बुधवार, 22 नवंबर 2017

रुको मत- चले चलो!

किसी भी मनुष्य ने जो ऊंचाइयां और गहराइयां छुई हैं, वह कोई भी अन्य मनुष्य कभी भी छू सकता है। और, जो ऊंचाइयां और गहराइयां अभी तक किसी न भी स्पर्श नहीं की हैं, उन्हें अभी भी मनुष्य स्पर्श कर सकेगा। स्मरण रखना कि मनुष्य की शक्तियां अनंत हैं।
मैं प्रत्येक मनुष्य के भीतर अनंत शक्तियों को प्रसुप्त देखता हूं। इन शक्तियों में से अधिक शक्तियां सोई ही रह जाती हैं और हमारे जीवन के सोने की अंतिम रात्रि आ जाती है। हम इन शक्तियों और संभावनाओं को जगा ही नहीं पाते। इस भांति हम में से अधिकतम लोग आधे ही जीते हैं या उससे से भी कम। हमारी बहुत-सी शारीरिक और मानसिक शक्तियां अधूरी ही उपयोग में आती हैं और आध्यात्मिक शक्तियां तो उपयोग में आती ही नहीं। हम स्वयं में छिपे शक्ति-स्रोतों को न्यूनतम ही खोदते हैं और यही हमारी आंतरिक दरिद्रता का मूल कारण है। विलियम जेम्स ने कहा है, ''मनुष्य की अग्नि बुझी-बुझी जलती है और इसलिए वह स्वयं की आत्मा के ही समक्ष भी अत्यंत हीनता में जीता है।''
इस हीनता से ऊपर उठना अत्यंत आवश्यक है। अपने ही हाथों दीन-हीन बने रहने से बड़ा कोई पाप नहीं। भूमि खोदने से जल-स्रोत मिलते हैं, ऐसे ही जो स्वयं में खोदना सीख जाते हैं, वे स्वयं में ही छिपे अनंत शक्ति-स्रोतों को उपलब्ध होते हैं। किंतु उसके लिए सक्रिय और स्रजनात्मक होना होगा। जिसे स्वयं की पूर्णता को पाना है, वह- जबकि दूसरे विचार ही करते रहते हैं- विधायक रूप में सक्रिय हो जाता है। वह जो थोड़ा सा जानता है, उसे ही पहले क्रिया में परिणत कर लेता है। वह बहुत जानने को नहीं रुकता। और, इस भांति एक-एक कुदाली चलाकर वह स्वयं में शक्ति का कुंआ खोद लेता है, जबकि मात्र विचार करने वाले बैठे ही रह जाते हैं। विधायक सक्रियता और स्रजनात्मक से ही सोई शक्तियां जाग्रत होती हैं और व्यक्ति अधिक से अधिक जीवित बनता है। जो व्यक्ति अपनी पूर्ण संभावित शक्तियों को सक्रिय कर लेता है, वही पूरे जीवन का अनुभव कर पाता है और वही आत्मा का भी अनुभव करता है। क्योंकि, स्वयं की समस्त संभावनाओं के वास्तविक बन जाने पर जो अनुभूति होती है, वही आत्मा है।
विचार पर ही मत रुके रहो। चलो- और कुछ करो। हजार मील चलने के विचार करने से एक कदम चलना भी ज्यादा मूल्यवान है, क्योंकि वह कहीं तो पहुंचता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

बुधवार, 1 नवंबर 2017

देख कबीरा रोया - प्रवचन-30

देख कबीरा रोया

एक आदमी को परमात्मा का वरदान था कि जब भी वह चलेउसकी छाया न बनेउसकी छाप न पड़े। वह सूरज की रोशनी में चलता तो उसकी छाया नहीं बनती थी। जिस गांव में वह थालोगों ने उसका साथ छोड़ दिया। उसके परिवार के लोगों ने उसको घर से बाहर कर दिया। उसके मित्र और प्रियजन उसको देख कर डरने और भयभीत होने लगे। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बन गई कि उसे गांव के बाहर जाने के लिए मजबूर हो जाना पड़ा। वह बहुत हैरान हुआतो उसने परमात्मा से प्रार्थना की कि मैंने केवल छाया खो दी हैऔर लोग मुझसे इतने भयभीत हो गए हैंलेकिन लोग तो आत्मा भी खो देते हैंऔर तब भी उनसे कोई भयभीत नहीं होता है।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-28

अनिवार्य संतति-नियमन

प्रश्न: आप तीसरी बार यहां आए हैं। आपकी दो बातों का हम पर असर रहा--एक तो आप बुद्धिनिष्ठा की हिमायत करते हैं और दूसरी विचारनिष्ठा की बात करते हैं आप। गुरु को मानने के लिए आप मना करते हैं।

मैं तो इतना कह रहा हूं कि जो खबरें मेरे बाबत पहुंचाई जाती हैंवे इतनी तोड़ते-मरोड़ते हैंइतनी बिगड़ कर पहुंचाई जाती हैं--जब आप मुझे कहते हैं तो मुझे हैरानी हो जाती है। वह जो पत्रकारों से नारगोल में बात हुई थीउनसे सिर्फ मजाक में मैंने कहाउनसे सिर्फ मजाक में मैंने यह कहा कि जिसको तुम लोकतंत्र कह रहे होइस लोकतंत्र से तो बेहतर हो कि पचास साल के लिए कोई तानाशाह बैठ जाए। यह सिर्फ मजाक में कहा। और उनकी बेवकूफी की सीमा नहीं हैजिसको उन्होंने कहा कि मैं पचास साल के लिए देश में तानाशाही चाहता हूं। मैं जो कह रहा हूंउनमें से ही किसी ने कहा कि आज जो बातें कहते हैंइससे तो आपको कोई गोली मार दे तो क्या हो?मैंने तो सिर्फ मजाक में कहा कि बहुत अच्छा हो जाएगाफिर गांधी से मेरा मुकाबला हो जाए। उन सबने छाप दिया कि मैं गांधी से मुकाबला करना चाहता हूं।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-27

गांधी पर पुनर्विचार

मेरे प्रिय आत्मन्!
डॉ. राममनोहर लोहिया मरणशय्या पर पड़े थे। मृत्यु और जीवन के बीच झूलती उनकी चेतना जब भी होश में आती तो वह बार-बार एक ही बात दोहराते। बेहोशी मेंमरते क्षणों में वे बार-बार यह कहते सुने गए। मेरा देश सड़ गया हैमेरे देश की आत्मा सड़ गई है। यह कहते हुए उनकी मृत्यु हुई। पता नहीं उस मरते हुए आदमी की बात आप तक पहुंची है या नहीं पहुंची। लेकिन राममनोहर लोहिया जैसे विचारशील व्यक्ति को यह कहते हुए मरना पड़े कि मेरा देश सड़ गया,मेरे देश की आत्मा सड़ गई हैतो कुछ विचारणीय है।
क्यों सड़ गई है देश की आत्माकिसी देश की आत्मा सड़ कैसे जाती हैजिस देश में विचार बंद हो जाता है उस देश की आत्मा सड़ जाती है। जीवन का प्रवाह हैविचार का प्रवाह है। और जीवन का प्रवाह जब रुक जाता है, विचार का प्रवाह जब रुक जाता है, तो जैसे कोई सरिता रुक जाए और डबरा बन जाए, फिर वह सागर तक तो नहीं जाती, डबरा बन कर सड़ती है, गंदी होती है, सूखती है। कीचड़ और दलदल पैदा होता है। इस देश में विचार की सरिता रुक कर डबरा बन गई है। हमने विचार करना बंद कर दिया है। हम तो विचार से भयभीत हो गए हैं, ऐसा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि विचार से हमारे भीतर कोई डर पैदा हो गया है। हम विश्वास की बात करते हैं, विचार की जरा भी बात नहीं करते।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-25

समाजवाद: परिपक्व पूंजीवाद का परिणाम

प्रश्न: आपने अभी-अभी ऐसा कहा था कि हमारे यहां अभी सोशलिज्म की जरूरत नहीं है। अभी जो कैपिटलिज्म हैवह यहां फ्लरिश होना चाहिए। उसके बारे में क्या आप कुछ विस्तार से प्रकाश डालेंगे?

हांमेरी ऐसी दृष्टि है कि समाजवाद पूंजीवाद की परिपक्व अवस्था का फल है। और समाजवाद यदि अहिंसात्मक और लोकतांत्रिक ढंग से लाना हो तो पूंजीवाद परिपक्व होइसकी पूरी चेष्टा की जानी चाहिए। पूंजीवाद की परिपक्वता का अर्थ हैएक औद्योगिक क्रांति--कि देश का जीवन भूमि से बंधा न रह जाएऔर देश का जीवन आदिम उपकरणों से बंधा न रह जाए। आधुनिकतम यंत्रीकरण हो तो संपत्ति पैदा हो सकती है। और संपत्ति जब अतिरिक्त मात्रा में पैदा होती हैतभी उसका वितरण भी हो सकता हैऔर विभाजन भी हो सकता है।

अभी हम समाजवाद की कोशिश करेंगे तो सिर्फ गरीबी ही बांट सकते हैंऔर गरीबी बांटने का कोई अर्थ नहीं हैबल्कि खतरनाक भी है। और एकबारगी हम आज समाजवादी ढांचे में समाज को ढालेंतो जिस समाज में उत्पादन की आज कोई प्रेरणा नहीं हैजिसका प्रमाद बहुत पुराना और गहरा हैऔर जिसे संपत्ति पैदा करने की कोई समझ भी नहीं हैउस समाज को अगर आज समाजवादी ढांचा दिया जाए तो हम सदा के लिए गरीब होने की मुहर अपने ऊपर लगा लेंगे।
इसलिए मैं यह नहीं कहता हूं कि समाजवाद जरूरी नहीं है। मैं मानता हूं कि समाजवाद ही जरूरी है। लेकिन समाजवाद संभव हो सके इसलिए औद्योगीकरण और राष्ट्र का ठीक अर्थों में पूंजीवाद हो जाना जरूरी है। या फिर दूसरा रास्ता यह है कि अगर कच्चे पूंजीवाद से हमें समाजवाद पर जाना हो तो हमें हिंसा के कम से कम पचास वर्षों की तैयारी करनी चाहिए। फिर वह लोकतांत्रिक नहीं होगा। फिर वह वैसा ही होगा जैसा रूस या चीन में हो रहा है। वैसी भी हमारी तैयारी नहीं है कि इतने बड़े पैमाने पर हिंसा कर सकें कि एक करोड़ आदमियों की हत्या कर सकें। और मैं मानता हूं कि एक करोड़ की हत्या करके हम अपने देश में संपत्ति पैदा कर पाएंगेयह संदिग्ध दिखता है। फिर ऐसी भी मेरी समझ है कि उतनी बड़ी हिंसा करके रूस में जैसी सफलता की आशा थीवह सफलता उपलब्ध नहीं हो पाई। और आज भी रूस एक गरीब मुल्क ही हैअमीर मुल्क नहीं है। और चीन की हालतें तो और भी बदतर हैं।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-24

राष्ट्रभाषा: अ-लोकतांत्रिक

प्रश्न: परमात्मा तक जाने के लिए क्या विश्वास के द्वारा ही जाया जा सकता है?

मेरी समझ ऐसी है कि परमात्मा और विश्वास का कोई संबंध ही नहीं है। और जो भी विश्वास करता हैउसको मैं आस्तिक नहीं कहता। विश्वास का मतलब है कि जिसे हम नहीं जानते हैंउसे मानते हैं। और मेरा कहना है कि जिसे हम नहीं जानतेउसे मानने से बड़ा पाप नहीं हो सकता। अगर कोई ईश्वर को इनकार करता है और कहता है कि मुझे अविश्वास हैतो भी मैं कह रहा हूं कि वह गलत बात कह रहा है। क्योंकि जब तक उसने खोज न लिया होसमस्त को खोज न लिया हो और ऐसा पा न लिया हो कि ईश्वर नहीं हैतब तक ऐसा कहना ठीक नहीं कि विश्वास है। और एक आदमी कहता है,मुझे विश्वास हैहालांकि मैंने जाना नहींदेखा नहींलेकिन विश्वास करता हूं।

मैं दोनों बातें कहता हूं। मैं कहता हूंईश्वर जानने की चीज हैबिलीफ की नहींनोइंग की। जब मैं कहता हूं कि ईश्वर है तो यह मेरा विश्वास नहीं हैऐसी मेरी प्रतीति है। ऐसा मुझे लगता है कि वही है और कुछ भी नहीं है। और ईश्वर को मैं कोई व्यक्तिवाचीपर्सनल तरीके से नहीं सोच पाता। ईश्वर से मेरा मतलब हैदी एग्झिस्टेंशियल। जो हैउसका ही नाम ईश्वर है। जो हैव्हाट इज़--बस उसको ही मैं ईश्वर कह रहा हूं। इसलिए अगर कोई कोई कहेईश्वर नहीं भी है तो मुझे दिक्कत नहीं पड़ती। इतना मैं कहता हूं कि जो हैवह हैऔर उसको नाम देने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-23

गांधी की रुग्ण-दृष्टि

मेरे प्रिय आत्मन्!
जॉर्ज बर्नार्डशा ने एक छोटी सी किताब लिखी है। वह किताब सूक्तियों की मैक्सिम्स की किताब है। उसमें पहली सूक्ति उसने बहुत अदभुत लिखी है। पहला सूत्र उसने लिखा है: द फर्स्ट गोल्डन रूल इज़ दैट देअर आर नो गोल्डन रूल्स। पहला स्वर्ण-सूत्र यह है कि जगत में स्वर्ण-सूत्र हैं ही नहीं।
यह मुझे इसलिए स्मरण आता है कि जब मैं सोचते बैठता हूंगांधी-विचार पर बोलने के लिएतो पहली बात तो मैं यह कहना चाहता हूं कि गांधी-विचार जैसी कोई विचार-दृष्टि है ही नहीं। गांधी-विचार जैसी कोई चीज नहीं है। "गांधी-विश्वासजैसी चीज है, "गांधी-विचारजैसी चीज नहीं है। गांधी के विश्वास हैं कुछलेकिन गांधी के पास कोई वैज्ञानिक दृष्टि और कोई वैज्ञानिक विचार नहीं है। गांधी के विश्वासों को ही हम अगर गांधी-विचार कहेंतो बात दूसरी है। क्योंकि विचार का पहला लक्षण है--संदेह। विचार शुरू होता है संदेह से। विचार की यात्रा ही चलती है डाउटसंदेह से। और गांधी संदेह करने को जरा भी राजी नहीं हैं। उनके जीवन की सारी चिंतना चलती है, श्रद्धा से, विश्वास से। यह पहली बात समझ लेनी जरूरी है कि जो व्यक्ति संदेह करने को राजी नहीं है, वह विचार के जगत में कोई गति नहीं कर सकता है। जो व्यक्ति विश्वास करने को पकड़े बैठा हुआ है, वह विचार नहीं कर सकता है। उसे विचार करने की जरूरत ही नहीं है।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-22

विचार-क्रांति की भूमिका

प्रश्न: पिछली बार जब अहमदाबाद आए थे तो आपको सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हुए थे। तथा आपकी विचारधारा समाचारपत्रों में भी प्रकाशित हुई थी। उनमें से कुछ लोगों का कहना है कि आपके विचार कम्युनिस्ट विचारधारा से बहुत मेल खाते हैं और उसके बहुत समीप हैं। कृपया इस संबंध में आप अधिक प्रकाश डालें।

पहली बात तो यह है कि मेरी दृष्टि में कोई भी विचारशील आदमी किसी न किसी रूप में कम्युनिज्म के निकट होगा ही। यह असंभव हैइससे उलटा होना। और अगर हो तो यह तो वह आदमी विचारशील न होगाया बेईमान होगा।
उसके कुछ कारण हैं।
जैसेयह बात अब स्वीकार करनी असंभव है कि दुनिया में किसी तरह की आर्थिक असमानता चलनी चाहिए। यह बात भी स्वीकार करनी असंभव है कि दुनिया किसी तरह के वर्गों में विभक्त रहे। प्रत्येक मनुष्य को किसी न किसी रूप में जीवन में विकास का समान अवसर मिलेइसके लिए भी अब कोई विरोध नहीं होता। और मेरी समझ मेंआज ही नहींमैं तो बुद्ध को,महावीर कोक्राइस्ट कोसबको कम्युनिस्ट कहता हूं। उन्हें कोई पता नहीं था।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-21

गांधीवादी कहां हैं?

मेरे प्रिय आत्मन्!
मैं निरंतर सोचता रहाव्हेअर आर द गांधीयंसगांधीवादी कहां हैंलेकिन मेरे भीतर सिवाय एक उत्तर के और कुछ शब्द नहीं उठे। मेरे भीतर एक ही उत्तर उठता रहा--वहीं हैंजहां हो सकते थे। यही सोचते हुए रात मैं सो गया और सोने में मैंने एक सपना देखा। उसी से मैं अपनी बात शुरू करना चाहता हूं। शायद यही सोचते हुए सोया था कि गांधीवादी कहां हैंइसलिए वह सपना निर्मित हुआ होगा।
मैंने देखा कि राजधानी के एक बहुत बड़े बगीचे में जहां गांधीजी की प्रतिमा खड़ी हैमैं उस पत्थर की प्रतिमा के नीचे पड़ी बेंच पर बैठा हूं। दोपहर है और बगीचे में सन्नाटा हैकोई भी नहीं है। मैं सोचने लगा कि गांधीजी से ही क्यों न पूछ लिया जाए कि गांधीवादी कहां हैंलेकिन इसके पहले कि मैं पूछतामैंने देखा कि गांधीजी की प्रतिमा कुछ बड़बड़ा रही है। तो मैं गौर से सुनने लगा। गांधीजी की प्रतिमा कह रही थी दुष्टों ने मुझे कहां खड़ा कर दिया है--धूप में, बरसात में, सर्दी में! और राणाप्रताप को घोड़ा दिया हुआ है, शिवाजी को घोड़ा दिया हुआ है, रानी लक्ष्मीबाई को घोड़ा दिया हुआ है। मुझे पैर पर ही खड़ा कर दिया है? मैं तो बहुत हैरान हुआ। मैंने नहीं सोचा था कि गांधी भी गुस्सा होते हैं। मैं भागा हुआ राजधानी के बड़े नेता के पास गया कि गांधीजी बहुत गुस्से में हैं, बहुत गालियां दे रहे हैं कि मुझे दुष्टों ने कहां खड़ा कर दिया है। मुझे भी घोड़ा चाहिए। उन नेता ने कहा कि ऐसा कही नहीं हो सकता। गांधीजी कभी गाली नहीं दे सकते। मैं तुम्हारे साथ चलता हूं मैं उन नेता को ले जाकर प्रतिमा के सामने खड़ा हो गया। उस प्रतिमा ने कहा कि मैंने घोड़ा लाने को कहा था, तू गधे को कहां से ले आया? वह तो हैरान हुआ। यह तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-20

वैज्ञानिक विकास और बदलते जीवन-मूल्य

प्रश्न: इस औद्योगिक युग में आत्म-अभिव्यक्ति के द्वारा मनुष्य आत्म-साक्षात्कार कैसे करे?

दोत्तीन बातें--एक तो मनुष्य सदा से ही औद्योगिक रहा हैइंडस्ट्रियल रहा है। चाहे वह छोटे औजार से काम कर रहा हो या बड़े औजार से काम कर रहा हो--छोटे पैमाने पर काम कर रहा हो,बड़े पैमाने पर काम कर रहा होआदमी जब से पृथ्वी पर है तब से इंडस्ट्रियल एक साथ हैवह आदमी के साथ ही था। और जैसे आज हम लगता है कि दो हजार साल पहले आदमी इंडस्ट्रियल नहीं थादो हजार साल हम भी इंडस्ट्रियल नहीं मालूम होंगे।
पहले तो बात यह समझ लेने जैसी है कि मेरी समझ ही यह है कि आदमीआदमी होने की वजह से ही इंडस्ट्रियल है। आदमी को पशु से जो बात भिन्न करती है वह उसका यंत्रों का उपयोग है। वह कितने ही छोटे पैमाने पर होयह दूसरी बात है। लेकिन हमेशा से आदमी उद्योग में लगा है। असल में आदमी जी ही नहीं सकता है बिना उद्योग में लगा हुआ। इसका औद्योगिक, यह कहना कोई विशेष मूल्य नहीं देता, मनुष्य का पूरा इतिहास ही औद्योगिक है। इसलिए जो सवाल आपने उठाया है कि औद्योगिक युग में कैसे आदमी आत्म-साक्षात्कार करे, आत्म-अभिव्यक्ति के द्वारा?

देख कबीरा रोया - प्रवचन-19

परस्पर-निर्भरता और विश्व नागरिकता

नॉन-प्राडक्टिव वेल्थ के लिए हम टैक्सेस ज्यादा लगाएं और प्राडक्टिव वेल्थ के लिए हम जितना प्रमोशंस दे सकेंदें। दो ही तो उपाय हैं। अगर एक आदमी लाख रुपया पाया है मुफ्त में तो उस पर टैक्स भारी होना चाहिए और एक आदमी लाख रुपये से कुछ प्रॉडयूस कर रहा होडेढ़ लाख पैदा कर रहा हो तो उस पर टैक्सेस कम होने चाहिए। अभी हालतें उलटी हैं अगर आप लाख रुपया अपने घर में रख कर कुछ भी नहीं कमाते तो आपको कोई टैक्सेशन नहीं है और अगर आप डेढ़ लाख कमाते हैं तो आप पर टैक्सेशन हैं। अभी अगर वेल्थ को क्रिएट करते हैं तो आपको दंड देना पड़ता है टैक्सेशन के रूप में। अगर आप वेल्थ को रोक कर बैठ जाएं तो उसका कोई दंड नहीं है!

इसे हमें उलटना चाहिए। अनप्राडक्टिव वेल्थ पर बहुत भारी टैक्सेशन होना चाहिए और प्राडक्टिव वेल्थ पर टैक्सेशन कम होना चाहिए और जितना हायर प्राडक्शन होउतनाटैक्सेशन कम होना चाहिए। अगर एक आदमी लाख रुपया कमाए तो उसको जितना टैक्सेशन होदो लाख कमाने वाले पर उससे और कम होतीन लाख कमाने वाले पर और कमपांच लाख कमाने वाले पर और कमऔर दस लाख अगर कमाता हो तो उसको तो हम सरकार से और सहायता दे सकें तो देना चाहिए--टैक्सेशन खतम! एक सीमा के बाद टैक्सेशन खतम कर देना चाहिए। तो हम आदमी की जो वेल्थ पड़ी हुई है उसको प्राडक्शन की तरफ मोड़ पाएंगेनहीं तो नहीं मोड़ पाएंगे। अभी हालतें उलटी हैं।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-18

प्रेम-विवाह: जातिवाद का अंत

हमारे यहां चूंकि जातिवाद का राजकरण है--जो हिंदू हैवह हिंदू को वोट देता हैजो मुस्लिम है वह मुस्लिम को वोट देता है। हमारे यहां बहुत कौमें हैं। आपके खयाल में इसको मिटाने के लिए क्या करना चाहिए?

दोत्तीन बातें करना चाहूंगा। एक तो जातीय दंगे को साधारण दंगा मानना शुरू करना चाहिए। उसे जातीय दंगा मानना नहीं चाहिएसाधारण दंगा मानना चाहिए। और जो हम साधारण दंगे के साथ व्यवहार करते हैं वही व्यवहार उस दंगे के साथ भी करना चाहिएक्योंकि जातीय दंगा मानने से ही कठिनाइयां शुरू हो जाती हैंइसलिए जातीय दंगा मानने की जरूरत नहीं है। जब एक लड़का एक लड़की को भगा कर ले जाता हैवह मुसलमान हो कि हिंदूकि लड़की हिंदू है कि मुसलमान है--इस लड़के और लड़की के साथ वही व्यवहार किया जाना चाहिएजो कोई लड़का किसी लड़का को भगा कर ले जाएऔर हो। इसको जातीय मानने का कोई कारण नहीं है।

और हमजो इस मुल्क में जातीय दंगों को खतम करना चाहते हैंइतनी ज्यादा जातीयता की बात करते हैं कि हम उसे रिकग्नीशन देना शुरू कर देते हैं। इसलिए पहली तो बात यह है कि जातीयता को राजनीति के द्वारा किसी तरह का रिकग्नीशन नहीं होना चाहिए। राज्य की नजरों में हिंदू या मुसलमान का कोई फर्क नहीं होना चाहिए।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-17

असली अपराधी: राजनीतिज्ञ

आज तक आपने जो किया हैउसका मिशन क्या-क्या है--आपका उद्देश्य क्या हैमहाबलेश्वर शिविर में मैं आ चुका हूं।

दोत्तीन बातें हैं। हमारे समाज की और हमारे देश की एक जड़ मनोदशा हैजहां चीजें ठहर गई हैं,बहुत समय से ठहर गई हैं। उनमें कोई गति नहीं रह गई। कोई दो ढाई हजार वर्ष से हम सिर्फ पुनरुक्ति कर रहे हैं। दो ढाई हजार वर्ष से हमने नये का स्वागत बंद कर दिया हैपुराने की ही पुनरुक्ति कर रहे हैं। तो मेरे काम का पहला हिस्सा पुराने की पुनरुक्ति को तोड़ता है। और पुराने की पुनरुक्ति का हमारा मन टूटेतो ही हम नये के स्वागत के लिए तैयार हो सकते हैंवह दूसरा हिस्सा है। तो पहला तो पुराने को पकड़ने की हमारी जो आकांक्षा हैऔर जो नये का भय हैये दो हिस्से हैं। पुराने को तोड़ देने का और नये के स्वागत के लिए मार्ग खोलने का।

पुराने की पकड़ के कारण ही हम विज्ञान को जन्म न दे पाए। यद्यपि पृथ्वी पर सबसे पहले हम ही थेजिन्होंने विज्ञान की शुरुआत की थीलेकिन हम वह नहीं हैं जो कि उसको अंत तक ले जा सके। हम बहुत शुरू किए और रुक गए। जगत में जितनी भी खोजे हैंउन सबके बीज हमने शुरू किएलेकिन फल कोई काट रहा है। तो कहीं कुछ भूल हो रही है और दृष्टि में जो भूल हो रही हैवह यह हो रही है कि वैज्ञानिक अनुसंधान निरंतर पुराने को इनकार करने और नये की खोज करने से विकसित होता है। अगर एक बार हम पुराने को पूरी तरह स्वीकार कर लेंतो नये के खुलने के लिए अवकाश नहीं रह जाता है। तो वैज्ञानिक हम न हो पाएइस वजह से।
दूसरीइसी तरह वजह से--शायद हमारी धरती पृथ्वी पर सबसे ज्यादा साधन संपन्न हैलेकिन हम दरिद्र रह गएक्योंकि टेक्नालॉजी तो सदा नई है और हमारे पास चित्त जो है पुराने को दोहराने वाला है। तो जो टेक्नालॉजी को पैदा कर सकेवह संपत्ति को पैदा कर पाए। हम बुरी तरह पिछड़ गए।
तीसरी बातजो पुराने की ही पकड़ के कारण पैदा हो गईयह है कि जो हमें उपलब्ध हो गया थाउसे हम संतोष बना लिया,स्वभावतः। अगर हम असंतोष रखें उसके साथ तो हमें रोज नये को खोजना पड़े। तो हमने एक गरीब संतोष की स्थिति बना ली। संतोष अगर बहुत गहरा हो जाएतो मौत का पर्यायवाची हो जाता है। क्योंकि जीवन की ऊर्जा तो असंतोष से गति करती है। तो यह जो हमने स्टेटिक सोसाइटी बनाई हैमेरा मिशन आप कह सकते हैं कि एस्केपिज्म का यहअवरोध का यहगति के रुक जाने का जहां-जहां मुझे जो-जो कारण दिखाई पड़ता हैवहां-वहां चोट करूंगा। यह विध्वंसात्मक हिस्सा हुआ। यह विध्वंस का हिस्सा हुआयह एक पहलू है।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-16

विध्वंस: सृजन का प्रारंभ

यह सवाल नहीं है। पहली बात तो यह कि मैं निपट एक व्यक्ति की भांतिजो मुझे ठीक लगता है वह में कहूं। न तो मेरी कोई संस्था हैन कोई संगठन। हांकोई संगठन बना कर मेरी बात उसे ठीक लगती है और लोगों तक पहुंचाएतो वैसा संगठन जीवन जागृति केंद्र है। वह उसका संगठन हैजिन्हें मेरी बात ठीक लगती है और वे लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन मैं उस संगठन का हिस्सा नहीं हूं और उस संगठन का मेरे ऊपर कोई बंधन नहीं हैइसलिए वह संगठन रोज मुश्किल में है। क्योंकि कल मैंने कुछ कहा थावह संगठन के लोगों को ठीक लगता था। आज कुछ कहता हूंनहीं ठीक लगता है। वे मुश्किल में पड़ जाते हैं। मेरी तो उनसे कोई शर्त नहीं हैउनसे मैं बंधा हुआ नहीं हूंइसलिए जितनी प्रवृत्तियां चलती हैंजिन्हें मेरी बात ठीक लगती हैउनके द्वारा चलती हैं।
मेरे द्वारा तो सिर्फ एक ही प्रवृत्ति चलती है कि जो मुझे ठीक लगता हैवह मैं कहता रहता हूं। उससे ज्यादा मेरी कोई प्रवृत्ति नहीं है और जो मुझे ठीक लगता है, इसलिए निरंतर निवेदन करता रहता हूं कि जो मुझे ठीक लगता है, वह आपको ठीक लगे, यह जरूरी नहीं है। बहुत ज्यादा संभावना तो यही है कि वह न लगे। क्योंकि दो व्यक्तियों को एक सी बात ठीक लगे, यह जरा असंभावना है। असल में दो व्यक्ति इतने भिन्न-भिन्न हैं कि एक ही बात पर राजी नहीं होते। तो पूछा जा सकता है कि फिर मैं क्यों कहता हूं, अगर दूसरे को मुझे राजी नहीं करना है, प्रभावित नहीं करना है, दूसरे को अपने साथ बांधना नहीं है, संगठन नहीं, अनुयायी नहीं, शिष्य नहीं, तो फिर मैं क्यों कहता हूं?

असल में आज तक निरंतर तभी कोई बोला हैजब उसे संगठन बनाना हो। तभी कोई बोला हैजब उसे किसी को प्रभावित ही करना होतभी तक बोला हैउसे पंथ और संप्रदाय ही बांधना हो। इसलिए यह सवाल उठता है। इसलिए बोलना सहज बात नहीं रह गई। मैं बोलने को अत्यंत सहज बात मानता हूं। मुझे तो ठीक लगता हैउसे कहने में मुझे आनंद आता हैइसलिए कहता हूं। आपको प्रभावित करने के लिए नहीं। एक फूल खिलता है और उस फूल से सुगंध गिरती है। यह रास्ते से चलने वाले लोगों को प्रभावित करने के लिए नहीं। फूल को आनंद हैवह खिला हैउसकी सुगंध मिलती है।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-15

भौतिक समृद्धि अध्यात्म का आधार

जो ठीक है और सच है वह मुझे कहना ही पड़ेगा। इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं। आखिर जो सत्य हैलोगों को उसके साथ आना पड़ेगा--चाहे वे आज दूर जाते हुए मालूम पड़ें। और लोग पास हैं इसलिए मैं असत्य नहीं बोल सकता। क्योंकि सच जब भी बोला जाएगातब भी प्राथमिक परिणाम उसका यही होगा कि लोग दूर भागेंगे। क्योंकि हजारों वर्षों की धारणा में वे पले हैंउस पर चोट पड़ेगी। सत्य का हमेशा ही यही परिणाम हुआ है। सत्य हमेशा डिवास्टेंटिंग है। एक अर्थ है कि वह जो हमारी धारणा है उसको तो तोड़ डालेगा। और अगर धारणा तोड़ने से हम बचना चाहें तो हम सत्य नहीं बोल सकते। जान कर मैं किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाह रहा हूं। डेलिब्रेटली मैं किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाहता। लेकिन सत्य जितनी चोट पहुंचाता है उसमें मैं असमर्थ हूंउतनी चोट पहुंचेगी। उसको बचा भी नहीं सकता हूं। फिर मैं कोई राजनीतिक नेता नहीं हूं कि मैं इसकी फिक्र करूं कि लोग मेरे पास आएंकि मैं इसकी फिक्र करूं कि पब्लिक ओपिनियन क्या है?

मैं इस चिंता में हूं कि लोकमानस सत्य के निकट पहुंचना चाहिए। मैं लोकमानस के अनुकूल बनूंइसकी मुझे जरा भी चिंता नहीं है। सत्य के अनुकूल लोकमानस बनाया जाएइसकी मुझे चिंता है। और निश्चित ही बहुत सी बातें मैं कह रहा हूं जो चोट पहुंचाने वाली हैंआघात करने वाली और विध्वंसकारी हैं। लेकिन असल में सच में कहा जाए तो पूरी बातें नहीं कर रहा हूंजो कि और भी चोट करने वाली होंगीजो कि और भी विध्वंसकारी होंगी।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-14

पूंजीवाद का दर्शन

इस वक्त तकलीफ यह है कि समाजवादी तो कह रहा हैऔर पूंजीवाद चुप हैवह सब देख रहा है। अपने घर में बैठ कर कह रहा है कि यह क्या हो रहा है। तब वह मर ही जाएगाकोई उपाय नहीं है।

समाजवादी आपके पास आकर कहता नहीं है कि आप गलत बात कर रहे हैं?

मुझसे कोई आकर कहे तो मैं सदा तैयार हूं समझने कोअपनी बात समझाने को। अगर आप किसी बात को ठीक से कह रहे हैं और ठीक है बाततो बहुत कठिनाई है एंटी सोशलिज्म की बात में। तो फिलासफी नहीं बना सकेंगे आपइसलिए कहते हैं। जब तक आपके पास अपने आर्ग्युमेंट न हों...सोशलिज्म के पास अपने आर्ग्युमेंट हैं इसलिए आप परेशानी में पड़ जाते हैं। आपके पास आर्ग्युमेंट हैं इसलिए आप परेशानी में पड़ जाते हैं। आपके पास आर्ग्युमेंट नहीं हैं। और बिना आर्ग्युमेंट के आप जब कुछ कहते हैं तो ऐसा लगता है कि सिर्फ आपका इंट्रेस्ट है इसलिए आप बकवास कर रहे हैं।

असल में कैपिटलिस्ट खुद ही डिफेंस के मूड में है। यह उसकी तकलीफ है। वह खुद ही मान रहा है कि कैपिटलिज्म है तो खराब चीजइसलिए वह लड़ नहीं पाया। उसका कारण है कि यह सारा का सारा जो है--हमारे मन तो बहुत कुछ प्रोपेगेंडा पर चलते हैं। सोशलिज्म का प्रोपेगेंडा सौ साल का है और जब भी कोई व्यवस्था बनी होती हैउसके विरोध में यह प्रोपेगेंडा करता है। वह तो प्रोपेगेंडा करता है ठीक सेलेकिन जिसकी व्यवस्था बनी होती हैवह सोचता है क्या कर लेगाइसलिए वह कुछ प्रोपेगेंडा करता नहीं और अंत में हारता है।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-13

पूंजीवाद का विकास

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मेरे खयाल में तो अगर कोई बात सत्य हैउपयोगी हैतो सत्य अपना माध्यम खोज ही लेता है। नहीं अखबार थे तब की दुनिया मेंसत्य मरा नहीं। बुद्ध के लिए कोई अखबार नहीं थामहावीर के लिए कोई अखबार नहीं थाक्राइस्ट के लिए कोई अखबार नहीं था। तो भी क्राइस्ट मर नहीं गए। अगर बात में कुछ सच्चाई हैतो सत्य अपना माध्यम खोज लेगा। अखबार भी उसका माध्यम बन सकता है। लेकिन अखबार की वजह से कोई सत्य बचेगाऐसा नहीं है। या अखबार की वजह से कोई असत्य बहुत दिन तक रह सकता हैऐसा भी नहीं है। माध्यम की वजह से कोई चीज नहीं बचती हैकोई चीज बचने योग्य होतो माध्यम मिल जाता है। अखबार भी मिल ही जाएगा। नहीं मिलेतो भी इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। हम जो कह रहे हैंवह सत्य हैइसकी चिंता करनी चाहिए। अगर वह सत्य है तो माध्यम मिलेगा। और नहीं मिला तो भी क्या हर्ज है, तो भी कोई हर्ज नहीं है।

लेकिन इस युग में फर्क पड़ा हैऔर वह फर्क यह है कि थोड़ी-बहुत देर तक प्रचार के द्वारा असत्य को भी चलाया जा सकता है। प्रोपेगेंडाअसत्य को भी थोड़ी देर तक तो चला ही सकता है। सत्य जैसा दिखा ही सकता है। और थोड़ी देर तक प्रोपेगेंडा सत्य को भी प्रचारित होने से रोक ही सकता है। लेकिन यह चरम बात नहीं हैयह थोड़ी देर के लिए बात है।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-12

समाजवाद का पहला कदम: पूंजीवाद

जैसे ही समाज में सुविधा बढ़ती हैसुख बढ़ता हैधन बढ़ता हैवैसे ही परेशानी बढ़ती है। जब आप भी सुखी थे तो आपमें भी परेशान आदमी पैदा हुआ है। हरे राम जो आप भज रहे थेवह आपके सुखी समाज ने पैदा किया थावह गरीब आदमी ने पैदा नहीं किया था। वह बुद्ध या महावीर जैसे अमीर घर के बेटे जाकर हरे राम कर रहे थे। एक गरीब आदमी इतना परेशान है कि और परेशान होने का उसे उपाय नहीं है। इसलिए यह जो आप सोचते हैंएस्केपिज्म नहीं हैयह सुविधा है जो कि आपको...होता क्या हैकठिनाई क्या हैमुझे एक तकलीफ हैमुझे खाना नहीं मिल रहातो मेरा चौबीस घंटा तो खाना जुटाने में व्यतीत होता है। मुझे रहने को मकान नहीं है,तो मैं उसमें परेशान हूंऔर मेरे सारे सपने इसके होते हैं कि मुझे खाना कैसे मिल जाएमकान कैसे मिल जाता हैकपड़ा कैसे मिल जाएएक औरत कैसे मिल जाए?

जब मुझे यह सब मिल जाएतब असली परेशानी शुरू होती है कि अब क्याक्योंकि जब तक यह नहीं मिला है तब तक तो आशा रहती है कि एक अच्छी औरत मिलेगीएक अच्छा मकान मिलेगाएक कार होगीतो सब स्वर्ग हो जाएगा। जब सब मिल जाता है तब पहली दफे सवाल उठता है कि अब क्याअब मिलने को कुछ भी नहींअब क्या करेंसारी कठिनाइयां तब शुरू होती हैं--अगर भगवान आपकी सारी इच्छाएं पूरी कर दे तो आप फौरन स्युसाइड कर लेंगे। और कोई उपाय नहीं रह जाएगा। आत्महत्या जो है वह पूरी इच्छा हो जाने के बाद की इच्छा है। फिर करिएगा क्याफिर करने को कुछ भी नहीं बचता है। तो जहां-जहां समाज एफ्लुएंट होता हैवहां-वहां तकलीफ शुरू होती है।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-11

गांधीवाद ही नहींवाद मात्र के विरोध में हूं

आपके प्रवचनों से जो सारा ही गुजरात में एक हलचल मच गई है। तो इसमें आप खुलासा कर सकते हैं?

किस संबंध मेंकुछ एक-एक बात...

अगर गांधीजी के बारे में बोलेंगे और किसी व्यक्ति के बारे में बोलेंगेतो आपको बोला हैइस गैर-संदिग्ध होगी यह। आज तो हमने सुनातो उसमें कोई गैर-संदिग्ध नहीं होती है। न आपने गांधीजी की निंदा की हैन ही क्राइस्ट की। मगर यह गैर-संदिग्ध हो गई है सारे गुजरात में कि आपने गांधीजी की निंदा की या नेहरू जी की निंदा कीतो इसमें आप कुछ खुलासा कर सकते हैं?

किसी व्यक्ति की निंदा करने का मेरे मन में कोई सवाल ही नहीं है। और व्यक्ति की निंदा का कोई प्रयोजन भी नहीं है। वाद की जरूर मेरे मन में बहुत निंदा है। वादसंप्रदाय--चाहे वह राजनैतिक होचाहे धार्मिक होसब तरह के बाड़े टूटने चाहिएऔर मनुष्य का मन सोचने-समझने के लिए मुक्त होना चाहिए।

रूस मैं जाऊंगा तो माक्र्सवाद का विरोध करूंगाहिंदुस्तान में गांधीवाद का विरोध करूंगा। गांधीवाद से भी विरोध नहीं हैवाद से ही मेरा विरोध है।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-10

मेरी दृष्टि में रचनात्मक क्या है?
मेरे प्रिय आत्मन्!

बहुत से प्रश्न पूछे गए हैं। एक मित्र ने पूछा है कि मैं बोलता ही रहूंगाकोई सेवा कार्य नहीं करूंगाकोई रचनात्मक काम नहीं करूंगाक्या मेरी दृष्टि में सिर्फ बोलते ही जाना पर्याप्त है?

इस बात को थोड़ा समझ लेना उपयोगी है। पहली बात तो यह कि जो लोग सेवा को सचेत रूप से करते हैंकांशसलीउन लोगों को मैं समाज के लिए अहितकर और खतरनाक मानता हूं। सेवा जीवन का सहज अंग हो छाया की तरहवह हमारे प्रेम से सहज निकलती होतब तो ठीकअन्यथा समाज-सेवक जितना समाज का अहित और नुकसान करते हैंउतना कोई भी नहीं करता है।
समाज-सेवा भी अहंकारियों के लिए एक व्यवसाय है। दिखाई ऐसा पड़ता है कि समाज-सेवक विनम्र हैसबकी सेवा करता है;लेकिन सेवक के अहंकार को कोई देखेगा तो पता चलेगा कि सेवक भी सेवा करके मालिक बनने की पूरी चेष्टा में संलग्न होता है।

देख कबीरा रोया - प्रवचन-09

गांधी का चिंतन अवैज्ञानिक है
मेरे प्रिय आत्मन,
गाँधी जी के संबन्ध में मेरी जो दृष्टि है, उस पर हम विचार करेंगे। जिंदा आदमी को मार डालो और मरे हुए आदमी की पूजा करो। ये दोनों तरकीबें हैं।ये छूटने के रास्ते हैंये बचने के रास्ते हैं। फिर पूजा भी हम उसी की करते हैं जिसे हमने बहुत सताया हो। पूजा मानसिक रूप से पश्चात्ताप है। वह प्रायश्चित्त है। जिन लोगों को जीते जी हम सताते हैंउनके मरने के बाद पूरा समाज उनकी पूजा करता हैऐसे प्रायश्चित्त करता है। वह जो पीड़ा दी हैवह जो अपराध किया हैवह जो पाप है भीतरउस पाप का प्रायश्चित्त चलता है,फिर हजारों साल तक पूजा चलती है। पूजा किए गए अपराध का प्रायश्चित्त है। लेकिन वह भी अपराध का ही दूसरा हिस्सा है।
गांधी को जिंदा रहते में हम सताएंगेन सुनेंगे उनकीलेकिन मर जाने पर हम हजारों साल तक पूजा करेंगे। यह गिल्टी कांसियंसयह अपराधी चित्त का हिस्सा है यह पूजा। 

देख कबीरा रोया - प्रवचन-08

विध्वंस: सृजन का प्रारंभ
यह सवाल नहीं है। पहली बात तो यह कि मैं निपट एक व्यक्ति की भांतिजो मुझे ठीक लगता है वह में कहूं। न तो मेरी कोई संस्था हैन कोई संगठन। हांकोई संगठन बना कर मेरी बात उसे ठीक लगती है और लोगों तक पहुंचाएतो वैसा संगठन जीवन जागृति केंद्र है। वह उसका संगठन हैजिन्हें मेरी बात ठीक लगती है और वे लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन मैं उस संगठन का हिस्सा नहीं हूं और उस संगठन का मेरे ऊपर कोई बंधन नहीं हैइसलिए वह संगठन रोज मुश्किल में है। क्योंकि कल मैंने कुछ कहा थावह संगठन के लोगों को ठीक लगता था। आज कुछ कहता हूंनहीं ठीक लगता है। वे मुश्किल में पड़ जाते हैं। मेरी तो उनसे कोई शर्त नहीं हैउनसे मैं बंधा हुआ नहीं हूंइसलिए जितनी प्रवृत्तियां चलती हैंजिन्हें मेरी बात ठीक लगती हैउनके द्वारा चलती हैं।

मेरे द्वारा तो सिर्फ एक ही प्रवृत्ति चलती है कि जो मुझे ठीक लगता हैवह मैं कहता रहता हूं। उससे ज्यादा मेरी कोई प्रवृत्ति नहीं है और जो मुझे ठीक लगता हैइसलिए निरंतर निवेदन करता रहता हूं कि जो मुझे ठीक लगता हैवह आपको ठीक लगेयह जरूरी नहीं है। बहुत ज्यादा संभावना तो यही है कि वह न लगे। क्योंकि दो व्यक्तियों को एक सी बात ठीक लगेयह जरा असंभावना है। असल में दो व्यक्ति इतने भिन्न-भिन्न हैं कि एक ही बात पर राजी नहीं होते। तो पूछा जा सकता है कि फिर मैं क्यों कहता हूंअगर दूसरे को मुझे राजी नहीं करना हैप्रभावित नहीं करना हैदूसरे को अपने साथ बांधना नहीं है,संगठन नहींअनुयायी नहींशिष्य नहींतो फिर मैं क्यों कहता हूं?