मंगलवार, 19 सितंबर 2017

मन को जानों!

मनुष्य का मन ही सब कुछ है। यह मन सब कुछ जानना चाहता है। लेकिन, ज्ञान केवल उन्हें ही उपलब्ध होता है, जो कि इस मन को ही जान लेते हैं।
कोई पूछता था, ''सत्य को पाने के लिए मैं क्या करूं?'' मैंने कहा, ''स्वयं की सत्त में प्रवेश करो। और, यह होगा चित्त की जड़ पकड़ने से। उसके शाख-पल्लवों की चिंता व्यर्थ है। चित्त की जड़ को पकड़ने के लिए आंखों को बंद करो और शांति से विचारों के निरीक्षण में उतरो। किसी एक विचार को लो और उसके जन्म से मृत्यु तक का निरीक्षण करो।'' लुक्वान यू ने कहा है, ''विचारों को ऐसे पकड़ो, जैसे कि कोई बिल्ली चूहे की प्रतीक्षा करती और झपटती है।'' यह बिलकुल ठीक कहा। बिल्ली की भांति ही तीव्रता, उत्कटता और सजगता से प्रतीक्षा करो। एक पलक भी बेहोशी में न झपे और फिर जैसे ही कोई विचार उठे, झपटकर पकड़ लो। फिर उसका सम्यक निरीक्षण करो। वह कहां से पैदा हुआ और कहां अंत होता है- यह देखो। और, यह देखते-देखते ही तुम पाओगे कि वह तो पानी के बुलबुले की भांति विलीन हो गया है या कि स्वप्न की भांति तिरोहित। ऐसे ही क्रमश: जो विचार आवें, उनके साथ भी तुम्हारा यही व्यवहार हो। इस व्यवहार से विचार का आगमन क्षीण होता है और निरंतर इस भांति उन पर आक्रमण करने से वे आते ही नहीं हैं। विचार न हों, तो मन बिलकुल शांत हो जाता है। और, जहां मन शांत है, वहीं मन की जड़ है। इस जड़ को जो पकड़ लेता है, उसका स्वयं में प्रवेश होता है। स्वयं में प्रवेश पा लेना ही सत्य को पा लेना है।
सत्य जानने वाले में ही छिपा है। शेष कुछ भी जानने से वह नहीं उघड़ता। ज्ञाता को ही जो जान लेते हैं, ज्ञान उन्हें ही मिलता है। ज्ञेय के पीछे मत भागो। ज्ञान चाहिए, तो ज्ञाता के भी पीछे चलना आवश्यक है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

रविवार, 10 सितंबर 2017

बहुतेरे हैं घाट - प्रवचन-04

अंतिम स्वर्ण सोपान: परम मौन
पहला प्रश्नः
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः
वृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
नासो धर्मो यत्र न सत्यमस्ति
न तत्सत्यं यच्छलेलानुविद्धम्।।
‘जिसमें वृद्ध नहीं हैं वह सभा नहीं है; जो धर्म को नहीं बतलाते वे वृद्ध नहीं हैं।
 जिसमें सत्य नहीं है वह धर्म नहीं है; जिसमें छल मिला हुआ है वह सत्य नहीं है।’
महाभारत के इस सुभाषित पर कुछ कहने की कृपा करें।

सहजानंद, वृद्ध होना तो बहुत आसान है। कुछ न करो तो भी वृद्ध हो ही जाओगे। अधार्मिक भी वृद्ध हो जाता है, धार्मिक भी वृद्ध हो जाता है; पापी भी, पुण्यात्मा भी; साधु भी, असाधु भी। वृद्ध होना कोई कला नहीं है। पशु-पक्षी भी वृद्ध होते हैं, वृक्ष भी वृद्ध होते हैं, पहाड़-पर्वत भी वृद्ध होते हैं। 
जैसे विंध्याचल पर्वत पृथ्वी का सबसे बूूढा पर्वत है..इतना कि उसकी कमर झुक गई है। उसकी झुकी कमर के कारण ही यह कहानी बनी कि अगस्त्य ऋषि दक्षिण गए, तब विंध्याचल ने झुक कर उनको नमस्कार किया। और वे कह गए कि जब तक मैं लौट न आऊं, तब तक तू झुका रहना। फिर वे लौटे नहीं, वे समाप्त ही हो गए। तब से बेचारा विंध्याचल झुका ही है। असलियत यह है कि विंध्याचल पृथ्वी पर सबसे बूढ़ा पर्वत है और हिमालय सबसे युवा।


पर्वत भी बूढ़े होते हैं, वृक्ष भी बूढ़े होते हैं, पशु-पक्षी भी बूढ़े होते हैं, आदमी भी बूढ़ा होता है। बूढ़ा होना कोई अपने में गुण नहीं है। इसकी कोई महत्ता नहीं है।
इसलिए यह सूत्र कहता हैः ‘जिसमें वृद्ध नहीं हैं वह सभा नहीं है।’ इसका अगर मोटा-मोटा अर्थ लो, तब तो यह सूत्र बिल्कुल गलत है। लेकिन इसका गहरा अर्थ भी लिया जा सकता है। मैं आश्वासन नहीं दे सकता कि वही गहरा अर्थ महाभारत का भी रहा होगा, क्योंकि सूत्र का बाकी हिस्सा भी बहुत उथली बातों से भरा है। लेकिन इन उथली बातों का संकेत इस भांति उपयोग किया जा सकता है कि तुम्हारे लिए मार्गदर्शक हो सके।
इसलिए मुझे चिंता नहीं है कि महाभारत का क्या अर्थ है। मुझे इसकी चिंता है कौन सा अर्थ तुम्हारे लिए सार्थक होगा। मुझे तुम्हारी फिकर है, महाभारत से मुझे क्या लेना-देना?

बहुतेरे हैं घाट - प्रवचन-03

रसो वै सः की धूम
प्रश्न:
पहला प्रश्नः कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः।
उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन्।।
चरैवेति। चरैवेति।।
‘जो सो रहा है वह कलि है, निद्रा से उठ बैठने वाला द्वापर है,
उठ कर खड़ा हो जाने वाला त्रेता है, लेकिन जो चल पड़ता है
वह कृतयुग, सतयुग, स्वर्ण-युग बन जाता है।
इसलिए चलते रहो, चलते रहो।’
ऐतरेय ब्राह्मण के इस सुभाषित का अभिप्राय समझाने का अनुग्रह करें।

नित्यानंद, यह सूत्र मेरे अत्यंत प्यारे सूत्रों में से एक है। जैसे मैंने ही कहा हो। मेरे प्राणों की झनकार है इसमें। सौ प्रतिशत मैं इससे राजी हूं। इस सूत्र के अतिरिक्त सतयुग की, द्वापर की, त्रेता की, कलियुग की जो भी परिभाषाएं शास्त्रों में की गईं, सभी गलत हैं। यह अकेला सूत्र है जो सम्यक दिशा में इशारा करता है।

यह सूत्र सतयुग से लेकर कलियुग तक की धारणा को समय से मुक्त कर लेता है; समाज से मुक्त कर लेता है; अतीत, भविष्य, वर्तमान से मुक्त कर लेता है और इसे प्रतिष्ठित कर देता है व्यक्ति की चेतना में, व्यक्ति के जागरण में, उसकी समाधि में।

बहुतेरे हैं घाट - प्रवचन-02

प्रेम : ध्यान की ज्योति

पहला प्रश्न :
अथ यदि वे कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्,
ये तत्र ब्राह्मणाः संदर्शिनो युक्ता आयुक्ता अलूसा धर्मकामाः स्युः,
यथा ते तक्र वर्तेरन तथा तत्र वर्तेथाः।।
‘यदि कभी आपको अपने कर्म या आचरण के संबंध में
संदेह उपस्थित हो तो जो विचारशील, तपस्वी,
कर्तव्यपरायण, शांत स्वभाव, धर्मात्मा विद्वान हों, उनकी
सेवा में उपस्थित होकर अपना समाधान करिए और
उनके आचरण और उपदेश का अनुसरण कीजिए।’
तैत्तरीय उपनिषद की इस सूक्ति पर प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।


सत्यानंद, पहली बातः मूल में एक शब्द है जिसे तुम अनुवाद में या तो चूक गए या बचा कर निकल गए या तुमने अनुवाद में जो अर्थ उसका किया उसमें अनर्थ हो गया। उस शब्द पर ही सब निर्भर है। शब्द है ब्राह्मण।
ये तत्र ब्राह्मणाः संदर्शिनो युक्ता।
ब्राह्मण के अर्थ पर सब कुछ निर्भर करेगा।


लेकिन सत्यानंद, तुम्हारी तकलीफ भी मैं समझता हूं। ब्राह्मण का अगर अर्थ मेरे अर्थों में करो तो फिर पूरा सूत्र डगमगा जाएगा। ब्राह्मण का अर्थ है जो ब्रह्म को जाने; सीधा-सादा, साफ-सुथरा, दो और दो चार जैसा स्पष्ट। जो ब्रह्म को जाने उसके पास बैठ कर समाधान हो सकेगा। पूछने की भी जरूरत न होगी। और न ही उसके अनुसार आचरण करने की जरूरत होगी। न ही उसके उपदेश के अनुसार वर्तन करने की जरूरत होगी। उसके पास बैठ कर समाधि लग जाएगी। उसके पास बैठने की कला ही सत्संग है, समाधि है। उसके भीतर की ज्योति तुम्हारे भीतर जल उठे तो तुम्हारे भीतर भी उपनिषद का फूल खिले। फिर तैत्तरीय उपनिषद के सूत्रों की तुम्हें चिंता न करनी पड़े।

बहुतेरे हैं घाट - प्रवचन-01

सत्संग : हृदय का हृदय से मौन मिलन

पहला प्रश्नः आज आपके संबोधि दिवस उत्सव पर एक नयी प्रवचनमाला प्रारंभ हो रही हैः बहुतेरे हैं घाट। संत पलटू के इस सूत्र को हमें समझाने की अनुकंपा करेंः जैसे नदी एक है, बहुतेरे हैं घाट।

आनंद दिव्या, मनुष्य का मन मनुष्य के भीतर भेद का सूत्र है। जब तक मन है तब तक भेद है। मन एक नहीं, अनेक है। मन के पार गए कि अनेक के पार गए। जैसे ही मन छूटा, विचार छूटे, वैसे ही भेद गया, द्वैत गया, दुई गई, दुविधा गई। फिर जोशेष रह जाता है वह अभिव्यक्ति योग्य भी नहीं है। क्योंकि अभिव्यक्ति भी विचार में करनी होगी। विचार में आते ही फिर खंडित हो जाएगा। मन के पार अखंड का साम्राज्य है। मन के पार ‘मैं’ नहीं है, ‘तू’ नहीं है। मन के पार हिंदू नहीं है, मुसलमान नहीं है, ईसाई नहीं है। मन के पार अमृत है, भगवत्ता है, सत्य है। और उसका स्वाद एक है।

फिर कैसे कोई उस अ-मनी दशा तक पहुंचता है, यह बात और। जितने मन हैं उतने मार्ग हो सकते हैं। क्योंकि जो जहां है वहीं से तो यात्रा शुरू करेगा। और इसलिए हर यात्रा अलग होगी। बुद्ध अपने ढंग से पहुंचेंगे, महावीर अपने ढंग से पहुंचेंगे, जीसस अपने ढंग से, जरथुस्त्र अपने ढंग से।

शनिवार, 9 सितंबर 2017

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-20

अहोभावआनंदउत्सव है भक्ति
दिनांक २२ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

पहला प्रश्न: परम विरहासक्ति पर कुछ कहने की कृपा करें।

उस प्यारे की मौजूदगी प्यारी हैतो गैर-माजूदगी भी प्यारी होगी। जिसने उसे चाहा हैअनुपस्थिति में उसकी चाह और बढ़ेगी,घटेगी नहीं। चाह की कसौटी यही है। लेकिन चाह तो तुमने जानी नहींकामना जानी है। कामना की खूबी यह है: मिल जाए,जिसे तुमने मांगा हैतो मांग टूट जाती हैसमाप्त हो जाती है। धन मिल जाएधन व्यर्थ हो जाता है। प्रेमी मिल जाएप्रेमी व्यर्थ हो जाता है। कामना पा भी लेतो भी खाली रह जाती है। प्रार्थना न भी पाएतो भी भरी है।
विरहासक्ति का अर्थ है कि भक्त भगवान को तो प्रेम करता ही हैउसकी गैर-मौजूदगी को भी प्रेम करने लगता है। उसकी गैर-मौजूदगी भी उसकी ही गैर-मौजूदगी है। उसका न दिखाई पड़ना भी उसका ही न दिखाई पड़ना है। पूर्ण है वहशून्य भी उसका ही है। सब भाव उसका हैअभाव भी उसका ही है। फिर जो वह देउसी में भक्त राजी है।
भक्त का भाव यही है कि तू जो कराएरुलाएदूर रखेहंसाए कि पास रखेतृप्त करे कि अतृप्ति की आग जलाएवर्षा बनकर आए कि प्यास बनकर उठे--तेरी मर्जी पर मेरा होना है! तो भक्त यह नहीं कहता कि मेरी मर्जी मान और प्रगट हो। वह कहता हैतेरा अप्रगट होना भी प्यारा हैहम इसे ही प्यार कर लेंगे। हम तेरी अनुपस्थिति में भी नाचेंगे और गुनगुनाएंगे!
और जब तक तुम उसकी अनुपस्थिति को प्रेम न कर पाओगेतब तक वह उपस्थित न हो सकेगा। यही भक्त की कसौटी है। इसलिए विरहासक्ति...।
विरह से भी आसक्ति हो जाती है। आंसुओं से भी प्रेम हो जाता है। तुमने भक्त को रोते देखा होवह दुख में नहीं रो रहा है। उसके आंसू खुशी के आंसू हैं। उसके आंसू फलों जैसे हैंचांदत्तारों जैसे हैं। उसके आंसुओं में फिर से झांको। उसकी आंखों में कोई शिकायत नहीं हैअनुग्रह का भाव है: "तूने रुलायायह भी क्य कुछ कम है! क्योंकि बहुत आंखें हैंबिना रोये ही रह जाती हैं। बहुत आंखें हैं जिन्हें आंसुओं का सौभाग्य ही नहीं मिलता। तूने दूर रखातड़फायाइसी तड़फ से तो भक्त्ति का जन्म हुआ। इसी से तो तेरे पास आने की महत आकांक्षा जगीअभीप्सा पैदा हुई। तो दूर रखने में भी तेरा कोई राज होगा। तेरी मर्जी पूरी हो'!
जीवन को देखने के दो ढंग हैं। एक धार्मिक व्यक्ति का ढंग हैवह कांटों में भी फूल खोज लेता है। और एक अधार्मिक व्यक्ति का ढंग हैवह फूलों में भी कांटे खोज लेता है। देखने पर सब कुछ निर्भर है।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-19

प्रज्ञा की थिरता है मुक्ति
दिनांक २१ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

वादो नावलम्ब्य ।।७४।।
बाहुल्यावकाशादनियतत्ववच्च ।।७५।।
भक्तिशास्त्राणि मननीयानि तदुद्बोधक कर्माण्यपि करणीयानि।।७६।।
सुखदुःस्वेच्छालाभादित्यक्ते काले प्रतीक्ष्यमाण क्षगार्द्धमपि व्यर्थं न नेयम्।।७७।।
अहिंसासत्यशौचदयास्तिक्यादिचारित्र्याणि परिपालनियानि।।७८।।
सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तितैर्भगवानेव भजनीयः।।७९।।
स कर्ीत्यमानः शीघ्रमेवाविर्भवति अनुभावयति च भक्तान्।।८०।।
त्रिसत्यस्य भक्त्तिरेव गरीयसी भक्त्तिरेव गरीयसी।।८१।।
गुणमाहात्म्यासक्त्ति रूपासक्त्ति पूजासति स्मरणासक्त्ति दास्यासक्त्ति साख्यासक्त्ति कांतासक्ति वात्सल्यासक्त्यात्मनि वेदनासक्त्ति तन्मयतासक्त्ति परमविरहासक्त्तिरूपा
एकधाप्येकादशधा भवति।।८२।।
इत्येवं वदन्ति जनजल्पपनिर्भया एकमताः
कुमारव्यासशुकशांडिल्यगर्गविष्णुकौण्डिन्य
शेषोद्धवारुणिबजिहनुमद्विभीषणादयो भक्त्ययाचार्याः।।८३।।
य इदं नारदप्रोक्तं शिवानुशासनं विश्वसिति श्रद्धते स प्रेष्ठं लभते
स प्रष्ठं लभते इति।।८४।।


एक तीर्थयात्रा आज पूरी होगी।
भक्त्ति कोई शास्त्र नहीं है--यात्रा है। भक्त्ति कोई सिद्धांत नहीं है--जीवन-रस है। भक्त्ति को समझकर कोई समझ पाया नहीं। भक्त्ति को डूबकरभक्त्ति में डूबकर ही कोई भक्त्ति के राज को समझ पाता है।
नाच कहीं ज्यादा करीब है विचार से। गीत कहीं ज्यादा करीब है गद्य से। हृदय करीब है मस्तिष्क से।
इन बहुत दिनों भक्त्ति की लहरों में हमने आंदोलन लियाबहुत तुम्हें रुलाया भीक्योंकि भक्त्ति आंसुओं के बहुत करीब है। और जो रो न सकेवह भक्त न हो सकेगा। छोटे बच्चे की तरह जो असहाय होकर रो सकेवही भक्ति-मार्ग से गुजर पाता है।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-18

एकांत के मंदिर में है भक्ति
दिनांक १८ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

पहला प्रश्न: 
घर-परिवार में होते हुए भी मुझे लगता है कि कोई अपना नहीं हैमैं बिलकुल अकेली हूं। साथ ही पाती हूं बुढ़ापा भी आने लगा,और रिक्त हूंरूखी-सूखी हूंप्रेम की एक बूंद भी मुझमें नहीं है। पैर से थोड़ी अपाहिज हूंइसलिए शिविर में मन भर के नाच भी नहीं सकती। घर वाले आपको विशेष पसंद भी नहीं करते हैं। अब तो आपको सुनकर आंसू बहते हैं और कुछ सूझता नहीं कि क्या करूं! क्या मेरे लिए आशा की कोई किरण संभव है?

पहली बात: अकेला होना मनुष्का स्वभाव है। अकेला होना मनुष्य की नियति है। और जब तक अकेले होने को स्वीकार न करोगेतब तक बेचैनी रहेगी। लाख उपाय करो कि अकेलापन मिट जाएनहीं मिटेगानहीं मिटेगा। क्योंकि अकेलापन तुम्हारे भीतर की आंतरिक अवस्था हैतुम्हारा स्वभाव है। ऊपर-ऊपर होतानिकालकर अलग कर देते।
अकेलापन सांयोगिक नहीं हैअलग किया ही नहीं जा सकता। अगर तुम्हारा अकेलापन तुमसे अलग हो जाएउसी दिन तुम्हारी आत्मा खो जाएगी। आत्मा का होने का ढंग ही अकेला होना है। और जब तक तुम अकेलेपन को मिटाने की चेष्टा करोगेतब तक हार और पराजय ही हाथ लगेगी। क्योंकि स्वभाव का अर्थ हैजो न मिटाया जा सके। कोई उपाय नहीं है। मित्र बनाओ,परिवार बसाओबच्चे होंपति-पत्नी होंसमाज हो--सब थोड़ी देर का धोखा भला दे जाएं कि तुम अकेले नहीं होपर अकेला होना मिटता नहीं है। जब भी थोड़ी आंख भीतर करोगेपाओगे: अरे! परिवार कहां दूर पड़ा रह गयामित्र-प्रियजनकितना बड़ा फासला है! आंख बंद की कि पाया कि अकेले हो गए। आंख खोलकर तुम अपने को भुलाए रहो भरमों में,  डुबाए रहो हजार काम-धंधों मेंव्यस्तता को ओढ़े रहो--लेकिन बार-बार क्षणभर कोघड़ीभर को तो विश्राम करोगे! क्षणभर को तो घर आओगे,भीतर प्रवेश करोगे! फिर वही स्वादफिर वही एकाकीपन!
गृहस्थ का अर्थ ही यही है: वह व्यक्ति जो संबंध बनाकर अपने भीतर के अकेलेपन को मिटाने की चेष्टा में संलग्न है। गृहस्थ की यही परिभाषा है। संन्यस्त की यही परिभषा है कि जिसने यह जान लिया कि यह मेरा स्वभाव हैमिटाने में व्यर्थ समय न खोऊंऔर जिसने अपने एकाकीपन को भोगना शुरू कर दिया--रस ले-लेकरजो अपने एकाकीपन को दुश्मन की तरह नहीं देखताबल्कि एकाकीपन को ही जिसने अपनी शरण बना लीसंसार की धूप सेबेचैनी से बचने के लिए सदा अपने एकाकीपन में चला गयाजब भी थका बाहरभीतर डूब गयाजब भी बाहर उलझाउपद्रव हुआतब भीतर डूब गयाजब पाया कि बाहर जीवन गंदा हुआ जाता हैभीतर स्नान कर लिया एकाकीपन मेंफिर ताजा हो गया!
ध्यान अर्थात एकाकीपन में रमने की कला।
एकाकीपन परम सुंदर है। तुमने नाहक के भय पाल रखे हैं। उन भयों के लिए कोई वास्तविक कारण नहीं है--सांयोगिक कारण हैं।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-17

कान्ता जैसी प्रतिबद्धता है भक्ति
दिनांक १७ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

त्रिरूपभंगपूर्वकं नित्यदासनित्यकांता भजनात्मकं
वा प्रेमैव कार्यम्प्रेमैव कार्यम्
भक्त एकान्तिनो मुख्याः
कण्ठावरोधरोमांचाश्रुभिः परस्परं लपमानाः
पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि सुकर्मीकुर्वन्ति
कर्माणि सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि
तन्मयाः
मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवताः सनाथा चेयं भूर्भवति
नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः
यतस्तदीयाः


आज के लिए पहला सूत्र--
"त्रिभंगपूर्वकं'...
"तीन--स्वामीसेवकसेवा--ऐसे रूपों को भंग कर नित्य दासभक्ति से या नित्य कांताभक्ति से प्रेम करना चाहिए--प्रेम ही करना चाहिए'
जीवन के सारे अनुभव त्रैत के हैं--द्वैत के ही नहींत्रैत के हैं। सत्य है अद्वैत। लेकिन मनुष्य के अनुभव सभी त्रैत के हैं। देखते हो कुछतत्क्षण तीन भंग हो जाते हैं-- देखने वालादिखाई पड़ने वाली चीजऔर दोनों के बीच दर्शन का संबंध। जानते हो कुछतो ज्ञाताज्ञेयऔर ज्ञान। ऐसी त्रिवेणी है सारे अनुभव की।
सत्य एक हैलेकिन साधारणतः दिखाई पड़ता हैद्वैत है--ज्ञाताज्ञेय क्योंकि बीच का ज्ञान दिखाई नहीं पड़तावह सरस्वती है,वह दृश्य नहीं है। प्रयाग के तीर्थ पर तीन नदियां मिलती हैं--गगांयमुनासरस्वती। गंगा दिखाई पड़ती हैयमुना दिखाई पड़ती हैसरस्वती अदृश्य है। तीर्थ बनाया ही इसलिए है वहां क्योंकि त्रिवेणी ही सारे जीवन का तीर्थ है। यहां दो तो दिखाई पड़ते हैं,तीसरा छुपा-छुपा है। द्रष्टादृश्य दिखाई पड़ते हैंदर्शन का अनुमान करना पड़ता है। दृश्य भी पकड़ में आ जाता हैद्रष्टा भी पकड़ में आ जाता है--दर्शन को तुम अपनी मुट्ठी में न बांध पाओगेवह अदृश्य सरस्वती है। सरस्वती को ज्ञान की देवी कहा हैवह ज्ञान की प्रतिमा है। ज्ञान कहोदर्शन कहो--वह छिपा हुआ स्रोत है।
सत्य एक है--अद्वैतसाधारण देखने पर दो मालूम पड़ता है--द्वैतठीक से खोजने पर पता चलता है--त्रैत।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-16

उदासी नहीं--उत्सव है भक्ति
दिनांक १६ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

पहला प्रश्न: पुराण-कथा हैप्रहलाद नास्तिक राजा हिरण्यकश्यप के यहां जन्म लेता हैऔर फिर हिरण्यकश्यप अपनी नास्तिकता सिद्ध करने के लिए प्रहलाद को नदी में डुबोता हैपहाड़ से गिरवाता हैऔर अंत में अपनी बहन होलिका से पूर्णिमा के दिन जलवाता है। और आश्चर्य तो यही है कि वह सभी जगह बच जाता हैऔर प्रभु का गुणगान गाता है। और तब से इस देश में होली जालाकर होली का उत्सव मनाते हैंरंग गुलाल डालते हैंआनंद मनाते हैं। कृपा करके इस पुराण-कथा का मर्म हमें समझाइए।

पुराण इतिहास नहीं है। पुराण महाकाव्य है। पुराण में जो हुआ हैवह कभी हुआ है ऐसा नहींवरन सदा होता रहता है। तो पुराण में किन्हीं घटनाओं का अंकन नहीं हैवरन किन्हीं सत्यों की ओर इंगित है। पुराण शाश्वत है।
ऐसा कभी हुआ था कि नास्तिक के घर आस्तिक का जन्म हुआऐसा नहींसदा ही नास्तिकता में ही आस्तिकता का जन्म होता है। सदा हीऔर होने का उपाय ही नहीं है। आस्तिक की तरह तो कोई पैदा हो ही नहीं सकतापैदा तो सभी नास्तिक की तरह होते हैं। फिर उसी नास्तिकता में आस्तिकता का फूल लगता है। तो नास्तिकता आस्तिकता की मां हैपिता है। नास्तिकता के गर्भ से ही आस्तिकता का आविर्भाव होता है।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-15

हृदय-सरोवर का कमल है भक्ति
दिनांक १५ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ
प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयंप्रमाणत्वात्
शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च
लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात्
न तदसिद्धौ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव
स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं न श्रवणीयम्
अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम्
तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम्

भक्ति तो एक है।
बुद्ध ने कहा हैजैसे सागर को कहीं से भी चखोखारा है: ऐसा ही सत्य भी है--एक स्वाद हैएक रस है। फिर भी नारद ने भक्ति के तीन विभाजन किए हैं। पराभक्ति के वे विभाजन नहीं हैंगौणी भक्ति के विभाजन हैं।

तो पहला विभाजन: पराभक्ति मुख्याभक्तिवह तो एक स्वरूप है। फिर गौणीभक्ति: दोयमनीचीमनुष्यों के अनुसार। चूंकि मनुष्य तीन प्रकार के हैंइसलिए स्वभावतः उनकी भक्ति भी तीन प्रकार की हो जाती है।
प्रकाश का तो एक ही रंग हैलेकिन कांच के टुकड़े से प्रकाश निकल जाए तो सात रंग का हो जाता है--कांच उसे सात रंगों में विभाजित कर देता है। ऐसे ही तो इन्द्रधनुष बनता है। वर्षा के दिनों मेंहवा मेंवायुमण्डल में छोटे-छोटे पानी के कण झूलते होते हैंउन पानी के कणों से निकलती सूरज की किरण सात हिस्सों में टूट जाती है। तो वर्षा के दिन होंसूरज निकला हो,इन्द्रधनुष बन जाता है। किरण तो एकरंगी हैलेकिन सप्तरंगी हो जाती है।
भक्ति तो एकरंगी हैलेकिन मनुष्य तीन तरह के हैंइसलिए गौण अर्थ में भक्ति तीन तरह की हो जाती है। उन्हें भी समझ लेना जरूरी हैक्योंकि बड़ी बहुमूल्य बात उनमें छिपी है।
सत्त्व रजतम--ऐसे तीन मनुष्य के विभाजन हैं। स्वभावतः आदमी जो भी करेगाउसका कृत्य उससे प्रभावित होता है। सात्त्वि भक्ति करेगा तो सत्त्व के हस्ताक्षर होंगे। राजसी भक्ति करेगा तो भक्ति में भी राजस गुण समाविष्ट हो जाएगा। तामसी भक्ति करेगा तो तमस से बचा न सकेगा अपनी भक्ति को।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-14

असहाय हृदय की आह है प्रार्थना-भक्ति
दिनांक १४ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

पहला प्रश्न: भगवान! सामर्थ्य तो कुछ है नहीं और प्यास उठी अनंत की! चल पड़ी हूं डगमगातीक्या मिलन होगा नहीं?

पूछा है वृद्ध संन्यासिनी सीता ने।
पहली बात: सामर्थ्य से कोई कभी परमात्मा से मिला नहीं। सामर्थ्य तो अकड़ है। सामर्थ्य ही तो बाधा है। सामर्थ्य यानी अहंकार। सामर्थ्य यानी दावा। दावे से कभी कोई मिला हैदावे ने कभी प्रेम पायादावेदार तो हार ही गयापहले ही कदम पर मंजिल चूक गई।
अगर पता है कि सामर्थ्य नहीं है तो मिलन निश्चित है। असहाय अवस्था में होता है मिलन--जहां तुम्हें लगता हैमेरे किए कुछ भी न होगाजहां तुम्हारी हार पूरी-पूरी हैजहां तुम्हें लगता हैमेरे किए होगा कैसेजहां तुम्हारा अहंकार सब भांति धूल-धूसरित होकर गिर पड़ा हैजहां तुम्हें अपनी तरफ से श्वास लेने की भी सामर्थ्य न रहीयात्रा दूर की बातजहां उठते भी नहीं बनता;जहां पैर भी उठाना चाहो तो नहीं उठता। जहां ऐसा असहाय भाव तुम्हें घेर लेता हैवहीं प्रार्थना का जन्म होता है।
प्रार्थना असहाय हृदय की आह है।
परम असामर्थ्य में ही प्रभु को पाने की सामर्थ्य है।
असहाय भाव को गहरा होने दो।
परमात्मा को कोई जीतकर थोड़े ही जीतता है--हारकर जीतता है। वहां हार ही विजय है। वहां जो अकड़कर गयाउसने अपने ही हाथ अपनी गर्दन काट ली। वहां जो गर्दन काटकर गयापहुंच ही गया।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-13

शून्य का संगीत है प्रेमा-भक्ति
दिनांक १३ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

अनिर्वचनीशं प्रेमस्वरूपम्
मूकास्वादमवत्
प्रकाशते क्वापि पात्रे
गुणरहितं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्
तत्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति
भाषयति तदेव चिन्तयति
गौणी त्रिधा गुणभेदादार्तादिभेदाद्वा
उत्तरस्मांदुत्तरस्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति

अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम!
प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है--जो कहा न जा सके--जीया जा सकेभोगा जा सकेअनुभव किया जा सके--पर कहा न जा सके।
लहर सागर में है सागर भी लहर में है। लेकिन लहर पूरी की पूरी सागर में हैपूरा का पूरा सागर लहर में नहीं है।

अनुभव सागर जैस हैअभिव्यक्त्ति लहर जैसी है।...थोड़ी सी खबर लाती हैपर बहुतअनंतगुना पीछे छूट जाता हैजरा सी झलक लाती हैलेकिन बहुत शेष रह जाता है।
शब्द शून्य को बांध नहीं पाते--बांध नहीं सकते। शब्द तो छोटे-छोटे आंगनों जैसे हैं। अनुभव काशून्य काप्रेम कापरमात्मा का आकाश असीम है। यद्यपि आंगन में भी वही आकाश झांकता हैलेकिन आंगन को आकाश मत समझ लेनाअन्यथा कारागृह में पड़ जाओगे। जिसने आंगन को आकाश समझाउसका दुर्भाग्यक्योंकि फिर आंगन में ही जीने लगेगा। आंगन से आकाश बहुत बड़ा है। आंगन से स्वाद ले लेनालेकिन तृप्त मत हो जाना।
शब्द से अनुभव का आकाश बहुत बड़ा है। शब्द से यात्रा शुरू होलेकिन शब्द पर यात्रा पूरी न हो जाए। कहीं शब्द को ही सब मत समझ लेना। शब्द में इंगित हैंइशारे हैंजैसे राह के किनारे मील के पत्थर हैंतीर लगे हैं--आगे की तरफ सूचना है। मील के पत्थर को मंजिल मत समझ लेना। सभी शब्द चाहे वेद के होंचाहे कुरान केचाहे बाइबिल के--शब्द मात्र सीमित हैंऔर प्रेम का अनुभव विराट है।
इसलिए पहला सूत्र है आज काबहुत अनूठा: "अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्'!
"उस प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है!'

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-12

अभी और यहीं है भक्ति
दिनांक १२ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

पहला प्रश्न: भगवानभक्ति और भोग में क्या कुछ आंतरिक तारतम्य है?

भोग को जानता है सिर्फ भक्त ही। भक्त के अतिरिक्त भोग को किसी ने जाना नहींक्योंकि भोग तो सिर्फ भगवान का ही हो सकता है। जिसे तुम संसार में भोग कहते हो वह तो भोग की छाया भी नहींवह तो भोग की दूर कीप्रतिध्वनी भी नहींउसे तो भोग का आभास कहना भी गलत होगा--भोग की भ्रांति है।
जिन्होंने परमात्मा को जाना उन्होंने ही भोगा। भोग भक्त और भगवान के बीच का संबंध है। भोग की गंगा बहती है भगवान औरभक्त के किनारों के बीच--एक तरफ भगवानदूसरी तरफ भक्तबीच में भोग की गंगा का प्रवाह ।
भोग बड़ा बहुमूल्य शब्द है--योग से ज्यादा बहुमूल्य। लेकिन मेरे अर्थ को ठीक से समझ लेना। योग तो फिर भी मनुष्य की बुद्धि का जोड़ हैहिसाब-किताब हैविधि-विधान है। भोग बुद्धि का नहींहृदय का परमात्मा से जोड़ हैन कोई हिसाब हैन कोई किताब हैन कोई विधि-विधान है। समग्र समर्पण हैसमग्र निवेदन है।
भक्त अपने को भगवान के चरणों में रख देता हैउसी क्षण से श्वास-श्वास में भगवान का भोग शुरू हे जाता है।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-11

शून्य की झील में प्रेम का कमल है भक्ति
दिनांक ११ मार्च१९७६श्री रजनीश आश्रमपूना

दुःसंगः सर्वथैव त्याज्य
कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशसर्वनाशकारणत्वात्
तरंगायिता अपीमे संगात्समुद्रायन्ति
कस्तरति कस्तरति मायामयः संगास्त्यजति यो
महानुभावं सेवते निर्ममो भवति
यो विविक्तस्थानं सेवतेयो लोकबन्धमुन्मूलयति,
निस्त्रैगुण्यौ भवतियोगक्षेमं त्यजति
यः कर्मफलं त्यजतिकर्माणि संन्यस्यति ततो निर्द्वन्द्वो भवति
वेदानपि संन्यस्यति केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते
स तरति स तरति स लोकांस्तारयति

जो नहीं हैउसे निर्बल मत जानना। जो नहीं हैउसमें भी बड़ा बल है। अन्यथामरु-मरीचिकाएं मनुष्य को आकर्षित न करतीं और स्वप्नों पर भरोसा न आताक्षितिज आमंत्रण न देतास्वप्न सत्य मालूम न होते।

जो नहीं हैवह भी बड़ा प्रबल हैऔर मन के लिए "जो हैउससे भी ज्यादा प्रबल है। मन उसे देख ही नहीं पाता, "जो है'। मन सदा उसका ही चिंतन करता है जो नहीं हैजिसका अभाव है। जो हाथ में नहीं हैमन उसका विचार करता है। जो हाथ में है,उसे तो मन भूल ही जाता है।
मन के इस सूत्र को ठीक से समझ लेना जरूरी हैतो ही भक्ति-सूत्र समझ में आ सकेंगे। क्योंकि मन के विपरीत जो गयावही भक्ति को उपलब्ध हुआ। मन के साथ जो चलावह कभी भगवान तक न पहुंच सकेगा।
भगवान यानी "जो है', भक्ति यानी "जो है', उसे देखने की कला।
लेकिन "जो है', वह हमें दिखाई क्यों नहीं पड़ता? "जो हैवह तो हमें सहज ही दिखाई पड़ना चाहिए। "जो हैउसे खोजने की जरूरत ही क्यों हो? "जो हैउसे हम भूले ही क्योंउसे हम भूले ही क्योंउसे हम भूले ही कैसे? "जो हैउसे हमने खोया कैसे? "जो हैउसे खोया कैसे जा सकता है?