मंगलवार, 30 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-014

फलाकांक्षारहित कर्मजीवंत समता और परम पद

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।। ४७।।
इससे तेरा कर्म करने मात्र में ही अधिकार होवेफल में कभी नहींऔर तू कर्मों के फल की वासना वाला भी मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी प्रीति न होवे।


कर्मयोग का आधार-सूत्र: अधिकार है कर्म मेंफल में नहींकरने की स्वतंत्रता हैपाने की नहीं। क्योंकि करना एक व्यक्ति से निकलता हैऔर फल समष्टि से निकलता है। मैं जो करता हूंवह मुझसे बहता हैलेकिन जो होता हैउसमें समस्त का हाथ है। करने की धारा तो व्यक्ति की हैलेकिन फल का सार समष्टि का है। इसलिए कृष्ण कहते हैंकरने का अधिकार है तुम्हाराफल की आकांक्षा अनधिकृत है।

लेकिन हम उलटे चलते हैंफल की आकांक्षा पहले और कर्म पीछे। हम बैलगाड़ी को आगे और बैलों को पीछे बांधते हैं। कृष्ण कह रहे हैंकर्म पहलेफल पीछे आता है--लाया नहीं जाता। लाने की कोई सामर्थ्य मनुष्य की नहीं हैकरने की सामर्थ्य मनुष्य की है। क्योंऐसा क्यों हैक्योंकि मैं अकेला नहीं हूंविराट है।
मैं सोचता हूंकल सुबह उठूंगाआपसे मिलूंगा। लेकिन कल सुबह सूरज भी उगेगाकल सुबह भी होगीजरूरी नहीं है कि कल सुबह हो ही। मेरे हाथ में नहीं है कि कल सूरज उगे ही। एक दिन तो ऐसा जरूर आएगा कि सूरज डूबेगा और उगेगा नहीं। वह दिन कल भी हो सकता है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि अब यह सूरज चार हजार साल से ज्यादा नहीं चलेगा। इसकी उम्र चुकती है। यह भी बूढ़ा हो गया है। इसकी किरणें भी बिखर चुकी हैं। रोज बिखरती जा रही हैं न मालूम कितने अरबों वर्षों से! अब उसके भीतर की भट्ठी चुक रही हैअब उसका ईंधन चुक रहा है। चार हजार साल हमारे लिए बहुत बड़े हैंसूरज के लिए ना-कुछ। चार हजार साल में सूरज ठंडा पडजाएगा--किसी भी दिन। जिस दिन ठंडा पड़ जाएगाउस दिन उगेगा नहींउस दिन सुबह नहीं होगी। उसकी पहली रात भी लोगों ने वचन दिए होंगे कि कल सुबह आते हैं--निश्चित।
लेकिन छोड़ें! सूरज चार हजार साल बाद डूबेगा और नहीं उगेगा। हमारा क्या पक्का भरोसा है कि कल सुबह हम ही उगेंगे! कल सुबह होगीपर हम होंगेजरूरी नहीं है। और कल सुबह भी होगीसूरज भी उगेगाहम भी होंगेलेकिन वचन को पूरा करने की आकांक्षा होगीजरूरी नहीं है। एक छोटी-सी कहानी कहूं।
सुना है मैंने कि चीन में एक सम्राट ने अपने मुख्य वजीर कोबड़े वजीर को फांसी की सजा दे दी। कुछ नाराजगी थी। लेकिन नियम था उस राज्य का कि फांसी के एक दिन पहले स्वयं सम्राट फांसी पर लटकने वाले कैदी से मिलेऔर उसकी कोई आखिरी आकांक्षा हो तो पूरी कर दे। निश्चित हीआखिरी आकांक्षा जीवन को बचाने की नहीं हो सकती थी। वह बंदिश थी। उतनी भर आकांक्षा नहीं हो सकती थी।
सम्राट पहुंचा--कल सुबह फांसी होगी--आज संध्याऔर अपने वजीर से पूछा कि क्या तुम्हारी इच्छा हैपूरी करूं! क्योंकि कल तुम्हारा अंतिम दिन है। वजीर एकदम दरवाजे के बाहर की तरफ देखकर रोने लगा। सम्राट ने कहातुम और रोते होकभी मैं कल्पना भी नहीं कर सकतातुम्हारी आंखें और आंसुओं से भरी!
बहुत बहादुर आदमी था। नाराज सम्राट कितना ही होउसकी बहादुरी पर कभी शक न था। तुम और रोते हो! क्या मौत से डरते होउस वजीर ने कहामौत! मौत से नहीं रोतारोता किसी और बात से हूं। सम्राट ने कहाबोलोमैं पूरा कर दूं। वजीर ने कहानहींवह पूरा नहीं हो सकेगाइसलिए जाने दें। सम्राट जिद्द पर अड़ गया कि क्यों नहीं हो सकेगाआखिरी इच्छा मुझे पूरी ही करनी है।
तो उस वजीर ने कहानहीं मानते हैं तो सुन लेंकि आप जिस घोड़े पर बैठकर आए हैंउसे देखकर रोता हूं। सम्राट ने कहापागल हो गएउस घोड़े को देखकर रोने जैसा क्या हैवजीर ने कहामैंने एक कला सीखी थीतीस वर्ष लगाए उस कला को सीखने में। वह कला थी कि घोड़ों को आकाश में उड़ना सिखाया जा सकता हैलेकिन एक विशेष जाति के घोड़े को। उसे खोजता रहावह नहीं मिला। और कल सुबह मैं मर रहा हूंजो सामने घोड़ा खड़ा हैवह उसी जाति का हैजिस पर आप सवार होकर आए हैं।
सम्राट के मन को लोभ पकड़ा। आकाश में घोड़ा उड़ सकेतो उस सम्राट की कीर्ति का कोई अंत न रहे पृथ्वी पर। उसने कहाफिक्र छोड़ो मौत की! कितने दिन लगेंगेघोड़ा आकाश में उड़ना सीख सकेकितना समय लगेगाउस वजीर ने कहाएक वर्ष। सम्राट ने कहाबहुत ज्यादा समय नहीं है। अगर घोड़ा उड़ सका तो ठीकअन्यथा मौत एक साल बाद। फांसी एक साल बाद भी लग सकती हैअगर घोड़ा नहीं उड़ा। अगर उड़ा तो फांसी से भी बच जाओगे,आधा राज्य भी तुम्हें भेंट कर दूंगा।
वजीर घोड़े पर बैठकर घर आ गया। पत्नी-बच्चे रो रहे थेबिलख रहे थे। आखिरी रात थी। घर आए वजीर को देखकर सब चकित हुए। कहाकैसे आ गएवजीर ने कहानी बताई। पत्नी और जोर से रोने लगी। उसने कहातुम पागल तो नहीं होक्योंकि मैं भलीभांति जानती हूंतुम कोई कला नहीं जानतेजिससे घोड़ा उड़ना सीख सके। व्यर्थ ही झूठ बोले। अब यह साल तो हमें मौत से भी बदतर हो जाएगा। और अगर मांगा ही था समयतो इतनी कंजूसी क्या की?बीसपच्चीसतीस वर्ष मांग सकते थे! एक वर्ष तो ऐसे चुक जाएगा कि अभी आया अभी गयारोते-रोते चुक जाएगा।
उस वजीर ने कहाफिक्र मत करएक वर्ष बहुत लंबी बात है। शायदशायद बुद्धिमानी के बुनियादी सूत्र का उसे पता था। और ऐसा ही हुआ। वर्ष बड़ा लंबा शुरू हुआ। पत्नी ने कहाकैसा लंबा! अभी चुक जाएगा। वजीर ने कहाक्या भरोसा है कि मैं बचूं वर्ष मेंक्या भरोसा हैघोड़ा बचेक्या भरोसा हैराजा बचेबहुत-सी कंडीशंस पूरी होंतब वर्ष पूरा होगा। और ऐसा हुआ कि न वजीर बचान घोड़ा बचान राजा बचा। वह वर्ष के पहले तीनों ही मर गए।
कल की कोई भी अपेक्षा नहीं की जा सकती। फल सदा कल हैफल सदा भविष्य में है। कर्म सदा अभी हैयहीं। कर्म किया जा सकता है। कर्म वर्तमान हैफल भविष्य है। इसलिए भविष्य के लिए आशा बांधनीनिराशा बांधनी है। कर्म अभी किया जा सकता हैअधिकार है। वर्तमान में हम हैं। भविष्य में हम होंगेयह भी तय नहीं। भविष्य में क्या होगाकुछ भी तय नहीं। हम अपनी ओर से कर लेंइतना काफी है। हम मांगें नहम अपेक्षा न रखेंहम फल की प्रतीक्षा न करेंहम कर्म करें और फल प्रभु पर छोड़ दें--यही बुद्धिमानी का गहरे से गहरा सूत्र है।
इस संबंध में यह बहुत मजेदार बात है कि जो लोग जितनी ज्यादा फल की आकांक्षा करते हैंउतना ही कम कर्म करते हैं। असल में फल की आकांक्षा में इतनी शक्ति लग जाती है कि कर्म करने योग्य बचती नहीं। असल में फल की आकांक्षा में मन इतना उलझ जाता हैभविष्य की यात्रा पर इतना निकल जाता है कि वर्तमान में होता ही नहीं। असल में फल की आकांक्षा में चित्त ऐसा रस से भर जाता है कि कर्म विरस हो जाता हैरसहीन हो जाता है।
इसलिए यह बहुत मजे का दूसरा सूत्र आपसे कहता हूं कि जितना फलाकांक्षा से भरा चित्तउतना ही कर्महीन होता है। और जितना फलाकांक्षा से मुक्त चित्तउतना ही पूर्णकर्मी होता है। क्योंकि उसके पास कर्म ही बचता हैफल तो होता नहींजिसमें बंटवारा कर सके। सारी चेतनासारा मनसारी शक्तिसब कुछ इसी क्षणअभी कर्म पर लग जाती है।
स्वभावतःजिसका सब कुछ कर्म पर लग जाता हैउसके फल के आने की संभावना बढ़ जाती है। स्वभावतःजिसका सब कुछ कर्म पर नहीं लगताउसके फल के आने की संभावना कम हो जाती है।
इसलिए तीसरा सूत्र आपसे कहता हूं कि जो जितनी फलाकांक्षा से भरा हैउतनी ही फल के आने की उम्मीद कम है। और जिसने जितनी फल की आकांक्षा छोड़ दी हैउतनी ही फल के आने की उम्मीद ज्यादा है। यह जगत बहुत उलटा है। और परमात्मा का गणित साधारण गणित नहीं हैबहुत असाधारण गणित है।
जीसस का एक वचन है कि जो बचाएगाउससे छीन लिया जाएगा। जो दे देगाउसे सब कुछ दे दिया जाएगा। जीसस ने कहा हैजो अपने को बचाता हैव्यर्थ ही अपने को खोता है। क्योंकि उसे परमात्मा के गणित का पता नहीं है। जो अपने को खोता हैवह पूरे परमात्मा को ही पा लेता है।
तो जब कर्म का अधिकार है और फल की आकांक्षा व्यर्थ हैऐसा कृष्ण कहते हैंतो यह मत समझ लेना कि फल मिलता नहींऐसा भी मत समझ लेना कि फल का कोई मार्ग नहीं है। कर्म ही फल का मार्ग हैआकांक्षाफल की आकांक्षाफल का मार्ग नहीं है। इसलिए कृष्ण जो कहते हैंउससे फल की अधिकतमआप्टिमम संभावना है मिलने की। और हम जो करते हैंउससे फल के खोने की मैक्सिममअधिकतम संभावना है और लघुतममिनिमम मिलने की संभावना है।
जो फल की सारी ही चिंता छोड़ देता हैअगर धर्म की भाषा में कहेंतो कहना होगापरमात्मा उसके फल की चिंता कर लेता है। असल में छोड़ने का भरोसा इतना बड़ा हैछोड़ने का संकल्प इतना बड़ा हैछोड़ने की श्रद्धा इतनी बड़ी है कि अगर इतनी बड़ी श्रद्धा के लिए भी परमात्मा से कोई प्रत्युत्तर नहीं हैतो फिर परमात्मा नहीं हो सकता है। इतनी बड़ी श्रद्धा के लिए--कि कोई कर्म करता है और फल की बात ही नहीं करताकर्म करता है और सो जाता है और फल का स्वप्न भी नहीं देखता--इतनी बड़ी श्रद्धा से भरे हुए चित्त को भी अगर फल न मिलता होतो फिर परमात्मा के होने का कोई कारण नहीं है। इतनी श्रद्धा से भरे चित्त के चारों ओर से समस्त शक्तियां दौड़ पड़ती हैं।
और जब आप फलाकांक्षा करते हैंतब आपको पता हैआप अश्रद्धा कर रहे हैं! शायद इसको कभी सोचा न हो कि फलाकांक्षा अश्रद्धागहरी से गहरी अनास्थाऔर गहरी से गहरी नास्तिकता है। जब आप कहते हैंफल भी मिलेतो आप यह कह रहे हैं कि अकेले कर्म से निश्चय नहीं है फल कामुझे फल की आकांक्षा भी करनी पड़ेगी। आप कहते हैं,दो और दो चार जोड़ता तो हूंजुड़कर चार हों भी। इसका मतलब यह है कि दो और दो जुड़कर चार होते हैंऐसे नियम की कोई भी श्रद्धा नहीं है। हों भीन भी हों!
जितना अश्रद्धालु चित्त हैउतना फलातुर होता है। जितना श्रद्धा से परिपूर्ण चित्त हैउतना फल को फेंक देता है--जाने समष्टिजाने जगतजाने विश्व की चेतना। मेरा काम पूरा हुआअब शेष काम उसका है।
फल की आकांक्षा वही छोड़ सकता हैजो इतना स्वयं परस्वयं के कर्म पर श्रद्धा से भरा है। और स्वभावतः जो इतनी श्रद्धा से भरा हैउसका कर्म पूर्ण हो जाता हैटोटल हो जाता है--टोटल एक्ट। और जब कर्म पूर्ण होता हैतो फल सुनिश्चित है। लेकिन जब चित्त बंटा होता है फल के लिए और कर्म के लिएतब जिस मात्रा में फल की आकांक्षा ज्यादा हैकर्म का फल उतना ही अनिश्चित है।
सुबह एक मित्र आए। उन्होंने एक बहुत बढ़िया सवाल उठाया। मैं तो चला गया। शायद परसों मैंने कहीं कहा कि एक छोटे-से मजाक से महाभारत पैदा हुआ। एक छोटे-से व्यंग्य से द्रौपदी केमहाभारत पैदा हुआ। छोटा-सा व्यंग्य द्रौपदी का हीदुर्योधन के मन में तीर की तरह चुभ गया और द्रौपदी नग्न की गईऐसा मैंने कहा। मैं तो चला गया। उन मित्र के मन में बहुत तूफान आ गया होगा। हमारे मन भी तो बहुत छोटे-छोटे प्यालियों जैसे हैंजिनमें बहुत छोटे-से हवा के झोंके से तूफान आ जाता है--चाय की प्याली से ज्यादा नहीं! तूफान आ गया होगा। मैं तो चला गयामंच पर वे चढ़ आए होंगे। उन्होंने कहातद्दन खोटी बात छेबिलकुल झूठी बात हैद्रौपदी कभी नग्न नहीं की गई।
द्रौपदी नग्न की गईहुई नहीं--यह दूसरी बात है। द्रौपदी पूरी तरह नग्न की गईहुई नहीं--यह बिलकुल दूसरी बात है। करने वालों ने कोई कोर-कसर न छोड़ी थी। करने वालों ने सारी ताकत लगा दी थी। लेकिन फल आया नहींकिए हुए के अनुकूल नहीं आया फल--यह दूसरी बात है।
असल मेंजो द्रौपदी को नग्न करना चाहते थेउन्होंने क्या रख छोड़ा था! उनकी तरफ से कोई कोर-कसर न थी। लेकिन हम सभी कर्म करने वालों कोअज्ञात भी बीच में उतर आता हैइसका कभी कोई पता नहीं है। वह जो कृष्ण की कथा हैवह अज्ञात के उतरने की कथा है। अज्ञात के भी हाथ हैंजो हमें दिखाई नहीं पड़ते।
हम ही नहीं हैं इस पृथ्वी पर। मैं अकेला नहीं हूं। मेरी अकेली आकांक्षा नहीं हैअनंत आकांक्षाएं हैं। और अनंत की भी आकांक्षा है। और उन सब के गणित पर अंततः तय होगा कि क्या हुआ। अकेला दुर्योधन ही नहीं है नग्न करने में,द्रौपदी भी तो है जो नग्न की जा रही है। द्रौपदी की भी तो चेतना हैद्रौपदी का भी तो अस्तित्व है। और अन्याय होगा यह कि द्रौपदी वस्तु की तरह प्रयोग की जाए। उसके पास भी चेतना है और व्यक्ति हैउसके पास भी संकल्प है। साधारण स्त्री नहीं है द्रौपदी।
सच तो यह है कि द्रौपदी के मुकाबले की स्त्री पूरे विश्व के इतिहास में दूसरी नहीं है। कठिन लगेगी बात। क्योंकि याद आती है सीता कीयाद आती है सावित्री की। और भी बहुत यादें हैं। फिर भी मैं कहता हूंद्रौपदी का कोई मुकाबला ही नहीं है। द्रौपदी बहुत ही अद्वितीय है। उसमें सीता की मिठास तो है हीउसमें क्लियोपेट्रा का नमक भी है। उसमें क्लियोपेट्रा का सौंदर्य तो है हीउसमें गार्गी का तर्क भी है। असल में पूरे महाभारत की धुरी द्रौपदी है। वह सारा युद्ध उसके आस-पास हुआ है।
लेकिन चूंकि पुरुष कथाएं लिखते हैंइसलिए कथाओं में पुरुष-पात्र बहुत उभरकर दिखाई पड़ते हैं। असल में दुनिया की कोई महाकथा स्त्री की धुरी के बिना नहीं चलती। सब महाकथाएं स्त्री की धुरी पर घटित होती हैं। वह बड़ी रामायण सीता की धुरी पर घटित हुई हैउसमें केंद्र में सीता है। राम और रावण तो ट्राएंगल के दो छोर हैंधुरी पर सीता है।
ये कौरव और पांडव और यह सारा पूरा महाभारत और यह सारा युद्ध द्रौपदी की धुरी पर घटा है। उस युग की और सारे युगों की सुंदरतम स्त्री है वह। नहींआश्चर्य नहीं है कि दुर्योधन ने भी उसे चाहा हो। असल मेंउस युग में कौन पुरुष होगा जिसने उसे न चाहा हो! उसका अस्तित्व उसके प्रति चाह पैदा करने वाला था। दुर्योधन ने भी उसे चाहा है और फिर वह चली गई अर्जुन के हाथ।
और यह भी बड़े मजे की बात है कि द्रौपदी को पांच भाइयों में बांटना पड़ा। कहानी बड़ी सरल हैउतनी सरल घटना नहीं हो सकती। कहानी तो इतनी ही सरल है कि अर्जुन ने आकर बाहर से कहा कि मां देखोहम क्या ले आए हैं! और मां ने कहाजो भी ले आए होवह पांचों भाई बांट लो। लेकिन इतनी सरल घटना हो नहीं सकती। क्योंकि जब बाद में मां को भी तो पता चला होगा कि यह मामला वस्तु का नहींस्त्री का है। यह कैसे बांटी जा सकती है! तो कौन-सी कठिनाई थी कि कुंती कह देती कि भूल हुई। मुझे क्या पता कि तुम पत्नी ले आए हो!
नहींलेकिन मैं जानता हूं कि जो संघर्ष दुर्योधन और अर्जुन के बीच होतावह संघर्ष पांच भाइयों के बीच भी हो सकता था। द्रौपदी ऐसी थीवे पांच भाई भी कट-मर सकते थे उसके लिए। उसे बांट देना ही सुगमतम राजनीति थी। वह घर भी कट सकता था। वह महायुद्धजो पीछे कौरवों-पांडवों में हुआवह पांडवों-पांडवों में भी हो सकता था।
इसलिए कहानी मेरे लिए उतनी सरल नहीं है। कहानी बहुत प्रतीकात्मक है और गहरी है। वह यह खबर देती है कि स्त्री वह ऐसी थी कि पांच भाई भी लड़ जाते। इतनी गुणी थीसाधारण नहीं थीअसाधारण थी। उसको नग्न करना आसान बात नहीं थीआग से खेलना था। तो अकेला दुर्योधन नहीं है कि नग्न कर ले। द्रौपदी भी है।
और ध्यान रहेबहुत बातें हैं इसमेंजो खयाल में ले लेने जैसी हैं। जब तक कोई स्त्री स्वयं नग्न न होना चाहेतब तक इस जगत में कोई पुरुष किसी स्त्री को नग्न नहीं कर सकता हैनहीं कर पाता है। वस्त्र उतार भी लेतो भी नग्न नहीं कर सकता है। नग्न होना बड़ी घटना है वस्त्र उतरने सेनिर्वस्त्र होने से नग्न होना बहुत भिन्न घटना है। निर्वस्त्र करना बहुत कठिन बात नहीं हैकोई भी कर सकता हैलेकिन नग्न करना बहुत दूसरी बात है। नग्न तो कोई स्त्री तभी होती हैजब वह किसी के प्रति खुलती है स्वयं। अन्यथा नहीं होतीवह ढंकी ही रह जाती है। उसके वस्त्र छीने जा सकते हैंलेकिन वस्त्र छीनना स्त्री को नग्न करना नहीं है। यह भी।
और यह भी कि द्रौपदी जैसी स्त्री को नहीं पा सका दुर्योधन। उसके व्यंग्य तीखे पड़ गए उसके मन पर। बड़ा हारा हुआ है। हारे हुए व्यक्ति--जैसे कि क्रोध में आई हुई बिल्लियां खंभे नोचने लगती हैं--वैसा करने लगते हैं। और स्त्री के सामने जब भी पुरुष हारता है--और इससे बड़ी हार पुरुष को कभी नहीं होती। पुरुष पुरुष से लड़ लेहार-जीत होती है। लेकिन पुरुष जब स्त्री से हारता है किसी भी क्षण मेंतो इससे बड़ी कोई हार नहीं होती।
तो दुर्योधन उस दिन उसे नग्न करने का जितना आयोजन करके बैठा हैवह सारा आयोजन भी हारे हुए पुरुष-मन का है। और उस तरफ जो स्त्री खड़ी है हंसने वालीवह कोई साधारण स्त्री नहीं है। उसका भी अपना संकल्प हैअपना विल है। उसकी भी अपनी सामर्थ्य हैउसकी भी अपनी श्रद्धा हैउसका भी अपना होना है। उसकी उस श्रद्धा मेंवह जो कथा हैवह कथा तो काव्य है कि कृष्ण उसकी साड़ी को बढ़ाए चले जाते हैं। लेकिन मतलब सिर्फ इतना है कि जिसके पास अपना संकल्प हैउसे परमात्मा का सारा संकल्प तत्काल उपलब्ध हो जाता है। तो अगर परमात्मा के हाथ उसे मिल जाते हैंतो कोई आश्चर्य नहीं।
तो मैंने कहाऔर मैं फिर से कहता हूंद्रौपदी नग्न की गईलेकिन हुई नहीं। नग्न करना बहुत आसान हैउसका हो जाना बहुत और बात है। बीच में अज्ञात विधि आ गईबीच में अज्ञात कारण आ गए। दुर्योधन ने जो चाहावह हुआ नहीं। कर्म का अधिकार थाफल का अधिकार नहीं था।
यह द्रौपदी बहुत अनूठी है। यह पूरा युद्ध हो गया। भीष्म पड़े हैं शय्या पर--बाणों की शय्या पर--और कृष्ण कहते हैं पांडवों को कि पूछ लो धर्म का राज! और वह द्रौपदी हंसती है। उसकी हंसी पूरे महाभारत पर छाई है। वह हंसती है कि इनसे पूछते हैं धर्म का रहस्य! जब मैं नग्न की जा रही थीतब ये सिर झुकाए बैठे थे। उसका व्यंग्य गहरा है। वह स्त्री बहुत असाधारण है।
काश! हिंदुस्तान की स्त्रियों ने सीता को आदर्श न बनाकर द्रौपदी को आदर्श बनाया होतातो हिंदुस्तान की स्त्री की शान और होती।
लेकिन नहींद्रौपदी खो गई है। उसका कोई पता नहीं है। खो गई। एक तो पांच पतियों की पत्नी हैइसलिए मन को पीड़ा होती है। लेकिन एक पति की पत्नी होना भी कितना मुश्किल हैउसका पता नहीं है। और जो पांच पतियों को निभा सकी हैवह साधारण स्त्री नहीं हैअसाधारण हैसुपर ह्यूमन है। सीता भी अतिमानवीय हैलेकिन टू ह्यूमन के अर्थों में। और द्रौपदी भी अतिमानवीय हैलेकिन सुपर ह्यूमन के अर्थों में।
पूरे भारत के इतिहास में द्रौपदी को सिर्फ एक आदमी ने प्रशंसा दी है। और एक ऐसे आदमी ने जो बिलकुल अनपेक्षित है। पूरे भारत के इतिहास में डाक्टर राम मनोहर लोहिया को छोड़कर किसी आदमी ने द्रौपदी को सम्मान नहीं दिया है,हैरानी की बात है। मेरा तो लोहिया से प्रेम इस बात से हो गया कि पांच हजार साल के इतिहास में एक आदमीजो द्रौपदी को सीता के ऊपर रखने को तैयार है।
यह जो मैंने कहाआदमी करता है कर्म फल की अति आकांक्षा सेकर्म भी नहीं हो पाता और फल की अति आकांक्षा से दुराशा और निराशा ही हाथ लगती है। कृष्ण ने यह बहुत बहुमूल्य सूत्र कहा है। इसे हृदय के बहुत कोने में सम्हालकर रख लेने जैसा है।
करें कर्मवह हाथ में हैअभी हैयहीं है। फल को छोड़ें। फल को छोड़ने का साहस दिखलाएं। कर्म को करने का संकल्पफल को छोड़ने का साहसफिर कर्म निश्चित ही फल ले आता है। लेकिन आप उस फल को मत लाएंवह तो कर्म के पीछे छाया की तरह चला आता है। और जिसने छोड़ा भरोसे सेउसके छोड़ने में हीउसके भरोसे में हीजगत की सारी ऊर्जा सहयोगी हो जाती है।
जैसे ही हम मांग करते हैंऐसा होवैसे ही हम जगत-ऊर्जा के विपरीत खड़े हो जाते हैं और शत्रु हो जाते हैं। जैसे ही हम कहते हैंजो तेरी मर्जीजो हमें करना थावह हमने कर लियाअब तेरी मर्जी पूरी होहम जगत-ऊर्जा के प्रति मैत्री से भर जाते हैं। और जगत और हमारे बीचजीवन-ऊर्जा और हमारे बीचपरमात्मा और हमारे बीच एक हार्मनी,एक संगीत फलित हो जाता है। जैसे ही हमने कहा कि नहींकिया भी मैंनेजो चाहता हूं वह हो भीवैसे ही हम जगत के विपरीत खड़े हो गए हैं। और जगत के विपरीत खड़े होकर सिवाय निराशा केअसफलता के कभी कुछ हाथ नहीं लगता है। इसलिए कर्मयोगी के लिए कर्म ही अधिकार है। फल! फल परमात्मा का प्रसाद है।


योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। ४८।।
हे धनंजयआसक्ति को त्यागकरसिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकरयोग में स्थित हुआ कर्मों को कर। यह समत्वभाव ही योग नाम से कहा जाता है।


समता ही योग है--इक्विलिब्रियमसंतुलनसंगीत। दो के बीच चुनाव नहींदो के बीच समभावविरोधों के बीच चुनाव नहींअविरोधदो अतियों के बीचदो पोलेरिटीज के बीचदो ध्रुवों के बीच पसंद-नापसंद नहींराग-द्वेष नहीं,साक्षीभाव। समता का अर्थ ठीक से समझ लेना जरूरी हैक्योंकि कृष्ण कहते हैंवही योग है।
समत्व कठिन है बहुत। चुनाव सदा आसान है। मन कहता हैइसे चुन लोजिसे चुनते होउससे विपरीत को छोड़ दो। कृष्ण कहते हैंचुनो ही मत। दोनों समान हैंऐसा जानो। और जब दोनों समान हैंतो चुनेंगे कैसेचुनाव तभी तक हो सकता हैजब असमान हों। एक हो श्रेष्ठएक हो अश्रेष्ठएक में दिखती हो सिद्धिएक में दिखती हो असिद्धि;एक में दिखता हो शुभएक में दिखता हो अशुभ। कहीं न कहीं कोई तुलना का उपाय होकंपेरिजन होतभी चुनाव है। अगर दोनों ही समान हैंतो चुनाव कहां?
चौराहे पर खड़े हैं। अगर सभी रास्ते समान हैंतो जाना कहांजाएंगे कैसेचुनेंगे कैसेखड़े हो जाएंगे। लेकिन अगर एक रास्ता ठीक है और एक गलततो जाएंगेगति होगी। जहां भी असमान दिखातत्काल चित्त यात्रा पर निकल जाता है--दि वेरी मोमेंट। यहां पता चला कि वह ठीकपता नहीं चला कि चित्त गया। पता चला कि वह गलतपता नहीं चला कि चित्त लौटा। पता लगा प्रीतिकरपता लगा अप्रीतिकरपता लगा श्रेयसपता लगा अश्रेयस--यहां पता लगा मन कोकि मन गया। पता लगना ही मन के लिए तत्काल रूपांतरण हो जाता है। और समता उसे उपलब्ध होती हैजो बीच में खड़ा हो जाता है।
कभी रस्सी पर चलते हुए नट को देखानट चुन सकता हैकिसी भी ओर गिर सकता है। गिर जाएझंझट के बाहर हो जाए। लेकिन दोनों गिराव के बीच में सम्हालता है। अगर वह झुकता भी दिखाई पड़ता है आपकोतो सिर्फ अपने को सम्हालने के लिएझुकने के लिए नहीं। और आप अगर सम्हले भी दिखते हैंतो सिर्फ झुकने के लिए। आप अगर एक क्षण चौरस्ते पर खड़े भी होते हैंतो चुनने के लिएकि कौन-से रास्ते से जाऊं! अगर एक क्षण विचार भी करते हैंतो चुनाव के लिएकि क्या ठीक है! क्या करूंक्या न करूं! क्या अच्छा हैक्या बुरा है! किससे सफलता मिलेगी,किससे असफलता मिलेगी! क्या होगा लाभक्या होगी हानि! अगर चिंतन भी करते हैं कभीतो चुनाव के लिए।
नट को देखा है रस्सी पर! झुकता भी दिखता हैलेकिन झुकने के लिए नहीं। जब वह बाएं झुकता हैतब आपने कभी खयाल किया हैकि बाएं वह तभी झुकता हैजब दाएं गिरने का डर पैदा होता है। दाएं तब झुकता हैजब बाएं गिरने का डर पैदा होता है। वह दाएं गिरने के डर को बाएं झुककर बैलेंस करता है। बाएं और दाएं के बीचराइट और लेफ्ट के बीच वह पूरे वक्त अपने को सम कर रहा है।
निश्चित हीयह समता जड़ नहीं हैजैसा कि पत्थर पड़ा हो। जीवन में भी समता जड़ नहीं हैजैसा पत्थर पड़ा हो। जीवन की समता भी नट जैसी समता ही है--प्रतिपल जीवित हैसचेतन हैगतिमान है।
दो तरह की समता हो सकती है। एक आदमी सोया पड़ा है गहरी सुषुप्ति मेंवह भी समता को उपलब्ध है। क्योंकि वहां भी कोई चुनाव नहीं है। लेकिन सुषुप्ति योग नहीं है। एक आदमी शराब पीकर रास्ते पर पड़ा हैउसे भी सिद्धि और असिद्धि में कोई फर्क नहीं है। लेकिन शराब पी लेना समता नहीं हैन योग है। यद्यपि कई लोग शराब पीकर भी योग की भूल में पड़ते हैं।
तो गांजा पीने वाले योगी भी हैंचरस पीने वाले योगी भी हैं। और आज ही हैंऐसा नहीं हैअति प्राचीन हैं। और अभी तो उनका प्रभाव पश्चिम में बहुत बढ़ता जाता है। अभी तो बस्तियां बस गई हैं अमेरिका मेंजहां लोग चरस पी रहे हैं। मैस्कलीनलिसर्जिक एसिडमारिजुआनासब चल रहा है। वे भी इस खयाल में हैं कि जब नशे में धुत होते हैंतो समता सध जाती हैक्योंकि चुनाव नहीं रहता।
कृष्ण अर्जुन को ऐसी समता को नहीं कह रहे हैं कि तू बेहोश हो जा! बेहोशी में भी चुनाव नहीं रहताक्योंकि चुनाव करने वाला नहीं रहता। लेकिन जब चुनाव करने वाला ही न रहातो चुनाव के न रहने का क्या प्रयोजन हैक्या अर्थ हैक्या उपलब्धि है?
नहींचुनाव करने वाला हैचाहे तो चुनाव कर सकता हैनहीं करता है। और जब चाहते हुए चुनाव नहीं करता कोई,जानते हुए जब दो विरोधों से अपने को बचा लेता हैबीच में खड़ा हो जाता हैतो योग को उपलब्ध होता हैसमाधि को उपलब्ध होता है।
सुषुप्ति और समाधि में बड़ी समानता है। चाहें तो हम ऐसी परिभाषा कर सकते हैं कि सुषुप्ति मूर्च्छित समाधि है। और ऐसी भी कि समाधि जाग्रत सुषुप्ति है। बड़ी समानता है। सुषुप्ति में आदमी प्रकृति की समता को उपलब्ध हो जाता है,समाधि में व्यक्ति परमात्मा की समता को उपलब्ध होता है।
इसलिए दुनिया में बेहोशी का जो इतना आकर्षण हैउसका मौलिक कारण धर्म है। शराब का जो इतना आकर्षण है,उसका मौलिक कारण धार्मिक इच्छा है।
आप कहेंगेक्या मैं यह कह रहा हूं कि धार्मिक आदमी को शराब पीनी चाहिएनहींमैं यही कह रहा हूं कि धार्मिक आदमी को शराब नहीं पीनी चाहिएक्योंकि शराब धर्म का सब्स्टीटयूट बन सकती है। नशा धर्म का परिपूरक बन सकता है। क्योंकि वहां भी एक तरह की समताजड़ समता उपलब्ध होती है।
कृष्ण जिस समता की बात कर रहे हैंवह सचेतन समता की बात है। उस युद्ध के क्षण में तो बहुत सचेतन होना पड़ेगा न! युद्ध के क्षण में तो बेहोश नहीं हुआ जा सकतामारिजुआना और एल एस डी नहीं लिया जा सकतान चरस पी जा सकती है। युद्ध के क्षण में तो पूरा जागना होगा।
कभी आपने खयाल किया होन किया हो! जितने खतरे का क्षण होता हैआप उतने ही जागे हुए होते हो।
अगर हम यहां बैठे हैंऔर यहां जमीन पर मैं एक फीट चौड़ी और सौ फीट लंबी लकड़ी की पट्टी बिछा दूं और आपसे उस पर चलने को कहूंतो कोई गिरेगा उस पट्टी पर सेकोई भी नहीं गिरेगा। बच्चे भी निकल जाएंगेबूढ़े भी निकल जाएंगेबीमार भी निकल जाएंगेकोई नहीं गिरेगा। लेकिन फिर उस पट्टी को इस मकान की छत पर और दूसरे मकान की छत पर रख दें। वही पट्टी हैएक फीट चौड़ी है। ज्यादा चौड़ी नहीं हो गईकम चौड़ी नहीं कीउतनी ही लंबी है। फिर हमसे कहा जाएचलें इस पर! तब कितने लोग चलने को राजी होंगे?
गणित और विज्ञान के हिसाब से कुछ भी फर्क नहीं पड़ा है। पट्टी वही हैआप भी वही हैं। खतरा क्या हैडर क्या हैऔर जब आप नीचे निकल गए थे चलकर और नहीं गिरे थेतो अभी गिर जाएंगेइसकी संभावना क्या है?
नहींलेकिन आप कहेंगेअब नहीं चल सकते। क्योंक्योंकि जमीन पर चलते वक्त जागने की कोई भी जरूरत न थी,सोए-सोए भी चल सकते थे। अब इस पर जागकर चलना पड़ेगाखतरा नीचे खड़ा है। इतना जागकर चलने का भरोसा नहीं है कि सौ फीट तक जागे रह सकेंगे। एक-दो फीट चलेंगेहोश खो जाएगा। कोई फिल्मी गाना बीच में आ जाएगा,कुछ और आ जाएगाजमीन पर हो जाएंगे। नीचे एक कुत्ता ही भौंक देगातो सब समता समाप्त हो जाएगी। तो आप कहेंगेनहींअब नहीं चल सकते। अब क्यों नहीं चल सकते हैंअब एक नई जरूरत--खतरे में जागरण चाहिए।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि युद्ध का इतना आकर्षण भी खतरे का आकर्षण है। इसलिए कभी आपने खयाल कियाजब दुनिया में युद्ध चलता हैतो लोगों के चेहरों की रौनक बढ़ जाती हैघटती नहीं। और जो आदमी कभी आठ बजे नहीं उठा थावह पांच बजे उठकर रेडियो खोल लेता है। पांच बजे से पूछता हैअखबार कहां हैजिंदगी में एक पुलक आ जाती है! बात क्या हैयुद्ध के क्षण में इतनी पुलक?
युद्ध का खतरा हमारी नींद को थोड़ा कम करता है। हम थोड़े जागते हैं। जागने का अपना रस है। इसलिए दस-पंद्रह साल में सोई हुई मनुष्यता को एक युद्ध पैदा करना पड़ता हैक्योंकि और कोई रास्ता नहीं है। और किसी तरह जागने का उपाय नहीं है। और जब युद्ध पैदा हो जाता हैतो रौनक छा जाती है। जिंदगी में रसपुलक और गति आ जाती है।
युद्ध के इस क्षण में कृष्ण बेहोशी की बात तो कह ही नहीं सकते हैंवह वर्जित हैउसका कोई सवाल ही नहीं उठता है। फिर कृष्ण जिस समता की बात कर रहे हैंजिस योग कीवह क्या हैवह हैदो के बीचद्वंद्व के बीच निर्द्वंद्वअचुनावच्वाइसलेसनेस। कैसे होगा यहअगर आपने द्वंद्व के बीच निर्द्वंद्व होना भी चुनातो वह भी चुनाव है।
इसे समझ लें। यह जरा थोड़ा कठिन पड़ेगा।
अगर आपने दो द्वंद्व के बीच निर्द्वंद्व होने को चुनातो दैट टू इज़ ए च्वाइसवह भी एक चुनाव है। निर्द्वंद्व आप नहीं हो सकते। अब आप नए द्वंद्व में जुड़ रहे हैं--द्वंद्व में रहना कि निर्द्वंद्व रहना। अब यह द्वंद्व हैअब यह कांफ्लिक्ट है। अगर आप इसका चुनाव करते हैं कि निर्द्वंद्व रहेंगे हमहम द्वंद्व में नहीं पड़तेतो यह फिर चुनाव हो गया। अब जरा बारीक और नाजुक बात हो गई। लेकिन निर्द्वंद्व को कोई चुन ही नहीं सकता। निर्द्वंद्व अचुनाव में खिलता हैवह आपका चुनाव नहीं है। अचुनाव में निर्द्वंद्व का फूल खिलता हैआप चुन नहीं सकते। तो आपको द्वंद्व और निर्द्वंद्व में नहीं चुनना है।
गीता के इस सूत्र को पढ़कर अनेक लोग मेरे पास आकर कहते हैं कि हम कैसे समतावान होंयानी मतलबहम समता को कैसे चुनेंकृष्ण तो कहते हैं कि समता योग हैतो हम समता को कैसे पा लें?
वे समता को चुनने की तैयारी दिखला रहे हैं। कृष्ण कहते हैंचुना कि समता खोई। फिर तुमने द्वंद्व बनाया--असमता और समता का द्वंद्व बना लिया। असमता छोड़नी हैसमता चुननी है! इससे क्या फर्क पड़ता है कि तुम द्वंद्व का पेयर कैसा बनाते होबादशाह और गुलाम का बनाते होकि बेगम और बादशाह का बनाते हो--इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आप द्वंद्व बनाए बिना रह नहीं सकते। और जो द्वंद्व बनाता हैवह समता को उपलब्ध नहीं होता है। फिर कैसेक्या है रास्ता?
रास्ता एक ही है कि द्वंद्व के प्रति जागेंकुछ करें मतजस्ट बी अवेयर। जानें कि एक रास्ता यह और एक रास्ता यह और यह मैंतीन हैं यहां। यह रही सफलतायह रही विफलता और यह रहा मैं। यह तीसरा मैं जो हूंइसके प्रति जागें। और जैसे ही इस तीसरे के प्रति जागेंगेजैसे ही यह थर्ड फोर्सयह तीसरा तत्व नजर में आएगाकि न तो मैं सफलता हूंन मैं विफलता हूं। विफलता भी मुझ पर आती हैसफलता भी मुझ पर आती है। सफलता भी चली जाती हैविफलता भी चली जाती है। सुबह होती हैसूरज खिलता हैरोशनी फैलती है। मैं रोशनी में खड़ा हो जाता हूं। फिर सांझ होतीअंधेरा आता हैफिर अंधेरा मेरे ऊपर छा जाता है। लेकिन न तो मैं प्रकाश हूंन मैं अंधेरा हूं। न तो मैं दिन हूंन मैं रात हूं। क्योंकि दिन भी मुझ पर आकर निकल जाता है और फिर भी मैं होता हूं। रात भी मुझ पर होकर निकल जाती हैफिर भी मैं होता हूं। निश्चित हीरात और दिन से मैं अलग हूंपृथक हूंअन्य हूं।
यह बोध कि मैं भिन्न हूं द्वंद्व सेद्वंद्व को तत्काल गिरा देता है और निर्द्वंद्व फूल खिल जाता है। वह समता का फूल योग है। और जो समता को उपलब्ध हो जाता हैउसे कुछ भी और उपलब्ध करने को बाकी नहीं बचता है।
इसलिए कृष्ण कहते हैंअर्जुनतू समत्व को उपलब्ध हो। छोड़ फिक्र सिद्धि कीअसिद्धि कीसफलताअसफलता कीहिंसा-अहिंसा कीधर्म कीअधर्म कीक्या होगाक्या नहीं होगाईदर आर छोड़! तू अपने में खड़ा हो। तू जाग। तू जागकर द्वंद्व को देख। तू समता में प्रवेश कर। क्योंकि समता ही योग है।


दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।। ४९।।
इस समत्व रूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यंत तुच्छ हैइसलिए हे धनंजयसमत्वबुद्धियोग का आश्रय ग्रहण कर,क्योंकि फल की वासना वाले अत्यंत दीन हैं।


कृष्ण कहते हैंधनंजयबुद्धियोग को खोजो। मैंने जो अभी कहाद्वंद्व को छोड़ोस्वयं को खोजोउसी को कृष्ण कहते हैंबुद्धि को खोजो। क्योंकि स्वयं का जो पहला परिचय हैवह बुद्धि है। स्वयं का जो पहला परिचय है। अपने से परिचित होने चलेंगेतो द्वार पर ही जिससे परिचय होगावह बुद्धि है। स्वयं का द्वार बुद्धि है। और स्वयं के इस द्वार में से प्रवेश किए बिना कोई भी न आत्मवान होता हैन ज्ञानवान होता है। यह बुद्धि का द्वार है। लेकिन बुद्धि के द्वार पर हमारी दृष्टि नहीं जातीक्योंकि बुद्धि से हमेशा हम कर्मों के चुनाव का काम करते रहते हैं।
बुद्धि के दो उपयोग हो सकते हैं। सब दरवाजों के दो उपयोग होते हैं। प्रत्येक दरवाजे के दो उपयोग हैं। होंगे ही। सब दरवाजे इसीलिए बनाए जाते हैंउनसे बाहर भी जाया जा सकता हैउनसे भीतर भी जाया जा सकता है। दरवाजे का मतलब ही यह होता है कि उससे बाहर भी जाया जा सकता हैउससे भीतर भी जाया जा सकता है। जिससे भी बाहर जा सकते हैंउससे ही भीतर भी जा सकते हैं। लेकिन हमने अब तक बुद्धि के दरवाजे का एक ही उपयोग किया है--बाहर जाने का। हमने अब तक उसका एक्जिट का उपयोग किया हैएंट्रेंस का उपयोग नहीं किया। जिस दिन आदमी बुद्धि का एंट्रेंस की तरहप्रवेश की तरह उपयोग करता हैउसी दिन--उसी दिन--जीवन में क्रांति फलित हो जाती है।
अर्जुन भी बुद्धि का उपयोग कर रहा है। ऐसा नहीं कि नहीं कर रहा हैकहना चाहिएजरूरत से ज्यादा ही कर रहा है। इतना ज्यादा कर रहा है कि कृष्ण को भी उसने दिक्कत में डाला हुआ है। बुद्धि का भलीभांति उपयोग कर रहा है। निर्बुद्धि नहीं हैबुद्धि काफी है। वह काफी बुद्धि ही उसे कठिनाई में डाले हुए है। निर्बुद्धि वहां और भी बहुत हैंवे परेशान नहीं हैं।
लेकिन बुद्धि का वह एक ही उपयोग जानता है। वह बुद्धि का उपयोग कर रहा है कि यह करूं तो ठीककि वह करूं तो ठीकऐसा होगातो क्या होगावैसा होगातो क्या होगावह बुद्धि का उपयोग कर रहा है बहिर्जगत के संबंध मेंवह बुद्धि का उपयोग कर रहा है फलों के लिएवह बुद्धि का उपयोग कर रहा है कि कल क्या होगापरसों क्या होगासंतति कैसी होगीकुल नाश होगाक्या होगाक्या नहीं होगावह बुद्धि का सारा उपयोग कर रहा है। सिर्फ एक उपयोग नहीं कर रहा है--भीतर प्रवेश का।
कृष्ण उससे कहते हैंधनंजयकर्म के संबंध में ही सोचते रहना बड़ी निकृष्ट उपयोगिता है बुद्धि की। उसके संबंध में भी सोचोजो कर्म के संबंध में सोच रहा है। कर्म को ही देखते रहनाबाहर ही देखते रहनाबुद्धि का अत्यल्प उपयोग है--निकृष्टतम!
अगर इसे ऐसा कहें कि व्यवहार के लिए ही बुद्धि का उपयोग करना--क्या करनाक्या नहीं करना--बुद्धि की क्षमता का न्यूनतम उपयोग है। और इसलिए हमारी बुद्धि पूरी काम में नहीं आतीक्योंकि उतनी बुद्धि की जरूरत नहीं है। जहां सुई से काम चल जाता हैवहां तलवार की जरूरत ही नहीं पड़ती।
अगर वैज्ञानिक से पूछेंतो वह कहता है कि श्रेष्ठतम मनुष्य भी अपनी बुद्धि के पंद्रह प्रतिशत से ज्यादा का उपयोग नहीं करते हैंकुल पंद्रह प्रतिशतवह भी श्रेष्ठतम! श्रेष्ठतम यानी कोई आइंस्टीन या कोई बर्ट्रेंड रसेल। तो जो दुकान पर बैठा हैवह आदमी कितनी करता हैजो दफ्तर में काम कर रहा हैवह आदमी कितनी करता हैजो स्कूल में पढ़ा रहा हैवह आदमी कितना काम करता है बुद्धि सेदो-ढाई परसेंटइससे ज्यादा नहीं। दो-ढाई परसेंट भी पूरी जिंदगी नहीं करता आदमी उपयोगकेवल अठारह साल की उम्र तक। अठारह साल की उम्र के बाद तो मुश्किल से ही कोई उपयोग करता है। क्योंकि कई बातें बुद्धि सीख लेती हैकामचलाऊ सब बातें बुद्धि सीख लेती हैफिर उन्हीं से काम चलाती रहती है जिंदगीभर।
अठारह साल के बाद मुश्किल से आदमी मिलेगाजिसकी बुद्धि बढ़ती है। आप कहेंगेगलत। सत्तर साल के आदमी के पास अठारह साल के आदमी से ज्यादा अनुभव होता है। अनुभव ज्यादा होता हैबुद्धि ज्यादा नहीं होतीअठारह साल की ही बुद्धि होती है। उसी बुद्धि से वहउसी चम्मच से वह अनुभव को इकट्ठा करता चला जाता है। चम्मच बड़ी नहीं करताचम्मच वही रहती हैबस उससे अनुभव को इकट्ठा करता चला जाता है। अनुभव का ढेर बढ़ जाता है उसके पासबाकी चम्मच जो उसकी बुद्धि की होती हैवह अठारह साल वाली ही होती है।
दूसरे महायुद्ध में तो बड़ी कठिनाई हुई। कठिनाई यह हुई कि दूसरे महायुद्ध में अमेरिका को जांच-पड़ताल करनी पड़ी कि हम जिन सैनिकों को भेजते हैंउनका आई.क्यू. कितना हैउनका बुद्धि-माप कितना है। युद्ध में भेज रहे हैंतो उनकी बुद्धि की जांच भी तो होनी चाहिए! शरीर की जांच तो हो जाती है कि यह आदमी ताकतवर हैलड़ सकता है,सब ठीक। लेकिन अब युद्ध जो हैवह शरीर से नहीं चल रहा हैमस्कुलर नहीं रह गया है। अब युद्ध बहुत कुछ मानसिक हो गया है। बुद्धि कितनी है?
तो बड़ी हैरानी हुई। युद्ध के मैदान के लिए जो सैनिक भर्ती हो रहे थेउनकी जांच करने से पता चला कि उन सभी सैनिकों की जो औसत बुद्धि की उम्र हैवह तेरह साल से ज्यादा की नहीं है। तेरह साल! उसमें युनिवर्सिटी के ग्रेजुएट हैंउसमें मैट्रिक से कम पढ़ा-लिखा तो कोई भी नहीं है। कहना चाहिएपढ़े-लिखे से पढ़ा-लिखा वर्ग है। उसकी उम्र भी उतनी ही है जितनी तेरह साल के बच्चे की होनी चाहिए--बुद्धि की। बड़ी चौंकाने वालीबड़ी घबराने वाली बात है। मगर कारण है। और कारण यह है कि बाहर की दुनिया में जरूरत ही नहीं है बुद्धि की इतनी।
इसलिए जब कृष्ण कहते हैं तो बहुत मनोवैज्ञानिक सत्य कह रहे हैं वह कि निकृष्टतम उपयोग है कर्म के लिए बुद्धि का। निकृष्टतम! बुद्धि के योग्य ही नहीं है वह। वह बिना बुद्धि के भी हो सकता है। मशीनें आदमी से अच्छा काम कर लेती हैं।
सच तो यह है कि आदमी रोज मशीनों से हारता जा रहा हैऔर धीरे-धीरे आदमियों को कारखानेदफ्तर के बाहर होना पड़ेगा। मशीनें उनकी जगह लेती चली जाएंगी। क्योंकि आदमी उतना अच्छा काम नहीं कर पाताजितना ज्यादा अच्छा मशीनें कर लेती हैं। उसका कारण सिर्फ एक ही है कि मशीनों के पास बिलकुल बुद्धि नहीं है। भूल-चूक के लिए भी बुद्धि होनी जरूरी है। गलती करने के लिए भी बुद्धि होनी जरूरी है। मशीनें गलती करती ही नहीं। करती चली जाती हैंजो कर रही हैं।
हम भी सत्रह-अठारह साल की उम्र होते-होते तक मेकेनिकल हो जाते हैं। दिमाग सीख जाता है क्या करना हैफिर उसको करता चला जाता है।
एक और बुद्धि का महत उपयोग है--बुद्धियोग--बुद्धिमानी नहींबुद्धिमत्ता नहींइंटलेक्चुअलिज्म नहींसिर्फ बौद्धिकता नहीं। बुद्धियोग का क्या मतलब है कृष्ण काबुद्धियोग का मतलब हैजिस दिन हम बुद्धि के द्वार का बाहर के जगत के लिए नहींबल्कि स्वयं को जानने की यात्रा के लिए प्रयोग करते हैं। तब सौ प्रतिशत बुद्धि की जरूरत पड़ती है। तब स्वयं-प्रवेश के लिए समस्त बुद्धिमत्ता पुकारी जाती है।
अगर बायोलाजिस्ट से पूछेंतो वह कहता हैआदमी की आधी खोपड़ी बिलकुल बेकाम पड़ी हैआधी खोपड़ी का कोई भी हिस्सा काम नहीं कर रहा है। बड़ी चिंता की बात है जीव-शास्त्र के लिए कि बात क्या हैइसकी शरीर में जरूरत क्या हैयह जो सिर का बड़ा हिस्सा बेकार पड़ा हैकुछ करता ही नहींइसको काट भी दें तो चल सकता हैआदमी में कोई फर्क नहीं पड़ेगापर यह है क्योंक्योंकि प्रकृति कुछ भी व्यर्थ तो बनाती नहीं। या तो यह हो सकता है कि पहले कभी आदमी पूरी खोपड़ी का उपयोग करता रहा होफिर भूल-चूक हो गई हो कुछआधी खोपड़ी के द्वार-दरवाजे बंद हो गए हैं। या यह हो सकता है कि आगे संभावना है कि आदमी के मस्तिष्क में और बहुत कुछ पोटेंशियल है,बीजरूप हैजो सक्रिय हो और काम करे।
दोनों ही बातें थोड़ी दूर तक सच हैं। ऐसे लोग पृथ्वी पर हो चुके हैंबुद्ध या कृष्ण या कपिल या कणादजिन्होंने पूरी-पूरी बुद्धि का उपयोग किया। ऐसे लोग भविष्य में भी होंगेजो इसका पूरा-पूरा उपयोग करें। लेकिन बाहर के काम के लिए थोड़ी-सी ही बुद्धि से काम चल जाता है। वह न्यूनतम उपयोग है--निकृष्टतम।
अर्जुन को कृष्ण कहते हैंधनंजयतू बुद्धियोग को उपलब्ध हो। तू बुद्धि का भीतर जाने के लिएस्वयं को जानने के लिएउसे जानने के लिए जो सब चुनावों के बीच में चुनने वाला हैजो सब करने के बीच में करने वाला हैजो सब घटनाओं के बीच में साक्षी हैजो सब घटनाओं के पीछे खड़ा है दूरदेखने वाला द्रष्टा हैउसे तू खोज। और जैसे ही उसे तू खोज लेगातू समता को उपलब्ध हो जाएगा। फिर ये बाहर की चिंताएं--ऐसा ठीकवैसा गलत--तुझे पीड़ित और परेशान नहीं करेंगी। तब तू निश्चिंत भाव से जी सकता है। और वह निश्चिंतता तेरी समता से आएगीतेरी बेहोशी से नहीं।


बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।। ५०।।
बुद्धियुक्त पुरुष पुण्य-पाप दोनों को इस लोक में ही त्याग देता है अर्थात उनसे लिपायमान नहीं होता। इससे बुद्धियोग के लिए ही चेष्टा कर। यह बुद्धिरूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्म बंधन से छूटने का उपाय है।


सांख्यबुद्धि को उपलब्ध व्यक्ति पाप-पुण्य से निवृत्त हो जाता है। सांख्यबुद्धि को उपलब्ध व्यक्ति कर्म की कुशलता को उपलब्ध हो जाता है। और कर्म की कुशलता हीकृष्ण कहते हैंयोग है।
इसमें बहुत-सी बातें हैं। एक तोसांख्यबुद्धि। इसके पहले सूत्र में मैंने कहा कि बुद्धि का प्रयोग प्रवेश के लिए,बहिर्यात्रा के लिए नहींअंतर्यात्रा के लिए है। जिस दिन कोई व्यक्ति अपने विचार का उपयोग अंतर्यात्रा के लिए करता हैउस दिन सांख्य को उपलब्ध होता है। जिस दिन भीतर पहुंचता हैस्वयं में जब खड़ा हो जाता है--स्टैंडिंग इन वनसेल्फ--जब अपने में ही खड़ा हो जाता हैजब स्वयं में और स्वयं के खड़े होने में रत्तीभर का फासला नहीं होता;जब हम वहीं होते हैं जहां हमारा सब कुछ होना हैजब हम वही होते हैं जो हम हैंजब हम ठीक अपने प्राणों की ज्योति के साथ एक होकर खड़े हो जाते हैं--इसे सांख्यबुद्धि कृष्ण कहते हैं।
मैंने पीछे आपसे कहा कि सांख्य परम ज्ञान हैदि सुप्रीम डॉक्ट्रिन। उससे बड़ा कोई सिद्धांत नहीं है। ह्यूबर्ट बेनॉयट ने एक किताब लिखी है। किताब का नाम हैदि सुप्रीम डॉक्ट्रिन। लेकिन उसे सांख्य का कोई पता नहीं है। उसने वह किताब झेन पर लिखी है। लेकिन जो भी लिखा है वह सांख्य है। परम सिद्धांत क्या हैसांख्य को परम ज्ञान कृष्ण कहते हैंक्या बात हैज्ञानों में श्रेष्ठतम ज्ञान सांख्य क्यों है?
दो तरह के ज्ञान हैं। एक ज्ञानजिससे हम ज्ञेय को जानते हैं। और एक दूसरा ज्ञानजिससे हम ज्ञाता को जानते हैं। एक ज्ञानजिससे हम आब्जेक्ट को जानते हैं--वस्तु कोविषय को। और एक ज्ञानजिससे हम सब्जेक्ट को जानते हैं,जानने वाले को ही जानते हैं जिससे। ज्ञान दो हैं। पहला ज्ञान साइंस बन जाता हैआब्जेक्टिव नालेज। दूसरा ज्ञान सांख्य बन जाता हैसब्जेक्टिव नालेज।
मैं आपको जान रहा हूंयह भी एक जानना है। लेकिन मैं आपको कितना ही जानूंतब भी पूरा न जान पाऊंगा। मैं आपको कितना ही जानूंमेरा जानना राउंड अबाउट होगामैं आपके आस-पास घूमकर जानूंगाआपके भीतर नहीं जा सकता। अगर मैं आपके शरीर की चीर-फाड़ भी कर लूंतो भी बाहर ही जानूंगातो भी भीतर नहीं जा सकता। अगर मैं आपके मस्तिष्क के भी टुकड़े-टुकड़े कर लूंतो भी बाहर ही रहूंगाभीतर नहीं जा सकता। उन अर्थों में मैं आपके भीतर नहीं जा सकताजिन अर्थों में आप अपने भीतर हैं। यह इंपासिबिलिटी है।
आपके पैर में दर्द हो रहा है। मैं समझ सकता हूंक्या हो रहा है। मेरे पैर में भी दर्द हुआ है। नहीं हुआ हैतो मेरे सिर में दर्द हुआ हैतो भी मैं अनुमान कर सकता हूं कि आपको क्या हो रहा है। अगर कुछ भी नहीं हुआ हैतो भी आपके चेहरे को देखकर समझ सकता हूं कि कोई पीड़ा हो रही है। लेकिन सच में आपको क्या हो रहा हैइसे मैं बाहर से ही जान सकता हूं। वह इनफरेंस हैअनुमान है। मैं अनुमान कर रहा हूं कि ऐसा कुछ हो रहा है। लेकिन जैसे आप अपने दर्द को जान रहे हैंवैसा जानने का मेरे लिए आपके बाहर से कोई भी उपाय नहीं है।
लीबनिज हुआ एक बहुत बड़ा गणितज्ञ और विचारक। उसने आदमी के लिए एक शब्द दिया हैमोनोड। वह कहता है,हर आदमी एक बंद मकान हैजिसमें कोई द्वार-दरवाजा-खिड़की भी नहीं है। मोनोड का मतलब हैविंडोलेस सेल--एक बंद मकानजिसमें कोई खिड़की भी नहीं हैजिसमें से घुस जाओ और भीतर जाकर जान लो कि क्या हो रहा है!
आप प्रेम से भरे हैं। क्या करें कि हम आपके प्रेम को जान लें बाहर सेकोई उपाय नहीं है। कोई उपाय नहीं है। निर-उपाय है। हांलेकिन कुछ-कुछ जान सकते हैं। पर वह जो जानना हैवह ठीक नहीं है कहना कि ज्ञान है।
तो बर्ट्रेंड रसेल ने दो शब्द बनाए हैं। एक को वह कहता है नालेजऔर एक को कहता है एक्वेनटेंस। एक को वह कहता है ज्ञानऔर एक को कहता है परिचय। तो दूसरे का हम ज्यादा से ज्यादा परिचय कर सकते हैंएक्वेनटेंस कर सकते हैंदूसरे का ज्ञान नहीं हो सकता। और दूसरे का जो परिचय हैउसमें भी इतने मीडियम हैं बीच में कि वह ठीक हैइसका कभी भरोसा नहीं हो सकता है।
आप वहां बैठे हैं बीस गज की दूरी पर। मैंने आपके चेहरे को कभी नहीं देखाहालांकि अभी भी देख रहा हूं। फिर भी आपके चेहरे को नहीं देख रहा हूं। आपके पास से ये प्रकाश की किरणेंआपके चेहरे को लेकर मेरी आंखों के भीतर जा रही हैं। फिर आंखों के भीतर ये प्रकाश की किरणें मेरी आंखों के तंतुओं को हिला रही हैं। फिर वे आंखों के तंतु मेरे भीतर जाकर मस्तिष्क के किसी रासायनिक द्रव्य में कुछ कर रहे हैंजिसको अभी वैज्ञानिक भी नहीं कहते कि क्या कर रहे हैं। वे कहते हैंसमथिंग। अभी पक्का नहीं होता कि वे वहां क्या कर रहे हैं! उनके कुछ करने से मुझे आप दिखाई पड़ रहे हैं। पता नहींआप वहां हैं भी या नहीं। क्योंकि सपने में भी आप मुझे दिखाई पड़ते हैं और नहीं होते हैंसुबह पाता हूंनहीं हैं। अभी आप दिखाई पड़ रहे हैंपता नहींहैं या नहीं! क्योंकि कौन कह सकता है कि जो मैं देख रहा हूंवह सपना नहीं है! कौन कह सकता है कि जो मैं देख रहा हूंवह सपना नहीं है!
फिर पीलिया का मरीज हैउसे सब चीजें पीली दिखाई पड़ती हैं। कलर ब्लाइंड लोग होते हैं--दस में से एक होता है,यहां भी कई लोग होंगे--उनको खुद भी पता नहीं होता। कुछ लोग रंगों के प्रति अंधे होते हैं। कोई किसी रंग के प्रति अंधा होता है। पता नहीं चलताबहुत मुश्किल है पता चलना। क्योंकि अभाव का पता चलना बहुत मुश्किल है।
बर्नार्ड शा हरे रंग के प्रति अंधा था--साठ साल की उम्र में पता चला। साठ साल तक उसे पता ही नहीं था कि हरा रंग उसे दिखाई ही नहीं पड़ता! उसे हरा और पीला एक-सा दिखाई पड़ता था। कभी कोई मौका ही नहीं आया कि जिसमें जांच-पड़ताल हो जाती। वह तो साठवीं वर्षगांठ पर किसी ने एक सूट उसे भेंट भेजा। हरे रंग का सूट था। टाई भेजना भूल गया होगा। तो बर्नार्ड शा न सोचा कि टाई भी खरीद लाएंतो पूरा हो जाए। तो बाजार में टाई खरीदने गयापीले रंग की टाई खरीद लाया।
सेक्रेटरी ने रास्ते में कहा कि आप यह क्या कर रहे हैंबड़ी अजीब मालूम पड़ेगी! पीले रंग की टाई और हरे रंग के कोट परबर्नार्ड शा ने कहापीला और हरा! क्या दोनों बिलकुल मैच नहीं करतेदोनों बिलकुल एक जैसे नहीं हैं?उसने कहा कि आप मजाक तो नहीं कर रहे हैंबर्नार्ड शा आदमी मजाक करने वाला था। पर उसने कहा कि नहीं,मजाक नहीं कर रहा। तुम क्या कह रहे हो! ये दोनों अलग हैंये दोनों एक ही रंग हैं! तब आंख की जांच करवाईतो पता चला कि उसकी आंख को हरा रंग दिखाई ही नहीं पड़ता। वह ब्लाइंड है हरे रंग के प्रति।
तो जो मुझे दिखाई पड़ रहा हैवह सच में हैवैसा ही है जैसा दिखाई पड़ रहा हैकुछ पक्का नहीं है। जो हमें दिखाई पड़ रहा हैवह सिर्फ एज़म्शन है। हम मानकर चल सकते हैं कि है। एक बड़ी दूरबीन ले आएंएक बड़ी खुर्दबीन ले आएं और आपके चेहरे पर लगाकर देखें।
ऐसी मजाक मैंने सुनी है। एक वैज्ञानिक ने एक बहुत सुंदर स्त्री से विवाह किया। और जाकर अपने मित्रों सेवैज्ञानिकों से कहा कि बहुत सुंदर स्त्री से प्रेम किया है। उन वैज्ञानिकों ने कहाठीक से देख भी लिया हैखुर्दबीन लगाई थी कि नहींक्योंकि भरोसा क्या है! उसने कहाक्या पागलपन की बात करते होकहीं स्त्री के सौंदर्य को खुर्दबीन लगाकर देखा जाता है! उन्होंने कहातुम ले आना अपनी सुंदर स्त्री को।
मित्रसिर्फ मजाक मेंमिलाने ले आया। उन सबने एक बड़ी खुर्दबीन रखीसुंदर स्त्री को दूसरी तरफ बिठाया। उसके पति को बुलाया कि जरा यहां से आकर देखो। देखा तो एक चीख निकल गई उसके मुंह से। क्योंकि उस तरफ तो खाई-खड्डे के सिवाय कुछ दिखाई नहीं पड़ता था। स्त्री के चेहरे पर इतने खाई-खड्डे!
लेकिन खुर्दबीन चाहिएआदमी के चेहरे पर भी हैं। बड़ी खुर्दबीन से जब देखो तो ऐसा लगता है कि खाई-पहाड़खाई-पहाड़ऐसा दिखाई पड़ता है। सत्य क्या हैजो खुर्दबीन से दिखता है वहया जो खाली आंख से दिखता है वहअगर सत्य ही होगातो खुर्दबीन वाला ही ज्यादा होना चाहिएखाली आंख की बजाय। उसको वैज्ञानिक बड़े इंतजाम से बनाते हैं।
जो हमें दिखाई पड़ रहा हैवह सिर्फ एक्वेनटेंस हैकामचलाऊयूटिलिटेरियन! उपयोगी हैसत्य नहीं है। इसलिए दूसरे से हम सिर्फ परिचित ही हो सकते हैं। उस परिचय को कभी ज्ञान मत समझ लेना।
इसलिए कृष्ण अर्जुन से कहते हैंपरम-ज्ञान है सांख्य। सांख्य का मतलब हैदूसरे को नहींउसे जानो जो तुम हो। क्योंकि उसे ही तुम भीतर सेइंटिमेटलीआंतरिकता सेगहरे में जान सकते हो। उसको बाहर से जानने की जरूरत नहीं है। उसमें तुम उतर सकते होडूब सकते होएक हो सकते हो।
इसलिए इस मुल्क मेंहमारे मुल्क में तो हम ज्ञान कहते ही सिर्फ आत्मज्ञान को हैं। बाकी सब परिचय है। साइंस ज्ञान नहीं है इन अर्थों में। साइंस का जो शब्द है अंग्रेजी मेंउसका मतलब होता है ज्ञानउसका मतलब भी टु नो है। साइंस का मतलब अंग्रेजी में होता है ज्ञान। लेकिन हम अपने मुल्क में साइंस को ज्ञान नहीं कहतेहम उसे विज्ञान कहते हैंहम कहते हैंविशेष ज्ञान। ज्ञान नहींस्पेसिफिक नालेज। ज्ञान नहींक्योंकि ज्ञान तो है वह जो स्वयं को जानता है। यह विशेष ज्ञान हैजिससे जिंदगी में काम चलता है। एक स्पेसिफिक नालेज हैएक्वेनटेंस हैपरिचय है।
इसलिए हमारा विज्ञान शब्द अंग्रेजी के साइंस शब्द से ज्यादा मौजूं हैवह ठीक है। क्योंकि वह एक--वि--विशेषता जोड़कर यह कह देता है कि ज्ञान नहीं हैएक तरह का ज्ञान है। एक तरह का ज्ञान हैए टाइप आफ नालेज। लेकिन सच में ज्ञान तो एक ही है। और वह है उसे जाननाजो सबको जानता है।
यह भी स्मरण रखना जरूरी है कि जब मैं उसे ही नहीं जानताजो सबको जानता हैतो मैं सबको कैसे जान सकता हूं! जब मैं अपने को ही नहीं जानता कि मैं कौन हूंतो मैं आपको कैसे जान सकता हूं कि आप कौन हैं! अभी जब मैंने इस निकटतम सत्य को नहीं जाना--दि मोस्ट इंटिमेटदि नियरेस्ट--जिसमें इंचभर का फासला नहीं हैउस तक को भी नहीं जान पायातो आप तो मुझसे बहुत दूर हैंअनंत दूरी पर हैं। और अनंत दूरी पर हैं। कितने ही पास बैठ जाएंघुटने से घुटना लगा लेंछाती से छाती लगा लेंदूरी अनंत है--इनफिनिट इज़ दि डिस्टेंस। कितने ही करीब बैठ जाएंदूरी अनंत है। क्योंकि भीतर प्रवेश नहीं हो सकताफासला बहुत हैउसे पूरा नहीं किया जा सकता। सभी प्रेमियों की तकलीफ यही है। प्रेम की पीड़ा ही यही है कि जिसको पास लेना चाहते हैंन ले पाएंतो मन दुखता रहता है कि पास नहीं ले पाए। और पास ले लेते हैंतो मन दुखता है कि पास तो आ गएलेकिन फिर भी पास कहां आ पाए! दूरी बनी ही रही। वे प्रेमी भी दुखी होते हैंजो दूर रह जाते हैंऔर उनसे भी ज्यादा दुखी वे होते हैंजो निकट आ जाते हैं। क्योंकि कम से कम दूर रहने में एक भरोसा तो रहता है कि अगर पास आ जातेतो आनंद आ जाता। पास आकर पता चलता है कि डिसइलूजनमेंट हुआ। पास आ ही नहीं सकते। तीस साल पति-पत्नी साथ रहेंपास आते हैंविवाह के दिन से दूरी रोज बड़ी होती हैकम नहीं होती। क्योंकि जैसे-जैसे समझ आती हैवैसे-वैसे पता चलता हैपास आने का कोई उपाय नहीं मालूम होता।
हर आदमी एक मोनोड है--अपने में बंदआईलैंडकहीं से खुलता ही नहीं। जितने निकट रहते हैंउतना ही पता चलता है कि परिचय नहीं हैअपरिचित हैं बिलकुल। कोई पहचान नहीं हो पाई। मरते दम तक भी पहचान नहीं हो पाती। असल में जो आदमी दूसरे की पहचान को निकला है अपने को बिना जानेवह गलत हैवह गलत यात्रा कर रहा है,जो कभी सफल नहीं हो सकती।
सांख्य स्वयं को जानने वाला ज्ञान है। इसलिए मैं कहता हूंदि सुप्रीम साइंसपरम ज्ञान। और कृष्ण कहते हैं,धनंजयअगर तू इस परम ज्ञान को उपलब्ध होता हैतो योग सध गया समझफिर कुछ और साधने को नहीं बचता। सब सध गयाजिसने स्वयं को जाना। सब मिल गयाजिसने स्वयं को पाया। सब खुल गयाजिसने स्वयं को खोला। तो अर्जुन से वे कहते हैंसब मिल जाता हैसब योग सांख्यबुद्धि को उपलब्ध व्यक्ति को उपलब्ध है। और योग कर्म की कुशलता बन जाती है।
योग कर्म की कुशलता क्यों हैव्हायक्योंक्यों कहते हैंयोग कर्म की कुशलता हैक्योंकि हम तो योगियों को सिर्फ कर्म से भागते देखते हैं। कृष्ण बड़ी उलटी बात कहते हैं। असल में उलटी बात कहने के लिए कृष्ण जैसी हिम्मत ही चाहिएनहीं तो उलटी बात कहना बहुत मुश्किल है। लोग सीधी-सीधी बातें कहते रहते हैं। सीधी बातें अक्सर गलत होती हैं। अक्सर गलत होती हैं। क्योंकि सीधी बातें सभी लोग मानते हैं। और सभी लोग सत्य को नहीं मानते हैं। सभी लोगजो कनवीनिएंट हैसुविधापूर्ण हैउसको मानते हैं।
कृष्ण बड़ी उलटी बात कह रहे हैं। वे कह रहे हैं योगी कर्म की कुशलता को उपलब्ध हो जाता है। योग ही कर्म की कुशलता है।
हम तो योगी को भागते देखते हैं। एक ही कुशलता देखते हैं--भागने की। एक ही एफिशिएंसी है उसके पासकि वह एकदम रफू हो जाता है कहीं से भी। रफू शब्द तो आप समझते हैं नकंबल में या शाल में छेद हो जाता है न। तो उसको रफू करने वाला ठीक कर देता है। छेद एकदम रफू हो जाता है। रफू मतलबपता ही नहीं चलता कि कहां है। ऐसे ही संन्यासी रफू होना जानता है। बस एक ही कुशलता है--रफू होने की। और तो कोई कुशलता संन्यासी मेंयोगी में दिखाई नहीं पड़ती।
तो फिर ये कृष्ण क्या कहते हैंये किस योगी की बात कर रहे हैंनिश्चित हीये जिस योगी की बात कर रहे हैं,वह पैदा नहीं हो पाया है। जिस योगी की ये बात कर रहे हैंवह योगी चूक गया।
असल में योगी तो वह पैदा हो पाया हैजो अर्जुन को मानता हैकृष्ण को नहीं। अर्जुन भी रफू होने के लिए बड़ी उत्सुकता दिखला रहे हैं। वह भी कहते हैंरफू करो भगवान! कहीं से रास्ता दे दोमैं निकल जाऊं। फिर लौटकर न देखूं। बड़े उपद्रव में उलझाया हुआ है। यह सब क्या देख रहा हूं! मुझे बाहर निकलने का रास्ता बता दो।
कृष्ण उसे बाहर ले जाने का उपाय नहींऔर भी अपने भीतर ले जाने का उपाय बता रहे हैं। इस युद्ध के तो बाहर ले जा नहीं रहे। वह इस युद्ध के भी बाहर जाना चाहता है। इस युद्ध के तो भीतर ही खड़ा रखे हुए हैंऔर उससे उलटा कह रहे हैं कि जरा और भीतर चल--युद्ध से भी भीतरअपने भीतर चल। और अगर तू अपने भीतर चला जाता है,तो फिर भागने की कोई जरूरत नहीं। फिर तू जो भी करेगावही कुशल हो जाएगा--तू जो भी करेगावही।
क्योंकि जो व्यक्ति भीतर शांत हैऔर जिसके भीतर का दीया जल गयाऔर जिसके भीतर प्रकाश हैऔर जिसके भीतर मृत्यु न रहीऔर जिसके भीतर अहंकार न रहाऔर जिसके भीतर असंतुलन न रहाऔर जिसके भीतर सब समता हो गईऔर जिसके भीतर सब ठहर गयासब मौनसब शांत हो गया--उस व्यक्ति के कर्म में कुशलता न होगीतो किसके होगी?
अशांत है हृदयतो कर्म कैसे कुशल हो सकता हैकंपता हैडोलता है मनतो हाथ भी डोलता है। कंपता हैडोलता है चित्ततो कर्म भी डोलता है। सब विकृत हो जाता है। क्योंकि भीतर ही सब डोल रहा हैभीतर ही कुछ थिर नहीं है। शराबी के पैर जैसे कंप रहेऐसा भीतर सब कंप रहा है। बाहर भी सब कंप जाता है। कंप जाता हैअकुशल हो जाता है।
भीतर जब सब शांत हैसब मौन हैतो अकुशलता आएगी कहां सेअकुशलता आती है--भीतर की अशांतिभीतर के तनावटेंशनएंग्जाइटीभीतर की चिंताभीतर के विषादभीतर गड़े हैं जो कांटे दुख केपीड़ा केचिंता के--वे सब कंपा डालते हैं। उनसे जो आह उठती हैवह बाहर सब अकुशल कर जाती है। लेकिन भीतर अगर वीणा बजने लगे मौन कीसमता कीतो अकुशलता के आने का उपाय कहां हैबाहर सब कुशल हो जाता है। फिर तब ऐसा आदमी जो भी करता हैवह मिडास जैसा हो जाता है।
कहानी है यूनान में कि मिडास जो भी छूतावह सोने का हो जाता। जो भी छू लेतावह सोने का हो जाता। मिडास तो बड़ी मुश्किल में पड़ा इससेक्योंकि सोना पास में न हो तो ही ठीक। थोड़ा होतो भी चल जाए। मिडास जैसा हो जाएतो मुश्किल हो गई। क्योंकि सोना न तो खाया जा सकतान पीया जा सकता। पानी छुए मिडासतो सोना हो जाएखाना छुएतो सोना हो जाए। पत्नी उससे दूर भागेबच्चे उससे दूर बचें। सभी सोने वालों की पत्नियां और बच्चे दूर भागते हैं। छुएंतो सोना हो जाएं। मिडास का टच--पत्नी को अगर गले लगा ले प्रेम सेतो वह मरीसोना हो गई।
तो जहां भी सोने का संस्पर्श हैवहां प्रेम मर जाता हैसब सोना हो जाता हैसब पैसा हो जाता है। मिडास तो बड़ी मुश्किल में पड़ा। क्योंकि वह जो छूता थावह जीवित भी होतो मुर्दा सोना हो जाए।
लेकिन मैं यह कह रहा हूं कि कृष्ण एक और तरह की कीमियाऔर तरह की अल्केमी बता रहे हैं। वे यह बता रहे हैं कि भीतर अगर समता हैऔर भीतर अगर सांख्य हैऔर भीतर अगर सब मौन और शांत हो गया हैतो हाथ जो भी छूते हैंवह कुशल हो जाता हैजो भी करते हैंवह कुशल हो जाता है। फिर जो होता हैवह सभी सफल है। सफल ही नहींकहना चाहिएसुफल भी है।
सुफल और बात है। सफल तो चोर भी होता हैलेकिन सुफल नहीं होता। सफल का तो इतना ही मतलब है कि काम करते हैंफल लग जाता है। लेकिन कड़वा लगता हैजहरीला भी लगता है। सुफल का मतलब हैअमृत का फल लगता है। भीतर जब सब ठीक हैतो बाहर सब ठीक हो जाता है। इसे कृष्ण ने योग की कुशलता कहा है।
और यह पृथ्वी तब तक दीनतादुख और पीड़ा से भरी रहेगीजब तक अयोगी कुशलता की कोशिश कर रहे हैं कर्म कीऔर योगी पलायन की कोशिश कर रहे हैं। जब तक योगी भागेंगे और अयोगी जमकर खड़े रहेंगेतब तक यह दुनिया उपद्रव बनी रहेतो आश्चर्य नहीं है। इससे उलटा होतो ज्यादा स्वागत योग्य है। अयोगी भागें तो भाग जाएं,योगी टिकें और खड़े हों और जीवन के युद्ध को स्वीकार करें।
जीवन के युद्ध में नहीं है प्रश्न। युद्ध भीतर हैवह है कष्ट। द्वंद्व भीतर हैवह है कष्ट। वहां निर्द्वंद्वतावहां मौनवहां शांतितो बाहर सब कुशल हो जाता है।
एक श्लोक और।


कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्य नामयम्।। ५१।।
क्योंकि बुद्धियोगयुक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकरजन्मरूप बंधन से छूटे हुए निर्दोष,अर्थात अमृतमय परमपद को प्राप्त होते हैं।


जो भी ऐसे ज्ञान को उपलब्ध हो जाता हैजो भी ऐसी निष्ठा कोऐसी श्रद्धा कोऐसे अनुभव को उपलब्ध हो जाता है जहां द्वंद्व नहीं हैवैसा व्यक्ति जन्म केमृत्यु के घेरे से मुक्त होकर परमपद को पा लेता है।
इसे थोड़ा-सा खोलना पड़ेगा।
एक तोजन्म-मृत्यु से मुक्त हो जाता हैइसका ऐसा मतलब नहीं है कि अभी जन्म-मृत्यु में है। है तो अभी भी नहीं;ऐसा प्रतीत करता है कि है। जन्म-मृत्यु से मुक्त हो जाता हैइसका मतलब यह नहीं कि पहले बंधा था और अब मुक्त हो जाता है। नहींऐसा बंधा तो पहले भी नहीं थालेकिन मानता था कि बंधा हूं। और अब जानता है कि नहीं बंधा हूं। पहला तो यह खयाल ले लेना जरूरी है। जो घटना घटती है जन्म और मृत्यु से मुक्ति कीवह वास्तविक नहीं हैक्योंकि जन्म और मृत्यु ही वास्तविक नहीं हैं। जो घटना घटती हैवह एक असत्य काएक अज्ञान का निराकरण है।
जैसे कि मैं एक गणित करता हूंदो और दो पांच जोड़ लेता हूं। मैं कितना ही दो और दो पांच जोडूंदो और दो पांच होते नहीं हैं। जब मैं दो और दो पांच जोड़ रहा हूंतब भी दो और दो चार ही हैं। यानी मेरे जोड़ने से कोई दो और दो पांच नहीं हो जाते। एक कमरे में कुर्सियां रखी हैं दो और दोऔर मैं जोड़कर बाहर आता हूं और कहता हूं कि पांच हैं,तो भी कमरे में पांच कुर्सियां नहीं हो जातीं। कमरे में कुर्सियां चार ही होती हैं। भूल जोड़ की है। जोड़ की भूल,अस्तित्व की भूल नहीं बनती।
तो सांख्य का कहना है कि जो गलती हैवह अस्तित्व में नहीं है। जो गलती हैवह हमारी समझ में है। वह जोड़ की भूल है। ऐसा नहीं है कि जन्म और मृत्यु हैं। ऐसा हमें दिखाई पड़ रहा है कि हैं। हमारे दिखाई पड़ने से हो नहीं जातीं।
फिर कल मुझे पता चलता है कि नहींदो और दो पांच नहीं होतेदो और दो चार होते हैं। मैं फिर लौटकर कमरे में जाता हूं और मैं देखता हूं कि ठीकदो और दो चार ही हैं। और मैं बाहर आकर कहता हूं कि जब गणित ठीक आ जाता है किसी कोतो कुर्सियां पांच नहीं रह जातींचार हो जाती हैं। ऐसा ही--ठीक ऐसा ही--ऐसा ही समझना है। जो भूल हैवह ज्ञान की भूल हैइरर आफ नोइंग। वह भूल एक्झिस्टेंशियल नहीं हैअस्तित्वगत नहीं है। क्योंकि अस्तित्वगत अगर भूल होतो सिर्फ जानने से नहीं मिट सकती है।
अगर कुर्सियां पांच ही हो गई होंतो फिर मैं दो और दो चार कर लूंइससे चार नहीं हो जातीं। कुर्सियां दो और दो चार होने से चार तभी हो सकती हैंजब वे चार रही ही हों उस समय भीजब मैं पांच गिनता था। वह मेरे गिनने की भूल थी।
जीवन और मरण आत्मा का होता नहींप्रतीत होता हैएपियरेंस हैदिखाई पड़ता हैगणित की भूल है। मैंने पीछे आपसे बात कहीइसे थोड़ा और आगे ले जाना जरूरी है। हम दूसरे को मरते देख लेते हैंतो सोचते हैंमैं भी मरूंगा। यह इमिटेटिव मिसअंडरस्टैंडिंग है। और चूंकि जिंदगी में हम सब इमिटेशन से सीखते हैंनकल से सीखते हैंतो मृत्यु भी नकल से सीख लेते हैं। यह नकल है। नकल चोरी है बिलकुल। जैसे कि बच्चे स्कूल में दूसरे की कापी में से उतारकर उत्तर लिख लेते हैं। उनको हम चोर कहते हैं। हम सब चोर हैंजिंदगी में हमारे अधिकतम अनुभव चोरी के हैं। मृत्यु जैसा बड़ा अनुभव भी चुराया हुआ है। किसी को मरते देखाकहा कि अब हम भी मरेंगे।
आपने अपने को कभी मरते देखा हैकिसी को मरते देखासोचाहम भी मरेंगे। नकल कर ली। फिर रोज कोई न कोई मर रहा है--एक मरादो मरेतीन मरेचार मरेपांच मरे। फिर पता चला कि सबको मरना ही पड़ता है। पहले जो भी हुएसब मरे। तो फिर पक्का होता जाता है अनुमानगणित तय होता जाता है कि नहींमरना ही है।
मृत्यु हैयह अनुभूत सत्य नहीं है। यह एक्सपीरिएंस्ड ट्रुथ नहीं है कि मृत्यु है। यह अनुमानजन्यइनफरेंशियल है। यह हमने चारों तरफ देख लिया कि ऐसा होता हैइसलिए मृत्यु है।
आपने अपना जन्म देखायह बड़े मजे की बात हैआप जन्मे और आपको अपने जन्म का भी पता नहींछोड़ेंमृत्यु अभी आने वाली हैभविष्य में हैइसलिए भविष्य का अभी हम कैसे पक्का करें! लेकिन जन्म तो कम से कम अतीत में है। आप जन्मे हैं। आपको जन्म का भी पता नहीं है कि आप जन्मे हैं! बड़ी मजेदार बात है। मृत्यु का न पता हो,समझ में आता है। क्योंकि मृत्यु अभी भविष्य हैपता नहीं होगी कि नहीं होगी। लेकिन जन्म तो हो चुका है। पर आपको जन्म का भी कोई पता नहीं। और आप ही जन्मे और आपको ही अपने जन्म का पता नहीं है!
असल में आपको अपना ही पता नहीं हैजन्म वगैरह का पता कैसे हो! इतनी बड़ी घटना जन्म की घट गईऔर आपको पता नहीं है! असल में आपको जीवन की किसी घटना का--गहरी घटना का--कोई भी पता नहीं है। आपको तो जो सिखा दिया गया हैवही पता है। स्कूल में गणित सिखा दिया गयामां-बाप ने भाषा सिखा दीफिर धर्म-मंदिर में धर्म की किताब सिखा दीफिर किसी ने हिंदू-मुसलमान सिखा दियाफिर किसी ने कुछ और सिखा दिया--वह सब सीखकर खड़े हो गए हैं। मगर आपको जिंदगी का कुछ भी गहरा अनुभव नहीं हैजन्म तक का कोई अनुभव नहीं है!
तो ध्यान रहेजब जन्म से गुजरकर आपको जन्म का अनुभव नहीं मिलातो पक्का समझना कि मृत्यु से भी आप गुजर जाओगे और आपको अनुभव नहीं मिलेगा। क्योंकि वह भी इतनी ही गहरी घटना हैजितनी जन्म है। वह दरवाजा वही हैजन्म से आप आए थेमृत्यु से आप लौटेंगे--दि सेम डोर। दरवाजा अलग नहीं हैदरवाजा वही है। इधर आए थेउधर जाएंगे। और दरवाजे को देखने की आपकी आदत नहीं है। आंख बंद करके निकल जाते हैं। अभी निकल आए हैं आंख बंद करकेअब फिर आंख बंद करके निकल जाएंगे।
तो ये जन्म और मृत्यु...जन्म भीलोग हमसे कहते हैं कि आपका हुआ। वह भी कथन है। मृत्यु भी हम देखते हैं कि होती हैवह अनुमान है। जन्म किसी ने बतायामृत्यु का अनुमान हमने किया है। लेकिन न हमें जन्म का कोई पता हैन हमें मृत्यु का कोई पता है। तो ये जन्म और मृत्यु होते हैंये बड़े इमिटेटिव कनक्लूजंस हैंये नकल से ली गई निष्पत्तियां हैं।
सांख्य कहता है कि काश! तुम एक बार जन्म लो जानते हुए। काश! तुम एक बार मरो जानते हुए। फिर तुम दुबारा न कहोगे कि जन्म और मरण होता है। और अभी मृत्यु को तो देर हैऔर जन्म हो चुकालेकिन जीवित अभी आप हैं। सांख्य कहता हैअगर तुम जीवित रहो जानते हुएतो भी छुटकारा हो जाएगा। छुटकारे का मतलब ही इतना है कि वह जो भ्रांति हो रही हैविचार से जो निष्कर्ष लिया जा रहा हैवह गलत सिद्ध होता है।
तो जो सांख्यबुद्धि को उपलब्ध हो जाते हैंकृष्ण कहते हैंअर्जुनवे जन्म-मृत्यु से मुक्त हो जाते हैं। ठीक होता कहना कि वे कहते कि वे जन्म-मृत्यु की गलती से मुक्त हो जाते हैं। परमपद को उपलब्ध होते हैं।
वह परमपद कहां हैजब भी हम परमपद की बात सोचते हैंतो कहीं ऊपर आकाश में खयाल आता है। क्योंकि पद जो हैं हमारेवे जमीन से जितने ऊंचे होते जाते हैंउतने बड़े होते जाते हैं।
पट्टाभि सीतारमैया ने एक संस्मरण लिखा है। लिखा है कि मद्रास में एक मजिस्ट्रेट था अंग्रेज। वह अपनी अदालत में एक ही कुर्सी रखता थाखुद के बैठने के लिए। बाकी कुर्सियां थींलेकिन वह बगल के कमरे में रखता था। नंबर डाल रखे थे। क्योंकि वह कहता थाआदमी देखकर कुर्सी देनी चाहिए। तो एक नंबर का एक मोढ़ा था छोटा-साबिलकुल गरीब आदमी आ जाए--बहुत गरीब आ जाएतब तो खड़े-खड़े चल जाए--बाकी थोड़ाजिसको एकदम गरीब न भी कहा जा सकेउसको नंबर एक का मोढ़ा। फिर नंबर दो का मोढ़ाफिर नंबर तीन की कुर्सीफिर चार की--ऐसे सात नंबर की कुर्सियां थीं।
एक दिन एक आदमी आया--पट्टाभि सीतारमैया ने लिखा है--कि एक दिन बड़ी मुश्किल हो गई। एक बड़ा धोखे से भरा आदमी आ गया। आदमी आया तो मजिस्ट्रेट ने देखा उसकोतो सोचा कि खड़े-खड़े चल जाएगा।
सोचना पड़ता हैकौन आदमी आया! आपको भी सोचना पड़ता हैकहां बिठाएं! क्या करें! क्या न करें! आदमी देखकर जगह बनानी पड़ती है। आदमी के लिए कोई जगह नहीं बनाताजैसा दिखाई पड़ता हैउसके लिए जगह बनानी पड़ती है।
पर जैसे ही पास आया और जैसे ही उसने ऊपर आंख उठाईतो देखा कि एक कीमती चश्मा लगाए हुए है। उसने कहा कि जाओनंबर एकचपरासी को कहा कि नंबर एक। चपरासी भीतर भागा गया। वह बूढ़ा पास आकर खड़ा हुआ। जब उसने सिर ऊंचा किया--झुकी है कमर उसकी--तो देखागले में सोने की चेन है। तब तक मोढ़ा लिए चपरासी आता था। उसने कहारुक-रुक! नंबर दो ला। तब तक उस बूढ़े ने कोट उठाकर घड़ी देखी। तब तक चपरासी नंबर दो लाता था। मजिस्ट्रेट ने कहारुक-रुक...।
उस बूढ़े ने कहामैं बूढ़ा आदमी हूंजो आखिरी नंबर होवही बुला लो। क्योंकि अभी और भी बहुत बातें हैं। तुम्हें शायद पता नहीं कि सरकार ने मुझे राय बहादुर की पदवी दी है। और तुम्हें शायद यह भी पता नहीं कि मैं यहां आया ही इसलिए हूं कि कुछ लाख रुपया सरकार को दान करना चाहता हूं। नंबर आखिरी कुर्सी जो होतू बुला ले। बार-बार चपरासी को दिक्कत दे रहे हो। और मैं बूढ़ा आदमी हूं।
तो हमारे पद जो हैंवे जमीन से ऊंचे उठते हैं। ऐसा ऊपर उठते जाते हैं सिंहासन। तो उसी सिंहासन के आखिरी छोर पर कहीं आकाश में परमपद हमारे खयाल में हैकि परमपद जो हैवह कहीं समव्हेअर अपऊपर है।
जिस परमपद की कृष्ण बात कर रहे हैंवह समव्हेअर इन-- ऊपर की बात नहीं है वहवह कहीं भीतर--उस जगह,जिसके और भीतर नहीं जाया जा सकताउस जगहजो आंतरिकता का अंत है। जो इनरमोस्ट कोरवह जो भीतरी से भीतरी जगह हैवह जो भीतरी से भीतरी मंदिर है चेतना कावहीं परमपद है। सांख्य को उपलब्ध व्यक्ति उस परम मंदिर में प्रविष्ट हो जाते हैं।
शेष फिर कल।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें