गुरुवार, 25 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-010

जीवन की
परम धन्यता--
स्वधर्म की पूर्णता में

प्रश्न: भगवान श्रीअट्ठाइसवें श्लोक पर सुबह बात हुई--
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिवेदना।।

इसमें कहा गया है कि आदि में अप्रकटअंत में अप्रकट और मध्य में प्रकट है जोतो यह जो मैनिफेस्टेड हैप्रकट हैइसमें ही द्वैतता का अनुभव होता है। और जो अप्रकट हैउसमें अद्वैत का दर्शन किया जाता है। तो यह जो मध्य में मैनिफेस्टेड हैउसमें जो द्वैतता हैडुअलिज्म हैउसका परिहार करने के लिए आप कोई विशेष प्रक्रिया का सूचन देंगे?
 अव्यक्त है प्रारंभ मेंअव्यक्त है अंत मेंमध्य में व्यक्त का जगत है।
जिब्रान ने कहीं कहा हैएक रातअंधेरी अमावस की रात मेंएक छोटे-से झोपड़े में बैठा थामिट्टी का एक दीया जलाकर। टिमटिमाती थोड़ी-सी रोशनी थी। द्वार के बाहर भी अंधकार था। भवन के पीछे के द्वार के बाहर भी अंधकार था। सब ओर अंधकार था। केवल उस छोटे-से झोपड़े में उस दीए की थोड़ी-सी रोशनी थी। और एक रात का पक्षी फड़फड़ाता हुआ झोपड़े के द्वार से प्रविष्ट हुआउसने दो या तीन चक्कर झोपड़े के भीतर टिमटिमाती रोशनी में लगाएऔर पीछे के द्वार से बाहर हो गया। जिब्रान ने उस रात अपनी डायरी में लिखा कि उस पक्षी को अंधेरे से प्रकाश में दो क्षण के लिए आते देखकरफिर प्रकाश में दो क्षण फड़फड़ाते देखकर और फिर गहन अंधकार में खो जाते देखकर मुझे लगा कि जीवन भी ऐसा ही है।

अव्यक्त है प्रारंभ मेंअव्यक्त है बाद मेंदो क्षण की व्यक्त की फड़फड़ाहट है। दो क्षण के लिए वह जो मैनिफेस्टेड हैवह जो प्रकट हैउसमें फूल खिलते हैंपत्ते आते हैंजीवन हंसता हैरोता है और फिर खो जाता है। अव्यक्त में अद्वैत है--पहले भीअंत में भीदोनों ओर। मध्य में द्वैत हैद्वैत ही नहीं हैअनेकत्व है। दो ही नहीं हैंअनेक हैं। सब चीजें पृथक-पृथक मालूम होती हैं।
तो पूछ रहे हैं कि उस अपृथक कोउस अभिन्न कोउस एक कोउस अद्वय कोउस मूल को और आदि कोमध्य के इन व्यक्त क्षणों में जानने का क्या कोई प्रयोग है?
निश्चित ही है।
एक वृक्ष के नीचे खड़े हैं। पत्ते हवाओं में हिल रहे हैं। सूरज की रोशनी में पत्ते चमक रहे हैं। एक-एक पत्ता अलग-अलग मालूम होता है। और अगर पत्ते सचेतन हो जाएंअगर एक-एक पत्ता होश से भर जाएतो सोच भी न पाएगा कि साथ का जो पड़ोसी पत्ता हैवह और मैं कहीं एक हैंकहीं नीचे शाखा पर जुड़े हैं। पड़ोस में हिलते हुए पत्ते को देखकर जागा हुआहोश में आ गया पत्ता सोचेगाकोई पराया है।
सोचना ठीक भी हैतर्कयुक्त भी है। क्योंकि पड़ोस में कोई पत्ता बूढ़ा हो रहा है और यह पत्ता तो अभी जवान है। अगर ये दोनों एक होतेतो दोनों एक साथ बूढ़े हो गए होते। पड़ोस में कोई पत्ता गिरने के करीब हैपीला होकर सूखकर गिर रहा है। गिर गया है कोईजमीन पर सूखा पड़ा हैहवाओं में उड़ रहा है। अगर वह इस पत्ते से एक होतातो वह वृक्ष पर और जिससे एक हैवह पृथ्वी पर कैसे हो सकता था! वह हरा हैकोई सूख गया है। वह जवान हैकोई बूढ़ा हो गया है। कोई अभी बच्चा हैकिसी की अभी कोंपल फूटती है। उस पत्ते का सोचना ठीक ही है कि वह अलग है।
लेकिन काश! यह पत्ता बाहर से न देखे। अभी बाहर से देख रहा हैदेख रहा है दूसरे पत्ते को। काश! यह पत्ता अपने भीतर देख सके और भीतर उतरेतो क्या बहुत दूर वह रस-धार हैजहां से ये दोनों पत्ते जुड़े हैं! वह भी जो बूढ़ावह भी जो जवानवह भी जो आ रहा हैवह भी जो जा रहा हैक्या वह रस-धार बहुत दूर हैयह पत्ता अपने भीतर उतरेस्वयं में उतरेतो उस शाखा को जरूर ही देख पाएगाजान पाएगाजहां से सब पत्ते निकले हैं।
लेकिन फिर वह शाखा भी समझ सकती है कि दूसरी शाखा से अन्य हैभिन्न है। वह शाखा भी भीतर उतरेतो उस वृक्ष को खोज लेने में बहुत कठिनाई नहीं हैजहां सभी शाखाएं जुड़ी हैं। लेकिन वह वृक्ष भी सोच सकता है कि पड़ोस में खड़ा हुआ वृक्ष और हैअन्य है। लेकिन वह वृक्ष भी नीचे उतरेतो क्या उस पृथ्वी को खोजना बहुत कठिन होगाजिस पर कि दोनों वृक्ष जुड़े हैं और एक ही रस-धार से जीवन को पाते हैं! पृथ्वी भी सोचती होगी कि दूसरे ग्रह-मंडलतारेचांदसूरज अलग हैं। काश! पृथ्वी भी अपने भीतर उतर सकेतो जैसे पत्ते ने उतरकर जानावैसे पृथ्वी भी जानती है कि सारा ब्रह्मांड भीतर एक से जुड़ा है!
दो ही रास्ते हैं देखने के। एक रास्ता है जो तू से शुरू होता हैऔर एक रास्ता है जो मैं से शुरू होता है। जो रास्ता तू से शुरू होता हैवह अनेक के दर्शन में ले जाता है। जो रास्ता मैं से शुरू होता हैवह एक के दर्शन में ले जाता है। जो तू से शुरू होता हैवह अनमैनिफेस्टेड में नहीं ले जाएगावह अव्यक्त में नहीं ले जाएगावह व्यक्त में ही ले जाएगा। क्योंकि दूसरे के तू को हम बाहर से ही छू सकते हैंउसकी आंतरिक गहराइयों में उतरने का कोई उपाय नहींहम उसके बाहर ही घूम सकते हैं। भीतर तो हम सिर्फ स्वयं के ही उतर सकते हैं।
इसलिए प्रत्येक के भीतर वह सीढ़ी हैजहां से वह उतर सकता है वहांजहां अब भी अव्यक्त है। सब व्यक्त नहीं हो गया है। सब कभी व्यक्त हो भी नहीं सकता। अनंत है अव्यक्त। क्योंकि जो अद्वैत हैवह अनंत भी होगाऔर जो व्यक्त हैवह सीमित भी होगा। व्यक्त की सीमा हैअव्यक्त की कोई सीमा नहीं है। जो अव्यक्त हैवह अनंत हैवह अभी भी है। उस बड़े सागर पर बस एक लहर प्रकट हुई है। उस लहर ने सीमा बना ली है। वह सागर असीम है।
लेकिन अगर लहर दूसरी लहर को देखेतो सागर तक कभी न पहुंच पाएगी। दूसरी लहर से सागर तक पहुंचने का कोई भी उपाय नहीं है। क्योंकि दूसरी लहर के भीतर ही पहुंचने का कोई उपाय नहीं है। हम सिर्फ अपने ही भीतर उतर सकते हैं। और अपने ही भीतर उतरकर सबके भीतर उतर सकते हैं। स्वयं में उतरना पहली सीढ़ी हैस्वयं में उतरते ही सर्व में उतरना हो जाता है।
और यह बड़े मजे की बात है कि जो दूसरे में उतरता हैउसको ही लगता है कि मैं हूं। और जो मैं में उतरता हैउसे लगता हैमैं नहीं हूंसर्व है। मैं की सीढ़ी पर उतरते ही पता चलता है कि मैं भी खो गयासर्व ही रह गया।
लेकिन हम जीवन में सदा दूसरे से शुरू करते हैंदि अदर। बस वह दूसरे से ही हम सब सोचते हैं। अपने को छोड़कर ही हम चलते हैंउसको बाद दिए जाते हैं। जन्मों-जन्मों तक एक चीज को हम छोड़ते चले जाते हैंनिग्लेक्ट किए जाते हैंएक चीज के प्रति हमारी उपेक्षा गहन है--स्वयं को हम सदा ही छोड़कर चलते हैं। सब जोड़ लेते हैंसब हिसाब में ले लेते हैं। बस वह एकजो अपना होना हैउसे हिसाब के बाहर रख देते हैं।
वेई वू ने एक किताब लिखी हैदि टेंथ मैनदसवां आदमी। और बहुत पुरानी भारतीय कथा से वह किताब शुरू की है। उस कहानी से हम सब परिचित हैंकि दस आदमियों ने नदी पार की। वर्षा थीबाढ़ थी। नदी पार उतरकर सहज ही उन्होंने सोचा कि कोई बह न गया हो! तो उन्होंने गिनती की। निश्चित हीगिनती उन्होंने वैसी ही की जैसी हम करते हैं। लेकिन बड़ी मुश्किल हो गई। थे तो दसलेकिन गिनती में नौ ही निकले। एक ने कीदूसरे ने कीतीसरे ने कीफिर तो कन्फर्म हो गया कि नौ ही बचे हैंएक खो गया।
जैसे सभी की जिंदगी का ढंग एक ही था--हम सभी का है--प्रत्येक ने स्वयं को छोड़कर गिना। गिनती नौ हुई। अब वह जो एक खो गयाउसके लिए बैठकर वे रोने लगे। यह भी पक्का पता नहीं चलता था कि वह कौन खो गया! ऐसे शक भी होता है कि कोई नहीं खोया। लेकिन शक ही हैक्योंकि गणित कहता है कि खो गया। अब गणित इतना प्रामाणिक मालूम होता है कि अब शक को अलग ही हटा देना उचित है। रो लेना भी उचित हैक्योंकि जो खो गया मित्रउसके लिए अब और तो कुछ कर नहीं सकते। वे वहां बैठकर एक वृक्ष के नीचे रोते हैं।
वहां से एक फकीर गुजरा है। उसने पूछा कि क्या हुआक्यों रोते होउन्होंने कहाएक साथी खो गया है। दस चले थे उस पार सेअब गिनते हैं तो नौ ही हैं! वे फिर छाती पीटकर रोने लगे। उस फकीर ने नजर डाली और देखा कि वे दस ही हैं। पर समझा वह फकीर। संसारी आदमी की बुद्धि और संसारी आदमी के गणित को भलीभांति जानता था। जानता था कि संसारी की भूल ही एक है। वही भूल दिखता हैहो गई है।
उसने कहाजरा फिर से गिनो। लेकिन एक काम करोमैं एक-एक आदमी के गाल पर चांटा मारता हूं। जिसको मैं चांटा मारूंवह बोलेएक! दूसरे को मारूंदो! तीसरे को मारूंतीन! मैं चांटा मारता चलता हूं। चांटा इसलिएताकि तुम याद रख सको कि तुम छूट नहीं गए हो।
बड़ी हैरानी हुईगिनती दस तक पहुंच गई। वे बड़े चकित हुए और उन्होंने कहाक्या चमत्कार कियायह गिनती दस तक कैसे पहुंचीहमने बहुत गिनालेकिन नौ पर ही पहुंचती थी!
तो उस फकीर ने कहादुनिया में गिनने के दो ढंग हैं। दुनिया में दो तरह के गणित हैं। एक गणित जो तू से शुरू होता है और एक गणित जो मैं से शुरू होता है। जो गणित तू से शुरू होता हैवह गणित कभी भी अव्यक्त में नहीं ले जाएगा। नहीं ले जाएगा इसलिए कि तू के भीतर प्रवेश का द्वार ही नहीं है। जो गणित मैं से शुरू होता हैवह अव्यक्त में ले जाता है।
इसलिए धर्म की परम अनुभूति परमात्मा है। और धर्म का प्राथमिक चरण आत्मा है। आत्मा से शुरू करना पड़ता हैपरमात्मा पर पूर्णता होती है। स्वयं से चलना पड़ता हैसर्व में निष्पत्ति होती है।
तो अपने भीतर से गिनती शुरू करें। अभी भी आपके भीतर अव्यक्त मौजूद है। झांकते ही नहीं वहांयह दूसरी बात है। आपके भीतर अव्यक्त मौजूद है।
इसे थोड़ा समझ लेना उचित होगा कि अव्यक्त आपके भीतर कैसे है! आपके ठीक पैरों के नीचे है। जिस जमीन पर आप खड़े हैंवहीं! वहीं थोड़े ही दो कदम नीचे। चले नहीं कि अव्यक्त मौजूद है। कौन चला रहा है आपकी श्वास को?आपतो जरा बंद करके देखेंतो पता चलेगाआप नहीं चला रहे हैं। जरा रोकेंतो पता चल जाएगाआप नहीं चला रहे हैं। श्वास धक्के देगी और चलेगीतब आपको पता चलेगाआपके नीचे से भी कोई और गहरे में इसे चला रहा है। खून चल रहा है चौबीस घंटेआप नहीं चला रहे हैं। आपने कभी चलाया नहींचलाना पड़ता तो बहुत मुश्किल में पड़ जाते। वह काम ही इतना होता कि और कोई काम न बचता। और मिनट दो मिनट भी चूक जातेभूल जातेतो समाप्ति हो जाती। वह श्वास आदमी पर अगर होती चलाने कीतो दुनिया में आदमी बचता नहींकभी का समाप्त हो गया होता। एक क्षण चूके कि गए। नहींआप सोए रहेंबेहोश पड़े रहेंशराब पीए पड़े रहेंवह श्वास चलती रहेगीवह खून दौड़ता रहेगा।
खाना तो आप खा लेते हैंपचाता कौन हैआपअभी तक बड़ी से बड़ी वैज्ञानिक प्रयोगशाला रोटी को खून में बदलने में समर्थ नहीं हो पाई है। और वैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी का छोटा-सा पेट जो करता हैअगर किसी दिन हम समर्थ हुएतो कम से कम सैकड़ों मील जगह घेरेइतनी बड़ी फैक्टरी और लाखों लोग काम करेंइतना इंतजामएक आदमी के पेट में जो रहा हैउसके लिए करना पड़ेगा। लेकिन फिर भी पक्का नहीं है कि यह हो सकेगा। कौन चला रहा हैआप?
निश्चित हीएक बात पक्की है कि आप नहीं चला रहे हैं। तो आपके भीतर अव्यक्तआपके भीतर छिपी हुई कोई ताकतआपके मैं की सीमा के पार...!
आप सोते हैं रोज। लेकिन इस भ्रांति में मत पड़ना कि आप सोते हैंक्योंकि सोना कोई एक्ट नहीं हैकोई क्रिया नहीं है। भाषा में है। भाषा से कोई लेना-देना नहीं है। सोना बिलकुल ही क्रिया नहीं है। क्योंकि जिसको नींद नहीं आती है,उसको भलीभांति पता है कि कितनी ही करवट बदलता हैकितने ही उपाय करता हैनहीं आतीनहीं आतीनहीं आती। सच तो यह है कि जितने उपाय करता हैउतनी ही नहीं आती। और अगर कभी आती है तो उसके उपाय की वजह से नहीं आतीउपाय कर-कर के थक गया होता हैतब आती है। नींद ला नहीं सकते आप कि ले आएं। कहां से आती हैआपके भीतर अव्यक्त से आती है। मनोवैज्ञानिक से पूछेंतो उसे थोड़ी-सी समझ मिली है उस अव्यक्त कीउसे वह अनकांशस कह रहा है। वह कह रहा हैअचेतन से आती है।
पैर पर चोट लग गई है। तत्कालतत्काल मवाद से भर जाता है घाव। आपने कुछ कियाआपने कुछ भी नहीं किया। लेकिन पता नहींपूरे शरीर से वे जीवाणु दौड़कर उस घाव के पास पहुंच जाते हैं। जिसको आप मवाद कहते हैंवह मवाद नहीं हैवह उन जीवाणुओं की पर्त हैजो तत्काल उसे चारों तरफ से घेर लेते हैंबाहर के जगत से सुरक्षा देने के लिए। चमड़ी तो टूट गई हैदूसरी पर्त चाहिए। वह पर्त उसे घेर लेती है। और भीतर अव्यक्त तत्कालजो घाव बन गया हैउसे ठीक करने में लग जाता है।
साधारण चिकित्सक सोचता है कि हम ठीक कर देते हैं बीमारी को। लेकिन जो असाधारण चिकित्सक हैं जगत मेंजो जरा गहरे उतरे हैं मनुष्य की बीमारी मेंवे कहते हैं कि नहींज्यादा से ज्यादा हम थोड़ा-सा सहयोग पहुंचाते हैंइतना भी कहना अतिशयोक्ति है। शायद इतना ही कहना उचित है कि हम थोड़ी-सी बाधाएं अलग करते हैंबाकी हीलिंग फोर्स भीतर से आती है।
और अब तो मनोवैज्ञानिक निरंतर इतने गहरे उतर रहे हैंवे कहते हैं कि अगर एक आदमी के भीतर जीने की इच्छा चली गई हैतो घाव भरना मुश्किल हो जाता है। अगर एक आदमी के भीतर से जीवन की इच्छा चली गई हैतो बीमारी को चिकित्सा ठीक नहीं कर पाती। क्योंकि अव्यक्त नेजीने की जो शक्ति थीवह देनी बंद कर दीवापस ले ली। बूढ़े आदमी के शरीर में कोई बुनियादी फर्क नहीं हो गए होते हैं। लेकिन अव्यक्त सिकुड़ने लगता है। वह शक्ति वापस लौटने लगती है। उतार शुरू हो गया।
अगर हम अपने भीतर थोड़ा-सा झांकेंतो हमें पता चलेगा कि हम जहां जी रहे हैंवह शायद किसी एक बहुत बड़ी ऊर्जा का ऊपरी शिखर है। बसउस शिखर से ही हम परिचित हैंउसके पीछे हम बिलकुल परिचित नहीं हैं। उसके पीछे अव्यक्त अभी भी मौजूद है। सभी व्यक्त घटनाओं के पीछे अव्यक्त मौजूद है। सभी दृश्य घटनाओं के पीछे अदृश्य मौजूद है। सभी चेतन घटनाओं के पीछे अचेतन मौजूद है। सभी दिखाई पड़ने वाले जगत और रूप के पीछे अरूप मौजूद है। जरा रूप की परत में गहरे उतरें।
कैसे उतरेंक्या करें?
दूसरे को भूलें। बहुत कठिन है। आंख बंद करेंतो भी दूसरा ही याद आता है। आंख बंद करेंतो भी दूसरा ही दिखाई पड़ता है। आंख बंद करेंतो भी दूसरे से ही मिलना होता रहता है। दूसरे से आब्सेस्ड हैंदूसरे से रुग्ण हैं। दूसरा है कि पीछा छोड़ता ही नहींबसचित्त में घूमता ही चला जाता है। यह जो दूसरे की भीतर भीड़ हैइसे विदा करें।
विदा करने का उपाय हैइस भीड़ के प्रति साक्षी का भाव करें। भीतर आंख बंद करकेवे जो दूसरों के प्रतिबिंब हैंउनके साक्षी भर रह जाएं। देखते रहेंकुछ कहें मत। न पक्ष लेंन विपक्ष लें। न प्रेम करेंन घृणा करें। न किसी चित्र को कहें कि आओन किसी चित्र को कहें कि जाओ। बस बैठे रह जाएं और देखते रहेंदेखते रहेंदेखते रहें। धीरे-धीरे चित्र विदा होने लगते हैं। क्योंकि जिन मेहमानों को आतिथेय देखता ही रहेवे मेहमान ज्यादा देर नहीं टिक सकते। मित्रता दिखाए तो भी टिक सकते हैंशत्रुता दिखाए तो भी आ सकते हैं। कुछ भी न दिखाए...।
तो बुद्ध ने एक सूत्र दिया हैउपेक्षाइंडिफरेंस। बसरह जाएकुछ भी न दिखाएन पक्षन विपक्ष। तो धीरे-धीरे दूसरे के चित्र बिखर जाते हैं। विचार खो जाते हैं।
और जिस क्षण भी दूसरे के चित्र नहीं होतेउसी क्षण स्वयं के होने का बोध पहली दफा उतरता है। जिस क्षण दूसरा आपके भीतर मौजूद नहीं हैउसी क्षण अचानक आपको अपनी प्रेजेंस काअपने होने का अनुभव होता हैकहीं से कोई झरना फूट पड़ता है जैसे। जैसे पत्थर रखा था दूसरे का झरने के ऊपरवह हट गया और झरने की धारा फूट पड़ी। आप पहली दफा अपनी प्रेजेंस कोअपने होने कोअपने अस्तित्व को अनुभव करते हैं और अव्यक्त में यात्रा शुरू हो जाती है। उसके आगे आपको कुछ नहीं करना है।
जैसे एक आदमी छत से कूद जाए। कूद जाएतब तो ठीक है। कूदने के पहले पूछे कि मैं छत से कूद तो जाऊंगालेकिन फिर जमीन तक आने के लिए क्या करूंगातो हम कहेंगेतुम कुछ करना ही मतबाकी काम जमीन कर लेगी। तुम छत से कूद भर जानाबाकी काम जमीन पर छोड़ देना। वह बड़ी कुशल है। उसका ग्रेविटेशन हैउसकी अपनी कशिश हैअपना गुरुत्वाकर्षण हैवह तुम्हें खींच लेगी। तुम सिर्फ एक कदम छत से उठा लेना।
बसदूसरे से एक कदम उठा लेना आपबाकी अव्यक्त खींच लेगा। उसका अपना ग्रेविटेशन हैउससे बड़ा कोई ग्रेविटेशन नहीं हैउससे बड़ी कोई कशिश नहीं है। वह खींच लेगा। लेकिन हम दूसरे को पकड़े हैं। वह दूसरे को पकड़े होने की वजह सेदूसरे के साथ हम इतने जोर से चिपके हुए हैं कि वह द्वार ही नहीं खुल पाताजहां से अव्यक्त हमें पुकार ले और खींच ले और बुला ले और अपने में डुबा ले।
और एक बार अव्यक्त में डूबकर लौटेतो फिर दूसरे में भी वही दिखाई पड़ेगाजो स्वयं में दिखाई पड़ा है। क्योंकि दूसरे को हम वहीं तक जानते हैंजितना हम स्वयं को जानते हैं। जिस दिन आपको अपने भीतर अव्यक्त दिखाई पड़ जाएगावह इटरनल एबिसवह अंतहीन खाई अव्यक्त की अपने भीतर मुंह खोलकर दिखाई पड़ जाएगीउस दिन प्रत्येक आंख में और प्रत्येक चेहरे में वही अव्यक्त दिखाई पड़ना शुरू हो जाएगा। फिर पत्ते में और फूल में और आकाश मेंसब तरफ उस अव्यक्त की मौजूदगी अनुभव होने लगती है।
लेकिन यात्रा का पहला कदम स्वयं के भीतर है। उपेक्षा या साक्षी या कोई भी नाम देंअवेयरनेसकुछ भी नाम दें--दूसरे के जो चित्र भीतर हैंदूसरे के जो प्रतिबिंब भीतर हैंउनके प्रति होश से भर जाएं और कुछ मत करेंवे गिर जाते हैं। कुछ किया कि वे पकड़ जाते हैं। कुछ मत करें और अचानक आप पाएंगे कि घटना घट गई और आप अव्यक्त में उतर गए।
कृष्ण उसी अव्यक्त की बात कर रहे हैं। वह पहले भी थाबाद में भी हैअभी भी है। सिर्फ व्यक्त से ढंका है। जरा व्यक्त की परत के नीचे जाएं और वह प्रकट हो जाता है।


प्रश्न: भगवान श्रीहम अगर जीने की इच्छा छोड़ देंतो क्या अव्यक्त का सिकुड़ना शुरू होता हैया अव्यक्त का सिकुड़ना शुरू होता हैइसके प्रभाव से हम जीने की इच्छा खो बैठते हैंप्रश्न यह है कि आरंभ कहां से होता हैक्या पारस्परिक असर नहीं होता?


जीवन की इच्छा हम छोड़ दें तो अव्यक्त सिकुड़ना शुरू हो जाता हैया अव्यक्त सिकुड़ना शुरू हो जाता हैइसलिए हम जीवन की इच्छा छोड़ देते हैं--ये अगर दो घटनाएं होतींतो मैं कोई उत्तर दे पाता। ये दो घटनाएं नहीं हैंयह साइमलटेनियसयुगपत घटना है। अव्यक्त का सिकुड़ना और हमारा जीने की इच्छा छोड़ देनाएक ही घटना है। हमारा जीने की इच्छा छोड़ देना और अव्यक्त का सिकुड़ना भी एक ही घटना है। क्योंकि हम अव्यक्त से पृथक नहीं हैंहम उससे अन्य नहीं हैंहम उससे दूसरे नहीं हैं। यह एक ही चीज है।
हांहमें सबसे पहले जो पता चलता हैउसमें फर्क हो सकता है। अस्तित्व में दोनों एक चीज हैंपता चलने में फर्क हो सकता है। एक आदमी को पहले पता चल सकता है कि मेरी जीवन की इच्छा मरती जाती है। एक आदमी को पता चल सकता है कि मेरी तो इच्छा कोई मरी नहींलेकिन भीतर कुछ सिकुड़ना शुरू हो गया है। यह आदमियों पर निर्भर करेगा कि उनकी कहां से शुरुआत होगी।
अगर कोई आदमी निरंतर अहंकार में ही जीया हैतो उसकी प्रतीति और होगी। और कोई आदमी निरंतर निरहंकार में जीया हैतो उसकी प्रतीति और होगी। वह प्रतीति अहंकार के अस्तित्व पर निर्भर करेगीघटना के अस्तित्व पर नहीं। घटना तो एक ही है। घटना एक ही है। वे घटनाएं दो नहीं हैं। लेकिन हम तो अहंकार में ही जीते हैं। इसलिए साधारणतः जब जीवन सिकुड़ना शुरू होता हैअस्तित्व जब डूबना शुरू होता हैतो हमें ऐसा ही लगता है...।
बूढ़े आदमी कहते हुए सुने जाते हैं कि अब जीने की कोई इच्छा न रही। अब जीना नहीं चाहते। अब तो मौत ही आ जाए तो अच्छा है। लेकिन अभी भी वे यह कह रहे हैं कि अब जीने की कोई इच्छा न रहीजैसे कि अपनी इच्छा से अब तक जीते थे। लेकिन सब चीजों को अपने से बांधकर देखा हैतो इसको भी अपने से ही बांधकर वे देखेंगे।
हमारी स्थिति करीब-करीब ऐसी ही है। मैंने सुना है कि जगन्नाथ की रथ-यात्रा चल रही है। हजारों लोग रथ को नमस्कार कर रहे हैं। एक कुत्ता भी रथ के आगे हो लिया। उस कुत्ते की अकड़ देखते ही बनती है। ठीक कारण है। सभी उसको नमस्कार कर रहे हैं! जो भी सामने आता हैएकदम चरणों में गिर जाता है। सामने जो भी आ जाता हैचरणों में गिर जाता है। उस कुत्ते की अकड़ बढ़ती चली जा रही है। फिर पीछे लौटकर देखता हैतो पता चलता है कि सामने ही नहीं स्वागत हो रहा हैपीछे भी रथ चल रहा है। स्वभावतःजिस कुत्ते का इतना स्वागत हो रहा होउसके पीछे रथ चलना ही चाहिए। यह रथ कुत्ते के पीछे चल रहा है! ये लोग कुत्ते को नमस्कार कर रहे हैं!
हमारा अहंकार करीब-करीब जीवन की घटनाओं और पीछे अव्यक्त के चलने वाले रथ के बीच मेंकुत्ते की हालत में होता है। सब नमस्कार इस मैं को होते हैंसब पीछे से घटने वाली घटनाएं इस मैं को होती हैं। लेकिन कौन इस कुत्ते को समझाएकैसे समझाए?
इस पर निर्भर करेगा कि आपने पूरे जीवन को कैसे लिया है। जब आपको भूख लगी हैतब आपने सोचा है कि मैं भूख लगा रहा हूं या अव्यक्त से भूख आ रही है! जब आप बच्चे से जवान हो गए हैंतो आपने समझा कि मैं जवान हो गया हूं या अव्यक्त से जवानी आ रही है!
यह इंटरप्रिटेशन की बात हैयह व्याख्या की बात है। घटना तो वही हैजो हो रही हैवही हो रही है। लेकिन कुत्ता अपनी व्याख्या करने को तो स्वतंत्र है। रथ चल रहा हैनमस्कार रथ को की जा रही हैलेकिन कुत्ते को व्याख्या करने से तो नहीं रोक सकते कि नमस्कार मुझे हो रही हैरथ मेरे लिए चल रहा है!
आदमी जो व्याख्या कर रहा हैउसी से सभी कुछ अहंकार- केंद्रित हो जाता है। अन्यथा अहंकार को छोड़ेंतो फिर दो बातें नहीं रह जातींएक ही बात रह जाती हैक्योंकि हम भी अव्यक्त के ही हिस्से हैं। हम अगर अलग होतेतब उपाय भी थाहम भी अव्यक्त के ही हिस्से हैं। हम भी जो कर रहे हैंवह भी अव्यक्त ही कर रहा है। हम भी जो सोच रहे हैंवह भी अव्यक्त ही सोच रहा है। हम भी जो हो रहे हैंवह भी अव्यक्त ही हो रहा है।
जिस दिन हमें ऐसा दिखाई पड़ेगाउस दिन यह सवाल नहीं बनेगा। लेकिन अभी बनेगाक्योंकि हमें लगता हैकुछ हम कर रहे हैं। कुछ हम कर रहे हैंवह मनुष्य की व्याख्या है। उसी व्याख्या में अर्जुन उलझा हैइसलिए पीड़ित और परेशान है। वह यह कह रहा है कि मैं मारूं! इन सबको मैं काट डालूं! नहींये सब मेरे हैंमैं यह न करूंगा। इससे तो बेहतर है कि मैं भाग जाऊं। लेकिन भागना भी वही करेगामारना भी वही करेगा। वह कर्ता को नहीं छोड़ पाएगावह मैं की व्याख्या नहीं छोड़ पा रहा है।
कृष्ण अगर कुछ भी कह रहे हैंतो इतना ही कह रहे हैं कि तू जो व्याख्या कर रहा है मैं के केंद्र सेवह केंद्र ही झूठा हैवह केंद्र कहीं है ही नहीं। उस केंद्र के ऊपर तू जो सब समर्पित कर रहा हैवहीं तेरी भूल हुई जा रही है।
लेकिन हमें सब चीजें दो में टूटी हुई दिखाई पड़ती हैं। यह श्वास मेरे भीतर आती हैफिर दूसरी श्वास बाहर जाती है। ये दो श्वासें नहीं हैंएक श्वास है। कोई पूछ सकता है कि मैं श्वास को बाहर निकालता हूंइसलिए मुझे श्वास भीतर लेनी पड़ती हैया चूंकि मैं श्वास भीतर लेता हूंइसलिए मुझे श्वास बाहर निकालनी पड़ती हैतो हम कहेंगेभीतर आना और बाहर जाना एक ही श्वास के डोलने का फर्क है। एक ही श्वास हैवही भीतर आती हैवही बाहर जाती है।
असल में बाहर और भीतर भी दो चीजें नहीं हैं अव्यक्त में। बाहर और भीतर भी अव्यक्त में--बाहर और भीतर भी अव्यक्त में--एक ही चीज के दो छोर हैं। लेकिन जहां हम जी रहे हैंमैनिफेस्टेड जगत मेंव्यक्त मेंजहां सब अनेक हो गया हैवहां सब भिन्न हैवहां सब अलग है। फिर उस अलग से हमारे सब सवाल उठते हैं।
बुद्ध के पास एक व्यक्ति आया है। और बहुत सवाल पूछता है। तो बुद्ध ने कहाऐसा करतू सवालों के उत्तर ही चाहता हैउसने कहाउत्तर ही चाहता हूं। बुद्ध ने कहाऔर कितने लोगों से तूने पूछा हैउसने कहामैं बहुत लोगों से पूछकर थक चुका हूंअब आपके पास आया हूं। बुद्ध ने कहाइतने लोगों से पूछकर तुझे उत्तर नहीं मिलातो तुझे यह खयाल नहीं आता कि पूछने से उत्तर मिलेगा ही नहीं! उसने कहा कि नहींयह खयाल नहीं आया। मुझे तो इतना ही खयाल आता है कि अब और किसी से पूछेंअब और किसी से पूछेंअब और किसी से पूछें। बुद्ध ने कहातो कब तक तू पूछता रहेगामैं भी तुझे उत्तर दे दूं उसी तरहजैसे दूसरों ने तुझे दिए थेया कि तुझे सच ही उत्तर चाहिए। उसने कहामुझे सच ही उत्तर चाहिए।
तो बुद्ध ने कहाफिर तू रुक जाफिर तू सालभर पूछ ही मत। उसने कहाबिना पूछे उत्तर कैसे मिलेगाबुद्ध ने कहा,तू प्रश्न छोड़। सालभर बाद पूछना। सालभर पूछ ही मतसालभर सोच ही मतसालभर बात ही मत करसालभर मौन ही हो जा। उसने कहालेकिन इससे क्या होगायहबुद्ध ने कहासालभर बाद ठीक इसी दिन पूछ लेना। जब बुद्ध ने उससे यह कहा कि ठीक इसी दिन पूछ लेनातो एक भिक्षु वृक्ष के नीचे बैठा थाखिलखिलाकर हंसने लगा।
उस आदमी ने उस भिक्षु से पूछाहंसते हैं आपक्या बात हैहंसने की क्या बात हैउस भिक्षु ने कहापूछना हो तो अभी पूछ लेनाक्योंकि इसी धोखे में हम भी पड़े। हम साल बिता चुके हैं। जब सालभर बाद खुद ही जान लेते हैंतो पूछने को बचता नहीं है। पूछना हो तो अभी पूछ लेनानहीं तो फिर पूछ ही न पाओगे। ये बुद्ध बड़े धोखेबाज हैं। मैं भी इसी धोखे में पड़ा और पीछे मुझे पता चला कि और लोग भी इस धोखे में पड़े हैं। बुद्ध ने कहामैं अपने वचन पर अडिग रहूंगा। अगर सालभर बाद तू पूछेगातो मैं उत्तर दूंगा।
साल बीत गया। फिर वही दिन आ गया। और बुद्ध ने उस आदमी को कहा कि मित्रअब खड़े हो जाओ और प्रश्न पूछ लो! वह हंसने लगा और उसने कहा कि जाने देंबेकार की बात-चीत में कोई सार नहीं है। पर बुद्ध ने कहावायदा था मेरातो मैं तुम्हें याद दिलाए देता हूं। पीछे मत कहना कि मैंने धोखा दिया।
उसने कहा कि नहींआप उस दिन उत्तर देते तो ही धोखा होता। क्योंकि जब मैं चुप हुआतब मैंने देखा कि सारे प्रश्न विचार से निर्मित थेक्योंकि विचार ने अस्तित्व को खंड-खंड में तोड़ा हुआ था। और अस्तित्व था अखंड। अब जब मैं भीतर निर्विचार हुआतो मैंने पाया कि सारे प्रश्न झूठे थेक्योंकि अस्तित्व को तोड़कर खड़े किए गए थे।
उस अव्यक्त मेंउस अखंड में सब प्रश्न गिर जाते हैंलेकिन व्यक्त में सब प्रश्न उठते हैं। तो या तो हम प्रश्न पूछते रहेंतो जिंदगी दर्शनशास्त्र बन जाती है। और या हम भीतर उतरेंतो जिंदगी धर्म बन जाती है। और अधर्म धर्म के खिलाफ उतना नहीं हैजितनी फिलासफी हैजितना दर्शन है धर्म के खिलाफ। क्योंकि वह विचारऔर विचारऔर विचार में ले जाता है। और हर विचार चीजों को तोड़ता चला जाता है। आखिर में सब चीजें टूट जाती हैंप्रश्न ही प्रश्न रह जाते हैंकोई उत्तर नहीं बचता।
भीतर उतरेंवहां एक ही हैवहां दो नहीं हैं। और जहां दो नहीं हैंवहां प्रश्न नहीं हो सकता। प्रश्न के लिए कम से कम दो का होना जरूरी है कम से कम। पूछा जा सकेइसलिए कम से कम दो का होना जरूरी है।
वह जो पहले था अव्यक्तवह जो बाद में रह जाएगा अव्यक्तवह अभी भी है। उसमें उतरनाउसमें डूबना ही मार्ग है।


देही नित्यमध्योऽहं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।। ३०।।
स्वधर्मपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छे्रयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।। ३१।।
हे अर्जुनयह आत्मा सब के शरीर में सदा ही अवध्य हैइसलिए संपूर्ण भूत प्राणियों के लिए तू शोक करने को योग्य नहीं है।
और अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने को योग्य नहीं हैक्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्तव्य क्षत्रिय के लिए नहीं है।


कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि और सब बातें छोड़ भी दोतो भी क्षत्रिय होऔर क्षत्रिय के लिए युद्ध से भागना श्रेयस्कर नहीं है।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी हैकई कारणों से।
एक तो विगत पांच सौ वर्षों मेंसभी मनुष्य समान हैंइसकी बात इतनी प्रचारित की गई है कि कृष्ण की यह बात बहुत अजीब लगेगीबहुत अजीब लगेगीकि तुम क्षत्रिय हो। समाजवाद के जन्म के पहलेसारी पृथ्वी परउन सारे लोगों नेजिन्होंने सोचा है और जीवन को जाना हैबिलकुल ही दूसरी उनकी धारणा थी। वह धारणा यह थी कि कोई भी व्यक्ति समान नहीं है। एक।
और दूसरी धारणा उस असमानता से ही बंधी हुई थी और वह यह थी कि व्यक्तियों के टाइप हैंव्यक्तियों के विभिन्न प्रकार हैं। बहुत मोटे मेंइस देश के मनीषियों ने चार प्रकार बांटे हुए थे। वे चार वर्ण थे। वर्ण की धारणा भी बुरी तरहबुरी तरह निंदित हुई। इसलिए नहीं कि वर्ण की धारणा के पीछे कोई मनोवैज्ञानिक सत्य नहीं हैबल्कि इसलिए कि वर्ण की धारणा मानने वाले लोग अत्यंत नासमझ सिद्ध हुए। वर्ण की धारणा को प्रतिपादित जो आज लोग कर रहे हैं,अत्यंत प्रतिक्रियावादी और अवैज्ञानिक वर्ग के हैं। संग-साथ से सिद्धांत तक मुसीबत में पड़ जाते हैं!
इसलिए आज बड़ी मुश्किल पड़ती है यह बात कि कृष्ण का यह कहना कि तू क्षत्रिय है। जिस दिन यह बात कही गई थीउस दिन यह मनोवैज्ञानिक सत्य बहुत स्पष्ट था। अभी जैसे-जैसे पश्चिम में मनोविज्ञान की समझ बढ़ती हैवैसे-वैसे यह सत्य पुनः स्थापित होता जाता है। कार्ल गुस्ताव जुंग ने फिर आदमी को चार टाइप में बांटा है। और आज अगर पश्चिम में किसी आदमी की भी मनुष्य के मनस में गहरी से गहरी पैठ हैतो वह जुंग की है। उसने फिर चार हिस्सों में बांट दिया है।
नहींआदमी एक ही टाइप के नहीं हैं। पश्चिम में जो मनोविज्ञान का जन्मदाता है फ्रायडउसने तो मनोवैज्ञानिक आधार पर समाजवाद की खिलाफत की है। उसने कहा कि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूंलेकिन जितना ही मैं मनुष्य के मन को जानता हूंउतना ही मैं कहता हूं कि मनुष्य असमान है। इनइक्वालिटी इज़ दि फैक्टऔर इक्वालिटी सिर्फ एक झूठी कहानी हैपुराणकथा है। समानता है नहींहो नहीं सकतीक्योंकि व्यक्ति-व्यक्ति बुनियाद में बहुत भिन्न हैं।
इन भिन्नताओं की अगर हम बहुत मोटी रूप-रेखा बांधेंतो इस मुल्क ने कृष्ण के समय तक बहुत मनोवैज्ञानिक सत्य को विकसित कर लिया था और हमने चार वर्ण बांटे थे। चार वर्णों में राज है। और जहां भी कभी मनुष्यों को बांटा गया हैवह चार से कम में नहीं बांटा गया है और चार से ज्यादा में भी नहीं बांटा गयाजिन्होंने भी बांटा है--इस मुल्क में ही नहींइस मुल्क के बाहर भी। कुछ कारण दिखाई पड़ता है। कुछ प्राकृतिक तथ्य मालूम होता है पीछे।
ब्राह्मण से अर्थ है ऐसा व्यक्तिजिसके प्राणों का सारा समर्पण बौद्धिक हैइंटेलेक्चुअल है। जिसके प्राणों की सारी ऊर्जा बुद्धि में रूपांतरित होती है। जिसके जीवन की सारी खोज ज्ञान की खोज है। उसे प्रेम न मिलेचलेगाउसे धन न मिलेचलेगाउसे पद न मिलेचलेगालेकिन सत्य क्या हैइसके लिए वह सब समर्पित कर सकता है। पदधनसुखसब खो सकता है। बसएक लालसाउसके प्राणों की ऊर्जा एक ही लालसा के इर्द-गिर्द जीती हैउसके भीतर एक ही दीया जल रहा है और वह दीया यह है कि ज्ञान कैसे मिलेइसको ब्राह्मण...।
आज पश्चिम में जो वैज्ञानिक हैंवे ब्राह्मण हैं। आइंस्टीन को ब्राह्मण कहना चाहिएलुई पाश्चर को ब्राह्मण कहना चाहिए। आज पश्चिम में तीन सौ वर्षों में जिन लोगों ने विज्ञान के सत्य की खोज में अपनी आहुति दी हैउनको ब्राह्मण कहना चाहिए।
दूसरा वर्ग है क्षत्रिय का। उसके लिए ज्ञान नहीं है उसकी आकांक्षा का स्रोतउसकी आकांक्षा का स्रोत शक्ति हैपावर है। व्यक्ति हैं पृथ्वी परजिनका सारा जीवन शक्ति की ही खोज है। जैसे नीत्सेउसने किताब लिखी हैविल टु पावर। किताब लिखी है उसने कि जो असली नमक हैं आदमी के बीच--नीत्से कहता है--वे सभी शक्ति को पाने में आतुर हैंशक्ति के उपासक हैंवे सब शक्ति की खोज कर रहे हैं। इसलिए नीत्से ने कहा कि मैंने श्रेष्ठतम संगीत सुने हैंलेकिन जब सड़क पर चलते हुए सैनिकों के पैरों की आवाज और उनकी चमकती हुई संगीनें रोशनी में मुझे दिखाई पड़ती हैंइतना सुंदर संगीत मैंने कोई नहीं सुना।
ब्राह्मण को यह आदमी पागल मालूम पड़ेगासंगीन की चमकती हुई धार में कहीं कोई संगीत होता हैकि सिपाहियों के एक साथ पड़ते हुए कदमों की चाप में कोई संगीत होता हैसंगीत तो होता है कंटेंप्लेशन मेंचिंतना मेंआकाश के नीचे वृक्ष के पास बैठकर तारों के संबंध में सोचने में। संगीत तो होता है संगीत मेंकाव्य में। संगीत तो होता है खोज में सत्य की। यह पागल है नीत्से!
लेकिन नीत्से किसी एक वर्ग के लिए ठीक-ठीक बात कह रहा है। किसी के लिए तारों में कोई अर्थ नहीं होता। किसी के लिए एक ही अर्थ होता हैएक ही संकल्प होता है कि शक्ति और ऊर्जा के ऊपरी शिखर पर वह कैसे उठ जाए! उसे हमने कहा था क्षत्रिय।
कृष्ण पहचानते हैं अर्जुन को भलीभांति। वह टाइप क्षत्रिय का है। अभी बातें वह ब्राह्मण जैसी कर रहा है। इसमें कनफ्यूज्ड हो जाएगा। इसमें उपद्रव में पड़ जाएगा। उसके व्यक्तित्व का पूरा का पूरा बनावस्ट्रक्चरउसके मनस की एनाटामीउसके मनस का सारा ढांचा क्षत्रिय का है। तलवार ही उसकी आत्मा हैवही उसकी रौनक हैवही उसका संगीत है। अगर परमात्मा की झलक उसे कहीं से भी मिलनी हैतो वह तलवार की चमक से मिलनी है। उसके लिए कोई और रास्ता नहीं है।
तो उससे वे कह रहे हैंतू क्षत्रिय हैअगर और सब बातें भी छोड़तो तुझसे कहता हूं कि तू क्षत्रिय है। और तुझसे मैं कहता हूं कि क्षत्रिय से यहां-वहां होकर तू सिर्फ दीन-हीन हो जाएगायहां-वहां होकर तू सिर्फ ग्लानि को उपलब्ध होगायहां-वहां होकर तू सिर्फ अपने प्रति अपराधी हो जाएगा।
और ध्यान रहेअपने प्रति अपराध जगत में बड़े से बड़ा अपराध है। क्योंकि जो अपने प्रति अपराधी हो जाता हैवह फिर सबके प्रति अपराधी हो जाता है। सिर्फ वे ही लोग दूसरे के साथ अपराध नहीं करतेजो अपने साथ अपराध नहीं करते। और कृष्ण की भाषा में समझेंतो अपने साथ सबसे बड़ा अपराध यही है कि जो उस व्यक्ति का मौलिक स्वर है जीवन कावह उससे च्युत हो जाएउससे हट जाए।
तीसरा एक वर्ग और हैजिसको तलवार में सिर्फ भय के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दिखाई पड़ेगासंगीत तो कभी नहींसिर्फ भय दिखाई पड़ेगा। जिसे ज्ञान की खोज नासमझी मालूम पड़ेगी कि सिरफिरों का काम है। तो तीसरा वर्ग हैजिसके लिए धन महिमा है। जिसके लिए धन ही सब कुछ है। धन के आस-पास ही जिसके जीवन की सारी व्यवस्था निर्मित होती है। अगर वैसे आदमी को मोक्ष की भी बात करनी होतो उसके लिए मोक्ष भी धन के रूप में ही दिखाई पड़ सकता है। अगर वह भगवान का भी चिंतन करेगातो भगवान को लक्ष्मीनारायण बनाए बिना नहीं रह सकता। इसमें उसका कोई कसूर नहीं है। सिर्फ फैक्टसिर्फ तथ्य की बात कर रहा हूं मैं। ऐसा है। और ऐसा आदमी अगर छिपाए अपने कोतो व्यर्थ ही कठिनाई में पड़ेगा। अगर वह दबाए अपने कोतो कठिनाई में पड़ेगा। उसके लिए जीवन की जो परम अनुभूति का द्वार हैवह शायद धन की खोज से ही खुलने वाला है। इसलिए और कहीं से खुलने वाला नहीं है।
अब एक राकफेलर या एक मार्गन या एक टाटाये कोई छोटे लोग नहीं हैं। कोई कारण नहीं है इनके छोटे होने का। ये अपने वर्ग में वैसे ही श्रेष्ठ हैंजैसे कोई याज्ञवल्क्यजैसे कोई पतंजलिजैसे कोई अर्जुन अपने वर्गों में होंगे। इसमें कोई तुलना नहीं हैकोई कंपेरिजन नहीं है।
वर्ण की जो धारणा हैवह तुलनात्मक नहीं हैवह सिर्फ तथ्यात्मक है। जिस दिन वर्ण की धारणा तुलनात्मक हुई कि कौन ऊपरकौन नीचेउस दिन वर्ण की वैज्ञानिकता चली गई और वर्ण एक सामाजिक अनाचार बन गया। जिस दिन वर्ण में तुलना पैदा हुई--कि क्षत्रिय ऊपरकि ब्राह्मण ऊपरकि वैश्य ऊपरकि शूद्र ऊपरकि कौन नीचेकि कौन पीछे--जिस दिन वर्ण का शोषण किया गयावर्ण के वैज्ञानिक सिद्धांत को जिस दिन सामाजिक शोषण की आधारशिला में रखा गयाउस दिन से वर्ण की धारणा अनाचार हो गई।
सभी सिद्धांतों का अनाचार हो सकता हैकिसी भी सिद्धांत का शोषण हो सकता है। वर्ण की धारणा का भी शोषण हुआ। और अब इस मुल्क में जो वर्ण की धारणा के समर्थक हैंवे उस वर्ण की वैज्ञानिकता के समर्थक नहीं हैं। उस वर्ण के आधार पर जो शोषण खड़ा हैउसके समर्थक हैं। उनकी वजह से वे तो डूबेंगे हीवर्ण का एक बहुत वैज्ञानिक सिद्धांत भी डूब सकता है।
एक चौथा वर्ग भी हैजिसे धन से भी प्रयोजन नहीं हैशक्ति से भी अर्थ नहीं हैज्ञान की भी कोई बात नहीं हैलेकिन जिसका जीवन कहीं बहुत गहरे में सेवा और सर्विस के आस-पास घूमता है। जो अगर अपने को कहीं समर्पित कर पाए और किसी की सेवा कर पाएतो फुलफिलमेंट कोआप्तता को उपलब्ध हो सकता है।
ये जो चार वर्ग हैंइनमें कोई नीचे-ऊपर नहीं है। ऐसे चार मोटे विभाजन हैं। और कृष्ण की पूरी साइकोलाजीकृष्ण का पूरा का पूरा मनोविज्ञान इस बात पर खड़ा है कि प्रत्येक व्यक्ति को परमात्मा तक पहुंचने का जो मार्ग हैवह उसके स्वधर्म से गुजरता है। स्वधर्म का मतलब हिंदू नहींस्वधर्म का मतलब मुसलमान नहींस्वधर्म का मतलब जैन नहींस्वधर्म का मतलबउस व्यक्ति का जो वर्ण है। और वर्ण का जन्म से कोई संबंध नहीं है।
लेकिन संबंध निर्मित हो गया। हो जाने के पीछे बहुत कारण हैंवह मैं बात करूंगा। हो जाने के पीछे कारण थे,वैज्ञानिक ही कारण थे। संबंध था नहीं जन्म के साथ वर्ण काइसलिए फ्लुइडिटी थीऔर कोई विश्वामित्र यहां से वहां हो भी जाता था। संभावना थी कि एक वर्ण से दूसरे वर्ण में यात्रा हो जाए। लेकिन जैसे ही यह सिद्धांत खयाल में आ गया और इस सिद्धांत की परम प्रामाणिकता सिद्ध हो गई कि प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्ण से हीअपने स्वधर्म से ही सत्य को उपलब्ध हो सकता हैतो एक बहुत जरूरी बात पैदा हो गई और वह यह कि यह पता कैसे चले कि कौन व्यक्ति किस वर्ण का है! अगर जन्म से तय न होतो शायद ऐसा भी हो सकता है कि एक आदमी जीवनभर कोशिश करे और पता ही न लगा पाए कि वह किस वर्ण का है। उसका क्या है झुकाववह क्या होने को पैदा हुआ है--पता ही कैसे चलेतो फिर सुगम यह हो सकता है कि अगर जन्म से कुछ निश्चय किया जा सके।
लेकिन जन्म से निश्चय किया कैसे जा सकेकोई आदमी किसी के घर में पैदा हो गयाइससे तय हो जाएगाकोई आदमी किसी के घर में पैदा हो गयाब्राह्मण के घर मेंतो ब्राह्मण हो जाएगा?
जरूरी नहीं है। लेकिन बहुत संभावना है। प्रोबेबिलिटी ज्यादा है। और उस प्रोबेबिलिटी को बढ़ाने के लिएसर्टेन करने के लिए बहुत से प्रयोग किए गए। बड़े से बड़ा प्रयोग यह था कि ब्राह्मण को एक सुनिश्चित जीवन व्यवस्था दी गईएक डिसिप्लिन दी गई। यह डिसिप्लिन इसलिए दी गई कि इस आदमी को या इस स्त्री को जो नई आत्मा अपने गर्भ की तरह चुनेगीतो उस आत्मा को बहुत स्पष्ट हो जाना चाहिए कि वह उसके टाइप से मेल खाता है कि नहीं खाता है।
इसलिए मैंने परसों आपसे कहा कि वर्णसंकर होने के डर से नहींक्योंकि वर्णसंकर से तो बहुत ही विकसित व्यक्तित्व पैदा हो सकते हैंलेकिन दो जातियों में शादी न होउसका कारण बहुत दूसरा था। उसका कुल कारण इतना था कि हम प्रत्येक वर्ण को एक स्पष्ट फार्मएक रूप दे देना चाहते थे। और प्रत्येक वर्ण को इतना स्पष्ट ढांचा दे देना चाहते थे कि आत्माएंजो चुनाव करती हैं अपने नए जन्म के लिएउनके लिए एकदम सुगम व्यवस्था हो जाए। फिर भी भूल-चूक हो जाती थी। इतने बड़े समाज में बहुत वैज्ञानिक प्रयोग भी भूल-चूक ले आता है। तो कभी किसी...।
अब एक पिता और एक मांजिनके दोनों के जीवन की खोज ज्ञान रही हैनिश्चित ही ये जिस गर्भ को निर्मित करेंगेवह गर्भ किसी ज्ञान की खोजी आत्मा के लिए सुगमतम होगा। इसलिए बहुत संभावना है कि ब्राह्मण के घर में ब्राह्मण का टाइप पैदा हो। संभावना हैनिश्चय नहीं है। भूल-चूक हो सकती है। इसलिए भूल-चूक के लिए तरलता थीथोड़ी यात्रा हो सकती थी।
इन चार हिस्सों में जो स्ट्रैटिफिकेशन किया गया समाज काचार हिस्सों में तोड़ दिया गयाये चार हिस्से नीचे-ऊपर की धारणा से बहुत बाद में भरे। पहले तो एक बहुत वैज्ञानिकएक बहुत मनोवैज्ञानिक प्रयोग थाजो इनके बीच किया गया। ताकि आदमी पहचान सके कि उसके जीवन का मौलिकउसके जीवन का मौलिक पैशनउसके जीवन की मौलिक वासना क्या है। क्योंकि वह उसी वासना से यात्रा करके निर्वासना तक पहुंच सकता है।
कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं कि तू क्षत्रिय है। और सब बातें छोड़ देतो भी मैं तुझे कहता हूं कि तेरे लिए यही उचित हैतू लड़ने से मत भाग। तू लड़। तू लड़ ही सकता है। तेरा सारा व्यक्तित्व ही योद्धा का व्यक्तित्व है। तू हाथ में किताब लेकर नहीं बैठ सकता। हाथ में किताब रहेगीलेकिन तेरे प्राणों तक किताब नहीं पहुंच सकती। तू सेवा करने की फिक्र में पड़ जाए कि सेवक हो जाऊंलोगों के पैर दबाऊंतो तेरे हाथ पैर दबाते रहेंगेतेरी आत्मा वहां नहीं होगी। तू धन कमाने में लग जातो तू रुपये इकट्ठा करता रहेगालेकिन वे रुपये तेरे लिए निर्मूल्य होंगेउनका मूल्य नहीं होगा।
मूल्य रुपये में नहीं होतामूल्य व्यक्ति के वर्ण में होता है। उससे रुपये में आता है। मूल्य रुपए में नहीं होतामूल्य व्यक्ति के वर्ण में होता है। अगर वैश्य के हाथ में रुपया आ जाए तो उसमें मूल्य होता हैक्षत्रिय के हाथ में रुपये का इतना ही मूल्य हो सकता है कि वह तलवार खरीद लेइससे ज्यादा मूल्य नहीं होता। इंट्रिंजिक वैल्यू नहीं होती रुपये की क्षत्रिय के हाथ मेंहांएक्सटर्नल वैल्यू हो सकती है कि एक तलवार खरीद ले।
एक ब्राह्मण के हाथ में रुपये का कोई मतलब नहीं होताकोई मतलब ही नहीं होताठीकरा होता है। इसलिए ब्राह्मण रुपये को ठीकरा कहते रहेंगे। वैश्य की समझ में कभी नहीं आता कि बात क्या है! यह हो नहीं सकता। उसे तो दिखाई पड़ेगा कि इस जगत में कुछ चल नहीं सकतापैसा ही सब कुछ चला रहा है।
इसलिए अब तक दुनिया में जो भी व्यवस्थाएं बनी हैंवे भी गहरे में वर्ण की ही व्यवस्थाओं के रूपांतरण हैं। अब तक पृथ्वी पर कोई भी व्यवस्था ब्राह्मण की नहीं बन सकी। संभावना है आगे। आज जो पश्चिम में बहुत बुद्धिमान लोग मेरिटोक्रेसी की बात कर रहे हैंगुणतंत्र कीतो कभी ऐसा वक्त आ सकता है कि जगत में ब्राह्मण की व्यवस्था हो। शायद वैज्ञानिक इतने प्रभावशाली हो जाएंगे आने वाले पचास सालों में कि राजनीतिज्ञों को अपने आप जगह खाली कर देनी पड़े। अभी भी बहुत प्रभावशाली हो गए हैं। अभी भी एक वैज्ञानिक के ऊपर निर्भर करता है बड़े से बड़ा युद्धकि कौन जीतेगा।
अगर आइंस्टीन जर्मनी में होतातो जीत का हिसाब और होता। आइंस्टीन अमेरिका में थातो हिसाब और हो गया। हिटलर को अगर कोई भी भूल-चूक पछताती होगी अभी भी नर्क मेंतो एक ही भूल-चूक पछताती होगी कि इस यहूदी को भाग जाने दियावही गलती हो गई। यह एक आदमी पर इतना बड़ा निर्णय होगा...।
ज्ञान निर्णायक होता जा रहा है! क्षत्रिय दुनिया पर हुकूमत कर चुके। वैश्य आज अमेरिका में हुकूमत कर रहे हैं। शूद्र आज रूस और चीन में हुकूमत कर रहे हैं। शूद्र यानी प्रोलिटेरिएटशूद्र यानी वह जिसने अब तक सेवा की थीलेकिन बहुत सेवा कर चुकाअब वह कहता हैहटो! अब हम मालकियत भी करना चाहते हैं।
लेकिन ब्राह्मण के हाथ में भी कभी आ सकती है व्यवस्था। संभावना बढ़ती जाती है। क्योंकि क्षत्रियों के हाथ में जब तक व्यवस्था रहीसिवाय तलवार चलने के कुछ भी नहीं हुआ। अमेरिका के हाथ मेंजब से वैश्यों के हाथ में धन की सत्ता आई हैतब से सारी दुनिया में सिवाय धन के और कोई चीज विचारणीय नहीं रही। और जब से प्रोलिटेरिएटसेवकश्रमिक के हाथ में व्यवस्था आई हैतब से वह दुनिया में एरिस्टोक्रेसी ने जो भी श्रेष्ठ पैदा किया थाउसे नष्ट करने में लगा है।
चीन में जिसे वे सांस्कृतिक क्रांति कह रहे हैंवह सांस्कृतिक क्रांति नहींसांस्कृतिक हत्या है। जो भी संस्कृति ने पैदा किया है चीन कीउस सबको नष्ट करने में लगे हैं। बुद्ध की मूर्तियां तोड़ी जा रही हैंमंदिर गिराए जा रहे हैं! विहार,मस्जिदेंगुरुद्वारे गिराए जा रहे हैं। कीमती चित्रबहुमूल्य पेंटिंग्सवे सब बुर्जुआ हो गई हैंउन सबमें आग लगाई जा रही है।
यह जो कृष्ण उसको कह रहे हैं अर्जुन कोवह एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक बात कह रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि तू अन्यथा हो नहीं सकता। और इसको भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है कि क्यों नहीं हो सकता। अगर अर्जुन चाहेतो क्यों ब्राह्मण नहीं हो सकताअगर बुद्ध क्षत्रिय घर में पैदा होकर ब्राह्मण हो सकते हैंऔर बुद्ध जैसा ब्राह्मण नहीं हुआ। अगर महावीर क्षत्रिय घर में पैदा होकर ब्राह्मण हो सकते हैंऔर महावीर जैसा ब्राह्मण नहीं हुआ। जैनों के तो चौबीस तीर्थंकर ही क्षत्रिय हैंलेकिन क्षत्रिय का कोई काम नहीं कियाशुद्धतम ब्राह्मण की यात्रा पर निकले। तो क्यों कृष्ण जोर देते हैं कि अर्जुनतू क्षत्रिय ही हो सकता है। जब बुद्ध हो सकते हैंमहावीर हो सकते हैंपार्श्व हो सकते हैं,नेमिनाथ हो सकते हैं--नेमिनाथ तो कृष्ण के चचेरे भाई ही थे--वे जब हो सकते हैंतो इस अर्जुन का क्या कसूर है कि नहीं हो सकता! तो थोड़ी-सी बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
आज मनोविज्ञान कहता है कि तीन साल की उम्र तक आदमी जितना सीखता हैवह पचास प्रतिशत है पूरे जीवन के ज्ञान काफिफ्टी परसेंट। बाकी शेष जीवन में वह पचास प्रतिशत और सीखेगा। पचास प्रतिशत तीन साल में सीख लेता हैशेष पचास प्रतिशत आने वाले जीवन में सीखेगा। और वह जो पचास प्रतिशत उसने तीन वर्ष की उम्र तक सीखा है,उसे बदलना करीब-करीब असंभव है। बाद में जो पचास प्रतिशत सीखेगाउसे बदलना कभी भी संभव है। तीन वर्ष तक मानना चाहिएसमझना चाहिए कि व्यक्ति का मन करीब-करीब प्रौढ़ हो जाता है भीतर।
अगर बुद्ध और महावीर क्षत्रिय घरों में पैदा होकर भी ब्राह्मण की यात्रा पर निकल जाते हैंतो उनके लक्षण बहुत बचपन से साफ हैं। बुद्ध को एक प्रतियोगिता में खड़ा किया गया कि हरिण को निशाना लगाएंतो वे इनकार कर देते हैं। इस अर्जुन ने कभी ऐसा नहीं किया। यह अब तक निशाना ही लगाता रहा हैइसकी सारी यात्रा अब तक की क्षत्रिय की ही यात्रा है। आज अचानकआकस्मिकएक क्षण में यह कहने लगा कि नहीं। तो इसके पास जो व्यक्तित्व का ढांचा हैवह पूरा का पूरा ढांचा ऐसा नहीं है कि बदला जा सके। उसकी सारी तैयारीसारा शिक्षणसारी कंडीशनिंग बहुत व्यवस्था से क्षत्रिय के लिए हुई है। आज अचानक वह भाग नहीं सकता।
कृष्ण उससे कहते हैं कि तू जो छोड़ने की बात कर रहा हैवह उपाय नहीं है कोईकठिन है। तू क्षत्रिय हैयह जान। और अब शेष यात्रा तेरी क्षत्रिय की तरह गौरव के ढंग से पूरी हो सकती हैया तू अगौरव को उपलब्ध हो सकता है और कुछ भी नहीं। तो वे कहते हैं कि या तो तू यश को उपलब्ध हो सकता है क्षत्रिय की यात्रा सेया सिर्फ अपयश में गिर सकता है।


यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्।। ३२।।
हे पार्थअपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं।


इस दूसरे सूत्र में भी वे क्षत्रिय की धन्यता की स्मृति दिला रहे हैं। क्षत्रिय की क्या धन्यता है। क्षत्रिय के लिए क्या ब्लिसफुल है। क्षत्रिय के लिए क्या फुलफिलमेंट है। वह कैसे फुलफिल्ड हो सकता है। वह कैसे आप्तकाम हो सकता हैकैसे भर सकता है पूरा।
युद्ध ही उसके लिए अवसर है। वहीं वह कसौटी पर है। वहीं चुनौती हैवहीं संघर्ष हैवहां मौका है जांच काउसके क्षत्रिय होने की अग्निपरीक्षा है। कृष्ण कह रहे हैं कि जैसे स्वर्ग और नर्क के द्वार पर कोई खड़ा हो और चुनाव हाथ में हो। युद्ध में उतरता है तूचुनौती स्वीकार करता हैतो स्वर्ग का यश तेरा है। भागता हैपलायन करता हैपीठ दिखाता हैतो नर्क का अपयश तेरा है। यहां स्वर्ग और नर्क किसी भौगोलिक स्थान के लिए सूचक नहीं हैं। क्षत्रिय का स्वर्ग ही यही है...।
मैंने सुना है कि अकबर के दरबार में दो राजपूत गए। युवाजवानअभी मूंछ की रेखाएं आनी शुरू हुई हैं। दोनों अकबर के सामने गए और उन्होंने कहा कि हम दो बहादुर हैं और सेवा में उपस्थित हैंकोई काम! तो अकबर ने कहाबहादुर होइसका प्रमाण क्या हैउन दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखाहंसे। तलवारें बाहर निकल गईं। अकबर ने कहायह क्या करते होलेकिन जब तक वह कहेतब तक तलवारें चमक गईंकौंध गईं। एक क्षण में तो खून के फव्वारे बह रहे थेएक-दूसरे की छाती में तलवारें घुस गई थीं। खून के फव्वारों से चेहरे भर गए थे। और वे दोनों हंस रहे थे और उन्होंने कहाप्रमाण मिलाक्योंकि क्षत्रिय सिर्फ एक ही प्रमाण दे सकता है कि मौत मुस्कुराहट से ली जा सकती है। तो हम सर्टिफिकेट लिखवाकर कहां से लाएंसर्टिफिकेट कोई और हो भी नहीं सकता बहादुरी का।
अकबर तो घबड़ा गयाउसने अपनी आत्मकथा में लिखवाया है कि इतना मैं कभी नहीं घबड़ाया था। मानसिंह को उसने बुलाया और कहा कि क्यायह मामला क्या हैमैंने तो ऐसे ही पूछा था! तो मानसिंह ने कहाक्षत्रिय से दोबारा ऐसे ही मत पूछना। क्योंकि जिंदगी हम हाथ पर लेकर चलते हैं। क्षत्रिय का मतलब यह है कि मौत एक क्षण के लिए भी विचारणीय नहीं है। लेकिन अकबर ने लिखवाया है कि हैरानी तो मुझे यह थी कि मरते वक्त वे बड़े प्रसन्न थेउनके चेहरों पर मुस्कुराहट थी। तो मानसिंह से उसने पूछा कि यह मुस्कुराहटमरने के बाद भी! तो मानसिंह ने कहाक्षत्रिय जो हो सकता थाहो गया। फूल खिल गया। तृप्त! कोई यह नहीं कह सका कि क्षत्रिय नहीं! बात खतम हो गई।
वह जो कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि स्वर्ग और नर्कजिसके सामने दोनों के द्वार खुले होंऐसा क्षत्रिय के लिए युद्ध का क्षण है। वहीं है कसौटी उसकीवहीं है परीक्षा उसकी। जिसकी तू प्रतीक्षा करता थाजिसके लिए तू तैयार हुआ आज तकजिसकी तूने अभीप्सा और प्रार्थना कीजो तूने चाहावह आज पूरा होने को है। और ऐन वक्त पर तू भाग जाने की बात करता है! अपने हाथ से नर्क में गिरने की बात करता है!
क्षत्रिय के व्यक्तित्व को उसकी पहचान कहां हैउस मौके मेंउस अवसर मेंजहां वह जिंदगी को दांव पर ऐसे लगाता हैजैसे जिंदगी कुछ भी नहीं है। इसके लिए ही उसकी सारी तैयारी है। इसकी ही उसकी प्यास भी है। यह मौका चूकता है वहतो सदा के लिए तलवार से धार उतर जाएगीफिर तलवार जंग खाएगीफिर आंसू ही रह जाएंगे।
अवसर है प्रत्येक चीज का। ज्ञानी का भी अवसर हैधन के यात्री का भी अवसर हैसेवा के खोजी का भी अवसर है। अवसर जो चूक जाता हैवह पछताता है। और जब व्यक्तित्व को उभरने का आखिरी अवसर होजैसा अर्जुन के सामने हैशायद ऐसा अवसर दोबारा नहीं होगातो कृष्ण कहते हैंउचित ही है कि तू स्वर्ग और नर्क के द्वार पर खड़ा है। चुनाव तेरे हाथ में है। स्मरण कर कि तू कौन है! स्मरण कर कि तूने अब तक क्या चाहा है! स्मरण कर कि यह पूरी जिंदगीसुबह से सांझसांझ से सुबहतूने किस चीज की तैयारी की है! अब वह तलवार की चमक का मौका आया है और तू जंग देने की इच्छा रखता है?
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीघत च हित्वा पापमवाप्स्यसि।। ३३।।
अकीघत चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।। ३४।।
और यदि तू इस धर्मयुक्त संग्राम को नहीं करेगातो स्वधर्म को और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा।
और सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति को भी कथन करेंगे और वह अपकीर्ति माननीय पुरुष के लिए मरण से भी अधिक बुरी होती है।


अभय क्षत्रिय की आत्मा हैफियरलेसनेस। कैसा भी भय न पकड़े उसके मन कोकैसे भी भय के झंझावात उसे कंपाएं न। कैसा भी भय होमृत्यु का ही सहीतो भी उसके भीतर हलन-चलन न हो। एक छोटी-सी कहानी आपसे कहूंउससे खयाल आ सकेगा।
सुना है मैंने कि चीन में एक बहुत बड़ा धनुर्धर हुआ। उसने जाकर सम्राट को कहा कि अब मुझे जीतने वाला कोई भी नहीं है। तो मैं घोषणा करना चाहता हूं राज्य में कि कोई प्रतियोगिता करता होतो मैं तैयार हूं। और अगर कोई प्रतियोगी न निकले--या कोई प्रतियोगी निकलेतो मैं स्पर्धा के लिए आ गया हूं। और मैं यह चाहता हूं कि अगर कोई प्रतियोगी न निकले या प्रतियोगी हार जाएतो मुझे पूरे देश का श्रेष्ठतम धनुर्धर स्वीकार किया जाए। सम्राट ने कहाइसके पहले कि तुम मुझसे कुछ बात करोमेरा जो पहरेदार हैउससे मिल लो। पहरेदार ने कहा कि धनुर्धर तुम बड़े होलेकिन एक व्यक्ति को मैं जानता हूंकुछ दिन उसके पास रह आओ। कहीं ऐसा न हो कि नाहक अपयश मिले।
उस व्यक्ति की खोज करता हुआ वह धनुर्धर जंगल पहुंचा। जब उस व्यक्ति के पास उसने देखा और रहातो पता चला कि वह तो कुछ भी नहीं जानता था।
तीन वर्ष उसके पास सीखा। सब सीख गया। तब उसके मन में हुआ कि अब तो मैं सब सीख गयालेकिन फिर भी अब मैं किस मुंह से राजा के पास जाऊंक्योंकि मेरा गुरु तो कम से कम मुझसे ज्यादा जानता ही है। नहीं ज्यादातो मेरे बराबर जानता ही है। तो अच्छा यह हो कि मैं गुरु की हत्या करके चला जाऊं।
अक्सर गुरुओं की हत्या शिष्य ही करते हैं--अक्सर। यह बिलकुल स्वाभाविक नियम से चलता है।
तो गुरु सुबह-सुबह लकड़ियां बीनने गया है जंगल मेंवह एक वृक्ष की ओट में खड़ा हो गया। धनुर्धर हैदूर से उसने तीर मारागुरु लकड़ियां लिए चला आ रहा है। लेकिन अचानक सब उलटा हो गया। वह तीर पहुंचाउस गुरु ने देखाएक लकड़ी सिर के बंडल से निकालकर उस तीर को मारी। वह तीर उलटा लौटा और जाकर उस युवक की छाती में छिद गया।
गुरु ने आकर तीर निकाला और कहा कि इतना भर मैंने बचा रखा था। शिष्यों से गुरु को थोड़ा-सा बचा रखना पड़ता है। लेकिन तुम नाहक...। मुझसे कह देते। मैं गांव आऊंगा नहीं। और शिष्य से प्रतियोगिता करने आऊंगापागल हुए होतुम जाओघोषणा करोतुम मुझे मरा हुआ समझो। तुम्हारे निमित्त अब किसी को सिखाऊंगा भी नहीं। और मेरे आने की कोई बात ही नहींतुमसे प्रतियोगिता करूंगा! जाओलेकिन जाने के पहले ध्यान रखना कि मेरा गुरु अभी जिंदा है। और मैं कुछ भी नहीं जानता। उसके पास दस-पांच साल रहकर जो थोड़े-बहुत कंकड़-पत्थर बीन लिए थेवही। इसलिए उसके दर्शन एक बार कर लो।
बड़ा घबड़ाया वह आदमी। महत्वाकांक्षी के लिए धैर्य बिलकुल नहीं होता। तीन साल इसके साथ खराब हुए। लेकिन अब बिना उस आदमी को देखे जा भी नहीं सकता। तो गया पहाड़ों में खोजता हुआऔर ऊंचे शिखर पर। उसके गुरु ने कहा था कि मेरा बूढ़ा गुरु हैकमर उसकी झुक गई हैतुम पहचान लोगे। जब वह उसके पास पहुंचातो उसने जाकर देखा कि एक अत्यंत वृद्ध आदमीसौ के ऊपर पार हो गया होगाकमर झुक गई हैबिलकुल गोल हो गया है। सोचा कि यह आदमी!
उसने कहा कि क्या आप ही वे धनुर्धर हैंजिनके पास मुझे भेजा गया हैतो उस बूढ़े ने आंखें उठाईंउसकी पलकों के बाल भी बहुत बड़े हो गए थेबामुश्किल आंखें खोलकर उसने देखा और कहाहांठीक है। कैसे आए होक्या चाहते होउसने कहामैं भी एक धनुर्धर हूं।
तो वह बूढ़ा हंसने लगा। उसने कहाअभी धनुष-बाण साथ लिए हो! कैसे धनुर्धर होक्योंकि जब कोई कला में पूर्ण हो जाता हैतो यह व्यर्थ का बोझ नहीं ढोता है। जब वीणा बजाने में वीणावादक पूर्ण हो जाता हैतो वीणा तोड़ देता हैक्योंकि फिर वीणा पूर्ण संगीत के मार्ग पर बाधा बन जाती है। और जब धनुर्धर पूरा हो जाता हैतो धनुष-बाण किसलिएये तो सिर्फ अभ्यास के लिए थे।
बहुत घबड़ाया वह धनुर्धर। उसने कहासिर्फ अभ्यास ही! तो आगे और कौन-सी धनुर्विद्या हैतो उस बूढ़े ने कहाआओ मेरे साथ। वह बूढ़ा उसे लेकर पहाड़ के कगार पर चला गयाजहां नीचे हजारों फीट का गङ्ढ है।
वह बूढ़ा आगे बढ़ने लगावह धनुर्धर पीछे खड़ा रह गया। वह बूढ़ा आगे बढ़ाउसके पैरों की अंगुलियां पत्थर के बाहर झांकने लगीं। उसकी झुकी हुई गरदन खाई में झांकने लगी। उसने कहा कि बेटेऔर पास आओइतने दूर क्यों रुक गए हो! उसने कहालेकिन वहां तो मुझे बहुत डर लगता है। आप वहां खड़े ही कैसे हैंमेरी आंखें भरोसा नहीं करतींक्योंकि वहां तो जरा श्वास भी चूक जाए...!
तो उस बूढ़े ने कहाजब अभी मन इतना कंपता हैतो निशाना तुम्हारा अचूक नहीं हो सकता। और जहां भय हैवहां क्षत्रिय कभी पैदा नहीं होता है। उस बूढ़े ने कहाजहां भय हैवहां क्षत्रिय कभी पैदा नहीं होता है। वहां धनुर्धर के जन्म की संभावना नहीं है। भयभीत किस चीज से होऔर अगर भय हैतो मन में कंपन होंगे हीकितने ही सूक्ष्म हों,कितने ही सूक्ष्म होंमन में कंपन होंगे ही।
तो कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैंतू और भयभीततो कल जो तेरा सम्मान करते थेकल जिनके बीच तेरे यश की चर्चा थीकल जो तेरा गुणगान गाते थेकल तक जो तेरी तरफ देखते थे कि तू एक जीवंत प्रतीक है क्षत्रिय कावे सब हंसेंगे। अपयश की चर्चा हो जाएगीकीर्ति को धब्बा लगेगा। तू यह क्या कर रहा हैतेरा निज-धर्म है जोतेरी तैयारी है जिसके लिएजिसके विपरीत होकर तू जी भी न सकेगाकीर्ति के शिखर से गिरते हीतू श्वास भी न ले सकेगा।
और ठीक कहते हैं कृष्ण। अर्जुन जी नहीं सकता। क्षत्रिय मर सकता है गौरव सेलेकिन पलायन करके गौरव से जी नहीं सकता। वह क्षत्रिय होने की संभावना में ही नहीं है। तो कृष्ण कहते हैंजो तेरी संभावना हैउससे विपरीत जाकर तू पछताएगाउससे विपरीत जाकर तू सब खो देगा।
इस संबंध में दोत्तीन बातें अंत में आपसे कहूंजो खयाल ले लेने जैसी हैंउनसे बड़ी भ्रांति होती हैअगर वे खयाल में न रहें। लग सकता है कि कृष्ण क्या युद्धखोर हैंवार-मांगर हैं! लग सकता है कि युद्ध की ऐसी उत्तेजना! युद्ध के लिए ऐसा प्रोत्साहन! तो भूल हो जाएगीअगर आपने ऐसा सोचा।
कृष्ण सिर्फ एक मनस-शास्त्री हैं। अर्जुन की पोटेंशियलिटी को समझते हैंअर्जुन क्या हो सकता हैयह समझते हैंऔर अर्जुन क्या होकर तृप्त हो सकता हैयह समझते हैं। और अर्जुन क्या होने से चूक जाएतो सदा के लिए दुख और विषाद को उपलब्ध हो जाएगा और अपने ही हाथ नर्क मेंआत्मघाती हो जाएगायह भी समझते हैं।
अब आज सारी दुनिया में मनस-शास्त्र के सामने जो गहरे से गहरा सवाल हैवह यही है कि हम प्रत्येक बच्चे को उसकी संभावनाउसकी पोटेंशियलिटी बता सकेंवह क्या हो सकता है। सब अस्तव्यस्त है।
रवींद्रनाथ के पिता रवींद्रनाथ को कवि नहीं बनाना चाहते हैं। कोई भी पिता नहीं बनाना चाहेगा। मैंने तो सुना है कि महाकवि निराला के घर एक रात एक छोटी-सी बैठक चलती थी। सुमित्रानंदन पंत थेमहादेवी थींमैथिलीशरण गुप्त थेऔर कुछ लोग थे। मैथिलीशरण गुप्त बहुत दिन बाद आए थे। तो जैसी उनकी आदत थीनिराला के भोजन बनाने वाले महाराज को भी पूछा कि ठीक तो होसब ठीक तो हैउसने कहाऔर तो सब ठीक है महाराजलेकिन मेरा लड़काकिसी तरह उसे ठीक करेंबर्बाद हुआ जा रहा है। तो मैथिलीशरण ने पूछाक्या हुआ तुम्हारे लड़के कोक्या गुंडा-बदमाश हो गयाचोर-लफंगा हो गयाउसने कहा कि नहीं-नहींमेरा लड़का कवि हो गया है।
इन सब कवियों पर क्या गुजरी होगीपता नहीं।
रवींद्रनाथ के पिता भी नहीं चाहते थे कि कवि हो जाए लड़का। सब चेष्टा कीपढ़ायालिखायापूरा परिवार बड़ा ही धुआंधार पीछे लगा था--इंजीनियर बन जाएडाक्टर बन जाएप्रोफेसर बन जाए--कुछ भी बन जाएकाम का बन जाए।
रवींद्रनाथ के घर में एक किताब रखी हैजोड़ासांको भवन में। बड़ा परिवार थाबहुत बच्चे थेसौ लोग थे घर में। हर बच्चे के जन्मदिन पर उस किताब में उस बच्चे के संबंध में घर के सब बड़े-बूढ़े भविष्यवाणियां लिखते थे। उस किताब में रवींद्रनाथ के सारे भाई-बहन--काफी थेदर्जनभर--सबके संबंध में बहुत अच्छी बातें लिखी हैं। रवींद्रनाथ के संबंध में किसी ने अच्छी बात नहीं लिखी है। रवींद्रनाथ की मां ने खुद लिखा है कि रवि से हमें कोई आशा नहीं है। सब लड़के बड़े होनहार हैंकोई प्रथम आता हैकोई गोल्ड मेडल लाता हैकोई युनिवर्सिटी में चमकता है। यह लड़का बिलकुल गैर-चमक का है।
लेकिन आज आप नाम भी नहीं बता सकते कि रवींद्रनाथ के उन सब चमकदार भाइयों के नाम क्या हैं! वे अचानक कहीं खो गए।
मनोविज्ञान इस समय बहुत व्यस्त है कि यह जो जगत इतना दुखी मालूम पड़ रहा हैइसका बहुत बुनियादी कारण जो हैवह डिसप्लेसमेंट है। हर आदमी जो हो सकता हैवह नहीं हो पा रहा है। वह कहीं और लगा दिया गया है। एक चमार हैवह प्रधानमंत्री हो गया है। जिसे प्रधानमंत्री होना चाहिएवह कहीं जूते बेच रहा है। सब अस्तव्यस्त है। किसी को भी पता भी तो नहीं है कि वह क्या हो सकता है! धक्के हैंबिलकुल एक्सिडेंटल है जैसे सबसांयोगिक है जैसे सब। बाप को एक सनक सवार है कि लड़के को इंजीनियर होना चाहिएतो इंजीनियर होना चाहिए। अब बाप की सनक से लड़के का क्या लेना-देना! होना था तो बाप को हो जाना चाहिए था। लेकिन बाप को सनक सवार हैबेटे को इंजीनियर होना चाहिए। फिर बाप भी क्या कर सकता हैउसे कुछ भी तो पता नहीं है।
इसलिए आज सारी दुनिया में मनोवैज्ञानिक इस बात के लिए आतुर हैं कि प्रत्येक बच्चे की पोटेंशियलिटी की खोज ही मनुष्यता के लिए मार्ग बन सकती है।
वह जो कृष्ण कह रहे हैंवह युद्ध की बात नहीं कह रहे हैंभूलकर भी मत समझ लेना यह। इससे बड़ी भ्रांति पैदा होती है। कृष्ण जब यह कह रहे हैंतो यह बात स्पेसिफिकलीविशेष रूप से अर्जुन के टाइप के लिए निवेदित है। यह बातअर्जुन की जो संभावना हैउस संभावना के लिए उत्प्रेरित है। यह बात हर किसी के लिए नहीं है। यह हर कोई के लिए नहीं है।
लेकिन इतने बड़े मनोविज्ञान की समझ खो गई। महावीर ने अहिंसा की बात कही। वह कुछ लोगों के लिए सार्थक है,अगर पूरे मुल्क को पकड़ ले तो खतरा है। कृष्ण ने हिंसा की बात कही। वह अर्जुन के लिए सार्थक हैऔर कुछ लोगों के लिए बिलकुल सार्थक हैपूरे मुल्क को पकड़ ले तो खतरा है।
लेकिन भूल निरंतर हो जाती है। वह निरंतर भूल यह हो जाती है कि हम प्रत्येक सत्य को जनरलाइज कर देते हैंउसको सामान्य नियम बना देते हैं। कोई सत्य व्यक्त जगत में सामान्य नियम नहीं है। अव्यक्त जगत की बात छोड़ेंव्यक्त जगत मेंमैनिफेस्टेड जगत में सभी सत्य सशर्त हैंउनके पीछे शर्त है।
ध्यान रखेंगे पूरे समय कि अर्जुन से कही जा रही है यह बातएक पोटेंशियल क्षत्रिय सेजिसके जीवन में कोई और स्वर नहीं रहा हैन हो सकता है। उसकी आत्मा जो हो सकती हैकृष्ण उसके पीछे बिलकुल लाठी लेकर पड़ गए हैंकि तू वही हो जाजो तू हो सकता है। वह भाग रहा है। वह बचाव कर रहा हैवह डर रहा हैवह भयभीत हो रहा हैवह पच्चीस तर्क खोज रहा है।
कृष्ण युद्धखोर नहीं हैं। कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं यह। और आप भूलकर भी यह मत समझ लेना कि सबके लिए,अर्जुन से कहा गया सत्यसत्य है। ऐसा भूलकर मत समझ लेना।
हांएक ही बात सत्य है उसमेंजो जनरलाइज की जा सकती हैऔर वह यह है कि प्रत्येक की संभावना ही उसका सत्य है। इससे अगर कोई भी बात निकालनी होतो इतनी ही निकलती है कि प्रत्येक की उसकी निज-संभावना ही उसके लिए सत्य है।
गीता की इस किताब को अगर महावीर पढ़ेंतो भी पढ़कर महावीर महावीर ही होंगेअर्जुन नहीं हो जाएंगे। क्योंकि वे राज समझ जाएंगे कि मेरी पोटेंशियलिटी क्या हैवही मेरी यात्रा है। इस किताब को बुद्ध पढ़ेंतो दिक्कत नहीं आएगी जरा भी। वे कहेंगेबिलकुल ठीकमैं अपनी यात्रा पर जाता हूंजो मैं हो सकता हूं।
प्रत्येक को जाना है अपनी यात्रा परजो वह हो सकता है। और प्रत्येक को खोज लेना है व्यक्त जगत में कि मेरे होने की क्या संभावना है। गीता का संदेश इतना ही हैयुद्धखोरी का नहीं है। लेकिन भ्रांति हुई है गीता को पढ़कर। युद्धखोर को लगता है कि बिलकुल ठीकहोना चाहिए युद्ध। गैर-युद्धखोर को लगता हैबिलकुल गलत हैयुद्ध करवाने की बात कर रहे हैं!
कृष्ण का युद्ध से लेना-देना ही नहीं है। जब मैं ऐसा कहूंगातो आपको जरा मुश्किल होगीलेकिन मैं फिर पुनः-पुनः कहता हूंकृष्ण को युद्ध से लेना-देना नहीं है। कृष्ण एक मनोवैज्ञानिक सत्य कह रहे हैं। वे कह रहे हैं अर्जुन सेयह तेरा नक्शा हैयह तेरा बिल्ट-इन-प्रोसेस है। तू यह हो सकता है। इससे अन्यथा होने की चेष्टा में सिवाय अपयशअसफलताआत्मघात के और कुछ भी नहीं है।
शेष कल सुबह बात करेंगे।

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