रविवार, 28 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-012

निष्काम कर्म
और अखंड मन की कीमिया

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।। ३९।।

हे पार्थयह सब तेरे लिए सांख्य (ज्ञानयोग) के विषय में कहा गया और इसी को अब (निष्काम कर्म) योग के विषय में सुन कि जिस बुद्धि से युक्त हुआ तूकर्मों के बंधन को अच्छी तरह से नाश करेगा।

अनंत हैं सत्य तक पहुंचने के मार्ग। अनंत हैं प्रभु के मंदिर के द्वार। होंगे ही अनंतक्योंकि अनंत तक पहुंचने के लिए अनंत ही मार्ग हो सकते हैं। जो भी एकांत को पकड़ लेते हैं--जो भी सोचते हैंएक ही द्वार हैएक ही मार्ग है--वे भी पहुंच जाते हैं। लेकिन जो भी पहुंच जाते हैंवे कभी नहीं कह पाते कि एक ही मार्ग हैएक ही द्वार है। एक का आग्रह सिर्फ उनका ही हैजो नहीं पहुंचे हैंजो पहुंच गए हैंवे अनाग्रही हैं।
कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैंअब तक जो मैंने तुझसे कहावह सांख्य की दृष्टि थी।

सांख्य की दृष्टि गहरी से गहरी ज्ञान की दृष्टि है। सांख्य का जो मार्ग हैवह परम ज्ञान का मार्ग है। इसे थोड़ा समझ लेंतो फिर आगे दूसरे मार्ग समझना आसान हो जाएगा।
पर कृष्ण ने क्यों सांख्य की ही पहले बात कर ली! सांख्य की इसलिए पहले बात कर ली कि अगर सांख्य काम में आ जाएतो फिर और कोई आवश्यकता नहीं है। सांख्य काम में न आ सकेतो ही फिर कोई और आवश्यकता है।
जापान में झेन साधना की एक पद्धति है। आज पश्चिम में झेन का बहुत प्रभाव है। आज का जो भी विचारशील वर्ग है जगत कापूरे जगत की इंटेलिजेंसियावह झेन में उत्सुक है। और झेन सांख्य का ही एक रूप है।
सांख्य का कहना यही है कि जानना ही काफी हैकरना कुछ भी नहीं हैनालेज इज़ इनफजानना पर्याप्त है। इस जगत की जो पीड़ा है और बंधन हैवह न जानने से ज्यादा नहीं है। अज्ञान के अतिरिक्त और कोई वास्तविक बंधन नहीं है। कोई जंजीर नहीं हैजिसे तोड़नी है। न ही कोई कारागृह हैजिसे मिटाना है। न ही कोई जगह हैजिससे मुक्त होना है। सिर्फ जानना है। जानना है कि मैं कौन हूंजानना है कि जो चारों तरफ फैला हैवह क्या हैसिर्फ अंडरस्टैंडिंगसिर्फ जानना।
जो लोग कृष्णमूर्ति से परिचित हैंउन्हें यह स्मरण में ले लेना उपयोगी होगा कि कृष्णमूर्ति का सारा विचार सांख्य है। लेकिन सांख्य को समझना कठिन है।
जैसे एक आदमी दुख में पड़ा हैहम उससे कहें कि केवल जान लेना है कि दुख क्या है और तू बाहर हो जाएगा। वह आदमी कहेगाजानता तो मैं भलीभांति हूं कि दुख है। जानने से कुछ नहीं होतामुझे इलाज चाहिएऔषधि चाहिए। कुछ करो कि मेरा दुख चला जाए।
एक आदमीजो वस्तुतः चिंतित और परेशान हैविक्षिप्त हैपागल हैउससे हम कहें कि सिर्फ जानना काफी है और तू पागलपन के बाहर आ जाएगा। वह आदमी कहेगाजानता तो मैं काफी हूंजानने को अब और क्या बचा है! लेकिन जानने से पागलपन नहीं मिटता। कुछ और करो! जानने के अलावा भी कुछ और जरूरी है।
कृष्ण ने अर्जुन को सबसे पहले सांख्य की दृष्टि कहीक्योंकि यदि सांख्य काम में आ जाए तो किसी और बात के कहने की कोई जरूरत नहीं है। न काम में आएतो फिर किसी और बात के कहने की जरूरत पड़ सकती है।
सुकरात का बहुत ही कीमती वचन हैजिसमें उसने कहा हैनालेज इज़ वर्च्यूज्ञान ही सदगुण है। वह कहता था,जान लेना ही ठीक हो जाना है। उससे लोग पूछते थे कि हम भलीभांति जानते हैं कि चोरी बुरी हैलेकिन चोरी छूटती नहीं! तो सुकरात कहतातुम जानते ही नहीं कि चोरी क्या है। अगर तुम जान लो कि चोरी क्या हैतो छोड़ने के लिए कुछ भी न करना होगा।
हम जानते हैंक्रोध बुरा हैहम जानते हैंभय बुरा हैहम जानते हैंकाम बुरा हैवासना बुरी हैलोभ बुरा हैमद-मत्सर सब बुरा हैसब जानते हैं। सांख्य या सुकरात या कृष्णमूर्तिवे सब कहेंगे: नहींजानते नहीं हो। सुना है कि क्रोध बुरा हैजाना नहीं है। किसी और ने कहा है कि क्रोध बुरा हैस्वयं जाना नहीं है। और जानना कभी भी उधार और बारोड नहीं होता। जानना सदा स्वयं का होता है। फर्क है दोनों बातों में।
एक बच्चे ने सुना है कि आग में हाथ डालने से हाथ जल जाता हैऔर एक बच्चे ने आग में हाथ डालकर देखा है कि हाथ जल जाता है। इन दोनों बातों में जमीन-आसमान का फर्क है। दोनों के वाक्य एक से हैं। जिसने सिर्फ सुना हैवह भी कहता हैमैं जानता हूं कि आग में हाथ डालने से हाथ जल जाता है। और जिसने आग में हाथ डालकर जाना है,वह भी कहता हैमैं जानता हूं कि आग में हाथ डालने से हाथ जल जाता है।
इन दोनों के वचन एक-से हैंलेकिन इन दोनों की मनःस्थिति एक-सी नहीं है। और जिसने सिर्फ सुना हैवह कभी हाथ डाल सकता है। और जिसने जाना हैवह कभी हाथ नहीं डाल सकता है। और जिसने सिर्फ सुना हैवह कभी हाथ डालकर कहेगा कि जानता तो मैं था कि हाथ डालने से हाथ जल जाता हैफिर मैंने हाथ क्यों डालावह जानने में भूल कर रहा है। दूसरे से मिला हुआ जाननाजानना नहीं हो सकता।
जिस जानने की सांख्य बात करता हैजिस नोइंग की सांख्य बात करता हैवह वह जानना हैजो उधार नहीं है। इस जानने से क्या हो जाएगाएक छोटी-सी कहानी से बात समझाने की कोशिश करूं।
दूसरे महायुद्ध में ऐसा हुआ कि एक आदमी युद्ध-स्थल पर आहत हो गया। जब होश में आया बेहोशी सेतो पता चला कि उसे सब स्मरण भूल गया हैवह अपना सब अतीत भूल चुका है। उसे यह भी पता नहीं है कि उसका नाम क्या है! कठिनाई न आतीक्योंकि सेना में नाम की कोई जरूरत नहीं होती। लेकिन उसका नंबर भी खो गया युद्ध के स्थल पर।
सेना में तो आदमी नंबर से जाना जाता हैसेना में नाम से नहीं जाना जाता। सुविधा है नंबर से जानने में। और जब पता चलता है कि ग्यारह नंबर आज मर गयातो कोई तकलीफ नहीं होती। क्योंकि नंबर के न बाप होतेन मां होती,न बेटा होता। नंबर का कोई भी नहीं होता। नंबर मर जाता हैमर जाता है। तख्ती पर सूचना लग जाती है कि इतने नंबर गिर गए। किसी को कहीं कोई पीड़ा नहीं होती। नंबर रिप्लेस हो जाते हैं। दूसरा नंबर ग्यारह नंबर उसकी जगह आ जाता है। किसी आदमी को रिप्लेस करना मुश्किल हैलेकिन नंबर को रख देना नंबर की जगह कोई कठिन नहीं है। यह मिलिटरी तो नंबर से चलती है। दफ्तर में नाम होते हैंरजिस्टर में।
लेकिन उसका नंबर भी खो गया है। उसे नाम याद नहीं रहा। अब वह कौन हैअब क्या करेंउसे कहां भेजेंउसका घर कहां हैउसके मां-बाप कहां हैंबहुत कोशिश कीखोज-बीन कीकुछ पता नहीं चल सका। फिर आखिर किसी ने सुझाव दिया कि एक ही रास्ता है कि उसे इंग्लैंड के गांव-गांव में घुमाया जाए। शायद कहीं उसे देखकर याद आ जाए कि यह मेरा घर हैयह मेरा गांव है। शायद वह जान ले।
फिर उसे ले गए। स्टेशनों पर उसे उतारकर खड़ा कर देतेवह देखता रह जाताकुछ याद न आता। फिर तो जो ले गए थे घुमानेवे भी थक गए। एक छोटे स्टेशन परजिस पर उतरकर देखने का इरादा भी नहीं हैगाड़ी खड़ी हैचलने को है। उस आदमी ने खिड़की से झांककर देखा और उसने कहामेरा गांव! उतराबताना ही भूल गयाकि जो साथ थे उनको बता दे। भागासड़क पर आ गया। चिल्लायामेरा घर! दौड़ागली में पहुंचा। दरवाजे के सामने खड़े होकर कहा,मेरी मां! लौटकर पीछे देखासाथी पीछे भागकर आए हैं। उनसे बोलायह रहा मेरा नाम। याद आ गया।
सांख्य कहता हैआत्मज्ञान सिर्फ रिमेंबरेंस हैसिर्फ स्मरण है। कुछ खोया नहीं हैकुछ मिटा नहीं हैकुछ गया नहीं हैकुछ नया बना नहीं हैसिर्फ स्मृति खो गई है। और जिसे हम जानने जा रहे हैंअगर वह नया जानना हैतब तो फिर कुछ और करना पड़ेगा। लेकिन अगर वह भूला हुआ ही हैजिसे पुनः जानना हैतब कुछ करने की जरूरत नहीं हैजान लेना ही काफी है।
तो कृष्ण ने कहा कि अभी जो मैंने तुझसे कहा अर्जुनवह सांख्य की दृष्टि थी। इस पूरे वक्त कृष्ण ने सिर्फ स्मरण दिलाने की कोशिश कीकि आत्मा अमर हैन उसका जन्म हैन उसकी मृत्यु है। स्मरण दिलाया कि अव्यक्त था,अव्यक्त होगाबीच में व्यक्त का थोड़ा-सा खेल है। स्मरण दिलाया कि जो तुझे दिखाई पड़ते हैंवे पहले भी थेआगे भी होंगे। स्मरण दिलाया कि जिन्हें तू मारने के भय से भयभीत हो रहा हैउन्हें मारा नहीं जा सकता है।
इस पूरे समय कृष्ण क्या कर रहे हैंकृष्ण अर्जुन कोजैसे उस सिपाही को घुमाया जा रहा है इंग्लैंड मेंऐसे उसे किसी विचार के लोक में घुमा रहे हैं कि शायद कोई विचार-कणकोई स्मृति चोट कर जाए और वह कहे कि ठीक,यही है। ऐसा ही है। लेकिन ऐसा वह नहीं कह पाता।
वह शिथिल गातअपने गांडीव को रखेउदास मनवैसा ही हताशविषाद से घिरा बैठा है। वह कृष्ण की बातें सुनता है। वह उसे पूरे इंग्लैंड में घुमा दिए--हर स्टेशनहर जगह। कहीं भी उसे स्मरण नहीं आता कि वह दौड़कर कहेकि यह रहा मैंठीक हैबात अब बंद करोपहचान आ गईरिकग्नीशन हुआप्रत्यभिज्ञा हुईस्मरण आ गया है। ऐसा वह कहता नहीं। वह बैठा है। वह रीढ़ भी नहीं उठातावह सीधा भी नहीं बैठता। उसे कुछ भी स्मरण नहीं आ रहा है।
इसलिए कृष्ण उससे कहते हैं कि अब मैं तुझसे कर्मयोग की बात कहता हूं। सांख्ययोग श्रेष्ठतम योग है। अब मैं तुझसे कर्मयोग की बात करता हूं। वे जो जानने से ही नहीं जान सकतेजिन्हें कुछ करना ही पड़ेगाजो बिना कुछ किए स्मरण ला ही नहीं सकते-- अब मैं तुझसे कर्मयोग की बात कहता हूं।


प्रश्न: भगवान श्रीझेन बुद्धिज्म मेंजैसे कि अद्वैत वेदांत में ब्रह्म आता हैतो झेन बुद्धिज्म में तो कुछ ऐसा है नहींतो आप साम्यता जो बता रहे हैंउसकी स्पष्टता करें। और दूसरी बात यह है कि वेस्टर्न फिलासफर्स सांख्य का कभी पुरस्कार करते हैंतो इसलिए कि सांख्य निरीश्वरवादी है। लेकिन कोई-कोई विद्वान ऐसा कहते हैं कि सांख्य निरीश्वरवादी नहीं है। तो यह भी है। तो वेस्टर्न फिलासफर्स निरीश्वरवादी हैइसलिए सांख्य का स्वीकार करते हैंऔर झेन और सांख्य दोनों में ब्रह्म तत्व का स्थान क्या हो सकता है?


झेन और सांख्य के बीच जो साम्य मैंने कहाउस साम्य का कारण है। ब्रह्म की चर्चा नहींउस साम्य का कारण है ज्ञान की प्रधानता। झेन कहता हैकरने को कुछ भी नहीं हैऔर जो करेगावह व्यर्थ ही भटकेगा। झेन तो यहां तक कहता है कि तुमने खोजा कि तुम भटके। खोजो ही मतखड़े हो जाओ और जान लो। क्योंकि तुम वही होजिसे तुम खोज रहे हो। झेन कहता हैजिसने प्रयास कियावह मुश्किल में पड़ेगा। क्योंकि जिसे हमें पाना हैवह प्रयास से पाने की बात नहीं है। केवल अप्रयास मेंएफर्टलेसनेस में जानने की बात है।
झेन कहता हैपा सकते हैं श्रम से उसेजो हमारा नहीं है। पा सकते हैं श्रम से उसेजो हमें मिला हुआ नहीं है। धन पाना हो तो बिना श्रम के नहीं मिलेगाधन पाने के लिए श्रम करना होगा। धन हमारा कोई स्वभाव नहीं है। एक आदमी को दूसरे के घर जाना होतो रास्ता चलना पड़ेगाक्योंकि दूसरे का घर अपना घर नहीं है। लेकिन एक आदमी अपने घर में बैठा हो और पूछता हो कि मुझे मेरे घर जाना हैमैं किस रास्ते से जाऊंतो झेन कहता हैजाना ही मतअन्यथा घर से दूर निकल जाओगे।
एक छोटी-सी कहानी मुझे याद आती हैजो झेन फकीर कहते हैं। वे कहते हैंएक आदमी ने शराब पी ली। शराब पीकर आधी रात अपने घर पहुंचा। हाथ-पैर डोलते हैंआंखों को ठीक दिखाई नहीं पड़ता। ऐसे भी अंधेरा हैभीतर नशा हैबाहर अंधेरा है। टटोल-टटालकर किसी तरह अपने दरवाजे तक पहुंच गया है। और फिर थक गया है। बहुत देर से भटक रहा है। फिर जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि कोई मुझे मेरे घर पहुंचा दो। मेरी मां राह देखती होगी।
पास-पड़ोस के लोग उठ आए। और उन्होंने कहापागल तो नहीं हो गए हो! तुम अपने ही घर के सामने खड़े होअपने ही घर की सीढ़ियों पर। यही तुम्हारा घर है। लेकिन वह आदमी इतना परेशानी में चिल्ला रहा है कि मुझे मेरे घर पहुंचा दोमुझे मेरे घर जाना हैमेरी बूढ़ी मां राह देखती होगीकि सुने कौन! सुनने के लिए भी तो चुप होना जरूरी है। वह आदमी चिल्ला रहा है। पास-पड़ोस के लोग उससे कह रहे हैंयही तुम्हारा घर है।
लेकिन यही तुम्हारा घर है--यह भीतर कैसे प्रवेश करेवह आदमी तो भीतर चिल्ला रहा हैमेरा घर कहां हैशोरगुल सुनकर उसकी बूढ़ी मां भी उठ आईजिसकी तलाश में वह है। उसने दरवाजा खोलाउसने उसके सिर पर हाथ रखा और कहाबेटा तुझे क्या हो गया है! उसने उसके ही पैर पकड़ लिए और उसने कहा कि मेरी बूढ़ी मां राह देखती होगी;मुझे रास्ता बताओ कि मेरा घर कहां है?
तो पास-पड़ोस में कोई मजाक करने वाले लोग एक बैलगाड़ी लेकर आ गए और उन्होंने कहा कि बैठोहम तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचा देते हैं। वह आदमी बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने कहा कि यह भला आदमी है। ये सारे लोग मुझे घर पहुंचाने का कोई उपाय ही नहीं करते! कोई उपाय नहीं करतान कोई बैलगाड़ी लातान कोई घोड़ा लातान मेरा कोई हाथ पकड़ता। तुम एक भले आदमी हो। उसने उसके पैर पड़े। वह आदमी हंसता रहा। उसे बैलगाड़ी में बिठायादस-बारह चक्कर लगाए घर केफिर उसे द्वार के सामने उतारा। फिर वह कहने लगाधन्यवाद! बड़ी कृपा कीमुझे मेरे घर पहुंचा दिया।
अब कृष्ण अर्जुन से कोशिश कर चुके पहली वाली कि यही तेरा घर है। अब नहीं मानतातो बैलगाड़ी जोतते हैं। वे कहते हैंकर्मयोग में चल। अब तू चक्कर लगा। अब तू दस-पांच चक्कर लगा लेफिर ही तुझे खयाल में आ सकता है कि पहुंचा। बिना चले तू स्वयं तक भी नहीं पहुंच सकता है।
झेन कहता है कि जिसे हम खोज रहे हैंवह वहीं है जहां हम हैंइंचभर का फासला नहीं है। इसलिए जाओगे कहां?खोजोगे कैसेश्रम क्या करोगेअसल में श्रम करके हम पराए को पा सकते हैंस्वयं को नहीं। स्वयं तो सब श्रम के पहले उपलब्ध है।
तो झेन और सांख्य का जो साम्य मैंने कहावह इसलिए कहा कि सांख्य भी कर्म को व्यर्थ मानता हैकोई अर्थ नहीं है कर्म का। झेन भी कर्म को व्यर्थ मानता हैकोई अर्थ नहीं कर्म का। क्योंकि जिसे जानना हैवह सब कर्मों के पहले ही मिला हुआ हैआलरेडी एचीव्ड।
तो जो अड़चन हैजो कठिनाई हैजो समझ में हमें नहीं आतीवह इस तरह की है कि कोई चीज जो हमें मिली हुई नहीं हैउसे पाना हैयह एक बात है। और कोई चीज जो हमें मिली ही हैउसे सिर्फ जानना हैयह बिलकुल दूसरी बात है। यदि आत्मा भीतर है हीतो कहां खोजना हैऔर अगर मैं ब्रह्म हूं हीतो क्या करना हैकरने से क्या संबंध हैकरने से क्या होगा?
नहींन-करने में उतरना होगानान-एक्शन में उतरना होगाअकर्म में उतरना होगा। छोड़ देना होगा करना-वरना और थोड़ी देर रुककर उसे देखना होगाजो करने के पीछे खड़ा हैजो सब करने का आधार हैफिर भी करने के बाहर है।
एक और झेन कहानी मुझे याद आती है कि झेन में कोई पांच सौ वर्ष पहलेएक बहुत अदभुत फकीर हुआबांकेई। जापान का सम्राट उसके दर्शन को गया। बड़ी चर्चा सुनीबड़ी प्रशंसा सुनीतो गया। सुना उसने कि दूर-दूर पहाड़ पर फैली हुई मोनेस्ट्री हैआश्रम है। कोई पांच सौ भिक्षु वहां साधना में रत हैं। तो गया। बांकेई से उसने कहाएक-एक जगह मुझे दिखाओ तुम्हारे आश्रम कीमैं काफी समय लेकर आया हूं। मुझे बताओ कि तुम कहां-कहां क्या-क्या करते होमैं सब जानना चाहता हूं।
आश्रम के दूर-दूर तक फैले हुए मकान हैं। कहीं भिक्षु रहते हैंकहीं भोजन करते हैंकहीं सोते हैंकहीं स्नान करते हैं,कहीं अध्ययन करते हैं--कहीं कुछकहीं कुछ। बीच मेंआश्रम के सारे विस्तार के बीच एक बड़ा भवन हैस्वर्ण-शिखरों से मंडित एक मंदिर है।
बांकेई ने कहाभिक्षु जहां-जहां जो-जो करते हैंवह मैं आपको दिखाता हूं। फिर वह ले चला। सम्राट को ले गया भोजनालय में और कहायहां भोजन करते हैं। ले गया स्नानगृहों में कि यहां स्नान करते हैं भिक्षु। ले गया जगह-जगह। सम्राट थकने लगा। उसने कहा कि छोड़ो भीये सब छोटी-छोटी जगह तो ठीक हैंवह जो बीच में स्वर्ण-शिखरों से मंडित मंदिर हैवहां क्या करते होवहां ले चलो। मैं वह देखने को बड़ा आतुर हूं।
लेकिन न मालूम क्या हो कि जैसे ही सम्राट उस बीच में उठे शिखर वाले मंदिर की बात करेबांकेई एकदम बहरा हो जाएवह सुने ही न। एक दफा सम्राट ने सोचा कि शायद चूक गयाखयाल में नहीं आया। फिर दुबारा जोर से कहा कि और सब बातें तो तुम ठीक से सुन लेते हो! यह स्नानगृह देखने मैं नहीं आयायह भोजनालय देखने मैं नहीं आयाउस मंदिर में क्या करते होलेकिन बांकेई एकदम चुप हो गयावह सुनता ही नहीं। फिर घुमाने लगा--यहां यह होता हैयहां यह होता है।
आखिर वापस द्वार पर लौट आएउस बीच के मंदिर में बांकेई नहीं ले गया। सम्राट घोड़े पर बैठने लगा और उसने कहाया तो मैं पागल हूं या तुम पागल हो। जिस जगह को मैं देखने आया थातुमने दिखाई ही नहीं। तुम आदमी कैसे होऔर मैं बार-बार कहता हूं कि उस मंदिर में ले चलोवहां क्या करते हैंतुम एकदम बहरे हो जाते हो। सब बात सुनते होइसी बात में बहरे हो जाते हो!
बांकेई ने कहाआप नहीं मानते तो मुझे उत्तर देना पड़ेगा। आपने कहावहां-वहां ले चलोजहां-जहां भिक्षु कुछ करते हैंतो मैं वहां-वहां ले गया। वह जो बीच में मंदिर हैवहां भिक्षु कुछ भी नहीं करते। वहां सिर्फ भिक्षु भिक्षु होते हैं। वह हमारा ध्यान मंदिर हैमेडिटेशन सेंटर है। वहां हम कुछ करते नहींसिर्फ होते हैं। वहां डूइंग नहीं हैवहां बीइंग है। वहां करने का मामला नहीं है। वहां जब करने से हम थक जाते हैं और सिर्फ होने का आनंद लेना चाहते हैंतो हम वहां भीतर जाते हैं। अब मेरी मजबूरी थीआपने कहा थाक्या करते हैंवहां ले चलो।
अगर मैं उस भवन में ले जाताआप पूछते कि भिक्षु यहां क्या करते हैंतो मैं क्या कहताऔर नहीं करने की बात आप समझ सकतेइसकी मुझे आशा नहीं है। अगर मैं कहताध्यान करते हैंतो भी गलती होतीक्योंकि ध्यान कोई करना नहीं हैध्यान कोई एक्शन नहीं है। अगर मैं कहताप्रार्थना करते हैंतो भी गलती होतीक्योंकि प्रार्थना कभी कोई कर नहीं सकतावह कोई एक्ट नहीं हैभाव है। तो मैं मुश्किल में पड़ गयाइसलिए मुझे मजबूरी में बहरा हो जाना पड़ा। फिर मैंने सोचाबजाय गलत बोलने के यही उचित है कि आप मुझे पागल या बहरा समझकर चले जाएं।
झेन कहता हैध्यान अर्थात न-करना। इस न-करने में ही वह जाना जाता हैजो है। सांख्य और झेन का इस वजह से साम्य है। झेन बात नहीं करता ब्रह्म की। क्योंकि झेन का कहना यह है कि जब तक ध्यान नहींजब तक ज्ञान नहीं,तब तक ब्रह्म की बात व्यर्थ है। और जब ज्ञान हुआध्यान हुआतब भी ब्रह्म की बात व्यर्थ है। क्योंकि जिसे हमने नहीं जानाउसकी बात क्या करें! और जिसे हमने जान लियाउसकी बात की क्या जरूरत है! इसलिए झेन चुप हैवह मौन हैवह ब्रह्म की बात नहीं करता।
लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि ब्रह्म नहीं जानता। यह तो निर्भर करेगा व्यक्तियों पर। सांख्य बात करता है,इसी आशा में कि शायद उसकी चर्चा--उसकी चर्चा से उसे जाना नहीं जा सकतालेकिन उसकी चर्चा शायद किसी के मन में छिपी हुई प्यास पर चोट बन जाए। शायद उसकी चर्चा किसी के मन में चल रही आकांक्षा को मार्ग दे दे। शायद उसकी चर्चा ऊंट के लिए आखिरी तिनका सिद्ध हो जाए। कोई बिलकुल बैठने को ही था ऊंटएक तिनका और--एक तिनके से कहीं ऊंट बैठा है! लेकिन शायद किसी बैठते ऊंट को तिनका सिद्ध हो जाएवह बैठ जाए।
इसलिए सांख्य बात करता है। लेकिन कैसे मिलेगा वहकुछ करने सेनहींजानने से। जानना और करनाडूइंग और नोइंग का जो फर्क हैउस मामले में झेन और सांख्य बिलकुल समान हैं। और जगत में जितने भी परम ज्ञानी हुए हैं,उन सब परम ज्ञानियों की बातों में सांख्य तो होगा ही। सांख्य से बचा नहीं जा सकता। सांख्य तो होगा ही। यह हो सकता है कि किसी की चर्चा में शुद्ध सांख्य हो। तब ऐसा आदमी बहुत कम लोगों के काम का रह जाएगा।
जैसे बुद्ध। बुद्ध की चर्चा शुद्ध सांख्य है। इसलिए हिंदुस्तान से बुद्ध के पैर उखड़ गए। क्योंकि सिर्फ जाननासिर्फ जाननासिर्फ जानना! करना कुछ भी नहीं! वह जो इतना बड़ा जगत हैजहां सब करने वाले इकट्ठे हैंवे कहते हैं कि कुछ तो करने को बताओकुछ पाने को बताओ! बुद्ध कहते हैंन कुछ पाने को हैन कुछ करने को। झेन जो हैवह बुद्धिज्म की शाखा है। वह शुद्धतम बुद्ध का विचार है। लेकिन हिंदुस्तान के बाहर बुद्ध के पैर जम गए--चीन में,बर्मा मेंथाईलैंड मेंतिब्बत में। क्योंकि जो अशुद्धि करने के लिए बुद्ध का विचार हिंदुस्तान में राजी नहीं हुआतो यहां उसके पैर उखड़ गएतो वही समझौता उसे करना पड़ाजो यहां करने को राजी नहीं हुआ।
तिब्बत में वह करना बन गयारिचुअल बन गया। चीन में जाकर उसने करने के लिए स्वीकृति दे दी कि ऐसा-ऐसा करो। थाईलैंड में वह करना बन गयालंका में करना बन गया। वह कर्मयोग बना। जब तक वह सांख्य रहा शुद्धतब तक उसकी जड़ें फैलनी मुश्किल हो गईं।
थोड़े से लोगों की ही पकड़ में आ सकती है शुद्ध सांख्य की बात। इसलिए श्रेष्ठतम विचार सांख्य ने दियालेकिन सांख्य को मानने वाला आदमी हिंदुस्तान में खोजे से नहीं मिलेगा। सब तरह केहजार तरह के मानने वाले आदमी मिल जाएंगेसांख्य को मानने वाला आदमी नहीं मिलेगा। सांख्य के लिए समर्पित एक मंदिर नहीं है। सांख्य के जन्मदाता के लिए समर्पित एक मूर्ति नहीं है।
असल में जो एब्सोल्यूट ट्रुथ की बात करेंगेउनको राजी होना चाहिए कि आम जनता तक उनकी खबर मुश्किल से पहुंचेगी। जो पूर्ण सत्य की बात करेंगेउनको राजी रहना चाहिए कि उनकी बात बहुत आकाश में घूमती रहेगी। जमीन तक उतारना बहुत मुश्किल है। क्योंकि यहां जमीन पर सिर्फ अशुद्ध सत्य उतरते हैं। यहां जमीन पर जिस सत्य को भी पैर जमाने होंउसे जमीन के साथ समझौता करना पड़ता है।
कृष्ण ने पहले नानकंप्रोमाइजिंग सांख्य की बात की। कहा कि मैं तुझे सांख्य की बुद्धि बताता हूं। लेकिन देखा कि अर्जुन के भीतर उसकी जड़ें नहीं पहुंच सकतीं। इसलिए दूसरेसेकेंडरी वे कहते हैंअब मैं तुझसे कर्मयोग की बात कहता हूं।
और एक बात और पूछी है कि पश्चिम में क्या सांख्य की चर्चा जिन दार्शनिकों ने की हैउनका कारण यही तो नहीं है कि सांख्य निरीश्वरवादी है?
असल में जो भी ब्रह्मवादी हैवह ईश्वरवादी हो नहीं सकता। जो भी ब्रह्मवादी हैवह ईश्वरवादी हो नहीं सकता। अगर वह ईश्वर को जगह भी देगातो वह माया के भीतर ही होगी जगहबाहर नहीं हो सकती। वह इलूजन के भीतर ही होगी। या तो वह कह देगाकोई ईश्वर नहीं हैब्रह्म पर्याप्त हैअव्यक्त पर्याप्त है। या अगर समझौता किया उसने आपसेतो वह कहेगाईश्वर हैवह भी अव्यक्त का एक रूप हैलेकिन माया के घेरे के भीतर। वह सिर्फ आपसे समझौता कर रहा है।
सांख्य के जो मौलिक सूत्र हैंवे शुद्धतम हैं। उनमें ईश्वर की कोई जगह नहीं है। ईश्वर का मतलब समझ लेना आप,ब्रह्म का फर्क समझ लेना।
ईश्वर का मतलब हैदि क्रिएटरसृजन करने वाला। ब्रह्म का अर्थ हैशुद्धतम जीवन की ऊर्जा। ईश्वर के पहले भी ब्रह्म है। ईश्वर भी बनते और मिटते हैंईश्वर भी आते और जाते हैं। ईश्वर हमारी धारणाएं हैं।
इसे ऐसा समझें कि मैं एक अंधेरी रात में चल रहा हूं। दूरदो-चार मील दूर कुछ दिखाई पड़ता है। लगता है कि कोई पुलिस वाला खड़ा है। और मीलभर चलकर आता हूं पासतो दिखाई पड़ता हैपुलिस वाला नहीं हैकोई झाड़ का ठूंठ है। और मीलभर चलकर आता हूंतो पाता हूंझाड़ का ठूंठ भी नहीं हैस्वतंत्रता का स्मारक है। जो हैवह वही है। और पता नहीं मीलभर बाद चलकर पता क्या चले! जो हैवह तो वही है। मैं आगे आता जा रहा हूं।
जो लोग ब्रह्म की यात्रा पर निकलते हैंयात्रा के अंत पर जिसे पाते हैंवह ब्रह्म है। और यात्रा पास आती जाती है,पास आती जाती हैउस पास आते जाते में जिसे पाते हैंवह ईश्वर है। ईश्वर ब्रह्म को दूर से देखा गया कंसेप्शन है,धारणा है। हम सोच ही नहीं सकते ब्रह्म को। जब हम सोचते हैंतब हम ईश्वर बना लेते हैं। निर्गुण को हम सोच ही नहीं सकतेजब सोचते हैं तो सगुण बना लेते हैं। निराकार को हम सोच नहीं सकतेजब सोचते हैं तो उसे भी आकार दे देते हैं।
ब्रह्म मनुष्य के मन से जब देखा जाता हैतब ईश्वर निर्मित होता है। यह ईश्वर मनुष्य का निर्माण है। जैसे-जैसे आगे जाएगाविचार छोड़ेगाछोड़ेगा और निर्विचार होगाउस दिन पाएगाईश्वर भी खो गया। अब जो शेष रह जाता है निराकारनिर्गुणवही ब्रह्म है।
तो शुद्धतम सूत्र में तो सांख्य राजी नहीं है। क्योंकि सांख्य कहता हैबीच के मुकाम बनाने नहीं हैं। लेकिन सांख्य की भी बाद में एक दूसरी धारा फूटी। निरीश्वर सांख्य तो था हीलेकिन वह भी हवा में खोने लगातो सेश्वर सांख्य भी निर्मित हुआ। कुछ लोगों ने समझौते किए और सांख्य में भी ईश्वर को जोड़ा। और कहा कि काम नहीं चलेगाक्योंकि आदमी ब्रह्म को पकड़ नहीं पाताउसके लिए बीच की मंजिलें बनानी पड़ेंगी। और न ही पकड़ पाएइससे तो अच्छा है कि चार कदम चले और ईश्वर को पकड़े। फिर ईश्वर को छुड़ा लेंगे। चलने को ही जो राजी न होउसे चार कदम चलाओ। चार कदम चलने के बाद कहेंगे कि यह जो तुम्हें दिखाई पड़ता थागलत दिखाई पड़ता थाइसे छोड़ो। और चार कदम चलो। हो सकता हैबीच में कई ईश्वर के मंदिर खड़े करने पड़ें--इससे पहले कि ब्रह्म का अव्यक्तब्रह्म का निराकार मंदिर प्रकट हो।
पश्चिम में जो सांख्य का प्रभाव हैवह निरीश्वरवादी होने की वजह से नहीं है। पश्चिम में भी जो बुद्धिमान,विचारशील आदमी पैदा हुआ हैवह भी जानता है कि बात तो सिर्फ ज्ञान की ही हैसिर्फ जान लेने की ही है। अगर हमें समझ में न आएतो वह हमारी मजबूरी हैलेकिन बात केवल जान लेने की है। अगर इकहार्ट से पूछेंया प्लेटिनस से पूछेंया बोहेम से पूछेंतो पश्चिम में भी जो आदमी जानता हैवह कहेगाबात तो यही है कि सिर्फ जान लेना हैऔर कुछ भी नहीं करना है। जरा हिले करने के लिए--कि चूक हुई। क्योंकि करना बिना हिले न होगा। करेंगे तो हिलना ही पड़ेगा। और वह जो अकंप हैवह हम जरा भी हिले कि खोया।
उसी की तरह अकंप हो जाना पड़ेगा। जैसे दीए की लौ किसी बंद घर में--जहां हवा के झोंके न आते हों--अकंप जलती है। ऐसे ही अकर्म में व्यक्ति की चेतना अकंप हो जाती हैअकर्म मेंनान-एक्शन में अकंप हो जाती है। और जैसे ही व्यक्ति की चेतना अकंप होती हैविराट की चेतना से एक हो जाती है।
पश्चिम में भी प्रभाव सांख्य का है। और मैं मानता हूं कि जैसे-जैसे मनुष्य की बुद्धि और विकसित होगीसांख्य और भी प्रभावी होता चला जाएगा। भारत में उतना प्रभाव सांख्य का नहीं है। भारत में प्रभाव योग का हैजो कि बिलकुल ही दूसरीउलटी बात है। योग कहता हैकुछ करना पड़ेगा। योग मनुष्य की निम्नतम बुद्धि से चलता है। सांख्य मनुष्य की श्रेष्ठतम बुद्धि से चलता है।
स्वभावतःजो श्रेष्ठतम से शुरू करेगावह आखिर तक नहीं आ पाएगा। और अक्सर ऐसा होता है कि जो आखिरी से शुरू करेगावह चाहे तो श्रेष्ठतम तक पहुंच जाए।
सांख्य शुद्धतम ज्ञान हैयोग शुद्धतम क्रिया है। और अगर हम सारी दुनिया के चिंतन को दो हिस्सों में बांटना चाहें,तो सांख्य और योग दो शब्द काफी हैं। जिनका भी करने पर भरोसा हैउनको योग मेंऔर जिनको न-करने पर भरोसा हैसिर्फ जानने पर भरोसा हैउनको सांख्य में। असल में जगत में सांख्य और योग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। बाकी सब इन दो केटेगरी में कहीं न कहीं खड़े होंगे। चाहे दुनिया के किसी कोने में कोई चिंतन पैदा हुआ हो जीवन के प्रतिबस दो ही विभाजन में बांटा जा सकता है।
असल में पूरब और पश्चिम की फिलासफी बांटनी बंद करनी चाहिएजैनहिंदूमुसलमान की फिलासफी बांटनी बंद करनी चाहिएसिर्फ दो विभाजन किए जाने चाहिएयोग और सांख्य। योग पर वे आस्थाएंजो कहती हैंकुछ करने से होगा। सांख्य पर वे आस्थाएंजो कहती हैंकुछ न करने से ही होता है।


नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।। ४०।।
इस निष्काम कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं हैऔर उलटा फलस्वरूप दोष भी नहीं होता हैइसलिए इस निष्काम कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा भी साधनजन्म-मृत्युरूप महान भय से उद्धार कर देता है।


कृष्ण कह रहे हैं कि निष्काम कर्म का कोई भी कदम व्यर्थ नहीं जाता है। इसे समझना जरूरी है। निष्काम कर्म का छोटा-सा प्रयास भी व्यर्थ नहीं जाता है। लेकिन इससे उलटी बात भी समझ लेनी चाहिए। सकाम कर्म का बड़े से बड़ा प्रयास भी व्यर्थ ही जाता है।
एक घर में मैं अभी ठहरा था। चिंतित थेजिनके घर रुका था। रात नींद नहीं आती थीतो मैंने पूछाबात क्या है?उन्होंने कहाक्या बताएंबड़ी मुसीबत टूट पड़ी हैपांच लाख का नुकसान हो गया। स्वभावतःपांच लाख का नुकसान लगा होतो बड़ी मुसीबत टूट ही गई है। मैंने उनकी पत्नी को पूछाक्या हो गयाकैसे नुकसान लग गया पांच लाख काउनकी पत्नी ने कहाआप इनकी बातों में मत पड़ जाना। पांच लाख का नुकसान नहीं लगा हैपांच लाख का लाभ हुआ है!
मैं तो बहुत मुश्किल में पड़ गया। मैंने कहा कि क्या कहती हो! उसने कहाबिलकुल ठीक कहती हूं। उनको दस लाख के लाभ की आशा थीपांच लाख का ही लाभ हुआ हैइसलिए उनको पांच लाख का नुकसान हो गया है। नींद हराम हैदवाएं चल रही हैंब्लड-प्रेशर बढ़ा हुआ है। कोई उपाय नहीं है उनको समझाने का कि पांच लाख का लाभ हुआ है!
मैंने उनसे पूछा। तो उन्होंने कहा कि वह पांच लाख क्यादस लाख होने ही वाले थे। पंद्रह भी हो सकते थे। पांच का कोई सवाल ही नहीं है। पांच का तो सुनिश्चित नुकसान हुआ है।
अब यह सकाम बुद्धि हैयह सदा असफल होती हैसदा असफल होती है। लाभ होतो भी हानि होती है सकाम बुद्धि में। क्योंकि अपेक्षा का कोई अंत नहीं है। जो भी मिलता हैसदा छोटा पड़ता है। जो भी सफलता मिलती हैवह भी किसी बड़ी असफलता के सामने फीकी लगती है। कुछ भी मिल जाएतो भी तृप्ति नहीं है। कुछ भी मिल जाएतो भी संतोष की कहीं कोई झलक नहीं आती। सकाम कर्म असफल होने को बाध्य है। असफलता में नहीं है उसका राज,उसका राज सकाम होने में है।
अब कृष्ण कहते हैंनिष्काम कर्म का छोटा-सा भी कृत्य सफल ही होता है। होगा हीक्योंकि असफलता का कोई उपाय नहीं है। जब निष्काम हैतो अपेक्षारहित है। इसलिए जो भी मिल जाएवह भी बहुत है। क्योंकि कोई अपेक्षा नहीं थी,जिससे उसको छोटा बताया जा सके।
कहानी सुनी है हम सबने कि अकबर ने एक लकीर खींच दी थी दरबार में अपनेऔर कहा था अपने दरबारियों को कि बिना छुए इसे छोटा कर दो। वे सब हार गए थे और फिर बीरबल ने एक बड़ी लकीर उसके पास खींच दी। उसे छुआ नहींकाटा नहींपोंछा नहींसिर्फ एक बड़ी लकीर पास खींच दी। और वह लकीर एकदम छोटी हो गई।
अपेक्षा की बड़ी लकीर जिनके मन में खिंची हैसफलता की सभी लकीरें छोटी पड़ती हैं। अपेक्षा एंडलेस है--वह जितनी बड़ी खींची थी बीरबल नेवह कुछ बड़ी नहीं थी--अपेक्षा की जो लकीर हैउसका कोई अंत ही नहीं है। वह दोनों छोरों पर अनंत है। जो लोग ब्रह्म को जानते हैंवे ब्रह्म को अनंत कहते हैं। लेकिन जिन्होंने ब्रह्म को नहीं जानावे भी एक अनंत चीज को जानते हैं। वह अपेक्षा हैएक्सपेक्टेशन है। उस अनंत अपेक्षा के पास खींची गई कोई भी सफलता सदा छोटी पड़ती है।
लेकिन कृष्ण कह रहे हैं कि अपेक्षा की लकीर मिटा दो। निष्काम कर्म का अर्थ यही है--अपेक्षारहितफल की आकांक्षारहितकामनारहित। स्वभावतःबड़ी होशियारी की बात उन्होंने कही है। वे कह रहे हैं कि अगर अपेक्षा की लकीर मिटा दोतो फिर छोटा-सा भी कर्म तृप्ति ही लाता है। क्योंकि कितना ही छोटा होतो भी बड़ा ही होता है,क्योंकि तौलने के लिए कोई नीचे लकीर नहीं होती। इसलिए निष्कामकर्मी कभी भी विषाद को उपलब्ध नहीं होता है। सिर्फ सकामकर्मी विषाद को उपलब्ध होता है। फ्रस्टे्रशन जो हैवह सकाम कर्म की छाया है। निष्काम कर्म की कोई छाया नहीं बनतीकोई विषाद नहीं बनता।
इसलिए एक बहुत मजे की बात ध्यान में ले लेनी जरूरी हैगरीब आदमी ज्यादा विषाद को उपलब्ध नहीं होताअमीर आदमी ज्यादा विषाद को उपलब्ध होता है। होना नहीं चाहिए ऐसा। बिलकुल नियम को तोड़कर चलती हुई बात मालूम पड़ती है। गरीब समाज ज्यादा परेशान नहीं होतेअमीर समाज बहुत परेशान हो जाते हैं। क्या कारण होगा?
असल में गरीब आदमी अनंत अपेक्षा की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह जानता है अपनी सीमा को। वह जानता है कि क्या हो सकता हैक्या नहीं हो सकता है। अपने वश के बाहर है बातवह अनंत अपेक्षा की रेखा नहीं बनाता। इसलिए फ्रस्ट्रेशन को उपलब्ध नहीं होता। इसलिए विषाद को उपलब्ध नहीं होता। अमीर आदमीजिसके पास सुविधा है,संपन्नता हैअपेक्षा की रेखा को अनंत गुना बड़ा करने की हिम्मत जुटा लेता है। बसउसी के साथ विषाद उत्पन्न हो जाता है।
पाल गुडमेन ने अमेरिका के संबंध में एक किताब लिखी हैग्रोइंग अप एब्सर्ड। उसमें उसने एक बहुत मजे की बात कही है। उसने कहा है कि मनुष्य जाति ने जिन-जिन सुविधाओं की आकांक्षा की थीवे सब पूरी हो गई हैं अमेरिका में। मनुष्य जाति ने जो-जो सपने देखे थेउनसे भी आगे अमेरिका में सफलता मिल गई। लेकिन अमेरिका में जो आदमी हैआज उससे दुखी आदमी बस्तर के जंगल में भी नहीं है। क्याहो क्या गयायह एब्सर्डिटी कहां से आई?यह अजीब बात है कि जो-जो आदमी करोड़ों साल से अपेक्षा कर रहा थावह सब फलित हो गई है। सब सपने पूरे हो गए हैं। यह क्या हो गया लेकिनहुआ क्या?
हुआ यह कि सब शक्ति हाथ में होने पर अपेक्षाएं एकदम अनंत हो गईं। इसलिए जो भी पास में हैएकदम छोटा पड़ गया। बस्तर के आदिवासी की बहुत बड़ी अपेक्षा की सामर्थ्य नहीं हैजो भी हाथ में हैकाफी बड़ा है।
इसलिए दुनिया में गरीब आदमी कभी बगावत नहीं करते। गरीब आदमी अपेक्षा ही नहीं करते कि बगावत कर सकें। दुनिया में बगावत शुरू होती हैजब गरीब आदमी के पास अपेक्षाएं दिखाई पड़ने लगती हैं निकटतब उपद्रव शुरू होता है। दुनिया में अशिक्षित आदमी बगावत नहीं करतेक्योंकि अपेक्षा बांध नहीं पाते। शिक्षित आदमी उपद्रव शुरू करते हैं। क्योंकि जैसे ही शिक्षा हुईअपेक्षाएं एकदम विस्तार लेने लगती हैं। शिक्षित आदमी को शांत करना मुश्किल है। मैं नहीं कहता कि शिक्षित नहीं करना चाहिएयह मैं नहीं कह रहा हूं। शिक्षित आदमी को शांत करना मुश्किल है। अभी तक तो कोई उपाय नहीं खोजा जा सका।
एक बहुत बड़े विचारक ने तो एक किताब लिखी हैकंपल्सरी मिसएजुकेशन। जिसको हम अनिवार्य शिक्षा कहते हैंवह उसको अनिवार्य कुशिक्षा...। क्योंकि अगर अंततः आदमी सिर्फ दुखी और अशांत ही होता होतो अद सीख लेने से भी क्या हो जाने वाला है! अगर समृद्धि सिर्फ विषाद ही लाती होतो ऐसी समृद्धि से दरिद्रता बेहतर मालूम पड़ सकती है।
लेकिन राज क्या हैसीक्रेट सिर्फ इतना-सा हैसमृद्धि से कोई लेना-देना नहीं हैअगर अपेक्षा की धारा बहुत ज्यादा न होतो समृद्ध आदमी भी शांत हो सकता है। और अगर अपेक्षा की धारा बहुत बड़ी होतो दरिद्र भी अशांत हो जाएगा। अगर अपेक्षा शून्य होतो शिक्षित भी शांत हो सकता है। अगर अपेक्षा विराट होतो अशिक्षित भी अशांत हो जाता है। प्रश्न शिक्षित-अशिक्षितधन और दरिद्रता का नहीं है। प्रश्न सदा ही गहरे में अपेक्षा का हैएक्सपेक्टेशन का है।
तो वह कृष्ण कह रहे हैं कि निष्काम कर्म की तुझसे मैं बात कहता हूं और इसलिए कहता हूंक्योंकि निष्काम कर्म को करने वाला व्यक्ति कभी भी असफलता को उपलब्ध नहीं होता है। यह पहली बात। और दूसरी बात वे यह कह रहे हैं कि निष्काम कर्म में छोटा-सा भी विघ्नछोटी-सी भी बाधा नहीं आती। क्यों नहीं आतीनिष्काम कर्म में ऐसी क्या कीमिया हैक्या केमिस्ट्री है कि बाधा नहीं आतीकोई प्रत्यवाय पैदा नहीं होता!
है। बाधा भी तो अपेक्षा के कारण ही दिखाई पड़ती है। जिसकी अपेक्षा नहीं हैउसे बाधा भी कैसे दिखाई पड़ेगीगंगा बहती है सागर की तरफअगर वह पहले से एक नक्शा बना ले और पक्का कर ले कि इस-इस रास्ते से जाना हैतो हजार बाधाएं आएंगी रास्ते में। क्योंकि कहीं किसी ने मकान बना लिया होगा गंगा से बिना पूछेकहीं कोई पहाड़ खड़ा हो गया होगा गंगा से बिना पूछेकहीं चढ़ाई होगी गंगा से बिना पूछे। और नक्शा वह पहले बना लेतो फिर बाधाएं हजार आएंगी। और यह भी हो सकता है कि बाधाओं से लड़-लड़कर गंगा इतनी मुश्किल में पड़ जाए कि सागर तक कभी पहुंच ही न पाए।
लेकिन गंगा बिना ही नक्शे केबिना प्लानिंग के चल पड़ती है। रास्ता पहले से अपेक्षा में न होने सेजो भी मार्ग मिल जाता हैवही रास्ता है। बाधा का कोई प्रश्न ही नहीं है। अगर पहाड़ रास्ते में पड़ता हैतो किनारे से गंगा बह जाती है। पहाड़ से रास्ता बनाना किसको थाजिससे पहाड़ बाधा बने!
जो लोग भी भविष्य की अपेक्षा को सुनिश्चित करके चलते हैंअपने हाथ से बाधाएं खड़ी करते हैं। क्योंकि भविष्य आपका अकेला नहीं है। किस पहाड़ ने बीच में खड़े होने की पहले से योजना कर रखी होगीआपको कुछ पता नहीं है।
जो भविष्य को निश्चित करके नहीं चलताजो अभी कर्म करता है और कल कर्म का क्या फल होगाइसकी कोई फिक्स्डइसकी कोई सुनिश्चित धारणा नहीं बनाताउसके मार्ग में बाधा आएगी कैसेअसल में उसके लिए तो जो भी मार्ग होगावही मार्ग है। और जो भी मार्ग मिलेगाउसी के लिए परमात्मा को धन्यवाद है। उसको बाधा मिल ही नहीं सकती।
इसलिए कृष्ण कहते हैंअर्जुननिष्काम कर्म की यात्रा पर जरा-सा भी प्रत्यवाय नहीं हैजरा-सी भी बाधा नहीं है,जरा-सा भी हिंडरेंस है ही नहीं। पर बड़ी होशियारी कीबड़ी कलात्मक बात हैबहुत आर्टिस्टिक बात है। एकदम से खयाल में नहीं आएगी। एकदम से खयाल में नहीं आएगी कि बाधा क्यों नहीं हैक्या निष्काम कर्म करने वाले आदमी को बाधा नहीं बची?
बाधाएं सब अपनी जगह हैंलेकिन निष्काम कर्म करने वाले आदमी ने बाधाओं को स्वीकार करना बंद कर दिया। स्वीकृति होती थी अपेक्षाओं सेउनके प्रतिकूल होने से। अब कुछ भी प्रतिकूल नहीं है। निष्काम कर्म की धारणा में बहने वाले आदमी को सभी कुछ अनुकूल है। इसका यह मतलब नहीं है कि सभी कुछ अनुकूल है। असल में जो भी है,वह अनुकूल ही हैक्योंकि प्रतिकूल को तय करने का उसके पास कोई भी तराजू नहीं है। न बाधा हैन विफलता है। सब बाधाएंसब विफलताएं सकाम मन की निर्मितियां हैं।


प्रश्न: भगवान श्रीश्लोक के उत्तरार्द्ध में-- स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्--इस धर्म का अति अल्प आचरण भी बड़े भय से बचाता हैइसे भी समझाएं।

निष्काम कर्म का अल्प आचरण भी बड़े-बड़े भयों से बचाता है। बड़े-बड़े भय क्या हैंबड़े-बड़े भय यही हैं--असफलता तो नहीं मिलेगी! विषाद तो हाथ नहीं आएगा! दुख तो पल्ले नहीं पड़ेगा! कोई बाधा तो न आ जाएगी! निराशा तो नहीं मिलेगी! बड़े-बड़े भय यही हैं। कृष्ण कह रहे हैंसूत्र के अंतिम हिस्से मेंकि निष्काम कर्म का थोड़ा-सा भी आचरण,अंशमात्र आचरण भीरत्तीभर आचरण भीपहाड़ जैसे भयों से मनुष्य को मुक्ति दिला देता है।
असल में जब तक विपरीत दशा को न समझ लेंखयाल में नहीं आएगा। जरा-सी अपेक्षा पहाड़ों जैसे भय को निर्मित कर देती है। जरा-सी कामनापहाड़ों जैसे दुखों का निर्माण कर देती है। जरा-सी इच्छा पर जोरजरा-सा आग्रह कि ऐसा ही होसारे जीवन को अस्तव्यस्त कर जाता है। जिसने भी कहाऐसा ही होवह दुख पाएगा ही। ऐसा होता ही नहीं। जिसने भी कहाऐसा ही होगातो ही मैं सुखी हो सकता हूंउसने अपने नर्क का इंतजाम स्वयं ही कर लिया। वह आर्किटेक्ट है अपने नर्क का खुद हीउसने सब व्यवस्था अपने लिए कर ली है।
हम जितने दुख झेल रहे हैंकभी आपने सोचा कि कितनी छोटी अपेक्षाओं पर खड़े हैं! कितनी छोटी अपेक्षाओं पर! नहीं देखा कभी। हम जो दुख झेल रहे हैंकितनी छोटी अपेक्षाओं पर खड़े हैं!
एक आदमी रास्ते से निकल रहा है। आपने सदा उसको नमस्कार किया थाआज आप नमस्कार नहीं करते हैंये दो हाथ ऊपर नहीं उठे आज। उसकी नींद हराम हैवह परेशान हैउसे बुखार चढ़ आया है! अब वह सोचने लगा कि क्या हो गयाकोई बदनामी हो गईइज्जत हाथ से चली गईप्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई। जिस आदमी ने सदा नमस्कार कीउसने नमस्कार नहीं किया! क्या होगाक्या नहीं होगाअब उसको कैसे बदला चुकानाऔर क्या नहीं करना--वह हजार-हजार चक्करों में पड़ गया है। इस आदमी के ये दो हाथों का न उठनाहो सकता है उसकी जिंदगी के सारे भवन को उदासी से भर जाए।
पति घर आया है और उसने कहापानी लाओ। और पत्नी नहीं लाई दो क्षण। सब दुख हो गया! पति घर से बाहर निकलाराह चलती किसी स्त्री को उसने आंख उठाकर देख लियापत्नी के प्राण अंत हो गए! पत्नी मरने जैसी हालत में हो गईजीने का कोई अर्थ नहीं रहाजीना बिलकुल बेकार है!
हम अगर अपने दुखों के पहाड़ को देखेंतो बड़ी क्षुद्र अपेक्षाएं उनके पीछे खड़ी मिलती हैं। यहीं से समझना उचित होगा। क्योंकि निष्काम कर्म का तो अंश भी हमें पता नहींलेकिन सकाम कर्म के काफी अंश हमें पता हैं। यहीं से समझना उचित होगा। उसके विपरीत निष्काम कर्म की स्थिति है। कितनी क्षुद्र अपेक्षाएं कितने विराट दुख को पैदा करती चली जाती हैं!
यह जो इतना बड़ा महाभारत हुआजानते हैं कितनी क्षुद्र-सी घटना से शुरू हुआइतना बड़ा यह युद्धयह इतनी-सी क्षुद्र घटना से शुरू हुआ! बहुत ही क्षुद्र घटना सेमजाक सेएक जोक। दुनिया के सभी युद्ध मजाक से शुरू होते हैं।
दुर्योधन आया है। और पांडवों ने एक मकान बनाया है। और अंधे के बेटे की वे मजाक कर रहे हैं। उसमें उन्होंने आईने लगाए हुए हैं। और इस तरह से लगाए हुए हैं कि दुर्योधन कोजहां दरवाजा नहीं हैवहां दरवाजा दिखाई पड़ जाता है;जहां पानी हैवहां पानी दिखाई नहीं पड़ता। उसका दीवार से सिर टकरा जाता हैपानी में गिर पड़ता है। द्रौपदी हंसती है। वह हंसी सारे महाभारत के युद्ध का मूल है। उस हंसी का बदला फिर द्रौपदी को नंगा करके चुकाया जाता है। फिर यह बदला चलता है। बड़ी ही क्षुद्र-सी घटनाजस्ट ए जोकएक मजाकलेकिन बहुत महंगा पड़ा है। मजाक बढ़ता ही चला गया। फिर उसके कोई आर-पार न रहे और उसने इस पूरे मुल्क को मथ डाला।
एक स्त्री का हंसना! एक घर में चचेरे भाइयों की आपसी मजाक! कभी सोचा भी न होगा कि हंसी इतनी महंगी पड़ सकती है। लेकिन उन्हें पता नहीं कि दुर्योधन की भी अपेक्षाएं हैं। चोट अपेक्षाओं को लग गई। चोट अपेक्षाओं को लग गई। दुर्योधन ने सोचा भी नहीं था कि उस पर हंसा जाएगा--निमंत्रण देकर। उसने सोचा भी नहीं था कि उसका इस तरह मखौल और मजाक उड़ाया जाएगा। वह आया होगा सम्मान लेनेमिला मजाक। उपद्रव शुरू हो गया।
फिर उस उपद्रव के भयंकर परिणाम हुए। जिन परिणामों से मैं नहीं सोचता हूं कि आज तक भी भारत पूरी तरह मुक्त हो पाया है। वह महाभारत में जो घटित हुआ थाउसके परिणाम की प्रतिध्वनि आज भी भारत के प्राणों में चलती है।
जगत में बड़े छोटे-सेछोटे-से कारण सब कुछ करते हैं।
सकाम का हमें पता हैनिष्काम का हमें कुछ पता नहीं है। निष्काम कृत्य को भी ठीक ऐसे ही समझेंइसकी उलटी दिशा में। जरा-सा निष्काम भावऔर बड़े-बड़े भय जीवन के दूर हो जाते हैं।
प्रश्न: भगवान श्रीक्या निष्काम भावना से हमारी प्रगति नहीं रुक जाती है?


पूछ रहे हैं कि निष्काम भावना से हमारी प्रगति नहीं रुक जाती है?
प्रगति का क्या मतलब होता हैअगर प्रगति से मतलब हो कि बहुत धन होबड़ा मकान होजायदाद होजमीन हो,तो शायद--तो शायद--थोड़ी रुकावट पड़ सकती है। लेकिन अगर प्रगति से अर्थ हैशांति होआनंद होप्रेम होजीवन में प्रकाश होज्ञान होतो रुकावट नहीं पड़तीबड़ी गति मिलती है। इसलिए आपकी प्रगति का क्या मतलब हैइस पर निर्भर करेगा।
प्रगति से आपका क्या मतलब हैअगर प्रगति से यही मतलब है जो बाहर इकट्ठा होता हैतब तो शायद थोड़ी बाधा पड़ सकती है। लेकिन बाहर सब कुछ भी मिल जाए--सारा जगतसारी संपदा--और भीतर एक भी किरण शांति की न फूटेतो मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्हें शांति की एक किरण देने को राजी हो जाए और कहे कि छोड़ दो यह सब राज्य और यह सब धन और यह सब दौलततो तुम छोड़ पाओगे। छोड़ सकोगे। एक छोटी-सी शांति की लहर भी इस जगत के पूरे साम्राज्य के समतुल नहीं है।
लेकिन हम प्रगति से एक ही मतलब लेते हैं। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि मैं ऐसा कह रहा हूं कि जो निष्काम कर्म में गति करेगाअनिवार्य रूप से दीन और दरिद्र हो जाएगा। यह मैं नहीं कह रहा हूं। क्योंकि मन शांत होतो दरिद्र होने की कोई अनिवार्यता नहीं है। क्योंकि शांत मन जिस दिशा में भी काम करेगाज्यादा कुशल होगा। धन भी कमाएगातो भी ज्यादा कुशल होगा। हांएक फर्क पड़ेगा कि धन कमाने का अर्थ चोरी नहीं हो सकेगा। शांत मन के लिए धन कमाने का अर्थ धन कमाना ही होगाचोरी नहीं। धन निर्मित करना होगा।
शांत मन होतो आदमी जो भी करेगाकुशल हो जाता है। उसके मित्र ज्यादा होंगेउसकी कुशलता ज्यादा होगी,उसके पास शक्ति ज्यादा होगीसमझ ज्यादा होगी। इसलिए ऐसा नहीं कह रहा हूं कि वैसा आदमी अनिवार्य रूप से दरिद्र होगा। भीतरी तो समृद्धि होगी हीलेकिन भीतरी समृद्धि बाहरी समृद्धि को लाने का भी आधार बनती है,लेकिन गौण होगी। भीतरी समृद्धि के बचतेभीतरी समृद्धि के रहते हुए मिलती होगी--नाट एट दि कास्टकीमत न चुकानी पड़ती होगी भीतरी समृद्धि की--तो बाहरी समृद्धि भी आएगी। हांसिर्फ उसी जगह बाधा पड़ेगीजहां बाहरी समृद्धि कहेगी कि भीतरी शांति और आनंद खोओतो मैं मिल सकती हूं। तो वैसा निष्कामकर्मी कहेगा कि मत मिलो,यही तुम्हारी कृपा है। जाओ।
प्रगति का क्या अर्थ हैइस पर सब निर्भर करता है। अगर सिर्फ दौड़ना ही प्रगति है--कहीं भी दौड़नाबिना कहीं पहुंचे--तब बात अलग है। लेकिन कहीं अगर पहुंचना प्रगति हैतो फिर बात बिलकुल अलग होगी। अगर आप यह कहते हों कि एक आदमी पागल है और हम उससे कहें कि तुम्हारे दिमाग का इलाज किए देते हैं। और वह कहेदिमाग का इलाज तो आप कर देंगेलेकिन इससे मेरी प्रगति में बाधा तो नहीं पड़ेगीक्योंकि अभी मैं जितनी तेजी से दौड़ता हूं,कोई दूसरा नहीं दौड़ पाता। हम कहेंगेबाधा पड़ेगी। अभी तुम्हारी जैसी तेजी से कोई भी नहीं दौड़ पातालेकिन तुम इतनी तेजी से दौड़कर भी कहीं नहीं पहुंचते और धीमे चलने वाले लोग भी पहुंच जाते हैं। बसइतना ही खयाल होतो बात समझ में आ सकती है।


व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।। ४१।।
हे अर्जुनइस कल्याणमार्ग में निश्चयात्मक-बुद्धि एक ही है और अज्ञानी (सकामी) पुरुषों की बुद्धियां बहुत भेदों वाली अनंत होती हैं।


मनुष्य का मन एक हो सकता हैअनेक हो सकता है। मनुष्य का चित्त अखंड हो सकता हैखंड-खंड हो सकता है। मनुष्य की बुद्धि स्वविरोधी खंडों में बंटी हुई हो सकती हैविभाजित हो सकती हैअविभाजित भी हो सकती है। साधारणतः विषयी चित्तइच्छाओं से भरे चित्त की अवस्था एक मन की नहीं होती हैअनेक मन की होती है;पोलीसाइकिकबहुचित्त होते हैं। और ऐसा ही नहीं कि बहुचित्त होते हैंएक चित्त के विपरीत दूसरा चित्त भी होता है।
मैं कुछ दिन पहले दिल्ली में था। एक मित्रबड़े शिक्षाशास्त्री हैंकिसी विश्वविद्यालय के पहले कुलपति थेफिर अब और भी बड़े पद पर हैं। वे मुझसे पूछने आए कि हम शिक्षित तो कर रहे हैं लोगों कोलेकिन बेईमानीझूठदगा,फरेबसब बढ़ता चला जाता है! हम अपने बच्चों को बेईमानीदगाफरेबझूठ से कैसे रोकेंतो मैंने उनसे पूछा कि दूसरों के बच्चों की पहले छोड़ दें। क्योंकि दूसरों के बच्चों को दगाफरेब से रोकने को कोई भी तैयार हो जाता है। मैं आपके बच्चों की बात करना चाहता हूं। दूसरों के बच्चों को दगाफरेब से रोकने में कौन सी कठिनाई है! दूसरे का बेटा संन्यासी हो जाएतो सब मुहल्ले के लोग उसको स्वागत- धन्यवाद देने आते हैं। उनका बेटा होतब पता चलता है!
मैंने उनसे पूछादूसरों के बच्चों की बात छोड़ दें। आपके भी लड़के हैं! उन्होंने कहाहैं। लेकिन वे कुछ डरे हुए मालूम पड़ेजैसे ही मैंने कहा कि आपके बच्चों की सीधी बात की जाए। मैंने उनसे पूछा कि मैं आपसे यह पूछता हूंआप अपने बच्चों को दगाफरेबझूठखुशामदबेईमानी--ये जो हजार बीमारियां इस समय मुल्क में हैं--इन सब से छुटकारा दिलाना चाहते हैंउन्होंने बड़े डरते से मन से कहा कि हांदिलाना चाहता हूं। लेकिन मैंने कहाआप इतने कमजोर मन से कह रहे हैं हांकि मैं फिर से पूछता हूंथोड़ी हिम्मत जुटाकर कहिए। उन्होंने कहा कि नहीं-नहींमैं तो दिलाना ही चाहता हूं।
मैंने कहालेकिन आप हिम्मत नहीं जुटाते। आप जितनी ताकत से पहले मुझसे बोले कि सब बर्बाद हुआ जा रहा है,हम मुल्कभर के बच्चों को कैसे ईमानदारी सिखाएं! उतने जोर से आप अब नहीं कहते। उन्होंने कहा कि आपने मेरा कमजोर हिस्सा छू दिया है। आपने मेरी नस पकड़ ली है। मैंने कहा कि नस पकड़कर ही बात हो सकती हैअन्यथा तो कोई बात होती नहीं। इस मुल्क में हर आदमी बिना नस पकड़े बात करता रहता हैतो कोई मतलब ही नहीं होता है। तो मैं नस ही पकड़ना चाहता हूं।
तो उन्होंने कहा कि नहींइतनी हिम्मत से तो नहीं कह सकता। मैंने कहाक्यों नहीं कह सकतेतो उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं। इतना तो मैं चाहता हूं कि जितने ऊंचे पद तक मैं उठाकम से कम मेरा लड़का भी उठे। और यह भी मैं जानता हूं कि अगर वह पूरा ईमानदार होनैतिक होतो नहीं उठ सकता। तो फिर मैंने कहादो मन हैं आपके। दो में से एक साफ तय करिए--या तो कहिए कि लड़का सड़क पर भीख मांगेइसके लिए मैं राजी हूंलेकिन बेईमानी नहीं। और या फिर कहिए कि लड़का बेईमान होमुझे कोई मतलब नहींलड़का शिक्षा मंत्रालय में होना चाहिए। एजुकेशन मिनिस्ट्री में पहुंचे बिना हमें कोई चैन नहीं है। बेईमानी से हमें कोई मतलब नहीं। साफ बात कहिए। और नहीं तो आप अपने लड़के में भी डबल माइंड पैदा कर देंगे।
वह लड़का भी समझ जाएगा कि बाप चाहता है कि शिक्षामंत्री होने तक पहुंचो। और देखता है कि शिक्षामंत्री होने तक की यात्रासीढ़ी दर सीढ़ी बेईमानी और चोरी की यात्रा है। दूसरी तरफ बाप कहता है कि ईमानदार बनो। और ईमानदार की इस जगत में हालत ठीक वैसी हैजैसी कि नाइबर ने एक किताब लिखी हैमारल मैन इन इम्मारल सोसाइटी--नैतिक आदमी अनैतिक समाज में। सड़क पर भीख मांगने की तैयारी होनी ही चाहिए। यद्यपि नैतिक होकर सड़क पर भीख मांगने में जितना आनंद हैउतना अनैतिक होकर सम्राट हो जाने में भी नहीं है। लेकिन वह दूसरी बात है।
ये दोनों बातें लड़के के दिमाग में होंगीतो लड़के के दो मन हो जाएंगे। तब तो वह यही कर सकता है ज्यादा से ज्यादाकि उसको कोई इंतजाम भीतरी करना पड़ेगा। कोई कोएलिशन गवर्नमेंट तो भीतर बनानी पड़ेगी न! इन सब उपद्रवी विरोधी तत्वों के बीच कोई तो समझौता करकेकोई संविद सरकार निर्मित करनी पड़ेगी! तो फिर यही होगा कि जब बाहर दिखाना हो तो ईमानदारी दिखाओ और जब भीतर करना हो तो बेईमानी करो। क्योंकि मंत्री के पद तक पहुंचना ही है और ईमानदारी बड़ी अच्छी चीज हैउसको भी दिखाना ही है।
चित्त हमारा बंट जाता है अनेक खंडों मेंऔर विपरीत आकांक्षाएं एक साथ पकड़ लेती हैं। और अनंत इच्छाएं एक साथ जब मन को पकड़ती हैंतो अनंत खंड हो जाते हैं। और एक ही साथ हम सब इच्छाओं को करते चले जाते हैं। एक आदमी कहता हैमुझे शांति चाहिएऔर साथ ही कहता हैमुझे प्रतिष्ठा चाहिए। उसे कभी खयाल में नहीं आता कि वह क्या कह रहा है!
एक मित्र मेरे पास आए। आते ही से मुझसे बोले कि मैं अरविंद आश्रम हो आयारमण आश्रम हो आयाशिवानंद के आश्रम हो आयासब आश्रम छान डालेकहीं शांति नहीं मिलती है। अभी मैं पांडिचेरी से सीधा चला आ रहा हूं। किसी ने आपका नाम ले दियातो मैंने कहा आपके पास भी जाकर शांति--तो मुझे शांति दें।
तो मैंने कहा कि इसके पहले कि तुम मुझसे भी निराश होओएकदम उलटे लौटो और वापस हो जाओ। मैं तुम्हें शांति नहीं दूंगा। और तुम कुछ इस तरह कह रहे हो कि जैसे अरविंद आश्रम ने तुम्हें शांति देने का कोई ठेका ले रखा है। सब जगह हो आयाकहीं नहीं मिली! जैसे कि मिलना कोई आपका अधिकार था। बाहर हो जाओ दरवाजे के!
उन्होंने कहाआप कैसे आदमी हैं! मैं शांति खोजने आया हूं। मैंने कहाअशांति खोजने कहां गए थेअशांति खोजने किस आश्रम में गए थेयह मुझे पहले बता दो। कहाकहीं नहीं गया था। तो मैंने कहाजब तुम अशांति तक पैदा करने में कुशल होतो शांति भी पैदा कर सकते हो। मेरी क्या जरूरत हैजिस रास्ते से अशांत हुए होउसी रास्ते से वापस लौट पड़ो तो शांत हो जाओगे। मैं कहां आता हूं बीच मेंअशांति के वक्त मुझसे तुमने कोई सलाह न ली थी,शांति के वक्त तुम मुझसे सलाह लेने चले आए हो! मैंने पूछा कि शांति की बात बंद। अगर मेरे पास रुकना हैतो अशांति की चर्चा करो कि अशांत कैसे हुए होक्या है अशांतिउसकी मुझसे बात करो। अशांति तुम्हारी स्पष्ट हो जाएतो शांति पाना जरा भी कठिन नहीं है।
वे दो दिन मेरे पास थे। उनकी अशांति फिर धीरे-धीरे उन्होंने खोलनी शुरू की। वही थीजो हम सब की है। एक ही लड़का है उनका। बहुत पैसा कमाया। ठेकेदारी थी। एक ही लड़का है। उस लड़के ने एक लड़की से शादी कर लीजिससे वे नहीं चाहते थे कि शादी करे। तलवार लेकर खड़े हो गए दरवाजे पर--लाश बिछा दूंगाबाहर निकल जाओ! लड़का बाहर निकल गया। अब मुसीबत है। अब मौत करीब आ रही है। अब किस मुंह से लड़के को वापस बुलाएंतलवार दिखाकर निकाला था। और मौत पास आ रही है। और जिंदगीभर जिस पैसे को हजार तरह की चोरी और बेईमानी से कमायाउसका कोई मालिक भी नहीं रह जाता और हाथ से सब छूटा जा रहा है!
तो मैंने उनसे पूछावह लड़की खराब थीजिसने तुम्हारे लड़के से शादी की हैउन्होंने कहानहींलड़की तो बिलकुल अच्छी हैलेकिन मेरी इच्छा के खिलाफ...।
तुम्हारी इच्छा से तुम शादी करोतुम्हारा लड़का क्यों करने लगाअशांत होने के रास्ते खड़े कर रहे हो। फिर जब उसने शादी अपनी इच्छा से की और तुमने उसे घर से बाहर निकाल दियातो अब परेशान क्यों हो रहे होबात समाप्त हो गई। उसने तो आकर नहीं कहा कि घर में वापस लो।
कहने लगेयही तो अशांति है। वह एक दफा आकर माफी मांग लेअंदर आ जाए।
नहीं मानीठीक है। जब उसने आपकी बात नहीं मानीतो ठीक है। बात खतम हो गई। अब आप क्यों परेशान हैं?
तो इस धन का क्या होगा?
मैंने कहाधन का सबके मर जाने के बाद क्या होता हैऔर तुम्हें क्या फिक्र हैतुम मर जाओगेधन का जो होगा,वह होगा।
कहा कि नहींमेरे ही लड़के के पास मेरा धन होना चाहिए। तो मैंने कहाफिर मेरे लड़के के पास मेरी ही पसंद की औरत होनी चाहिएयह खयाल छोड़ो। तुम्हारा लड़का धन छोड़ने को राजी है अपने प्रेम के लिएतुम भी कुछ छोड़ने को राजी होओ।
दो दिन मेरे पास थेसारी बात हुई। देखा कि सब हजार तरह की उलटी-सीधी इच्छाएं मन को पकड़े हुए हैंतो चित्त अशांत हो गया है। हम सब का मन ऐसा ही अशांत है।
कृष्ण कह रहे हैं कि विषय-आसक्त चित्त--चूंकि विषय बहुत विपरीत हैं--एक ही साथ विपरीत विषयों की आकांक्षा करके विक्षिप्त होता रहता है और खंड-खंड में टूट जाता है। जो व्यक्ति निष्काम कर्म की तरफ यात्रा करता है,अनिवार्यरूपेण--क्योंकि कामना गिरती हैतो कामना से बने हुए खंड गिरते हैं। जो व्यक्ति अपेक्षारहित जीवन में प्रवेश करता हैचूंकि अपेक्षा गिरती हैइसलिए अपेक्षाओं से निर्मित खंड गिरते हैं। उसके भीतर एकचित्ततायूनिसाइकिकनेस,उसके भीतर एक मन पैदा होना शुरू होता है।
और जहां एक मन हैवहां जीवन का सब कुछ है--शांति भीसुख भीआनंद भी। जहां एक मन हैवहां सब कुछ है--शक्ति भीसंगीत भीसौंदर्य भी। जहां एक मन हैउस एक मन के पीछे जीवन में जो भी हैवह सब चला आता है। और जहां अनेक मन हैंतो पास में भी जो हैवह भी सब बिखर जाता है और खो जाता है। लेकिन हम सब पारे की तरह हैं--खंड-खंडटूटे हुएबिखरे हुए। खुद ही इतने खंडों में टूटे हैंकि कैसे शांति हो सकती है!
जोसुआ लिएबमेन ने अपने संस्मरण लिखे हैं। संस्मरण की किताब को जो नाम दिया हैवह बहुत अच्छा है। और किताब के पहले ही हिस्से में उसने जो उल्लेख किया हैवह कीमती है। कहा कि जवान थाविश्वविद्यालय से पढ़कर लौटा थातो मेरे मन में हुआ कि अब जीवन का एक नक्शा बना लूं कि जीवन में क्या-क्या पाना है! स्वभावतः,जीवन का एक नक्शा होतो जीवन को सुव्यवस्थित चलाया जा सके।
तो उसने एक फेहरिस्त बनाई। उस फेहरिस्त में लिखा कि धन चाहिएसुंदर पत्नी चाहिएयश चाहिएसम्मान चाहिए,सदाचार चाहिए...। कोई बीस-बाइस बातों की फेहरिस्त तैयार की। उसमें सब आ गयाजो आदमी चाह सकता है। जो भी चाह चाह सकती हैवह सब आ गया। जो भी विषय की मांग हो सकती हैवह सब आ गया। जो भी कामना निर्मित कर सकती हैवे सब सपने आ गए। पर न मालूमपूरी फेहरिस्त को बार-बार पढ़ता हैकि इसमें और कुछ तो नहीं जोड़ा जाना हैक्योंकि वह जीवनभर का नक्शा बनाना है।
सब खोज लेता हैकुछ जोड़ने को बचता नहीं। सब आ गयाफिर भीसमथिंग इज़ मिसिंग। कुछ ऐसा लगता है कि कोई कड़ी खो रही है। क्यों लगता है ऐसाक्योंकि रात सोते वक्त उसने सोचा कि मैं देखूं कि सब मुझे समझ लो कि मिल गयाजो-जो मैंने फेहरिस्त पर लिखा हैसब मिल गया--हो जाएगा सब ठीकतो मन खाली-खाली लगता है। मन में ऐसा उत्तर नहीं आता आश्वासन से भरानिश्चय से भराकि हांयह सब मिल जाएजो फेहरिस्त पर लिखा हैतो बससब मिल जाएगा। नहींऐसा निश्चय नहीं आताऐसी निश्चयात्मक लहर नहीं आती भीतर।
तो गांव में एक बूढ़े फकीर के पास वह गया। उसने कहा कि इस गांव में सबसे ज्यादा बूढ़े तुम होसबसे ज्यादा जिंदगी तुमने देखी है। और तुमने जिंदगी गृहस्थ की ही नहीं देखीसंन्यासी की भी देखी है। तुमसे बड़ा अनुभवी कोई भी नहीं है। तो मैं यह फेहरिस्त लाया हूंजरा इसमें कुछ जोड़ना हो तो बता दो।
उस बूढ़े ने पूरी फेहरिस्त पढ़ीफिर वह हंसा और उसने कलम उठाकर वह पूरी फेहरिस्त काट दी। और पूरी फेहरिस्त के ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में तीन शब्द लिख दिएपीस आफ माइंडमन की शांति। उसने कहाबाकी ये सब तुम फिक्र छोड़ोतुम यह एक चीज पा लोतो यह बाकी सब मिल सकता है। और यदि तुमने बाकी सब भी पा लियातो भी ये जो तीन शब्द मैंने लिखेये तुम्हें कभी मिलने वाले नहीं हैं। और आखिर में निर्णय यही होगा कि यह पीस आफ माइंडयह मन की शांति मिली या नहीं!
तो लिएबमेन ने अपनी आत्मकथा लिखी हैउसको नाम दिया हैपीस आफ माइंड। किताब को नाम दियामन की शांति। और लिखा कि उस दिन तो मुझे लगा कि यह बूढ़े ने सब फेहरिस्त खराब कर दी। कितनी मेहनत से बनाकर लाया हूं और इस आदमी ने सब काट-पीट कर दिया। जंची नहीं बात कुछ उसकी। लेकिन जिंदगी के अंत में लिएबमेन कहता है कि आज मैं जानता हूं कि उस बूढ़े ने फेहरिस्त काटी थीतो ठीक ही किया था। उसने फाड़कर क्यों न फेंक दी! बेकार। आज जीवन के अंत में वे ही तीन शब्द पास घूम रहे हैं। काशउस दिन मैं समझ जाता कि मन की शांति ही सब कुछ हैतो शायद आज तक पाया भी जा सकता था। लेकिन जिंदगी उसी फेहरिस्त को पूरा करने में बीत जाती है सबकी।
कृष्ण कह रहे हैंयह जो विषयों की दौड़ है चित्त कीयह सिर्फ अशांति को...। अशांति का अर्थ ही सिर्फ एक हैबहुत-बहुत दिशाओं में दौड़ता हुआ मनअर्थात अशांति। न दौड़ता हुआ मनअर्थात शांति। कृष्ण कहते हैंनिष्काम कर्म की जो भाव-दशा हैवह एक मन और शांति को पैदा करती है। और जहां एक मन हैवहीं निश्चयात्मक बुद्धि हैदि डेफिनीटिव इंटलेक्टदि डेफिनीटिव इंटेलिजेंस।
इसको आखिरी बात समझ लें। तो जहां एक मन हैवहां अनिश्चय नहीं है। अनिश्चय होगा कहांअनिश्चय के लिए कम से कम दो मन चाहिए। जहां एक मन हैवहां निश्चय है।
इसलिए आमतौर से आदमी लेकिन क्या करता हैवह कहता है कि निश्चयात्मक बुद्धि चाहिएतो वह कहता है,जोड़त्तोड़ करके निश्चय कर लो। दबा दो मन को और छाती पर बैठ जाओऔर निश्चय कर लो कि बसनिश्चय कर लिया। लेकिन जब वह निश्चय कर रहा है जोर सेतभी उसको पता है कि भीतर विपरीत स्वर कह रहे हैं कि यह तुम क्या कर रहे होयह ठीक नहीं है। वह आदमी कसम ले रहा है कि ब्रह्मचर्य साधूंगानिश्चय करता हूं। लेकिन निश्चय किसके खिलाफ कर रहे होजिसके खिलाफ निश्चय कर रहे होवह भीतर बैठा है।
मैं एक बूढ़े आदमी से मिला। उस बूढ़े आदमी ने कहा कि मैंने अपनी जिंदगी में तीन बार ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है। तो मैंने पूछा कि चौथी बार क्यों नहीं लियाबूढ़ा आदमी ईमानदार था। बूढ़े आदमी कम ही ईमानदार होते हैंक्योंकि जिंदगी इतनी बेईमानी सिखा देती है कि जिसका कोई हिसाब नहीं। बच्चे साधारणतः ईमानदार होते हैं। बेईमान बच्चा खोजना मुश्किल है। बूढ़े साधारणतः बेईमान होते हैं। ईमानदार बूढ़ा खोजना मुश्किल है।
पर वह बूढ़ा ईमानदार आदमी था। उसने कहा कि आप ठीक कहते हैं। आप ठीक कहते हैंमैंने चौथी बार इसीलिए नहीं लिया कि तीन बार की असफलता ने हिम्मत ही तुड़वा दी। फिर हिम्मत भी नहीं रही कि चौथी बार ले सकूं। पर मैंने कहातुमने व्रत किसके खिलाफ लिया थाअपने ही खिलाफ कहीं व्रत पूरे होते हैंजब तुमने व्रत लिया थातब तुम्हारा पूरा मन राजी थाउसने कहापूरा ही मन राजी होता तो फिर क्या था! मेजारिटी माइंड से लिया थाबहुमत से लिया था।
मन कोई पार्लियामेंट नहीं है कि जिसमें आप बहुमत से पक्ष लें। मन कोई पार्लियामेंट नहीं हैकोई संसद नहीं है। और अगर संसद भी हैतो वैसी ही संसद हैजैसी दिल्ली में है। उसमें कुछ पक्का नहीं है कि जो अभी आपके पक्ष में गवाही दे रहा थावह दो दिन बाद विपक्ष में गवाही देगाउसका कुछ पक्का नहीं है। आप रातभर सोकर सुबह उठोगे और पाओगे कि माइनारिटी में होमेजारिटी हाथ से खिसक गई है।
कृष्ण कुछ और बात कह रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे हैं कि तुम निश्चय करो। वे यह कह रहे हैंजो निष्काम कर्म की यात्रा पर निकलता हैउसे निश्चयात्मक बुद्धि उपलब्ध हो जाती हैक्योंकि उसके पास एक ही मन रह जाता है। विषयों में जो भटकता नहींजो अपेक्षा नहीं करताजो कामना की व्यर्थता को समझ लेता हैजो भविष्य के लिए आतुरता से फल की मांग नहीं करताजो क्षण में और वर्तमान में जीता है--वैसे व्यक्ति को एक मन उपलब्ध होता है। एक मन निश्चयात्मक हो जाता हैउसे करना नहीं पड़ता।
शेष कल सुबह बात करेंगे।

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