़ाव ऐसा आता हैजहां भक्त की तरफ से सब प्रयास समाप्त हो जाते हैं। क्योंकि प्रयास भी अहंकार है। मैं कुछ करूंगा तो परमात्मा मिलेगाइसका तो अर्थ हुआ कि मेरे करने पर उसका मिलना निर्भर है। इसका तो यह अर्थ हुआ कि यह भी एक तरह की कमाई है। इसका तो यह अर्थ हुआ कि अगर मैंने सिक्के मौजूद कर दिए तो मैं उसको वैसे ही खरीद कर ले आऊंगा जैसे बाजार से किसी और सामान को खरीदकर ले आता हूं--पुण्य के सिक्के सहीभक्ति-भाव के सिक्के सही।
नहींऐसा नहीं है। मैं सब भी पूरा कर दूं तो भी उसके होने की अनिवार्यता नहीं है। मेरे सब करने पर भी वह नहीं मिलेगाजब तक कि मेरा "करने वालामौजूद है।
तो भक्त पहले करने से शुरू करता है। बहुत करता हैबहुत रोता हैबहुत नाचता हैबहुत याद करता हैबहुत तड़फता हैफिर धीरे-धीरे उसे समझ में आता है कि मेरी तड़फन में भी मेरी अस्मिता छिपी हैमेरी पुकार में भी मेरा अहंकार हैमेरे भजन में भी मैं हूंमेरे कीर्तन में भी मेरी छाप हैकर्तृत्व मौजूद है!
जिस दिन यह समझ आती है उस दिन भक्त मिट जाता हैउस दिन जैसे किसी ने दर्पण गिरा दिया और कांच से टुकड़े-टुकड़े हो गएउस दिन भक्त नहीं रह जाता।
जिस दिन भक्त नहीं रह जाताभक्ति कौन करे! कौन मंदिर जाए! कौन मंत्रोच्चार करे! कौन विधि-विधान पूरा करे! एक गहन सन्नाटा घेर लेता है! उसी सन्नाटे में दूसरा हाथ उतरता है।
तुम मिटे नहीं कि परमात्मा आया नहीं! तुमने सिंहासन खाली किया कि वह उतरा! तुम्हारी शून्यता में ही उसके आगमन की संभावना है।
भक्ति तो साकार हैभगवान निराकार है। और भक्त के संबंध में हम क्या कहेंभक्त अपने को साकार समझता हैवह उसकी भ्रांति हैजिस दिन जानेगाअपने को भी निराकार पाएगा। भक्त अपने को भक्त समझता हैयह भी उसकी भ्रांति हैजिस दिन जानेगा उस दिन अपने को भगवान पाएगा।
सब आकार स्वप्नवत हैं। निराकार सत्य हैआकार स्वप्न है। लेकिन हम जहां खड़े हैंवहां आकारों का जगत है। हम अभी स्वप्न में ही पड़े हैं। हमें तो जागना भी होगा तो स्वप्न में ही थोड़ी यात्रा करनी पड़ेगी।
भक्ति साकार ही होनी चाहिए--होती ही है। निराकार भक्ति हो नहीं सकतीक्योंकि निराकार में करने को क्या रह जाता है,करनेवाला नहीं रह जाता!
भक्ति तो साकार ही होगीलेकिन भगवान निराकार है। इसलिए एक न एक दिन भक्ति भी जानी चाहिए। भक्ति की पूर्णता पर भक्ति भी चली जाती है। प्रार्थना जब पूर्ण होती है तो प्रार्थना भी चली जाती है। ध्यान जब पूर्ण होता है तो ध्यान भी व्यर्थ हो जाता है--हो ही जाना चाहिए। जो चीज भी पूर्ण हो जाती है वह व्यर्थ हो जाती है। जब तक अधूरी है तब तक ठीक है--मंदिर जाना होगापूजा कारनी होगी। करनालेकिन याद रखनाकहीं यह न भूल जाए कि यह सिर्फ शुरुआत है। यह जीवन की पाठशाला की शुरुआत हैअंत नहीं है। यह बारहखड़ी हैक ख ग है।
छोटे बच्चों की किताबें देखी हैं। कुछ भी समझाना हो तो चित्र बनाने पड़ते हैंक्योंकि छोटा बच्चा चित्र ही समझ सकता है। आम तो छोटे में लिखोआम का बड़ा चित्र बनाओ। पूरा पन्ना आम के चित्र से भरोकोने में आम लिखो। क्योंकि पहले यह चित्र देखेगातब वह शब्द को समझेगा।
ऐसा ही भक्त है। भगवान! "भगवानतो कोने में रखोबड़ी मूर्ति बनाओखूब सजाओ। अभी भक्त बच्चा है। अभी उस खाली कोने में जो भगवान है वह उसे दिखाई न पड़ेगा।
तुमने कभी गौर कियामंदिर गए होजहां मूर्ति है वहां तो भगवान हैंलेकिन खाली जगह तो मूर्ति को घेरे हुए हैवहां भगवान दिखाई पड़ावहां भी भगवान हैंतुम्हें नहीं दिखाई पड़ाक्योंकि तुम्हें मूर्ति चाहिए। बचपना है अभी! मंदिर में भगवान दिखाई पड़ामंदिर के बाहर कौन हैमंदिर की दीवालों को कौन छू रहा हैसूरज की किरणों में किसने मंदिर की दीवालों पर थाप ही हैहवाओं में कौन मंदिर के आसपास लहरें ले रहा हैमंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ाते हुए भक्तों के भीतर कौन सीढ़ियां चढ़ रहा हैवहां तुम्हें अभी नहीं दिखाई पड़ा। अभी बचकाना है मन। अभी चित्र चाहिएमूर्ति चाहिए।
साकार से शुरुआत करनी होतीह हैलेकिन साकार पर रुक मत जाना। मैं यह नहीं कहता हूं कि साकार की शुरुआत ही मत करना। नहीं तो बच्चा भाषा कभी सीखेगा ही नहीं। वह सीखने का ढंग हैबिलकुल जरूरी है। अड़चन वहां शुरू होती है जहां तुम पहले पाठ को ही अंतिम पाठ समझ कर बैठ जाते हो।
सीख लेना और मुक्त हो जाना!
जो भी सीख लोउससे मुक्ति हो जाती है।
आगे चलो!
मूर्ति में देख लिया--अब अमूर्त में देखो!
आकार में देख लिया--अब निराकार में देखो!
शब्द में सुन लिया--अब नि:शब्द में सुनो!
शास्त्र में पहचान लिया--अब मौन मेंशून्य में चलो!
पर जल्दी भी मत करना। अगर मंदिर में ही न दिखा हो तो मंदिर के बाहर तो दिख ही न सकेगा। जल्दी भी मत करना।
आदमी का मन अति पर बड़ी आसानी से चला जाता है।
तो इस देश में तो बड़ी अतियां हुईं। इसमें एक तरफ लोग हैं जो कहते हैंपरमात्मा निराकार है। वे किसी तरह की मूर्ति को बरदाश्त न करेंगेकिसी तरह की पूजा को बरदाश्त न करेंगे।
मुसलमानों ने यही रुख पकड़ लियातो मूर्तियों को तो॰?ने पर उतारू हो गए।
अब थोड़ा सोचो! पूजा के योग्य तो मूर्ति नहीं हैलेकिन तोड़ने के योग्य है! इतने में तो पूजा ही हो जाती। जब परमात्मा की कोई मूर्ति ही नहीं है तो तोड़ने का भी क्या प्रयोजनतोड़ने में भी क्यों श्रम लगाते हो?
अति होती है: या तो पूजा करेंगेया तोड़ेंगे।
समझ नहीं है अति के पास कोई।
तो एक तरफ हैं तो जिद्द किए जाते हैं कि परमात्मा निराकार है। ठीक कहते हैंबिलकुल ठीक ही कहते हैंपरमात्मा निराकार है। लेकिन आदमी उस जगह नहीं है अभीजहां से निराकार से संबंध जुड़ सके। आदमी अभी निराकार के योग्य नहीं है। होगा बुद्ध के लिएपर आदमी बुद्ध कहांहोगा महावीर के लिएलेकिन किससे बातें कर रहे होजिससे बातें कर रहे होउसकी भी तो सोचो। दया करों उस पर। तुम परम स्वस्थ लोगों की बातें अस्पताल में पड़े बिमारों से कर रहे हो! बुद्ध को जरूरत नहीं हैलेकिन जिसको तुम समझा रहे होउसकोउस पर ध्यान करोकरुणा करो थोड़ी।
निराकार की बातें करनेवाले लोग बड़े दयाहीन हैं। करुणा उनके मन में जरा भी नहीं है। इसलिए उनकी निराकार की बातें सब थोथीपांडित्य हैंशास्त्रीय हैं।
फिर दूसरी तरफ साकार की बात करनेवाले लोग हैंउनके मन में आदमी के प्रति दया तो हैलेकिन सत्य की निष्ठा नहीं। ठीक कहते हैंइस आदमी को ले जाना है। जिसका सारा चित्त मूर्तियों से भरा हैजिसके चित्त में सब आकार ही आकार हैंउससे निराकार की अभी पहचान नहीं हो सकतीआकारों से ही संबंध जुड़ाना होगाफिर धीरे-धीरे छुड़ा लेंगेसीढ़ी-सीढ़ी चढ़ा लेंगे। छलांग न हो सकेगीसीढ़ी-सीढ़ी यात्रा हो जाएगी।
ठीक कहते हैं कि परमात्मा साकार है। लेकिन फिर जिद्द पैदा होती है। फिर जिद्द यह पैदा होती है कि परमात्मा साकार है,यह कोई अंतिम सत्य है। तो फिर लोग मूर्तियों से ही बंधे रह जाते हैं। कुछ मूर्ति-भंजक हैंमूर्तियां तोड़ने में जीवन गंवाते हैं;कुछ मूर्ति-पूजक हैंमूर्तियों को सजाने में जीवन गंवाते हैं।
मेरी तुम पूछते हो तो मैं तुमसे कहूंगामुझे दोनों की बातों में सार है और दोनों की बातों में खतरा भी दिखाई पड़ता है। सार है दोनों की बातों में और खतरा भी दोनों की बातों में। तुम सार-सार चुन लेना और खतरे से बच जाना।
मेरा कोई मजहब नहीं हैमेरा कोई सम्प्रदाय नहीं है। इसलिए मुझे कोई अड़चन भी नहीं हैकिसी से भी सत्यजहां भी सत्य होवहां देखने में मुझे कोई अड़चन नहीं है। मेरा कोई आग्रह नहीं है। मेरे पास कोई कसौटी नहीं है जिस पर मैं तौलूं। मैं सीधा देख पाता हूं।
जो साकार की बात कहते हैंठीक कहते हैंआधी मंजिल तक वे तुम्हारे साथ हो सकेंगे--बस आधी मंजिल तक! उसके बाद निराकार की बात तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण होने लगेगी। तब तुम घिरे मत रह जानागिरफ्त में मत रह जाना। तब तुम यह मत कहना कि हम तो साकार की पूजा करते रहे अब तकहम आकार को भीतर न प्रवेश करने देंगे। आंख बंद मत कर लेना जब निराकार पुकारे। यह मत कहना कि यह मेरी धारणा में नहीं हैयह तो हमारा शास्त्र नहीं हैहम तो माननेवाले साकार के हैं! आंख बंद मत कर लेना। पीठ मत फेर लेना। क्योंकि तुम्हारा साकार ही वहां ले आया हैउसको तो तुम अपनी साकार की सफलता मानना कि तुम्हारी पूजा पूरी हुईतुम्हारी प्रार्थना सुनी गई। तो तुमने फायदा भी ले लियातुम खतरे से भी बच गए।
साकार से तुम चलोनिराकार पर तुम पहुंचो!
ऐसा अगर तुम्हारे जीवन में संतुलन हो तो कोई खतरा नहीं है।
तोदूसरी तरफ लोग हैंवे कहते हैं, "जब निराकार ही है आखिर में तो हम पहले से ही निराकार क्यों न मानेंवे चल ही नहीं पाते। वे उन लंगड़े लोगों की तरह हैं जो बैसाखियों का सहारा लेने को राजी नहीं।
तुमने देखा! पैर पर चोट लग गई होऐक्सीडेंट हो गया होतो डाक्टर कहता हैबैसाखियों का सहारा ले लो। साल छह महीने बैसाखियों के सहारे चलोफिर धीरे-धीरे शक्ति वापस लौट आएगी। फिर धीरे-धीरे बैसाखियां छोड़ देनापैरों पर चलना।
तुम डाक्टर से यह नहीं कहते कि जब  आखिर पैरों से ही चलना है तो अभी से हम बैसाखियों से क्यों चलेंनहींहम बैसाखियां छुंएगे भी नहीं। तुम कहते हो, "ठीक हैबैसाखियों का उपयोग कर लेंगे'
सब धर्म तुम्हारे उपयोग के लिए हैं। तुम उनका उपयोग कर लेना और तुम किसी के भी गुलाम मत बनना। कोई धारणा इतनी बड़ी न हो जाए कि सत्य को ओट कर ले।

प्रश्न चौथा: आशीर्वाद क्या हैऔर गुरु जब शिष्य के सिर पर हाथ धरता हैतब क्या प्रेषित करता हैऔर क्या आशीर्वाद लेने की भी क्षमता होती है?

आशीर्वाद गुरु तो अकारण देता है,बेशर्त देता हैलेकिन तुम ले पाओगे या न ले पाओगेयह तुम पर निर्भर है। इतना ही काफी नहीं है कि कोई दे और तुम ले लोतुम्हें उसमें कुछ दिखाई भी पड़ना चाहिएतभी तुम लोगे। वर्षा हो और तुम छाते की ओट में छिपकर खड़े हो जाओतो तुम न भीगोगे। आशीर्वाद बरसेऔर तुम अहंकार की ओट मेंअहंकार के छाते में छिप जाओतो तुम न भीगोगे। वर्षा हो जाएगीमेघ आएंगेऔर चले जाएंगे तुम सूखे रह जाओगे।
तोतुम्हारी तैयारी चाहिए। तुम्हारा स्वीकार का भाव चाहिए। ग्रहण करने की क्षमता चाहिए। चातक की भांति मुंह खोलकर आकाश की तरफप्रार्थना से भरा हुआ हृदय चाहिए। स्वाति की बूंद तुम्हारे बंद मुंह में न गिरेगी--मुंह खुला होना चाहिए,आकाश की तरफ उठा होना चाहिएप्रतीक्षातुर होना चाहिएतो ही...।
तोजब तुम गुरु के पास झुकोतब वस्तुतः झुकना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि सिर ही झुके और हृदय बिना झुका रह जाए,तो आशीर्वाद बरस जाएगा...।
समझने की बात यह है कि गुरु यह नहीं कह रहा है कि तुम्हारी कोई पात्रता होगी तो आशीर्वाद दूंगालेकिन तुम्हारी पात्रता न होगी तो दिया आशीर्वाद तुम तक न पहुंच पाएगाव्यर्थ चला जाएगा।
गुरु आशीर्वाद देता हैऐसा कहना भी ठीक नहींगुरु से आशीर्वाद बरसता हैऐसा ही कहना ठीक है। जैसे दीए से रोशनी झरती हैफूल से गंध बहती हैऐसा गुरु कुछ करता हैप्रेषित करता हैऐसा नहींतुम्हें कुछ देता है विशेष रूप सेऐसा नहीं--झर ही रहा है। वह उसके होने का ढंग है। उसने कोई ऊंचाई पाई हैजिस ऊंचाई से झरने नीचे की तरफ बहते ही रहते हैं। अगर तुम तैयार हो तो तुम नहा लोगे। तुम अगर तैयार हो तो जन्मों-जन्मों की धूल बह जाएगी उस स्नान में। तुम अगर तैयार हो तो तुम्हारे मार्ग के कांटे हट जाएंगे और फूलों से भर जाएगा मार्ग।
लेकिन आशीर्वाद लेने की कलाझुकने की कला है। वह अहंकार को हटाने की कला है। वह स्वीकार-भाव है! आस्तिकता है! श्रद्धा है! आस्था है! प्रेम है!
तो पहली तो बात यह है कि गुरु देता हैऐसा नहींगुरु आशीर्वाद का दान हैदेता नहीं है। गुरु के होने में ही समाया है...!
ऐसा भी मत समझना कि वह तुम्हारे लिए कुछ विशेष रूप से कर रहा है। कोई भी न होएकांत में भी दीया जलेतो भी रोशनी जलती रहती हैतो भी प्रकाश पड़ता रहता है। वीरान मेंनिर्जन में फूल खिलेकोई राह से न निकलेकोई नासापुट पास न आएकिसी को कभी कानों कान खबर ही न होगी शायदनिर्जन में खिले फूल की किसको खबर होगीलेकिन सुगंध तो झरती ही रहेगीसुगंध तो भरती ही रहेगी हवाओं मेंहवाओं पर पंख फैलाती रहेगीसुगंध तो दूर-दूर की यात्रा पर निकलती ही रहेगी। फूल तो अपने को लुटा देगा। इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई था या नहीं! किसी का होना न होना संयोग है। फूल खिल गया है तो सुगंध का बिखरना नियति है।
गुरु वही है जिससे आशीर्वाद ऐसे ही बिखरता हैजैसे खिल गए फूल से गंध बिखरती है। संयोग की बात है कि कोई ले लेझेल ले। संयोग की बात है कि कोई अपने नासापुटों को भर ले। संयोग की बात है कि इन किरणों को कोई संभाल ले अपने हाथों में और अपने अंधेरे रास्ते पर चिराग जला ले। यह संयोग की बात है।
आशीर्वाद दिया नहीं जाातागुरु के होने का ढंग आशीर्वाद हैवह प्रसादरूप है।
आशीर्वाद क्या है?
आशीर्वाद जैसे मैंने कहाफूल जब खिलता है तो गंध बिखरती है। गंध क्या हैबीज में छिपी थीफूल में प्रकट हुईबीज में बंद थीफूल में खिली। लंबी यात्रा करनी पड़ीबीज अंकुर बनाकितनी कठिनाइयां थींकितने पत्थर-रोड़े थे राह में बीज के,जमीन को फोड़कर ऊपर आयाकितना कोमल था और कितना संघर्ष थाहजार उपद्रवों को झेलकर बचा--वृक्ष बनाफूल खिले,गंध बिखरी!
गुरु: तुम्हारे भीतर जो कल होने वाला  हैतुम्हारा जो भविष्य हैवह गुरु का वर्तमान है। तुम अगर बीज हो तो वह गंध हो गया है। तुम अगर बंद झरने होराह नहीं खोज पा रहे होतो वह सागर से मिल गया है। वह तुम्हारा भविष्य है।
गुरु में तुम अपने होने की आखिरी संभावना का दर्शन पाते हो।
आशीर्वाद का अर्थ है: गुरु के सान्निध्य में तुम्हारे वर्तमान और तुम्हारे भविष्य का मिलन होता हैतुम्हारा भविष्य तुम्हारे वर्तमान पर झरता है।
गुरु माध्यम है--तुम जो नहीं हो अभी और हो सकते हो--उसकी खबर है। अगर तुम ठीक से झुक जाओ तो उसका आशीर्वाद तुम्हारे लिए  एक ऊर्ध्वयात्रा बन जाएगी। वह तुम्हारे ऊपर उतरेगाबरसेगा। जैसे आकाश से वर्षा होती हैजमीन में छिपे बीज तक पहुंचती हैऐसा वह तुम तक पहुंचेगा। आकाश से वर्षा होती हैजमीन में छिपे बीज तक पहुंचती है और तत्क्षण बीज का अंकुरण फूट जाता है और बीज आकाश की तरफ उठने लगता है।
आशीर्वाद में गुरु तुम तक पहुंचेगाउतरेगाउसका अस्तित्व तुम्हारे अस्तित्व को छुएगातुम्हारी भूमि मेंअंधेरे में दबे हुए बीज पर उसकी वर्षा होगी और तत्क्षण तुम ऊपर की यात्रा पर निकल जाओगे।
आशीर्वाद का अर्थ है: गुरु ने तुम्हारे शून्य मेंतुम्हारी रिक्तता में अपने को भराताकि तुम्हारे भीतर जो दबा पड़ा हैउसे पुकार मिल जाएउसे आह्वान मिल जाएचुनौती मिल जाएसुगबुगाहट पैदा होतुम्हारे भीतर जो बीज है वह भी अंकुरित होने लगे,उसे खबर मिल जाए कि मैं क्या हो सकता हूं!
इसलिए भक्ति-शास्त्र सत्संग की महिमा गाता है।
तुम करीब आओतुम झुकोतो गुरु तुम्हारे करीब आ पाता है। तुम झुको तो वह तुम में उतर पाता है... अवतरण!
हर आशीर्वाद में परमात्मा अवतरित होता है। हर आशीर्वाद अवतार है।
हमने उन्हीं व्यक्तियों को अवतार कहा है जिनके कारण बहुत से व्यक्तियों के भीतरअनेकों के भीतर सोई हुई संभावनाएं सजग हो गईंवास्तविक बनीं। हमने उन्हीं व्यक्तियों को अवतार कहा है जो हमारे भीतर उस गहराई तक उतर सके जहां तक हम भी नहीं पहुंच पाए और जिन्होंने हमारी गहराइयों को छू दियातिलमिला दियाजगा दियाजिन्होंने हमारी नींद तोड़ दी।
तो आशीर्वाद अवतरण है--ऊंचाइयों कातुम्हारी गहराइयों मेंभविष्य कातुम्हारे वर्तमान मेंसंभावना कातुम्हारी वास्तविकता मेंतुम्हारे तथ्यों के जीवन में सत्य की पुकार है।
और आशीर्वाद अनूठी बात हैक्योंकि गुरु दिए जा रहा है। उसे कुछ करना नहीं पड़ रहा है। कोई श्रम नहीं है जो उसे करना पड़ रहा है। तुम न भी लोगे तो भी यह गंध हवाओं में लुटानी ही पड़ेगी। मेघ जब भर जाएंगेतो बरसेंगे ही। बीज अंकुरित हों या न होंमेघ जब भर जाएंगे तो बरसेंगे ही--बरसना ही पड़ेगा।
तो गुरु मेघ हैबरस रहा है।
बुद्ध ने तो उस अवस्था को मेघ-समाधि कहा है--जब समाधि बरसती है। वही गुरु की दशा है। जब समाधि बरसने लगती है--तब आशीर्वादतब प्रसाद!
पर तुम ले सको तो ही ले पाओगे।
झुकने की कला सीखोमिटने की कला सीखोतो तुम्हारे होने का सूत्रपात होता है।

पांचवां प्रश्न: कल के प्रवचन में अचानक कुछ घटा! सुनते-सुनते ध्यान दो वाक्यों के बीच मौन पर केंद्रित हो गया और बड़ी गहरी और शीतल शांति का अनुभव हुआ! प्रणाम स्वीकार करें!

शुभ हुआ! उस तरफ ज्यादा से ज्यादा ध्यान को ले जाएंताकि यह घटना केवल एक स्मृति न रह जाएताकि यह घटना धीरे-धीरे तुम्हारे जीवन की शैली बन जाए!
जैसे दो शब्द के बीच में ध्यान रुकाऐसे ही जीवन के हर पहलू में जहां-जहां अभिव्यक्त्ति हैवहां-वहां दो अभिव्यक्तियों के बीच में कहीं मोक्ष है।
रात और दिन अभिव्यक्तियां हैं। अगर तुम दिन से बंधे रहे तो रात से डरे रहोगे। अगर रात से बंधे रहे तो दिन से परेशान रहोगे। रात और दिन के बीच में संध्या का काल है। इसलिए तो हमने इस देश में संध्या को प्रार्थना का समय चुना है--बीच में,ठीक मध्य में!
दुकान से ही मत बंधे रहना और मंदिर से भी मत बंध जाना। मंदिर और दुकान के बीच में कहीं संन्यास है। हर दो अभिव्यक्तियों और विरोधोंअतियों के बीच में मध्य में खोजते रहनातो तुम्हारे जीवन में संयम का फूल खिलेगा।
और यह घटना स्मृति न बन जाएक्योंकि बहुत बार ऐसी घटना घटती है। हम ऐसे अभागे हैं कि घट भी जाती हैझलक भी मिल जाती हैतो भी झलक को गहराते नहीं। पकड़ में भी आ जाते हैं सूत्र तो आ-आकर खो जाते हैं। कई बार तुम्हारे हाथ में आंचल आ गया है सत्य का और छिटक गया हैतुम फिर झपकी लेने लगते होफिर याद भूल जाती हैफिर होश खो जाता है।
शुभ हुआ! सौभाग्य हुआ! प्रसाद का क्षण मिला! उसे गहराना। उसे जितना ज्यादा जहां-जहां खोज सकोखोजनाताकि धीरे-धीरे वह तुम्हें हर जगह दिखाई पड़ने लगे। उसी शून्य और शांति से तुम्हें परमात्मा के पहले दर्शन होंगे। उसी शून्य से निराकार का हाथ तुम तक आएगा। हाथ तैयार ही है आने को! तुम बस जरा एक कदम चलोपरमात्मा हजार कदम तुम्हारी तरफ चलता है।
आखिरी प्रश्नः एक परम्परा कहती है कि दवर्षि नारद परम मुक्ति को उपलब्ध नहीं थे। दूसरी परम्परा उन्हें सप्तऋषि में एक मानती हैजिनका गुह्य और परोक्ष कार्य सदा चलता रहा है। क्या

6-भक्ति-सूत्र के रचयिता के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने की
कृपा करेंगे?

जानकर ही नारद की कोई बात मैंने नहीं की। सोचकर की छोड़ा। क्योंकि भक्त का कोई कर्तृत्व नहीं होता और न व्यक्तित्व होता है। भक्त तो एक मौन हैएक शून्य निवेदन है!
भक्त कुछ करता नहींइसलिए कोई कर्तृत्व नहीं होता।
भक्त तो एक आनंद है! एक गीत है! एक नृत्य है!
एक अहोभाव है!
बड़ा सूक्ष्म है भक्त का अस्तित्व!
न तो कोई कर्तृत्व हैन कोई व्यक्तित्व हैक्योंकि भक्त तो एक खाली बांस की पोंगरी हैव्यक्तित्व क्या! खाली जगह हैजहां से भगवान को जगह देता हैजहां से भगवान उससे बहने लगते हैं।
नारद पर इसलिए मैंने कुछ कहा नहीं। और इसीलिए नारद के संबंध में न मालूम कितनी कथाएं प्रचलित हैं। नारद के व्यक्तित्व को समझा ही नहीं जा सका। समझने के लिए जगह नहीं है। समझने के लिए आधार नहीं है।
एक परम्परा कहती है कि वे परम मुक्ति को उपलब्ध नहीं हुए। क्यों?...क्योंकि नारद में बुद्ध जैसा व्यक्तित्व दिखाई नहीं पड़तान महावीर जैसा व्यक्तित्व दिखाई पड़ता है। नारद ऐसे सुलझे हुए मालूम नहीं होते जैसे बुद्ध सुलझे हुए मालूम होते हैं। नारद बड़े उच्च मालूम होते हैं। कथाएं कहे चली जाती हैं कि पृथ्वि और स्वर्ग के बीच में न केवल खुद उलझे हैंदूसरों को भी उलझाते रहते हैं।
नारद का व्यक्तित्व साफ-साफ नहीं है। बुद्ध साफ-साफ उस पार हैंसमझ में आते हैं। नारद न इस पार न उस पारकहीं बीच में डोलते हैं।
कितनी कथाएं हैं! नारद स्वर्ग जा रहे हैंबैकुंठ जा रहे हैंबैकुंठ से जमीन पर आ रहे हैं--दो लोकों के बीच में! मेरे लिए उतना ही इंगित है कि दो किनारों के बीच में...!
व्यक्तित्व बड़ा उलझा हुआ मालूम पड़ता है। एक ही किनारे पर इतनी उलझन है। दो संसारों के बीच में जो जिए--एक पैर यहां रखेएक बैकुंठ में रखे--उसकी उलझन तुम समझ सकते हो। लेकिन वही मेरे लिए परम संन्यास का रूप हैजो दो अतियों के बीच अपने को संभाल ले।
एक किनारेपर बस गएवह भी कोई सुलझावसुलझाव हुआया दूसरे किनारे पर हट गएवह भी कोई सुलझावसुलझाव हुआसेतु बनना चाहिएजिस पर दोनों किनारे जुड़ जाएं।
नारद सेतु हैं। इस तरफ से देखो तो बिलकुल संसारी हैं! और उस तरफ से तुम देख न सकोगेउस तरफ से मैं देख रहा हूं। उस तरफ से देखो तो परम वीतराग हैं।
इसी तरफ से देखा गया है। इसी किनारे पर खड़े हुए लोग देखते हैं कि यह सेतु तो यहीं जुड़ा हैइसी किनारे पर जुड़ा हैदूसरा किनारा तो दिखाई नहीं पड़ता। तो नारद संसार से जुड़े मालूम पड़ते हैंसांसारिक मालूम पड़ते हैं। उनके आसपास रची गई कथाएं इस किनारे के लोगों ने रची हैं। मैं तुमसे उस किनारे से कह रहा हूं कि नारद सेतु हैं।
नारद बड़े अनूठे रहस्यपूर्ण व्यक्ति हैं। उनका अनूठापन यही हैउनकी अद्वितीयता यही है कि वे एकतरफा नहीं हैंएकांगी नहीं हैं। महान समन्वय उनमें सिद्ध हुआ है।
फिर सारी कथाएं कहती हैं कि वे कुछ उलझाव का ताना-बाना बुनते रहते हैं। लोकमानस में उनकी जो प्रतीति है वह कुछ चुगलखोर जैसी हैं। यह भी अकारण नहीं बन गई होगीक्योंकि कोई भी बात बनती है तो उसके पीछे कुछ न कुछ कारण होगा। हजारों साल तक करोड़ों लोग जब ऐसी कहानियां गढ़ते रहते हैंतो उसके पीछे कहीं न कहीं कोई सूत्रपात होगाकहीं न कहीं कोई आधार होगा। आधार है।
जब भक्त अपने को परमात्मा के हाथ में सौंप देता हैतो "वहजो करवाये वह करता है। फिर वह यह भी नहीं कहता कि यह बात जंचती नहींयह करनी ठीक न होगा। फिर वह असंगतियां भी करवाए तो असंगति भी करता है। छोड़ने का अर्थ ही होता है पूरा छोड़ना। फिर उसमें हिसाब नहीं रखता। वह झूठ भी बुलवाए तो भी भक्त यह नहीं कह सकता, "मैं न बोलूंगा'। क्योंकि भक्त है ही नहीं। वह कहता है, "तेरा झूठतो तेरा झूठ मेरे सच से भी ज्यादा बड़ा है'
इसे थो॰?ा समझना, "मेरा सच भी तेरे झूठ से छोटा होगा! तेरा झूठ भी मेरे सच से बड़ा होगा! फिर तू करवा रहा है तो जरूर कोई कारण होगा। फिर तू ही जानयह हिसाबकौन रखे!'
तो नारद के व्यक्तित्व में संगति नहीं है। यहां की बात वहां कह रहे हैंबढ़ा-चढ़ाकर कह रहे हैंकभी घटाकर कह रहे हैंकभी जोड़का कह रहे हैं। इसलिए स्वभावतः लोगमानस को यह लगता है कि यह व्यक्ति और मुक्त! तो थोड़ी अड़चन मालूम होती है।
मुक्त के संबंध में हमारी धारणाएं हैं कुछनारद सब धारणाओं को तोड़ देते हैंक्योंकि नारद अपने को सब भांति समर्पित कर देते हैं। परमात्मा की इस विराट लीली मेंइस बड़े खेल मेंइस बड़े नाटक मेंवे अपना कोई व्यक्तित्व लेकर नहीं चलतेवे "वहजो करवाता है करते हैं। इतना ही इंगित है। "वहअगर झूठ भी बुलवाए तो झूठ भी बोल देते हैं। लेकिन नारद ने झूठ नहीं बोला हैपरमात्मा की लीला के अंश हो गए हैं!
इस बात को लोकमानस न समझ पाएयह भी स्वाभाविक है। लेकिन इतना बड़ा सूत्रइतना बड़ा नाटक चलता हो तो उसमें नारद जैसे व्यक्तित्व की भी जरूरत है। वह भी कोई कमी पूरी करता है। नारद के बिना कथाएं अधूरी रह जाएंगी। नारद के बिना नाटक सूना-सूना होगा। नारद कुछ महत्वपूर्ण सूत्र का काम पूरा करते हैं।
पर नारद के व्यक्तित्व की बात इतनी ही है कि उन्होंने छोड़ दिया है, "वहजो करवाए!
उनका रूप जो लोकमानस में है वह यह है कि वे अपना एकतारा लिए इस लोक से स लोक के बीच डोलते रहते हैं। उनका वाद्य उनके साथ है। उनका संगीत उनके साथ है। उनके भीतर की संगीतपूर्ण दशा उनके साथ है।
ज्यादा कुछ उनके संबंध में कहा नहीं जा सकताकहने की कोई जरूरत नहीं है। उनका एकतारा ही उनका प्रतीक है। भीतर उनके एक ही स्वर बज रहा हैवह भक्ति का हैएक ही स्वर बज रहा हैवह समर्पण का हैएक ही स्वर बज रहा हैवह श्रद्धा का है। फिर परमात्मा जो कराएजो "उसकीमर्जी!
नारद की अपनी कोई मर्जी नहीं है। अपने व्यक्तित्व को बनाने में भी उनकी कोई आचरणगत धारणा नहीं है। महावीर की मर्जी हैवे पैर भी फूंक-फूंककर रखते हैंउनके पास एक आचरण है। बुद्ध की मर्जी हैएक शील हैनारद के पास अपना उतना भी दावा नहीं है।
इसलिए अगर तुम मुझसे पूछते हो तो मैं तुमसे कहता हूं कि यही परम मुक्ति है।

आज इतना ही।

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