सोमवार, 15 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-002

अर्जुन के विषाद का मनोविश्लेषण

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।। २३।।
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।। २४।।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति।। २५।।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।। २६।।
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।। २७।।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।। २८।।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।। २९।।

और दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में कल्याण चाहने वाले
जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं,
उन युद्ध करने वालों को मैं देखूंगा।
संजय बोला: हे धृतराष्ट्रअर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने और संपूर्ण राजाओं के सामनेउत्तम रथ को खड़ा करके ऐसे कहा कि हे पार्थ,
इन इकट्ठे हुए कौरवों को देख।
उसके उपरांत पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित हुए पिता के भाइयों कोपितामहों कोआचार्यों कोमामों कोभाइयों कोपुत्रों कोपौत्रों को तथा मित्रों कोससुरों को और सुहृदों को भी देखा।
इस प्रकार उन खड़े हुए संपूर्ण बंधुओं को देखकर वह अत्यंत करुणा से युक्त हुआ कुंतीपुत्र अर्जुन शोक करता हुआ यह बोला: हे कृष्ण! इस युद्ध की इच्छा वाले खड़े हुए स्वजन समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं और मुख भी सूखा जाता है और मेरे शरीर में कंप तथा रोमांच होता है।


अर्जुन युद्ध से पीड़ित नहीं हैयुद्ध-विरोधी भी नहीं है। हिंसा के संबंध में उसकी कोई अरुचि भी नहीं है। उसके सारे जीवन का शिक्षणउसके सारे जीवन का संस्कारहिंसा और युद्ध के लिए है। लेकिनयह समझने जैसी बात है कि जितना ही हिंसक चित्त होउतना ही ममत्व से भरा हुआ चित्त भी होता है। हिंसा और ममत्व साथ ही साथ जीते हैं। अहिंसक चित्त ममत्व के भी बाहर हो जाता है।
असल में जिसे अहिंसक होना होउसे मेरे का भाव ही छोड़ देना पड़ता है। मेरे का भाव ही हिंसा है। क्योंकि जैसे ही मैं कहता हूं मेरावैसे ही जो मेरा नहीं हैवह पृथक होना शुरू हो जाता है। जैसे ही किसी को मैं कहता हूं मित्रवैसे ही किसी को मैं शत्रु निर्मित करना शुरू कर देता हूं। जैसे ही मैं सीमा खींचता हूं अपनों कीवैसे ही मैं परायों की सीमा भी खींच लेता हूं। समस्त हिंसाअपने और पराए के बीच खींची गई सीमा से पैदा होती है।
इसलिए अर्जुन शिथिल-गात हो गया। उसके अंग-अंग शिथिल हो गए। इसलिए नहीं कि वह युद्ध से विरक्त हुआइसलिए नहीं कि उसे होने वाली हिंसा में कुछ बुरा दिखाई पड़ाइसलिए नहीं कि अहिंसा का कोई आकस्मिक आकर्षण उसके मन में जन्म गयाबल्कि इसलिए कि हिंसा के ही दूसरे पहलू ने उसके भीतर सेहिंसा के ही गहरे पहलू नेहिंसा के ही बुनियादी आधार नेउसके चित्त को पकड़ लिया--ममत्व ने उसके चित्त को पकड़ लिया।
ममत्व हिंसा ही है। इसे न समझेंगे तो फिर पूरी गीता को समझना कठिन हो जाएगा। जो इसे नहीं समझ सकेउन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि अर्जुन अहिंसा की तरफ झुकता थाकृष्ण ने उसे हिंसा की तरफ झुकाया! जो अहिंसा की तरफ झुकता होउसे कृष्ण हिंसा की तरफ झुकाना नहीं चाहेंगे। जो अहिंसा की तरफ झुकता होउसे कृष्ण चाहें भी हिंसा की तरफ झुकानातो भी न झुका पाएंगे।
लेकिन अर्जुन अहिंसा की तरफ रत्तीभर नहीं झुक रहा है। अर्जुन का चित्त हिंसा के गहरे आधार पर जाकर अटक गया है। वह हिंसा का ही आधार है। उसे दिखाई पड़े अपने ही लोग--प्रियजनसंबंधी। काश! वहां प्रियजन और संबंधी न होतेतो अर्जुन भेड़-बकरियों की तरह लोगों को काट सकता था। अपने थेइसलिए काटने में कठिनाई मालूम पड़ी। पराए होतेतो काटने में कोई कठिनाई न मालूम पड़ती।
और अहिंसा केवल उसके ही चित्त में पैदा होती हैजिसका अपना-पराया मिट गया हो। अर्जुनयह जो संकटग्रस्त हुआ उसका चित्तयह अहिंसा की तरफ आकर्षण से नहींहिंसा के ही मूल आधार पर पहुंचने के कारण है। स्वभावतःइतने संकट के क्षण मेंइतने क्राइसिस के मोमेंट में हिंसा की जो बुनियादी आधारशिला थीवह अर्जुन के सामने प्रकट हुई। अगर पराए होते तो अर्जुन को पता भी न चलता कि वह हिंसक हैउसे पता भी न चलता कि उसने कुछ बुरा कियाउसे पता भी न चलता कि युद्ध अधार्मिक है। उसके गात शिथिल न होतेबल्कि परायों को देखकर उसके गात और तन जाते। उसके धनुष पर बाण आ जाताउसके हाथ पर तलवार आ जाती। वह बड़ा प्रफुल्लित होता।
लेकिन वह एकदम उदास हो गया। इस उदासी में उसे अपने चित्त की हिंसा का मूल आधार दिखाई पड़ा। उसे दिखाई पड़ाइस संकट के क्षण में उसे ममत्व दिखाई पड़ा!
यह बड़े आश्चर्य की बात है कि अक्सर हम अपने चित्त की गहराइयों को केवल संकट के क्षणों में ही देख पाते हैं। साधारण क्षणों में हम चित्त की गहराइयों को नहीं देख पाते। साधारण क्षणों में हम साधारण जीते हैं। असाधारण क्षणों मेंजो हमारे गहरे से गहरे में छिपा हैवह प्रकट होना शुरू हो जाता है।
अर्जुन को दिखाई पड़ामेरे लोग! युद्ध की वीभत्सता नेयुद्ध की सन्निकटता नेबस अब युद्ध शुरू होने को हैतब उसे दिखाई पड़ामेरे लोग!
काश! अर्जुन ने कहा होतायुद्ध व्यर्थ हैहिंसा व्यर्थ हैतो गीता की किताब निर्मित न होती। लेकिन उसने कहाअपने ही लोग इकट्ठे हैंउनको काटने के विचार से ही मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं। असल में जिसने अपने जीवन के भवन को अपनों के ऊपर बनाया हैउन्हें काटते क्षण में उसके अंग शिथिल होंयह बिलकुल स्वाभाविक है।
मृत्यु होती है पड़ोस मेंछूती नहीं मन को! कहते हैंबेचारा मर गया। घर में होती हैतब इतना कहकर नहीं निपट पाते। तब छूती है। क्योंकि जब घर में होती हैअपना कोई मरता हैतो हम भी मरते हैं। हमारा भी एक हिस्सा मरता है। हमारा भी इनवेस्टमेंट था उस आदमी में। हम भी उसमें कुछ लगाए थे। उसकी जिंदगी से हमें भी कुछ मिलता था। हमारे मन के भी किसी कोने को उस आदमी ने भरा था।
पत्नी मरती हैतो पत्नी ही नहीं मरतीपति भी मरता है। सच तो यह है कि पत्नी के साथ ही पति पैदा हुआ थाउसके पहले पति नहीं था। पत्नी मरती है तो पति भी मरता है। बेटा मरता हैतो मां भी मरती हैक्योंकि मां बेटे के पहले मां नहीं थीमां बेटे के जन्म के साथ ही हुई है। जब बेटा जन्मता हैतो एक तरफ बेटा जन्मता हैदूसरी तरफ मां भी जन्मती है। और जब बेटा मरता हैतो एक तरफ बेटा मरता हैदूसरी तरफ मां भी मरती है। जिसे हमने अपना कहा हैउससे हम जुड़े हैंहम भी मरते हैं।
अर्जुन ने जब देखा कि अपने ही सब इकट्ठे हैंतो अर्जुन को अगर अपना ही आत्मघातस्युसाइड दिखाई पड़ा हो तो आश्चर्य नहीं है। अर्जुन घबड़ाया नहीं दूसरों की मृत्यु सेअर्जुन घबड़ाया आत्मघात की संभावना से। उसे लगा,सब अपने मर जाएंतो मैं बचूंगा कहां!
यह थोड़ा सोचने जैसा है। हमारा मैंहमारे अपनों के जोड़ का नाम है। जिसे हम मैं कहते हैंवह मेरों के जोड़ का नाम है। अगर मेरे सब मेरे विदा हो जाएंतो मैं खो जाऊंगा। मैं बच नहीं सकता। यह मेरा मैंकुछ मेरे पिता से,कुछ मेरी मां सेकुछ मेरे बेटे सेकुछ मेरे मित्र से--इन सबसे जुड़ा है।
आश्चर्य तो यह है कि जिन्हें हम अपने कहते हैंउनसे ही नहीं जुड़ा हैजिन्हें हम पराए कहते हैंउनसे भी जुड़ा है--परिधि के बाहर--लेकिन उनसे भी जुड़ा है। तो जब मेरा शत्रु मरता हैतब भी थोड़ा मैं मरता हूं। क्योंकि मैं फिर वही नहीं हो सकूंगाजो मेरे शत्रु के होने पर मैं था। शत्रु भी मेरी जिंदगी को कुछ देता था। मेरा शत्रु थाहोगा शत्रुपर मेरा शत्रु था। उससे भी मेरे मैं का संबंध था। उसके बिना मैं फिर अधूरा और खाली हो जाऊंगा।
अर्जुन कोदूसरों का घात होगाऐसा दिखाई पड़तातो बात और थी। अर्जुन को बहुत गहरे में दिखाई पड़ा कि यह तो मैं अपनी ही आत्महत्या करने को उत्सुक हुआ हूंयह तो मैं ही मरूंगा। मेरे मर जाएंगेतो मेरे होने का क्या अर्थ है! जब मेरे ही न होंगेतो मुझे सब मिल जाए तो भी व्यर्थ है।
यह भी थोड़ा सोचने जैसा है। हम अपने लिए जो कुछ इकट्ठा करते हैंवह अपने लिए कमअपनों के लिए ज्यादा होता है। जो मकान हम बनाते हैंवह अपने लिए कमअपनों के लिए ज्यादा होता है। उन अपनों के लिए भी जो साथ रहेंगेऔर उन अपनों के लिए भी जो देखेंगे और प्रशंसा करेंगेऔर उन पराए-अपनों के लिए भीजो जलेंगे औरर् ईष्या से भरेंगे।
अगर इस पृथ्वी पर सबसे श्रेष्ठ भवन भी मेरे पास रह जाए और अपने न रह जाएं--मित्र भी नहींशत्रु भी नहीं--तो अचानक मैं पाऊंगावह भवन झोपड़ी से भी बदतर हो गया है। क्योंकि वह भवन एक फसाडएक दिखावा था। उस भवन के माध्यम से अपनों कोपरायों को मैं प्रभावित कर रहा था। वह भवन तो सिर्फ प्रभावित करने की एक व्यवस्था थी। अब मैं किसे प्रभावित करूं!
आप जो कपड़े पहनते हैंवह अपने शरीर को ढंकने को कमदूसरे की आंखों को झपने को ज्यादा है। अकेले में सब बेमानी हो जाता है। आप जो सिंहासनों पर चढ़ते हैंवह सिंहासनों पर बैठने के आनंद के लिए कम--क्योंकि कोई सिंहासन पर बैठकर कभी किसी आनंद को उपलब्ध नहीं हुआ है--पर अपनों और परायों में जो हम सिंहासन पर चढ़करजो करिश्माजो चमत्कार पैदा कर पाते हैंउसके लिए ज्यादा है। सिंहासन पर बैठे आप रह जाएं और नीचे से लोग खो जाएंअचानक आप पाएंगेसिंहासन पर बैठे होना हास्यास्पद हो गया। उतर आएंगेफिर शायद दुबारा नहीं चढ़ेंगे।
अर्जुन को लगा उस क्षण में कि अपने ही इकट्ठे हैं दोनों तरफ। मरेंगे अपने ही। अगर जीत भी गयातो जीत का प्रयोजन क्या हैजीत के लिए जीत नहीं चाही जाती। जीत रस हैअपनों और परायों के बीच जो अहंकार भरेगा,उसका! साम्राज्य मिलेगाक्या होगा अर्थकोई अर्थ न होगा।
यह जो अर्जुन के मन में विषाद घिर गयाइसे ठीक से समझ लेना चाहिए। यह विषाद ममत्व का है। यह विषाद हिंसक चित्त का है। और इस विषाद के कारण ही कृष्ण को इतने धक्के देने पड़े अर्जुन को। अर्जुन की जगह अगर महावीर जैसा व्यक्ति होतातो बात उसी वक्त खत्म हो गई होती। यह बात आगे नहीं चल सकती थी। अगर महावीर जैसा व्यक्ति होतातो शायद यह बात उठ भी नहीं सकती थी। शायद महावीर जैसा व्यक्ति होतातो कृष्ण एक शब्द भी उस व्यक्ति से न बोले होते। बोलने का कोई अर्थ न था। बात समाप्त ही हो गई होती।
यह गीता कृष्ण ने कही कमअर्जुन ने कहलवाई ज्यादा है। इसका असली ऑथरलेखक कृष्ण नहीं हैंइसका असली लेखक अर्जुन है। अर्जुन की यह चित्त-दशा आधार बनी है। और कृष्ण को साफ दिखाई पड़ रहा है कि एक हिंसक अपनी हिंसा के पूरे दर्शन को उपलब्ध हो गया है। और अब हिंसा से भागने की जो बातें कर रहा हैउनका कारण भी हिंसक चित्त है। अर्जुन की दुविधा अहिंसक की हिंसा से भागने की दुविधा नहीं है। अर्जुन की दुविधा हिंसक की हिंसा से ही भागने की दुविधा है।
इस सत्य को ठीक से समझ लेना जरूरी है। यह ममत्व हिंसा ही हैलेकिन गहरी हिंसा हैदिखाई नहीं पड़ती। जब मैं किसी को कहता हूं मेरातो पजेशन शुरू हो गयामालकियत शुरू हो गई। मालकियत हिंसा का एक रूप है। पति पत्नी से कहता हैमेरी। मालकियत शुरू हो गई। पत्नी पति से कहती हैमेरे। मालकियत शुरू हो गई। और जब भी हम किसी व्यक्ति के मालिक हो जाते हैंतभी हम उस व्यक्ति की आत्मा का हनन कर देते हैं। हमने मार डाला उसे। हमने तोड़ डाला उसे। असल में हम उस व्यक्ति के साथ व्यक्ति की तरह नहींवस्तु की तरह व्यवहार कर रहे हैं। अब कुर्सी मेरी जिस अर्थ में होती हैउसी अर्थ में पत्नी मेरी हो जाती है। मकान मेरा जिस अर्थ में होता हैउसी अर्थ में पति मेरा हो जाता है।
स्वभावतःइसलिए जहां-जहां मेरे का संबंध हैवहां-वहां प्रेम फलित नहीं होतासिर्फ कलह ही फलित होती है। इसलिए दुनिया में जब तक पति-पत्नी मेरे का दावा करेंगेबाप-बेटे मेरे का दावा करेंगेतब तक दुनिया में बाप-बेटे,पति-पत्नी के बीच कलह ही चल सकती हैमैत्री नहीं हो सकती। मेरे का दावामैत्री का विनाश है। मेरे का दावा,चीजों को उलटा ही कर देता है। सब हिंसा हो जाती है।
मैंने सुना हैएक आदमी ने शादी की हैलेकिन पत्नी बहुत पढ़ी-लिखी नहीं है। मन में बड़ी इच्छा है कि पत्नी कभी पत्र लिखे। घर से बाहर पति गया हैतो उसे समझाकर गया है। थोड़ा लिख लेती है। समझाकर गया हैक्या-क्या लिखना। सभी पति-पत्नी एक-दूसरे को समझा रहे हैंक्या-क्या लिखना!
उसने बताया थाऊपर लिखनाप्राणों से प्यारे--कभी ऐसा होता नहीं है--नीचे लिखनाचरणों की दासी। पत्नी का पत्र तो मिलालेकिन कुछ भूल हो गई। उसने ऊपर लिखाचरणों के दास। और नीचे लिखाप्राणों की प्यासी।
जो नहीं लिखते हैंउनकी स्थिति भी ऐसी ही है। जो बिलकुल ठीक-ठीक लिखते हैंउनकी स्थिति भी ऐसी ही है। जहां आग्रह है मालकियत कावहां हम सिर्फ घृणा ही पैदा करते हैं। और जहां घृणा हैवहां हिंसा आएगी। इसलिए हमारे सब संबंध हिंसा के संबंध हो गए हैं। हमारा परिवार हिंसा का संबंध होकर रह गया है।
यह जो अर्जुन को दिखाई पड़ामेरे सब मिट जाएंगे तो मैं कहां! और मेरों को मिटाकर जीत कासाम्राज्य का क्या अर्थ है! इससे वह अहिंसक नहीं हो गया हैअन्यथा कृष्ण आशीर्वाद देते और कहतेविदा हो जाबात समाप्त हो गई। लेकिन कृष्ण देख रहे हैं कि हिंसक वह पूरा है। मैं और ममत्व की बात कर रहा हैइसलिए अहिंसा झूठी है।
जो मैं की बात कर रहा हो और अहिंसा की बात कर रहा होतो जानना कि अहिंसा झूठी है। क्योंकि मैं के आधार पर अहिंसा का फूल खिलता ही नहीं। मेरे के आधार पर अहिंसा के जीवन का कोई विकास ही नहीं होता।


प्रश्न: भगवान श्रीअर्जुन युद्धभूमि पर गया। उसने स्वजनगुरुजन और मित्रों को देखा तो शोक से भर गया;विषाद हुआ उसको। उसका चित्त हिंसक था। युद्धभूमि पर दुर्योधन भी थायुधिष्ठिर भी थाद्रोणाचार्य भी थे और भी जो बहुत से थेउनके भी स्वजन-मित्र थे। उनका भी चित्त हिंसा तथा ममत्व से भरा हुआ थातो अर्जुन को ही सिर्फ विषाद क्यों हुआ?


निश्चय हीदुर्योधन भी वहां थाऔर भी योद्धा वहां थेउन्हें क्यों विषाद न हुआवे भी ममत्व से भरे लोग थे। वे भी हिंसा से भरे लोग थे। नहीं हुआकारण है। हिंसा भी अंधी हो सकती हैविचारहीन हो सकती है। ममत्व भी अंधा हो सकता हैविचारहीन हो सकता है। हिंसा भी आंख वाली हो सकती हैविचारपूर्ण हो सकती है। ममत्व भी आंख वाला हो सकता है और विचारपूर्ण हो सकता है।
सुबह मैंने कहा था कि अर्जुन की कठिनाई यही है कि वह विचारहीन नहीं है। विचार है। और विचार दुविधा में डालता है। विचार ने दुविधा में डाला उसे। दुर्योधन को भी दिखाई पड़ रहा हैलेकिन हिंसा इतनी अंधी है कि यह नहीं देख पाएगा दुर्योधन कि इस हिंसा के पीछे मैं उन सबको मार डालूंगाजिनके बिना हिंसा भी व्यर्थ हो जाती है। अंधेपन में यह दिखाई नहीं पड़ेगा। अर्जुन उतना अंधा नहीं है। इसलिए अर्जुन उस युद्ध के स्थल पर विशेष है। विशेष इन अर्थों में है कि जीवन की तैयारी उसकी वही हैजो दुर्योधन की हैजीवन की तैयारी उसकी वही हैजो दुर्योधन की है,लेकिन मन की तैयारी उसकी भिन्न है। मन में उसके विचार हैसंदेह हैडाउट है। मन में उसके शक है। वह पूछ सकता हैवह प्रश्न उठा सकता है। और जिज्ञासा का बुनियादी सूत्र उसके पास है।
और सबसे बड़े प्रश्न वे नहीं हैंजो हम जगत के संबंध में उठाते हैं। सबसे बड़े प्रश्न वे नहीं हैंजो हम पूछते हैं कि किसने जगत बनायासबसे बड़े प्रश्न वे नहीं हैंजो हम पूछते हैं कि ईश्वर है या नहींसबसे बड़े प्रश्न वे हैं,जो हमारे मन के ही कांफ्लिक्टमन के ही द्वंद्व से जन्मते हैं। लेकिन अपने ही मन के द्वंद्व को देख पाने के लिए विचार चाहिएचिंतन चाहिएमनन चाहिए।
अर्जुन सोच पा रहा हैदेख पा रहा है कि मैं जो हिंसा करने जा रहा हूंउसमें वे ही लोग मर जाएंगेजिनके लिए हिंसा करने का कुछ अर्थ हो सकता है। अंधा नहीं है। और यह अंधा न होना ही उसका कष्ट भी हैउसका सौभाग्य भी है।
इसे समझ लेना उचित है। अंधा नहीं हैयह उसका कष्ट है। दुर्योधन कष्ट में नहीं है। दुर्योधन के लिए युद्ध एक रस है। अर्जुन के लिए युद्ध एक संकट और कष्ट हो गया। सौभाग्य भी यही है। यदि वह इस कष्ट को पार हो जाता हैतो निर्विचार में पहुंच सकेगा। अगर वह इस कष्ट को पार हो जाता हैतो परमात्मा में समर्पण को पहुंच सकेगा। अगर वह इस कष्ट को पार हो जाता हैतो ममत्व को छोड़ने में पहुंच सकेगा। अगर इस कष्ट को पार नहीं हो पातातो निश्चित ही यह युद्ध उसके लिए विकट संकट होगाजिसमें वह स्किजोफ्रेनिक हो जाएगाजिसमें उसका व्यक्तित्व दो खंडों में टूट जाएगा। या तो भाग जाएगाया लड़ेगा बेमन से और हार जाएगा।
जो लड़ाई बेमन से लड़ी जाएवह हारी ही जाने वाली है। क्योंकि बेमन से लड़ने का मतलब हैआधा मन भाग रहा हैआधा मन लड़ रहा है। और जो आदमी अपने भीतर ही विपरीत दिशाओं में गति करता होउसकी पराजय निश्चित है। दुर्योधन जीतेगा फिर। पूरे मन से लड़ रहा है। कुएं में भी गिर रहा हैतो पूरे मन से गिर रहा हैअंधकार में भी जा रहा हैतो पूरे मन से जा रहा है।
असल में अंधकार में दो ही व्यक्ति पूरे मन से जा सकते हैंएक तो वहजो अंधा है। क्योंकि उसे अंधकार और प्रकाश से कोई अंतर नहीं पड़ता। एक वहजिसके पास आत्मिक प्रकाश है। क्योंकि तब अंधकार कोउसका होना ही अंधकार को मिटा देता है।
अर्जुन या तो दुर्योधन जैसा हो जाएनीचे गिर जाएविचार से विचारहीनता में गिर जाएतो युद्ध में चला जाएगा। और या कृष्ण जैसा हो जाएविचार से निर्विचार में पहुंच जाएइतना ज्योतिर्मय हो जाएइतना ज्योति से भर जाए भीतरी कि देख पाए कि कौन मरता हैकौन मारा जाता है! देख पाए कि यह जो सब हो रहा हैस्वप्न से ज्यादा नहीं है। या तो इतने बड़े सत्य को देख पाए तो युद्ध में जा सकता हैया इतने बड़े असत्य को देख पाए कि हम उनको ही मारकर आनंद को उपलब्ध हो जाएंगेजिनके लिए मारने की चेष्टा कर रहे हैं! या तो दुर्योधन के असत्य में उतर जाएतो अर्जुन निश्चिंत हो जाएगाया कृष्ण के सत्य में पहुंच जाएतो अर्जुन निश्चिंत हो जाएगा।
अर्जुन एक तनाव है।
नीत्से ने कहीं कहा है कि आदमी एक सेतु हैए ब्रिजदो अलग-अलग पारों को जोड़ता हुआ। आदमी एक तनाव है। या तो पशु हो जाएतो सुख को पा लेया परमात्मा हो जाएतो आनंद को पा ले। लेकिन जब तक आदमी हैतब तक सुख भी नहीं पा सकतातब तक आनंद भी नहीं पा सकतातब तक सुख और आनंद के बीच सिर्फ खिंच सकता हैएंग्जाइटी और तनाव भर हो सकता है।
इसीलिए हम दोनों काम करते हैं जीवन में। शराब पीकर पशु हो जाते हैंथोड़ा सुख मिलता है। सेक्स में थोड़ा सुख मिलता हैपशु में वापस उतर जाते हैं। नीचे गिर जाते हैं विचार सेतो थोड़ा सुख मिलता है।
दुनिया में शराब का इतना आकर्षण किसी और कारण से नहीं है। शराब हमें वापस पशु में पहुंचा देने की सुविधा बन जाती हैनशा करके हम वहीं हो जाते हैंजहां सभी पशु हैं। फिर हम पशु जैसे निश्चिंत हैंक्योंकि पशु कोई चिंता नहीं करता। कोई पशु पागल नहीं होता। सिर्फ सर्कस के पशु पागल होते हैं। क्योंकि सर्कस का पशु करीब-करीब आदमी की हालत में आ जाता है। आदमी करीब-करीब सर्कस के पशु की हालत में है। कोई पशु पागल नहीं होता। और किसी पशु के लिए विक्षिप्तताचिंताअनिद्राइनसोमेनिया--ऐसी बीमारियां नहीं आतीं। कोई पशु आत्मघात नहीं करतास्युसाइड नहीं करता। क्योंकि आत्मघात के लिए बहुत चिंता इकट्ठी हो जानी जरूरी है।
बड़े मजे की बात है कि कोई पशु बोर्डम अनुभव नहीं करतावह कभी ऊबता नहीं है। एक भैंस हैवह रोज वही घास चर रही हैचरती रहेगीवह कभी नहीं ऊबती। ऊबने का कोई सवाल नहीं है। ऊबने के लिए विचार चाहिए। बोर्डम के लिएऊब के लिए विचार चाहिए। इसलिए मनुष्यों में जो जितना ज्यादा विचारशील हैउतना ऊबेगा। मनुष्यों में जो जितना ज्यादा विचारशील हैउतना चिंता से भर जाएगा। मनुष्यों में जो जितना ज्यादा विचारशील हैवह पागल हो सकता है। मनुष्यों में जो जितना ज्यादा विचारशील हैवह विक्षिप्त हो सकता है। लेकिन यह एक ही पहलू है।
दूसरा पहलू यह है कि जो विक्षिप्त होने की स्थिति को पार कर जाएवह विमुक्त भी हो सकता है। और जो चिंता को पार कर जाएवह निश्चिंतता के सजग आनंद को उपलब्ध हो सकता है। और जो तनाव को पार कर जाए,वह विश्रांति के उस अनुभव को पा सकता हैजो सिर्फ परमात्मा में विश्राम से उपलब्ध होती है।
अर्जुन मनुष्य का प्रतीक हैदुर्योधन पशु का प्रतीक हैकृष्ण परमात्मा के प्रतीक हैं। वहां तीन प्रतीक हैं उस युद्ध-स्थल पर। अर्जुन डांवाडोल है। वह दुर्योधन और कृष्ण के बीच डांवाडोल है। उसे निश्चिंतता मिल सकती हैही कैन बी ऐट ईज़अगर वह दुर्योधन हो जाएअगर वह कृष्ण हो जाए। अर्जुन रहते कोई सुविधा नहीं है। अर्जुन रहते तनाव है। अर्जुन रहते मुश्किल है। उसकी मुश्किल यही है कि दुर्योधन हो नहीं सकताकृष्ण होना समझ में नहीं आता;और जो हैवहां टिक नहीं सकता। क्योंकि वह बीच की तरंग भर हैवहां टिका नहीं जा सकता। कोई भी सेतु मकान बनाने के लिए नहीं होता।
अकबर ने फतेहपुर सीकरी बनाईतो वहां एक पुल परएक ब्रिज पर उसने वाक्य लिखवाया--सेतु पार करने को हैसेतु निवास के लिए नहीं है।
ठीक ही है। जो भी आदमी सेतु पर निवास बनाएगावह मुश्किल में पड़ेगा। कहीं भी लौट जाएं--पशु हो जाएं कि परमात्मा हो जाएं--आदमी नियति नहीं है। आदमी होना संकट हैक्राइसिस है। आदमी अंत नहीं है। आदमीअगर ठीक से हम समझें तोन तो पशु है और न परमात्मा है। न तो वह पशु हो पाता हैक्योंकि पशु को पार कर चुका। और न वह परमात्मा हो पाता हैक्योंकि परमात्मा को पहुंचना है। मनुष्य सिर्फ परमात्मा और पशु के बीच डोलता हुआ अस्तित्व है।
हम चौबीस घंटे में कई बार दोनों कोनों पर पहुंच जाते हैं। क्रोध में वही आदमी पशु के निकट आ जाता है,शांति में वही आदमी परमात्मा के निकट पहुंच जाता है। हम दिन में चौबीस घंटे में बहुत बार नर्क और स्वर्ग की यात्रा कर लेते हैं--बहुत बार। क्षण में स्वर्ग में होते हैंक्षण में नर्क में उतर जाते हैं। नर्क में पछताते हैंफिर स्वर्ग की चेष्टा शुरू हो जाती है। स्वर्ग में पैर जमा नहीं पातेफिर नर्क में पहुंचना शुरू हो जाता है।
और तनाव का एक नियम है कि तनाव सदा विपरीत में आकर्षण पैदा कर देता है। जैसे घड़ी का पेंडुलम होता है। वह बाईं तरफ जाता है। जब बाईं तरफ जाता हैतब हमें लगता है कि बाईं तरफ जा रहा है। लेकिन जो घड़ी के विज्ञान को समझते हैंवे यह भी जानते हैं कि वह बाईं तरफ जाते समय दाईं तरफ जाने की शक्ति इकट्ठी कर रहा हैमोमेंटम इकट्ठा कर रहा है। वह जितनी दूर बाईं तरफ जाएगाउतनी ही दूर दाईं तरफ जाने की ताकत इकट्ठी कर रहा है। असल में वह बाईं तरफ इसीलिए जा रहा है कि दाईं तरफ जा सके। और दाईं तरफ जाते वक्त इसीलिए जा रहा है कि बाईं तरफ जा सके।
आदमी पूरे समय पशु और परमात्मा के बीच पेंडुलम की तरह घूम रहा है। अर्जुन आदमी का प्रतीक है। और आज के आदमी का तो और भी ज्यादा है। आज के आदमी की चेतना ठीक अर्जुन की चेतना है। इसलिए दुनिया में दोनों बातें एक साथ हैंएक ओर मनुष्य अपनी चेतना को समाधि तक ले जाने के लिए आतुर हैऔर दूसरी तरफ आदमी एल एस डी सेमैस्कलीन सेमारिजुआना सेशराब सेसेक्स से पशु की तरफ ले जाने को आतुर है।
और अक्सर ऐसा होगा कि एक ही आदमी ये दोनों काम करता हुआ मालूम पड़ेगा। वही आदमी भारत की यात्रा पर आएगावही आदमी अमेरिका में एल एस डी लेता रहेगा। वह दोनों एक साथ कर रहा है।
मनुष्य बेहोश हो जाएतो पशु हो सकता है। लेकिन बेहोश ज्यादा देर नहीं रहा जा सकता। बेहोशी के सुख भी होश में ही अनुभव हो पाते हैं। बेहोशी में बेहोशी का सुख भी अनुभव नहीं होता। शराब का भी मजाजब शराब पीए होता है आदमीतब पता नहीं चलता। पता तो तभी चलता हैजब शराब का नशा उतर जाता है। नींद में जब आप होते हैंतब नींद का कोई मजा पता नहीं चलता। वह सुबह जागकर पता चलता है कि बड़ी आनंदपूर्ण निद्रा थी। बेहोशी के सुख के लिए होश में आना जरूरी है। और होश में कोई सुख नहीं मालूम पड़ताइसलिए फिर बेहोशी में उतरना पड़ता है।
अर्जुन मनुष्य की चेतना हैइसलिए अदभुत है। गीता इसीलिए अदभुत है कि वह मनुष्य की बहुत आंतरिक मनःस्थिति का आधार है। मनुष्य की आंतरिक मनःस्थिति अर्जुन के साथ कृष्ण का जो संघर्ष है पूरे समयवह जो अर्जुन के साथ कृष्ण का संवाद है या विवाद हैवह जो अर्जुन को खींच-खींचकर परमात्मा की तरफ लाने की चेष्टा है,और अर्जुन वापस शिथिल-गात होकर बैठ जाता हैवह फिर पशु में गिरना चाहता हैयह जो संघर्ष हैवह अर्जुन के लिए हैदुर्योधन के लिए नहीं। दुर्योधन निश्चिंत है। अर्जुन भी वैसा हो तो निश्चिंत हो सकता है। वैसा नहीं है।
हममें भी जो दुर्योधन की तरह हैंवे निश्चिंत हैंवे मकान बना रहे हैंवे दिल्ली मेंराजधानियों के सिंहासन चढ़ रहे हैंवे धन कमा रहे हैं। हममें भी जो अर्जुन की तरह हैंवे बेचैन और परेशान हैं। वे बेचैन हैं इसलिए कि जहां हैंवह जगह घर बनाने योग्य नहीं मालूम पड़ती। जहां से आ गए हैंवहां से आगे बढ़ गए हैंपीछे लौटना संभव नहीं है। जहां पहुंचे नहीं हैंउसका कोई पता नहीं है कि वह कहां है मार्गवह मंदिर कहां है! उसका कोई पता नहीं है।
धार्मिक आदमी स्वभावतः संकटग्रस्त होता हैक्राइसिस में होता है। अधार्मिक आदमी क्राइसिस में नहीं होता। इसलिए मंदिरों में बैठा आदमी ज्यादा चिंतित दिखाई पड़ेगाबजाय कारागृहों में बैठे आदमी के। कारागृह में बैठा आदमी इतना चिंतित नहीं मालूम पड़ता हैनिश्चिंत है। एक किनारे पर वह हैवह सेतु पर नहीं है। एक अर्थों में वह सौभाग्यशाली मालूम पड़ सकता है,र् ईष्या-योग्यकितना निश्चिंत है! लेकिन उसका सौभाग्य बड़े गहरे अभिशाप को छिपाए है। वह इसी तट पर रह जाएगा। उसमें अभी मनुष्य की किरण भी पैदा नहीं हुई।
मनुष्य के साथ ही उपद्रव शुरू होता हैमनुष्य के साथ ही संताप शुरू होता हैक्योंकि मनुष्य के साथ ही परमात्मा होने की संभावनापोटेंशियलिटी के द्वार खुलते हैं।
वह अर्जुन पशु होना नहीं चाहतास्थिति पशु होने की हैपरमात्मा होने का उसे पता नहीं है। बहुत गहरी अनजान में आकांक्षा परमात्मा होने की ही हैइसीलिए वह पूछ रहा हैइसीलिए प्रश्न उठा रहा हैइसीलिए जिज्ञासा जगा रहा है। जिसके जीवन में भी प्रश्न हैंजिसके जीवन में भी जिज्ञासा हैजिसके जीवन में भी असंतोष है--उसके जीवन में धर्म आ सकता है। जिसके जीवन में नहीं है चिंतानहीं है प्रश्ननहीं है संदेहनहीं है जिज्ञासानहीं है असंतोष--उसके जीवन में धर्म के आने की कोई सुविधा नहीं है।
जो बीज टूटेगा अंकुरित होने कोचिंता में पड़ेगा। बीज बहुत मजबूत चीज हैअंकुर बहुत कमजोर होता है! बीज बड़ा निश्चिंत होता हैअंकुर बड़ी चिंता में पड़ जाता है। अंकुर निकलता है जमीन से पत्थरों को तोड़कर। अंकुर जैसी कमजोर चीज पत्थरों को तोड़करमिट्टी को काटकर बाहर निकलती हैअज्ञातअनजाने जगत मेंजिसका कोई परिचय नहींकोई पहचान नहीं। कोई बच्चा तोड़ डालेगाकोई पशु चर जाएगाकिसी के पैर के नीचे दबेगा! क्या होगाक्या नहीं होगा! बीज अपने में रहेतो बहुत निश्चिंत है। न किसी बच्चे के पैर के नीचे दबेगान कोई अज्ञात के खतरे हैंअपने में बंद है।
दुर्योधन बीज में बंद जैसा व्यक्ति हैनिश्चिंत है। अर्जुन अंकुरित हैअंकुर चिंतित हैअंकुर बेचैन है। क्या होगाफूल आएंगे कि नहींबीज होना छोड़ दियाअब फूल आएंगे कि नहींफूल के लिएबढ़ने के लिए आतुर है। वही आतुरता उसे कृष्ण से निरंतर प्रश्न पुछवाए चली जाती है। इसलिए अर्जुन के मन में चिंता हैप्रश्न हैंदुर्योधन के मन में नहीं।


प्रश्न: भगवान श्रीकृपया यह बताइए कि मनुष्य के सामने द्वंद्वात्मक दशा बार-बार आती रहती हैतो इस द्वंद्व भरी दशा को पार करने के लिए मूल आधार कौन-सा होना चाहिएऔर द्वंद्व भरी दशा को हम विकासोन्मुख किस तरह बना सकेंऔर यह जो द्वंद्व दशा होती हैउसमें से हमने जो अपना संकल्प कर लिया या निश्चय कर लियातो उसमें मूल चीज कौन सी होती है हमारे सामने?


अर्जुन के लिए भी यही सवाल है। इस सवाल को आमतौर से आदमी जैसा हल करता हैवैसा ही अर्जुन भी करना चाहता है। द्वंद्व मनुष्य का स्वभाव है--मनुष्य काआत्मा का नहींशरीर का नहीं--मनुष्य का द्वंद्व स्वभाव है। द्वंद्व को अगर जल्दबाजी से हल करने की कोशिश कीतो पशु की तरफ वापस लौट जाना रास्ता है। शीघ्रता की,तो पीछे लौट जाएंगे। वह परिचित रास्ता हैवहां वापस जाया जा सकता है। द्वंद्व से गुजरना ही तपश्चर्या हैधैर्य से द्वंद्व को झेलना ही तपश्चर्या है। और द्वंद्व को झेलकर ही व्यक्ति द्वंद्व के पार होता है। इसलिए कोई जल्दी से निश्चय कर लेसिर्फ द्वंद्व को मिटाने के लिएतो उसका निश्चय काम का नहीं हैवह नीचे गिर जाएगावह वापस गिर रहा है।
पशु बहुत निश्चयात्मक हैपशुओं में डाउट नहीं है। बड़े निश्चय में जी रहे हैंबड़े विश्वासी हैंबड़े आस्तिक मालूम होते हैं! पर उनकी आस्तिकता आस्तिकता नहीं है। क्योंकि जिसने नास्तिकता नहीं जानीउसकी आस्तिकता का अर्थ कितना हैऔर जिसने नहीं कहने का कष्ट नहीं जानावह हां कहने के आनंद को उपलब्ध नहीं हो सकता है। और जिसने संदेह नहीं कियाउसकी श्रद्धा दो कौड़ी की है। लेकिन जिसने संदेह किया और जो संदेह को जीया और संदेह के पार हुआउसकी श्रद्धा का कुछ बल हैउसकी श्रद्धा की कोई प्रामाणिकता है।
तो एक तो रास्ता यह है कि जल्दी कोई निश्चय कर लें। और निश्चय करने के बहुत रास्ते आदमी पकड़ लेता है। किसी शास्त्र को पकड़ लेतो निश्चय हो जाएगा। शास्त्र निश्चय की भाषा में बोल देगा कि ऐसा-ऐसा करो और विश्वास करो। जिसने शास्त्र पकड़कर निश्चय कियाउस आदमी ने अपने मनुष्य होने से इनकार कर दिया। उसे एक अवसर मिला था विकास काउसने खो दिया। गुरु को पकड़ लो! जिसने गुरु को पकड़ लियाउसने अवसर खो दिया। एक संकट थाजिसमें बेसहारा गुजरने के लिए परमात्मा ने उसे छोड़ा थाउसने उस संकट से बचाव कर लिया। वह संकट से बिना गुजरे रह गया। और आग में गुजरतातो सोना निखरता। वह आग में गुजरा ही नहींवह गुरु की आड़ में हो गयातो सोना निखरेगा भी नहीं।
निश्चय करने को आपसे नहीं कहता। आप निश्चय करोगे कैसेजो आदमी द्वंद्व में हैउसका निश्चय भी द्वंद्व से भरा होगा। जब द्वंद्व में हैंतो निश्चय करेंगे कैसेद्वंद्व से भरा आदमी निश्चय नहीं कर सकताकरना भी नहीं चाहिए।
द्वंद्व को जीएंद्वंद्व में तपेंद्वंद्व में मरें और खपेंद्वंद्व को भोगेंद्वंद्व की आग से भागें मत। क्योंकि जो आग दिखाई पड़ रही हैउसी में कचरा जलेगा और सोना बचेगा। द्वंद्व से गुजरेंद्वंद्व को नियति समझें। वह मनुष्य की डेस्टिनी हैवह उसका भाग्य है। उससे गुजरना ही होगा। उसे जीएं। जल्दी न करें। निश्चय जल्दी न करें।
हांद्वंद्व से गुजरेंतो निश्चय आएगा। द्वंद्व से गुजरेंतो श्रद्धा आएगीलानी नहीं पड़ेगी। लाई गई श्रद्धा का कोई भी मूल्य नहीं है। क्योंकि जो श्रद्धा लानी पड़ी हैउसका मतलब ही है कि अभी आने के योग्य मन न बना थाजल्दी ले आए। जो श्रद्धा बनानी पड़ी हैउसका अर्थ ही है कि पीछे द्वंद्वग्रस्त मन है। वह भीतर जिंदा रहेगा,ऊपर से पर्त श्रद्धा की हो जाएगी। वह ऊपर-ऊपर काम देगीसमय पर काम नहीं देगी।
जब कठिन समय होगामौत सामने खड़ी होगी। तो बहुत पक्का विश्वास कर लिया था कि आत्मा अमर है;जब गीता पढ़ते थेतब पक्का विश्वास रहा था। जब रोज सुबह मंदिर जाते थेतब पक्का था कि आत्मा अमर है। और जब डाक्टर पास खड़ा हो जाएगाऔर उसका चेहरा उदास दिखाई पड़ेगाऔर घर के लोग भागने-दौड़ने लगेंगे,और नाड़ी की गति गिरने लगेगीतब अचानक पता चलेगा कि पता नहींआत्मा अमर है या नहीं!
क्योंकि लाख कहें गीताएंउनके कहने से आत्मा अमर नहीं हो सकती। आत्मा अमर हैइसलिए वे कहती हैं,यह दूसरी बात है। लेकिन उनके कहने से आत्मा अमर नहीं हो सकती। और आप किसी को मान लेंइससे कुछ होने वाला नहीं है। हांद्वंद्व से गुजरेंपीड़ा को झेलेंवह अवसर हैउससे बचने की कोशिश मत करें।
अर्जुन भी बचने की कोशिश कर रहा है। लेकिन कृष्ण उसे बचाने की कोशिश नहीं कर रहेवे पूरे द्वंद्व को खींचते हैं। अन्यथा कृष्ण कहते कि बेफिक्र रहोमैं सब जानता हूं। बेकार की बातचीत मत कर। मुझ पर श्रद्धा रख और कूद जाऐसा भी कह सकते थे। इतनी लंबी गीता कहने की जरूरत न थी।
इतनी लंबी गीता अर्जुन के द्वंद्व के प्रति बड़ा सम्मान है। और मजा है कि अर्जुन बार-बार वही पूछता है। और कृष्ण हैं कि यह नहीं कहते कि यह तो तू पूछ चुका! फिर वही पूछता है। फिर वही पूछता है। सारे के सारेपूरे के पूरे प्रश्न अर्जुन के अलग-अलग नहीं हैं। सिर्फ शब्दावली अलग है। बात वह वही पूछ रहा है। उसका द्वंद्व बार-बार लौट आ रहा है। कृष्ण उससे यह नहीं कहते कि चुपअश्रद्धा करता है! चुपअविश्वास करता है! अर्जुन पूछता है वही-वही दोहरा-दोहराकर। उसका द्वंद्व ही बार-बार नए-नए रूप लेकर खड़ा हो जाता है।
कृष्ण उसे विश्वास दिलाने को उत्सुक नहीं हैं। कृष्ण उसे श्रद्धा तक पहुंचाने को जरूर उत्सुक हैं। और विश्वास और श्रद्धा में बड़ा फर्क है। विश्वास वह हैजो हम संदेह को हल किए बिना ऊपर से आरोपित कर लेते हैं। श्रद्धा वह हैजो संदेह के गिर जाने से फलित होती है। श्रद्धासंदेह की ही यात्रा से मिली मंजिल है। विश्वाससंदेह के भय से पकड़ लिए गए अंधे आधार हैं।
तो मैं कहूंगाजीएं द्वंद्व कोतीव्रता से जीएंइंटेंसिटी से जीएं। धीरे-धीरे जीएंगेतो बहुत समय लगेगा। कुनकुनी आंच में डाल देंगे सोने कोतो निखरने में जन्म लग सकते हैं। तीव्रता से जीएं।
द्वंद्व मनुष्य का अनिवार्य परीक्षण हैजिससे वह परमात्मा तक पहुंचने की योग्यता का निर्णय दे पाता है। जीएंभागें मत। एस्केप न करेंकंसोलेशंस मत खोजेंसांत्वनाएं मत बनाएं। जानें कि यही है नियतिद्वंद्व है। लड़ें,तीव्रता से उतरें इस द्वंद्व में। क्या होगा इसका परिणाम?
इसके दो परिणाम होंगे। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने चित्त के द्वंद्व में पूरी तरह उतरने को राजी हो जाता है,वैसे ही उस व्यक्ति के भीतर एक तीसरा बिंदु भी पैदा हो जाता हैदो के अलावा तीसरी ताकत भी पैदा हो जाती है। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने द्वंद्व को जीने के लिए राजी होता हैवैसे ही उसके भीतर दो नहींतीन शुरू हो जाते हैं। दि थर्ड फोर्सवह जो निर्णय करती है कि जीएंगे द्वंद्व कोवह द्वंद्व के बाहर हैवह द्वंद्व के भीतर नहीं है।
मैंने सुना हैसेंट थेरेसा एक ईसाई फकीर औरत हुई है। उसके पास तीन पैसे थे। और एक दिन सुबह उसने गांव में कहा कि मैं एक बड़ा चर्च बनाना चाहती हूं। मेरे पास काफी पैसे आ गए हैं। लोग हैरान हुएक्योंकि कल भी उसको लोगों ने भीख मांगते देखा था। लोगों ने पूछा कि इतने पैसे अचानक कहां से आ गएजिससे बड़ा चर्च बनाने का खयाल हैउसने अपना भिक्षापात्र दिखायाउसमें तीन पैसे थे। लोगों ने कहापागल तो नहीं हो गई थेरेसा! वैसे हम पहले ही सोचते थे कि तेरा दिमाग कुछ गड़बड़ है!
असल में भगवान की तरफ जो लोग जाते हैंउनका दिमाग उनको थोड़ा गड़बड़ दिखाई पड़ता ही हैजो नहीं जाते हैं।
हम पहले ही सोचते थे कि तेरा दिमाग कुछ न कुछ ढीला है। तीन पैसे से चर्च बनाएगीथेरेसा ने कहामैं हूं,तीन पैसे हैं और परमात्मा भी है। थेरेसा + तीन पैसे + परमात्मा। उन सबने कहावह परमात्मा कहां हैतो थेरेसा ने कहा कि वह थर्ड फोर्स हैवह तीसरी शक्ति हैवह तुम्हें दिखाई नहीं पड़ेगीक्योंकि अभी तुम अपने भीतर तीसरी शक्ति को नहीं खोज सके हो।
जो व्यक्ति अपने भीतर तीसरी शक्ति को खोज लेता हैवह इस सारे जगत में भी तीसरी शक्ति को तत्काल देखने में समर्थ हो जाता है। आप द्वंद्व को ही देख रहे हैंलेकिन यह खयाल नहीं है कि जो द्वंद्व को देख रहा है और समझ रहा हैवह द्वंद्व में नहीं हो सकतावह द्वंद्व के बाहर ही होगा। अगर दो लड़ रहे हैं आपके भीतरतो निश्चित ही आप उन दोनों के बाहर हैंअन्यथा देखेंगे कैसेअगर उन दोनों में से एक से जुड़े होतेतब तो एक से आपका तादात्म्य हो गया होता और दूसरे से आप अलग हो गए होते।
लेकिन आप कहते हैंद्वंद्व हो रहा हैमेरे बाएं और दाएं हाथ लड़ रहे हैं। मेरे बाएं और दाएं हाथ लड़ पाते हैं,क्योंकि इन बाएं और दाएं हाथ के पीछे मैं एक तीसरी ताकत हूं। अगर मैं बायां हाथ हूंतो दाएं हाथ से मेरा क्या आंतरिक द्वंद्व हैवह पराया हो गया। अगर मैं दायां हाथ नहीं बायां हाथ हूंतो दायां हाथ पराया हो गयाआंतरिक द्वंद्व कहां है?
आंतरिक द्वंद्व इसीलिए है कि एक तीसरा भी हैजो देख रहा है। जो कह रहा है कि मन में बड़ा द्वंद्व है। मन कभी यह कहता हैमन कभी वह कहता है। लेकिन जो मन के द्वंद्व के संबंध में कह रहा हैयह कौन है?
द्वंद्व में उतरें और इस तीसरे को पहचानते जाएं। जैसे-जैसे द्वंद्व में उतरेंगेयह तीसरा साक्षीयह विटनेस दिखाई पड़ना शुरू हो जाएगा। और जिस दिन यह तीसरा दिखाई पड़ाउसी दिन से द्वंद्व विदा होने शुरू हो जाएंगे। तीसरा नहीं दिखाई पड़ताइसलिए द्वंद्व है। तीसरा दिखाई पड़ता हैतो जोड़ शुरू हो जाता है।
पर द्वंद्व से भागें मत। द्वंद्व की प्रक्रिया अनिवार्य है। उससे ही गुजरकरवह जो द्वंद्व के पार हैट्रांसेंडेंटल हैउसे पाया जाता है।
पूरी गीता उस तीसरे बिंदु पर ही खींचने की कोशिश है अर्जुन कोपूरे समय अर्जुन को खींचने की चेष्टा कृष्ण की यही है कि वह तीसरे को पहचान ले। वह तीसरे को पहचान लेतीसरे की पहचान के लिए सारा श्रम है। वह तीसरा सबके भीतर है और सबके बाहर भी है। लेकिन जब तक भीतर न दिखाई पड़ेतब तक बाहर दिखाई नहीं पड़ सकता है। भीतर दिखाई पड़ेतो बाहर वही-वही दिखाई पड़ने लगता है।


प्रश्न: भगवान श्रीआपने धनंजय को सिंबल आफ ह्यूमन एट्रिब्यूटमानवीय गुणों का प्रतीक बताया है। और सार्त्र के कथन सेही इज़ कंडेम्ड टु बी एंग्जाइटी रिडेन। तो स्वजनों की हत्या के खयाल से धनंजय का कंप जाना क्या मानवीय नहीं थायुद्धनिवृत्ति का उसका विचार मोहवशात भी क्या प्रकृति-संगत नहीं थाशेक्सपियर के हेमलेट की तरह अर्जुन का विषाद भीटु किल आर नाट टु किलमारना या न मारना प्रकार का था। तिलक ने गीता-रहस्य में अर्जुन की विषाद दशा का साम्य हेमलेट की मनःस्थिति में ढूंढ़ निकालाक्या यह उचित है?


सार्त्र जो कहता हैवह अर्जुन लिए बिलकुल ठीक ही कहता है। अर्जुन की भी संकट-अवस्था एक्झिस्टेंशियल ही थी। सार्त्रकामू या उनामुनो या जेस्पर या हाइडेगरपश्चिम में जो भी अस्तित्ववादी विचारक हैंवे ठीक अर्जुन की मनःस्थिति में हैं। इसलिए सावधान रहनापश्चिम में कृष्ण पैदा हो सकते हैं। क्योंकि जहां अर्जुन की मनःस्थिति हो,वहां कृष्ण के पैदा होने की संभावना हो जाती है। पूरा पश्चिम एक्झिस्टेंशियल क्राइसिस में है। पूरे पश्चिम के सामने मनुष्य की चिंतातुरता एकमात्र सत्य होकर खड़ी हो गई है। क्या करें और क्या न करेंईदर ऑरयह या वहक्या चुनेंक्या न चुनेंकौन-सा मूल्य चुनने योग्य हैकौन-सा मूल्य चुनने योग्य नहीं है--सब संदिग्ध हो गया है।
और ध्यान रहे कि पश्चिम में भी यह जो अस्तित्ववादी चिंतन पैदा हुआयह दो युद्धों के बीच में पैदा हुआ है। सार्त्र या कामू या उनामुनो पिछले दो महायुद्धों की परिणति हैं। पिछले दो महायुद्धों ने पश्चिम के चित्त में भी वह स्थिति खड़ी कर दी हैजो अर्जुन के चित्त में महाभारत के सामने खड़ी हो गई थी। विगत दो युद्धों ने पश्चिम के सारे मूल्य डगमगा दिए हैं। और अब सवाल यह है कि लड़ना कि नहीं लड़नालड़ने से क्या होगाऔर ठीक स्थिति वैसी है कि अपने सब मर जाएंगेतो लड़ने का क्या अर्थ है! और जब युद्ध की इतनी विकट स्थिति खड़ी हो जाएतो शांति के समय में बनाए गए सब नियम संदिग्ध हो जाएं तो आश्चर्य नहीं है। यह ठीक सवाल उठाया है।
सार्त्र ठीक अर्जुन की मनःस्थिति में है। खतरा दूसरा है। सार्त्र की मनःस्थिति से खतरा नहीं है। सार्त्र अर्जुन की मनःस्थिति में हैलेकिन समझ रहा हैकृष्ण की मनःस्थिति में है। खतरा वहां है। है अर्जुन की मनःस्थिति में। जिज्ञासा करेठीक है। प्रश्न पूछेठीक है। वह उत्तर दे रहा है। खतरा वहां है। खतरा यहां है कि सार्त्र जिज्ञासा नहीं कर रहा है। सार्त्र पूछ नहीं रहा कि क्या है ठीक। सार्त्र उत्तर दे रहा है कि कुछ भी ठीक नहीं है। सार्त्र उत्तर दे रहा है कि कुछ भी ठीक नहीं हैकोई मूल्य नहीं है। अस्तित्व अर्थहीन हैमीनिंगलेस है।
यह जो उत्तर दे रहा है कि ईश्वर नहीं है जगत मेंआत्मा नहीं है जगत मेंमृत्यु के बाद बचना नहीं है जगत मेंसारा का सारा अस्तित्व एक अव्यवस्था हैएक अनार्की हैएक संयोग-जन्य घटना हैइसमें कोई सार नहीं है कहीं भी। यह उत्तर दे रहा है। यहां खतरा है।
अर्जुन भी उत्तर दे सकता था। लेकिन अर्जुन सिर्फ जिज्ञासा कर रहा है। अगर अर्जुन उत्तर देतो खतरे पैदा होंगे। लेकिन अर्जुन जिज्ञासा कर रहा है। और मैं मानता हूं कि जिसे दिखाई पड़ता हो--जैसा सार्त्र को दिखाई पड़ता है कि कोई मूल्य नहीं हैएक वैल्युलेसनेस है--जिसे दिखाई पड़ता है कि कोई अर्थ नहींकोई प्रयोजन नहीं। अगर सच में ही ऐसा दिखाई पड़ता हैतब तो सार्त्र को कुछ कहने का भी अर्थ नहीं है। चुप हो जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में मौन ही सार्थक मालूम पड़ सकता है। व्यर्थ है सारी बात।
नहींलेकिन सार्त्र मौन नहीं है। आतुर है कहने कोसमझाने कोजो कह रहा है उससे दूसरों को राजी करने को। तब डर होता है। तब डर यह होता है कि सार्त्र भी भीतर असंदिग्ध नहीं है कि जो कह रहा है वह ठीक है। शायद सार्त्र दूसरों को समझाकर दूसरों के चेहरे पर यह देखने को उत्सुक है कि कहीं उनको अगर ठीक लगती हो यह बात,तो ठीक होगी। मैं भी फिर ठीक मान लूं।
सार्त्र जिज्ञासा करेवहां तक ठीक है। लेकिन पश्चिम में एक्झिस्टेंशियलिस्ट विचारक जिज्ञासा को उत्तर बना रहे हैं। और जब जिज्ञासा उत्तर बनती हैऔर जब शिष्य गुरु हो जाता हैऔर जब पूछना ही बताना बन जाता हैतब एक क्राइसिस आफ वैल्यूज पैदा होती हैजो कि पश्चिम में पैदा हुई है। सब अस्तव्यस्त हो गया है। सब अस्तव्यस्त हो गया है। उस अस्तव्यस्तता में कहीं कोई राह नहीं दिखाई पड़ती। नहीं दिखाई पड़तीइसलिए नहीं कि राह नहीं है,राह तो सदा है। लेकिन अगर हम यह मान ही लें कि राह है ही नहींयही हमारा उत्तर बन जाएतो फिर राह दिखाई पड़नी असंभव है।
अर्जुन यह नहीं मानता। अर्जुन बड़ी जिज्ञासा कर रहा है कि राह होगी। मैं खोजता हूंमैं पूछता हूंआप मुझे बताएं। वह कृष्ण को कह रहा हैआप मुझे बताएंआप मुझे समझाएं। मैं अज्ञानी हूंमुझे कुछ पता नहीं है। विनम्र है। अर्जुन का अज्ञान विनम्र हैसार्त्र का अज्ञान विनम्र नहीं है। सार्त्र का अज्ञान बहुत असर्टिव है। खतरा है। और जब अज्ञान असर्टिव होता हैजब अज्ञान मुखर होता हैतो जितने खतरे होते हैंउतने खतरे और किसी बात से नहीं होते। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि अज्ञान मुखर होता है।
अर्जुन पूछ रहा है। वह कहता हैमुझे पता नहीं है। मैं संदेह में पड़ गया हूं। मैं डूबा जा रहा हूं संकट मेंमुझे कोई मार्ग दें। लेकिन मार्ग हो सकता हैइसकी उसकी खोज जारी है।
मैं मानता हूं कि अर्जुन सार्त्र से ज्यादा साहसी है। क्योंकि इतनी गहन निराशा में भी मार्ग की खोज बड़े साहस की बात है। सार्त्र उतना साहसी नहीं है। उसके वक्तव्य बहुत साहसी मालूम पड़ते हैंउतना साहसी नहीं है। असल में कई बार ऐसा होता है कि अंधेरी गली में आदमी निकलता हैतो सीटी बजाता हुआ निकलता है। सीटी बड़ी साहसी मालूम पड़ती है आस-पास सोए हुए लोगों को। लेकिन सीटी बजाने से साहस पता नहीं चलताउससे सिर्फ इतना ही पता चलता है कि आदमी डर रहा है। वह सीटी साहस का सबूत नहीं होती। वह सिर्फ भय को छिपाने की चेष्टा होती है।
वह जो केआसजो अराजकता पश्चिम के सामने दो महायुद्धों ने प्रकट कर दी हैवह जो नीचे से एक बवंडर प्रकट हुआ है और भूमि फट गई हैऔर एक ज्वालामुखी ने मुंह बा दिया है पश्चिम के सामनेउस ज्वालामुखी को झुठलाने की कोशिश चल रही है।
है ही नहीं जीवन में कोई अर्थइसलिए अनर्थ से डरने की जरूरत क्या है! है ही नहीं कोई मूल्यइसलिए मूल्य की खोज की चिंता भी क्या करनी है! है ही नहीं कोई परमात्मातो प्रार्थना करने से क्या फायदा है! है ही नहीं कोई आशाइसलिए निराशा में भी चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं है!
निराशा में भी निश्चिंतता खोजने की चेष्टासिर्फ इस बात की सूचक है कि हृदय बहुत कमजोर है और साहस कम है। असल में आशा जब तीव्र निराशा में पड़ती हैतभी पता चलता है कि है या नहीं। और जब गहन अंधकार में ज्योति को खोजने की चेष्टा चलती हैतभी पता चलता है कि प्रकाश की कोई आकांक्षागहरा साहसगहरी लगन और गहरे संकल्प से जुड़ी है या नहीं जुड़ी है।
पश्चिम की सार्त्रवादी चिंतना निराशा को स्वीकार कर लेने की है। निराशा है। इससे पश्चिम उबरेगा नहीं। इसलिए एक्झिस्टेंशियलिज्म और उस तरह के विचारक सिर्फ एक फैशन से ज्यादा नहीं हैं। और फैशन मरनी शुरू हो गई हैफैशन मर रही है। अब अस्तित्ववाद कोई बहुत जीवित धारणा नहीं है। बच्चे पश्चिम के उसको भी इनकार कर रहे हैंवह भी ओल्ड फैशन हो गई है। छोड़ो यह बकवास भी!
लेकिन सार्त्र की पीढ़ी ने जो निराशा दी हैउसका दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ी पर दिखाई पड़ रहा है। वह पीढ़ी कहती है कि ठीक हैहम सड़क पर नंगे नाचेंगेक्योंकि तुम्हीं ने तो कहा कि कोई अर्थ नहीं हैतो फिर कपड़े पहनने में ही कौन-सा अर्थ है! तो हम फिर किसी भी तरह के काम-संबंध निर्मित करेंगेक्योंकि तुम्हीं ने तो कहा है कि कोई अर्थ नहीं हैतो परिवार का भी क्या अर्थ है! फिर हम किसी को आदर नहीं देंगेक्योंकि तुम्हीं ने तो कहा है कि जब ईश्वर ही नहीं हैतो आदर का क्या अर्थ है! और हम कल की चिंता न करेंगे।
आज अमेरिका और यूरोप की युनिवर्सिटीज लड़के खाली करके भाग रहे हैं। उनसे कहते हैं उनके मां-बाप कि पढ़ोतो वे कहते हैंकल का क्या भरोसातुम्हीं ने तो कहा है कि सब अनिश्चित हैतो पढ़-लिखकर भी क्या होगा?और वे लड़के पूछते हैं कि हिरोशिमा में भी लड़के पढ़ रहे थे कालेज मेंफिर एटम गिर गया और सब समाप्त हो गया। हम भी पढ़ेंगेतुम एटम तैयार कर रहे होकिस दिन गिरा दोगेकुछ पता नहीं है। तो हमें जी लेने दोजो दो-चार क्षण हमें मिले हैंहमें जी लेने दो।
तो पश्चिम में जो जीवन का एक विस्तार है टाइम मेंसमय में जो एक जीवन की यात्रा हैवह एकदम खंडित हो गई है। क्षण पर टिक गया हैअभी जो हैकर लोअगले क्षण का कोई भरोसा नहीं है। और अगले क्षण के भरोसे को करोगे भी क्याअंततः तो मृत्यु ही हैअगला क्षण मृत्यु है। टाइम जो हैवह डेथ का पर्यायवाची हो गया पश्चिम मेंसमय और मृत्यु एक ही अर्थ के हो गए। अभी जो हैहैऔर कोई मूल्य नहीं है।
अभी एक व्यक्ति ने कई हत्याएं कीं। और जब अदालत ने उससे पूछा तो उसने कहाक्या हर्ज है! जब सभी को मर ही जाना हैतो मैंने मरने में सहायता की है। और वे तो मर ही जातेउनको मारने से मुझे थोड़ा आनंद मिला है! उसके ले लेने में हर्ज क्या हैजब कोई मूल्य ही नहीं हैतो ठीक है।
सार्त्र की पीढ़ी पश्चिम को एक खोखलेपन सेएक हालोनेस से भर गई। क्योंकि उसके पास उत्तर नहीं थेसिर्फ प्रश्न थे। और उसने प्रश्नों को ही उत्तर बता दिया।
अगर अर्जुन जीत जाएतो इस मुल्क में भी हालोनेस पैदा हो जाए। अर्जुन नहीं जीता और कृष्ण जीत गए। वह एक संघर्ष था बड़ा अर्जुन और कृष्ण के बीच। अगर अर्जुन को शक सवार हो जाएऔर धुन सवार हो जाए गुरु होने कीऔर वह अपनी जिज्ञासाओं को उत्तर बना देऔर अपने प्रश्नों को उत्तर बना देऔर अपने अज्ञान को ज्ञान मान लेतो इस मुल्क में भी वही स्थिति पैदा हो जातीजो पश्चिम में अस्तित्ववादी चिंतन के कारण पैदा हुई है। स्थिति वही हैलेकिन पश्चिम के पास अभी भी कृष्ण नहीं हैं। लेकिन इस सिचुएशन में कृष्ण पश्चिम में पैदा हो सकते हैं।
और इसलिए बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि कृष्ण- कांशसनेस जैसे आंदोलन पश्चिम के मन को पकड़ रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं है कि पश्चिम की सड़कों पर लड़के और लड़कियां ढोल पीटकर और कृष्ण का भजन कर रहे हैं। यह कोई आश्चर्य नहीं है। यह आकस्मिक नहीं है। इस जगत में आकस्मिक कुछ भी नहीं होता। इस जगत में फूल भी खिलता हैतो लंबे कारण होते हैं। अगर लंदन की सड़क पर कोई हरेकृष्ण का भजन ढोल पर पीटता हुआ घूमता है,तो यह आकस्मिक नहीं है। यह पश्चिम के चित्त में कहीं कोई गहरी पीड़ा है।
अर्जुन तो मौजूद हो गयाकृष्ण कहां हैंप्रश्न तो खड़ा हो गयाउत्तर कहां हैउत्तर की तलाश हैउत्तर की तलाश पैदा हुई है। इसलिए ठीक सवाल था यह।
लेकिन मैं अर्जुन को मनुष्य का प्रतीक कहता हूं। और अर्जुन को जो ममत्व पकड़ावह भी मनुष्य की मनुष्यता है। लेकिन नीत्से का एक वचन आपसे कहूं। नीत्से ने कहा हैअभागा होगा वह दिनजिस दिन मनुष्य मनुष्य से पार होने की आकांक्षा छोड़ देगा। अभागा होगा वह दिनजिस दिन मनुष्य की प्रत्यंचा पर मनुष्य को पार करने वाला तीर न खिंचेगा। अभागा होगा वह दिनजिस दिन मनुष्य मनुष्य होने से तृप्त हो जाएगा। मनुष्य मंजिल नहीं हैपड़ाव है। उसे पार होना ही है। अर्जुन मंजिल नहीं हैपड़ाव है।
स्वाभाविक है आदमी के लिएअपनों को चाहे। स्वाभाविक है आदमी के लिएअपनों को मारने से डरे। स्वाभाविक है आदमी के लिएईदर-ऑर पकड़े--यह या वहकरूं या न करूं--चिंता आए। लेकिन जो मनुष्य के लिए स्वाभाविक हैवह जीवन का अंत नहीं है। और मनुष्य के लिए जो स्वाभाविक हैवह सिर्फ मनुष्य के लिए स्वाभाविक है। और उस स्वभाव में चिंता और पीड़ा और तनाव भी जुड़े हैंअशांतिदुख और विक्षिप्तता भी जुड़ी है।
मनुष्य को अगर हम स्वाभाविक समझेंतो वह स्वाभाविकता वैसी ही हैजैसे कैंसर स्वाभाविक हैटी.बी. स्वाभाविक है। लेकिन टी.बी. के स्वभाव के साथ पीड़ा भी जुड़ी है। ऐसे ही मनुष्य को अगर हम पशु की तरफ से देखें,तो मनुष्य एक एवोल्यूशन हैएक विकास हैऔर अगर परमात्मा की तरफ से देखेंतो एक डिसीज हैएक बीमारी है। अगर हम पशु की तरफ से देखेंतो मनुष्य एक विकास हैऔर अगर परमात्मा की तरफ से देखेंतो मनुष्य एक बीमारी हैएक डिसीज है।
यह अंग्रेजी का शब्द डिसीज बहुत अच्छा है। यह दो शब्दों से बना है--डिसईज। उसका सिर्फ मतलब होता है बेचैनीनाट ऐट ईज। तो आदमी एक डिसीज हैएक बेचैनी हैअगर परमात्मा की तरफ से देखें।
और अगर पशु भी हमारे संबंध में सोचते होंगेतो वे भी नहीं सोचते होंगे कि हम विकास हैं। वे भी सोचते होंगे कि हमारे बीच से कुछ लोग गड़बड़ हो गए हैंविक्षिप्त हो गए हैंइनका दिमाग खराब हो गया है। सिवाय परेशानी के...क्योंकि जब कोई पशु देखता होगा कि आदमी साइकियाट्रिस्ट के दफ्तर में जाता हैआदमी मनोवैज्ञानिक के पास अपने मन की जांच के लिए जाता हैजब देखते होंगे आदमी पागलखाने खड़े करता हैऔर जब देखते होंगे कि यह आदमी दिन-रात चिंता में जीता हैतो पशु भी कभी सोचते होंगे। कभी न कभी उनकी जमात बैठती होगी और वे सोचते होंगे कि इन बेचारों को कितना समझाया था कि मत आदमी बनो। नहीं माने हैंऔर फल भोग रहे हैं! जैसा कि पिता अक्सर बेटों के संबंध में सोचते हैं।
पशु पिता हैंहम उसी यात्रा से आते हैं। जरूर सोचते होंगे कि कितना समझायालेकिन बिगड़ गई है यह जेनरेशनयह पीढ़ी भटक गई। लेकिन उन्हें पता नहीं कि इस भटकाव से संभावनाएं खुल गई हैं। इस भटकाव से एक बड़ी यात्रा खुली है।
स्वभावतःजो घर बैठा हैवह उतना परेशान नहीं होता। जो यात्रा पर निकला हैवह परेशान होता है। राह की धूल भी हैराह के गङ्ढे भी हैंराह की भूलें भी हैंराह पर भटकन भी है। अनजान रास्ता हैपास कोई नक्शा नहीं। अनचार्टर्ड हैखोजना है और चलना हैचलना है और रास्ता बनाना है। लेकिन जो चलेंगेभूलेंगेभटकेंगेगिरेंगेदुखी होंगेवे ही पहुंचते भी हैं।
अर्जुन स्वाभाविक है मनुष्य के लिए। लेकिन अर्जुन खुद पीड़ा से भरा है। वह भी मनुष्य होने की इच्छा में नहीं है। वह कहता है या तो दुर्योधन हो जाएया तो कोई समझा दे कि जो हो रहा हैसब ठीक है। या कोई ऊपर उठा दे अर्जुन होने से। उसकी चिंताउसका दुखउसकी पीड़ा वही है।


गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।। ३०।।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।। ३१।।
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।। ३२।।
तथा हाथ से गांडीव धनुष गिरता है और त्वचा भी बहुत जलती है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है। इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूं। और हे केशव! लक्षणों को भी विपरीत ही देखता हूं तथा युद्ध में अपने कुल को मारकर कल्याण भी नहीं देखता। हे कृष्ण! मैं विजय को नहीं चाहता और राज्य तथा सुखों को भी नहीं चाहता।
हे गोविंद! हमें राज्य से क्या प्रयोजन है,
अथवा भोगों से और जीवन से भी क्या प्रयोजन है।


अर्जुन के अंग शिथिल हो गए हैं। मन साथ छोड़ दिया है। धनुष छूट गया है। वह इतना कमजोर मालूम पड़ रहा है कि कहता हैरथ पर मैं बैठ भी सकूंगा या नहींइतनी भी सामर्थ्य नहीं है। यहां दोत्तीन बातें समझनी जरूरी हैं।
एक तो यह कि शरीर केवल हमारे चित्त का प्रतिफलन है। गहरे में मन में जो घटित होता हैवह शरीर के रोएं-रोएं तक फलित हो जाता है। यह अर्जुन बलशाली इतनाअचानक ऐसा बलहीन हो गया कि रथ पर बैठना उसे कठिन मालूम पड़ रहा है! क्षणभर पहले ऐसा नहीं था। इस क्षणभर में वह बीमार नहीं हो गया। इस क्षणभर में उसके शरीर में कोई अशक्ति नहीं आ गई। इस क्षणभर में वह वृद्ध नहीं हो गया। इस क्षणभर में क्या हुआ है?
इस क्षण में एक ही घटना घटी हैउसका मन क्षीण हो गयाउसका मन दुर्बल हो गयाउसका मन स्व-विरोधी खंडों में विभाजित हो गया। जहां मन विभाजित होता है विरोधी खंडों मेंतत्काल शरीर रुग्णदीन हो जाता है। जहां मन संयुक्त होता है एक संगीतपूर्ण स्वर मेंवहां शरीर तत्काल स्वस्थ और अविभाजित हो जाता है। उसके धनुष का गिर जानाउसके हाथ-पैर का कंपनाउसके रोओं का खड़ा हो जानासूचक है। इस बात का सूचक है कि शरीर हमारे मन की छाया से ज्यादा नहीं है।
नहींपहले ऐसा खयाल नहीं था। वैज्ञानिक कहते रहे हैं कि मन हमारा शरीर की छाया से ज्यादा नहीं है। जो इस भ्रांत-चिंतन को मानकर सोचते रहेवे लोग भी यही कहते रहे हैं। बृहस्पति भी यही कहेंगेएपिकुरस भी यही कहेगाकार्ल माक्र्स और एंजिल्स भी यही कहेंगेकि वह जो चेतना हैवह केवल बाई-प्राडक्ट है। वह जो भीतर मन है,वह केवल हमारे शरीर की उप-उत्पत्ति हैवह केवल शरीर की छाया है।
अभी अमेरिका में दो मनोवैज्ञानिक थेजेम्स और लेंगे। उन्होंने एक बहुत अदभुत सिद्धांत प्रतिपादित किया थाऔर वर्षों तक स्वीकार किया जाता रहा। जेम्स-लेंगे थियरी उनके सिद्धांत का नाम था। बड़ी मजे की बात उन्होंने कही थी। उन दोनों ने यह सिद्ध करने की कोशिश की थी कि सदा से हम ऐसा समझते रहे हैं कि आदमी भयभीत होता हैइसलिए भागता है। उन्होंने कहानहींयह गलत है। क्योंकि अगर शरीर प्रमुख है और मन केवल उप-उत्पत्ति हैतो सच्चाई उलटी होनी चाहिए। उन्होंने कहामनुष्य चूंकि भागता हैइसलिए भय अनुभव करता है।
हम सोचते रहे हैं सदा से कि आदमी क्रोधित होता हैइसलिए मुट्ठियां भिंच जाती हैंक्रोधित होता हैइसलिए दांत भिंच जाते हैंक्रोधित होता है इसलिए आंखों में खून दौड़ जाता हैक्रोधित होता हैइसलिए श्वास तेजी से चलने लगती है और हमले की तैयारी हो जाती है।
जेम्स-लेंगे ने कहागलत है यह बात। क्योंकि शरीर प्रमुख हैइसलिए घटना पहले शरीर पर घटेगीमन में केवल प्रतिफलन होगा। मन सिर्फ एक मिरर हैएक दर्पण! इससे ज्यादा नहीं। इसलिए उन्होंने कहा कि नहींबात उलटी है। आदमी चूंकि मुट्ठियां भींच लेता है और आदमी चूंकि दांत कस लेता है और चूंकि शरीर में खून तेजी से दौड़ता हैश्वास तेज चलती हैइसलिए क्रोध पैदा होता है।
फिर उन्होंने सिद्ध करने के लिए...और यहां तर्क का बहुत मजेदार मामला है। और तर्क कभी-कभी कैसे गलत रास्तों पर ले जाता हैवह देखने जैसा है। उन्होंने कहातो मैं यह कहता हूं कि एक आदमी बिना भागे हुए और बिना शरीर पर भागने का कोई प्रभाव हुए भयभीत होकर बता दे। या एक आदमी बिना आंखें लाल किएमुट्ठियां बांधेदांत भींचेक्रोध करके बता दे।
मुश्किल है बात! कैसे बताइएगा क्रोध करके। तब उन दोनों ने कहा कि तब ठीक हैजब इसके बिना क्रोध नहीं हो सकतातो क्रोध इनका ही जोड़ है। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं है।
लेकिन पता नहींजेम्स-लेंगे को किसी ने क्यों नहीं कहा कि इससे उलटा होता है। एक अभिनेता क्रोध करके बता सकता हैआंखें लाल करके बता सकता हैदांत भींच सकता हैमुट्ठी भींच सकता हैफिर भी भीतर उसके कोई क्रोध नहीं होता। और एक अभिनेता प्रेम करके बता सकता है--और जितना अभिनेता बता सकता हैउतना शायद कोई भी नहीं बता सकता--भीतर उसके कोई प्रेम नहीं होता है।
यह अर्जुनजेम्स-लेंगे सिद्धांत के बिलकुल विपरीत काम कर रहा हैबिलकुल उलटा काम कर रहा है। जेम्स-लेंगे इसको बिलकुल मानने को राजी नहीं होंगेकहेंगेबिलकुल उलटी बातें कर रहा है। इसे कहना चाहिए कि चूंकि मेरा धनुष गिरा जाता हैचूंकि मेरे रोएं खड़े हुए जाते हैंचूंकि मेरा शरीर शिथिल हुआ जाता हैक्योंकि मेरे अंग निढाल हुए जाते हैंइसलिए हे केशव! मेरे मन में बड़ी चिंता पैदा हो रही है।
लेकिन यह ऐसा नहीं कह रहा है। चिंता इसे पहले पैदा हो गई है। क्योंकि इसके शरीर के शिथिल होने और इसके रोएं खड़े होने का और कोई भी कारण नहीं हैबाहर कोई भी कारण नहीं है। एक क्षण में बाहर कुछ भी नहीं बदला है। बाहर सब वही हैलेकिन भीतर सब बदल गया है। भीतर सब बदल गया है।
तिब्बत में ल्हासा युनिवर्सिटी में विद्यार्थियों का भी शिक्षण जो होता थाउसमें भी योग का कुछ वर्ग अनिवार्य था। और एक योग का नियमित प्रयोग ल्हासा युनिवर्सिटी में चलता था। उसमें भी विद्यार्थियों को उत्तीर्ण होना जरूरी था। और वह था हीट-योग। वह है शरीर में भीतर से मन के कारण गर्मी पैदा करने की प्रक्रिया। अजीब! सिर्फ मन से! सिर्फ मन से। बाहर बर्फ पड़ रही हैऔर आदमी नग्न खड़ा हैऔर उसके शरीर से पसीना चू रहा है।
और इतने पर राजी नहीं होते थे वे। और जब पश्चिम से आए हुए डाक्टरों ने भी इसका परीक्षण कियातो बहुत हैरान हो गए। क्योंकि जब विद्यार्थियों की परीक्षा होती थीतो रात में खुले मैदान मेंबर्फ के पासझील के किनारे उन्हें नग्न खड़ा किया जाता। और उनके पास कपड़ेकोटकमीज गीले करके रखे जातेपानी में डुबाकर। और वे नग्न खड़े हैं। और उस लड़के को सर्वाधिक अंक मिलेंगेजो रात अपने शरीर से इतनी गर्मी पैदा करे कि अनेक कपड़े सुखा दे शरीर पर पहनकर! जितने ज्यादा कपड़े रातभर में वह सुखा देगाउतने ज्यादा अंक उसको मिलने वाले हैं!
और जब पश्चिम से आए डाक्टरों के एक दल ने यह देखातो वे दंग रह गए। उन्होंने कहाजेम्स-लेंगे थियरी का क्या हुआक्योंकि बाहर तो बर्फ पड़ रही है और वे डाक्टर तो लबादे पर लबादे पहनकर भी भीतर कंपे जा रहे हैं। और ये नग्न खड़े लड़के क्या कर रहे हैंक्योंकि इनके शरीर पर जो होना चाहिएवह हो रहा है। लेकिन मन इनकार कर रहा है। और मन कहे चला जा रहा है कोई बर्फ नहीं है। और मन कहे चला जा रहा है कि धूप हैतेज गर्मी है। और मन कहे जा रहा है कि शरीर में आग तप रही है। इसलिए शरीर को पसीना छोड़ना पड़ रहा है।
यह जो अर्जुन के साथ हुआवह उसके मन में पैदा हुए भंवर का शरीर तक पहुंचा हुआ परिणाम है। और हमारी जिंदगी में शरीर से बहुत कम भंवर मन तक पहुंचते हैं। मन से ही अधिकतम भंवर शरीर तक पहुंचते हैं। लेकिन हम जिंदगीभर शरीर की ही फिक्र किए चले जाते हैं।
अगर कृष्ण को थोड़ी भी--जिसको तथाकथित वैज्ञानिक बुद्धि कहें--होतीतो वे अर्जुन को कहते कि मालूम होता हैतुझे फ्लू हो गया है! अगर उन्होंने माक्र्स को पढ़ा होतातो वे कहतेमालूम होता हैतेरे शरीर में किसी हार्मोन की कोई कमी हो गई है। वे कहतेतू चल और किसी जनरल अस्पताल में भर्ती हो जा। लेकिन उन्होंने यह बिलकुल नहीं कहा। वे शिथिल-गात होते अर्जुन को कुछ और समझाने लगेवे उसके मन को कुछ और समझाने लगे;वे उसके मन को बदलने की कोशिश करने लगे।
जगत में दो ही प्रक्रियाएं हैंया तो आदमी के शरीर को बदलने की प्रक्रिया और या आदमी की चेतना को बदलने की प्रक्रिया। विज्ञान आदमी के शरीर को बदलने की प्रक्रिया पर ध्यान देता हैधर्म मनुष्य की चेतना को बदलने की प्रक्रिया पर ध्यान देता है। वहीं भेद है। और इसलिए मैं कहता हूंधर्म विज्ञान से ज्यादा गहरा विज्ञान है,धर्म विज्ञान से ज्यादा महान विज्ञान है। वह सुप्रीम साइंस हैवह परम विज्ञान है। क्योंकि वह केंद्र से शुरू करता है। और वैज्ञानिक बुद्धि निश्चित ही केंद्र से शुरू करेगी। परिधि पर की गई चोटें जरूरी नहीं कि केंद्र पर पहुंचेंलेकिन केंद्र पर की गई चोटें जरूरी रूप से परिधि पर पहुंचती हैं।
एक पत्ते को पहुंचाया गया नुकसान जरूरी नहीं है कि जड़ों तक पहुंचे। अक्सर तो नहीं पहुंचेगा। पहुंचने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जड़ों को पहुंचाया गया नुकसान पत्तों तक जरूर पहुंच जाएगापहुंचना ही पड़ेगापहुंचने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है।
इसलिए अर्जुन की इस स्थिति को देखकरकृष्ण उसे कहां से पकड़ते हैंअगर वे शरीर से पकड़तेतो गीता फिजियोलाजी की एक किताब होती। वह भौतिक-शास्त्र होती। वे उसे चेतना से पकड़ते हैंइसलिए गीता एक मनस-शास्त्र बन गई। गीता के मनस-शास्त्र बनने का प्रारंभ--अर्जुन के शरीर की घटना पर कृष्ण बिलकुल ध्यान ही नहीं देते। वे न उसकी नाड़ी देखते हैंन थर्मामीटर लगाते हैं। वे उसकी फिक्र ही नहीं करते कि उसके शरीर को क्या हो रहा है। वे फिक्र करते हैं कि उसकी चेतना को क्या हो रहा है। यह थोड़ा विचारणीय है।
जैसा मैंने कहाआज भी मनुष्य जाति करीब-करीब अर्जुन की चेतना से ग्रस्त है। उसके शरीर पर भी वे परिणाम हो रहे हैं। लेकिन हम जो इलाज कर रहे हैंवे शरीर से शुरू करने वाले हैं। इसलिए सब इलाज हो जाते हैं,और बीमार बीमार ही बना रहता है। उसकी चेतना से कोई इलाज शुरू नहीं हो पाता है।
यह अर्जुन कहता हैमेरा मन साथ छोड़े दे रहा है। मैं बिलकुल निर्वीर्य हो गयाबलहीन हो गया।
बल क्या हैएक तो बल है जो शरीर की मांस-पेशियोंमसल्स में होता है। उसमें तो कोई भी फर्क नहीं पड़ गया है। लेकिन इस क्षण अर्जुन को एक छोटा-सा बच्चा भी धक्का दे देतो वह गिर जाएगा। इस क्षण अर्जुन की मसल्स कुछ भी काम नहीं करेंगी। एक छोटा-सा बच्चा उसे हरा सकता है। यह मस्कुलर ताकत कुछ अर्थ की नहीं मालूम होती है। एक और बल हैजो संकल्प सेविल से पैदा होता है। सच तो यह है कि वही बल हैजो संकल्प से पैदा होता है।
वह जो संकल्प से पैदा होने वाला बल हैवह बिलकुल ही खो गया है। क्योंकि संकल्प कहां से आएमन दुविधा में पड़ गयातो संकल्प खंडित हो जाता है। मन एकाग्र होतो संकल्प संगठित हो जाता है। मन दुविधा में द्वंद्वग्रस्त हो जाएकांफ्लिक्ट में पड़ जाएतो संकल्प खो जाता है। हम सब भी निर्बल हैंसंकल्प नहीं है। वही संकल्प खो गया है। क्या करूंक्या न करूंकरना क्या उचित होगाक्या उचित नहीं होगासब आधार खो गए पैर के नीचे से। अर्जुन अधर में लटका रह गया हैवह त्रिशंकु हो गया है।
यह प्रत्येक मनुष्य की स्थिति है। और इसलिए अदभुत सत्य हैं कुरान मेंऔर अदभुत सत्य हैं बाइबिल में,और अदभुत सत्य हैं जेन्दअवेस्ता मेंऔर अदभुत सत्य हैं ताओत्तेह-किंग मेंऔर दुनिया के अनेक-अनेक ग्रंथों में अदभुत सत्य हैंलेकिन गीता फिर भी विशिष्ट हैऔर उसका कुल कारण इतना है कि वह धर्मशास्त्र कममनस-शास्त्रसाइकोलाजी ज्यादा है। उसमें कोरे स्टेटमेंट्स नहीं हैं कि ईश्वर है और आत्मा है। उसमें कोई दार्शनिक वक्तव्य नहीं हैंकोई दार्शनिक तर्क नहीं हैं। गीता मनुष्य जाति का पहला मनोविज्ञान हैवह पहली साइकोलाजी है। इसलिए उसके मूल्य की बात ही और है।
अगर मेरा वश चलेतो कृष्ण को मनोविज्ञान का पिता मैं कहना चाहूंगा। वे पहले व्यक्ति हैंजो दुविधाग्रस्त चित्तमाइंड इन कांफ्लिक्टसंतापग्रस्त मनखंड-खंड टूटे हुए संकल्प को अखंड और इंटिग्रेट करने की...कहें कि वे पहले आदमी हैंजो साइको-एनालिसिस कामनस-विश्लेषण का उपयोग करते हैं। सिर्फ मनस-विश्लेषण का ही नहीं,बल्कि साथ ही एक और दूसरी बात का भीमनस-संश्लेषण का भीसाइको-सिंथीसिस का भी।
तो कृष्ण सिर्फ फ्रायड की तरह मनोविश्लेषक नहीं हैंवे संश्लेषक भी हैं। वे मन की खोज ही नहीं करते कि क्या-क्या खंड हैं उसके! वे इसकी भी खोज करते हैं कि वह कैसे अखंडइंडिविजुएशन को उपलब्ध होअर्जुन कैसे अखंड हो जाए!
और यह अर्जुन की चित्त-दशाहम सबकी चित्त-दशा है। लेकिनशायद संकट के इतने तीव्र क्षण में हम कभी नहीं होते। हमारा संकट भी कुनकुनाल्यूक-वार्म होता हैइसलिए हम उसको सहते चले जाते हैं। इतना ड्रामैटिक,इतना त्वरा से भराइतना नाटकीय संकट होतो शायद हम भी अखंड होने के लिए आतुर हो जाएं।
मैंने सुना है कि एक मनोवैज्ञानिक ने एक उबलते हुए पानी की बाल्टी में एक मेंढक को डाल दिया। वह मेंढक तत्काल छलांग लगाकर बाहर हो गया। वह मेंढक अर्जुन की हालत में पड़ गया था। उबलता हुआ पानीमेंढक कैसे एडजस्ट करे! छलांग लगाकर बाहर हो गया। फिर उसी मनोवैज्ञानिक ने उसी मेंढक को एक दूसरी बाल्टी में डाला और उसके पानी को धीरे-धीरे गरम कियाचौबीस घंटे में उबलने तक लाया वह। करता रहा धीरे-धीरे गरम। वह जो मेंढक थाहम जैसाराजी होता गया। थोड़ा पानी गरम हुआमेंढक भी थोड़ा गरम हुआ। उस मेंढक ने कहाअभी ऐसी कोई छलांग लगाने की खास बात नहीं हैचलेगा। वह एडजस्टमेंट करता चला गयाजैसा हम सब करते चले जाते हैं। चौबीस घंटे में वह एडजस्टेड हो गया। जब पानी उबलातब एडजस्टेड रहाक्योंकि अभी उसे कोई फर्क नहीं मालूम पड़ा। रत्ती-रत्ती बढ़ा। एक रत्ती से दूसरी रत्ती में कोई छलांग लगाने जैसी बात नहीं थी। उसने कहा कि इतने से राजी हो गएतो इतने से और सही। वह मर गया। पानी उबलता रहावह उसी में उबल गयाछलांग न लगाई। मेंढक छलांग लगा सकता था। अब मेंढक को छलांग लगाने से ज्यादा स्वाभाविक और कुछ भी नहीं हैमगर वह भी न हो सका।
अर्जुन उबलते हुए पानी में एकदम पड़ गया है। इसलिए सिचुएशन ड्रामैटिक हैसिचुएशन एक्सट्रीम है। वह ठीक स्थिति पूरी उबलती हुई है। इसलिए अर्जुन एकदम धनुषबाण छोड़ दिया। हम अपनी तराजू भी नहीं छोड़ सकते इस तरहहम अपना गज भी नहीं छोड़ सकते इस तरहहम अपनी कलम भी नहीं छोड़ सकते इस तरह। और रथ पर ही बैठने में एकदम इतना कमजोर हो गया! क्या हुआसंकट सेइतनी तीव्रता से राजी होनाएडजस्ट होना मुश्किल हो गया।
मैं आपसे कहना चाहूंगा कि राजी मत होते चले जाना। नहीं सबको ऐसे मौके नहीं आते कि महाभारत हो हरेक की जिंदगी में। और बड़ी कृपा है भगवान कीऐसा हरेक आदमी को महाभारत का मौका लाना पड़ेतो कठिनाई होगी बहुत।
लेकिन जिंदगी महाभारत हैपर लंबे फैलाव पर है! त्वरा नहीं है उतनी। तीव्रता नहीं है उतनी। सघनता नहीं है उतनी। धीमे-धीमे सब होता रहता है। मौत आ जाती है और हम एडजस्ट होते चले जाते हैंहम समायोजित हो जाते हैं। और तब जिंदगी में क्रांति नहीं हो पाती है।
अर्जुन की जिंदगी में क्रांति निश्चित है। इधर या उधरउसे क्रांति से गुजरना ही पड़ेगा। पानी उबलता हुआ है। ऐसी जगह हैजहां उसे कुछ न कुछ करना ही होगा। या तो वह भाग जाएजैसा कि बहुत लोग भाग जाते हैं। सरल वही होगा। शार्ट कट वही है। निकटतम यही मालूम पड़ता हैभाग जाए।
इसलिए अधिक लोग जीवन के संकट में से भागने वाला संन्यास निकाल लेते हैं। अधिक लोग जीवन के संकट में से एस्केपिस्ट रिनंसिएशन निकाल लेते हैंएकदम जंगल भाग जाते हैं। वे कहते हैंनहींअहमदाबाद नहींहरिद्वार जा रहे हैं। अर्जुन भी वैसी स्थिति में था। हालांकि गीता वे अपने साथ ले जाते हैं। तब बड़ी हैरानी होती है। हरिद्वार में गीता पढ़ते हैं। अर्जुन भी पढ़ सकता था। हरिद्वार वह भी जाना चाहता था। लेकिन वह उसको एक गलत आदमी मिल गयाकृष्ण मिल गया। उसने कहा कि रुकभाग मत!
क्योंकि भगोड़े परमात्मा तक पहुंच सकते हैंभगोड़े परमात्मा तक नहीं पहुंच सकते। जो जीवन के सत्य से भागते हैंवे परमात्मा तक नहीं पहुंच सकते हैं। जो जीवन का ही साक्षात्कार करने में असमर्थ हैंवे परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकते हैं। क्योंकि जो जीवन को ही देखकर शिथिल-गात हो जाते हैंजिनके गांडीव छूट जाते हैं हाथ सेजिनके रोएं कंपने लगते हैं और जिनके प्राण थरथराने लगते हैं--जीवन को ही देखकर--नहींपरमात्मा के समक्ष वे खड़े नहीं हो सकेंगे।
जीवन तैयारी हैजीवन कदम-कदम तैयारी हैउस विराट सत्य के साक्षात्कार कीएनकाउंटर की। और अर्जुन तो जीवन के एक छोटे से तथ्य से ही भागा चला जा रहा है! लेकिन भागने की तैयारी उसकी पूरी हो गई है।
अब यह बड़े मजे की बात है कि वह रथ पर नहीं चढ़ पाता। वह कहता हैरथ पर चढ़ने की भी शक्ति नहीं है। लेकिन अगर उससे कहो कि भाग जाओ जंगल की तरफतो वह बड़ी शक्ति पाएगाअभी भाग जाएगा। एकदम इतनी तेजी से दौड़ेगाजितनी तेजी से कभी नहीं दौड़ा है। जो आदमी जिंदगी से लड़ने की सामर्थ्य नहीं जुटा पा रहा हैवह भागने की जुटा लेता है। सामर्थ्य की तो कमी नहीं मालूम पड़तीशक्ति की तो कमी नहीं मालूम पड़तीशक्ति तो है। अगर कृष्ण उसे कहेंछोड़ सबतो वह बड़ा प्रफुल्ल हो जाएगा। लेकिन यह प्रफुल्लता ज्यादा देर टिकेगी नहीं। और अगर अर्जुन जंगल चला जाएतो थोड़ी देर में ही उदास हो जाएगा। बैठ भी जाए वह संन्यासी के वेश में एक वृक्ष के नीचेतो थोड़ी देर में जंगल से ही लकड़ी वगैरह बटोरकर वह तीर-कमान बना लेगा। वह आदमी वही है।
क्योंकि हम अपने से भागकर कहीं भी नहीं जा सकते हैं। हम सबसे भाग सकते हैंअपने से नहीं भाग सकते हैं। मैं तो अपने साथ ही पहुंच जाऊंगा। तो थोड़ी देर में जब वह देखेगा कि कोई देखने वाला नहीं हैतो पशु-पक्षियों का शिकार शुरू कर देगा। अर्जुन ही तो भागेगा न! और पशु-पक्षी तो अपने नहीं हैंवे तो स्वजन-प्रियजन नहीं हैं। उन्हें तो मारने में कोई कठिनाई आएगी नहीं। वह मजे से मारेगा।
अर्जुन संन्यासी हो नहीं सकता। क्योंकि जो संसारी होने की भी हिम्मत नहीं दिखा पा रहा हैउसके संन्यासी होने का कोई उपाय नहीं है। असल में संन्यास संसार से भागने का नाम नहीं हैसंसार को पार कर जाने का नाम है।
संन्याससंसार की जलन और आग का अतिक्रमण है। और जो उसे पूरा पार कर लेता हैवही अधिकारी हो पाता है। संन्यास संसार से विरोध नहींसंन्यास संसार की संपूर्ण समझ और संघर्ष का फल है।
संन्यास की स्थिति में आ गया है वह। पलायनवादी होतब तो अभी रास्ता है उसके सामने। अगर संघर्ष में जाएतो कठिनाई है। अब पूरी गीता उसके गात की शिथिलता को मिटाने के लिए हैउसे वापस संकल्पवान होने के लिए हैउसे वापस शक्तिसंकल्पवापस व्यक्तित्व और आत्मवान बनाने की पूरी चेष्टा है।
और इसलिए मैं जो सारी चर्चा करूंगावह इसी दृष्टि से चर्चा करूंगा कि वह आपके मनस के भी काम की है। और अगर आपके भीतर अर्जुन न होतो आप मत आएंवह आपके काम की बात नहीं है। वह बेमानी है। आपके भीतर दुविधा न होआपके भीतर संघर्ष न होआपके भीतर बेचैनी न होतो आप मत सुनें। उससे कोई संबंध नहीं है। आपके भीतर दुविधा होबेचैनी होतनाव होआपके भीतर निर्णय में कठिनाई होआपके भीतर खंड-खंड आदमी हो और आप भी भीतर से टूट गए होंडिसइंटिग्रेटेड होंतो ही आने वाली बात आपके अर्थ की हो सकती है।
शेष कल सुबह!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें