बुधवार, 17 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-004

दलीलों के पीछे छिपा ममत्व और हिंसा

प्रश्न: भगवान श्रीआज सुबह आपने बताया कि गीता अध्यात्म-शास्त्र नहीं हैमानस-शास्त्र है। मगर आपने यह भी बताया कि राम में रावण का अंश होता है और रावण में राम का होता है। वैसे ही गीता में भी क्या ऐसा नहीं हो सकता कि शास्त्र में भी अध्यात्म का कुछ अंश आ गया हो?


मैं अध्यात्म को ऐसी अनुभूति कहता हूंजो अभिव्यक्त नहीं हो सकती। इशारे दिए जा सकते हैंलेकिन इशारे अभिव्यक्तियां नहीं हैं। चांद को अंगुली से बताया जा सकता हैलेकिन अंगुली चांद नहीं है।
गीता को जब मैंने कहा कि मनोविज्ञान हैतो मेरा अर्थ ऐसा नहीं हैजैसे कि फ्रायड का मनोविज्ञान है। फ्रायड का मनोविज्ञान मन पर समाप्त हो जाता हैउसका कोई इशारा मन के पार नहीं है। मन ही इति हैउसके आगे और कोई अस्तित्व नहीं है। गीता ऐसा मनोविज्ञान हैजो इशारा आगे के लिए करता है। लेकिन इशारा आगे की स्थिति नहीं है।

गीता तो मनोविज्ञान ही हैलेकिन आत्मा की तरफअध्यात्म की तरफपरम अस्तित्व की तरफउस मनोविज्ञान से इशारे गए हैं। लेकिन अध्यात्म नहीं है। मील का पत्थर हैतीर का निशान बना हैमंजिल की तरफ इशारा है। लेकिन मील का पत्थर मील का पत्थर ही हैवह मंजिल नहीं है।
कोई भी शास्त्र अध्यात्म नहीं हैं। हांऐसे शास्त्र हैंजो अध्यात्म की तरफ इशारे हैं। लेकिन सब इशारे मनोवैज्ञानिक हैं। इशारे अध्यात्म नहीं हैं। अध्यात्म तो वह है जो इशारे को पाकर उपलब्ध होगा। और वैसे अध्यात्म की कोई अभिव्यक्ति संभव नहीं हैआंशिक भी संभव नहीं है। उसका प्रतिफलन भी संभव नहीं है। उसके कारण हैं। संक्षिप्त में दोत्तीन कारण खयाल में ले लेने जरूरी हैं।
एक तो जब अध्यात्म का अनुभव होता हैतो कोई विचार चित्त में नहीं होता। और जिस अनुभव में विचार मौजूद न होउस अनुभव को विचार प्रकट कैसे करे! विचार प्रकट कर सकता है उस अनुभव कोजिसमें वह मौजूद रहा होगवाह रहा हो। लेकिन जिस अनुभव में वह मौजूद ही न रहा होउसको विचार प्रकट नहीं कर पाता। अध्यात्म का अनुभव निर्विचार अनुभव है। विचार मौजूद नहीं होताइसलिए विचार कोई खबर नहीं ला पाता।
इसलिए तो उपनिषद कह-कहकर थक जाते हैंनेति-नेति। कहते हैंयह भी नहींवह भी नहीं। पूछें कि क्या हैतो कहते हैंयह भी नहीं हैवह भी नहीं है। जो भी मनुष्य कह सकता हैवह कुछ भी नहीं है। फिर क्या है वह अनुभवजो सब कहने के बाहर शेष रह जाता है?
बुद्ध तो ग्यारह प्रश्नों को पूछने की मनाही ही कर दिए थेकि इनको पूछना ही मत। क्योंकि इनको तुम पूछोगे तो खतरे हैं। अगर मैं उत्तर न दूं तो कठोर मालूम पडूंगा तुम्हारे प्रतिऔर अगर उत्तर दूं तो सत्य के साथ अन्याय होगाक्योंकि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया जा सकता। इसलिए पूछना ही मतमुझे मुश्किल में मत डालना। तो जिस गांव में बुद्ध जातेखबर कर दी जाती कि ये ग्यारह सवाल कोई भी न पूछे। वे ग्यारह सवाल अध्यात्म के सवाल हैं।
लाओत्से पर जब लोगों ने जोर डाला कि वह अपने अनुभव लिख देतो उसने कहामुझे मुश्किल में मत डालो। क्योंकि जो मैं लिखूंगावह मेरा अनुभव नहीं होगा। और जो मेरा अनुभव हैजो मैं लिखना चाहता हूंउसे लिखने का कोई उपाय नहीं है। फिर भी दबाव मेंमित्रों के आग्रह मेंप्रियजनों के दबाव में--नहीं माने लोगतो उसने अपनी किताब लिखी। लेकिन किताब के पहले ही लिखा कि जो कहा जा सकता हैवह सत्य नहीं है। और सत्य वही हैजो नहीं कहा जा सकता है। इस शर्त को ध्यान में रखकर मेरी किताब पढ़ना।
दुनिया में जिनका भी आध्यात्मिक अनुभव हैउनका यह भी अनुभव है कि वह प्रकट करने जैसा नहीं है। वह प्रकट नहीं हो सकता। निरंतर फकीर उसे गूंगे का गुड़ कहते रहे हैं। ऐसा नहीं कि गूंगा नहीं जान लेता है कि गुड़ का स्वाद कैसा हैबिलकुल जान लेता है। लेकिन गूंगा उस स्वाद को कह नहीं पाता। आप सोचते होंगेआप कह पाते हैंतो बड़ी गलती में हैं। आप भी गुड़ के स्वाद को अब तक कह नहीं पाए। गूंगा ही नहीं कह पायाबोलने वाले भी नहीं कह पाए। और अगर मैं जिद्द करूं कि समझाइए कैसा होता है स्वादतो ज्यादा से ज्यादा गुड़ आप मेरे हाथ में दे सकते हैं कि चखिए। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। लेकिन गुड़ तो हाथ में दिया जा सकता हैअध्यात्म हाथ में भी नहीं दिया जा सकता कि चखिए।
दुनिया का कोई शास्त्र आध्यात्मिक नहीं है। हांदुनिया में ऐसे शास्त्र हैंजिनके इशारे अध्यात्म की तरफ हैं। गीता भी उनमें से एक है। लेकिन वे इशारे मन के भीतर हैं। मन के पार दिखाने वाले हैंलेकिन मन के भीतर हैं। और उनका विज्ञान तो मनोविज्ञान हैउनका आधार तो मनोविज्ञान है। शास्त्र की ऊंची से ऊंची ऊंचाई मनस है। शब्द की ऊंची से ऊंची संभावना मनस है। अभिव्यक्ति की आखिरी सीमा मनस है। जहां तक मन हैवहां तक प्रकट हो सकता है। जहां मन नहीं हैवहां सब अप्रकट रह जाता है।
तो जब मैंने गीता को मनोविज्ञान कहातो मेरा अर्थ नहीं है कि वाटसन के मनोविज्ञान जैसा मनोविज्ञानकोई बिहेवियरिज्मकोई व्यवहारवाद। या पावलोव का विज्ञानकोई कंडीशंड रिफ्लेक्स। ये सारे के सारे मनोविज्ञान अपने में बंद हैं और मन के आगे किसी सत्ता को स्वीकार करने को राजी नहीं हैं। कुछ तो मन की भी सत्ता स्वीकार करने को राजी नहीं हैं। वे तो कहते हैंमन सिर्फ शरीर का ही हिस्सा है। मन यानी मस्तिष्क। मन कहीं कुछ और नहीं है। यह हड्डी-मांस-पेशीइन सबका ही विकसित हिस्सा है। मन भी शरीर से अलग कुछ नहीं है।
गीता ऐसा मनोविज्ञान नहीं है। गीता ऐसा मनोविज्ञान हैजो मन के पार इशारा करता है। लेकिन है मनोविज्ञान ही। अध्यात्म-शास्त्र उसे मैं नहीं कहूंगा। और इसलिए नहीं कि कोई और अध्यात्म-शास्त्र है। कहीं कोई शास्त्र अध्यात्म का नहीं है। अध्यात्म की घोषणा ही यही है कि शास्त्र में संभव नहीं है मेरा होनाशब्द में मैं नहीं समाऊंगाकोई बुद्धि की सीमा-रेखा में नहीं मुझे बांधा जा सकता। जो सब सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता हैऔर सब शब्दों को व्यर्थ कर जाता हैऔर सब अभिव्यक्तियों को शून्य कर जाता है--वैसी जो अनुभूति हैउसका नाम अध्यात्म है।


प्रश्न: भगवान श्रीकहीं ऐसा मनु-वचन है कि जहां आततायी को मारने के लिए उन्होंने निर्देश दिया हैआततायिनम् आयन्तं अन्यादेवऽविचारतः। शास्त्राज्ञा तो है ऐसी और अर्जुन यह भी जानता है कि दुर्योधन आदि सब आततायी हैंऔर तब भी उनको मारने से उसका जी हिचकिचाता है। तो इसका कारण क्या है?


एक तो मनु जो कहते हैंवह सिर्फ सामाजिक नीति हैसोशल इथिक्स है। मनु जो कहते हैंवह केवल सामाजिक चिंतना हैसोशल कोड है। मनु का वचन अध्यात्म नहीं है। मनु का वचन तो मनस भी नहीं हैमनोविज्ञान भी नहीं है। मनु का वचन तो सामाजिक रीति-व्यवहार की व्यवस्था है। इसलिए मनु को जोड़ना हो अगरतो उसे जोड़ना पड़ेगा माक्र्स सेउसे जोड़ना पड़ेगा दुर्खीम सेइस तरह के लोगों के साथ। मनु का कोई बहुत गहरा सवाल नहीं है।
मनु सामाजिक व्यवस्थापक हैं। और समाज की कोई भी व्यवस्था चरम नहीं है। समाज की सभी व्यवस्थाएं सामयिक हैं। जो व्यक्ति भी थोड़ा चिंतन करेगाउसका चिंतन निरंतर समाज की व्यवस्था के ऊपर चला जाएगा। क्योंकि समाज की व्यवस्था अंतिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर बनाई गई होती है।
जैसे कहा जाता है कि योग्य शिक्षक वही हैजो अपनी कक्षा में अंतिम विद्यार्थी को ध्यान में रखकर बोलता हो। निश्चित ही योग्य शिक्षक वही हैजो कक्षा में अंतिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर बोलता हो। लेकिन तब जो कक्षा में प्रथम व्यक्ति हैउसके लिए शिक्षक तत्काल बेकार हो जाता है।
समाज की व्यवस्था में तो अंतिम व्यक्ति को ध्यान में रखा जाता है और जड़ नियम स्थापित किए जाते हैं। अर्जुन साधारण व्यक्ति नहीं हैमीडियाकर माइंड नहीं हैअर्जुन चिंतनशील हैमेधावी हैअसाधारण प्रतिभाशाली हैजिंदगी उसके लिए सोच-विचार बन जाती है।
अब मनु कहते हैं कि जो आततायी हैउसे तो मार देने में कोई बुराई नहीं है। विचारशील को इतना आसान नहीं है मामला। कौन आततायी हैऔर आततायी हो भीतब भी मारना उचित है या नहीं उचित हैफिर आततायी अपना है,मनु को उसका खयाल भी नहीं है। आततायी में मानकर चला गया है कि वह दुश्मन है। यहां आततायी अपना है। और एक व्यक्ति नहीं हैलाखों व्यक्ति हैं। और उन लाखों से लाखों तरह के निकट संबंध हैं।
इसलिए अर्जुन की स्थिति बहुत भिन्न है। वह साधारण आततायी कीहमलावर कीऔर जिसके ऊपर हमला हुआ हैउसकी नहीं है। वही तो वह चिंतन कर रहा हैवही तो वह कह रहा है कि अगर इन सब को मारकर राज्य को भी पा लेंतो क्या यह सौदा उचित हैवह वही पूछ रहा है। इन सबको मारकर राज्य को पा लेनाक्या सौदा उचित हैक्या इतनी कीमत पर राज्य को ले लेना कुछ सार्थकता रखता हैवह यही पूछ रहा है।
यह जो अर्जुन की मनोदशा हैमनु के जो नियम हैंउन नियमों से बहुत ऊपर चिंतन की है।
असल में नियम तो सदा जड़ होते हैं। जड़ नियम कामचलाऊ होते हैं और विशेष संकट की स्थितियों में अर्थहीन हो जाते हैं। और अर्जुन की संकट की स्थिति बहुत विशेष है। विशेषता तीन प्रकार की है। एक तो यह है कि यह तय करना बहुत मुश्किल है कि आततायी कौन है?
सदा ही मुश्किल है। हमें बहुत आसानी लगती है पीछे से तय करने में कि आततायी कौन है। अगर कौरव जीत गए होतेतो आपको पता चलता कि आततायी कौन हैक्योंकि तब कथा और ढंग से लिखी गई होतीक्योंकि तब कथाकार और होते। और कथाकार तो जो विजेता हैउसके आस-पास इकट्ठे होते हैंहारे हुओं के आस-पास तो इकट्ठे नहीं होते।
दूसरे महायुद्ध में हिटलर हार गयातो अब हम जानते हैं कि बुरा कौन था। लेकिन अगर हिटलर जीत जाता और चर्चिल और रूजवेल्ट और स्टैलिन हारतेतो हम बिलकुल पक्का जानते कि बुरा कोई दूसरा था। स्थितियां गुजर जाने पर पीछे से जो हम सोच पाते हैंवह ठीक स्थितियों के बीच में इतना तय नहीं होता है। आमतौर से इतिहास लिखने वाला आदमी विजेताओं का इतिहास लिखता है। और आमतौर से इतिहास विजेताओं के आस-पास क्रिस्टलाइज होता है।
तो आज हम जानते हैं कि कौरव आततायी थे। लेकिन ठीक युद्ध के क्षण मेंकौन आततायी हैकिसने बुरा किया हैयह मामला इतना दो और दो चार जैसा साफ नहीं होता। कभी साफ नहीं होता।
चीन कहे चला जाता है कि हमला हिंदुस्तान ने उस पर किया था। हिंदुस्तान कहे चला जाता है कि चीन ने हमला उस पर किया था। कभी यह तय नहीं होगा कि किसने हमला किया था। आज तक कभी तय नहीं हो पाया कि कौन हमलावर है। हांजो जीत जाता हैवह इतिहास लिख लेता है। हारा हुआ हमलावर तय हो जाता है। जो हार जाता हैवह इतिहास नहीं लिख पाता है।
क्या हार जाना ही हमलावर होने का सबूत हैपीछे से तय करना सदा आसान हैक्योंकि तब रेखाएं बंध गई होती हैं। लेकिन ठीक परिस्थिति के बीच इतना आसान नहीं है।
भूल-चूक सदा दोनों तरफ होती हैमात्राओं में फर्क हो सकते हैंलेकिन इकतरफा नहीं होती। ऐसा नहीं है कि कौरव ही एकदम जिम्मेवार हैं सारे पाप के लिएऔर पांडव बिलकुल नहीं हैं। ऐसा नहीं है। मात्राओं के फर्क होते हैं। यह हो सकता हैकौरव ज्यादा जिम्मेवार हैं। लेकिन यह भी बहुत पीछे से जब पर्सपेक्टिव मिलता हैदूरी मिलती हैतब तय होता है।
ठीक युद्ध के घने क्षण में अर्जुन का मन बहुत चिंतित हो उठा है। कुछ साफ नहीं हैक्या हो रहा हैवह कहां तक ठीक हो रहा है। और फिर अगर यह भी तय हो कि आततायी वही हैंतो भी उस तरफ सारे प्रियजन खड़े हैं। होगादुर्योधन आततायी होगा! लेकिन द्रोणद्रोण आततायी नहीं हैं। दुर्योधन आततायी होगालेकिन भीष्मभीष्म आततायी नहीं हैंउनकी गोद में ये सब बच्चे बड़े हुए हैं। दुश्मन एक नहीं हैदुश्मन एक बड़ी जमात है। उस जमात में तय करना कठिन है। यही चिंता का कारण है।
मनु जो नियम बना रहे हैंवे बहुत साधारण हैंसाधारणतया उपयोगी हैं। लेकिन इस विशेष स्थिति में मनु काम नहीं करेंगे। कर भी सकते थेकर सकते थे एक ही हालत में कि अर्जुन इस स्थिति को झुठलाना चाहतातो कहतामनु का हवाला देताकि ठीक है मनु ने कहा हैआततायी को मारोमारते हैं। लेकिन वह कोई बहुत बड़ा विचारपूर्ण कदम न होता। और एक तो बात पक्की थी कि विचारपूर्ण इसलिए भी न होता कि यह गीता आपको उपलब्ध न होती। यह गीता उपलब्ध हो सकी है अर्जुन के मंथन सेमनन सेउसकी विचारणा सेउसकी जिज्ञासा से। चीजों को सीधा स्वीकार कर लिया होतातो ठीक थायुद्ध होताकोई जीतताकोई हारता। युद्ध होता है तो कोई जीतता हैकोई हारता है। कहानी बनती हैकथा बनती है।
महाभारत उतना महत्वपूर्ण सिद्ध नहीं हुआ हैजितनी गीता महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है। महाभारत तो हुआ और समाप्त हो गया। गीता का समाप्त होना मुश्किल है। महाभारत तो एक घटना रह गई है। और समय बीतता जाता है और भूलता चला जाता है। बल्कि सच तो यह है कि महाभारत याद ही इसलिए रह गया कि उसमें गीता भी घटीनहीं तो महाभारत याद रहने जैसा भी नहीं था।
हजारों युद्ध हुए हैं। आदमी ने तीन हजार साल में चौदह हजार युद्ध किए हैं। लेकिन युद्धठीक हैएक छोटा-सा फुटनोट बन जाता है इतिहास में। लेकिन युद्ध से भी बड़ी घटना गीता बन गई है। वह महाभारत का जो युद्ध थाउससे भी महत्वपूर्ण घटना गीता बन गई है। आज अगर महाभारत याद हैतो गीता के कारण याद हैगीता महाभारत के कारण याद नहीं है।
और इसलिए यह भी आपसे कहना चाहूंगाइस जगत में घटनाओं का मूल्य नहींइस जगत में विचारणाओं का मूल्य है। इस जगत में इवेंट्सघटनाएं घटती हैं और राख हो जाती हैं। और विचार शाश्वत यात्रा पर निकल जाते हैं। घटनाएं मर जाती हैंउन घटनाओं के बीच अगर किसी विचार काकिसी आत्मवान विचार का जन्म हुआतो वह अनंत की यात्रा पर निकल जाता है।
महाभारत महत्वपूर्ण नहीं है। न भी हुआ हो तो क्या फर्क पड़ता है! लेकिन गीता न हुई हो तो बहुत फर्क पड़ता है। महाभारत एक छोटी-सी घटना हो गई। और जैसे समय आगे बढ़ता जाएगाछोटी होती जाएगी। एक परिवार के भाइयों काचचेरे भाइयों का झगड़ा था। हो गयानिपट गया। उनकी बात थीसमाप्त हो गई। लेकिन गीता रोज-रोज महत्वपूर्ण होती चली गई है। यह हो सकी महत्वपूर्ण इसलिए कि अर्जुन के पास मनु को मान लेने जैसी साधारण बुद्धि नहीं थी। अर्जुन के पास एक प्रतिभा थीजो पूछती हैजो संकट में सवाल उठाती है।
आमतौर से संकट में सवाल उठाना बहुत कठिन है। घर में बैठकर गीता पढ़ना और सवाल उठाना बहुत आसान है। अर्जुन की स्थिति में सवाल उठाना बहुत जोखम से भरा काम है। वह स्थिति सवाल की नहीं है। वह स्थिति कोई ब्रह्म-जिज्ञासा की नहीं हैवह स्थिति कोई गुरु-शिष्य वृक्ष के नीचे बैठकर चिंतन-मनन करेंइसकी नहीं है। युद्ध द्वार पर खड़ा है। हुंकारें हो गई हैंशंख बज गए हैं और इस क्षण में उस आदमी के मन में कंपन हैं। हिम्मतवर आदमी है। कंपन को उस युद्ध के बीच स्थल में प्रकट करता है और वहां भी सोच-विचार करता है। इतने संकट में जो सोच-विचार करता हैवह साधारण प्रतिभा नहीं है। मनु से काम न चलेगाउसे कृष्ण जैसा आदमी चाहिए। मनु वहां होते तो वे कहते कि पढ़ लो मेरी मनुस्मृतिउसमें लिखा है कि आततायी को मारोकर्तव्य स्पष्ट है।
कर्तव्य सिर्फ नासमझों को सदा स्पष्ट रहा हैसमझदारों को कभी स्पष्ट नहीं रहा। समझदार सदा संदिग्ध रहे हैं। क्योंकि समझदार इतना सोचता है और अक्सर दोनों पहलुओं पर सोचता है कि मुश्किल में पड़ जाता है कि कौन सही हैकौन गलत है! गलत और सही की स्पष्टता अज्ञानियों को जितनी होती हैउतनी विचारशील लोगों को नहीं होती।
अज्ञानी के लिए सब साफ होता हैयह गलत हैवह सही है। यह हिंदू हैवह मुसलमान है। यह अपना हैवह पराया है। लेकिन जितना चिंतन आगे बढ़ता हैउतना ही संदेह खड़ा होता है। कौन अपनाकौन परायाक्या ठीकक्या गलतऔर इस जगत में जो भी मूल्यवान पैदा हुआ हैवह इस चिंतन की पीड़ा के प्रसव को जिन्होंने सहा हैउनसे पैदा हुआ है। अर्जुन ने कष्ट सहा है उस घड़ी मेंउस कष्ट के परिणाम में गीता प्रतिसंवेदित हुई है।
नहींमनु से काम नहीं चल सकता। उतने जड़ नियम सड़क पर ट्रैफिक के नियम जैसे हैं कि बाएं चलना चाहिए। बिलकुल ठीक है। इसमें कोई अड़चन नहीं है। उलटा कर लें कि दाएं चलना चाहिएतो भी कोई तकलीफ नहीं है। अमेरिका में उलटा चलते हैंलिखा है दाएं चलना चाहिएतो आदमी दाएं चल रहा है। बाएं चलेंदाएं चलेंतय कर लेने से काम चल जाता है।
लेकिन ये कोई जीवन के परम आधार नहीं हैं। और अगर कोई आदमी सवाल उठाए कि बाएं चलने में ऐसी कौन-सी खूबी हैदाएं क्यों न चला जाए! तो दुनिया में कोई नहीं समझा पाएगा। यह सिर्फ व्यवस्थागत है। और अगर कोई बहुत विचारशील आदमी हो और सवाल उठाए कि बाएं क्या है और दाएं क्या हैतो मुश्किल खड़ी हो जाएगी। कामचलाऊ है।
मनु की जो व्यवस्था हैअत्यंत कामचलाऊ है। कामचलाऊ व्यवस्था के ऊपर प्रश्न उठ रहे हैं अर्जुन के मन में। उसके प्रश्न परम हैं। वह यह पूछ रहा है कि मिल जाएगा राज्य इतनों को मारकरअपनों को मारकर--क्या होगा अर्थक्या होगा प्रयोजनमाना कि जीत जाऊंगाक्या होगामाना कि वे आततायी हैंकाट डालेंगे उन्हेंबदला पूरा हो जाएगा--फिर क्या होगाबदले का क्या अर्थ हैऔर न मालूम कितने निहत्थे मर जाएंगेन मालूम कितने निर्दोष मर जाएंगेजिनका कोई संबंध नहीं हैजो युद्ध में घसीटकर ले आए गए हैंक्योंकि उनका कहीं कोई संबंध है--उन सबका क्या होगा?
नहींउसके प्रश्न ज्यादा कीमती हैंमनु से काम नहीं चल सकता है।


तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव।। ३७।।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।। ३८।।
इससे हे माधवअपने बांधव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैंक्योंकि अपने कुटुंब को मारकर हम कैसे सुखी होंगेयद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाशकृत दोष को और मित्रों के साथ विरोध करने में पाप को नहीं देखते हैं।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन।। ३९।।
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत।। ४०।।
परंतु हे जनार्दनकुल के नाश करने से होते हुए दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिएक्योंकि कुल के नाश होने से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म के नाश होने से संपूर्ण कुल को पाप भी बहुत दबा लेता है!


अर्जुन कह रहा है कि वे विचारहीन हैंहम भी विचारहीन होकर जो करेंगेवह कैसे शुभ होगा! माना कि वे गलत हैंलेकिन गलत के प्रत्युत्तर में हम भी गलत करेंगेतो क्या वह ठीक होगा! क्या एक गलत का प्रत्युत्तर दूसरे गलत से दिए जाने पर सही का निर्माण करता है! वह यह पूछ रहा है कि भूल है उनकीतो हम भी भूल करेंगेतो दो भूलें मिलकर ठीक हो जाती हैं कि दुगुनी हो जाती हैं! माना कि उनका चित्त भ्रमित हो गया हैमाना कि उनकी बुद्धि नष्ट हुई हैतो क्या हम भी अपनी बुद्धि नष्ट कर लें! और जो मिलेगाक्या वह इस योग्य है! क्या उसकी इतनी उपादेयता है! क्या उसका इतना मूल्य है!
ध्यान रखेंइसमें अर्जुन के मन में दोहरी बात चल रही है। एक ओर वह कह रहा है कि क्या इसका कोई मूल्य है! इसमें दो बातें हैं। हो सकता है कोई मूल्य हो और कृष्ण उसे मूल्य बता पाएंतो वह लड़ने के लिए रेशनलाइज कर ले। हो सकता हैकृष्ण समझा पाएं कि हां मूल्य हैहो सकता हैकृष्ण समझा पाएं कि लाभ हैकल्याण हैहो सकता हैकृष्ण समझा पाएं कि बुराई को बुराई से काट दिया जाएगाऔर तब जो शेष बचेगा वह शुभ होगा--तो वह लड़ने के लिए अपने को तैयार कर ले। आदमी अपने को तैयार करने के लिए बुद्धिगत कारण खोजना चाहता है।
अर्जुन के मन में दोनों बातें हैं। वह जिस तरह से प्रश्न को मौजूद कर रहा हैवह यह है कि या तो मुझे भाग जाने के लिए स्वीकृति देंया तो मैं एस्केप कर जाऊंऔर या फिर मैं युद्ध में उतरूंतो मुझे प्रयोजन स्पष्ट करा दें। वह अपने मन को साफ कर लेना चाहता है। युद्ध में उतरेतो यह जानकर निश्चितमनाकि जो हो रहा हैवह शुभ हो रहा है। या फिर युद्ध से भाग जाए। ये दो विकल्प उसे दिखाई पड़ रहे हैं। वह दोनों के लिए राजी दिखाई पड़ता हैदो में से कोई भी एक हो जाए।
इसे थोड़ा समझ लेने जैसा है। आदमी सदा से अपने को बुद्धिमानविचारशीलरेशनल समझता रहा है। अरस्तू ने तो आदमी को रेशनल एनिमल ही कहा हैकहा है कि बुद्धिमान प्राणी है। लेकिन जैसे-जैसे आदमी के संबंध में समझ हमारी बढ़ी हैवैसे-वैसे पता चला है कि उसकी बुद्धिमानी सिर्फ अपनी अबुद्धिमानियों को बुद्धिमानी सिद्ध करने से ज्यादा नहीं है। आदमी का रीजनसिर्फ उसके भीतर जो इर्रेशनल हैजो बिलकुल अबौद्धिक हैउसको जस्टिफाई करने की कोशिश में लगा रहा है।
अगर उसे युद्ध करना हैतो पहले वह सिद्ध कर लेना चाहेगा कि युद्ध से मंगल होगाकल्याण होगाफिर युद्ध में उतर जाएगा। अगर उसे किसी की गर्दन काटनी हैतो वह पहले सिद्ध कर लेना चाहेगा कि जिसकी गर्दन कट रही हैउसके ही हित में यह कार्य हो रहा हैतब फिर वह गर्दन आसानी से काट सकेगा। अगर उसे आग लगानी है तो वह तय कर लेना चाहेगा कि इस आग लगाने से धर्म की रक्षा होगीतो वह आग लगाने के लिए तैयार हो जाएगा। आदमी नेउसके भीतर जो बिलकुल अबौद्धिक तत्व हैंउनको भी बुद्धिमानी से सिद्ध कर लेने की निरंतर चेष्टा की है।
अर्जुन भी वैसी ही स्थिति में है। उसके भीतर लड़ने की तैयारी तो हैअन्यथा इस युद्ध के मैदान तक आने की कोई जरूरत न थी। उसके मन के भीतर युद्ध का आग्रह तो है। राज्य वह लेना चाहता है। जो हुआ है उसके साथउसका बदला भी चुकाना चाहता है। इसीलिए तो युद्ध के इस आखिरी क्षण तक आ गया है। लेकिन वैसी तैयारी नहीं हैजैसी दुर्योधन की हैजैसी भीम की है। पूरा नहीं है। मन बंटा हुआ हैस्प्लिट हैटूटा हुआ है। कहीं भीतर लग भी रहा है कि गलत हैव्यर्थ हैऔर कहीं लग भी रहा है कि करना ही पड़ेगाप्रतिष्ठा काअहंकार काकुल काहजार बातों का सवाल है। दोनों बातें उसके भीतर चल रही हैं। दोहरा उसका मन हैडबल बाइंड है।
और ध्यान रहेविचारशील आदमी में सदा ही दोहरा मन होता है। विचारहीन में दोहरा मन नहीं होता। निर्विचार में भी दोहरा मन नहीं होतालेकिन विचारशील आदमी में दोहरा मन होता है। विचारशील आदमी का मतलब हैजो अपने भीतर ही निरंतर डायलाग में और डिसकशन में लगा हैजो अपने भीतर ही विवाद में लगा है। अपने को ही दो हिस्सों में करकेक्या ठीकक्या ठीक नहींइसका उत्तर-प्रत्युत्तर कर रहा है। विचारशील आदमी चौबीस घंटे अपने भीतर चर्चा कर रहा है स्वयं से ही।
वह चर्चा अर्जुन के भीतर चलती रही होगी। समझा-बुझाकर वह अपने को युद्ध के मैदान पर ले आया है कि नहीं,लड़ना उचित है। लेकिन युद्ध की पूरी स्थिति का उसे पता नहीं था।
पिछले महायुद्ध में जिस आदमी ने हिरोशिमा पर एटम बम गिरायाउसे कुछ भी पता नहीं है कि क्या होगा! उसे इतना ही पता है कि एक बटन दबा देनी है और नीचे एटम गिर जाएगा। उसे यह भी पता नहीं है कि इस एटम से एक लाख आदमी मरेंगे। उसे कुछ भी पता नहीं है। उसे सिर्फ एक आर्डर हैएक आज्ञा हैजो उसे पूरी करनी है। और आज्ञा यह है कि उसे जाकर हवाई जहाज से एक बटन दबा देनी है। हिरोशिमा के ऊपर वह बटन दबाकर लौट आया।
जैसे सारी दुनिया को पता चलाऐसे ही उसको भी पता चला कि एक लाख आदमी मर गए हैं। फिर उसकी नींद हराम हो गई। फिर वह आदमी रात-दिन लाखों मुर्दे देखने लगा। उसके प्राण थरथराने लगेकंपने लगे। उसके हाथ-पैर में कंपन होने लगा। फिर तो अंततः उसने हमले करने शुरू कर दिए अपने परनाड़ी काट डाली एक दिनसिर पर हथौड़ी मार ली। फिर तो उसे पागलखाने में रखना पड़ा। फिर तो उसने दूसरों पर भी हमले शुरू कर दिए। फिर तो उसे जंजीरों में रखना पड़ा। उसकी नींद बिलकुल चली गई। और वह आदमी एक ही अपराध की ग्लानि से भर गयागिल्ट एक ही उसको पकड़ गई कि मैंने लाख आदमी मारे हैं। लेकिन उसे कोई पता नहीं था।
अब जो हमारी युद्ध की व्यवस्था हैबिलकुल इनह्यूमन है। अब उसमें पता नहीं चलतामारने वाले को भी पता नहीं चलता कि वह लाख आदमियों की मौत का बटन दबा रहा है। लेकिन महाभारत में स्थिति और थीसब चीजें सामने थीं। युद्ध सीधा मानवीय थाह्यूमन था। आमने-सामने सब खड़े थे। अर्जुन देख सकता था रथ पर खड़ा होकर कि क्या होगा परिणाम! उसे दिखाई पड़ने लगाइनमें फलां मित्र हैवह मरेगाउसके छोटे बच्चे हैं घर पर।
ध्यान रहेयुद्ध अब जो हैवह इनह्यूमन हो गया हैअमानवीय हो गया है। इसलिए अब बड़ा खतरा है। क्योंकि लड़ने वाले को भी साफ पता नहीं चलता कि क्या होगा! जो हो रहा हैबिलकुल अंधेरे में हो रहा है। और जो आदमी तय करते हैं उसकोउनके पास भी फिगर होते हैंआदमी नहीं होते हैंआंकड़े होते हैं। उनके पास होता हैएक लाख आदमी मरेंगे। एक लाख आदमी मरेंगेयह सुनकर कुछ भी पता नहीं चलता। एक लाख आदमियों को सामने खड़ा करिएखड़े हो जाइए मंच परदेखिए कि ये एक लाख आदमी मरेंगे! तब इनकी एक लाख पत्नियां भी दिखाई पड़ती हैंइनके लाखों बच्चे भी दिखाई पड़ते हैं। इनकी बूढ़ी मां भी होंगीइनके पिता भी होंगे। इनकी न मालूम क्या-क्या जिम्मेवारियां होंगी। इन एक लाख को मारने की जिम्मेवारी अगर हिरोशिमा पर बम डालने वाले को सामने होतीतो मैं भी सोचता हूं कि वह आदमी कहताइससे मैं मर जाना पसंद करूंगा; यह आज्ञा मैं नहीं मानता। उसके सामने भी सवाल उठताइनको मारना हैक्या नौकरी के लिए?
अर्जुन को सवाल उठासामने था सब चित्र। उसे सब दिखाई पड़ने लगाये विधवाएं रोती-बिलखती दिखाई पड़ने लगीं। इनमें न मालूम कितने उसके प्रियजन थेउनकी विधवाएं होंगीउनके बच्चे तड़फेंगेरोएंगे। यह सब लाशों से भर जाएगा मैदान। यह इतना साफ उसे दिखाई पड़ा कि अपने को समझा-बुझाकर लाया था कि लड़ना उचित हैवह सब डांवाडोल हो गया। उसके दूसरे मन ने कहना शुरू किया कि यह तू क्या करने जा रहा है! यह तो पाप होगा। इससे बड़ा पाप और क्या हो सकता हैऔर इसलिए कि राज्य मिल जाएऔर इसलिए कि धन मिल जाएऔर इसलिए कि थोड़ा सुख मिल जाएइन सबको मारने की तेरी तैयारी है?
निश्चित ही वह विचारशील आदमी रहा होगा। उसके मन ने इनकार करना शुरू कर दिया। लेकिन इनकार में दूसरा मन भीतर बैठा हुआ है। और वह दूसरा मन भी बोल रहा है कि अगर कोई रेशनलाइजेशन मिल जाएअगर मिल जाए कि नहींइसमें कोई हर्ज नहीं हैयह उचित है बिलकुलयह औचित्य मालूम पड़ जाएतो वह अपने को इकट्ठा कर लेएकजुट कर लेयुद्ध में उतर जाए।
कृष्ण से पूछते वक्त अर्जुन को भी पता नहीं है कि उत्तर क्या मिलेगाऔर कृष्ण से पूछते वक्त अर्जुन को भी साफ नहीं है कि स्थिति बाद में क्या बनेगीकृष्ण जैसे आदमी प्रिडिक्टेबल नहीं होते। कृष्ण जैसे आदमियों के उत्तर निश्चित नहीं होतेरेडीमेड नहीं होते। कृष्ण जैसे आदमी के साथ पक्का नहीं है कि वे क्या कहेंगे! लेकिन अर्जुन के साथ पक्का है कि वह दो बातें चाह रहा है। या तो यह सिद्ध हो जाए कि यह युद्ध उचित हैनीतिसम्मत हैधार्मिक हैलाभ होगाकल्याण होगाश्रेयस मिलेगाइस लोक मेंपरलोक में सुख मिलेगातो वह युद्ध में कूद जाएगा। और अगर यह सिद्ध हो जाए कि नहीं हो सकतातो युद्ध से भाग जाए। उसके सामने दो विकल्प स्पष्ट हैं। और उन दोनों के बीच उसका मन डोल रहा हैऔर दोनों के बीच उसके भीतर मन का बंटाव है। लड़ना भी चाहता है! अगर उसका मन लड़ना ही न चाहता होतो कृष्ण से पूछने की कोई भी जरूरत नहीं है।
अभी मैं एक गांव में था। एक युवक मेरे पास आए और उन्होंने मुझ से पूछा कि मैं संन्यास लेना चाहता हूं। आपकी क्या सलाह हैमैंने कहाजब तक मेरी सलाह की जरूरत होतब तक तुम संन्यास मत लेना। क्योंकि संन्यास कोई ऐसी बात नहीं है कि मेरी सलाह से लिया जा सके। जिस दिन तुम्हें ऐसा लगे कि सारी दुनिया भी कहे कि संन्यास मत लोतब भी तुम्हें लेने जैसा लगेतभी तुम लेना। तो ही संन्यास के फूल में आनंद की सुगंध आ सकेगीअन्यथा नहीं आ सकेगी।
वह अर्जुन सलाह नहीं मांगताअगर उसको साफ एक मन हो जाता कि गलत हैचला गया होता। उसने कृष्ण से कहा होता कि सम्हालो इस रथ कोले जाओ इन घोड़ों को जहां ले जाना होऔर जो करना हो करोमैं जाता हूं। और कृष्ण कहते कि मैं कोई सलाह देता हूंतो वह कहता कि बिना मांगी सलाह न दुनिया में कभी मानी गई न मानी जाती है। अपनी सलाह अपने पास रखें।
नहींलेकिन वह सलाह मांग रहा है। सलाह मांग रहा हैवही बता रहा है कि उसका दोहरा मन है। अभी उसको भी भरोसा है कि कोई सलाह मिल जाए तो युद्ध कर लेयह भरोसा है उसके भीतर। इसलिए कृष्ण से पूछ रहा है। अगर यह भी पक्का होता कि युद्ध करना उचित हैतब कृष्ण से कोई सलाह लेने की जरूरत न थीयुद्ध की सब तैयारी हो गई थी।
अर्जुन डांवाडोल हैअर्जुन बंटा हैइसलिए वह सारे सवाल उठा रहा है। उसके सवाल महत्वपूर्ण हैं। और जो आदमी भी थोड़ा विचार करते हैंउन सबकी जिंदगी में ऐसे सवाल रोज ही उठते हैं--जब मन बंट जाता हैऔर दोहरे उत्तर एक साथ आने लगते हैंऔर सब निर्णय खो जाते हैं। अर्जुन संशय की अवस्था में हैडिसीसिवनेस खो गई है।
जब भी आप किसी से सलाह मांगते हैंतब वह सदा ही इस बात की खबर होती है कि अपने पर भरोसा खो गया हैसेल्फ कांफिडेंस खो गया है। अब अपने से कोई आशा नहीं उत्तर की। क्योंकि अपने से दो उत्तर एक-से बलपूर्वक आ रहे हैंएक-सी एम्फेसिस लेकर आ रहे हैं। दोनों में तय करना मुश्किल है। कभी एक ठीककभी दूसरा ठीक मालूम पड़ता है। तभी आदमी सलाह मांगने जाता है। जब भी कोई आदमी सलाह मांगने जाता हैतब जानना चाहिएवह भीतर से इतना बंट गया है कि अब उसके भीतर से उसे उत्तर नहीं मालूम पड़ रहा है। ऐसी उसकी दशा है। वह अपनी उसी दशा का वर्णन कर रहा है।


प्रश्न: भगवान श्रीआपने अभी संन्यास के बारे में कुछ कहा। तो यहां जीवन जागृति केंद्र के बुक स्टॉल पर अभिनव संन्यास योजना नामक एक पुस्तिका भी बिक रही हैतो उसमें कहीं लिखा है कि आप गुरु नहीं गवाह बनते हैंतो वह भी स्पष्ट करें। और साथ में और भी एक सवाल है। अर्जुन और कृष्ण दोनों युद्ध में खड़े हैंयुद्धारंभ में ही गीता के अठारह अध्याय सुनने में अर्जुन कैसे प्रवृत्त हो सकता है और कृष्ण कैसे गीता-प्रवचन सुनाने को व्यस्त हो सकते हैंसारी सेनाएं भी वहां मौजूद थीं। तो क्या सब कृष्णार्जुन संवादप्रश्नोत्तर सुनने में ही व्यस्त थेक्या वह टाइम साइकोलाजिकल टाइम था या कोई दूसरा था?


कृष्ण से इतनी लंबी चर्चा निश्चित ही प्रश्नवाची है। निश्चय ही प्रश्न उठता है। युद्ध के मैदान परजहां कि योद्धा तैयार हों लड़ने कोजूझने कोवहां ये अठारह अध्याययह इतनी लंबी किताबअगर कृष्ण ने बिलकुल उस तरह से कही होजैसे कि गीता-भक्त दोहराते हैंतो भी काफी समय लग गया होगा। अगर बिना रुके और बिना अर्जुन की तरफ देखेआंख बंद करके बोलते ही चले गए होंतब भी काफी वक्त लग जाएगा। यह कैसे संभव हुआ होगा?
दो बातें इस संबंध में। निरंतर यह सवाल गूंजता रहा है। इसलिए कुछ लोगों ने तो यह कह दिया कि गीता महाभारत में प्रक्षिप्त हैवह बाद में डाल दी गई हैयह हो नहीं सकता। कुछ लोगों ने कहा कि वहां संक्षिप्त में बात हुई होगीफिर उसको विस्तार से बाद में कवि ने फैला दिया है।
दोनों ही बातें मेरे लिए सही नहीं हैं। मेरे लिए तो गीता घटी हैऔर वैसी ही घटी है जैसी सामने है। लेकिन घटने के क्रम को थोड़ा समझना जरूरी है। यह सारी बातचीत आमने-सामने हुई होयह सारी बातचीत जैसे हम और आप बोल रहे हैंऐसी हुई होतो इसमें कृष्ण और अर्जुन ही भागीदार न रह जाते। इसमें बहुत लोग थेबड़ी भीड़ थी चारों तरफ। इसमें और लोग भी भागीदार हो गए होते। इसमें और लोगों ने भी सवाल उठाए होते। इसमें और सारे लोग बिलकुल चुप ही खड़े हैं! इस तरफ भी योद्धा हैंउस तरफ भी योद्धा हैं। यह बात दोनों की चलती है घंटों। इसमें कोई बोला नहीं बीच में! किसी ने इतना भी न कहा कि यह बातचीत का समय नहीं हैयुद्ध का समय हैशंख बज चुके हैंअब यह चर्चा नहीं चलनी चाहिए!
नहींकोई नहीं बोला। मेरे देखेयह चर्चा टेलीपैथिक हैयह चर्चा सीधी आमने-सामने नहीं हुई है। टेलीपैथी थोड़ी समझनी पड़ेतो खयाल में आएअन्यथा खयाल में नहीं आ पाएगी। एक दोत्तीन उदाहरण से समझाने की कोशिश करूंगा।
एक फकीर था अभी यूनान में जार्ज गुरजिएफ। तीन महीने के लिए रूस के एक बहुत बड़े गणितज्ञ आस्पेंस्की और उसके तीस और शिष्यों को लेकर वह तिफलिस के एक छोटे से गांव में जाकर बैठ गया था। इन तीस लोगों को एक बड़े बंगले में उसने कैद कर रखा था। कैदक्योंकि बाहर निकलने की कोई आज्ञा न थी। और इन तीस लोगों को कहा था कि कोई एक भी शब्द तीन महीने बोलेगा नहीं। न केवल शब्द नहीं बोलेगाइशारे से भी नहीं बोलेगाआंख से भी नहीं बोलेगाहाथ से भी नहीं बोलेगा। कहा था कि ये तीस लोग जो इस मकान में रहेंगे तीन महीनेप्रत्येक को ऐसे रहना हैजैसे वह अकेला ही होकोई दूसरा मौजूद ही नहीं है। दूसरे को रिकग्नाइज भी नहीं करना है--आंख से भीइशारे से भी। दूसरा आस-पास से निकल जाएतो देखना भी नहीं है। और गुरजिएफ ने कहा कि जिसको भी मैं पकड़ लूंगा जरा-सा इशारा करते हुए भीदूसरे को स्वीकार करते हुए भी पकड़ लूंगा कि दूसरा निकल रहा था और तुम बचकर निकलेतो भी मैं बाहर कर दूंगा। क्योंकि तुमने दूसरे को स्वीकार कर लिया कि दूसरा यहां हैबातचीत हो गईतुम बचकर निकलेइशारा हो गया।
पंद्रह दिन में सत्ताइस आदमी बाहर कर दिए गए।
बड़ा मुश्किल मामला था। जहां तीस आदमी मौजूद होंएक कमरे में दस-दसबारह-बारह लोग बैठे होंवहां दूसरों को बिलकुल भूल ही जाना कि वे हैं ही नहींअकेले जीने लगनाकठिन था। इतना कठिन नहीं जितना हम सोचते हैंक्योंकि तीन आदमी बच ही गएतीन भी छोटी संख्या नहीं है। इतना कठिन नहीं हैक्योंकि एक आदमी जंगल में बैठकर आंख बंद करके भीड़ में हो जाता हैतो भीड़ में बैठकर अकेला क्यों नहीं हो सकता! मन की सभी क्रियाएं रिवर्सिबल हैं। मन की सभी क्रियाएं उलटी हो सकती हैं। अगर जंगल में बैठकर आदमी अपनी पत्नी से बातचीत कर सकता हैतो अपनी पत्नी के पास बैठकर बिलकुल अकेला हो सकता है। इसमें कोई अड़चन नहीं है।
तीन आदमी बच गएउनमें गणितज्ञ आस्पेंस्की भी था। वह खुद भी एक वैज्ञानिक चिंतक था। और इधर सौ वर्षों में गणित पर शायद सर्वाधिक गहरी किताब उसने लिखी हैटर्शियम आर्गानम। कहते हैं कि यूरोप में तीन बड़ी किताबें लिखी गई हैं अब तक। एक अरस्तू का आर्गानमफिर बैकन का नोवम आर्गानमऔर फिर आस्पेंस्की का टर्शियम आर्गानम। यह बड़ा वैज्ञानिक चिंतक थायह भी उन तीन में एक बच गया था।
तीन महीने बीत गए। तीन महीने वह ऐसे वहां रहाजैसे अकेला है। वे कमरों में जो लोग थेवे तो भूल ही गएबाहर जो दुनिया थीवह भी भूल गई। और जो आदमी दूसरों को भूल जाएवह अपने को भी भूल जाता हैस्मरण रखें। अगर अपने को याद रखना होतो दूसरों को याद रखना जरूरी है। क्योंकि मैं और तू एक ही डंडे के दो छोर हैं। इनमें से एक गया कि दूसरा फौरन गया। ये दोनों बचते हैंया दोनों चले जाते हैं। कोई कहे कि मैं मैं को बचा लूं और तू को भूल जाऊंतो असंभव है। क्योंकि मैं जो हैवह तू की ही चोट हैवह तू का ही उत्तर है। अगर तू भूल जाए तो मैं बिखर जाता है। अगर मैं भूल जाए तो तू विदा हो जाता है। वे दो एक साथ बचते हैंअन्यथा नहीं बचते। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
दूसरे भूल गएयह तो ठीक थाआस्पेंस्की खुद को भी भूल गया। फिर बचा सिर्फ अस्तित्व। तीन महीने बादगुरजिएफ सामने बैठा है और आस्पेंस्की भी सामने बैठा है। अचानक आस्पेंस्की को सुनाई पड़ा कि किसी ने बुलाया है और कहा,आस्पेंस्कीसुनो! उसने चौंककर चारों तरफ देखाकौन हैलेकिन कोई बोल नहीं रहा है। सामने गुरजिएफ बैठा है। उसने गुरजिएफ को गौर से देखा इन तीन महीनों में। गुरजिएफ हंसने लगा। फिर भीतर से आवाज आईपहचान नहीं रहे हो मेरी आवाजमैं गुरजिएफ बोल रहा हूं। सामने ओंठ बंद हैंवह आदमी चुप बैठा है। आस्पेंस्की बहुत हैरान हुआ। उसने कहा कि मैं यह क्या अनुभव कर रहा हूंवह पहली दफे तीन महीने में बोला।
गुरजिएफ ने कहा कि अब तुम उस जगह आ गए हो मौन कीजहां बिना शब्द के बातचीत की जा सकती है। अब मैं तुमसे सीधे बोल सकता हूंशब्दों की अब कोई जरूरत नहीं है।
अभी रूस के एक दूसरे वैज्ञानिक फयादोव ने एक हजार मील दूर बिना किसी माध्यम के संदेश भेजने के प्रयोग में सफलता पाई है। आप भी पा सकते हैंबहुत कठिन मामला नहीं है। कभी एक छोटा-सा प्रयोग घर में कर लें। छोटे बच्चे को चुन लें। अंधेरा कर लें कमरे मेंदूसरे कोने में उसे बैठा देंएक कोने में आप बैठ जाएं। और उस बच्चे से कह दें कि तू आंख बंद कर ले और ध्यान मेरी तरफ रख। और सुनने की कोशिश कर कि मैं कुछ बोल तो नहीं रहा हूं। और एक ही शब्द अपने भीतर बार-बार दोहराए चले जाएं: गुलाबगुलाबगुलाब। बोलें मतभीतर दोहराए चले जाएं। घंटेआधा घंटे में वह बच्चा बोलने लगेगा कि आप गुलाब बोल रहे हैं। और आप भीतर ही बोलेंआप बाहर मत बोलें।
इससे उलटा भी हो सकता हैलेकिन जरा देर लगेगी। अगर बच्चा वहां बैठकर अपने मन में एक शब्द सोचे और आप पकड़ना चाहेंतो शायद दोत्तीन दिन लग जाएंगे। बच्चा जल्दी पकड़ लेगा। आदमीजिसको हम जिंदगी कहते हैंउसमें बिगड़ने के सिवाय और कुछ भी नहीं करता। बूढ़े बिगड़े हुए बच्चों से अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होते। लेकिन बच्चा घंटेआधा घंटे में पकड़ना शुरू कर देगा। एक ही शब्द दोहराएंऔर अगर एक पकड़ लिया जाए तो फिर अभ्यास से पूरा वाक्य पकड़ा जा सकता है।
कृष्ण और अर्जुन के लिए ध्यान में रखना जरूरी है कि यह चर्चाबाहर हुई चर्चा नहीं है। यह चर्चा गहरी है और यह चर्चा बिलकुल भीतरी है। इसलिए इसमें युद्ध के आसपास खड़े लोग भी गवाह नहीं थे। और इसलिए हो सकता है यह भी कि जिन्होंने महाभारत लिखाउन्होंने पहले गीता उसमें न जोड़ी हो। यह हो सकता है। यह हो सकता है कि इतिहासकार नेजिसने लिखी हैउसने न जोड़ी होलेकिन संजय सुन पा रहा है। क्योंकि संजयजो देख पाता है इतनी दूरवह सुन भी पा सकता है। असल में दुनिया को संजय से पहली दफा गीता सुनने को मिली हैकृष्ण से सुनने को पहली दफा नहीं मिली। पहली दफा अर्जुन ने सुनी हैवह सुनना बहुत भीतरी है। उस सुनने का बाहरी कोई प्रमाण नहीं था।
और दूसरी बात आपसे कहना चाहूंगा कि यह टेलीपैथिक कम्युनिकेशन है। गीता एक अंतर्संवाद हैजिसमें शब्दों का ऊपर उपयोग नहीं हुआ है। महावीर के संबंध में कहा जाता है कि वे कभी नहीं बोले। और जितने उनके शब्द हैंवे उन्होंने नहीं बोले। उनके पास लोग खड़े रहते थेमहावीर उनसे बोलते--ऊपर से नहींक्योंकि हजारों लोग सुनने आए होतेउनको कुछ सुनाई न पड़ता--फिर वह आदमी जोर से बोलता कि महावीर ऐसा कहते हैं।
इसलिए महावीर की वाणी को शून्य वाणीशब्दहीन वाणी कहा गया है। उन्होंने सीधा कभी नहीं बोला। किसी से भीतर से बोला और किसी ने उसे बाहर प्रकट किया। करीब-करीब ऐसे ही जैसे इस माइक से मैं बोल रहा हूं और आप सुन रहे हैं। माइक की तरह एक आदमी का भी उपयोग हो सकता है।
कृष्ण और अर्जुन के बीच जो बात हुई थीअगर संजय ने न सुनी होती तो खो गई होती। बहुत-सी और बातें भी बहुत बार हुई हैं और खो गई हैं। महावीर के बहुत वचन उपलब्ध नहीं हैं।
बुद्ध ने एक दिन अपने सारे भिक्षुओं को इकट्ठा किया। और हाथ में एक कमल का फूल लेकर वे वहां आए। फिर बैठ गए और उस कमल के फूल को देखने लगे और देखते रहे। लोग हैरान हो गएथोड़ी देर में बेचैनी शुरू हो गईकोई खांसा होगाकिसी ने करवट बदली होगीक्योंकि बहुत देर हो गई। वे चुप क्यों बैठे हैं! बोलेंबोलेंबोलें। फिर आखिर आधा घंटा बीतने लगातो बेचैनी बहुत बढ़ गई। किसी ने खड़े होकर कहाआप क्या कर रहे हैंहम आपको सुनने आए हैं। आप बोलते नहीं! बुद्ध ने कहामैं बोल रहा हूंसुनोसुनो। लेकिन लोगों ने कहाआप कुछ बोलते नहींक्या सुनें?
तभी एक भिक्षुजिसका नाम था महाकाश्यपवह हंसने लगा। तो बुद्ध ने उसे बुलाकर वह फूल दे दिया। और कहा कि सुनोजो शब्द से बोला जा सकता थावह मैं तुमसे कह चुकाऔर जो शब्द से नहीं बोला जा सकता थाभीतर ही बोला जा सकता थावह मैंने महाकाश्यप से कह दिया है। अब तुम्हें पूछना हो तो महाकाश्यप से पूछ लेना।
महाकाश्यप से बुद्ध ने क्या कहायह अब तक बुद्ध के भिक्षु पूछते हैं एक-दूसरे से। क्योंकि वह महाकाश्यप से जब भी किसी ने पूछातो वह हंसने लगा और उसने कहाजब बुद्ध न कह सकेतो मैं क्यों उपद्रव में पडूं! उसने कहा कि कहना होता तो बुद्ध ही तुम से कह देते। और जब वे भूल-चूक नहीं किएतो मैं करने वाला नहीं हूं।
फिर महाकाश्यप ने किसी को फिर मौन से कहाफिर उस आदमी ने भी किसी से नहीं कहा--और ऐसे छः आदमियों की परंपरा। और तब छठवां आदमी था बोधिधर्मउसने पहली दफा उस बात को कहा। इस बीच कोई नौ सौ वर्ष बीत गए। बोधिधर्म ने पहली दफे वह कहाजो बुद्ध ने महाकाश्यप से कहा था। और उसने क्यों कहाक्योंकि जब बोधिधर्म ने चीन में पहली दफे जाकर कहा कि अब मैं वह कहता हूं जो बुद्ध ने महाकाश्यप से कहा थातो लोगों ने कहाअब तक किसी ने नहीं कहातुम क्यों कहते हो! तो उसने कहा कि अब चुपचाप सुनने वाला कोई भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए मजबूरी है और मैं मरने के करीब हूं। वह बात खो जाएगी जो बुद्ध ने महाकाश्यप से कही थी। अब जितनी भी गलत-सही मुझसे बन सकती हैमैं कहे देता हूं।
यह एक घटना है। इसलिए पहली बात आपसे कहूंगीता कृष्ण और अर्जुन के बीच मौन-संवाद में घटी है। दूसरी बात आप से कहूं कि मौन-संवाद का टाइम-स्केल अलग है। इसे समझना भी जरूरी होगा। नहीं तो आप कहेंगे कि मौन-संवाद में भी तो कम से कम घंटेडेढ़ घंटेदो घंटे तो लगते ही। क्योंकि इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं आपसे ऊपर से कहूं कि भीतर से कहूंसमय तो लगेगा! तब आपको थोड़ा समय के स्केल कोसमय की सारणी को समझना पड़ेगा।
आपको कभी एक दफा कुर्सी पर बैठे-बैठे झपकी लग जाती है और आप एक सपना देखते हैं। और सपने में देखते हैं कि आपकी शादी हो गईघर बस गयानौकरी लग गईमकान खरीद लियाबच्चे हो गएबच्चे बड़े हो गएशहनाई बज रही हैलड़के की शादी हो रही है। और तभी कोई आपको बगल से आपका आफिसर आकर उठाता है। और आप घड़ी में देखते हैंऔर पाते हैं कि मुश्किल से एक मिनट बीता है झपकी लगे। तब बड़ी मुश्किल होती है कि एक मिनट में इतना लंबा उपद्रव कैसे हुआ होगा! आधी जिंदगी लग जाती है इतना उपद्रव करने में। तीस-चालीस साल लग जाते हैं,यह एक मिनट में कैसे हुआलेकिन बिलकुल हुआ।
असल में ड्रीम-टाइम अलग है। उसका स्केल अलग है। स्वप्न की जो समय की धारणा हैबिलकुल अलग है। इसलिए एक मिनट के सपने में जिंदगीभर के सपने देखे जा सकते हैं। एक मिनट में पूरी जिंदगी देखी जा सकती है।
आमतौर से लोग कहते हैं कि जब कोई नदी में डूबकर मरता हैतो आखिरी डुबकी में अपनी पूरी जिंदगी को फिर से देख लेता है। देख सकता हैइसमें कोई बहुत कठिनाई नहीं है। समय अलग है स्वप्न काजागने का समय अलग है। लेकिन जागने में भी समय का स्केल चौबीस घंटे एक-सा नहीं रहता। उसमें पूरे वक्त बदलाहट होती रहती हैवह फ्लिकर करता है।
जैसे जब आप दुख में होते हैं तो समय लंबा हो जाता हैऔर जब सुख में होते हैं तो छोटा हो जाता है। कोई प्रियजन पास आकर बैठ जाता हैघंटा बीत जाता हैलगता हैअभी तो आए थेक्षणभर हुआ है। और कोई दुश्मन आकर बैठ जाता हैऔर क्षणभर भी नहीं बैठता है कि ऐसा लगता हैकब जाएगा! जिंदगी बीती जा रही है। घड़ी में तो उतना ही समय चलता हैलेकिन आपके मन के समय की धारणा पूरे वक्त छोटी-बड़ी होती रहती है।
घर में कोई मर रहा होरातभर उसकी खाट के पास बैठें तो ऐसा लगेगा कि इटरनिटी हो गईअनंत मालूम पड़ता है। अनंत मालूम पड़ता है। रात खतम होती नहीं मालूम पड़ती। कब होगी खतम! लेकिन वही कोई अपने प्रियजन के साथ नृत्य कर रहा हैऔर रात ऐसे भागने लगती है कि आज रात दुश्मन है और जल्दी कर रही है। और रात जल्दी से भाग जाती है और सुबह आ जाती है। और ऐसा लगता हैसांझ और सुबह के बीच में कोई वक्त ही नहीं था। बस,सांझ आई और सुबह आ गई। बीच का वक्त गिर जाता है।
सुख में समय छोटा मालूम होता है। छोटा हो जाता हैमालूम होता नहींहो ही जाता है। दुख में बड़ा हो जाता है। दिन में भीजागते में भी समय पूरे वक्त बदल रहा है। और अगर कभी आनंद का अनुभव किया होतो समय समाप्त हो जाता है।
जीसस से किसी ने पूछा कि तुम्हारे प्रभु के राज्य में खास बात क्या होगीतो जीसस ने कहादेयर शैल बी टाइम नो लांगर-- समय नहीं होगा। खास बात यह होगी। तो उन्होंने पूछा कि यह हमारी समझ में नहीं आता कि समय नहीं होगातो फिर सब काम कैसे चलेगा!
आनंद के क्षण में समय नहीं होता। अगर कभी ध्यान का एक क्षण भी आपके भीतर उतरा हैकभी आनंद का एक क्षण भी आपको नचा गया हैतो उस वक्त समय नहीं होतासमय समाप्त हो गया होता है। इस संबंध में दुनिया के वे सारे लोग सहमत हैं--चाहे महावीरचाहे बुद्धचाहे लाओत्सेचाहे जीससचाहे मोहम्मदचाहे कोई और--वे सब राजी हैं कि वह जो क्षण है आत्म-अनुभव काआनंद काब्रह्म कावह टाइमलेस मोमेंट हैवह समयरहित क्षण हैवह कालातीत है।
तो जो टेलीपैथी का समय हैउसके स्केल अलग हैं। क्षणभर में भी यह बात हो सकती हैजिसके लिए डेढ़ घंटा लिखने में लगे। आपने क्षणभर में जो सपना देखा हैअगर लिखिएगा तो आपको डेढ़ घंटा लगेगा। आप कहेंगेबड़ी अजीब बात है। देखा क्षणभर में और लिखने में डेढ़ घंटा लग रहा है! क्या कारण हैक्या वजह है?
तीसरी बात इसलिए और आपको खयाल में दे दूं। वजह यह है कि जब आपके भीतर कोई घटना घटती हैतब वह साइमलटेनियस घटती हैवह युगपत घटती है। जैसे मैं आपको देख रहा हूंतो मैं आपको इकट्ठा देख रहा हूं एक ही क्षण में। लेकिन अगर आपकी गिनती करने आऊंतो एक-एक की गिनती करूंगा। और तब लीनियर हो जाएगाएक रेखा में मुझे आपकी गिनती करनी पड़ेगीउसमें घंटों लग जाएंगे। आपको जब देखातो मैंने सबको देखा आपको। वह एक क्षण में एक साथ हो गया। लेकिन जब गिना और कहीं आपके नाम लिखूं रजिस्टर परतो बहुत घंटे लग जाएंगे।
तो जब आप सपने को देखते हैंतो युगपत घट जाता है। जब आप उसको लिखते हैं कागज परतब आप लंबाई में लिखते हैंयुगपत नहीं रह जाता। एक-एक घटना लिखनी पड़ती है। तब वह लंबी हो जाती हैसमय ज्यादा ले लेती है।
गीता जब लिखी गई या संजय ने जब कही धृतराष्ट्र को कि ऐसी-ऐसी बात हो रही है वहां कृष्ण और अर्जुन के बीच,तब उसमें वक्त लगा होगा उतना हीजितना वक्त अभी गीता पढ़ते वक्त आपको लगेगा--उतना ही। लेकिन कृष्ण और अर्जुन के बीच समय कितना लगायह तब तक आपको खयाल में आना मुश्किल हैजब तक आपको टेलीपैथी का थोड़ा-सा अनुभव न हो।
हमारे हिसाब से समय का कोई मूल्य नहीं है वहां। इसलिए हो सकता हैकिसी भी योद्धा को पता भी न चला हो कि कृष्ण और अर्जुन के बीच क्या घटा! एक क्षण में हो गया हो। रथ जाकर खड़ा हुआ होअर्जुन निढाल होकर बैठ गया हो और एक क्षण में यह सारी बात हो गई होजो हुई है।
एक छोटी-सी कहानीफिर हम दूसरा श्लोक लें।
सुना है मैंनेनारद के जीवन में एक कहानी है। यह जगत माया हैयह जगत माया है--बड़े-बड़े ज्ञानियों से नारद ने सुना है। फिर स्वयं भगवान से जाकर उन्होंने पूछा कि मेरी समझ में नहीं आताजो हैवह माया कैसे हो सकता हैजो हैवह है! वह माया कैसे हो सकता हैउसके इलूजरीउसके माया होने का क्या मतलब हैधूप तपती है तेजआकाश में सूरज हैदोपहर है। भगवान ने कहा कि मुझे बड़ी प्यास लगी है--फिर पीछे समझाऊं--थोड़ा पानी ले आ।
नारद पानी लेने गए। गांव में प्रवेश किया। दोपहर हैलोग अपने घरों में सो रहे हैं। एक दरवाजे पर दस्तक दी। एक युवती बाहर आई। नारद भूल गए भगवान को। कोई भी भूल जाए। जिसको सदा याद किया जा सकता हैउसको याद करने की इतनी जल्दी भी क्या है! भूल गए। और जब भगवान को ही भूल गएतो उनकी प्यास का क्या सवाल रहा! किसलिए आए थेयाद न रहा। लड़की को देखते रहेमोहित हो गए। निवेदन किया कि मैं विवाह का प्रस्ताव लेकर आया हूं। पिता बाहर थे। उस लड़की ने कहापिता को आ जाने देंतब तक आप विश्राम करें।
विश्राम किया। पिता आए। राजी हो गए। विवाह हो गया। फिर चली कहानी। बच्चे हुएचार-छह बच्चे पैदा हो गए। काफी वक्त लगा। पिता मर भी गयाससुर मर भी गए। बूढ़े हो गए नारद। पत्नी भी बूढ़ी हो गईबच्चों की लाइन लग गई। बाढ़ आ गई। वर्षा के दिन हैं। गांव डूब गया। अब अपने पत्नी-बच्चों को बचाकर किसी तरह बाढ़ पार कर रहे हैं। बूढ़े हैंशक्ति नहीं है पास। बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं। पत्नी को बचाते हैंतो बच्चे बहे जाते हैंबच्चों को बचाते हैंतो पत्नी बही जाती है। बाढ़ है तेज और सबको बचाने में सब बह जाते हैं। नारद अकेले थके-मांदे तट पर जाकर लगते हैं। आंखें बंद हैंआंसू बह रहे हैं। और कोई पूछता है कि उठोबड़ी देर लगा दीसूरज ढलने के करीब हो गया और हम प्यासे ही बैठे हैं। पानी अब तक नहीं लाए?
नारद ने आंख खोलीदेखाभगवान खड़े हैं। उन्होंने कहाअरेमैं तो भूल ही गया। मगर इस बीच तो बहुत कुछ हो गया। आप कहते हैंअभी सिर्फ सूरज ढल रहा हैउन्होंने कहासूरज ही ढल रहा है। चारों तरफ देखाबाढ़ का कोई पता नहीं है। पूछाबच्चे-पत्नीभगवान ने कहाकैसे बच्चेकैसी पत्नीकोई सपना तो नहीं देखते थेभगवान ने कहा कि तुम पूछते थे कि जो हैवह माया कैसे हो सकता हैजो हैवह माया नहीं है। लेकिन जो हैउसे समय के माध्यम से देखने से वह सब माया हो जाता है। और जो हैउसे समय के अतिरिक्तसमय का अतिक्रमण करके देखने से वह सब सत्य हो जाता है। संसार समय के माध्यम से देखा गया सत्य है। सत्य समय-शून्य माध्यम से देखा गया संसार है।
यह जो घटना घटी हैयह घटना आंतरिक है और समय की परिधि के बाहर है।

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः।। ४१।।
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः।। ४२।।
तथा हे कृष्णपाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं। और हे वार्ष्णेयस्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
और वह वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नर्क में ले जाने के लिए ही (होता) है। लोप हुई पिंड और जल की क्रिया वाले इनके पितर लोग भी गिर जाते हैं।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्तेजातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः।। ४३।।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।। ४४।।
और इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं।
हे जनार्दननष्ट हुए कुलधर्म वाले मनुष्यों का अनंत काल तक नर्क में वास होता हैऐसा हमने सुना है।


अर्जुन बहुत-बहुत मार्गों से क्या-क्या बुरा हो जाएगा युद्ध मेंउसकी खोजबीन कर रहा है। उसके मन में बहुत-बहुत बुराइयां दिखाई पड़ रही हैं। अभी ही नहींआगे भीसंतति कैसी हो जाएगीवर्ण कैसे विकृत हो जाएंगेसनातन धर्म कैसे नष्ट हो जाएगावह सब खोज रहा है। यह बहुत अजीब-सा लगेगा कि उसे इस सब की चिंता क्यों है!
लेकिन अगर हिरोशिमा के बाद बर्ट्रेंड रसेल और पश्चिम के समस्त युद्ध-विरोधी लोगों का साहित्य देखेंतो हैरान होंगे। वे भी सब यही कह रहे हैं। बच्चे विकृत हो जाएंगेव्यवस्था नष्ट हो जाएगीसभ्यता नष्ट हो जाएगीधर्म खो जाएगासंस्कृति खो जाएगी। जो-जो अर्जुन को खयाल आ रहा हैवह-वह खयाल हिरोशिमा के बाद सारी दुनिया के शांतिवादी लोगों को आ रहा है। शांतिवादी--शांतिवादी कह रहा हूं--शांतिवादी युद्ध से क्या-क्या बुरा हो जाएगाउसकी तलाश में लगता है। लेकिन उसकी सारी तलाशजैसा मैंने कहाउसके भीतर पलायन की जो वृत्ति पैदा हो रही हैउसके समर्थन में कारण खोजने की होती है।
हम वही खोज लेते हैंजो हम करना चाहते हैं। लेकिन दिखाई ऐसा पड़ता है कि जो होना चाहिएवही हम कर रहे हैं। हम जो करना चाहते हैंहम उसकी ही दलीलें खोज लेते हैं। और जिंदगी में सब की दलीलों के लिए सुविधा है। जो आदमी जो करना चाहता हैउसके लिए पक्ष की सारी दलीलें खोज लेता है।
एक आदमी ने अमेरिका में एक किताब लिखी है कि तेरह तारीख या तेरह का आंकड़ातेरह की संख्या खतरनाक है। बड़ी किताब लिखी है। और सब खोज लिया उसने कि तेरहवीं मंजिल पर से कौन आदमी गिरकर मरा। तो आज तो अमेरिका के कई होटलों में तेरहवीं मंजिल ही नहीं है उस किताब के प्रभाव मेंक्योंकि तेरहवीं पर कोई ठहरने को राजी नहीं है। बारहवीं के बाद सीधी चौदहवीं मंजिल आ जाती है। तेरह तारीख को अस्पताल में जो लोग भर्ती होते हैंउनमें से कितने मर जाते हैंतेरह तारीख को कितने एक्सिडेंट होते हैं सड़क परतेरह तारीख को कितने लोगों को कैंसर होता हैतेरह तारीख को कितने हवाई जहाज गिरते हैंतेरह तारीख को कितनी मोटरें टकराती हैं--तेरह तारीख को क्या-क्या उपद्रव होता हैउसने सब इकट्ठा कर लिया है। बारह को भी होता हैग्यारह को भी होता है--उतना ही। लेकिन वह उसने छोड़ दिया है। तेरह का सब इकट्ठा कर लिया है।
कोई अगर ग्यारह तारीख के खिलाफ होतो वह ग्यारह तारीख के लिए यह सब इकट्ठा कर लेगा। अगर कोई तेरह तारीख के पक्ष में होतो तेरह तारीख को बच्चे भी पैदा होते हैंतेरह तारीख को हवाई जहाज नहीं भी गिरते हैंतेरह तारीख को अच्छी घटनाएं भी घटती हैंविवाह भी होते हैंतेरह तारीख को मित्रता भी बनती हैतेरह तारीख को विजय-उत्सव भी होते हैंतेरह तारीख को भी सब अच्छा भी होता है। आदमी का चित्त उसे खोज लेता हैजो वह चाहता है।
अभी वह पलायन चाहता है अर्जुनतो वह यह सब खोज रहा है। कल तक उसने यह बात नहीं कही थी कभी भी। कल तक उसे आने वाली संतति को क्या होगाकोई मतलब न था। युद्ध के आखिरी क्षण तक उसे कभी इन सब बातों का खयाल न आयाआज सब खयाल आ रहा है! आज उसके मन को पलायन पकड़ रहा हैतो वह सब दलीलें खोज रहा है।
अब यह बड़े मजे की बात है कि कुल मामला इतना है कि वह अपनों को मारने से भयभीत हो रहा है। लेकिन दलीलें बहुत दूसरी खोज रहा है। वह सब दलीलें खोज रहा है। मामला कुल इतना है कि वह ममत्व से पीड़ित हैमोह से पीड़ित हैअपनों को मारने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। इतनी-सी बात हैलेकिन इसके आस-पास वह बड़ा जालफिलासफी खड़ी कर रहा है।
हम सब करते हैं। छोटी-सी बात जो होती हैअक्सर ऐसा होता है कि वह बात हम छोड़ ही देते हैंजो होती हैउसके आस-पास जो जाल हम खड़ा करते हैंवह बहुत दूसरा होता है। एक आदमी को किसी को मारना हैतो वह बहाने खोज लेता है। एक आदमी को क्रोध करना हैतो वह बहाने खोज लेता है। एक आदमी को भागना हैतो वह बहाने खोज लेता है। आदमी को जो करना हैवह पहले आता हैऔर बहाने खोजना पीछे आता है।
वह कृष्ण देख रहे हैं और हंस रहे हैं। समझ रहे हैं कि ये सब जो दलीलें वह दे रहा हैये चालबाजी की दलीलें हैंये दलीलें वास्तविक नहीं हैंये सही नहीं हैं। यह उसकी अपनी दृष्टि नहीं है। क्योंकि उसने कभी आज तक किसी को मारते वक्त नहीं सोचा। कोई ऐसा पहला मौका नहीं है कि वह मार रहा है। वह निष्णात योद्धा है। मारना ही उसकी जिंदगीभर का अनुभव और कुशलता है। मारना ही उसका बल हैतलवार ही उसका हाथ हैधनुष-बाण ही उसकी आत्मा है। ऐसा आदमी नहीं है कि कोई तराजू पकड़े बैठा रहा हो और अचानक युद्ध पर लाकर खड़ा कर दिया गया हो। इसलिए उसकी बातों पर कृष्ण जरूर हंस रहे होंगे। वे जरूर देख रहे होंगे कि आदमी कितना चालाक है!
सब आदमी चालाक हैं। जो कारण होता हैउसे हम भुलाते हैं। और जो कारण नहीं होता हैउसके लिए हम दलीलें इकट्ठी करते हैं। और अक्सर ऐसा होता है कि खुद को ही दलीलें देकर हम समझा लेते हैं और मूल कारण छूट जाता है।
लेकिन कृष्ण चाहेंगे कि उसे मूल कारण खयाल में आ जाए। क्योंकि मूल कारण अगर खयाल में होतो समझ पैदा हो सकती है। और अगर मूल कारण छिपा दिया जाए और दूसरे फाल्स रीजन्सझूठे कारण इकट्ठे कर लिए...।
अर्जुन को क्या मतलब है कि आगे क्या होगाधर्म की उसे कब चिंता थी कि धर्म विनष्ट हो जाएगा! कब उसने फिक्र की थी कि ब्राह्मणकि कहीं कुल विकृत न हो जाएंकब उसने फिक्र की थीइन सब बातों की कोई चिंता न थी कभी। आज अचानक सब चिंताएं उसके मन पर उतर आई हैं!
यह समझने जैसा है कि ये सारी चिंताएं क्यों उतर रही हैंक्योंकि वह भागना चाहता है। भागना चाहता हैतो ऐसा नहीं दिखाएगा कि कायर है। वजह से भागेगा। रीजनेबल होगा उसका भागना। कहेगा कि इतने कारण थेइसलिए भागता हूं। अगर बिना कारण भागेगातो दुनिया हंसेगी। यहीं उसकी चालाकी है। यहीं हम सब की भी चालाकी है। हम जो भी कर रहे हैंउसके लिए पहले कारण का एक जाल खड़ा करेंगे। जैसे मकान को बनाते हैंतो एक स्ट्रक्चर खड़ा करते हैंऐसे हम एक जाल खड़ा करेंगे। उस जाल से हम दिखाएंगे कि यह ठीक है। लेकिन मूल कारण बिलकुल और होगा।
अगर कृष्ण को यह साफ दिखाई पड़ जाए कि अर्जुन जो कह रहा हैवही कारण हैतो मैं नहीं मानता कि वे धर्म का विनाश करवाना चाहेंगेमैं नहीं मानता कि वे चाहेंगे कि बच्चे विकृत हो जाएंमैं नहीं सोचता कि वे चाहेंगे कि संस्कृति,सनातन-धर्म नष्ट हो जाए। नहीं वे चाहेंगे। लेकिन ये कारण नहीं हैं। ये फाल्स सब्स्टीटयूट्स हैंये झूठे परिपूरक कारण हैं। इसलिए कृष्ण इनको गिराने की कोशिश करेंगेइनको काटने की कोशिश करेंगे। वे अर्जुन को वहां लाएंगेजहां मूल कारण है। क्योंकि मूल कारण से लड़ा जा सकता हैलेकिन झूठे कारणों से लड़ा नहीं जा सकता। और इसलिए हम मूल को छिपा लेते हैं और झूठे कारणों में जीते हैं।
यह अर्जुन की मनोदशा ठीक से पहचान लेनी जरूरी है। यह रीजन की कनिंगनेस हैयह बुद्धि की चालाकी है। सीधा नहीं कहता कि मैं भाग जाना चाहता हूंनहीं होता मन अपनों को मारने कायह तो आत्मघात हैमैं जा रहा हूं। सीधा नहीं कहता। दुनिया में कोई आदमी सीधा नहीं कहता। जो आदमी सीधा कहता हैउसकी जिंदगी में क्रांति हो जाती है;जो इरछा-तिरछा कहता रहता हैउसकी जिंदगी में कभी क्रांति नहीं होती। वह जिसको कहते हैं झाड़ी के आसपास पीटनाबीटिंग अराउंड दि बुशबसऐसे ही वह पीटेगा पूरे वक्त। झाड़ी बचाएगाआसपास पिटाई करेगा। अपने को बचाएगा और हजार-हजार कारण खोजेगा। छोटी-सी बात है सीधी उसकीहिम्मत खो रहा हैममत्व के साथ हिम्मत जा रही है। उतनी सीधी बात नहीं कहेगा और सारी बातें इकट्ठी कर रहा है। उसके कारण सुनने और समझने जैसे हैं। हमारा चित्त भी ऐसा करता हैइसलिए समझना उपयोगी है।


प्रश्न: भगवान श्रीअर्जुन के चित्त ने जो कुछ भी कारण बताएउसमें है कि कुलधर्म का क्षय होने से दूषित स्त्रियों से वर्णसंकर प्रजा का जन्म होता है। जो प्रजा पिंड और तर्पण क्रिया नहीं करती हैउससे उनके पितृगण नर्क में जाते हैं। तो क्या पितृगण पिंडदान नहीं देने पर भूखे मरते हैंयह क्या अर्जुन के चित्त की भ्रांति ही है?


नहीं! अर्जुन के कारण सब अत्यंत ऊपरीअत्यंत व्यर्थ हैं। कोई पितृगण आपके पिंड से बंधकर नहीं जीते हैं। और अगर आपके पिंडदान से किन्हीं जा चुके पितृगणों की आगे की यात्रा बिगड़ती होतब तो पिंडदान बड़ी खतरनाक बात है। आत्माएं अपने ही भीतर से अपनी यात्रा पर निकलती हैं। आपने उनके पीछे क्या किया और क्या नहीं कियाइससे उनकी यात्रा का कोई भी संबंध नहीं है।
लेकिन पुरोहितों का एक जाल है जगत में। और पुरोहितों का जाल जन्म से लेकर मृत्यु तक आदमी को कसता है,मरने बाद भी कसता है। और बिना आदमी को भयभीत किए आदमी का शोषण नहीं किया जा सकता। भय ही शोषण का आधार है। तो बेटे का शोषण किया जा सकता हैमरे हुए बाप के लिए भी भय दिखाकर।
अर्जुन वह सब बातें कर रहा है। वह उसने सुनी होंगी। वह सब उसके आसपास हवा में रही होंगी। तब थींतब तो आश्चर्य नहींअभी भी हैं। पांच हजार साल पहले अर्जुन ने सुनी होंगीकोई आश्चर्य की बात नहींअभी भी हैं। अर्जुन जो कह रहा हैउसने जो सुना होगा हवा मेंजो पुरोहित समझाते रहे होंगे आसपासवही कह रहा है। उसे कोई मतलब नहीं है। वह तो वे सब दलीलें इकट्ठी परेड करवा रहा है कृष्ण के सामने कि साबित हो जाए कि वह भाग रहा हैतो भागना ही धर्म हैउचित है। वह इसीलिए ये सारी दलीलें ला रहा है। लेकिन इनमें कोई भी सत्य नहीं है। और न ही कोई वर्णसंकर से कोई विकृति होती है।
उस दिन खयाल था। अभी भी है। करपात्री और शंकराचार्य से पूछिएतो यही खयाल है। कुछ लोगों के खयाल बदलते ही नहींसारी दुनिया में सब बदल जाए! कुछ लोग खयाल को ऐसा पकड़ते हैं कि खयाल के नीचे से सारी जिंदगी निकल जाती हैलेकिन मुर्दा खयाल को पकड़े रह जाते हैं।
क्रास ब्रीडिंग--जिसको वर्णसंकर कह रहा है अर्जुन--श्रेष्ठतम ब्रीडिंग है। क्रास ब्रीडिंग से संभावना श्रेष्ठतर होने की है। बीज में आप पूरी तरह उपयोग कर रहे हैं। उस वक्त आप खयाल में नहीं लाते कि अर्जुन के खिलाफ जा रहे हैं। जानवरों में उपयोग कर रहे हैं। आदमी में अभी उपयोग नहीं कर रहे हैं। इसलिए आज आदमी की ब्रीडिंग जानवरों से भी पिछड़ी हुई ब्रीडिंग है।
आज हम जितने अच्छे कुत्ते पैदा कर लेते हैं कुत्तों मेंउतना अच्छा आदमी आदमी में पैदा नहीं कर पाते। आदमी की अभी भी संतति की व्यवस्था एकदम अवैज्ञानिक है। अर्जुन के वक्त में तो रही ही होगीआज भी है। आज भी आदमी से श्रेष्ठतर आदमीमन और शरीर की दृष्टि से स्वस्थज्यादा आयुष्य वालाज्यादा प्रतिभाशाली पैदा हो सकेइस तरफ हमारा कोई खयाल नहीं है। बीज की हम फिक्र करते हैं। बीज अच्छे से अच्छा होता जा रहा है--फलों काफूलों कागेहूं का। पशुओं में हम अच्छे से अच्छे पशु पैदा करने की फिक्र करते हैं। आदमी में अभी भी फिक्र नहीं है।
लेकिन पुराने वक्त में ऐसा खयाल था कि अगर दूसरी जाति से मिलना हुआतो जो बच्चा पैदा होगा वह वर्णसंकर हो जाएगा। सच तो यह है कि इस जगत में जितनी भी प्रतिभाशाली जातियां हैंवे सब वर्णसंकर हैं। और जितनी शुद्ध जातियां हैंवे बिलकुल पिछड़ गई हैं। नीग्रो बिलकुल शुद्ध हैंअफ्रीका के जंगलों में रहने वाले आदमी बिलकुल शुद्ध हैंहिंदुस्तान के आदिवासी बिलकुल शुद्ध हैं। जितनी भी विकासमान संस्कृतियां हैंसभ्यताएं हैंवे सभी वर्णसंकर हैं।
असल मेंजैसे दो नदियां मिलकर ज्यादा समृद्ध हो जाती हैंवैसे ही जीवन की दो विभिन्न धाराएं भी मिलकर ज्यादा समृद्ध हो जाती हैं। अगर अर्जुन ठीक हैतब तो बहन और भाई की शादी करवा देनी चाहिएउससे बिलकुल शुद्ध बच्चे पैदा होंगे। लेकिन बहन और भाई की शादी से शुद्ध बच्चा पैदा नहीं होतासिर्फ रुग्ण बच्चा पैदा होता है। बहन और भाई को हम बचाते हैं। जो बुद्धिमान हैंवे चचेरे भाई और बहन को भी बचाते हैं। जो उनसे भी ज्यादा बुद्धिमान हैंवे अपनी जाति में शादी कभी न करेंगे। जो उनसे भी ज्यादा बुद्धिमान हैंवे अपने देश को भी बचाएंगे। और आज नहीं कलअगर किसी ग्रह परउपग्रह पर हमने कोई मनुष्य खोज लिएतो जो बहुत बुद्धिमान हैंवे इंटर प्लेनेटरी क्रास ब्रीडिंग की फिक्र करेंगे।
लेकिन वह अर्जुन तो सिर्फ परेड करवा रहा है। वह तो यह कह रहा है कि यह-यह उसने सुना है। ऐसी-ऐसी हानि हो जाएगीइसलिए मुझे भागने दो। न उसे क्रास ब्रीडिंग से मतलब हैन कोई वह जानकार है। उसकी जानकारी और कुशलता इस सबकी नहीं है। हांये उसके सुने हुए खयाल हैं। चारों तरफ हवा में ये बातें थींआज भी हैं। उस समय थींतो बिलकुल स्वाभाविक लगता है। क्योंकि मनुष्य की संतति का जन्म-शास्त्र बहुत विकसित नहीं था। आज तो बहुत विकसित है।
लेकिन आज भी इतने विकसित संतति-शास्त्र के साथहमारा मस्तिष्क इतना विकसित नहीं है कि हम उसे सह सकें या उस संबंध में सोच सकें। क्योंकि अपनी जाति में शादी करनाबहुत दूर की अपनी बहन से ही शादी करना है। जरा फासला हैदस-पांच पीढ़ियों का फासला होगा। अपनी ही जाति में शादी करनादस-पांच पीढ़ियों के पीछे एक ही पिता की संतति है वह। सौ पीढ़ी पीछे होगीबहुत दूर जाएंगे तो। लेकिन एक जाति में सब बहन-भाई ही हैं। और ज्यादा पीछे जाएंगे तो एक महाजाति में भी सब बहन-भाई हैं।
जितने दूर जाएंजितना विभिन्न बीजारोपण संयुक्त होउतनी विभिन्न समृद्धियांउतने विभिन्न संस्कारउतनी विभिन्न जातियों के द्वारा अनुभव किया गया सारा का सारा हजारों साल का इतिहास जेनेटिक अणु में इकट्ठा होकर उस व्यक्ति को मिल जाता है। जितने दूर से ये दो धाराएं आएंउतने विलक्षण व्यक्ति के पैदा होने की संभावना है।
तो वर्णसंकर बहुत गाली थी अर्जुन के वक्त मेंहिंदुस्तान में अभी भी काशी में गाली है। लेकिन अब सारे जगत के बुद्धिमान इस बात के लिए राजी हैं कि जितने दूर का वर्ण होजितनी संकरता होउतने ही श्रेष्ठतम व्यक्ति को जन्म दिया जा सकता है। लेकिन अर्जुन को इससे लेना-देना नहीं है। अर्जुन कोई इस पर वक्तव्य नहीं दे रहा है। वह तो सिर्फ दलीलें इकट्ठी कर रहा है।


प्रश्न: भगवान श्रीनर्क या स्वर्ग जैसे कुछ स्थान विशेष हैं क्याऐसा लगता है कि पाप और पुण्य एवं नर्क और स्वर्ग की कल्पना व्यक्ति को भयभीत या प्रोत्साहित करने के हेतु की गई है। क्या आप सहमत हैं इससे?


नर्क और स्वर्ग भौगोलिक स्थान नहीं हैंलेकिन मानसिक दशाएं जरूर हैं। लेकिन आदमी का चिंतन सदा ही चीजों को चित्रों में रूपांतरित करता है। आदमी बिना चित्रों के नहीं सोच पाता। आदमी को सोचने में चित्र बड़े सहयोगी हो जाते हैं।
हम सबने देखी हैअभी भी घरों में टंगी हुई है भारत माता की फोटो। वह तो कुछ बुद्धिमान हमारे मुल्क में पता नहीं क्यों नहीं हैं कि भारत माता की खोज पर नहीं निकलते! फोटो तो घरों में लटकी हुई है भारत माता की। लेकिन भारत माता कहीं खोजने से मिलने वाली नहीं है। लेकिन हजारदो हजार साल बाद अगर कोई कहेगा कि भारत माता नहीं थीतो लोग कहेंगेबिलकुल गलत कहते हैं। देखोगांधीजी इशारा कर रहे हैं फोटो में भारत माता की तरफ। गांधीजी गलती कर सकते हैंभारत माता जरूर रही होंगी। या तो कहीं गुहा-कंदराओं में छिप गई हैं हमारे पाप की वजह से।
आदमी जो भी समझना चाहेउसे चित्रों में रूपांतरित करता है। असल में जितना हम पुराने में लौटेंगेउतनी ही पिक्टोरियल लैंग्वेज बढ़ती जाती है। असल में दुनिया की पुरानी भाषाएं चित्रात्मक हैं। जैसे चीनी अभी भी चित्रों की भाषा है। अभी भी शब्द नहीं हैंवर्ण नहीं हैंचित्र हैंचित्रों में ही सारा काम करना पड़ता हैइसलिए चीनी सीखना बहुत मुश्किल मामला हो जाता है। साधारण भी कोई सीखे तो दस-पंद्रह साल तो मेहनत करनी ही पड़े। क्योंकि कम से कम दस-बीस हजार चित्र तो उसे याद होने ही चाहिए। अब चीनी में अगर झगड़ा लिखना हैतो एक झाड़ बनाकर उसके नीचे दो औरतें बिठालनी पड़ती हैंतब पता चलता है कि झगड़ा है। बिलकुल पक्का झगड़ा तो है ही। एक झाड़ के नीचे दो औरतें! इससे बड़ा झगड़ा और क्या हो सकता है?
सारी दुनिया कीजितने हम पीछे लौटेंगेउतनी चिंतना पिक्टोरियल होगी। अभी भी हम सपना जब देखते हैंतो उसमें शब्द नहीं होतेचित्र होते हैं। क्योंकि सपना जो हैवह प्रिमिटिवबहुत पुराना हैनया नहीं है। बीसवीं सदी में भी बीसवीं सदी का सपना देखना मुश्किल है। सपना तो हम देखते हैं कोई लाख साल पुराना। उसका ढंग लाख साल पुराना होता है।
इसलिए बच्चों की किताब में चित्र ज्यादा रखने पड़ते हैं और शब्द कम रखने पड़ते हैं। क्योंकि बच्चा शब्दों से नहीं समझ सकेगाचित्रों से समझेगा। अभी ग गणेश जी कानाहक गणेश जी को फंसाना पड़ता है। गणेश जी का कोई लेना-देना नहीं है ग से। लेकिन बच्चा गणेश जी को समझेगाफिर ग को समझेगा। बच्चा प्रिमिटिव है।
तो जितना हम पीछे लौटेंगेउतने सारे मानसिक तत्व हमें भौगोलिक बनाने पड़े। स्वर्ग चित्त की एक दशा है। जब सब सुखपूर्ण हैसब शांत हैसब फूल खिले हैंसब संगीत से भरा है। लेकिन इसे कैसे कहें! इसे ऊपर रखना पड़ा। नर्क हैजहां कि सब दुख हैपीड़ा हैजलन है। नीचे रखना पड़ा। नीचे और ऊपर वेल्यूज बन गईं। ऊपर वह हैजो श्रेष्ठ हैनीचे वह हैजो बुरा हैनिकृष्ट है। फिर जलनदुखपीड़ातो आग की लपटें बनानी पड़ीं। स्वर्गतो शीतलशांतएयरकंडीशनिंग की व्यवस्था करनी पड़ी। लेकिन वे सब चित्र हैं। लेकिन जिद पीछे पैदा होती है। जिद पुरोहित पैदा करवाता है। वह कहता हैनहींचित्र नहीं हैं। ये तो स्थान हैं। अब वह मुश्किल में पड़ेगा।
क्योंकि जब ख्रुश्चेव का आदमी पहली दफा अंतरिक्ष में पहुंचातो ख्रुश्चेव ने रेडियो पर कहा कि मेरे आदमी चांद का चक्कर लगा लिए हैं। कोई स्वर्ग दिखाई नहीं पड़ रहा है। अब यह पुरोहित से झगड़ा है ख्रुश्चेव का। ख्रुश्चेव से पुरोहित को हारना पड़ेगाक्योंकि पुरोहित दावा ही गलत कर रहा है। कहीं कोई ऊपर स्वर्ग नहीं हैकहीं कोई नीचे नर्क नहीं है। हांलेकिन सुख की अवस्था ऊपर की अवस्था हैनर्क की अवस्था दुख की अवस्थानीचे की अवस्था है।
और यह नीचे-ऊपर को इतना भौगोलिक बनाने का कारण है। जब आप सुखी होंगेतब आपको लगेगा जैसे आप जमीन से ऊपर उठ गए हैं। और जब आप दुखी होंगेतो ऐसा लगेगा कि जमीन में गड़ गए हैं। वह बहुत मानसिक फीलिंग है जब आप दुखी होंगेतो सब तरफ ऐसा लगेगा कि अंधेरा छा गया। जब सुखी होंगेतब सब तरफ लगेगा कि आलोक छा गया। वह फीलिंग हैभाव हैअनुभव है भीतर। जब दुखी होंगेतो ऐसा लगेगा कि जैसे जल रहे हैंजैसे कोई भीतर से आग जल रही है। और जब आनंदित होंगेतो भीतर फूल खिलने लगेंगे।
वे भीतरी भाव हैं। लेकिन कवि उनको कैसे बनाए! चित्रकार उनको कैसे समझाए! धर्मगुरु उन्हें कैसे लोगों के सामने उपस्थित करे! तो उसने बनाया उनका चित्रतो ऊपर गया स्वर्गनीचे गया नर्क। लेकिन अब वह भाषा बेमानी हो गई। अब आदमी उस भाषा के पार चला गयाभाषा बदलनी पड़ेगी।
तो मैं कहता हूंज्यॉग्राफिकल नहींभौगोलिक नहींसाइकोलाजिकल हैंस्वर्ग और नर्क हैं। और ऐसा भी नहीं है कि आप मरकर स्वर्ग चले जाएंगे और नर्क चले जाएंगे। आप चौबीस घंटे में कई बार स्वर्ग और नर्क में यात्रा करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कोई कि इकट्ठा एक दफा होलसेलबिलकुल फुटकर है मामलाचौबीस घंटे का काम है।
जब आप क्रोध में होते हैं तो फौरन नर्क में होते हैं। जब आप प्रेम में होते हैं तो स्वर्ग में उठ जाते हैं। पूरे वक्त आपका मन नीचे-ऊपर हो रहा है। पूरे वक्त आप सीढ़ियां उतर रहे हैं अंधेरे की और आलोक की। ऐसा कोई इकट्ठा नहीं है। लेकिन जो आदमी जिंदगीभर नर्क में ही गुजारता होउसकी आगे की यात्रा भी अंधेरे की तरफ ही हो रही है।
यह अर्जुन बेचारा सारी दुनिया को बचाने के लिए--आत्माएं स्वर्ग जाएंइसके लिएउनके बेटे पिंडदान करेंइसलिएकोई विधवा न हो जाएइसलिएवर्णसंकरता न फैल जाएविनाश न हो जाए--इतने बड़े उपद्रव के लिए...। यह आदमी सिर्फ भागना चाहता है। इतनी-सी छोटी बात की कृष्ण आज्ञा दे दें।
लेकिन इसमें भी वह सेंक्शन मांग रहा हैइसमें भी वह चाह रहा है कि कृष्ण कह दें कि अर्जुनतू बिलकुल ठीक कहता है। ताकि कल जिम्मेवारी उसकी अपनी न रह जाएतब वह कल कह सके कि कृष्ण! तुमने ही मुझसे कहा थाइसलिए मैं गया था।
असल में इतनी भी हिम्मत नहीं है उसकी कि वह रिस्पांसबिलिटी अपने ऊपर ले लेकि कह दे कि मैं जाता हूं। क्योंकि तब उसे दूसरा मन उसका कहता है कि कायरता होगी! यह तो उसके खून में नहीं है। यह भागना उसके वश की बात नहीं है। क्षत्रिय हैपीठ दिखाना उसकी हिम्मत के बाहर है। मर जाना बेहतर हैपीठ दिखाना बेहतर नहीं है। यह भी उसके भीतर बैठा है। इसलिए वह कहता है कि कृष्ण अगर साक्षी दे देंऔर कह दें कि ठीक हैतू उचित कहता है अर्जुन...।
वह तो कृष्ण की जगह अगर कोई साधारण धातु का बना हुआ कोई पंडित-पुरोहित होतातो कह देता कि बिलकुल ठीक कहता है अर्जुनशास्त्र में ऐसा ही तो लिखा हैअर्जुन भाग गया होता। वह भागने का रास्ता खोज रहा है। लेकिन उसे पता नहीं कि जिससे वह बात कर रहा हैउस आदमी को धोखा देना मुश्किल है। वह अर्जुन को पैनागहरे देख रहा है। वह जानता है कि वह क्षत्रिय है और क्षत्रिय होना ही उसकी नियति हैवही उसकी डेस्टिनी है। वह ये सब बातें ऐसी कर रहा हैब्राह्मणों जैसी। ब्राह्मण वह है नहीं। बातें ब्राह्मणों जैसी कर रहा है। दलीलें वह ब्राह्मणों की दे रहा है। है वह ब्राह्मण नहींहै वह क्षत्रिय। तलवार के अतिरिक्त वह कुछ नहीं जानता। एक ही शास्त्र है उसका। असल में अर्जुन जैसा क्षत्रिय दुनिया में खोजना मुश्किल है।
मेरे एक मित्र जापान से आएतो किसी ने उन्हें एक मूर्ति भेंट कर दी। उस मूर्ति के एक हाथ में तलवार है और तलवार की चमक है चेहरे पर। और दूसरे हाथ में एक दीया है और दीए की ज्योति की चमक है दूसरे हिस्से पर चेहरे के! जिस तरफ दीया हैउस तरफ से मूर्ति को देखेंतो लगता है कि चेहरा बुद्ध का है। और जिस तरफ तलवार हैउस तरफ से देखेंतो लगता है कि चेहरा अर्जुन का है।
वे मुझसे पूछने लगे कि यह क्या मामला हैतो मैंने कहा कि अगर बुद्ध के मुकाबले बुद्ध से ज्यादा बड़ा ब्राह्मण खोजना मुश्किल हैशुद्ध ब्राह्मणतो अर्जुन से बड़ा क्षत्रिय भी खोजना मुश्किल है। और यह जो मूर्ति है जापान मेंसमुराई सैनिक की मूर्ति है। समुराई के लिए नियम है कि उसके पास बुद्ध जैसी शांति और अर्जुन जैसी क्षमता चाहिएतभी वह सैनिक है। लड़ने की हिम्मत अर्जुन जैसी और लड़ते समय शांति बुद्ध जैसी। बड़े इंपासिबल की मांग हैबड़े असंभव की मांग है।
लेकिन अर्जुन के पास बुद्ध जैसा कुछ भी नहीं है। उसकी शांति सिर्फ बचाव है। उसकी शांति की बातें सिर्फ पलायनवादी हैं। वह शांति की बातें करके भी पछताएगा। कल अर्जुन फिर कृष्ण को पकड़ लेगा कि तुमने क्यों मुझे सहारा दियाबदनामी हो गई! कुल की प्रतिष्ठा चली गई! वह फिर पच्चीस दलीलें ले आएगा। जैसे अभी पच्चीस दलीलें लाया है भागने के पक्ष मेंकल पच्चीस दलीलें लाएगा और कृष्ण को कहेगा कि तुम ही जिम्मेवार होतुमने ही मुझे उलझा दिया और भगा दिया। अब सब बदनामी हो गई। अब कौन जिम्मा ले इसका?
इसलिए कृष्ण उसे इतने सस्ते में छोड़ नहीं सकते हैं। इतने सस्ते में छोड़ने की बात भी नहीं है। वह आदमी दोहरे दिमाग में है। उसे एक दिमाग पर लाना एकदम आवश्यक है। फिर वह एक दिमाग से जो भी करेकृष्ण की उसे सहमति हो सकती है।
आज इतना ही। फिर कल सुबह।

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