शनिवार, 9 सितंबर 2017

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-03

बड़ी संवेदनशील है भक्ति

दिनांक १३ जनवरी१९७६श्री रजनीश आश्रम पूना

सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्।।
निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः।।
तस्मिन्नन्यता तद्धिरोधिषूदासीनता च।।
अन्याश्रयाणां त्यागो५नन्यता।।
लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्धिरोधिषूदासीनता।।
भवतु निश्चयदाढर्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्।।
अन्यथा पातित्याशङ्कया।।
लोको५पि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीधारणावधि।।

जीवन की व्यर्थता जब तक प्रगाढ़ अनुभव न बन जाए तब तक परमात्मा की खोज शुरू नहीं होती। जीवन की व्यर्थता का बोध ही उसकी तरफ पहला कदम है। जब तक ऐसी भ्रांति बनी है कि यहां कुछ खोज लेंगेपा लेंगेयहां कुछ मिल जायेगा सपनों की दुनिया में--तब तक परमात्मा भी एक सपना ही हैतब तक तुम उसे खोजने नहीं निकलतेतब तक तुम स्वयं को दांव पर भी नहीं लगाते।

परमात्मा मुफ्त मिलनेवाला नहीं है। जो भी तुम होतुम्हारी परिपूर्ण सत्ता जब तक दांव पर न लग जाएतब तक परमात्मा से कोई मिलन नहीं। क्योंकि प्रेम इससे कम पर नहीं मिल सकता। और प्रार्थना इससे कम पर शुरू नहीं होती। यह काम जुआरियों का हैदुकानदारों का नहीं। यहां पूरी खोने की हिम्मत चाहिए। दीवानगी चाहिए! मस्ती चाहिए!
लेकिन यह तभी संभव हो पाता है जब जो तुम्हारे पास हैवह व्यर्थ दिखायी पड़ता हैवह कूड़ा-करकट हो जाता हैतब तुम उसे पकड़ते नहीं।
करोड़ों लोग परमात्मा के शब्द का उच्चार करते हैंप्रार्थना करते हैंपूजा करते हैंलेकिन उसकी कोई झलक नहीं मिलती। क्या पूजा व्यर्थ हैनहींकरनेवालों ने की ही नहीं। क्या प्रार्थना शून्य आकाश में खो जाती है,  कोई प्रत्युत्तर नहीं आताप्रार्थना थी ही नहींअन्यथा प्रत्युत्तर तत्क्षण आता है। इधर तुमने पुकारा भी नहीं कि उधर प्रत्युत्तर मिला नहीं! पर तुमने पुकारा ही नहीं। तुम सोचते हो कि तुमने पुकारातुम सोचते हो कि तुमने प्रार्थना कीलेकिन कभी तुमने हृदय को दांव पर लगाया नहीं।
आधे-आधे मन से न होगा।: पूरे-पूरे की मांग है।
तोजब तक तुम्हें लगता है कि संसार में अभी कुछ मिल सकता हैरस कायम हैजब तक तुम जागे नहींसपने में थोड़े उलझे होजब तक तुम्हें सपने में भरोसा है कि यह सच है--तब तक परमात्मा की तरफ आशाओं का प्रवाहआकांक्षाओं का प्रवाह शुरू नहीं होतातब तक प्रार्थना तुम्हारी अभीप्सा नहीं होतीतुम्हारे हृदय की भाव-दशा नहीं होतीतब तुम्हारी प्रार्थना भी तुम्हारी चालाकीतुम्हारे गणिततुम्हारी होशियारी का हिसाब होती है। तुम सोचते हो: "चलोहो-न-हो कहीं परमात्मा हो ही न,प्रार्थना भी कर लोपूजा भी कर लोबिगड़ता क्या है! हानि क्या है! अगर लाभ हुआ तो हो जाएगान हुआ तो हानि तो कुछ भी नहीं।'
मैंने सुना हैएक नाटकगृह में ऐसा हुआ कि मध्य नाटक मेंजो नाटक का प्रधान पात्र थाउसे हृदय का दौरा पड़ गया। संयोजक परदे के बाहर आयाउसने क्षमा मांगी कि क्षमा करेंदुख की बात हैहृदय के दौरे के कारण प्रमुख नायक की मृत्यु हो गयी है और नाटक आगे न हो सकेगा। हम क्षमा-प्रार्थी हैंलेकिन हमारे कोई हाथ की बात भी नहीं।
लोग नाटक में बड़े उलझे थे। अभी तो जिज्ञासा जगी थीऔर यह तो बीच में सब टूट गया--जैसे नींद टूट गई!
एक स्त्री ने खड़े होकर कहा कि छाती के ऊपर मालिश करोअभिनेता की।
मैनेजर ने कहा, "देवी जीवह मर चुका है। अब मालिश से क्या लाभ होगा?'
उस स्त्री ने कहा, "लाभ न होहानि क्या होगी?'
बस तुम्हारी प्रार्थना ऐसी ही है कि अगर लाभ न हुआकोई हर्जा नहीं, "हानि क्या होगी!सभी नास्तिक आस्तिक होने लगते हैं,क्योंकि जैसे-जैसे मौत करीब आती है और पैर लड़खड़ाते हैं और अंधेरा घना होने लगता है और आकाश के तारे छुपने लगते हैं,सब आशाओं के दिये बुझने लगते हैं और लगता है कि अब सिर्फ कब्र के अतिरिक्त और कोई जगह न रहीतो नास्तिक भी परमात्मा का स्मरण करने लगता है: कौन जानेशायद हो!
लेकिन "शायदसे प्रार्थना नहीं बनती। "शायदसे समझदारी तो समझ में आती हैप्रेम समझ में नहीं आता।
समझदारी से कोई कभी समझदार नहीं हुआ। समझदारी के कारण ही तो तुम नासमझ बने हो। तुम्हारी समझदारी ही महंगी पड़ रही है।
तोपरमात्मा की तरफ अगर तुम होशियारी से जा रहे होबही-खाते का हिसाब वहां भी फैला रहे होसोचते हो कि ठीक है,संसार को भी संभाल लेंपरमात्मा को भी संभाल लेंदोनों नावों पर सवार हो जाएं--तो तुम मुश्किल में पड़ोगे। तुम मुश्किल में पड़े होक्योंकि मैं देखता हूंतुम दोनों नावों में आधे-आधे खड़े हो।
नाव पर तो एक ही चढ़ा जाता है...एक ही नाव पर चढ़ा जाता हैअन्यथा दुविधा पैदा हो जाती है। दो दिशाओं में चलोगे तो टूट जाओगेखंड-खंड हो जाओगेबिखर जाओगे। और जब तुम ही खंड-खंड हो गयेबिखर गयेजब तुम्हारे भीतर ही एकतानता न रहीतो प्रार्थना कौन करेगापूजा कौन करेगाभीड़ थोड़े ही पूजा करती हैभीतर की एकता से पूजा उठती हैभीतर की अखंडता से सुगंध उठती है प्रार्थना की।
तो इस बात को पहले खयाल में ले लेना चाहिए तो ही भक्ति-सूत्र समझ में आ सकेंगे।
यह जिंदगी अगर तुम्हें अभी भी रसपूर्ण मालूम पड़ती है तो थोड़ा और जी लो। आज नहीं कलरस टूट जायेगा।
जितना आदमी सजग हो उतने जल्दी रस टूट जाता है। जितना आदमी बेहोश होउतनी देर तक रस टिकता है। बेहोशी रस का सहारा है। जितनी तुम्हारे भीतर बुद्धिमानी हो--होशियारी नहीं कह रहा हूंचालाकी नहीं कह रहा हूंबुद्धिमत्ता हो--उतनी जल्दी तुम जीवन के रस से चुक जाओगे। और जब जीवन का रस चुकता है तभी तुम्हारी रसधार जो जीवन में नियोजित थीमुक्त होती है: अब संसार में जाने को कोई जगह न बचीअब वह रास्ता न रहाअब चीजों की तरफ दौड़ने की बात न रहीअब संग्रह को बड़ा करना हैमकान बड़ा बनाना है धन इकट्ठा करना हैपद-प्रतिष्ठा पानी है--यह सब व्यर्थ हुआ;अब तुम अपने घर की तरफ लौटते हो।
"घर बयाबां में बनाया नहीं हमने लेकिन
जिसको घर समझे हुए थे वह बयाबां निकला।'
कोई रेगिस्तान में घर नहीं बनाया थालेकिन जिसको घर समझे हुए थे वही रेगिस्तान निकलावही वीरान निकला।
जिस दिन तुम्हें अपना घर बयाबां मालूम पड़ेवीरान मालूम पड़े...वीरान हैसिर्फ तुम अपने सपनों के कारण उसे सजाये हो। जरा चौंककर देखो: जिसे तुम घर कह रहे होवह घर नहीं हैज्यादा-से-ज्यादा सराय हैआज टिके होकल विदा हो जाना पड़ेगा। जो छिन ही जाना हैउसको अपना कहना किस मुंह से संभव हैजहां से उखड़ ही जाना पड़ेगाजहां क्षण-भर को ठहरने का अवसर मिला है,, पड़ाव हो सकता हैमंजिल नहीं हैऔर मंजिल के पहले घर कहां! घर तो वहीं हो सकता है जहां पहुंचे तो पहुंचेजिसके आगे जाने को कुछ और न रहे।
परमात्मा के अतिरिक्त कोई घर नहीं हो सकता।
मुझसे लोग पूछते हैं, "संन्यास की परिभाषा क्या?' तो मैं कहता हूं, "दो तरह के घर बनानेवाले हैंदो तरह के गृहस्थ हैं: एक जो संसार में घर बनाते हैंउनको हम गृहस्थ कहते हैंएक जो परमात्मा में घर बनाते हैंवे भी गृहस्थ हैंउनको हम संन्यासी कहते हैं--सिर्फ भेद करने को। घर अलग-अलग जगह बनाते हैं। एक हैं जो पानी पर जीवन को लिखते हैंलिख भी नहीं पाते और मिट जाता हैऔर एक हैं जो जीवन की शाश्वतता पर लिखते हैं। एक हैं जो रेत पर घर बनाते हैंजिनकी बुनियाद ही डगमगा रही हैऔर एक है जो जीवन की शाश्वतता को आधार की तरह स्वीकार करते हैं।'
पहला सूत्र है: "वह भक्ति कामना युक्त नहीं हैक्योंकि वह निरोध-स्वरूपा है।'
संसार यानी कामना।
संसार का ठीक अर्थ समझ लोक्योंकि तुम्हें संसार का भी अर्थ गलत ही बताया गया है।
कोई घर छोड़कर भाग जाता है तो वह कहता हैसंसार छोड़ दिया। कोई पत्नी को छोड़कर भाग जाता है तो वह कहता हैसंसार छोड़ दिया। काशसंसार इतना स्थूल होता! काशतुम्हारी पत्नी के छोड़ जाने से संसार छूट जाता! काशबात इतनी सस्ती होती! तो संन्यास बहुत बहुमूल्य नहीं होता।
संसार न तो पत्नी में हैन घर में हैन धन में हैन बाजार में हैन दुकान में है--संसार तुम्हारी कामना में है। जब तक तुम मांगते हो कि मुझे कुछ चाहिएजब तक तुम सोचते हो कि मेरा संतोषमेरा सुखमुझे मिल जाएउसमें हैतब तक तुम संसार में हो।
जब तक मांग है तब तक संसार है।
संसार का अर्थ है: तुम्हारा हृदय एक भिक्षापात्र हैजिसको लिये तुम मांगते फिरते हो--कभी इस द्वारकभी उस द्वार। कितने ठुकराये जाते हो! लेकिन फिर-फिर संभलकर मांगने लगते हो। क्योंकि एक ही तुम्हारे मन में धारणा है कि और ज्यादाऔर ज्यादा मिल जाएतो शायद सुख हो!
"औरकी दौड़ संसार है।
तो तुम मंदिर में भी बैठ जाओ और वहां भी अगर तुम मांग रहे हो तो तुम संसार में ही हो। तुम हिमालय पर चले जाओवहां भी आंख बंद करे अगर तुम मांग ही रहे होपरमात्मा से कह रहे हो, "और देस्वर्ग देमोक्ष देइससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या मांगते हो। संसार का कोई संबंध इससे नहीं है कि तुम क्या मांगते होअन्यथा संसार छोड़ने का ढोंग भी हो जाता है और संसार छूटता भी नहीं।
संसार तुम्हारे भीतर हैबाहर नहीं। संसार तुम्हारी इस मांग में है कि "मैं जैसा हूं वैसा काफी नहीं हूंकुछ चाहिए जो मुझे पूरा करेमैं अधूरा हूंअतृप्त हूंकुछ मिल जाए जो मुझे पूरा करेतृप्त करेसंतुष्ट करे!'
स्वयं को अधूरा मानने में और आशा रखने में कि कुछ मिलेगा जो पूरा कर देगाबस वहां संसार है।
मांग छूटी: संसार छूटा! तब कोई घर छोड़ने की जरूरत नहीं हैन पत्नी को छोड़ने की जरूरतन पति कोन बच्चों को--उनको कोई कसूर नहीं है!... घर में रहते तुम संसार से मुक्त हो जाते हो।... पत्नी के पास बैठे तुम संसार से मुक्त हो जाते हो। बच्चों को सजाते-संभालते तुम संसार से मुक्त हो जाते हो। क्योंकि संसार से मुक्त होने को केवल इतना ही अर्थ है कि अब तुम तृप्त होजैसे होजो होतुम्हारे होने में अब कोई मांग नहीं हैतुम्हारे होने में अब कोई आकांक्षा नहीं हैतुम्हारा होना कामनातुर नहीं हैतुम अब कामनाओं का फैलाव नहीं होविस्तार नहीं हो--तुम बस हो: तृप्तयही क्षणऔर जैसे तुम होपर्याप्त है,पर्याप्त से भी ज्यादा है।
तब तुम्हारी प्रार्थना धन्यवाद बन जाती हैमांग नहीं। तब तुम मंदिर कुछ मांगने नहीं जातेतुम उसे धन्यवाद देने जाते हो कि "तूने इतना दियाअपेक्षा से ज्यादा दियाजो कभी मांगा नहीं था वह दिया। तेरे देने का कोई अंत नहीं! हमारा पात्र ही छोटा पड़ता जाता है और तू भरे जा रहा है!'
...तब भी तुम रोते हो जाकर मंदिर मेंलेकिन तब तुम्हारे आंसुओं का सौंदर्य और!
जब तुम मांग से रोते होतब तुम्हारे आंसू गंदे हैंदीन हैंदरिद्र हैं। जब तुम अहोभाव से रोते होतुम्हारे आंसुओं का मूल्य कोई मोती नहीं चुका सकते। तब तुम्हारा एक-एक आंसू बहुमूल्य हैहीरा है। आंसू वही हैलेकिन अहोभाव से भरे हुए हृदय से जब आता हैतो रूपांतरित हो जाता है।
तुम जरा फर्क करके देखना। तुम दुख में भी रोये होपीड़ा में रोये होअसंतोष में रोये होशिकायत में रोये होकभी अहोभाव में भी रोकर देखनाकभी आनंद में भी रोकर देखना--और तुम पाओगे: तुम्हारे बदलते ही आंसुओं का ढंग भी बदल जाता है। तब आंसू फूलों की तरह आते हैं। तब आंसुओं में एक सुगंध होती है जो इस लोक की नहीं है।
मीरा भी रोती हैपर मीरा के आंसू भिखारी के आंसू नहीं है। चैतन्य भी रोते हैंलेकिन चैतन्य के आंसू दीन-दरिद्र नहीं हैंकुछ मांग से नहीं निकल रहे हैंकिसी अभाव से पैदा नहीं हुए हैं--किसी बड़ी गहन भाव-दशा से जन्मे हैं! गंगा का जल भी उतना पवित्र नहीं है।
"वह भक्ति कामना युक्त नहीं हैक्योंकि वह निरोधस्वरूपा है।'
निरोधस्वरूपा!
साधारणतः भक्ति-सूत्र पर व्याख्या करनेवालों ने निरोधस्वरूपा का अर्थ किया है कि जिन्होंने सब त्याग दियाछोड़ दिया। नहीं,मेरा वैसा अर्थ नहीं है। जरा सा फर्क करता हूंलेकिन फर्क बहुत बड़ा है। समझोगे तो उससे बड़ा फर्क नहीं हो सकता।
निरोधस्वरूपा का अर्थ यह नहीं है कि जिन्होंने छोड़ दिया--निरोधस्वरूपा का अर्थ है कि जिनसे छूट गया। निरोध और त्याग का वही फर्क है। त्याग का अर्थ होता है: छोड़ा निरोध का अर्थ होता है: छूटाव्यर्थ हुआ। जो चीज व्यर्थ हो जाती है उसे छोड़ना थोड़े ही पड़ता हैछूट जाती है।
सुबह तुम रोज घर का कूड़ा-करकट इकट्ठा करके बाहर फेंक आते हो तो तुम कोई जाकर अखबारों के दफ्तर में खबर नहीं देते कि आज फिर त्याग कर दिया कूड़े-करकट काढेर-का-ढेर त्याग कर दिया! तुम जाओगे तो लोग तुम्हें पागल समझेंगे। अगर कूड़ा-करकट है तो फिर छोड़ाइसकी बात ही क्यों उठाते हो?
तो जो आदमी कहता है, "मैंने त्याग किया, "वह आदमी अभी भी निरोध को उपलब्ध नहीं हुआ। क्योंकि त्याग करने का अर्थ ही यह होता है कि अभी भी सार्थकता शेष थी।
अगर कोई कहता है कि मैंने बड़ा स्वर्ण छोड़ा बड़े महल छोड़े गौर से देखना: स्वर्ण अभी भी स्वर्ण थामहल अभी भी महल थे। "छोड़ा'!  छोड़ना बड़ी चेष्टा से हुआ। चेष्टा का अर्थ ही यह होता है कि रस अभी कायम थाफल पका न थाकच्चा थातोड़ना पड़ा।
पका फल गिरता हैकच्चा फल तोड़ना पड़ता है।
तो त्यागी तो सभी कच्चे हैं। निरोध को उपलब्ध व्यक्ति पका हुआ व्यक्ति है। त्याग और निरोध का यही फर्क है। नारद कह सकते थे, "त्यागस्वरूपा है', पर उन्होंने नहीं कहा। "निरोधस्वरूपा'! व्यर्थ हो गयी जो चीजवह गिर जाती हैउसका निरोध हो जाता है।
सुबह तुम जागते हो तो सपनों का त्याग थोड़े ही करते होकि जागकर तुम कहते हो, "बस रात-भर के सपने छोड़ता हूं।जागे कि निरोध हुआ। जागते ही तुमने पाया कि सपने टूट गयेसपने व्यर्थ हो गयेसपने सिद्ध हो गये कि सपने थेबात समाप्त हुईअब उनकी चर्चा क्या करनी है!
जो त्याग का हिसाब रखते हैंसमझनाभोगी ही हैं--शीर्षासन करते हुएउलटे खड़े हो गये हैंभोगी ही हैं।
एक संन्यासी को मैं जानता हूं जो भूलते ही नहीं...। कोई चालीस साल पहले उन्होंने छोड़ा था संसार--छोड़ा थानिरोध नहीं हुआ था--चालीस साल बीत गयेअभी भी छूटा नहीं। छोड़ा हुआ कभी छूटता ही नहीं। वे अभी भी कहते रहते हैं कि मैंने लाखों रुपये पर लात मार दी। मैंने उनसे एक दिन कहा कि लात लग नयी पायीतुमने मारी होगीचूक गयी! उन्होंने कहाक्या मतलब?'
चालीस साल हो गये...छूट गयाछूट गया। इसकी चर्चा क्यों खींचते होइसे रोज-रोज याद क्यों करते होरस कायम है। लाखों में अभी भी मूल्य है। अभी भी तुम दूसरों को भूलते नहीं बताना कि मैंने लाखों पर लात मारी। तुमने बैंक-बैलेंस कायम रखा है। गिनती जारी है। नहींयह त्याग तो हैनिरोध नहीं।'
त्याग झूठा सिक्का है निरोध का। निरोध बड़ी अदभुत घटना है!
रामकृष्ण के पास एक आदमी आयाहजार सोने की अशर्फियां लाया थादान करनेउनको देने। उन्होंने कहा, "मुझे जरूरत नहीं। तू एक काम करगंगा में फेंक आ।वह गयालेकिन घंटा-भर हो गयालौटा नहींतो रामकृष्ण ने आदमी भेजे कि देखो,क्या हुआकहीं दुख में डूब तो नहीं मरा! गये तो वह एक अशर्फी को बजा-बजाकर फेंक रहा थाभीड़ इकट्ठी हो गयी थीलोग चमत्कृत हो रहे थे। तो उन्होंने आकर कहा कि वह एक-एक अशर्फी गिन-गिनकर फेंक रहा है।
तो रामकृष्ण गये और उससे कहा,"नासमझ! जब कोई इकट्ठा करता है तब तो गिनना समझ में आता है। लेकिन जब फेंकना ही है तो क्या गिनकर फेंकना! नौ सौ निन्यानबे थीं कि हजार थींक्या फर्क पड़ता है! कोई हिसाब रखना है पीछे कि कितनी फेंकीकि कितनी दान कींअगर हिसाब रखना है तो फेंक ही मतअपने घर ले जा। जब हिसाब ही नहीं छूटता है तो अशर्फियां छोड़ने से कुछ भी न होगा। असली चीज हिसाब का छूटना हैअसली चीज अशर्फियां छोड़ने से कुछ भी न होगा। असली चीज हिसाब का छूटना हैअसली चीज अशर्फियों का छूटना नहीं है।'
जीसस ने कहा है: "तुम्हारा एक हाथ जो दान करेदूसरे हाथ को पता न पड़े।'
सूफी फकीर कहते हैं: "नेकी करकुएं में डाल। हिसाब मत रख। किया भूलकुएं में डाल दे। बात खत्म हो गयीजैसे कभी हुई ही न थी।'
लेकिन तुम जाओ अपने त्यागियों के पासमहात्माओं के पासतुम उनके पास पूरा हिसाब पाओगे। हिसाब ठीक भी नहीं पाओगेबहुत बढ़ा-चढ़ाया हुआ है। हजार छोड़े होंगे तो लाख हो गये हैं। अब पूछता कौन हैऔर त्याग की परीक्षा भी क्या है,कसौटी भी क्या हैतुम्हारे पास लाख रुपये हैं तो तुम रुपये दिखा सकते होलेकिन जिसने लाख छोड़े हैं उसके पास प्रमाण क्या है कि उसने लाख छोड़े कि दस लाख छोड़ेन केवल महात्याग ऐसा करते हैंमहात्माओं के शिष्य उसको बढ़ाते चले जाते हैं।
महावीर ने महल छोड़ाधन-संपत्ति छोड़ीजैनियों ने जो शास्त्र लिखे हैंउनमें इतना बढ़ा-चढ़ा कर लिखा हैवह सरासर झूठ है। क्योंकि महावीर का साम्राज्य बड़ा छोटा-सा था कोई बड़ा नहीं था। महावीर के समय भारत में दो हजार राज्य थे। कोई बहुत बड़ा नहीं थाएक छोटी डिस्ट्रिक्ट से ज्यादा नहींएक छोटे जिले से ज्यादा नहीं था। इतने हाथी-घोड़े जितने जैनियों ने लिखे हैं,अगर होते तो आदमियों के रहने की जगह न रह जाती। लेकिन बढ़-चढ़ जाता है।
कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध हुआ। हिंदू उसकी जो कहानी बताते हैंउसको अगर सुनो तो ऐसा लगता है कि उस युद्ध के लिए पूरी पृथ्वी कम पड़ेगी। कुरुक्षेत्र का छोटा-सा मैदान उसमें अट्ठारह अक्षौहिणी सेनाएं बन नहीं सकतींलड़ना तो दूरअगर वे प्रेम भी करना चाहेंशांत खड़े होकरतो भी संभव नहीं है। लड़ने के लिए थोड़ी जगह चाहिएस्थान चाहिए! लेकिन बढ़ता जाता है...।
बुद्ध के भक्तों ने जो लिखा है वह सच नहीं हैक्योंकि बुद्ध की भी जगह बड़ी छोटी थीवह कोई बहुत बड़ा साम्राज्य नहीं था। लेकिन जिस तरह की कहानियां हैं... और कहानियां बढ़ती चली गयी हैं।
क्योंइन कहानियों को बढ़ाने का कारण क्या हैकारण साफ है कि हम त्याग को भी धन की मात्रा से ही समझ पाते हैंऔर कोई उपाय नहीं है।
समझोअगर महावीर फकीर के घर पैदा होते और पास धन न होतातो तुम कैसे जानते कि उन्होंने त्याग कियावे घर छोड़ देतेलेकिन त्यागी तो नहीं हो सकते थे। महात्यागी तुम कैसे कहतेथा ही नहीं कुछ तो छोड़ा क्या?
तुम्हें भीतर के रहस्य तो दिखायी नहीं पड़तेबस बाहर की चीजें दिखायी पड़ती हैं। तब तो इसका यह अर्थ हुआ कि केवल धनी ही त्यागी हो सकते हैं। तब तो इसका अर्थ हुआ कि त्यागी होने के पहले बहुत धनी हो जाना जरूरी है। तब तो इसका अर्थ हुआ कि परमात्मा के जगत में भी अंततः धन का ही मूल्य हैउसी से हिसाब लगेगा।
एक फकीर ने सब छोड़ दियाउसके पास दो पैसे थे। महावीर ने भी सब छोड़ दियाउनके पास करोड़ रुपये थेपरमात्मा के सामने हिसाब में महावीर जीत जाएंगेगरीब हार जाएगा। दो पैसे छोड़े! इन्होंने करोड़ छोड़े!
नहींपरमात्मा के राज्य में तुमने क्या छोड़ाइसका सवाल नहीं हैछोड़ा या नहीं छोड़ाबस इसका ही सवाल हैछोड़ा या छूटा,इसका ही सवाल है।
निरोध का अर्थ है: छूट जाता है।
जिन्होंने संसार के सत्य को देखाउनके जीवन में निरोध आ जाता है। उस निरोध को नारद ने भक्ति का स्वभाव कहा।
"वह भक्ति कामना युक्त नहीं हैऔर निरोधस्वरूपा है।उसका स्वरूप है निरोध।
जैसे ही संसार से कामना हटती हैवही कामना परमात्मा की दिशा में प्रार्थना बन जाती हैंवही ऊर्जा है! कोई अलग ऊर्जा नहीं है। वे ही हाथ जो भिक्षापात्र बने थेप्रार्थना में जुड़ जाते हैं। वही हृदय जो धन-संपत्ति को मांगता फिरता थापरम अहोभाव में झुक जाता है। वही जीवन-ऊर्जा जो नीचे की तरफ भागती थीखाई-खड्ड खोजती थीआकाश की तरफ उठने लगती है।
"तेरी राह किसने बतायी न पूछदिले मुज्त्तरब राहबर हो गया।'
तेरी राह किसने  बतायीयह मत पूछ--प्यासा दिल सदगुरु हो गयाव्याकुल हृदय मार्गदर्शक बन गया!
"तेरी राह किसने बतायी न पूछ
दिले मुज्त्तरब राहबर हो गया।'
जिस दिन संसार से तुम्हारा रस टूटता हैव्याकुलता जगती है परमात्मा की। वही मार्गदर्शक हो जाता है। वही तुम्हें ले चलता है। उसी के सहारे लोग पहुंचते है।
संसार की मांग करता हुआ व्यक्ति उन हजार चीजों में चाहे तो परमात्मा की मांग का भी जोड़ ले सकता हैलेकिन वह फेहरिश्त में एक नाम होगा--लंबी फहेरिश्त में! और मेरे खयाल से आखिरी होगा। अगर तुम्हारी फेहरिश्त में हजार नाम हैं तो वह एक हजार एक होगा।
मेरे पास लोग आ जाते हैं और वे कहते हैं, "हम प्रार्थना करना चाहते हैं समय कहां!इन्हीं लोगों को मैं सिनेमा में बैठे देखता हूं। इन्हीं लोगों को मैं क्लब-घर में ताश खेलते देखता हूं। इन्हीं लोगों को अखबार को पढ़ते देखता हूं सुबह से उठकर। इन्हीं लोगों को व्यर्थ की गपशप में संलग्न देखता हूं। ये ही लोग हजार तरह के उपद्रव में जुड़ जाते हैंलड़ाई-झगड़ों में जुड़ जाते हैं। हिंदू मुसलमानों को काटने लगते हैंमुसलमान हिंदुओं को काटने लगते हैं। ये ही लोग! लेकिन जब प्रार्थना का सवाल उठता है तो कहते हैं, "समय कहां!'
वे क्या कह रहे हैंवे यह कह रहे हैं कि और बड़ी चीजें हैं परमात्मा सेसमय पहले उनको देंफिर बच जाए तो परमात्मा को दें। वे यह नहीं कह रहे हैं कि समय नहीं हैंवे यह कह रहे हैंसमय तो है--समय तो सभी के पास बराबर है--लेकिन और चीजें ज्यादा जरूरी हैं। परमात्मा क्यू में बिलकुल अंतिम खड़ा है। पहले धन इकट्ठा कर लेंमकान बना लेंइज्जत-प्रतिष्ठा संभाल लें,फिर...। ऐसे परमात्मा प्रतीक्षा ही करता रहता हैफिरकभी आता नहीं--आयोग ही नहींक्योंकि इस संसार की दौड़ कभी पूरी नहीं होती।
यहां कुछ भी पूरा होनेवाला नहीं है। यहां तो जितना पीयो उतनी प्यास बढ़ती जाती है। यहां तो जितना भोजन करो उतनी भूख बढ़ती जाती है। यहां तो जितनी तिजोड़ी भरती जाएउतना ही आदमी भीतर कृपण होता चला जाता है। दुनिया बड़ी अदभुत है! यहां गरीब के पास तो अमीर का दिल मिल भी जाएअमीर के पास बिलकुल गरीब का दिल होता है।
इन हजार उपद्रवों में अगर तुम सोचते हो कि परमात्मा को भी एक आकांक्षा बना लेंगेतो संभव नहीं है। परमात्मा तो अभीप्सा बनेतो ही तुम अधिकारी होते हो। अभीप्सा का अर्थ होता है: सारी इच्छाएं उसी की इच्छा में परिणत हो जाएंसारे नदी-नाले उसी के सागर में गिर जाएंउसके अतिरिक्त कुछ भी न सूझेउसके अतिरिक्त हृदय में कोई आवाज न रहेउसके अतिरिक्त श्वासों में कोई स्वर न बजेउसका ही इकतारा बजने लगे!
फकीरों के पास तुमने इकतारा देखा है। कभी सोचा न होगाइकतारा प्रतीक है: परमात्मा के लिए एक ही तार काफी है। सितार में और बहुत तार होते हैंवीणा में बहुत तार होते हैं और सारंगी में बहुत तार होते हैं--वे संसार के प्रतीक हैंइकतारापरमात्मा का।
बस इकतारा! एक ही अभीप्सा का स्वर बजने लगेदूसरी कोई ध्वनि भी न रह जाएतो ही
"रग रग में नेशे इश्क हैऐ चारागर मेरे!
यह दर्द वह नहींके कहीं होकहीं न हो।'
रगरग में नेशे इश्क हैऐ चारागर मेरे!
यह दर्द वह नहींकि कहीं होकहीं न हो।'
जब परमात्मा का दर्द तुम्हारे रग-रग में समा जाता हैजब तुम्हारा रोआं-रोआं उसी को पुकारता हैसोते और जागते अहर्निश उसका ही स्मरण बना रहता हैकरो कुछ भीयाद उसकी हीजाओ कहींयाद उसकी हीबैठो कि उठो कि सोओयाद उसकी ही-- जब रग-रग में ऐसा समा जाता हैतभी तुमने पात्रता पायीतभी तुम अधिकारी हुए।
और ध्यान रखनाआज नहीं कलइस महाक्रांति में उतरना ही पड़ेगा। लाख तुम कोशिश करो इस संसार को घर बना लेने की,सफलता मिलनेवाली नहीं है। कोई कभी सफल नहीं हो पाया। सपने को सच कितना ही मानोसपना एक दिन टूटता ही है। सपने का स्वभाव ही टूट जाना है। तुम उसे सच मान कर थोड़ी-बहुत देर नींद ले सकते होलेकिन सदा के लिए यह नींद नहीं हो सकती। सपने का स्वभाव ही शुरू होनासमाप्त होना है। इस संसार कोतुम लाख कोशिश करो...हम सब कोशिश कर रहे हैं...हमहमारी सारी कोशिश यही है कि बुद्धनारदमीरा इन सबको हम गलत सिद्ध कर दें।
हम सबकी कोशिश क्या हैहमारी कोशिश यही है कि हम सिद्ध कर देंगे किसंसार में सुख हैहम सिद्ध कर देंगे कि परमात्मा आवश्यक नहीं हैहम सिद्ध कर देंगे कि जीवन परमात्मा के दिन पर्याप्त हैहम सिद्ध कर देंगे कि धन में है कुछ,कि यह सपना नहीं हैमाया नहीं हैसत्य है।
छोड़ो इस मूढ़ता कोकभी कोई कर नहीं पाया! लेकिन इस करने की कोशिश में लोग अपने जीवन को गंवा देते हैं।
"हजार तरह तखय्युल ने करवटें बदली
कफस कफस ही रहाफिर भी आशियां न हुआ।'
नहींयह घर न बन पाएगा। यह जगह कारागृह हैयह घर न बन पाएगी। यहां तुम अजनबी हो। यहां तुम लाख उपाय करो,और कल्पनाएं कितनी ही करवटें बदलेंहजार तरह से कल्पनाएंसपने को संजोएंलेकिन यह जाल कल्पना का ही रहेगा।
कल्पना तुम्हारी हैसत्य परमात्मा का है। जब तक तुम सोचोगे-विचारोगेतब तक तुम सपने में रहोगे। जब तुम सोच-विचार छोड़ोगे और जागोगेतब तुम जानोगेसत्य क्या है।
सत्य मुक्तिदायी है। और जो मुक्त करे वही घर है। जहां स्वतंत्रता हो वही घर है।
कारागृह में और घर में फर्क क्या हैदीवालें तो उन्हीं ईंटों की बनी हैंदरवाजे उन्हीं लकड़ियों के बने हैं।
कारागृह और घर में फर्क क्या हैघर में तुम मुक्त होकारागृह में तुम मुक्त नहीं हो--बस इतना ही फर्क है।
घर स्वतंत्रता हैकारागृह गुलामी है।
"हजार तरह तखय्युल ने करवटें बदलीं
कफस कफस ही रहाफिर भी आशियां न हुआ।'
कारागृह में तुम बदलते रहो कल्पनाएं अपनीसोचते रहोजाले बुनते रहो सपनों केसजाते रहो भीतर से कारागृह को-- नहीं,घर न हो पाएगा।
जो जितनी जल्दी जाग जाए इस संबंध में उतना ही सौभाग्यशाली हैजितनी देर लगती है उतना ही समय व्यर्थ जाता है;जितनी देर लगती है उतनी ही गलत आदतें मजबूत होती चली जाती हैजितनी देर लगती है उतने ही बंधन और भी सख्त होते चले जाते हैं और तुम्हारी शक्ति क्षीण होती चली जाती है उन्हें तोड़ने की। इसलिए बुढ़ापे की प्रतीक्षा मत करना। अगर समझ आए तो जब समझ आ जाएक्षण-भर भी स्थगित मत करना उस समझ को।
"लौकिक और वैदिक समस्त कर्मों के त्याग को निरोध कहते हैं।'
संस्कृत का मूल बहुत अदभुत है! हिंदी में अनुवाद जो लोग करते हैंउन्हें त्याग और निरोध का कोई भेद साफ नहीं है।
संस्कृत का मूल कहता है:
लोकवेदव्यापारइस सबका निरोध हो जाएन्यास हो जाएवही भक्ति है।
इसे समझें हम।
इस लोक और परलोक के व्यापार का निरोध हो जाए...।'
इस लोक का व्यापार है: धन की दौड़ हैपद की दौड़ है। परलोक का भी व्यापार है: सुखआनंदमोक्षवे भी यात्रा ही हैंवे भी दौड़ हैं। किसी तरह इस संसार से तुम ऊबते होऊब नहीं पाए कि तुम दूसरे संसार के सपने देखते शुरू कर देते हो। इसी तरह सपने देखनेवालों ने स्वर्ग बनायेस्वर्ग में हजार कल्पनाओं को जगह दीजो-जो यहां पूरा नहीं हो पाया हैवह-वह वहां रख लिया है। और कभी-कभी तो कल्पनाएं बड़ी मूढ़तापूर्ण मालूम होती हैं कि विचारों तो बड़ी हैरानी होती है।
मुसलमान कहते हैंउनके स्वर्ग में बहिश्त मेंशराब के चश्मे बहा रहे हैं। यहां पीने नहीं देते। यहां कहते हैं पाप और वहां चश्मे बहाते हैं। तुम सोच सकते होबात बिलकुल सीधी हैयह चश्मों की कल्पना किसने की होगी। यह उन्होंने की है जिनको यहां पीने में रस था और त्याग कर दिया। यह सीधी-सी बात हैसीधा मनोविज्ञान है। यहां पीना चाहते थेलेकिन डर की वजह से पी न पाये। यहां पीना चाहते थेलेकिन धार्मिक शिक्षण की वजह से पी न पाये। यहां पीना चाहते थे लेकिन हिम्मत न जुटा पायेतो अब स्वर्ग में चश्मे बहा रहे हैं। यहां चुल्लू-चुल्लू मिलती हैवहां डुबकी लगाएंगे।
"जाहिद के कस्रे-जुहूद की बुनियाद है यही
मस्जिद बहुत करीब थीमैखाना दूर था।'
वह जिनको तुम त्यागी समझते होउनके त्याग में अधिकतर तो कारण यही है कि मस्जिद करीब थी और मधुशाला दूर थी...इतना ही। इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म का शिक्षण देनेवाले लोग तो पास थेशराब का विज्ञापन करनेवाले लोग दूर थे। मां-बापसमाजपरिवारमंदिर-मस्जिदस्कूल-विद्यालयवे सब शराब के खिलाफ हैंवे सब मस्जिद और मंदिर के पक्ष में हैं। इसलिए बैठ तो गये मंदिर मेंबैठ तो गये मस्जिद मेंलेकिन मन का रागमन की कामनाकोई शिक्षण से थोड़े ही मिटती है;अनुभव से मिटती है। सोचते तो शराब की ही हैंयहां नहीं मिलीतो अब कल्पना में फैलाव करते हैंस्वर्ग में मिलेगी!
हिंदुओं का स्वर्ग है...।
और बड़े मजे की बात हैअगर तुम किसी भी जाति का स्वर्ग ठीक से पहचान लो तो तुम यह भी समझ जाओगे: उस जाति ने किन-किन चीजों की वर्जना की है। उस जाति के शास्त्रों को पढ़ने की जरूरत नहींउसका स्वर्ग समझ लोफौरन पता चल जाएगा कि इस जाति ने किन-किन चीजों को जबरदस्ती त्याग है।
...हिंदुओं के स्वर्ग में कल्पवृक्ष हैजहां सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैंबैठ जाओ उसके नीचे बस! ऐसा भी नहीं कि कुछ समय का फासला पड़ता होसमय लगता ही नहीं है। तुमने यहां कामना की कि यहां पूरी हुई! तुमने कहा, "भोजन आ जाए', थाल आ गये! बस तुम यहां कह भी नहीं पाये थे और थाल मौजूद हो गये।
हिंदुओं के स्वर्ग में कल्पवृक्ष है--क्योंक्योंकि हिंदुओं ने सभी इच्छाओं के त्याग का आग्रह किया है। सभी इच्छाओं का त्याग! स्वभावतः: जो किसी तरह अपने को समझा-बुझाकर त्यागी हो जाएगावह इसी आशा में जी रहा है कि कभी तो मरेंगेयह देह तो कोई ज्यादा दिन चलनेवाली नहीं हैऔर कुछ साल बीत जाएंफिर कल्पवृक्ष है! फिर उसके नीचे बैठ जाएंगे!
तुमने कभी देखादिन में कभी उपवास कर लो तो तुम रात-भर भोजन के सपने देखते हो! ब्रह्मचर्य का व्रत ले लो तो सपने में स्त्रियां ही स्त्रियां दिखायी पड़ती हैं।
ये सपने हैं: कल्पवृक्ष! शराब के चश्मे! ये इस बात की खबर दे रहे हैं कि तुमने किस-किस चीज को जबरदस्ती छोड़ दिया है--अनुभव से नहींपक कर नहीं। संस्कारशिक्षण,दबाव...!
"मस्जिद बहुत करीब थीमैखाना दूर था!उतने दूर जाने की तुम हिम्मत न जुटा पाये। जाते तो प्रतिष्ठा दांव पर लगती थी। तो तुमने एक तरकीब निकाली कि यहां मस्जिद में रहोस्वर्ग में मयखाने में रह लेंगे। ऐसे तुमने अपने को समझाया। ऐसे तुमने समझौता किया।
तुम्हारे स्वर्ग तुम्हारी कल्पनाओं के जाल हैंऔर तुम्हारे नरक...स्वर्ग तुमने अपने लिए बनाये हैं और नरक दूसरों के लिए--वे भी बड़े विचारणीय हैं।
हिंदुओं का नरक हैतो भयंकर आग जल रही हैसतत अग्नि जलती हैबुझती नहीं। उसमें जलाये जा रहे हैं लोग। भारत गरमी से पीड़ित देश है। यहां सूर्य तपता है। तो शीतलता स्वर्ग में...शीतल मंद बयार बहती है! सुबह ही बनी रहती है स्वर्ग में,दोपहर नहीं आती। बस सुबह की ही ताजगी बनी रहती है। फूल खिलते हैंमुरझाते नहीं। और शीतल हवा कहती रहती है। नरक में भयंकर लपटें हैं। वह गरम देश की धारणा है।
तिब्बतीवे नहीं बनातेवे नहीं कहते कि नरक में लपटें हैं। उनका स्वर्ग गरम और ऊष्ण हैक्योंकि ठंडे मुल्क के लोग मरे जा रहे हैं ठंड सेनरक में बर्फ-ही-बर्फ जमी हैउसमें लोग गल रहे हैं बर्फ में!
न तो कहीं कोई स्वर्ग हैन कहीं कोई नरक है। स्वर्ग तुम बनाते हो अपने लिए। जो-जो कामनाएं तुम पूरी करना चाहते थे और नहीं कर पायेतो तुम स्वर्ग में कर लेते हो। स्वर्ग हिंदुओं का बिलकुल एयरकंडीशंड हैवातानुकूलित है। वहां कोई ताप नहीं लगती। पसीना नहीं आता स्वर्ग में--पसीना आता ही नहीं।
और जो तुम छोड़ दिये होअपने लिए कल्पना कर रहे होऔर दूसरों ने नहीं छोड़ा... समझो कि तुम शराब पीना चाहते थे और नहीं पी पायेतो तुमने अपने लिए तो स्वर्ग में इंतजाम कर और जी रहे हैंउनके लिए क्या करोगेउनको भी दंड तो मिलना ही चाहिएक्योंकि तुमने त्याग कियाउन्होंने त्याग नहीं कियातो उनको नरक की लपटों में जलाया जाएगा। और वहां शराब तो दूरपानी भी पीने को न मिलेगा। आग की लपटें होंगीकंठ आग से भरा होगाऔर पानी नहीं मिलेगा! पानी की बूंद नहीं मिलेगी!
इससे पता चलता है तुम्हारे मन कातुम्हारी खुद की परेशानी कातुम्हारी हिंसा कातुम्हारी वासना का। न किसी स्वर्ग का इससे पता चलता हैन किसी नरक का इससे पता चलता है।
भक्ति तो उसे उपलब्ध होती है जिसको न इस संसार की कोई कामना रही न उस संसार की। जिसकी कामना का व्यापार निरुद्ध हो गयाजिसने कहा, "अब हमें कुछ मांगना ही नहीं हैन यहां न वहां', मां ही छोड़ दी--उसे सब मिल जाता है "यही'
"उस प्रियतम भगवान में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।'
बिलकुल ठीक।"उस प्रियतम भगवान में अनन्यता'...! जैसे हम उसके साथ एक हो गयेअनन्य! जरा भी भेद न रह जाए! रत्ती भर भी फासला न रह जाए! मैं और तू का फासला न रह जाए!
"उस प्रियतम में अनन्यता अपने आप ही उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता बन जाती है।'
"उदासीनताशब्द को समझ लेना जरूरी है। उदासीनता निरोध का मार्ग है।
जिसको तुम त्यागी कहते होवह उदासीन नहीं होता। जो आदमी शराब का त्याग करता हैवह शराब के प्रति उदासीन नहीं होताशराब के प्रति बड़े विरोध में होता है--उदासीन कैसे होगाविरोध में होता है।
उदासीन का अर्थ है: हमें कोई प्रयोजन नहीं। विरोध का अर्थ है: शराब जहर है।
जो आदमी कामवासना में उदासीन होता हैवह कामवासना के विरोध में नहीं होता। अगर कोई दूसरा कामवासना में जा रहा है तो इससे उसके मन में निंदा पैदा नहीं होती--"यह उसकी मर्जी है! यह उसकी समझ है! उसका समय न आया होगाकभी आयेगा।उस पर करुणा आ सकती हैक्रोध नहीं आता।
जो आदमी धन में उदासीन हैउसके मन में धन की कोई निंदा नहीं होती। वह धन का पाप नहीं कहता। वह इतना ही कहता है कि धन की उपयोगिता हैलेकिन वह उपयोगिता बड़ी क्षणिक है। वह इतना ही कहता है कि धन सब कुछ नहीं है। वह यह नहीं कहता कि धन कुछ भी नहीं है। वह इतना ही कहता हैसंसार में उपयोगी होगालेकिन संसार सब कुछ नहीं है। वह धन के विरोध में नहीं है।
ऐसे त्यागी हैं कि अगर उनके सामने तुम रुपये ले जाओ तो वे आंख बंद कर लेते हैं। अब वह उदासीनता न हुई। ऐसे त्यागी हैं जो धन को हाथ से नहीं छूते। यह उदासीनता न हुई।
एक आदमी मुझे मिलने आया--एक संन्यासी। कोई दो वर्ष हुए। तो मैंने उन्हें कहा कि ठीक हैकभी एक शिविर में आ जाओ तो ध्यान करो। उन्होंने कहा कि यह जरा मुश्किल है। उनके साथ एक आदमी और था। तो मैंने पूछा, "इसमें क्या मुश्किल है?'
उन्होंने कहा, "मैं पैसा नहीं छूता। तो टेन में सफर करो तो टिकट भी खरीदनी पड़ती है।'
तो मैंने कहा, "तुम यहां तक कैसे आये?'
तो वे बोले, "यह आदमी साथ है। पैसे यह रखता हैमैं छूता भी नहीं। तो यही साथ आने को तैयार हो तो ही मैं शिविर में आ सकता हूं।
अब यह तो पैसे से भी ज्यादा बड़ी गुलामी हो गयी। पैसाऔर यह आदमी भी उलटा...। इससे तो अकेले पैसे ही गुलामी भी ठीक थीअब यह कम-से-कम आदमी एक और उपद्रव है। और पैसे इन्हीं के हैं,, रखता वह है! यह दोहरी गुलामी हुई!
उदासीनता का अर्थ है: हो तो हो ठीकन हो तो ठीक। उदासीनता में को पक्षपात नहीं है। उदासीनता बड़ी अदभुत बात है। वह वैराग्य का परम लक्षण है।
इसलिए अगर तुम किसी वैरागी में पाओ उदासीनता की जगह विरोधतो समझना कि चूक हो गयी। अगर वह घबड़ाये तो समझना कि रस कायम हैजिस चीज से घबड़ाता है उसी का रस कायम है। अगर धन छूने से डरे तो समझना कि धन का लोभ भीतर मौजूद है। अगर स्त्री को देखने से डरे तो समझना कि कामवासना भीतर मौजूद है। क्योंकि हम उसी से डरते हैं जिसमें गिरने की हमें संभावना मालूम होती हैशंका मालूम होती है।
उदासीनता का अर्थ है: कोई फर्क नहीं पड़ता।
ऐसा हुआ कि बुद्ध एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते थेपूर्णिमा की रात थीऔर पास के नगर से कुछ युवकधनपतियों के लड़केएक वेश्या को लेकर जंगल में आ गये थे-- मौज-रंग करने! वे तो शराब पीकर मस्त हो गयेवेश्या ने मौका देखा कि वे तो शराब पीकर होश खो दिये हैंवह भाग खड़ी हुई।
जब सुबह होने के करीब आयी और उनको ठंड लगी और होश आया और देखा कि वह 'वेश्या तो भाग गयी हैतो वे उसकी खोज में निकले। उसी रास्ते पर बुद्ध ध्यान करते थेउनके पास आये और उन्होंने कहा कि "यहां से कोई स्त्री तो नहीं निकली?'
बुद्ध ने कहा, "कोई निकला जरूरलेकिन स्त्री थी या पुरुषयह जरा कहना मुश्किल है--क्योंकि मेरा रस ही न रहा। कोई निकला जरूरलेकिन स्त्री थी या पुरुषइसमें मेरा रस न रहा।'
यह उदासीनता है।
बुद्ध ने कहा कि जब तक मेरा रस थातब तक गौर से देखता भी था: कौन कौन है! अब मेरा कोई रस नहीं है।
जब रस खो जाता है तो सिर्फ एक उदासीनता होती हैएक शांति तुम्हें घेर लेती है। उसमें कोई पक्षपात नहीं होता।
उस प्रियतम में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।' "पीना-न-पीना एक है जाहिद! खता मुआफ
नीयत जब एतबार के काबिल नहीं रही।'
जब तक नीयत पर एतबार न होजब तक अपने भीतर की स्थिति पर भरोसा न हो तब तक तुम कसमें भी ले लोतो कुछ फर्क नहीं पड़ताव्रत धारण कर लोकोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि असली बात तो नीयत है। तुम पियो न पियोइससे कोई फर्क नहीं पड़ताघर में रहो कि बाहर रहोइससे कोई फर्क नहीं पड़तापूजा करो कि न करोइससे कोई फर्क नहीं पड़ता--असली सवाल तुम्हारे भीतर की नीयत का है। अगर नीयत साफ है तो तुम कहीं भी रहोमंदिर ही पाओगे। अगर नीयत साफ नहीं हैतो तुम मंदिर में रहोतुम वेश्यागृह में ही रहोगे। क्योंकि आदमी अपनी नीयत में रहता हैअपने भीतर की मनोदशा में रहता है।
"उस प्रियतम में अनन्यता...।'
"कैसी तलबकहां की तलबकिसलिए तलब
हम हैं तो वह नहीं हैवह है तो हम नहीं।'
एक ही बच सकता है प्रेम मेंदो नहीं। या तो परमात्मा बचेगा तो तुम न बचोगेया तुम बचोगे तो परमात्मा न बचेगा।
"कैसी तलबकहां की तलबकिसलिए तलब
हम हैं तो वह नहीं हैवह है तो हम नहीं।'
अनन्यता का अर्थ है: एक ही बचेगा।
प्रेम गली अति सांकरी तामे दो न समाय'--उसमें दो नहीं समा सकते।
तो भक्त धीरे-धीरे भगवान हो जाता हैभगवान धीरे-धीरे भक्त हो जाता है।
रामकृष्ण पूजा करते हैं तो भोग लगाने के पहले खुद चख लेते हैं। मंदिर के ट्रस्टियों ने बुलाया कि "यह तो पूजा न हुई। किस शास्त्र में लिखा हैभगवान को भोग पहले लगाओफिर तो बचेवह तुम भोजन करो। लेकिन यह तो बात तो गलत हो रही है। यह उलटा हो रहा है। तुम भगवान को झूठा भोग लगा रहे हो! तुम पहले चखते हो।'
रामकृष्ण ने कहा, "संभाल लो फिर अपनी नौकरीमैं चला। क्योंकि मेरी मां जब भी भोजन बनाती थी तो पहले खुद चखती थी,फिर मुझे देती थी। जब मां का प्रेम इतनी फिक्र करता था तो यह प्रेम तो उससे भी बड़ा है। मैं बिना चखे भोग नहीं लगा सकता भगवान कोपता नहीं लगाने योग्य है भी या नहीं!'
ऐसी अनन्यताऐसी निकटताइतनी समीपताकि धीरे-धीरे सीमाएं खो जाएं! तो कभी ऐसा होता है कि रामकृष्ण दिन-भर नाचते रहते और कभी ऐसा होता कि पखवाड़ा बीत जाता और मंदिर में न जाते। फिर बुलाये गये के यह क्या मामला हैमंदिर खाली पड़ा रहता हैपूजा नहीं होती। रामकृष्ण कहते, "जब होती है तब होती हैजब नहीं होती तब नहीं होती। जब "वहबुलाता है और जब अनन्यता का भाव जगता है तभी...। जब दूरी रहती हैतब क्या सारजब मैं रहता हूं तब पूजा किसकीजब वही बचता है तभी होती है। जब यह मेरे हाथ में नहीं है कि वही बचे। जब होता है तब होता है। सहजस्फूर्त है!'
रामकृष्ण जैसा पुजारी फिर किसी मंदिर को न मिलेगा। दक्षिणेश्वर के भगवान धन्यभागी हैं कि रामकृष्ण जैसा पुजारी मिला।
अनन्य-भाव का अर्थ है: "मैंऔर "तूदो नहींएक ही बचता है। वस्तुतः दोनों तरफ से प्रेमी-प्रेयसी या भक्त और भगवानदोनों खोते हैं और दोनों के बीच में एक नये का आविर्भाव होता है: एक नये ज्योतिर्मय चैतन्य का आविर्भाव होता हैजिसमें भक्त भी खो गया होता है एक कोने सेदूसरे कोने से भगवान भी खो गया होता है।
भक्त और भगवान तो द्वैत की भाषा हैभक्ति तो अद्वैत है।
"उस प्रीतम में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।'
और जिसने भी उसके साथ ऐसी एकतानता साध लीवह संसार के प्रति उदासीन हो जाता हैंछोड़ना नहीं पड़ता संसारत्यागना नहीं पड़ता संसारसब छूट जाता हैव्यर्थ हो जाता हैसार्थकता ही नहीं रह जातीछोड़ने को क्या बचता है।
"अपने प्रीतम को छोड़कर दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।'
परमात्मा तुम्हें ऐसा भर दे के तुम्हारे भीतर कोई रत्ती-भर जगह न बचे तो उससे भरी हुई नहीं हैतुम लबालब उससे भर जाओ,तुम ऊपर से बहने लगो ऐसे भर जाओकोई दूसरा आश्रय न बचेकिसी दूसरे की तरफ कोई लगाव न रह जाएसभी लगाव उस एक के प्रति ही समर्पित हो जाएं...।
"देखता था मैं निगाहों से हर एक जा तुझको
देखता था मैं निगाहों से हर एक जा तुझको
और उन्हीं में तू निहां थामुझे मालूम न था।'
"आंखों से खोजता था तुझे सब जगह और यह मुझे पता नहीं था कि मेरी आंखों में ही बैठा हुआ है! तू खोजनेवाले में ही छिपा है। तू मेरे देखने में ही छिपा है। और मैं निगाहों से खोजता था हर एक जा तुझकोऔर यह पता न था...!
तुम जब तक परमात्मा को बाहर खोज रहे होखोज न पाओगे। वह उन निगाहो में ही छिपा हैउस दृष्टि में हीउस देखने की क्षमता में ही! वह तुम्हारे होश में छिपा है। वह तुम्हारे होने में छिपा है।
"देखता था मैं निगाहों से हर एक जा तुझको
और उन्हीं में तू निहां थामुझे मालूम न था।'
तुम मंदिर हो।
परमात्मा को खोजने किसी और मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है। अपने ही भीतर डूब कर पाया हैजिन्होंने भी पाया है।
अगर तुम सारे आसरे छोड़ दोसारे सहारे छोड़ दोतो तुम अपने ही डूब जाओगे। जो भी तुम पकड़े हो आसरे की तरहवही तुम्हें अपने से बाहर अटकाये हुए है। धन का आसरा हैपद का आसरा हैमित्र का आसरा हैसंगी-साथियों कापरिवार का आसरा हैपति-पत्नी का आसरा है! जिन-जिन आसरों को तुम सोच रहे हो कि ये सहारे हैंसुरक्षा हैंवही तुम्हें बाहर अटकाये हैं।
छोड़ दो सब आसरे!
बे-आसरे हो जाओ!
बे-सहारा हो जाओ!
असहाय हो जाओ!
और अचानक तुम पाओगे: तुम्हें अपने ही भीतर वह भूमि मिल गयी जिसे जन्मों-जन्मों खोजते थे और न पाते थेअपने ही भीतर वह हाथ मिल गया जो शाश्वत है। अब किसी और आसरे की कोई जरूरत न रही।
"लौकिक और वैदिक कर्मों में भगवान के अनुकूल कर्म करन ही उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता है।'
और फिर ऐसा व्यक्ति जिसकी अनन्यता सध गयी परमात्मा सेजिसका तार मिल गयातन्मयता बंध गयीएक सामंजस्य आ गयाहाथ परमात्मा के हाथ में हो गया जिसका--ऐसा व्यक्ति फिर उसके ही अनुकूल कर्म करता है, ""वहजो करवाता है वही करता है। फिर उसका अपना कर्ता-भाव चला जाता है। फिर वह कहता है, "जो वह करवाये! जो उसकी मर्जी! जो नाच नचाये,वही मेरा जीवन है।फिर अपनी तरफ से निर्णय लेनाअपनी तरफ से विचार करनासंभव नहीं है।
"विधि-निषेध से अतीत अलौकिक प्रेम प्राप्ति का मन में दृढ़ निश्चय हो जाने के बाद भी शास्त्र की रक्षा करनी चाहिएअन्यथा गिर जाने की संभावना है
यह सूत्र महत्वपूर्ण हैक्योंकि ऐसा घटता है। जब तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम परमात्मा के अनुसार चलने लगेजब तुम्हें ऐसा लगता है कि अब तो तुम एक हो गयेतो सारी विधि-निषेध के पार हो गयेअब समाज का कोई नियम तुम पर लागू नहीं होता।
सच हैकोई नियम लागू नहीं होतालेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि तुम नियम छोड़कर चलने लगो। तुम पर नियम नहीं लागू होतासमाज तो अब भी नियम में जीता है। तुम जिस समाज में होउस समाज के लिए तुम अड़चन मत बनोसहारा बनो;उस समाज के लिए तुम उपद्रव का कारण न बनोमार्ग बनो।
इसलिए नारद कहते हैं, "विधि-निषेध से अतीत...।कोई नियम लागू नहीं होता प्रेम परभक्त पर। वह पहुंच गया वहांसब नियमों के पारपरम नियम उसे मिल गया प्रेम काअब उस पर कोई नियम लागू नहीं होता। लेकिन फिर भीअगर वह रास्ते पर चले तो उसे बाएं ही चलना चाहिएक्योंकि सारा ट्रैफिक बाएं ही चल रहा है। अगर वह दाएं चलने लगेवह कहे कि हम तो भक्ति को उपलब्ध हो गयेतो खतरा है--खतरा है पतन का। असल में इस तरह का आग्रह वही आदमी करेगा जो अभी उपलब्ध ही नहीं हुआ हैवस्तुतः उपलब्ध नहीं हुआ है। क्योंकि उपलब्ध होकर तो कोई नहीं गिरताअसंभव है गिरना।
इसे थोड़ा गौर से समझ लेना।
जो उपलब्ध नहीं हुआ है परमात्मा कोवही इस तरह का आग्रह करेगा के मुझ पर तो कोई नियम लागू नहीं होता। यह अहंकार की नयी उदघोषणा है। यह अहंकार का नया खेल शुरू हुआ। एक नया संसार चला अब। वह कहेगामुझ पर कोई नियम लागू नहीं होता। मैं तो अब उसके ही सहारे जीता हूं। इसलिए जो "वहकरवाता है वही करता हूं।
इसकी आड़ में कहीं तुम अपने अहंकार को मत छिपा लेना। कहीं ऐसा न हो कि यह भी धोखा हो तुम्हारा।
इसलिए सूत्र कहता है: सजग रहना। ऐसी स्थिति भी आ जाये कि तुम विधि-निषेध के पार हो जाओतो भी शास्त्र की रक्षा जारी रखना। उस रक्षा में तुम्हारी रक्षा है। उस रक्षा में दूसरों की रक्षा तो है हीतुम्हारी भी रक्षा है। क्योंतुम अपने अहंकार को सजाने-संवारने का नया उपाय न पा सकोगे।
और स्मरण रखनाजो विधि-निषेध के पार हो गयावह विधि-निषेध को तोड़ने की चिंता में नहीं पड़ता। जो पार ही हो गया,वह चिंता क्या करेगा तोड़ने की! वह कमल जैसा पार हो जाता है पानी के। जो पार हो गया है वह जीवन को चुपचाप स्वीकार कर लेता है जैसा हैलोग जैसे जी रहे हैंठीक है।
छोटे बच्चे खिलौनों से खेल रहे हैंतुम वहां जाते होतुम जानते होवे खिलौने हैंतुम जानते होखेल के नियम सब बनाये हुए हैं। लेकिन बाप भी छोटे बच्चों के साथ जब खेलता है तो खेल के नियम मानता है। वह यह नहीं कह सकता कि मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूंमैं नियम के बाहर हूं। छोटे बच्चों के साथ छोटे बच्चों की तरह ही व्यवहार करेगा--यही प्रौढ़ का लक्षण है।
तो जो व्यक्ति वस्तुतः भक्ति के परम सूत्र को उपलब्ध होता हैवह तोड़ नहीं देता जीवन की व्यवस्था को। वह कोई अराजकता नहीं ले आता।
जीसस ने कहा है कि मैं शास्त्र को खंडित करने नहींपूर्ण करने आया हूं।
वह शास्त्र के मूल स्वभाव का पुनः पुनः उदघाटन करता है। वह शास्त्र के खो गये सूत्रों को पुनः पुनरुज्जीवित करता है। वह शास्त्र पर जम गयी धूल को हटाता है। वह शास्त्र के दर्पण को निखारता है ताकि फिर तुम शास्त्र के दर्पण में अपने चेहरे को देख सकोफिर तुम अपने को पहचान सको। सदियों में शास्त्र पर जो धूल जम जाती हैसदियों में स्त्री पर जो व्याख्या की परतें जम जाती हैंउनको फिर वह अलग कर देता हैलेकिन शास्त्र की रक्षा करता है। क्योंकि शास्त्र तो उनके वचन हैं जिन्होंने जाना। वे बुद्धपुरुषों के वचन हैं। व्याख्याएं कितनी ही गलत हो गयी होंलोगों ने कितना ही गलत अर्थ लिया हो,लेकिन मूल तो बुद्धपुरुषों से आता है,मूल तो गलत नहीं हो सकता।
मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं क्यों शास्त्रों की व्याख्या कर रहा हूं। इसीलिए कि जो धूल जमी हो वह अलग हो जाएताकि मैं तुम्हें उनका खालिस सोना जाहिर कर सकूं। अगर मैं तुम्हें कभी शास्त्र के विपरीत भी मालूम पड़ूंतो समझना कि तुम्हारे समझने में कहीं भूल हो गयी हैतो समझना कि तुमने शास्त्र का जो अर्थ समझा था वह अर्थ शास्त्र का न थाइसलिए मैं विपरीत मालूम पड़ रहा हूं। अन्यथा मैं भी तुमसे कहता हूं कि शास्त्र का खंडन करने नहींशास्त्र का शुद्धतम स्वरूप आविष्कृत करने की सारी चेष्टा है।
"लौकिक कर्मों को भी तब तक (बाह्म ज्ञान रहने तक) विधिपूर्वक करना चाहिएपर भोजनादि कार्यजब तक शरीर रहेगाहोते रहेंगे।
जो बाह्य कर्म हैंउन्हें साधारणतः जैसी विधि होजैसी समाज की धारणा होवैसे ही करते जाना चाहिए--बाह्य ज्ञान रहने तक! क्योंकि भक्ति में ऐसी घड़ियां भी आती हैं जब बाह्य ज्ञान बिलकुल खो जाता हैतब सूत्र लागू नहीं होता। क्योंकि ऐसी भी घड़ियां आती हैं जब मस्ती ऐसे शिखर छूती है कि बाह्य ज्ञान ही नहीं रह जाता। रामकृष्ण छह-छह दिन के लिए बेहोश हो जाते थे। जब फिर अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। तब वे अपने में इतने लीन हो जाते थेइतने दूर निकल जाते थे कि उनके शरीर को ही संभालकर रखना पड़ता था।
लेकिन भोजनादि कार्य तब तक होते रहेंगे जब तक शरीर है।'
इस सूत्र से यह समझ लो कि जीवन में वासना तो हटनी चाहिएजरूरतें हटाने का सवाल नहीं है। भोजन तो जरूरी है। वस्त्र जरूरी हैं। छप्पर जरूरी हैउसका कोई निषेध नहीं हैनिषेध है गैर जरूरी काजो कि केवल मन की आकांक्षा से पैदा होता है,जिसके बिना तुम रह सकते थेमजे से रह सकते थेजिसके बिना कोई अड़चन न पड़ती थीशायद और भी मजे से रह सकते।
एक बहुत बड़ा विचारक हुआ: अल्डुअस हक्सले। कैलिफोर्निया में उसका मकान थाऔर जीवन-भर उसने बड़ी बहुमूल्य चीजें इकट्ठी की थीं--पुराने शास्त्रबहुमूल्य अनूठी किताबेंचित्रपेंटिंगमूर्तियांशिल्प। बड़ा संवेदनशील व्यक्ति था। उसके पास बहुमूल्य भंडार था अनूठी चीजों का। सारे संसार से उसने इकट्ठा किया था। उसकी कीमत कूतनी आसान नहीं। अचानक एक दिन आग लग गयी और सब जलकर राख हो गया।
अल्डुअस हक्सले ने कहा कि मैंने तो सोचा था कि मैं मर जाऊंगा इसके दुख सेलेकिन अचानकजिसकी कभी अपेक्षा भी न की थीऐसा अनुभव हुआ कि जैसे एक बोझ हलका हो गया। एक बोझ! वह खुद भी चौंका यह अनुभव देखकर। सामने ही जल रहा है उसका विशाल संग्रहालय और वह सामने खड़ा है लपटों केऔर उसने कहा कि मुझे लगा कि मैं एकदम हलका हो गया हूं और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं स्वच्छ हो गया हूं।आई फैल्ट क्लीन"। एक ताजगी!
तुम्हें पता नहीं है कि बहुत-सी गैरजरूरी चीजों ने तुम्हें जीवन तो नहीं दिया हैबोझ दिया है। उनके बिना तुम ज्यादा स्वस्थ हो सकते थे। उनके बिना तुम ज्यादा प्रसन्न हो सकते थे। उन्होंने सिर्फ तनाव दिया हैचिंता दी है।
जरूरत को छोड़ने का कोई सवाल नहीं है। भक्ति कोई जबरदस्ती त्याग नहीं सिखाती। यह भक्ति की खूबी है और उसकी स्वाभाविकता है। जीवन की सामान्य जरूरतें पूरी होनी ही चाहिए।
तो भक्ति कोई जबरदस्ती नहीं करती कि तुम नग्न खड़े हो जाओतुम उपवास करोतुम शरीर को तपाओ व्यर्थ--ऐसी दुष्टता ऐसी हिंसा भक्ति नहीं सिखाती। यह भक्ति की खूबी है और उसकी स्वाभाविकता है। जीवन की सामान्य जरूरतें पूरी होनी ही चाहिए।
तो भक्ति कोई जबरदस्ती नहीं करती कि तुम नग्न खड़े हो जाओतुम उपवास करोतुम शरीर को तपाओ व्यर्थ--ऐसी दुष्टता,ऐसी हिंसा भक्ति नहीं सिखाती।
भक्ति कहती है: यह जो परमात्मा का मंदिर है तुम्हारा घरइसकी साज-संभाल जरूरी है। यह उसका घर है। इसे तुम्हें "उसके'योग्य स्वच्छ और ताजा सुंदर रखना चाहिए। लेकिन जरूरत और वासना में फर्क समझना आवश्यक है।
मैंने सुना हैमुल्ला नसरुद्दीन एक स्त्री के प्रेम में थाशादी करना चाहता था। तो उस स्त्री ने कहा, "नसरुद्दीनऔर तो सब ठीक हैएक बात मैं पूछना चाहती हूंकि तुम उन पुरुषों में तो नहीं हो जो शादी के बाद पत्नी को दफ्तरों में काम करवाते हैं या नौकरी करवाते हैं?
नसरुद्दीन ने कहा,"भूलकर भी इस तरह का मत सोच। कभी भी मेरी पत्नी काम पर जाने वाली नहीं है। हांएक बात और,अगर कपड़ारोटीमकान जैसी विलास की चीजों की तूने मांग की तो फिर मैं नहीं जानता...। लेकिन रोटीकपड़ामकानऐसी विलास की चीजें मत मांगना।'
विलास और जरूरत में फर्क करना जरूरी है।
भक्ति स्वस्थ सहज मार्ग है। स्वाभाविकअस्वाभाविक नहीं। भक्ति तुम जैसे होतुम्हारी जरूरतों को स्वीकार करती है। कहीं कोई अकारण अपने को कष्ट देनापीड़ा देनाव्यर्थ के तनाव खड़े करनेउनसे आदमी परमात्मा के प्रेम को उपलब्ध नहीं होता,उनसे तो और सघन अहंकार को उपलब्ध होता है।
भक्ति त्याग नहीं हैनिरोध है। जो अपने से छूट जाए। जो व्यर्थ है छूट जाएगा। जो सार्थक हैजरूरी हैशेष रहेगा।
इसलिए आखिरी सूत्र है: लौकिक कर्मों को भी तब तक (बाह्य ज्ञान रहने तक) विधिपूर्वक करना चाहिएपर भोजनादि कार्य जब तक शरीर रहेगाहोते रहेंगे।
भक्ति की यह स्वाभाविकता ही उसके प्रभाव का कारण है।
भक्ति बड़ी संवेदनशील है। वह जीवन को कुरूप करने के लिए उत्सुक नहीं हैजीवन का सौंदर्य स्वीकार है। क्योंकि जीवन अन्यथा परमात्मा का ही हैअंततः वही छिपा है! उसको ध्यान में रखकर ही चलना उचित है।
जो व्यर्थ है वह छूट जाए। जो सार्थक है वह संभल जाए। जो कूड़ा-करकट है वह अपने आप गिर जाएजो बहुमूल्य है वह बचा रहे।
भक्ति को अगर तुम ठीक से समझो तो तुम पाओगे धर्म की उतनी सहजस्वाभाविक और कोई व्यवस्था नहीं है।

आज इतना ही।

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