गुरुवार, 18 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-005

दूसरी अति

अहो बत महत्पापं कर्तुंव्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः।। ४५।।

अहो! शोक है कि हम लोग (बुद्धिमान होकर भी) महान पाप करने को तैयार हुए हैंजो कि राज्य और सुख के लोभ से अपने कुल को मारने के लिए उद्यत हुए हैं।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्।। ४६।।
यदि मुझ शस्त्ररहितन सामना करने वाले कोशस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मारेंतो वह मरना भी मेरे लिए अति कल्याणकारक होगा।
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः।। ४७।।

संजय बोले कि रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाला अर्जुन इस प्रकार कहकर बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया।


अथ द्वितीयोऽध्यायः

संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।। १।।
संजय ने कहा: पूर्वोक्त प्रकार से दया से भरकर और आंसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा।
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।। २।।
हे अर्जुनतुमको इस विषम स्थल में यह अज्ञान किस हेतु से प्राप्त हुआक्योंकि यह न तो श्रेष्ठ पुरुषों से आचरण किया गया हैन स्वर्ग को देने वाला हैन कीर्ति को करने वाला है।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप।। ३।।
इसलिए हे अर्जुननपुंसकता को मत प्राप्त हो। यह तेरे लिए योग्य नहीं है। हे परंतपतुच्छ हृदय की दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो।


संजय ने अर्जुन के लिएदया से भरा हुआदया के आंसू आंख में लिएऐसा कहा है। दया को थोड़ा समझ लेना जरूरी है। संजय ने नहीं कहाकरुणा से भरा हुआकहा हैदया से भरा हुआ।
साधारणतः शब्दकोश में दया और करुणा पर्यायवाची दिखाई पड़ते हैं। साधारणतः हम भी उन दोनों शब्दों का एक-सा प्रयोग करते हुए दिखाई पड़ते हैं। उससे बड़ी भ्रांति पैदा होती है। दया का अर्थ हैपरिस्थितिजन्यऔर करुणा का अर्थ हैमनःस्थितिजन्य। उनमें बुनियादी फर्क है।
करुणा का अर्थ हैजिसके हृदय में करुणा है। बाहर की परिस्थिति से उसका कोई संबंध नहीं है। करुणावान व्यक्ति अकेले में बैठा होतो भी उसके हृदय से करुणा बहती रहेगी। जैसे निर्जन में फूल खिला होतो भी सुगंध उड़ती रहेगी। राह पर निकलने वालों से कोई संबंध नहीं है। राह से कोई निकलता है या नहीं निकलता हैफूल की सुगंध को इससे कुछ लेना-देना नहीं है। नहीं कोई निकलतातो निर्जन पर भी फूल की सुगंध उड़ती है। कोई निकलता है तो उसे सुगंध मिल जाती हैयह दूसरी बात हैफूल उसके लिए सुगंधित नहीं होता है।
करुणा व्यक्ति की अंतस चेतना का स्रोत है। वहां सुगंध की भांति करुणा उठती है। इसलिए बुद्ध को या महावीर को दयावान कहना गलत हैवे करुणावान हैंमहाकारुणिक हैं।
अर्जुन को संजय कहता हैदया से भरा हुआ। दया सिर्फ उनमें पैदा होती हैजिनमें करुणा नहीं होती। दया सिर्फ उनमें पैदा होती हैजिनके भीतर हृदय में करुणा नहीं होती। दया परिस्थिति के दबाव से पैदा होती है। करुणा हृदय के विकास से पैदा होती है। राह पर एक भिखारी को देखकर जो आपके भीतर पैदा होता हैवह दया हैवह करुणा नहीं है।
और तब एक बात और समझ लेनी चाहिए कि दया अहंकार को भरती है और करुणा अहंकार को विगलित करती है। करुणा सिर्फ उसमें ही पैदा होती हैजिसमें अहंकार न हो। दया भी अहंकार को ही परिपुष्ट करने का माध्यम है। अच्छा माध्यम हैसज्जनों का माध्यम हैलेकिन माध्यम अहंकार को ही पुष्ट करने का है।
जब आप किसी को दान देते हैंतब आपके भीतर जो रस उपलब्ध होता है--देने वाले कादेने वाले की स्थिति में होने का--भिखारी को देखकर जो दया पैदा होती हैउस क्षण में अगर भीतर खोजेंगेतो अहंकार का स्वर भी बजता होता है। करुणावान चाहेगापृथ्वी पर कोई भिखारी न रहेदयावान चाहेगाभिखारी रहे। अन्यथा दयावान को बड़ी कठिनाई होगी। दया पर खड़े हुए समाज भिखारी को नष्ट नहीं करतेपोषित करते हैं। करुणा पर कोई समाज खड़ा होगातो भिखारी को बरदाश्त नहीं कर सकेगा। नहीं होना चाहिए।
अर्जुन के मन में जो हुआ हैवह दया है। करुणा होती तो क्रांति हो जाती। इसे इसलिए ठीक से समझ लेना जरूरी है कि कृष्ण जो उत्तर दे रहे हैंवह ध्यान में रखने योग्य है। तत्काल कृष्ण उससे जो कह रहे हैंवह सिर्फ उसके अहंकार की बात कह रहे हैं। वह उससे कह रहे हैंअनार्यों के योग्य। वह दूसरा सूत्र बताता है कि कृष्ण ने पकड़ी है बात।
अहंकार का स्वर बज रहा है उसमें। वह कह रहा हैमुझे दया आती है। ऐसा कृत्य मैं कैसे कर सकता हूं?कृत्य बुरा हैऐसा नहीं। ऐसा कृत्य मैं कैसे कर सकता हूंइतना बुरा मैं कहां हूं! इससे तो उचित होगाकृष्ण से वह कहता है कि वे सब धृतराष्ट्र के पुत्र मुझे मार डालें। वह ठीक होगाबजाय इसके कि इतने कुकृत्य को करने को मैं तत्पर होऊं।
अहंकार अपने स्वयं की बलि भी दे सकता है। अहंकार जो आखिरी कृत्य कर सकता हैवह शहीदी हैवह मार्टर भी हो सकता है। और अक्सर अहंकार शहीद होता हैलेकिन शहीद होने से और मजबूत होता है।
अर्जुन कह रहा है कि इससे तो बेहतर है कि मैं मर जाऊं। मैंअर्जुनऐसी स्थिति में कुकृत्य नहीं कर सकूंगा। दया आती है मुझेयह सब क्या करने को लोग इकट्ठे हुए हैं! आश्चर्य होता है मुझे।
उसकी बात से ऐसा लगता है कि इस युद्ध के बनने में वह बिलकुल साथी-सहयोगी नहीं है। उसने कोआप्ट नहीं किया है। यह युद्ध जैसे आकस्मिक उसके सामने खड़ा हो गया है। उसे जैसे इसका कुछ पता ही नहीं है। यह जो परिस्थिति बनी हैइसमें वह जैसे पार्टिसिपेंटभागीदार नहीं है। इस तरह दूर खड़े होकर बात कर रहा हैकि दया आती है मुझे। आंख में आंसू भर गए हैं उसके। नहींऐसा मैं न कर सकूंगा। इससे तो बेहतर है कि मैं ही मर जाऊं,वही श्रेयस्कर है...।
इस स्वर को कृष्ण ने पकड़ा है। इसलिए मैंने कहा कि कृष्ण इस पृथ्वी पर पहले मनोवैज्ञानिक हैं। क्योंकि दूसरा सूत्र कृष्ण का सिर्फ अर्जुन के अहंकार को और बढ़ावा देने वाला सूत्र है।
दूसरे सूत्र में कहते हैंकैसे अनार्यों जैसी तू बात करता हैआर्य का अर्थ है श्रेष्ठजनअनार्य का अर्थ है निकृष्टजन। आर्य का अर्थ है अहंकारीजनअनार्य का अर्थ है दीन-हीन। तू कैसी अनार्यों जैसी बात करता है!
अब सोचने जैसा है कि दया की बात अनार्यों जैसी बात है! आंख में दया से भरे हुए आंसू अनार्यों जैसी बात है! और कृष्ण कहते हैंइस पृथ्वी पर अपयश का कारण बनेगा और परलोक में भी अकल्याणकारी है। दया!
शायद ही कभी आपको खयाल आया हो कि संजय कहता हैदया से भरा अर्जुनआंखों में आंसू लिएऔर कृष्ण जो कहते हैंउसमें तालमेल नहीं दिखाई पड़ता। क्योंकि दया को हमने कभी ठीक से नहीं समझा कि दया भी अहंकार का भूषण है। दया भी अहंकार का कृत्य है। वह भी ईगो-एक्ट है--अच्छे आदमी का। क्रूरता बुरे आदमी का ईगो-एक्ट है।
ध्यान रहेअहंकार अच्छाइयों से भी अपने को भरता हैबुराइयों से भी अपने को भरता है। और अक्सर तो ऐसा होता है कि जब अच्छाइयों से अहंकार को भरने की सुविधा नहीं मिलतीतभी वह बुराइयों से अपने को भरता है।
इसलिए जिन्हें हम सज्जन कहते हैं और जिन्हें हम दुर्जन कहते हैंउनमें बहुत मौलिक भेद नहीं होता,ओरिजनल भेद नहीं होता। सज्जन और दुर्जनएक ही अहंकार की धुरी पर खड़े होते हैं। फर्क इतना ही होता है कि दुर्जन अपने अहंकार को भरने के लिए दूसरों को चोट पहुंचा सकता है। सज्जन अपने अहंकार को भरने के लिए स्वयं को चोट पहुंचा सकता है। चोट पहुंचाने में फर्क नहीं होता।
अर्जुन कह रहा हैइनको मैं मारूंइससे तो बेहतर है मैं मर जाऊं। दुर्जन--अगर हम मनोविज्ञान की भाषा में बोलें तो-- सैडिस्ट होता है। और सज्जन जब अहंकार को भरता हैतो मैसोचिस्ट होता है। मैसोच एक आदमी हुआजो अपने को ही मारता था।
सभी स्वयं को पीड़ा देने वाले लोग जल्दी सज्जन हो सकते हैं। अगर मैं आपको भूखा मारूंतो दुर्जन हो जाऊंगा। कानूनअदालत मुझे पकड़ेंगे। लेकिन मैं खुद ही अनशन करूंतो कोई कानूनअदालत मुझे पकड़ेगा नहीं;आप ही मेरा जुलूस निकालेंगे।
लेकिन भूखा मारना आपको अगर बुरा हैतो मुझको भूखा मारना कैसे ठीक हो जाएगासिर्फ इसलिए कि यह शरीर मेरे जिम्मे पड़ गया है और वह शरीर आपके जिम्मे पड़ गया है! तो आपके शरीर को अगर कोड़े मारूं और आपको अगर नंगा खड़ा करूं और कांटों पर लिटा दूंतो अपराध हो जाएगा। और खुद नंगा हो जाऊं और कांटों पर लेट जाऊंतो तपश्चर्या हो जाएगी! सिर्फ रुख बदलने सेसिर्फ तीर उस तरफ से हटकर इस तरफ आ जाएतो धर्म हो जाएगा!
अर्जुन कह रहा हैइन्हें मारने की बजाय तो मैं मर जाऊं। वह बात वही कह रहा हैमरने-मारने की ही कह रहा है। उसमें कोई बहुत फर्क नहीं है। हांतीर का रुख बदल रहा है।
और ध्यान रहेदूसरे को मारने में कभी इतने अहंकार की तृप्ति नहीं होतीजितना स्वयं को मारने में होती है। क्योंकि दूसरा मरते वक्त भी मुंह पर थूककर मर सकता है। लेकिन खुद आदमी जब अपने को मारता हैतो बिलकुल निहत्थाबिना उत्तर के मरता है। दूसरे को मारना कभी पूरा नहीं होता। दूसरा मरकर भी बच जाता है। उसकी आंखें कहती हैं कि मार डाला भलालेकिन हार नहीं गया वह! लेकिन खुद को मारते वक्त तो कोई उपाय ही नहीं। हराने का मजा पूरा आ जाता है।
अर्जुन दया की बात करता हो और कृष्ण उससे कहते हैं कि अर्जुनतेरे योग्य नहीं हैं ऐसी बातेंअपयश फैलेगा--तो वे सिर्फ उसके अहंकार को फुसला रहे हैंपरसुएड कर रहे हैं।
दूसरा सूत्र कृष्ण काबताता है कि पकड़ी है उन्होंने नस। वे ठीक जगह छू रहे हैं उसे। क्योंकि उसे यह समझाना कि दया ठीक नहींव्यर्थ है। उसे यह भी समझाना कि दया और करुणा में फासला हैअभी व्यर्थ है। अभी तो उसकी रग अहंकार है। अभी अहंकार सैडिज्म से मैसोचिज्म की तरफ जा रहा है। अभी वह दूसरे को दुख देने की जगहअपने को दुख देने के लिए तत्पर हो रहा है।
इस स्थिति में वे दूसरे सूत्र में उससे कहते हैं कि तू क्या कह रहा है! आर्य होकरसभ्यसुसंस्कृत होकर,कुलीन होकरकैसी अकुलीनों जैसी बात कर रहा है! भागने की बात कर रहा है युद्ध सेकातरता तेरे मन को पकड़ती हैवे चोट कर रहे हैं उसके अहंकार को।
बहुत बार गीता को पढ़ने वाले लोग ऐसी बारीक और नाजुक जगहों पर बुनियादी भूल कर जाते हैं। क्या कृष्ण यह कह रहे हैं कि अहंकारी होनहींकृष्ण सिर्फ यह देख रहे हैं कि जो दया उठ रही हैवह अगर अहंकार से उठ रही हैतो अहंकार को फुलाने से तत्काल विदा हो जाएगी।
इसलिए कहते हैंकातरपन की बातें कर रहा है! कायरता की बातें कर रहा है! सख्त से सख्त शब्दों का वे उपयोग करेंगे।
यहां अर्जुन से वे जो कह रहे हैं पूरे वक्तउसमें क्या प्रतिक्रिया पैदा होती हैउसके लिए कह रहे हैं। मनोविश्लेषण शुरू होता है। कृष्ण अर्जुन को साइकोएनालिसिस में ले जाते हैं। लेट गया अर्जुन कोच पर अब कृष्ण की। अब वे जो भी पूछ रहे हैंउसको जगाकर पूरा देखना चाहेंगे कि वह है कहां! कितने गहरे पानी में है!
अब आगे से कृष्ण यहां साइकोएनालिस्टमनोविश्लेषक हैं। और अर्जुन सिर्फ पेशेंट हैसिर्फ बीमार है। और उसे सब तरफ से उकसाकर देखना और जगाना जरूरी है। पहली चोट वे उसके अहंकार पर करते हैं।
और स्वभावतःमनुष्य की गहरी से गहरी और पहली बीमारी अहंकार है। और जहां अहंकार हैवहां दया झूठी है। और जहां अहंकार हैवहां अहिंसा झूठी है। और जहां अहंकार हैवहां शांति झूठी है। और जहां अहंकार हैवहां कल्याण और मंगल और लोकहित की बातें झूठी हैं। क्योंकि जहां अहंकार हैवहां ये सारी की सारी चीजें सिर्फ अहंकार के आभूषण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं।


अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
ईषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।। ४।।
तब अर्जुन बोलाहे मधुसूदनमैं रणभूमि में भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के प्रति किस प्रकार बाणों को करके युद्ध करूंगाक्योंकि हे अरिसूदनवे दोनों ही पूजनीय हैं।


लेकिन अर्जुन नहीं पकड़ पाता। वह फिर वही दोहराता है दूसरे कोण से। वह कहता हैमैं द्रोण और भीष्म से कैसे युद्ध करूंगावे मेरे पूज्य हैं। बात फिर भी वह विनम्रता की बोलता है।
लेकिन अहंकार अक्सर विनम्रता की भाषा बोलता है। और अक्सर विनम्र लोगों में सबसे गहन अहंकारी पाए जाते हैं। असल में विनम्रता डिफेंसिव ईगोइज्म हैवह सुरक्षा करता हुआ अहंकार है। आक्रामक अहंकार मुश्किल में पड़ सकता है। विनम्र अहंकार पहले से ही सुरक्षित हैवह इंश्योर्ड है।
इसलिए जब कोई कहता हैमैं तो कुछ भी नहीं हूंआपके चरणों की धूल हूंतब जरा उसकी आंखों में देखना। तब उसकी आंखें कुछ और ही कहती हुई मालूम पड़ेंगी। उसके शब्द कुछ और कहते मालूम पड़ेंगे।
कृष्ण ने अर्जुन की रग पर हाथ रखा हैलेकिन अर्जुन नहीं समझ पा रहा है। वह दूसरे कोने से फिर बात शुरू करता है। वह कहता हैद्रोण कोजो मेरे गुरु हैंभीष्म कोजो मेरे परम आदरणीय हैंपूज्य हैं--उन पर मैं कैसे आक्रमण करूंगा!
यहां ध्यान में रखने जैसी बात हैयहां भीष्म और द्रोण गौण हैं। अर्जुन कह रहा हैमैं कैसे आक्रमण करूंगा?इतना बुरा मैं नहीं कि द्रोण पर और बाण खींचूं! कि भीष्म की और छाती छेदूं! नहींयह मुझसे न हो सकेगा। यहां वह कह तो यही रहा है कि वे पूज्य हैंयह मैं कैसे करूंगालेकिन गहरे में खोजें और देखें तो पता चलेगावह यह कह रहा है कि यह मेरी जो इमेज हैमेरी जो प्रतिमा हैमेरी ही आंखों में जो मैं हूंउसके लिए यह असंभव है। इससे तो बेहतर है मधुसूदन कि मैं ही मर जाऊं। इससे तो अच्छा हैप्रतिमा बचेशरीर खो जाएअहंकार बचेमैं खो जाऊं। वह जो इमेज है मेरीवह जो सेल्फ इमेज है उसकी...।
हर आदमी की अपनी-अपनी एक प्रतिमा है। जब आप किसी पर क्रोध कर लेते हैं और बाद में पछताते हैं और क्षमा मांगते हैंतो इस भ्रांति में मत पड़ना कि आप क्षमा मांग रहे हैं और पछता रहे हैं। असल में आप अपने सेल्फ इमेज को वापस निर्मित कर रहे हैं। आप जब किसी पर क्रोध करते हैंतो आपने निरंतर अपने को अच्छा आदमी समझा हैवह प्रतिमा आप अपने ही हाथ से खंडित कर लेते हैं। क्रोध के बाद पता चलता है कि वह अच्छा आदमी,जो मैं अपने को अब तक समझता थाक्या मैं नहीं हूं! अहंकार कहता हैनहींआदमी तो मैं अच्छा ही हूं। यह क्रोध जो हो गया हैयह बीच में आ गई भूल-चूक है। इंस्पाइट आफ मीमेरे बावजूद हो गया है। यह कोई मैंने नहीं किया हैहो गयापरिस्थितिजन्य है। पछताते हैंक्षमा मांग लेते हैं।
अगर सच में ही क्रोध के लिए पछताए हैंतो दुबारा क्रोध फिर जीवन में नहीं आना चाहिए। नहींलेकिन कल फिर क्रोध आता है।
नहींक्रोध से कोई अड़चन न थी। अड़चन हुई थी कोई और बात से। यह कभी सोचा ही नहीं था कि मैं और क्रोध कर सकता हूं! तो जब पछता लेते हैंतब आपकी अच्छी प्रतिमाआपका अहंकार फिर सिंहासन पर विराजमान हो जाता है।
वह कहता हैदेखो माफी मांग लीक्षमा मांग ली। विनम्र आदमी हूं। समय नेपरिस्थिति नेअवसर नेमूड नहीं थाभूखा थादफ्तर से नाराज लौटा थाअसफल थाकुछ काम में गड़बड़ हो गई थी--परिस्थितिजन्य था। मेरे भीतर से नहीं आया था क्रोध। मैंने तो क्षमा मांग ली है। जैसे ही होश आयाजैसे ही मैं लौटामैंने क्षमा मांग ली है। आप अपनी प्रतिमा को फिर सजा-संवारकरफिर गहने-आभूषण पहनाकर सिंहासन पर विराजमान कर दिए। क्रोध के पहले भी यह प्रतिमा सिंहासन पर बैठी थीक्रोध में नीचे लुढ़क गई थीफिर बिठा दिया। अब आप फिर पूर्ववत पुरानी जगह आ गएकल फिर क्रोध करेंगे। पूर्ववत अपनी जगह आ गए। क्रोध के पहले भी यहीं थेक्रोध के बाद भी यहीं आ गए। जो पश्चात्ताप हैवह इस प्रतिमा की पुनर्स्थापना है।
लेकिन ऐसा लगता हैक्षमा मांगता आदमी बड़ा विनम्र है। सब दिखावे सच नहीं हैं। सच बहुत गहरे हैं और अक्सर उलटे हैं। वह आदमी आपसे क्षमा नहीं मांग रहा है। वह आदमी अपने ही सामने निंदित हो गया है। उस निंदा को झाड़ रहा हैपोंछ रहा हैबुहार रहा है। वह फिर साफ-सुथरास्नान करके फिर खड़ा हो रहा है।
यह जो अर्जुन कह रहा है कि पूज्य हैं उस तरफउन्हें मैं कैसे मारूंएम्फेसिस यहां उनके पूज्य होने पर नहीं है। एम्फेसिस यहां अर्जुन के मैं पर है कि मैं कैसे मारूंनहीं-नहींयह अपने मैं की प्रतिमा खंडित करने सेकि लोक-लोकांतर में लोग कहें कि अपने ही गुरु पर आक्रमण कियाकि अपने ही पूज्यों को माराइससे तो बेहतर है मधुसूदन कि मैं ही मर जाऊं। लेकिन लोग कहें कि मर गया अर्जुनलेकिन पूज्यों पर हाथ न उठाया। मर गयामिट गया,लेकिन गुरु पर हाथ न उठाया।
उसके मैं को पकड़ लेने की जरूरत है। अभी उसकी पकड़ में नहीं है। किसी की पकड़ में नहीं होता है। जिसका मैं अपनी ही पकड़ में आ जाएवह मैं के बाहर हो जाता है। हम अपने मैं को बचा-बचाकर जीते हैं। वह दूसरी-दूसरी बातें करता जाएगा। वह सब्स्टीटयूट खोजता चला जाएगा। कभी कहेगा यहकभी कहेगा वह। सिर्फ उस बिंदु को छोड़ता जाएगाजो है। कृष्ण ने छूना चाहा थावह उस बात को छोड़ गया है। अनार्य-आर्य की बात वह नहीं उठाता। कातरता की बात वह नहीं उठाता। लोक में यशपरलोक में भटकावउसकी बात वह नहीं उठातावह दूसरी बात उठाता है। जैसे उसने कृष्ण को सुना ही नहीं। उसके वचन कह रहे हैं कि बीच में जो कृष्ण ने बोला हैअर्जुन ने नहीं सुना।
सभी बातें जो बोली जाती हैंहम सुनते नहीं। हम वही सुन लेते हैंजो हम सुनना चाहते हैं। सभी जो दिखाई पड़ता हैवह हम देखते नहीं। हम वही देख लेते हैंजो हम देखना चाहते हैं। सभी जो हम पढ़ते हैंवह पढ़ा नहीं जाताहम वही पढ़ लेते हैंजो हम पढ़ना चाहते हैं। हमारा देखनासुननापढ़नासब सिलेक्टिव हैउसमें चुनाव है। हम पूरे वक्त वह छांट रहे हैंजो हम नहीं देखना चाहते।
एक नया मनोविज्ञान हैगेस्टाल्ट। यह जो अर्जुन ने उत्तर दिया वापसयह गेस्टाल्ट का अदभुत प्रमाण है। गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिक कहते हैंआकाश में बादल घिरे होंतो हर आदमी उनमें अलग-अलग चीजें देखता है। डरा हुआ आदमी भूत-प्रेत देख लेता हैधार्मिक आदमी भगवान की प्रतिमा देख लेता हैफिल्मी दिमाग का आदमी अभिनेता-अभिनेत्रियां देख लेता है। वह एक ही बादल आकाश में हैअपना-अपना देखना हो जाता है।
प्रत्येक आदमी अपनी ही निर्मित दुनिया में जीता है। और हम अपनी दुनिया में...इसलिए इस पृथ्वी पर एक दुनिया की भ्रांति में मत रहना आप। इस दुनिया में जितने आदमी हैंकम से कम उतनी दुनियाएं हैं। अगर साढ़े तीन अरब आदमी हैं आज पृथ्वी परतो पृथ्वी पर साढ़े तीन अरब दुनियाएं हैं। और एक आदमी भी पूरी जिंदगी एक दुनिया में रहता होऐसा मत सोच लेना। उसकी दुनिया भी रोज बदलती चली जाती है।
पर्ल बक ने एक किताब अपनी आत्मकथा की लिखी हैतो नाम दिया हैमाई सेवरल वर्ल्ड्समेरे अनेक संसार।
अब एक आदमी के अनेक संसार कैसे होंगेरोज बदल रहा है। और प्रत्येक व्यक्ति अपनी दुनिया के आस पास बाड़ेदरवाजेसंतरीपहरेदार खड़े रखता है। और वह कहता हैइन-इन को भीतर आने देनाइन-इन को बाहर से ही कह देना कि घर पर नहीं हैं। यह हम लोगों के साथ ही नहीं करतेसूचनाओं के साथ भी करते हैं।
अब अर्जुन ने बिलकुल नहीं सुना हैकृष्ण ने जो कहावह बिलकुल नहीं सुना है। वह जो उत्तर दे रहा हैवह बताता है कि वह इररेलेवेंट हैउसकी कोई संगति नहीं है।
हम भी नहीं सुनते। दो आदमी बात करते हैंअगर आप चुपचाप साक्षी बनकर खड़े हो जाएं तो बड़े हैरान होंगे। लेकिन साक्षी बनकर खड़ा होना मुश्किल है। क्योंकि पता नहीं चलेगा और आप भी तीसरे आदमी भागीदार हो जाएंगे बातचीत में। अगर आप दो आदमियों की साक्षी बनकर बात सुनें तो बहुत हैरान होंगे कि ये एक-दूसरे से बात कर रहे हैं या अपने-अपने से बात कर रहे हैं! एक आदमी जो कह रहा हैदूसरा जो कहता है उससे उसका कोई भी संबंध नहीं है।
जुंग ने एक संस्मरण लिखा है कि दो पागल प्रोफेसर उसके पागलखाने में भर्ती हुए इलाज के लिए। ऐसे भी प्रोफेसरों के पागल होने की संभावना ज्यादा है। या यह भी हो सकता है कि पागल आदमी प्रोफेसर होने को उत्सुक रहते हैं। वे दोनों पागल हो गए हैं। साधारण पागल नहीं हैं। साधारण पागल डर जाता हैभयभीत हो जाता है। प्रोफेसर पागल हैं। पागल होकर वे और भी बुद्धिमान हो गए हैं। जब तक जागे रहते हैंघनघोर चर्चा चलती रहती है। जुंग खिड़की से छिपकर सुनता है कि उनमें क्या बात होती है!
बातें बड़ी अदभुत होती हैंबड़ी गहराई की होती हैं। दोनों इन्फार्म्ड हैंउन दोनों ने बहुत पढ़ा-लिखासुना-समझा है। कम उनकी जानकारी नहीं हैशायद वही उनके पागलपन का कारण है। जानकारी ज्यादा हो और ज्ञान कम होतो भी आदमी पागल हो सकता है। और ज्ञान तो होता नहींजानकारी ही ज्यादा हो जाती हैफिर वह बोझ हो जाती है।
चकित है जुंगउनकी जानकारी देखकर। वे जिन विषयों पर चर्चा करते हैंवे बड़े गहरे और नाजुक हैं। लेकिन इससे भी चकित ज्यादा दूसरी बात पर हैऔर वह यह कि जो एक बोलता हैउसका दूसरे से कोई संबंध ही नहीं होता। लेकिन यह तो पागल के लिए बिलकुल स्वाभाविक है। इससे भी ज्यादा चकित इस बात पर है कि जब एक बोलता है तो दूसरा चुप रहता है। और ऐसा लगता है कि सुन रहा है। और जैसे ही वह बंद करता है कि दूसरा जो बोलता है तो उसे सुनकर लगता है कि उसने उसे बिलकुल नहीं सुना। क्योंकि अगर वह आकाश की बात कर रहा था,तो वह पाताल की शुरू करता है। उसमें कोई संबंध ही नहीं होता।
तब वह अंदर गया और उसने जाकर पूछा कि और सब तो मेरी समझ में आ गयाआप गहरी बातें कर रहे हैं,वह समझ में आ गया। समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब एक बोलता हैतो दूसरा चुप क्यों हो जाता है! तो वे दोनों हंसने लगे और उन्होंने कहा कि क्या तुम हमें पागल समझते हो?
इस दुनिया में पागल भर अपने को कभी पागल नहीं समझते। और जो आदमी अपने को पागल समझता हो,समझना चाहिएवह पागल होने के ऊपर उठने लगा।
क्या तुम हमें पागल समझते होउन दोनों ने कहा। नहींजुंग ने कहाऐसी भूल मैं कैसे कर सकता हूं! पागल बिलकुल आपको नहीं समझता हूं। पर यही मैं पूछ रहा हूं कि जब एक बोलता हैतो दूसरा चुप क्यों रह जाता है! तो उन्होंने कहाक्या तुम समझते हो कि हमें कनवर्सेशन का नियम भी मालूम नहींबातचीत करने की व्यवस्था भी मालूम नहींहमें मालूम है कि जब एक बोले तो दूसरे को चुप रहना चाहिए। जुंग ने कहाजब तुम्हें इतना मालूम है,तो मैं यह और पूछना चाहता हूं कि जो एक बोलता हैउससे दूसरे के बोलने का कभी कोई संबंध ही नहीं होता! दोनों फिर हंसने लगे। उन्होंने कहाखैरहम तो पागल समझे जाते हैंलेकिन इस जमीन पर जहां भी लोग बोलते हैं दो,उनकी बातों में कोई संबंध होता हैजुंग घबड़ाकर वापस लौट आया। उसने अपने संस्मरण में लिखा है कि उस दिन से मैं भी सोचता हूं जब किसी से बात करता हूं--संबंध है!
थोड़ा संबंध हम बना लेते हैं। जब आपसे मैं बात कर रहा हूंअगर हम पागल नहीं हैं--जिसकी कि संभावना बहुत कम है--तो जब आप बोल रहे हैंतब मैं अपने भीतर बोले चला जाता हूं। जैसे ही आप चुप होते हैंमैं बोलना शुरू करता हूं। मैं जो बोलना शुरू करता हूंउसका संबंध मेरे भीतर जो मैं बोल रहा थाउससे होता हैआपसे नहीं होता। हांइतना संबंध हो सकता है जैसा खूंटी और कोट का होता हैकि आपकी बात में से कोई एक बात पकड़ लूं,खूंटी बना लूंऔर मेरे भीतर जो चल रहा थाउसको उस पर टांग दूं। बसइतना ही संबंध होता है।
अर्जुन और कृष्ण की चर्चा में यह मौका बार-बार आएगाइसलिए मैंने इसे ठीक से आपसे कह देना चाहा। अर्जुन ने बिलकुल नहीं सुना कि कृष्ण ने क्या कहा है। नहीं कहा होताऐसी ही स्थिति है। वह अपने भीतर की ही सुने चला जा रहा है। वह कह रहा हैये पूज्यये द्रोणये भीष्म...। वह यह सोच रहा होगा भीतर। इधर कृष्ण क्या बोल रहे हैंवे जो बोल रहे हैंवह परिधि के बाहर हो रहा है। उसके भीतर जो चल रहा हैवह यह चल रहा है। वह कृष्ण से कहता है कि मधुसूदनये पूज्यये प्रियइन्हें मैं मार सकता हूंमैं अर्जुन। इसे ध्यान रखना। उसने कृष्ण की बात नहीं सुनी।

प्रश्न: भगवान श्रीआपने बताया कि प्रोफेसर पागल होते हैं। तो आप पहले दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक थेअब आप आचार्य बन गए हैं। तो हमको आप उपलब्ध हुए हैंयह हमारा सौभाग्य है। आपने अभी एक बात बताई ईगो के बारे में। तो एक प्रश्न यह उठता है कि ईगो के बिना तो प्रोजेक्शन होता ही नहीं। और साइकोलाजिस्ट जो हैं--आप तो आत्म-संश्लेषक हैं--मगर साइकोलाजिस्ट तो यह कहते हैं कि ईगो फुलफिलमेंट के बिना व्यक्तित्व का पूर्णतया विकास नहीं होता। और आप अहं-शून्यता की बात करते हैंतो क्या ईगो को एनाइलेट करने का आप सूचन दे रहे हैं?


एक तो मैंने कहा कि प्रोफेसर के पागल होने की संभावना ज्यादा होती है। पागल हो ही जाता हैऐसा नहीं कहा। और दूसरा यह भी नहीं कहा है कि सभी पागल प्रोफेसर होते हैं। ऐसा भी नहीं कहा हैसंभावना ज्यादा होती है। असल में जहां भी तथाकथित ज्ञान का भार ज्यादा होबर्डन होवहीं चित्त विक्षिप्त हो सकता है। ज्ञान तो चित्त को मुक्त करता हैज्ञान का भार विक्षिप्त करता है। और ज्ञानजो मुक्त करता हैवह स्वयं से आता है। और ज्ञानजो विक्षिप्त कर देता हैवह स्वयं से कभी नहीं आतावह सदा पर से आता है।
दूसरी बात पूछी है कि मनोवैज्ञानिक तो अहंकार को विकसित करने की बात करते हैं। मैं तो अहंकार को शून्य करने की बात करता हूं। मनोवैज्ञानिक निश्चित ही अहंकार को विकसित करने की बात करेंगे। सभी मनोवैज्ञानिक नहीं;बुद्ध नहीं करेंगेकृष्ण नहीं करेंगेमहावीर नहीं करेंगे। फ्रायड करेगाएरिक्सन करेगा। करेगाउसका कारण है। क्योंकि फ्रायड या एरिक्सन के लिए अहंकार से ऊपर कोई और सत्य नहीं है। तो जो आखिरी सत्य हैउसको विकसित किया जाना चाहिए। महावीरबुद्ध या कृष्ण के लिए अहंकार आखिरी सत्य नहीं हैकेवल बीच की सीढ़ी है। निरहंकार आखिरी सत्य है। अहंकार नहींब्रह्म आखिरी सत्य है। अहंकार सिर्फ सीढ़ी है।
इसलिए बुद्ध या महावीर या कृष्ण कहेंगेअहंकार को विकसित भी करो और विसर्जित भी करो। सीढ़ी पर चढ़ो भी और सीढ़ी को छोड़ो भी। आओ भी उस परजाओ भी उस पर से। उठो भी उस तकपार भी हो जाओ। चूंकि मन के पार भी सत्ता हैइसलिए मन का जो आखिरी सत्य है--अहंकार--वह पार की सत्ता के लिए छोड़ने का पहला कदम होगा। अगर मैं अपने घर से आपके घर में आना चाहूंतो मेरे घर की आखिरी दीवार छोड़ना ही आपके घर में प्रवेश का पहला कदम होगा। मन की आखिरी सीमा अहंकार है। अहंकार से ऊपर मन नहीं जा सकता।
चूंकि पश्चिम का मनोविज्ञान मन को आखिरी सत्य समझ रहा हैइसलिए अहंकार के विकास की बात उचित है। उचित कह रहा हूंसत्य नहीं। सीमा के भीतर बिलकुल ठीक है बात। लेकिन जिस दिन पश्चिम के मनस-शास्त्र को एहसास होगाऔर एहसास होना शुरू हो गया है। जुंग के साथ दीवार टूटनी शुरू हो गई है। और अनुभव होने लगा है कि अहंकार के पार भी कुछ है।
लेकिन अभी भी अहंकार के पार का जो अनुभव हो रहा है पश्चिम के मनोविज्ञान कोवह अहंकार के नीचे हो रहा है--बिलो ईगोबियांड ईगो नहीं हो रहा है। अहंकार के पार भी कुछ है--मतलब अचेतनचेतन से भी नीचे--अति चेतन नहींसुपर कांशस नहींचेतन के भी आगे नहीं। लेकिन यह बड़ी शुभ घड़ी है। अहंकार के पार तो कम से कम कुछ हैनीचे ही सही। और अगर नीचे है तो ऊपर होने की बाधा कम हो जाती है। और अगर हम अहंकार के पार नीचे भी कुछ स्वीकार करते हैंतो आज नहीं कल ऊपर भी स्वीकार करने की सुविधा बनती है।
मनोविज्ञान तो कहेगाअहंकार को ठीक से इंटिग्रेटेडक्रिस्टलाइज्डअहंकार को ठीक शुद्धसाफसंश्लिष्ट हो जाना चाहिए। यही इंडिविजुएशन हैयही व्यक्तित्व है। कृष्ण नहीं कहेंगे। कृष्ण कहेंगेउसके आगे एक कदम और है। संश्लिष्टएकाग्र हुए अहंकार को किसी दिन समर्पित हो जाना चाहिएसरेंडर्ड हो जाना चाहिए। वह आखिरी कदम है अहंकार की तरफ से। लेकिन ब्रह्म की तरफ वह पहला कदम है।
निश्चित ही बूंद अपने को खो दे सागर मेंतो सागर हो सकती है। और अहंकार अपने को खो दे सागर मेंतो ब्रह्म हो सकता है। लेकिन खोने के पहले होना तो चाहिएबूंद भी होनी तो चाहिए। अगर बूंद ही न होभाप होतो सागर में खोना मुश्किल है। अगर कोई भाप की बूंद उड़ रही होतो उससे हम पहले कहेंगेबूंद बन जाओ। फिर बूंद बन जाने पर कहेंगे कि जाओसागर में कूद जाओ। क्योंकि भाप सीधी सागर में नहीं कूद सकतीकितना ही उपाय करेआकाश की तरफ उड़ेगीसागर में कूद नहीं सकती। बूंद कूद सकती है।
तो पश्चिम का मनोविज्ञान बूंद बनाने तक हैकृष्ण का मनोविज्ञान सागर बनाने तक है। लेकिन पश्चिम के मनोविज्ञान से गुजरना पड़ेगा। जो अभी भाप हैंउनको फ्रायड और जुंग के पास से गुजरना पड़ेगातभी वे कृष्ण के पास पहुंच सकते हैं। लेकिन बहुत से भाप के कण सीधे ही कृष्ण तक पहुंचना चाहते हैंवे मुश्किल में पड़ जाते हैं। बीच में फ्रायड है हीउससे बचा नहीं जा सकता। अंत वह नहीं हैलेकिन प्रारंभ वह जरूर है।
कृष्ण का मनोविज्ञान चरम मनोविज्ञान हैदि सुप्रीम। जहां से मन समाप्त होता हैवहां है वह। वह लास्ट बैरियर पर है। और फ्रायड और एडलर मन की पहली सीमा की चर्चा कर रहे हैं। यह अगर खयाल में रहेतो कठिनाई नहीं होगी।
मैं भी कहूंगाअहंकार को संश्लिष्ट करेंताकि एक दिन समर्पित कर सकें। क्योंकि समर्पित वही कर सकेगा जो संश्लिष्ट है। जिसके अपने ही अहंकार के पच्चीस खंड हैंजो स्किजोफ्रैनिक हैजिसके भीतर एक मैं भी नहीं हैकई मैं हैं--वह समर्पण करने कैसे जाएगाएक मैं को समर्पण करेगादूसरा कहेगारहने दोवापस आ जाओ।
हम अभी ऐसे ही हैं। मनोविज्ञान की समस्त खोजें कहती हैंहम पोलीसाइकिक हैं। हमारे भीतर एक मैं भी नहीं हैबहुत मैं हैंअनेक मैं हैं। रात एक मैं कहता है कि सुबह पांच बजे उठेंगेकसम खा लेता है। सुबह पांच बजे दूसरा मैं कहता हैसर्दी बहुत है। छोड़ोकहां की बातों में पड़े हो! फिर कल देखेंगे। करवट लेकर सो जाता है। सुबह सात बजे तीसरा मैं कहता है कि बड़ी भूल की। शाम को तय किया थापांच बजे सुबह बदले क्योंबड़ा पश्चात्ताप करता है। आप एक ही आदमी पांच बजे तय किए थेतो सुबह किस आदमी ने आपसे कहा कि सो जाओ! आपके भीतर ही कोई बोल रहा हैबाहर कोई नहीं बोल रहा है। और जब सो ही गए थे पांच बजेतो सुबह सात बजे पश्चात्ताप क्यों कर रहे हैंआप ही सोए थेकिसी ने कहा नहीं था। अब यह पश्चात्ताप कौन कर रहा है?
सामान्यतः हमें खयाल आता है कि मैं एक मैं हूंइससे बड़ा कनफ्यूजन पैदा होता है। हमारे भीतर बहुत मैं हैं। एक मैं कह देता है उठेंगेदूसरा मैं कहता है नहीं उठतेतीसरा मैं कहता है पश्चात्ताप करेंगे। चौथा मैं सब भूल जाता हैकोई याद ही नहीं रखता इन सब बातों की। और ऐसे ही जिंदगी चलती चली जाती है।
मनोविज्ञान कहता हैपहले मैं को एक करो।
एक मैं हो तो समर्पण हो सकता है। पच्चीस स्वर हों तो समर्पण कैसे होगा! इसलिए भगवान के सामने एक मैं तो झुक जाता है चरणों मेंदूसरा मैं अकड़कर खड़ा रहता हैवहीं मंदिर में। एक मैं तो चरणों में सिर रखे पड़ा रहता हैदूसरा देखता रहता है कि मंदिर में कोई देखने वाला आया कि नहीं आया। एक ही आदमी खड़ा हैपर दो मैं हैं। एक वहां चरणों में सिर रखे हैदूसरा झांककर देख रहा है कि लोग देख रहे हैं कि नहीं देख रहे हैं! अब समर्पण कर रहे होतो लोगों सेदेखने वालों से क्या लेना-देना है! एक मैं नीचे चरणों में पड़ा हैदूसरा मैं कह रहा हैकहां के खेल में पड़े हो! सब बेकार है। कहीं कोई भगवान नहीं है। एक मैं इधर भगवान के चरण पकड़े हुए हैदूसरा मैं दुकान पर बैठा हुआ काम में लगा है।
मैं संश्लिष्ट होना चाहिएतभी समर्पण हो सकता है। इसलिए मैं इनमें विरोध नहीं देखता। मैं इनमें विकास देखता हूं। फ्रायड अंत नहीं हैलेकिन महत्वपूर्ण है और मैं संश्लिष्ट करने में उपयोगी है। कृष्ण अंत हैं। वहां एक सीमा पर जाकर मैं को समर्पित भी कर देना है।


गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव
भुग्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान्।। ५।।
महानुभाव गुरुजनों को न मारकरइस लोक में भिक्षा का अन्न भी भोगना कल्याणकारक समझता हूंक्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूंगा।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।। ६।।
हम लोग यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या करना श्रेष्ठ हैअथवा यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर जीना भी नहीं चाहतेवे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़े हैं।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छे्रयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।। ७।।
इसलिए कायरतारूप दोष करके उपहत हुए स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहितचित्त हुआ मैं आपको पूछता हूंजो कुछ निश्चय किया हुआ कल्याणकारक साधन होवह मेरे लिए कहिएक्योंकि मैं आपका शिष्य हूं,इसलिए आपके शरण हुए मेरे को शिक्षा दीजिए।


अर्जुन अपनी ही बात कहे चला जाता है। पूछता मालूम पड़ता है कृष्ण सेलेकिन वस्तुतः कृष्ण को ही धर्म क्या हैबताए चला जाता है। पूछ रहा है कि अविद्या से मेरा मन भर गया है। क्या उचित हैक्या अनुचित हैउसका मेरा बोध खो गया है। लेकिन साथ ही कहे चला जा रहा है कि अपनों को मारकर तो जो अन्न भी खाऊंगावह रक्त से भरा हुआ होगा। अपनों को मारकर सम्राट बन जाने से तो बेहतर है कि मैं सड़क का भिखारी हो जाऊं। निर्णय दिए चला जा रहा है। निर्णय दिए चला जा रहा है और कह रहा हैअविद्या से मेरा मन भर गया है। दोनों बातों में कोई संगति नहीं है। अविद्या से मन भर गया हैतो अर्जुन के पास कहने को कुछ भी नहीं होना चाहिए। इतना ही काफी है कि अविद्या से मेरा मन भर गया हैमुझे मार्ग बताएं। मैं नहीं जानताक्या ठीक हैक्या गलत है। नहींलेकिन साथ ही वह कहता है कि यह ठीक है और यह गलत है।
चित्त हमारा कितना ही कहे कि अविद्या से भर गयाअहंकार मानने को राजी नहीं होता। अहंकार कहता हैमैं और अविद्या से भर गया! मुझे पता है कि धर्म क्या है और अधर्म क्या है।
दूसरी बात यह भी देख लेने जैसी है कि अहंकार जहां भी होता हैवहां सदा अतियों का चुनाव करता है,एक्सट्रीम इज़ दि च्वाइस। एक अति से ठीक दूसरी अति को चुनता है। अहंकार कभी मध्य में खड़ा नहीं होताखड़ा नहीं हो सकताक्योंकि ठीक मध्य में अहंकार की मृत्यु है। तो वह कहता हैसम्राट होने से तो भिखारी होना बेहतर है। दो आखिरी पोलेरिटी चुनता है। वह कहता हैसम्राट होने से तो भिखारी होना बेहतर है। अर्जुन या तो सम्राट हो सकता है या भिखारी हो सकता हैबीच में कहीं नहीं हो सकता। या तो उस छोर पर नंबर एक या इस छोर पर नंबर एकलेकिन नंबर एक ही हो सकता है।
यह थोड़ा ध्यान रखने जैसा है। बर्नार्ड शा ने कभी कहा कि अगर मुझे स्वर्ग भी मिले और नंबर दो होना पड़े,तो मैं इनकार करता हूं। मैं नर्क में ही रहना पसंद कर लूंगालेकिन नंबर एक होना चाहिए। नंबर एक होना चाहिए,नर्क भी पसंद कर लूंगा। नंबर दो भी अगर हो जाता हूंतो स्वर्ग मुझे नहीं चाहिए। क्या मजा होगा उस स्वर्ग में जिसमें नंबर दो हो गए! नर्क में भी मजा हो सकता हैअगर नंबर एक...। इसलिए नंबर एक होने वाले लोग अगर सब नर्क में इकट्ठे हो जाते हों तो बहुत हैरानी नहीं है। दिल्ली से नर्क का रास्ता एकदम करीब है। दिल्ली से गए कि नर्क में गए। वहां बीच में गैप भी नहीं है। वह जो नंबर एक होने के लिए पीड़ित हैअगर उससे सम्राट होना छूटता हो तो वह तत्काल जो दूसरा विकल्प हैवह भिखारी होने का है।
यह विकल्प भी देखना जरूरी हैक्योंकि यह विकल्प सिर्फ अहंकार ही चुनता है। यह विकल्प--एक्सट्रीमअति का विकल्प--सदा अहंकार ही चुनता है। क्योंकि अहंकार को इससे मतलब नहीं है कि सम्राट बनो कि भिखारी बनो;मतलब इससे है कि नंबर एक!
अर्जुन कह रहा है कि इससे तो बेहतर है कि मैं भिखारी ही हो जाऊंसड़क पर भीख मांगूं। ऊपर से दिखाई पड़ता है कि बड़ी विनम्रता की बात कह रहा है। सम्राट होना छोड़कर भीख मांगने की बात कह रहा है। लेकिन भीतर से बहुत फर्क नहीं है। भीतर बात वही है। भीतर बात वही हैअति पर होने की बात अहंकार की इच्छा है। आखिरी पोल परध्रुव पर खड़े होने की इच्छा अहंकार की इच्छा है। या तो इस कोने या उस कोनेमध्य उसके लिए नहीं है।
बुद्ध के मनोविज्ञान का नाम मध्यमार्ग हैदि मिडल वे। और जब बुद्ध से किसी ने पूछा कि आप अपने मार्ग को मज्झिम निकाय--बीच का मार्ग--क्यों कहते हैंतो बुद्ध ने कहाजो दो अतियों के बिलकुल बीच में खड़ा हो जाए,वही केवल अहंकार से मुक्त हो सकता हैअन्यथा मुक्त नहीं हो सकता।
एक छोटी-सी घटना बुद्ध के जीवन के साथ जुड़ी है। एक गांव में बुद्ध आए हैं। सम्राट दीक्षित होने आ गया। और उस सम्राट ने कहा कि मुझे भी दीक्षा दे दें। बुद्ध के भिक्षुओं ने बुद्ध के कान में कहासावधानी से देना इसे आप। क्योंकि हमने जो इसके संबंध में सुना हैवह बिलकुल विपरीत है। यह आदमी कभी रथ से नीचे नंगे पैर भी नहीं चला है। यह आदमी अपने महल मेंजो भी संभव हैसारे भोग के साधनों में डूबा पड़ा है। यह अपनी सीढ़ियां भी चढ़ता है तो सीढ़ियों के किनारे रेलिंग की जगह नंगी स्त्रियों को खड़ा रखता हैउनके कंधों पर हाथ रखकर चढ़ता है। जरा इससे सावधान रहना। शराब और स्त्री के अतिरिक्त इसकी जिंदगी में कभी कुछ नहीं आया है। और यह आज अचानक भिक्षु होने और त्यागी बननेतपश्चर्या का व्रत लेने आया है। यह आदमी बीच में धोखा न दे जाए।
बुद्ध ने कहाजहां तक मैं आदमियों को जानता हूंयह आदमी धोखा न देगा। यह एक अति से ऊब गयाअब दूसरी अति पर जा रहा है। एक एक्सट्रीम से ऊब गया और अब दूसरे एक्सट्रीम पर जा रहा है। पर उन्होंने कहाहमें संदेह होता हैक्योंकि यह कल तक बिलकुल और था। बुद्ध ने कहामुझे संदेह नहीं होता है। इस तरह के लोग अक्सर ही अतियों में चुनाव करते हैं। भय मत करो। उन्होंने कहाहमें नहीं लगता है कि यह भीख मांग सकेगासड़क पर नंगे पैर चल सकेगाधूप-छांव सह सकेगाहमें नहीं दिखाई पड़ता। बुद्ध ने कहायह तुम से ज्यादा सह सकेगा। हंसे वे सब। उन्होंने कहा कि इस मामले में कम से कम बुद्ध निश्चित ही गलत हो जाने वाले हैं।
लेकिन नहींबुद्ध गलत नहीं हुए। दूसरे ही दिन से देखा गया कि भिक्षु अगर रास्ते पर चलतेतो रास्ते के नीचे चलता वह सम्राट जहां कांटे होते। और भिक्षु अगर वृक्ष की छाया में बैठतेतो वह सम्राट धूप में खड़ा रहता। और भिक्षु अगर दिन में एक बार भोजन करतेतो वह सम्राट दो दिन में एक बार भोजन करता।
छह महीने में वह सूखकर काला पड़ गया। अति सुंदर उसकी काया थी। भूख से हड्डियां उसकी बाहर निकल आईं। पैरों में घाव बन गए। बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से पूछा कि कहोतुम कहते थे कि यह आदमी भरोसे का नहीं,और मैंने तुमसे कहा था कि यह आदमी बहुत भरोसे का हैयह आदमी तुमसे आगे तपश्चर्या कर लेगा। परवे भिक्षु कहने लगेहम हैरान हैं कि आप कैसे पहचाने!
बुद्ध ने कहाअहंकार सदा एक अति से दूसरी अति चुन लेता है। बीच में नहीं रुक सकता। यह सम्राटों में सम्राट थायह भिक्षुओं में भिक्षु है। यह सम्राटों में नंबर एक सम्राट था। इसने सारी सुंदर स्त्रियां राज्य की इकट्ठी कर रखी थीं। इसने सारे हीरे-जवाहरात अपने महल के रास्तों पर जड़ रखे थे। अब यह भिक्षुओं में साधारण भिक्षु नहीं है। यह भिक्षुओं में असाधारण भिक्षु है। तुम चलते हो सीधे रास्ते परयह चलता है तिरछे रास्ते पर। तुम कांटे बचाकर चलते होयह कांटे देखकर चलता है कि कहां-कहां हैं। तुम छाया में बैठते होयह धूप में खड़ा होता है। यह नंबर एक रहेगायह कहीं भी रहे। यह नंबर एक होना नहीं छोड़ सकतायह तुम्हें मात करके रहेगा। इसने सम्राटों को मात कियातुम भिखारियों को कैसे मात नहीं करेगा! अहंकार अति चुनता है।
अर्जुन कह रहा है कि छोड़ दूं सब साम्राज्यकुछ अर्थ नहीं। भिक्षा मांग लेंगे। मांग सकता हैबिलकुल मांग सकता है। अहंकार की वहां भी तृप्ति हो सकती है। मध्य में नहीं रुक सकता। अति से अति पर जा सकता है। अति से अति पर जाने में कोई रूपांतरणकोई ट्रांसफार्मेशन नहीं है।
फिर बुद्ध एक दिन उस सम्राट के पास गए सांझ को। रुग्णबीमारवह राह के किनारे पड़ा था। बुद्ध ने उससे कहामैं एक बात पूछने आया हूं। मैंने सुना है कि तुम जब सम्राट थेतो वीणा बजाने में बहुत कुशल थे। मैं तुमसे पूछने आया हूं कि वीणा के तार अगर बहुत कसे होंतो संगीत पैदा होता हैउसने कहाकैसे पैदा होगा! तार टूट जाते हैं। और बुद्ध ने कहाबहुत ढीले हों तारतब संगीत पैदा होता हैउस सम्राट ने कहा कि नहींबहुत ढीले हों तो टंकार ही पैदा नहीं होती संगीत कैसे पैदा होगाबुद्ध ने कहाअब मैं जाऊं। एक बात और तुमसे कह जाऊं कि जो वीणा के तारों का नियम है--न बहुत ढीलेन बहुत कसेअर्थात न कसे न ढीलेबीच में कहींजहां न तो कहा जा सके कि तार कसे हैंन कहा जा सके कि तार ढीले हैं--ठीक मध्य में जब तार होते हैंतभी संगीत पैदा होता है। जीवन की वीणा का भी नियम यही है।
काश! अर्जुन बीच की बात करतातो कृष्ण कहतेजाओबात समाप्त हो गईकोई अर्थ न रहा। लेकिन वह बीच की बात नहीं कर रहा है। वह एक अति से दूसरी अति की बात कर रहा है। दूसरी अति पर अहंकार फिर अपने को भर लेता है।


प्रश्न: भगवान श्रीयहां पर एक मुद्दे का प्रश्न आ गया है श्रोतागणों से। पूछते हैं कि कोर्ट में सब से पहले गीता पर क्यों हाथ रखवाते हैंकोर्ट में रामायण या उपनिषद क्यों नहीं रखतेक्या गीता में एक श्रद्धा है या सिर्फ अंधश्रद्धा है?


पूछा है कि अदालत में शपथ लेते वक्त गीता पर हाथ क्यों रखवाते हैंरामायण पर क्यों नहीं रखवा लेते?उपनिषद पर क्यों नहीं रखवा लेतेबड़ा कारण है। पता नहीं अदालत को पता है या नहींलेकिन कारण हैकारण बड़ा है।
रामकितने ही बड़े होंलेकिन इस मुल्क के चित्त में वे पूर्ण अवतार की तरह नहीं हैंअंश है उनका अवतार। उपनिषद के ऋषि कितने ही बड़े ज्ञानी होंलेकिन अवतार नहीं हैं। कृष्ण पूर्ण अवतार हैं। परमात्मा अगर पूरा पृथ्वी पर उतरेतो करीब-करीब कृष्ण जैसा होगा। इसलिए कृष्ण इस मुल्क के अधिकतम मन को छू पाए हैंबहुत कारणों से। एक तो पूर्ण अवतार का अर्थ होता हैमल्टी डायमेंशनलबहुआयामीजो मनुष्य के समस्त व्यक्तित्व को स्पर्श करता हो। राम वन डायमेंशनल हैं।
हर्बर्ट मारक्यूस ने एक किताब लिखी हैवन डायमेंशनल मैनएक आयामी मनुष्य। राम वन डायमेंशनल हैं,एक आयामी हैंएकसुरे हैंएक ही स्वर है उनमें। स्वभावतः एक ही स्वर का आदमी सिर्फ उस एकसुरे आदमियों के लिए प्रीतिकर हो सकता हैसबके लिए प्रीतिकर नहीं हो सकता। महावीर और बुद्ध सभी एकसुरे हैं। एक ही स्वर है उनका। इसलिए समस्त मनुष्यों के लिए महावीर और बुद्ध प्रीतिकर नहीं हो सकते। हांमनुष्यों का एक वर्ग होगाजो बुद्ध के लिए दीवाना हो जाएजो महावीर के लिए पागल हो जाए। लेकिन एक वर्ग ही होगासभी मनुष्य नहीं हो सकते।
लेकिन कृष्ण मल्टी डायमेंशनल हैं। ऐसा आदमी जमीन पर खोजना कठिन हैजो कृष्ण में प्रेम करने योग्य तत्व न पा ले। चोर भी कृष्ण को प्रेम कर सकता है। नाचने वाला भी प्रेम कर सकता है। साधु भी प्रेम कर सकता है;असाधु भी प्रेम कर सकता है। युद्ध के क्षेत्र में लड़ने वाला भी प्रेम कर सकता हैगोपियों के साथ नृत्य करने वाला भी प्रेम कर सकता है। कृष्ण एक आर्केस्ट्रा हैं। बहुत वाद्य हैंसब बज रहे हैं। जिसे जो वाद्य पसंद होवह अपने वाद्य को तो प्रेम कर ही सकता है। और इसलिए पूरे कृष्ण को प्रेम करने वाले आदमी पैदा नहीं हो सके। जिन्होंने भी प्रेम किया हैउन्होंने कृष्ण में चुनाव किया है।
सूरदास तो बालकृष्ण को प्रेम करते हैंगोपियों से वे बहुत डरते हैं। इसलिए बालकृष्ण को प्रेम करते हैं। क्योंकि बालकृष्ण उन्हें जमते हैं कि बिलकुल ठीक हैं। ठीक है कि बालक हैतो चलेगा। जवान कृष्ण से सूरदास को डर लगता हैक्योंकि जवान सूरदास से सूरदास को डर लगा है। तो अपना चुनाव है उनका। वह अपना चुनाव कर लेंगे।
अब अगर केशवदास को कृष्ण को प्रेम करना हैतो बालकृष्ण की वह फिक्र ही छोड़ देंगे। वह तो जवान कृष्ण को--जो कि चांद की छाया में नाच रहा हैजिसके कोई नीति-नियम नहीं हैंजिसकी कोई मर्यादा नहींजो अमर्याद है,जिसको कोई बंधन नहीं पकड़तेजो एकदम अराजक है--तो केशवदास तो उस युवा कृष्ण को चुन लेंगेबालकृष्ण की फिक्र छोड़ देंगे।
अब तक कृष्ण को पूरा प्रेम करने वाला आदमी नहीं हुआ। क्योंकि पूरे कृष्ण को प्रेम करना तभी संभव हैजब वह आदमी भी मल्टी डायमेंशनल हो। हम आमतौर से एक आयामी होते हैं। एक हमारा ट्रैक होता है व्यक्तित्व का,एक रेल की पटरी होती हैउस पटरी पर हम चलते हैं।
मगर कृष्ण में हमें अपनी पटरी के योग्य मिल जाएगा। इसलिए कृष्ण इस मुल्क के हर तरह के आदमी के लिए प्रीतिकर हैं। बुरे से बुरे आदमी के लिए प्रीतिकर हो सकते हैं।
ध्यान रहेअदालत में अच्छे आदमियों को तो कभी-कभी जाना पड़ता है--यानी जब बुरे आदमी उनको ले जाते हैंतब जाना पड़ता है--अदालत आमतौर से बुरे आदमियों की जगह है। बुरा आदमी अगर राम को प्रेम करता होतातो अदालत में आता ही नहीं। जो अदालत में आ गया हैराम की कसम खिलाना नासमझी है उसको। कृष्ण की कसम खिलाई जा सकती है। अदालत में आकर भी आदमी कृष्ण को प्रेम करता हुआ हो सकता है। बुरे आदमी के लिए भी कृष्ण खुले हैं। इन बुरे आदमियों के लिए भी उनके मकान का एक दरवाजा हैजो खुला है।
राम वगैरह के मंदिर में इकहरे दरवाजे हैंकृष्ण के मंदिर में बहुत दरवाजे हैं। वहां शराबी भी जाएतो उसके लिए भी एक दरवाजा है। असल में कृष्ण से बड़ी छाती का आदमी खोजना बहुत मुश्किल है। इसलिए मैं नहीं कहता कि अदालत को पता होगा--यह मुझे पता नहीं--लेकिन जाने-अनजानेकृष्ण का रेंज व्यक्तियों को छूने का सर्वाधिक है। अधिकतम व्यक्ति उनसे स्पर्शित हो सकते हैं। ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं हैजिससे कृष्ण आलिंगन करने से इनकार करेंकहें कि तू हमारे लिए नहींहट! सबके लिए हैं। इसलिए सर्वाधिक के लिए होने से संभावना है।
और पूछा है कि क्या सिर्फ अंधविश्वास है?
नहींसिर्फ अंधविश्वास नहीं है। इस जगत में सत्य से भी बड़ा सत्य प्रेम है। और जिसके प्रति प्रेम हैउसके प्रति असत्य होना मुश्किल है। असल में जिसके प्रति प्रेम हैहम उसी के प्रति सत्य हो पाते हैं। जिंदगी में हम सत्य वहीं हो पाते हैंजहां हमारा प्रेम है। और अगर प्रेमी के पास भी आप सत्य न हो पाते होंतो समझना कि प्रेम का धोखा है।
अगर एक पति अपनी पत्नी से भी कुछ छिपाता हो और सत्य न हो पाता होएक पत्नी अपने पति से भी कुछ छिपाती हो और सत्य न हो पाती हो--कोई बड़ी बात नहींछोटी-मोटी बात भी छिपाती होअगर उसे क्रोध आ रहा हो और क्रोध को भी छिपाती हो--तो भी प्रेम की कमी हैतो भी प्रेम नहीं है। प्रेम अपने को पूरा नग्न उघाड़ देता है--सब तरह सेसब परतों पर।
अंधविश्वास कारण नहीं है। प्रेम की रग को पकड़ना जरूरी हैतो ही सत्य बुलवाया जा सकता है। यह भी मैं नहीं जानता कि अदालत को पता है या नहीं। क्योंकि अदालत को प्रेम का कुछ पता होगाइसमें जरा संदेह है। लेकिन इतना तो मनस-शास्त्र कहता है कि अगर हम प्रेम की रग को पकड़ लेंतो आदमी के सत्य बोलने की सर्वाधिक संभावना है। बोलेगा कि नहींयह दूसरी बात है। लेकिन अधिकतम संभावना वहीं हैजहां प्रेम की रग को हम पकड़ लेते हैं। और जहां प्रेम नहीं हैवहां अधिकतम असत्य की संभावना हैक्योंकि सत्य का कोई कारण नहीं रह जाता है।


न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्।। ८।।
क्योंकि भूमि में निष्कंटक धनधान्य संपन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपन को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूं जो कि मेरी इंद्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके।
संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।। ९।।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।। १०।।
संजय बोले: हे राजननिद्रा को जीतने वाला अर्जुन अंतर्यामी भगवान श्री कृष्ण के प्रति इस प्रकार कहकर फिर (श्री गोविंद को) युद्ध नहीं करूंगाऐसे स्पष्ट कहकर चुप हो गया।
उसके उपरांत हे भरतवंशी धृतराष्ट्रअंतर्यामी श्री कृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस शोकयुक्त अर्जुन को हंसते हुए से यह वचन कहा।


अर्जुन अति अनिश्चय की स्थिति में है। संजय कहता हैफिर भी ऐसा कहकर कि मैं युद्ध नहीं करूंगाअर्जुन रथ में बैठ गया है। अति अनिश्चय की स्थिति में ऐसा निश्चयात्मक भाव कि मैं युद्ध नहीं करूंगासोचने जैसा है। इतना डिसीसिव वक्तव्यइतना निर्णायक वक्तव्य कि मैं युद्ध नहीं करूंगा और इतनी अनिश्चय की स्थिति कि क्या ठीक हैक्या गलत हैइतनी अनिश्चय की स्थिति कि मन अविद्या से भरा है मेरामुझे प्रकाशित करो। लेकिन मुझे प्रकाशित करोयह कहता हुआ भी वह निर्णय तो अपना ही ले लेता है। वह कहता हैमैं युद्ध नहीं करूंगा।
इसके जरा भीतर प्रवेश करना जरूरी होगा। अक्सर जब आप बहुत निश्चय की बात बोलते हैंतब आपके भीतर अनिश्चय गहरा होता है। एक आदमी कहता है कि मैं दृढ़ निश्चय करता हूं। जब ऐसा कोई आदमी कहेतो समझना कि उसके भीतर अनिश्चय बहुत ज्यादा हैनहीं तो दृढ़ निश्चय की जरूरत नहीं पड़ेगी। जब एक आदमी कहेमेरा ईश्वर पर पक्का भरोसा हैतो समझना कि भरोसा भीतर बिलकुल नहीं है। नहीं तो पक्के भरोसे का लेबल लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जब एक आदमी बार-बार कहे कि मैं सत्य ही बोलता हूंतब समझना कि भीतर असत्य की बहुत संभावना है। अन्यथा ऐसे बोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
हम अपने भीतर जो डांवाडोलपन हैउसे निश्चयात्मक वक्तव्यों को ऊपर से थोपकर मिटाने की कोशिश में रत होते हैं। हम सभीहम सभी जो भीतर बिलकुल निश्चित नहीं हैउसको भी बाहर चेहरे पर निश्चित करके देख लेना चाहते हैं।
अब यह अर्जुन बड़े मजे की बात कह रहा है। वह कह रहा हैमैं युद्ध नहीं करूंगा। उसने तो आखिरी निर्णय ले लियाउसने निष्पत्ति ले ली। उसने तो कनक्लूडिंग बात कह दी। अब कृष्ण के लिए छोड़ा क्या हैअगर युद्ध नहीं करूंगातो अब कृष्ण से पूछने को क्या बचा हैसलाह क्या लेनी है?
इसलिए दूसरी बात जो संजय कह रहा हैवह बड़ी मजेदार है। वह कह रहा हैकृष्ण ने हंसते हुए...।
वह हंसी किस बात पर हैहंसने का क्या कारण हैअर्जुन हंसी योग्य हैइतनी दुख और पीड़ा में पड़ा हुआ,इतने संकट मेंइतनी क्राइसिस में--और कृष्ण हंसते हैं! लेकिन अब तक नहीं हंसे थे। पहली दफे कृष्ण हंसते हैं उसके वक्तव्य को सुनकर।
उस हंसी का कारण है। कि वे देखते हैंइतना अनिश्चित आदमी इतने निश्चय वक्तव्य दे रहा है कि युद्ध नहीं करूंगा! धोखा किसको दे रहा हैउसके धोखे परउसके सेल्फ डिसेप्शन परउसकी आत्मवंचना पर कृष्ण को हंसी आ जाती है। जो जानता हैउसे आएगी। देख रहे हैं कि नीचे तो दरारें ही दरारें हैं उसके मन में। देख रहे हैं कि नीचे तो कटा-कटा मन है उसकाटूटा-टूटा मन है। देख रहे हैं कि नीचे कुछ भी तय नहीं है और ऊपर से वह कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा। यह वह अपने को धोखा दे रहा है।
हम सब देते हैं। और जब भी हम बहुत निश्चय की भाषा बोलते हैंतब भीतर अनिश्चय को छिपाते हैं। जब हम बहुत प्रेम की भाषा बोलते हैंतो भीतर घृणा को छिपाते हैं। और जब हम बहुत आस्तिकता की भाषा बोलते हैंतो भीतर नास्तिकता को छिपाते हैं। आदमी उलटा जीता है। ऊपर जो दिखाई पड़ता हैठीक उससे उलटा भीतर होता है।
इसलिए कृष्ण की हंसी बिलकुल मौजूं हैठीक वक्त पर है। असामयिक नहीं हैलगेगी असामयिक। अच्छा नहीं लगता यह। बड़ी कठोर बात मालूम पड़ती है कि कृष्ण हंसें। इतने दुखइतने संकट में पड़ा हुआ अर्जुनउस पर हंसें! लेकिन हंसी का कारण है। देख रहे हैं उसको कि कैसा दोहरा काम अर्जुन कर रहा है। एक तरफ कुछ कह रहा हैदूसरी तरफ ठीक उलटा वक्तव्य दे रहा है।
दो-सुरे आदमी के वक्तव्य मेंदोहरे आदमी के वक्तव्य में हमेशा अंतर्विरोध होता है। अंतर्विरोध बहुत साफ है। यानी वह ऐसा काम कर रहा हैकि एक हाथ से ईंट रख रहा है मकान की और दूसरे हाथ से खींच रहा हैएक हाथ से दीवार उठाता हैदूसरे हाथ से खींचता हैदिनभर मकान बनाता हैरात गिरा लेता है। यह जो दोहरा काम वह कर रहा हैइसलिए कृष्ण हंस रहे हैं। यह हंसी उसके व्यक्तित्व के इस दोहरेपन परइस स्किजोफ्रेनिकबंटे हुए पन पर हंसी के सिवाय और क्या हो सकता है!
मगर कृष्ण की हंसी में काफी इशारा है। लेकिन मैं नहीं समझता कि अर्जुन ने वह हंसी देखी होगी। और मैं नहीं समझता कि अर्जुन ने वह हंसी सुनी होगी।
आखिरी सूत्र और पढ़ लें।


श्री भगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।। ११।।
श्री कृष्ण बोले: हे अर्जुनतू न शोक करने योग्यों के लिए शोक करता हैऔर पंडितों के से वचनों को कहता हैपरंतु पंडितजनजिनके प्राण चले गए हैंउनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैंउनके लिए भी नहीं शोक करते हैं।


हंसकर जो कृष्ण ने कहा हैवह और भी कठोर है। वे अर्जुन को कहते हैं कि तुम शास्त्र की भाषा बोल रहे हो,लेकिन पंडित नहीं होमूढ़ होमूर्ख हो। क्योंकि शास्त्र की भाषा बोलते हुए भी तुम जो निष्पत्तियां निकाल रहे होवे तुम्हारी अपनी हैं। शास्त्र की भाषा बोल रहा है--क्या-क्या अधर्म हो जाएगाक्या-क्या अशुभ हो जाएगाक्या-क्या बुरा हो जाएगा--पूरी शास्त्र की भाषा अर्जुन बोल रहा है। लेकिन शास्त्र की भाषा पर अपने को थोप रहा है। जो निष्कर्ष लेना चाहता हैवह उसके भीतर लिया हुआ है। शास्त्र से केवल गवाही और समर्थन खोज रहा है।
मूर्ख और पंडित में एक ही फर्क है। मूर्ख भी शास्त्र की भाषा बोल सकता हैअक्सर बोलता हैकुशलता से बोल सकता है। क्योंकि मूर्ख होने और शास्त्र की भाषा बोलने में कोई विरोध नहीं है। लेकिन मूर्ख शास्त्र से वही अर्थ निकाल लेता हैजो निकालना चाहता है। शास्त्र से मूर्ख को कोई प्रयोजन नहीं हैप्रयोजन अपने से है। शास्त्र को भी वह अपने साथ खड़ा कर लेता है गवाही की तरह।
सिमन वेल ने कहीं एक वाक्य लिखा हैलिखा है कि कुछ लोग हैं जो सत्य को भी अपने पक्ष में खड़ा करना चाहते हैंऔर कुछ लोग हैं जो सत्य के पक्ष में स्वयं खड़े होना चाहते हैं। बसदो ही तरह के लोग हैं। कुछ लोग हैं जो धर्म को अपनी पीठ के पीछे खड़ा करना चाहते हैंशास्त्र को अपने पीछे खड़ा करना चाहते हैंऔर कुछ लोग हैं जो धर्म के साथ खड़े होने का साहस रखते हैं।
लेकिन धर्म के साथ खड़ा होना बड़ा क्रांतिकारी कदम हैक्योंकि धर्म मिटा डालेगाआपको तो बचने नहीं देगा। लेकिन धर्म को अपने पक्ष में खड़ा कर लेना बहुत कनफर्मिस्टबहुत सरलबड़ा रूढ़िग्रस्त कदम हैक्योंकि उससे आप अपने को बचाने के लिए सुविधा और सिक्योरिटी खोजते हैं।
अर्जुन पंडित की भाषा बोल रहा हैपंडित जैसी बातें बोल रहा है। लेकिन अर्जुन को ज्ञान सेप्रज्ञा से कोई लेना-देना नहीं है। अपने पक्ष में सारे शास्त्रों को खड़ा करना चाहता है।
और जो व्यक्ति शास्त्र को अपने पक्ष में खड़ा कर लेना चाहता हैस्वभावतः अपने को शास्त्र के ऊपर रख लेता है। और अपने को शास्त्र के ऊपर रख लेने से ज्यादा खतरनाक और कुछ भी नहीं हो सकता है। क्योंकि उसने यह तो मान ही लिया कि वह ठीक हैउसमें गलती होने की तो उसे अब कोई संभावना न रही। उसने अपने ठीक होने का तो अंतिम निर्णय ले लिया। अब वह शास्त्रों में भी अपने को खोज लेता है।
ईसाई फकीर एक बात कहा करते हैं कि शैतान भी शास्त्र से हवाले दे देता हैअक्सर देता है। कोई कठिनाई नहीं है शास्त्र से हवाले दे देने में। आसान है बात। अर्जुन भी वैसे ही शास्त्र के हवाले दे रहा है।
और बड़े मजे की बात यह है कि किस आदमी के सामने शास्त्र के हवाले दे रहा है! जब शास्त्र मूर्तिमंत सामने खड़ा होतब शास्त्र के हवाले सिर्फ नासमझ दे सकता है। किस आदमी के सामने ज्ञान की बातें बोल रहा है! जब ज्ञान सामने खड़ा होतब ज्ञान की उधार बातें सिर्फ नासमझ बोल सकता है। कृष्ण का हंसना उचित है। और कृष्ण का यह कहना भी उचित है कि अर्जुन तू पंडित की भाषा बोलता हैलेकिन निपट गंवारी का काम कर रहा है। किसके सामने?
सुना है मैंने कि बोधिधर्म के पास एक आदमी गया बुद्ध की एक किताब लेकरऔर बोधिधर्म से बोला कि इस किताब के संबंध में मुझे कुछ समझाओ। बोधिधर्म ने कहा कि यदि तू समझता है कि बुद्ध की किताब मैं समझा सकूंगातो किताब को फेंकमुझसे ही समझ ले। और अगर तू समझता है कि बुद्ध की किताब बोधिधर्म नहीं समझा सकेगातो मुझे फेंककिताब को ही समझ ले।
कृष्ण की हंसी बहुत उचित है। किनके हवाले दे रहा हैऔर बड़े मजे की बात हैपूरे समय कह रहा है,भगवन्! कह रहा हैभगवान! हे भगवान! हे मधुसूदन! और शास्त्र के हवाले दे रहा है।
भगवान के सामने भी कुछ नासमझ शास्त्र लेकर पहुंच जाते हैंउनकी नासमझी का कोई अंत नहीं है। अगर कभी भगवान भी उन्हें मिल जाएतो उसके सामने भी वे गीता के उद्धरण देंगे कि गीता में ऐसा लिखा है। तो भगवान को हंसना ही पड़ेगा कि कम से कम अब तो गीता छोड़ो। लेकिन वे नहीं छोड़ेंगे।
वह अर्जुनजो आम पंडित की नासमझी हैवही कर रहा है। और कृष्ण सीधे और साफ कह रहे हैं। इतनी सीधी और साफ बात कम कही गई हैबहुत कम कही गई है। कृष्ण कह सकते हैंकहने का कारण है। लेकिन अर्जुन इसे भी सुनेगा या नहींयह कहना मुश्किल है! अर्जुन करीब-करीब पूरी गीता मेंबहुत समय तकअंधे और बहरे का ही प्रदर्शन करता है। अन्यथा शायद गीता की जरूरत ही नहीं थी। अगर वह एक बार गौर से आंख खोलकर कृष्ण को देख लेतातो ही बात समाप्त हो गई थी। लेकिन वह भगवान भी कहे चला जाता है और उनकी तरफ ध्यान भी नहीं दे रहा है!
जब खुद भगवान ही सारथी हैं--अगर सच में वह जानता है कि वे भगवान हैं--तो जब वे सारथी बनकर ही रथ पर बैठ गए हों और लगाम उनके ही हाथ में होतब वह व्यर्थ अपने सिर पर वजन क्यों ले रहा है सोचने का! अगर वे भगवान ही हैंऐसा वह जानता हैतो अब और पूछने की क्या गुंजाइश हैहाथ में लगाम उनके हैछोड़ दे बात! लेकिन वह कहता है भगवानजानता अभी नहीं है।
हम भी भगवान कहे चले जाते हैंजानते नहीं हैं। मंदिर में एक आदमी भगवान के सामने खड़े होकर कहता है कि नौकरी नहीं लग रहीनौकरी लगवा दें भगवान। अगर भगवान को जानता ही हैतो इतना तो जानना ही चाहिए कि नौकरी नहीं लग रहीइसका उन्हें पता होगा। यह कृपा करके इन्फर्मेशन मत दें। और अगर इतना भी उनको पता नहीं हैतो ऐसे भगवान के सामने हाथ जोड़कर भी कुछ होने वाला नहीं है। जो आम भक्त भगवान के सामने कर रहा हैकह रहा हैभगवान! और शक उसे इतना भी है कि अब यह लड़के को नौकरी नहीं लग रही है...!
जीसस सूली पर आखिरी क्षण मेंजब हाथ में उनके खीले ठोंक दिए गएतो उनके मुंह से एक आवाज निकल गई जोर से कि हे भगवानयह क्या दिखला रहा है! यह क्या करवा रहा है! एक क्षण को जीसस के मुंह से निकल गयायह क्या करवा रहा है!
मतलब क्या हुआशिकायत हो गई। मतलब क्या हुआमतलब यह हुआ कि जीसस कुछ और देखना चाहते थे और कुछ और हो रहा है। मतलब यह हुआ कि समर्पण नहीं हैमतलब यह हुआ कि भगवान के हाथों में लगाम नहीं हैमतलब यह हुआ कि इस क्षण में जीसस भगवान से ज्यादा बुद्धिमान अपने को समझ रहे हैं!
तत्काल जीसस को खयाल आ गया। अर्जुन को बहुत मुश्किल से खयाल आता हैजीसस को तत्काल खयाल आ गया। जैसे ही उनके मुंह से यह आवाज निकली कि हे भगवानयह क्या दिखला रहा है! दूसरा वाक्य उन्होंने कहा,क्षमा कर। जो तेरी मर्जी--दाई विल बी डन--तेरी ही इच्छा पूरी हो। यह मैं क्या कह दिया--क्या दिखला रहा है! शक पैदा हो गया।
मेरे हिसाब में तो इस एक वचन को बोलते वक्त जीसस मरियम के बेटे जीसस थे और दूसरे वचन को बोलते वक्त वे क्राइस्ट हो गए। इस बीच में क्रांति घटित हो गई। एक क्षण पहले तक वे सिर्फ मरियम के बेटे जीसस थे,जिसने कहायह क्या दिखला रहा है! शिकायत मौजूद थी। आस्तिक के मन में शिकायत नहीं हो सकती। दूसरे क्षण में ही तत्काल उनके मुंह से निकलाक्षमा करतेरी इच्छा पूरी हो। जो तू कर रहा हैवही ठीक हैउससे अन्यथा ठीक होने का कोई सवाल ही नहीं है।
बसवे क्राइस्ट हो गए। दूसरे ही क्षण वे मरियम के साधारण बेटे न रहेवे परमात्मा के पुत्र हो गए।
अर्जुन कहे तो चला जा रहा हैभगवानभगवान! लेकिन वह संबोधन हैवैसे ही जैसे सभी संबोधन झूठे होते हैंऔपचारिक होते हैं। अभी भगवान उसे दिखाई नहीं पड़ रहा है। दिखाई तो उसे यही पड़ रहा है कि अपना सखा है कृष्ण। आ गया है साथसारथी का काम कर रहा है। साथ हैइसलिए पूछ लेते हैं। बाकी भगवान की जो अनुभूति है,वह अगर उसे हो जाए तो पूछने को क्या बचता है! उसे कहना चाहिए कि लगाम तुम्हारे हाथ में हैजो मर्जी। दाई विल बी डनअपनी इच्छा पूरी करो।
इसलिए उसके भगवान का संबोधन अभी सार्थक नहीं है। क्योंकि वह संबोधनों के बाद भी निर्णय खुद ले रहा है। वह कह रहा हैमैं युद्ध नहीं करूंगा। कह रहा हैभगवान! कह रहा हैमैं युद्ध नहीं करूंगा। इस पर कृष्ण हंसें और कहें कि तू बड़ी विरोधी बातें बोल रहा हैतो उचित ही है।
शेष संध्या बात करेंगे।

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