शनिवार, 20 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-007

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।। १६।।
और हे अर्जुनअसत (वस्तु) का तो अस्तित्व नहीं है और सत का अभाव नहीं है। इस प्रकारइन दोनों को हम तत्व-ज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है।

क्या है सत्यक्या है असत्यउसके भेद को पहचान लेना ही ज्ञान हैप्रज्ञा है। किसे कहें है और किसे कहें नहीं हैइन दोनों की भेद-रेखा को खींच लेना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। क्या है स्वप्न और क्या है यथार्थइसके अंतर को समझ लेना ही मुक्ति का मार्ग है। कृष्ण ने इस वचन में कहा हैजो हैऔर सदा हैऔर जिसके न होने का कोई उपाय नहीं है,जिसके न होने की कोई संभावना ही नहीं हैवही सत हैवही रियल है। जो हैलेकिन कभी नहीं था और कभी फिर नहीं हो सकता हैजिसके न हो जाने की संभावना हैवही असत हैवही अनरियल है।

यहां बहुत समझ लेने जैसी बात है। साधारणतः असतअनरियल हम उसे कहते हैंजो नहीं है। लेकिन जो नहीं हैउसे तो असत कहने का भी कोई अर्थ नहीं है। जो नहीं हैउसे तो कुछ भी कहने का कोई अर्थ नहीं है। जो नहीं है,उसे इतना भी कहना कि वह नहीं हैगलत हैक्योंकि हम है शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। जब हम कहते हैं नहीं है,तब भी हम है शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। जो नहीं हैउसके लिए नहीं हैकहना भी गलत है। जो नहीं हैवह नहीं ही हैउसकी कोई बात ही अर्थहीन है।
इसलिए असत का अर्थ नान-एक्झिस्टेंट नहीं होता है। असत का अर्थ होता हैजो नहीं हैफिर भी हैजो नहीं हैफिर भी होने का भ्रम देता हैजो नहीं हैफिर भी प्रतीत होता है कि है। रात स्वप्न देखा हैयह नहीं कह सकते कि वह नहीं है। नहीं थातो देखा कैसेनहीं थातो स्वप्न भी हो सकेयह संभव नहीं है। देखा हैजीया हैगुजरे हैं,लेकिन सुबह उठकर कहते हैं कि स्वप्न था।
यह सुबह उठकर जिसे स्वप्न कहते हैंउसे बिलकुल नहींनान-एक्झिस्टेंट नहीं कहा जा सकता। था तो जरूर। देखा हैगुजरे हैं। और ऐसा भी नहीं था कि जिसका परिणाम न हुआ हो। जब रात स्वप्न में भयभीत हुए हैंतो कंप गए हैं। असली शरीर कंप गया हैप्राण कंप गए हैंरोएं खड़े हो गए हैं। नींद भी टूट गई है स्वप्न सेतो भी छाती धड़कती रही है। जागकर देख लिया है कि स्वप्न थालेकिन छाती धड़की जा रही हैहाथ-पैर कंपे जा रहे हैं।
यदि वह स्वप्न बिलकुल ही नहीं होतातो उसका कोई भी परिणाम नहीं हो सकता था। थालेकिन उस अर्थ में नहीं थाजिस अर्थ में जागकर जो दिखाई पड़ता हैवह है। उसे किस कोटि में रखें--न होने कीहोने कीउसे किस जगह रखेंथा जरूर और फिर भी नहीं है!
असत की जो कोटि हैअसत की जो केटेगरी हैअनरियल की जो कोटि हैवह अनस्तित्व की कोटि नहीं है। अनरियलअसत की कोटि अस्तित्व और अनस्तित्व के बीच की कोटि है। ऐसा सतजो सत मालूम पड़ता हैलेकिन नहीं है।
लेकिन हम यह कैसे जानेंगेक्योंकि स्वप्न में तो पता नहीं पड़ता कि जो हम देख रहे हैंवह नहीं है। स्वप्न में तो मालूम होता हैजो देख रहे हैंवह बिलकुल है। और ऐसा नहीं है कि पहली दफे स्वप्न देखने में ऐसा मालूम पड़ता हो। जीवनभर स्वप्न देखकर भी और रोज सुबह जागकर भीजानकर कि नहीं थाआज रात फिर जब स्वप्न आएगातब स्वप्न में पूरी तरह लगेगा कि है। लगता है पूरी तरह कि हैभासता है पूरी तरह कि हैफिर भी सुबह जागकर पाते हैं कि नहीं है।
यह जो एपिअरेंस हैभासना हैयह जो दिखाई पड़ना हैयह जो होने जैसा धोखा हैइसका नाम असत है। संसार को जब असत कहा हैतो उसका यह अर्थ नहीं है कि संसार नहीं है। उसका इतना ही अर्थ है कि चेतना की ऐसी अवस्था भी हैजब हम जागने से भी जागते हैं। अभी हम स्वप्न से जागकर देखते हैंतो पाते हैंस्वप्न नहीं है। लेकिन जब हम जागने से भी जागकर देखते हैंतो पाते हैं कि जिसे जागने में जाना थावह भी नहीं है। जागने से भी जाग जाने का नाम समाधि है। जिसे अभी हम जागना कह रहे हैंजब इससे भी जागते हैंतब पता चलता है कि जो देखा थावह भी नहीं है।
कृष्ण कह रहे हैंजिसके आगे-पीछे न होना हो और बीच में होना होवह असत है। जो एक समय था कि नहीं था और एक समय आता है कि नहीं हो जाता हैउसके बीच की जो घटना हैबीच की जो हैपनिंग हैदो न होने के बीच जो होना हैउसका नाम असत हैउसका नाम अनरियल है।
लेकिन जिसका न होना है ही नहींजिसके पीछे भी होना हैबीच में भी होना हैआगे भी होना हैजो तीनों तलों पर है हीसोएं तो भी हैजागें तो भी हैजागकर भी जागें तो भी हैनिद्रा में भी हैजागरण में भी हैसमाधि में भी हैजो चेतना की हर स्थिति में ही हैउसका नाम सत है। और ऐसा जो सत हैवह सदा हैसनातन है,अनादि हैअनंत है।
जो ऐसे सत को पहचान लेते हैंवे बीच में आने वाले असत के भंवर कोअसत की लहरों को देखकर न सुखी होते हैंन दुखी होते हैं। क्योंकि वे जानते हैंजो क्षणभर पहले नहीं थावह क्षणभर बाद नहीं हो जाएगा। दोनों ओर न होने की खाई हैबीच में होने का शिखर है। तो स्वप्न है। तो असत है। दोनों ओर होने का ही विस्तार है अंतहीन,तो जो हैवह सत है।
कसौटीकृष्ण कीमती कसौटी हाथ में देते हैंउससे सत की परख हो सकती है। सुख अभी हैअभी क्षणभर पहले नहीं थाऔर अभी क्षणभर बाद फिर नहीं हो जाता है। दुख अभी हैक्षणभर पहले नहीं थाक्षणभर बाद नहीं हो जाता है। जीवन अभी हैकल नहीं थाकल फिर नहीं हो जाता है। जो-जो चीजें बीच में होती हैं और दोनों छोरों पर नहीं होती हैंवे बीच में केवल होने का धोखा ही दे पाती हैं। क्योंकि जो दोनों ओर नहीं हैवह बीच में भी नहीं हो सकता है। सिर्फ भासता हैदिखाई पड़ता हैएपीअर होता है।
जीवन की प्रत्येक चीज को इस कसौटी पर कसा जा सकता है। अर्जुन से कृष्ण यही कह रहे हैं कि तू कसकर देख। जो अतीत में नहीं थाजो भविष्य में नहीं होगाउसके अभी होने के व्यामोह में मत पड़। वह अभी भी वस्तुतः नहीं हैवह अभी भी सिर्फ दिखाई पड़ रहा हैवह सिर्फ होने का धोखा दे रहा है। और तू धोखे से जाग भी न पाएगा कि वह नहीं हो जाएगा। तू उस पर ध्यान देजो पहले भी थाजो अभी भी है और आगे भी होगा। हो सकता हैवह तुझे दिखाई भी न पड़ रहा होलेकिन वही है। तू उसकी ही तलाश करतू उसकी ही खोज कर।
जीवन में सत्य की खोजअसत्य की परख से शुरू होती है। टु नो दि फाल्स एज दि फाल्समिथ्या को जानना मिथ्या की भांतिअसत को पहचान लेना असत की भांतिसत्य की खोज का आधार है। सत्य को खोजने का और कोई आधार भी नहीं है हमारे पास। हम कैसे खोजें कि सत क्या हैसत्य क्या हैहम ऐसे ही शुरू कर सकते हैं कि असत्य क्या है।
कई बार बड़ी उलझन पैदा होती है। क्योंकि कहा जा सकता है कि जब तक हमें सत्य पता न होतब तक हम कैसे जानेंगे कि असत्य क्या है! जब तक हमें सत्य पता न होतब तक हम कैसे जानेंगे कि असत्य क्या हैसत्य पता होतो ही असत्य को जान सकेंगे। और सत्य हमें पता नहीं है।
लेकिन इससे उलटी बात भी कही जा सकती है। और सोफिस्ट उलटी दलील भी देते रहे हैं। वे कहते हैं कि जब तक हमें यही पता नहीं है कि असत्य क्या हैतो हम कैसे समझ लेंगे कि सत्य क्या है! यह चक्रीय तर्क वैसा ही है,जैसे अंडे और मुर्गी का है। कौन पहले हैअंडा पहले है या मुर्गी पहले हैकहें कि मुर्गी पहले है तो मुश्किल में पड़ जाते हैंक्योंकि मुर्गी बिना अंडे के नहीं हो सकेगी। कहें कि अंडा पहले है तो उतनी ही कठिनाई खड़ी हो जाती है,क्योंकि अंडा बिना मुर्गी के रखे रखा नहीं जा सकेगा। लेकिन कहीं से प्रारंभ करना पड़ेगाअन्यथा उस दुष्चक्र मेंउस विशियस सर्किल में कहीं कोई प्रारंभ नहीं है।
अगर ठीक से पहचानेंतो मुर्गी और अंडे दो नहीं हैं। इसीलिए दुष्चक्र पैदा होता है। अंडाहो रही मुर्गी हैमुर्गी,बन रहा अंडा है। वे दो नहीं हैंवे एक ही प्रोसेसएक ही हिस्से केएक ही लहर के दो भाग हैं। और इसीलिए दुष्चक्र पैदा होता है कि कौन पहले! उनमें कोई भी पहले नहीं है। एक ही साथ हैंसाइमलटेनियस हैंयुगपत हैं। अंडा मुर्गी है,मुर्गी अंडा है।
यह सत और असत का भी करीब-करीब सवाल ऐसा है। वह जिसको हम असत कहते हैंउसका आधार भी सत है। क्योंकि वह असत भी सत होकर ही भासता हैवह भी दिखाई पड़ता है। एक रस्सी पड़ी है और अंधेरे में सांप दिखाई पड़ती है। सांप का दिखाई पड़ना बिलकुल ही असत है। पास जाते हैं और पाते हैं कि सांप नहीं हैलेकिन पाते हैं कि रस्सी है। वह रस्सी सांप जैसी भास सकीपर रस्सी थी भीतर। रस्सी का होना सत है। वह सांप एक क्षण को दिखाई पड़ाफिर नहीं दिखाई पड़ावह असत था। पर वह भीउसके आधार में भी सत थासब्सटैंस मेंकहीं गहरे में सत था। उस सत के ही आभास सेउस सत के ही प्रतिफलन से वह असत भी भास सका है।
लहर के पीछे भी सागर हैमर्त्य के पीछे भी अमृत हैशरीर के पीछे भी आत्मा हैपदार्थ के पीछे भी परमात्मा है। अगर पदार्थ भी भासता हैतो परमात्मा के ही प्रतिफलन सेरिफ्लेक्शन से भासता हैअन्यथा भास नहीं सकता।
आप एक नदी के किनारे खड़े हैं और नीचे आपका प्रतिबिंब बनता है। निश्चित ही वह प्रतिबिंब आप नहीं हैं;लेकिन वह प्रतिबिंब आपके बिना भी नहीं है। निश्चित ही वह प्रतिबिंब सत नहीं हैपानी पर बनी केवल छवि है। लेकिन फिर भी वह प्रतिबिंब जहां से आ रहा हैवहां सत है।
असतसत की ही झलक है क्षणभर को मिली। क्षणभर को सत ने जो आकृति लीअगर हमने उस आकृति को जोर से पकड़ लियातो हम असत को पकड़ लेते हैं। और अगर हमने उस आकृति में से उसको पहचान लिया जो निराकारनिर्गुणउस क्षणभर आकृति में झलका थातो हम सत को पकड़ लेते हैं।
लेकिन जहां हम खड़े हैंवहां आकृतियों का जगत है। जहां हम खड़े हैंवहां प्रतिफलन ही दिखाई पड़ते हैं। हमारी आंखें इस तरह झुकी हैं कि नदी के तट पर कौन खड़ा हैवह दिखाई नहीं पड़तानदी के जल में जो प्रतिबिंब बन रहा हैवही दिखाई पड़ता है। हमें उससे ही शुरू करना पड़ेगाहमें असत से ही शुरू करना पड़ेगा। हम स्वप्न में हैंतो स्वप्न से ही शुरू करना पड़ेगा। अगर हम स्वप्न को ठीक से पहचानते जाएंतो स्वप्न तिरोहित होता चला जाएगा।
यह बड़े मजे की बात हैकभी प्रयोग करने जैसा अदभुत है। रोज रात को सोते समय स्मरण रखकर सोएं,सोते-सोते एक ही स्मरण रखे रहें कि जब स्वप्न आए तब मुझे होश बना रहे कि यह स्वप्न है। बहुत कठिन पड़ेगा,लेकिन संभव हो जाता है। नींद लगती जाएलगती जाएऔर आप स्मरण करते जाएंकरते जाएं कि जैसे ही स्वप्न आएमैं जान पाऊं कि यह स्वप्न है। थोड़े ही दिन में यह संभव हो जाता हैनींद में भी यह स्मृति प्रवेश कर जाती है। अचेतन में उतर जाती है। और जैसे ही स्वप्न आता हैवैसे ही पता चलता हैयह स्वप्न है।
लेकिन एक बहुत मजे की घटना है। जैसे ही पता चलता हैयह स्वप्न हैस्वप्न तत्काल टूट जाता है--तत्काल,इधर पता चला कि यह स्वप्न है कि उधर स्वप्न टूटा और बिखरा। स्वप्न को स्वप्न की भांति पहचान लेनाउसकी हत्या कर देनी है। वह तभी तक जी सकता हैजब तक सत्य प्रतीत हो। उसके जीने का आधार उसके सत्य होने की प्रतीति में है।
इस प्रयोग को जरूर करना ही चाहिए।
इस प्रयोग के बाद कृष्ण का यह सूत्र बहुत साफ समझ में आ जाएगा कि वे इतना जोर देकर क्यों कह रहे हैं कि अर्जुनअसत और सत के बीच की भेद-रेखा को जो पहचान लेता हैवह ज्ञान को उपलब्ध हो जाता है। स्वप्न से ही शुरू करें रात केफिर बाद में दिन के स्वप्न को भी जागकर देखें और वहां भी स्मरण रखें कि जो है--दो नहीं के बीच में--वह स्वप्न है। और तब अचानक आप पाएंगे कि आपके भीतर कोई रूपांतरित होता चला जा रहा है। और जहां कल मन पकड़ लेने का होता थाआज वहां मुट्ठी नहीं बंधती। कल जहां मन रोक लेने का होता था किसी स्थिति को,आज वहां हंसकर गुजर जाने का मन होता है। क्योंकि जो दोनों तरफ नहीं हैउसे पकड़नाहवा को मुट्ठी में बांधने जैसा है। जितने जोर से पकड़ोउतने ही बाहर हाथ के हो जाती है। मत पकड़ो तो बनी रहती हैपकड़ो तो खो जाती है।
जैसे ही यह दिखाई पड़ गया कि दो नहीं के बीच में जो हैहै मालूम पड़ता हैवह स्वप्न हैवैसे ही आपकी जिंदगी से असत की पकड़ गिरनी शुरू हो जाएगीस्वप्न बिखरना शुरू हो जाएगा। तब जो शेष रह जाता हैदि रिमेनिंगवह सत्य है। जिसको आप पूरी तरह जागकर भी नहीं मिटा पातेजिसको आप पूरी तरह स्मरण करके भी नहीं मिटा पातेजो आपके बावजूद शेष रह जाता हैवही सत्य है। वह शाश्वत हैउसका कोई आदि नहीं हैकोई अंत नहीं है। कहना चाहिएवह टाइमलेस है।
यह भी थोड़ा समझ लेने जैसा है।
असत हमेशा टाइम में होगासमय में होगा। क्योंकि जो कल नहीं थाआज हैऔर कल नहीं हो जाएगा,उसके समय के तीन विभाजन हुए--अतीतवर्तमान और भविष्य। लेकिन जो कल भी थाआज भी हैकल भी होगा,उसके तीन विभाजन नहीं हो सकते। उसका कौन-सा अतीत हैउसका कौन-सा वर्तमान हैउसका कौन-सा भविष्य है?वह सिर्फ है। इसलिए सत्य के साथ टाइम सेंस नहीं हैसमय की कोई धारणा नहीं है। सत कालातीत हैसमय के बाहर है। असत समय के भीतर है।
जैसे मैंने कहाआप नदी के तट पर खड़े हैं और आपका प्रतिफलनरिफ्लेक्शन नदी में बन रहा है। आप नदी के बाहर हो सकते हैंलेकिन रिफ्लेक्शन सदा नदी के भीतर ही बन सकता है। पानी का माध्यम जरूरी है। कोई भी माध्यम जो दर्पण का काम कर सकेकोई भी माध्यम जो प्रतिफलन कर सकेवह जरूरी है। आपके होने के लिए,कोई प्रतिफलन करने वाले माध्यम की जरूरत नहीं है। लेकिन आपका चित्र बन सकेउसके लिए प्रतिफलन के माध्यम की जरूरत है।
टाइमसमय प्रतिफलन का माध्यम है। किनारे पर सत खड़ा होता हैसमय में असत पैदा होता है। समय की धारा मेंसमय के दर्पण परटाइम मिरर पर जो प्रतिफलन बनता हैवह असत है। और समय में कोई भी चीज थिर नहीं हो सकती। जैसे पानी में कोई भी चीज थिर नहीं हो सकतीक्योंकि पानी अथिर है। इसलिए कितना ही थिर प्रतिबिंब होफिर भी कंपता रहेगा। पानी कंपन है।
ये जो कंपते हुए प्रतिबिंब हैं समय के दर्पण पर बने हुएकल थेअभी हैंकल नहीं होंगे। कल भी बड़ी बात है;बीते क्षण में थेनहीं थेअगले क्षण में नहीं हो जाएंगे। ऐसा जो क्षण-क्षण बदल रहा हैजो क्षणिक हैवह असत है। जो क्षण के पार हैजो सदा हैवही सत है। इसकी भेद-रेखा को जो पहचान लेताकृष्ण कहते हैंवह ज्ञान को उपलब्ध हो जाता है।


अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति।। १७।।
इस न्याय के अनुसार नाशरहित तो उसको जानो कि जिससे यह संपूर्ण जगत व्याप्त हैक्योंकि इस अविनाशी का विनाश करने को कोई भी समर्थ नहीं है।


जिसने इस सारे जगत को व्याप्त किया हैवह सूक्ष्मतम अविनाशी है। लेकिन जिससे यह सारा जगत व्याप्त हुआ हैवह वस्तु स्थूल है और विनाशवान है। इसे ऐसा समझेंएक कमरा हैखाली हैकुछ भी सामान नहीं है। वह जो कमरे का खालीपन हैवह पूरा का पूरा व्याप्त किए है कमरे को। उचित तो यही होगा कि जब कमरा नहीं थातब भी वह खालीपन था। पीछे हमने दीवारें उठाकर उस खालीपन को चारों तरफ से बंद किया है। कमरा नहीं थातब भी वह खालीपन था। कमरा नहीं होगातब भी वह खालीपन होगा। कमरा हैतब भी वह खालीपन है। कमरा बना है,मिटेगाकभी नहीं थाकभी नहीं हो जाएगापर वह जो खालीपन हैवह जो स्पेस हैवह जो अवकाश हैवह जो आकाश है--वह थाहैरहेगा।
उसके लिए थाहैइस तरह के शब्द उचित नहीं हैं। क्योंकि जो कभी भी नहीं नहीं हुआउसके लिए है कहना ठीक नहीं है। है सिर्फ उसी चीज के लिए कहना ठीक हैजो नहीं है भी हो सकती है। वृक्ष हैकहना ठीक हैआदमी हैकहना ठीक हैपरमात्मा हैकहना ठीक नहीं है। परमात्मा के साथ यह कहना कि परमात्मा हैपुनरुक्ति है,रिपिटीशन है। परमात्मा का अर्थ ही है कि जो है। उसको दोहराने की कोई जरूरत नहीं है कि परमात्मा है। इसका मतलब यह हुआ कि जो हैवह है। कोई और मतलब नहीं हुआ। जो नहीं नहीं हो सकताउसके लिए है कहना बिलकुल बेमानी है।
इसीलिए बुद्ध जैसे परम आस्तिक नेपरमात्मा हैऐसा शब्द कभी प्रयोग नहीं किया। नासमझ समझे कि नास्तिक है यह आदमी। लेकिन बुद्ध को लगा कि यह तो बड़ी ही भूल भरी बात कहनी है कि परमात्मा है। क्योंकि है सिर्फ उसी के लिए कहना चाहिएजो नहीं है भी हो जाता है। आदमी हैठीक है बात। उस पर है हम लगा सकते हैं। है उस पर आई हुई घटना हैकल खो जाएगी। लेकिन परमात्मा हैयह कहना ठीक नहीं है। गॉड इज़कहना ठीक नहीं है। क्योंकि गॉड का तो मतलब ही इज़नेस है। जो है हीउसके लिए है कहनाबड़ा कमजोर शब्द उपयोग करना हैगलत शब्द उपयोग करना हैपुनरुक्ति है।
खाली जगह है ही। कमरा नहीं थातब भी थी। फिर कमरे में हम फर्नीचर ले आएफिर कमरे में हमने तस्वीरें लगा दींफिर कमरे में हम आकर बैठ गए। कमरा पूरा सज गयाभर गया। अब इस कमरे में दो चीजें हैं। एक तो वह खालीपनजो सदा से थाऔर एक यह भरापनजो सदा से नहीं था। लेकिन बड़े मजे की बात है कि कमरे का खालीपन हमें कभी दिखाई नहीं पड़ताकमरे का भरापन दिखाई पड़ता है। कमरे में वही दिखाई पड़ता हैजो भरा हुआ है। वह नहीं दिखाई पड़ताजो खाली है। किसी भी कमरे में आप प्रवेश करेंगेतो वही दिखाई पड़ता हैजो वहां है। वह नहीं दिखाई पड़ताजो वहां सदा था। वह नहीं दिखाई पड़ता। वह अदृश्य भी है। अगर खालीपन का भी पता चलता है,तो कहना चाहिए कि भरेपन के रिफरेंस में पता चलता है।
यह कुर्सी रखी हैतो इसके आस-पास खाली जगह मालूम पड़ती है। इस कुर्सी के आस-पास खाली जगह मालूम पड़ती है। खाली जगह के बीच में यह कुर्सी मालूम नहीं पड़ती। असलियत यही है कि खालीपन के बीच में यह कुर्सी रखी है। कुर्सी हटाई जा सकती हैखालीपन हटाया नहीं जा सकताभरा जा सकता हैहटाया नहीं जा सकता।
आप एक कमरे से कुर्सी बाहर निकाल ले सकते हैंक्योंकि कुर्सी कमरे के अस्तित्व का हिस्सा नहीं है। लेकिन कमरे से खालीपन नहीं निकाल सकते। ज्यादा से ज्यादा कमरे में सामान भरकर खालीपन को दबा सकते हैं। अगर कमरे में से सब चीजें निकाल ली जाएंतो आप कहेंगेयहां तो कुछ भी नहीं है। और अगर कमरे से सब चीजें निकाल ली गई होंतो आपको सिर्फ कमरे की दीवारें दिखाई पड़ेंगी। अगर दीवारें भी निकाल ली जाएंतो आप कहेंगेयहां कमरा ही नहीं है।
लेकिन दीवारें कमरा नहीं हैं। दीवारों के बीच में जो खाली जगह हैवही कमरा है। अंग्रेजी का शब्द रूम बहुत अच्छा है। रूम का मतलब होता हैखाली जगह। रूम का मतलब ही होता हैखाली जगह। पर वह खाली जगह दिखाई भी नहीं पड़तीखयाल में भी नहीं आतीक्योंकि खाली जगह का हमें स्मरण ही नहीं है। असल में खाली जगह इतनी सदा से है कि उसे हमें देखने की जरूरत ही नहीं पड़ी है।
ठीक ऐसे हीयह जो विराट आकाश हैयह जो स्पेस है अनंतयह जो खाली जगह हैयह जो एंपटीनेस है फैली हुई अनंत तकजिसका कोई ओर-छोर नहीं हैजो कहीं शुरू नहीं होती और कहीं समाप्त नहीं होती।
आप ध्यान रखेंखाली चीज कभी भी शुरू और समाप्त नहीं हो सकतीसिर्फ भरी चीज शुरू और समाप्त हो सकती है। खालीपन की कोई बिगनिंग और कोई एंड नहीं हो सकता। कमरे के खालीपन की कौन-सी शुरुआत है और कौन-सा अंत हैहांदीवार का होता हैसामान का होता हैकमरे का नहीं होता। स्पेस की कोई सीमाएं नहीं हैं,आकाश का अर्थ ही है कि जिसकी कोई सीमा नहीं है। यह जो असीम फैला हुआ हैयह सत है। और इस असीम के बीच में बहुत कुछ उठता हैबनता हैनिर्मित होता हैबिखरता हैवह असत है।
वृक्ष बनेखालीपन थोड़ी देर के लिए हरा हुआ। फूल खिलेखालीपन थोड़ी देर के लिए सुगंध से भरा। फिर फूल गिर गएफिर वृक्ष गिर गयाखालीपन फिर अपनी जगह है। और जब वृक्ष उठा था और फूल खिले थेतब भी खालीपन में कोई अंतर नहीं पड़ा थावह वैसा ही था।
चीजें बनती हैं और मिटती हैं। जो बनता है और मिटता हैवह स्थूल हैवह दिखाई पड़ता है। जो नहीं बनता,नहीं मिटतावह सूक्ष्म हैवह अदृश्य है। सूक्ष्म कहना भी ठीक नहीं है। लेकिन मजबूरी में कृष्ण ने सूक्ष्म का प्रयोग किया है। उचित नहीं हैलेकिन मजबूरी है। कोई और उपाय नहीं है। असल में जब हम कहते हैं सूक्ष्मतो हमारा मतलब यह होता हैस्थूल का ही कोई हिस्सा। जब हम कहते हैं छोटातो मतलब होता है कि बड़े का ही कोई हिस्सा। जब हम कहते हैं बहुत सूक्ष्मतो हमारा मतलब होता है कि बहुत कम स्थूल। बाकी मनुष्य की भाषा में सूक्ष्म भी स्थूल से ही जुड़ा है। हम कितना ही कहें सूक्ष्मातिसूक्ष्मतो भी स्थूल से ही जुड़ा है। आदमी की भाषा द्वंद्व से बनी है। उसमें पेयर्स हैंउसमें दो-दो चीजों के जोड़े हैं।
लेकिन कृष्ण जिसे सूक्ष्म कह रहे हैंवह स्थूल का कोई हिस्सा नहीं है। कृष्ण सूक्ष्म कह रहे हैं उसेजो स्थूल नहीं है। मजबूरी है। लेकिन उसके लिए हमारे पास कोई शब्द नहीं है। इसलिए निकटतम गलत शब्द जो हो सकता है,वह सूक्ष्म है। यानी कम से कम गलत शब्द जो हो सकता हैवह सूक्ष्म है। उसके लिए कोई शब्द नहीं है। कुछ भी हम कहें।
हमने जितने शब्द बनाए हैंवे बड़े मजेदार हैं। हम उलटे से उलटा शब्द भी प्रयोग करेंतो भी कोई अंतर नहीं पड़ता। वह उलटे से उलटा भी हमारे पुराने शब्द से ही जुड़ा होता है। अगर हम कहें कि वह असीम हैतो भी हमें सीमा से ही वह शब्द बनाना पड़ता है।
अब यह बड़े मजे की बात है कि सीमा में असीम का कोई भाव नहीं होता। लेकिन असीम में सीमा का भाव होता है। हम कितनी ही कल्पना करें असीम कीहम ज्यादा से ज्यादा बहुत बड़ी सीमा की कल्पना करते हैं। हम कितना ही सोचेंतो हमारा मतलब यही होता है कि सीमा और आगे हटा दोऔर आगे हटा दोऔर आगे हटा दो। लेकिन सीमा होगी ही नहींयह हमारा विचार नहीं सोच पाता। वह इनकंसिवेबल है। उसकी कोई चिंतना नहीं हो सकती असीम की।
जब हम कहते हैंकमरे में खालीपन हैतो उसका मतलब हमारे मन में यह होता है कि कमरे में खालीपन भरा है। तो हम एंपटीनेस को भी वस्तु की तरह उपयोग करते हैंखालीपन भरा है। जैसे खालीपन कोई चीज है। जब कि खालीपन का मतलब न भरा होना हैजहां कुछ भी नहीं है। लेकिन अगर हम कुछ भी नहीं का भी प्रयोग करेंतो हम कुछ भी नहीं का भी वस्तु की तरह प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी में शब्द है नथिंगवह बना है नो-थिंग से। नथिंग भी कहना हो--नहीं कुछ--तो भी थिंगवस्तु उसमें लानी पड़ती है। बिना वस्तु के हम सोच ही नहीं सकतेबिना स्थूल के हम सोच ही नहीं सकते।
इसलिए कृष्ण के इस सूक्ष्म शब्द को आदमी की मजबूरी समझें। इसका मतलब स्थूल का कोई अंश नहीं है,कोई बहुत सूक्ष्म स्थूल नहीं है। सूक्ष्म का अर्थ हैजो स्थूल नहीं ही है। और स्थूल क्या हैजो दिखाई पड़ता हैवह स्थूल है। जो स्पर्श में आता हैवह स्थूल है। जो सुनाई पड़ता हैवह स्थूल है। असल में जो इंद्रियों की पकड़ में आता हैवह स्थूल है।
ऐसा भी नहीं है कि आप कल बड़ी दूरबीन बना लेंखुर्दबीन बना लें और उसकी पकड़ में आ जाए तो वह सूक्ष्म हो जाएगा। नहींजो भी पकड़ में आ जाएवह स्थूल है। क्योंकि दूरबीन कुछ नहीं करतीसिर्फ आपकी आंख की इंद्रिय की शक्ति को बड़ा करती है। आपकी आंख ही जैसे और बड़ी आंख हो जाती है। बड़े से बड़े यंत्र भी हम विकसित कर लेंतब भी जो पकड़ में आएगावह स्थूल ही होगा। क्योंकि सब यंत्र हमारी इंद्रियों के एक्सटेंशन हैंवे हमारी इंद्रियों के लिए और जोड़े गए हिस्से हैं।
एक आदमी आंख से चश्मा लगाकर देख रहा है। तो जो उसे आंख से नहीं दिखाई पड़ता थावह अब दिखाई पड़ रहा है। लेकिन वह कोई सूक्ष्म चीज नहीं देख रहा है। वैज्ञानिक बड़ी दूर की चीजें देख रहे हैंबड़े दूर कालेकिन वह भी स्थूल है। जो भी दिखाई पड़ेगाजो भी सुनाई पड़ेगाजो भी स्पर्श में आ जाएगाइंद्रियों की सीमा के भीतर जो भी आ जाएगावह स्थूल है। सूक्ष्म का मतलब हैजो मनुष्य की इंद्रियों की सीमा में नहीं आता हैनहीं आ सकता हैनहीं लाया जा सकता है। असल में विचार भी जिसे नहीं पकड़ सकतावही सूक्ष्म है।
अब वैज्ञानिक कहते हैं...कल तक वह परमाणु सूक्ष्मतम था। अब परमाणु भी टूट गयाअब इलेक्ट्रान है,न्यूट्रान हैप्रोटान है। अब वैज्ञानिक कहते हैं कि वे सर्वाधिक सूक्ष्म हैं। क्योंकि अब वे दिखाई पड़ने के बाहर ही हो गए। अब अनुमान का ही मामला है। लेकिन जो अनुमान में भी आता हैवह भी सूक्ष्म नहीं है। क्योंकि अनुमान भी मनुष्य के विचार का हिस्सा है।
इसलिए वैज्ञानिक जिसे इलेक्ट्रान कह रहे हैंवह भी कृष्ण का सूक्ष्म नहीं है। इलेक्ट्रान के भी पारठीक होगा कहनाआलवेज दि बियांडजहां तक आप पहुंच जाएंगेउसके जो पार। वहां भी पहुंच जाएंगेतो उसके जो पारदि ट्रांसेंडेंटलवह जो सदा अतिक्रमण कर जाता हैवही सूक्ष्म है। पार होना ही जिसका गुण है। आप जहां तक पकड़ पाते हैंजो उसके पार सदा शेष रह जाता हैसदा ही शेष रह जाता है और रह जाएगा।
ठीक से समझ लेना उचित होगा। हमारे पास दो शब्द हैं-- अज्ञातअननोनअज्ञेयअननोएबल। साधारणतः जब हम सूक्ष्म को समझने जाते हैंतो ऐसा लगता हैजो अज्ञात हैअननोन है। नहींकृष्ण उसे सूक्ष्म नहीं कह रहे हैं। क्योंकि जो अननोन हैवह नोन बन सकता हैजो अज्ञात हैवह कल ज्ञात हो जाएगा। वह सूक्ष्म नहीं है। जिसके ज्ञात होने की अनंत में भी कभी संभावना हैवह सूक्ष्म नहीं है।
स्थूल ही ज्ञात हो सकता है। आज न होकल हो जाए। कल न होकभी हो जाए। लेकिन जो भी ज्ञात हो सकता हैवह स्थूल है। जो ज्ञात हो ही नहीं सकताजो सदा ही ज्ञान के बाहर छूट जाता हैजो सदा ही जानने की पकड़ के बाहर रह जाता हैअननोएबलअज्ञेय है। नहींजाना ही नहीं जा सकता जोवही सूक्ष्म है। इसलिए सूक्ष्म का मतलब ऐसा नहीं है कि हमारे पास अच्छे उपकरण होंगे तो हम उसे जान लेंगे।
लोग पूछते हैं कि क्या विज्ञान कभी परमात्मा को जान पाएगाजिसे भी विज्ञान जान लेगावह परमात्मा नहीं होगा। क्योंकि परमात्मा से अर्थ ही है कि जो जानने की पकड़ में नहीं आता। किसी दिन विज्ञान की प्रयोगशाला अगर परमात्मा को पकड़ लेगीतो वह पदार्थ हो जाएगा। असल में जहां तक परमात्मा पकड़ में आता हैउसी का नाम पदार्थ है। और जहां परमात्मा पकड़ में नहीं आतावहीं परमात्मा है।
सूक्ष्म का कृष्ण का अर्थ ठीक से खयाल में ले लेना जरूरी है। क्योंकि जो सूक्ष्म हैवही सत है। जो पकड़ में आता हैवह असत होगा। वह आज होगाकल नहीं होगा। जो पकड़ में नहीं आतावही सत है।
एक कमरे में हम जाएंवहां फूल रखा है। फूल सुबह ठीक हैसांझ मुरझा जाएगा। उसी फूल के नीचे शंकर जी की पिंडी रखी हैपत्थर रखा है। वह सुबह भी थासांझ भी होगा। लेकिन सौ वर्षदो सौ वर्षतीन सौ वर्षहजार वर्ष--बिखर जाएगा। फूल एक दिन में बिखर गया। पत्थर थाहजारों वर्ष में बिखरा। इससे अंतर नहीं पड़ता। कमरे में सिर्फ एक चीज है जो नहीं बिखरेगीवह कमरे का कमरापन हैरूमीनेस है। वह जो खालीपन हैवह भर नहीं बिखरेगा। वही सूक्ष्म हैवही सत है। बाकी कमरे में जो भी हैवह सब बिखर जाएगा।
मैंने एक ताओइस्ट चित्रकार की कहानी पढ़ी है। मैंने पढ़ा है कि एक ताओ गुरु ने अपने शिष्यों को कहा कि तुम एक चित्र बना लाओ। उन्होंने पूछा कि कोई थीमकोई विषय दे दें। तो उसने कहातुम एक चित्र बना लाओ कि गाय घास चर रही है। वे चित्र बनाकर ले आए। सभी अच्छे-अच्छे चित्र बनाकर ले आए थे। लेकिन एक साधु जो चित्र बनाकर लाया थाउसमें जरा चौंकने वाली बात थी। क्योंकि वह कोरा कागज ही ले आया था।
गुरु ने पूछा कि क्या बना नहीं पाएउसने कहा कि नहींचित्र बना हैदेखें। फिर गुरु ने उसके कागज की तरफ देखाऔर शिष्यों ने भी कागज की तरफ देखाफिर सबने उसकी तरफ देखा और पूछा कि गाय कहां है! तो उसने कहागाय घास चरकर जा चुकी है। उन्होंने पूछा कि घास कहां हैतो उसने कहा कि घास गाय चर गई। तो उन्होंने पूछाइसमें फिर क्या बचातो उसने कहाजो गाय के पहले भी था और घास के पहले भी थाऔर गाय के बाद भी बचता है और घास के बाद भी बचता हैवही मैं बना लाया हूं। लेकिन वे सब कहने लगेयह कोरा कागज है! पर उसने कहा कि यही बचता है--यह कोरापन।
कृष्ण इस कोरेपन को सूक्ष्म कह रहे हैं। जो सब लहरों के उठ जानेगिर जाने पर बच जाता है। और जो सदा बच जाता हैवही सत है।


प्रश्न: भगवान श्रीनथिंगनेस वर्सेस एवरीथिंगनेस में आप कभी आपके प्रवचन में भागना और जागना जो प्रयोग करते हैंतो मैं उससे भागूं या जागूंइससे उसको क्या मतलब हैइसमें क्या एफर्ट का तत्व नहीं आताऔर टोटल एक्सेप्टिबिलिटी में ईविल का क्या स्थान होता है?


शून्यनथिंगनेस और सब कुछएवरीथिंगनेसएक ही चीज को कहने के दो ढंग हैं दो ओर से--नकार से या विधेय सेनिगेटिव से या पाजिटिव से। जब हम कहते हैं शून्यतो यह हमारा चुनाव है नकार का। जब हम कहते हैं पूर्णतो यह हमारा चुनाव है विधेय का। लेकिन मजे की बात है कि सिर्फ शून्य ही पूर्ण होता है और पूर्ण ही शून्य होता है। सिर्फ शून्य ही पूर्ण होता हैक्योंकि शून्य के अपूर्ण होने का कोई उपाय नहीं है। आप अधूरा शून्य नहीं खींच सकते। आप शून्य के दो हिस्से नहीं कर सकते। आप शून्य में से कितना ही निकाल लेंतो भी शून्य में कुछ कम नहीं होता। आप शून्य में कितना ही जोड़ देंतो शून्य में कुछ बढ़ता नहीं।
शून्य का मतलब ही यह है कि उससे बाहर-भीतर कुछ नहीं निकाला जा सकता। पूर्ण का भी मतलब यही है। पूर्ण का मतलब ही यह है कि जिसमें जोड़ने को कुछ नहीं बचा। क्योंकि पूर्ण के बाहर कुछ नहीं बच सकता। दि टोटल,अब उसके बाहर कुछ बचा नहींजिसको जोड़ें। जिसमें से कुछ निकालें तो कोई जगह नहीं बचीक्योंकि टोटल के बाहर कोई जगह नहीं बच जाएगीजिसमें निकाल लें। शून्य से कुछ निकालेंतो पीछे शून्य ही बचता है। शून्य में कुछ जोड़ेंतो उतना ही शून्य रहता है। पूर्ण से कुछ निकालने का उपाय नहींपूर्ण में कुछ जोड़ने का उपाय नहीं। क्योंकि पूर्ण में अगर कुछ जोड़ा जा सकेतो इसका मतलब है कि वह अपूर्ण था पहलेअब उसमें कुछ जोड़ा जा सकता है।
शून्य और पूर्ण एक ही सत्य के दो नाम हैं। हमारे पास दो रास्ते हैंजहां से हम नाम दे सकते हैं। या तो हम नकार का उपयोग करेंया विधेय का उपयोग करें। सब कुछ और कुछ भी नहींएक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। यह हमारा चुनाव है कि हम कैसे इसे कहें। अगर यह खयाल में आ जाएतो इस जगत में उठे बहुत बड़े विवाद की बुनियादी आधारशिला गिर जाती है।
बुद्ध और शंकर के बीच कोई विवाद नहीं है। सिर्फ नकार और विधेय के शब्दों के प्रयोग का फासला और भिन्नता है। बुद्ध नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करते हैं। वे कहते हैंनहीं हैशून्य हैनिर्वाण है। निर्वाण का मतलब,दीए का बुझ जाना। जैसे दीया बुझ जाता हैबसऐसे ही सब कुछ नहीं हो जाता है।
शंकर कहते हैंसब हैब्रह्म हैमोक्ष हैज्ञान है। सब विधेय शब्दों का प्रयोग करते हैं। और बड़े मजे की बात यह है कि ये दोनों इशारे बिलकुल एक चीज की तरफ हैं। शंकर और बुद्ध से करीब दूसरे आदमी खोजना मुश्किल है। लेकिन शंकर और बुद्ध के करीब ही इस मुल्क का सबसे बड़ा विवाद खड़ा हुआ। हां और न के बीच कितना फासला मालूम पड़ता है! इससे ज्यादा उलटे शब्द नहीं हो सकते। लेकिन पूर्ण हां और पूर्ण न के बीच कोई फासला नहीं है। लेकिन वह हमें अनुभव हो जाए दो में से किसी एक का भीतो ही दिखाई पड़ सकता है।
पूछा है कि मैं कहता हूंभागें मतजागें--समग्र के प्रति जागें। क्योंकि भागने का मतलब ही यह है कि हमने समग्र में कुछ चुनाव कर लिया कि इसे छोड़ेंगेउसे पकड़ेंगेतभी भागा जा सकता है। भागने का मतलब है कि कुछ हम छोड़ेंगे और कुछ हम पकड़ेंगे। अगर पूरे को छोड़ेंतो भागकर कहां जाएंगेअगर पूरे को स्वीकार करेंतो भागकर कहां जाएंगेअगर त्याग पूर्ण होतो भागना नहीं हो सकता। भागेंगे कहांजहां भाग रहे हैंपूर्ण में वह भी त्यागा जा चुका है। मक्का भागेंगेमदीना भागेंगेकाशी भागेंगेहरिद्वार भागेंगेअगर त्याग पूर्ण हैतो भागना असंभव है। अगर भोग भी पूर्ण हैतो भागना असंभव है। भागने की कोई जरूरत नहीं है।
सब अधूरे का खेल हैसब आधे का खेल है। तो जो हाफ-हार्टेडजो आधे हृदय से भोग रहे हैंउनको पकड़ने का उपाय है। जो आधे हृदय से त्याग रहे हैंउनको छोड़ने का उपाय है। लेकिन जो पूरे हृदय से जी रहे हैंउनको न भागने को कुछ हैन त्यागने को कुछ है। उनको तो सिर्फ जानने को ही कुछ है--जागने को ही।
प्रश्न भागने का नहीं हैप्रश्न जागने का है। प्रश्न देखने का हैदर्शन का है। प्रश्न गहरे में झांकने का है। प्रश्न यह नहीं है कि पदार्थ से भाग जाओक्योंकि कहीं भी भागोगे तो पदार्थ है। प्रश्न यह है कि पदार्थ में गहरे झांको,ताकि परमात्मा दिखाई पड़ेतब भागने की कोई जरूरत न रह जाएगी।
आकृतियों से जो भागेगावह जाएगा कहांदूसरी आकृतियों के पास पहुंच जाएगा। स्थानों से भागेगादूसरे स्थानों में पहुंच जाएगा। मकानों से भागेगादूसरे मकानों में पहुंच जाएगा। लोगों से भागेगादूसरे लोगों में पहुंच जाएगा। भागकर जाएंगे कहांजहां भी भागेंगे वहां संसार है। संसार से नहीं भागा जा सकता। हर जगह पहुंचकर पता चलेगासंसार है। फिर वहां से भी भागोफिर वहां से भी भागो--भागते रहो।
अगर हम चांदत्तारों की रोशनी की गति भी पा जाएंतो भी संसार के बाहर न भाग सकेंगे। अभी तक कोई चांदत्तारा नहीं भाग सकाअभी तक कोई रोशनी की किरण नहीं भाग सकी संसार के बाहर। अनंत-अनंत यात्रा है रोशनी की किरणों की। लेकिन होगी संसार के भीतर हीभाग नहीं सकतीं। असल में जहां तक भाग सकते हैंवहां तक तो संसार होगा ही। नहीं तो भागेंगे कैसेरास्ता कहां पाएंगे?
जाग सकते हैं। ज्ञानी जागता हैअज्ञानी भागता है। हांअज्ञानी के भागने के दो ढंग हैं। कभी वह स्त्री की तरफ भागता हैकभी स्त्री की तरफ से भागता है। कभी धन की तरफ भागता हैकभी धन छोड़ने के लिए भागता है। कभी मुंह करके भागता है संसार की तरफकभी पीठ करके भागता है। न मुंह करके कभी संसार को उपलब्ध कर पाता हैन पीठ करके कभी संसार को छोड़ पाता है।
जो न पाया जा सकता है और न छोड़ा जा सकता हैउसका नाम संसार है। सपने न पाए जा सकते हैंन छोड़े जा सकते हैं। असत न पाया जा सकता हैन छोड़ा जा सकता है। असत के प्रति केवल जागा जा सकता हैवन कैन बी ओनली अवेयर। सपने के प्रति सिर्फ जागा जा सकता है। जो आदमी सपना छोड़कर भाग रहा हैवह काफी गहरे सपने में अभी है। क्योंकि जिसको सपना छोड़कर भागना पड़ रहा हैउसे इतना तो पक्का है कि सपना सपना नहीं है। भागने योग्य तो मालूम ही हो रहा है। इतना सच तो दिखाई पड़ता ही है।
कृष्ण को समझेंगे तो दिखाई पड़ेगा। कृष्ण अर्जुन को भागने से ही बचाने की चेष्टा में संलग्न हैं। यह पूरी गीता भागने वालों के खिलाफ है। यह पूरी गीता इस बात के खिलाफ है कि जो भागने वाले हैंवे वही पागलपन को उलटी दिशा में कर रहे हैंजो पकड़ने वाले करते हैं। लेकिन सिर्फ पागलपन उलटा हो जाएशीर्षासन करने लगेतो इससे पागलपन नहीं रह जाताऐसा नहीं है। कोई पागल शीर्षासन करके खड़ा हो जाएतो पागलपन मिट जाता है,ऐसा नहीं है।
भोगी त्यागी हो जाते हैंसंसारी संन्यासी हो जाते हैंउलटे हो जाते हैंतो कोई अंतर नहीं पड़ता। हांदिशा उलटी दिखाई पड़ने लगती हैआदमी वही होता है। ढंग उलटे हो जाते हैंआदमी वही होता है।
कृष्ण गीता में एक बहुत ही अनूठी बात कह रहे हैं। और वे यह कह रहे हैं कि संसारी और संन्यासी विपरीत नहीं हैं। एक-दूसरे से उलटे नहीं हैं। संसार से भागकर कोई संन्यासी नहीं होतासंसार में जागकर कोई संन्यासी होता है। और जागना होतो यहीं जाग जाओ। कहीं भी भागोइससे कोई अंतर नहीं पड़ता। जागने के लिए कोई खास जगह नहीं हैकहीं भी जागा जा सकता है। सपने मिटाने के लिए खास सपने देखने की जरूरत नहीं हैकिसी भी सपने में जागा जा सकता है।
एक आदमी सपना देख रहा है चोर काएक आदमी सपना देख रहा है साधु का। क्या साधु वाले सपने से जागना आसान हैबजाय चोर वाले सपने केदोनों सपने हैं। जागना एक-सा ही है। कोई अंतर नहीं पड़ता। साधु होने के सपने से जागने में भी यही करना पड़ेगा कि जानना पड़ेगायह सपना है। और चोर के सपने से भी जागने के लिए यही करना पड़ेगा कि जानना पड़ेगा कि यह सपना है। सपने को सपने की भांति जानना ही जागना है। और सपने को सत्य की तरह जो मान लेता हैउसके समाने दो विकल्प हैं। या तो सपने में डूबेभोगेया सपने से भागे और त्यागे।
गीताभोग और त्याग दोनों की अतियों को सपने के बीच मानेगी। जागना! और जागने के लिए ही वे कह रहे हैं कि तू पहचान अर्जुनक्या सत हैक्या असत है! यह तू पहचानतो यह पहचानयह रिकग्नीशन ही तेरा जागरण बन जाने वाला है।


प्रश्न: भगवान श्रीआप यह तो कहेंगे न कि जागना भी भागने का शीर्षासन हैइतना तो एफर्ट करना पड़ेगा!


नहींजागना भागने से जरा भी संबंधित नहीं है। जागना भागने से संबंधित ही नहीं है। क्योंकि जागने में भागने का कोई भी तत्व नहीं हैविपरीत तत्व भी नहीं हैदूसरी तरफ भागना भी नहीं है। जागने का मतलब ही है कि जो हैउसे हम देखने को तत्पर होते हैं।
धन हैइसके साथ भागने के दो काम हो सकते हैं। एक काम हो सकता है कि इसे छाती से लगाकर पकड़कर बैठ जाएंइसमें से एक पैसा न भाग जाएइसका ध्यान रखें। दूसरा हो सकता है कि इससे ऐसे भागें कि लौटकर न देखें।
मुझे कोई कह रहा था कि विनोबा के सामने पैसा करोतो दूसरी तरफ मुंह कर लेते हैं। पैसे से इतना डर! तो पैसे में काफी ताकत मालूम पड़ती है। रामकृष्ण के पास अगर कोई पैसा रख देतो ऐसी छलांग लगाकर उचकते हैं कि सांप-बिच्छू आ गया। पैसे में सांप-बिच्छूतो सपना टूटा नहीं। सपने ने दूसरी शकल ली। पहले पैसा स्वर्ग मालूम पड़ता थाअब नर्क मालूम पड़ने लगा। लेकिन पैसा कुछ है--यह जारी है।
पैसा कुछ भी नहीं है। है तो लहर है--न भागने योग्यन पकड़ने योग्य। जागना बहुत और बात है। उसमें पैसे से आंख बंद करने की जरूरत नहीं हैपैसे को छाती से पकड़ लेने की जरूरत नहीं है। पैसा वहां हैआप यहां हैं। पैसे ने कभी आपको नहीं पकड़ान पैसा कभी आपसे भागा। आपकी पैसे ने इतनी फिक्र नहीं कीजितनी फिक्र आप पैसे की कर रहे हैं। पैसा कहीं ज्यादा ज्ञानी मालूम पड़ता है। आप चले जाओ तो रोता नहीं हैआप आ जाओ तो प्रसन्न नहीं होता। कहता नहींकि आइएस्वागत हैबड़ा अच्छा हुआ।
जागने का अर्थ यह हैजहां हैं--कहीं न कहीं हैंकिसी न किसी सपने में हैंकोई आश्रम के सपने में होगा,कोई दूकान के सपने में होगा--जहां हैंकिसी न किसी सपने में हैंवहां जागें। इस सपने को पहचानें कि यह सत्य है?इस बात की जिज्ञासाइस बात की खोज कि जो मैं देख रहा हूंवह क्या है?
नहींमैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप कहने लगेंयह सपना है। अगर आपको कहना पड़े कि यह सपना हैतो जागना नहीं होगातब एफर्ट होगा। अगर आपको कोशिश करनी पड़े कि यह सब सपना हैआपको अगर कोशिश करके अपने को समझाना पड़े कि यह सब सपना हैतब तो समझ लेना कि अभी आपको सपने का पता नहीं चला। सपने का पता अगर चल जाएतो यह कहने की कोई जरूरत नहीं रह जाती कि सब सपना है। सब सपना हैयह तो वही आदमी दोहराता है अपने मन मेंजिसे अभी सपने का कोई भी पता नहीं है।
एक सूफी फकीर को मेरे पास लाए थे। वह मित्र जो लाए थेकहने लगे कि उन फकीर को सब जगह परमात्मा ही परमात्मा दिखाई पड़ता है। मैंने उनसे पूछा कि जगह भी दिखाई पड़ती हैपरमात्मा भी दिखाई पड़ता हैदोनों दिखाई पड़ते हैंउन्होंने कहाहांउन्हें कण-कण में परमात्मा दिखाई पड़ता है। तो मैंने कहाकण भी दिखाई पड़ता हैकण में परमात्मा भी दिखाई पड़ता हैऐसाउन्होंने कहाआप कैसी बातें पूछते हैंमैंने कहाअगर परमात्मा ही दिखाई पड़ता हैतो अब कण दिखाई नहीं पड़ना चाहिए। और कण दिखाई पड़ता हैतो परमात्मा आरोपित होगा,इंपोज्ड होगा। कोशिश की गई होगी।
इसलिए जो आदमी कहता है कि कण-कण में परमात्मा दिखाई पड़ता हैउसे दो चीजें दिखाई पड़ रही हैंकण भी दिखाई पड़ रहा हैपरमात्मा भी दिखाई पड़ रहा है। ये दोनों चीजें एक साथ दिखाई नहीं पड़ सकतीं। इनमें से एक ही चीज एक बार दिखाई पड़ सकती है। अगर परमात्मा दिखाई पड़ता हैतो कण दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि परमात्मा के अतिरिक्त कण की कोई जगह नहीं रह जातीजहां उसे देखें। और अगर कण दिखाई पड़ता हैतो परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि जब तक कण दिखाई पड़ रहा हैतब तक परमात्मा दिखाई पड़ना मुश्किल है।
तो मैंने उनसे कहाकोशिश की होगीसमझाया होगा अपने कोलिखा है किताबों में कि कण-कण में परमात्मा है। नहींउन्होंने कहा कि मुझे वर्षों से दिखाई पड़ता है। तो मैंने कहाऔर वर्षों के पहले कोशिश की होगी। मैंने कहा,आप रुकें। मेरे पास रुक जाएं और दो-चार दिन अब देखने की कोशिश न करें।
दूसरे दिन सुबह उन्होंने मुझसे कहा कि आपने मुझे भारी नुकसान पहुंचाया। मेरी तीस साल की साधना खराब कर दी। क्योंकि मैंने रात से कोशिश नहीं कीतो मुझे वृक्ष फिर वृक्ष दिखाई पड़ने लगे। अब मुझे परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता!
तो मैंने कहाजिसको तीस साल देखकर भीदो-चार घंटे देखने की कोशिश न की जाए और खो जाता होतो आप वृक्षों के ऊपर अपना एक सपना आरोपित कर रहे हैं। उसका परमात्मा से कोई लेना-देना नहीं है। कह रहे हैं कि वृक्ष में परमात्मा है। समझाए जाएंतो दिखाई पड़ने लगेगा।
लेकिन यह वह परमात्मा नहीं हैजिसकी कृष्ण बात कर रहे हैं। आपको परमात्मा थोपना नहीं है जगत पर,आपको तो जगत के प्रति ही जाग जाना है। जागते से जगत खो जाता है और परमात्मा शेष रह जाता है।
आपको सपने को समझाना नहीं है अपने को कि यह झूठ हैयह झूठ है। नहींसपने को देख लेना है ठीक से,क्या हैऔर जैसे ही सपने को देख लिया जाता है कि क्या हैतो आप अचानक पाते हैं कि सपना टूट गया और नहीं है। फिर जो शेष रह जाता हैवही सत्य है।
प्रयास तो हमें असत्य के लिए करने पड़ते हैंसत्य के लिए नहीं करने पड़ते हैं। एफर्ट तो असत्य के लिए करना पड़ता हैसत्य के लिए नहीं करना पड़ता। क्योंकि जो सत्य मनुष्य के प्रयास से मिलता होगावह सत्य नहीं हो सकता। जो सत्य मनुष्य के प्रयास के बिना ही मौजूद हैवही सत्य है।
सत्य आपको निर्मित नहीं करना हैवह आपका कंस्ट्रक्शन नहीं है कि आप उसका निर्माण करेंगे। सत्य तो है ही। कृपा करके असत्य भर निर्माण न करेंजो हैवह दिखाई पड़ जाएगा।
मैं एक वृक्ष की शाखा को अपने हाथ से खींच लेता हूं। फिर मैं राह चलते आपसे पूछता हूं कि इस वृक्ष की शाखा को मैंने इसकी जगह से नीचे खींच लिया हैअब मैं इसे इसकी जगह वापस पहुंचाना चाहता हूंतो क्या करूं?तो आप क्या कहेंगे मुझसे कि कुछ करिए! आप कहेंगेकृपा करके खींचिए भर मतछोड़ दीजिए। शाखा अपनी जगह पहुंच जाएगीशाखा अपनी जगह थी हीआपकी कृपा से ही अपनी जगह से हट गई है।
परमात्मा में पहुंचने के लिए मनुष्य को किसी एफर्ट और प्रयास की जरूरत नहीं है। परमात्मा को खोने के लिए उसने जो प्रयास किया हैकृपा करके उतना प्रयास भर वह न करेअपनी जगह पहुंच जाएगा।
स्वप्न हमारे निर्माण हैं। सत्य हमारा निर्माण नहीं है।
इसलिए बुद्ध को जब ज्ञान हुआ और लोगों ने बुद्ध से पूछा कि तुम्हें क्या मिलातो बुद्ध ने कहामुझे कुछ मिला नहींसिर्फ मैंने कुछ खोया है। तब तो वे बहुत हैरान हुए। उन्होंने कहाहम तो सोचते थे कि आपको कुछ मिला है! बुद्ध ने कहामिला कुछ भी नहीं। जो था हीउसे मैंने जाना है। हांखोया जरूर कुछ। जो-जो मैंने बनाया थावह मुझे सब खो देना पड़ा। अज्ञान मैंने खोया और ज्ञान मैंने पाया नहींक्योंकि ज्ञान था ही। जिस अज्ञान को मैं जोर से पकडथाउसकी वजह से दिखाई नहीं पड़ रहा था। खोया जरूरपाया कुछ भी नहीं। पाया वहीजो पाया ही हुआ था,जो सदा से मिला ही हुआ था।
ठीक से समझें तो सिर्फ जागकर देखने की जरूरत है। आंख खोलकरप्रज्ञा को पूरी तरह जगाकरचेतना को पूरे होश से अप्रमाद में लाकर देखने भर की जरूरत है कि क्या है! और जैसे ही हम देखते हैं कि क्या हैउसमें जो नहीं हैवह गिर जाता हैजो हैवह शेष रह जाता है।


अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।। १८।।
औरइस नाशरहितअप्रमेयनित्यस्वरूप जीवात्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिएहे भरतवंशी अर्जुन,
तू युद्ध कर।


अर्जुन को युद्ध बड़ा सत्य मालूम पड़ रहा हैदेह बहुत सत्य मालूम पड़ रही हैमृत्यु बहुत सत्य मालूम पड़ रही हैउसकी अड़चन स्वाभाविक है। उसकी अड़चन हमारी सबकी अड़चन है। जो हमें सत्य मालूम पड़ता हैवही उसे सत्य मालूम पड़ रहा है। कृष्ण उसे बड़ी दूसरी दुनिया की बातें कह रहे हैं। वे कह रहे हैं कि यह देहये शरीरधारी लोगयह दिखाई पड़ने वाला सारा जाल--यह स्वप्न है। तू इसकी फिक्र मत कर और लड़।
कृष्ण का लड़ने के लिए यह आह्वान तथाकथित धार्मिक लोगों कोसो काल्ड रिलीजस लोगों कोसदा ही कष्ट का कारण रहा हैसमझ के बाहर रहा है। क्योंकि एक तरफ समझाने वाले लोग हैंजो कहते हैंचींटी पर पैर पड़ जाए तो बचानाअहिंसा है। पानी छानकर पीना। दूसरी तरफ यह कृष्ण हैजो कह रहा है कि लड़क्योंकि यहां न कोई मरतान कोई मारा जाता। यह सब देह स्वप्न है।
अर्जुन साधारणतः ठीक कहता मालूम पड़ता है। गांधी ने चाहा होता कि अर्जुन की बात कृष्ण मान लेते,अहिंसावादियों ने चाहा होता कि कृष्ण की बात न चलतीअर्जुन की चल जाती। लेकिन कृष्ण बड़ी अजीब बात कह रहे हैं। वे कह रहे हैंजो स्वप्न हैउसके लिए तू दुखी हो रहा है! जो नहीं हैउसके लिए तू पीड़ित और परेशान हो रहा है! साधारण नीति के बहुत पार चली गई बात।
इसलिए जब पहली बार गीता के अनुवाद पश्चिम में पहुंचेतो पश्चिम के नीतिविदों की छातियां कंप गईं। भरोसा न हुआ कि कृष्ण और ऐसी बात कहेंगे। जिन्होंने सिर्फ पुरानी बाइबिल के टेन कमांडमेंट्स पढ़े थे धर्म के नाम पर--जिन्होंने पढ़ा था चोरी मत करजिन्होंने पढ़ा था असत मत बोलजिन्होंने पढ़ा था किसी को दुख मत पहुंचा--उनके प्राण अगर कंप गए हों...। बड़ा शॉकिंग था कि कृष्ण कहते हैं कि यह सब स्वप्न हैतू लड़!
तो पश्चिम के नीतिविदों को लगा कि गीता जैसी किताब नैतिक नहीं है। या तो अनैतिक है या अतिनैतिक है। या तो इम्मारल है या एमारल है। कम से कम मारल तो नहीं है। यह क्या बात है?
और ऐसा पश्चिम में ही लगा होऐसा नहींजैन विचारकों ने कृष्ण को नर्क में डाल दिया। जैन चिंतन को अनुभव हुआ कि यह आदमी क्या कह रहा है! मारने की खुली छूट! अगर अर्जुन का वश चलता तो महाभारत शायद न होता। कृष्ण ने ही करवा दिया। तो अहिंसा की धारा इस मुल्क में भी थी। उसने कृष्ण को नर्क में डालने की जरूरत महसूस की। इस आदमी को नर्क में डाल ही देना चाहिए।
यह बड़ा मुद्दा है और बड़े विचार का है। इसमें ध्यान रखना जरूरी है कि नीति धर्म नहीं हैनीति बहुत कामचलाऊ व्यवस्था है। नीति बिलकुल सामाजिक घटना है। नीति स्वप्न के बीच व्यवस्था है। स्वप्न में भी रास्तों पर चलना हो तो नियम बनाने पड़ेंगे। स्वप्न में भी जीना हो तो व्यवस्थापनडिसिप्लिनशिष्ट-अनुशासन बनाना पड़ेगा। नीति धर्म नहीं हैनीति बिलकुल सामाजिक व्यवस्था है। इसलिए नीति रोज बदल सकती हैसमाज बदलेगा और नीति बदलेगी। कल जो ठीक थावह आज गलत हो जाएगा। आज जो ठीक हैवह कल गलत हो जाएगा। नीति भी असत का हिस्सा है।
इसका यह मतलब नहीं है कि धर्म अनीति है। जब नीति तक असत का हिस्सा हैतो अनीति तो असत का हिस्सा होगी ही। धर्म नीति और अनीति को पार करता है। असल में धर्म संसार को पार करता है। तो इसलिए कृष्ण की बात जिस तल से कही जा रही हैउस तल से बहुत मुश्किल से समझी जा सकी है।
जैनों ने नर्क में डाल दियावह एक उपाय थाउनसे छुटकारा पाने का। गांधी ने पूरी गीता को मेटाफर मान लिया। मान लिया कि यह हुई नहीं है घटना कभीक्योंकि कृष्ण कहां युद्ध करवा सकते हैं! यह किसी असली युद्ध की बात नहीं हैयह तो शुभ-अशुभ के बीच जो युद्ध चलता हैउसकी प्रतीक-कथा हैसिम्बालिक है। यह दूसरी तरकीब थी--ज्यादा बली। लेकिन मतलब वही छुटकारा पाने का है। मतलब यह कि यह घटना कभी...।
कृष्ण युद्ध कैसे करवा सकते हैं! कृष्ण कैसे कह सकते हैं कि युद्ध करो! नहींकृष्ण तो यह कह ही नहीं सकते। इसलिए अब एक दूसरा उपाय है--होशियारी से कृष्ण से बच जाने का--और वह यह है कि कहो कि मेटाफर है,सिंबल हैएक कहानी हैप्रतीक-कथा है। यह घटना कभी घटी नहींऐसा कोई युद्ध कहीं हुआ नहीं कि जिसमें युद्ध करवाया गया हो। ये सब तो प्रतीक- पुरुष हैं--यह अर्जुन और यह दुर्योधन और ये सब--ये व्यक्ति नहीं हैंये ऐतिहासिक तथ्य नहीं हैं। यह तो सिर्फ एक पैरेबल हैएक प्रतीक-कथा हैजिसमें शुभ और अशुभ की लड़ाई हो रही है। और अशुभ के खिलाफ लड़ने के लिए कृष्ण कह रहे हैं।
अब यह कृष्ण को एकदम विकृत करना है। कृष्ण अशुभ के खिलाफ लड़ने को नहीं कह रहे हैं। अगर कृष्ण को ठीक समझेंतो वे कह रहे हैं कि शुभ और अशुभ एक ही स्वप्न के हिस्से हैंहिंसा और अहिंसा एक ही स्वप्न के हिस्से हैं। कृष्ण यह नहीं कह रहे हैं कि हिंसा ठीक हैकृष्ण इतना ही कह रहे हैं कि हिंसा और अहिंसा अच्छे और बुरे आदमी के स्वप्न हैं। स्वप्न ही हैं। और पूरे स्वप्न को स्वप्न की भांति जो जानता हैवह सत्य को उपलब्ध होता है। नीति का अतिक्रमण करती है यह बात। अनैतिक नहीं है। अनीति का भी अतिक्रमण करती है यह बात।
इन अर्थों में कृष्ण का संदेश बहुत कठिन हो जाता है समझना। चुनाव आसान पड़ता है--यह बुरा हैयह ठीक है। लेकिन ठीक और बुरा दोनों ही स्वप्न हैंयहां हमारे पैर डगमगा जाते हैं। लेकिन जो यहां पैर को थिर रख सके,वही गीता में आगे प्रवेश कर सकेगा।
इसलिए इस बात को बिलकुल ठीक से समझ लेना कि कृष्ण न हिंसक हैंन अहिंसक हैं। क्योंकि हिंसक की मान्यता है कि मैं दूसरे को मार डालता हूं। और अहिंसक की मान्यता है कि मैं दूसरे को बचा रहा हूं। और कृष्ण कहते हैं कि जो न मारा जा सकतावह बचाया भी नहीं जा सकता है। न तुम बचा सकते होन तुम मार सकते हो। जो है,वह है। और जो नहीं हैवह नहीं है। तुम दोनों एक-दूसरे से विपरीत स्वप्न देख रहे हो।
एक आदमी किसी की छाती में छुरा भोंक देता हैतो सोचता हैमिटा डाला इसे। और दूसरा आदमी उसकी छाती से छुरा निकाल कर मलहम-पट्टी करता हैऔर सोचता हैबचा लिया इसे। इन दोनों ने सपने देखे विपरीत--एक बुरे आदमी का सपनाएक अच्छे आदमी का सपना। और हम चाहेंगे कि अगर सपना ही देखना हैतो अधिक लोग अच्छे आदमी का सपना देखें।
लेकिन कृष्ण यह कह रहे हैं कि दोनों सपने हैं। और एक और तल है देखने काजहां बचाने वाला और मारने वाला एक-सी ही भूल कर रहा है। वह भूल यही है कि जो हैउसे या तो मिटाया जा सकता हैया बचाया जा सकता है। कृष्ण कह रहे हैंजो नहीं हैवह नहीं हैजो हैवह है। वे यह नहीं कह रहे हैं कि बुरे आदमी का सपना देखेंवे यह कह रहे हैं कि दोनों ही सपने हैं। और अगर देखना ही हैतो पूरे सपने को देखेंताकि जाग जाएं। अगर देखना ही हैतो बुरे-अच्छे आदमी के सपनों में चुनाव न करेंपूरे सपने को ही देखें और जाग जाएं।
यह जागरण कीअवेयरनेस की जो प्रक्रिया कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैंवह अर्जुन की कैसे समझ में आएगी,बड़ी कठिनाई है। क्योंकि अर्जुन बड़ी नीतिवादी बातें कर रहा है। और वह नैतिक सपना देखने को बड़ा उत्सुक है। वह अनैतिक सपने से ऊबा हुआ मालूम पड़ता है। अब वह नैतिक सपना देखने को उत्सुक है। और कृष्ण कहते हैंसपने में ही चुनाव कर रहा है। पूरे सपने के प्रति ही जाग जाना है।
एक सूत्र और पढ़ लेंफिर रात हम बात करेंगे।


य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।। १९।।
औरजो इस आत्मा को मारने वाला समझता हैतथा जो इसको मरा मानता हैवे दोनों ही नहीं जानते हैं। क्योंकियह आत्मा न मारता है और न मारा जाता है।


जो हैवह न मरता है और न मारा जाता है। और जो है हमारे भीतरउसका नाम आत्मा है। और जो है हमारे बाहरउसका नाम परमात्मा है। जो मारा जाता है और जो मार सकता हैया जो अनुभव करता है कि मारा गया--हमारे भीतर उसका नाम शरीर हैहमारे बाहर उसका नाम जगत है। जो अमृत हैजो इम्मार्टल हैवही चेतना है। और जो मर्त्य हैवही जड़ है। साथ हीजो मर्त्य हैवही लहर हैअसत हैऔर जो अमृत हैवही सागर हैसत है।
अर्जुन के मन में यही चिंतादुविधा और पीड़ा है कि मैं कैसे मारने में संलग्न हो जाऊं! इससे तो बेहतर हैमैं ही मर जाऊं। ये दोनों बातें एक साथ ही होंगी। जो दूसरे को सोच सकता है मरने की भाषा मेंवह अपने को भी मरने की भाषा में सोच सकता है। जो सोच सकता है कि मृत्यु संभव हैवह स्वभावतः दुखी हो जाएगा। लेकिन कृष्ण कह रहे हैं कि मृत्यु एक मात्र असंभावना है--दि ओनली इंपासिबिलिटी। मृत्यु हो ही नहीं सकती। मृत्यु की असंभावना है।
लेकिन जिंदगी जहां हम जीते हैंवहां तो मृत्यु से ज्यादा निश्चित और कोई संभावना नहीं है। वहां सब चीजें असंभव हो सकती हैंमृत्यु भर सुनिश्चित रूप से संभव है। एक बात तय हैवह है मृत्यु। और सब बातें तय नहीं हैं। और सब बदलाहट हो सकती है। कोई दुखी होगाकोई सुखी होगा। कोई स्वस्थ होगाकोई बीमार होगा। कोई सफल होगाकोई असफल होगा। कोई दीन होगाकोई सम्राट होगा। और सब होगाऔर सब विकल्प खुले हैंएक विकल्प बंद है। वह मृत्यु का विकल्प हैवह होगा ही। सम्राट भी वहां पहुंचेगाभिखारी भी वहां पहुंचेगासफल भीअसफल भीस्वस्थ भीबीमार भी--सब वहां पहुंच जाएंगे। एक बातजिस जीवन में हम खड़े हैंवहां तय हैवह मृत्यु है।
और कृष्ण बिलकुल उलटी बात कह रहे हैंवे यह कह रहे हैं कि एक बात भर सुनिश्चित है कि मृत्यु असंभावना है। न कभी कोई मरा और न कभी कोई मर सकता है। मृत्यु अकेला भ्रम है। शायद इस मृत्यु के आस-पास ही हमारे जीवन के सारे कोण निर्मित होते हैं। जो देखता है कि मृत्यु सत्य हैउसके जीवन में शरीर से ज्यादा का अनुभव नहीं है।
यह बड़े मजे की बात है कि आपको मृत्यु का कोई भी अनुभव नहीं है। आपने दूसरों को मरते देखा हैअपने को मरते कभी नहीं देखा है।
समझें कि एक व्यक्ति को हम विकसित करेंजिसने मृत्यु न देखी होकिसी को मरते न देखा हो। कल्पना कर लेंएक व्यक्ति को हम इस तरह बड़ा करते हैंजिसने मृत्यु नहीं देखी। क्या यह आदमी कभी भी सोच पाएगा कि मैं मर जाऊंगाक्या इसके मन में कभी भी यह कल्पना भी उठ सकती है कि मैं मर जाऊंगा?
असंभव है। मृत्यु इनफरेंस हैअनुमान हैदूसरे को मरते देखकर। और मजा यह है कि जब दूसरा मरता है तो आप मृत्यु नहीं देख रहेक्योंकि मृत्यु की घटना आपके लिए सिर्फ इतनी है कि वह कल तक बोलता थाअब नहीं बोलताकल तक चलता थाअब नहीं चलता। आप चलते हुए कोन चलते की अवस्था में गया हुआ देख रहे हैं। बोलते हुए कोन बोलते की अवस्था में देख रहे हैं। धड़कते हृदय कोन धड़कते हृदय की अवस्था में देख रहे हैं। लेकिन क्या इतने से काफी है कि आप कहेंजो भीतर थावह मर गयाक्या इतना पर्याप्त हैक्या इतना काफी है?मृत्यु की निष्पत्ति लेने को क्या यह काफी हो गयायह काफी नहीं है।
दक्षिण में एक योगी थे कुछ वर्षों पहलेब्रह्मयोगी। उन्होंने आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी मेंऔर कलकत्ता और रंगून युनिवर्सिटी में--तीन जगह मरने का प्रयोग करके दिखाया। वह बहुत कीमती प्रयोग था। वह दस मिनट के लिए मर जाते थे।
जब आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में उनका प्रयोग हुआ तो डाक्टर्स मौजूद थे। और उन्होंने कहा कि इस दस मिनट में आप मेरी जांच-पड़ताल करके लिख दें सर्टिफिकेट कि यह आदमी मर गया कि जिंदा है। फिर उनकी श्वास खो गई। फिर उनकी नाड़ी बंद हो गई। फिर हृदय ने धड़कना बंद कर दिया। फिर खून की चाल सब शांत हो गई। और दस डाक्टरों ने--आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी के मेडिकल कालेज के--सर्टिफिकेट लिखा कि यह आदमी मर गया है। और मरने के सारे सिम्प्टम्स इस आदमी ने पूरे कर दिए हैं। और दस आदमियों ने दस्तखत किए।
और वे ब्रह्मयोगी दस मिनट के बाद वापस जिंदा हो गए। श्वास फिर चलने लगीहृदय फिर धड़कने लगा,खून फिर बहने लगानाड़ी फिर वापस लौट आई। और उन्होंने कहाफिर सर्टिफिकेट लिखें कि इस आदमी के बाबत क्या खयाल है! उन डाक्टरों ने कहाहम बड़ी मुश्किल में पड़ गए। आप हम पर कोई अदालत में मुकदमा तो न चलाएंगेक्योंकि मेडिकल साइंस जो कह सकती थीहमने कह दिया। तो ब्रह्मयोगी ने कहामुझे यह भी लिखकर दें कि अब तक जितने लोगों को आपने मरने के सर्टिफिकेट दिए हैंवे संदिग्ध हो गए हैं।
असल में जिसे हम मृत्यु कह रहे हैंवह जीवन का शरीर से सरक जाना है। जैसे कोई दीया अपनी किरणों को सिकोड़ ले वापसऐसे जीवन का फैलाव वापस सिकुड़ जाता हैबीज में वापस लौट जाता है। फिर नई यात्रा पर निकल जाता है। लेकिन बाहर से इस सिकुड़ने को हम मृत्यु समझ लेते हैं।
बटन दबा दी हमनेबिजली का बल्ब जलता थाकिरणें समाप्त हो गईं। बल्ब से अंधकार झरने लगा। क्या बिजली मर गईसिर्फ अभिव्यक्ति खो गई। सिर्फ मैनिफेस्टेशन बंद हो गया। फिर बटन दबाते हैंफिर किरणें बिजली की वापस बहने लगीं। क्या बिजली पुनरुज्जीवित हो गईक्योंकि जो मरी नहीं थीउसको पुनरुज्जीवित कहने का कोई अर्थ नहीं है। बिजली पूरे समय वहीं थीसिर्फ अभिव्यक्ति खो गई थी।
जिसे हम मृत्यु कहते हैंवह प्रकट का फिर पुनः अप्रकट हो जाना है। जिसे हम जन्म कहते हैंवह अप्रकट का पुनः प्रकट हो जाना है।
कृष्ण कहते हैंन ही शरीर को मारने से आत्मा मरती हैन ही शरीर को बचाने से आत्मा बचती है। आत्मा न मरती हैन बचती है। असल में जो मरने और बचने के पार हैवही आत्मा हैवही अस्तित्व है।
शेष सांझ हम बात करेंगे।

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