सोमवार, 29 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-013

कामद्वंद्व और शास्त्र से--निष्कामनिर्द्वंद्व और स्वानुभव की ओर

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः।। ४२।।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।। ४३।।
हे अर्जुनजो सकामी पुरुष केवल फल श्रुति में प्रीति रखने वालेस्वर्ग को ही परम श्रेष्ठ मानने वालेइससे बढ़कर कुछ नहीं है--ऐसे कहने वाले हैंवे अविवेकीजन जन्मरूप कर्मफल को देने वाली और भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए बहुत-सी क्रियाओं के विस्तार वाली इस प्रकार की जिस दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहते हैं।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।। ४४।।
उस वाणी द्वारा हरे हुए चित्त वालेतथा भोग और ऐश्वर्य में आसक्ति वालेउन पुरुषों के अंतःकरण में निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती है।



कर्मयोग की बात करते हुए कृष्ण ने अर्जुन को कहा है कि वे सारे लोगजो सुखकामनाविषय और वासना से उत्प्रेरित हैंजो स्वर्ग से ऊपर जगत में कुछ भी नहीं देख पाते हैंजिनका धार्मिक चिंतनमनन और अध्ययन भी विषय-प्रेरित ही होता हैजो संसार में तो सुख की मांग करते ही हैंजो परलोक में भी सुख की ही मांग किए चले जाते हैंजिनके परलोक की दृष्टि भी वासना का ही विस्तार हैऐसे व्यक्ति निष्काम-कर्म की गहराई को समझने में असमर्थ हैं।
कर्मयोग को अगर एक संक्षिप्त से गणित के सूत्र में कहेंतो कहना होगाकर्म - कामना = कर्मयोग। जहां कर्म से कामना ऋण कर दी जाती हैतब जो शेष रह जाता हैवही कर्मयोग है। लेकिन कामना को शेष करने का अर्थ केवल सांसारिक कामना को शेष कर देना नहीं हैकामना मात्र को शेष कर देना है। इस बात को थोड़ा गहरे में समझ लेना जरूरी है।
संसार की कामना को शेष कर देना बहुत कठिन नहीं हैकामना मात्र को शेष करना असली तपश्चर्या है। संसार की कामना तो शेष की जा सकती है। अगर परलोक की कामना का प्रलोभन दिया जाएतो संसार की कामना छोड़ने में कोई भी कठिनाई नहीं है। अगर किसी से कहा जाएइस पृथ्वी पर धन छोड़ोक्योंकि परलोक मेंयहां जो थोड़ा छोड़ता हैबहुत पाता है। तो उस थोड़े को छोड़ना बहुत कठिन नहीं है। वह बार्गेन हैवह सौदा है। हम सभी छोड़ते हैं,पाने के लिए हम सभी छोड़ते हैं। पाने के लिए कुछ भी छोड़ा जा सकता है।
लेकिन पाने के लिए जो छोड़ना हैवह निष्काम नहीं है। वह पाना चाहे परलोक में होवह पाना चाहे भविष्य में हो,वह पाना चाहे धर्म के सिक्कों में होइससे बहुत फर्क नहीं पड़ता है। पाने की आकांक्षा को आधार बनाकर जो छोड़ना हैवही कामना हैवही कामग्रस्त चित्त है। वैसा चित्त कर्मयोग को उपलब्ध नहीं होता।
यहां कहा जाए पृथ्वी पर स्त्रियों को छोड़ दोक्योंकि स्वर्ग में अप्सराएं उपलब्ध हैंयहां कहा जाए पृथ्वी पर शराब छोड़ दोक्योंकि बहिश्त में शराब के चश्मे बह रहे हैंतो इस छोड़ने में कोई भी छोड़ना नहीं है। यह केवल कामना को नए रूप मेंनए लोक मेंनए आयाम में पुनः पकड़ लेना है। यह प्रलोभन ही है।
इसलिए जो व्यक्ति भीकहीं भीकिसी भी रूप में पाने की आकांक्षा से कुछ करता हैवह कर्मयोग को उपलब्ध नहीं हो सकता है। क्योंकि कर्मयोग का मौलिक आधारकामनारहितफल की कामनारहित कर्म है। कठिन है बहुत। क्योंकि साधारणतः हम सोचेंगे कि फिर कर्म होगा ही कैसेहम तो कर्म करते ही इसलिए हैं कि कुछ पाने को हैकोई लक्ष्य,कोई फल। हम तो चलते ही इसलिए हैं कि कहीं पहुंचने को है। हम तो श्वास भी इसीलिए लेते हैं कि पीछे कुछ होने को है। अगर पता चले कि नहींआगे की कोई कामना नहींतब तो फिर हम हिलेंगे भी नहींकरेंगे भी नहीं। कर्म होगा कैसे?
गीता के संबंध में और कृष्ण के संदेश के संबंध में जिन लोगों ने भी चिंतन किया हैउनके लिए जो बड़े से बड़ा मनोवैज्ञानिक सवाल हैउलझाव हैवह यही है कि कृष्ण कहते हैंकर्म वासनारहितकामनारहित! तो कर्म होगा कैसे?क्योंकि कर्म का मोटिवेशनकर्म की प्रेरणा कहां से उत्पन्न होती हैकर्म की प्रेरणा तो कामना से ही उत्पन्न होती है। कुछ हम चाहते हैंइसलिए कुछ हम करते हैं। चाह पहलेकरना पीछे। विषय पहलेकर्म पीछे। आकांक्षा पहलेफिर छाया की तरह हमारा कर्म आता है। अगर हम छोड़ दें चाहनाडिजायरइच्छाविषयतो कर्म आएगा कैसे?मोटिवेशन नहीं होगा।
अगर हम पश्चिम के मनोविज्ञान से भी पूछें--जो कि मोटिवेशन पर बहुत काम कर रहा है--कर्म की प्रेरणा क्या हैतो पश्चिम के पूरे मनोवैज्ञानिक एक स्वर से कहते हैं कि बिना कामना के कर्म नहीं हो सकता है।
कृष्ण का मनोविज्ञान आधुनिक मनोविज्ञान से बिलकुल उलटी बात कह रहा है। वे यह कह रहे हैं कि कर्म जब तक कामना से बंधा हैतब तक सिवाय दुख और अंधकार के कहीं भी नहीं ले जाता है। जिस दिन कर्म कामना से मुक्त होता है--परलोक की कामना से भीस्वर्ग की कामना से भी--जिस दिन कर्म शुद्ध होता हैप्योर एक्ट हो जाता है,जिसमें कोई चाह की जरा भी अशुद्धि नहीं होतीउस दिन ही कर्म निष्काम है और योग बन जाता है।
और वैसा कर्म स्वयं में मुक्ति है। वैसे कर्म के लिए किसी मोक्ष की आगे कोई जरूरत नहीं है। वैसे कर्म का कोई मोक्ष भविष्य में नहीं है। वैसा कर्म अभी और यहींहियर एंड नाउ मुक्ति है। वैसा कर्म मुक्ति है। वैसे कर्म का मुक्ति फल नहीं हैवैसे कर्म की निजता ही मुक्ति है।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी हैक्योंकि आगे बार-बारउसके इर्द-गिर्द बात घूमेगी। और कृष्ण के संदेश की बुनियाद में वह बात छिपी है। क्या कर्म हो सकता है बिना कामना केक्या बिना चाह के हम कुछ कर सकते हैंतो फिर प्रेरणा कहां से उपलब्ध होगीवह स्रोत कहां से आएगावह शक्ति कहां से आएगीजो हमें खींचे और कर्म में संयुक्त करे?
जिस जगत में हम जीते हैं और जिस कर्मों के जाल से हम अब तक परिचित रहे हैंउसमें शायद ही एकाध ऐसा कर्म हो जो अनमोटिवेटेड हो--शायद ही। अगर कभी ऐसा कोई कर्म भी दिखाई पड़ता होजो अनमोटिवेटेड मालूम होता है,जिसमें आगे कोई मोटिवजिसमें आगे कोई पाने की आकांक्षा नहीं होतीउसमें भी थोड़ा भीतर खोजेंगेतो मिल जाएगी।
रास्ते पर आप चल रहे हैं। आपके आगे कोई हैउसका छाता गिर गया। आप उठाकर दे देते हैं--अनमोटिवेटेड। उठाते वक्त आप यह भी नहीं सोचते कि क्या फलक्या उपलब्धिक्या मिलेगानहींयह सोच नहीं होता। छाता गिरा,आपने उठायादे दिया। दिखाई पड़ता हैअनमोटिवेटेड है। क्योंकि न घर से सोचकर चले थे कि किसी का छाता गिरेगातो उठाएंगे। छाता गिराउसके एक क्षण पहले तक छाता उठाने की कोई भी योजना मन में न थी। छाता गिरने और छाता उठाने के बीच भी कोई चाह दिखाई नहीं पड़ती है।
लेकिन फिर भीमनोविज्ञान कहेगाअनकांशस मोटिवेशन है। अगर छाता देने के बाद वह आदमी धन्यवाद न देतो दुख होगा। छाता दबा ले और चल पड़ेतो आप चौकन्ने से खड़े रह जाएंगे कि कैसा आदमी हैधन्यवाद भी नहीं! अगर पीछे इतना भी स्मरण आता है कि कैसा आदमी हैधन्यवाद भी नहीं! तो मोटिवेशन हो गया। सचेतन नहीं था,आपने सोचा नहीं थालेकिन मन के किसी गहरे तल पर छिपा था। अब पीछे से हम कह सकते हैं कि धन्यवाद पाने के लिए छाता उठायाआप कहेंगेनहींधन्यवाद का तो कोई विचार ही न थायह तो पीछे पता चला।
लेकिन जो नहीं थावह पीछे भी पता नहीं चल सकता है। जो बीज में न छिपा होवह प्रकट भी नहीं हो सकता है। जो अव्यक्त न रहा होवह व्यक्त भी नहीं हो सकता है। कहीं छिपा थाकिसी अनकांशसकिसी अचेतन के तल पर दबा थाराह देखता था। नहींसचेतन कोई कामना नहीं थीलेकिन अचेतन कामना थी।
जीवन में ऐसे कुछ क्षण हमें मालूम पड़ते हैंजहां लगता हैअनमोटिवेटेडनिष्काम कोई कृत्य घटित हो गया है। लेकिन उसे भी पीछे से लौटकर देखेंतो लगता हैकामना कहीं छिपी थी। इसलिए पश्चिम का मनोविज्ञान कहेगा कि चाहे दिखाई पड़े और चाहे न दिखाई पड़ेजहां भी कर्म हैवहां कामना हैइतना ही फर्क हो सकता है कि वह चेतन है या अचेतन है।
लेकिन कृष्ण कहते हैंऐसा कर्म हो सकता हैजहां कामना नहीं हो। यह वक्तव्य बहुत महत्वपूर्ण है। इसे समझने के लिए दो-चार ओर से हम यात्रा करेंगे। एक छोटी-सी कहानी से आपको कहना चाहूंगा। क्योंकि जो हमारी जिंदगी में परिचित नहीं हैउसे हमें किसी और की जिंदगी में झांकना पड़े। और हमारी जिंदगी ही इति नहीं है। हमें किसी और जिंदगी में झांकना पड़ेदेखना पड़े कि क्या यह संभव हैइज़ इट पासिबलपहले तो यही देख लें कि क्या यह संभव हैअगर संभावना दिखाई पड़ेतो शायद कल सत्य भी हो सकती है।
अकबर एक दिन तानसेन को कहा हैतुम्हारे संगीत को सुनता हूंतो मन में ऐसा खयाल उठता है कि तुम जैसा बजाने वाला शायद ही पृथ्वी पर हो! आगे भी कभी होगायह भी भरोसा नहीं आता। क्योंकि इससे ऊंचाई और क्या हो सकेगीइसकी धारणा भी नहीं बनती है। तुम शिखर हो। लेकिन कल रात जब तुम्हें विदा किया थासोने गया थातो मुझे खयाल आयाहो सकता हैतुमने भी किसी से सीखा होकोई तुम्हारा गुरु हो। तो मैं आज तुमसे पूछता हूं कि तुम्हारा कोई गुरु हैतुमने किसी से सीखा है?
तो तानसेन ने कहामैं कुछ भी नहीं हूं गुरु के सामनेजिससे सीखा हैउसके चरणों की धूल भी नहीं हूं। इसलिए वह खयाल मन से छोड़ दें। शिखर! भूमि पर भी नहीं हूं। लेकिन आपने मुझे ही जाना हैइसलिए आपको शिखर मालूम पड़ता हूं। ऊंट जब पहाड़ के करीब आता हैतब उसे पता चलता हैअन्यथा वह पहाड़ होता ही है। परतानसेन ने कहा कि मैं गुरु के चरणों में बैठा हूंमैं कुछ भी नहीं हूं। कभी उनके चरणों में बैठने की योग्यता भी हो जाएतो समझूंगा बहुत कुछ पा लिया।
तो अकबर ने कहातुम्हारे गुरु जीवित हों तो तत्क्षणअभी और आज उन्हें ले आओमैं सुनना चाहूंगा। पर तानसेन ने कहायही कठिनाई है। जीवित वे हैंलेकिन उन्हें लाया नहीं जा सकता।
अकबर ने कहाजो भी भेंट करनी होतैयारी है। जो भी! जो भी इच्छा होदेंगे। तुम जो कहोवही देंगे। तानसेन ने कहावही कठिनाई हैक्योंकि उन्हें कुछ लेने को राजी नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह कुछ लेने का प्रश्न ही नहीं है। अकबर ने कहाकुछ लेने का प्रश्न नहीं है! तो क्या उपाय किया जाएतानसेन ने कहाकोई उपाय नहींआपको ही चलना पड़े। तो उन्होंने कहामैं अभी चलने को तैयार हूं। तानसेन ने कहाअभी चलने से तो कोई सार नहीं है। क्योंकि कहने से वे बजाएंगेऐसा नहीं है। जब वे बजाते हैंतब कोई सुन लेबात और है। तो मैं पता लगाता हूं कि वे कब बजाते हैं। तब हम चलेंगे।
पता चला--हरिदास फकीर उसके गुरु थेयमुना के किनारे रहते थे--पता चलारात तीन बजे उठकर वे बजाते हैंनाचते हैं। तो शायद ही दुनिया के किसी अकबर की हैसियत के सम्राट ने तीन बजे रात चोरी से किसी संगीतज्ञ को सुना हो। अकबर और तानसेन चोरी से झोपड़ी के बाहर ठंडी रात में छिपकर बैठे रहे। पूरे समय अकबर की आंखों से आंसू बहते रहे। एक शब्द बोला नहीं।
संगीत बंद हुआ। वापस होने लगे। सुबह फूटने लगी। राह में भी तानसेन से अकबर बोला नहीं। महल के द्वार पर तानसेन से इतना ही कहाअब तक सोचता था कि तुम जैसा कोई भी नहीं बजा सकता। अब सोचता हूं कि तुम हो कहां! लेकिन क्या बात हैतुम अपने गुरु जैसा क्यों नहीं बजा सकते हो?
तानसेन ने कहाबात तो बहुत साफ है। मैं कुछ पाने के लिए बजाता हूंऔर मेरे गुरु ने कुछ पा लिया हैइसलिए बजाते हैं। मेरे बजाने के आगे कुछ लक्ष्य हैजो मुझे मिलेउसमें मेरे प्राण हैं। इसलिए बजाने में मेरे प्राण पूरे कभी नहीं हो सकते। बजाने में मैं सदा अधूरा हूंअंश हूं। अगर बिना बजाए भी मुझे वह मिल जाए जो बजाने से मिलता है,तो बजाने को फेंककर उसे पा लूंगा। बजाना मेरे लिए साधन हैसाध्य नहीं है। साध्य कहीं और है--भविष्य मेंधन में,यश मेंप्रतिष्ठा में--साध्य कहीं और हैसंगीत सिर्फ साधन है। साधन कभी आत्मा नहीं बन पातीसाध्य में ही आत्मा अटकी होती है। अगर साध्य बिना साधन के मिल जाएतो साधन को छोड़ दूं अभी। लेकिन नहीं मिलता साधन के बिनाइसलिए साधन को खींचता हूं। लेकिन दृष्टि और प्राण और आकांक्षा और सब घूमता है साध्य के निकट। लेकिन जिनको आप सुनकर आ रहे हैंसंगीत उनके लिए कुछ पाने का साधन नहीं है। आगे कुछ भी नहीं है,जिसे पाने को वे बजा रहे हैं। बल्कि पीछे कुछ हैजिससे उनका संगीत फूट रहा है और बज रहा है। कुछ पा लिया है,कुछ भर गया हैवह बह रहा है। कोई अनुभूतिकोई सत्यकोई परमात्मा प्राणों में भर गया है। अब वह बह रहा है,ओवर फ्लोइंग है।
अकबर बार-बार पूछने लगाकिसलिएकिसलिए?
स्वभावतःहम भी पूछते हैंकिसलिएपर तानसेन ने कहानदियां किसलिए बह रही हैंफूल किसलिए खिल रहे हैं?सूर्य किसलिए निकल रहा है?
किसलिएमनुष्य की बुद्धि ने पैदा किया है। सारा जगत ओवर फ्लोइंग हैआदमी को छोड़कर। सारा जगत आगे के लिए नहीं जी रहा हैसारा जगत भीतर से जी रहा है। फूल खिल रहा हैखिलने में ही आनंद है। सूर्य निकल रहा है,निकलने में ही आनंद है। हवाएं बह रही हैंबहने में ही आनंद है। आकाश हैहोने में ही आनंद है। आनंद आगे नहीं,अभी हैयहीं है।
और जो हो रहा हैवह भीतर की ऊर्जा से अकारण बहाव है--अनमोटिवेटेड एक्ट। जिस पर कि कृष्ण का सारा कर्मयोग खड़ा होगा। वह जीवन को भविष्य की तरफ से पकड़ना नहींवह जीवन को आकांक्षा की तरफ से खींचना नहींवरन व्यक्ति के भीतर छिपा जो अव्यक्त हैउसकी ओवर फ्लोइंगउसका ऊपर से बह जाना है। कृत्यजिस दिन आपके जीवन-ऊर्जा की ओवर फ्लोइंग हैऊपर से बह जाना हैउस दिन निष्काम है। और जब तक भविष्य के लिए किसी कारण से बहना हैतब तक सकाम है। सकाम कर्म योग नहीं हैनिष्काम कर्म योग है।
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कामना भविष्य कीस्वर्ग कीमोक्ष कीपरमात्मा की--इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर एक व्यक्ति मंदिर में भजन गा रहा हैऔर इस भजन में भी इतनी कामना है कि ईश्वर को पा लूंतो यह भजन व्यर्थ हो गयायह भजन योग न रहा। ईश्वर को पाने की कामना भी कामना ही है। और कामना से कभी ईश्वर पाया नहीं जाता। ईश्वर तो निष्कामना में उपलब्ध है। अगर भजन में इतनी भी कामना है कि ईश्वर को पा लूं,तो भजन व्यर्थ हुआ। अगर प्रार्थना में इतनी भी मांग है कि तेरे दर्शन हो जाएंतो प्रार्थना व्यर्थ हो गई।
लेकिन प्रार्थना अनमोटिवेटेड हैनहीं किसी को पाने के लिएवरन भीतर के भाव से जन्मी है और अपने में पूरी है,अपने में पूरी है--आगे कुछ द्वार नहीं खोज रही है--तो प्रार्थना है। और उसी क्षण में प्रार्थना सफल हैजिस क्षण प्रार्थना निष्काम है। प्रत्येक कर्म प्रार्थना बन जाता हैअगर निष्काम बन जाए। और प्रत्येक प्रार्थना बंधन बन जाती है,अगर सकाम बन जाए।
लेकिन हम जैसे दुकान चलाते हैंवैसे ही पूजा भी करते हैं। दुकान भी मोटिवेटेड होती हैपूजा भी। दुकान में भी कुछ पाने को होता हैपूजा में भी। पाप भी करते हैंतो भी कुछ पाने को करते हैं। पुण्य भी करते हैंतो कुछ पाने को करते हैं। और कृष्ण कह रहे हैं कि पाने के लिए करना ही अधर्म है। पाने की आकांक्षा के बिना जो कृत्य का फूल खिलता है--दि फ्लावरिंग आफ दि प्योर एक्ट--शुद्ध कर्म जब खिलता है बिना किसी कारण के...।
इस संबंध में इमेनुअल कांट का नाम लेना जरूरी है। जर्मनी में कांट ने करीब-करीब कृष्ण से मिलती-जुलती बात कही है। उसने कहा कि अगर कर्तव्य में जरा-सी भी आकांक्षा हैतो कर्तव्य पाप हो गया। जरा-सी भी! कर्तव्य तभी कर्तव्य हैजब बिलकुल शुद्ध हैउसमें कोई आकांक्षा नहीं है।
यह हमें कठिन पड़ेगा। क्योंकि हमारी जिंदगी में ऐसा कोई कर्म नहीं हैजिससे हमारी पहचान होजिससे हम समझ पाएं। लेकिन ऐसे कर्म के लिए द्वार खोले जा सकते हैं।
मैंने कहारास्ते पर एक आदमी हैउसका छाता गिर गया है। आप छाता उठाएंदे देंऔर छाता उठाकर देते समय भीतर देखते रहें कि कोई मांग तो नहीं उठती है! सिर्फ देखते रहें। छाता उठाकर दें और अपने रास्ते पर चल पड़ें और भीतर देखते रहें कि कोई मांग तो नहीं उठती धन्यवाद की भी! उठेगीलेकिन देखते रहेंदो-चार कृत्यों में देखते रहें और अचानक पाएंगेक्या पागलपन है! गिर जाएगी।
दिन में जो आदमी एक कृत्य भी अनमोटिवेटेड कर लेवह कृष्ण की गीता को समझ पा सकता है। एक कृत्य भी चौबीस घंटे में अनमोटिवेटेड कर लेजिसमें कि कुछ न होचेतन-अचेतन कोई मांग न हो--बस किया और हट गए और चले गए--तो कृष्ण की गीता कोऔर कृष्ण के कर्मयोग को समझने का मार्ग खुल जाएगा। रोज गीता न पढ़ें,चलेगा। लेकिन एक कृत्य चौबीस घंटे में ऐसा खिल जाएजिसमें हमारी कोई भी कामना नहीं हैबसजिसमें करना ही पर्याप्त है और हम बाहर हो गए और चल पड़े।
कठिन नहीं है। अगर थोड़ी खोज-बीन करेंतो बहुत कठिन नहीं है। छोटी-छोटीछोटी-छोटी घटनाओं में उसकी झलक मिल सकती है।
और यह जो कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैंवह पूरा का पूरा प्रयोगात्मक है। होगा ही। यह कोई गुरुकुल में बैठकरकिसी वृक्ष के तलेकिसी आश्रम में हुई चर्चा नहीं है। यह युद्ध के स्थल परजहां सघन कर्म प्रतीक्षा कर रहा हैवहां हुई चर्चा है। यह चर्चा किसी शांत वट-वृक्ष के नीचे बैठकर कोई तत्व-चर्चा नहीं हैयह कोरी तत्व-चर्चा नहीं है। यह सघन कर्म के बीचठीक युद्ध के क्षण में--युद्ध से ज्यादा सघन कृत्य और क्या होगा--वहां हुई यह चर्चा है। और अर्जुन से कृष्ण कह रहे हैं कि अगर स्वर्ग तक की भी कामना मन में है--किसी भी विषय की--तो सब व्यर्थ हो जाता है।
कर्मयोग का सारकर्म ऋण कामना है। काम से कामना गई...।
हमने तो काम शब्द ही रखा हुआ है कर्म के लिए। क्योंकि काम कामना से ही बनता है। हम तो कहते हैंकाम वही हैजो कामना से चलता है।
लेकिन कृष्ण कहते हैंकाम से अगर कामना घट जाए तो कर्मयोग। तो फिर साधारण कर्म नहीं रह जाता है वहयोग बन जाता है। और योग बन जाएतो न पाप हैन पुण्य हैन बंधन हैन मुक्ति है--दोनों के बाहर है व्यक्ति।


त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।। ४५।।
हे अर्जुनसब वेद तीनों गुणों के कार्य रूप संसार को विषय करने वालेअर्थात प्रकाश करने वाले हैं,
इसलिए तू असंसारीअर्थात निष्कामी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों से रहितनित्य वस्तु में स्थित तथा योगक्षेम को न चाहने वाला और आत्मवान हो।


राग और द्वेष से मुक्तद्वंद्व से रहित और शून्य। राग और द्वेष से मुक्तदो में से एक पर होना सदा आसान है। राग में होना आसान हैविराग में भी होना आसान है। विराग द्वेष है। धन को पकड़ना आसान हैधन को त्यागना आसान है। पकड़ना राग हैत्यागना द्वेष है। राग और द्वेष दोनों से मुक्त हो जाओशून्य हो जाओरिक्त हो जाओ,तो जिसे महावीर ने वीतरागता कहा हैउसे उपलब्ध होता है व्यक्ति।
द्वंद्व में चुनाव आसान हैचुनावरहित होना कठिन है। च्वाइस आसान हैच्वाइसलेसनेस कठिन है। कहें मन को कि इसे चुनते हैंतो मन कहता है--ठीक। कहें मन कोइसके विपरीत चुनते हैंतो भी मन कहता है--ठीक। चुनो जरूर! क्योंकि जहां तक चुनाव हैवहां तक मन जी सकता है। चुनाव कोई भी होइससे फर्क नहीं पड़ता--घर चुनोजंगल चुनोमित्रता चुनोशत्रुता चुनोधन चुनोधन-विरोध चुनोकुछ भी चुनोप्रेम चुनोघृणा चुनोक्रोध चुनोक्षमा चुनोकुछ भी चुनो--च्वाइस होतो मन जीता है। लेकिन कुछ भी मत चुनोतो मन तत्काल--तत्काल--गिर जाता है। मन के आधार गिर जाते हैं। च्वाइस मन का आधार हैचुनाव मन का प्राण है।
इसलिए जब तक चुनाव चलता है जीवन मेंतब तक आप कितना ही चुनाव बदलते रहेंइससे बहुत फर्क नहीं पड़ता है। संसार छोड़ेंमोक्ष चुनेंपदार्थ छोड़ेंपरमात्मा चुनेंपाप छोड़ेंपुण्य चुनें--कुछ भी चुनें। यह सवाल नहीं है कि आप क्या चुनते हैंसवाल गहरे में यह है कि क्या आप चुनते हैंअगर चुनते हैंअगर च्वाइस हैतो द्वंद्व रहेगा। क्योंकि किसी को छोड़ते हैं और किसी को चुनते हैं।
यह भी समझ लेना जरूरी है कि जिसे छोड़ते हैंउसे पूरा कभी नहीं छोड़ पा सकते हैं। क्योंकि जिसे छोड़ना पड़ता है,उसकी मन में गहरी पकड़ होती है। नहीं तो छोड़ना क्यों पड़ेगाअगर एक आदमी के मन में धन की कोई पकड़ न होतो वह धन का त्याग कैसे करेगात्याग के लिए पकड़ अनिवार्य है। अगर एक आदमी की कामवासना मेंसेक्स में रुचि न होलगाव न होआकर्षण न होतो वह ब्रह्मचर्य कैसे चुनेगाऔर जिसमें आकर्षण हैलगाव हैउसके खिलाफ हम चुन रहे हैंतो ज्यादा से ज्यादा हम दमन कर सकते हैंसप्रेशन कर सकते हैं। और कुछ होने वाला नहीं हैदब जाएगा। जिसे हमने इनकार कियावह हमारे अचेतन में उतर जाएगा। और जिसे हमने स्वीकार कियावह हमारा चेतन बन जाएगा।
हमारा मनजिसे अस्वीकार करता हैउसे अंधेरे में ढकेल देता है। हमारे सबके मन के गोडाउन हैं। घर में जो चीज बेकार हो जाती हैउसे हम कबाड़खाने में डाल देते हैं। ऐसे ही चेतन मन जिसे इनकार कर देता हैउसे अचेतन में डाल देता है। जिसे स्वीकार कर लेता हैउसे चेतन में ले आता है। चेतन मन हमारा बैठकखाना है।
लेकिन किसी भी आदमी का घर बैठकखाने में नहीं होता। बैठकखानों में सिर्फ मेहमानों का स्वागत किया जाता है,उसमें कोई रहता नहीं। असली घर बैठकखाने के बाद शुरू होता है। बैठकखाना घर का हिस्सा नहीं हैतो भी चलेगा। कह सकते हैं कि बैठकखाना घर का हिस्सा नहीं है। क्योंकि घर वाले बैठकखाने में नहीं रहतेबैठकखाने में सिर्फ अतिथियों का स्वागत होता है। बैठकखाना सिर्फ फेस हैबैठकखाना सिर्फ एक चेहरा हैदिखावा है घर काअसली घर नहीं है। बैठकखाना एक डिसेप्शन हैएक धोखा हैजिसमें बाहर से आए लोगों को धोखा दिया जाता है कि यह है हमारा घर। हालांकि उसमें कोई रहता नहींन उसमें कोई सोतान उसमें कोई खातान उसमें कोई पीता। उसमें कोई नहीं रहतावह घर है ही नहीं। वह सिर्फ घर का धोखा है। बैठकखाने के बाद घर शुरू होता है।
चेतन मन हमाराजगत के दिखावे के लिए बैठकखाना है। उससे हम दूसरों से मिलते-जुलते हैं। लेकिन उसके गहरे में हमारा असली जीवन शुरू होता है। जब भी हम चुनाव करते हैंतो चुनाव से कोई चीज मिटती नहीं। चुनाव से सिर्फ बैठकखाने की चीजें घर के भीतर चली जाती हैं। चुनाव सेसिर्फ जिसे हम चुनते हैंउसे बैठकखाने में लगा देते हैं। वह हमारा डेकोरेशन है।
इसलिए दिनभर जो आदमी धन को इनकार करता हैकहता है कि नहींमैं त्याग को चुना हूंरात सपने में धन को इकट्ठा करता है। जो दिनभर कामवासना से लड़ता हैरात सपने में कामवासना से घिर जाता है। जो दिनभर उपवास करता हैरात राजमहलों में निमंत्रित हो जाता है भोजन के लिए।
सपने में एसर्ट करता है वह जो भीतर छिपा है। वह कहता हैबहुत हो गया दिनभर अब चुनावअब हम प्रतीक्षा कर रहे हैं दिनभर से भीतरअब हमसे भी मिलो। वह जाता नहीं हैवह सिर्फ दबा रहता है।
और एक मजे की बात है कि जो भीतर दबा हैवह शक्ति-संपन्न होता जाता है। और जो बैठकखाने में हैवह धीरे-धीरे निर्बल होता जाता है। और जल्दी ही वह वक्त आ जाता है कि जिसे हमने दबाया हैवह अपनी उदघोषणा करता हैविस्फोट होता है। वह निकल पड़ता है बाहर।
अच्छे से अच्छे आदमी कोजिसकी जिंदगी बिलकुल बढ़ियासुंदरस्मूथसमतल भूमि पर चलती हैउसे भी शराब पिला देंतो पता चलेगाउसके भीतर क्या-क्या छिपा है! सब निकलने लगेगा। शराब किसी आदमी में कुछ पैदा नहीं करती। शराब सिर्फ बैठकखाने और घर का फासला तोड़ देती हैदरवाजा खोल देती है।
अभी पश्चिम में एक फकीर था गुरजिएफ। उसके पास जो भी साधक आतातो पंद्रह दिन तो उसको शराब में डुबाता। कैसा पागल आदमी होगानहींसमझदार था। क्योंकि वह यह कहता है कि जब तक मैं उसे न देख लूंजिसे तुमने दबाया हैतब तक मैं तुम्हारे साथ कुछ भी काम नहीं कर सकता। क्योंकि तुम क्या कह रहे होवह भरोसे का नहीं है। तुम्हारे भीतर क्या पड़ा हैवही जान लेना जरूरी है।
तो एकदम शराब पिलाता पंद्रह दिनइतना डुबा देता शराब में। फिर उस आदमी का असली चेहरा खोजता कि भीतर कौन-कौन छिपा हैकिस-किस को दबाया है! तुम्हारी च्वाइस ने क्या-क्या किया हैइसे जानना जरूरी हैतभी रूपांतरण हो सकता है।
कई लोग तो भाग जाते कि हम यह बरदाश्त नहीं कर सकते। लेकिन गुरजिएफ कहता कि पंद्रह दिन तो जब तक मैं तुम्हें शराब में न डुबा लूंजब तक मैं तुम्हारे भीतरी घर में न झांक लूं कि तुमने क्या-क्या दबा रखा हैतब तक मैं तुमसे बात भी नहीं करूंगा। क्योंकि तुम जो कहते होउसको सुनकर अगर मैं तुम्हारे साथ मेहनत करूंतो मेहनत व्यर्थ चली जाएगी। क्योंकि तुम जो कहते होपक्का नहीं है कि तुम वही होभीतर तुम कुछ और हो सकते हो। और अंतिम निष्कर्ष परतुम्हारे जो भीतर पड़ा हैवही निर्णायक है।
इसलिए कृष्ण कहते हैंचुनना मत। क्योंकि चुनाव किया कि भीतर गया वहजिसे तुमने छोड़ादबायावह अंदर गया। और जिसे तुमने उभारा और स्वीकारावह ऊपर आया। बसइससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। द्वंद्व बना ही रहेगा। और द्वंद्व क्या हैकांफ्लिक्ट क्या है?
द्वंद्व एक ही हैचेतन और अचेतन का द्वंद्व है। आपने कसम ली हैक्रोध नहीं करेंगे। कसम आपकी चेतन मन में,कांशस माइंड में रहेगी। और क्रोध की ताकतें अचेतन मन में रहेंगी। कल कोई गाली देगाअचेतन मन कहेगाकरो क्रोध! और चेतन मन कहेगाकसम खाई है कि क्रोध नहीं करना है। और द्वंद्व खड़ा होगा। लड़ोगे भीतर।
और ध्यान रहेजब भी लड़ाई होगीतो अचेतन जीतेगा। इमरजेंसी में हमेशा अचेतन जीतेगा। बेकाम समय में चेतन जीतता हुआ दिखाई पड़ेगाकाम के समय में अचेतन जीतेगा। क्योंक्योंकि मनोविज्ञान की अधिकतम खोजें इस नतीजे पर पहुंची हैं कि चेतन मन हमारे मन का एक हिस्सा है। अगर हम मन के दस हिस्से करेंतो एक हिस्सा चेतन और नौ हिस्सा अचेतन है। नौगुनी ताकत है उसकी।
तो वह जो नौगुनी ताकत वाला मन हैवह प्रतीक्षा करता है कि कोई हर्जा नहीं। सुबह जब गीता का पाठ करते हो तब कोई फिक्र नहींकसम खाओ कि क्रोध नहीं करेंगे। मंदिर जब जाते होतब कोई फिक्र नहींमंदिर कोई जिंदगी है! कहो कि क्रोध नहीं करेंगे। देख लेंगे दुकान पर! देख लेंगे घर में! जब मौका आएगा असलीतब एकदम चेतन हट जाता है और अचेतन हमला बोल देता है।
इसीलिए तो हम कहते हैंक्रोध करने के बाद आदमी कहता है कि पता नहीं कैसे मैंने क्रोध कर लिया! मेरे बावजूद--इंस्पाइट आफ मी--मेरे बावजूद क्रोध हो गया। लेकिन आपके बावजूद क्रोध कैसे हो सकता हैनिश्चित हीआपने अपने ही किसी गहरे हिस्से को इतना दबाया है कि उसको आप दूसरा समझने लगे हैंकि वह और है। वह हमला बोल देता है। जब वक्त आता हैवह हमला बोल देता है।
यह जो द्वंद्व हैयह जो कांफ्लिक्ट हैयही मनुष्य का नरक है। द्वंद्व नरक है। कांफ्लिक्ट के अतिरिक्त और कोई नरक नहीं है। और हम इसको बढ़ाए चले जाते हैं। जितना हम चुनते जाते हैंबढ़ाए चले जाते हैं।
तो कृष्ण इस सूत्र में कहते हैंराग और द्वेष से--द्वंद्व सेकांफ्लिक्ट से--जो बाहर हो जाता हैजो चुनाव के बाहर हो जाता हैवही जीवन के परम सत्य को जान पाता है। और जो द्वंद्व के भीतर घिरा रहता हैवह सिर्फ जीवन के नरक को ही जान पाता है।
इस द्वंद्व-अतीत वीतरागता में ही निष्काम कर्म का फूल खिल सकता है। या निष्काम कर्म की भूमिका होतो यह द्वंद्वरहितराग-द्वेषरहितयह शून्य-चेतना फलित हो सकती है।
चेतना जब शून्य होती हैतभी शुद्ध होती है। यह शून्य का कृष्ण का कहना! चेतना जब शून्य होती हैतभी शुद्ध होती हैजब शुद्ध होती हैतब शून्य ही होती है।
करीब-करीब ऐसा समझें कि एक दर्पण है। दर्पण कब शुद्धतम होता हैजब दर्पण में कुछ भी नहीं प्रतिफलित होता,जब दर्पण में कोई तस्वीर नहीं बनती। जब तक दर्पण में तस्वीर बनती हैतब तक कुछ फारेनकुछ विजातीय दर्पण पर छाया रहता है। जब तक दर्पण पर कोई तस्वीर बनती हैतब तक दर्पण सिर्फ दर्पण नहीं होताकुछ और भी होता है। एक तस्वीर निकलती हैदूसरी बन जाती है। दूसरी निकलती हैतीसरी बन जाती है। दर्पण पर कुछ बहता रहता है। लेकिन जब कोई तस्वीर नहीं बनतीजब दर्पण सिर्फ दर्पण ही होता हैतब शून्य होता है।
चेतना सिर्फ दर्पण है। जब तक उस पर कोई तस्वीर बनती रहती है--कभी राग कीकभी विराग कीकभी मित्रता की,कभी शत्रुता कीकभी बाएं कीकभी दाएं की--कोई न कोई तस्वीर बनती रहती हैतो चेतना अशुद्ध होती है। लेकिन अगर कोई तस्वीर नहीं बनतीचेतना द्वंद्व के बाहरचुनाव के बाहर होती हैतो शून्य हो जाती है। शून्य चेतना में क्या बनता हैजब दर्पण शून्य होता हैतब दर्पण ही रह जाता है। जब चेतना शून्य होती हैतो सिर्फ चैतन्य ही रह जाती है।
वह जो चैतन्य की शून्य प्रतीति हैवही ब्रह्म का अनुभव है। वह जो शुद्ध चैतन्य की अनुभूति हैवही मुक्ति का अनुभव है। शून्य और ब्रह्मएक ही अनुभव के दो छोर हैं। इधर शून्य हुएउधर ब्रह्म हुए। इधर दर्पण पर तस्वीरें बननी बंद हुईं कि उधर भीतर से ब्रह्म का उदय हुआ। ब्रह्म के दर्पण पर तस्वीरों का जमाव ही संसार है।
हम असल में दर्पण की तरह व्यवहार ही नहीं करते। हम तो कैमरे की फिल्म की तरह व्यवहार करते हैं। कैमरे की फिल्म प्रतिबिंब को ऐसा पकड़ लेती है कि छोड़ती ही नहीं। फिल्म मिट जाती हैतस्वीर ही हो जाती है।
अगर हम कोई ऐसा कैमरा बना सकेंबना सकते हैंजिसमें कि एक तस्वीर के ऊपर दूसरी और दूसरी के ऊपर तीसरी ली जा सकेएक फिल्म पर अगर हजार तस्वीरेंलाख तस्वीरें ली जा सकेंतो जो स्थिति उस फिल्म की होगीवैसी स्थिति हमारे चित्त की है। तस्वीरों पर तस्वीरेंतस्वीरों पर तस्वीरें इकट्ठी हो जाती हैं। कनफ्यूजन के सिवाय कुछ नहीं शेष रहता। कोई शकल पहचान में भी नहीं आती है कि किसकी तस्वीर है। कुछ पता भी नहीं चलता कि क्या है। एक नाइटमेयरिशएक दुख-स्वप्न जैसा चित्त हो जाता है।
दर्पण तो फिर भी बेहतर है। एक तस्वीर बनती हैमिट जाती हैतब दूसरी बनती है। हमारा चित्त ऐसा दर्पण हैजो तस्वीरों को पकड़ता ही चला जाता हैइकट्ठा करता चला जाता हैतस्वीरें ही तस्वीरें रह जाती हैं।
उर्दू के किसी कवि की एक पंक्ति हैजिसमें उसने कहा है कि मरने के बाद घर से बस कुछ तस्वीरें ही निकली हैं। मरने के बाद हमारे घर से भी कुछ तस्वीरों के सिवाय निकलने को कुछ और नहीं है। जिंदगीभर तस्वीरों के संग्रह के अतिरिक्त हमारा कोई और कृत्य नहीं है।
कृष्ण कहते हैंशून्यनिर्द्वंद्व चित्त...। छोड़ो तस्वीरों कोजानो दर्पण को। मत करो चुनावक्योंकि चुनाव किया कि पकड़ा। पकड़ो ही मतनो क्लिंगिंग। रह जाओ वहीजो हो। उस शून्य क्षण में जो जाना जाता हैवही जीवन का परम सत्य हैपरम ज्ञान है।


प्रश्न: भगवान श्रीइस श्लोक में यह र्वात्तिक मिलाबहुत यथार्थ है। मगर एक मुश्किल पड़ जाती है कि त्रैगुण्यविषया वेदा। इसमें गीता सर्व वेद पर आक्षेप करती है कि वे त्रैगुण्य विषय से युक्त हैं! और दूसराउत्तरार्ध में निर्योगक्षेम आत्मवानतो आत्मवान होना न होना एक आंतरिक भाव हैतो श्रीकृष्ण उसको योगक्षेम प्रवृत्ति की बाह्य घटना से क्यों जोड़ते हुए दिखते हैंमात्र आत्मवान होने से योगक्षेम की समस्या हल हो सकेगी?


कृष्ण कहते हैंसमस्त वेद सगुण सेतीन गुणों से भरे हैंनिर्गुण नहीं हैं। शब्द निर्गुण नहीं हो सकतावेद ही नहीं,कृष्ण का शब्द भी निर्गुण नहीं हो सकता। और जब वे कहते हैं समस्त वेदतो उसका मतलब है समस्त शास्त्र,उसका मतलब है समस्त वचनउसका मतलब है समस्त ज्ञानजो कहा गयावह कभी भी तीन गुणों के बाहर नहीं हो सकता।
इसे ऐसा समझें कि जो भी अभिव्यक्त हैवह गुण के बाहर नहीं हो सकता। सिर्फ अव्यक्तअनभिव्यक्त,अनमैनिफेस्टेड निर्गुण हो सकता हैव्यक्त तो सदा ही सगुण होगा। असल में व्यक्त होने के लिए गुण का सहारा लेना पड़ता है। व्यक्त होने के लिए गुण की रूपरेखा लेनी पड़ती है। व्यक्त होने के लिए गुण का माध्यम चुनना पड़ता है। जैसे ही कुछ व्यक्त होगा कि गुण की सीमा में प्रवेश कर जाएगा।
वेद का अर्थ हैव्यक्त ज्ञानवेद का अर्थ हैशब्द में सत्य। जब सत्य को शब्द में रखेंगेतब सत्य की असीमता शेष न रह जाएगीवह सीमित हो जाएगा। कितना ही बड़ा शब्द होतो भी सत्य को पूरा न घेर पाएगाक्योंकि सत्य को पूरा घेरा नहीं जा सकता। कितनी ही बड़ी प्रतिमा होतो भी परमात्मा को पूरा न घेर पाएगीक्योंकि परमात्मा को पूरा घेरा नहीं जा सकता।
सब शब्दसब व्यक्त सीमा बनाते हैं। गुणों की सीमा बनाते हैं। गुण से ही व्यक्त होगा। एक बीज में वृक्ष निर्गुण हो सकता हैनिराकार हो सकता है। हैअभी कोई आकार नहीं है। लेकिन जब बीज फूटेगा और प्रकट होगातो वृक्ष आकार ले लेगा।
तो जहां वे कह रहे हैं वेद के संबंध मेंवह समस्त वक्तव्य के संबंध में कही गई बात है। उसमें गीता भी समाहित हो गई है। तो ऐसा नहीं है कि गीता वेद की कोई उपेक्षा कर रही है। वेद में भी ऐसे वचन हैंजो कहेंगेशब्द से उसे नहीं कहा जा सकता।
समस्त शास्त्रों की गहरी से गहरी कठिनाई यही है कि शास्त्र उसी को कहने की चेष्टा में संलग्न हैंजो नहीं कहा जा सकता है। शास्त्र उसी को बताने में संलग्न हैंजिसे बताने के लिए कोई उपाय नहीं है। शास्त्र उसी दिशा में इंगित कर रहे हैंजो अदिशा हैजो दिशा नहीं हैनो-डायमेंशन है।
अगर मुझे वृक्ष बताना होतो मैं इशारा कर दूं कि वह रहा। अगर मुझे तारा बताना होतो बता दूं कि वह रहा। लेकिन अगर मुझे परमात्मा बताना होतो अंगुली से नहीं बताया जा सकतामुट्ठी बांधकर बताना पड़ेगा और कहना पड़ेगायह रहा। क्योंकि अंगुली तो समव्हेयरकहीं बताएगीऔर जो एवरीव्हेयर हैउसे अंगुली से नहीं बताया जा सकता। अंगुली से बताने में भूल हो जाने वाली हैक्योंकि अंगुली तो कहीं इशारा करती है उसकोबाकी जगह भी तो वही है।
नानक गए मक्का। सो गए रात। पुजारी बहुत नाराज हुए। नानक को पकड़ा और कहा कि बड़े मूढ़ मालूम पड़ते हो! पवित्र मंदिर की तरफपरमात्मा की तरफ पैर करके सोते होतो नानक ने कहा कि मैं बड़ी मुसीबत में थामैं भी बहुत सोचाकोई उपाय नहीं मिला। तुम्हीं को मैं स्वतंत्रता देता हूंतुम मेरे पैर उस तरफ कर दोजहां परमात्मा न हो।
वे पुजारी मुश्किल में पड़े होंगे। पुजारी हमेशा नानक जैसे आदमी से मिल जाएतो मुश्किल में पड़ता है। क्योंकि पुजारी को धर्म का कोई पता नहीं होता। पुजारी को धर्म का कोई पता ही नहीं होता। उसे मंदिर का पता होता है। मंदिर की सीमा है।
मुश्किल में डाल दिया। वही सवाल है नानक का। नानक कहते हैंमेरे पैर उस तरफ कर दोजहां परमात्मा न होमैं राजी।
कहां करें पैरकहीं भी करेंगेपरमात्मा तो होगा। मंदिर नहीं होगाकाबा नहीं होगापरमात्मा तो होगा। तो फिर काबा में जो परमात्मा हैवह उसी परमात्मा से समतुल नहीं हो सकताजो सब जगह है।
तो काबा का परमात्मा सगुण हो जाएगा। मंदिर का परमात्मा सगुण हो जाएगा। शब्द का परमात्मा सगुण हो जाएगा। शास्त्र का परमात्मा सगुण हो जाएगा। बोलाकहाप्रकट हुआ कि सगुण हुआ। कृष्ण जो बोल रहे हैंवह भी सगुण हो जाता हैबोलते ही सगुण हो जाता है।
वेद की निंदा नहीं है वहवेद की सीमा का निर्देश है। शब्द की निंदा नहीं है वहशब्द की सीमा का निर्देश है। वचन की निंदा नहीं है वहवचन की सीमा का निर्देश है। और वह निर्देश करना जरूरी है। लेकिन कितना ही निर्देश करो,आदमी बहरा है। अगर कृष्ण की बात सुन ले कि वेद में जो हैवह सब त्रिगुण के भीतर हैतो वह कहेगाछोड़ो वेद कोगीता को पकड़ो। क्योंकि वेद में तो निर्गुण निराकार नहीं हैछोड़ो! छोटा हो गया वेदगीता को पकड़ो।
लेकिन समझ ही नहीं पाया वह। अगर कृष्ण कहीं देखते होंगेतो वे हंसते होंगे कि तुमने फिर दूसरा वेद बना लिया। यह सवाल वेद का नहीं हैयह सवाल व्यक्त की सीमा का है।
और दूसरी बात पूछी है कि अगर आत्मस्थिति को सीधा ही स्वीकार कर लिया जाएतो उसे योगक्षेम से क्यों जोड़ते हैं?
जोड़ते नहीं हैंजुड़ी है। सिर्फ कहते हैं। जोड़ते नहीं हैंजुड़ी है। जैसे एक दीया जलेतो दीया तो अपने में ही जलता है। अगर आस-पास कोई चीज न हो दिखाई पड़ने कोतो भी जलता है। दीए का जलनादीए का प्रकाश से भरना,किन्हीं प्रकाशित चीजों पर निर्भर नहीं होता। लेकिन दीया जलता हैतो चीजें प्रकाशित होती हैं। जो भी आस-पास होगावह प्रकाशित होगा।
और बड़े मजे की बात है कि आपने कभी भी प्रकाश नहीं देखा है अब तकसिर्फ प्रकाशित चीजें देखी हैं। प्रकाश नहीं देखा है किसी ने भी आज तकसिर्फ प्रकाशित चीजें देखी हैं। प्रकाशित चीजों की वजह से आप अनुमान करते हैं कि प्रकाश है। आप सोचेंगे कि मैं क्या बात कह रहा हूं! हम सब ने प्रकाश देखा है। फिर से सोचनाप्रकाश कभी किसी ने देखा ही नहीं।
यह वृक्ष दिखता है सूरज की रोशनी में चमकता हुआइसलिए आप कहते हैंसूरज की रोशनी है। फिर अंधेरा आ जाता है और वृक्ष नहीं दिखता हैआप कहते हैंरोशनी गई। लेकिन आपने रोशनी नहीं देखी है। देखें आकाश की तरफचीजें दिखाई पड़ेंगीरोशनी कहीं दिखाई नहीं पड़ेगी। जहां भी हैजो भी दिखाई पड़ रहा हैवह प्रकाशित हैप्रकाश नहीं।
कृष्ण के कहने का कारण है। वे कहते हैंजब कोई शून्य आत्मस्थिति को उपलब्ध होता हैतो योगक्षेम फलित होते हैं। आपको योगक्षेम ही दिखाई पड़ेंगे। आपको आत्मस्थिति दिखाई नहीं पड़ेगी। उस आत्मस्थिति के पास जो घटना घटती है योगक्षेम कीवही दिखाई पड़ेगी। जब कोई व्यक्ति आनंद को उपलब्ध होता हैतो आपको उसके भीतर की स्थिति दिखाई नहीं पड़ेगीउसके चारों तरफ सब आनंद से भर जाएगावही दिखाई पड़ेगा। जब कोई भीतर ज्ञान को उपलब्ध होता हैतो आपको उसके ज्ञान की स्थिति दिखाई नहीं पड़ेगीलेकिन उसके चारों तरफ ज्ञान की घटनाएं घटने लगेंगीवही आपको दिखाई पड़ेगा। भीतर तो शुद्ध अस्तित्व ही रह जाएगा आत्मा कालेकिन योगक्षेम उसके कांसिक्वेंसेस होंगे।
जैसे दीया जलेगाऔर चीजें चमकने लगेंगी। चीजें न हों तो भी दीया जल सकता हैलेकिन तब आपको दिखाई नहीं पड़ सकता है। अर्जुन आत्मवान होगायह उसकी भीतरी घटना है। अर्जुन का आत्मवान होनाचारों तरफ योगक्षेम के फूल खिला देगायह उसकी बाहरी घटना है। इसलिए वे दोनों का स्मरण करते हैं। और हम कैसे पहचानेंगे जो बाहर खड़े हैंवे आत्मवान को नहीं पहचानेंगेयोगक्षेम को पहचानेंगे।
मोहम्मद के बाबत कहा जाता है कि मोहम्मद जहां भी चलतेतो उनके ऊपर आकाश में एक बदली चलती साथछाया करती हुई। कठिन मालूम पड़ती है बात। मोहम्मद जहां भी जाएंतो उनके ऊपर एक बदली चले और छाया करे! लेकिन आदमी के पास शब्द कमजोर हैंइसलिए जो चीज गद्य में नहीं कही जा सकतीउसे हम पद्य में कहते हैं। पद्य हमारे गद्य की असमर्थता है। जब प्रोज़ में नहीं कह पातेतो पोएट्री निर्मित करते हैं। और जीवन में जो-जो गहरा हैवह गद्य में नहीं कहा जा सकताइसलिए जीवन का सब गहरा पद्य मेंपोएट्री में कहा जाता है।
यह पोएटिक एक्सप्रेशन है किसी अनुभूति कामोहम्मद जहां भी जातेवहां छाया पहुंच जाती। मोहम्मद जहां भी जाते,वहां आस-पास के लोगों को ऐसा लगता जैसे रेगिस्तानमरुस्थल के आदमी को लगेगा कि जैसे ऊपर कोई बादल आ गया हो और सब छाया हो गई हो। मोहम्मद जहां होतेवहां योगक्षेम फलित होता।
महावीर के बाबत कहा गया है कि महावीर अगर रास्ते से चलतेतो कांटे अगर सीधे पड़े होतेतो उलटे हो जाते। कोई कांटा फिक्र नहीं करेगासंभावना कम दिखाई पड़ती है।
लेकिन जिन्होंने यह लिखा हैउन्होंने कुछ अनुभव किया है। महावीर के आस-पास सीधे कांटे भी उलटे हो जाएं--कांटे नहींपर कांटापन। जिंदगी में बहुत कांटे हैंबहुत तरह के कांटे हैं। रास्तों पर बहुत कांटे हैं। और महावीर के पास जो लोग आए होंउन्हें अचानक लगा हो कि अब तक जो कांटे सीधे चुभ रहे थेवे एकदम उलटे हो गएनहीं चुभ रहे हैं;योगक्षेम फलित हुआ होतो कविता कैसे कहेआदमी कैसे कहेआदमी कहता है कि ऐसा हो जाता है। लेकिन भूल होती है हमें। हमें तो यही दिखाई पड़ता है। हम महावीर को पहचानेंगे भी कैसे कि वे महावीर हैंहम कैसे पहचानेंगे कि बुद्ध बुद्ध हैं?
तो बुद्ध के लिए हमने कहानियां गढ़ी हैं कि बुद्ध जिस गांव से निकलते हैंवहां केशर की वर्षा हो जाती है। हो नहीं सकतीउस केशर की नहींजो बाजार में बिकती है। लेकिन जिन लोगों के गांव से बुद्ध गुजरे हैंउनको जरूर केशर की सुगंध जैसाकेशर जैसा--उनके पास जो कीमती से कीमती शब्द रहा होगा--उसकी प्रतीति हुईउसका एहसास हुआ है। कुछ बरसा है उस गांव में जरूर। और आदमी की भाषा में कोई और शब्द नहीं होगातो कहा हैकेशर बरस गई है।
जब भीतर जीवन प्रकाशित होता हैतो बाहर भी प्रकाश की किरणें लोगों को छूती हैं। वे जब लोगों को छूती हैंतो योगक्षेम फलित होता है।
इसलिए कृष्ण कहते हैं और ठीक कहते हैं। कहना चाहिए। कहना जरूरी है। क्योंकि एक व्यक्ति के जीवन में भी जब आत्मा की घटना घटती हैतो उसके प्रकाश का वर्तुल दूर-दूर लोक-लोकांतर तक फैल जाता है। और एक व्यक्ति के भीतर भी जो स्वर बजता है आत्मा कातो उसकी स्वरलहरी दूसरों के प्राणों को भी झंकार से भर जाती है। और एक व्यक्ति के जीवन में जब आनंद फलित होता हैतो दूसरों के जीवन में भी आनंद के फूल थोड़े-से जरूर बरस जाते हैं।
इसलिए अर्जुन को तो कहते हैंतू आत्मवान हो जाएगाशक्ति-संपन्न हो जाएगा। लेकिन जब शक्ति-संपन्न होगा कोईभीतर आत्मवान होगा कोईतो इसे एक और दूसरी तरफ से देखने की कोशिश करें।
जब कोई व्यक्ति आत्महीन होता हैजब कोई व्यक्ति अपनी आत्मा को खो देता हैतो कभी आपने खयाल किया है कि उसके आस-पास दुखपीड़ा का जन्म होना शुरू हो जाता है! जब कोई एक व्यक्ति अपनी आत्मा को खोता हैतो अपने आस-पास दुख का एक वर्तुल पैदा कर लेता है! निर्भर करेगा कि कितनी उसने आत्मा खोई है।
अगर एक हिटलर जैसा आदमी पृथ्वी पर पैदा होतो विराट दुख का वर्तुल चारों ओर फलित होता है। योगक्षेम का पता ही नहीं चलतासब खो जाता है। उससे उलटा घटित होने लगता है। अकल्याण और अमंगल चारों ओर फैल जाता है। फैलेगा। चंगेज खां जैसा आदमी पैदा होता हैतो जहां से गुजर जाता हैवहां केशर नहीं बरसतीसिर्फ खून! सिर्फ खून ही बहता है।
बुरे आदमियों को हम भलीभांति पहचानते हैं। उनके आस-पास जो घटनाएं घटती हैंउन्हें भी पहचानते हैं। स्वभावतः,बुरे आदमी के आस-पास जो घटना घटती हैवह बहुत मैटीरियल होती हैबहुत भौतिक होती हैदिखाई पड़ती है।
चंगेज खां निकले आपके गांव सेतो मुश्किल है कि आप न देख पाएं। क्योंकि घटनाएं बहुत भौतिकमैटीरियल घटेंगी। चंगेज खां जिस गांव से निकलताउस गांव के सारे बच्चों को कटवा डालता। भालों पर बच्चों के सिर लगवा देता। और जब चंगेज खां से किसी ने पूछा कि तुम क्या कर रहे होदस-दस हजार बच्चे भालों पर लटके हैं! तो चंगेज खां ने हंसकर कहा कि लोगों को पता होना चाहिए कि चंगेज खां निकल रहा है।
बुद्ध भी निकलते हैं किसी गांव सेकृष्ण भी निकलते हैं किसी गांव सेजीसस भी निकलते हैं किसी गांव से--घटनाएं इम्मैटीरियल घटती हैंघटनाएं मैटीरियल नहीं होतीं। इसलिए जिनके पास थोड़ी संवेदनशील चेतना हैवे ही पकड़ पाते हैं। जिनके पास थोड़ा संवेदन से भरा हुआ मन हैजो रिस्पांसिव हैंवे ही पकड़ पाते हैं।
उसमें जो पकड़ में आता हैउसको कृष्ण कह रहे हैं योगक्षेम। वे जो पकड़ पाते हैंउनको पता लगता हैसब बदल गया। हवा और हो गईआकाश और हो गयासब और हो गया। यह जो सब और हो जाने का अनुभव हैइस अनुभव को कृष्ण कह रहे हैं योगक्षेम। उसे स्मरण दिलाना उचित है।
एक बात और खयाल में ले लेनी जरूरी है कि वे कह रहे हैंतू शक्ति-संपन्न हो जाएगा।
असल में मनुष्य तब तक शक्ति-संपन्न होता ही नहींजब तक स्वयं होता हैतब तक वह शक्ति-विपन्न ही होता है। असल में स्वयं होनाअहंकार-केंद्रित होनादीन होने की रामबाण व्यवस्था है। जितना मैं अहंकार से भरा हूंजितना मैं हूंउतना ही मैं दीन हूं। जितना मेरा अहंकार छूटता और मैं आत्मवान होता हूंजितना ही मैं मिटताउतना ही मैं सर्व से एक होता हूं। तब शक्ति मेरी नहींब्रह्म की हो जाती है। तब मेरे हाथ मुझसे नहीं चलतेब्रह्म से चलते हैं। तब मेरी वाणी मुझसे नहीं बोलतीब्रह्म से बोलती है। तब मेरा उठना-बैठना मेरा नहींउसका ही हो जाता है।
स्वभावतःउससे बड़ी और शक्ति-संपन्नता क्या होगीजिस दिन व्यक्ति अपने को समर्पित कर देता सर्व के लिए,उस दिन सर्व की सारी शक्ति उसकी अपनी हो जाती है। उस दिन होता है वह शक्ति-संपन्न।
शक्ति यहां पावर का प्रतीक नहीं है। शक्ति उन अर्थों में नहींजैसे किसी पद पर पहुंचकर कोई आदमी शक्तिशाली हो जाता हैकि कोई आदमी कल तक सड़क पर थाफिर मिनिस्टर हो गयातो शक्तिशाली हो गया। यह शक्ति व्यक्ति में नहीं होतीयह शक्ति पद में होती है। इसको कुर्सी से नीचे उतारोयह फिर विपन्न हो जाता है। यह शक्ति इसमें होती ही नहींयह इसके कुर्सी पर बैठने से होती है।
कभी सर्कस मेंकार्निवाल में आपने इलेक्ट्रिक चेयर देखी होकुर्सी जो इलेक्ट्रिफाइड होती है। उस पर एक लड़की या लड़के को बिठा रखते हैं। वह लड़का भी इलेक्ट्रिफाइड हो जाता है। फिर उस लड़के को छुएंतो शॉक लगता है। वह लड़के का शॉक नहीं हैकुर्सी का शॉक है। लड़के को कुर्सी से बाहर उतारेंगया। मोरारजी भाई कुर्सी पर और मोरारजी भाई कुर्सी के बाहर। इलेक्ट्रिफाइड चेयर! सर्कस है! मगर वह जो कुर्सी पर बैठा हुआ लड़का या लड़की हैजब आपको शॉक लगता हैतो उसकी शान देखें। वह समझता है कि शायद मैं शॉक मार रहा हूं। कुर्सी के शॉक हैं। लेकिन आइडेंटिफाइड हो जाता है आदमी।
पावर नहीं मतलब है कृष्ण की शक्ति का। कृष्ण की शक्ति का मतलब हैएनर्जीऊर्जाजो पद से नहीं आती। असल में जो पद-मात्र छोड़ने से आती है।
अहंकार पद को खोजता है। जो अहंकार को ही छोड़ देता हैउसके सब पद खो जाते हैं। उसके पास कोई पद नहीं रह जाता। वह शून्य हो जाता है। उस शून्य में विराट गूंजने लगता है। उस शून्य में विराट उतर आता है। उस शून्य में विराट के लिए द्वार मिल जाता है। तब वह एनर्जी हैपावर नहीं। तब वह ऊर्जा हैशक्ति हैउधार नहीं है। तब वह व्यक्ति मिटा और अव्यक्ति हो गया। तब व्यक्ति नहीं हैपरमात्मा है। और ऐसी स्थिति से वापस लौटना नहीं होता।
ध्यान रखेंपावर से वापस लौटना होता है। पद से वापस लौटना होता हैधन से वापस लौटना होता है। जो शक्ति भी किसी कारण से मिलती है और अहंकार की खोज से मिलती हैउससे लौटना होता है। लेकिन जो शक्ति अहंकार को खोकर मिलती हैवह प्वाइंट आफ नो रिटर्न हैउससे वापस लौटना नहीं होता है।
इसलिए एक बार व्यक्ति परमात्मा की शक्ति को जान लेता हैएक हो जाता हैवह सदा के लिए शक्ति-संपन्न हो जाता है। शायद यह कहना ठीक नहीं है कि शक्ति-संपन्न हो जाता हैउचित यही होगा कहना कि वह शक्ति-संपन्नता हो जाता है। शक्ति-संपन्न हो जाता हैतो ऐसा खयाल बनता है कि वह भी बचता है। नहींयह कहना ठीक नहीं है कि वह शक्ति-संपन्न हो जाता हैयही कहना ठीक है कि वह शक्ति हो जाता है। और ऐसी शक्ति अगर पद की है,धन की हैतो योगक्षेम फलित नहीं होंगे। ऐसी शक्ति अगर परमात्मा की हैतो योगक्षेम फलित होंगे।
इसलिए भी योगक्षेम की बात कर लेनी उचित है। क्योंकि ऐसी शक्तियां भी हैंजिनसे योगक्षेम से उलटा फलित होता है।
पावर-पालिटिक्स है सारी दुनिया में। जब भी कोई आदमी पोलिटिकली पावरफुल होने की यात्रा करता हैतो योगक्षेम फलित नहीं होता है। उससे उलटा ही फलित होता है। अमंगल ही फलित होता है। दुख ही फलित होता है।
तो शक्ति का यह स्मरण रहेभेद खयाल में रहेशक्ति का अर्थ पावर नहींएनर्जी। शक्ति का अर्थ अहंकार की खोज नहींअहंकार का विसर्जन। तो निश्चित ही योगक्षेम फलित होता है।


यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।। ४६।।
क्योंकि मनुष्य कासब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त होने परछोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता हैअच्छी प्रकार ब्रह्म को जानने वाले ब्राह्मण का भी सब वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।


कृष्ण कह रहे हैं कि जैसे छोटे-छोटे नदीत्तालाब हैंकुएं-पोखर हैंझरने हैंइन झरनों में नहाने से जो आनंद होता है,जो शुचिता मिलती हैऐसी शुचिता तो सागर में नहाने से मिल ही जाती है अनेक गुना होकर। शब्दों के पोखर में,शास्त्रों के पोखर में जो मिलता हैउससे अनेक गुना ज्ञान के सागर में मिल ही जाता है। वेद में जो मिलेगा--संहिता मेंशास्त्र मेंशब्द में--वह ज्ञानी को ज्ञान में तो अनंत गुना होकर मिल ही जाता है।
इसमें दो बातें ध्यान रखने जैसी हैं। एक तो यह कि जो सीमा में मिलता हैवह असीम में मिल ही जाता है। इसलिए असीम के लिए सीमित को छोड़ने में भय की कोई भी आवश्यकता नहीं है। अगर ज्ञान के लिए वेद को छोड़ना होतो कोई चिंता की बात नहीं है। सत्य के लिए शब्द को छोड़ना होतो कोई चिंता की बात नहीं है। अनुभव के लिए शास्त्र को छोड़ना होतो कोई चिंता की बात नहीं है--पहली बात। क्योंकि जो मिलता है यहांउससे अनंत गुना वहां मिल ही जाता है।
दूसरी बातसागर में जो मिलता हैज्ञान में जो मिलता हैअसीम में जो मिलता हैउस असीम में मिलने वाले को सीमित के लिए छोड़ना बहुत खतरनाक है। अपने घर के कुएं के लिए सागर को छोड़ना बहुत खतरनाक है। माना कि घर का कुआं हैअपना हैबचपन से जानापरिचित हैफिर भी कुआं है। घरों में कुएं से ज्यादा सागर हो भी नहीं सकते। सागरों तक जाना हो तो घरों को छोड़ना पड़ता है। घरों में कुएं ही हो सकते हैं।
हम सबके अपने-अपने घर हैंअपने-अपने वेद हैंअपने- अपने शास्त्र हैंअपने-अपने धर्म हैंअपने-अपने संप्रदाय हैं,अपने-अपने मोहग्रस्त शब्द हैं। हम सबके अपने-अपने--कोई मुसलमान हैकोई हिंदू हैकोई ईसाई है--सबके अपने वेद हैं। कोई इस मूर्ति का पूजककोई उस मूर्ति का पूजककोई इस मंत्र का भक्तकोई उस मंत्र का भक्त है। सबके अपने-अपने कुएं हैं।
कृष्ण यहां कह रहे हैंइनके लिए सागर को छोड़ना खतरनाक है। हांइससे उलटावाइस-वरसा हो सकता है। सागर के लिए इनको छोड़ने में कोई भी हर्ज नहीं है। क्योंकि जो इनमें मिलेगावह अनंत गुना होकर सागर में मिल ही जाता है।
इसलिए वह व्यक्ति अभागा हैजो अपने घर के कुएं के लिए--बाइबिलकुरानवेदगीता...गीता भी! गीता का कृष्ण ने उल्लेख नहीं कियाकैसे करते! क्योंकि जो वे कह रहे थेवही गीता बनने वाला था। गीता तब तक थी नहीं। मैं उल्लेख करता हूंगीता भी! जो इनमें मिलता हैइससे अनंत गुना होकर ज्ञान में मिल ही जाता है। इसलिए जो इनके कारण ज्ञान के लिए रुकावट बनाएइनके पक्ष में ज्ञान को छोड़ेवह अभागा है। लेकिन जो ज्ञान के लिए इन सबको छोड़ देवह सौभाग्यशाली है। क्योंकि जो इनमें मिलेगावह ज्ञान में मिल ही जाने वाला है।
लेकिन क्या मतलब हैज्ञान का और वेद काज्ञान का और शास्त्र का फासला क्या हैभेद क्या है?
गहरा फासला है। जो जानते हैंउन्हें बहुत स्पष्ट दिखाई पड?ता है। जो नहीं जानते हैंउन्हें दिखाई पड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है। क्योंकि किन्हीं भी दो चीजों का फासला जानने के लिए दोनों चीजों को जानना जरूरी है। जो एक ही चीज को जानता हैदूसरे को जानता ही नहींफासला कैसे निर्मित करेकैसे तय करे?
हम शास्त्र को ही जानते हैंइसलिए हम जो फासले निर्मित करते हैंज्यादा से ज्यादा दो शास्त्रों के बीच करते हैं। हम कहते हैंकुरान कि बाइबिलवेद कि गीताकि महावीर कि बुद्धकि जीसस कि जरथुस्त्र। हम जो फासले तय करते हैंवे फासले ज्ञान और शास्त्र के बीच नहीं होतेशास्त्र और शास्त्र के बीच होते हैं। क्योंकि हम शास्त्रों को जानते हैं। असली फासला शास्त्र और शास्त्र के बीच नहीं हैअसली फासला शास्त्रों और ज्ञान के बीच है। उस दिशा में थोड़ी-सी सूचक बातें खयाल ले लेनी चाहिए।
ज्ञान वह हैजो कभी भीकभी भी अनुभव के बिना नहीं होता है। ज्ञान यानी अनुभवऔर अनुभव तो सदा अपना ही होता हैदूसरे का नहीं होता। अनुभव यानी अपना। शास्त्र भी अनुभव हैलेकिन दूसरे का। शास्त्र भी ज्ञान हैलेकिन दूसरे का। ज्ञान भी ज्ञान हैलेकिन अपना।
मैं अपनी आंख से देख रहा हूंयह ज्ञान है। मैं अंधा हूंआप देखते हैं और मुझे कहते हैंयह शास्त्र है। नहीं कि आप गलत कहते हैं। ऐसा नहीं कि आप गलत ही कहते हैं। लेकिन आप कहते हैंआप देखते हैं। आप जो आंख से करते हैं,वह मैं कान से कर रहा हूं। फर्क पड़ने वाला है। कान आंख का काम नहीं कर सकता।
इसलिए शास्त्र के जो पुराने नाम हैंवे बहुत बढ़िया हैं। श्रुतिसुना हुआ--देखा हुआ नहीं। स्मृतिसुना हुआस्मरण किया हुआयाद किया हुआमेमोराइज्ड--जाना हुआ नहीं। सब शास्त्र श्रुति और स्मृति हैं। किसी ने जाना और कहा। हमने जाना नहीं और सुना। जो उसकी आंख से हुआवह हमारे कान से हुआ। शास्त्र कान से आते हैंसत्य आंख से आता है। सत्य दर्शन हैशास्त्र श्रुति हैं।
दूसरे का अनुभवकुछ भी उपाय करूं मैंमेरा अनुभव नहीं है। हांदूसरे का अनुभव उपयोगी हो सकता है। इसी अर्थ में उपयोगी हो सकता है--इस अर्थ में नहीं कि मैं उस पर भरोसा का लूंविश्वास कर लूंअंधश्रद्धालु हो जाऊंइस अर्थ में तो दुरुपयोग ही हो जाएगाहिन्ड्रेंस बनेगाबाधा बनेगा--इस अर्थ में उपयोगी हो सकता है कि दूसरे ने जो जाना हैउसे जानने की संभावना का द्वार मेरे लिए भी खुलता है। जो दूसरे को हो सका हैवह मेरे लिए भी हो सकता हैइसका आश्वासन मिलता है। जो दूसरे के लिए हो सकावह क्यों मेरे लिए नहीं हो सकेगाइसकी प्रेरणा। जो दूसरे के लिए हो सकावह मेरे भीतर छिपी हुई प्यास को जगाने का कारण हो सकता है। लेकिन बस इतना ही। जानना तो मुझे ही पड़ेगा। जानना मुझे ही पड़ेगाजीना मुझे ही पड़ेगाउस सागरत्तट तक मुझे ही पहुंचना पड़ेगा।
एक और मजे की बात है कि घर में जो कुएं हैंवे बनाए हुए होते हैंसागर बनाया हुआ नहीं होता। आपके पिता ने बनाया होगा घर का कुआंउनके पिता ने बनाया होगाकिसी ने बनाया होगा। जिसने बनाया होगाउसे एक सीक्रेट का पता हैउसे एक राज का पता है कि कहीं से भी जमीन को तोड़ोसागर मिल जाता है। कुआं है क्याजस्ट ए होलसिर्फ एक छेद है। आप यह मत समझना कि पानी कुआं है। पानी तो सागर ही हैकुआं तो सिर्फ उस सागर में झांकने का आपके आंगन में उपाय है। सागर तो है ही नीचे फैला हुआ। वही है। जहां भी जल हैवहीं सागर है। हां,आपके आंगन में एक छेद खोद लेते हैं आप। कुएं से पानी नहीं खोदतेकुएं से सिर्फ मिट्टी अलग करते हैंपरत तोड़ देते हैंएक छेद हो जाता हैअपने ही घर में सागर को झांकने का उपाय हो जाता है।
लेकिन कुआं बनाया हुआ है। और अगर कुआं इसकी खबर लाए--रिमेंबरेंस--कि सागर भी है और सागर की यात्रा करवा देतब तो कुआं सहयोगी हो जाता है। और अगर कुआं ही सागर बन जाए और हम सोचें कि यही रहा सागरतो फिर सागर कीअसीम की यात्रा नहीं हो पातीफिर हम कुएं के किनारे ही बैठे समाप्त होते हैं।
शास्त्र कुएं हैं। जो जानते हैंखोदते हैं। और शब्द की सीमा में छेद बनाते हैं। जो कहा जा सकता हैउसकी सीमा में छेद बनाते हैं। और अनकहे की थोड़ी-सी झलकथोड़ा-सा दर्शन करवाते हैं। इस आशा में कि इसको देखकर अनंत की यात्रा पर कोई निकलेगा। इसलिए नहीं कि इसे देखकर कोई बैठ जाएगा और तृप्त हो जाएगा।
कुआं सागर हैसीमा में बंधा। सागर कुआं हैअसीम में मुक्त। शास्त्र ज्ञान हैसीमा में बंधा। ज्ञान शास्त्र हैअसीम में मुक्त।
तो कृष्ण जब वेद कीशब्द की बात कर रहे हैंतो निंदा नहीं हैसिर्फ निर्देश है। और निर्देश स्मरण में रखने योग्य है।
अभी इतना ही। फिर सांझ बात करेंगे।

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