सोमवार, 22 अगस्त 2016

गीता दर्शन-(भाग-01)-प्रवचन-008

मरणधर्मा शरीर
और
अमृतअरूप आत्मा

प्रश्न: भगवान श्री,
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।

इस श्लोक के बारे में सुबह जो चर्चा हुईउसमें आत्मा यदि हननकर्ता नहीं या हनन्य भी नहीं हैतो जनरल डायर या नाजियों के कनसनट्रेशन कैंप की घटनाएं कैसे जस्टिफाई हो सकती हैं! टोटल एक्सेप्टिबिलिटी में इनकी क्या उपादेयता है?


न कोई मरता है और न कोई मारता हैजो हैउसके विनाश की कोई संभावना नहीं है। तब क्या इसका यह अर्थ लिया जाए कि हिंसा करने में कोई भी बुराई नहीं हैक्या इसका यह अर्थ लिया जाए कि जनरल डायर ने या आउश्वित्ज में जर्मनी में या हिरोशिमा में जो महान हिंसा हुईवह निंदा योग्य नहीं हैस्वीकार योग्य है?

नहींकृष्ण का ऐसा अर्थ नहीं है। इसे समझ लेना उपयोगी है। हिंसा नहीं होतीइसका यह अर्थ नहीं है कि हिंसा करने की आकांक्षा बुरी नहीं है। हिंसा तो होती ही नहींलेकिन हिंसा की आकांक्षा होती हैहिंसा का अभिप्राय होता हैहिंसा की मनोदशा होती है।
जो हिंसा करने के लिए इच्छा रख रहा हैजो दूसरे को मारने में रस ले रहा हैजो दूसरे को मारकर प्रसन्न हो रहा है,जो दूसरे को मारकर समझ रहा है कि मैंने मारा--कोई नहीं मरेगा पीछे--लेकिन इस आदमी की यह समझ कि मैंने माराइस आदमी का यह रस कि मारने में मजा मिलाइस आदमी की यह मनोकांक्षा कि मारना संभव हैइस सबका पाप है।
पाप हिंसा होने में नहीं हैपाप हिंसा करने में है। होना तो असंभव हैकरना संभव है। जब एक व्यक्ति हिंसा कर रहा हैतो दो चीजें हैं वहां। हिंसा की घटना तोकृष्ण कहते हैंअसंभव हैलेकिन हिंसा की मनोभावना बिलकुल संभव है।
ठीक इससे उलटा भी सोच लें कि फिर क्या महावीर की अहिंसा और बुद्ध की अहिंसा का कोई अर्थ नहींअगर हिरोशिमा और आउश्वित्ज के कनसनट्रेशन कैंप्स में होने वाली हिंसा का कोई अर्थ नहीं हैतो बुद्ध और महावीर की अहिंसा का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता। अगर आप समझते हों कि अहिंसा का अर्थ तभी हैजब हम किसी मरते और मिटते को बचा पाएंतो कोई अर्थ नहीं है।
नहींमहावीर और बुद्ध की अहिंसा का अर्थ और है। यह बचाने की आकांक्षायह न मारने की आकांक्षा! यह मारने में रस न लेने की स्थितियह बचाने में रस लेने का मनोभाव! जब महावीर एक चींटी को बचाकर निकलते हैंतो ऐसा नहीं है कि महावीर के बचाने से चींटी बच जाती है। चींटी में जो बचने वाला हैबचा ही रहेगाऔर जो नहीं बचने वाला हैवह महावीर के बचाने से नहीं बचता है। लेकिन महावीर का यह भाव बचाकर निकलने का बड़ा कीमती है। इस भाव से चींटी को कोई लाभ-हानि नहीं होतीलेकिन महावीर को जरूर होती है।
बहुत गहरे में प्रश्न भाव का हैघटना का नहीं है। बहुत गहरे में प्रश्न भावना का हैवह व्यक्ति क्या सोच रहा है। क्योंकि व्यक्ति जीता है अपने विचारों में घिरा हुआ। घटनाएं घटती हैं यथार्थ मेंव्यक्ति जीता है विचार मेंभाव में।
हिंसा बुरी हैकृष्ण के यह कहने के बाद भी बुरी है कि हिंसा नहीं होती। और कृष्ण का कहना जरा भी गलत नहीं है। असल में कृष्ण अस्तित्व से कह रहे हैंअस्तित्व के बीच खोज रहे हैं।
हिटलर जब लोगों को मार रहा हैतो कृष्ण की मनोदशा में नहीं है। हिटलर को लोगों को मारने में रस और आनंद है--मिटाने मेंविनाश करने में। विनाश होता है या नहीं होता हैयह बिलकुल दूसरी बात है। लेकिन हिटलर को विनाश में रस है। यह रस हिंसा है।
अगर ठीक से समझेंतो विनाश का रस हिंसा हैमारने की इच्छा हिंसा है। मरना होता है या नहीं होता हैयह बिलकुल दूसरी बात है। और यह जो रस हिटलर का हैयह एक डिसीज्डरुग्ण चित्त का रस है।
समझ लेना जरूरी है कि जब भी विनाश में रस मालूम पड़ेतो ऐसा आदमी भीतर विक्षिप्त है। जितना ही भीतर आदमी शांत और आनंदित होगाउतना ही विनाश में रस असंभव है। जितना ही भीतर आनंदित होगाउतना सृजन में रस होगाउतना क्रिएटिविटी में रस होगा।
महावीर की अहिंसा एक क्रिएटिव फीलिंग हैजगत के प्रति एक सृजनात्मक भाव है। हिटलर की हिंसा जगत के प्रति एक विनाशात्मक भाव हैएक डिस्ट्रक्टिव भाव है। यह भाव महत्वपूर्ण है। और जहां हम जी रहे हैंवहां अस्तित्व में क्या होता हैयह मूल्यवान नहीं है।
मैं एक छोटी-सी घटना से समझाने की कोशिश करूं।
कबीर के घर बहुत भक्त आते हैं। गीतभजन...। और जब जाने लगते हैंतो कबीर कहते हैंभोजन करते जाएं। फिर कबीर का बेटा और पत्नी परेशान हो गए। बेटे ने एक दिन कहा कि अब बरदाश्त के बाहर है। हम कब तक कर्ज लेते जाएं! यह हम कहां से लोगों को खिलाएं! अब आप कहना बंद करें।
कबीर ने कहा कि मुझे याद ही नहीं रहतीजब घर कोई मेहमान आता हैतो मुझे खयाल ही नहीं रहता कि घर में कुछ नहीं है। और घर कोई आया हो तो कैसे खयाल रखा जाए कि घर में कुछ नहीं है! तो मैं कहे ही जाता हूं कि भोजन करते जाएं। फिर तो बेटे ने कहातो क्या हम चोरी करने लगेंव्यंग्य में कहाक्रोध में कहा कि क्या हम चोरी करने लगें! कबीर ने कहा कि अरेतुझे यह पहले खयाल क्यों न आया! वह बेटा तो हैरान हुआक्योंकि उसे आशा न थी कि कबीर और ऐसा कहेंगे। तो उसने कहातो फिर आज मैं चोरी करने जाऊंवह बेटा भी साधारण नहीं थाकबीर का ही बेटा था। मैं आज चोरी करने जाऊंकबीर ने कहाबिलकुल। तो बेटे ने और परीक्षा लेने के लिए कहाआप भी चलिएगाकबीर ने कहाचला चलूंगा।
रात हो गईबेटे ने कहाचलें। बेटा भी आखिरी तर्क की सीमा तक देखना चाहता था कि बात क्या हैक्या कबीर चोरी करने को राजी हैंकबीर--और चोरी करने को राजी! बेटे की समझ के बिलकुल बाहर है। अर्जुन की समझ के भी बाहर है कि कृष्ण हिंसा करने को राजी हैं।
ले गया कबीर का बेटा कमाल कबीर को। फिर जाकर दीवार तोड़ी। दीवार तोड़कर बीच-बीच में देखता भी रहा। कबीर उससे कहते हैंइतना घबड़ाता क्यों हैइतना कंपता क्यों हैउसने दीवार भी तोड़ ली। फिर उसने कहामैं भीतर जाऊं?कबीर ने कहा कि जरूर जा। वह भीतर भी गया। वह एक गेहूं का बोरा घसीटकर भी लाया। उसने सोचाअब रोकेंगेअब रोकेंगे। अब तो बहुत हो गयाहद्द हो गई। कबीर ने बोरा भी बाहर निकलवा लिया। फिर बेटे से कहाभीतर जाकरघर में लोग सोए होंगेउनको कह आओ कि तुम्हारे घर चोरी हो गई हैहम एक बोरा ले जा रहे हैं। तो उस बेटे ने कहायह किस प्रकार की चोरी हैचोरी कहीं बताई जाती हैतो कबीर ने कहा कि जो चोरी बताई नहीं जा सकतीवह फिर पाप हो गई। खबर करो! तो बेटे ने कहा कि मैं इतनी देर से परेशान ही था कि यह किस तरह आप चोरी करवा रहे हैं! कबीर ने कहामुझे याद ही न रहाक्योंकि जब से यह दिखाई पड़ने लगा कि सभी एक हैंतब से कुछ अपना न रहाकुछ पराया न रहा। वह दूसरे का हैतब चोरी पाप है। लेकिन वह याद ही न रहातूने ठीक याद दिला दिया। लेकिन तूने पहले याद क्यों न दिलाया!
कबीर कह रहे हैंवह दूसरे का हैतब तक तो चोरी पाप है। लेकिन अगर दूसरे की कोई चीज नहीं रह गईअगर सभी एक का ही हैऔर उस तरफ जो श्वास चलती हैवह भी मेरी हैऔर इस तरफ जो श्वास चलती हैवह भी मेरी है--तो इस तल पर चोरी के पाप होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। लेकिन यह अस्तित्व के तल की बात हुई। यह ब्रह्मज्ञान में प्रविष्ट व्यक्ति की बात हुई।
तो कबीर ने कहाअगर न जगा सकता हो तो वापस लौटा दे। क्योंकि अपने को ही अगर हम खबर करने में डरते हैंतो चीज फिर अपनी नहीं है। तो फिर वापस लौटा दे। किससे बचकर ले जाना है?
अब यह बहुत दो तलों की बात हो गईयह दो एक्झिस्टेंस की बात हो गई। इसे ठीक से खयाल में ले लें। एक तो अस्तित्व का जगत हैजहां सभी कुछ परमात्मा का हैवहां चोरी नहीं हो सकती। कबीर उसी जगत में जी रहे हैं। एक मनोभावों का जगत हैजहां दूसरा दूसरा हैमैं मैं हूंमेरी चीज मेरी हैदूसरे की चीज दूसरे की है। वहां चोरी होती हैहो रही हैहो सकती है।
जब तक दूसरे की चीज दूसरे की हैतब तक चोरी पाप है। चोरी घटित होती नहींसिर्फ चीजें यहां से वहां रखी जाती हैं। चोरी की क्या घटना घट सकती है इस जमीन पर! कल न मैं रहूंगान आप रहेंगे। मेरी चीजें भी मेरी नहीं रह जाएंगीआपकी चीजें भी आपकी नहीं रह जाएंगी। चीजें यहां पड़ी हैं--इस घर में या उस घर मेंक्या फर्क पड़ेगा!
अस्तित्व के तल पर चोरी नहीं घटतीभाव के तल पर चोरी घटती है। अगर हिटलर यह कह सके कि मरने में हिंसा होती ही नहींतो हिटलर को फिर अपने आस-पास संतरी खड़े करने की जरूरत नहीं। फिर वह आउश्वित्ज में मारे लोगों कोतो हमें कोई एतराज न होगा। लेकिन खुद को बचाने के लिए जो तत्पर हैदूसरे को मारने को जो आतुर हैवह जानता हैमानता है कि हिंसा होती है। खुद को जो बचा रहा है।
अगर कृष्ण अर्जुन से यह कहें कि ये कोई मरने वाले नहीं हैंबेफिक्री से मारलेकिन तू मरने वाला हैजरा अपने को सम्हालनाबचाना। तब फिर बेईमानी हो जाएगी। लेकिन कृष्ण उससे कहते हैं कि न कोई मरता हैन कोई मारा जाता है। अगर ये भी तुझे मार डालेंतो भी कुछ मरता नहीं। अगर तू भी इन्हें मार डालेतो भी कुछ मरता नहीं। वे बहुत अस्तित्व की गहरी बात कह रहे हैं। इतना स्मरण रखना जरूरी है।
हिरोशिमा में हिंसा हुईक्योंकि जिन्होंने बम पटकावे मारने के लिए पटके थे। हिटलर ने हिंसा कीक्योंकि वह मानकर चल रहा है कि दूसरे को मार रहे हैं। मरता हैनहीं मरता हैयह बहुत दूसरी बात है। इससे हिटलर का कोई लेना-देना नहीं है। जब तक मैं अपने को बचाने को उत्सुक हूंतब तक मैं दूसरे को मारने को सिद्धांत नहीं बना सकता। जब तक मैं कहता हूंयह मेरी चीज हैकोई चोरी न कर ले जाएतब तक मैं दूसरे के घर चोरी करने जाऊंतो वह चोरी कबीर की चोरी नहीं हो सकती। कबीर की चोरी चोरी ही नहीं है। कृष्ण की हिंसा हिंसा ही नहीं है।
इसलिए सवाल उचित है। कृष्ण की गीता और कृष्ण का संदेश समझकर कोई अगर ऐसा समझ ले कि दूसरे को मारना मारना ही नहीं हैबिलकुल झूठ हैसमझेलेकिन खुद का मारा जाना भी मारा जाना नहीं हैइस शर्त को ध्यान में रखकरतब कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अपने को बचाए और दूसरे को मारे--और मजा यह है कि हम अपने को बचाने के लिए ही दूसरे को मारते हैं--तब फिर कृष्ण को भूल ही जाएं तो अच्छा है।
खतरा हुआ है। इस मुल्क ने जीवन के इतने गहरे सत्यों को पहचाना थाउसकी वजह से यह मुल्क बुरी तरह पतित हुआ है। असल में बहुत गहरे सत्य बेईमान आदमियों के हाथों में पड़ जाएंतो असत्यों से बदतर सिद्ध होते हैं। इस मुल्क ने इतने गहरे सत्यों को पहचाना था कि उन सत्यों को जब तक हम पूरा न जान लेंतब तक उनका आधा उपयोग नहीं कर सकते।
इस मुल्क ने भलीभांति जाना था कि व्यवहार तो माया हैवह तो सपना है। तो फिर ठीक हैबेईमानी में कौन-सी बुराई है! अगर यह मुल्क पांच हजार साल की निरंतर चिंतना के बाद आज पृथ्वी पर सर्वाधिक बेईमान हैतो उसका कारण है। अगर हम इतनी अच्छी बातें करने के बाद भी जीवन में एकदम विपरीत सिद्ध होते हैंतो उसका कारण है। उसका कारण यही है कि जिस तल पर बातें हैंउस तल पर हम नहीं उठतेबल्कि जिस तल पर हम हैंउसी तल पर उन बातों को ले आते हैं।
कृष्ण के तल पर अर्जुन उतरेउठेतब तो ठीक। और अगर अर्जुन कृष्ण को अपने तल पर खींच लाएतो खतरा होने वाला है। और अक्सर ऐसा होता है कि कृष्ण के तल तक उठना तो मुश्किल हो जाता हैकृष्ण को ही खींचकर हम अपने तल पर ले आते हैं। तब हम ऐट ईज़सुविधा में हो जाते हैं। तब हम कह पाते हैंसब माया हैसब माया है;बेईमानी कर पाते हैंकह पाते हैंमाया है। अब बड़े मजे की बात है कि जिस आदमी को माया दिखाई पड़ रही हैवह आदमी बेईमानी करने में इतना रसलिप्त हो सकता है?
एक मित्र आए। कहने लगेजब से ध्यान करने लगा हूंतो मन सरल हो गया है। एक आदमी धोखा देकर मेरा झोला ले गया। ऐसे तो सब माया है--उन्होंने कहा--ऐसे तो सब माया हैलेकिन वह धोखा दे गयाझोला ले गया। अब आगे ध्यान करूं कि न करूंऐसे तो सब माया है--इसे वे बार-बार कहते हैं। मैंने कहाऐसे तो सब माया हैतो इतना झोले से क्यों परेशान हो रहे हैंऔर ऐसे सब माया हैतो वह आदमी क्या धोखा दे गयाऔर ऐसे सब माया हैतो किसका झोला कौन ले गया है?
नहींउन्होंने कहाऐसे तो सब माया हैलेकिन पूछने मैं यह आया हूं कि अगर ऐसा ध्यान में सरल होता जाऊंऔर हर कोई धोखा देने लगे!
अब ये दो तलों की बातें हैं। उनके खयाल में नहीं पड़तींकि वह ऐसे तो सब माया हैकृष्ण से सुन लियाऔर वह जो झोला चोरी चला गयावहां हम खड़े हैं। और यह जो बात हैयह किसी शिखर से कही गई है। हम जहां खड़े हैंवहां यह बात बिलकुल नहीं है।
इस देश के पतन मेंइस देश के चारित्रिक ह्रास मेंइस देश के जीवन में एकदम अंधकार भर जाने में और गंदगी भर जाने मेंहमारे ऊंचे से ऊंचे सिद्धांतों की हमने जो व्याख्या की हैवह कारण है।
यह सवाल ठीक है।
कृष्ण आपसे नहीं कह रहे हैं कि बेफिक्री से हिंसा करो। कृष्ण यह कह रहे हैं कि अगर यह तुम्हारी समझ में आ जाए कि कोई मरता नहींकोई मारा नहीं जातातबतब जो होता हैहोने दो। लेकिन दोहरा है यह तीर। डबल ऐरोड है। यह ऐसा नहीं है कि दूसरा मरता है तो मारोक्योंकि कोई नहीं मरता। और जब खुद मरने लगो तो चिल्लाओ कि कहीं मुझे मार मत डालना। ऐसा ही हो गया है।
हम इस देश में सर्वाधिक मानते हैं कि आत्मा अमर है और सबसे ज्यादा मरने से डरते हैं जमीन पर। हमसे ज्यादा कोई भी मरने से नहीं डरता। जिनको हम नास्तिक कहते हैंजिनको हम कहते हैं--ईश्वर को नहीं मानतेआत्मा को नहीं मानतेवे भी नहीं डरते हैं मरने से। वे भी कहते हैं कि ठीक हैमौका आ जाएजिंदगी दांव पर लगा दें। लेकिन हम एक हजार साल तक गुलाम रह सकेक्योंकि जिंदगी दांव पर लगाने की हमारी हिम्मत ही नहीं रही। हांघर में बैठकर हम बात करते हैं कि आत्मा अमर है। अगर आत्मा अमर हैतो इस मुल्क को एक सेकेंड के लिए गुलाम नहीं किया जा सकता था।
लेकिन आत्मा जरूर अमर हैलेकिन हम बेईमान हैं। आत्मा अमर हैवह हम कृष्ण से सुन लेते हैंऔर हम मरने वाले हैंयह हम भलीभांति जानते हैं। अपने को बचाए चले जाते हैं। बल्कि आत्मा अमर हैइसका पाठ रोज इसीलिए करते हैंकि भरोसा आ जाए कि मरेंगे नहीं। कम से कम मैं तो नहीं मरूंगाइसका भरोसा दिला रहे हैंइससे अपने को समझा रहे हैं। इस दो तल पर--जहां कृष्ण खड़े हैं वहांऔर जहां हम खड़े हैं वहां--वहां के फासले को ठीक से समझ लेना।
और कृष्ण की बात तभी पूरी सार्थक होगीजब आप कृष्ण के तल पर उठें। और कृपा करके कृष्ण को अपने तल पर मत लाना। हालांकि वह आसान हैक्योंकि कृष्ण कुछ भी नहीं कर सकते। आप गीता को जिस तल पर ले जाना चाहेंवहीं ले जाएं। जहां कटघरे में रहते होंगोडाउन में रहते होंनर्क में रहते होंवहीं ले जाएं गीता कोतो वहीं चली जाएगी। कृष्ण कुछ भी नहीं कर सकते।
कृपा करके जीवन के जो परम सत्य हैंउन्हें जीवन की अंधेरी गुहाओं में मत ले जाना। वे जीवन के परम सत्य शिखरों पर जाने गए हैं। आप भी शिखरों पर चढ़नातभी उन परम सत्यों को समझ पाएंगे। वे परम सत्य सिर्फ पुकार हैंआपके लिए चुनौतियां हैं कि आओ इस ऊंचाई परजहां प्रकाश ही प्रकाश हैजहां आत्मा ही आत्मा हैजहां अमृत ही अमृत है।
लेकिन जिन अंधेरी गलियों में हम जीते हैंजहां अंधेरा ही अंधेरा हैजहां प्रकाश की कोई किरण नहीं पहुंचती मालूम पड़ती। वहां यह सुनकर कि प्रकाश ही प्रकाश हैअंधकार है ही नहींअपने हाथ के दीए को मत बुझा देना--कि जब प्रकाश ही प्रकाश हैतब इस दीए की क्या जरूरत हैफूंक दो। उस दीए को बुझाने से गली और अंधेरी हो जाएगी। जहां आदमी जी रहा हैवहां हिंसा और अहिंसा का भेद है। अंधेरा है वहां। जहां आदमी जी रहा हैवहां चोरी और अचोरी में भेद है। अंधेरा है वहां। वहां कृष्ण की बात सुनकर अपने इस भेद के छोटे-से दीए को मत फूंक देना। नहीं तो सिर्फ अंधेरा घना हो जाएगाऔर कुछ भी नहीं होगा।
हांकृष्ण की बात सुनकर सिर्फ समझना इतनाएक शिखर है चेतना काजहां अंधेरा है ही नहींजहां दीया जलाना पागलपन है। पर उस शिखर की यात्रा करनी होती है। उस शिखर की यात्रा पर हम धीरे-धीरे बढ़ेंगे। कि वह शिखर कैसेकैसे हम उस जगह पहुंच जाएंजहां जीवन अमृत हैऔर जहां अहिंसा और हिंसा बचकानी बातें हैंचाइल्डिश बातें हैं। लेकिन वहां नहीं जहां हम हैंवहां बड़ी सार्थक हैंवहां बड़ी महत्वपूर्ण हैं।


न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।। २०।।
यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता हैअथवा न यह आत्माहो करके फिर होने वाला हैक्योंकि यह अजन्मानित्यशाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश होने पर भी यह नष्ट नहीं होता है।


जहां हम हैंजो हम हैंवहां सभी कुछ जात हैजन्मता है। जिससे भी हम परिचित हैंवहां अजातअजन्माकुछ भी नहीं है। जो भी हमने देखा हैजो भी हमने पहचाना हैवह सब जन्मा हैसब मरता है। लेकिन जन्म और मरण की इस प्रक्रिया को भी संभव होने के लिए इसके पीछे कोईइस सब मरने और जन्मने की शृंखला के पीछे--जैसे माला के गुरियों को कोई धागा पिरोता हैदिखाई नहीं पड़तागुरिए दिखाई पड़ते हैं--इस जन्म और मरण के गुरियों की लंबी माला को पिरोने वाला कोई अजात धागा भी चाहिए। अन्यथा गुरिए बिखर जाते हैं। टिक भी नहीं सकतेसाथ खड़े भी नहीं हो सकतेउनमें कोई जोड़ भी नहीं हो सकता। दिखती है माला ऊपर से गुरियों कीहोती नहीं है गुरियों की। गुरिए टिके होते हैं एक धागे परजो सब गुरियों के बीच से दौड़ता है।
जन्म हैमृत्यु हैआना हैजाना हैपरिवर्तन हैइस सबके पीछे अजात सूत्र--अनबॉर्नअनडाइंगअजातअमृतन जो जन्मतान जो मरता--ऐसा एक सूत्र चाहिए ही। वही अस्तित्व हैवही आत्मा हैवही परमात्मा है। सारे रूपांतरण के पीछेसारे रूपों के पीछेअरूप भी चाहिए। वह अरूप न होतो रूप टिक न सकेंगे।
फिल्म देखते हैं सिनेमागृह में बैठकर। प्रतिपल दौड़ते रहते हैं फिल्म के चित्र। चित्रों में कुछ होता नहीं बहुत। सिर्फ किरणों का जाल होता है। छाया-प्रकाश का जोड़ होता है। लेकिन पीछे एक परदा चाहिए। वह परदा बिलकुल दिखाई नहीं पड़ताजब तक फिल्म दौड़ती रहती है। उसे दिखाई पड़ना भी नहीं चाहिए। अगर वह दिखाई पड़ेतो फिल्म दिखाई न पड़ सके। जब तक फिल्म चलती रहती हैरूप आते और जाते रहते हैंतब तक पीछे थिर खड़ा परदा दिखाई नहीं पड़ता।
लेकिन उस परदे को हटा देंतो ये रूप कहीं भी प्रकट नहीं हो सकतेये आकृतियां कहीं भी प्रकट नहीं हो सकतीं। इन आकृतियों की दौड़ती हुई परिवर्तन की इस लीला में पीछे कोई थिर परदा चाहिएजो उन्हें सम्हाले। एक चित्र आएगातब भी परदा वही होगा। दूसरा चित्र आएगातब भी परदा वही होगा। तीसरा चित्र आएगातब भी परदा वही होगा। चित्र बदलते जाएंगेपरदा वही होगा। तभी इन चित्रों में एक संगतितभी इन चित्रों में एक शृंखलातभी इन चित्रों में एक संबंध दिखाई पड़ेगा। वह संबंधपीछे जो थिर परदा हैउससे ही पैदा हो रहा है।
सारा जीवन चित्रों का फैलाव है। ये चित्र टिक नहीं सकते। जन्म भी एक चित्र हैमृत्यु भी एक चित्र है--जवानी भीबुढ़ापा भीसुख भीदुख भीसौंदर्य भीकुरूपता भीसफलता-असफलता भी--वह सब चित्रों की धारा है। उन चित्रों की धारा को सम्हालने के लिए कोई चाहिएजो दिखाई नहीं पड़ेगा। उसको दिखाई पड़ने का उपाय नहीं है। जब तक चित्रों को आप देख रहे हैंतब तक वह दिखाई नहीं पड़ेगा।
वह परदे की तरह जो पीछे खड़ा हैवही अस्तित्व है। उसे कृष्ण कहते हैंवह अजातअजन्माकभी जन्मता नहींकभी मरता नहीं। लेकिन भूलकर भी आप ऐसा मत समझ लेना कि यह आपके संबंध में कहा जा रहा है। आप तो जन्मते हैं और मरते हैं। और जिस आप के संबंध में यह कहा जा रहा हैउस आप काआपको कोई भी पता नहीं है। जिस आप को आप जानते हैंवह तो जन्मता हैउसकी तो जन्मत्तारीख हैउसकी तो मृत्यु की तिथि भी होगी। कब्र पर पत्थर लगेगातो उसमें जन्म और मृत्यु दोनों की तारीखें लग जाएंगी। लोगजब आप जन्मे थेतो बैंडबाजा बजाए थेखुशी किए थे। जब मरेंगेतो रोएंगेदुखी होंगे। आप जितना अपने को जानते हैंवह सिर्फ चित्रों का समूह है।
इसे थोड़ा वैज्ञानिक ढंग से भी समझना उपयोगी है कि क्या सच में ही जिसे आप जानते हैंवह चित्रों का समूह है?
अब तो हम ब्रेनवाश कर सकते हैं। अब तो वैज्ञानिक रास्ते उपलब्ध हैंजिनसे हम आपके चित्त की सारी स्मृति को पोंछ डाल सकते हैं। एक आदमी है पचास साल काउसे पता है कि चार लड़कों का पिता हैपत्नी हैमकान हैयह उसका नाम हैयह उसकी वंशावली है। इस-इस पद पर रहा हैयह-यह काम किया है। सब पचास साल की कथा है। उसका ब्रेनवाश किया जा सकता है। उसके मस्तिष्क को हम साफ कर डाल सकते हैं। फिर भी वह होगा। लेकिन फिर वह यह भी न बता सकेगा कि मेरा नाम क्या है। और यह भी न बता सकेगा कि मेरे कितने लड़के हैं।
मेरे एक मित्र हैं डाक्टर। ट्रेन से गिर पड़े। चोट खाने से स्मृति चली गई। बचपन से मेरे साथी हैंसाथ मेरे पढ़े हैं। देखने उन्हें मैं उनके गांव गया। जाकर सामने बैठ गयाउन्होंने मुझे देखा और जैसे नहीं देखा। मैंने उनसे पूछापहचाना नहींउन्होंने कहा कि कौन हैं आपउनके पिता ने कहा कि सारी स्मृति चली गई हैजब से ट्रेन से गिरे हैंचोट लग गईसारी स्मृति चली गईकोई स्मरण नहीं है।
इस आदमी के पास इसका कोई अतीत नहीं है। चित्र खो गए। कल तक यह कहता थामैं यह हूंमेरा यह नाम है। अब वे सब चित्र खो गए। वह फिल्म वाश हो गई। वह सब धुल गया। अब यह खाली है--कोरा कागज। अब इस कोरे कागज पर फिर से लिखा जाएगा। अब उसकी नई स्मृति बननी शुरू हुई।
अभी जब दुबारा मैं मिलने गयातो उसने कहा कि आपको पता ही होगा कि तीन साल पहले मैं गिर पड़ाचोट लग गई। अब इस तीन साल की स्मृति फिर से निर्मित होनी शुरू हुई। लेकिन तीन साल के पहले वह कौन थावह बात समाप्त हो गई। हांउसे याद दिलाते हैं कि तुम डाक्टर थेतो वह कहता हैआप लोग कहते हैं कि मैं डाक्टर थालेकिन मुझे कुछ पता नहीं। मेरा इतिहास तो बस वहीं से समाप्त हो जाता हैजहां से वह घटना घट गईजहां वह दुर्घटना घट गई।
आज चीन में तो कम्युनिस्ट ब्रेनवाश को एक पोलिटिकलएक राजनैतिक उपाय बना लिए हैं। रूस में तो वह चल ही रहा है। अब आने वाली दुनिया में किसी राजनैतिक विरोधी को मारने की जरूरत नहीं होगी। क्योंकि इससे बड़ी हत्या और क्या हो सकती है कि उसके ब्रेन को वाश कर दो। विरोधी को पकड़ो और उसके मस्तिष्क को साफ कर दो। विद्युत के धक्कों सेऔर दूसरे केमिकल्स सेऔर दूसरी मानसिक प्रक्रियाओं से उसकी स्मृति को पोंछ डालो। फिर क्या बात हैसमाप्त हो गई। अगर माक्र्स के दिमाग को साफ कर दोतो कैपिटल साफ हो जाएगी। उसके दिमाग में जो हैवह मिट जाएगा। फिर उस आदमी की कोई आइडेंटिटीउसका कोई तादात्म्य पीछे से नहीं रह जाएगा।
तो हम जिसे कहते हैं मैंजो कभी पैदा हुआजो किसी का बेटा हैकिसी का पिता हैकिसी का पति हैयह सिर्फ चित्रों का संग्रह हैएलबम हैइससे ज्यादा नहीं है। अपना-अपना एलबम सम्हाले बैठे हैं। उसी को लौट-लौटकर देख लेते हैंदूसरों को भी दिखा देते हैंकोई घर में आता हैकि यह एलबम है। बाकी यह आप नहीं हैं।
अगर इस एलबम को आप समझते हों कि कृष्ण कह रहे हैं अजाततो इस गलती में मत पड़ना। यह अजात नहीं है। यह तो जन्मा है। यह तो जात है। यह मरेगा भी। जो जन्मा हैवह मरेगा भी। जन्म एक छोर हैमृत्यु दूसरा अनिवार्य छोर है। आप तो मरेंगे ही।
इस बात को ठीक से समझ लेंतो शायद उस आप को खोजा जा सकेजो कि नहीं मरेगा। लेकिन हम इसी मैं को पकड़े रह जाते हैंजो जन्मा है। यह मैं--यह मैं--मैं नहीं हूं। यह सिर्फ मेरे उस गहरे मैं पर इकट्ठे हो गए चित्र हैंजिनसे मैं गुजरा हूं।
इसलिए जापान में झेन फकीर के पास जब कोई साधक जाता है और उससे पूछता है कि मैं क्या साधना करूंतो वह कहता है कि तू यह साधना करअपना ओरिजनल फेसजो जन्म के पहले तेरा चेहरा थाउसको खोजकर आ।
जन्म के पहले कहीं कोई चेहरा होता है! अब कोई आपसे कहने लगेमरने के बाद जो आपकी शकल होगीउसको खोजकर लाइए। कोई आपसे कहे कि जन्म के पहले जो आपकी शकल थीवह खोजकर लाइए।
वे झेन फकीर ठीक कहते हैं। वे वही कहते हैंजो कृष्ण कह रहे हैं। वे यह कहते हैंउसका पता लगाओजो तुममें कभी जन्मा नहीं था। अगर ऐसे किसी सूत्र को तुम खोज सकते होजो जन्म के पहले भी थातो विश्वास रखो फिर कि वह मृत्यु के बाद भी होगा। जो जन्म के पहले थाउसे मृत्यु नहीं पोंछ सकेगी। जो जन्म के पहले थावह मृत्यु के बाद भी होगा। और जो जन्म के बाद ही हुआ हैवह मृत्यु के पहले तक ही साथी हो सकता हैउसके आगे साथी नहीं हो सकता है।
कृष्ण जब कह रहे हैं कि कोई है अजन्मानहीं जन्मतानहीं मरताजिसे शस्त्रों से छेदा नहीं जा सकता...।
आपकोमुझे छेदा जा सकता है। इसलिए ध्यान रखनाजिसे छेदा जा सकता हैकृष्ण उसके संबंध में बात नहीं कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिसे छेदा नहीं जा सकता शस्त्रों सेआग में जलाया नहीं जा सकतापानी में डुबाया नहीं जा सकता।
हमें तो छेदा जा सकता हैकोई कठिनाई नहीं है छेदे जाने में। आग में जलाए जाने में कोई कठिनाई नहीं है। पानी में डुबाए जाने में कोई कठिनाई नहीं है।
तो जो पानी में डुबाया जा सकताआग में जलाया जा सकताशस्त्रों से छेदा जा सकताउसकी यह चर्चा नहीं है। जिसके ऊपर सर्जन कुछ कर सकता हैउसकी यह चर्चा नहीं है। जिसके लिए डाक्टर कुछ कर सकता हैउसकी यह चर्चा नहीं है। डाक्टर जिससे उलझा हैवह मर्त्य है। और सर्जन जिस पर काम कर रहा हैवह मरणधर्मा है। विज्ञान की प्रयोगशाला में जिस पर खोज-बीन हो रही हैवह मरणधर्मा है। इससे उसका कोई लेना-देना नहीं है।
इसलिए अगर वैज्ञानिक सोचता हो कि अपनी प्रयोगशाला की टेबल पर किसी दिन वह कृष्ण के अजात कोअजन्मे कोअमृत को पकड़ लेगातो भूल में पड़ा है। वह कभी पकड़ नहीं पाएगा। उसके सब सूक्ष्मतम औजार उसको ही पकड़ पाएंगेजो छेदा जा सकता है। लेकिन जो नहीं छेदा जा सकताअगर वह दिखाई पड़ जाए...वह दिखाई पड़ सकता है। वह दिखाई पड़ सकता है।
सिकंदर हिंदुस्तान आया। जब हिंदुस्तान से वापस लौटता थातो हिंदुस्तान की सीमा को छोड़ते वक्त उसके मित्रों ने याद दिलाया कि जब हम यूनान से चले थेतो यूनान के दार्शनिकों ने कहा था कि हिंदुस्तान से एक संन्यासी को लेते आना।
अब संन्यासी जो हैवह सच यह है कि जगत को हिंदुस्तान की देन हैअकेली देन है। पर काफी है। सारे जगत की सारी देनें भी इकट्ठी कर ली जाएंतो एक संन्यासी भी हमने जगत को दियातो हमने बैलेंस पूरा कर दिया है। और शायद जिस दिन दुनिया की सब देनें बेकार सिद्ध हो जाएंगीउस दिन हमारा दिया संन्यास ही सारी दुनिया के लिए अर्थ का हो सकता है।
तो याद दिलाई मित्रों ने सिकंदर को कि एक संन्यासी को तो ले चलें। बहुत चीजें लूट ली हैं। धन लूट लियालेकिन धन वहां भी है। बहुमूल्य चीजेंहीरे-जवाहरात ले जा रहे हैंलेकिन वे वहां भी हैं। एक संन्यासी को भी ले चलेंजो वहां नहीं है। सिकंदर ने सोचा कि जैसे और चीजें ले जाई जा सकती हैंवैसे ही संन्यासी को ले जाने में क्या तकलीफ है! उसने कहा कि जाओपकड़ लाओकहीं कोई संन्यासी हो।
गांव में लोग गएगांव में पूछा कि कोई संन्यासी हैलोगों ने कहासंन्यासी तो हैलेकिन प्रयोजन क्या हैतुम्हारे ढंग संन्यासी के पास पहुंचने जैसे नहीं मालूम पड़ते! नंगी तलवारें हाथ में लिए होपागल मालूम पड़ते होक्या बात हैतो उन्होंने कहा कि पागल नहींहम सिकंदर के सिपाही हैं। और किसी संन्यासी को पकड़कर हम यूनान ले जाना चाहते हैं।
तो उन लोगों ने कहा कि जो संन्यासी तुम्हारी पकड़ में आ जाएसमझना कि संन्यासी नहीं है। जाओहालांकि गांव में एक संन्यासी हैहम तुम्हें उसका पता दिए देते हैं। नदी के किनारे तीस वर्षों से एक आदमी नग्न रहता है। जैसा हमने सुना हैजैसा हमने उसे देखा हैजैसा इन तीस वर्षों में हमने उसे जाना हैहम कह सकते हैं कि वह संन्यासी है। लेकिन तुम उसे पकड़ न पाओगे। परउन्होंने कहादिक्कत क्या हैतलवारें हमारे पासजंजीरें हमारे पास! उन्होंने कहातुम जाओउसी से निपटो।
वे गए। उस संन्यासी से उन्होंने कहा कि महान सिकंदर की आज्ञा है कि हमारे साथ चलो। हम तुम्हें सम्मान देंगेसत्कार देंगेशाही व्यवस्था देंगे। यूनान तुम्हें ले जाना है। कोई पीड़ा नहींकोई दुख नहींकोई रास्ते में तकलीफ नहीं होने देंगे। वह संन्यासी हंसने लगा। उसने कहा कि अगर सत्कार ही मुझे चाहिए होताअगर स्वागत ही मुझे चाहिए होताअगर सुख ही मुझे चाहिए होतातो मैं संन्यासी कैसे होताछोड़ो! सपने की बातें मत करो। मतलब की बात कहो।
तो उन्होंने कहा कि मतलब की बात यह है कि अगर नहीं जाओगेतो हम जबरदस्ती पकड़कर ले जाएंगे। तो उस संन्यासी ने कहा कि जिसे तुम पकड़कर ले जाओगेवह संन्यासी नहीं है। संन्यासी परम स्वतंत्र हैउसे कोई पकड़कर नहीं ले जा सकता। उन्होंने कहाहम मार डालेंगे। तो उस संन्यासी ने कहावह तुम कर सकते हो। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि तुम मारोगेलेकिन भ्रम में रहोगेक्योंकि तुम जिसे मारोगेवह मैं नहीं हूं। तुम अपने सिकंदर को ही लिवा लाओ। शायद उसकी कुछ समझ में आ जाए।
वे सिपाही सिकंदर को बुलाने आए। सिकंदर से उन्होंने कहा कि अजीब आदमी है। वह कहता हैमार डालोतो भी जिसे तुम मारोगेवह मैं नहीं हूं। कौन है फिर वहसिकंदर ने कहाहमने तो ऐसा कोई आदमी नहीं देखाजो मारने के बाद बचता हो। बचेगा कैसेअब सिकंदर अनुभव से कहता थाहजारों लोग मारे थे उसने। उसने कहामैंने कभी किसी आदमी को मरने के बाद बचते नहीं देखा!
गयानंगी तलवार उसके हाथ में है। संन्यासी से उसने कहा कि चलना पड़ेगा। अन्यथा यह तलवार गरदन और शरीर को अलग कर देगी। वह संन्यासी खिलखिलाकर हंसने लगा। और उसने कहा कि जिस गरदन और शरीर के अलग करने की तुम बात कर रहे होउसे मैं बहुत पहलेअलग हैऐसा जान चुका हूं। इसलिए अब तुम और ज्यादा अलग न कर सकोगे। इतनी अलग जान चुका हूं कि तुम्हारी तलवार के लिए बीच में से गुजर जाने के लिए काफी फासला हैजगह है। काफी अलग जान चुका हूंअब तुम और अलग न कर सकोगे।
सिकंदर को क्या समझ में आतीं ये बातें! उसने तलवार उठा ली। उसने कहामैं अभी काट दूंगा। देखोसिद्धांतों की बातों में मत पड़ो। फिलासफी से मुझे बहुत लेना-देना नहीं है। मैं आदमी व्यावहारिक हूंप्रैक्टिकल हूं। ये ऊंची बातें छोड़ो। एक झटका और गरदन अलग हो जाएगी। सिकंदर से उस संन्यासी ने कहातुम मारो तलवार। जिस तरह तुम देखोगे कि गरदन नीचे गिर गईउसी तरह हम भी देखेंगे कि गरदन नीचे गिर गई।
अब यह जो आदमी हैयह कह रहा है वहीजो कृष्ण कह रहे हैं--छेदने से छिदता नहींकाटने से कटता नहीं। इसलिए जब तक आप छेदने से छिद जाते हों और काटने से कट जाते होंतब तक जाननाअभी अपने होने का पता नहीं चला। जब छेदने से शरीर छिद जाता हो और भीतर अनछिदा कुछ रह जाता होजब काटने से शरीर कट जाता हो और भीतर अनकटा कुछ शेष रह जाता होजब बीमार होने से शरीर बीमार हो जाता हो और भीतर बीमारी के बाहर कोई रह जाता होजब दुख आता हो तो शरीर दुख से भर जाता हो और भीतर दुख के पार कोई खड़ा देखता रह जाता हो--तब जानना कि कृष्ण जिस आप की बात कर रहे हैंउस आप का अब तक आपको भी पता नहीं था।
अर्जुन वही बात कर रहा हैजो सिकंदर कर रहा है। टाइप भी उनका एक ही है। उनके टाइप में भी बहुत फर्क नहीं है--शरीर ही। लेकिन हम सबका भी टाइप वही है।
निरंतर खोजते रहना! कांटा तो चुभता है रोज पैर मेंतब जरा देखना कि अनचुभा भी भीतर कोई रह गयाबीमारी तो आती है रोजजरा भीतर देखनाबीमारी के बाहर कोई बचादुख आता है रोजरोनाहंसनासब आता है रोज। देखनादेखनाखोजना उसेजो इनके बाहर बच जाता है।
धीरे-धीरे खोजने से वह दिखाई पड़ने लगता है। और जब एक बार दिखाई पड़ता हैतो पता चलता है कि जिसे हमने अब तक समझा था कि मैं हूंवह सिर्फ छाया थीसिर्फ शैडो थी। छाया को ही समझा था कि मैं हूं और उसका हमें कोई पता ही नहीं थाजिसकी छाया बन रही है। छाया के साथ ही एक होकर जीए थे। वह छाया हमारी स्मृतियों का जोड़ हैहमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक बने हुए चित्रों का एलबम है।


वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्तिकम्।। २१।।
हे पृथापुत्र अर्जुनजो पुरुष इस आत्मा को नाशरहितनित्यअजन्मा और अव्यय जानता हैवह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है।


जानता है! कृष्ण कहते हैंजो ऐसा जानता है--हू नोज लाइक दिस। नहीं कहते हैं कि जो ऐसा मानता है--हू बिलीव्स लाइक दिस। कह सकते थे कि जो पुरुष ऐसा मानता है कि न जन्म हैन मृत्यु है। तब तो हम सबको भी बहुत आसानी हो जाए। मानने से ज्यादा सरल कुछ भी नहीं हैक्योंकि मानने के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता। जानने से ज्यादा कठिन कुछ भी नहीं हैक्योंकि जानने के लिए तो पूरी आत्म-क्रांति से गुजर जाना पड़ता है।
कृष्ण कहते हैंजो पुरुष ऐसा जानता है। इस जानने शब्द को ठीक से पहचान लेना जरूरी है। क्योंकि सारा धर्म जानने शब्द को छोड़कर मानने शब्द के इर्द-गिर्द घूम रहा है। सारा धर्मसारी पृथ्वी पर बहुत-बहुत नामों से जो धर्म प्रचलित हैवह सब मानने के आस-पास घूम रहा है। वह सारा धर्म कह रहा हैमानो ऐसामानोगे तो हो जाएगा। लेकिन कृष्ण कहते हैंजो जानता है।
अब जानने का क्या मतलबजानना भी दो तरह से हो सकता है। शास्त्र से कोई पढ़ लेतो भी जान लेता है। अनुभव से कोई जानेतो भी जान लेता है। क्या ये दोनों जानना एक ही अर्थ रखते हैंशास्त्र से जानना तो बड़ा सरल है। लिखा हैपढ़ा और जाना। उसके लिए सिर्फ शिक्षित होना काफी हैपठित होना काफी है। उसके लिए धार्मिक होने की कोई जरूरत नहीं है। शास्त्र से पढ़कर जो जानना हैवह जानना नहीं हैजानने का धोखा है। वह सिर्फ इन्फर्मेशन है,सूचना है।
लेकिन सूचना से धोखे हो जाते हैं। पढ़ लेते हैंअजर हैअमर हैनहीं जन्मतानहीं मरतापढ़ लेते हैंदोहरा लेते हैं। बार-बार दोहरा लेने से भूल जाते हैं कि जानते नहीं हैंसिर्फ दोहराते हैं। बहुत बार-बार दोहराने सेबहुत बार-बार दोहराने से बात ही भूल जाती है कि जो हम कह रहे हैंवह अपना जानना नहीं है।
एक आदमी शास्त्र में पढ़ ले तैरने की कलाजान ले पूरा शास्त्र। चाहे तो तैरने पर बोल सकेबोलेलिख सके तो लिखे। चाहे तो कोई युनिवर्सिटी से पीएच.डी. ले ले। डाक्टर हो जाए तैरने के संबंध में। लेकिन फिर भी उस आदमी को भूलकर नदी में धक्का मत देना। क्योंकि उसकी पीएच.डी. तैरा न सकेगी। उसकी पीएच.डी. और जल्दी डुबा देगीक्योंकि काफी वजनी होती हैपत्थर का काम करेगी।
तैरने के संबंध में जाननातैरना जानना नहीं है। सत्य के संबंध में जाननासत्य जानना नहीं है। टु नो अबाउटसंबंध में जाननाइज़ इक्वीवेलेंटबिलकुल बराबर है न जानने के। सत्य के संबंध में जाननासत्य को न जानने के बराबर है। लेकिन एकदम बराबर कहना ठीक नहीं हैथोड़ा खतरा है। सत्य को न जाननाऐसा जाननासत्य की तरफ जाने में राह बन जाती है। लेकिन सत्य को बिना जानते हुए जान लेना कि जानते हैंसत्य की तरफ जाने में बाधा बन जाती है। नहींइक्वीवेलेंट भी नहीं है।
कृष्ण के इस शब्द को बहुत ठीक से समझ लेना चाहिए। क्योंकि इस एक शब्द के आस-पास ही आथेंटिक रिलीजन,वास्तविक धर्म का जन्म होता है--जानने। मानने के आस-पास नान-आथेंटिकअप्रामाणिक धर्म का जन्म होता है। जानने से जो उपलब्ध होता हैउसका नाम श्रद्धा है। और मानने से जो उपलब्ध होता हैउसका नाम विश्वास हैबिलीफ है। और जो लोग विश्वासी हैंवे धार्मिक नहीं हैंवे बिना जाने मान रहे हैं।
यह शब्द बहुत छोटा नहीं हैबड़े से बड़ा शब्द है। लेकिन भ्रांति इसके साथ निरंतर होती रहती है। हमारे पास एक शब्द हैवेदवेद का अर्थ हैजानना। लेकिन हम तो वेद से मतलब लेते हैंसंहितावह जो किताब है। हमने कहा हैवेद अपौरुषेय हैजानना अपौरुषेय है। लेकिन हम मतलब लेते हैं कि वह जो किताब है हमारे पासवेद नाम कीवह परमात्मा की लिखी हुई है।
वेद किताब नहीं हैवेद जीवन है। लेकिन जानने को मानना बना लेना बड़ा आसान हैज्ञान को किताब बना लेना बड़ा आसान हैजानने को शास्त्र पर निर्भर कर देना बहुत आसान है। क्योंकि तब बहुत कुछ करना नहीं पड़ताजानने की जगह केवल स्मृति की जरूरत होती है। बसयाद कर लेना काफी होता है। तो बहुत लोग गीता याद कर रहे हैं!
मैं एक गांव में गया था अभीतो वहां उन्होंने एक गीता-मंदिर बनाया है। मैंने पूछाएक छोटी-सी गीता के लिए इतना बड़ा मंदिरतो उन्होंने कहा कि नहींजगह कम पड़ रही है। मैंने कहाक्या कर रहे हैं यहां आपउन्होंने कहा कि अब तक हम यहां एक लाख गीता लिखवाकर हाथ से रखवा चुके हैं। अब जगह कम पड़ रही है। हिंदुस्तान भर में हजारों लोग गीता लिख-लिखकर भेज रहे हैं। मैंने कहालेकिन यह क्या हो रहा हैइससे क्या होगाउन्होंने कहा कि कोई आदमी दस दफे लिख चुकाकोई पचास दफे लिख चुकाकोई सौ दफे लिख चुका--लिखने से ज्ञान होगा।
तो मैंने उनसे कहाछापेखाने तो परम ज्ञानी हो गए होंगे। कंपोजिटरों के तो हमको चरण पकड़ लेना चाहिएकंपोजिटर जहां मिल जाएंक्योंकि कितनी गीताएं छाप चुके वे! अब महात्माओं की तलाश प्रेस में करनी चाहिएमुद्रणशाला में करनी चाहिएअब और कहीं नहीं करनी चाहिए।
यह पागलपन क्यों पैदा होता हैहोने का कारण है। ऐसा लगता हैशास्त्र से जानना हो जाएगा। शास्त्र से सूचना मिल सकती हैइन्फर्मेशन मिल सकती हैइशारे मिल सकते हैंज्ञान नहीं मिल सकता। ज्ञान तो जीवन के अनुभव से ही मिलेगा। और जब तक जीवन के अनुभव से यह पता न चल जाए कि हमारे भीतर कोई अजन्मा हैतब तक रुकना मततब तक कृष्ण कितना ही कहेंमान मत लेना। कृष्ण के कहने से इतना ही जानना कि जब इतने जोर से यह आदमी कह रहा हैतो खोजेंतो लगाएं पता। जब इतने आश्वासन से यह आदमी भरा हैइतने सहज आश्वासन से कह रहा हैजाना है इसनेजीया है कुछदेखा है कुछ। हम भी देखेंहम भी जानेंहम भी जीएं। काश! शास्त्र इशारा बन जाए और हम यात्रा पर निकल जाएं। लेकिन शास्त्र मंदिर बन जाता है और हम विश्राम को उपलब्ध हो जाते हैं।
इस जानने शब्द को स्मरण रखनाक्योंकि पीछे कृष्ण उस पर बार-बारगहरे से गहरा जोर देते हैं।


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।। २२।।
और यदि तू कहे कि मैं तो शरीरों के वियोग का शोक करता हूंतो यह भी उचित नहीं हैक्योंकि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकरदूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता हैवैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।


वस्त्रों की भांतिजीर्ण हो गए वस्त्रों की भांति शरीर को छोड़ती है आत्मानए शरीरों को ग्रहण करती है। लेकिन वस्त्रों की भांति! हमने कभी अपने शरीर को वस्त्र की भांति अनुभव कियाऐसा जिसे हमने ओढ़ा होऐसा जिसे हमने पहना होऐसा जो हमारे बाहर होऐसा जिसके हम भीतर होंकभी हमने वस्त्र की तरह शरीर को अनुभव किया?
नहींहमने तो अपने को शरीर की तरह ही अनुभव किया है। जब भूख लगती हैतो ऐसा नहीं लगता कि भूख लगी है--ऐसा मुझे पता चल रहा है। ऐसा लगता हैमुझे भूख लगी। जब सिर में दर्द होता हैतो ऐसा नहीं लगता है कि सिर में दर्द हो रहा है--ऐसा मुझे पता चल रहा है।
नहींऐसा लगता हैमेरे सिर में दर्द हो रहा हैमुझे दर्द हो रहा है। तादात्म्यआइडेंटिटी गहरी है। ऐसा नहीं लगता कि मैं और शरीर ऐसा कुछ दो हैं। ऐसा लगता हैशरीर ही मैं हूं।
कभी आंख बंद करके यह देखाशरीर की उम्र पचास वर्ष हुईमेरी कितनी उम्र हैकभी आंख बंद करके दो क्षण सोचाशरीर की उम्र पचास साल हुईमेरी कितनी उम्र हैकभी आंख बंद करके चिंतन किया कि शरीर का तो ऐसा चेहरा हैमेरा कैसा चेहरा हैकभी सिर में दर्द हो रहा हो तो आंख बंद करके खोज-बीन की कि यह दर्द मुझे हो रहा है या मुझसे कहीं दूर हो रहा है?
पिछले महायुद्ध में एक बहुत अदभुत घटना घटी। फ्रांस में एक अस्पताल में एक आदमी भरती हुआ--युद्ध में बहुत आहतचोट खाकर। उसका पूरा का पूरा पैर जख्मी हो गया। अंगूठे में उसे भयंकर पीड़ा है। चीखता हैचिल्लाता हैबेहोश हो जाता है। होश आता हैफिर चीखता और चिल्लाता है। रात उसे डाक्टरों ने बेहोश करके घुटने से नीचे का पूरा पैर काट डाला। क्योंकि उसके पूरे शरीर के विषाक्त हो जाने का डर था।
चौबीस घंटे बाद वह होश में आया। होश में आते ही उसने चीख मारी। उसने कहामेरे अंगूठे में बहुत दर्द हो रहा है! अंगूठा अब था ही नहीं। पास खड़ी नर्स हंसी और उसने कहाजरा सोचकर कहिए। सचअंगूठे में दर्द हो रहा हैउसने कहाक्या मजाक कर रहा हूंअंगूठे में मुझे बहुत भयंकर दर्द हो रहा है। कंबल पड़ा है उसके पैर परउसे दिखाई तो पड़ता नहीं।
उस नर्स ने कहाऔर जरा सोचिएथोड़ा भीतर खोज-बीन करिए। उसने कहाखोज-बीन की बात क्या हैदर्द इतना साफ है। नर्स ने कंबल उठाया और कहादेखिए अंगूठा कहां हैअंगूठा तो नहीं था। आधा पैर ही नहीं था। पर उस आदमी ने कहा कि देख तो रहा हूं कि अंगूठा नहीं हैआधा पैर भी कट गया हैलेकिन दर्द फिर भी मुझे अंगूठे में हो रहा है।
तब तो एक मुश्किल की बात हो गई। चिकित्सक बुलाए गए। चिकित्सकों के सामने भी पहली दफा ऐसा सवाल आया था। जो अंगूठा नहीं हैउसमें दर्द कैसे हो सकता हैलेकिन फिर जांच-पड़ताल कीतो पता चला कि हो सकता है। जो अंगूठा नहीं हैउसमें भी दर्द हो सकता है। यह बड़ी मेटााफिजिकल बात हो गईयह तो बड़ा अध्यात्म हो गया। डाक्टरों ने पूरी जांच-पड़ताल कीतो लिखा कि वह आदमी ठीक कह रहा हैदर्द उसे अंगूठे में हो रहा है।
तब तो उस आदमी ने भी कहा कि क्या मजाक कर रहे हैं! पहले उन्होंने उससे कहा थाक्या मजाक कर रहे होफिर उस आदमी ने कहा कि कैसी मजाक कर रहे हैं! मैं जरूर किसी भ्रम में पड़ गया होऊंगा। लेकिन आप भी कहते हैं कि दर्द हो सकता है उस अंगूठे मेंजो नहीं है! तो डाक्टरों ने कहाहो सकता है। क्योंकि दर्द अंगूठे में होता हैपता कहीं और चलता है। अंगूठे और पता चलने की जगह में बहुत फासला है। जहां पता चलता हैवह चेतना है। जहां दर्द होता हैवह अंगूठा है। दर्द से चेतना तक संदेश लाने के लिए जिन स्नायुओं का काम रहता हैभूल से वे स्नायु अभी तक खबर दे रहे हैं कि दर्द हो रहा है।
जब अंगूठे में दर्द होता हैतो उससे जुड़े हुए स्नायुओं के तंतु कंपने शुरू हो जाते हैं। कंपन से ही वे खबर पहुंचाते हैं। जैसे टिक-टिकटिक-टिक से टेलिग्राफ में खबर पहुंचाई जाती हैऐसा ही कंपित होकर वे स्नायु खबर पहुंचाते हैं। कई हेड आफिसेज से गुजरती है वह खबर आपके मस्तिष्क तक आने में। फिर मस्तिष्क चेतना तक खबर पहुंचाता है। इसमें कई ट्रांसफार्मेशन होते हैं। कई कोड लैंग्वेज बदलती हैं। कई बार कोड बदलता हैक्योंकि इन सबकी भाषा अलग-अलग है।
तो कुछ ऐसा हुआ कि अंगूठा तो कट गयालेकिन जो संदेशवाहक नाड़ियां खबर ले जा रही थींवे कंपती ही रहीं। वे कंपती रहींतो संदेश पहुंचता रहा। संदेश पहुंचता रहा और मस्तिष्क कहता रहा कि अंगूठे में दर्द हो रहा है।
क्या ऐसा हो सकता है कि हम एक आदमी के पूरे शरीर को अलग कर लें और सिर्फ मस्तिष्क को निकाल लेंअब तो हो जाता है। पूरे शरीर को अलग किया जा सकता है। मस्तिष्क को बचाया जा सकता हैअकेले मस्तिष्क को। अगर एक आदमी को हम बेहोश करें और उसके पूरे शरीर को अलग करके उसके मस्तिष्क को प्रयोगशाला में रख लें और अगर मस्तिष्क से हम पूछ सकें कि तुम्हारा शरीर के बाबत क्या खयाल हैतो वह कहेगा कि सब ठीक है। कहीं कोई दर्द नहीं हो रहा है। शरीर है ही नहीं। वह कहेगासब ठीक है।
शरीर का जो बोध हैवह कृष्ण कहते हैंवस्त्र की भांति है। लेकिन वस्त्र ऐसाजिससे हम इतने चिपट गए हैं कि वह वस्त्र नहीं रहाहमारी चमड़ी हो गया। इतने जोर से चिपट गए हैंइतना तादात्म्य है जन्मों-जन्मों काकि शरीर ही मैं हूंऐसी ही हमारी पकड़ हो गई है। जब तक यह शरीर और मेरे बीच डिस्टेंसफासला पैदा नहीं होतातब तक कृष्ण का यह सूत्र समझ में नहीं आएगा कि जीर्ण वस्त्रों की भांति...।
यहथोड़े-से प्रयोग करेंतो खयाल में आने लगेगा। बहुत ज्यादा प्रयोग नहींबहुत थोड़े-से प्रयोग। सत्य तो यही हैजो कहा जा रहा है। असत्य वह हैजो हम माने हुए हैं। लेकिन माने हुए असत्य वास्तविक सत्यों को छिपा देते हैं। माना हुआ है हमनेवह हमारी मान्यता है। और बचपन से हम सिखाते हैं और मान्यताएं घर करती चली जाती हैं।
हमने माना हुआ है कि मैं शरीर हूं। शरीर सुंदर होता हैतो हम मानते हैंमैं सुंदर हूं। शरीर स्वस्थ होता हैतो हम मानते हैंमैं स्वस्थ हूं। शरीर को कुछ होता हैतो हम मैं के साथ एक करके मानते हैं। फिर यह प्रतीति गहरी होती चली जाती हैयह स्मृति सघन हो जाती है। फिर शरीर वस्त्र नहीं रह जाताहम ही वस्त्र हो जाते हैं।
एक मेरे मित्र हैं। वृद्ध हैंसीढ़ियों से पैर फिसल पड़ा उनका। पैर में बहुत चोट पहुंची। कोई पचहत्तर साल के वृद्ध हैं। गया उनके गांव तो लोगों ने कहातो मैं उन्हें देखने गया। बहुत कराहते थे और डाक्टरों ने तीन महीने के लिए उनको बिस्तर पर सीधा बांध रखा था। और कहा कि तीन महीने हिलना-डुलना नहीं। सक्रिय आदमी हैंपचहत्तर साल की उम्र में भी बिना भागे-दौड़े उन्हें चैन नहीं। तीन महीने तो उनको ऐसा अनंत काल मालूम होने लगा।
मैं मिलने गयातो कोई छह-सात दिन हुए थे। रोने लगे। हिम्मतवर आदमी हैं। कभी आंख उनकी आंसुओं से भरेगीमैंने सोचा नहीं था। एकदम असहाय हो गए और कहा कि इससे तो बेहतर हैमैं मर जाता। ये तीन महीने इस तरह बंधे हुए! यह तो बिलकुल नर्क हो गया। यह मैं न गुजार सकूंगा। मुझसे बोलेमेरे लिए प्रार्थना करिए कि भगवान मुझे उठा ही ले। अब जरूरत भी क्या है। अब काफी जी भी लिया। अब ये तीन महीने इस खाट पर बंधे-बंधे ज्यादा कठिन हो जाएंगे। तकलीफ भी बहुत हैपीड़ा भी बहुत है।
मैंने उनसे कहाछोटा-सा प्रयोग करें। आंख बंद कर लें और पहला तो यह काम करें कि तकलीफ कहां हैएक्जेक्ट पिन प्वाइंट करें कि तकलीफ कहां है। वे बोलेपूरे पैर में तकलीफ है। मैंने कहा कि थोड़ा आंख बंद करके खोज-बीन करेंसच में पूरे पैर में तकलीफ है?
क्योंकि आदमी को एग्जाजरेट करने कीबढ़ाने की आदत है। न तो इतनी तकलीफ होती हैन इतना सुख होता है। हम सब बढ़ाकर देखते हैं। आदमी के पास मैग्नीफाइंग माइंड है। उसके पास--जैसे कि कांच होता है नचीजों को बड़ा करके बता देता है--ऐसी खोपड़ी है। हर चीज को बड़ा करके देखता है। कोई फूलमाला पहनाता हैतो वह समझता है कि भगवान हो गए। कोई जरा हंस देता हैतो वह समझता है कि गएसब इज्जत पानी में मिल गई। मैग्नीफाइंग ग्लास का काम उसका दिमाग करता है।
मैंने कहाजरा खोजें। मैं नहीं मानता कि पूरे पैर में दर्द हो सकता है। क्योंकि पूरे पैर में होतातो पूरे शरीर में दिखाई पड़ता। जरा खोजें।
आंख बंद करके उन्होंने खोजना शुरू किया। पंद्रह मिनट बाद मुझसे कहा कि हैरानी की बात है। दर्द जितनी जगह फैला हुआ दिखाई पड़ता थाइतनी जगह है नहीं। बसघुटने के ठीक पास मालूम पड़ता है। मैंने कहाकितनी जगह घेरता होगाउन्होंने कहा कि जैसे कोई एक बड़ी गेंद के बराबर जगह। मैंने कहाऔर थोड़ा खोजें। और थोड़ा खोजें। उन्होंने फिर आंख बंद कर ली। और अब तो आश्वस्त थेक्योंकि दर्द इतना सिकुड़ा कि सोचा भी नहीं था कि मन ने इतना फैलाया होगा। और खोजा। पंद्रह मिनट मैं बैठा रहा। वे खोजते चले गए।
फिर उन्होंने आंख नहीं खोली। चालीस मिनटपैंतालीस मिनट--और उनका चेहरा मैं देख रहा हूंऔर उनका चेहरा बदलता जा रहा है। कोई सत्तर मिनट बाद उन्होंने आंख खोली और कहाआश्चर्य है कि वह तो ऐसा रह गयाजैसे कोई सुई चुभाता हो इतनी जगह में। फिर मैंने कहाफिर क्या हुआआपको जवाब देना थामुझे जल्दी जाना हैमैं सत्तर मिनट से बैठा हुआ हूंआप आंख नहीं खोले। उन्होंने कहा कि जब वह इतना सिकुड़ गया कि ऐसा लगने लगा कि बसएक जरा-सा बिंदु जहां पिन चुभाई जा रही होवहीं दर्द हैतो मैं उसे और गौर से देखने लगा। मैंने सोचाजो इतना सिकुड़ सकता हैवह खो भी सकता है। और ऐसे क्षण आने लगे कि कभी मुझे लगे कि नहीं है। और कभी लगे कि हैकभी लगे कि खो गया। और एक क्षण लगे कि सब ठीक हैऔर एक क्षण लगे कि वापस आ गया।
फिर मैंने कहा कि फिर भी मुझे खबर कर देनी थीतो मैं जाता। उन्होंने कहालेकिन एक और नई घटना घटीजिसके लिए मैं सोच ही नहीं रहा था। वह घटना यह घटी कि जब मैंने इतने गौर से दर्द को देखातो मुझे लगा कि दर्द कहीं बहुत दूर है और मैं कहीं बहुत दूर हूं। दोनों के बीच बड़ा फासला है। तो मैंने कहाअब ये तीन महीने इसका ही ध्यान करते रहें। जब भी दर्द होफौरन आंख बंद करें और ध्यान में लग जाएं।
तीन महीने बाद वे मुझे मिले तो उन्होंने पैर पकड़ लिए। फिर रोएलेकिन अब आंसू आनंद के थे। और उन्होंने कहा,भगवान की कृपा है कि मरने के पहले तीन महीने खाट पर लगा दियाअन्यथा मैं कभी आंख बंद करके बैठने वाला आदमी नहीं हूं। लेकिन इतना आनंद मुझे मिला है कि मैं जीवन में सिर्फ इसी घटना के लिए अनुगृहीत हूं परमात्मा का।
मैंने कहाक्या हुआ आपकोउन्होंने कहायह दर्द को मिटाते-मिटाते मुझे पता चला कि दर्द तो जैसे दीवार पर हो रहा है घर की और मैं तो घर का मालिक हूंबहुत अलग!
शरीर को भीतर से जानना पड़ेफ्राम दि इंटीरियर। हम अपने शरीर को बाहर से जानते हैं। जैसे कोई आदमी अपने घर को बाहर से जानता हो। हमने कभी शरीर को भीतर से फील नहीं किया हैबाहर से ही जानते हैं। यह हाथ हम देखते हैंतो यह हम बाहर से ही देखते हैं। वैसे ही जैसे आप मेरे हाथ को देख रहे हैं बाहर सेऐसे ही मैं भी अपने हाथ को बाहर से जानता हूं। हम सिर्फ फ्राम दि विदाउटबाहर से ही परिचित हैं अपने शरीर से। हम अपने शरीर को भी भीतर से नहीं जानते। फर्क है दोनों बातों में। घर के बाहर से खड़े होकर देखें तो बाहर की दीवार दिखाई पड़ती हैघर के भीतर से खड़े होकर देखें तो घर का इंटीरियरभीतर की दीवार दिखाई पड़ती है।
इस शरीर को जब तक बाहर से देखेंगेतब तक जीर्ण वस्त्रों की तरहवस्त्रों की तरह यह शरीर दिखाई नहीं पड़ सकता है। इसे भीतर से देखेंइसे आंख बंद करके भीतर से एहसास करें कि शरीर भीतर से कैसा हैइनर लाइनिंग कैसी हैकोट के भीतर की सिलाई कैसी हैबाहर से तो ठीक हैभीतर से कैसी हैइसकी भीतर की रेखाओं को पकड़ने की कोशिश करें। और जैसे-जैसे साफ होने लगेगावैसे-वैसे लगेगा कि जैसे एक दीया जल रहा है और उसके चारों तरफ एक कांच है। अब तक कांच से ही हमने देखा थातो कांच ही मालूम पड़ता था कि ज्योति है। जब भीतर से देखा तो पता चला कि ज्योति अलग हैकांच तो केवल बाहरी आवरण है।
और एक बार एक क्षण को भी यह एहसास हो जाए कि ज्योति अलग है और शरीर बाहरी आवरण हैतो फिर सब मृत्यु वस्त्रों का बदलना हैफिर सब जन्म नए वस्त्रों का ग्रहण हैफिर सब मृत्यु पुराने वस्त्रों का छोड़ना है। तब जीर्ण वस्त्रों की तरह यह शरीर छोड़ा जाता हैनए वस्त्रों की तरह लिया जाता है। और आत्मा अपनी अनंत यात्रा पर अनंत वस्त्रों को ग्रहण करती और छोड़ती है। तब जन्म और मृत्युजन्म और मृत्यु नहीं हैंकेवल वस्त्रों का परिवर्तन है। तब सुख और दुख का कारण नहीं है।
लेकिन यह जो कृष्ण कहते हैंयह गीता से समझ में न आएगायह अपने भीतर समझना पड़ेगा। धर्म के लिए प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं ही प्रयोगशाला बन जाना पड़ता है। यह कृष्ण जो कह रहे हैंइसको पढ़कर मत समझना कि आप समझ लेंगे। मैं जो समझा रहा हूंउसे समझकर समझ लेंगेइस भ्रांति में मत पड़ जाना। इससे तो ज्यादा से ज्यादा चुनौती मिल सकती है। लौटकर घर प्रयोग करने लग जाना। लौटकर भी क्योंयहां से चलते वक्त ही रास्ते पर जरा देखना कि यह जो चल रहा है शरीरइसके भीतर कोई अचल भी हैऔर चलते-चलते भी भीतर अचल का अनुभव होना शुरू हो जाएगा। यह जो श्वास चल रही हैयही मैं हूं या श्वासों को भी देखने वाला पीछे कोई हैतब श्वास भी दिखाई पड़ने लगेगी कि यह रही। और जिसको दिखाई पड़ रही हैवह श्वास नहीं हो सकताक्योंकि श्वास को श्वास दिखाई नहीं पड़ सकती।
तब विचारों को जरा भीतर देखने लगनाकि ये जो विचार चल रहे हैं मस्तिष्क मेंयही मैं हूंतब पता चलेगा कि जिसको विचार दिखाई पड़ रहे हैंवह विचार कैसे हो सकता है! कोई एक विचार दूसरे विचार को देखने में समर्थ नहीं है। किसी एक विचार ने दूसरे विचार को कभी देखा नहीं है। जो देख रहा है साक्षीवह अलग है। और जब शरीरविचारश्वासचलनाखानाभूख-प्याससुख-दुख अलग मालूम पड़ने लगेंतब पता चलेगा कि कृष्ण जो कह रहे हैं कि जीर्ण वस्त्रों की तरह यह शरीर छोड़ा जाता हैनए वस्त्रों की तरह लिया जाता हैउसका क्या अर्थ है। और अगर यह दिखाई पड़ जाएतो फिर कैसा दुखकैसा सुखमरने में फिर मृत्यु नहींजन्म में फिर जन्म नहीं। जो था वह हैसिर्फ वस्त्र बदले जा रहे हैं।


प्रश्न: भगवान श्रीआत्मा व्यापक हैपूर्ण हैतो पूर्ण से पूर्ण कहां जाता हैआत्मा एक शरीर से छूटकर दूसरे कौन शरीर में जाता हैकहां से शरीर में आता भी हैआत्मा का उदर-प्रवेश होउससे पहले गर्भ जीता भी कैसे है?


आत्मा न तो आता हैन जाता है। आने-जाने की सारी बात शरीर की है। मोटे हिसाब से दो शरीर समझ लें। एक शरीर तो जो हमें दिखाई पड़ रहा है। यह शरीर माता-पिता से मिलता हैजन्मता है। और इसके पास अपनी सीमा हैअपनी सामर्थ्य हैउतने दिन चलता है और समाप्त हो जाता है। यंत्र है। माता-पिता से सिर्फ यंत्र मिलता है। गर्भ में माता-पिता सिर्फ यंत्र की सिचुएशनस्थिति पैदा करते हैं। यह शरीर जो हमें दिखाई पड़ रहा हैयह जन्म के साथ शुरू होता है और मृत्यु के साथ समाप्त होता है। यह आता और जाता है।
एक और शरीर है जो आत्मा के लिए और भीतर का वस्त्र हैकहें कि अंडरवियर है। यह ऊपर का वस्त्र है यह शरीर,वह जरा भीतरी वस्त्र है। वह शरीर पिछले जन्म से साथ आता है। वह सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म हैइसका अर्थ इतना ही कि यह शरीर बहुत पौदगलिकमैटीरियल हैवह शरीर इलेक्ट्रानिक है। वह शरीर विद्युत-कणों से निर्मित है। वह जो विद्युत-कणों से निर्मित दूसरा शरीर हैवह आपके साथ पिछले जन्म से आता है। वही यात्रा करता है। वह भी यात्रा करता है।
वह शरीरदूसरा सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर में प्रवेश कर जाता हैगर्भ में प्रवेश कर जाता है। उसका प्रवेश होना वैसा ही आटोमैटिकस्वचालित हैजैसे पानी पहाड़ से उतरता हैनदियों से बहता है और सागर में चला जाता है। जैसे पानी का नीचे की तरफ बहना प्राकृतिक हैऐसा ही सूक्ष्म शरीर का अपने योग्य अनुकूल शरीर में प्रवाहित होना एकदम प्राकृतिक घटना है।
इसलिए साधारण आदमी मरता है तो तत्काल जन्म मिल जाता हैक्योंकि चौबीस घंटे पृथ्वी पर लाखों गर्भ उपलब्ध हैं। असाधारण आदमी मरता है तो समय लगता हैजल्दी गर्भ नहीं मिलता। चाहे बुरा आदमी मरे असाधारणचाहे अच्छा आदमी मरे असाधारणदोनों के लिए बहुत प्रतीक्षा का समय है। दोनों के लिए तत्काल गर्भ उपलब्ध नहीं होता। रेडीमेड गर्भ सिर्फ बिलकुल मध्यवर्गीय लोगों को मिलते हैं। उनके लिए रोज गर्भ उपलब्ध हैं। इधर मरे नहीं कि उधर गर्भ ने पुकारा नहीं। इधर मरे नहीं कि गर्भ के गङ्ढे में बहे नहीं। इसमें देर नहीं लगती।
लेकिन बहुत बुरा आदमीजैसे हिटलर जैसा आदमीतो मुश्किल हो जाती है। हिटलर के लिए मां-बाप की प्रतीक्षा में काफी समय लग जाता है। गांधी जैसे आदमी को भी काफी समय लग जाता है। इनके लिए जल्दी गर्भ उपलब्ध नहीं हो सकता। हमारे हिसाब से कभी सैकड़ों वर्ष भी लग जाते हैं। उनके हिसाब से नहीं कह रहा हूं। उनके लिए टाइम-स्केल अलग है। हमारे हिसाब से कभी सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं। जैसे ही योग्य गर्भ उपलब्ध हुआ कि वैसे ही योग्य सूक्ष्म शरीर उसमें प्रवेश कर जाता है। सारी यात्रा इन्हीं शरीरों की है। अब आत्मा किस भांति संबंधित होता है इस सब में?
असल में हमारे पास अब तक जो भी प्रतीक हैंआदमी के पासवे आने-जाने के हैं। घर में कोई आया और गया। तो आदमी तो प्रतीकों का उपयोग करेगा। प्रतीक कभी भी ठीक-ठीक नहीं होते। आने-जाने की बात बहुत ठीक नहीं है आत्मा के संबंध में। अब आत्मा को हम कैसा प्रतीककिस प्रतीक से कहें! कृष्ण के वक्त में तो प्रतीक और भी नहीं हैं। प्रतीक तो बहुत क्रूड हैं। उनसे हमें काम चलाना पड़ता है। जैसे उदाहरण के लिएएक-दो उदाहरण लेने से खयाल में आ जाए।
एक आदमी किसी समुद्र में एक छोटे-से द्वीप पर रहता है। वहां कोई फूल नहीं होते। पत्थर ही पत्थर हैं। रेत ही रेत है। वह आदमी यात्रा पर निकलता है और किसी महाद्वीप पर बहुत-से फूल देखकर लौटता है। उसके द्वीप के लोग उससे पूछते हैं कि क्या नई चीज देखीवह कहता हैफूल। वे लोग कहते हैंफूल यानी क्याव्हाट डू यू मीनतो उस द्वीप पर फूल नहीं होतेअब वह क्या करे! वह नदी के किनारे से चमकदार पत्थर उठा लाता हैरंगीन पत्थर उठा लाता है। वह कहता हैऐसे होते हैं।
निश्चित हीउस द्वीप का कोई आदमी इस पर सवाल नहीं उठाएगा। क्योंकि सवाल का कोई कारण नहीं है। लेकिन उस आदमी की--जो फूल देखकर आया है--बड़ी मुसीबत है। कोई प्रतीक उपलब्ध नहीं हैजिससे वह कहे।
हम जिस जगत में जीते हैंवहां आना-जाना प्रतीक है। तो जन्म को हम कहते हैं आनामृत्यु को हम कहते हैं जाना। लेकिन सच में ही आत्मा न आती हैन जाती है। तो इसके लिए एक प्रतीक मेरे खयाल में आता हैवह शायद और करीब हैवह आपके समझ में आ जाए।
अभी पश्चिम में उनका खयाल है कि पेट्रोल से ज्यादा दिन तक कार नहीं चलाई जा सकेगी। क्योंकि पेट्रोल ने इतना नुकसान कर दिया है। इकोलाजी का एक नया आंदोलन सारे योरोप और अमेरिका में चलता है। इतनी गंदी कर दी है हवा पेट्रोल ने कि आदमी के जीने योग्य नहीं रह गई है। तो अब पेट्रोल से कार नहीं चलाई जा सकतीतो बिजली से ही चलाई जाएगी। या तो बैटरी से चलाई जाएतो थोड़ी महंगी होगी। या बिजली से चलाई जाए। लेकिन बिजली से चलाने के लिए--कैसे चलाई जाएबिजली कार को कैसे मिलती रहे?
तो रूसी वैज्ञानिकों का एक सुझाव कीमती मालूम पड़ता है। उनका कहना हैइस सदी के पूरे होते-होते हम सारे रास्तों के नीचे बिजली के तार बिछा देंगे। सारे रास्तों के नीचे बिजली के तार बिछा देंगे। जो भी कार ऊपर से चलेगी रास्ते केनीचे से उसे बिजली चलने के लिए उपलब्ध होती रहेगी।
जैसे ट्राम चलती है आपकी। ऊपर तार होता हैउससे बिजली मिलती रहती है। ट्राम चलती हैबिजली नहीं चलती। बिजली ऊपर से मिलती रहती हैनीचे से ट्राम दौड़ती रहती है। जितनी आगे बढ़ती हैउधर से बिजली मिल जाती है। जैसे ट्राम चलती है और बिजली नहीं चलतीलेकिन ऊपर से प्रतिपल मिलती रहती है। और जब बिजली न मिलेतो ट्राम तत्काल रुक जाए। बिजली के द्वारा चलती हैलेकिन बिजली नहीं चलतीट्राम चलती है।
ठीक वैसे ही रूस का वैज्ञानिक कहता हैनीचे हम सड़कों के तार बिछा देंगेकार ऊपर से दौड़ती रहेगी। बसउसके दौड़ने से वह बिजली लेती रहेगी। कार का मीटर तय करता रहेगाकितनी बिजली आपने ली। वह आप जमा करते रहेंगे। लेकिन बिजली नहीं चलेगीचलेगी कार।
ठीक ऐसे हीआत्मा व्यापक तत्व हैवह है ही सब जगह। सिर्फ हमारा सूक्ष्म शरीर बदलता रहता हैदौड़ता रहता है। और जहां भी जाता हैआत्मा से उसे जीवन मिलता रहता है।
जिस दिन सूक्ष्म शरीर बिखर जाता हैट्राम टूट गईबिजली अपनी जगह रह जाती हैट्राम टूट जाती हैसूक्ष्म शरीर खो जाता है। तो जब सूक्ष्म शरीर खोता हैतो आत्मा परमात्मा से मिल जाती हैऐसा नहीं। आत्मा परमात्मा से सदा मिली ही हुई थीसूक्ष्म शरीर की दीवार के कारण अलग मालूम पड़ती थीअब अलग नहीं मालूम पड़ती है।
आने-जाने की जो धारणा है--आवागमन की--वह बड़ी क्रूड सिमली है। वह बहुत ही दूर की हैलेकिन कोई उपाय नहीं है। जो मैं कह रहा हूंमैं यह कह रहा हूं कि आत्मा तो चारों तरफ मौजूद हैहमारे भीतर भीबाहर भी।
अब यहां बिजली के बल्ब जल रहे हैं। एक सौ कैंडिल का बल्ब जल रहा हैएक पचास कैंडिल का जल रहा हैएक बीस कैंडिल का जल रहा हैएक बिलकुल जुगनू की तरह पांच कैंडिल का जल रहा है। इन सबके भीतर एक सी बिजली दौड़ रही है। और प्रत्येक अपनी कैंडिल के आधार पर उतनी बिजली ले रहा है। यह माइक हैइसमें तो कोई बल्ब भी नहीं लगा हुआ हैयह माइक अपनी उपयोगिता के लिए बिजली ले रहा है। रेडियो अपनी उपयोगिता की बिजली ले रहा हैपंखा अपनी उपयोगिता की बिजली ले रहा है। बिजली में कोई फर्क नहीं है--पंखे के यंत्र में फर्क हैमाइक के यंत्र में फर्क हैबल्ब के यंत्र में फर्क है।
परमात्मा चारों तरफ मौजूद है। सब तरफ वही है। हमारे पास एक सूक्ष्म यंत्र हैसूक्ष्म शरीर। उसके अनुसार हम उससे ताकत और जीवन ले रहे हैं। इसलिए अगर हमारे पास पांच कैंडिल का सूक्ष्म शरीर हैतो हम पांच कैंडिल की ताकत ले रहे हैंपचास कैंडिल का हैतो पचास कैंडिल की ले रहे हैं। महावीर के पास हजार कैंडिल का हैतो हजार कैंडिल का ले रहे हैं। हम गरीब हैं बहुतएक ही कैंडिल का सूक्ष्म शरीर हैतो एक ही कैंडिल की ले रहे हैं।
परमात्मा की कंजूसी नहीं है इसमें। हम जितना बड़ा पात्र लेकर आ गए हैंउतना ही उपलब्ध हो रहा है। हम चाहें हम हजार कैंडिल के हो जाएंतो ठीक महावीर से जैसी प्रतिभा प्रकट होती हैहमसे प्रकट हो जाए। और एक सीमा आती है कि महावीर कहते हैंहजार से भी काम नहीं चलेगाहम तो अनंत कैंडिल चाहते हैं! तो फिर कहते हैं कि बल्ब तोड़ दोतो फिर अनंत कैंडिल के हो जाओ। क्योंकि बल्ब जब तक रहेगातो सीमा रहेगी ही कैंडिल कीहजार होदो हजार होलाख होदस लाख हो। लेकिन अगर अनंत प्रकाश चाहिएतो बल्ब तोड़ दो। तो फिर महावीर कहते हैंहम बल्ब तोड़ देते हैंहम मुक्त हो जाते हैं।
मुक्त होने का कुल मतलब इतना है कि अब ले चुके यंत्रों से बहुतलेकिन देखा कि हर यंत्र सीमा बन जाता है। और जहां सीमा है वहां दुख है। इसलिए तोड़ देते हैं यंत्र कोअब हम पूरे के साथ एक ही हुए जाते हैं।
यह भाषा की गलती है कि एक ही हुए जाते हैंएक थे ही। यंत्र बीच में थाइसलिए कम मिलता था। यंत्र टूट गयातो पूरा है।
आत्मा आती-जाती नहींसूक्ष्म शरीर आता हैजाता है। स्थूल शरीर आता हैजाता है। स्थूल शरीर मिलता है माता-पिता सेसूक्ष्म शरीर मिलता है पिछले जन्म से। और आत्मा सदा से है।
सूक्ष्म शरीर न होतो स्थूल शरीर ग्रहण नहीं किया जा सकता। सूक्ष्म शरीर टूट जाएतो स्थूल शरीर ग्रहण करना असंभव है। इसलिए सूक्ष्म शरीर के टूटते ही दो घटनाएं घटती हैं। एक तरफ सूक्ष्म शरीर गिरा कि स्थूल शरीर की यात्रा बंद हो जाती है। और दूसरी तरफ परमात्मा से जो हमारी सीमा थीवह मिट जाती है। सूक्ष्म शरीर का गिर जाना ही साधना है। बीच का सेतुजो ब्रिज है बीच में हमें जोड़ने वाला--शरीर से इस तरफ और उस तरफ परमात्मा से--वह गिर जाता है। उसको गिरा देना ही समस्त साधना है।
वह सूक्ष्म शरीर जिन चीजों से बना हैउन्हें समझ लेना जरूरी है। वह हमारी इच्छाओं सेवासनाओं सेकामनाओं सेआकांक्षाओं सेअपेक्षाओं सेहमारे किए कर्मों सेहमारे न किए कर्मों से लेकिन चाहे गए कर्मों सेहमारे विचारों से,हमारे कामों सेहम जो भी रहे हैं--सोचा हैविचारा हैकिया हैअनुभव किया हैभावना की है--उस सबकाउस सबके इलेक्ट्रानिक प्रभावों सेउस सबके वैद्युतिक प्रभावों से निर्मित हमारा सूक्ष्म शरीर है।
उस सूक्ष्म शरीर का विसर्जन ही दो परिणाम लाता है। इधर गर्भ की यात्रा बंद हो जाती है। जब ज्ञान हुआ तब बुद्ध ने कहा कि घोषणा करता हूं कि मेरे मनतूजिसने अब तक मेरे लिए बहुत शरीरों के घर बनाएअब तू विश्राम को उपलब्ध हो सकता है। अब तुझे मेरे लिए कोई और घर बनाने की जरूरत नहीं। धन्यवाद देता हूं और तुझे छुट्टी देता हूं। अब तेरे लिए कोई काम नहीं बचाक्योंकि मेरी कोई कामना नहीं बची। अब तक मेरे लिए अनेक-अनेक घर बनाने वाले मनअब तुझे आगे घर बनाने की कोई जरूरत नहीं है।
मरते वक्त जब बुद्ध से लोगों ने पूछा कि अबजब कि आपकी आत्मा परम में लीन हो जाएगीतो आप कहां होंगेतो बुद्ध ने कहा कि अगर मैं कहीं होऊंगा तो परम में लीन कैसे हो सकूंगा! क्योंकि जो समव्हेयर हैजो कहीं हैवह एवरीव्हेयर नहीं हो सकतावह सब कहीं नहीं हो सकता। जो कहीं हैवह सब कहीं नहीं हो सकता। तो बुद्ध ने कहायह पूछो ही मत। अब मैं कहीं नहीं होऊंगाक्योंकि सब कहीं होऊंगा। मगर फिर-फिर पूछते हैं भक्तकि कुछ तो बताएंअब आप कहां होंगे?
बूंद से पूछ रहे हैं कि सागर में गिरकर तू कहां होगीबूंद कहती हैसागर ही हो जाऊंगी। लेकिन और बूंदें पूछना चाहेंगी कि वह तो ठीक हैलेकिन फिर भी कहां होगीकभी मिलने आएं! तो बूंदजो सागर हो रही हैवह कहती हैतुम सागर में ही आ जानातो मिलन हो जाएगा। लेकिन बूंद से मिलन नहीं होगासागर से ही मिलन होगा।
जिसे बुद्ध से मिलना होकृष्ण से मिलना होमहावीर से मिलना होजीसस सेमोहम्मद से मिलना होतो अब बूंद से मिलना नहीं हो सकता। कितना ही मूर्ति बनाकर रखे रहेंअब बूंद से मिलना नहीं हो सकता। बूंद गई सागर में,इसीलिए तो मूर्ति बनाई। यही तो मजा हैपैराडाक्स है। मूर्ति इसीलिए बनाई कि बूंद सागर में गई। बनाने योग्य हो गई मूर्ति अब इसकी।
लेकिन अब मूर्ति में कुछ मतलब नहीं है। अब तो मिलना हो तो सागर में ही जाना पड़े।
माता-पिता से मिलता है बूंद का आकारबाह्य। स्वयं के पिछले जन्मों से मिलती है बूंद की भीतरी व्यवस्था। और परमात्मा से मिलती है जीवन-ऊर्जावह है हमारी आत्मा। लेकिन जब तक इस बूंद की दोहरी परत को हम ठीक से न पहचान लेंतब तक उसको हम नहीं पहचान सकतेजो दोनों के बाहर है।
आज इतना ही। फिर कल सुबह बात करेंगे।

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